The 10 Principles of Arya Samaj

The 10 Principles of Arya Samaj
God is the original source of all that is known by spritual knowledge and the physical sciences.
God is Existent, conscious, all-beatitude, Formless, Almighty, Just, Merciful, Unbegotten, Infinite, Unchangeable, Beginningless, Incomparable, the support of All, the Lord of All, All-pervading, Omniscient and Controller of All from within, Evermature, Imperishable, Fearless, Eternal, Pure, Creator of the Universe. He alone ought to be worshipped.
The Vedas are the books of all True knowledge. It is the paramount duty of all Aryas to read them, to teach them to others, to listen to them and to recite them to others.
All persons should always be ready to accept truth and renounce untruth.
All acts ought to be performed in conformity to Dharma(righteousness) i.e. after due consideration of truth and untruth.
The primary object of Arya Samaj is to do good to the whole world, i.e. to promote physical, spiritual and social progress of all humans.
Your dealings with all should be regulated by love and due justice, in accordance with the dictates of Dharma(righteousness).
Avidya(illusion and ignorance) be dispelled, and Vidya(realisation and acquisition of knowledge) should be promoted.
None should remain satisfied with his own progress only, but incessantly strive for the social upliftment, realizing his own benefitin the advancement of all others.
All men ought to dedicate themselves necessarily for the social good and the well being of all, subordinating their personal interest, while the individual is free to enjoy the freedom of action for individual being.

“भारतीय संस्कृति के मूलाधार – वेद, रामायण और महाभारत”

ओ३म्
“भारतीय संस्कृति के मूलाधार – वेद, रामायण और महाभारत”
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लेखक-डा. जयदत्त उप्रेती, स्वस्त्ययन, अल्मोड़ा-263601, उत्तराखण्ड।
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भारत की प्राचीन काल से चली आ रही विश्वविख्यात संस्कृति के आधारभूत तीन मूल आधार हैं- ऋग्वेदादि चारों वेद, वाल्मीकि रामायण और महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास रचित महाभारत। इनमें वेदों को तो देवकाव्य या अपौरुषेय काव्य भी कहा जाता है। स्वयं वेद में कहा गया है, सनातन देवकाव्य (ईश्वरीय काव्य) को देखो जो न कभी जीर्ण (अर्थात् पुराना) होता है और न नष्ट होता है- ‘‘देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति”। मानव सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न अग्नि, वायु, आदित्य, अंगिरा नामक चार अमैथुनी सृष्टि के आदि ऋषियों के अत्यन्त पवित्र अन्तःकरणों में शब्द, अर्थ, सम्बन्ध सहित ऋग्-यजुः-साम-अथर्व नामक चारों वेदों का ज्ञान सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, निराकार ईश्वर के द्वारा प्रदान किया गया जिनसे सर्वप्रथम ब्रह्मा नामक देवर्षि ने वेदों को प्राप्त किया। बाद में उन्होंने ही अपनी दिव्य योग्यता से लिपि का आविष्कार कर, तद्द्वारा अपने पुत्रादिकों एवं अन्य अवरकालिक ऋषियों को वेद पढ़ाये और शनैः शनैः वेदज्ञान समस्त भूमण्डल में फैलता गया। यह बात व्याकरण, निरुक्तादि वेदांगों, ऐतरेय-शतपथादि ब्राह्मण ग्रन्थों और उपनिषदों में वर्णित है। ऋग्वेदादि चारों वेदों को कण्ठस्थ करने के कारण ब्रह्मा को चतुर्र्मुख उपाधि प्राप्त है।

जैसे वेदों को अपौरुषेय देवकाव्य कहा जाता है, उसी प्रकार लोकभाषा संस्कृत में सर्वप्रथम काव्य की रचना करने वाले महर्षि वाल्मीकि हुए, जिन्होंने रामकथा पर आधारित रामायण नामक महाकाव्य का प्रणयन किया। इसलिए उन्हें आदिकवि और रामायण को संस्कृत साहित्य में आदि महाकाव्य कहा जाता है।

वैदिक वांग्मय के पश्चात अलग अलग युगों में अनेक महर्षि हुए जिन्होंने आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थवेद नामक चार उपवेदों, शिक्षा, व्याकरण, निरुक्त, कल्प, छन्द, ज्योतिष नामक छः वेदांग शास्त्रों, मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रों, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व-मीमांसा (वेदान्त) और उत्तर मीमांसा नामक छः वेदोपांग नामक दर्शनशास्त्रों की रचना की। इसी प्रकार त्रेतायुग और द्वापर युग की प्रमुख ऐतिहासक घटनाओं पर आधारित क्रमशः महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण नामक महाकाव्य और महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास रचित महाभारत नामक महाकाव्य संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में अति प्रसिद्ध हैं। इस लेख में इन दोनों महाकाव्यों की कुछ समानताओं और विशेषताओं का दिग्देर्शन किया जा रहा है, जो इस प्रकार है।

पहले वाल्मीकि रामायण की चर्चा करते हैं। वाल्मीकि रामायण के विषय मे ज्ञातव्य है कि उसको चतुर्विंशतिसाहस्त्री संहिता भी कहा जाता है। इसका कारण यह है कि यह महाकाव्य चैबीस हजार अनुष्टुप छन्द के श्लोकों में पूर्ण हुआ है। इसके प्रत्येक हजार का पहला श्लोक गायत्री मन्त्र के एक एक अक्षर से आरम्भ होता है। जैसे कि गायत्री मन्त्र जो तत् शब्द से आरम्भ होकर 24वें अक्षर यात् में समाप्त होता है (महाव्याहृतियों भूर्भुवः स्वः को छोड़कर) उसी प्रकार वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड का आरम्भ भी ‘त’ अक्षर से होता है और अन्तिम युद्धकाण्ड या उत्तरकाण्ड के अन्तिम चैबीस हजारहवें श्लोक के प्रथम अक्षर या से होता है या नहीं, इसकी पुष्टि कुल श्लोकों की गणना के आधार पर की जा सकती है। युद्धकाण्ड पर ही रामायण को पूर्ण माना जाता है या उत्तरकाण्ड की समाप्ति पर, इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। इसलिए तदनुसार गणना भी वैकल्पिक होगी। यों युद्धकाण्ड की पुष्पिका (जो प्रत्येक काण्ड के अन्त में समान रूप से पढ़ी गई है) इस प्रकार हैः-

‘‘इत्यार्षे श्रीमद् रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये चतुर्विंशतिसाहस्त्रयां युद्धकाण्डे सर्वजनपरिवृतस्य राजाधिराजस्य श्रीमद् रामचन्द्रस्य पट्टाभिषेकभद्राण्यं नाम त्रिंशदधिकशततमः सर्गः।130। —वर्तमानकथाप्रसंगः समाप्तः।।” इस प्रकार युद्धकाण्ड के अन्त में रामायण की मुख्य कथा समाप्त होने के कारण, तथा उत्तर काण्ड में पुराणों के समान अनेक उपाख्यानों का समावेश होने के कारण उसे कतिपय विद्वान प्रक्षिप्त मानते हैं, कतिपय नहीं मानते।

वाल्मीकि रामायण में रामकथा का आरम्भ महर्षि वाल्मीकि द्वारा मुनिश्रेष्ठ उत्तम विद्वान् नारदमुनि से इस प्रकार प्रश्न पूछने पर होता है, कि हे मुनि जी! आप बतलावें कि वर्तमान समय में सर्वश्रेष्ठ धर्मात्मा, सत्यवादी, सदाचारवान्, आत्मवान्, शूरवीर, दृढप्रतिज्ञ, विद्वान्, सब जनों का हितैषी कौन है? इस पर नारदमुनि उत्तर देते हैं कि हे मुने! ये बहुत सारे दुर्लभ गुणों वाले व्यक्ति के बारे में आपने पूछा है। सो, मैं बतलाता हूं। वे हैं इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए सर्वलोक प्रसिद्ध श्री रामचन्द्र। जो संयमी, सदाचारवान्, बलवान्, धैर्यवान्, बुद्धिमान्, नीतिमान्, ईर्ष्याद्वेषरहित, तेजस्वी, जितेन्द्रिय, संग्राम में शत्रु को विनष्ट करने वालेएवं यशस्वी हैं।

‘‘तपः स्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम्। नारदं परिप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिनिपुंगवम्।।
को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान्। धर्मश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः।।
चारित्रेण को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः। विद्वान् कः समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः।।
आत्मवान् को जितक्रोधो द्युतिमान् कोऽनसूयकः। कस्य बिभ्रति देवाश्च ताजरोषस्य संयुगे।।
बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः। मुने! वक्ष्याम्यहं बुदध्वा तैर्युक्तः श्रूयतां नरः।।
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः। नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी।।
बुद्धिमान् नीतिमान् वाग्मी श्रीमान् शत्रुनिवर्हणः।।”

सम्पूर्ण रामायण में रस छन्द अलंकारादि काव्यगुण होते हुए, श्री राम के ये गुण पदे पदे वाल्मीकि महाकवि के द्वारा वर्णित हुए हैं जिसके कारण रामायण महाकाव्यों में सर्वोत्तम महाकाव्य के रूप में लोक प्रसिद्ध हुआ है। अतएव कवि ने उसकी प्रशस्ति में स्वयं लिखा है- यह काव्य वेदों के समान पवित्र, पापनाशक, आयुर्वर्धक एवं पुण्यप्रद है। इसको पढ़ने वाला सब पापों से मुक्त होगा। उसकी आयु बढ़ेगी और वह जन्मान्तर में सपुत्रपौत्र और सेवकों सहित सुखी रहेगा। ब्राह्मण इसको पढ़ेगा तो उत्तम विद्वान् बनेगा, क्षत्रिय पढ़ेगा तो भूपति राजा बनेगा, वैश्य पढ़ेगा तो उत्तम धनवान् बनेगा और शूद्र पढ़ेगा तो वह भी महान् बनेगा। जब तक पृथ्वीतल में पर्वत और सरितायें रहेंगी तब तक रामायण की कथा का संसार में प्रचार होता रहेगा।

इदं पवित्रं पापघ्नं पुण्यं वेदैश्चसंमितम्। यः पठेद् रामचरितं सर्वणपैप्रमुच्यते।।**
एतदाख्यानमायुष्यं पठन् रामायणं नरः सपुत्रपौत्रः सगणः प्रेत्य स्वर्गे महीयते।।
पठन् द्विजो वागृषभत्वमीयात्। स्यात् क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात्।।
वणिग्जनः पुण्यफलत्वमीयात् जनश्च शूद्रोऽपि महत्वमीयात्।। (बा0रा0, 1-1-98, 99, 100)

लगभग सात काण्डों, साढ़े छः सौ सर्गों, अनेक अध्यायों और हजारों श्लोकों में विभक्त है रामायण जिसमें परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व के लिए सभी हितकर नियमों और सुशासन के साथ साथ धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष नामक चारों पुरुषार्थों का वर्णन है। कर्तव्य कर्मों की प्रेरणा और त्याज्य कर्मों का निषेध एवं देशकालगत प्रकृति का सुन्दर मनोहारी चित्रण रामायण काव्य की विशेषता है। इसके द्वारा प्राचीन भारतीय संस्कृति, कला, धर्म और विज्ञान का सुन्दर परिचय प्राप्त होता है।

ठीक इसी प्रकार, महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास द्वारा रचित महाभारत नामक महाकाव्य द्वारा हमें तात्कालिक भारतीय संस्कृति का परिज्ञान होता है। जो प्रायः वैदिक तथा रामायण कालिक संस्कृति से मिलती-जुलती होते हुए भी अनेक अंशों में उससे भिन्नता लिए हुई दिखाई देती है।

जिस प्रकार वाल्मीकि रामायण में चैबीस हजार श्लोक होने से उसे चतुर्विंशतिसाहस्री संहिता कहा जाता है, उसी प्रकार महाभारत में एक लाख श्लोक होने से महाभारत को शतसाहस्री संहिता कहा गया है। वाल्मीकि रामायण जहां काण्ड, सर्ग, अध्याय और अनुष्टुप छन्द के श्लोकों में निबद्ध है, वहां महाभारत पर्वों, अध्यायों और अनुष्टुप श्लोकों में विभक्त है। विशाल ग्रन्थ महाभारत में अठारह पर्व हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं। आदि, सभा, वन, विराट, उद्योग, भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक, स्त्री, शान्ति, अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थान, स्वर्गारोहण। इन मुख्य 18 पर्वों में प्रत्येक के अन्तर्गत छोटे छोटे पर्व भी हैं जो भिन्न भिन्न नामों से उपाख्यान पर्व कहलाते हैं। इन्हीं में से एक वनपर्वान्तर्गत 273वें अध्याय से 291वें अध्याय पर्यन्त 19 अध्यायों का रामोपाख्यान पर्व भी है जिसमें रामायण में वर्णित रामकथा का संक्षिप्त वर्णन किया गया है। सुप्रसिद्ध भगवद्गीता भी महाभारत के भीष्मपर्व का ही एक अंश है।

महाभारत का आरम्भिक नाम जय था। तदनन्तर उपाख्यानों से रहित केवल चैबीस हजार श्लोकों के ग्रन्थ का नाम भारत हुआ। और जब यह एक लाख श्लोकों का ग्रन्थ बना तब उसका नाम महाभारत कहा जाने लगा। इस विशाल ग्रन्थ को महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास ने नित्य प्रातः उठकर तीन वर्षों में पूर्ण किया। यह वर्णन महाभारत के आदि पर्व में दिया गया है। तद्यथा,

नारायणं मनस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्।।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो राहुणा चन्द्रमा यथा। जयो नामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीषुणा।।
चतुर्विंशतिसाहस्रीं चक्रे भारतसंहिताम्। उपाख्यानैर्विना तावद् भारतं प्रोच्यते बुधैः।।
इदं शतसहस्रं हि श्लोकानां पुण्यकर्मणाम्। सत्यवत्यात्मजेनेह व्याख्यातममितौजसा।। महाभारत आदि पर्व।।

वाल्मीकि रामायण की ही भांति महाभारत को भी वेदों के समान अत्युत्तम महाकाव्य माना गया है। इसको पढ़ने सुनने वालों का सब प्रकार से कल्याण और उन्नति होती है। यह धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और मोक्षशास्त्र का पुण्य ग्रन्थ है। चार पुरुषार्थों – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के विषय में जो महाभारत में कहा गया है, वही अन्यत्र भी है। और जो महाभारत में नहीं कहा गया है, वह अन्यत्र भी नहीं है।

इदं हि वेदैः संमितं पवित्रमपि चोत्तमम्। श्राव्याणामुत्तमं चेदं पुराणमृषिसंस्तुतम्।।
इतिहासमिमं श्रुत्वा पुरुषोऽपि सुदारुणः। मुच्यते सर्वपापेभ्यो राहुणा चन्द्रमा यथा।।
धर्मशास्त्रमिदं पुण्यमर्थशास्त्रमिदं परम्। मोक्षशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेनामितबुद्धिना।।
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ। यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्।।
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 62, श्लोक 14, 16, 19, 20, 23, 52, 53)

इस प्रकार ऋषिकृत होने से रामायण और महाभारत दोनों को आर्ष महाकाव्य कहा जाता है जिनकी अनेक शिक्षायें श्रेष्ठ, धर्मानुसार होने से प्रामाणिक और पालन करने योग्य मानी जाती हैं। वे सब प्रकार से मानवों के लिए सुख और कल्याणप्रद हुआ करती हैं। भारतीय संस्कृति में इसीलिए सरहस्य सांगोपांग वेदों, वाल्मीकि रामायण और महाभारत को सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थों के रूप में माना जाता है और सदैव जिज्ञासु धार्मिक जनता इन्हें आदर और श्रद्धा के साथ पढ़ा करती है। इति शुभमस्तु।

(*पादटिप्पणी *यह श्लोक गवर्नमेंट संस्कृत कालेज, बनारस के प्रिंसीपल ग्रिफिथ (उन्नसवीं शती के उत्तरार्ध) को इतना प्रिय लगा कि उन्होंने इसको कालेज भवन के सामने एक शिलालेख में लिखवा दिया था। अब वह सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में उसी स्थान पर लगा है। -लेखक)
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-प्रस्तुतकर्ता मनमोहन कुमार आर्य
देहरादून।
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ईश्वर और वेद ही संसार में सच्चे अमृत हैं”

ईश्वर और वेद ही संसार में सच्चे अमृत हैं”
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संसार में तीन सनातन, अनादि, अविनाशी, नित्य व अमर सत्तायें हैं। यह हैं ईश्वर, जीव और प्रकृति। अमृत उसे कहते हैं जिसकी मृत्यु न हो तथा जिसमें दुःख लेशमात्र न हों और आनन्द भरपूर हो। ईश्वर अजन्मा अर्थात् जन्म-मरण धर्म से रहित है। अतः ईश्वर मृत्यु के बन्धन से मुक्त होने के कारण अमृत है। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप होने से सदैव आनन्द से पूर्ण रहता है। प्रकृति में विकार होकर कार्य सृष्टि का निर्माण होता है और इसकी समयावधि पूर्ण होने पर यह प्रलय को प्राप्त हो जाती है। प्रकृति जड़ होने के कारण इस पर अमृत और विकारों का सुख व दुःखरूपी प्रभाव नहीं होता। जीवात्मा अनादि, अनन्त, अविनाशी, अमर, अजर, नित्य, जन्म-मरण धर्मा, पाप-पुण्य कर्मों का कर्ता और कर्मों के कारण बन्धनों में फंसता है। बन्धनों में फंसा तथा सुख-दुःखों को भोगने वाला जीवात्मा तब तक अमृत नहीं कहला सकता जब तक कि इसका जन्म व मरण का बन्धन दीर्घकाल की अवधि के लिये भंग न हो। क्या ऐसा हो सकता है? इसका उत्तर है कि यह अवश्य हो सकता है। इस विषय को वैदिक धर्म विषयक प्रामाणिक शास्त्रों एवं सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों को पढ़ कर जाना जा सकता है। सिद्धान्त है कि मनुष्य के जन्म का कारण उसके पूर्वजन्मों के कर्म होते हैं। उन कर्मों को पाप व पुण्य के भेद तथा पुण्यों की अधिकता होने पर जीवात्मा को मनुष्य का जन्म मिलता है। यदि पाप कर्मों को न किया जाये, पुण्य कर्मों को निष्काम भाव से किया जाये और वेद के अनुसार सदाचरण से युक्त जीवन व्यतीत करने सहित वेदविहित पंचमहायज्ञ कर्मों व मोक्ष प्राप्ति के साधक कर्मों को किया जाये तो इससे मनुष्य को जन्म-मरण से छूट मिल सकती है। शास्त्रीय विधान के अनुसार मनुष्य 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों तक की अवधि के लिए जन्म मरण से मुक्त हो जाता है। यह कथन हमारे ईश्वर, धर्म तथा वेद मर्मज्ञ ऋषियों का है जिन्हें यह योग्यता प्राप्त होती है कि वह ईश्वर के सान्निध्य से तथा ईश्वर के साक्षात्कारपूर्वक किसी भी विषय को यथार्थ रूप में जान सकते हैं। ऋषियों के कहे वचनों में सन्देह का कोई कारण नहीं होता। ऋषि दयानन्द ने इसमें यह भी जोड़ा है कि ऋषियों के वेदानुकूल वचन ही प्रमाण होते हैं। मोक्ष व मोक्षावधि विषय में ऋषि वचनों का वेदों से विरोध न होने पर इन्हें प्रमाण स्वीकार करना ही उचित है।

इस आधार पर मनुष्य का आत्मा वेदविहित सद्कर्मों सहित अमृतमय ज्ञान को प्राप्त कर मोक्ष रूप अमृत को प्राप्त हो सकता है। अमृत वा मोक्ष की प्राप्ति विषयक ज्ञान ही चार वेद व वेदानुकूल उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, रामायण एवं महाभारत ग्रन्थों की सद्शिक्षायें हैं। संसार में प्रचलित मत-मतान्तरों ने वेद की शिक्षाओं व मान्यताओं में भ्रम फैलाये हुए हैं। वह वेद को अपनी अज्ञानता तथा अपने हितों के विरुद्ध होने से ईश्वरीय ज्ञान स्वीकार नहीं करते। वेद परमात्मा का सृष्टि के आरम्भ में दिया गया ज्ञान है। वेद की सभी शिक्षायें व मान्यतायें सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान ईश्वर प्रदत्त होने के कारण शत-प्रतिशत सत्य हैं। कोई भी ज्ञानी, अनुभवी, विशेषज्ञ मनुष्य व महापुरुष किसी धार्मिक व सांसारिक विषय पर दूसरों को जो जानकारी व ज्ञान देता है वह उसके अनुभव व विवेक पर आधारित होने के कारण प्रायः सत्य ही हुआ करता है। ईश्वर ने प्रकृति के सूक्ष्म कणों से इस सृष्टि को बनाया है। यह सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, पृथिवीस्थ सभी अपौरुषेय पदार्थ ईश्वर द्वारा ही उत्पन्न व निर्मित किये गये हैं। उसी ईश्वर ने इस सृष्टि में मनुष्य आदि सभी प्राणियों योनियों सहित सभी ओषधियों, वनस्पतियों, कन्द, मूल, फल, गोदुग्ध तथा सभी प्रकार के अन्न व इतर पदार्थ बनाये हैं। उसके ज्ञान का विपरीत व अनर्थक होने का प्रश्न ही नहीं होता। अतः साक्षात्कृत धर्मा वेदों के ऋषियों ने अपनी योग एवं विवेक बुद्धि से वेदों की सत्यता की परीक्षा करने के बाद वेदों को ईश्वर ज्ञान घोषित किया, वह सत्य व उपयोगी होने से सबके लिए सर्वथा ग्राह्य एवं उपादेय है।

उन्नीसवीं शताब्दी में ऋषि दयानन्द ने परीक्षापूर्वक वेदाध्ययन कर वेदों के ईश्वरीय ज्ञान एवं सर्वांश में सत्य होने की घोषणा की थी। उन्होंने नियम दिया है ‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों (सभी मनुष्यों) का परमधर्म है।’ संसार में ईश्वर एक है तो उसका ज्ञान एवं शिक्षायें भी एक व एक समान होंगी। उनमें कहीं परस्पर विरोध नहीं हो सकता। वह प्राणियों में भेदभाव नहीं कर सकती। जिस किसी ग्रन्थ में सृष्टि के नियमों के विरुद्ध ज्ञान है वह ईश्वरीय ग्रन्थ कदापि नहीं हो सकते। पृथिवी गोल है। जिन ग्रन्थों में पृथिवी के गोल न होने विषयक कथन हों, वह कैसे अपनी पुस्तक को ईश्वर का ज्ञान कह सकते हैं? वैदिक विद्वानों ने सभी मत-पन्थों के ग्रन्थों को देखा है और निष्पक्ष आधार पर निश्चित किया है कि वेद ही एकमात्र ईश्वरीय ज्ञान है। इस विषयक अनेक विद्वानों के तर्क एवं प्रमाणों से युक्त लघु ग्रन्थ आर्यसमाज में उपलब्ध हैं जिससे सभी लोग लाभ उठा सकते हैं और उन्हें पढ़कर स्वयं सत्यासत्य का निर्णय कर सकते हैं अथवा वैदिक विद्वानों से शंका समाधान कर सकते हैं। आर्यसमाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द ने स्वयं ही इस विषय पर विचार किया और वेदों को ईश्वरीय ज्ञान सिद्ध किया है। उन्होंने मत-पन्थों के विषय में लिखा है कि उनमें जो कुछ सत्य बातें हैं वह वेदों के सबसे प्राचीन होने के कारण वेदों से उनमें गई हैं और मत-मतान्तरों के ग्रन्थों में जो असत्य व सृष्टि नियमों के विरुद्ध बातें हैं वह उनकी अपनी हैं। वैज्ञानिक जगत में देखा जाता है कि कोई वैज्ञानिक कुछ नई बात कहता है तो पूरे विश्व के वैज्ञानिक उस पर विचार करते हैं और परीक्षा करने पर यदि वह सत्य पाई जाती है तो उसे विश्वस्तर पर स्वीकार कर लेते हैं। धार्मिक व सम्प्रदायवादियों में इसके विपरीत सभी अपनी अपनी पुस्तकें जो मध्यकाल के अन्धकार के दिनों में लिखी गईं थी, उन्हीं पर विश्वास करते हैं। किसी मत ने आज तक उनकी किसी मान्यता व वाक्यों में अर्ध विराम या पूर्ण विराम जैसा परिवर्तन व संशोधन नहीं किया है। इसकी कभी आवश्यकता भी अनुभव नहीं की गई। इसी से मत-मतान्तरों के ज्ञान के स्तर का अनुमान किया जा सकता है।

हमने ईश्वर व वेद सहित जीवात्मा की चर्चा लेख की उपर्युक्त पंक्तियों में की है। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप तथा सर्वज्ञ होने से सदैव अमृतस्वरूप है। वह कभी जन्म नहीं लेता, अज्ञान में नहीं फंसता, वह सदैव आनन्दमय रहता है, इस आधार पर वह अमृत सिद्ध होता है। ईश्वर सर्वज्ञ है और उसका दिया हुआ वेदज्ञान भी सर्वज्ञता के गुणों से पूरित है। वेदों में ऐसे अनेक विषय हैं जिन पर सृष्टि के आदिकाल में मनुष्य स्वप्रयत्नों से ज्ञान अर्जित नहीं कर सकता था। अनेक सत्य रहस्यों से युक्त वह वेदज्ञान मनुष्यात्मा को अमृत प्राप्त कराने वाला अमृतमय ज्ञान है। यदि वेद न होता तो संसार को ईश्वर, आत्मा और प्रकृति सहित कार्य प्रकृति वा सृष्टि विषय का जो ज्ञान आज वेद, उपनषिदों एवं दर्शन आदि ग्रन्थों के माध्यम से प्राप्त है, वह कदापि न होता। अतः ईश्वर के समान उसका ज्ञान वेद भी अमृतमय व जीवात्माओं को अमृतमय मोक्ष को प्राप्त कराने वाला ज्ञान सिद्ध होता है। हमारे इन विचारों को अधिक गहराई से यदि समझना हो तो ऋषि दयानन्द कृत सत्यार्थप्रकाश एवं इतर प्राचीन उपनिषद एवं दर्शन आदि साहित्य को पढ़ना समीचीन है। वेदों ने कहा है कि ज्ञान से मुक्ति होती है। वेद ही वस्तुतः इस सिद्धान्त को पुष्ट करता है। अमृत व मोक्ष समानार्थक शब्द है। अमृत किसी ऐसे द्रव का नाम नहीं जिसे पीने मात्र से मनुष्य जन्म-मरण के बन्धनों से मुक्त होकर मोक्षावस्था को प्राप्त हो जाये। यह कल्पना ही कहा जा सकता है। जहां न भय है न शोक, न दुःख है न चिन्ता और जहां हर पल व हर क्षण ईश्वर के आनन्दमय स्वरूप को प्राप्त होकर जीवात्मा आनन्द का अनुभव करता है वही सद्ज्ञान व सद्कर्म ही अमृत हैं। इससे ईश्वर व वेद अमृत सिद्ध होते हैं।

वह मनुष्य भाग्यशाली है जिसने वेदों व वैदिक शिक्षाओं का अध्ययन कर ईश्वर के सत्यस्वरूप को प्राप्त कर लिया है। ऐसा करने से अल्पज्ञ, एकदेशी, ससीम, जन्म-मरण धर्मा, पाप-पुण्य कर्मों में फंसा हुआ जीवात्मा भी जन्म व मृत्यु के दुःखों से बचकर अमृतमय मोक्ष को प्राप्त होता है। यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के 14हवें मन्त्र में परमात्मा ने उपदेश करते हुए विद्या से अमृत वा मोक्ष की प्राप्ति बताई है। यही मनुष्य जीवन का अन्तिम लक्ष्य है। मन्त्र है ‘विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह। अविद्यया मृत्युं तीत्र्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते।।’ इस मन्त्र का ऋषि दयानन्द कृत मन्त्रार्थ है ‘जो विद्वान् विद्या और उसके सम्बन्धी साधन-उपसाधनों पूर्व (मन्त्रों में) कही अविद्या और इसके उपयोगी साधनासमूह को और उस ध्यानगम्य मर्म इन दोनों को साथ ही जानता है वह शरीरादि जड़ पदार्थ समूह से किये पुरुषार्थ से मरण दुःख के भय को उल्लंघन कर आत्मा और शुद्ध अन्तःकरण के संयोग में जो धर्म उससे उत्पन्न हुए यथार्थ दर्शनरूप विद्या से (अमृतम्) नाशरहित अपने स्वरूप या परमात्मा को (अश्नुते) प्राप्त होता है।’

ईश्वर और वेद ही संसार में मनुष्यों के लिए अमृत तुल्य है। इनका सेवन करने से मनुष्य अमृत अर्थात् मोक्ष को प्राप्त होकर मोक्षावधि तक आनन्द में विचरण करता है। उसको किंचित भी दुःख नहीं होता। यही सभी जीवात्माओं के लिये प्राप्तव्य है। इसे प्राप्त करने का वेदमार्ग के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है। मोक्ष के इच्छुक साधकों को मोक्ष प्राप्ति वा दुःखों की निवृत्ति के लिये वेदों की शरण में आना ही होगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
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महापुरुष द्वेष को जीत लेते हैं🌷

महापुरुष द्वेष को जीत लेते हैं🌷

महापुरुषों के उदाहरण से पता चलता है कि उन्होंने द्वेष को किस प्रकार से जीत लिया था। उनका व्यवहार अपने विरोधियों के प्रति कैसा था।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजी महाराज को विमाता कैकेयी के कारण वनवास मिला। विधि की विडम्बना देखिए कि जिन्हें कल राजा बनना था उन्हें फकीर बनना पड़ा। साम्यावस्था को धारण करने वाले व्यक्ति ने वनवास को भी वरदान समझकर स्वीकार कर लिया। इससे भी बड़ी बात है कि उन्होंने कैकेयी के प्रति कोई दुर्भाव मन में नहीं रखा। उसके विषय में कोई अपशब्द मुँह से नहीं निकाला। अद्वेष की यह चरम सीमा है। यही महापुरुष का महापुरुषत्व है।
जिसके कारण महलों में पले एक राजकुमार को चौदह वर्ष तक जंगल के कष्ट सहने पड़े, पत्नी को खोना पड़ा, भयंकर युद्ध करना पड़ा―कितने ही घोर दुःख सहने पड़े!
परन्तु उस महापुरुष के मुख से कैकेयी के प्रति कोई अपशब्द नहीं निकला। यह बड़े धैर्य और आत्मविजय का लक्षण है।

काशी शास्त्रार्थ की समाप्ति पर महर्षि दयानन्दजी का घोर अपमान हुआ। उन पर ईंट, गोबर, पत्थर व जूते फेंके गये। पण्डित ईश्वरसिंह नाम के एक निर्मले सन्त काशी में वास करते थे। उनके मन में इच्छा हुई कि चलो इस समय चलकर दयानन्द की दशा देखें यदि इस महान अनादर से उनका चित्त विचलित न हुआ तो समझेंगे कि वह सच्चा ब्रह्मज्ञानी और एक पहुँचा हुआ महात्मा है।
यह विचार लेकर सन्त ईश्वरसिंह आनन्दोद्यान में पहुँचे। ईश्वरसिंह को आते देख ऋषि दयानन्द जी मुस्कुराये और उनका बड़े आदर से स्वागत किया गया। दोनों मिलकर बहुत समय तक आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध में बात करते रहे।
इतनी लम्बी बातचीत में ईश्वर सिंह को स्वामी जी के मुखमण्डल पर उदासीनता का एक भी चिह्न दिखाई नहीं दिया। उन्होंने लोगों के अन्याय व अत्याचार की कोई चर्चा नहीं की।
पण्डित ईश्वर सिंह ने जब देखा कि इतने घोर अपमान और निष्ठुर अन्याय के पश्चात् भी ऋषि दयानन्द जी ने मुख से एक भी अपमानजनक शब्द नहीं निकाला तो उन्होंने ऋषि दयानन्द के चरण छूकर कहा, “महाराज! आज तक मैं आपको वेदशास्त्र का ज्ञाता एक पण्डितमात्र समझता रहा हूँ, परन्तु आज के पण्डितों के घृणित उत्पात से और विरोध की भयंकर आँधी से आपके ह्रदय सागर में राग-द्वेष की एक भी लहर न उठते देखकर मुझे पूर्ण निश्चय हो गया है कि आप वीतराग महात्मा और सिद्धपुरुष हैं।

उपर्युक्त घटना सिद्ध करती है कि महर्षि दयानन्द में द्वेष का सर्वथा अभाव था।
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दुष्ट व्यक्ति विद्वान भी हो तब भी उसका संग नहीं करना चाहिये’

ओ३म्
‘दुष्ट व्यक्ति विद्वान भी हो तब भी उसका संग नहीं करना चाहिये’
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वैदिक साहित्य में वेद से इतर ऋषियों व विद्वानों के अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं जिनमें जीवन को अपने लक्ष्य आनन्द व मोक्ष तक पहुंचाने के लिये उत्तम विचार व शिक्षायें दी गई हैं। ऐसी ही एक शिक्षा है कि मनुष्य को दुष्ट व्यक्तियों की संगति नहीं करनी चाहिये। इसका परिणाम यह होता है कि सज्जन मनुष्य की सज्जनता व शुभगणों में प्रवृत्ति कम होकर दुष्ट व्यक्ति के अवगुण उसमें आ जाते हैं। दुष्ट व्यक्तियों की संगति से दुष्ट व्यक्तियों के जीवन के दुर्गुण सज्जन मनुष्यों के स्वभाव व व्यवहार में भी आ जाते हैं। जो मनुष्य वैदिक साहित्य के स्वाध्याय से दूर हैं तथा जो विद्वानों व सत्पुरुषों की संगति नहीं करते उनमें लोभ, काम, परिग्रह, दुष्ट इच्छाओं का आ जाना सम्भव होता है। स्वाध्याय तथा सत्पुरुषों की संगति सहित सन्ध्या एवं यज्ञ आदि आवश्यक नियमों का पालन करने से मनुष्य के जीवन व चरित्र का निर्माण होता है। इससे मनुष्य अनेक बुराईयों से बच जाते हैं। ऐसा भी देखा गया है कि अनेक बुरे लोगों ने सत्पुरुषों के प्रभाव से अपनी बुराईयों को छोड़ दिया। इसके दो उदहारण हम प्रस्तुत कर रहे हैं।

एक बार एक स्थान का प्रसिद्ध डाकू अपने साथियों के साथ एक स्थान पर डाका डालने गया। जिस घर में डाका डालना था उसी से सटा हुआ एक मन्दिर था जहां कर्म-फल व्यवस्था पर व्याख्यान हो रहा था। डाकू मन्दिर में कुछ स्थानों पर छुप कर बैठ गये। वहां से वह डाका डालने वाले धनवान के घर की निगरानी कर रहे थे। संयोगवश डाकुओं के सरदार के कानों में वहां हो रहे व्याख्यान के शब्द पड़ रहे थे। व्याख्यान में वक्ता कह रहे थे मनुष्य जो भी शुभ व अशुभ कर्म करता है उसे उसका फल इस जन्म या परजन्म में अवश्य ही भोगना पड़ता है। वह उस कर्म के फल को बिना भोगे उसके बन्धन से मुक्त नहीं होता। डाकू के कान में यह शब्द पड़े तो इन शब्दों को सुनकर वह अपने कर्मों के बारे में विचार करने लगा। उसने अपने साथियों को उसके अगले संकेत तक योजना के अनुसार कोई कार्य न करने को कहा। अब वह व्याख्यान सुन रहे श्रोताओं के मध्य आ कर बैठ गया। सत्संग में जो लोग बैठ थे वह उसे देख डर कर भागने लगे। सभी लोग उस डाकू को पहचानते थे। एक समय आया कि वक्ता व डाकू ही वहां रहे। व्याख्यान समाप्त होने पर डाकू ने वक्ता से प्रश्न किया कि यदि कोई व्यक्ति अच्छे व कुछ बुरे काम करता है तो क्या उसके बुरे कर्म उसके अच्छे कर्मों में समायोजित होते हैं अथवा नहीं? वक्ता ने तर्कयुक्त उत्तर देते हुए कहा शुभ कर्मों का फल अलग से और पाप कर्मों का फल अलग से मिलता है। डाकू को वक्ता की बातें तर्कसंगत लगी। उसने उस दिन की डाका डालने की योजना स्थगित कर दी। उसके बाद उसने डाके न डालने का निर्णय किया और स्वयं एक साधु की तरह सज्जन पुरुष का जीवन व्यतीत करने लगा। यह व्याख्यान व सज्जन पुरुष की संगति का प्रभाव था। ऐसे अनेक उदाहरण और भी हैं।

ऋषि दयानन्द (1825-1883) ने अविभाजित पंजाब सहित पूरे देश में वैदिक धर्म का प्रचार किया था। जब वह प्रचार करते हुए पंजाब के झेलम नगर में पहुंचे थे तो वहां उनके व्याख्यान सुनने एक गीतकार, गायक, संगीतज्ञ अमीचन्द जी भी पहुंचे थे। अमीचन्द जी ने स्वामी दयानन्द जी से अनुरोध किया कि वह एक भजन प्रस्तुत करना चाहते हैं। स्वामी जी ने उनका आग्रह स्वीकार किया और अमीचन्द जी को श्रोताओं को अपना भजन सुनाने का अवसर दिया। अमीचन्द जी का कण्ठ माधुर्य से युक्त था तथा उनके द्वारा प्रस्तुत रचना के शब्द प्रभावशाली थे। भजन की समाप्ति के बाद स्वामीजी ने उनके भजन की प्रशंसा की। स्वामी जी के व्याख्यान के बाद आयोजकों ने स्वामी दयानन्द को अमीचन्द के व्यक्तिगत दुर्गुणों से परिचित कराया। दूसरे दिन अमीचन्द जी व्याख्यान सुनने समय से बहुत पहले पहुंच गये। आज पुनः अमीचन्द जी ने ऋषि दयानन्द को भजन सुनाने के लिये अवसर देने का अनुरोध किया। ऋषि ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। अमीचन्द जी ने भजन सुनाया। भजन के बाद स्वामी जी ने अमीचन्द जी के भजन की भूरि भूरि प्रंशसा की और अन्त में कहा कि ‘अमीचन्द! तुम हो तो हीरे, किन्तु कीचड़ में पड़े हुए हो।’ यह शब्द सुनकर अमीचन्द जी पर जादू का सा प्रभाव हुआ। वह बोले महाराज! आज के बाद आपको अपना मुंह तभी दिखाऊंगा जब कीचड़ से बाहर आ जाऊंगा। इसके बाद उनका जीवन कीचड़ से पूर्णतः बाहर निकल गया। वह उसके बाद आर्यसमाज के प्रथम प्रभावशाली और अनेक शास्त्रीय भजनों के रचनाकर व गायक के रूप में प्रसिद्ध हुए जिनको आज भी देश विदेश में गाया जाता है। यह परिवर्तन भी सत्संगति का परिणाम था। उनके उत्तरवर्ती सभी भजनोपदेशकों के लिए उनका जीवन अनुकरणीय एवं प्रेरणादायक है। अमीचन्द जी के जीवन में यह परिवर्तन ऋषि दयानन्द जी की संगति के कारण आया। यदि वह उस दिन सत्संग में न जाते तो उनके जीवन में यह क्रान्तिकारी परिवर्तन न आता। पहले उन्हें ऋषि दयानन्द जैसा साधु पुरुष मिला नहीं था जिससे वह कुसंगति में फंसकर दुव्र्यसनों से ग्रस्त् हो गये जिससे उनका पारिवारिक जीवन भी बर्बाद हो गया था। इस घटना के बाद सभी बिगड़ी बातें सुधर गईं। हम अनुभव करते हैं कि यदि कोई बन्धु ऋषि दयानन्द के जीवन चरित्र और उनके सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों को पढ़े ले तो उसके जीवन का अमीचन्द जी की भांति सुधार हो सकता है और वह लोहे से कुन्दन बन सकता है।

मनुष्य के अन्दर दुष्टता एवं अन्य दुर्गुण संगति के कारण ही आते हैं। जो मनुष्य ईश्वर की सन्ध्या-उपासना करता है तथा सज्जन व विद्वानों की संगति करता है, उसके अन्दर ईश्वर व उन सज्जन विद्वानों के सदृश गुण आते हैं। वैदिक धर्म में प्रतिदिन दैनिक अग्निहोत्र करने का विधान है। अग्निहोत्र को यज्ञ कहते हैं। यज्ञ करने से देवपूजा, संगतिकरण एवं दान आदि गुणों का सम्मिलित लाभ इसके करने वालों को प्राप्त होता है। अग्निहोत्र करने से जीवन अग्नि के समान पापों से रहित तथा तेजस्वी बनता है। यज्ञ में पुरोहित एवं अन्य विद्वानों की उपस्थिति से उनसे संगतिकरण होता है जिससे उनके धार्मिक विचार सुनने को मिलते हैं। यह धार्मिक विचार हमारे जीवन के दोषों को दूर करते हैं और हमें सज्जन व साधु मनुष्य बनाते हैं। दान करने से सुपात्रों को लाभ होता है जिसका फल परमात्मा कई गुणा दान करने वालों को भी देता है। शुभगुणों का दान भी महत्वपूर्ण है। इससे दूसरों को तो लाभ होता ही है, दानी मनुष्य को भी कर्म के अनुसार फल तथा आत्मसन्तोष का अनुभव होता है। सन्ध्या, अग्निहोत्र-यज्ञ, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा बलिवैश्वदेवयज्ञ सहित वेदज्ञान एवं वैदिक सत्साहित्य के स्वाध्याय के कारण ही वैदिक धर्म एवं संस्कृति विश्व की महानतम संस्कृति है। वैदिक धर्म में सज्जन पुरुष औरों से अधिक पाये जाते हैं, यह हमारा निजी अनुभव है। जैसा गुरु होता है वैसा ही चेला होता है। इस कहावत के अनुसार वैदिक धर्मी राम, कृष्ण, ऋषियों, योगियों, ऋषि दयानन्द तथा स्वामी श्रद्धानन्द जी के गुणों वाले होते हैं।

हमारे देश के अनेक महापुरुषों ने दुष्ट व्यक्तियों के सम्बन्ध में हमें सावधान किया है। महाराज भृतहरि ने लिखा है कि ‘दुष्ट मनुष्य यदि विद्वान हो तो भी उसके संग से बचना चाहिए। क्या मणिवाला सर्प जहरीला नहीं होता?’ आचार्य चाणक्य ने कहा है ‘दुष्ट मनुष्यों को रास्ते पर लाने के केवल दो ही उपाय हैं। या तो जूते से उनका मुंह तोड़ दिया जाय अथवा उनकी अवहेलना कर दी जाये।’ एक अन्य स्थान पर आचार्य चाणक्य ने कहा है ‘दुष्ट व्यक्ति के तीन लक्षण होते हैं, उसका मुख कमल के समान सुन्दर दिखाई देता है और वाणी चन्दन के समान शीतल लगती है परन्तु उसका हृदय कैंची के समान तेज होता है।’ कुमार-संभव ने लिखा है कि ‘दुष्ट लोगों को महान व्यक्तियों के कार्य अच्छे नहीं लगते, इसलिए वे उनसे द्वेष करते हैं।’ आर्यसमाज का सातवां नियम है ‘सबसे प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य (सज्जनों के सज्जनता तथा दुष्टों के साथ दुष्टता का) व्यवहार करना चाहिये।’

ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ यथा नाम तथा गुण एवं विश्वविख्यात ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में उन्होंने मनुष्य की परिभाषा दी है। यहां अन्यायकारी बलवान एवं अधर्मी शब्दों का प्रयोग दुष्ट व्यक्तियों के लिये ही किया गया है। उनके वचन हैं ‘मनुष्य उसी को कहना (अर्थात् मनुष्य वही है) कि जो मननशील होकर स्वात्मवत् अन्यों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान् से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे। इतना ही नहीं किन्तु अपने सर्व सामथ्र्य से धर्मात्माओं, कि चाहे वे महा अनाथ, निर्बल और गुणरहित क्यों न हों, उन की रक्षा, उन्नति, प्रियाचरण और अधर्मी चाहे चक्रवर्ती सनाथ, महाबलवान् और गुणवान् भी हो तथापि उस का नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे। अर्थात् जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करे। इस काम में चाहे उस (मनुष्य) को कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी भले ही जायें परन्तु इस मनुष्यपनरूप धर्म से पृथक् कभी न होवें।’

इस लेख को लिखने का हमारा प्रयोजन यह बताना है कि हमें दुष्ट प्रवृत्तियों के लोगों से कदापि मित्रता व संगति नहीं करनी चाहिये। यदि करेंगे तो इसके दुष्परिणाम हमें प्राप्त होंगे। इसके स्थान पर हमें यथासम्भव सज्जन, सच्चे धार्मिक तथा विद्वान लोगों की ही संगति व मित्रता करनी चाहिये। इससे जीवन में बहुत लाभ होता है। सद्ग्रन्थ भी हमारे सच्चे मित्रों के समान होते हैं। अतः हमें वेद सहित सत्यार्थप्रकाश, उपनिषद, दर्शन, विशुद्ध मनुस्मृति, शुद्ध रामायण एवं शुद्ध महाभारत आदि सद्ग्रन्थों का अध्ययन अवश्य करना चाहिये। इससे हमारा यह लोक एवं परलोक सुधरेगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
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वीरता की अवतार महारानी लक्ष्मी बाई

वीरता की अवतार महारानी लक्ष्मी बाई
डा.अशोक आर्य
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में देश की वीरांगनाओं ने यह सिद्ध कर दिखाया कि नारी केवल अबला, कोमलांगी, रमणी ही नहीं वरण समय आने पर वह सबला, वज्रांगी तथा रणचंडी का रूप धारण करने की शक्ति भी रखती है| इतना ही नहीं वह अपने नाम के अर्थ का विपर्यय करने में भी पूर्णतया सक्ष्म है| यह सब उसके बाल्यकाल से ही आरम्भ हो जाता है| जब महारानी लक्ष्मी बाई अभी मनुबाई के रूप में छोटी ही थी, तभी उसने बाल सुलभ क्रीडाओं में दुर्ग घेरना, चक्रव्यूह तोड़ना, बरछी चलाना आदि के रूप में बच्चों के साथ खेलें खेलीं| इसी से ही इस छोटी-नन्हीं बालिका का भावी जीवन प्रतिध्वनित हो गया था| विवाह के पश्चात् जब पति की मृत्यु होने पर अंग्रेज की कंपनी सरकार ने उसकी एक न सुनी तथा झांसी की बागडोर अपने हाथ में लेने की घोषणा कर दी तो लक्ष्मीबाई ने चंडी का रूप धारण करते हुए पुरुष वेश में समरांगण में जा डटी|
रानी में मोर्चाबंदी करने की अद्भुत कला थी| इस कारण ही तो वह अंग्रेजों पर निरंतर विजय पा रही थी तथा गोरे एक साधारण सी महिला से पराजित होकर मुंह छिपाते फिरते थे| १८ जून १८५८ को लक्ष्मीबाई ने बड़ी सरलता से ग्वालियर पर अपना अधिकार जमा लिया| यहाँ वह चारों और से घिरी हुई थी फिर भी प्रात: उठकर स्नान ध्यान करना न भूलती थी| यहाँ आकर भी प्रात: उसने यह सब नित्यकर्म किया तत्पश्चात् वीरांगना स्वरूप अपना श्रृंगार किया| केसरिया बाना पहिन, शस्त्र उठाकर तथा शत्रुओं के संहार के लिए अपने सखा व साथियों और सैनिकों सहित मैदान में आ डटी| जब उसने अपने एकमात्र पुत्र दामोदर राव को रामचंद्र राव की पीठ पर बांधा तो सब लोग समझ गए कि रानी आज अपना रणचंडी का रूप धारण करने वाली है| कुछ ही क्षणों में तोपखाने ने आग उगलना आरम्भ कर दिया| इस के अचूक निशाने से जहाँ अंग्रेजी सेनाओं के चिथड़े उड़ने लगे, वहाँ उनका तोपखाना भी तहस-नहस होने लगा| जिस ग्वालियर की सहायता के लिए रानी ने जूही के माध्यम से कुमुक भेजी, उसी ग्वालियर की सेना ने ही विश्वासघात किया किन्तु रानी लक्ष्मीबाई ने साहस न छोड़ा और बड़े धैर्य से शत्रु सेना को गाजर-मूली कि भाँति काटते हुए आगे बढ़ने लगी| रानी के भयंकर प्रहारों से भयभीत अंग्रेजी सेना रण छोड़कर भागने वाली ही थी कि अकस्मात् उनकी सहायता के लिए पीछे से सेना की एक और टुकड़ी आ पहुंची| इस मध्य रानी की पैदल सेना ने भी गोरों से भिड़कर महा प्रलय का दृश्य बना दिया| इस भयंकर मारकाट में एक क्षण वह भी आया जब रानी एक स्थान पर अकेली ही रह गई तथा उसकी सहेली मुंदरा भी बुरी तरह से घायल हो गई| रानी दोनों हाथों से बिजली की गति से तलवार चलाते हुए मारकाट मचा रही थी| इस मारकाट के संघर्ष में वह स्वयं भी बुरी तरह से घायल हो गई थी, तो भी रानी तथा उसकी सेना काल बनकर शत्रु सेना के साथ जूझ रहे थे|
गुलमुहम्म्द ने देखा कि रानी की अवस्था अत्यंत गंभीर है | इस अवस्था को देख गुलमुहम्म्द ने तत्काल उन्हें बाबा गंगादास की कुटिया तक पहुंचाया| यहाँ पहुँचाने तक रानी की अवस्था बहुत बिगड़ चुकी थी|, मुंदरा तो इससे पहले ही ईश चरणों में जा चुकी थी| महारानी ने भी अंतिम बार अपनी आँखें खोलीं और फिर सदा सदा के लिए प्रभु चरणों में लीन हो गई| इस प्रकार जो ज्योति २१ अक्टूबर सन् १८३५ में प्रज्वलित हुई थी, वह मात्र २३ वर्ष की आयु में ही अत्यधिक आभा बिखेर कर १८ जून १८५७ को सदा के लिए लीन हो गई| किन्तु इतिहास में उनके शौर्य के चर्चे सदा होते रहेंगे|
रानी के देहांत पर बाबा गंगादास जी ने अपनी झोंपड़ी की घास तथा लकडियाँ उधेड़ कर दोनों सखियों का दाह संस्कार किया| जब दोनों चिताएं धू-धू कर जल रहीं थीं तो गुलमुहम्म्द ने अपनी सैनिक पौशाक (केसरिया बाना) को भी चिता की भेंट कर दिया| उधर बालक दामोदर राव को लेकर रामचंद्र राव देशमुख भी दक्षिण को चला गया तथा रघुनाथ घात लगाए गौरों की प्रतीक्षा में बैठ गया| जब चिता ठंडी हो गई तो गुलमुहम्मद ने रानी की चिता के स्थान पर स्मारक स्वरूप एक चबूतरा बना दिया| यह बनाया गया चबूतरा ही बाद में रानी लक्ष्मीबाई की भव्य समाधि के रूप में बदल गया| आज प्रतिदिन हजारों सैलानी इस स्मारक के दर्शन कर अपने आप को धन्य मानते हैं|
आर्य समाज की महान् सेविका तथा हिंदी साहित्य की अन्यतम कव्यित्री सुभुद्रा कुमारी चौहान ने बड़े सुन्दर काव्य में रानी को इस प्रकार स्मरण किया है :-
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी ,
सन् सतावन में चमक उठी वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी ,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी||

डा. अशोक आर्य
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तीन बार अंग्रेज की फांसी पर झुलाने वाले नगर सेठ अमरचंद

तीन बार अंग्रेज की फांसी पर झुलाने वाले नगर सेठ अमरचंद
डा. अशोक आर्य
बीकानेर आरम्भ से ही वीर प्रस्विनी भूमि राजस्थान का मुख्य भाग रहा है| यहाँ के ही निवासी सेठ अमरचंद बाँठिया के यहाँ जो संतान हुई, उसका नाम अबीरचंद बाँठिया रखा गया|
अभी वह छोटे ही थे कि उनके पिता व्यापार के लिए ग्वालियर जा बसे| पुत्र का साथ जाना आवश्यक था| अत: अबीरचंद जी भी पिता के साथ ही ग्वालियर में जाकर रहने लगे| अबीरचन्द जी के पिता जैन मत के अनुगामी थे, इस कारण उन्होंने अपने व्यापार में इतना परिश्रम किया, इसमें इमानदारी को कभी हाथ से जाने न दिया| अपनी सज्जनता का भी पूरा परिचय दिया| इन सब कारणों से अबिरचंद जी तथा उनके परिवार को इतनी प्रतिष्ठा मिली कि इस प्रतिष्ठा के कारण ग्वालियर राजघराने ने उन्हें नगर सेठ की उपाधि प्रदान करते हुए राजघराने के ही समान अपने पैरों में सोने के कड़े पहनने का अधिकार भी दे दिया| ग्वालियरका राजा इतना सम्मान देकर ही संतुष्ट न हुआ अपितु कुछ काल पश्चात् उन्हें अपने राज्य के राजकोष का प्रभारी भी नियुक्त कर दिया|
अमरचन्द जी स्वभाव से ही बड़े धर्मप्रेमी व्यक्ति थे। अपने इस धार्मिक स्वभाव के कारण वह धार्मिक सत्संगों में जाते हही रहते थे| सन् 1855 ईस्वी में उन्होंने चातुर्मास के दिनों में ग्वालियर पधारे जैन सन्त बुद्धि विजय जी के प्रवचन सुने। इन्हीं सन्त महाराज के प्रवचन वह इससे पूर्व सन् 1854 ईस्वी में अजमेर में भी सुन चुके थे। इन प्रवचनों को सुनने का यह परिणाम हुआ कि वे विदेशी और विधर्मी राज्य के विरुद्ध डटकर खड़े हो गये। सन् 1857 ईस्वी के प्रथम स्वाधीनता आन्दोलन में उन्होंने बढ़चढ़ कर भाग लिया तथा जब अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय सेना और क्रान्तिकारी ग्वालियर में सक्रिय हुए, तो सेठ जी ने स्वयं को भामाशाह के प्रतिरूप में प्रस्तुत किया तथा न केवल राजकोष के समस्त धन को ही अपितु इसके साथ ही साथ अपनी पैतृक सम्पत्ति को भी देश कि स्वाधीनता के लिए उन्हें सौंप दिया।
अमरचंद जी कहा करते थे कि राजकोष का सब धन संग्रह सदा जनता से ही होता है, इसलिए जनता के हित के लिए इस धन को जनहित में देश को अथवा देश को स्वाधीन करवाने का प्रयास कर रहे स्वाधीनता सेनानियों को देना अपराध नहीं है| जहाँ तक निजी सम्पत्ति का प्रश्न था, वह उनकी अपनी मेहनत से कमाई गई थी, उसके प्रयोग का अधिकार भी उनका निज का ही था | अत: अपनी निजी सम्पत्ति होने के कारण, वे चाहे जिसे दें, इस पर किसी की कोई रोकटोक या आपत्ति का अधिआकर नहीं है| अत: यह संपत्ति भी उन्होंने देश के लिए न्योछावर कर दी| उनका यह दान अंग्रेज को कहाँ सहन हो सकता था? अत: अंग्रेजों ने इन्हें राजद्रोही घोषित कर उनके विरुद्ध वारण्ट जारी कर दिया। ग्वालियर राजघराना भी उस समय अंग्रेजों का ही साथ दे रहा था।
अपने विरुद्ध वारंट जारी होने का समाचार सुनते ही अमरचन्द जी भूमिगत होकर क्रान्तिकारियों का सहयोग करते रहे| इस मध्य ही एक दिन दुर्भाग्य से वे शासन के हत्थे चढ़ गये| उन्हें हिरासत में ले लिया गया| अब उन पर मुकदमा चलाकर उन्हें जेल में ठूँस दिया गया। अनेक प्रकार की सुख-सुविधाओं में पले सेठ अमर चंद जी को वहाँ दारुण यातनाएँ दी गयीं। यथा उन्हें मुर्गा बनाना, पेड़ से उल्टा लटका कर चाबुकों से मारना, हाथ पैर बाँधकर चारों ओर से खींचना, लोहे के जूतों से मारना, मूत्र पिलाना आदि अमानवीय यातनाएं प्रमुख थीं| अंग्रेज चाहते थे कि वे क्षमा माँग लें; किन्तु देश के लिए मर मिटने के लिए सब सुखों को त्याग चुके सेठ अमरचंद जी क्षमा के लिए तैयार कैसे हो सकते थे? अत: उन्होंने क्षमा माँगने के स्थान पर स्वयं को भारत माता की भेट चढ़ाना उत्तम समझा| उनके इस निर्णय से कुपित अंग्रेजों ने उनके आठ वर्षीय निरपराध पुत्र को भी पकड़ लिया।
पिता के लिए पुत्र एक कमजोर कड़ी माना जाता है| इस कमजोर कड़ी का ही प्रयोग करते हुए अंग्रेजों ने धमकी दी कि यदि तुमने क्षमा नहीं माँगी, तो तुम्हारे पुत्र की हत्या कर दी जाएगी। अमर चंद जी के लिए यह बहुत कठिन घड़ी थी; परन्तु सेठ जी इस धमकी से भी उस प्रकार ही विचलित न हुए जिसप्रकार बन्दा वीर वैरागी अपने बच्चे के बलिदान पर विचलित न उए थे| अपनी क्रूरता के लिए प्रसिद्ध अंग्रेज ने निरपराध बालक(अमरचंद के पुत्र) को तोप के मुँह पर बाँधकर गोला दाग दिया। बच्चे का शरीर चिथड़े-चिथड़े होक्रर हवा में फ़ैल गया। फिर भी जब नगर सेठ अमरचंद जी विचलित न हुए तथा अपने हठ को न छोड़ा तो सेठ जी के लिए फांसी कि तिथि निश्चित कर दी गई| अत: 22 जून, 1858 ईस्वी को उन्हें भी फाँसी पर लटकाने की घोषणा कर दी गई| अंग्रेज इस फांसी के कृत्य को करते हुए नगर तथा ग्रामीण लोगों को भी भयभीत करना चाहता था| इसलिए नगर तथा संलग्न देहातों के ग्रामीण लोगों के सामने सर्राफा बाजार में ही उन्हें फांसी देने की सार्वजनिक घोषणा की गई|
कुछ ही दिनों में फांसी के लिए निर्धारित 22 जून भी आ गया। सेठ जी तो दिल के भी सेठ ही थे, इस कारण उन्हें अपने शरीर का कोई मोह नहीं रह गया था। फांसी के फंदे पर जाते समय जब उनसे अन्तिम इच्छा के लिए पूछा गया तो उन्होंने अपने धर्म के अनुसार नवकार मन्त्र जपने की इच्छा व्यक्त की। उन्हें इसकी अनुमति दे दी गयी; जो उन्होंने बड़ी श्रद्धा भावना से पूर्ण की| देश भक्तों की सहायता करने वाले के लिए परमात्मा सदा ही साथ आ जाता है| इनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ| इनको परमात्मा की व्यवस्था के कारण एक बार नहीं तीन बार फांसी पर लताकायागआया| प्रथम बार जब इनको फांसी पर लटकाया जाने लगा तो अकस्मात् वह रस्सी टूट गई, जिससे उन्हें फांसी डी जा रही थी| अत: नई रस्सी तैयार कर उन्हें दूसरी बार फांसी पर लटकाया गया तो इस बार पेड़ की वह शाखा ही टूट गई, जिस पर उन्हें लटकाने का यत्न किया गया था| अब तीसरी बार उन्हें फांसी पर लटकाया जाना था| तीसरी बार उन्हें एक मजबूत नीम के पेड़ पर लटकाया गया| इस तीसरी बार अंग्रेज बड़ी कठिनाई से उन्हें फांसी देने में सफल हो पाया| अब अंग्रेज ने पुन: जन सामान्य को भयभीत करने के लिए शव को नीम के पेड़ से उतारने के स्थान पर इसे वहीँ लटकने दिया और यह शव तीन दिन तक उस पेड़ पर ही लटकता रहा| इस शव को देख लोग मन ही मन अंग्रेज की बर्बरता पर आंसू बहाते रहे|
सर्राफा बाजार में स्थित जिस नीम के पेड़ पर सेठ अमरचन्द बाँठिया जी को फाँसी दी गयी थी, उसके निकट ही आज सेठ जी की प्रतिमा स्थापित की गई है। प्रति वर्ष 22 जून को वहाँ बड़ी संख्या में आकर लोग देश की स्वतन्त्रता के लिए अपने तथा अपनी एकमात्र संतान के प्राण देने वाले उस अमर हुतात्मा को श्रद्धाँजलि अर्पित करते हैं।

डा. अशोक आर्य
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अमर बलिदानी राजा देवीसिंह गोदर

अमर बलिदानी राजा देवीसिंह गोदर
(जिनका बलिदान प्रथम 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में हुआ)
डा. अशोक आर्य

राजा देवीसिंह जी का जन्म मथुरा के राया तहसील के गांव अचरु में गोदर गौत्र (जिसे आज गोदारा के नाम से जाना जाता है) के हिंदू जाट परिवार में हुआ। धर्म के प्रति आप का अत्यधिक विश्वास था| इसके साथ ही साथ आप एक अच्छे पहलवान् भी थे। पहलवान् होने से तो आपका झुकाव क्षत्रियत्व की और होना चाहिए था किन्तु आपमें धार्मिक भावना अधिक बलवती थी, इस कारण आपने राज्य सत्ता के सुखों को त्याग कर संन्यास ले लिया और साधू बनकर घूमने तथा सदुपदेश देने लगे|
एक युवक के ताना देने क परिणाम:-
भारत जब अंग्रेजी दासता में जकड़ा हुआ था तथा देश पर अंग्रेज़ी अत्याचारों से भारतीय जूझ रहे थे| इन्हीं दिनों की बात है, जब आप एक गाँव में पहलवानी कर रहे थे तो आपके समकक्ष कोई अन्य पहलवान् न होने से कोई पहलवान् टिक नहीं पा रहा था| अत: आपकी विजय हुई| विजेता पहलवान् देवीसिह जी ने विजय की प्रसन्नता में जब झूमना आरम्भ किया तो एक युवक ने उन पर ताना कसते हुए कहा कि यहां एक छोटी सी जीत पर इतनी ख़ुशी मना रहे हो यदि दम है तो अंग्रेजों के सामने खड़े होकर देश की आजादी के लिए लड़ो| आप जानते हैं कि आपके पूर्वजो ने सदा से इस क्षेत्र की रक्षा अपने प्राणों की आहुति देकर की है। क्षत्रियों का धर्म भी यही उपदेश करता है|
राजा साहब तो बाल्यकाल से ही देशभक्त और धर्म परायण थे| अत: उस युवक की कही गई साधारण सी यह बात सीधे उनके दिल में जा कर चुभ गई| पहलवान् राजा साहिब ने प्रत्युत्तर में कहा कि बात तो तुम्हारी शतप्रतिशात सही है| यहां ताकत दिखाने का कोई लाभ नहीं, यह तो शक्ति का नाश करना ही तो है| मुझे अंग्रेज से लड़कर देश को आजाद कवाना चाहिए किन्तु अंग्रेजों जैसे शक्तिशाली शत्रु से लड़ने के लिए एक उत्तम सेना भी तो चाहिये, मैं वह सेना कहां से लाऊं। वहां पर उपस्थित उनके एक साथी ने तत्काल सुझाव दिया कि आप अपनी स्वयं की एक अच्छी सेना खड़ी करें। इस पर राजा साहब सहमत हो गए। पूरे क्षेत्र में राजा देवीसिंह जी का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता था|लोग राजा साहिब के प्रति अत्यधिक श्रद्धा रखते थे तथा उनका बहुत आदर करते थे।
क्रान्ति की ज्वाला
इस घटना के अनंतर राजा देवीसिंह जी के जीवन का जीवन ही परिवर्तित हो गया, एक उद्देश्य निर्धारित हो गया और उन्होंने सेना के एकत्रीकरण के लिए संलग्न गांवों के भ्रमण आरम्भ कर दिए| इस भ्रमण के मध्य जहाँ वह देश की स्वाधीनता के लिए योद्धाओं का साथ पाने के लिए आह्वान् कर रहे थे वहां जन जन में भी स्वाधीनता के महत्व को समझाते हुए उन्हें अपने आन्दोलन के साथ जोड़ रहे थे| स्वराज्य का भीष्ण शंखनाद करते ही उन्होंने क्षेत्र के गावों यथा राया, हाथरस, मुरसान, सादाबाद आदि समेत सम्पूर्ण कन्हैया की नगरी मथुरा, बृज क्षेत्र में क्रांति की अलख जगा दी। उस तेजस्वी नेता ने तेजपूर्ण भाषणों का ऐसा तांता बांधा कि युवाओं के खून में उबाल आने लगा और उनके साथ जुड़कर देश के लिए मर मिटने की शपथ लेकर पंक्तिबद्ध होने लगे। अत: उन्हें एक देशभक्त तथा धार्मिक सेना खड़ी करने में कुछ भी परेशानी नहीं आई। इस देशभक्त सेना ने राजा साहिब के नेत्रत्व में किसान की आजादी, अपना राज, तथा भारत को दासता से मुक्त कराने का दृढ संकल्प लिया।
कोई भी कार्य करना हो तो सब से पूर्व उसमें व्यय होने वाले धन की आवश्यकता होती है| इस आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए उन्होंने कुछ तो चंदा एकत्र किया तथा कुछ अंग्रेजों के धन को लूटकर तलवारों और बंदूकों की व्यवस्था की| अब जब धन भी आ गया और शस्त्र भी मिल गए तो इन्हें चलाने के लिए भी प्रशिक्षण की आवश्यकता थी| इन्हें शीघ्र ही शास्त्रों क प्रशिक्षण देने के लिए एक ऐसा प्रशिक्षक मिला गया, जो एक पदमुक्त सैनिक अधिकारी था| इस अधिकारी ने अपनी सेवाओं के माध्यम से सब वीरों को शस्त्र चलाने के लिए प्रशिक्षण देना आरम्भ किया और कुछ ही दिनों में युवकों को शास्त्रात्रों में निपुण भी कर दिया| बस फिर क्या था, देशभक्त प्रतीक्षा तो किया नहीं करते| देश को अपनी सेवायें देने के लिए उन्हें अवसर भी मिला गया| 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम अभी आरम्भ ही हुआ था, राजा साहिब अपनी इस नवनिर्मित सेना के साथ इस क्रान्ति के सहभागी बन अंग्रेज के विरोध में आ खड़े हुए|जब इस सबकी सूचना अंग्रेजों को मिली तो वह बौखला गए। राजा साहिब को क्रान्ति से अलग करने के लिए उन्होंने राजा साहब को लालच देते हुए ब्रिटिश सेना में आने का निमंत्रण दिया किन्तु राजा देवीसिंह ने बड़ी वीरता से अंग्रेज को यह उत्तर दिया कि अपने देश के दुश्मनों के साथ मिलकर अपने ही देशवासियों के विरोध में वह कभी भी खड़े नहीं हो सकते|
तत्पशचात् हरियाणा के नगर फरीदाबाद के निकटवर्ती सथित नगर बल्लभगढ के राजा नाहर सिंह ने उनकी भरपुर सहायता करते हुए, उन्होंने दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह जफर के पास जाकर राजा देवीसिंह जी की अनुशंसा करके उनके राज को मान्यता देने के लिए अनुरोध किया|बहादुरशाह जफर को उस समय क्रान्तिकारियो की आवस्यकता तो थी ही इसके साथ ही उनके सहायक के रूप में एक नाहरसिंह ही तो थे, जिनके कारण वह दिल्ली को अब तक अंग्रेजों से बचाये हुए थे। इसलिए उन्होंने इस अनुशंसा को तत्काल स्वीकार करते हुए राजा देवीसिंह जी के राज्य को अपनी और से मान्यता दे दी। इस प्रकार राजा देवीसिंह जी का राज तिलक हुआ और वह एक मान्यता प्राप्त श्रेणी के विधिवत् राजा बने|
राजा के रूप में देवीसिह जी ने अब अंग्रेज की सब व्यवस्थाओं को तहस नहस करने के लिए अंग्रेज संस्थाओं पर आक्रमण करना तथा उन्हें लूटना आरम्भ कर दिया| इस प्रकार ही मार्च सन् 1857 ईस्वी में एक बार फिर राजा देवीसिंह जी ने राया थाने पर आक्रमण कर दिया तथा वहां का सब कुछ नष्ट भ्रष्ट कर दिया। सात दिन तक थाने को घेरे रखा। जेल पर आक्रमण करके सब सरकारी दफ्तरों, बिल्डिंगों,पुलिस चौकियों आदि को जला कर राख कर दिया गया। परिणाम स्वरूप उस क्षेत्र के अंग्रेज कलेक्टर थोर्नबिल वहां का सब कुछ नष्ट होता वहीँ छोड़ वेष बदलकर वहां से भाग खड़ा हुआ। उसके भागने में उसके वफादार दिलावरख़ान और सेठ जमना प्रसाद ने उसकी सहायता की। इसके प्रतिफल स्वरूप दोनों को ही अंग्रेजी सरकार से बड़ा भूभाग तथा अन्य पुरस्कार मिला।
इस प्रकार राजा देवीसिह जी के प्रयास से राया अंग्रेज के चंगुल से निकल कर स्वाधीन हो गया| जिन बही खातों व अन्य माध्यमों से अंग्रेज लोग भारतीयों को लूट रहे थे, वह सब राजा साहिब ने अपने कब्जे में लेने के अनंतर जला दिए| यह सब व्यवस्था करने के अनंतर उन्होंने नगर के उन व्यापारियों को धमकाया, जो अंगेज का समर्थन किया करते थे| उन्हें कहा गया कि या तो देश सेवा के कार्यों में उनका साथ दें अन्यथा दंड के लिए तैयार रहें। जो व्यापारी नहीं माने उनकी दुकान से सामान लूट लिया गया तथा उनके बही खाते जला दिए गए क्योंकि वे अंग्रेजों के साथ रहकर गरीबों से हद से ज्यादा सूदखोरी करते थे। पूरे मथुरा में राजा देवीसिंह की जय के नारे गूंजने लगे, उन्हें गरीबों का राजा कहते हुए सदैव अजेय राजा के रूप में जनता ने उन्हें प्रस्तुत किया|
राजा साहिब को अपना थाना चलाने के इए स्थान की आवश्यकता थी| उन्होंने एक सरकारी स्कूल के भवन को इस हेतू लिया और थाना आरम्भ कर दिया तथा अपनी सरकार पूर्णतः आधुनिक पद्धति से बनाई। उन्होंने कमिशनर, अदालत, पुलिस सुप्रिटेंडेन्ट आदि पद बना कर ईमानदार तथा देशभक्त व्यक्तियों को इन पदों पर नियुक्त किया| राजा साहिब प्रतिदिन यहाँ आकर जनता की समस्याओं को सुनते और उनका निराकरण करते| अब उन्होंने राया के किले पर भी अधिकार कर लिया। उनका यह नियम था कि प्रतिदिन जनता के बीच रहते हुए उनकी समस्याओं को अपनी आँखों से देखते और उनका समाधान भी करते थे।
राजा साहिब सब में देशभक्ति की भावानाएं जगाते रहते थे| इस हेतु वे देशभक्ति को जगाते हुए पूरे क्षेत्र में घूमते थे। उनके क्षेत्र में अंग्रेजों के प्रवेश पर रोक थी। राजा साहिब ने अनेक बार क्रांतिकारियों की सहायता करते हुए उनके साथ मिलकर अनेक अंग्रेजों को लूटा व आम लोगो की सहायता की।
बलिदान
राजा साहब ने निरंतर एक वर्ष तक अंग्रेज के नाक में दम किये रखा| किसी भी क्षण अंग्रेज को सुख चैन से बैठने का अवसर तक न दिया| अवस्था यहाँ तक आ गई कि अंग्रेज सरकार की चूलें तक हिलने लगीं|अंग्रेज अधिकारी तो राजा साहिब का नाम तक ही सुनकर थर थर कांपने लगते थे। एक अकेला वीर इतनी विशाल अंग्रेज सेना का कब तक सामना कर सकता था, हुआ भी कुछ ऐसा ही| अंग्रेजों ने कोटा से अपनी सेना को बुलाया| सेनाधिकारी मि. बिल ने अंग्रेज सेना के अधिकारी डेनिश के नेत्रत्व में सेना की एक बड़ी टुकड़ी की सहायता से आक्रमण किया, बड़ी सेना होते हुए भी धोखा देने में चतुर अंग्रेज ने यहाँ भी धोखे से ही काम लिया और धोखे से राजा साहिब को बंदी बना लिया। दिनांक 15 जून सन् 1858 को राया में ही उन्हें, उनके साथी श्री राम गोदारा तथा उनके अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ फांसी दे दी गई| अंग्रेजों ने फांसी देने से पूर्व उन्हें झुकने के लिए बोला किन्तु राजा साहिब ने कड़कते स्वर में निर्भय होकर कहा कि मैं मृत्यु के भय से अपने देश के शत्रुओं के आगे नहीं झुकूंगा।
इस प्रकार भारत माता का एक सच्चे सपूत, देशभक्त साधु ने देश पर संकट आने पर, संन्यास धर्म से ऊपर उठते हुए, अपनी तलवार पुनः उठाकर क्षत्रिय धर्म का पालन किया तथा देश सेवा करते हुए हंसते हंसते फांसी पर झूलकर देश के लिए बलिदान हो गया ।

डा. अशोक आर्य
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सर्वोत्तम धर्मग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश’

सर्वोत्तम धर्मग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश’
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🌷परमात्मा ने इस सृष्टि और मनुष्य आदि प्राणियों को बनाया है। परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति का अखिल विश्व में स्वतन्त्र अस्तित्व है। यह तीनों सत्तायें मौलिक, अनादि, नित्य, अनुत्पन्न, अविनाशी गुणों वाली हैं। परमात्मा ने यह सृष्टि जीवों के कर्मों के सुख व दुःख रूपी फल प्रदान करने के लिये बनाई है। मनुष्य योनि वह योनि है जिसमें वह जीवात्मा उत्पन्न किये गये हैं जिन्होंने पूर्व जन्मों में आधे से अधिक शुभ व पुण्य कर्म किये हों। जिसके शुभ, पुण्य या अच्छे कर्मों का प्रतिशत 50 से जितना अधिक होता है, उन्हें इस मनुष्य जीवन में उतने ही अधिक सुख, ज्ञान व साधन आदि प्राप्त होते हैं। अन्य जीवात्माओं, जिनके अशुभ कर्मों का अनुपात शुभ कर्मों से अधिक होता हैं, उन्हें मनुष्येतर नीच योनियां प्राप्त होती हैं जहां वह दुःखों से मुक्ति के लिये मनुष्यों की तरह सन्ध्योपासना, यज्ञ, परोपकार, दान आदि शुभ नहीं कर सकते। मनुष्य का जीवन मिल जाने पर इसे समाजोपयोगी व देशोपयोगी बनाने के लिये ज्ञान प्राप्ति तथा ज्ञानानुरूप पुरुषार्थमय जीवन व्यतीत करने की आवश्यकता होती है। ज्ञान की प्राप्ति मनुष्यों को अपने माता-पिता, आचार्यों, पुस्तकों का अध्ययन, वेद एवं ऋषियों के ग्रन्थों के स्वाध्याय के द्वारा होती है।

वर्तमान में देश देशान्तर में सत्य विद्याओं के ग्रन्थों की उपलब्धि न होने और भोले भाले मनुष्यों के अविद्यायुक्त मिथ्या मतों व उनके ग्रन्थों सत्यासत्य मिश्रित बातों में फंसे होने से सत्य ग्रन्थों के अध्ययन की अतीव आवश्यकता है। सत्य ग्रन्थों की परीक्षा करने के बाद पूर्ण प्रमाणिक ग्रन्थ ईश्वर से प्राप्त वेद ज्ञान की चार संहितायें सिद्ध होती हैं। चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं। वेद ज्ञान की इन संहिताओं समस्त ईश्वर प्रदत्त ज्ञान सम्मिलित है। सृष्टि की आदि में परमात्मा ने चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा के माध्यम से अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न सभी मनुष्यों को यही वेद ज्ञान प्रदान किया था। इससे वेदाध्ययन की परम्परा आरम्भ होकर ऋषि जैमिनी, ऋषि दयानन्द और उनके अनुयायियों तक चली आई है। वेदों को समझाने व इनका सरलीकरण करने के लिये समय-समय पर अनेक ऋषियों ने व्याकरण ग्रन्थों सहित अनेक विषयों के शास्त्र ग्रन्थों का प्रणयन किया। वर्तमान में दर्शन, उपनिषदादि ग्रन्थ परा विद्या के प्रमुख ग्रन्थों में आते हैं। इसके अतिरिक्त व्याकरण सहित आयुर्वेद, ज्योतिष, कल्प व शिल्प आदि अपरा विद्याओं के ग्रन्थों का अध्ययन कर मनुष्य अपने जीवन को दुःखों से मुक्त कर मरणोपरान्त जन्म मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त कर ईश्वर के सान्निध्य से उसके परमानन्द को भोग सकते हैं।

जन्म मरण से मुक्ति सहित ईश्वर के परमानन्द की प्राप्ति के लिये मनुष्यों को सत्य व धर्म का आचरण करना होता है। इसके ज्ञान के लिये वेदों के बाद सबसे अधिक ज्ञानयुक्त ग्रन्थ ‘‘सत्यार्थ-प्रकाश” है। मनुष्य जीवन के लिये उपयोगी सभी विषयों व उनके सत्य अर्थों का विधान इस ग्रन्थ से प्राप्त होता है। इस ग्रन्थ के समान महत्चवपूर्ण व उपयोगी अन्य कोई ग्रन्थ संसार में नहीं है। इस ग्रन्थ से मनुष्यों के कर्तव्यों के ज्ञान सहित उनके आचरण की प्रेरणा प्राप्त होती है। अकर्तव्यों व अशुभ कर्मों से होने वाली हानियों के ज्ञान के साथ उनसे दूर रहने की प्रेरणा भी यह ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश करता है।

यदि यह ग्रन्थ देश के सभी मनुष्यों तक पहुंच जाये और स्कूलों आदि के द्वारा इसका अध्ययन कराया जाये तो मनुष्य अविद्याओं व मिथ्याचरणों में विचरण करने और अपनी आध्यात्मिक एवं शारीरिक हानि होने से बच सकता है। इसके प्रचार से मिथ्या मत-मतान्तरों का हानिकारक प्रभाव भी दूर हो सकता है और समस्त विश्व के सभी मनुष्य सत्य ज्ञान के अनुसरण कर अपना व दूसरों का उपकार कर श्रेय मार्ग के पथिक बन कर ईश्वर की कृपा के पात्र बन सकते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति सहित संसार से अविद्या का नाश और विद्या का प्रसार करने के लिये सच्चे ईश्वर भक्त ऋषि दयानन्द ने इस ग्रन्थ का प्रणयन किया है। यह ग्रन्थ ज्ञान का सूर्य है जबकि इसके सम्मुख सभी मत-मतान्तरों की पुस्तकें अज्ञान के तिमिर से युक्त हैं। यहीं कारण हैं कि अनेक प्रमुख मतों के विद्वानों ने इसका अध्ययन करने व इसको समझने के बाद सत्य वैदिक मत का अनुयायी बन कर इसके प्रचार व प्रसार को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया।
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वृत्ति सारुप्यता योग मार्ग और भोग मार्ग

वृत्ति सारुप्यता
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वैदिक विद्वान श्री अवधेश प्रसाद पांडेय जीने on line Vebinar में कल योग विषयक चर्चा करते हुए कहा था कि –

मनुष्यमात्र का सर्वांगी उत्कर्ष योग रूपी प्रबल साधन से प्राप्त होता है । समस्त दुखों से छूटकर नित्य सुख की प्राप्ति करनी हो तो योगशास्त्र का आश्रय लेना पड़ेगा और तदनुसार अपना आंतर – बाह्य आचरण करना पड़ेगा ।

योग शास्त्र के रचयिता पातंजल ऋषि ने युज समाधौ योग शब्द का अर्थ समाधि कहा है अर्थात् दूसरे सूत्र अनुसार
योग: चित्त वृत्ति निरोध: चित्त की वृत्तियों को रोकना योग है । योग को समाधि है अर्थात् अपनी वृत्तियों को रोककर हृदय स्थित परमात्मा में निवेशित करना योग है । चित्त की उत्कृष्ट भूमि में समाधि प्राप्त होती है । इसको निरुद्ध अवस्था कहते है । इस अवस्था में असंप्रज्ञात समाधि लगती है और ईश्वर साक्षात्कार होता है ।

तीसरे सूत्र में योग का फल दर्शाया गया है –

तदा द्रष्टु: स्वरूपे अवस्थानम् = योगी की उच्च स्तरीय निरुद्ध अवस्था में वह आत्मस्थित परमात्मा का प्रकाशन कर लेता है । चित्त की इस परिपक्व अवस्था में परमात्मा खुद योगी पर विशेष कृपा बरसाते हुए अपना ज्ञान चक्षु प्रदान करके अपना प्रत्यक्ष स्वरूप प्रगट कर देता है । इस अवस्था में योगी के कलेशो की नितान्त परिसमाप्ति हो जाती है । *जैसी स्थिति कैवल्य की होती है वैसी स्थिति इस निरुद्ध अवस्था में योगी प्राप्त कर लेता है । अब वह स्पष्ट रूप से जान लेता है कि मैंने आवागमन के सारे बंधन तोड़ दिए है, सारे अविद्या के संस्कार दग्धबिज कर डाले है, अतः मेरा जन्म निश्चित रूप से आगे नहीं होगा और शरीर छुटने के बाद मै मोक्ष प्राप्त करूंगा ।

चौथा सूत्र – वृत्तिसारुप्यमितरत्र की विस्तार से व्याख्या करते हुए श्रीमान पांडेय जीने कहा था कि –

यदि योगी = साधक मन की एकाग्र अथवा निरुद्ध अवस्था प्राप्त नहीं करता तो वह व्युत्थान दशा में होता है । इसको पतित अवस्था = सांसारिक अवस्था भी कहते है । इस अवस्था में क्लेश, बंधन, दुःख, पीड़ा, परतंत्रता, जन्म मरण आदि बने रहेंगे । इस व्युत्थान दशा को “योग” नहीं कह सकते । क्षिप्त, विक्षिप्त अथवा मूढ़ अवस्था में रहनेवाले मनुष्य को साधन करना ही पड़ेगा । उसे क्रम से संघर्ष करते हुए निरंतर आगे बढ़ना होगा । इतर अवस्था में साधक विषय – वस्तु – घटना का ठीक विवेक नहीं कर पाता । अपने मन की वृत्ति को वह अपने आत्मा में आरोपित कर देता है । जब मनुष्य सांसारिक विषय वासनोआे तथा संबंधों में चिपकता है, तब उसे खाना – पीना – घूमना – सोना – मोज मस्ती करना अच्छा लगता है । परिणामत: वह निश्चित पतन की गर्ता में जायेगा ही, ऐसा कह सकते है ।
दर्शित विषयो को अपना स्वरूप मान लेना बहुत बड़ी अविद्या है । मन के स्क्रीन पर आते हुए दृश्य को अपना स्वरूप मान लेना अविवेक है, बेईमानी है, जूठा दर्शन है ।

हम जीवात्मा तात्विक रूप से स्वतंत्र है, अणु स्वरूप है, चेतन है, अनंता है, अपरिणामी है, निर्लेप है, शुद्ध है, बुद्ध है = जाननेवाले दृष्टा है, कर्ता है, सुख दुःख के भोक्ता है ।

मन एक परमात्मा प्रदत्त दिव्य अत्यंत शक्तिशाली साधन है । वह पंच भूतो से सृजित है । सत्व प्रधान आंतर – बाह्य द्विमुखी साधन है । मन का व्यापार है, वृत्तिओ का निरंतर उठाते रहना । हम आत्मा मन से पृथक चेतन सत्ता है । वृत्ति को उठानेवाले हम है, रोकनेवाले भी हम है । मन में वृत्तियों को संयमित करना हमारे हाथ में है । मन में उठाई गई वृत्ति को अथवा तो संसार में घटित घटना को अपना मान लेना महा मूर्खता है । महा अविवेक है ।

उदाहरण देखे –
घर जल गया, तो मै मर गया, मै लूट गया ऐसा मानना इतर अवस्था है, पतन अवस्था है, व्युत्थान अवस्था है । वृत्ति सारुप्यता रखना खतरनाक है । हमारे पास बहुत सारे उदाहरण है कि – एक परिवार में पति की मौत हुई, तो पत्नी ने मान लिया कि हाय.. हाय… मै मर गई । मै लूट गई, मेरा क्या होगा ? आधे घंटे में उसकी भी “हार्ट अटैक” से मौत हो गई । यह क्या है, वृत्तिसारुप्यता । अन्य में हुई घटना को अपने में आरोपित कर देना मूर्खता है । परमात्मा ने हमे अपना शरीर सुरक्षा के लिए, स्वस्थ रखने के लिए तथा महत्तम सुख – आनंद – ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए दिया है । अपनी नादानी से, मूर्खता से इस मूल्यवान शरीर को ऐसे कैसे फेंक सकते है ?

स्व. ज्ञानेश्वरजी आर्य को स्मरण करते हुए वैदिक विद्वान श्री अवधेश प्रसाद जीने कहा था कि
किसीकी मृत्यु हुई हो, उस काल में वे वानप्रस्थ साधक आश्रम, रोजड़ में हमे बताते थे ऐसी मृत्यु की घटना में किसीको भी बिल्कुल रोना नहीं है, दुःखी भी नहीं होना है । बाह्य घटना को अपने में आरोपित नहीं करना है । शांत, गंभीर, धर्यवान और संतुलित बने रहना है । इस घटना को दृष्टा भाव से देखना है ।

रोते वे है जो उस व्यक्ति या वस्तु के प्रति राग रखते है, मोह रखते है । रोना – पीटना अर्थात् अपनी मन की स्थिति को बिगाड़ना है, विचलित करना है । अपने प्रियतम के प्रति छोटी छोटी बातों में रूठ जाना, आंसू बहाना बिल्कुल गलत बात है । ऐसा तो संसारी भोगवादी व्यक्ति ही करते है । हमे तो प्रेम करना है, वह भी नि:स्वार्थ । हमे हर हालत में स्थिर बुद्धि से अपने कर्तव्य का निर्वहन करना है । रोग द्वेष मोह से ऊपर उठना है । संकट समय में साधक कभी रोते नहीं, गभराते नहि, वे धीर, गंभीर तथा दृष्टा बने रहते है, सम्यक बने रहते है । उस संकट का सामना करते है, स्थिर मन से, शांत मन से, जागृत मन से समस्या का समाधान निकालने का पूरी ईमानदारी से प्रयास करते है ।
योगी एवम् साधक गण एसी दुखद घटना कभी भी, कीसीके भी साथ हो सकती है, ऐसी मानसिक पूर्व तैयारी बनाएं रखते है । कभी भी मेरी मृत्यु हो सकती है.. अपने शरीर को वे अग्नि में भस्म होता हुआ सदा देखते है *भस्मान्तं शरीरम् । इस प्रकार वे स्थितप्रज्ञ, अविचल, एकसमान शांत बने रहते है । वे शरीर, संसार, मन, जीवात्मा तथा परमात्मा को पृथक पृथक देखते है । अतः शोक – मोह से ऊपर उठ जाते है । तत्वज्ञानी – यथार्थ दृष्टा वे बने रहते है ।

चाहे कितना भी बड़ा संकट या अत्यन्त विपरित स्थिति क्यों आ न जाए, हमे अपनी मन की स्थिति विचलित नहीं करनी है । दुनिया की कोई ताक़त हमे दुःखी नहीं कर सकती । हमे वे पीड़ा दे सकती है – कष्ट दे सकती है, किन्तु दुःखी नहीं कर सकती, जब तक हम न चाहे की “मै दुःखी हो जाऊं” ।

प्रवचन के अंतिम चरण में श्री अवधेश प्रसाद जीने जीवन के दो मार्ग है – योग मार्ग और भोग मार्ग इस पर विवेचना करते हुए कहा कि –
जीवन में हर पल हमे निर्णय लेना होता है कि हम किस मार्ग पर चले ? एक मार्ग है जो कल्याण का मार्ग है, जिसे उपनिषद ने “श्रेय मार्ग” भी कहा है वह “प्रभु का मार्ग” है । प्रारंभ में वह तपस्या करवाता है, संघर्ष करवाता है, किन्तु वह हमारे लिए उपकारक साबित होता है, वह मार्ग “पुण्यवाह” है, “अमृत का मार्ग” है । उसी पर हमे चलना है । भोग मार्ग संसार का मार्ग है । वहां पीड़ा, बंधन, दुःख और धोखा ही धोखा मिलेगा । हमे योग मार्ग पर प्रभु के मार्ग पर चलना है । अतः हम सभी परस्पर प्रेम करते हुए, विवेक बुद्धि बनाते हुए कर्तव्य परायण होकर ईश्वर आज्ञानुसार जीवन यापन करे और सबका मंगल हो, कल्याण हो ।

। इति ओम् शम् ।
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माता पिता की सेवा

माता पिता की सेवा

यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा पृथ्वी से भारी क्या है आकाश से भी ऊंचा कौन है युधिष्ठिर जी बोले माता पृथ्वी से भी भारी है और पिता आकाश से भी ऊंचा है
यह है माता-पिता का गौरव और महत्व माता सर्व तीर्थ मई है और पिता संपूर्ण देवताओं का स्वरूप है इतना ही नहीं मैं तो कहा करता हूं माता पिता को ईश्वर के जीवित जागृत प्रतिनिधि समझता हूं हमें जन्म देने वाले हमारा लालन-पालन और पोषण करने वाले माता पिता कि हमें हर प्रकार से सेवा करनी चाहिए।
आप चिंतन करके देखें तो अवश्य प्राचीन काल के समय में उमर लंबी होती थी क्योंकि उस समय लोग अपने माता-पिता को प्रतिदिन प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया करते थे आज का युवक तो माता-पिता को नमस्ते करने में भी लज्जा करते हैं संसार में अपना मान और सम्मान चाहते हैं यदि आपको यश और बल की इच्छा है तो अपने माता-पिता और वृद्धों की सेवा करो क्योंकि मनु महाराज ने कहां है कि जो व्यक्ति माता-पिता और वृद्धों को नमस्ते करते हैं उनकी सेवा करते हैं उनकी आयु विद्या यश और बल चार प्रकार की समृद्धि माता पिता की सेवा करने से होती है इसलिए बंधुओं हम सदा अपने माता पिता की सेवा करें श्रवण कुमार अपने माता पिता के सेवा करने से इतिहास में अमर हो गए
एक बार रामकृष्ण परमहंस के पास एक युवक आया और कहने लगा आप मुझे संन्यास की दीक्षा दे दे तो परमहंस जी ने पूछा आप घर में अकेले हैं तो कहने लगा नहीं मेरे पास एक बूढ़ी मां है तो परमहंस ने कहा बूढ़ी मां को अकेला असहाय छोड़कर आप सन्यास क्यों लेना चाहते हैं युवक ने कहा मोक्ष को प्राप्त करने के लिए परमहंस ने कहा मां को छोड़कर सन्यास लेने से आपको मोक्ष मिलने वाला नहीं है आप जाएं और अपनी मां की सेवा करें उसी से आपको मोक्ष मिलेगा सुख मिलेगा जीवन में उत्साह मिलेगा इसलिए जीवन में हमें सदा अपने माता पिता को समय देना चाहिए|

गोपाल पाण्डेय
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