#राजा_महेंद्र_प्रताप_सिंह

आजाद हिंद सरकार के संस्थापक महान स्वतन्त्रता सेनानी #राजा_महेंद्र_प्रताप_सिंह(1 दिसम्बर 1886-29 अप्रैल1979) जयंती

राजा महेंद्र प्रताप का जन्म मुरसान के राजा बहादुर घनश्याम सिंह के यहाँ खड्ग सिंह के रूप में हुआ।
बाद में उन्हें #हाथरस के राजा हरिनारायण सिंह ने गोद ले लिया व उनका नाम महेंद्र प्रताप रखा।

उन्होने #निर्बल समाचार पत्र की स्थापना की व भारतीयों में स्वतन्त्रता के प्रति जागरूकता लाने का काम किया।

वे विदेश गए कई देशों से भारत की स्वतंत्रता के लिए सहयोग मांगा और इसके बाद #काबुल अफगानिस्तान में देश की प्रथम #आजाद_हिंद_सरकार की स्थापना की।
वहां आजाद हिंद फौज बनाई और अखंड भारत के प्रथम राष्ट्रपति के मानक पद पर आसीन हुए। लेकिन सु वे वहां कामयाब नहीं हो सके।
अंग्रेजों ने इनके #सिर पर इनमे रख दिया था व इसके बाद उनका राज्य हड़प लिया था।

इसके बाद वे दुनिया भर के देशों में समर्थन के लिए घूमे जापान में उन्होंने एग्जेक्युटिव बोर्ड ऑफ इंडिया की स्थापना की और रास बिहारी बोस उनके उपाध्यक्ष थे।
इस दौरान उन्हें
जापान से मार्को पोलो, जर्मनी ने ऑर्डर ऑफ रेड ईगल की उपाधि दी थी। वे चीन की संसद में भाषण देने वाले पहले भारतीय थे।
वे दलाई लामा से भी मिले थे।

बहुत से देशों में पहुँचे व भारतीयों पर हो रहे अत्याचार के बारे में विश्व को जागृत किया।दुनियाभर में फैले भारतीयों व उनके संगठनों को एक किया व फौज के निर्माण के।लिए प्रोत्साहित किया

उन्होंने ग़दर पार्टी के साथ मिलकर भी आजादी के लिए कार्य किया व फौज तैयार करने के लिए सारी योजनाएं बना ली।

फिर जापान से सब तैयार कर लिया लेकिन ऐन मौके पर जापानी मनमानी करते दिखे और अपमानजनक शर्ते रखने लगे तो राजा साहब ने उन्हें फटकार दिया और कहा कि वे अपने अनुसार कार्य करेंगे वे देश को आजाद कराने के लिए लड़ रहे हैं न कि फिर से गुलाम करने के लिए। इस पर जापानी बिफर पड़े उन्हके नजरबंद कर दिया। उसके बाद राजा साहब की सहमति से रास बिहारी बोस जी अध्यक्ष बने। इसी बोर्ड का नाम योजना के हिसाब से आजाद हिंद फौज रखा गया और दूसरी आजाद हिंद फौज तैयार हुई। इस तरह यह फौज एक दिन में नहीं बनी थी बल्कि राजा साहब के पूरे जीवनकाल का तप थी। उसके कुछ समय बाद आजाद हिंद फौज की बागडोर संभालने के लिए नेताजी को बुलाया गया था।

वे विश्वयुद्ध में अंग्रेजो का साथ देने के विरुद्ध थे और उन्होंने इस पर गांधी जी का विरोध किया।

उन्होंने विश्व मैत्री संघ की स्थापना की,उसी तर्ज पर आज uno बनने की शुरुआत हुई थी।

वे 32 सालों तक देश के लिए अपना परिवार छोड़कर दुनिया भर की खाक छानते रहे।
जब वे वापिस भारत पहुंचे तो #सरदार_पटेल जी की बेटी #मणिकाबेन उन्हें हवाई अड्डे पर लेने पहुंची थी।

1952 में उन्हें #नोबल पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया था।

1909 में वृन्दावन में #प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की जो तकनीकी शिक्षा के लिए भारत में प्रथम केन्द्र था। मदनमोहन मालवीय इसके उद्धाटन समारोह में उपस्थित रहे। ट्रस्ट का निर्माण हुआ-अपने पांच गाँव, वृन्दावन का राजमहल और चल संपत्ति का दान दिया। राजा साहब #श्रीकृष्ण भक्त थे उन्ही के नाम पर उन्होंने देश का यह प्रथम तकनीकी प्रेम महाविद्दालय खोला था।उन्होंने अपनी आधी सम्पति इस विद्यालय को दान कर दी थी।

बनारस #हिंदू विश्वद्यालय, अलीगढ़ विद्द्यालय, #कायस्थ पाठशाला के लिए जमीन दान में दी। हिन्दू विश्वविद्यालय के बोर्ड के #सदस्य भी रहे।

उनकी दृष्टि विशाल थी। वे जाति, वर्ग, रंग, देश आदि के द्वारा मानवता को विभक्त करना घोर अन्याय, पाप और अत्याचार मानते थे। ब्राह्मण-भंगी को भेद बुद्धि से देखने के पक्ष में नहीं थे।

वृन्दावन में ही एक विशाल फलवाले उद्यान को जो 80 एकड़ में था, 1911 में #आर्य_प्रतिनिधि_सभा उत्तर प्रदेश को दान में दे दिया। जिसमें आर्य समाज द्वारा संचालित वृन्दावन गुरुकुल है और राष्ट्रीय विश्वविद्यालय भी है।

मथुरा में किसानों के लिए #बैंक खोला, अपने राज्य के गांवों में प्रारंभिक #पाठशालाएं खुलवाई।

उनकी राष्ट्रवादी सोच के कारण कांग्रेस के नेता उन पर RSS का #एजेंट होने का आरोप लगाते रहते थे।

उन्होंने चुनावों में बड़े बड़े दिग्गजों को धूल चटा दी थी।
उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार होते हुए भी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री #अटल बिहारी वाजपेयी जी की जमानत जब्त करवा दी थी।

उन्होंने छुआछूत को कम करने के लिए दलितों के साथ एक राजा होते हुए भी खाना खाया जो उस समय एक असामान्य बात थी।उन्होके #चर्मकार समाज को जाटव की उपाधि दी थी।

उन्होंने अपनी सारी #संपत्ति देश और शिक्षा के लिए दान कर दी थी।
अपनी अफगानिस्तान यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी जी ने भी अपने भाषण में इनको नमन किया था।

आप गर्व से अपने नाम के आगे “आर्य पेशवा” लगाते थे। आपने अनेक आर्यसमाजों को अनुदान भी दिया था और स्थापना भी की थी। जिसमें से एक झज्जर जिले का खेड़ी आसरा आर्यसमाज हैं।

ऐसे महान दानवीर स्वतन्त्रता सेनानी राष्ट्रवादी समाज सुधारक राजा महेंद्र प्रताप को उनकी जयंती पर उन्हें कोटि कोटि नमन।

आविष्कार 

आविष्कार 

         गणित संख्याओं का विज्ञान है जानते हो, संख्या का अर्थ क्या होता है ? ‘संख्या’ का अर्थ होता है पूर्ण ज्ञान, निश्चयात्मक ज्ञान, पूरी जानकारी। गणित में जानकारी तो निश्चयात्मक होती है; पर निश्चय तक पहुंचने के लिए कल्पना का सहारा भी लेना पड़ता है। गणित के सवाल हल करते समय कभी तुमने भी इस तरह की कल्पना की होगी- ‘माना कि….’ । ऐसी कल्पना हम किसी के भी बारे में कर सकते हैं। आयो ! आज ऐसा ही एक सवाल करें।

           माना कि तुम दुनिया के पहले आदमी  हो और सोते से जागने पर पूरब की दिशा में उषा के सौंदर्य को देख रहे हो। अंधेरे के बाद उषा का लाल लाल प्रकाश बहुत आनंद दे रहा है न ! मालूम पड़ रहा होगा जैसे सारा सुख तुम्हारे ऊपर उंडेला जा रहा हो । सूरज की पहली किरण भी देखी होगीजैसे वही है हाथ, जो तुम पर सुख और आनन्द की वर्षा कर रहा है। हाथ अकेला है । वर्षा करनेवाला दिखाई नहीं देता। उषा भी अकेली, और यह हाथ भी अकेला, और तुम ? तुम भी अकेले । क्या लगता है यह सब तुम्हें ? अनुभव होता होगा, ‘मैं हूँ और यह उषा है, और यह हाथ है, सुख और आनंद बरसाने वाला’। कल्पना अच्छी लग रही है न ? मन में इच्छा जाग रही होगी कि उसको देखें जो सुख बरसाता है, जो आनंद बरसाता है, जो प्रकाश बरसाता है और अंधकार का नाश करता है । जानना चाहते होंगे कि कौन है वह ? कैसा होगा वह ? कितना बड़ा होगा वह ? कितने रूप वाला होगा वह ? हाँ, यह तो मन में निश्चित रूप से होगा कि वह रात के अंधेरे की तरह नहीं हो सकता; उससे भिन्न होगा; प्रकाश का केंद्र होगा। वह केवल मेरे लिए होगा, किसी और के लिए नहीं होगा। मैं सिर्फ उसके लिए होऊंगा, किसी और के लिए नहीं।

          मान रहे हो न तुम, कि तुम सबसे पहले आदमी हो और सबसे पहली उषा को देख रहे हो. सबसे पहली किरण को देख रहे हो ? लो, तैयार हो जाओ, वह आ रहा है जिसकी सबसे पहली किरण, पहला हाथ देख रहे थे। वह सुख का दाता, प्रकाश का दाता, आनन्द का दाता । कौन है वह ? वह गोले का ऊपरी हिस्सा दिखा । वह ऊंचा होता जा रहा है । आधा गोला हो गया। अब पूरा हो रहा है । तपे हुए सोने का गोला । सुनहरा प्रकाश का गोला। सूख और आनंद और प्रकाश क्या इसी में भरे हुए थे ? हां, इसी में । क्या यह किसी की गेंद है या गुब्बारा है जिसमें सुख भरा हुआ है ? अगर ऐसा होता तो यह फूटता, तब.सुख बिखेरता। यह तो सुख का पुज है, प्रकाश का पूज है। पता नहीं चलता कि इसने कौन से हाथ से सुख बरसाया था ? न जाने कितने हाथ हैं इसके ? कहां छिपे थे ये सब ? क्या रात के अंधेरे में ? अंधेरे में तो नहीं छिप सकते। अंधेरा इसको रहता है वहां अंधेरा नहीं रह सकता। यह आज पहली बार ही थोड़े आया है। रोज़ाना आता होगा, रोज़ाना आता रहेगा। कैसे सोचा यह तुमने ? तुम तो पहले आदमी हो न ? निश्चय ही तुम्हारा मन कहता होगा कि यह इतना सुख एक दिन में नहीं बटोरा जा सकता; इसे बार बार बरसना चाहिए । और, इसके साथ ही, मन यह भी कहता होगा कि ‘हाँ, यह रोजाना बरसेगा क्यों कि इस सुख बरसाने वाले के अनेक हाथ हैं। कभी इससे बरसाएगा, कभी उससे बरसाएगा; पर बरसाएगा रोज़ । नियम से आकर बरसाएगा। यह मेरा मित्र है । बड़ा प्यारा मित्र, परम मित्र । ऐसा न होता तो मेरे लिए इतना सब कुछ क्यों लाता ।

समय बड़ा बलवान 

समय बड़ा बलवान

          जीवन में समय का बड़ा महत्त्व है समय से ही जीवन है । समय की शक्ति अपार है। अंगरेजी कहावत है, Time is money, समय धन है । समय बल भी है। समय को व्यर्थ खोना धन एवं शक्ति को खोना है।

         एक दार्शनिक ने कहा था- ‘समय के सिर पर प्रागे की तरफ लम्बे बाल हैं, पीछे का हिस्सा गंजा है जब वह सामने आ रहा हो तो पकड़ा जा सकता है । निकल गया तो हाथ मलते ही रह जायोगे अब पछताये होत वया, जब चिड़िया चुग गई खेत ।

           धन-दौलत तो परिश्रम और बुद्धि-कौशल से अजित कर लो, स्वास्थ्य पौष्टिक आहार एवं उचित उपचार से पुन: प्राप्त कर लो; भूली हुई विद्या भी अभ्यास से स्मरण कर लो; किन्तु बीता हुअा समय लौटाया नहीं जा सकताकाल का पहिया आगे ही आगे बढ़ता है, पीछे नहीं र लौटता ।

           सिकन्दर की चन्द साँसें ही शेष थीं। वह अन्त समय में अपनी मां से मिलना चाहता था। सब धन-दौलत, राज-पाट देने को तैयार था। पर उससे कुछ ज्ञान भी नहीं खरीद सका । सामान सौ बरस का, पल की खबर नहीं।

          रावण भी शुभ हितकारी कार्यों को कल पर टालता रहा । कल तो कभी पाया नहीं; काल आगया इसी लिए कहा है-

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।

पल में परले होयगी, फेरि करेगो कब ॥

         युधिष्ठिर ने एक भिक्ष से कहा-कल पाना, हम कल देंगे । भीम ने उठकर ढोल बजाना शुरू किया, और कहा, ‘धर्मराज ने काल को जीत लिया है। इन्हें कल के बारे में पक्का पता है। कल ये रहेंगे, भिक्षु भी रहेगा, धन भी रहेगा और देने का मन भी रहेगा। युधिष्ठिर का भूल का अहसास हुआ । उसी समय दान किया। यह जीवन थोड़ा है। कब यमराज का बुलावा पाजाये, क्या पता ? अतः पल-पल का सदुपयोग कर लेना है । एक पल से अधिक हमारे हाथ और कुछ भी नहीं है । प्राने बाला क्षण भविष्य है; जाने वाला क्षगा भूत है वर्तमान क्षण ही तो हमारी मम्पदा है । उसे सम्हाल लो, भूतभविष्य दोनों सम्हल जायेंगे । गप्पा में, व्यर्थ की चर्चानों में, दुव्यसनों में समय नहीं गंवाना है । सिनेमा, शतरंज, ताश. ग्रादि मैं मग्न होकर कहते हैं समय काट रहे हैं। ममय काट रहे हैं या ममय हमें काट रहा है ? जो समय की उपेक्षा करते हैं, समय उन्हें बरबाद कर देता है। समय बड़ा बलवान है-

तुलसी नर का पया बड़ा, समय बड़ा बलवान ।

नीलन लूटी गोफि  का, यहि अर्जुन वहि बाण ॥

         गांधी जी बहुत व्यस्त होते हुए भी समय का पूरा लाभ उठाते थे । दातीन करते समय मन में गीता के एक प्रलोक का मनन करते-करते उसे कठस्थ कर लेते थे । इस प्रकार उन्होंने अनेक श्लोक, मंत्र कंठस्थ किये थे। समय के बदले विद्या, वृद्धि, ग्रारोग्य, लक्ष्मी. ध्यान. समाधि ग्रादि को खरीदा जा सकता हैं । भगवान ने हमें प्रचुर समय रूपी धन देकर भेजा है। हम उसे कैसे खर्च कर रहे हैं ? सीता मासे जीवन निर्माण के लिए या विनाश के लिए ? स्वामी ‘विदेह’ की ‘गाथा’ पढ़ कर विदित हुया कि वे किम प्रकार नियम व अनुशासन से समय का लाभ उठाते थे, तभी तो अल्प समय में इतना वेद-प्रचार का कार्य कर पाये । स्वामी जी प्राय: प्रवचन में कहते थे, ‘कलाई में बंधी घड़ी भी हंसती है, रोती है। जो घड़ी का ख्याल करके ठीक समय पर कार्य करते हैं उन की घड़ी हँसती है । जो समय की उपेक्षा करते है उनकी घड़ी रोती है। हम निरीक्षण करें अपनी २४ घण्टे की दिनचर्या को । किस प्रकार का है हमारा समय विभाजन । आलस्य, प्रमाद को त्यागना है । समय के मूल्य को प्रांकना है। एक-एक क्षण का भरपूर सलाम लेना है। न अपना समय व्यर्थ करना है, न दूसरों के समय को नष्ट करना है। वक्त की कद्र करनी है।

ब्रह्म की आंधी

ब्रह्म की आंधी

यथा वातश् च्यावयति भूम्या रेणुमन्तरिक्षा चाभ्रम् ।

एवा मत सर्व दुर्भूतं ब्रह्मनुत्तमपायति ।

          जब मैं ईश्वरीय नियमों के अनुसार प्रकृति में घटित होने- वाले घटनाचक्र पर दृष्टिपात करता हूँ तब मेरा मानस किसी किसी घटनाचक्र से तरंगित हो उठता है। मैं सोचने लगता है कि यह घटना मेरे अन्दर भी क्यों नहीं घटित होतीआज मेरा ध्यान ‘वायु’ की ओर गया है। अभी प्रबल झंझावात आया था, सामने के मैदान की धूल को उड़ा ले गया और अब यह भू-प्रदेश नितान्त स्वच्छ हो गया है। इस वायु की एक और करामात देखो, अांधी के बाद वृष्टि होने लगी है। आकाश में जो मेघ- घटाएं छायी हुई थीं, उन्हें झकझोर कर वायु ने नीचे बरसा दिया है जिससे भूमि वर्षा से स्नात होकर और भी अधिक निखर उठी है।

         मैं चाहता हूँ कि मेरे अन्दर भी झंझावात उठे, ब्रह्म की अांधी पाये, ईश्वरीय भावों और वैदिक भावनाओं का सांय-सांय करता हुया अंधड़ उठे । मेरे हृत्पटल पर और मस्तिष्क-भूमि में जो दुर्भावों, पापों और वासनाओं की बहुत सी धूल एकत्र हो गई है उसे वह उड़ा ले जाये तथा मेरे अन्तःकरण और मस्तिष्क को निर्मल कर दे । जैसे कभी-कभी आकाश में जल-भरे बादल छाये रहने पर भी बरसते नहीं, वैसे ही मेरे प्रात्माकाश में भी सद्भावों और सद्गुणों के बादल छाए हुए हैं । पर बरस नहीं रहे। ब्रह्म-रूप पवन, ईश्वर और वेद का प्रबल प्रभंजन उन सद्भावों और सद् गणों को झकझोर कर मेरे हृदय और मस्तिष्क पर बरसा दे। दुर्भावों के उड़ चुकने से निर्मल हुया हृदय और मस्तिष्क उन सद्भावों और सद्गुणों को आत्मसात् कर लेने के लिए योग्य भूमि सिद्ध होगा

         प्रायो, साधना द्वारा हम अपने अन्दर ब्रह्म की आंधी  उठाए और समस्त ‘दुर्भूत’ को उस आंधी के झोंके से उड़ाकर मन और मस्तिष्क की भूमियों को पवित्र कर लेवें।

वैदिक ईश्वर भक्ति

वैदिक ईश्वर भक्ति

    इस वर्णाश्रम धर्म के पालन में मनुष्य को अविचल और समर्थ बनाने के लिये है। कर्त्तव्य-पालन की शक्ति प्राप्ति के लिये हम शक्ति-भण्डार प्रभु के चरणों में बैठते हैं। ईश्वर शक्ति का अर्थ ईश्वर को रिश्वत देना खुशामद करना या गा, रिझाकर पापों के फल से छुट्टी पा लेना नहीं है, किन्तु ऐसी शक्ति और स्वभाव प्राप्त करना है। जिससे पाप और अपराध होवें ही नहीं। वेद की ईश्वर भक्ति अत्यन्त सरल हैईश्वर एक है- दो चार या दस बीस नहीं। यों उस एक ही ईश्वर के गुण कर्म और स्वभाव परक असंख्य नाम हैं पर उसका मुख्य और निज नाम ‘ओ३म्’ है। सारे संसार के मनुष्य उस एक ओ३म् प्रभु के पुत्र होने से सभी आपस में भाई-भाई हैं। पिता को प्रसन्नता इसी में है कि सभी भाई परस्पर मिलकर प्रेम पूर्वक रहें और एक दूसरे को सूखी बनाने के विचार से कार्य करें। परम पिता परमात्मा की सच्ची पूजा भी प्रभु की प्रजा की निष्काम सेवा-साधना ही है. ‘पञ्च महायज्ञों’ का विधान इसी दृष्टि से है। सब सबके सुख के लिए सोचें, सब सबके सुख के लिए कार्य करें। सब सबके सुख के लिए जियें यही वैदिक ईश्वर भक्ति का व्यावहारिक रूप है।

वैदिक ईश्वर भक्ति

वैदिक ईश्वर भक्ति

   इस वर्णाश्रम धर्म के पालन में मनुष्य को अविचल और समर्थ बनाने के लिये है। कर्त्तव्य-पालन की शक्ति प्राप्ति के लिये हम शक्ति-भण्डार प्रभु के चरणों में बैठते हैं। ईश्वर शक्ति का अर्थ ईश्वर को रिश्वत देना खुशामद करना या गा, रिझाकर पापों के फल से छुट्टी पा लेना नहीं है, किन्तु ऐसी शक्ति और स्वभाव प्राप्त करना है। जिससे पाप और अपराध होवें ही नहीं। वेद की ईश्वर भक्ति अत्यन्त सरल हैईश्वर एक है- दो चार या दस बीस नहीं। यों उस एक ही ईश्वर के गुण कर्म और स्वभाव परक असंख्य नाम हैं पर उसका मुख्य और निज नाम ‘ओ३म्’ है। सारे संसार के मनुष्य उस एक ओ३म् प्रभु के पुत्र होने से सभी आपस में भाई-भाई हैं। पिता को प्रसन्नता इसी में है कि सभी भाई परस्पर मिलकर प्रेम पूर्वक रहें और एक दूसरे को सूखी बनाने के विचार से कार्य करें। परम पिता परमात्मा की सच्ची पूजा भी प्रभु की प्रजा की निष्काम सेवा-साधना ही है. ‘पञ्च महायज्ञों’ का विधान इसी दृष्टि से है। सब सबके सुख के लिए सोचें, सब सबके सुख के लिए कार्य करें। सब सबके सुख के लिए जियें यही वैदिक ईश्वर भक्ति का व्यावहारिक रूप है।

वर्णधर्म

वर्णधर्म

            आश्रम धर्म को अधिक व्यावहारिक बनाने के लिये हैहर मनुष्य को योग्यता, कार्य क्षमता तथा स्वभाव (रूचि) एक जैसे नहीं नह होते। अतः वह समाज के लिये अधिकतम हित साधक बन सकें, इसके लिये वर्ण व्यवस्था है। सम्पूर्ण मानव समाज में मुख्यतया चार प्रवृत्ति हैं। इन्हों का नाम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य कौर शूद्र है। इनके पीछे किसी प्रकार की भी छुटाई, बड़ाई की बात नहीं है। अपनी रूचि, क्षमता और योग्यता के अनुसार किसी एक का चयन उसी के द्वारा अज्ञान, अन्याय या अभाव में से किसी एक को मिटाने के रूप में अपने समाज, राष्ट्र और विश्व की सेवा ही वर्णधर्म का रहस्य है।

वर्णधर्म

वर्णधर्म

            आश्रम धर्म को अधिक व्यावहारिक बनाने के लिये हैहर मनुष्य को योग्यता, कार्य क्षमता तथा स्वभाव (रूचि) एक जैसे नहीं नह होते। अतः वह समाज के लिये अधिकतम हित साधक बन सकें, इसके लिये वर्ण व्यवस्था है। सम्पूर्ण मानव समाज में मुख्यतया चार प्रवृत्ति हैं। इन्हों का नाम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य कौर शूद्र है। इनके पीछे किसी प्रकार की भी छुटाई, बड़ाई की बात नहीं है। अपनी रूचि, क्षमता और योग्यता के अनुसार किसी एक का चयन उसी के द्वारा अज्ञान, अन्याय या अभाव में से किसी एक को मिटाने के रूप में अपने समाज, राष्ट्र और विश्व की सेवा ही वर्णधर्म का रहस्य है।

परम पुरुष का सन्दर्शन 

परम पुरुष का सन्दर्शन 

स नो बन्धुर्जनिता, स विधाता, धामानि वेद भुवनानि विश्वा ।

यत्र देवा अमृतमानशानास, तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ।

         १) परम पुरुष निर्गुण, निराकार है; पर साधक योगी उसे अनन्त गुणों की खान समझकर उसकी गुण-गरिमा से निरन्तर प्रेरणा लेना चाहते हैं। मनुष्य और मनुष्य में जितने सम्बन्ध हो सकते हैं उनकी इति भी परम पुरुष में होती है। श्रद्धा और आदर से परम पुरुष के साथ अनेक प्रिय और आत्मीय सम्बन्धों की कल्पना करता हुआ साधक सोचता रहता है कि वह परमेश्वर हमारा बन्धु है हमको प्रात्मीयता के सूत्र में बांधने वाला हैहमारा जनक भी वही है उसी की प्रेरणा से यह सृष्टि गई है। वह इसको जन्म देकर इसका पोषण भी करता है । सृष्टि का धारक होने के कारण ही उसे विधाता कहा जाता है । वह. सृष्टि का नियामक है। वह सर्वज्ञ भी है । वह सब तेजोमय लोकों का जानकार है। सब भुवनों-तीन भुवनों का ज्ञान उसे होता है। उससे कुछ भी छिपा हुआ नहीं है।

        २) पिण्ड और ब्रह्माण्ड में हमारे पूर्वजों ने तीन, पांच या सात दिव्य लोकों की कल्पना की है पिण्ड में स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर की स्थिति वैसी ही है जैसे ब्रह्माण्ड में पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्य लोक की स्थिति है। इनसे ऊपर तुरीय स्थान प्रात्मा का है। ब्रह्माण्ड में धु लोक में स्थित सूर्य से ऊपर परम पद की कल्पना की जाती है । तुरीय लोक की सत्ता का आभास तृतीय धाम में ही हो सकता है इसलिए यहाँ परम बन्धु और जनक परमात्मा से उस तृतीय धाम की अोर प्रेरणा देने के लिए प्रार्थना की गई है ।

         ३) परमधाम की एक विशेषता का यहां उल्लेख किया गया है। वह यह कि उसमें देवगण अमृत का सेवन किया करते हैं। हमारा शरीर दिव्य और अदिव्य तत्त्वों के सम्मिलित सहयोग से चल रहा है। जब हम स्थूल शरीर से सम्बद्ध अदिव्य अर्थात् भौतिक पदार्थों से जुड़े रहते हैं तब हम मरणधर्मा होते हैं; किन्तु जब हम इस शरीर में व्याप्त दिव्य तत्त्वों से सम्बन्ध जोड़ लेते हैं तो हमारा जीवन भी जन्म-मरण के चक्कर से ऊपर उठ जाता है । अमर जीवन की खोज का यही मार्ग है। इस दिशा में बढ़ने के लिए साधना करनेवाले योगी देवताओं की तरह अमृत का सेवन करके अमर हो जाते है। इसके लिए प्रेरणा अपनी दिव्य शक्तियों के माध्यम से वही परम पुरुष देता हैं।

बन्धु, जनक वह और विधाता

 सब भुवनों का रखता ज्ञान ।

उसी लोक को ओर प्रेरते

(जहाँ) करते देव अमृत का पान ।

प्रजातंत्र ही क्यों

प्रजातंत्र ही क्यों

 महामात्य चाणक्य ने सुशासन के लिए दण्ड को सर्वोपरि साधन माना है । एक समय सारे देश में यह माग्यता प्रचलित रही है कि राज्य में जब दण्ड खड़ा रहता है तब धर्म, नीति, सदाचार, आदि सबकी सुस्थिति होती है । ऐसी स्थिति में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि प्रजातंत्र में दण्ड का क्या स्थान होना चाहिए ? महाभारत में कहा गया है कि पहले न राज्य था, न दण्ड देने वाला राजा; प्रजा स्वेच्छा से अपने अपने धर्म का पालन करती हुई परस्पर शासन कर लिया करती थी। यह आदिम प्रजातन्त्र की पद्धति थी। प्रजातांत्रिक व्यवस्था के विषय में जब जब भी चिन्तन किया जायगा तब-तब प्रादिम प्रजातंत्र की यह व्यवस्था हमारे लिए प्रेरक सिद्ध होगी।

         दण्ड क्यों दिया जाता है ? राजा तो उसको दण्ड दिया करता था जो उसकी इच्छा के अनुरूप कार्य नहीं करता था। लोगों को प्रातंकित करने के लिए भी दण्ड दिया जाता था। प्रजातंत्र में ऐसी व्यवस्था नहीं चल सकती। यहाँ तो सामूहिक इच्छा के विपरीत आचरण करने वाले को ही दण्ड दिया जा सकता है सामूहिक इच्छा सदाचार के विरुद्ध हो तो उसको एक अकेला प्रादमी भी चुनौती दे सकता है। उसे कालकोठरी में डाल दिया जाय तो भी वह अनौचित्य के प्रति विद्रोह कर सकता है। यों कहा जा सकता है कि प्रजातंत्र में समूह की शक्ति को नियन्त्रित करने के लिए समझदार व्यक्ति सदैव समूह के अनुचित निर्णयों को चुनौती देते हैं। इसलिए यह उक्ति प्रसिद्ध हो गई है कि प्रजातंत्र में ईमानदार और स्पष्ट वक्ता अधिकतर जेल में ही अपना जीवन बिताते हैं । फिर भी लोगों को राजा के निरंकुश शासन की अपेक्षा प्रजातंत्र ही प्रिय लगता हैइसका एक कारण यह है कि प्रजातंत्र में भिन्न-भिन्न रुचियों वाले लोग निर्णय लेते हैं इसलिए अनुचित दण्ड से बचने की संभावना अधिक होती हैं। दूसरा पक्ष यह भी है कि इसी संभावना के कारण प्रजातत्र में अपराधों की संख्या बढ़ने लगती है।

          वस्तुत: प्रजातंत्र ऐसी आदर्श व्यवस्था है जिसमें अपराध पनपने की संभावना ही नहीं होती । कैकेयी के भ्राता अश्वपति ने अपनी प्रजातांत्रिक व्यवस्था की विशेषता उद्घोषित करते हुए कहा था कि उनके राज्य में न चोर है, न झूठ बोलने वाला; कोई स्वैर नहीं हैं तब स्वैरिणी कहाँ से होगी। इस तरह की घोषणा वही कर सकता है जो स्वयं सदाचारी हो । नेता सदाचारी न हों तो नागरिक सदाचारी हो ही नहीं सकते हमारे पड़ोसी राष्ट्रों में प्रजातत्र नेताओं के अनाचार के कारण नष्ट हुअा है। हमारे देश में सब नेता तो सदाचारी नहीं है; पर कुछ अवश्य ही अपने चरित्र को पवित्र रखना चाहते हैं । देश उन्हीं के बल पर चल रहा है। प्रजातंत्र में दण्ड का लक्ष्य यही हो सकता है कि सदाचारी और व्यवस्थाप्रिय लोगों को उसका संरक्षण मिले । वह कठोर तो हो; पर उसका उपयोग कम से कम करना पड़े।

                                                                                                                         -पंचोली