The 10 Principles of Arya Samaj

The 10 Principles of Arya Samaj
God is the original source of all that is known by spritual knowledge and the physical sciences.
God is Existent, conscious, all-beatitude, Formless, Almighty, Just, Merciful, Unbegotten, Infinite, Unchangeable, Beginningless, Incomparable, the support of All, the Lord of All, All-pervading, Omniscient and Controller of All from within, Evermature, Imperishable, Fearless, Eternal, Pure, Creator of the Universe. He alone ought to be worshipped.
The Vedas are the books of all True knowledge. It is the paramount duty of all Aryas to read them, to teach them to others, to listen to them and to recite them to others.
All persons should always be ready to accept truth and renounce untruth.
All acts ought to be performed in conformity to Dharma(righteousness) i.e. after due consideration of truth and untruth.
The primary object of Arya Samaj is to do good to the whole world, i.e. to promote physical, spiritual and social progress of all humans.
Your dealings with all should be regulated by love and due justice, in accordance with the dictates of Dharma(righteousness).
Avidya(illusion and ignorance) be dispelled, and Vidya(realisation and acquisition of knowledge) should be promoted.
None should remain satisfied with his own progress only, but incessantly strive for the social upliftment, realizing his own benefitin the advancement of all others.
All men ought to dedicate themselves necessarily for the social good and the well being of all, subordinating their personal interest, while the individual is free to enjoy the freedom of action for individual being.

मेरे मालिक प्रभु सबसे न्यारे

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मेरा रंग दे बसंती चोला

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देश_को_आजादी_देे_गये

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#देश_को_आजादी_देे_गये, उन शहीदों को नमन , उन वीरों को नमन । कन्या गुरुकुल झारखंड की छात्राओं के द्वारा #देशभक्ति_भजन#गुरुकुल में बदेशभक्ति के तराने गाए जाते हैं ,#देशभक्ति सिखाई जाती है। #कन्या_गुरुकुल #हजारीबाग #झारखंड की ब्रह्मचारिणी द्वारा देशभक्ति गीत सुने और समझे , कैसे गुरुकुल में राष्ट्र निर्माण हो रहा है ? वेद और वेद से संबंधित जानकारियों के लिए #राष्ट्रभक्ति_देशभक्ति #ईश्वरभक्ति_भजन को सुनने के लिए #वैदिक_राष्ट्र यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें। धन्यवाद #Vaidik_rashtra #Vedic_rashtra #Aryasamaj_gurukul

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किस ने हमें वेदों का ज्ञान दिया?

किस ने हमें वेदों का ज्ञान दिया? कौन था जिसने वेद पढ़ने का अधिकार? सभी माताओं को, बहनों को वेद पढ़ने का अधिकार दिया वो केवल देव दयानंद था देव दयानंद। आप वेद वैदिक सिद्धांतों को जानने के लिए समझने के लिए #वैदिक_राष्ट्र #vaidik_rashtra यूट्यूब चैनल अवश्य देखें ,लाइक करें ,शेयर करें। धन्यवाद

महर्षि दयानन्द जी ने किया वर्तमान युग में त्रैतवाद का प्रतिपादन 

महर्षि दयानन्द जी ने किया वर्तमान युग में त्रैतवाद का प्रतिपादन 

      आत्मा और ईश्वर के दो तत्त्वों के अतिरिक्त ‘भौतिक द्रव्य’ एक तीसरा तत्त्व है, इसलिए वैज्ञानिक दृष्टि से यह विचार करना आवश्यक है कि सृष्टि उत्पत्ति में मूल तत्त्व कितने हैं। मूलभूत तत्त्वों के विषय में वैज्ञानिक दृष्टि से मुख्य तौर पर निम्न विचारधाराओं पर विचार किया जाता है।

      एकत्ववाद-एकत्वाद का सिद्धान्त कहता है कि या तो जड़ से ही सृष्टि का निर्माण हुआ है या चेतन से ही सृष्टि का निर्माण हुआ है। अगर जड़ से सृष्टि का निर्माण माने तो मानना पड़ता है कि भौतिक द्रव्य (प्रकृति) से ही जीवन की उत्पत्ति हुई है। ये लोग जड़ से जीवन की उत्पत्ति मानते है, किन्तु आत्मा-परमात्मा जैसे तत्त्व नहीं मानते। यह धारणा प्राचीन युग के चार्वाकों ने की है, वर्तमान युग के जड़वादियों भौतिक वादियों की है। अगर चेतन से सृष्टि का निर्माण माने तो मानना पड़ता है कि चेतन तत्त्व से ही भौतिक द्रव्य (प्रकृति) की उत्पत्ति हुई है। ये लोग भौतिक द्रव्य तथा जीवात्मा की पृथक्, स्वतन्त्र, अनादि सता नहीं मानते। यह धारणा भारतीय दार्शनिकों में मुख्य तौर पर शंकराचार्य (788-820) के वेदान्त सिद्धान्त के पाश्चात्य दार्शनिकों में मुख्य तौर स्पाइनोजा (1632-1677) तथा वर्कले (1685-1753) की और मतवादियों में यहूदी, ईसाई व मुसलमानों की है। यहूदी, ईसाई तथा मुसलमान मानते हैं कि ईश्वर एक है, उसी ने अभाव से नेस्ति से जगत् तथा जीव को उत्पन्न कर दिया। भारत में इस मत के प्रवर्तक आचार्य वृहस्पति माने जाते हैं। चार्वाक् का अर्थ है, ‘चारु वाक्’ मीठी वाणी बोलने वाला। उनका कहना है कि न कोई ईश्वर है न जीव है, यह देह ही सब कुछ है। देह नष्ट हुआ सव कुछ समाप्त हो गया। मानव देह पृथ्वी, अप, तेज, वायु तत्त्वों से देह तथा संसार बना है।

      प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जव ये चार तत्त्वों से जड़ परमाणुओं के मिश्रण से बने हैं, तव इन जड़ तत्त्वों के मिश्रण से चेतन तत्त्व जीव कैसे उत्पन्न हुआ।

     चार्वाक् का उत्तर-जिस प्रकार दही और गोबर मिला देने से कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं, इसी प्रकार भिन्न-भिन्न परमाणुओं के एक विशेष प्रकार विशेष मात्र से मिलने से आत्मा उत्पन्न हो जाता है। वतर्मान विज्ञान का उदाहरण लिया जाए तो जैसे हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन दोनों अदृश्य तत्त्व हैं। इन दोनों के एक विशेष मात्र में सम्मिश्रण से जल नामक तत्त्व उत्पन्न हो जाता है जो इन दोनों से भिन्न है, वैसे ही भिन्न भिन्न जड़ परमाणुओं के मिश्रण से उनसे भिन्न-भिन्न तत्त्व उत्पन्न हो जाता हैउत्तर है कि दही और गोवर को तथा हाईड्रोजन तथा ऑक्सीजन को तो मिलाने वाली दूसरी चेतन हस्ती होती है। कलेवर बढ़ने के कारण एकत्ववाद को यहीं विराम देते हैं।

    द्वैतवाद-द्वैतवाद का सिद्धान्त यह है कि मूलभूत सताएं दो हैं-जीव तथा प्रकृति। यह धारणा सांख्यदर्शन की कही जाती है। सांख्यदर्शन के रचयिता महर्षि कपिल थे। सांख्यदर्शन को निरीखर सांख्य कहा जाता है। ऋषि दयानन्द जी ने सांख्य को सेश्वरवादी ही माना है। सांख्य का मुख्य विषय प्रकृति तथा पुरुष जड़ तथा चेतन इन दो तत्त्वों पर विचार करना है।

     भारतीय दर्शन शास्त्र में एकत्ववाद के विरुद्ध सवसे पहले प्रबल आवाज सांख्यकार महर्षि कपिल ने उठाईउनका कहना है कि सृष्टि में अन्तिम सत्ता में एक तत्त्व मानने से काम नहीं चल सकता। जड़ तथा चेतन दो सत्ताओं को तो मानना ही पड़ेगा तभी सृष्टि उत्पत्ति की समस्या का समाधान हो सकता है। इस विचार को सांख्य दर्शन का प्रकृति पुरुष का सिद्धान्त कहा जाता है। वैदिक संस्कृति के भोक्ता-भोग्य, दृष्टा, दृश्य आदि सिद्धान्तों का प्रारम्भ इसी द्वैतवाद के सिद्धान्त से हुआ है। द्वैतवाद कं आचार्यों का मत है एक सता जड़ है दूसरी चेतन। उनका कहना है कि सृष्टि की समस्या को समझने के लिए इन दो को तो मानना ही पड़ेगा। चेतन भी एक की जगह दो है-एक आत्मा दूसरा परमात्मा।

      सांख्यमतानुसार जव सरकार्यवाद सिद्ध हो जाता है तव यह मत अपने आप ही गिर जाता है कि दृश्य सृष्टि की उत्पत्ति शून्य से हुई है अर्थात् जो कुछ है ही नहीं उससे जो अस्तित्व है वह उत्पन्न नहीं हो सकता। इस बात से साफ सिद्ध होता है कि सृष्टि किसी न किसी पदार्थ से उत्पन्न हुई है और इस समय सृष्टि में जो गुण हमें दीख पड़ते हैं वे ही इस मूल पदार्थ में होने चाहिएं। अब यदि हम सृष्टि की ओर देखें तो हम वृक्ष-पशु-मनुष्य, पत्थर-सोना-चांदी, हीरा, जल-वायु अनेक पदार्थ दीख पड़ते हैं, इन सबके रूप तथा गुण भिन्न-भिन्न हैंसांख्यवादियों का सिद्धान्त है कि यह भिन्नता तथा नानात्व आदि में अर्थात् मूल पदार्थ में तो नहीं दीखता किन्तु मूल में सबका द्रव्य एक ही है। अर्वाचीन रसायन शाख्याओं ने भी भिन्न-भिन्न द्रव्यों का पृथक्करण करके पहले 62 मूल तत्त्व फिर 92 और अब 105 ढूंढ निकाले थे। अब पश्चिमी विज्ञान बेताओं ने भी यह निश्चय कर लिया है कि ये मूल तत्त्व स्वतन्य वा स्वयं सिद्ध नहीं हैइन सबकी जड़ में कोई न कोई एक ही पदार्थ है, उस पदार्थ में जो मूल पृथ्वी तारागण की सृष्टि उत्पन्न हुई है। जगत् के सब पदार्थों में जो मूल द्रव्य है उसे ही सांख्य दर्शन में प्रकृति कहते हैं। सांख्यवादियों ने सब पदार्थों का निरीक्षण करके पदार्थों में तीन गुणों को पाया है सत्त्व, रज तथा तम इसलिए मूल द्रव्य में प्रकृति में भी इन तीन गुणों को मानते हैं जिसके कारण प्रकृति में नानात्व पाया जाता है, एक प्रकृति से इन तीन गुणों के कारण अनेक पदार्थ उत्पन्न हो जाते हैं। सांख्य का कथन है कि सांसारिक जड़ पदार्थों की मूल सता प्रकृति है। जिस प्रकार सांख्य जड़ प्रकृति की मूल सत्ता मानता है उसी प्रकार चेतन को भी मूल सत्ता मानता है। इसी चेतन को पुरुष, क्षेत्र तथा अक्षर कहा गया है।

       समीक्षा-हमने देखा भारतीय चिन्तकों में जहां एकत्ववादी थे, वहां द्वित्ववादी भी थे जिनका कहना है कि सृष्टि उत्पत्ति की समस्या सिर्फ एक मूल सता को मानने से हल नहीं होती। चाहे जड़ को मूल सता माने चाहे चेतन को जड़ से चेतन उत्पन्न नहीं हो सकता, न पतन से जड़ उत्पन्न हो सकता है, क्योंकि यह दोनों तत्त्व एक दूसरे से भिन्न है। इसलिए इन सब नाना रूपी जड़ रूपों को एक में समाविष्ट कर जड प्रकृति का नाम दे दिया गया। वैसे ही चेतन में अल्प चेतन और सर्वज्ञ चेतन ये मूल तत्त्व भी हो यह तीनों शब्द पिण्ड में आत्मा तथा ब्रमाण्ड में परमात्मा पर एक समान घटित हो जाते हैंविचार किया जाता है सांख्य, उपनिषद् आदि में ईश्वर जीव प्रकृति इन तीनों मूल सताओं को स्वीकार करते हैं।

     चैतवाद-त्रैतवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन करने वाले महर्शि दयानन्द सरस्वती जी चैतवाद का सिद्धान्त है कि किसी वस्तु के निर्माण में तीन प्रकार के कारणों का होना आवश्यक है। वे है उपादान कारण, निमित कारण तथा साधारण कारण। इन्हें क्रमशः समवायी कारण, निमित कारण तथा असमयावी (अकारिक कारण)उदाहरणार्थ हम घड़े का दृष्टान्त लेते हैं। उपादान या समवायी कारण वह है जिसके बिना घड़ा न बन सके, जो स्वयं रूप बदलकर घड़ा बन जाए। इस परिभाषा से मिट्टी घड़े का उपादान कारण या समवायी कारण हुआनिमित कारण वह है, जिसके बनाने से कुछ न बने, न बनाने से न बने, आप बने नहीं दूसरे को प्रकारान्तर से बना दे। इस परिभाषा में कुम्हार घड़े का निमित्त कारण हुआसाधारण कारण वह है जो किसी वस्तु के बनाने में साधन हो या साधारण निमित्त हो। इस परिभाषा में कुम्हार का गोल चाक आदि घड़े के निर्माण में साधारण कारण हुआ।

       वेतवाद का या बहुत्ववाद वह सिद्धान्त है जो कहता है मूल भूत सताएं तीन है। ये मूलभूत सताएं हैं ईश्वर जीव तथा प्रकृति। वेदों में इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन हैरामानुजाचार्य (जन्म 1017) मध्वाचार्य (जन्म 1119) भी ईश्वर तथा जीव की अलग अलग सताएं मानते थे। वर्तमान युग में त्रेतवाद का प्रतिपादन महर्षि दयानन्द (1824-1883) ने किया और अनेको पण्डितों ने सांख्यदर्शन के सूत्रों का भाष्य त्रेतवाद ही किया है। तीन मूल भूत सत्ताओं ईश्वर जीव प्रकृति के सिद्धान्त को हमने त्रेतवाद या बहुत्ववाद की श्रेणी में रखा है।

       सृष्टि का उपादन कारण प्रकृति है परमाणु है। यह उपादान कारण न हो तो सृष्टि बन नहीं सकती। सृष्टि का निमित्तकारण ब्रह्म या ईश्वर है। वैसे सृष्टि में प्रकृति ने नाना प्रकार ब्रह्माण्ड में सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, अप, तेज. वायु, आकाश आदि तथा पिंड में ज्ञानेन्द्रियां कर्मेन्द्रियां आदि साधारण कारण हैं। जैसे कुम्हार द्वारा निर्मित घड़े का उद्देश्य पानी भरना है, वैसे सृष्टि का उद्देश्य जीवात्मा को कर्मफल देना होता है। उसे विकास के मार्ग पर डाल देता है। प्रकृति परमेश्वर के साथ जीवात्मा न हां तो सृष्टि का संचालन खेल मात्र रह जाता है।

      इन सब कारणों से सृष्टि की रचना में न एकत्ववाद से काम चलता है न द्वित्ववाद से काम चलता है। त्रेतत्वाद से ही इस समस्या का समाधान हो सकता है। उपनिषदों गीता सांख्य में त्रेतवाद माना है।

वेदो में बेतवादः द्वा सुपर्णा सयुजा समानं वृक्षं परिशस्वजाते।

तयोरन्यः पिप्पलं स्वादु अति अनश्नन अन्यः अभि चाकशीति।। (ऋग्वेद)

बालात एकम अणीयस्कम उत एक नैव दृश्यते। 

ततः परिण्वजीयसी देवता सा मम प्रिया।। (अर्थववेद) 

      पिण्डरूपी वृक्ष तथा ब्रह्माण्डरूपी वृक्ष में वह जीव रूपी पक्षी पिण्ड में इन्द्रियों का तथा ब्रह्माण्ड में सांसारिक विषयों मीठा-मीठा लुभावना भोग ले रहा है, दूसरा परमेश्वररूपी पक्षी जीवात्मा द्वारा किये गये रूपी कर्मों का फल देने के लिए उसकी गति विधि को देखता रहता है।

 

महर्षि विरजानन्द जी के जीवनवृत्त की एक झलक

महर्षि विरजानन्द जी के जीवनवृत्त की एक झलक

      ब्राह्मण कुल के धार्मिक परिवार में जन्मे विरजानन्द का उपनयन संस्कार कराया गया था और इस बालक ने गायत्री मंत्र की दीक्षा पाई थी। पांच वर्ष की आयु में चेचक (माता) के रोग में इसकी आँखें चली गई थी। विरजानन्द बाल्यावस्था में घर के अत्याचारों से दुःखी होकर निकल पड़े थे और विद्वानों का संग पाकर व्याकरण और दूसरे शास्त्रों के मर्मज्ञ बन गए थे। विरजानन्द बुद्धिमान् था और उनकी स्मरणशक्ति बड़ी तीव्र और आश्चर्यमय थी। उन्होंने आर्षग्रन्थों की कसौटी को अपने हाथों में रखा।

      विरजानन्द जी रात को 2 बजे उठकर तीन घण्टे समाधि लगाते थे और नियत समय पर पहुँचकर पाठशाला में छात्रों को पढ़ाते थे। विरजानन्द जी ने बड़ी तपश्चर्यापूर्वक गंगा तीर पर रहकर तीन वर्ष तक गायत्री मंत्र का जप किया था। कण्ठ पर्यन्त जल में खड़ा होकर गायत्री मंत्र का जप करके इस अन्धे नवयुवक ने अपने तपोबल से अगाध विद्या और अलौकिक ब्रह्मतेज प्राप्त किया था। आँखें न होने के कारण विरजानन्द की चित्तवृत्ति अन्तर्मुखी सरलता से हो गई थी। विरजानन्द जी ने वेद की मर्यादाओं का पालन करते हुए कठोर पुरुषार्थ किया और बीस वर्ष की आयु में आचार्यों की तेजस्वी परम्परा में प्रविष्ट कर गये थे।

     जा इसके पश्चात् विरजानन्द जी ने कनखल में योगिराज दण्डी स्वामी सम्पूर्णानन्द जी के चरणों में बैठकर एक वर्ष तक वेदों की शिक्षा प्राप्त करके संन्यास धारण किया था। बालब्रह्मचारी दण्डी स्वामी विरजानन्द की प्रभु-भक्ति, ऋषि- भक्ति और मातृ-भूमि के प्रति बड़ी श्रद्धा थी। गुरुजी ने विरजानन्द को ‘ऋषियांवाला’ की पदवी से विभूषित किया था।

      23 वर्ष की आयु में महर्षि विरजानन्द जी का यश सर्वत्र फैल गयासंसार में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं है जब किसी के सदाचरण की सुगन्ध संसार में न फैली हो और लोग उससे अपरिचित रहे होंशास्त्रार्थ के युग में हरद्वार, काशी, मथुरा और वृन्दावन के बड़े-बड़े दिग्गज संस्कृत के विद्वान् एक स्वर से कह रहे थे कि मथुरा वाले दण्डी स्वामी विरजानन्द को पराजय करो और दिग्विजय को प्राप्त करोविरजानन्द जी शास्त्रार्थ के पुरोधा थे। काशी, मथुरा और वृन्दावन के प्रसिद्ध विद्वान् उनकी संस्कृत की शुद्ध वक्तृता इसलिए सुनने आते थे कि वह प्रणाली मन्त्र उच्चारण की सीख सकें जो ठीकठीक वैदिक है।

      स्वामी जी पाठशाला में छात्रों को पृथक्पृथक् पढ़ाते थे, क्लास बनाकर नहीं पढ़ाते थे। वे छात्रों से अन्वय बनवाते थे और मन्त्रों को निरुक्तरूपी यौगिक चाबी से खोलकर अष्टाध्यायी, महाभाष्य, निरुक्त, निघण्टु और शतपथादि ग्रन्थों का प्रमाण देकर मन्त्र में एक-एक शब्द का अर्थ सिखाते थे और छात्र विद्वान् बनकर घर लौटते थे। सृष्टि में वेदमन्त्रों के अर्थों को समाधिस्थ बुद्धि से दर्शन कराने वाले ही ऋषि कहलाते हैं। ऋषि का दूसरा नाम मन्त्रद्रष्टा है, मन्त्रद्रष्टा होने के कारण ही स्वामी विरजानन्द और स्वामी दयानन्द ऋषि और महर्षि कहलाये। न महर्षि विरजानन्द जी की योग्यता का परिचय इस बात से मिलता है कि दयानन्द जी स्वयं यह वर्णन करते हैं कि शिक्षा समाप्त करके दो वर्ष तक आगरा में शास्त्रों का गम्भीर पर्यालोचन करते रहे। जहाँ भी उन्हें बाधा आती थी, वे गुरुजी से सम्पर्क करके उसका समाधान कर लेते थे। आर्षग्रन्थों के प्रति दयानन्द की गहरी निष्ठा गुरु विरजानन्द की ही देन थी

       ऋषि विरजानन्द जी ने दयानन्द को वेदविद्या सिखाकर अपनी प्रचण्ड शक्ति किरणों द्वारा ऋषि श्रेणी का मनुष्य बनाया और संसार से अविद्या-अन्धकार मिटाने के लिए, वेदों के पुनरुद्धार के लिए और प्रचार के लिए उद्यत कियायही थी वैदिक काल की महिमा और प्राचीन ऋषियों की तेजस्वी परम्परा । पृथ्वी पर पुनः वैदिक समय लाने के लिए और संसार में वेदों की कीर्ति फैलाने के लिए अपना जीवन अर्पित करके महर्षि विरजानन्द जी अमर हो गए। उनका सारा हृदय वेदविद्या से परिपूर्ण था।

आर्य ओ३म् ध्वज क्यों फहराते हैं

आर्य ओ३म् ध्वज क्यों फहराते हैं ?ओ३म् का क्या अर्थ है ? ओ३म् ध्वज हमें क्या संदेश देता है? मानव मात्र के उत्थान के लिए- उन्नति के लिए ओम ध्वज का क्या संकेत है ? इन सभी विचारों को जानने के लिए आप वैदिक राष्ट्र यूट्यूब चैनल अवश्य सब्सक्राइब करें ।
लाइक करें ।शेयर करें और यह वीडियो पूरा देखें संक्षिप्त रूप में स्वामी आर्यवेश जी के द्वारा यह संदेश हमें विशेष जानकारी देगा।
धन्यवाद

यदि आज रामायण की घटना हो और लंका विजय पर कैसे प्रतिक्रिया की जाएगी.

यदि आज रामायण की घटना हो और लंका विजय पर कैसे प्रतिक्रिया की जाएगी.

1. रवीश कुमार का राम के लिए कुछ ऐसा होता एक खुला पत्र :
आखिर राम अपनी पत्नी की लेकर क्यों गए थे जंगल में ? यह एक सोची समझी चाल लगती है। सब कुछ राम का करा धरा है। .रावण अल्पसंख्यक था। राक्षस जाती अल्पसंख्यक थी। ये अल्पसंख्यकों के साथ घोर अन्याय है! मेरा चेनल मांग करता है कि रावण के वध के लिए उचित मुवावाजा दिया जाए। और राम माफी मांगे !

2. एक इंग्लिश न्यूज पेपर का सम्पादकीय कुछ ऐसा होता.
आखिर राम को लड़ाई लड़ने के लिए लंका जाने की ज़रूरत थी क्यों ?हमारी संस्कृति कहां है? रावण को आतंकित क्यों किया जा रहा था?ओह माय गॉड !! रावण मारे गए! केसरिया आतंक का भयनाक रूप !

3. राजदीप सरदेसाई/ बरखा दत्त/ टुकड़े टुकड़े गैंग JNU की ब्रेकिंग इण्डिया ब्रिगेड के बोल कुछ इस तरह होते —
ये क्या हो रहा है ?क्या हम एक ऐसा भारत चाहते हैं जहां एक राजा अपनी पत्नी की सुरक्षा के लिए एक संपूर्ण साम्राज्य को जला दे ?
राम के भक्तों ने देश में सभी पद और सामाजिक लाभ हासिल किए थे ! अल्पसंख्यकों को उनके अधिकारों से वंचित रखा जा रहा था ! इसलिए, अपने अधिकार वापस पाने के लिए रावण का कर सीता का अपहरण करना सर्वथा उचित है ।

4- गिरगिट ब्राण्ड यू टर्न नायक युग पुरुष जी बोलते — राम लक्ष्मण हनुमान और विभीषण आदि सब मिले हुए हैं। इनकी जांच होनी चाहिए।

5. एक जबरदस्ती के नेता जी —
मैंने अयोध्या का दौरा किया और भैया मैंने देखा कि राम का विकास मॉडल एकदम असफल रहा है ! और राम ने जो पुष्पक विमान प्रयोग किया …भैया उसमे घोटाला हुआ है। उसकी खरीद में गड़बड़ी हुई है। मुझे बस 15 मिनट बोलने का मौका दे दो भैया , राम मेरे सामने खड़ा नहीं हो सकेगा। भूकंप आ जाएगा भैया।

6 श्री रावण साहब को मेरी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि…. वो मासूम था। रावण के इस एनकाउंटर पर मैडम रात भर फूट फूट कर रोती रही। दिग्विजय सिंह !!


और अंत में…
रात के दो बजे कोर्ट खुलता ! तीन मिनट तक जिरह होती। राम को दोषी करार दे दिया जाता !

क्या स्त्रियों को गायत्री जप का अधिकार है

क्या स्त्रियों को गायत्री जप का अधिकार है?

प्रियांशु सेठ

आज के युग में हिन्दू समाज में एक भ्रान्ति फैली हुई है कि गायत्री मन्त्र के जप का अधिकार स्त्रियों को नहीं है। ये हमारे शास्त्रों के विरुद्ध है। प्राचीन काल में सभी स्त्रियां व पुरुष नित्य गायत्री की उपासना करते थे किन्तु आज ये नहीं होता। आजकल पौराणिक गुरु अपने चेले और चेलियों को नए-नए मन्त्र (?) देते हैं। कोई ‘रामं रामाय नमः’ का, कोई ‘नमो नारायण:’ बता रहा है तो कोई ‘सोअहम्’ और न जाने क्या-क्या। इन मन्त्रों में द्वादशाक्षर मन्त्र अत्यन्त प्रसिद्ध है। वह तथाकथित मन्त्र है- ‘ओं नमो भगवते वासुदेवाय’। इस मन्त्र के सम्बन्ध में पहली बात तो यह है कि यह मन्त्र ही नहीं है। कोई भी व्यक्ति इस मन्त्र को किसी वेद में नहीं दिखा सकता। दूसरी बात यह कि यह द्विजों के लिए नहीं है।
यह बात पुराणों से भी सिद्ध होती है। पुराणों में कहा गया है-

द्वादशाक्षरकं मन्त्रं स्त्रीशूद्रेषु विधीयते। -विष्णुधर्मो० प्रथम खण्ड १५५/२८
अर्थात् द्वादश अक्षर का मन्त्र स्त्री और शूद्रों के लिए है।

जब स्त्रियों को वेदाधिकार से वञ्चित कर दिया तब ‘ओं नमो भगवते वासुदेवाय’ आदि मन्त्र बना लिए गए। कोई भी पौराणिक अपने शिष्यों को गायत्री मन्त्र का जप करना नहीं बताता है, कुछ पौराणिक गुरु गायत्री मन्त्र बताते भी हैं तो कहते हैं कि स्त्रियों को इस मन्त्र के जप का अधिकार नहीं है।
यह ऐसा अनर्थ है, जिसका समाधान बहुत आवश्यक है। वेद भगवान् से लेकर पुराणों और स्मृतियों तक-सबने ही वेद में स्त्रियों का अधिकार माना है। जब वेद-मन्त्रों की द्रष्टा ऋषिकाएँ भी हुई हैं, तब इनके वेद पढ़ने के अधिकार पर अंगुली कौन उठा सकता है? फिर अनेक ब्रह्मवादिनी देवियों का वर्णन इतिहास में आता है। ‘महाभारत’ के शल्यपर्व में एक तपस्विनी का इतिहास आया है, जो वेदाध्ययन करने वाली और योग-सिद्धि को प्राप्त थी। इसका नाम ‘सिद्धा’ था। भरद्वाज की पुत्री श्रुतावली वेद की पूरी पण्डिता थी। भक्त शाण्डिल्य की पुत्री ‘श्रीमती’ निरन्तर वेदाध्ययन में प्रवृत्त रहती थी। ‘शिवा’ नामक ब्राह्मणी वेदों में पारंगत थी। इसी प्रकार भारती, मैत्रेयी, गार्गी, सुलभा, द्रौपदी, वयुना, धारिणी, वेदवती आदि कितनी ही देवियों का वर्णन आता है, जो वेद पढ़ती थीं। वेदवती को तो चारों वेद कण्ठाग्र थे। यही नहीं, अपितु देवियों को ब्रह्मा की पदवी भी मिलती थी। जब चारों वेद पढ़ने का अधिकार देवियों को प्राप्त है, तो क्या गायत्री-मन्त्र वेदों के बाहर है?

पुराणों ने भी स्त्रियों को अधिकार दिया है कि वेद-मन्त्र ग्रहण करें। ‘भविष्यपुराण’ के उत्तरपर्व ४/१३ में लिखा है-

या स्त्री भर्त्रा वियुक्तापि त्वाचारे संयुता शुभा।
सा च मन्त्रान् प्र गृह्णातु सभर्त्रा स्वनुज्ञया।।

“उत्तम आचरणवाली विधवा स्त्री वेद-मन्त्रों को ग्रहण करे और सधवा स्त्री अपने पति की अनुमति से मन्त्रों को ग्रहण करे।”

वसिष्ठ स्मृति २१/७ में लिखा है-

“यदि स्त्री के मन में पति के प्रति दुर्भाव आये तो उस पाप का प्रायश्चित्त करने के साथ १०८ बार गायत्री-मन्त्र के जपने से वह पवित्र होती है।”

भविष्यपुराण में कहा है-

वृथा जाप्यमवैदिकम्। – भवि० उत्तर० १२२/९
अवैदिक मन्त्रों का जप करना निरर्थक है।

ऐसे अनेक प्रमाण हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि जो मठधारी देवियों को गायत्री-जप से रोकते हैं वे वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास आदि सबसे मुंह मोड़ते हैं।

इस पवित्र मन्त्र की व्याख्या में कितने ही ग्रन्थ लिखे जा चुके हैं और अभी कितने और लिखे जायेंगे; परन्तु इस मन्त्र की पूर्णरूपेण व्याख्या फिर भी न हो सकेगी, क्योंकि यह चार वेदों का सार है। जिन साधकों ने इसका जप करना है वे बड़े-बड़े ग्रन्थों को सामने नहीं रख सकते और बिना भावार्थ के भी जप अधिक लाभ नहीं पहुंचाता। जप करनेवाले को ज्ञात होना चाहिए कि मैं भगवान् के समक्ष बैठा हुआ क्या कह रहा हूँ, उस प्रियतम से क्या निवेदन किया जा रहा है और कौन-सी मांग उसके सामने रखी जा ही है।

मैं तो गायत्री-मन्त्र को आत्म-समर्पण का मन्त्र समझता हूँ। जिस प्रकार एक युवती अच्छी तरह जानती हुई विवाह-मण्डप में पवित्र अग्नि के सामने बैठी पूर्ण निश्चय के साथ अपने पतिदेव के आगे अपने-आपको समर्पण करती हुई, पति को अपना वर बनाती है, इसी प्रकार गायत्री-मन्त्र का जप करनेवाला अपने प्रियतम से कहता है कि “हे प्यारे, मैं तेरे सुन्दर शुद्ध तेज का ध्यान करता हूँ। तू ही वरने योग्य है। तू, जो कि सारे जगत् का उत्पन्न करनेवाला है, सबको प्रकाश देनेवाला है। प्राण-प्यारे! दुःखों को दूर करने और सुखों को देनेवाले रक्षक और स्वामिन्! अपनी बुद्धि को तेरे अर्पण करता हूँ। इसे अपनी ओर ले चल!”

जब एक देवी एक बार अपने पति को वर लेती है, तो फिर वह सदा के लिए उसी की हो जाती है। गायत्री-मन्त्र में उपासक या साधक भगवान् को अपना वर चुनता है और अपने-आपको उसके सुपुर्द कर देता है। अब उसके हृदयरूपी सिंहासन पर सिवाय उस प्यारे प्रभु के और कोई बैठ ही नहीं सकता। यदि प्रभु के अतिरिक्त कोई और उसमें आता है तो जैसे देवी का पतिव्रत धर्म कलुषित हो जाता है, वैसे ही भक्त की भक्ति को भी कलंक लगता है। गायत्री-मंत्र का जप करते-करते भक्त बार-बार ईश्वर से यही याचना करता है कि मैं तेरा हो चुका। मेरी बुद्धि की नकेल तेरे हाथ में है। हे प्रभो! अपनी ओर ही इसे ले चल। मन तो एक ही है न! जब यह प्रभु को भेंट दिया, तो फिर यह और कहां जाएगा? कबीर कहता है-

कबिरा यह मन एक है, चाहे जहां लगाय।
भावे प्रभु की भक्ति कर, भावे विषय कमाय।।

जब गायत्री-मन्त्र द्वारा इसे ईश्वर में लगा दिया, उसी के हवाले सब-कुछ के दिया, तो फिर उसी के होकर, हर समय उससे यही कहना चाहिए कि-

नैनों की कर कोठरी, पुतली पलँग बिछाय।
पलकों की चिक डालकर, पिय को लेउँ रिझाय।।

जब एक बार अपनी बुद्धि तथा मन ईश्वर के अर्पण कर दिया तो फिर प्रभु की आज्ञा के बिना वह कोई और विचार अपने अन्दर ला ही नहीं सकेगा। जब गायत्री का पाठ करते हुए भगवान् को ‘भू:’- प्राण-प्यारा कह दिया, तो फिर ईश्वर के बिना हमारे प्राण रहेंगे कैसे?
जब किसी का प्राण-प्यारा बिछुड़ जाता है, तो उसके विरह में जो अवस्था उसके प्रेमी की होती है, वही अवस्था भगवान् की भावना से क्षणमात्र दूर हो जानेवाले भक्त की भी हो जाती है। विरह का अर्थ है अपने प्रियतम के प्रेम पर मर-मिटने की लगन। एक कवि का कथन है-

उर में दाह, प्रवाह दृग, रह-रह निकले आह।
मर मिटने की चाह हो, यही विरह की राह।।

परन्तु गायत्री की साधना करनेवालों को मरने की आवश्यकता नहीं पड़ती, अपितु उनमें गायत्री-जप से तथा तदनुकूल आचरण करने से एक नया जीवन आ जाता है।

(अब तो महर्षि दयानन्द की अपार दया से स्त्रियों को भी वेदाधिकर प्राप्त हो गया है, अतः इन अवैदिक तथाकथित मन्त्रों को तिलाञ्जलि दे देनी चाहिए एवं गायत्री मन्त्र का जप नित्य करना चाहिए।)