The 10 Principles of Arya Samaj

The 10 Principles of Arya Samaj
God is the original source of all that is known by spritual knowledge and the physical sciences.
God is Existent, conscious, all-beatitude, Formless, Almighty, Just, Merciful, Unbegotten, Infinite, Unchangeable, Beginningless, Incomparable, the support of All, the Lord of All, All-pervading, Omniscient and Controller of All from within, Evermature, Imperishable, Fearless, Eternal, Pure, Creator of the Universe. He alone ought to be worshipped.
The Vedas are the books of all True knowledge. It is the paramount duty of all Aryas to read them, to teach them to others, to listen to them and to recite them to others.
All persons should always be ready to accept truth and renounce untruth.
All acts ought to be performed in conformity to Dharma(righteousness) i.e. after due consideration of truth and untruth.
The primary object of Arya Samaj is to do good to the whole world, i.e. to promote physical, spiritual and social progress of all humans.
Your dealings with all should be regulated by love and due justice, in accordance with the dictates of Dharma(righteousness).
Avidya(illusion and ignorance) be dispelled, and Vidya(realisation and acquisition of knowledge) should be promoted.
None should remain satisfied with his own progress only, but incessantly strive for the social upliftment, realizing his own benefitin the advancement of all others.
All men ought to dedicate themselves necessarily for the social good and the well being of all, subordinating their personal interest, while the individual is free to enjoy the freedom of action for individual being.

ईश्वर की उपासना के लिए निश्चित मन्त्र एवं मन्त्र चयन (स्मृतिशेष) आचार्य श्री ज्ञानेश्वरार्य: एक शंका प्रायः यह भी लोगों के मन में आती है कि जो स्वामी दयानन्द जी ने पंचमहायज्ञ विधि में, संस्कारविधि में जो-जो मंत्र लिखे हैं उन्हीं के माध्यम से ईश्वर ध्यान हो का सकता है अन्य किन्ही मंत्रों से ईश्वर का ध्यान नहीं हो सकता क्या यह सत्य है? इसके विषय में उत्तर ये है कि ऐसी बात नहीं है कि उन्हीं मंत्रों के माध्यम से ही ईश्वर का ध्यान हो सकता है। हम वेद के किसी अन्य मंत्र से भी ईश्वर की उपासना, ध्यान कर सकते हैं। इतनी बात अवश्य है कि उन मंत्रों के अंदर ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव का वर्णन होना चाहिए। ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना विषय होने चाहिए। न केवल वेदमंत्र अपितु ऋषियों के बनाए ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों में जो श्लोक हैं उन श्लोकों के माध्यम से भी ईश्वर की उपासना कर सकते हैं। दर्शन आदि में ऋषियों द्वारा जो सूत्र बनाये हैं, उनके माध्यम से भी उपासना कर सकते हैं। ऋषियों ने ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव की व्याख्या करते हुए जिन वाक्यों की रचना की है, जो वेद मंत्रों के भाष्य किए हैं, सूत्रों के भाष्य किए हैं, उन भाष्यों के वाक्यों से भी ईश्वर की उपासना कर सकते हैं। अर्थात् हम किसी भी सामान्य शब्द से भी ईश्वर की प्रार्थना-उपासना कर सकते हैं शर्त एक है मंत्रों में, उन श्लोकों में, वाक्यों में, शब्दों में, ईश्वर के गुण-कर्म- स्वभाव का वर्णन आता हो। कोई भी मंत्र, कोई भी वाक्य, कोई भी सूत्र, कोई भी श्लोक ईश्वर कैसा है ? किस प्रकार के गुण वाला है ? किस प्रकार के कर्मों को करता है ? किस प्रकार के स्वभाव वाला है ? आदि विषयों को यदि बताता है तो उस मंत्र, सूत्र, श्लोक, वाक्य, शब्द से हम ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना कर सकते हैं। जो व्यक्ति मंत्र भी नहीं जानता है, श्लोक भी नहीं जानता है, सूत्र भी नहीं जानता है, संस्कृत भी नहीं जानता है, ऋषियों के वाक्यों को भी नहीं जानता है, कोई अच्छे संस्कृत का शब्द उसके पास नहीं हैं तो उसका भी उपाय है कि विद्वानों के, भक्तों के बनाए जो भजन, गीत हैं उन भजनों के माध्यम से भी ईश्वर का ध्यान कर सकता है। ध्यान के लिए एकाग्रता व समर्पण आवश्यक है। यदि हमारा समर्पण ईश्वर के प्रति है और हम एकाग्र है, उसके प्रति प्रेम है, तो ईश्वर का ध्यान भजन से भी कर सकते हैं और गीत से भी कर सकते हैं। उपासना हेतु मन्त्र चयन जिन मन्त्रों का चयन ऋषियों ने ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना के लिए किया है उन मन्त्रों में ईश्वर की उपासना कैसे करनी चाहिए ? क्या-क्या माँगना चाहिए? हमको क्या-क्या अपेक्षा है ? वो सारी बातें उन मंत्रों में निहित हैं। शरीर के विषय में, मन के विषय में, आत्मा के विषय में जो-जो हमारी अपेक्षाएं हैं। हमें क्या चाहिए ? ईश्वर क्या दे सकता है ? ये सारी बातें इन मंत्रों में सूत्र रूप में बताया गया है। ईश्वर कैसा है ? उसका गुण-कर्म-स्वभाव कैसा है ? हम कैसे ईश्वर को प्राप्त कर सकते है ? ईश्वर की उपासना करने से क्या लाभ होता है ? क्या महत्व, उपयोगिता है ? ईश्वर की उपासना से क्या हमारी प्रयोजन की सिद्धि होती है ? ये सारी बातें जितनी सूक्ष्मता से, सरलता से, संक्षेप से इन मंत्रों में बतायी गयी है उतनी और अन्य मंत्रों में नहीं मिलती हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह उन मंत्रों के से ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना करें। क्योंकि ऋषि लोग बुद्धिमान थे उन्होंने विशेष मंत्रों का चयन किया, ऐसे वैसे सामान्य मंत्रों को नहीं ले लिया। फिर भी प्रायः देखने में आता है एक ही एक प्रकार के मंत्रों का उच्चारण करने से व्यक्ति ऊब जाता है जैसे कि एक-एक प्रकार का भोजन करने से, एक-एक प्रकार के वस्त्र पहनने से व्यक्ति ऊब जाता है, ऐसे ही एक ही एक प्रकार के मंत्रों से भी ऊब जाता है। इसमें यह अवकाश है कि हम और भी अनेक अन्य प्रकार के मंत्रों को ले कर, जिसमें ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव अच्छी प्रकार से बताये गये हों और उन मन्त्रों में यह भी बताया गया हो कि उपासना के क्या लाभ क्या हैं? उन मंत्रों के माध्यम से भी ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना की जा सकती है, ऐसा कोई अनिवार्य नियम नहीं है कि केवल संस्कार विधि या पंचमहायज्ञ पुस्तक में बताये गये मंत्रों से ही ईश्वर का ध्यान हो सकता है अन्य मंत्रों, सूत्रों, श्लोकों, वाक्यों या शब्दों से नहीं हो सकती। [स्रोत : निराकार ईश्वर की उपासना, पृ. 29-32, प्रस्तुति : भावेश मेरजा]

मरने के बाद बाद शरीर की क्या गति होती है यम नचिकेता संवाद

शनिवार, 7 दिसंबर 2019

आध्यात्मिक चर्चा – ४

आध्यात्मिक चर्चा – ४
आचार्य हरिशंकर अग्निहोत्री
 
आज हम नचिकेता के प्रश्न (शरीर के मरने के बाद आत्मा की क्या गति होती है?) पर यमाचार्य के उत्तर का विश्लेषण करेंगे। यमाचार्य नचिकेता को आत्मज्ञान के सन्दर्भ में उपदेश करते है –
 
न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
 
यमाचार्य नचिकेता के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि (न हन्यते हन्यमाने शरीरे ) शरीर के मरने के बाद आत्मा नहीं मरता है । वैसे तो संक्षेप में यह उत्तर हो गया लेकिन इतने उत्तर से काम नहीं चलेगा इसीलिए आगे कहते हैं कि (न जायते न म्रियते ) आत्मा न जन्म लेता है और न ही मरता है । ऐसा कहने पर पुनः नया प्रश्न उपस्थित होता है कि संसार में तो जन्म और मृत्यु देखने में आता है और यमाचार्य कह रहे हैं कि आत्मा का जन्म – मृत्यु नही होता है। इस प्रसंग को इस प्रकार समझेंगे कि संसार में ऐसी बहुत सी घटनायें होती है जो होती तो कुछ हैं और कही कुछ जाती हैं । जैसे रेलगाड़ी में यात्रा करने वाला एक दूसरे से कहता है कि देखना भाई कौन सा स्टेशन आगया और उत्तर देने वाला भी कह देता है कि अमुख स्टेशन आगया जबकि प्रश्न भी गलत है और उत्तर भी गलत है क्योंकि स्टेशन नही आता है यात्री स्टेशन पहुंचते हैं इसीलिए यह कहना चाहिए कि हम कौन से स्टेशन पहुंच गये या गाड़ी कौन से स्टेशन पहुंच गयी और उत्तर देने वाला कहना चाहिए कि हम या गाड़ी अमुख स्टेशन पहुंच गये।
     एक और उदाहरण लेते हैं – हम यदि यह प्रश्न करें कि क्या सूर्य – उदय अस्त होता है तो कुछ लोग कहेंगे कि सूर्य उदय – अस्त होता है और कुछ लोग कहेंगे कि सूर्य उदय अस्त नहीं होता है और कुछ तो कहेंगे कि उदय अस्त होते दिखाई नहीं देता है क्या। लेकिन यथार्थ तो यही है सूर्य का उदय और अस्त कभी नहीं होता है लेकिन पृथ्वी के घूमने के कारण सूर्य का उदय अस्त दिखाई देता है वैसे ही जैसे गाड़ी में चलने वाले व्यक्ति को वृक्ष पीछे की ओर दौड़ते दिखते हैं। इसी प्रकार आत्मा का जन्म मृत्यु नही होता आत्मा शरीर में आजाती है तो जन्म सा दिखाई देता है और आत्मा शरीर को छोड़कर चली जाती है तो मृत्यु सी दिखाई देती है। अर्थात् आत्मा और शरीर के संयोग का जन्म है तथा आत्मा और शरीर के वियोग का नाम मृत्यु है। अभी हम आत्मा के विषय में समझ रहे हैं आगे हम शरीर के बारे में विस्तार से जानेंगे।
आत्मा की अमरता के विषय में योगेश्वर श्री कृष्ण जी महाराज अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं –
 
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।।
 
     आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता और वायु सूखा नहीं सकता । अर्थात् आत्मा को किसी भी साधन से नष्ट नहीं किया जा सकता है। आत्मा एक अविनाशी और अनादि तत्व है।
आत्मा के बारे में एक बात अधिक जानने योग्य है ( जो ऐसा मानते हैं कि आत्मा तो परमात्मा में से बनती है, उनको यह बात अधिक ध्यान देकर समझनी चाहिए) यमाचार्य कहते हैं आत्मा किसी कारण से उत्पन्न नहीं हुआ है अर्थात् इसका कोई उपादान कारण नही है‌। आत्मा किसी में से बना नही है और ना ही इसमें से कुछ बनेगा। 
इस विषय पर योगेश्वर श्री कृष्ण महाराज की बात बहुत प्रासंगिक लगती है वे कहते हैं कि –
 
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌ ॥ 
 
  ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैं किसी भी समय में नहीं था, या तू नहीं था अथवा ये समस्त राजा नहीं थे और न ऐसा ही होगा कि भविष्य में हम सब नहीं रहेंगे। अर्थात् हम पहले भी हमेशा थे और आगे भी हमेशा रहेंगे।
ऋग्वेद में अविनाशी व अनादि तत्वों के बिषय इस प्रकार कहा है –
 
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते |
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति || 
 
( द्वा ) जो ब्रह्म और जीव दोनों ( सुपर्णा ) चेतनता और पालनादि गुणों से सदृश ( सयुजा ) व्याप्य – व्यापक भाव से संयुक्त ( सखाया ) परस्पर मित्रतायुक्त , सनातन अनादि हैं ; और ( समानम् ) वैसा ही ( वृक्षम् ) अनादि मूलरूप कारण और शाखारूप कार्ययुक्त वृक्ष अर्थात जो स्थूल होकर प्रलय में छिन्न – भिन्न हो जाता है , वह तीसरा अनादि पदार्थ ; इन तीनों के गुण , कर्म और स्वभाव भी अनादि हैं । ( तयोरन्यः ) इन जीव और ब्रह्म में से एक जो जीव है , वह इस वृक्षरूप संसार में पाप पुण्य रूप फलों को ( स्वाद्वत्ति ) अच्छे प्रकार भोगता है , और दूसरा परमात्मा कर्मों के फलों को ( अनश्नन् ) न भोगता हुआ चारों ओर अर्थात् भीतर-बाहर सर्वत्र प्रकाशमान हो रहा है । जीव से ईश्वर , ईश्वर से जीव और दोनों से प्रकृति भिन्न-स्वरूप तीनों अनादि हैं ।
 
यमाचार्य आत्मा के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहते हैं – (न) नहीं (जायते)उत्पन्न होता है (न) नहीं (म्रियते) मरता है (वा) या (विपश्चित) चेतनरूप, मेधावी  (अयम्) यह (कुतश्चित्) कहीं से किसी उपादान कारण से (न, बभूव) उत्पन्न नहीं हुआ (कश्चित्) कोई (इससे भी उत्पन्न नहीं हुआ)  (अजः) जन्म नहीं लेता (नित्यः) नित्य (शाश्वत:) अनादि हमेशा रहनेवाला (अयम्) यह (पुराणः) सनातन है (शरीरे) शरीर के (हन्यमाने) नाश होने पर (न, हन्यते)नष्ट नहीं होता ॥
अभी तक हमने समझा कि आत्मा (जीव) एक अविनाशी और अनादि तत्व है इसका जन्म-मृत्यु नही होता है । शरीर और आत्मा के संयोग का नाम जन्म कहलाता है और शरीर और आत्मा के साथ साथ चलने का नाम जीवन है तथा शरीर और आत्मा के वियोग का नाम मृत्यु है । आगे हम शरीर को समझेंगे।
क्रमशः ..

ईश्वर की उपासना के लिए निश्चित मन्त्र एवं मन्त्र चयन

ईश्वर की उपासना के लिए निश्चित मन्त्र एवं मन्त्र चयन ●
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  1. – (स्मृतिशेष) आचार्य श्री ज्ञानेश्वरार्य:

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अर्थात् हम किसी भी सामान्य शब्द से भी ईश्वर की प्रार्थना-उपासना कर सकते हैं शर्त एक है मंत्रों में, उन श्लोकों में, वाक्यों में, शब्दों में, ईश्वर के गुण-कर्म- स्वभाव का वर्णन आता हो। कोई भी मंत्र, कोई भी वाक्य, कोई भी सूत्र, कोई भी श्लोक ईश्वर कैसा है ? किस प्रकार के गुण वाला है ? किस प्रकार के कर्मों को करता है ? किस प्रकार के स्वभाव वाला है ? आदि विषयों को यदि बताता है तो उस मंत्र, सूत्र, श्लोक, वाक्य, शब्द से हम ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना कर सकते हैं।

जो व्यक्ति मंत्र भी नहीं जानता है, श्लोक भी नहीं जानता है, सूत्र भी नहीं जानता है, संस्कृत भी नहीं जानता है, ऋषियों के वाक्यों को भी नहीं जानता है, कोई अच्छे संस्कृत का शब्द उसके पास नहीं हैं तो उसका भी उपाय है कि विद्वानों के, भक्तों के बनाए जो भजन, गीत हैं उन भजनों के माध्यम से भी ईश्वर का ध्यान कर सकता है। ध्यान के लिए एकाग्रता व समर्पण आवश्यक है। यदि हमारा समर्पण ईश्वर के प्रति है और हम एकाग्र है, उसके प्रति प्रेम है, तो ईश्वर का ध्यान भजन से भी कर सकते हैं और गीत से भी कर सकते हैं।

उपासना हेतु मन्त्र चयन

जिन मन्त्रों का चयन ऋषियों ने ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना के लिए किया है उन मन्त्रों में ईश्वर की उपासना कैसे करनी चाहिए ? क्या-क्या माँगना चाहिए? हमको क्या-क्या अपेक्षा है ? वो सारी बातें उन मंत्रों में निहित हैं। शरीर के विषय में, मन के विषय में, आत्मा के विषय में जो-जो हमारी अपेक्षाएं हैं। हमें क्या चाहिए ? ईश्वर क्या दे सकता है ? ये सारी बातें इन मंत्रों में सूत्र रूप में बताया गया है।

ईश्वर कैसा है ? उसका गुण-कर्म-स्वभाव कैसा है ? हम कैसे ईश्वर को प्राप्त कर सकते है ? ईश्वर की उपासना करने से क्या लाभ होता है ? क्या महत्व, उपयोगिता है ? ईश्वर की उपासना से क्या हमारी प्रयोजन की सिद्धि होती है ? ये सारी बातें जितनी सूक्ष्मता से, सरलता से, संक्षेप से इन मंत्रों में बतायी गयी है उतनी और अन्य मंत्रों में नहीं मिलती हैं।

इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह उन मंत्रों के से ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना करें। क्योंकि ऋषि लोग बुद्धिमान थे उन्होंने विशेष मंत्रों का चयन किया, ऐसे वैसे सामान्य मंत्रों को नहीं ले लिया। फिर भी प्रायः देखने में आता है एक ही एक प्रकार के मंत्रों का उच्चारण करने से व्यक्ति ऊब जाता है जैसे कि एक-एक प्रकार का भोजन करने से, एक-एक प्रकार के वस्त्र पहनने से व्यक्ति ऊब जाता है, ऐसे ही एक ही एक प्रकार के मंत्रों से भी ऊब जाता है। इसमें यह अवकाश है कि हम और भी अनेक अन्य प्रकार के मंत्रों को ले कर, जिसमें ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव अच्छी प्रकार से बताये गये हों और उन मन्त्रों में यह भी बताया गया हो कि उपासना के क्या लाभ क्या हैं? उन मंत्रों के माध्यम से भी ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना की जा सकती है, ऐसा कोई अनिवार्य नियम नहीं है कि केवल संस्कार विधि या पंचमहायज्ञ पुस्तक में बताये गये मंत्रों से ही ईश्वर का ध्यान हो सकता है अन्य मंत्रों, सूत्रों, श्लोकों, वाक्यों या शब्दों से नहीं हो सकती।

[स्रोत : निराकार ईश्वर की उपासना, पृ. 29-32, प्रस्तुति : भावेश मेरजा]

ईश्वर की उपासना

ईश्वर की उपासना
December 5, 2019 • Satydev ji

ईश्वर की उपासना मिथ्या विश्वास पर नहीं अपितु सत्य पर आधारित होने चाहिए। यदि कोई नमक की डली को चीनी समझने लगे तो वह चीनी नहीं बन जाएगी। मनुष्य असत्य कल्पना करे तो वह यथार्थ नहीं अपितु भ्रम कहलायेगा। मूर्ति पूजा का समर्थन करने वाले हिन्दू कब श्री राम और श्री कृष्ण को छोड़कर मुसलमानों की कब्रों में ईश्वर को खोजने लग गए मालूम ही नहीं चला। ऐसे ही साईं बाबा को भी भगवान बताने लगे मालूम ही नहीं चला। असत्य को सत्य समझने का यही दुष्प्रभाव है। हिन्दू समाज अगर वेद विदित सत्य को समझ जाये कि ईश्वर निराकार है और सभी की आत्मा में उसका वास है और उनकी पूजा करने के लिए किसी मूर्ति वा मजार की आवश्यकता नहीं है तो एक दिन में संगठित हो जाये। खेद है कि आठ सौ सालों तक मुसलमानों की मार खाने के पश्चात भी हिंदुओं को यह समझ नहीं आया कि उनकी बीमारी क्या है !!

*हवन का महत्व* 🔥 _________________

*हवन का महत्व* 🔥
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*फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमें उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः 👇*

*आम की लकड़ी पर किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है।जो कि खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओं को मारती है ।तथा वातावरण को शुद्द करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला।*
*गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है।*
*टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया की यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।*
*हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च की । क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्द होता है और जीवाणु नाश होता है ?अथवा नही ? उन्होंने ग्रंथों में वर्णिंत हवन सामग्री जुटाई और जलाने पर पाया कि ये विषाणु नाश करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा कि सिर्फ आम की लकड़ी १ किलो जलाने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए । पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी तो एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बैक्टीरिया का स्तर ९४ % कम हो गया।*
*यही नहीं उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजुद जीवाणुओ का परीक्षण किया और पाया कि कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के २४ घंटे बाद भी जीवाणुओं का स्तर सामान्य से ९६ प्रतिशत कम था। बार-बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था।*
*यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र* *(resarch journal of Ethnopharmacology 2007) में भी दिसंबर* *२००७ में छप चुकी है। रिपोर्ट में लिखा गया कि हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों एवं फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का भी नाश होता है। जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है ।*

परोपकार करने का ढंग

परोपकार करने का ढंग

December 4, 2019 • आचार्य विमलेश कुमारी बंसल आर्या

 पूरे अपने परिवार को करती हूँ समर्पित।

हम सब जीते रहें परस्पर विमल एक दूजे के हित।।

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परोपकार करने का एक सुंदर ढंग बताती हूँ।

जब करती हूँ भोजन तब भूखों पर ध्यान जमाती हूँ।

जब करती हूँ भजन तो अपने सुखके संग सबको ले आती हूँ।

जब पहनती हूँ वस्त्र, तो निर्वस्त्रों हित वस्त्र निकालती हूँ।

जब बोलती हूँ कुछ शब्द तब

गूंगों की आवाज हो जाती हूँ।

जब चलती हूँ पैदल तब

लंगड़ों की वैसाखी स्वयं को पाती हूँ।

और भी बहुत कुछ होने का मन करता है मेरा,

पर मैं स्वयं को उस विमल निर्मल धवल परमेश्वर का वरदान पाती हूँ।

नतमस्तक हो जाती हूँ।

जमीन में गढ़ गढ़ जाती हूँ।

-आचार्या विमलेश बंसल आर्या

परम पुरुष का सन्दर्शन

परम पुरुष का सन्दर्शन

स नो बन्धुर्जनिता, स विधाता, धामानि वेद भुवनानि विश्वा ।

यत्र देवा अमृतमानशानास, तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ।

         १) परम पुरुष निर्गुण, निराकार है; पर साधक योगी उसे अनन्त गुणों की खान समझकर उसकी गुण-गरिमा से निरन्तर प्रेरणा लेना चाहते हैं। मनुष्य और मनुष्य में जितने सम्बन्ध हो सकते हैं उनकी इति भी परम पुरुष में होती है। श्रद्धा और आदर से परम पुरुष के साथ अनेक प्रिय और आत्मीय सम्बन्धों की कल्पना करता हुआ साधक सोचता रहता है कि वह परमेश्वर हमारा बन्धु है हमको प्रात्मीयता के सूत्र में बांधने वाला हैहमारा जनक भी वही है उसी की प्रेरणा से यह सृष्टि गई है। वह इसको जन्म देकर इसका पोषण भी करता है । सृष्टि का धारक होने के कारण ही उसे विधाता कहा जाता है । वह. सृष्टि का नियामक है। वह सर्वज्ञ भी है । वह सब तेजोमय लोकों का जानकार है। सब भुवनों-तीन भुवनों का ज्ञान उसे होता है। उससे कुछ भी छिपा हुआ नहीं है।

        २) पिण्ड और ब्रह्माण्ड में हमारे पूर्वजों ने तीन, पांच या सात दिव्य लोकों की कल्पना की है पिण्ड में स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर की स्थिति वैसी ही है जैसे ब्रह्माण्ड में पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्य लोक की स्थिति है। इनसे ऊपर तुरीय स्थान प्रात्मा का है। ब्रह्माण्ड में धु लोक में स्थित सूर्य से ऊपर परम पद की कल्पना की जाती है । तुरीय लोक की सत्ता का आभास तृतीय धाम में ही हो सकता है इसलिए यहाँ परम बन्धु और जनक परमात्मा से उस तृतीय धाम की अोर प्रेरणा देने के लिए प्रार्थना की गई है ।

         ३) परमधाम की एक विशेषता का यहां उल्लेख किया गया है। वह यह कि उसमें देवगण अमृत का सेवन किया करते हैं। हमारा शरीर दिव्य और अदिव्य तत्त्वों के सम्मिलित सहयोग से चल रहा है। जब हम स्थूल शरीर से सम्बद्ध अदिव्य अर्थात् भौतिक पदार्थों से जुड़े रहते हैं तब हम मरणधर्मा होते हैं; किन्तु जब हम इस शरीर में व्याप्त दिव्य तत्त्वों से सम्बन्ध जोड़ लेते हैं तो हमारा जीवन भी जन्म-मरण के चक्कर से ऊपर उठ जाता है । अमर जीवन की खोज का यही मार्ग है। इस दिशा में बढ़ने के लिए साधना करनेवाले योगी देवताओं की तरह अमृत का सेवन करके अमर हो जाते है। इसके लिए प्रेरणा अपनी दिव्य शक्तियों के माध्यम से वही परम पुरुष देता हैं।

बन्धु, जनक वह और विधाता

 सब भुवनों का रखता ज्ञान ।

उसी लोक को ओर प्रेरते

(जहाँ) करते देव अमृत का पान ।

आश्रम धर्म

आश्रम धर्म

         यह मनुष्य के सम्पूर्ण सफल जीवन की शतवर्षीय योजना हैकिस प्रकार एक मनुष्य, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की परिपालना द्वारा अपने निजी जीवन को सब प्रकार से समुन्नत बनाता हुआ अपने परिवार, समाज-राष्ट्र और प्राणि-मात्र की हित साधना करता हुआ अन्ततः इसी कर्त्तव्य (धर्म) सम्पादन द्वारा प्रियतम प्रभु की शान्तिदायिनी गोद को पा सकता है- यह इस योजना का लक्ष्य है।

आश्रम धर्म

आश्रम धर्म

         यह मनुष्य के सम्पूर्ण सफल जीवन की शतवर्षीय योजना हैकिस प्रकार एक मनुष्य, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की परिपालना द्वारा अपने निजी जीवन को सब प्रकार से समुन्नत बनाता हुआ अपने परिवार, समाज-राष्ट्र और प्राणि-मात्र की हित साधना करता हुआ अन्ततः इसी कर्त्तव्य (धर्म) सम्पादन द्वारा प्रियतम प्रभु की शान्तिदायिनी गोद को पा सकता है- यह इस योजना का लक्ष्य है।