The 10 Principles of Arya Samaj

The 10 Principles of Arya Samaj
God is the original source of all that is known by spritual knowledge and the physical sciences.
God is Existent, conscious, all-beatitude, Formless, Almighty, Just, Merciful, Unbegotten, Infinite, Unchangeable, Beginningless, Incomparable, the support of All, the Lord of All, All-pervading, Omniscient and Controller of All from within, Evermature, Imperishable, Fearless, Eternal, Pure, Creator of the Universe. He alone ought to be worshipped.
The Vedas are the books of all True knowledge. It is the paramount duty of all Aryas to read them, to teach them to others, to listen to them and to recite them to others.
All persons should always be ready to accept truth and renounce untruth.
All acts ought to be performed in conformity to Dharma(righteousness) i.e. after due consideration of truth and untruth.
The primary object of Arya Samaj is to do good to the whole world, i.e. to promote physical, spiritual and social progress of all humans.
Your dealings with all should be regulated by love and due justice, in accordance with the dictates of Dharma(righteousness).
Avidya(illusion and ignorance) be dispelled, and Vidya(realisation and acquisition of knowledge) should be promoted.
None should remain satisfied with his own progress only, but incessantly strive for the social upliftment, realizing his own benefitin the advancement of all others.
All men ought to dedicate themselves necessarily for the social good and the well being of all, subordinating their personal interest, while the individual is free to enjoy the freedom of action for individual being.

“मनुष्य को ईश्वर और आत्मा के सत्यस्वरूप को जानना चाहिये”

ओ३म्
“मनुष्य को ईश्वर और आत्मा के सत्यस्वरूप को जानना चाहिये”
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मनुष्य एक ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम प्राणी को कहते हैं। मनुष्य नाम मनुष्य के मननशील व सत्यासत्य का विवेक करने के कारण पड़ा है। वेदों में मनुष्य के लिए कहा गया है ‘मनुर्भव’ अर्थात् ‘हे मनुष्य! तू मनुष्य बन।’ इसका अर्थ है कि परमात्मा ने सभी मनुष्यों को प्रेरणा की है कि तुम मननशील अर्थात् सत्य व असत्य का विचार करने वाले तथा सत्य को जानकर उसको आचरण में लाने वाले बनों। जो मनुष्य ऐसा करते हैं वह भाग्यशाली हैं और अपने मनुष्य होने के कर्तव्य को पूरा करते हैं। कुछ व बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जिन्होंने कुछ मौलिक प्रश्नों पर कभी विचार ही नहीं किया होता। ऐसे मौलिक प्रश्न अनेक हैं परन्तु कुछ मुख्य प्रश्न हैं हम कौन हैं? यह संसार किससे, कब व कैसे अस्तित्व में आया? हमारे कर्तव्य क्या हैं? इस जन्म से पहले हमारा अस्तित्व था या नहीं? मृत्यु के बाद आत्मा रहता है या नहीं? मरने के बाद यदि जीवात्मा रहता है तो उसकी क्या गति व स्थिति होती है? मनुष्यों के जीवन में जो दुःख आते हैं उनसे वह कैसे मुक्त हो सकता है? परमात्मा और आत्मा के परस्पर क्या सम्बन्ध हैं? परमात्मा और आत्मा का सत्यस्वरूप तथा इनके गुण, कर्म व स्वभाव क्या हैं? ऐसे अनेक प्रश्न हो सकते हैं जिनके सत्य उत्तर प्रत्येक मनुष्य को ज्ञात होने चाहिये परन्तु ऐसा देखने में आता है कि इन प्रश्नों के सत्य उत्तर तो हमारे बड़े बड़े आचार्यों एवं विद्वानों को भी पता नहीं है फिर सामान्य मनुष्य से इनकी अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

ऐसा नहीं है कि इन प्रश्नों के उत्तर विद्यमान व सुलभ नहीं है। इन प्रश्नों के सत्य व यथार्थ उत्तर मत-मतान्तरों के ग्रन्थों में या तो हैं नहीं और यदि हैं तो वह अविद्या से युक्त व भ्रम उत्पन्न करने वाले हैं। ऐसे कुछ प्रश्नों के उत्तर जानने के लिये ही ऋषि दयानन्द (1825-1883) ने लगभग सन् 1846 में अपना पितृगृह छोड़ कर सत्य का अनुसंधान किया था। वह लगभग 17 वर्षों के तप, पुरुषार्थ, अध्ययन, खोज, योगाभ्यास तथा वेद-वेदांगों के अध्ययन से इन प्रश्नों सहित जीवन की प्रायः सभी शंकाओं के उत्तर जानने में समर्थ हुए थे। उन्होंने ज्ञान, विद्या व योगाभ्यास से न केवल आत्मा, परमात्मा तथा सृष्टि विषयक प्रश्नों के उत्तरों को जाना था अपितु आत्मा तथा परमात्मा का साक्षात्कार भी किया था। विद्या प्राप्त कर तथा ईश्वर का साक्षात्कार कर वह निभ्र्रान्त हुए थे और अपने कर्तव्य को जानकर उन्होंने देश व समाज से अविद्या, अज्ञान तथा मिथ्या विश्वासों को दूर कर देश व समाज को सत्य विद्याओं से युक्त करने का संकल्प लिया था जिसे उन्होंने अपूर्व रीति से वेद प्रचार, ग्रन्थ लेखन, शास्त्रार्थ, समाज सुधार, अन्धविश्वास तथा कुरीतियों के उन्मूलन आदि कार्यों को करके पूरा किया। हम जब विचार करते हैं तो पाते हैं कि महाभारत युद्ध के बाद वेदों के विलुप्त होने वा ऋषि परम्पराओं के समाप्त होने के कारण देश में अविद्या का प्रसार हुआ था। इसी कारण से देश में अविद्या व अन्धविश्वासों सहित सामाजिक कुरतियों का प्रचार हुआ। ऋषि दयानन्द ने महाभारत युद्ध, जो पांच हजार वर्ष पूर्व हुआ था, पहले ऐसे ऋषि उत्पन्न हुए जिन्होंने वेदों को प्राप्त कर अपनी विद्या से उनके सत्य अर्थों का प्रकाश व प्रचार किया। उनके इस कार्य से देश देशान्तर के मनुष्य सामान्य व गूढ़ विषयों से सम्बन्धित सबके जानने योग्य प्रश्नों व शंकाओं का समाधान प्राप्त कर सकेे।

ऋषि दयानन्द ने अविद्या को दूर करने के लिये सत्यार्थप्रकाश नामक एक प्रमुख प्रतिनिधि ग्रन्थ का प्रणयन किया। इस एक ग्रन्थ से ही विश्व में विद्यमान अधिकांश अविद्या को दूर करने में सहायता मिलती है। ऋषि दयानन्द ने इस ग्रन्थ को लिखने से पूर्व व इसके बाद भी देश देशान्तर में घूम कर वेदों व वैदिक ज्ञान का प्रचार किया। सभी लोगों व मताचार्यों की शंकाओं का समाधान किया। मूर्तिपूजा, अवतारवाद, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध, सामाजिक भेदभाव तथा जन्मना जातिव्यवस्था आदि का विरोध किया और इनके वैदिक सत्य समाधान प्रस्तुत किये। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के अतिरिक्त ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका तथा ऋग्वेद (आंशिक) तथा यजुर्वेद (सम्पूर्ण) का वेदभाष्यों सहित संस्कार विधि, पंचमहायज्ञविधि, आर्याभिविनय, व्यवहारभानू, गोकरुणानिधि आदि अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों को लिखा। संस्कृत अध्यापन हेतु आर्ष व्याकरण के ग्रन्थों का भी प्रणयन व प्रकाश भी ऋषि दयानन्द जी ने किया। उनके विद्या गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती तथा उन्होंने ही विलुप्त आर्ष व्याकरण अष्टाध्यायी-महाभाष्य-निरुक्त प्रणाली को पुनर्जीवित किया। आज भी इस आर्ष व्याकरण प्रणाली से आर्यसमाज के गुरुकुलों में अध्यापन होता है जिससे अद्यावधि सहस्रों विद्वान तैयार हुए हैं। ऋषि दयानन्द के प्रचार व अविद्या दूर कर विद्या का प्रकाश करने के परिणामस्वरूप ऋषि की शिष्य परम्परा से हमें चारों वेदों सहित अनेक आर्ष प्राचीन ग्रन्थों के हिन्दी भाष्य तथा सहस्रों की संख्या आर्य ग्रन्थ व साहित्य प्राप्त हुआ है।

ऋषि दयानन्द के शिष्यों ने हजारों की संख्या में ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना आदि विषयक भजनों व गीतों सहित अनेक विषयों के गीत आदि भी लिखे हैं जिन्हें आर्यसमाज के अनुयायियों व इतर लोगों द्वारा गाया जाता है। ऋषि दयानन्द ने देश व समाज को सच्ची ईश्वरोपासना की विधि भी सिखाई है। इस हेतु उन्होंने पंचमहायज्ञ विधि लिख कर सन्ध्या तथा देवयज्ञ अग्निहोत्र का देश देशान्तर में प्रचार किया। आज भी देश देशान्तर में उनके अनुयायी प्रतिदिन सन्ध्या व देवयज्ञ सहित सभी पंचमहायज्ञों को करते हैं जिससे समाज में सात्विक विचारों की वृद्धि तथा वातावरण एवं पर्यावरण की रक्षा होती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऋषि दयानन्द के कार्य व विचारों से हम मनुष्य के जानने योग्य सभी दुर्लभ महत्वपूर्ण प्रश्नों के सत्य उत्तरों व समाधान को प्राप्त हुए हैं। उनका दिया हुआ ज्ञान मनुष्य जाति की सबसे बड़ी सम्पदा है। यह सत्य है कि धन व सम्पत्ति का महत्व होता है, इससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता परन्तु यह भी सत्य है कि मनुष्य के लिए सत्य ज्ञान व विद्या से बढ़कर कोई पदार्थ नहीं है। यह अमृत तुल्य सत्य ज्ञान यदि हमें महाभारत युद्ध के बाद किसी एक पुरुष व विद्वान से मिला है तो वह व्यक्ति केवल महर्षि दयानन्द सरस्वती हैं। उनकी शिष्य परम्परा के विद्वानों ने भी उनके ज्ञान की व्याख्या व विस्तार कर देश व समाज की प्रशंसनीय सेवा की है। अतः ऋषि दयानन्द का मानव जाति सहित देश व समाज की उन्नति में अपूर्व व सर्वाधिक योगदान है। उनकी सभी मान्यतायें वेदों पर आधारित होने के साथ साथ आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भी प्रासंगिक एवं सर्वाधिक उपयोगी हैं। इनके मार्गदर्शन लेने व इनको अपनाने से मुनष्य की सर्वांगीण उन्नति होती है। इससे मनुष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त होते हैं।

मनुष्य क्या है, इस प्रश्न पर विचार करने से विदित होता है कि मनुष्य एक मननशील प्राणी है। जीवित मनुष्य का शरीर उक सत्य, चेतन, अल्पज्ञ जीवात्मा तथा जड़ प्राकृतिक पदार्थों से निर्मित शरीर का अद्भुत संयोग है जो अपौरुषेय सत्ता ईश्वर द्वारा कराया जाता है। ईश्वर एक सत्य, चेतन तथा आनन्दस्वरूप सत्ता है। ईश्वर निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य और पवित्र है। इस स्वरूप वाले ईश्वर से ही हमारी यह सृष्टि बनी है व उसी के द्वारा इसका पालन हो रहा है। ईश्वर सभी चेतन, अल्पज्ञ तथा एकदेशी सत्ता जीवात्माओं के पिता व स्वामी के तुल्य हैं। जीवात्मा को सुख व मोक्ष प्रदान करने में सहायक होने के लिये वह जीवों के लिये इस सृष्टि की रचना व पालन करते हैं। जीवात्मा का स्वरूप सत्य, चित्त, एकदेशी, अल्पज्ञ, ससीम, जन्म व मृत्यु को प्राप्त होने वाली, कर्म करने में स्वतन्त्र तथा फल भोगने में परतन्त्र सत्ता है। आत्मा अनादि, नित्य, अमर तथा अविनाशी है। अनादि काल से इसका जन्म व पुनर्जन्म का चक्र निरन्तर चल रहा है। मोक्ष पर्यन्त जीवात्मा का जन्म व मृत्यु क्रमशः होते रहते हैं।

जीवात्मा के कल्याण के लिये सृष्टि के आदि में परमात्मा वेदों का ज्ञान देते हैं। यह वेद ज्ञान आज भी अपने मूल स्वरूप में सुलभ है। परमात्मा का दिया वेद ज्ञान सब सत्य विद्याओं का पुस्तक वा ग्रन्थ है। इससे मनुष्य को अपने सभी कर्तव्यों का बोध होता है। निषिद्ध कर्मों का बोध भी वेदों में कराया गया है। मनुष्य को शुद्ध विचारों वाला तथा शुद्ध अन्न व भोजन का सेवन करने वाला होना चाहिये। इसी से आत्मा, मन व बुद्धि की उन्नति होती है। मांसाहार सर्वथा त्याज्य एवं निन्दनीय है। इससे मनुष्य की आत्मा का पतन होता है। सभी मनुष्यों का कर्तव्य है कि वेदों व वैदिक मान्यताओं का अध्ययन व स्वाध्याय करें। ऋषियों की मान्यता है कि मनुष्य को प्रतिदिन नियमित रूप से सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय कर अपना ज्ञान बढ़ाना चाहिये। ऐसा करने से हमारी सभी शंकाओं का स्वतः समाधान हो जाता है। सभी मनुष्यों को महर्षि दयानन्द जी का जीवन चरित्र भी पढ़ना चाहिये। इससे भी जीवन उन्नति की प्रेरणा मिलती है और अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का स्वाध्याय तो सभी मनुष्यों को अनिवार्य रूप से करना चाहिये। इसके अध्ययन से मनुष्य की ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति, कर्तव्य, अकर्तव्य, जीवन के उद्देश्य, उपासना आदि सभी शंकायें दूर हो जाती है। मनुष्य की आत्मा की उन्नति होकर योगाभ्यास आदि कर मनुष्य मोक्ष तक को प्राप्त हो सकता है। अतः मनुष्य जीवन में सभी उचित कार्यों को करते हुए मनुष्यों को वेदादि ग्रन्थों के स्वाध्याय एवं तदनुकूल आचरण कर अपने जीवन को उत्तम व आदर्श बनाना चाहिये। यह सत्य है कि वेद, वेदानुकूल ग्रन्थों सहित सत्यार्थप्रकाश के अध्ययन से ईश्वर व जीवात्मा सहित इस सृष्टि का सत्यस्वरूप जाना जाता है। अतः संसार को वेद, वैदिक साहित्य एवं सत्यार्थप्रकाश की शरण में आना चाहिये। इसी से विश्व व मनुष्य जाति का कल्याण होगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
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एक नगर में एक मशहूर चित्रकार रहता था ।

एक नगर में एक मशहूर चित्रकार रहता था ।

चित्रकार ने एक बहुत सुन्दर त स्वीर बनाई और उसे नगर के चौराहे मे लगा दिया और नीचे लिख दिया कि जिस किसी को , जहाँ भी इस में कमी नजर आये वह वहाँ निशान लगा दे ।

जब उसने शाम को तस्वीर देखी उसकी पूरी तस्वीर पर निशानों से ख़राब हो चुकी थी । यह देख वह बहुत दुखी हुआ । उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे वह दुःखी बैठा हुआ था ।

तभी उसका एक मित्र वहाँ से गुजरा उसने उस के दुःखी होने का कारण पूछा तो उसने उसे पूरी घटना बताई । उसने कहा एक काम करो कल दूसरी तस्वीर बनाना और उस मे लिखना कि जिस किसी को इस तस्वीर मे जहाँ कहीं भी कोई कमी नजर आये उसे सही कर दे ।

उसने अगले दिन यही किया । शाम को जब उसने अपनी तस्वीर देखी तो उसने देखा की तस्वीर पर किसी ने कुछ नहीं किया ।

वह संसार की रीति समझ गया । “कमी निकालना , निंदा करना , बुराई करना आसान , लेकिन उन कमियों को दूर करना अत्यंत कठिन होता है
” This is life……..

जब दुनिया यह कह्ती है कि
‘हार मान लो’
तो आशा धीरे से कान में कह्ती है कि.,,,,
‘एक बार फिर प्रयास करो’
और यह ठीक भी है..,,,
“जिंदगी आईसक्रीम की तरह है, टेस्ट करो तो भी पिघलती है;.,,,

वेस्ट करो तो भी पिघलती है,,,,,,
इसलिए जिंदगी को टेस्ट करना सीखो,
वेस्ट तो हो ही रही है.,,,
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सुझाव देना बहुत कठिन और खतरनाक काम है

सुझाव देना बहुत कठिन और खतरनाक काम है। सब को सुझाव देने का अधिकार भी नहीं है, इसलिए अनधिकार चेष्टा न करें।
अभी कुछ दिन पहले मैंने अपने संदेश में लिखा था कि भारत में बिना पूछे, बिना मांगे सुझाव देने की लोगों को बहुत बीमारी है। बार-बार उन्हें खुजली उठती है सुझाव देने की।
क्योंकि लोग दूसरों का सुझाव सुनना नहीं चाहते। और बिना पूछे, बिना मांगे ही उन्हें रोज सुझाव दिए जाते हैं। इसलिए वे इन सुझावों से तंग आकर इस क्रिया को खुजली और बीमारी के नाम से बोलकर, अपना गुस्सा कुछ ठंडा कर लेते हैं। तो क्यों न इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए।
जब कोई दूसरा व्यक्ति आपको बिना मांगे, बिना पूछे सुझाव देता है, तब आपको अच्छा नहीं लगता। क्या यही बात आप दूसरों के लिए नहीं सोच सकते, कि जैसे आपको दूसरे का बिना मांगा हुआ सुझाव अच्छा नहीं लगता, तो दूसरे को भी बिना मांगे आपका सुझाव सुनने पर अच्छा कैसे लगेगा? इसलिए विचार करें और बिना मांगे, बिना पूछे दूसरों को सुझाव न दें।
सुझाव देते समय प्राय: बड़ी-बड़ी 3 गलतियां होती हैं। उन गलतियों को समझने का प्रयास करें और उन गलतियों से बचें।
पहली गलती — बिना पूछे, बिना मांगे किसी को सुझाव देना। विदेशों में ऐसा देखा जाता है कि जब भी कोई व्यक्ति किसी को सुझाव देना चाहता है, तो वह एक्सक्यूज मी, इन शब्दों से पहले पूछता है, क्या मैं आपको सुझाव दे सकता हूं? यदि दूसरा व्यक्ति कहे कि — हां मैं सुनना चाहता हूं। तब वह अपना सुझाव उसको देता है। ऐसे ही आप सब को भी भारत में यदि किसी को सुझाव देना हो, तो पहले उससे पूछना चाहिए। कि मैं आपको इस विषय में एक सुझाव देना चाहता हूं. क्या आप मेरा सुझाव सुनना चाहते हैं? यदि वह कहे कि – हां बताइए. तभी आप अपना सुझाव दें। बिना पूछे न दें। अथवा वह सामने से कहे, कि इस विषय में आप मुझे कुछ सुझाव दीजिए. तो आप सुझाव दे सकते हैं।
दूसरी गलती — अपने से अधिक योग्य व्यक्ति या बड़े अधिकारी को सुझाव देना। जब आप सुझाव देवें, तो पहले यह अवश्य देख लें, कि आप किसे सुझाव दे रहे हैं? जिस व्यक्ति को आप सुझाव देना चाहते हैं, यदि वह व्यक्ति आप से अधिक विद्वान है, अधिक अनुभवी है, या बड़ा अधिकारी है, तो उसे आप सुझाव न दें। प्राय: लोग ऐसी गलती करते हैं। यदि कोई रोगी व्यक्ति किसी ऊंचे अनुभवी डॉक्टर साहब को चिकित्सा के मामले में सुझाव देवे, तो क्या यह उचित है? क्या कोई पुलिस कांस्टेबल, डीएसपी साहब को या आईजी साहब को पुलिस सुरक्षा संबंधी सुझाव दे सकता है? क्या कोई चपरासी, बैंक के मैनेजर को अकाउंट्स लिखने के मामले में सुझाव दे सकता है? यदि नहीं। तो सब लोगों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए।
तीसरी गलती — बिना प्रमाण तर्क के सुझाव देना। जब लोग किसी विषय में कुछ खास जानते नहीं, उस विषय का उन्होंने अध्ययन नहीं किया, कोई विशेष अनुभव भी नहीं है, ऐसे अनेक क्षेत्रों में भी हमने देखा है, कि लोग बिना प्रमाण के, बिना तर्क के, यूं ही अपनी डेढ़ अक्ल लगाते रहते हैं। और बिना सिर पैर के, उल्टे-सीधे सुझाव देते रहते हैं। रोज ही अनेक मैसेज आप whatsapp आदि पर देखते होंगे, जिनमें यह लिखा रहता है कि इस नुस्खे से आपका यह रोग दूर हो जाएगा। अब न तो मैसेज भेजने वाले का चिकित्सा विज्ञान में कोई अनुभव है, न वह डिग्री प्राप्त प्रशिक्षित चिकित्सक है। सिर्फ मैसेज फॉरवर्ड करके अपना नाम कमाना चाहता है, यह उचित नहीं है। इस प्रकार के मैसेज या अनुभव हीन सुझावों से लाभ तो कुछ होता नहीं, बल्कि सुझाव सुनने वाले का क्रोध और अधिक बढ़ जाता है। तो इस तीसरी गलती से भी बचना चाहिए।
एक और उदाहरण — एक बिजली का कारीगर बिजली ठीक कर रहा था। तो किसी अनाड़ी व्यक्ति ने बिना सोचे समझे उसे सुझाव देने शुरू कर दिए। उस कारीगर को और अधिक गुस्सा आया। वह मन ही मन में सोचने लगा कि इस मूर्ख को बिजली का कुछ पता तो है नहीं। और यह मुझे बिना सिर पैर के सुझाव दे रहा है। कितना मूर्ख है यह।
तो इस प्रकार से सोचना चाहिए। यदि आप किसी विषय में किसी व्यक्ति को सुझाव दे रहे हैं, और उस विषय में आपके पास कोई प्रमाण तर्क है नहीं, कोई अनुभव है नहीं, तो उस विषय में सुझाव नहीं देना चाहिए। बल्कि मौन रहकर उस कार्य को सीखना चाहिए। बिना सीखे, बिना सोचे समझे किसी को भी, कुछ भी सुझाव नहीं देना चाहिए।
परंतु आप भी ऐसा अनुभव करते होंगे कि, लोग इन तीनों गलतियों को करते रहते हैं, रुकते ही नहीं। स्वयं पर संयम नहीं रखते और बिना सोचे समझे, किसी को भी, बिना प्रमाण तर्क का कुछ भी सुझाव देते ही रहते हैं। कृपया इस खुजली या बीमारी से बचने का प्रयास करें। दूसरों की दृष्टि में मूर्ख न कहलाएं। व्यर्थ में अपनी खिल्ली न उड़वाएं। ऐसे बेढ़ंगे सुझाव देने पर यदि किसी दिन, किसी ने आपको डांट दिया, तब आप को बहुत कष्ट होगा।
– स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक

संसार में सुख दुख तो आते रहते हैं। इसका नाम ही तो संसार है।

संसार में सुख दुख तो आते रहते हैं। इसका नाम ही तो संसार है। सुख में सुखी न हों, दुख में दुखी न हों। इसी में जीवन की सफलता है।
महर्षि कपिल जी ने सांख्यदर्शन में बताया है कि संसार उसे कहते हैं जहां हर समय राग द्वेष का व्यवहार चलता ही रहता है। कहीं शरीर में, कहीं वाणी में, और कहीं मन में। यदि वाणी और शरीर से राग द्वेष का व्यवहार रुक भी जाए, तो भी मन में तो चलता ही रहता है।
जिस व्यक्ति ने संसार में जन्म लिया है, वह अनेक सुख भी भोगता और दुखों से भी पीड़ित होता है। और जब जीवन में सुख दुख आते हैं, तो राग द्वेष होना स्वाभाविक है। उस राग द्वेष से फिर आगे अच्छे बुरे कर्म होते हैं। और उन कर्मों से फिर अगला जन्म तथा फिर से सुख-दुख मिलता है। इस प्रकार से यह चक्र लगातार चलता ही रहता है। सुख-दुख, राग द्वेष, शुभ कर्म अशुभ कर्म, इन छह चीजों का चक्र हमेशा से चल रहा है, और आगे भी अनंत काल तक चलता रहेगा। इसी चक्र का नाम संसार चक्र है।
क्या इस चक्र से छूटने का कोई उपाय है? जी हां। मोक्ष प्राप्ति एक उपाय है। कोई व्यक्ति यदि मोक्ष प्राप्त कर लेवे, तो इन 6 वस्तुओं के चक्र से बाहर निकल जाएगा। जन्म मरण चक्र से भी छूट जाएगा। इन दोनों चक्रों से जब छूट जाएगा, इसी का नाम मोक्ष है। मोक्ष में आत्मा सब प्रकार के दुखों से रहित हो जाता है, और ईश्वर के आनंद को बहुत लंबे समय तक भोगता है।
जब तक मोक्ष नहीं होता, तब तक संसार में रहना होगा। और संसार में रहते हुए जब जब ये सुख दुख, राग द्वेष की परिस्थितियां आएंगी, इनसे युद्ध करना होगा। जो व्यक्ति इनसे युद्ध करके जीत जाएगा, वही इस चक्र से पार हो पाएगा, छूट पाएगा।
प्रश्न — तो इनसे कैसे युद्ध किया जाए? उत्तर — जब सुख आए तो बहुत उछलना नहीं, कूदना नहीं, नाचना नहीं, बहुत खुशी नहीं मनाना। उसे सामान्य रूप से निभा लेना। इसी प्रकार से जब दुख आए, तब दुखी परेशान चिंतित नहीं होना।
ऐसी स्थितियों में यह सोचना चाहिए, कि यह तो संसार है, सुख आता है, चला जाता है। दुख भी आया है, यह भी चला जाएगा। न तो सुख सदा हमारे साथ रहता है, न ही यह दुख सदा हमारे साथ रहेगा। इस प्रकार का चिंतन करके सुख-दुख को समान भाव से स्वीकार करना चाहिए। इस प्रकार से इन सुख दुख, राग द्वेष आदि शत्रुओं से युद्ध करना चाहिए।
यह कठिन कार्य है। यदि व्यक्ति ईमानदारी से पुरुषार्थ करे, तो धीरे-धीरे चिंतन करते-करते वह लंबे समय में, ऊपर बताई विधि के अनुसार, ऐसा युद्ध करने में समर्थ हो जाएगा, और वह इस युद्ध में जीत भी जाएगा।
तो सार यह हुआ कि, इस प्रकार से जीवन में किसी भी घटना के होने पर, अधिक प्रसन्न भी न होवें, और दुखी परेशान चिंतित भी न होवें। अपने मन की स्थिति को नियंत्रित रखें। ईश्वर की उपासना करें, विशेष रूप से दुःख की घटनाओं में। ईश्वर से आपको बहुत शक्ति मिलेगी, और आप इस कार्य में सफल हो जाएंगे।
– स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक
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यज्ञमय शाकाहार युक्त वैदिक जीवन ही सर्वोत्तम जीवन है

ओ३म्
“यज्ञमय शाकाहार युक्त वैदिक जीवन ही सर्वोत्तम जीवन है”
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वेद सृष्टि के प्राचीनतम ग्र्रन्थ हैं। वेदों के अध्ययन से ही मनुष्यों को धर्म व अधर्म का ज्ञान होता है जो आज भी प्रासंगिक एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वर्तमान में संसार में जो मत-मतान्तर प्रचलित हैं वह सब भी वेद की कुछ शिक्षाओं से युक्त हैं। उनमें जो अविद्यायुक्त कथन व मान्यतायें हैं वह उनकी अपनी हैं। वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है। यह ज्ञान ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को दिया था। ईश्वर एक सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अनादि, नित्य, अविनाशी तथा अमर सत्ता है। इस सृष्टि की रचना भी परमात्मा ने ही की है और इसका पालन भी सर्वव्यापक तथा सब जीवों व प्राणियों का पिता सर्वेश्वर ही कर रहा है। सर्वज्ञ व सर्वव्यापक होने से परमात्मा इस संसार, ब्रह्माण्ड वा विश्व के बारे में सब कुछ जानता है। मनुष्य कितना भी ज्ञान प्राप्त कर लें, यहां तक की उपासना आदि से ईश्वर का साक्षात्कार भी कर लंे, परन्तु वह परमात्मा के समान ज्ञानवान नहीं हो सकते। ईश्वर प्रदत्त वेदज्ञान का अध्ययन करने पर उसमें ईश्वर की सर्वज्ञता का बोध व दर्शन होते हैं।

वेदों का अध्ययन कर ही हमारे ऋषियों ने एक मत होकर, सृष्टि के विगत 1.96 अरब वर्षों के इतिहास में, सभी मनुष्यों के पांच प्रमुख कर्तव्य बताये हैं जिन्हें वह पंचमहायज्ञ कहा जाता है। इन पंचमहायज्ञों के नाम हैं ईश्वरोपासना वा सन्ध्या, देवयज्ञ अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा बलिवैश्वदेवयज्ञ। इन पंचमहायज्ञों से युक्त होने के कारण ही वैदिक धर्म व संस्कृति यज्ञमयी संस्कृति कही जाती है। हमें यज्ञ शब्द के अर्थ का ज्ञान भी होना चाहिये। यज्ञ श्रेष्ठतम व सत्यज्ञान से युक्त कर्मों को कहते हैं। परोपकार व सुपात्रों को दान देना भी यज्ञ में सम्मिलित है। यज्ञ का एक अर्थ विद्वान चेतन देवों की पूजा व सत्कार करना होता है। चेतन देवों माता, पिता व विद्वानों सहित पृथिवी, अग्नि, वायु, जल, आकाश आदि जड़ देवों की पूजा अर्थात् इनका सत्कार व इनसे लाभ प्राप्त करना, संगतिकरण तथा दान देना भी होता है। अग्निहोत्र यज्ञ में देवपूजा, संगतिकरण तथा दान का अच्छा समावेश रहता है। यज्ञ में विद्वानों को आमंत्रित किया जाता है और उनसे सदुपदेश प्राप्त किया जाता है। यज्ञ में हम जो घृत तथा साकल्य की आहुतियां देते हैं उनसे जड़ देवताओं का सत्कार होता है तथा प्रकृति व पर्यावरण का सन्तुलन बना रहता है। अग्निहोत्र यज्ञ से वायु व जल आदि की शुद्धि, रोगकारी किटाणुओं का नाश तथा मनुष्य आदि प्राणी रोगों से रहित तथा स्वस्थ रहते हैं। यज्ञ में वेदमंत्रों से ईश्वर की उपासना की जाती है जिससे वेदमंत्रों के अर्थों के अनुरूप परमात्मा हमारी प्रार्थनाओं को हमारी पात्रता के अनुसार पूरी करते हैं। यज्ञ से सब कामनाओं की पूर्ति एवं स्वर्ग की प्राप्ति होनी कही जाती है जो विचार करने पर सत्य एवं व्यवहारिक प्रतीत होती है। यज्ञ की इन सब व अन्य विशेषताओं के कारण ही परमात्मा ने वेदों में यज्ञ करने की प्रेरणा की है जिसे जानकर हमारे प्राचीन व अर्वाचीन ऋषियों व विद्वानों ने देश देशान्तर में यज्ञों का प्रचार किया था। आज भी वैदिक धर्म और ऋषि दयानन्द के अनुयायी आर्यसमाज संगठन से जुड़े बन्धु यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं तथा यज्ञ से होने वाले लाभों को प्राप्त करते हैं। यज्ञ करने से मनुष्य रोगरहित तथा स्वस्थ एवं अभावों से रहित हो जाते हंै। यज्ञकर्ता सुखी एवं ज्ञान विज्ञान सहित होकर सामाजिक जीवन में भी उन्नति को प्राप्त करते हैं।

परमात्मा ने यह सृष्टि अपनी सनातन व शाश्वत जीवात्मारूपी प्रजा के लिये ही बनाई है। हम संसार में सुखों का भोग करते हैं जिसका आधार परमात्मा व उसकी सृष्टि ही है। हमारा शरीर भी हमें परमात्मा से ही प्राप्त होता है। सभी प्रकार के अन्न व भोजन आदि भी हमें परमात्मा द्वारा बनाये चराचर जगत से ही प्राप्त होते हैं। अतः हमारा कर्तव्य होता है कि हम ईश्वर का ध्यान करें, उसे जानें, वेदाध्ययन करें, वेद में प्रस्तुत ईश्वर के सत्य स्वरूप को जानकर उसकी उपासना करें और सदा उसके कृतज्ञ बने रहे। ईश्वर का ध्यान करने से मनुष्य को अनेक लाभ होते हैं। उसकी आत्मा को ज्ञान प्राप्त होता है व उसमें उत्तरोत्र वृद्धि होती है, बल की प्राप्ति होती है, सद्प्रेरणायें मिलती हंै तथा ईश्वर उपासकों की रक्षा करता है। ईश्वर की उपासना से मनुष्य दुःखों से छूटकर सुखों को प्राप्त होते हैं। ऐसे अनेकानेक लाभ ईश्वर का सत्यज्ञान प्राप्त कर उसकी उपासना करने से होते हैं।

ईश्वर ने ही हमें यह श्रेष्ठ मानव शरीर दिया है। वही हमें परजन्मों में भी हमारे कर्मों के अनुसार जन्म, जीवन व आत्मा को सुख प्रदान करने वाले शरीर आदि देगा। यह क्रम अनन्त काल तक चलना है और हम अनादि व अमर होने के कारण ईश्वर से अनन्त काल तक वर्तमान जीवन के समान लाभान्वित होंगे। ईश्वर के जीवात्माओं पर इतने अधिक उपकार हैं कि कोई भी मनुष्य ईश्वर के उपकारों की गणना नहीं कर सकता। अतः ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होकर उसका ध्यान व उपासना करना तथा सभी प्रकार के अज्ञान, अन्धविश्वासों व पाखण्डों से दूर रहना हम सब मनुष्यों का कर्तव्य होता है। हमें सावधान रहकर अपने कर्तव्यों को जानकर उनका पालन करना चाहिये। ऐसा करने से ही हम ईश्वर की सत्य उपासना करते हैं और इससे हमें जीवन में ज्ञान, सुख, धन, सम्पत्ति, जीवनोन्नति तथा ईश्वर साक्षात्कार आदि ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है। यही सब ऐश्वर्य मनुष्य के लिये जीवन में प्राप्तव्य होते हैं। मनुष्य को ईश्वर उपासना सहित अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, अतिथि यज्ञ एवं बलिवैश्वदेव यज्ञ का भी नित्य प्रति सेवन करना चाहियें। इसके लिये हमें सत्यार्थप्रकाश, पवंचमहायज्ञविधि, संस्कारविधि आदि ग्रन्थों को पढ़ना चाहिये जिससे हमें पंचमहायज्ञों तथा यज्ञमय जीवन पद्धति का परिचय व ज्ञान हो सकेगा।

परमात्मा ने मनुष्य को दूसरे प्राणियों पर उपकार करने के लिये बनाया है। हमें ध्यान रखना होता है कि हमारे किसी कर्म से किसी भी प्राणी को अकारण पीड़ा न हो। अहिंसा का अर्थ भी वैर त्याग तथा दूसरे प्राणियों को अपने समान समझकर उरसे प्रेम व सत्कार का व्यवहार करने से पूरा व सिद्ध होता है। शाकाहार से किसी प्राणी को पीड़ा नहीं होती जबकि मांसाहार करने से जिन प्राणियों के मांस का भक्षण किया जाता है, उन्हें अकारण असहनीय पीड़ा होती है। वेदों में मांस भक्षण का विधान कहीं नहीं है। वेद विरुद्ध व्यवहार व कार्य सब मनुष्यों के लिए अकर्तव्य होते हैं। ज्ञान व विज्ञान के अनुरूप मनुष्य के स्वस्थ जीवन के लिए शाकाहार ही उत्तम भोजन होता है। शाकाहारी प्राणियों का जीवन मांसाहारी प्राणियों की तुलना में अधिक लम्बा होता है। हाथी व अश्व आदि बलशाली प्राणी शाकाहारी ही होते हैं। मांसाहार से अनेक रोगों की सम्भावना होती है। मांसाहार ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध अकर्तव्य एवं पापकर्म होता है जिसका फल मनुष्य को परमात्मा की न्याय व्यवस्था से जन्म जन्मान्तरों में भोगना पड़ता है।

हमारे महापुरुष श्री राम, श्री कृष्ण तथा ऋषि दयानन्द जी शाकाहारी थे तथा अपूर्व ज्ञान व बल से सम्पन्न थे। हनुमान तथा भीष्म पितामह भी अतुल बलशाली थे और भोजन की दृष्टि से शाकाहारी ही थे। अतः मनुष्यों को मांसाहार का त्यागकर शाकाहार को ही अपनाना चाहिये। यही जीवन सुख व उन्नति का आधार होता है। यदि हम अपने जीवन को यज्ञमय व शाकाहार से युक्त रखेंगे तो निश्चय ही हमारा कल्याण होगा। इसी कारण से हमें सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना चाहिये। अपने सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य का विचार करके करने चाहियें। ऐसा करेंगे तो निश्चय ही हमें मांसाहार का त्याग करना होगा और शाकाहार को अपनाना होगा। हमें सत्य मार्ग वेदपथ पर चल कर अपने जीवन को उन्नत व इसके प्रयोजन मोक्ष प्राप्ति को सिद्ध करने वाला बनाना चाहिये। इसी लिये परमात्मा ने इस सृष्टि को बनाकर आरम्भ में ही मनुष्यों को वेदज्ञान दिया था। वेद अध्ययन व अध्यापन करने के ग्रन्थ हंै। हम इनका जितना अध्ययन करेंगे उतना ही अधिक लाभ प्राप्त करेंगे और यदि अध्ययन नहीं करेंगे तो ईश्वर की आज्ञा भंग करने वाले होंगे। अतः हमें वेदाध्ययन व वेदों का स्वाध्याय करते हुए अपने जीवन को यज्ञमय बनाकर तथा शाकाहारी भोजन करते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिये। यही जीवन पद्धति श्रेष्ठ व सर्वोत्तम है। हमें सर्वोत्तम को ही अपनाना व आचरण में लाना चाहिये। वेदों का अध्ययन व वेदों के अनुसार ही आचरण करना सब मनुष्यों का ईश्वर प्रदत्त धर्म व कर्तव्य है। हमें इसे जानना चाहिये और इसी को अपनाना चाहिये जिससे हमें सुखों की प्राप्ति होने सहित जन्म जन्मान्तरों में हमारा कल्याण हों। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

आत्मा, अनादि, अविनाशी व जन्म-मरण धर्मा है तथा मोक्ष की कामना से युक्त है

ओ३म्
“आत्मा, अनादि, अविनाशी व जन्म-मरण धर्मा है तथा मोक्ष की कामना से युक्त है”
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संसार में तीन अनादि तथा नित्य पदार्थ हैं। यह पदार्थ हैं ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति। ईश्वर सत्य चित्त आनन्दस्वरूप एवं सर्वज्ञ है। आत्मा सत्य, चेतन एवं अल्पज्ञ है। प्रकृति सत्य एवं जड़ सत्ता है। अनादि पदार्थ वह होते हैं जिनका अस्तित्व सदा से है और सदा रहेगा। इन्हें किसी अन्य सत्ता ने उत्पन्न नहीं किया। इन तीन पदार्थों की सत्ता को स्वयंभू सत्ता कहा जाता है। ईश्वर सर्वशक्तिमान, अजन्मा, निराकार, सर्वव्यापक तथा सृष्टिकर्ता है। ईश्वर में इच्छा नहीं है जैसी कि मनुष्यों व प्राणियों में देखी जाती है। इच्छा न होने से उस इच्छा की पूर्ति के लिये परमात्मा कोई कर्म भी नहीं करता। इस कारण से वह कर्म के बन्धनों में नहीं फंसता और उसको मनुष्यों की भांति सत्यासत्य व पाप पुण्य कर्मों के समान कर्म बन्धनों व क्लेशों में नहीं फंसना पड़ता। जीव में इच्छा, द्वेष आदि प्रवृत्तियां होती है। इससे वह जो कर्म करता है उसके अनुसार उसे कर्म बन्धन में फंसना पड़ता है और न्यायाधीश के रूप में सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, न्यायकारी परमात्मा सब जीवों को उनके पाप व पुण्य सभी कर्मों के सुख व दुःख रूपी फल देता है। मनुष्य के कर्म ही भविष्य में मनुष्य की जन्म, पुनर्जन्म व मृत्यु का कारण बनते हैं। हमारा यह जन्म भी हमारे पूर्वजन्म के कर्मों का फल प्राप्त करने वा भोगने के लिये ही हुआ है। हमने जो पूर्वजन्म में कर्म किये हैं उनका फल तो हमें इस जन्म में मिलता है। जो कर्म बच जाते हैं उन्हें नया जन्म लेकर भोगना ही पड़ता है। यही परमात्मा की व्यवस्था इस सृष्टि में दृष्टिगोचर होती है जिसका विधान वेद तथा ऋषियों के सत्यज्ञान से युक्त ग्रन्थों में मिलता है। मनुष्य जब वेद आदि सत्शास्त्रों को पढ़ता है तो उसे यह स्पष्ट ज्ञान हो जाता है कि हमारी व अन्य सभी आत्माओं ने अनादि काल से अब तक असंख्य बार अपने अपने कर्मानुसार भिन्न भिन्न योनियांे में जन्म लिये हैं। जन्म के बाद आयु का भोग करने के बाद सबकी मृत्यु व पुनर्जन्म होता रहता है। जन्म व मरण का यह चक्र रुकने वाला नहीं है। यह सदा से चलता आ रहा है और सदा चलता रहेगा। हम अनन्त काल तक वर्तमान जन्म के समान संसार की अनेकानेक प्राणी योनियों में अपने कर्मानुसार जन्म लेते रहेंगे।

विज्ञान का नियम है कि संसार में न तो कोई नया पदार्थ बनाया जा सकता है और न ही उसे नष्ट किया जा सकता है। नष्ट होने का अर्थ उसका स्वरूप परिवर्तन होना होता है। पानी को गर्म करने पर वह भाप बनकर उड़ जाता है परन्तु उसका अस्तित्व बना रहता है। यदि ईधन को जलाते हैं तो वह भी सूक्ष्म अदृश्य पदार्थों व धुएं के रूप में परिविर्तत होकर वायुमण्डल में फैल जाता है परन्तु उसका अभाव नहीं होता। वह अन्य रूप में संसार व वातावरण में विद्यमान रहता है। इसी प्रकार से आत्मा की मृत्यु होने पर उसका अभाव रूपी नाश नहीं होता। उसका अस्तित्व बना रहता है। आत्मा शरीर से निकल कर वायुमण्डल व आकाश में जाती है। शरीर से आत्मा का निकास सर्वव्यापक तथा सर्वान्तर्यामी परमात्मा की प्रेरणा से होता है। आत्मा को पता नहीं होता कि यह प्रक्रिया किस प्रकार से सम्पन्न होती है। उसे यह आभास अवश्य होता है कि उसका शरीर निर्बल व निष्क्रिय हो रहा है। आत्मा व प्राण आदि से युक्त सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर से निकलते समय तक आत्मा को इसका कुछ ज्ञान व आभास रहता है। शास्त्र व विवेक से ज्ञात होता है कि यह आत्मा सूक्ष्म शरीर सहित अपने देह से निकलने पर परमात्मा की प्रेरणा से अपने कर्मानुसार भावी माता-पिता के शरीर में प्रविष्ट होता है जहां इसके जन्म की कालावधि व्यतीत होने पर जन्म होता है। जब तक मनुष्य अपने सभी कर्मों का भोग कर उनका क्षय नहीं कर लेगा, तब तक जन्म व मृत्यु का चक्र चलता ही रहेगा। जन्म व मृत्यु न हो इसके लिये हमें अपने इच्छा व द्वेष की प्रवृत्ति को जानकर उसको पूर्ण नियंत्रित करना होगा और वेदों का अध्ययन कर उससे प्राप्त ज्ञान के अनुसार जीवन बनाना होगा। मनुष्य वेदों के ज्ञान को प्राप्त होकर निष्काम कर्मों को करके ही उनके फलों से मुक्त होता है और ईश्वर की उपासना, अग्निहोत्र यज्ञ एवं अन्य सभी शुभ कर्मों के परिणाम तथा योगाभ्यास आदि से ईश्वर का साक्षात्कार करने से उसको दीर्घकालावधि के लिये जन्म व मृत्यु से अवकाश प्राप्त होता है जिसको मोक्ष कहते हैं। मोक्ष का तर्क एवं युक्तियों सहित वर्णन ऋषि दयानन्द ने वेदों के आधार पर अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के नवम समुल्लास में किया है। वहां इसका अध्ययन कर इसे समझा जा सकता है और मोक्ष प्राप्ति की प्रेरणा ग्रहण कर उसके लिये आवश्यक उपाय भी किये जा सकते हैं।

संसार में जन्म लेने वाले सभी प्राणियों की मृत्यु अवश्यम्भावी होती है। गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को बताया है कि जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु का होना निश्चित है तथा जिस प्राणी की मृत्यु होती है उसका जन्म अर्थात् पुनर्जन्म होना भी निश्चित है। गीता की यह बात वेद एवं ऋषि दयानन्द के मन्तव्यों के अनुरूप एवं सर्वथा सत्य है। जन्म किसी भी योनि में हो जीवन काल में सुख व दुःख सभी प्राणियों को हाते हैं। मनुष्य व प्राणी सुख की इच्छा करते हैं। कोई भी प्राणी दुःख की इच्छा कभी नहीं करता। सभी दुःखों से निवृत्ति तथा भविष्य में कभी किसी भी प्रकार का कोई दुःख न हो, इसकी कामना करते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये ही हमारे ऋषियों ने वेदों का अध्ययन कर व उसमें मोक्ष संबंधी विचारों का संग्रह कर उसे दर्शन, उपनिषद तथा सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों में प्रस्तुत किया है। परमात्मा जन्म व मरण से सर्वथा मुक्त एक सत्ता है। वह सर्वशक्तिमान एवं सृष्टि की नियन्ता शक्ति है। वह जीवों को सुख की इच्छा से किये जाने वाले कर्मों का फल देते हैं। यदि मनुष्य सुख की इच्छा न कर दुःखों की निवृत्ति की इच्छा करें और उसके साधनों व उपायों का विचार कर वेद एवं ऋषियों के ग्रन्थों का आश्रय लें, तो उन्हें विदित होता है कि वेदाध्ययन व वेदाचरण ही मनुष्य को सभी दुःखों से छुड़ाकर मोक्ष वा मुक्ति का आनन्द प्रदान कराते हैं। मोक्ष के विषय में ऋषि दयानन्द के वचन हैं कि जो मनुष्य विद्या और अविद्या के स्वरूप को साथ ही साथ जानता है वह अविद्या अर्थात कर्म व उपासना से मृत्यु को तर के विद्या अर्थात् यथार्थ ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त होता है। ऋषि दयानन्द यह भी बताते हैं कि मुक्ति उसे प्राप्त होती है जो बन्धनों में फंसा होता है। बद्ध वह होता है जो अधर्म व अज्ञान में फंसा हुआ होता है। अतः अधर्म व अज्ञान से छूटने पर मुक्ति का होना सम्भव होता है।

मनुष्य की आत्मा की मुक्ति व बन्धन किन-किन बातों से होता है इस पर भी ऋषि दयानन्द ने प्रकाश डाला है। वह बताते हैं कि परमेश्वर की आज्ञा पालने, अधर्म, अविद्या, कुसंग, कुसंस्कार, बुरे व्यसनों से अलग रहने और सत्यभाषण, परोपकार, विद्या, पक्षपातरहित न्याय, धर्म की वृद्धि करने, वेद विधि से परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना अर्थात् योगाभ्यास करने, विद्या पढ़ने, पढ़ाने और धर्म से पुरुषार्थ कर ज्ञान की उन्नति करने, सब से उत्तम साधनों को करने और जो कुछ करें वह सब पक्षपातरहित न्याय-धर्मानुसार ही करें। इन साधनों से मुक्ति और इन से विपरीत ईश्वराज्ञाभंग करने आदि काम से बन्ध व जन्म-मरण होता है। मुक्ति से जुड़े अन्य अनेक प्रश्नों व शंकाओं का भी ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में समाधान किया है। अतः सभी मनुष्यों को सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश को पढ़ने से मनुष्य को ईश्वर व जीवात्मा सहित सभी विषयों का आवश्यक ज्ञान हो जाता है जैसा ससंार में किसी अन्य ग्रन्थ में प्राप्त नहीं होता।

सभी मनुष्यों को ईश्वर व जीवात्मा के सत्यस्वरूप को जानना चाहिये। जीवात्मा व मनुष्य जीवन के उद्देश्य सहित जीवात्मा के लक्ष्य पर भी विचार करना चाहिये। ऐसा करके हम अपनी आत्मा व जीवन का अवश्य ही कल्याण कर सकेंगे। सत्यार्थप्रकाश सभी मनुष्यों का मित्र व सहयोगी के समान है। यदि हम सत्यार्थप्रकाश को अपना मित्र व मार्गदर्शक बनायेंगे और इससे परामर्श लेंगे तो हमारा, समाज व देश का अवश्य ही कल्याण होगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

 शिक्षा व्यवसाय से हिन्दू बाहर किए जा रहे

[13:19, 16/10/2020] +91 93106 79090: शिक्षा व्यवसाय से हिन्दू बाहर किए जा रहे (भाग 4)

राष्ट्रवादी कहलाने वालों की सत्ता में उन के वैचारिक समर्थकों, एक्टिविस्टों की विचित्र दुर्गति है। वे उसी तरह असहाय चीख-पुकार कर रहे हैं, जैसे कांग्रेसी या जातिवादियों के राज में करते थे। चाहे, वह मंदिरों पर राजकीय कब्जा हो, संविधान की विकृति हो, या शिक्षा-संस्कृति में हिन्दू विरोधी नीतियाँ हों। वे आज भी शिक्षा में हिन्दू विरोधी पक्षपात को दूर करने के लिए रो रहे हैं।

इस पक्षपात का उदाहरण ‘शिक्षा का अधिकार कानून, 2009’ (आर.टी.ई) भी है। जिस ने गरीब बच्चों को शिक्षा देने का भार केवल हिन्दुओं पर डाल दिया। अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों को इस से मुक्त रखा जिन की संख्या हजारों में है। उन्हें सरकारी अनुदान भी मिलता हो, तब भी उन पर आर.टी.ई लागू नहीं। जबकि हिन्दुओं द्वारा चलाए जा रहे स्कूल सरकारी अनुदान न भी लेते हों, तब भी उन्हें एक चौथाई सीटों पर निःशुल्क प्रवेश देना पड़ता है। यह फिर दोहरे जुल्म का उदाहरण है। हिन्दुओं द्वारा चलाए स्कूलों में चौथाई बच्चों का खर्च स्कूल को उठाना पड़ता है। गरीबों वाली सीटों पर भी प्रवेश तय करने का अधिकार स्कूल को नहीं, बल्कि राजकीय अधिकारियों को है। किसी कारण वे सीटें नहीं भरीं, तब भी उन्हें खाली रखना होगा।

इस के अलावा भी हिन्दुओं के स्कूलों पर सरकारी निर्देश, तरह-तरह के नियम बढ़ते गए हैं। उस में फीस संरचना, शिक्षकों के वेतन, छात्रों को प्रवेश की शर्तें, आदि तक तय करना शामिल है। यह खुला हिन्दू-विरोधी भेद-भाव है। क्योंकि यह सब स्कूल चलाने वाले का धर्म देख कर तय किया गया है। अरबपति क्रिश्चियन मिशनरी संस्थान भी उन नियमों से मुक्त हैं, जबकि साधारण हिन्दू स्कूल भी उन से बाध्य है। गोवा में आधे स्कूल मिशनरियों द्वारा संचालित हैं। केरल में उन की संख्या और अधिक है। उन के सामने हिन्दू स्कूलों का अस्तित्व ही खतरे में है।

आर.टी.ई के अन्य नियम भी हिन्दू स्कूलों पर चोट कर रहे हैं। जैसे, अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान किसी को भी प्रवेश दे सकते हैं। वे अपने समुदाय को संपूर्ण आरक्षण दे सकते हैं। कुछ मिशनरी स्कूलों में इसे हिन्दुओं का धर्मांतरण कराने के लिए भी इस्तेमाल हो रहा है! यह कह कर कि ‘सामान्य केटेगरी में सीट खाली नहीं, पर क्रिश्चियन वाली सीटें बची है। यदि क्रिश्चयिन बन जाओ तो एडमिशन मिल जाएगा।’ यह पुरानी तकनीक है, जिसे गाँधीजी ने मिशनरियों की सेवा, अस्पताल, स्कूल, आदि को ‘मछली फँसाने के लिए चारे’ का नाम दिया था।

अल्पसंख्यक संस्थान किसी को भी शिक्षक नियुक्त कर सकते हैं, उन पर न्यूनतम योग्यता शर्ते नहीं है। शिक्षकों को कुछ भी वेतन दे सकते हैं, उन पर पे-कमीशन लागू नहीं है। जो हिन्दुओं द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों पर है। यानी, हिन्दुओं को अधिकार नहीं रहा कि वे भी ‘ऊँचे’, ‘साधारण’ या ‘सस्ते’ स्कूल खोल सकें। जबकि अल्पसंख्यक संस्थानों को हरेक छूट है।

अभी दिल्ली में सरकार ने फीस बढ़ाने पर पाबंदी लगा दी है। गत महीनों में अनेक बच्चे कई महीने से फीस नहीं दे रहे। पर हिन्दुओं द्वारा चलाए जा रहे स्कूल उन का नाम नहीं काट सकते। सरकारी हुक्म है। एक हिन्दू संचालित स्कूल के व्यवस्थापक ने कहा, “इस महीने शिक्षकों-कर्मचारियों को वेतन देने के लाले पड़ गए हैं।” इस प्रकार, प्रवेश, नियुक्ति, आरक्षण, वेतन, फीस, आदि किसी चीज में अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों पर कोई सरकारी नियम बाध्यकारी नहीं। जबकि निम्नतम समुदाय के हिन्दू व्यक्ति/संस्था को भी छूट नहीं कि वह अपने समुदाय के लिए सीट सुरक्षित रखे। इस तरह, आर.टी.ई तरह-तरह से हिन्दुओं के विरुद्ध भेदभाव करता है। फलतः हिन्दुओं द्वारा चलाए जा रहे स्कूल बंद हो रहे हैं। अब तक लगभग चार हजार बंद हो चुके थे।

ध्यान रहे, अब शिक्षा लगभग पूरी तरह व्यवसाय में बदल चुका। ऐसी स्थिति में आर.टी.ई केवल हिन्दुओं पर लागू होना उन्हें इस व्यवसाय से बाहर करने का दबाव ही है। एक तरह का जजिया टैक्स, जो केवल हिन्दुओं पर है। क्या यह हिन्दुओं पर धर्मांतरित होने का दबाव या प्रलोभन नहीं, जैसा मुगल काल में था? क्योंकि जैसे ही कोई स्कूल या कॉलेज चलाने वाला हिन्दू धर्म बदल कर मुसलमान/ क्रिश्चियन हो जाए, वह अपने संस्थान में गरीबों के लिए 25 प्रतिशत निःशुल्क प्रवेश समेत सभी शर्तों, नियमों से मुक्त हो जाएगा! स्कूल की स्थिति के अनुसार यह राशि सालाना लाखों, करोड़ों में हो सकती है, जो किसी स्कूल या कॉलज को इसलिए देनी पड़ेगी, क्योंकि वह हिन्दू संचालित है!

इस पर सारे राजनीतिक दल, न्यायालय और मीडिया सभी चुप हैं। जबकि बीच-बीच में मानते हैं कि सेक्यूलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं के विरुद्ध अन्याय हो रहा है। गत दशकों में सारी गड़बड़ी संविधान के अनुच्छेद 26-30 की विकृति करके की गई। इस की संविधान निर्माताओं ने कल्पना तक नहीं की थी। संविधान में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का कई बार प्रयोग है, जबकि ‘बहुसंख्यक’ का नहीं। अर्थ यह न था कि वे बहुसंख्यक को वंचित रखना चाहते थे। वे मानकर चल रहे थे कि बहुसंख्यकों को तो अधिकार रहेंगे ही! उन्हें चिंता थी कि ‘अल्पसंख्यक’ को भी सब के बराबर अधिकार मिले रहें। इसलिए अनुच्छेद 30 लिख कर यह पक्का किया गया। उस के उपबन्ध-2 से स्पष्ट है कि संविधान की यही भावना थी।

किन्तु हिन्दू नेताओं, संगठनों की मूढ़ता और हिन्दू-विरोधियों की धूर्तता ने धीरे-धीरे उन अनुच्छेदों का यह अर्थ कर दिया कि अल्पसंख्यकों को ऐसे अधिकार हैं जो गैर-अल्पसंख्यकों यानी हिन्दुओं को नहीं हैं। किसी ने उस के विरुद्ध आवाज नहीं उठाई। वही आर.टी.ई कानून पर भी हुआ।दशकों से हिन्दू संगठन मानो अफीम खाकर पड़े हुए हैं। वरना अनुच्छेद 26-30 वाली विकृति जारी नही रह सकती थी। जिसे केवल प्रस्ताव पास कर सब के लिए समान घोषित करना है। मजे की बात यह कि ऐसा विधेयक मुस्लिम नेता सैयद शहाबुद्दीन ने दसवीं लोक सभा में अप्रैल 1995 में रखा था। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 30 के उपबन्धों में जहाँ-जहाँ ‘सभी अल्पसंख्यक’ लिखा हुआ था, उसे बदल कर ‘भारतीय नागरिकों का कोई भी वर्ग’ करने का प्रस्ताव दिया था।

उस विधेयक (नं 36/1995) के उद्देश्य में शहाबुद्दीन ने लिखा था कि अभी अनुच्छेद 30 केवल अल्पसंख्यकों पर लागू किया जाता है। जबकि, ‘‘एक विशाल और विविधता भरे समाज में लगभग सभी समूह चाहे जिन की पहचान धर्म, संप्रदाय, फिरका, भाषा और बोली किसी आधार पर होती हो, व्यवहारिक स्तर पर कहीं न कहीं अल्पसंख्यक ही है, चाहे किसी खास स्तर पर वह बहुसंख्यक क्यों न हो। आज विश्व में सांस्कृतिक पहचान के उभार के दौर में हर समूह अपनी पहचान के प्रति समान रूप से चिंतित है और अपनी पसंद की शैक्षिक संस्था बनाने की सुविधा चाहता है। इसलिए, यह उचित होगा कि संविधान के अनुच्छेद 30 के दायरे में देश के सभी समुदाय और हिस्से सम्मिलित किये जाएं।’’

शहाबुद्दीन ने उस में यह भी लिखा था कि जो बहुसंख्यकों को प्राप्त नहीं, वैसी सुविधा अल्पसंख्यकों को देने के लिए अनुच्छेद 30 की निन्दा होती रही है। अतः बहुसंख्यकों को भी अपनी शैक्षिक संस्थाएं बनाने, चलाने का समान अधिकार मिलना चाहिए। यह हिन्दू नेताओं की अचेतावस्था का प्रमाण है कि वह विधेयक यूँ ही पड़ा-पड़ा खत्म हो जाने दिया गया!

यह हमारे राजनीतिक दलों का दिवालियापन है कि नब्बे प्रतिशत हिन्दुओं से भरे दल व संसद 1975 ई. से ही लगातार नए, नए हिन्दू-विरोधी संशोधनों, कानूनों को पास करते रहे हैं। आर.टी.ई. का बेखटके पास होना उसी क्रम में था। किसी ने इस का मुगलिया, जजिया-नुमा भेद-भाव देखने की फिक्र नहीं की। वही हैरत आज भी कि कथित हिन्दूवादी सत्ताधारी भी इसे जारी रखे हुए हैं। हिन्दू समाज के विरुद्ध धार्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक भेद-भाव पर वे गाँधीजी के बंदरों जैसी मुद्रा में हैं। (समाप्त)

– डॉ. शंकर शरण (१३ अक्टूबर २०२०)

पण्डित ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु की पुण्यस्मृति का अभिनन्दन – लेखक पद्मविभूषण पूज्य डॉ बलदेव उपाध्याय जी, वाराणसी . जन्म दिवस – 14 अक्टूबर – विशेष स्मरण

पण्डित ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु की पुण्यस्मृति का अभिनन्दन
– लेखक पद्मविभूषण पूज्य डॉ बलदेव उपाध्याय जी, वाराणसी
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जन्म दिवस – 14 अक्टूबर – विशेष स्मरण
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पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु के अध्ययन काल के गुरुजनों का नाम्ना निर्देश तथा उनकी शिक्षा दीक्षा का संक्षेप में उल्लेख उनके स्वलिखित जीवन परिचय में बहुत से अज्ञात तथ्यों का विधिवत् वर्णन किया है – उन गुरुजनों में से अनेक व्यक्तियों से मेरा परिचय रहा है |
[पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु के] गुरुवर स्वामी पूर्णानन्द जी के अध्यापक पण्डित काशीनाथ शास्त्रीजी को बड़े निकट से जानता हूँ क्योंकि उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया मण्डल में जिस ग्राम में हुआ था, वह मेरे ग्राम से बहुत दूर नहीं था | हम दोनों ही व्यक्तियों का जन्म-स्थान बलिया जनपद ही है | पण्डित काशीनाथ शास्त्री जी, स्वामी श्रद्धानन्द जी के विशेष आग्रह पर हरिद्वार के गुरुकुल में अध्यापक बन कर गये थे और वहाँ उनके द्वारा शिक्षित विद्वानों ने बड़ी कीर्ति अर्जित की | काशी में आकर जिज्ञासु जी ने महाभाष्य, न्यायशास्त्र, मीमांसा तथा वेद का चिन्तन तथा मनन जिन विद्वानों के सान्निध्य में किया था, उनमें से अनेक पण्डितों के पास उन्हें झोले में ग्रन्थों को रखकर आते-जाते मैं बहुश: देखता था | वैदिक रामभट्ट रटाटे जी तो पञ्चगङ्गा घाट पर मेरे आवास के पास ही रहते थे – उनके पास जिज्ञासु जी को मैंने बहुश: आते – जाते देखा था | इस प्रकार उनके विद्याध्ययन में विशेष आग्रह तथा अदम्य उत्साह देखकर मुझे चकती होना पड़ता था | काशी के दयालु पण्डितों की प्रदत्त विद्या के लिए उन्होंने कभी नहीं भुलाया | इन पण्डितों की दिव्य स्मृति उनके जीवन परिचय में सर्वात्मना सुरक्षित है |
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पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी पद-वाक्य-प्रमाणज्ञ थे | वे पदशास्त्र (व्याकरण), वाक्यशास्त्र (मीमांसा) तथा प्रमाणशास्त्र (न्याय) के प्रौढ़ विद्वान् थे, परन्तु उनका विशेष आग्रह पदशास्त्र पर था | आर्ष-पाठविधि के विशेष मर्मज्ञ तथा प्रचारक थे | संस्कृत भाषा का ज्ञान सरलता सुगम रीति से बालकों को कराया जाय – इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उनका समग्र जीवन ही समर्पित था | इस लक्ष्य की सिद्धि के लिए प्रथमतः “संस्कृत पठन-पाठन की अनुभूत सरलतम विधि” नामक ग्रन्थ की रचना की तथा विपुल प्रचार की दृष्टि से उन्होंने इसका अँग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित किया The tested Easiest Method of Learning and Teaching Sanskrit नाम से | इसका प्रचुर प्रचार संस्कृत के शिक्षार्थियों में हुआ और आज भी यह अँग्रेजी भाषा के माध्यम से पाणिनीय व्याकरण में प्रवेश करने वालों के लिए आधिकारिक पुस्तक है | जिज्ञासु जी ने प्रथम खण्ड ही लिखा था, परन्तु जिज्ञासु जी के प्रौढ़ विद्वान् शिष्य पण्डित युधिष्ठिर मीमांसक जी ने इसका दूसरा खण्ड भी प्रकाशित कर इसका प्रचार कार्य को और भी आगे बढ़ाया है |
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आर्षपाठविधि का मुख्य लक्ष्य पाणिनी की अष्टाध्यायी को सरल और सुबोध बनाना तथा देववाणी का विशुद्ध प्रचार-प्रसार है और इस लक्ष्य की सिद्धि के लिए जिज्ञासु जी ने अपना दीर्घ जीवन ही समर्पित कर दिया है |
भट्टोजिदीक्षित द्वारा सङ्कलित ‘सिद्धान्तकौमुदी’ के द्वारा आजकल व्याकरण का अध्ययन-अध्यापन चल रहा है, परन्तु अनेक त्रुटियों का पता इस पद्धति के अनुसरण से लग चुका है | इसी लिए आर्षपाठविधि का उद्गम हुआ | जिज्ञासु जी के पाण्डित्य का यह वैशिष्ट्य है कि उन्होंने इसी पद्धति के द्वारा अष्टाध्यायी अध्ययन अपने गुरुवर्य पूर्णानन्द जी से प्रथमतः किया | अधीति (अध्ययन), बोध (मनन) आचरण (ग्रन्थ लेखन) तथा प्रचारण (अध्यापन) के द्वारा किसी विद्या के ज्ञान-विज्ञान की उत्कट कोटि में पहुँचाया जा सकता है और जिज्ञासु जी ने इस तथ्य को अपने जीवन में विधिवत् सम्पन्न किया | स्वयं पढ़ा, मनन किया, ग्रन्थ लिखा तथा शिष्यों को पढ़ाया | इन चार कार्यों का साधन उनके जीवन का परम लक्ष्य था |
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पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी का एतद्विषयक अद्भुत विपुलकाय ग्रन्थ है – अष्टाध्यायी (भाष्य) प्रथमावृत्ति, जिसके तीन भाग हैं, जो दो हजार से भी अधिक पृष्ठों में प्रकाशित हुई हैं | इनमें से प्रथम द्वितीय भाग तो जिज्ञासु जी की लेखनी के चमत्कार प्रस्तुत करते हैं और अन्तिम भाग उन्हीं की विदुषी शिष्या प्रज्ञा देवी की रचना है जो गुरु की रचना से प्रामाणिकता सरलता तथा विषयविन्यास के विषय में किसी प्रकार न्यून नहीं है |
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जिज्ञासु जी महाराज ने बहुत आरम्भ से ही अनुभव किया था कि अष्टाध्यायी-क्रम के अध्ययन से ही व्याकरण का ज्ञान, अतीव सरलता से किया जा सकता है और अष्टाध्यायी-क्रम का वैशिष्ट्य उन्होंने बतलाया तथा व्याकरणाध्ययन के इस अतीव सरल उपाय का विवेचन उन्होंने अपने पूर्वोक्त ग्रन्थ में किया है | सूत्र पाठ के क्रम के ज्ञान के बिना ‘पूर्व’ ‘पर’ ‘त्रिपादी’ ‘सपादसप्ताध्यायी’ तथा बाध्यबाधकभाव इत्यादि का ज्ञान, पढ़ने वाले एवं पढ़ानेवाले को भी कभी सम्भव नहीं है | इसीलिए जिज्ञासु जी ने अष्टाध्यायी के अध्ययन-अध्यापन, मनन-निदिध्यासन में अपनी समग्र शक्ति का उपयोग किया और इस विषय का पूरा परिचय उनके अष्टाध्यायी-भाष्य प्रथमावृत्ति के अवलोकन से प्रत्येक आलोचक को ही जाता है | इसमें अनुवृत्ति के निर्देश के साथ सूत्रों का विधिवत् अर्थप्रदर्शन किया है | इसमें व्याख्या संस्कृत तथा हिन्दी दोनों भाषाओं में की गयी है | इसका अध्ययन महाभाष्य में प्रवेश के अभिलाषी छात्रों का विशेषरुपेण सहायक है |
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वेद के अध्यापन-मनन की ओर आपकी अभिरुचि कम नहीं थी | इसीलिए पण्डित ब्रह्मदत्त जी ने दयानन्द स्वामी रचित यजुर्वेद भाष्य पर अपना विवरण प्रणीत किया, जो मूल तथा भाष्य के ज्ञान के लिए नितान्त उपयोगी साधन है | इस पद्धति तथा मननशैली से अपने अनेक शिष्यों तथा शिष्याओं को तैयार किया है | जिनमें पण्डित युधिष्ठिर मीमांसक जी तथा प्रज्ञा कुमारी जी के नाम अग्रगण्य हैं | मनीषीजन जिज्ञासु जी के कार्य को पूर्ण करने में सर्वथा संलग्न हैं | फलतः ये भी हमारी श्रद्धा के पात्र हैं |
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पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु के कार्यकलाप के वर्णनपरक ग्रन्थ में मेरा यह लेख श्रद्धाञ्जलि के रूप में सादर समर्पित है |
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(साभार स्मारिका, पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु जन्म शताब्दी 14 अक्तूबर 1892-1992, परिचितों व शिष्यों द्वारा लिखित संस्मरण व श्रद्धाञ्जलि, पद्मविभूषण पूज्य डॉ बलदेव उपाध्याय जी, वाराणसी द्वारा लिखित लेख पृष्ठ 213-214-215 में से, प्रकाशक- रामलाल कपूर ट्रस्ट)
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सश्रद्ध-प्रस्तोता :- विश्वप्रिय वेदानुरागी
मुझे गर्व है, मैं पूज्य गुरुवर्य पण्डित ब्रह्मदत्त जी की परम्परा परिवार का सदस्य हूँ | परमात्मा से प्रार्थना है कि, भविष्य में भी इस मेरे परिवार को विद्वानों का आश्रय मिलता रहे, उनके संस्कारों से सिंचित होते रहें |
धन्यवाद
नमस्तेजी
सादर
विदुषामनुचर
विश्वप्रिय वेदानुरागी

मनुस्मृति में नारियों की स्थिति

सभी को सादर नमस्ते जी
💥मनुर्भव💥
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💥🌹मनुस्मृति में नारियों की स्थिति🌹💥
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मनुस्मृति के अन्तःसाक्ष्य कहते हैं कि मनु की जो स्त्री-विरोधी छवि प्रस्तुत की जा रही है,वह निराधार एवं तथ्यों के विपरित है।मनु ने मनुस्मृति में स्त्रियों से सम्बन्धित जो व्यवस्थाएं दी हैं वे उनके सम्मान,सुरक्षा,समानता,सद्भाव और न्याय की भावना से प्रेरित हैं।कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं:-
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💥(1) नारियों को सर्वोच्च महत्व:-👇
महर्षि मनु संसार के वह प्रथम महापुरुष हैं,जिन्होंने नारी के विषय में सर्वप्रथम ऐसा सर्वोच्च आदर्श उद्घोष किया है,जो नारी की गरिमा,महिमा और सम्मान को असाधारण ऊंचाई प्रदान करता है-👇

💥#यत्रनार्यस्तुपूज्यन्तेरमन्तेतत्र_देवताः ।
#यत्रैताःतुनपूज्यन्तेसर्वास्तत्राफलाः_क्रियाः ।।-(३/५९)👇

इसका सही अर्थ है-‘जिस परिवार में नारियों का आदर-सम्मान होता है,वहाँ देवता=दिव्य गुण,कर्म,स्वभाव,दिव्य लाभ आदि प्राप्त होते हैं और जहां इनका आदर-सम्मान नहीं होता,वहां उनकी सब क्रियाएं निष्फल हो जाती हैं।’💥

💥स्त्रियों के प्रति प्रयुक्त सम्मानजनक एवं सुन्दर विशेषणों से बढ़कर,नारियों के प्रति मनु की भावना का बोध कराने वाले प्रमाण और कोई नहीं हो सकते।वे कहते हैं कि नारियों का घर भाग्योदय करने वाली,आदर के योग्य,घर की 💥ज्योति,गृहशोभा,गृहलक्ष्मी,गृहसंचालिका एवं गृहस्वामिनी,घर का स्वर्ग,संसारयात्रा का आधार हैं (९.११,२६,२८;५.१५०)।💥💥💥
कल्याण चाहने वाले परिवारजनों को स्त्रियों का आदर-सत्कार करना चाहिए,अनादर से शोकग्रस्त रहने वाली स्त्रियों के कारण घर और कुल नष्ट हो जाते हैं।स्त्री की प्रसन्नता में ही कुल की वास्तविक प्रसन्नता है (३.५५-६२)।💥💥💥💥💥💥
इसलिए वे गृहस्थों को उपदेश देते हैं कि परस्पर संतुष्ट रहें एक दूसरे के विपरीत आचरण न करें और ऐसा कार्य न करें जिससे एक-दूसरे से वियुक्त होने की स्थिति आ जाये(९.१०१-१०२)।
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मनु कीभावनाओं को व्यक्त करने के लिए एक श्लोक ही पर्याप्त है–
🔥#प्रजनार्थंमहाभागाःपूजार्हाः_गृहदीप्तयः ।
#स्त्रियःश्रीयश्चगेहेषुनविशेषोऽस्ति_कश्चन। 🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥-(मनु० १/२६)

💥अर्थात्-💥सन्तान उत्पत्ति के लिए घर का भाग्योदय करने वाली,आदर-सम्मान के योग्य,गृहज्योति होती हैं स्त्रियां।शोभा-लक्ष्मी और स्त्री में कोई अन्तर नहीं है,वे घर की प्रत्यक्ष शोभा हैं।

💥(2) पुत्र-पुत्री एक समान:-💥
मनुमत से अनभिज्ञ पाठकों को यह जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि मनु ही सबसे पहले वह संविधान निर्माता हैं जिन्होंने पुत्र-पुत्री की समानता को घोषित करके उसे वैधानिक रुप दिया है-

“#पुत्रेणदुहितासमा”(मनु० ९/१३०)*
💥अर्थात्-💥’पुत्री पुत्र के समान होती है।वह आत्मारुप है,अतः वह पैतृकसम्पत्ति की अधिकारिणी है।’

💥(3) पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार:-💥
मनु ने पेतृक सम्पत्ति में पुत्र-पुत्री को समान अधिकारी माना है।उनका यह मत मनुस्मृति के ९.१३०,१९२ में वर्णित है।इसे निरुक्त में इस प्रकार उद्घृत किया है-

#अविशेषेणपुत्राणांदायोभवतिधर्मतः ।
#मिथुनानांविसर्गादौमनुः_स्वायम्भुवोऽब्रवीत् 💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥।।-(३.१.४)

💥अर्थात्-💥सृष्टि के प्रारम्भ में स्वायम्भुव मनु ने यह विधान किया है कि दायभाग=पैतृक सम्पत्ति में पुत्र-पुत्री का समान अधिकार होता है।मातृधन में केवल कन्याओं का अधिकार विहित करके मनु ने परिवार में कन्याओं के महत्त्व में अभिवृद्धि की है(९.१३१)।

💥(4) स्त्रियों के धन की सुरक्षा के विशेष निर्देश:-👇
स्त्रियों को अबला समझकर कोई भी,चाहे वह बन्धु-बान्धव ही क्यों न हो,यदि स्त्रियों के धन पर कब्जा कर लें,तो उन्हें चोर सदृश दण्ड से दण्डित करने का आदेश मनु ने दिया है(९.२१२;३.५२;८.२;८-२९)।

💥(5) नारियों के प्रति किये अपराधों में कठोर दण्ड:-👇

स्त्रियों की सुरक्षा के दृष्टिगत नारियों की हत्या और उनका अपहरण करने वालों के लिए मृत्युदण्ड का विधान करके तथा बलात्कारियों के लिए यातनापूर्ण दण्ड देने के बाद देश निकाला का आदेश देकर मनु ने नारियों की सुरक्षा को सुनिश्चित बनाने का यत्न किया है 💥💥💥💥(८/३२३;९/२३२;८/३५२)।
नारियों के जीवन में आने वाली प्रत्येक छोटी-बड़ी कठिनाई का ध्यान रखते हुए मनु ने उनके निराकरण हेतु स्पष्ट निर्देश दिये हैं।👇👇

पुरुषों को निर्देश हैं कि वे माता,पत्नि और पुत्री के साथ झगड़ा न करें (४/१८०),इन पर मिथ्या दोषारोपण करने वालों,इनको निर्दोष होते हुए त्यागने वालों,पत्नि के प्रति वैवाहिक दायित्व न निभाने वालों के लिए दण्ड का विधान है 💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥(८/२७५,३८९;९/४)।

💥(6) वैवाहिक स्वतन्त्रता एवं अधिकार:-👇
विवाह के विषय में मनु के आदर्श विचार हैं।मनु ने कन्याओं को योग्य पति का स्वयं वरण करने का निर्देश देकर स्वयम्वर विवाह का अधिकार एवं उसकी स्वतन्त्रता दी है 💥💥💥💥(९/९०-९१)।
विधवा को पुनर्विवाह का भी अधिकार दिया है,साथ ही सन्तानप्राप्ति के लिए नियोग की भी छूट है💥💥💥(९/१७६,९/५६-६३)।
उन्होंने विवाह को कन्याओं के आदर-स्नेह का प्रतीक बताया है,अतः विवाह में किसी भी प्रकार के लेन-देन को अनुचित बताते हुए बल देकर उसका निषेध किया है💥💥💥💥💥💥 (३/५१-५४)।
स्त्रियों के सुखी-जीवन की कामना से उनका सुझाव है कि जीवनपर्यन्त अविवाहित रहना श्रेयस्कर है,किन्तु गुणहीन,दुष्ट पुरुष से विवाह नहीं करना चाहिए 💥💥💥💥💥💥💥💥💥(९/८९)।

लेख प्रस्तुति👇👇
#शशिआर्या_वैदिकभजनोपदेशिका

भारत में आज भी जिन विदेशियों पर गर्व किया जाता है

(13 अक्तूबर/ पुण्य-तिथि)
भारत में आज भी जिन विदेशियों पर गर्व किया जाता है, उनमें भगिनी निवेदिता का नाम सबसे पहले आता है.
भगिनी नेवेदिता का बचपन का नाम मार्गरेट एलिज़ाबेथ नोबेल था। मार्गरेट का जन्म 28 अक्टूम्बर, 1867 को काउंटी टाईरोन, आयरलैंड में हुआ था। मार्गरेट के पिता का नाम श्री सैमुएल रिचमंड नोबेल और माता का नाम मैरी इसाबेल था।
मार्गरेट ने अपनी शिक्षा हेलिफेक्स कॉलेज से पूर्ण की जिसमे उन्होंने कई विषयों के साथ-साथ संगीत और प्राकृतिक विज्ञान में दक्षता प्राप्त की। मार्गरेट ने 17 वर्ष की आयु में शिक्षा पूर्ण करने के बाद अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया। उनके मन में धर्म के बारे में जानने की बहुत जिज्ञासा थी।
मार्गरेट को एक बार पता चला की स्वामी विवेकानन्द अमेरिका में ओजस्वी भाषण देने के बाद इंग्लैड पधारे है तो मार्गरेट ने उनसे मिलने का निश्चय किया और वो लेडी मार्गसन के आवास पर स्वामी से मिलने गई। स्वामी जी के तेजस्वी व्यक्तित्व से वो बहुत प्रभावित हुई। मार्गरेट नोबेल स्वामी जी के वेदांत दर्शन से इतनी अधिक प्रभावित हुई की उनका हृदय आध्यात्मिक दर्शन की ओर प्रवृष्ट हो गया।
भगिनी निवेदिता का वास्तविक नाम मार्गरेट नोबेल था। वे आयरिश मूल की रहने वाली थी।
उनके के पिता एक चर्च में उपदेशक थे।
वो सर्वप्रथम 1896 में भारत आई। 25 March 1898 को उन्होंने ब्रह्मचार्य के व्रत को अंगीकार किया। उन्होंने ग्रामीण बल विधवाओं को कलकत्ता में लाकर शिक्षित किया।
उन्होंने बालिका शिक्षा के लिए कलकत्ता में एक school भी खोला।
उनकी मृत्यु 13 अक्टूम्बर, 1911 को दार्जलिंग में हुई और उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति रिवाज से किया गया।
स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण में कहा “मुझे सभी से आशा नहीं है, मुझे कुछ चुने हुए 20 लोग चाहिए जो अपना सम्पूर्ण जीवन संसार सेवा में न्योछावर कर सकें”
अगले ही दिन सुबह ही एक चेहरा उनके सामने था स्वामी जी ने कहा बताये आपकी क्या सेवा करूँ.
उसने कहा – ” स्वामी जी आपने कल 20 लोगो के बारे में बात की थी 19 लोगो का तो पता नहीं, पर 1 मै हूँ ”
“और वह थी भगनी निवेदिता”
स्वामी विवेकानन्द का मानना था की भारत की मुक्ति महिलाओं के हाथ में है इसलिए उन्हें शिक्षा द्वारा जागृत करना बहुत जरुरी है। स्वामी जी एक ऐसे व्यक्ति की खोज में थे जो भारतीय महिलाओं को जागृत करके उनमे राष्ट्रीय चेतना की भावना विकसित कर सके।
स्वामी जी को मार्गरेट में इन गुणों का समावेश दिखाई दिया जिनकी उनको तलाश थी और इसलिए उन्होंने मार्गरेट से आग्रह किया कि –
वो भारत आकर उनकी मदद करे और जो उनकी महिलाओं के लिए योजनाएँ है या जैसा वो सोचते हैं उसे यथार्थ में करने में मदद करें।
मार्गरेट नोबेल ऐसा अवसर को कैसे चूक सकती थीं उन्होंने तुरंत ही हाँ बोल दिया। वे 1896 में भारत आईं और यहाँ की गतिविधियों में भागीदारी करने लगी। 25 मार्च 1898 को स्वामी जी ने मार्गेट नोबेल को ब्रह्मचर्य की शपथ दिलाते हुए दीक्षा प्रदान की और उनका नाम निवेदिता रख दिया। इस अवसर पर स्वामी जी ने कहा-
जाओ और उसका अनुसरण करो, वो जिसने बुद्ध की दृष्टि प्राप्त करने से पहले 500 बार जन्म लिया और अपना जीवन न्योछावर कर दिया
आगे चल कर मार्गरेट नोबेल भगिनी निवेदिता ( Sister Nivedita) नाम से विख्यात हुईं।
भगिनी निवेदिता ने महिला शिक्षा के माध्यम से भारत की महानता को पुन: स्थापित करने का प्रयास किया और उन्हें इसमें सफलता भी मिली। मार्गरेट ‘बसु पद्धति’ से काफी प्रभावित थीं। उस समय ग्रामीण बंगाल में विधवाओं पर कठोर अनुशासन थोपे जाते थे जो की एक उदार व्यक्ति के हृदय को व्यथित करने के लिए काफी था। इसलिए मार्गरेट विधवा महिलाओं को कलकत्ता लाकर उन्हें बसु पद्धति से शिक्षा देतीं और उन्हें प्रशिक्षित करके गाँवो में वापस भेज देतीं ताकि वे और लोगो को शिक्षित कर सकें।
भगिनी निवेदिता ने स्वामी विवेकानंद के साथ कई स्थानों पर भ्रमण किया और स्वामी जी के दिखाए मार्ग पर चलते हुए बालिका शिक्षा के लिए कलकत्ता में एक स्कूल खोला। बालिका शिक्षा में जब भी सिस्टर निवेदिता को धन की जरूरत हुई तो उसके लिए श्रीमती बुल ने उनकी आर्थिक मदद की।
जब भारत में प्लेग और कालरा रोग फैल गया था तब अंग्रेजों ने कोई कार्य नहीं किया लेकिन भगिनी निवेदिता ने विषम हालात में भी रोग पीड़ितों की हर सम्भव मदद की थी। स्वामी विवेकानन्द के देह त्यागने के बाद उनके मिशन को संचालित करने का दायित्व भगिनी निवेदिता ने सम्भाला और उसे अच्छी तरह निभाया।
वो एक अच्छी लेखिका भी थी और उन्होंने- “द मास्टर एज आई सॉ हिम”, “ट्रेवल टेल्स”, “क्रेडल टेल्स ऑफ़ हिंदूइजम” आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ है।
भगिनी निवेदिता ने 13 अक्टूबर, 1911 को अपना देह त्याग दिया। उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से किया गया। ऐसी अद्भुत नारी, जिसने विदेशी होते हुए भी अपना पूर्ण जीवन भारत की सेवा में बिताया, हम सभी को हेमशा-हेमशा के लिए याद रहेगी। हम उन्हें शत-शत नमन करते हैं।
चण्डीगढ़