Vedic Lekh

15 novemberदिन 1949 में नत्थूराम गोडसे और नारायण दत्तात्रेय आप्टे को फांसी दी गई थी

वे बड़े काले दिन थे। वे बड़े ख़ूनी दिन थे। दस लाख से ज़्यादा लोग मौत की आगोश में चले गये थे। सब को पता ही है। मैं भी तो बार-बार उन्हीं की बातें कहता रहता हूँ। साल में सौ बार उनको श्रद्धांजलि देता हूँ।

1948 की 30 जनवरी को गान्धी जी की हत्या हुई थी। जब किसी की हत्या की बात हो, तो उसके हत्यारे की भी बात होती है। जब गान्धी जी की हत्या की बात हो, तो नत्थूराम गोडसे का नाम भी आता ही है।

नत्थूराम गोडसे ने गान्धी जी की हत्या की। यह तथ्य है। ख़ुद नत्थूराम गोडसे ने यह स्वीकार किया था कि गान्धी जी की हत्या उसी ने की थी।

जल्दबाज़ी में 15 नवम्बर, 1949 को गोडसे को नारायण दत्तात्रेय आप्टे के साथ अम्बाला में फाँसी दे दी गई। उस वक़्त की सरकार सिर्फ़ 71 दिन और इन्तज़ार कर लेती, तो गोडसे और आप्टे को सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का मौक़ा मिल जाता। उस वक़्त हमारे देश में सुप्रीम कोर्ट ही नहीं थी। 21 जून, 1949 को पंजाब की हाई कोर्ट ने दोनों की मौत की सज़ा को तस्दीक़ किया था।

सुप्रीम कोर्ट की जगह उस वक़्त प्रिवी कौंसिल हुआ करती थी। प्रिवी कौंसिल ने गोडसे और आप्टे की अपील न सुनने का फ़ैसला लिया। प्रिवी कौंसिल की मियाद 26 जनवरी, 1950 तक ख़त्म हो जाने वाली थी। इतने कम वक़्त में अपील का फ़ैसला नहीं हो सकता था, इसलिये प्रिवी कौंसिल ने अपील नहीं सुनी।

71 दिन बाद सुप्रीम कोर्ट का गठन होना था। गोडसे और आप्टे को सुप्रीम कोर्ट में अपील का मौक़ा देने के लिये 71 दिन का इन्तज़ार किया जाना सरकार को मन्ज़ूर नहीं था। इसलिये सुप्रीम कोर्ट के गठन के 71 दिन पहले गोडसे और आप्टे को फाँसी पर लटका दिया गया।

अपनी जान बचाने के लिये रहम की अपील करना गोडसे को मन्ज़ूर नहीं था।

नत्थूराम गोडसे को भी शायद पता न हो कि उसने सिर्फ़ गान्धी जी की हत्या ही नहीं की थी, बल्कि एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा दिया था। यह प्रश्न चिन्ह इतिहास के प्रति हमारी समझ पर भी था और गान्धीवाद पर भी।

गोडसे को फाँसी पर लटकाये जाने के बावजूद उस प्रश्नचिन्ह को फाँसी नहीं दी जा सकी, जो गोडसे लगाकर चला गया था। उस दौर के इतिहास की हमारी समझ पर वह प्रश्नचिन्ह अभी भी है, बल्कि अब और बड़ा हो गया है। उस प्रश्नचिन्ह से बचने के लिये कुछ लोगों को यह ज़रूरी लगता होगा कि गोडसे की बात ही न की जाये।

31 जुलाई, 1947 को गान्धी जी रावलपिण्डी में थे। 5 अगस्त को उन्होंने पोठोहार के इलाके के हसन अब्दाल में गुरुद्वारा पंजा साहिब में संगत को भाषण दिया। फिर वह वाह के रिफ्यूजी कैम्प में रह रहे हिन्दुओं, सिखों से भी मिले। 6 अगस्त को वह लाहौर पहुँचे और वहाँ के हिन्दुओं और सिखों को भाषण दिया।

गान्धी जी वहाँ के हिन्दुओं, सिखों को उपदेश दे रहे थे कि उनको नये बनने जा रहे पाकिस्तान में ही रहना चाहिये। लाहौर के कई हिन्दू, सिख ऐसे थे, जिनको गान्धी जी का पाकिस्तान में रुके रहने का सुझाव सही नहीं लगा। वे अपने घर छोड़कर नये भारत में आ गये और इस तरह वे क़त्लेआम से बच गये। जो लोग गान्धी जी के कहने में आकर 6 अगस्त के बाद भी वहीं रुके रहे, उनका क्या हाल हुआ, वह मैं अपनी कई वीडिओज़ में बता चुका हूँ।

पाकिस्तान बनने के बाद तक भी गान्धी जी यही कहते रहे कि पाकिस्तान के हिन्दुओं, सिखों को वहीं पाकिस्तान में ही रहते रहना चाहिये।

वही गान्धी जी दिसम्बर का महीना आते-आते पाकिस्तान के बहावलपुर के नवाब को अपील करते दिखे कि वहाँ फसे हिन्दुओं को भारत पहुँचाया जाये।

ऐसा नहीं था कि किसी हरमन-प्यारे नेता को अचानक ही किसी नत्थूराम गोडसे ने उठकर क़त्ल कर दिया था। 1947 के साल ने ही कई बार यह इशारा किया था कि बहुत सारे लोगों में गान्धी जी के लिये ग़ुस्सा था। गान्धी जी की सभाओं में बदअमनी फैलने लगी थी। गान्धी जी के क़त्ल की इबारत 1947 में ही लिखी जा चुकी थी। यह अलग बात है कि उस इबारत को गान्धी जी पढ़ नहीं पाये होंगे।

गान्धी जी की हत्या करने की कोशिश एक रिफ्यूजी मदन लाल पाहवा ने भी की थी, लेकिन वह नाकाम रहा। गान्धी जी की हत्या नत्थूराम गोडसे के हाथों होनी ही लिखी थी।

आज उन ब्राह्मणों को भी याद कर लूँ, जिनको गान्धी जी की हत्या के बाद बम्बई स्टेट में सिर्फ़ इस लिये क़त्ल कर दिया गया था, क्योंकि नत्थूराम गोडसे भी एक ब्राह्मण था। वह एक चितपावन ब्राह्मण था। गान्धी जी की हत्या के बाद कई ब्राह्मणों, ख़ास करके चितपावन ब्राह्मणों को नये आज़ाद हुये भारत में अपनी जान गंवानी पड़ी थी।

नत्थूराम गोडसे और नारायण दत्तात्रेय आप्टे की फाँसी मुझे गान्धी जी की याद दिलाती है। गान्धी जी को याद करते ही लाखों लोगों का क़त्लेआम भी फिर से मन को विचलित करने लगता है। वह क़त्लेआम कभी भूल सकता है क्या? वह क़त्लेआम कभी भुलाया जाना चाहिए क्या?

~ स्वामी अमृत पाल सिंघ ‘अमृत’

20 जुलाई/पुण्य-तिथि
एक विस्मृत विप्लवी बटुकेश्वर दत्त

यह इतिहास की विडम्बना है कि अनेक क्रान्तिकारी स्वतन्त्रता के युद्ध में सर्वस्व अर्पण करने के बाद भी अज्ञात या अल्पज्ञात ही रहे। ऐसे ही एक क्रान्तिवीर बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवम्बर, 1910 को ग्राम ओएरी खंडा घोष (जिला बर्दमान, बंगाल) में श्री गोष्ठा बिहारी दत्त के घर में हुआ था। वे एक दवा कंपनी में काम करते थे, जो बाद में कानपुर (उ.प्र.) में रहने लगे। इसलिए बटुकेश्वर दत्त की प्रारम्भिक शिक्षा पी.पी.एन हाईस्कूल कानपुर में हुई। उन्होंने अपने मित्रों के साथ‘कानपुर जिमनास्टिक क्लब’ की स्थापना भी की थी।

उन दिनों कानपुर क्रान्तिकारियों का एक बड़ा केन्द्र था। बटुकेश्वर अपने मित्रों में मोहन के नाम से प्रसिद्ध थे। भगतसिंह के साथ आठ अपै्रल, 1929 को दिल्ली के संसद भवन में बम फेंकने के बाद वे चाहते, तो भाग सकते थे; पर क्रान्तिकारी दल के निर्णय के अनुसार दोनों ने गिरफ्तारी दे दी।

छह जून, 1929 को न्यायालय में दोनों ने एक लिखित वक्तव्य दिया, जिसमें क्रान्तिकारी दल की कल्पना,इन्कलाब जिन्दाबाद का अर्थ तथा देश की व्यवस्था में आमूल परिवर्तन की बातें कही गयीं थीं। 25 जुलाई, 1929 को उन्होेंने गृहमन्त्री के नाम एक पत्र भी लिखा,जिसमें जेल में राजनीतिक बन्दियों पर हो रहे अत्याचार एवं उनके अधिकारों की चर्चा की गयी है। उन्होंने अन्य साथियों के साथ इस विषय पर 114 दिन तक भूख हड़ताल भी की।

भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू को फाँसी घोषित हुई,जबकि दत्त को आजीवन कारावास। इस पर भगतसिंह ने उन्हें एक पत्र लिखा। उसमें कहा गया है कि हम तो मर जायेंगे; पर तुम जीवित रहकर दिखा दो कि क्रान्तिकारी जैसे हँस कर फाँसी चढ़ता है, वैसे ही वह अपने आदर्शों के लिए हँसते हुए जेल की अन्धकारपूर्ण कोठरियों में यातनाएँ और उत्पीड़न भी सह सकता है।

23 मार्च, 1931 को लाहौर जेल में भगतसिंह आदि को फाँसी हुई और बटुकेश्वर दत्त को पहले अंदमान और फिर 1938 में पटना जेल में रखा गया। जेल में वे क्षय रोग तथा पेट दर्द से पीड़ित हो गये। आठ सितम्बर, 1938 को वे कुछ शर्तों के साथ रिहा किये गये; पर1942 में फिर भारत छोड़ो आंदोलन में जेल चले गये। 1945 में वे पटना में अपने बड़े भाई के घर में नजरबंद किये गये।

1947 में हजारीबाग जेल से मुक्त होकर वे पटना में ही रहने लगे। इतनी लम्बी जेल के बाद भी उनका उत्साह जीवित था। 36 वर्ष की अवस्था में उन्होंने आसनसोल में सादगीपूर्ण रीति से अंजलि दत्त से विवाह किया। भगतसिंह की माँ विद्यावती जी उन्हें अपना दूसरा बेटा मानती थीं।

पटना में बटुकेश्वर दत्त को बहुत आर्थिक कठिनाई झेलनी पड़ी। उन्होंने एक सिगरेट कंपनी के एजेंट की तथा पत्नी ने एक विद्यालय में 100 रु0 मासिक पर नौकरी की। 1963 में कुछ समय के लिए वे विधान परिषद में मनोनीत किये गये; पर वहाँ उन्हें काफी विरोध सहना पड़ा। उनका मन इस राजनीति के अनुकूल नहीं बना था।

1964 में स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर पहले पटना के सरकारी अस्पताल और फिर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में उनका इलाज हुआ। उन्होंने बड़ी वेदना से कहा कि जिस दिल्ली की संसद में मैंने बम फेंका था,वहाँ मुझे स्ट्रेचर पर आना पड़ेगा, यह कभी सोचा भी नहीं था।

बीमारी में माँ विद्यावती जी उनकी सेवा में लगी रहीं। राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और उनके कई पुराने साथी उनसे मिले। 20 जुलाई, 1965 की रात में दो बजे इस क्रान्तिवीर ने शरीर छोड़ दिया। उनका अन्तिम संस्कार वहीं हुआ, जहाँ भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के शव जलाये गये थे। अपने मित्रों और माता विद्यावती के साथ बटुकेश्वर दत्त आज भी वहाँ शान्त सो रहे हैं।


प्रत्येक जीवात्मा सुख पाना चाहती है निरन्तर सुख की ओर दौड़ रही है परंतु मंजिल प्राप्त नहीं कर पा रही है।
भोग योनियाँ तो बन्धन में हैं

न तृतीये तथा उप्लब्धे: वेदांतदर्शन३-१-१८,
अर्थात उनके लिए तो वैसे ही सुविधा नहीं वे तो निम्न योनि के प्राणी हैं मगर जो मानवयोनि पितृयान को प्राप्त कर देवयान अर्थात मोक्ष मार्ग का सुख लेना चाहती है उनके लिए सुंदर अवसर है।
ऐसा नहीं है कि उन्हें ज्ञान नहीं, ज्ञान भी प्राप्त कर ज्ञानी हो जाती है परंतु फिर भी मंजिल नहीं मिल पाती,
क्योंकि एक भूल उससे हो
रही है जो कि रोड़ा है पद, पैसा, प्रतिष्ठा, पुत्र पति पत्नी-परिवार से मोह,
परमात्मा को यह सब चाहिए नहीं,
क्योंकि उसके पास जाने वाला भी उसके परिवार का सदस्य है और नहीं जाने वाला भी।
वह तो आपका निष्काम भाव से किया कर्म और अपने प्रति श्रद्धा भक्ति देखता है।
अतः भूल से बचें, मूल को पकड़ें, विकृति की आयी धूल छंटने पर पूर्ण प्रकाश पूर्ण सुख
-दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या

+91 96715 03782:

ब्रह्माकुमारी या भ्रमकुमारी


हमारी हिन्दू कौम का कैसा दुर्भाग्य है कि इसमे जो भी चाहता है परमात्मा बन बैठता है। कोई मनुष्य बनना ही नहीँ चाहता। मुसलमानो मेँ यदि कोई पैगम्बर बनने का दावा करे तो उसे तुरन्त छुरे से कत्ल कर दिया जायेगा। ईसाइयो मेँ भी कोई ईसा का अवतार नहीँ हो सकता। पर हमारे यहाँ जो चाहता है झट अवतार बनकर मोक्ष का ठेकेदार बन जाता है। आज हम एक ऐसे ही वेद विरोधी ‘ब्रह्मकुमारी’ सम्प्रदाय के पाखण्ड का भण्डाफोड़ करेगेँ। ये मत वेद, शास्त्र, उपनिषद स्मृतियाँ आदि को नहीँ मानता अपितु उनका घोर निदंक है। इस मत की मुख्य पुस्तक ‘साप्ताहिक सत्संग’ नाम की किताब है जिसमेँ इस मत की सभी कल्पनायेँ लिखी हुई है|

ब्रह्माकुमारी- जैसे आत्मा एक ज्योति बिन्दु है वैसे ही आत्माओँ का पिता अर्थात्‌ परमात्मा भी ज्योति बिन्दु ही है।(सा॰स पृ॰51)
क्या पिता कभी अपने पुत्रोँ मेँ सर्वव्यापक होता है? परमात्मा तो सर्व आत्माओँ का पिता है, वह सब मेँ सर्वव्यापक नहीँ है (सा॰स पृ॰ 55)
आर्यसिद्धातीँ- वेदादि समस्त शास्त्रो मेँ परमेश्वर को सर्वव्यापक माना है, सर्वव्यापक होने से ही परमात्मा, सर्वाधार, सर्वत्र, सर्वान्तर्यामीँ, अनन्त, विश्व का सृजक, पालक एवं संचालक हो सकता है। उसे एक देशीय मानने से ये सब असम्भ होगा। और ये कहना कि पिता पुत्र मेँ व्यापक नहीँ होता है बच्चो की सी बात है। जो यह प्रकट करती है कि इनका सम्प्रदाय प्रवर्तक साधारण सी बुद्धि भी नहीँ रखता था। पिता व पुत्र दो पृथक एक देशीय सत्तायेँ हैँ। पिता पत्नी मेँ बीजाधान करके सन्तान के शरीर के लिए आधार बनाता है। जैसे लेखक कलम से किताब लिखता है, सैनिक बन्दूक से गोली मारता है, अब ऐसे कर्ता को कार्य मेँ व्यापक होने का प्रश्न उठाना पागलो जैसी बात है।
बह्मकुमारी- परमपिता परमात्मा ज्योति बिन्दु शिव कलियुग के अन्त मेँ परम धाम से अवतरित होकर एक साधारण मनुष्य के तन मेँ दिव्य प्रवेश करते हैँ और उसका नाम रखते हैँ “प्रजा पिता ब्रह्मा” उसके द्वारा ही वे सृष्टि को कलियुगी से सतयुगी बनाते हैँ। (पृ॰46)

आर्यसिद्धान्ती- ब्रह्माकुमारियो ! तुम सब लेखराज द्वारा बहका दी गई हो तो ईश्वर के बारे मेँ तुम कुछ भी नहीँ समझ सकती हो। जब तुम्हारा फर्जी त्रिमूर्ति शिव कहीँ ऊपर आसमान मेँ बैठा रहता है यहां पृथ्वी पर नहीँ रहता है, तो ऐसे परदेशी खुदा के मानने से कोई लाभ नहीँ होगा। यदि वह यहां आकर रहने लगे तो विश्वास रखो कि हम उसे गोली नहीँ मारेगेँ, शीशे मेँ बन्द करके उसे प्रदर्शनी मेँ बैठाकर सभी को हम उसे दिखावेगे कि यह ब्रह्माकुमारियो का डरपोक परमात्मा है जो बहुत ऊपर आकाश मेँ लटका रहता है। यदि हो सके तो उस अपने परमात्मा को मय उसकी बीवी के बुलवा लो। लेखराज तो बुढ़ापे मेँ औरतोँ का गुरू बना था और ऐश करते करते मर भी गया तथा तुम चेलियोँ को रोता-बिलखता छोड़ गया। यदि परमात्मा होता तो क्योँ मर जाता ?? और वो भी बिना अपना वादा पूरा किये जो उसने अपनी किताब के पृष्ठ 74 पर किया था ।।
ब्रह्माकुमारी- त्रिमूर्ति भगवान (लेखराज) अब से आठ वर्षोँ मेँ सतयुगी देवी सृष्टि की पुनः स्थापना और कलियुगी आसुरी स्वभाव वाले मनुष्यो की पुरानी सृष्टि का विनाश ईश्वरीय योजना के अनुसार अभी होने को है (पृ॰31) जिससे पूर्व ही सभी परमात्मा के द्वारा जन्म जन्मान्तर अधिकार स्वर्ग के रचयिता परमात्मा द्वारा प्राप्त कर सकते हैँ (सतयुग मेँ स्वर्गवासी कैसे बनेँ पृ॰33-34)

आर्यसिद्धान्ती- उपरोक्त वाक्य ब्रह्मकुमारियो के गुरू दादा लेखराज ने कहे थे। दुनिया के विनाश व चेले-चेलियो के उद्धार का ठेकेदार महाझूठा लेखराज मरमात्मा बनता था और सृष्टि का विनाश कराने व चेलियो को स्वर्ग अपने साथ ले जाने को आया था पर वो तो खुद ही मर गया। उसकी समझदार चेलियां व चेले उसे सौ बार धिक्कारते होगे कि कम्बख्त धोखा दे गया और हमेँ रोता पीटता छोड़ गया। झूठे परमात्मा बनने वालो की पोल जल्दी खुल जाती है।

ब्रह्मकुमारी- सृष्टि के इतिहास की हूबहू हर 5000 वर्ष बाद पुनरावृति हुआ करती है।
(पृ॰93)

आर्यसिद्धान्ती- यदि किसी को विद्या न आती हो तो चुप रहने से मूर्खता छिपी रहती है। झूठे लेखराज की बुद्धिहीनता उसकी मूर्खता प्रकट करती है। भारत की सभ्यता करोड़ो वर्ष पुरानी है। राम रावण को हुए ही लाखो वर्ष बीत चुके हैँ। तब से आजतक पुनः राम रावण का पूर्व जैसा संग्राम नहीँ हुआ। श्रीकृष्ण को ही 5000 वर्ष बीच चुके हैँ। और यदि लेखराज श्रीकृष्ण का अवतार होता तो उसे भी सुदर्शन चक्रधारी महावीर योद्धा होना चाहिए था। किन्तु वह तो ऐश ही करता रहा। चीन और पाकिस्तान भारत पर चढ़ बैठे पर वो कहीँ लड़ने मरने नहीँ गया।

ब्रह्माकुमारी- भगवान का अवतरण धर्म की अत्यन्त ग्लानि के समय अर्थात्‌ कलियुग के अन्त मेँ होता है। (पृ॰141)

आर्यसिद्धान्ती- तुम गीता की आड़ मेँ पाखण्ड फैलाना चाहती हो। गीता ने धर्म की ग्लानि के समय अवतार की बात की और उसी की नकल मेँ तुमने लेखराज को अवतार बनाकर अपना पन्थ चला डाला। जब गीता को मानती ही नहीँ, उसमेँ मिलावट मानती हो तो उसके इस सिद्धान्त को ही क्योँ स्वार्थवश ठीक मान बैठी हो?

ब्रह्माकुमारी- एक युग 5000 वर्ष का होता है जिनमेँ सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग यह चारोँ युग 1250 वर्ष के प्रत्येक होते हैँ। इन चारो मेँ प्रत्येक मनुष्यात्मा को कुल 84 बार जन्म लेना पड़ता है (पृ॰128-134 का सारांश)

आर्यसिद्धान्ती- तुमने जो ऊटपटांग कल्पना युगो की कर रखी है उसकी पुष्टि मेँ कोई प्रमाण तुम नहीँ दे सकती हो। ऐसी कल्पनाएं शेख चिल्ली किया करते हैँ। तुम्हारा लेखराज तो बेपढ़ा लिखा हर समय औरतोँ के चक्कर मेँ फँसा रहने वाला व्यक्ति था। जो ऊँट पटांग कल्पना करके तुम जैसी अबोध औरतो को फँसाया करता था।
ब्रह्मकुमारी- श्रीकृष्ण ही श्री नारायण थे और वे द्वापर मेँ नहीँ बल्कि पावन सृष्टि अर्थात्‌ सतयुग मेँ हुए थे। (पृ॰141)

आर्यसिधान्ती- श्रीकृष्णजी युधिष्ठिर के समकालीन महाभारत काल के थे। युधिष्ठिर संवत्‌ भी तब से चला आ रहा है जो अब पाँच हजार के लगभग है। कलियुग का प्रारम्भ भारतीय ज्योतिर्विदो के आधार पर महाभारत के बाद हुआ था। तो श्रीकृष्ण का काल सतयुग बताना तुम्हारी मूर्खता है।

ब्रह्माकुमारी- श्रीकृष्ण श्रीराम से पहले हुए थे। परन्तु आज लोगोँ को यह वास्तविक ज्ञान नहीँ है।

आर्यसिद्धान्ती- यह बात तुम्हारी महामूर्खता को पूर्ण सिद्ध करती है क्योँकि गीता मेँ श्रीकृष्ण ने कहा है “पवनः पवनाभस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्‌। अर्थात्‌ शस्त्रधारियो मे मैँ राम हूँ, इस प्रकार श्रीकृष्ण द्वारा श्रीराम का उदाहरण देकर राम को अपने से पूर्व होना घोषित किया है। इससे स्पष्ट है कि लेखराज शेखचिल्ली था जिसने गीता भी नहीँ पढ़ी थी।

ब्रह्मकुमारी- परमपिता शिव ज्योतिर्बिन्दु हैँ। वह परमधाम के वासी हैँ जहां पर प्रकाश ही प्रकाश है।”(पृ॰167)

आर्यसिद्धान्ती- जब तुम्हारा परमात्मा इस पृथ्वी का वासी नहीँ है तो उस विदेशी की उपासना क्यो करती है ? क्या धरती पर उसे प्लेग खा जायेगी? यदि वह बिन्दु है तो उसके अस्तित्व का ही क्या प्रमाण है? कहीँ वर्षा के जल मेँ बह न गया हो। कैसी हास्यास्पद कल्पना है पाखण्डियो की।

ब्रह्मकुमारी- वेद उपनिषद पुराण हमारे धर्मशास्त्र नहीँ हैँ। हमारा धर्म का शास्त्र तो गीता है। (पृ॰182)

आर्यसिद्धान्ती- वेदोँ के जिन्होनेँ दर्शन नहीँ किये, उपनिषद आदि का ज्ञान इसलिए नहीँ हुआ क्योकि संस्कृत पढ़ी ही नहीँ थी। अतः उनकी वे ही मूर्ख लोग निन्दा करते हैँ। गीता की तो आढ़ इसीलिए लेती हो क्योकि तुम्हे लेखराज को अवतार बताकर अपना ढोगी पन्थ चलाना है।
ब्रह्माकुमारी- रामायण तो एक नावेल है जिसमेँ 101 प्रतिशत गपशप डाल दी है (घोर कलह-युग विनाश पृ॰15)

आर्यसिद्धान्ती- संसार के ढेरो विद्वान और ऐतिहासिक व्यक्ति रामायण को सत्य घटना का ग्रन्थ मानते हैँ पर तुम्हारा कुपढ़ लेखराज वेद शास्त्र, रामायण आदि के अस्तित्व को भी नहीँ मानता है। उसने रामायण को उपन्यास लिखने का कमीनापन किया है, इसके प्रमाण मेँ उसने क्या दलील दी है? अथवा चेलियाँ बतावेँ की लेखराज के पास क्या प्रमाण है?

उपसंहार- इस महादुष्ट सम्प्रदाय के बारे क्या और कहाँ तक लिखे? ये सब सत्य शास्त्रों के घोर निन्दक और महानीच हैँ। अधिकतर इस मत की औरतें भगाई हुई बहेतू होती हैं। सभी नागरिकों को चाहिए कि इनके अड्डो में अपनी बहु-बेटियों को न जाने दें, क्योंकि औरतें ही इनका पहला शिकार होती हैं।
संदीप आर्य Mumbai: ✅✅✅

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⁠⁠⁠बाल समय रवि भक्ष लियो तब तीनहुं लोक भयो अंधियारो
युग सहस्र योजन पर भानु।लील्यो ताहि मधुर फल जानू

क्या हनुमान जी ने सूर्य को निगल लिया था

श्री हनुमान जी पर यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है ।कई लोग कहते हैं कि धार्मिक विषय पर कोई भी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाना चाहिए। चुपचाप स्वीकार कर लेना चाहिए ।परन्तु सच्चाई इस से बिल्कुल अलग है ।महर्षि मनु कहते हैं जो तर्क से जाना जाए वह धर्म है । धर्म मैजिक (जादू) नही लॉजिक (तर्क) पर आधारित है।
अब जरा इस विषय पर विचार करें हम सभी जानते हैं सूर्य पृथ्वी से करोड़ो गुना बड़ा है और सूर्य पृथ्वी से लगभग 15 करोड़ किलोमीटर दूर है ।तीसरे महत्वपूर्ण बात है सूर्य अत्यंत गर्म हैं ।
हनुमान जी के सूर्य निगलने पर विचार करते हैं कहते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि हनुमानजी के पास अणिमा गरिमा आदि सिद्धियां थी जिसके कारण वह शरीर को बड़ा कर सकते थे। चलिए अभी हम अणिमा गरिमा क्या है इस विषय पर विचार बाद में करेंगे पहले शरीर बड़ा करने पर विचार करते हैं ।
मान लीजिए एक गुब्बारा है जब हम उसमें हवा भरते हैं वह बड़ा हो जाता है। बाहर की हवा गुब्बारे के अंदर चली जाती है हमें लगता है कि गुब्बारा बड़ा हो गया है। यदि हम हनुमानजी का शरीर बड़ा करने का गुण भी स्वीकार करें तो शरीर बड़ा करने के लिए सारी धरती का पानी और धरती की हवा हनुमान जी के शरीर में समा जाए तो भी हनुमान जी सूर्य से छोटे ही रहेंगे क्योंकि वायुमंडल की संपूर्ण वायु और पृथ्वी के समुद्रों का सारा जल भी मिला लिया जाए सूर्य के मुकाबले नगण्य है। हनुमान जी का सूर्य को निगलना केवल एक कल्पना है। इसका सच्चाई से कोई संबंध नहीं है आप इसे स्वीकार करें या ना करें यह आप पर निर्भर है ।
वाल्मीकि रामायण के लगभग 10 संस्करण उपलब्ध हैं। उनमें से 1 या 2 संस्करणों में यह कहानी मिलती है। जहां यह कहानी मिलती है वहां इसका कोई प्रकरण ही नही है। साफ साफ पता चलता है कि इसे बाद में मिलाया गया है।
अब अणिमा और गरिमा आदि सिद्धियों के विषय में जानते हैं। अणिमा सिद्धि का अर्थ है चित्त का छोटी से छोटी बातों को जानने में सक्षम होना। गरिमा सिद्धि का अर्थ है विशाल ज्ञान को एक समय में एक साथ धारण करना । यह सिद्धियां मानसिक हैं ना कि शारीरिक।
आप विचार करने के लिए स्वतंत्र हैं। सहमति और असहमति आपका अधिकार है। इस लेख के पीछे किसी की मानसिकता का अपमान
ओर मर्यादापुरुषोत्तमश्रीराम ने वालि को बताई थी मरते समय चार बाते।

रामायण में जब श्रीराम ने बालि को बाण मारा तो वह घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा था। इस अवस्था में जब पुत्र अंगद उसके पास आया तब बालि ने उसे ज्ञान की कुछ बातें बताई थीं। ये बातें आज भी हमें कई परेशानियों से बचा सकती हैं। यहां जानिए ये बातें कौन सी हैं..
मरते समय बालि ने अंगद %