The 10 Principles of Arya Samaj

The 10 Principles of Arya Samaj
God is the original source of all that is known by spritual knowledge and the physical sciences.
God is Existent, conscious, all-beatitude, Formless, Almighty, Just, Merciful, Unbegotten, Infinite, Unchangeable, Beginningless, Incomparable, the support of All, the Lord of All, All-pervading, Omniscient and Controller of All from within, Evermature, Imperishable, Fearless, Eternal, Pure, Creator of the Universe. He alone ought to be worshipped.
The Vedas are the books of all True knowledge. It is the paramount duty of all Aryas to read them, to teach them to others, to listen to them and to recite them to others.
All persons should always be ready to accept truth and renounce untruth.
All acts ought to be performed in conformity to Dharma(righteousness) i.e. after due consideration of truth and untruth.
The primary object of Arya Samaj is to do good to the whole world, i.e. to promote physical, spiritual and social progress of all humans.
Your dealings with all should be regulated by love and due justice, in accordance with the dictates of Dharma(righteousness).
Avidya(illusion and ignorance) be dispelled, and Vidya(realisation and acquisition of knowledge) should be promoted.
None should remain satisfied with his own progress only, but incessantly strive for the social upliftment, realizing his own benefitin the advancement of all others.
All men ought to dedicate themselves necessarily for the social good and the well being of all, subordinating their personal interest, while the individual is free to enjoy the freedom of action for individual being.

साधू की कहानी

साधू की कहानी

लेखक- आचार्य मित्रसेन, एम०ए० सिद्धान्तालंकार
प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ

एक दिन स्वामी ध्यानानन्द अपनी प्रचार-यात्रा को चल दिये। वे प्रचार करते हुए हिमालय पर्वत के पास पहुंचने वाले ही थे कि उन्हें कहीं से विचित्र ध्वनि सुनाई पड़ी। उन्होंने देखा कि धू धू करके जंगल जल रहा था। जंगल के निकट रहने वाले अपनी सम्पत्ति को बचाने का यत्न कर रहे थे। तभी सबका ध्यान एक आश्चर्यजनक घटना की ओर आकृष्ट हुआ। सभी के मुख से निकल पड़ा- “हाय! तनिक उस पेड़ की ओर तो देखो। बेचारी चिड़िया अपने घोंसले के आस-पास कैसी चक्कर लगा रही है! अरे! आग की लपटें घोंसले के पास तक पहुंच गई है, नन्ही-सी चिड़िया, अह! वह कर ही क्या सकती है? वह वहां से उड़ क्यों नहीं जाती?”
सभी मनुष्य अपनी सम्पत्ति की चिन्ता छोड़कर उसी चिड़िया की ओर देखने लगे। बहुत ही दर्दनाक दृश्य था, लपटें बढ़ते बढ़ते घोंसले के पास पहुंच गई, तब चिड़िया ने जो कार्य किया उसकी किसी को आशा तक न थी। वह शीघ्रता से घोंसले के पास उड़कर पहुंच गई। पहले उसने घोंसले के ऊपर दो तीन चक्कर लगाये और जब कोई उपाय न दीख पड़ा तो उसने अपने दोनों पंख नन्हें-नन्हें मुन्नों पर फैला दिये। देखते ही देखते वह घोंसला, चिड़िया और उसके बच्चे जल मरे।
सारी जनता दंग रह गई, इतना प्यार, अद्भुत प्रेम! और वह भी उस छोटी सी चिड़िया के हृदय में। साधु ध्यानानन्द भी हैरान थे, अचानक ही उनके मन में विचार आया जिसकी प्रेरणा से वे जनता की ओर मुड़े और बोले- “भाईयों और बहिनों! जिस चिड़िया के प्रेम को देखकर आप आश्चर्यचकित हो रहे हैं, शायद आपको पता नहीं कि इससे भी अधिक प्रेम का प्रदर्शन आपके लिए हो चुका है, इस बलिदान से बढ़कर भी एक और ने हमारे लिए अपनी बलि दे दी। वह हमें इससे भी अधिक प्यार करता था।”

कुछ क्षण रुककर उन्होंने फिर कहा- हम लोगों को अज्ञान और पाप के मार्ग से बचाने के लिए किस तरह प्रभु ने अपना एक पुत्र भेजा। उन्होंने उन्हें यह भी बताया कि किस तरह यह ईश्वर का बेटा उच्च घराने में पैदा हुआ और एक महान् योगी, सुधारक, उपकारक का जीवन बिताया। परन्तु अज्ञानी लोगों ने उसे एक बार नहीं, १४ बार जहर पिलाया और अन्त में किस क्रूर ढंग से दूध में शीशा पिलाकर समाप्त कर दिया। आज से लगभग ८० वर्ष पूर्व यह घटना राजस्थान में घटी थी।
फिर भी उस विश्वोपकारी महर्षि ने सदियों से रोगी विश्व को चंगा किया, अज्ञान के कारण अन्धे मानव को ज्ञान चाक्षु दिए, नाना रोग ग्रसित तथा छुआछात के कोढ़ी भारत को स्वस्थ किया, यहां तक कि जीवन्मृत लोगों में भी चेतना के प्राण फूंके। परन्तु क्या वह अपने जीवन को नहीं बचा सकता था? हां, उसने १३ बार मृत्यु को पीछे धकेल दिया और १४वीं बार यह सोचकर कि पिता प्रभु को उसके जीवन की आवश्यकता है, उसकी यही इच्छा है तो उसने प्रभु की इच्छा पूरी की। इसी हेतु उसने सारे शरीर पर विष से निकले रोगों के कष्ट सहन किये और मरते-मरते भी अपने हत्यारे को धन की थैली देकर कहा था- “जा विदेश भाग जा, नहीं तो तुझे पुलिस मृत्यु दण्ड दे देगी।” एक बार उसने कहा था- “मैं संसार को कैद कराने नहीं आया बल्कि कैद से छुड़ाने आया हूं।” क्योंकि वह बेड़ियां तोड़ने आया था बेड़ियां डालने नहीं।

उस साधु जिसका नाम महर्षि दयानन्द सरस्वती था, ने इतनी दया क्यों की? क्योंकि उन्हें मानवता से असीम प्रेम था, उन्हें दया में ही आनन्द आता था करुणा की वह साक्षात् मूर्ति ही था। उसे यह भी ज्ञान था कि मानव जानते और न जानते हुए अनेक पाप करते हैं, वे इस भयंकर अपराध के दण्ड को नहीं जानते और चूंकि वह हमसे बेहद प्यार करता था इसलिये उसने हमें पापाग्नि की लपटों से बचाया। चाहे स्वयं को इस हेतु शहीद कर दिया, यह हमारी मुक्ति के लिए ही था। यदि वह हमें पापों से बचाने को न चेताता तो समाधि का आनन्द ही भोगता। मानवता की रक्षा के लिए उसने आर्य समाज की स्थापना की, जो उसके निर्वाण प्राप्ति के बाद विश्व की रक्षा करता आया है।
पाप-पुण्य क्या है? लोग अब भी नहीं जानते हैं। यही कारण है कि वे निरन्तर पाप कर रहे हैं, उसका भयंकर दण्ड भी उनको भोगना पड़ता है इसीलिये सबका पतन हो गया और मानव ईश्वर की महिमा से वञ्चित हो गये हैं।

दृष्टान्त में कही गई उस वफादार चिड़िया की मृत्यु की भांति महर्षि दयानन्द विश्व के उपकार को बलिदान दे गया। आज उसका उत्तराधिकारी आर्य समाज और ग्रन्थ उस अधूरे कार्य को पूर्ण कर रहे हैं। इस प्रकार वह अब भी जीवित है और इसीलिए जीवित है कि हम भी जीवित रह सकें तथा अनन्त काल तक के लिए नया आध्यात्मिक जीवन तथा अन्त में मुक्ति प्राप्त कर सकें परन्तु ये सभी हमें उसी समय प्राप्त हो सकती है जब हम स्पष्ट रूप से आर्य समाज की शरण में आ जावें और उसके सिद्धान्तों के अनुसार उसे मुक्तिदाता स्वीकार कर लें।

पन्डित गुरुदत्त विद्यार्थी और स्वामी अच्युतानंद संवाद

पन्डित गुरुदत्त विद्यार्थी और स्वामी अच्युतानंद संवाद।

अच्युतानंद – परन्तु गुरुदत्त तुम्हें क्या हुआ ?
तुझे अपने लाल की भी चिंता नहीं ।
पुत्ररत्न की देखभाल में इतनी असावधानी!
अगले दिन यही प्रश्न पूछ लिया महात्मा ने।

पंडित गुरुदत्त – ऋषि के दीवाने, मिशन के पागल, धून के धनी ने यह कहकर टाल दिया,
“कोई बात नहीं, स्वामी जी, वह शीघ्र नीरोग हो जाएगा।”
वाणी तो इतना कह कर मौन हो गई।
पर हृदय ने मूक भाषा में भेद खोल ही दिया।

“ऐ साधु ! प्रश्न का उत्तर चाहते हो ?

सुनो मुझे ऋषि के लिए अच्युतानन्द चाहिए।
भारी से भारी मूल्य देकर भी उसे प्राप्त करूंगा और अपने मानस – पिता की झोली में डाल दूंगा।

पुत्र का क्या है? जाने कब बड़ा होगा?
बड़ा होकर आर्य समाज के कार्य के योग्य बन पाएगा या नहीं?
बन भी गया तो यह कार्य करेगा भी?

सब कुछ अनिश्चित है।
पर आप तो सन्यासी है, योग्य है, विद्वान है, आप में कार्य करने की क्षमता है। यदि कहीं आप मिल जाओ तो फिर क्या चाहिए?
साधु ! तुम एक पुत्र की बात करते हो, यहां कई होते तो भी सभी वार देता।

सुनो साधु ! मेरा एक पितृकुल है और एक ऋषिकुल।
यदि पितृकुल नष्ट हो जाए तो कोई चिन्ता नहीं।
बस, मेरे ऋषि का कुल चलना चाहिए।

हरिवंश दा की प्रसिद्ध पंक्तियों की प्रेरणा से आज के परिपेक्ष्य

हरिवंश दा की प्रसिद्ध पंक्तियों की प्रेरणा से आज के परिपेक्ष्य में आप सभी से निवेदन,,,,

शत्रु ये अदृश्य है
विनाश इसका लक्ष्य है
कर न भूल, तू जरा भी ना फिसल
मत निकल, मत निकल, मत निकल

हिला रखा है विश्व को
रुला रखा है विश्व को
फूंक कर बढ़ा कदम, जरा संभल
मत निकल, मत निकल, मत निकल

उठा जो एक गलत कदम
कितनों का घुटेगा दम
तेरी जरा सी भूल से, देश जाएगा दहल
मत निकल, मत निकल, मत निकल

संतुलित व्यवहार कर
बन्द तू किवाड़ कर
घर में बैठ, इतना भी तू ना मचल
मत निकल, मत निकल, मत निकल।
अनुरोध की जन चेतना हेतु जब तक यह दावानल थम न जाए, पंक्तियों को अग्रसारित करें।।।।

पोराणिक हिंदूओ की ८ शंकाओं का समाधान

पोराणिक हिंदूओ की ८ शंकाओं का समाधान ⚜️
(1) प्रश्न : – क्या रावण के दस सिर थे ?
☀️उत्तर : – नहीं रावण 4 वेदों और 6 शास्त्रों का विद्वान् था । तो जिसके कारण उसको दस दिमाग वाला दशानन कहा जाता था । तो इसी कारण 4 + 6 = 10 , उसको दशानन कहा जाता है । जिसका अर्थ दस सिर कदापि नहीं है ।
(2) प्रश्नः – क्या हनुमान जी बंदर थे ? और उनकी पूँछ भी थी ?
☀️उत्तर : – नहीं वे मनुष्य थे । क्योंकि जिस जाती के वे थे वह वानर जाती कहलाती है । और जैसे भील नामक जाती थी वैसे ही वानर भी थी । वानर का तात्पर्य बंदर कभी नहीं होता । और पूँछ वाली बात तुलसी कृत रामचरितमानस में आती है । वाल्मीकि रामायण में ऐसी गप्पें नहीं हैं । आजकल जो TV serial रामायण पर बनते हैं वे भी तुलसी की रामचरितमानस के आधार पर बनते हैं । जिसके कारण लोगों के मनों में यह पूँछ वाले हनुमान जी बैठ गये हैं । अपनी गदा लेकर !! और serial बनाने वालों से पूछना चाहिये कि जिन वानरों को आप TV में बंदर मुखी दिखाते हो , तो उनकी स्त्रियों को वैसा क्यों नहीं दिखाते ? क्यों वे मानवी ही होती हैं ? क्यों नहीं उनके भी पूँछ और बंदर का मुख होता ?

(3) प्रश्नः – क्या कृष्ण गोपियों से क्रीड़ा करते थे ? और जब वे तालाब में नहातीं तो वे उनके कपड़े ले भागते थे ?
☀️उत्तर : – नहीं , कृष्ण का जन्म होते ही वह कुछ वर्ष अपनी प्रथम आया के वहाँ रहे । करीब 6 वर्ष तक वह वृदावन में खेलते कूदते रहे । और फिर अवनंतिकापुरी में सांदिपनी के गुरुकुल में भेजा गया । तो वह 30 वर्ष की आयु तक विद्या प्राप्त करके वापिस आये और आकर उनको मथुरा में जनसंघ की स्थापना करनी थी , कंस का चक्रव्यूह तोड़ कर । तो उसके पश्चात् वे कौरवों और पांडवों के झगड़े मिटाने को हस्तिनापुर और विदेह आदि राज्यों के चक्कर काटते रहे । तो यह रास रचाने और कपडे उठाने का समय उनको कब मिला ? यह झूठी भागवत हैं ।
(4) प्रश्न : – क्या ब्रह्मा के चार मुख थे ?
☀️उत्तर : – नहीं , ब्रह्मा का एक ही मुख था । चारों वेदों के प्रकाण्ड विद्वान् कहा जाता था , यानी कि चारों ओर से ज्ञानी जिसको चतुर्मुखी कहा जाता था । तो ब्रह्मा एक उपाधि थी । कई ब्रह्मा सृष्टि की आदि से ले कर अब तक हो गये हैं । और उनके एक ही मुँह था ।
(5) प्रश्न : – क्या विष्णु के चार भुजायें थीं ?
☀️उत्तर : – नहीं ! विष्णु नामक कोई काल्पनिक ईश्वर नहीं है , जिसको आप चित्रों में देखते हो । विष्णु निराकार ईश्वर का ही एक नाम है ।
(6) प्रश्न : – क्या गणेश का मुँह हाथी का था ?
☀️उत्तर : – हाथी के बच्चे का मुँह इतना चौड़ा होता है कि उसका भार एक छोटे बच्चे का शरीर कैसे सम्भालेगा ? अरे उस हाथी के सिर और मनुष्य के बच्चे का तो व्यास ( Diameter ) ही आपस में मेल नहीं खायेगा ? और जैसा कि शिव पुराण की कथा में आता है कि शिवजी ने क्रोध में गणेश का सिर काट दिया , तो फिर वो हाथी के बच्चे का ही शरीर क्यों ढूंढने दौड़े ? उन्होंने वही अपने पुत्र का मनुष्य का कटा हुआ सिर क्यों नहीं लगाया ? ये सब मिथ्या और अप्रामाणिक बाते हैं ।
(7) प्रश्न : – क्या राम और कृष्ण ईश्वर या ईश्वर के अवतार थे ?
☀️उत्तर : – नहीं ! ईश्वर शरीर में नहीं आता । वह निराकार है । हम जानते हैं कि कोई पदार्थ जब परिवर्तित होता है तो वह अपनी पहली वाली अवस्था से या तो बेहतर होता है या कम ? तो अगर ईश्वर का अवतार मानें तो क्या वह पहले से बेहतर हुआ ? अगर हाँ तो क्या वह पहले पूर्ण नहीं था ? तो फिर सृष्टि को कैसे रचता ? और यदि पहले से उसकी शक्ति कम हुई तो यह भी दोष की बात है । दूसरी बात यह है कि ईश्वर निराकार है और अनन्त शक्ति वाला । पर मनुष्य सीमित शक्ति वाला है । अवतार केवल जीवों का होता है जिसके पुनर्जन्म कहते हैं । ईश्वर का अवतार कभी नहीं होता ।
⚜️स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज के नियम ३ व ४ में लिखा है की –
३. वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढना – पढाना और सुनना – सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।
४. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोडने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। ⚜️
☀️आओ सभी मिथ्या ग्रंथों (पुराणो आदि ) को छोड़ कर वेद की ओर लोट चले ☀️
॥ ओ३म् ॥

वाल्मीकीय रामायण

वाल्मीकीय रामायण – प्रेरक प्रसंग – 4🌷 यज्ञ की राक्षसों द्वारा विघ्न से रक्षा हेतु ऋषि विश्वामित्र के अनुरोध पर अयोध्या नरेश दशरथ ने अपने पुत्रों राजकुमार राम और लक्ष्मण को ऋषि के साथ भेज दिया। थोड़ी दूर जाने के बाद ऋषि ने राम को मंत्र समूह रूप “बला” और “अतिबला” नामक विद्या ग्रहण करा दी। जो व्यक्ति की शारीरिक, बौद्धिक और मानसिक क्षमता बढ़ाने वाली है। उस रात ऋषि और राजकुमार सरयू नदी के किनारे सुखे पत्तों के बिछोने पर सोये। अगली रात उन्होंने गंगा नदी और सरयू नदी के संगम पर स्थित शिवजी के आश्रम में विश्राम किया। यहां से उन्होंने नाव द्वारा गंगा नदी पार की। आगे एक बीहड़ वन में पहुंचे जहां हिंसक पशुओं के अतिरिक्त ताटका नाम की भयंकर राक्षसी का आतंक व्याप्त था। विश्वामित्र जी के समझाने पर कि ताटका जैसी क्रूर अधर्मी राक्षसी स्त्री होते हुए। हुए भी दया की पत्र नहीं राम जी उसे बान से मार दिया ताकि गौ और ब्राह्मण का हित हो। उसी वन में ऋषि और राजकुमार रात को सो गये 🌹 प्रसन्नचित्त हो अगले दिन प्रातः ऋषि ने स्नानादि कर पवित्र हो कर पूर्व की ओर मुख करके राम को बीस से अधिक शक्तियां और अस्त्र – शस्त्र प्रदान किये जैसे वज्रास्त्र, महादिव्य दण्ड चक्र, वरुणपाश, सोमास्त्र, मानव नाम का गन्धर्वास्त्र, धर्मचक्र, विष्णु चक्र, काल चक्र, एन्द्रास्त्र, मोदकी और शिखरी दो गदायें, धर्मपाश, कालपाश, तामस और सौमन अस्त्र। कामोत्पादक मदनास्त्र और मोहित करने वाला पैशाचास्त्र…उनको चलाने और रोकने की विधि भी समझा दी। 🌺 उस दिन चलते चलते वह पक्षियों की मीठी चहचहाहट और वन-पशुओं से दर्शनीय और मनोहर दिखने वाले “सिद्घाश्रम (आजका बक्सर) पहुंचे। पहले यहां महात्मा वामन का तप सिद्ध हुआ था देवों में श्रेष्ठ विष्णु ने भी तप के लिए यहां निवास किया था। रामायण काल में यह ऋषि विश्वामित्र का आश्रम था। 🌹 वहाँ पहुँचने और अतिथि सत्कार के कुछ देर पश्चात राम और लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर ऋषि से अनुरोध किया कि आज ही यज्ञ आरम्भ कर दीजिए। तब नियम पूर्वक दीक्षा में प्रवेश कर यज्ञ आरम्भ कर दिया। रात भर राजकुमार आक्षसों से चौकस रहे।… अगली प्रातः राजकुमारों ने उठ कर संध्या उपासना की, परम जाप ( गायत्री मंत्र जप) किया और फिर अग्निहोत्र ( हवन) किया।… यज्ञ दीक्षा ले कर मुनि विश्वामित्र जी मौन थे। राजकुमारों ने आश्रम वासियों से पूछा कि किस समयावधि तक राक्षसों से यज्ञ की रक्षा करनी है। उत्तर मिला छ: दिन तक।.. पांच दिन तक तो यज्ञ निर्विघ्न चला। छटे दिन आकाश में भयानक शब्द हुआ। राक्षस मारीच, सुबाहु ने यज्ञ वेदी पर खून की वर्षा की। उन्हें आश्रम की ओर आते देख राम जी बोले ” पश्य लक्ष्मण दुर्वृत्तान् राक्षसान अपि शिताशनान् मानवास्त्र समाधूतान निलेन यथा घना” – – अर्थ – हे लक्ष्मण. ज़रा इन दुराचारी और मांसभक्षक राक्षसों को तो देखो। जैसे वायु बादलों को भगा देता है उसी प्रकार मैं इन्हें मानवास्त्र से अभी उड़ाता हूँ.. यह कह कर राम ने चमचमाता मानवास्त्र मारीच की छाती में मारा। वह भाग गया। अब राम ने आग्नेयास्त्र सुबाहु की छाती पर मारा और वह मर गया। बचे राक्षसों को वायवास्त्र चला कर नष्ट कर दिया। यज्ञ निर्विघ्न समाप्त हो गया। विश्वामित्र जी ने प्रसन्नता भाव से राजकुमारों की प्रशंसा की। फिर सब ने सन्ध्या की।.. यह बाल कांड के उन्नीसवें सर्ग तक का वृतांत है। 🌸🍁🌹 साभार – स्वामी जगदीश्वरानंद सरस्वती जी का भाष्य

आत्मा, परमात्मा ,प्रकृति ये तीन अनादि है

प्रश्न – क्या मानव शरीर या किसी भी प्राणी के शरीर में साँस (श्वास ) अपने आप आती है ?
उत्तर – नहीं
प्रश्न – तो फिर ये साँस कौन दिलवा रहा है ।
उत्तर – परम् पिता परमेश्वर ।
प्रश्न – किस तरह ?
उत्तर – इसके लिए विज्ञान से समझाना होगा । आत्मा, परमात्मा ,प्रकृति ये तीन अनादि है । परमात्मा , आत्मा के लिए प्रलय के बाद प्रकृति (जो की महान्धकार , एकरस एवं गतिहीन थी ) से पूरी सृस्टि की रचना करता है । जो प्रकृति एकरस थी उससे कणो (मॉलिक्यूल ) का निर्माण परमेश्वर अपने बल से ११ तरह की वेद छंद की गतियों ( सूत्रात्मा वायु , धनंजय , प्राण, अपान , व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, कृकल एवं देवदत्त ) से प्रकृति में विकार करके बनाता है । वेद में सात तरह मुख्य छंद है जैसे गायत्री , उष्णिक , अनुस्टुप , बृहती ,पंक्ति, त्रिस्टुप एवं जगती है ।

जितनी भी जड़ वस्तु हमें दिखाई दे रही है या नहीं दिखाई दे रही है उन सभी के कणो बनाने /बांधने / थामने के लिए परमात्मा ११ तरह की गति अपने बल से प्रलय आने तक हर कण में लगातार लगाकर रखता है एवं इन्ही गतियों के बल पर प्रोटोन ,न्यूट्रॉन इलेक्ट्रान गति कर रहे है सत्त्व गुण की वजह से विधुत आवेश हो रहा है , और इसी विधुत आवेश से पूरी सृस्टि बनी है । यदि परमात्मा ये विभिन्न गतियों से किसी कण में बल ना लगाए तो कोई भी कण , या शरीर नहीं बन सकता । जिस समय ये बल परमात्मा हटा लेता है उसी को प्रलय कहते है ।

मानव शरीर / किसी भी प्राणी के शरीर /या किसी भी जड़ वस्तु के कण को बांधने/थामने के लिए गायत्री छंद की गति बाहर की तरफ जाती है और त्रिस्टुप छंद की गति बाहर से अंदर की तरफ आती है । प्राणिजगत में इन्ही गतियों से प्राणों के सहारे ऑक्सीजन अंदर -बाहर आती है और इसी से प्राणियों का जीवन चल रहा है ।
आधुनक विज्ञान और जितने भी मत -मतान्तर है इनको इसकी जानकारी नहीं है , जो सत्य है वही धर्म है जो झूट है वही अधर्म है ।
इस अधर्म की वजह से ही दुनिया विनाश की तरफ जा रही है ।

मेरा उन अज्ञानीयो से प्रश्न है कि जो किसी शरीरधारी / अवतार को परम पिता परमेश्वर मान रहे हैं, तो उनको सांस कौन दिलवा रहा है ? और यदि हम किसी पत्थर प्लास्टिक, लकड़ी को ईश्वर मान रहे हैं तो मेरा उनसे भी कहना है कि इनके कण को कौन थामा हुआ है ?

दलितोद्धार के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले हुतात्मा वीर मेघराज जी जाट

[09:12, 30/03/2020] Vivek Arya Delhi: दलितोद्धार के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले हुतात्मा वीर मेघराज जी जाट

क्या आपने किसी ऐसे समाज सुधारक का नाम सुना है जिनका जन्म सवर्ण जाट परिवार में हुआ हो और उन्होंने दलितों के सामाजिक उत्थान के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए हो?

संभवत नहीं।

ऐसे महान आत्मा का नाम था वीर मेघराज जी।

वीर मेघराज जी स्वामी दयानंद की उसी शिष्य परम्परा के अनमोल रत्न थे जो दलितोद्धार जैसे पवित्र कार्य के लिए अपने प्राणों की आहुति देने से भी पीछे नहीं हटे। स्वामी दयानंद द्वारा जातिवाद के उनर्मुलन एवं पिछड़े और निर्धन वर्ग के उद्धार के सन्देश को हजारों आर्यों ने सम्पूर्ण देश में घर घर पहुचायाँ। अनेक कष्ट सहते हुए भी, अनेक प्रकार के दुखों को सहते हुए भी इस पवित्र यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाले आर्यों में वीर मेघराज का नाम विशेष स्थान रखता है। आपका जन्म 1881 में इंदौर के नारायणगढ़ में एक स्वर्ण जाट परिवार में हुआ था। बचपन से पौराणिक संस्कारों में पले बढे मेघराज की जिज्ञासु प्रवृति थी। एक वर्ष आपके क्षेत्र में आर्यसमाज के प्रचारक श्री विनायकराव जी का आगमन हुआ। विनायक जी ने अन्धविश्वास, सच्चे ईश्वर की भक्ति, जातिवाद उनर्मुलन आदि का प्रचार किया तो अज्ञानी लोगों ने उन पर ईट पत्थर आदि से वर्षा कर उन्हें घायल करने की कोशिश करी। मेघराज का इस अमानवीय व्यवहार से ह्रदय परिवर्तन हो गया और वे समाजसेवी और तपस्वी विनायक राव को अपने घर ले आए। उनकी सेवा करी, उनसे वार्तालाप किया , शंका समाधान किया। उनसे प्रेरणा पाकर मेघराज जी ने स्वामी दयानंद के ग्रंथों का स्वाध्याय किया और सिद्दांत रूप से अपने को समृद्ध कर आप सच्चे आर्य और वैदिक धर्मी बन गए।
अब मेघराज जी दीन दुखियों, दलितों और अनाथों की सेवा और रक्षा में सदा तत्पर रहने लगे। इस कार्य के लिए आप अपने मित्रों के साथ कोसों दूर दूर तक प्रचार करते थे। सन 1938 में इंदौर के महाराज ने अपने राज्य के सभी दलितों को मंदिर में प्रवेश देने की साहसिक घोषणा कर दी। इस घोषणा से अज्ञानी लोगों में खलबली मच गई। पोंगा पंडितों ने घोषणा कर दी की वे किसी भी दलित को किसी भी मंदिर में प्रवेश नहीं करने देंगे। उनके प्रतिरोध से राजकीय घोषणा कागजों तक सिमित रह गई।
वीर मेघराज से यह अनर्थ न देखा गया। करुणासागर दयालु दयानंद का शिष्य मेघराज दलितों को समान नागरिक अधिकार दिलवाने के लिए तत्पर हो उठा। उन्होंने दलित बंधुयों में घोषणा कर दी की में आपको आपका अधिकार दिलाने के लिए आगे लगूंगा। आप मेरे साथ मंदिर में प्रवेश करना। जो कोई मुझे या आपको रोकने की कोशिश करेगा उसे में इंदौर नरेश के पास ले जाऊँगा। वीरवर की हुंकार से अज्ञानी दल में शोर मच गया। वे मेघराज को कष्ट देने के लिए उनके पीछे लग गए।
मेघराज किसी कार्य से जंगल में गए तो उन्हें अकेले में घेर लिया और लाठियों से उन पर वार कर उन्हें घायल अचेत अवस्था में छोड़कर भाग गए। जैसे ही यह समाचार उनकी पत्नी और मित्रों को मिला तो वे भागते हुए उनके पास गए। वीर मेघराज को अपनी अवस्था पर तनिक भी दुःख नहीं हुआ। उन्होंने यहीं अंतिम सन्देश दिया की “भगवान इन भूले भटके लोगों की ऑंखें खोलें।यह सुपथगामी हो और आर्य जाति का कल्याण हो। ” इतना कहकर सदा सदा के लिए अपनी ऑंखें मूंदकर अमर हो गए।
उन समय आर्य मुसाफिर आदि पत्रों में उनकी पत्नी का यही सन्देश छपा की अपने पति की मृत्यु के पश्चात भी वे दलितोद्धार जैसे पवित्र कार्य से पीछे नहीं हटेंगी। सरकार ने कुछ लोगों को दंड में जेल भेज दिया। कुछ काल बाद वे आर्यसमाज के साथ मिलकर वीर मेघराज के अधूरे कार्यों में लग गए। जिन्हें मेघराज जीते जी न बदल सके उन्हें उनके बलिदान ने बदल दिया।

वीर मेघराज के बलिदान पर हमे एक ही सन्देश देना चाहते हैं –

आज भी उनकी मुहब्बत कौम के सीने में हैं ,मौत ऐसी हो नसीबों में तो क्या जीने में हैं।

दलित समाज में पैदा होकर दलितों के लिए कार्य करने वाले ज्योतिबा फुले और डॉ अम्बेडकर का नाम तो सभी राजनीतिक पार्टिया लेती है। मगर सवर्ण समाज में पैदा होकर दलितों के लिए संघर्ष करने वाले स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपत राय, भक्त फूल सिंह, मास्टर आत्माराम अमृतसरी सरीखे लोग आपको स्वामी दयानंद का शिष्य ही मिलेगा। आर्यसमाज के जातिवाद को मिटाने के संकल्प में भागी बने। तभी यह देश बचेगा।

यह प्रेरणादायक संस्मरण आज के समय में हम सभी को विश्व भातृत्व और आपसी सद्भाव का पावन सन्देश देता हैं।

डॉ विवेक आर्य
Only admins can send messages

ईश्वर, जीवात्मा

ईश्वर, जीवात्माईश्वर,

-प्रियांशु सेठ

ईश्वर-
(१) ईश्वर एक है व उसका मुख्य नाम ‘ओ३म्’ है। अपने विभिन्न गुण-कर्म-स्वभाव के कारण वह अनेक नामों से जाना जाता है।

(२) ईश्वर ‘निराकार’ है अर्थात् उसकी कोई मूर्त्ति नहीं है और न बन सकती है। न ही उसका कोई लिङ्ग या निशान है।

(३) ईश्वर ‘अनादि, अजन्मा और अमर’ है। वह न कभी पैदा होता है और न कभी मरता है।

(४) ईश्वर ‘सच्चिदानन्दस्वरूप’ है अर्थात् वह सदैव आनन्दमय रहता है, कभी क्रोधित नहीं होता।

(५) जीवों को उसके कर्मानुसार यथायोग्य न्याय देने के हेतु वह ‘न्यायकारी’ कहलाता है। यदि ईश्वर जीवों को उसके कुकर्मों का दण्ड न दे तो इससे वह अन्यायकारी सिद्ध हो जाएगा।

(६) ईश्वर ‘न्यायकारी’ होने के साथ-साथ ‘दयालु’ भी है अर्थात् वह जीवों को दण्ड इसलिए देता है ताकि जीव अपराध करने से बन्ध होकर दुःखों का भागी न बने, यही ईश्वर की दया है।

(७) कण-कण में व्याप्त होने से वह ‘सर्वव्यापक’ है अर्थात् वह हर जगह उपस्थित है।

(८) ईश्वर को किसी का भय नहीं होता, इससे वह ‘अभय’ है।

(९) ईश्वर ‘प्रजापति’ और ‘सर्वरक्षक’ है।

(१०) ईश्वर सदैव ‘पवित्र’ है अर्थात् उसका स्वभाव ‘नित्यशुद्धबुद्धमुक्त’ है।

(११) ईश्वर को अपने कार्यों को करने के लिए किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ती। ईश्वर ‘सर्वशक्तिमान्’ है अर्थात् वह अपने सामर्थ्य से सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और प्रलय करता है। वह अपना कोई भी कार्य अधूरा नहीं छोड़ता।

(१२) ईश्वर अवतार नहीं लेता। श्री रामचन्द्र तथा श्री कृष्ण आदि महात्मा थे, ईश्वर के अवतार नहीं।

(१३) ईश्वर ‘सर्वज्ञ’ है अर्थात् उसके लिए सब काल एक हैं। भूत, वर्तमान और भविष्यत्, यह काल तो मनुष्य के लिए हैं। ईश्वर तो ‘नित्य’ है, वह सर्वकालों में उपस्थित है।

जीवात्मा-
(१) जीवात्मा, ईश्वर से अलग एक चेतन सत्ता है।

(२) जीवात्मा अनादि, अजन्मा और अमर है। वह न जन्म लेता है और न ही उसकी मृत्यु होती है।

(३) जीवात्मा अनेक और सान्त हैं। इनकी शक्ति और ज्ञान में अल्पता होती है।

(४) जीवात्मा आकार रहित है, और न ही उसका कोई लिंग है।

(५) शरीर के मृत होने की अवस्था में जीवात्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में चला जाता है।

(६) जीवात्मा कर्म करने में स्वतन्त्र है। इसके कर्मों का न्याय ईश्वर की न्याय-व्यवस्था में होता है।

(७) अगर जीवात्मा अल्पज्ञता से मुक्त होकर सदैव आनन्द की कामना करता है तो उसे शारीरिक इन्द्रियों के माध्यम से ईश्वर की शरण में जाना पड़ेगा, जिसे मोक्ष कहते हैं।

प्रकृति-
(१) प्रकृति जड़ पदार्थ है। यह सदा से रहनेवाली है और सदा से रहेगी।

(२) प्रकृति सर्वव्यापी नहीं है क्योंकि इस सृष्टि के बाहर ऐसा भी स्थान है जहां न प्रकृति है न जीव अपितु केवल ईश्वर ही ईश्वर है।

(३) प्रकृति का आधार ईश्वर है। ईश्वर ही प्रकृति का स्वामी है।

(४) प्रकृति ज्ञानरहित है। प्रकृति ईश्वर के सहायता के बिना संचालित नहीं हो सकती है।

(५) संसार में कोई ऐसी चीज नहीं जिसको जादू कह सकते हैं। सब चीज नियम से होती हैं। प्रकृति की भी सभी चीजें सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि नियम से चलती हैं। नियम बदलते नहीं, सदा एक से रहते हैं।

अपने को जलाये और तपाये बिना आर्य समाज का कायाकल्प संभव नहीं

अपने को जलाये और तपाये बिना आर्य समाज का कायाकल्प संभव नहीं •

• खटाई में पड़ गये ऋषि मिशन को कैसे बचाया जा सकता है ? •

• How to rejuvenate Arya Samaj? •
————————

– स्वामी सत्यदेव विद्यालंकार

आर्य समाज को कठोर हाथों में पकड़ कर एक झकझोर देने की आवश्यकता है, जैसे कि ऋषि दयानन्द ने गहरी नींद में सोये हुए अपने देशवासियों को झकझोर दिया था।

स्वामी श्रद्धानन्द जी के बाद आज आर्यसमाज में ऐसा शक्तिशाली और प्रभावशाली व्यक्ति कहीं दीख नहीं पड़ता, जिसके हाथों में इतना बल हो और जिसके हृदय में इतनी सामर्थ्य हो कि वह आर्य समाज का कायाकल्प कर सके।

लेकिन भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिये इस कायाकल्प का किया जाना उतना ही जरूरी है, जितना कि ऋषि को समूचे देश का कायाकल्प करना जरूरी प्रतीत होता था।

यह निश्चित है कि इस कायाकल्प के लिये हममें से हर एक को अपना ही कायाकल्प करना चाहिए। आत्मिक अर्थात् व्यक्तिगत उन्नति ही समाज एवं संसार के उपकार की ईकाई है।

“प्रथम अपने दोष देख निकाल के पश्चात् दूसरे के दोषों को दृष्टि देके निकाले” – यह ऋषि का स्पष्ट आदेश है।

व्यक्तिगत रूप से हम सब उस [आर्य समाज रूपी] भट्टी के लिये ईधन हैं।

इसलिये अपने को जलाये और तपाये बिना उस भट्टी को प्रज्ज्वलित करने की हमारी आशा पूरी नहीं हो सकती।

अपने जलाने एवं तपाने का सीधा व स्पष्ट मतलब यही है कि हम ऋषि के दिखाये हुए मार्ग पर आरूढ हो जायं, उसके निमित्त समस्त कष्टों को झेलने के लिये तैयार हो जाय और हजारों विघ्न-बाधाओं के रहते हुए भी उससे विचलित न हों।

हमें अपने को परखना चाहिए, अपने जीवन की जांच-पड़ताल करनी चाहिए और अपने सारे व्यवहार को ऋषि के आदेश की कसौटी पर कसना चाहिए।

हम में से हर एक के जीवन की छाया हमारे संगठन व संस्था पर पड़ती है। उसी से उसका निर्माण होता है।

हमारे व्यक्तिगत जीवन के सामूहिक संचय का नाम ही तो समाज, संगठन एवं संस्था है।

अपने को ‘नास्तिक बनाये रखकर हम समाज को ‘ आस्तिक’ नहीं सकते।

अपने को सामाजिक कमजोरियों का पुंज बनाये रखकर हम समाज को बलवान नहीं बना सकते।

अपने को धार्मिक अन्ध विश्वासों में उलझाये रख कर हम समाज को उनसे छुटकारा नहीं दिला सकते।

अपने को परम्परागत रूढियों में फंसाये रखकर हम समाज को उनसे मुक्त नहीं कर सकते।

जात-बिरादरी की मोह-माया में स्वयं पड़े रह कर हम गुण-कर्म-स्वभाव को वर्ण-व्यवस्था का आधार नहीं बना सकते।

इस प्रकार हमारा सारा ही कार्यक्रम और ऋषि का सारा ही मिशन खटाई में पड़ गया है।

लेकिन इस व्यक्तिगत उन्नति का क्रम कैसे शुरू हो ?

हम तो उस भीषण आत्मवंचना के व्यापार में पड़ गये हैं, जिसमें पड़ने के बाद मनुष्य के लिये उन्नति करना कठिन हो जाता है।

हमें श्रेष्ठ, पवित्र और उच्च बनाने के लिये ऋषि ने उस ‘आर्य’ शब्द का प्रयोग किया था, जिसका सम्बन्ध भले कर्मों एवं सदगुणों के साथ है, लेकिन हमने उसे भी जातिपरक मान कर अपने को श्रेष्ठता, पवित्रता और उच्चता का अवतार मान लिया है।

सब सत्य विद्याओं का पुस्तक वेद हमें इस लिए दिया गया था कि हम उसके पढ़ने-पढ़ाने और सुनने-सुनाने का परम धर्म पालन करें, लेकिन हमें तो उस सच्चाई का इतना अभिमान हो गया कि हम यह भी भूल गये कि सत्यासत्य का अनुसंधान एवं विचार करते हुये सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहने का हमें आदेश दिया गया है।

अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि के लिए कोई विशेष उद्योग किये बिना ही हमने अपने को विद्या का पुंज मान लिया है।

वैदिक धर्म को सबसे श्रेष्ठ, सबसे पुरातन और सबसे पवित्र मानते हुए हमने उसको अपने आचार-विचार में लाने का विशेष यत्न किये बिना ही उसका अभिमान करना शुरू कर दिया है।

इस शाब्दिक अभिमान की पूजा का बल-बूते पर हम ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ के नारे को सार्थक बनाना चाहते हैं। यह कोरी आत्मवंचना है।

इससे न तो हमें कुछ व्यक्तिगत लाभ मिल सकता है और न हम सामूहिक रूप से प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकते हैं।

इसलिए आत्मवंचना के इस मायाजाल से अपने को बाहर निकालने में हमें तुरन्त ही लग जाना चाहिये।

व्यक्तिगत विद्रोह की यह प्रबल भावना हममे से हर एक के हृदय में प्रबल वेग के साथ पैदा होनी चाहिये।

अपने सारे आचार-विचार और व्यवहार को हमें एक बार फिर नये सिरे से नये ढांचे में डालने का उद्योग करना चाहिये।

अपनी सारी वृत्तियों और प्रवृत्तियों को राष्ट्रोन्मुखी बना कर आर्य समाज में ऋषि के राष्ट्रवाद की स्थापना कर अपने देश में अपना राज्य और सारे संसार में अपने देश का ‘अखण्ड सार्वभौम चक्रवती साम्राज्य’ स्थापित करने का महान् स्वप्न देखना चाहिए।

लोहारू का मुस्लिम नवाब और आर्यसमाज का संघर्ष

लोहारू का मुस्लिम नवाब और आर्यसमाज का संघर्ष

(29 मार्च 1941 को लोहारू कांड के उपलक्ष पर प्रकाशित)

डॉ विवेक आर्य

लोहारू 1947 से पहले एक मुस्लिम रियासत थी।पंजाब प्रांत में हिसार, शेखावाटी और बीकानेर से घिरा हुआ है छोटा सा नवाबी राज्य लोहारु। लोहारू की स्थापना अहमदबक्शखां ने 1803 में की थी। अंग्रेजों ने उन्हें यह रियासत जाट राजा भरतपुर के विरोध में सहायता करने के लिए दी थी। सन् 1935 के मध्य महीनों में तमाम जनता की निगाह में आ गया जबकि यहां के तेजस्वी किसानों ने नवाब की तानाशाही के खिलाफ आवाज बुलंद की।

रियासत का नवाब अमीनूद्दीन अहमद खान (Amin ud-din Ahmad Khan) था।

ठाकुर देशराज ने जाट जनसेवक 1949, पृष्ठ 499-500 में लिखा है-

एक सौ वर्ष तक नवाब अहमदबक्शखां और उसके वंशजों ने शांति के साथ राज्य किया किंतु इस अरसे में भी वे लगान में बढ़ोतरी करते रहे। जमीन के हक भी कम करते रहे। सन् 1909 में उन्होंने पहले पहल बंदोबस्त कराया जिसमें उनका एक विश्वेदारी का हिस्सा स्वीकार किया किंतु सन् 1923 में जो बंदोबस्त कराया उसमें उनके जमीन के हक़ विश्वेदारी को कम कर दिया और इस तरह की बातें जोड़ दी जिससे हक विरासत का सिलसिला भी खत्म होता था। लगान भी बढ़ाकर 70,000 से 94,000 कर दिया और एक नई लाग ऊंट टैक्स के नाम पर और लगा दी।

प्रजा के भोलेपन से जो भी लाभ उठाये जा सकते हैं, लुहारु के नवाब ने उठाए। वे एक फिजूल खर्च शासक थे। अपने बढे हुये खर्चों की पूर्ति के लिए उन्होंने अनेक टैक्स लगाए। जिनमें विधवा विवाह टेक्स भी था। चूंकि जाटों में विधवा विवाह का चलन है इसलिए उन्हें इस टैक्स से अच्छी आमदनी होती थी। टैक्स और ज्यादतियाँ दिन पर दिन बढ़ती जाती थी। फिर भी नवाब साहब के खर्चों का पूरा नहीं पड़ता था। इतनी छोटी सी रियासत के मालिक नवाब ने रंग बिरंगी की मोटरें खरीदी। यही क्यों हवाई जहाज भी खरीदा। गर्ज यह है कि उनके खरचों को पूरा करने में प्रजा के नाक में दम आ रहा था। नवाब साहब इतने पर भी आतंक के साथ हुकूमत करने के पक्षपाती थे। चाहे जिसे जेल में ठूंस देने, तंग करने, सबक सिखाने की बातें उनके लिए मामूली थी। देहात में शिक्षा का प्रबंध करना तो दूर उन्होंने किसानो द्वारा कायम की हुई पास पाठशालाओं को भी उठवा दिया। सन् 1935 के आरंभ में वहां के किसानों ने आंदोलन आरम्भ कर दिया। आंदोलन कर कम करने और हिन्दुओं के अधिकारों में सरकारी हस्तक्षेप कम करने के लिए था। आंदोलनकारियों के विरुद्ध नवाब ने दमनचक्र शुरू कर दिया। नवाब ने चहड़ के नंबरदार रामनाथ जी और सदाराम जी सिंघाणी के तिरखाराम और सरदाराराम जी तथा उदमीराम जी पहाड़ी को गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस ने बड़ी बेरहमी के साथ लाठीचार्ज किया और सैकड़ों आदमी जमीन पर बिछा दिए। इसके बाद गांव की लूट की गई। सामान मोटरों पर लादकर लोहारू को भेजा जाने लगा! चौधरी सहीराम और अर्जुन सिंह के मकानों में पुलिस ने घुसकर नादिरशाही ढंग से लूट की। स्त्रियों को भी बेइज्जत किया। फर्श खोद डाले गए। छत्ते तोड़ दी गई। सवेरे के 9 बजे से लेकर शाम के 6 बजे तक यह लूटपाट जारी रही। उसके बाद पचासों आदमियों को गिरफ्तार किया गया। उसके बाद तारीख 7 अगस्त 1935 को सिंघाणी पर नवाब ने हमला कराया। यहां फायर किया गया जिसे सैंकड़ों आदमी घायल हुए और पचासों मरणासन्न हो गए। गोली चलने का दृश्य बड़ा मार्मिक था। सिंहाणी गोलीकांड में जिन लोगों ने गोली खाकर बलि दी थी उनकी नामावली ‘गणेश’ अखबार के 6 सितंबर सन 1935 के अंक में इस प्रकार प्रकाशित हुई थी।

शहीद-1. लालजी वल्द कमला अग्रवाल वैश्य, 2. श्योबक्स हैंड वल्द धर्मा अग्रवाल वैश्य, 3. दुलाराम वल्द पातीराम जाट, 4. रामनाथ वल्द बस्तीराम जाट, 5. पीरु वल्द जीरान जाट, 6. भोला वल्द बहादुर जाट, 7. शिवचंद वल्द रामलाल जाट, 8. बानी वल्द मामचंद जाट, 9. अमीलाल वर्ल्ड सरदार जाट, 10. गुटीराम वल्द मोहरा जाट, 11. शिवचंद वल्द खूबी धानक सिंघानी के, 12. पूरन वल्द चेता जाट, 13. हीरा वल्द नानगा जाट, 14. कमला वल्द गोमा जाट जगनाऊ के, 15. धनिया जाट, 16. रामस्वरुप जाट का लड़का गोठरा के, 17. अमी लाल पीपली माम्चन्द वल्द गोधा खाती सिंघानी, 18. सुंदरी वल्द झंडू जाट सिंघानी, 19. माला वल्द झादू सिंघानी आदि।

इस अत्याचार की सुचना आर्यसमाज के शीर्घ नेता स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी तक पहुंची। उन्होंने आर्यसमाज के कार्य को लोहारू में गति देने का निर्णय लिया।

आर्यसमाज का जब प्रचार कार्य लोहारू में आरम्भ हुआ तो मुस्लिम नवाब को यह असहनीय हो गया कि आर्यसमाज उसके रहते कैसे समाज सुधार करने की सोच कैसे सकता है। लोहारू में समाज सुधार के लिए आर्यसमाज की स्थापना हेतु आर्यसमाज के प्रधान सेनानी स्वामी स्वतंत्रानन्द जी लोहारू पधारे। उनके साथ स्वामी ईशानन्द, न्योननंद सिंह (स्वामी नित्यानंद), स्वामी कर्मानन्द,भरत सिंह शास्त्री, ठाकुर भगवंत सिंह आदि प्रमुख आर्य सज्जन थे। 29-30 मार्च सन 1941 को आप सभी जुलुस निकालते हुए लोहारू की गलियों से निकले। नवाब ने अपने मुस्लिम गुंडों द्वारा जुलुस पर आक्रमण करवा दिया। स्वामी स्वतंत्रानन्द के सर पर कुल्हाड़े से हमला किया गया। उनका सर फट गया। बाद में रोहतक जाकर दिल्ली के ट्रैन मैं बैठकर उन्होंने टांकें लगवाये। अनेक आर्यों को शारीरिक हानि हुई। मगर जुलुस अपने गंतव्य तक पंहुचा। सम्पूर्ण लोहारू में आर्यों पर हुए अत्याचार को लेकर नवाब की घोर आलोचना हुई। आर्यसमाज की विधिवत स्थापना हुई। आर्यसमाज के सत्यवादी एवं पक्षपात रहित आचरण से नवाब प्रभावित हुआ। नवाब ने स्वामी स्वतंत्रानन्द को अपने महल में बुलाकर क्षमा मांगी। समाज सुधार के लिए आर्यसमाज ने लोहारू और उसके समीप विभिन्न विभिन्न ग्रामों में पाठशाला की स्थापना करी। यह पाठशालाएं आर्यों के महान परिश्रम का परिणाम थी। नवाब के डर से आर्यों को न कोई सहयोग करता था। न भोजन देता था। चार-चार दिन भूखे रहकर उन्होंने श्रमदान दिया। तब कहीं जाकर पाठशालाएं स्थापित हुई। दरअसल लोहारू में उससे पहले केवल एक इस्लामिक मदरसा चलता था जिसमें केवल उर्दू पढ़ाई जाती थी। अधिकतर मुस्लिम बच्चे ही पढ़ते थे। एक आध हिन्दू बच्चा अगर पढ़ता भी था तो उसके ऊपर मौलवी इस्लाम स्वीकार करने का दबाव बनाते रहते थे। इसलिए हिन्दू जनता प्राय: अशिक्षित थी। आर्यसमाज द्वारा स्थापित पाठशाला में सवर्णों के साथ साथ दलितों को सभी को समान्तर शिक्षा दी जाती थी।

1947 के पश्चात नवाब जयपुर चला गया। एक बार स्वामी ईशानन्द उनसे किसी समारोह में मिले। स्वामी जी ने नवाब से पूछा की अपने आर्यों पर इतना अत्याचार क्यों किया जबकि वे तो उत्तम कार्य ही करने लोहारू आये थे। नवाब ने उत्तर दिया। अगर आर्यसमाज के प्रभाव से मेरी रियासत की जनता जागृत हो जाती तो मेरी सत्ता को खतरा पैदा हो जाता। अगर हिन्दू पढ़-लिख जाते तो मेरी नवाबशाही के विरोध में खड़े हो जाते। इसलिए मैंने आर्यसमाज का लोहारू में विरोध किया था।

———
पूर्व विधायक स्व. चन्द्रभान ओबरा कृत लोहारू बावनी का इतिहास नामक पुस्तक में उल्लेख मिलता है कि लोहारू रियासत 1803 ई में अपनी स्थापना से लेकर 23 फरवरी 1948 तक कथित रूप से नवाबी शासन अत्याचारों से त्रस्त रही तथा यहां के लोगों ने जोर जुल्म का हमेशा डट कर विरोध किया। पुस्तक के अनुसार नवाब द्वारा लगाए गए विभिन्न करों से लोगों में भारी रोष था। 1877 के भीषण अकाल के बाद मंढोली कलां गांव के एक बहादुर किसान बद्दा जाट द्वारा किया गया संघर्ष भी नवाब द्वारा उसे फांसी पर लटकाने के आदेश के बाद धूमिल हो गया। बद्दा जाट का बलिदान रंग लाया और रियासत के लोगों में विद्रोह की ज्वाला धधकने लगी। 6 अगस्त 1935 के दिन चैहड़कलां गांव में एकजुट हुए किंतु नवाब की मिलीभगत से अंग्रेजी सेना ने धावा बोलकर 50 से भी अधिक लोगों को गिरफ्तार कर उन्हे कैद में डाल दिया। इस घटना के दो दिन बाद 8 अगस्त को आक्रोशित हजारों लोग रियासत के सिंघाणी गांव में एकत्रित हुए। शांतिपूर्वक सभा कर रहे लोगों पर गोलियों की बौछार करवा दी थी जिसमें तीन दर्जन से अधिक लोग काल के ग्रास बन गए थे। पुस्तक के अनुसार एक अप्रैल 1940 को स्वामी स्वतंत्रानंद के प्रयासों से लोहारू में आर्य समाज की नींव रखी गई तथा आर्य समाज से जुड़ने वाले लोग नवाबी शासन से मुक्ति के लिए एकजुट होने लगे। 29 मार्च 1941 में आर्य समाज के पहले वार्षिकोत्सव में जब स्वामी स्वतंत्रानंद और सैकड़ों आर्य समाजी सायंकाल को नगर कीर्तन कर रहे थे तब नवाब की सेना ने इन पर हमला बोल दिया। जिसमें स्वामी जी सहित काफी लोग घायल हुए। 20 सितंबर 1946 को प्रजा-मंडल के गठन से आंदोलन में काफी तेजी आई। अनेक देशभक्तों के बलिदानों के दम पर देश ने 15 अगस्त 1947 को आजादी पाई तथा केंद्र में जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में सरकार बन गई फिर भी लोहारू रियासत नवाबी शासन से आजादी की लड़ाई लड़ रही थी। जींद जिले के खोरड़ गांव में हुए प्रजामंडल के खुले अधिवेशन में एक प्रस्ताव पास करके बीकानेर के महाराजा को यह कहा गया कि लोहारू राज्य को बीकानेर राज्य में यहां के नवाब ने प्रजा की बिना राय लिए मिलाया है तथा वे किसी शर्त पर आपकी रियासत में मिलना नहीं चाहते। अत: आपको चाहिए कि प्रजा की इच्छाओं का आदर करते हुए लोहारू राज्य का शासन प्रबंध भारत सरकार को सौंप दें। यदि आपने इस प्रस्ताव पर कोई ध्यान नहीं दिया तो हमें बाध्य होकर अस्थायी सरकार बनाकर आजादी के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। लोहारू के प्रथम विधायक भक्त बूजाराम, पूर्व विधायक चंद्रभान ओबरा सहित प्रजा मंडल के प्रतिनिधि रियासती प्रजामंडल के अध्यक्ष डा. पट्टाभि सितारमैया से दिल्ली में मिला तथा प्रजा की इच्छा से उन्हे अवगत करवाया। नवाब ने उनके समक्ष अपना पक्ष रखा। पूरी स्थिति से अवगत होने के पश्चात डा.सितारमैया ने प्रजामंडल प्रतिनिधियों को सौराष्ट्र के मुख्यमन्त्री यू.एन. देबर के पास भेजा। देबर ने बताया कि बीकानेर रियासत के साथ विलय के बाद उत्पन्न वैधानिक स्थिति को देखते हुए आप लोग अपनी रियासत के गांव गांव जाकर पंजाब में मिलाने के पक्ष में लोगों के हस्ताक्षर करवा कर लाएं। सभी गांवों से शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करवाकर आजादी के दिवाने लोहारू के लोगों ने देबर की सलाह पर राजस्थान के मुख्यमन्त्री मोहनलाल सुखाड़िया तथा अकाली नेता तारासिंह से लिखित अनापत्ति प्राप्त की कि लोहारू को पंजाब के साथ मिलाने पर उन्हे कोई एतराज नही है।इसके पश्चात सांसद लाला अचितराम ने सिंघानी की जनसभा में स्वयं जाकर जनता की राय पूछी। सभी ने एक स्वर में पंजाब के साथ विलय की बात कही। अन्तत: लोहारू की जनता, प्रजामंडल और आर्य समाज के प्रयास रंग लाए तथा लोहारू 23 फरवरी 1948 को तत्कालीन पंजाब रियासत का अंग बन गया।
लोहारु के नवाबों की लिस्ट (https://www.jatland.com/home/Loharu)
Ahmad Baksh Khan: 1806-1827
Sams-ud-din Khan: 1827-1835 (eldest son)
Amin-ud-din Khan: 1935-1869 (step brother)
Alauddin Ahmed Khan: 1869-1884 (son)
Amir-ud-din Ahmad Khan, K.C.S.I: 1884-1920 (son)(abdicated)
Aizz-uddin Ahmad Khan:1920-1926 (second son)
Amin ud-din Ahmad Khan:1926-1947 (son) – (acceded to India)

पाठक समझ सकते है कि हिन्दू जनता पर मुस्लिम शासक कैसे इतने वर्षों से अत्याचार करते आ रहे है। इसीलिए स्वामी दयानंद ने स्वदेशी राजा होने का आवाहन किया था। आर्यसमाज का इतिहास ऐसे अनेक प्रेरणादायक संस्मरणों से भरा हुआ हैं।