The 10 Principles of Arya Samaj

The 10 Principles of Arya Samaj
God is the original source of all that is known by spritual knowledge and the physical sciences.
God is Existent, conscious, all-beatitude, Formless, Almighty, Just, Merciful, Unbegotten, Infinite, Unchangeable, Beginningless, Incomparable, the support of All, the Lord of All, All-pervading, Omniscient and Controller of All from within, Evermature, Imperishable, Fearless, Eternal, Pure, Creator of the Universe. He alone ought to be worshipped.
The Vedas are the books of all True knowledge. It is the paramount duty of all Aryas to read them, to teach them to others, to listen to them and to recite them to others.
All persons should always be ready to accept truth and renounce untruth.
All acts ought to be performed in conformity to Dharma(righteousness) i.e. after due consideration of truth and untruth.
The primary object of Arya Samaj is to do good to the whole world, i.e. to promote physical, spiritual and social progress of all humans.
Your dealings with all should be regulated by love and due justice, in accordance with the dictates of Dharma(righteousness).
Avidya(illusion and ignorance) be dispelled, and Vidya(realisation and acquisition of knowledge) should be promoted.
None should remain satisfied with his own progress only, but incessantly strive for the social upliftment, realizing his own benefitin the advancement of all others.
All men ought to dedicate themselves necessarily for the social good and the well being of all, subordinating their personal interest, while the individual is free to enjoy the freedom of action for individual being.

दुर्गा-पूजा दुर्गा-अष्टमी |

दुर्गा-पूजा दुर्गा-अष्टमी

बंगाल से लेकर पूरे देश में इसका बड़ा महात्म्य है | बड़े-बड़े पण्डित आयेंगे, दुर्गा-पूजन से लेकर दुर्गा-हवन तक करेंगे | यजमान को प्रभावित करने के लिए उसके सामने बहुत सारे मन्त्र बोले जायेंगे | यजमान को यह लगना चाहिये कि दुर्गा-पूजा के अवसर पर दुर्गा से सम्बन्धित मन्त्र भी बोला गया इसलिए वेद-मन्त्र भी खोजना होगा ताकि वह प्रभावित हो (ब्राह्मणों का एक अकथित नियम सा बन गया है की यजमान को प्रकाशित न करो परन्तु प्रभावित कर दो और दक्षिणा लेकर चलते बनो, इसमें दोष यजमानों का भी है क्यों कि वे “आँख के अन्धे-गाँठ के पूरे” बने बैठे रहते हैं जिसका लाभ ब्राह्मण-वर्ग उठाता रहता है | यदि यजमान ने रुचिपूर्वक और ब्राह्मण ने ज्ञान-पूर्वक संस्कार करवाया होता तो आज की स्थिति कहीं अच्छी होती इसलिए दोष दोनों का है|)

अपने यजमान को प्रभावित करने के लिए ही ब्राह्मण प्रायः निम्न प्रयोग करते रहते हैं :-

१) यदि शनैश्चर (शनि-देवता) की पूजा करनी है तो “शन्नो देवीरभिष्टये” (यजुर्वेद 36/12) मन्त्र बोला जाता है | जिसका शनि के साथ निकट का नहीं तो दूर का भी सम्बन्ध नहीं है |

२) राहू की पूजा करने के लिए “कया नश्चित्रा” मन्त्र का पाठ करते हैं

३) बुध ग्रह पूजा के लिए “उद् बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि” (यजुर्वेद 15/54) बोला जाता है

इसी प्रकार से दुर्गा की पूजा करनी हो तो निम्न वेद-मन्त्र का पाठ करते हैं |

जा॒तवे॑दसे सुनवाम॒ सोम॑मरातीय॒तो नि द॑हाति॒ वेद॑: ।

स न॑: पर्ष॒दति॑ *दु॒र्गाणि॒* विश्वा॑ ना॒वेव॒ सिन्धुं॑ दुरि॒तात्य॒ग्निः ॥

ऋग्वेद 01/99/01

पाठक स्पष्ट देख पा रहे होंगे की इस मन्त्र में दुर्गा पद आया है (फिर चाहे वह दुर्गाणि ही क्यों न हो) | ब्राह्मण भी जब मन्त्र बोलते हैं तब दुर्गा(णि) आने पर जोर से बोलते हैं ताकि यजमान को पता चल जाये की दुर्गा का विशेष मन्त्र बोला गया |

यहाँ विचार करना है की दुर्गा देवी के साथ दुर्गाणि का सम्बन्ध कैसे है ?

मन्त्र में “दुर्गाणि” शब्द आया है, जिसका अर्थ (महर्षि दयानन्द जी को छोड़ भी दिया जाये तब भी) सायणाचार्य जी ने “विश्वा विश्वानि सर्वाणि दुर्गाणि दुर्गमनानि भोक्तुमावश्यकानि दुःखानि” किया है | दुःखों को तैरने (पार करने) के लिए प्रार्थना की गई है | दुर्गाणि का अर्थ दुर्गम स्थितियाँ है |

देखने वाली बात यह है कि :- महर्षि दयानन्द जी को न मानने वाले और सायणाचार्य जी को ही मानने वाले पण्डित/ब्राह्मण इस मन्त्र का दुर्गापूजा में किस प्रकार गलत तरीके से प्रयोग करते हैं, सायणाचार्य जी को भी मात कर दिया है और दुर्गा पूजा में इस मन्त्र को जोड़ा जाने लगा |

महर्षि दयानन्द जी ने अपने वेद-मन्त्र भाष्य में दु॒र्गाणि॒ पद का अर्थ किया है “दुःखेन गन्तुं योग्यानि स्थानानि” किया है | अब बतलाइये ! दुर्गा के लिए दु॒र्गाणि॒ पद वाला मन्त्र पढ़ना कितना उचित है | ऐसा ही अर्थ/भाष्य ऋग्वेद 07/60/12 में भी में किया है “दुःख से जाने योग्य कामों का” ।

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पाठक की स्वाभाविक इच्छा होगी की इस मन्त्र का विनियोग किसने कब कहाँ किया है ? तो एक पुस्तक है पूना से छपी है जिसका नाम है संस्काररत्नमाला जिसमें इसका प्रयोग “दुर्गाप्रीत्यर्थ बलिदाने विनियोग:” (पृष्ठ 118) अर्थात् दुर्गा की प्रीति के लिए बलिदान करते समय इस मन्त्र को बोलना चाहिये | आगे लिखा है “दुर्गावाहने विनियोग:” अर्थात् दुर्गा के वाहन में इस मन्त्र को बोलना चाहिए | जबकि दुर्गा का वेद मन्त्र में नाम तक नहीं है |

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विनियोग का अर्थ होता है वि(विशेषतया) + नि (निश्चय से) योग (लगाना) = अर्थात् किसी मन्त्र का किसी क्रिया में लगाना , Application of a mantra । यदि किसी मन्त्र का जो अर्थ है वह उस क्रिया के साथ ठीक बैठ जाता है तब वह विनियोग ठीक है । यदि कोई व्यक्ति “शन्नो देवी’ मन्त्र बोल कर व्यायाम करें तो यह विनियोग ठीक नहीं माना जायेगा परन्तु आचमन करे तो विनियोग उचित कहलायेगा । *यह विनियोग ऋषिकृत है या पुरुषकृत है, ईश्वरकृत या अपौरुषेय नहीं है ।*

इस के साथ यजमानों से निवेदन है की कृपया मेरी इस प्रस्तुति/पोस्ट को ब्राह्मणों के विरुद्ध न लें परन्तु अपने विरुद्ध लें और जागृत बनें, शब्द-अर्थ को जानें, *योग्य-विद्वान्-सात्त्विक-धार्मिक-परोपकारप्रिय-सत्योपदेष्टा ब्राह्मण से ही संस्कार करवायें और स्वयं भी सीखें | यज्ञ-संस्कार आदि सीखने के लिए आर्य समाज नियमित आयें |*

धन्यवाद

*सादर*

विदुषामनुचर

विश्वप्रिय वेदानुरागी

*(प्रस्तुत लेख का आधार पण्डित ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु के लेखों का संग्रह “जिज्ञासु रचना मञ्जरी” पृष्ठ 238-239 है | वेदमन्त्रों का विनियोग नामक लेख को पाठक विस्तार से पढ़ें |)*

घर-वापसी का ऐतिहासिक आकलन

ईसाइयत और इस्लाम में चले गए हिन्दुओं को वापस हिन्दू समाज में लाने के कार्य को हमारे आधुनिक मनीषियों ने भी महत्वपूर्ण बताया था। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, महामना मदन मोहन मालवीय, और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने ही नहीं, बल्कि स्वामी विवेकानन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर, और श्रीअरविन्द ने इस का समर्थन किया था। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे राजनीतिक आंदोलन से भी अधिक महत्वपूर्ण माना था। श्रीअरविन्द ने भी कहा था, ‘‘हिन्दू-मुस्लिम एकता ऐसे नहीं बन सकती कि मुस्लिम तो हिन्दुओं को धर्मांतरित कराते रहें जबकि हिन्दू किसी भी मुस्लिम को धर्मांतरित न करें।’’ डॉ. श्रीरंग गोडबोले ने ‘शुद्धि आंदोलन का संक्षिप्त इतिहास: सन 712 से 1947 तक’ नामक पुस्तक में इसी का संक्षिप्त,प्रामाणिक आकलन किया है।

हिन्दू समाज ने प्राचीन काल से ही अनेक बाहरी लोगों को अपनाया था। महाभारत के शान्ति पर्व (65वें अध्याय) में भी यवनादि विदेशियों को वैदिक धर्म में शामिल करने का परामर्श मिलता है। प्रसिद्ध विद्वान आर. जी भंडारकर (1837-1925) ने भी प्राचीन काल में विदेशियों को हिन्दू समाज में अपनाने का विवचेन किया है। जाने-माने अरब यात्री अल बिलादुरी ने जिक्र किया है कि सिंध में पहली मुस्लिम जीत के बाद बने मुसलमान जल्द ही पुन: हिन्दू धर्म में आ गए। इतिहासकार डेनिसन रॉस ने भी यह लिखा है। मुस्लिम देशों से पलायन कर भारत आए गुलामों के शुद्धिकरण का वर्णन अल-बरूनी ने भी किया है। गुजरात के राजा भीमदेव के सामने महमूद गजनवी की पराजय के बाद भी अनेक मुसलमान शुद्ध होकर राजपूतों में शामिल किए गए थे।

खिलजी वंश का नाश भी एक जबरन धर्मांतरित मुस्लिम, खुश्रु खान ने ही हिन्दुओं के सहयोग से किया था। फिर उसने अपने महल और मस्जिद में हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा शुरू करवा दी, गोहत्या बंद कराई और हिन्दू राज्य कायम किया। यह वर्णन प्रसिद्ध लेखक जियाउद्दीन बरनी ने किया है। सुलतान मुहम्मद तुगलक के काल में दक्षिण भारत में हरिहर और बुक्का के धर्मांतरित होने और स्वामी विद्यारण्य (1296-1391) की प्रेरणा से पुन: हिन्दू होकर विजयनगर साम्राज्य बनाने की कथा भी जानी- मानी है। जियाउद्दीन बरनी ने फिरोज शाह तुगलक के समय एक ब्राह्मण को दंडस्वरूप जिंदा जलाए जाने का वर्णन भी किया है, जो मुसलमानों को हिन्दू धर्म के प्रति श्रद्धावान बनाया करता था। डॉ. गोडबोले ने इसे ‘शुद्धि’ के लिए प्रथम बलिदान का उदाहरण माना है। कश्मीर का सुलतान गियासुद्दीन (15वीं सदी) भी अपनी हिन्दू श्रद्धा के लिए जाना जाता है। उस ने पहले बलपूर्वक बनाए गए मुसलमानों को पुन: हिन्दू बनने के लिए प्रोत्साहन दिया।

14वीं सदी में कश्मीर के शाह मीर ने अपनी कुछ बेटियों का विवाह ब्राह्मण सरदारों से किया था। सिकंदर बुतशिकन के समय मुसलमान बने अनेक लोग पुन: हिन्दू धर्म में आ गए थे, इस का वर्णन तबकाते-अकबरी के लेखक ख्वाजा निजामुद्दीन अहमद (16वीं सदी) ने भी किया है। पंडित कंठ भट्ट या निर्मल कंठ ने व्यवस्थित रूप से शुद्धिकरण परिषद आयोजित की थी, यह उल्लेख मिलता है। कश्मीर में 19वीं सदी में भी राजा सर रणवीर सिंह ने बाकायदा एक ‘श्रीरणवीर कारित प्रायश्चित ग्रंथ’ का ही निर्माण करवाया था, जिस में म्लेच्छ बने लोगों की शुद्धि- व्यवस्था पर अध्याय दिया गया है। 16वीं सदी में जोधपुर के राजा सूरजमल ने आक्रमणकारी पठानों द्वारा अपहृत 140 हिन्दू बालिकाओं को छुड़ाने में ही अपने प्राणों की आहुति दी थी। उसी सदी में जैसलमेर के महारावल लूणकरण ने एक विशाल यज्ञ करा कर विगत सदियों में जबरन धर्मांतरित हुए लोगों की शुद्धि करवायी।

17वीं सदी में औरंगजेब के काल में भी शुद्धि के अनेक प्रयत्न हुए। पंजाब के होशियारपुर के एक हिन्दू का इस्लाम में धर्मांतरण हुआ था। उसकी शुद्धि पर उसे बंदी बना लिया गया। विरोध में होशियारपुर के हिन्दुओं ने हड़ताल की थी। स्पष्ट है कि शुद्धिकृत व्यक्ति के प्रति हिन्दू समाज की सहानुभूति हुआ करती थी। 17वीं सदी में ही कीरतपुर (होशियारपुर) के संन्यासी कल्याण भारती के फारस जाकर मुसलमान बन जाने, मगर अनुभव से पुन: इस्लाम त्यागकर हिन्दू बनने की घटना भी मिलती है। स्वदेश आगमन पर उस का भव्य स्वागत हुआ था। यह वर्णन दबिस्ताने मजाहिब के लेखक फानी (19वीं सदी) ने दिया है। उस ने कई मुस्लिमों के वैष्णव बैरागी बनने की जानकारी भी दी है। डॉ. गोडबोले के अनुसारए शुद्धि आंदोलन के सब से प्रमुख प्रणेता संतशिरोमणि स्वामी रामानन्द (1299-1410) को ही मानना चाहिए। उस समय दिल्ली में तुगलक वंश का राज था। स्वामी जी ने मुसलमान बने हजारों राजपूतों को अयोध्या में विलोम-मंत्र द्वारा समारोह पूर्वक हिन्दू बनाया।

संत रैदास (15-16वीं सदी) के प्रभाव से भी कुछ मुस्लिम हिन्दू बने थे। उसी काल में चैतन्य महाप्रभु भी हुए जिनके प्रभाव में भी मुसलमान के हिन्दू बन जाने के विवरण मिलते हैं। उन के अंतरंग शिष्य ठाकुर हरिदास पहले मुसलमान ही थे।

अपनों को अपनाने का अभियान:

मराठों ने 17वीं सदी में शुद्धिकरण की व्यवस्था ही खड़ी की थी। दबाव के कारण बने मुसलमान को शुद्ध कर स्वयं छत्रपति शिवाजी ने पुन: हिन्दू बनाने का कार्य किया था। हिन्दवी स्वराज्य में भ्रष्ट किए व्यक्तियों को शुद्ध करने की चार व्यवस्थाएं दी गई हैं। यह कार्य करवाने के लिए ‘पंडितराव’ उपाधि धारक अधिकारी भी नियुक्त किया गया था। शुद्ध हुए व्यक्ति को शुद्धिकरण का आधिकारिक प्रमाण-पत्र दिया जाता था और उस का पंजीकरण भी स्थानीय कोतवाली में होता था। 1665-70 ई. में पुर्तगाल-शासित प्रदेशों को जीतने के बाद शिवाजी ने पुर्तगाली शासन को बलपूर्वक ईसाइयत में धर्मांतरित हिन्दुओं की शुद्धि के भी आदेश दिए थे। शिवाजी की नीति बाद के वंशजों ने भी जारी रखी। उन्होंने कई चर्चों को देवी मंदिर के रूप में परिवर्तन भी किया। 19वीं सदी में शंकराचार्य नित्यानन्द सरस्वती ने वसई में असंख्य लोगों के पुन: हिन्दू धर्म में प्रवेश का स्वागत किया था। जब वसई के ब्राह्मणों ने उनका अनुष्ठान करने से इंकार किया तो शंकराचार्य ने आज्ञापत्र निकाल कर उन्हें इसे स्वीकार करने को कहा। आधुनिक युग में संगठित रूप से शुद्धि आंदोलन के बड़े प्रणेता स्वामी दयानन्द सरस्वती (1824-1883) हुए।

1877 ई.में पंजाब में उन्होंने इस प्रश्न पर पहली बार संबोधित किया। शुद्धि पर भाषण दिया और एक ईसाई की शुद्धि की। 1879 ई.में देहरादून में मुहम्मद उमर नामक मुस्लिम को शुद्ध कर उसे ‘अलखधारी’ नाम दिया। उन्होंने अमृतसर में ईसाइयत में धर्मांतरित होने जा रहे अनेक हिन्दू छात्रों को भी रोका। कुछ यूरोपीय ईसाई भी स्वामी जी के प्रभाव से हिन्दू बने। उन की बनाई गई राष्ट्रवादी संस्था आर्य समाज ने शुद्धि कार्य को व्यापक रूप से क्रियान्वित किया। आर्य समाज के पंडित लेखराम (1858-1897) ने शुद्धि के लिए अपना बलिदान भी किया। पंजाब में 1896 ई. में अकाल पड़ने पर ईसाई मिशनरियों ने अछूत हिन्दुओं को निशाना बनाया। तब आर्य समाज ने ऐसे अनेक हिन्दुओं को बचाया। उन्हें यज्ञोपवीत देकर और गायत्री मन्त्र पढ़ाकर सार्वजनिक कुएं भी उपलब्ध कराए। पंजाब,सिंध, अजमेर में मुस्लिम प्रभाव वाले हिन्दुओं को शुद्ध करके उन्हें सचेत किया। 1904 ई. में दारउ ल-उलूम देवबंद के एक मौलवी को भी शुद्ध किया गया। 1920-21 ई. में मोपला जिहाद के दौरान बीस हजार से अधिक हिन्दुओं की हत्या की गई। मृत्यु के भय से चार हजार से अधिक हिन्दू मुसलमान बन गये थे। इस भयावह घटनाक्रम से पूरे देश में आक्रोश की लहर उठी थी।

पंजाब में लाला हंसराज की अध्यक्षता में आर्य समाज की बैठक हुई, जिस में धर्मांतरित हिन्दुओं को शुद्ध करने का संकल्प लिया गया। पंडित ऋषिराम, लाला खुशालचन्द जैसे प्रतिनिधि मलाबार जाकर स्थानीय ब्राह्मणों का सहयोग लेकर लगभग ढाई हजार धर्मांतरितों को शुद्ध कर पुन: हिन्दू बनाने में सफल हुए। इस से देश भर में आर्य समाज का नाम विख्यात हुआ। मलाबार की सफलता के बाद देश के अन्य भागों में भी पहले बलात् धर्मांतरित कराए गए बंधुओं को पुन: हिन्दू समाज में लाने की भावना उठी। भारत में अनेक ऐसी नव-मुस्लिम जातियां थीं, कई आचार विचार पारंपरिक रूप से हिन्दुओं जैसे थे। जैसे, मलकाना राजपूत (संयुक्त प्रांत), मेव (मध्य राजस्थान), शेख (लरकाना, सिंध), मोरे सलाम (मध्य गुजरात) मातिया पीराना पंथी पाटीदार (दक्षिण गुजरात) आदि। इन लोगों को किसी युग में हिन्दू से जबरन मुस्लिम बना दिए जाने के सिवा पारिस्थितिक कारणों से उन पर कोई कड़ी इस्लामी पद्धतियां नहीं लादी जा सकी थीं।

उन में अधिकांश लोग पुन: हिन्दू समाज में वापस आना चाहते थे, लेकिन हिन्दुओं में रूढ़िवादी लोग इससे कतराते थे। इस का समाधान करने में कुछ जातिगत संगठनों ने अच्छी भूमिका निभाई। 1909 ई. में आगरे में पंडित भोजदत्त द्वारा स्थापित राजपूत शुद्धि सभा ने सैकड़ों नव-मुस्लिमों को हिन्दू धर्म में वापस लिया था। लेकिन राजपूत समुदाय द्वारा उन की उपेक्षा हो रही थी, जिस से वे डांवाडोल हो रहे थे। क्षत्रिय उपकारिणी सभा ने उन्हें सहारा देकर रोका। 30-31 मई 1923 को वृंदावन में भी एक विराट सम्मेलन हुआ, जिस में राजपूतों की सभी जातियां शामिल हुईं। उन्होंने मलकानों को शुद्ध करके हुक्के का संबंध जोड़ने का निर्णय किया। लाला हंसराज ने कड़ी गर्मी के महीनों में मैनपुरी में 147 गांवों को शुद्ध करने में सफलता पाई।

राष्ट्र मनीषियों ने निभायी भूमिका

शुद्धि आंदोलन में स्वामी श्रद्धानन्द (1856- 1926) का स्थान अमर है। आगरा में 13 फरवरी,1923 की क्षत्रिय उपकारिणी सभा की बैठक में उन्हें बुलाया गया था। इसमें सनातनी, आर्यसमाजी, सिख, जैन भी आए थे। यहीं ‘भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा’ का गठन हुआ। इसी के दस दिन बाद स्वामी जी की महत्वपूर्ण पुस्तिका ‘सेव द डाइंग रेस’ प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने नव-मुस्लिमों को शीघ्र अपने पुराने कुटुम्ब में लाने की आवश्यकता पर बल दिया। अगले दो महीनों में वे लगभग सौ गांवों में गए। पहले महीने में ही लगभग पांच हजार मलकानों को वापस लाया गया। उस वर्ष के अंत तक यह संख्या तीस हजार हो गई थी। इस कार्य पर जमीयत उलेमा और कांग्रेस के नेताओं ने आपत्ति भी की, लेकिन स्वामी जी अडिग रहे। 31 मार्च 1923 को भारत धर्म महामंडल और दरभंगा महाराज की ओर से काशी के पंडितों, पंजाब और महाराष्ट्र की विविध धर्म-सभाओं एवं जाति संगठनों ने भी स्वामी जी का समर्थन दिया। 4-5 अप्रैल 1923 को बनारस के सभाओं में भी इस विषय को रखा गया। फलत: काशी के कुछ रुढ़िवादी पंडितों ने भी मलकानों में काम करने का संकल्प लिया। मलकाना मुस्लिम राजपूतों की शुद्धि का काम पूरे हिन्दू समाज ने अपना लिया। स्वयं डॉ. अांबेदकर ने शुद्धि आंदोलन से अपनी सहानुभूति लिखित रूप से जताई थी। स्वामी श्रद्धानन्द ने 1924 ई. में दनकौर, बुलंदशहर में कई मुस्लिमों को शुद्ध किया।

मेरठ, मुजफ्फरनगर और बुलंदशहर में वे लगभग डेढ़ सौ ईसाइयों को भी पुन: हिन्दू समाज में ले आये। उन के सहयोगी रामभज दत्त और मंगल सेन इसी कार्य के लिए अन्य स्थानों पर गए। दिल्ली में मार्च 1926 में कराची से आई हुई महिला असगरी बेगन अपने बच्चों के साथ शुद्ध हुईं और उन्हें शान्ति देवी नाम दिया गया। इस पर असगरी के परिवारवालों ने स्वामी श्रद्धानन्द पर मुकदमा भी किया, किन्तु अदालत ने स्वामी जी को निर्दोष करार दिया। इसके बाद कुछ कट्टरपंथी मुसलमानों ने स्वामी जी को इस्लाम का शत्रु घोषित किया। इसी प्रचार के वशीभूत एक मतांध मुस्लिम ने 23 दिसंबर, 1926 को स्वामी जी को उन के घर में बीमार अवस्था में धोखे से मार डाला। यह निस्संदेह, शुद्धि के लिए ही स्वामी जी का बलिदान था। दुर्भाग्यवश, गांधी जी ने ठीक इसी काम के लिए स्वामी श्रद्धानन्द को बुरा-भला कहा था। इसमें संदेह नहीं कि गांधी जी और कुछ अन्य कांग्रेस नेताओं के बयानों ने कट्टरपंथी मुसलमानों को उग्र होने का हौसला दिया। यद्यपि कांग्रेस नेतृत्व के भी एक हिस्से में शुद्धि आंदोलन के प्रति उत्साह था। 30 दिसंबर, 1922 को गया (बिहार) में कांग्रेस के पंडाल में आयोजित हिन्दू महासभा के वार्षिक अधिवेशन में मोपला के पीड़ित हिन्दुओं के प्रति संवेदना प्रकट की गई। मलाबार के लोगों से धर्मांतरित लोगों को पुन: हिन्दू धर्म में स्वीकार करने के लिए भी आह्वान किया गया। इस अधिवेशन के अध्यक्ष पंडित मदन मोहन मालवीय तथा स्वागताध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे।

बहरहाल, ‘भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा’ के प्रयासों से सन 1923 से 1931 के बीच लगभग 1,83,3422 नव-मुस्लिमों को शुद्ध किया गया। इसी दौरान लगभग साठ हजार अछूत कहलाने वाले लोगों को हिन्दू धर्म छोड़ने से भी बचाया गया। 127 शुद्धि सम्मेलन हुए, 156 पंचायतें हुईं और 81 छोटे-बड़े सहभोज किए गए। सभा की ओर से शुद्धि समाचार नामक एक मासिक पत्र भी निकलता था, जिसके चौदह हजार ग्राहक थे। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा का सातवां अधिवेशन मालवीय जी की अध्यक्षता में 19-20 अगस्त 1923 को बनारस में हुआ था। उन्होंने अध्यक्षीय भाषण में शुद्धि कार्य का जोरदार समर्थन किया। वहां बाबू भगवान दास (काशी विद्यापीठ के संस्थापक, थियोसोफिस्ट, 1955 ई. में ‘भारत-रत्न’से सम्मानित) ने भी शुद्धि के समर्थन में अतिविद्वतापूर्ण भाषण दिया था। सर्वसम्मति से अहिन्दुओं के हिन्दू धर्म में प्रवेश संबंधी प्रस्ताव पास हुए।

अ.भा. हिन्दू महासभा का आठवां अधिवेशन 11 अप्रैल, 1925 को कोलकाता में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हुआ था। लालाजी ने इस्लाम में बलात धर्मांतरित हिन्दुओं की शुद्धि का समावेश किया। महासभा के नौ उद्देश्यों में इसे भी शामिल किया गया। बाद में भी हिन्दू महासभा के अध्यक्ष पद से कई महापुरुषों ने शुद्धि का समर्थन किया। वीर सावरकर ने भी इस तथा अन्य मंचों से शुद्धि का समर्थन और प्रत्यक्ष शुद्धि का कार्य भी किया। वीर सावरकर ने अंडमान के भयावह सेल्यूलर जेल में अपने भाइयों गणेश तथा बाबाराव के साथ मिलकर शुद्धि कार्य किया था। वहां कुछ मुस्लिम कारापाल अल्पवयस्क हिन्दू बंदियों को फुसलाकर या यातना देकर मुसलमान बनाते थे। उनमें से अनेक को सावरकर बंधुओं ने विधिपूर्वक शुद्ध कराया था। इसका पता चलने पर बाबाराव सावरकर पर जानलेवा हमला भी हुआ, किन्तु वे अडिग रहे। इस का उल्लेख उनकी आत्मकथा में एक स्वतंत्र अध्याय के रूप में है। उन्होंने डॉ. हेगडेवार के संपादकत्व में ‘स्वातंत्य दैनिक’ में शुद्धि संबंधी लेख भी लिखे थे। एक नाटक ‘संगीत उ: शाप’ भी लिखा। सार्वजनिक व्याख्यान भी दिए।

– डॉ. शंकर शरण

मनुस्मृति और नारी जाति

मनुस्मृति और नारी जाति

डॉ विवेक आर्य

भारतीय समाज में एक नया प्रचलन देखने को मिल रहा है। इस प्रचलन को बढ़ावा देने वाले सोशल मीडिया में अपने आपको बहुत बड़े बुद्धिजीवी के रूप में दर्शाते है। सत्य यह है कि वे होते है कॉपी पेस्टिया शूरवीर। अब एक ऐसी ही शूरवीर ने कल लिख दिया मनु ने नारी जाति का अपमान किया है। मनुस्मृति में नारी के विषय में बहुत सारी अनर्गल बातें लिखी है। मैंने पूछा आपने कभी मनुस्मृति पुस्तक रूप में देखी है। वह इस प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर एक नया कॉपी पेस्ट उठा लाया। उसने लिखा-

“ढोल, गंवार , शूद्र ,पशु ,नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।”

मेरी जोर के हंसी निकल गई। मुझे मालूम था कॉपी पेस्टिया शूरवीर ने कभी मनुस्मृति को देखा तक नहीं है। मैंने उससे पूछा अच्छा यह बताओ। मनुस्मृति कौनसी भाषा में है? वह बोला ब्राह्मणों की मृत भाषा संस्कृत। मैंने पूछा अच्छा अब यह बताओ कि यह जो आपने लिखा यह किस भाषा में है। वह फिर चुप हो गया। फिर मैंने लिखा यह तुलसीदास की चौपाई है। जो संस्कृत भाषा में नहीं अपितु अवधी भाषा में है। इसका मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। मगर कॉपी पेस्टिया शूरवीर मानने को तैयार नहीं था। फिर मैंने मनुस्मृति में नारी जाति के सम्बन्ध में जो प्रमाण दिए गए है, उन्हें लिखा। पाठकों के लिए वही प्रमाण लिख रहा हूँ। आपको भी कोई कॉपी पेस्टिया शूरवीर मिले तो उसका आप ज्ञान वर्धन अवश्य करना।

मनुस्मृति में नारी जाति

यत्र नार्य्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रऽफलाः क्रियाः। मनुस्मृति 3/56

अर्थात जिस समाज या परिवार में स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्यगुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं।

पिता, भाई, पति या देवर को अपनी कन्या, बहन, स्त्री या भाभी को हमेशा यथायोग्य मधुर-भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रखना चाहिए और उन्हें किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं पहुंचने देना चाहिए। -मनुस्मृति 3/55

जिस कुल में स्त्रियां अपने पति के गलत आचरण, अत्याचार या व्यभिचार आदि दोषों से पीड़ित रहती हैं। वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल में स्त्री-जन पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है। -मनुस्मृति 3/57

जो पुरुष, अपनी पत्नी को प्रसन्न नहीं रखता, उसका पूरा परिवार ही अप्रसन्न और शोकग्रस्त रहता है और यदि पत्नी प्रसन्न है तो सारा परिवार प्रसन्न रहता है। – मनुस्मृति 3/62

पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं, अत: साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति-पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए।-मनुस्मृति 9/96

ऐश्वर्य की कामना करने हारे मनुष्यों को योग्य है कि सत्कार और उत्सव के समयों में भूषण वस्त्र और भोजनादि से स्त्रियों का नित्यप्रति सत्कार करें। मनुस्मृति

पुत्र-पुत्री एक समान। आजकल यह तथ्य हमें बहुत सुनने को मिलता है। मनु सबसे पहले वह संविधान निर्माता है जिन्होंने जिन्होंने पुत्र-पुत्री की समानता को घोषित करके उसे वैधानिक रुप दिया है- ‘‘पुत्रेण दुहिता समा’’ (मनुस्मृति 9/130) अर्थात्-पुत्री पुत्र के समान होती है।

पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार मनु ने माना है। मनु के अनुसार पुत्री भी पुत्र के समान पैतृक संपत्ति में भागी है। यह प्रकरण मनुस्मृति के 9/130 9/192 में वर्णित है।

आज समाज में बलात्कार, छेड़खानी आदि घटनाएं बहुत बढ़ गई है। मनु नारियों के प्रति किये अपराधों जैसे हत्या, अपहरण , बलात्कार आदि के लिए कठोर दंड, मृत्युदंड एवं देश निकाला आदि का प्रावधान करते है। सन्दर्भ मनुस्मृति 8/323,9/232,8/342

नारियों के जीवन में आनेवाली प्रत्येक छोटी-बडी कठिनाई का ध्यान रखते हुए मनु ने उनके निराकरण हेतु स्पष्ट निर्देश दिये है।

पुरुषों को निर्देश है कि वे माता, पत्नी और पुत्री के साथ झगडा न करें। मनुस्मृति 4/180 इन पर मिथ्या दोषारोपण करनेवालों, इनको निर्दोष होते हुए त्यागनेवालों, पत्नी के प्रति वैवाहिक दायित्व न निभानेवालों के लिए दण्ड का विधान है। मनुस्मृति 8/274, 389,9/4

मनु की एक विशेषता और है, वह यह कि वे नारी की असुरक्षित तथा अमर्यादित स्वतन्त्रता के पक्षधर नहीं हैं और न उन बातों का समर्थन करते हैं जो परिणाम में अहितकर हैं। इसीलिए उन्होंने स्त्रियों को चेतावनी देते हुए सचेत किया है कि वे स्वयं को पिता, पति, पुत्र आदि की सुरक्षा से अलग न करें, क्योंकि एकाकी रहने से दो कुलों की निन्दा होने की आशंका रहती है। मनुस्मृति 5/149, 9/5- 6 इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनु स्त्रियों की स्वतन्त्रता के विरोधी है| इसका निहितार्थ यह है कि नारी की सर्वप्रथम सामाजिक आवश्यकता है -सुरक्षा की। वह सुरक्षा उसे, चाहे शासन-कानून प्रदान करे अथवा कोई पुरुष या स्वयं का सामर्थ्य।

उपर्युक्त विश्‍लेषण से हमें यह स्पष्ट होता है कि मनुस्मृति की व्यवस्थाएं स्त्री विरोधी नहीं हैं। वे न्यायपूर्ण और पक्षपातरहित हैं। मनु ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा जो निन्दा अथवा आपत्ति के योग्य हो।

मनुस्मृति और नारी जाति

मनुस्मृति और नारी जाति

डॉ विवेक आर्य

भारतीय समाज में एक नया प्रचलन देखने को मिल रहा है। इस प्रचलन को बढ़ावा देने वाले सोशल मीडिया में अपने आपको बहुत बड़े बुद्धिजीवी के रूप में दर्शाते है। सत्य यह है कि वे होते है कॉपी पेस्टिया शूरवीर। अब एक ऐसी ही शूरवीर ने कल लिख दिया मनु ने नारी जाति का अपमान किया है। मनुस्मृति में नारी के विषय में बहुत सारी अनर्गल बातें लिखी है। मैंने पूछा आपने कभी मनुस्मृति पुस्तक रूप में देखी है। वह इस प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर एक नया कॉपी पेस्ट उठा लाया। उसने लिखा-

“ढोल, गंवार , शूद्र ,पशु ,नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।”

मेरी जोर के हंसी निकल गई। मुझे मालूम था कॉपी पेस्टिया शूरवीर ने कभी मनुस्मृति को देखा तक नहीं है। मैंने उससे पूछा अच्छा यह बताओ। मनुस्मृति कौनसी भाषा में है? वह बोला ब्राह्मणों की मृत भाषा संस्कृत। मैंने पूछा अच्छा अब यह बताओ कि यह जो आपने लिखा यह किस भाषा में है। वह फिर चुप हो गया। फिर मैंने लिखा यह तुलसीदास की चौपाई है। जो संस्कृत भाषा में नहीं अपितु अवधी भाषा में है। इसका मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। मगर कॉपी पेस्टिया शूरवीर मानने को तैयार नहीं था। फिर मैंने मनुस्मृति में नारी जाति के सम्बन्ध में जो प्रमाण दिए गए है, उन्हें लिखा। पाठकों के लिए वही प्रमाण लिख रहा हूँ। आपको भी कोई कॉपी पेस्टिया शूरवीर मिले तो उसका आप ज्ञान वर्धन अवश्य करना।

मनुस्मृति में नारी जाति

यत्र नार्य्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रऽफलाः क्रियाः। मनुस्मृति 3/56

अर्थात जिस समाज या परिवार में स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्यगुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं।

पिता, भाई, पति या देवर को अपनी कन्या, बहन, स्त्री या भाभी को हमेशा यथायोग्य मधुर-भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रखना चाहिए और उन्हें किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं पहुंचने देना चाहिए। -मनुस्मृति 3/55

जिस कुल में स्त्रियां अपने पति के गलत आचरण, अत्याचार या व्यभिचार आदि दोषों से पीड़ित रहती हैं। वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल में स्त्री-जन पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है। -मनुस्मृति 3/57

जो पुरुष, अपनी पत्नी को प्रसन्न नहीं रखता, उसका पूरा परिवार ही अप्रसन्न और शोकग्रस्त रहता है और यदि पत्नी प्रसन्न है तो सारा परिवार प्रसन्न रहता है। – मनुस्मृति 3/62

पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं, अत: साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति-पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए।-मनुस्मृति 9/96

ऐश्वर्य की कामना करने हारे मनुष्यों को योग्य है कि सत्कार और उत्सव के समयों में भूषण वस्त्र और भोजनादि से स्त्रियों का नित्यप्रति सत्कार करें। मनुस्मृति

पुत्र-पुत्री एक समान। आजकल यह तथ्य हमें बहुत सुनने को मिलता है। मनु सबसे पहले वह संविधान निर्माता है जिन्होंने जिन्होंने पुत्र-पुत्री की समानता को घोषित करके उसे वैधानिक रुप दिया है- ‘‘पुत्रेण दुहिता समा’’ (मनुस्मृति 9/130) अर्थात्-पुत्री पुत्र के समान होती है।

पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार मनु ने माना है। मनु के अनुसार पुत्री भी पुत्र के समान पैतृक संपत्ति में भागी है। यह प्रकरण मनुस्मृति के 9/130 9/192 में वर्णित है।

आज समाज में बलात्कार, छेड़खानी आदि घटनाएं बहुत बढ़ गई है। मनु नारियों के प्रति किये अपराधों जैसे हत्या, अपहरण , बलात्कार आदि के लिए कठोर दंड, मृत्युदंड एवं देश निकाला आदि का प्रावधान करते है। सन्दर्भ मनुस्मृति 8/323,9/232,8/342

नारियों के जीवन में आनेवाली प्रत्येक छोटी-बडी कठिनाई का ध्यान रखते हुए मनु ने उनके निराकरण हेतु स्पष्ट निर्देश दिये है।

पुरुषों को निर्देश है कि वे माता, पत्नी और पुत्री के साथ झगडा न करें। मनुस्मृति 4/180 इन पर मिथ्या दोषारोपण करनेवालों, इनको निर्दोष होते हुए त्यागनेवालों, पत्नी के प्रति वैवाहिक दायित्व न निभानेवालों के लिए दण्ड का विधान है। मनुस्मृति 8/274, 389,9/4

मनु की एक विशेषता और है, वह यह कि वे नारी की असुरक्षित तथा अमर्यादित स्वतन्त्रता के पक्षधर नहीं हैं और न उन बातों का समर्थन करते हैं जो परिणाम में अहितकर हैं। इसीलिए उन्होंने स्त्रियों को चेतावनी देते हुए सचेत किया है कि वे स्वयं को पिता, पति, पुत्र आदि की सुरक्षा से अलग न करें, क्योंकि एकाकी रहने से दो कुलों की निन्दा होने की आशंका रहती है। मनुस्मृति 5/149, 9/5- 6 इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनु स्त्रियों की स्वतन्त्रता के विरोधी है| इसका निहितार्थ यह है कि नारी की सर्वप्रथम सामाजिक आवश्यकता है -सुरक्षा की। वह सुरक्षा उसे, चाहे शासन-कानून प्रदान करे अथवा कोई पुरुष या स्वयं का सामर्थ्य।

उपर्युक्त विश्‍लेषण से हमें यह स्पष्ट होता है कि मनुस्मृति की व्यवस्थाएं स्त्री विरोधी नहीं हैं। वे न्यायपूर्ण और पक्षपातरहित हैं। मनु ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा जो निन्दा अथवा आपत्ति के योग्य हो।

वेद सन्देश जीवन के संदर्भ में

वेदा वदन्ति ।

सन्देश पीपल के पत्तों का

अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता । यजु-३५-४

अश्वत्थ ( पीपल के वृक्ष ) पर तुम्हारी बैठना है ,पत्ता तुम्हारा वसति:-वास है ।

You are sitting on अश्वत्थ tree and live on the leaves.

हम तनिक अपनी मानसिकता पर विचार करें । हम प्राय: असत्य को सत्य ,चंचल को स्थिर ,जड़ को चेतन ,अनित्य को नित्य ,अपयश को यश ,बुराईको अच्छाई समझते हैं । हम संसार में आकर समझते हैं कि हमें सदैव यहाँ रहना है और मौज मस्ती करनी है ।
महात्मा युधिष्ठिर से यक्ष ने पूछा – इस संसार में आश्चर्य क्या है ,उन्हों ने जो उत्तर दिया वह त्रिकाल सत्य है ,उन्हों ने कहा –
अहन्यहनि गच्छन्ति भूता इह यमालयम् ।
अन्ये स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमत: परम् ।।
प्रतिदिन अर्थियों पर प्राणी श्मशान की ओर जा रहे हैं ,लोग अपने बन्धु बान्धवों को अपने हाथों से चितायें बना बना कर जलारहे हैं । परन्तु उन्हें कभी यह विचार नहीं आता कि उनकी गति भी ऐसी हीहै ।दो पाटन के बीच में ख़ाली रहा न कोय ।इस संसार रूपी चक्की में सभी पिस रहे हैं ।यहाँ कोई भी स्थिर नहीं है ,यहाँ जैसे ही कोई उत्पत्ति होती है उसके साथ ही साथ विनाश भी प्रारम्भ हो जाता है ,संयोगाः विप्रयोगान्ता: , हमारा जन्मदिवस नहीं है परन्तु आयुन्यूनता सूचक दिवस है – हमारी इतनी आयु कम हो गई – यह बताता है ।तब भी अपनी शेष आयु के लिये सावधान नहीं होते , असाध्य को साध्य समझते हुये पूरी जीवन उसी में बिता देते हैं । ये इन्द्रियों के भोग ,विषय ,धन दौलत जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिये साधन हैं ,ये मानव ता के घातक नहीं साधक हैं ।
किसी भी पदार्थ में जब स्थिरता नहीं है तो फिरहम स्थिरता की कामना ही क्यों करते हैं ? उपरोक्त वेद की सूक्ति स्पष्ट ही हमारी अस्थिरता को बता रही है – वह कहती है अश्वत्थ पर तुम्हारी बैठक है ,अश्वत्थ पीपल का वृक्ष होता है ,यह संस्कृत शब्द बडा ही सार्थक है – य: श्वो न स्थास्यति स: – जो कल नहीं ठहरेगा । भोगापवर्गार्थं दृश्यम् – हम अपने नैतिक जीवन निर्माण के कार्यों को ,परमात्म प्राप्ति के उपायों को ,ज्ञानादि मोक्ष के साधनों को कल पर छोड़ते हुये चले जाते हैं अभी तो समय नहीं है कल कर लेंगे जब कि शुभस्य शीघ्रं होना चाहिये । कौन जानता है कि वह कल आयेगा भी या नहीं ,कल तक रह भी पायेंगे या नहीं । इसका क्या प्रमाण है । अश्वत्थ को चलदल भी कहते हैं ,जिसका अर्थ है चंचल पत्तों वाला । पीपल के पत्ते प्रायः हिलते रहते हैं मानों वे घोषणा कर रहे हैं – पर्णे वो वसतिश्कृता – पत्ते पर तुम्हारा वास है – पता नहीं कब वायु का झोंका आये और वह नीचे गिर जाये जो स्वयं क्षण भंगुर है उसका आश्रय लेने वाला भीनिश्चित ही क्षण भंगुर है ।

निस्सन्देह यह सब दृश्यमान जगत् अस्थायी है परन्तु इसमें एक अमर तत्त्व भी विद्यमान है जिसे हम संसार के द्वारा ,क्षण भंगुर शरीरके द्वाराही प्राप्तकर सकते हैं । इसी में हमारी कुशलताहै किइस अचेतन तत्त्व से चेतन तत्त्व को प्राप्त करें ,अनित्य सेनित्य चेतन को प्राप्तकरें ।

महर्षि याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषद में मैत्रेयी से कहते हैं-य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोन्तरो -जो परमेश्वर – आत्मा अर्थात् जीव में स्थित हो कर भी जीव से भिन्न है , जिसको मूढ़ जीवात्मा नहीं जानता है कि वह परमात्मा मेरे अन्दर व्यापक है ,यदि जानता होता तो वह कभी कुकर्म नहीं करता , मानव बनता। दानव नहीं ,सदाचारी बनता दुराचारी नहीं ,रक्षक बनता भक्षक नहीं ,परमात्मा की वेदोपदिश्ट आज्ञाओं का पालन करके मोक्षाधिकारी बनता ,जन्मजन्मान्तर तक भटकता नहीं ।इस लिये कहा जैसे शरीर में जीव रहता है वैसे ही जीव में परमेश्वर व्यापक है ,उसको तू जान । अन्यत्र कहा – आत्मा वा अरे श्रोतव्यो ,मन्तव्यो ,निदिध्यासितव्य इति एषोपनिषत् ,एषा वेदोपनिषत् ।

क्षण भंगुर शरीर में रहने वाले जीवों की यही सार्थकता है कि हम उस परमेश्वर को ज्ञान के द्वारा ,योगांगों के द्वारा जानने का प्रयास करें ,जिसके लिये हमारे जन्म जन्मांतर व्यतीत हो जाते हैं ।उसी परमेश्वर के लिये आता है –
नित्यो sनित्यानां ,चेतनश्चेतनानाम् ,
एको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तमात्मस्थं येsनुपश्यन्ति धीरा: ,
तमाहुरग्र्यं पुरुषं प्रमाणम् ।।

उतो तदद्य विद्याम यतस्तत् परिषिच्यते । वेद ।
हम सब का कर्तव्य है उस सत्ता को जानें जिससे सबको जीवन मिलता है ।

आज का पंचांग

?? नमस्ते जी ??

?आपका दिन शुभ हो ?

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? 20 जुलाई 2019 ?
~~~~~

दिन —– शनिवार
तिथि — तृतीया
नक्षत्र —- शतभिषा
पक्ष —— कृष्ण
माह– — श्रावण
ऋतु ——– वर्षा
सूर्य दक्षिणायणे,उत्तर गोले
विक्रम सम्वत –2076
दयानंदाब्द — 195
शक सम्बत — 1941
कलयुगाब्द — 5121
मन्वतर —-वैवस्वत (सप्तम)
सृष्टि सम्वत–1960853120
#शुक्र अस्त पूर्व

? पहला सुख निरोगी काया नीम की निंबोली गिरी 10 ग्राम और बड़ी हरड़ का बक्कल 20 ग्राम लेकर चूर्ण बना लें । 2 ग्राम से 5 ग्राम तक धारोष्ण गोदुग्ध में कुछ मिश्री या शक्कर डाल कर दो तीन बार दें, इससे बार-बार खूनी दस्त जाना और दर्द दूर होता है। यह दिव्य औषधि है

?आज का विचार
मर्यादाओं को तोड़ने से मानवता खतरे में पड़ जाती है!

?एक निवेदन: बिना हेल्मेट के बाइक,बिना सीट-बेल्ट के कार मत चलाइए ! वर्षा ऋतु है एक दो वृक्ष अवश्य लगाइए!

? आज का वैदिक भजन ?

कविता छोटी है,परंतु सारांश बड़ा है

वाह रे जिंदगी

    “”””””””””””””””””‘””””
    * दौलत की भूख ऐसी लगी की कमाने निकल गए *
    * ओर जब दौलत मिली तो हाथ से रिश्ते निकल गए *
    * बच्चो के साथ रहने की फुरसत ना मिल सकी *
    * ओर जब फुरसत मिली तो बच्चे कमाने निकल गए *
    वाह रे जिंदगी
    “”””””””””””””””””‘””””

    वाह रे जिंदगी
    “”””””””””””””””””‘””””
    * जिंदगी की आधी उम्र तक पैसा कमाया*
    *पैसा कमाने में इस शरीर को खराब किया *
    * बाकी आधी उम्र उसी पैसे को *
    * शरीर ठीक करने में लगाया *
    * ओर अंत मे क्या हुआ *
    * ना शरीर बचा ना ही पैसा *
    “”””‛””””””””””””””””””””””””””””'””””””””””
    वाह रे जिंदगी
    “”””””””””””””””””‘””””

    वाह रे जिंदगी
    “”””””””””””””””””‘””””
    * शमशान के बाहर लिखा था *
    * मंजिल तो तेरी ये ही थी *
    * बस जिंदगी बित गई आते आते *
    * क्या मिला तुझे इस दुनिया से *

    * अपनो ने ही जला दिया तुझे जाते जाते *
    वाह रे जिंदगी

    ? आज का वैदिक भजन ?
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम
    बन जाऊँ बन्दा मैं तेरा हे कृपानिधान

    ऐसी कृपा करो प्रभु मेरे
    मिटे मन की तृष्णा और बन जायें तेरे
    सबसे हो प्रीति और बन जाये जीवन महान्
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम

    प्रभु!मुझको पिला दो कोई अमृत का प्याला
    रँग दे इस दिल को हम, कर दो मतवाला
    मेरा है तन-मन सब कुछ तुझपे कुर्बान
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम

    सदा पकड़ो मेरी बाहें
    कहीं भटक न जायें
    विषयों में फंस कर हम बहक न जायें
    जिस दिन तू निकले बिसर जाये मेरी जान
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम
    स्वर :- पूज्य स्वामी रामदेव जी
    इस भजन की तुलना वेद मन्त्र से करें :-
    “सांसों की माला पे सिमरू मैं प्रभु का नाम”

    वायुमारोह धर्मणा (धर्मणा वायुम् आरोह) सामवेद 483
    कोई श्वास भक्तिरस से रिक्त न रहजाए।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अमूल्य उपदेश (भाग ३)

२१. जो दुष्ट कर्मचारी द्विज को श्रेष्ठ, कर्मकार शूद्र को नीच मानें तो इसके परे पक्षपात् अन्याय, अधर्म दूसरा अधिक क्या होगा।

२२. जो विद्यादि सद्गुणों में गुरुत्व नहीं है झूठमूठ कण्ठी, तिलक, वेद विरुद्ध मन्त्रोपदेश करने वाले हैं वे गुरु ही नहीं किन्तु गडरिये हैं। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२३. “जो धर्मयुक्त उत्तम काम करे, सदा परोपकार में प्रवृत्त हो, कोई दुर्गुण जिसमें न हो, विद्वान् सत्योपदेश से सब का उपकार करे, उसको साधु कहते हैं।” (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२४. जैसे गृहस्थ व्यवहार और स्वार्थ में परिश्रम करते हैं उनसे अधिक परिश्रम परोपकार करने में संन्यासी भी तत्पर रहें तभी सब आश्रम उन्नति पर रहें। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२५. संन्यासियों का मुख्य कर्म यही है कि सब गृहस्थादि आश्रमों को सब प्रकार के व्यवहारों का सत्य निश्चय करा अधर्म व्यवहारों से छुड़ा सब संशयों का छेदन कर सत्य धर्मयुक्त व्यवहारों में प्रवृत्त करें। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ५)

२६. उत्तम दाता उसको कहते हैं जो देश, काल को जान कर सत्य विद्या धर्म की उन्नति रूप परोपकारार्थ देवे। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२७. जिसके शरीर में सुरक्षित वीर्य रहता है तब उसको आरोग्य, बुद्धि, बल, पराक्रम बढ़ के बहुत सुख की प्राप्ति होती है। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास २)

२८. अनेक प्रकार के मद्य, गांजा, भांग, अफीम आदि- जो-जो बुद्धि का नाश करने वाले पदार्थ हैं उनका सेवन कभी न करें। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास १०)

२९. देखो जब आर्यों का राज्य था तब महोपकारक गाय आदि नहीं मारे जाते थे, तभी आर्यावर्त्त व अन्य भूगोल देशों में बड़े आनन्द में मनुष्यादि प्राणी वर्त्तते थे क्योंकि दूध, घी, बैल आदि पशुओं की बहुताई होने से अन्न रस पुष्कल होते थे। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास १०)

३०. इन पशुओं के मारने वालों को सब मनुष्यों की हत्या करने वाले जानियेगा। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास १०)

उषा पृथ्वी के पूर्व के आधे भाग को अपनी लालिमा से भर देती है।

उषा पृथ्वी के पूर्व के आधे भाग को अपनी लालिमा से भर देती है। उषा की किरणें सूर्य का आगाज़ करती है, और दिन निकलने की घोषणा कर देती है। उसी प्रकार देवत्व के योद्धा मानवता के कल्याण करने के लिए अपने अस्त्र-शस्त्रों को चमकाते हैं। (सामवेद -१७५५)

प्रत्येक जीवात्मा सुख पाना चाहती है निरन्तर सुख की ओर दौड़ रही है परंतु मंजिल प्राप्त नहीं कर पा रही है।
भोग योनियाँ तो बन्धन में हैं
न तृतीये तथा उप्लब्धे: वेदांतदर्शन३-१-१८,
अर्थात उनके लिए तो वैसे ही सुविधा नहीं वे तो निम्न योनि के प्राणी हैं मगर जो मानवयोनि पितृयान को प्राप्त कर देवयान अर्थात मोक्ष मार्ग का सुख लेना चाहती है उनके लिए सुंदर अवसर है।
ऐसा नहीं है कि उन्हें ज्ञान नहीं, ज्ञान भी प्राप्त कर ज्ञानी हो जाती है परंतु फिर भी मंजिल नहीं मिल पाती,
क्योंकि एक भूल उससे हो
रही है जो कि रोड़ा है पद, पैसा, प्रतिष्ठा, पुत्र पति पत्नी-परिवार से मोह,
परमात्मा को यह सब चाहिए नहीं,
क्योंकि उसके पास जाने वाला भी उसके परिवार का सदस्य है और नहीं जाने वाला भी।
वह तो आपका निष्काम भाव से किया कर्म और अपने प्रति श्रद्धा भक्ति देखता है।
अतः भूल से बचें, मूल को पकड़ें, विकृति की आयी धूल छंटने पर पूर्ण प्रकाश पूर्ण सुख
-दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या

प्रतिभाद वा सर्वम्।।
-महर्षि पतंजलि कृत योगदर्शन विभूतिपाद सूत्र-३३,
शब्दार्थ
प्रातिभाद-प्रातिभ नामक ज्ञान से,
वा -अथवा,
सर्वम्- सब कुछ जान लेता है।
सूत्रार्थ
-अथवा प्रातिभ ज्ञान से अनेक पदार्थों का ज्ञान होता है।
इससे पूर्व सूत्र में मूर्धा के सात्विक प्रकाश में संयम के फल सिद्ध दर्शन को जानने का प्रयास किया।
प्रस्तुत सूत्र में प्रातिभ ज्ञान से अनेक पदार्थों के ज्ञान होने का कथन है।
महर्षि व्यास भाष्य करते हुए कहते हैं– प्रातिभ तारक नामक ज्ञान होता है। वह विवेकज ज्ञान का पूर्व रूप है वह प्रातिभ ज्ञान ऐसा ही होता है जैसे सूर्योदय के पूर्व प्रभा होती है उस प्रातिभ ज्ञान की उत्पत्ति के होने पर योगी उसके द्वारा सबको जानता है।
सर्वप्रथम इस प्रातिभ ज्ञान को ही समझने का प्रयास करते हैं।
यह ज्ञान स्वयं के अंदर से ही उत्तम संस्कारों के कारण पूर्व ही उत्पन्न होता है।
कहने का भाव यह है कि विवेकज ज्ञान से पहले का रूप ही प्रातिभ ज्ञान है।
वास्तव में जो पूर्व ही ज्ञानमय लालिमा रूप में भासे वही तो प्रातिभ है।
जैसे सूर्योदय से पूर्व की लालिमा दिखाई देती है। सूर्य उदय बाद में होता है ठीक उसी तरह विवेकज ज्ञान से पहले की ज्ञानमय लालिमा प्रातिभ नाम से जानी जाती है। यह ज्ञान किसी बाहर के निमित्त से उत्पन्न नहीं होता बल्कि पूर्व जन्म व इस जन्म दोनों के उत्तम संस्कार सुदृढ़ योगाभ्यास वेद आदि सत्य शास्त्रों के अध्ययन अध्यापन सत्संग आदि धर्म के आचरण से भीतर से ही पूर्व उत्पन्न होता है।
किसी किसी व्यक्ति में छोटी आयु में ही यह प्रातिभ ज्ञान देखा गया है ध्रुव, प्रह्लाद, मूलशंकर इत्यादि प्रतिभावान ज्ञानी बालक प्रातिभ ज्ञान के ऐतिहासिक प्रमाण हैं।
ऐसे ही बालक फिर विवेकी हो ईश्वर को प्राप्त भी कर गए।
क्योंकि अनेक पदार्थों के ज्ञान विज्ञान की परत प्रातिभ पर ही टिकी है।
जैसे पूत के पैर पालने में दिख जाते हैं वैसे ही विवेकी ज्ञान से पूर्व का ज्ञान जिसे महर्षि पतंजलि प्रातिभ कहते हैं। वह प्रतिभाशाली लोगों में पूर्व से ही भासता है। वही ज्ञान आगे बढ़कर स्वयं व ईश्वर का बोध करा देता है।
अतः जो योगाभ्यासी साधक योगाभ्यास में बचपन से ही कुशल हो निरन्तर साधनारत रहते हैं वह भी उनके प्रातिभ ज्ञान की ही वजह है।
वे ही आगे चलकर अनेक पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करते हुए सब कुछ अर्थात जिससे सब कुछ होता है उस ईश्वर को प्राप्त करने विवेकज ज्ञान तक कोई कसर नहीं छोड़ते।
वास्तव में ऐसे अमृतपुत्र ही ईश्वर के सच्चे अच्छे पुत्र हैं।
काव्यमय भाव?
प्रातिभ ही विवेकज आधार,
ज्यों सूर्योदय लालिमा पसार।
योगी भरे विविध विज्ञान,
सुसंस्कारवित् पूर्व निशान।।–दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या

vaidik lekh


प्रत्येक जीवात्मा सुख पाना चाहती है निरन्तर सुख की ओर दौड़ रही है परंतु मंजिल प्राप्त नहीं कर पा रही है।
भोग योनियाँ तो बन्धन में हैं

न तृतीये तथा उप्लब्धे: वेदांतदर्शन३-१-१८,
अर्थात उनके लिए तो वैसे ही सुविधा नहीं वे तो निम्न योनि के प्राणी हैं मगर जो मानवयोनि पितृयान को प्राप्त कर देवयान अर्थात मोक्ष मार्ग का सुख लेना चाहती है उनके लिए सुंदर अवसर है।
ऐसा नहीं है कि उन्हें ज्ञान नहीं, ज्ञान भी प्राप्त कर ज्ञानी हो जाती है परंतु फिर भी मंजिल नहीं मिल पाती,
क्योंकि एक भूल उससे हो
रही है जो कि रोड़ा है पद, पैसा, प्रतिष्ठा, पुत्र पति पत्नी-परिवार से मोह,
परमात्मा को यह सब चाहिए नहीं,
क्योंकि उसके पास जाने वाला भी उसके परिवार का सदस्य है और नहीं जाने वाला भी।
वह तो आपका निष्काम भाव से किया कर्म और अपने प्रति श्रद्धा भक्ति देखता है।
अतः भूल से बचें, मूल को पकड़ें, विकृति की आयी धूल छंटने पर पूर्ण प्रकाश पूर्ण सुख
-दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या

स्वामी दयानन्द और गोरक्षा
* गावो विश्वस्य मातर: *

जब आत्मा शरीर को छोड़ देती है तो शरीर मर जाता है अर्थात निष्क्रिय, निष्प्राण, तेजहिन हो जाता है। गो भारत सरीखे कृषि प्रधान देश की आत्मा है और यदि गो इस देश को छोड़ कर चली गयी तो भारत देश आत्मा के बिना शरीर मात्र रह जाएगा। इस राष्ट्र का पतन निश्चित रूप से कोई नहीं बचा सकेगा यदि गो आदि पशुओं को कटने से नहीं बचाया जाता है।

प्राचीन काल में तो संपत्ति का मापदण्ड भी गोधन(godhan) को ही माना जाता था। भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में भारतमाता और गोमाता दोनों ही समानरूप से सेवा और रक्षा के पात्र रहे हैं। संस्कृत में तो गाय और पृथ्वी दोनों के लिए एक ही शब्द ‘गो’ का प्रयोग हुआ है। ऋषि दयानन्द(rishi dayanand) की आर्थिक राष्ट्रियता का वह मुख्य स्तम्भ है। इस कारण उन्होने इस विषय को लेकर ‘गोकरुणानिधि’(gokarunanidhi) के नाम से एक स्वतंत्र ग्रंथ की रचना करके गो-विषयक सभी प्रश्नों का विस्तार से विवेचन किया है। इसी पुस्तक से ब्रिटिश सरकार को राजद्रोह(treason) की गन्ध आने लगी थी।

गोकरुणानिधि का उद्देश्य
इस ग्रंथ की भूमिका में ऋषि दयानन्द जी लिखते है कि “यह ग्रंथ इसी अभिप्राय से लिखा गया है जिससे गौ आदि पशु जहाँ तक सामर्थ्य हो बचाये जावे और उनके बचाने से दूध, घी और खेती के बढ्ने से सब का सुख बढ़ता रहे।”

आर्यराज (स्वराज्य) और गौ
ऋषि वचनामृत1ऋषि वचनामृत

महर्षि जी लिखते है कि “जब आर्यों का राज्य था तब ये महोपकारक गाय आदि पशु नहीं मारे जाते थे। तभी आर्यावर्त व अन्य देशों में बड़े आनंद से मनुष्य आदि प्राणी रहते थे क्योंकि दूध, घी, बैल आदि पशुओं की बहुताई होने से अन्न रस पुष्कल होते थे। जब से विदेशी मांसाहारी इस देश में आकार गौ आदि पशुओं को मरने वाले राज्याधिकारी हुए है तब से क्रमश: आर्यों के दु:खों की बढ़ती होती जाती है क्योंकि “नष्टे मुले नैव फलं न पुष्पम।” (सत्यार्थ प्रकाश) परंतु शोक! महाशोक! विदेशियों से आजादी मिलने के बाद भी हमारे शासकों ने इस भारत रूपी वृक्ष की जड़ को सींचने की बजाय काटने का ही कार्य किया है।

गौ सब सुखों का मूलऋषि वचनामृत3
महर्षि जी ने गौ को सभी सुखों का मूल सिद्ध करते हुए लिखा है – “गवादि पशु और कृषि आदि कर्मों की रक्षा वृद्धि होकर सब प्रकार के उत्तम सुख मनुष्यादि प्राणियों को प्राप्त होते है। पक्षपात छोड़कर देखिये, गौ आदि पशु और कृषि आदि कर्मों से सब संसार को असंख्य सुख होते है वा नहीं।”

गौ की उपयोगिता
गौ का हमारे दैनिक जीवन पर कितना व्यापक प्रभाव है और खाद्य समस्या को हल करने आदि बातों पर महर्षि जी लिखते है – “इनकी रक्षा में अन्न भी महंगा नहीं होता। क्योंकि दूध आदि के अधिक होने से दरिद्री को भी खान-पान में दूध आदि मिलने पर न्यून ही अन्न खाया जाता है और अन्न के कम खाने से मल भी कम होता है। मल के न्यून होने से दुर्गन्ध भी न्यून होता है। दुर्गन्ध के स्वल्प होने से वायु और वृष्टिजल की शुद्धि भी विशेष होती है। उससे रोगों की न्यूनता होने से सबको सुख बढ़ता है।”

गौ की विशेषताऋषि वचनामृत2
सभी पशुओं की रक्षा का आदेश देते हुए ऋषि ने सबसे अधिक बल गौ पर ही दिया है। उन्होने लिखा है – “वर्तमान में परमोपकरक गौ की रक्षा में ही मुख्य तात्पर्य है।” एक ही गौ से होने वाले लाभ का सविस्तार ब्योरा लिखने के बाद ऋषि लिखते है कि “एक गाय कि एक पीढ़ी में चार लाख पचहत्तर हजार छ: सौ मनुष्यों का पालन होता है और पीढ़ी पर पीढ़ी बढ़ा कर लेखा करें तो असंख्य मनुष्यों का पालन होता है।” (स०प्र०) गुणों में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण ही आर्यों ने गाय को सब पशुओं को सर्वोत्तम माना है। आजकल तो सभी विद्वानों आदि ने स…

आहत भारत को समझने वाले नायपॉल

शंकर शरण

सर विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल के निधन पर मन में पहली बात यह आई कि पूर्वजों के भारत से दूर जा चुकने के बावजूद भारत और हंिदूू धर्म उनके जीवन में बना रहा। वह टैगोर के बाद साहित्य का नोबेल पाने वाले भी दूसरे हंिदूू मनीषी थे। त्रिनिदाद में जन्में वीएस नायपॉल न ईसाई बने और न ही उन्होंने अपना हंिदूू नाम बदला। नायपॉल ने भारत और भारतीयों के बारे में भी कई पुस्तकें लिखीं। उनका आरंभिक लेखन विवादास्पद भी रहा, परंतु बाद में उन्होंने भारत की विडंबना को अधिक गहराई से प्रस्तुत किया। वह बार-बार भारत आते रहे। वह यहीं रहना भी चाहते थे, लेकिन यहां के सत्ताधारियों ने रुचि नहीं दिखाई। नायपॉल ने लेखन के अलावा कभी कोई और काम नहीं किया। आरंभिक काल में भयंकर गरीबी ङोलने के बावजूद उन्होंने दो महीने छोड़कर पूरे जीवन कभी नौकरी नहीं की। सिर्फ इस कारण कि वह किसी के आदेश पालक नहीं रह सकते थे। चाटुकारिता का तो सवाल ही नहीं। इसीलिए वह बेलाग लिखने,बोलने के लिए प्रसिद्ध हुए और दुनिया ने उनका लोहा माना। विपुल कथा लेखन के अलावा उन्होंने अनूठी विधा में ‘इंडिया: ए वूंडेड सिविलाइजेशन’, ‘अमंग द बिलीवर्स’ और ‘बियोंड बिलीफ’ जैसी चर्चित पुस्तकें लिखी। दशकों के अनुभव से नायपॉल ने कहा था कि भारत में यह एक सचमुच गंभीर समस्या है कि बहुत कम हंिदूू यह जानते हैं कि इस्लाम क्या है? बहुत कम हंिदूुओं ने इसका अध्ययन किया है या इस पर कभी सोचा है। उनकी उपरोक्त तीनों पुस्तकें हमारे लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। 1अपने लेख ‘द राइटर एंड इंडिया’ में नायपॉल भारत में छह सौ साल चले इस्लामी शासनकाल के बारे में यहां छाई चुप्पी पर सवाल उठाते हैं। नायपॉल दिखाते हैं कि इस्लामी हमलावरों के सामने भी हमारे पूर्वज उतने ही असहाय थे जितने बाद में ब्रिटिश शासकों के समक्ष नजर आए, मगर इस पर कभी चर्चा नहीं होती। नायपॉल के अनुसार भारत के सिवा कोई सभ्यता ऐसी नहीं जिसने बाहरी दुनिया से निपटने के लिए आज भी इतनी कम तैयारी कर रखी हो। कोई अन्य देश इतनी आसानी से हमले और लूटपाट का शिकार नहीं हुआ। शायद ही कोई और देश होगा जिसने अपनी बर्बादियों से इतना कम सबक सीखा होगा। नि:संदेह नायपॉल कोई हंिदूूवादी लेखक नहीं थे। वह तो मुसलमानों एवं हंिदूुओं के प्रति समान रूप सहानुभूतिशील थे। उन्होंने केवल निर्मम तटस्थता से यथार्थ को हमारे समक्ष रखा था। इसमें इस्लाम और उसकी भूमिका वैसी ही रखी गई जैसी वह रही। भारत के सेक्युलरवादी बुद्धिजीवी इसी का बुरा मानते थे। जबकि बाहरी अवलोकनकर्ता के रूप में नायपॉल अनेक वैसी बातें सरलता से देख पाते थे जो भारतीय अपने राग-द्वेष पूर्वाग्रहों, मतवादों आदि के कारण नहीं देखते।1सच पूछें तो ‘इंडिया: ए वूंडेड सिविलाइजेशन’ में समकालीन हंिदूुओं, उनके नेताओं की बड़ी दयनीय छवि उभरती है। यह 1975-76 के बीच भारत की चतुर्दिक यात्र करके उसी दौरान लिखी गई थी। बंबई की चाल और अवैध बस्तियां, पूना-बंबई के बीच का देहात, इंजीनियर और शिव-सैनिक, बिहार की शस्य-श्यामला धरती पर पीड़ित बाल-मजदूर, विजयनगर के खंडहरों के बीच रहने वाले लोग, जयपुर के बाहर अकालग्रस्त आबादी, प्रशासन के प्रयास, महानगरों में उच्च-वर्गीय लोगों के वार्तालाप आदि असंख्य अनुभवों के बीच नायपॉल ने भारत की घायल सभ्यता को समझने का यत्न किया था। इस पुस्तक में नव-स्वतंत्र भारत का जन-जीवन ही नहीं, वरन कई विषयों पर गंभीर विश्लेषण भी है। गांधीजी का महात्मावाद, भारतीय बुद्धिजीवियों, प्रशासकों, आमजनों की रूढ़ियां, आदतें, टूटती परंपराएं, उभरता खालीपन, नैतिक संभ्रम, इंदिरा का आपातकाल, जेपी आंदोलन, नक्सलवाद, भारतीय प्र…