Vedic Lekh


प्रत्येक जीवात्मा सुख पाना चाहती है निरन्तर सुख की ओर दौड़ रही है परंतु मंजिल प्राप्त नहीं कर पा रही है।
भोग योनियाँ तो बन्धन में हैं

न तृतीये तथा उप्लब्धे: वेदांतदर्शन३-१-१८,
अर्थात उनके लिए तो वैसे ही सुविधा नहीं वे तो निम्न योनि के प्राणी हैं मगर जो मानवयोनि पितृयान को प्राप्त कर देवयान अर्थात मोक्ष मार्ग का सुख लेना चाहती है उनके लिए सुंदर अवसर है।
ऐसा नहीं है कि उन्हें ज्ञान नहीं, ज्ञान भी प्राप्त कर ज्ञानी हो जाती है परंतु फिर भी मंजिल नहीं मिल पाती,
क्योंकि एक भूल उससे हो
रही है जो कि रोड़ा है पद, पैसा, प्रतिष्ठा, पुत्र पति पत्नी-परिवार से मोह,
परमात्मा को यह सब चाहिए नहीं,
क्योंकि उसके पास जाने वाला भी उसके परिवार का सदस्य है और नहीं जाने वाला भी।
वह तो आपका निष्काम भाव से किया कर्म और अपने प्रति श्रद्धा भक्ति देखता है।
अतः भूल से बचें, मूल को पकड़ें, विकृति की आयी धूल छंटने पर पूर्ण प्रकाश पूर्ण सुख
-दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या

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ब्रह्माकुमारी या भ्रमकुमारी


हमारी हिन्दू कौम का कैसा दुर्भाग्य है कि इसमे जो भी चाहता है परमात्मा बन बैठता है। कोई मनुष्य बनना ही नहीँ चाहता। मुसलमानो मेँ यदि कोई पैगम्बर बनने का दावा करे तो उसे तुरन्त छुरे से कत्ल कर दिया जायेगा। ईसाइयो मेँ भी कोई ईसा का अवतार नहीँ हो सकता। पर हमारे यहाँ जो चाहता है झट अवतार बनकर मोक्ष का ठेकेदार बन जाता है। आज हम एक ऐसे ही वेद विरोधी ‘ब्रह्मकुमारी’ सम्प्रदाय के पाखण्ड का भण्डाफोड़ करेगेँ। ये मत वेद, शास्त्र, उपनिषद स्मृतियाँ आदि को नहीँ मानता अपितु उनका घोर निदंक है। इस मत की मुख्य पुस्तक ‘साप्ताहिक सत्संग’ नाम की किताब है जिसमेँ इस मत की सभी कल्पनायेँ लिखी हुई है|

ब्रह्माकुमारी- जैसे आत्मा एक ज्योति बिन्दु है वैसे ही आत्माओँ का पिता अर्थात्‌ परमात्मा भी ज्योति बिन्दु ही है।(सा॰स पृ॰51)
क्या पिता कभी अपने पुत्रोँ मेँ सर्वव्यापक होता है? परमात्मा तो सर्व आत्माओँ का पिता है, वह सब मेँ सर्वव्यापक नहीँ है (सा॰स पृ॰ 55)
आर्यसिद्धातीँ- वेदादि समस्त शास्त्रो मेँ परमेश्वर को सर्वव्यापक माना है, सर्वव्यापक होने से ही परमात्मा, सर्वाधार, सर्वत्र, सर्वान्तर्यामीँ, अनन्त, विश्व का सृजक, पालक एवं संचालक हो सकता है। उसे एक देशीय मानने से ये सब असम्भ होगा। और ये कहना कि पिता पुत्र मेँ व्यापक नहीँ होता है बच्चो की सी बात है। जो यह प्रकट करती है कि इनका सम्प्रदाय प्रवर्तक साधारण सी बुद्धि भी नहीँ रखता था। पिता व पुत्र दो पृथक एक देशीय सत्तायेँ हैँ। पिता पत्नी मेँ बीजाधान करके सन्तान के शरीर के लिए आधार बनाता है। जैसे लेखक कलम से किताब लिखता है, सैनिक बन्दूक से गोली मारता है, अब ऐसे कर्ता को कार्य मेँ व्यापक होने का प्रश्न उठाना पागलो जैसी बात है।
बह्मकुमारी- परमपिता परमात्मा ज्योति बिन्दु शिव कलियुग के अन्त मेँ परम धाम से अवतरित होकर एक साधारण मनुष्य के तन मेँ दिव्य प्रवेश करते हैँ और उसका नाम रखते हैँ “प्रजा पिता ब्रह्मा” उसके द्वारा ही वे सृष्टि को कलियुगी से सतयुगी बनाते हैँ। (पृ॰46)

आर्यसिद्धान्ती- ब्रह्माकुमारियो ! तुम सब लेखराज द्वारा बहका दी गई हो तो ईश्वर के बारे मेँ तुम कुछ भी नहीँ समझ सकती हो। जब तुम्हारा फर्जी त्रिमूर्ति शिव कहीँ ऊपर आसमान मेँ बैठा रहता है यहां पृथ्वी पर नहीँ रहता है, तो ऐसे परदेशी खुदा के मानने से कोई लाभ नहीँ होगा। यदि वह यहां आकर रहने लगे तो विश्वास रखो कि हम उसे गोली नहीँ मारेगेँ, शीशे मेँ बन्द करके उसे प्रदर्शनी मेँ बैठाकर सभी को हम उसे दिखावेगे कि यह ब्रह्माकुमारियो का डरपोक परमात्मा है जो बहुत ऊपर आकाश मेँ लटका रहता है। यदि हो सके तो उस अपने परमात्मा को मय उसकी बीवी के बुलवा लो। लेखराज तो बुढ़ापे मेँ औरतोँ का गुरू बना था और ऐश करते करते मर भी गया तथा तुम चेलियोँ को रोता-बिलखता छोड़ गया। यदि परमात्मा होता तो क्योँ मर जाता ?? और वो भी बिना अपना वादा पूरा किये जो उसने अपनी किताब के पृष्ठ 74 पर किया था ।।
ब्रह्माकुमारी- त्रिमूर्ति भगवान (लेखराज) अब से आठ वर्षोँ मेँ सतयुगी देवी सृष्टि की पुनः स्थापना और कलियुगी आसुरी स्वभाव वाले मनुष्यो की पुरानी सृष्टि का विनाश ईश्वरीय योजना के अनुसार अभी होने को है (पृ॰31) जिससे पूर्व ही सभी परमात्मा के द्वारा जन्म जन्मान्तर अधिकार स्वर्ग के रचयिता परमात्मा द्वारा प्राप्त कर सकते हैँ (सतयुग मेँ स्वर्गवासी कैसे बनेँ पृ॰33-34)

आर्यसिद्धान्ती- उपरोक्त वाक्य ब्रह्मकुमारियो के गुरू दादा लेखराज ने कहे थे। दुनिया के विनाश व चेले-चेलियो के उद्धार का ठेकेदार महाझूठा लेखराज मरमात्मा बनता था और सृष्टि का विनाश कराने व चेलियो को स्वर्ग अपने साथ ले जाने को आया था पर वो तो खुद ही मर गया। उसकी समझदार चेलियां व चेले उसे सौ बार धिक्कारते होगे कि कम्बख्त धोखा दे गया और हमेँ रोता पीटता छोड़ गया। झूठे परमात्मा बनने वालो की पोल जल्दी खुल जाती है।

ब्रह्मकुमारी- सृष्टि के इतिहास की हूबहू हर 5000 वर्ष बाद पुनरावृति हुआ करती है।
(पृ॰93)

आर्यसिद्धान्ती- यदि किसी को विद्या न आती हो तो चुप रहने से मूर्खता छिपी रहती है। झूठे लेखराज की बुद्धिहीनता उसकी मूर्खता प्रकट करती है। भारत की सभ्यता करोड़ो वर्ष पुरानी है। राम रावण को हुए ही लाखो वर्ष बीत चुके हैँ। तब से आजतक पुनः राम रावण का पूर्व जैसा संग्राम नहीँ हुआ। श्रीकृष्ण को ही 5000 वर्ष बीच चुके हैँ। और यदि लेखराज श्रीकृष्ण का अवतार होता तो उसे भी सुदर्शन चक्रधारी महावीर योद्धा होना चाहिए था। किन्तु वह तो ऐश ही करता रहा। चीन और पाकिस्तान भारत पर चढ़ बैठे पर वो कहीँ लड़ने मरने नहीँ गया।

ब्रह्माकुमारी- भगवान का अवतरण धर्म की अत्यन्त ग्लानि के समय अर्थात्‌ कलियुग के अन्त मेँ होता है। (पृ॰141)

आर्यसिद्धान्ती- तुम गीता की आड़ मेँ पाखण्ड फैलाना चाहती हो। गीता ने धर्म की ग्लानि के समय अवतार की बात की और उसी की नकल मेँ तुमने लेखराज को अवतार बनाकर अपना पन्थ चला डाला। जब गीता को मानती ही नहीँ, उसमेँ मिलावट मानती हो तो उसके इस सिद्धान्त को ही क्योँ स्वार्थवश ठीक मान बैठी हो?

ब्रह्माकुमारी- एक युग 5000 वर्ष का होता है जिनमेँ सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग यह चारोँ युग 1250 वर्ष के प्रत्येक होते हैँ। इन चारो मेँ प्रत्येक मनुष्यात्मा को कुल 84 बार जन्म लेना पड़ता है (पृ॰128-134 का सारांश)

आर्यसिद्धान्ती- तुमने जो ऊटपटांग कल्पना युगो की कर रखी है उसकी पुष्टि मेँ कोई प्रमाण तुम नहीँ दे सकती हो। ऐसी कल्पनाएं शेख चिल्ली किया करते हैँ। तुम्हारा लेखराज तो बेपढ़ा लिखा हर समय औरतोँ के चक्कर मेँ फँसा रहने वाला व्यक्ति था। जो ऊँट पटांग कल्पना करके तुम जैसी अबोध औरतो को फँसाया करता था।
ब्रह्मकुमारी- श्रीकृष्ण ही श्री नारायण थे और वे द्वापर मेँ नहीँ बल्कि पावन सृष्टि अर्थात्‌ सतयुग मेँ हुए थे। (पृ॰141)

आर्यसिधान्ती- श्रीकृष्णजी युधिष्ठिर के समकालीन महाभारत काल के थे। युधिष्ठिर संवत्‌ भी तब से चला आ रहा है जो अब पाँच हजार के लगभग है। कलियुग का प्रारम्भ भारतीय ज्योतिर्विदो के आधार पर महाभारत के बाद हुआ था। तो श्रीकृष्ण का काल सतयुग बताना तुम्हारी मूर्खता है।

ब्रह्माकुमारी- श्रीकृष्ण श्रीराम से पहले हुए थे। परन्तु आज लोगोँ को यह वास्तविक ज्ञान नहीँ है।

आर्यसिद्धान्ती- यह बात तुम्हारी महामूर्खता को पूर्ण सिद्ध करती है क्योँकि गीता मेँ श्रीकृष्ण ने कहा है “पवनः पवनाभस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्‌। अर्थात्‌ शस्त्रधारियो मे मैँ राम हूँ, इस प्रकार श्रीकृष्ण द्वारा श्रीराम का उदाहरण देकर राम को अपने से पूर्व होना घोषित किया है। इससे स्पष्ट है कि लेखराज शेखचिल्ली था जिसने गीता भी नहीँ पढ़ी थी।

ब्रह्मकुमारी- परमपिता शिव ज्योतिर्बिन्दु हैँ। वह परमधाम के वासी हैँ जहां पर प्रकाश ही प्रकाश है।”(पृ॰167)

आर्यसिद्धान्ती- जब तुम्हारा परमात्मा इस पृथ्वी का वासी नहीँ है तो उस विदेशी की उपासना क्यो करती है ? क्या धरती पर उसे प्लेग खा जायेगी? यदि वह बिन्दु है तो उसके अस्तित्व का ही क्या प्रमाण है? कहीँ वर्षा के जल मेँ बह न गया हो। कैसी हास्यास्पद कल्पना है पाखण्डियो की।

ब्रह्मकुमारी- वेद उपनिषद पुराण हमारे धर्मशास्त्र नहीँ हैँ। हमारा धर्म का शास्त्र तो गीता है। (पृ॰182)

आर्यसिद्धान्ती- वेदोँ के जिन्होनेँ दर्शन नहीँ किये, उपनिषद आदि का ज्ञान इसलिए नहीँ हुआ क्योकि संस्कृत पढ़ी ही नहीँ थी। अतः उनकी वे ही मूर्ख लोग निन्दा करते हैँ। गीता की तो आढ़ इसीलिए लेती हो क्योकि तुम्हे लेखराज को अवतार बताकर अपना ढोगी पन्थ चलाना है।
ब्रह्माकुमारी- रामायण तो एक नावेल है जिसमेँ 101 प्रतिशत गपशप डाल दी है (घोर कलह-युग विनाश पृ॰15)

आर्यसिद्धान्ती- संसार के ढेरो विद्वान और ऐतिहासिक व्यक्ति रामायण को सत्य घटना का ग्रन्थ मानते हैँ पर तुम्हारा कुपढ़ लेखराज वेद शास्त्र, रामायण आदि के अस्तित्व को भी नहीँ मानता है। उसने रामायण को उपन्यास लिखने का कमीनापन किया है, इसके प्रमाण मेँ उसने क्या दलील दी है? अथवा चेलियाँ बतावेँ की लेखराज के पास क्या प्रमाण है?

उपसंहार- इस महादुष्ट सम्प्रदाय के बारे क्या और कहाँ तक लिखे? ये सब सत्य शास्त्रों के घोर निन्दक और महानीच हैँ। अधिकतर इस मत की औरतें भगाई हुई बहेतू होती हैं। सभी नागरिकों को चाहिए कि इनके अड्डो में अपनी बहु-बेटियों को न जाने दें, क्योंकि औरतें ही इनका पहला शिकार होती हैं।
संदीप आर्य Mumbai: ✅✅✅

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⁠⁠⁠बाल समय रवि भक्ष लियो तब तीनहुं लोक भयो अंधियारो
युग सहस्र योजन पर भानु।लील्यो ताहि मधुर फल जानू

क्या हनुमान जी ने सूर्य को निगल लिया था

श्री हनुमान जी पर यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है ।कई लोग कहते हैं कि धार्मिक विषय पर कोई भी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाना चाहिए। चुपचाप स्वीकार कर लेना चाहिए ।परन्तु सच्चाई इस से बिल्कुल अलग है ।महर्षि मनु कहते हैं जो तर्क से जाना जाए वह धर्म है । धर्म मैजिक (जादू) नही लॉजिक (तर्क) पर आधारित है।
अब जरा इस विषय पर विचार करें हम सभी जानते हैं सूर्य पृथ्वी से करोड़ो गुना बड़ा है और सूर्य पृथ्वी से लगभग 15 करोड़ किलोमीटर दूर है ।तीसरे महत्वपूर्ण बात है सूर्य अत्यंत गर्म हैं ।
हनुमान जी के सूर्य निगलने पर विचार करते हैं कहते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि हनुमानजी के पास अणिमा गरिमा आदि सिद्धियां थी जिसके कारण वह शरीर को बड़ा कर सकते थे। चलिए अभी हम अणिमा गरिमा क्या है इस विषय पर विचार बाद में करेंगे पहले शरीर बड़ा करने पर विचार करते हैं ।
मान लीजिए एक गुब्बारा है जब हम उसमें हवा भरते हैं वह बड़ा हो जाता है। बाहर की हवा गुब्बारे के अंदर चली जाती है हमें लगता है कि गुब्बारा बड़ा हो गया है। यदि हम हनुमानजी का शरीर बड़ा करने का गुण भी स्वीकार करें तो शरीर बड़ा करने के लिए सारी धरती का पानी और धरती की हवा हनुमान जी के शरीर में समा जाए तो भी हनुमान जी सूर्य से छोटे ही रहेंगे क्योंकि वायुमंडल की संपूर्ण वायु और पृथ्वी के समुद्रों का सारा जल भी मिला लिया जाए सूर्य के मुकाबले नगण्य है। हनुमान जी का सूर्य को निगलना केवल एक कल्पना है। इसका सच्चाई से कोई संबंध नहीं है आप इसे स्वीकार करें या ना करें यह आप पर निर्भर है ।
वाल्मीकि रामायण के लगभग 10 संस्करण उपलब्ध हैं। उनमें से 1 या 2 संस्करणों में यह कहानी मिलती है। जहां यह कहानी मिलती है वहां इसका कोई प्रकरण ही नही है। साफ साफ पता चलता है कि इसे बाद में मिलाया गया है।
अब अणिमा और गरिमा आदि सिद्धियों के विषय में जानते हैं। अणिमा सिद्धि का अर्थ है चित्त का छोटी से छोटी बातों को जानने में सक्षम होना। गरिमा सिद्धि का अर्थ है विशाल ज्ञान को एक समय में एक साथ धारण करना । यह सिद्धियां मानसिक हैं ना कि शारीरिक।
आप विचार करने के लिए स्वतंत्र हैं। सहमति और असहमति आपका अधिकार है। इस लेख के पीछे किसी की मानसिकता का अपमान
ओर मर्यादापुरुषोत्तमश्रीराम ने वालि को बताई थी मरते समय चार बाते।

रामायण में जब श्रीराम ने बालि को बाण मारा तो वह घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा था। इस अवस्था में जब पुत्र अंगद उसके पास आया तब बालि ने उसे ज्ञान की कुछ बातें बताई थीं। ये बातें आज भी हमें कई परेशानियों से बचा सकती हैं। यहां जानिए ये बातें कौन सी हैं..
मरते समय बालि ने अंगद से कही ये बातें बालि ने कहा
– देशकालौ भजस्वाद्य क्षममाण: प्रियाप्रिये।
सुखदु:खसह: काले सुग्रीववशगो भव।।

इस श्लोक में बालि ने अगंद को ज्ञान की तीन बातें बताई हैं…

1. देश काल और परिस्थितियों को समझो।
2. किसके साथ कब, कहां और कैसा व्यवहार करें, इसका सही निर्णय लेना चाहिए।
3. पसंद-नापसंद, सुख-दु:ख को सहन करना चाहिए और क्षमाभाव के साथ जीवन व्यतीत करना चाहिए।
बालि ने अंगद से कहा ये बातें ध्यान रखते हुए अब से सुग्रीव के साथ रहो।

आज के समय में भी यदि इन बातों का ध्यान रखा जाए तो हर इंसान बुरे समय से बच सकता है। अच्छे-बुरे हालात में शांति और धैर्य के साथ आचरण करना चाहिए।

जब बालि श्रीराम के बाण से घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, तब बालि में श्रीराम से कहा कि आप धर्म की रक्षा करते हैं तो मुझे (बालि को) इस प्रकार बाण क्यों मारा?

इस प्रश्न के जवाब में श्रीराम ने कहा कि छोटे भाई की पत्नी, बहिन, पुत्र की पत्नी और पुत्री, ये सब समान होती हैं और जो व्यक्ति इन्हें बुरी नजर से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता है। बालि, तूने अपने भाई सुग्रीव की पत्नी पर बुरी नजर रखी और सुग्रीव को मारना चाहा। इस पाप के कारण तुझे बाण मारा है। इस जवाब से बालि संतुष्ट हो गया और श्रीराम से अपने किए पापों की क्षमा याचना की। इसके बाद बालि ने अगंद को श्रीराम की सेवा में सौंप दिया।

इसके बाद बालि ने प्राण त्याग दिए। बाली की पत्नी तारा विलाप करने लगी। तब श्रीराम ने तारा को ज्ञान दिया कि यह शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु से मिलकर बना है। बालि का शरीर तुम्हारे सामने सोया है, लेकिन उसकी आत्मा अमर है तो विलाप नहीं करना चाहिए। इस प्रकार समझाने के बाद तारा शांत हुई। इसके बाद श्रीराम में सुग्रीव को राज्य सौंप दिया।

जब रावण सीता का हरण करके लंका ले गया तो सीता की खोज करते हुए श्रीराम और लक्ष्मण की भेंट हनुमान से हुई। ऋष्यमूक पर्वत पर हनुमान ने सुग्रीव और श्रीराम की मित्रता करवाई। सुग्रीव ने श्रीराम को सीता की खोज में मदद करने का आश्वासन दिया। इसके बाद सुग्रीव ने श्रीराम के सामने अपना दुख बताया कि किस प्रकार बालि ने बलपूर्वक मुझे (सुग्रीव को) राज्य से निष्कासित कर दिया है और मेरी पत्नी पर भी अधिकार कर लिया है। इसके बाद भी बालि मुझे नष्ट करने के लिए प्रयास कर रहा है। इस प्रकार सुग्रीव ने श्रीराम के सम्मुख अपनी पीड़ा बताई तो भगवान ने सुग्रीव को बालि के आतंक से मुक्ति दिलाने का भरोसा जताया।

जब श्रीराम ने सुग्रीव के शत्रु बालि को खत्म करने की बात कही थी तो सुग्रीव ने उसके पराक्रम और शक्तियों की जानकारी श्रीराम को दी। सुग्रीव ने श्रीराम को बताया कि बालि सूर्योदय से पहले ही पूर्व, पश्चिम और दक्षिण के सागर की परिक्रमा करके उत्तर तक घूम आता है। बालि बड़े-बड़े पर्वतों पर तुरंत ही चढ़ जाता है और बलपूर्वक शिखरों को उठा लेता है।

इतना ही नहीं, वह इन शिखरों को हवा में उछालकर फिर से हाथों में पकड़ लेता है। वनों में बड़े-बड़े पेड़ों को तुरंत ही तोड़ डालता है।
सुग्रीव ने बताया कि एक समय दुंदुभि नामक असुर था। वह बहुत ही शक्तिशाली और मायावी था। इस असुर की ऊंचाई कैलाश पर्वत के समान थी और वह किसी भैंसे की तरह दिखाई देता था। दुंदुभि एक हजार हाथियों का बल रखता था।

अपार बल के कारण वह घमंड से भर गया था। इसी घमंड में वह समुद्र देव के सामने पहुंच गया और युद्ध के लिए उन्हें ललकारने लगा। तब समुद्र ने दुंदुभि से कहा कि मैं तुमसे युद्ध करने में असमर्थ हूं। गिरिराज हिमालय तुमसे युद्ध कर सकते हैं, अत: तुम उनके पास जाओ। इसके बाद वह हिमालय के पास युद्ध के लिए पहुंच गया। तब हिमालय ने दुंदुभि को बालि से युद्ध करने की बात कही।

इस कारण ऋष्यमूक पर्वत पर नहीं जाता था बालि
सुग्रीव ने बताया कि बालि देवराज इंद्र का पुत्र है, इस कारण वह परम शक्तिशाली है। जब दुंदुभि ने बालि को युद्ध के लिए ललकारा तो उसने विशालकाय दुंदुभि को बुरी तरह-तरह मार-मारकर परास्त कर दिया था। जब पर्वत के आकार का भैंसा दुंदुभि मारा गया तो बालि ने दोनों हाथों से उठाकर उसके शव को हवा में फेंक दिया। हवा में उड़ते हुए शव से रक्त की बूंदें मतंग मुनि के आश्रम में जा गिरीं। इन रक्त की बूंदों से मतंग मुनि का आश्रम अपवित्र हो गया।

इस पर क्रोधित होकर मतंग मुनि ने श्राप दिया कि जिसने भी मेरे आश्रम और इस वन को अपवित्र किया है, वह आज के बाद इस क्षेत्र में न आए। अन्यथा उसका नाश हो जाएगा। मतंग मुनि के श्राप के कारण ही बालि ऋष्यमूक पर्वत क्षेत्र में प्रवेश नहीं करता था।

प्रभूश्रीराम ने बालि को बताई ये चार बाते ?

* अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥
इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥

भावार्थ:-(श्री रामजी ने कहा-) हे मूर्ख! सुन, छोटे भाई की स्त्री, बहिन, पुत्र की स्त्री और कन्या- ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता॥
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⁠+91 99261 24013: ⁠⁠⁠द्वारा.डाँ.पं.ओमप्रकाश.जोशी.शास्त्री
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+91 99288 53752jkind ashok@gmail.com⁠⁠ +91 99288 53752: ⁠⁠⁠क्या हनुमान आदि वानर बन्दर थे?

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Was Hanuman A Monkey?< वाल्मीकि रामायण में मर्यादा पुरुषोतम श्री राम चन्द्र जी महाराज के पश्चात परम बलशाली वीर शिरोमणि हनुमान जी का नाम स्मरण किया जाता हैं। हनुमान जी का जब हम चित्र देखते हैं तो उसमें उन्हें एक बन्दर के रूप में चित्रित किया गया हैं जिनके पूंछ भी हैं। हमारे मन में प्रश्न भी उठते हैं की क्या वाकई हनुमान जी बन्दर थे? क्या वाकई में उनकी पूंछ थी ? इस प्रश्न का उत्तर इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्यूंकि अज्ञानी लोग वीर हनुमान का नाम लेकर परिहास करने का असफल प्रयास करते रहते हैं। आईये इन प्रश्नों का उत्तर वाल्मीकि रामायण से ही प्राप्त करते हैं सर्वप्रथम “वानर” शब्द पर विचार करते हैं। सामान्य रूप से हम “वानर” शब्द से यह अभिप्रेत कर लेते हैं की वानर का अर्थ होता हैं बन्दर परन्तु अगर इस शब्द का विश्लेषण करे तो वानर शब्द का अर्थ होता हैं वन में उत्पन्न होने वाले अन्न को ग्रहण करने वाला। जैसे पर्वत अर्थात गिरि में रहने वाले और वहाँ का अन्न ग्रहण करने वाले को गिरिजन कहते हैं उसी प्रकार वन में रहने वाले को वानर कहते हैं। वानर शब्द से किसी योनि विशेष, जाति , प्रजाति अथवा उपजाति का बोध नहीं होता। सुग्रीव, बालि आदि का जो चित्र हम देखते हैं उसमें उनकी पूंछ दिखाई देती हैं, परन्तु उनकी स्त्रियों के कोई पूंछ नहीं होती? नर-मादा का ऐसा भेद संसार में किसी भी वर्ग में देखने को नहीं मिलता। इसलिए यह स्पष्ट होता हैं की हनुमान आदि के पूंछ होना केवल एक चित्रकार की कल्पना मात्र हैं। किष्किन्धा कांड (3/28-32) में जब श्री रामचंद्र जी महाराज की पहली बार ऋष्यमूक पर्वत पर हनुमान से भेंट हुई तब दोनों में परस्पर बातचीत के पश्चात रामचंद्र जी लक्ष्मण से बोले न अन् ऋग्वेद विनीतस्य न अ यजुर्वेद धारिणः | न अ-साम वेद विदुषः शक्यम् एवम् विभाषितुम् || ४-३-२८ “ऋग्वेद के अध्ययन से अनभिज्ञ और यजुर्वेद का जिसको बोध नहीं हैं तथा जिसने सामवेद का अध्ययन नहीं किया है, वह व्यक्ति इस प्रकार परिष्कृत बातें नहीं कर सकता। निश्चय ही इन्होनें सम्पूर्ण व्याकरण का अनेक बार अभ्यास किया हैं, क्यूंकि इतने समय तक बोलने में इन्होनें किसी भी अशुद्ध शब्द का उच्चारण नहीं किया हैं। संस्कार संपन्न, शास्त्रीय पद्यति से उच्चारण की हुई इनकी वाणी ह्रदय को हर्षित कर देती हैं”। सुंदर कांड (30/18,20) में जब हनुमान अशोक वाटिका में राक्षसियों के बीच में बैठी हुई सीता जी को अपना परिचय देने से पहले हनुमान जी सोचते हैं “यदि द्विजाति (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य) के समान परिमार्जित संस्कृत भाषा का प्रयोग करूँगा तो सीता मुझे रावण समझकर भय से संत्रस्त हो जाएगी। मेरे इस वनवासी रूप को देखकर तथा नागरिक संस्कृत को सुनकर पहले ही राक्षसों से डरी हुई यह सीता और भयभीत हो जाएगी। मुझको कामरूपी रावण समझकर भयातुर विशालाक्षी सीता कोलाहल आरंभ कर देगी। इसलिए मैं सामान्य नागरिक के समान परिमार्जित भाषा का प्रयोग करूँगा।” इस प्रमाणों से यह सिद्ध होता हैं की हनुमान जी चारों वेद ,व्याकरण और संस्कृत सहित अनेक भाषायों के ज्ञाता भी थे। हनुमान जी के अतिरिक्त अन्य वानर जैसे की बालि पुत्र अंगद का भी वर्णन वाल्मीकि रामायण में संसार के श्रेष्ठ महापुरुष के रूप में किष्किन्धा कांड 54/2 में हुआ हैं हनुमान बालि पुत्र अंगद को अष्टांग बुद्धि से सम्पन्न, चार प्रकार के बल से युक्त और राजनीति के चौदह गुणों से युक्त मानते थे। बुद्धि के यह आठ अंग हैं- सुनने की इच्छा, सुनना, सुनकर धारण करना, ऊहापोह करना, अर्थ या तात्पर्य को ठीक ठीक समझना, विज्ञान व तत्वज्ञान। चार प्रकार के बल हैं- साम , दाम, दंड और भेद राजनीति के चौदह गुण हैं- देशकाल का ज्ञान, दृढ़ता, कष्टसहिष्णुता, सर्वविज्ञानता, दक्षता, उत्साह, मंत्रगुप्ति, एकवाक्यता, शूरता, भक्तिज्ञान, कृतज्ञता, शरणागत वत्सलता, अधर्म के प्रति क्रोध और गंभीरता। भला इतने गुणों से सुशोभित अंगद बन्दर कहाँ से हो सकता हैं? अंगद की माता तारा के विषय में मरते समय किष्किन्धा कांड 16/12 में बालि ने कहा था की “सुषेन की पुत्री यह तारा सूक्षम विषयों के निर्णय करने तथा नाना प्रकार के उत्पातों के चिन्हों को समझने में सर्वथा निपुण हैं। जिस कार्य को यह अच्छा बताए, उसे नि:संग होकर करना। तारा की किसी सम्मति का परिणाम अन्यथा नहीं होता।” किष्किन्धा कांड (25/30) में बालि के अंतिम संस्कार के समय सुग्रीव ने आज्ञा दी – मेरे ज्येष्ठ बन्धु आर्य का संस्कार राजकीय नियन के अनुसार शास्त्र अनुकूल किया जाये। किष्किन्धा कांड (26/10) में सुग्रीव का राजतिलक हवन और मन्त्रादि के साथ विद्वानों ने किया। जहाँ तक जटायु का प्रश्न हैं वह गिद्ध नामक पक्षी नहीं था। जिस समय रावण सीता का अपहरण कर उसे ले जा रहा था तब जटायु को देख कर सीता ने कहाँ – हे आर्य जटायु ! यह पापी राक्षस पति रावण मुझे अनाथ की भान्ति उठाये ले जा रहा हैं सन्दर्भ-अरण्यक 49/38 जटायो पश्य मम आर्य ह्रियमाणम् अनाथ वत् | अनेन राक्षसेद्रेण करुणम् पाप कर्मणा || ४९-३८ कथम् तत् चन्द्र संकाशम् मुखम् आसीत् मनोहरम् | सीतया कानि च उक्तानि तस्मिन् काले द्विजोत्तम || ६८-६ यहाँ जटायु को आर्य और द्विज कहा गया हैं। यह शब्द किसी पशु-पक्षी के सम्बोधन में नहीं कहे जाते। रावण को अपना परिचय देते हुए जटायु ने कहा -मैं गृध कूट का भूतपूर्व राजा हूँ और मेरा नाम जटायु हैं सन्दर्भ -अरण्यक 50/4 (जटायुः नाम नाम्ना अहम् गृध्र राजो महाबलः | 50/4) यह भी निश्चित हैं की पशु-पक्षी किसी राज्य का राजा नहीं हो सकते। इन प्रमाणों से यह सिद्ध होता हैं की जटायु पक्षी नहीं था अपितु एक मनुष्य था जो अपनी वृद्धावस्था में जंगल में वास कर रहा था। जहाँ तक जाम्बवान (जामवंत) के रीछ होने का प्रश्न हैं। जब युद्ध में राम-लक्ष्मण मेघनाद के ब्रहमास्त्र से घायल हो गए थे तब किसी को भी उस संकट से बाहर निकलने का उपाय नहीं सूझ रहा था। तब विभीषण और हनुमान जाम्बवान के पास गये तब जाम्बवान ने हनुमान को हिमालय जाकर ऋषभ नामक पर्वत और कैलाश नामक पर्वत से संजीवनी नामक औषधि लाने को कहा था। सन्दर्भ युद्ध कांड सर्ग 74/31-34 आपत काल में बुद्धिमान और विद्वान जनों से संकट का हल पूछा जाता हैं और युद्ध जैसे काल में ऐसा निर्णय किसी अत्यंत बुद्धिवान और विचारवान व्यक्ति से पूछा जाता हैं। पशु-पक्षी आदि से ऐसे संकट काल में उपाय पूछना सर्वप्रथम तो संभव ही नहीं हैं दूसरे बुद्धि से परे की बात हैं। इन सब वर्णन और विवरणों को बुद्धि पूर्वक पढने के पश्चात कौन मान सकता हैं की हनुमान, बालि , सुग्रीव आदि विद्वान एवं बुद्धिमान मनुष्य न होकर बन्दर आदि थे। यह केवल मात्र एक कल्पना हैं और अपने श्रेष्ठ महापुरुषों के विषय में असत्य कथन हैं। अन्य प्रमाण == १- हनुमान जी की माता जी का नाम 'अंजनी' था. और पिता जी का नाम 'पवन' था. ये दोनों मनुष्य थे या बन्दर ? यदि ये दोनों मनुष्य थे. तो क्या मनुष्यों के मनुष्य पैदा होते हैं या बन्दर ? यदि बन्दर पैदा नहीं होते, तो विचार करें, कि जब हनुमान जी के माता पिता मनुष्य थे, तो उनका बेटा श्री हनुमान जी भी तो मनुष्य सिद्ध हुआ. २- यदि कोई छोटा बच्चा कहीं पर भीड़ में खो जाये, तो एक बन्दर से कहो, कि वह उस बच्चे का फोटो देख कर भीड़ में से उस बच्चे को पहचान कर ले आये. अब सोचिये क्या वह बन्दर भीड़ में से बच्चे को पहचान कर ले आयेगा. यदि नहीं. तो क्या हनुमान जी सीता जी को लंका से ढूंढ कर उनकी खबर ले आये या नहीं. यदि उनकी खबर ढूंढ लाये, तो अब बताइये, बन्दर तो यह काम नहीं कर सकता. ३- आपने रामायण सीरिअल में बाली, सुग्रीव और उनकी पत्नियाँ तो देखी ही होंगी. उस सीरिअल में बाली और सुग्रीव तो बन्दर दिखाए गए.परन्तु उनकी पत्नियाँ मनुष्यों वाली स्त्रियाँ दिखाई गईं या बंदरियां दिखाईं. यदि उनकी पत्नियाँ मनुष्य जाति की थी. तो उनके पति भी मनुष्य होने चाहियें. अर्थात बाली और सुग्रीव भी मनुष्य दिखने चाहिए थे. परन्तु वे दोनों बन्दर दिखाए गए.यदि वे बन्दर थे, तो सोचिये क्या मनुष्यों की स्त्रियों की शादी बंदरों के साथ होती है ? या आजकल भी कोई मनुष्य स्त्रियाँ बंदरों के साथ शादी करने को तैयार हैं ? यदि उनकी पत्नियाँ मनुष्य थीं, तो उनके पति = बाली और सुग्रीव भी मनुष्य ही सिद्ध हुए. और श्री हनुमान जी उनके महामंत्री थे. वे भी उसी जाति के थे. तो श्री हनुमान जी भी मनुष्य सिद्ध हुए. ४- वाल्मीकि रामायण में श्री हनुमान जी की योग्यता लिखी है, कि वे ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के विद्वान थे. तथा संस्कृत व्याकरण शास्त्र में बहुत कुशल थे. सोचिये, क्या बन्दर ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद तथा संस्कृत व्याकरण पढ़ सकता है ? यदि नहीं, तो बताइये, श्री हनुमान जी बन्दर कैसे हुए ? ५- हनुमान चालीसा के प्रारंभ में चौथे/पांचवें वाक्य में लिखा है, कि " काँधे मूंज जनेऊ साजे, हाथ बज्र और धजा बिराजे " अर्थात श्री हनुमान जी के कंधे पर मूंज की जनेऊ अर्थात यज्ञोपवीत सुशोभित होता था. उनके एक हाथ में वज्र (गदा) और दूसरे हाथ में ध्वज रहता था. अब सोचिये हनुमान चालीसा बहुत लोग पढ़ते हैं. फिर भी इस बात पर ध्यान नहीं देते, कि क्या बन्दर के कंधे पर मूंज की जनेऊ हो सकती है. क्या बन्दर के एक हाथ में गदा और दूसरे हाथ में ध्वज होता है. यदि नहीं, तो श्री हनुमान जी बन्दर कैसे हुए ? मेरा सभी महानुभावों से विनम्र अनुरोध है, कृपया गुस्सा न करें और ठंडे दिल - दिमाग से सोचें. कि वेदों के महान विद्वान, महाबलवान, ब्रह्मचारी, तपस्वी श्री हनुमान जी को बन्दर बना कर उनका अपमान न करें, और पाप के भागी न बनें. आदित्य ब्रह्मचारी, परम बलवान, चतुर और बुद्धिमान, श्री रामचंद्र जी के परम मित्र और सहायक , वेदों और व्याकरण के पंडित, अंजनी पुत्र श्री हनुमान ..... बन्दर नहीं थे. वे वेदों के बड़े विद्वान्, बलवान, ब्रह्मचारी और तपस्वी थे. ⁠⁠⁠⁠ raghavarya2002⁠⁠⁠⁠⁠ ⁠⁠ +91 92545 79975: ⁠⁠⁠🌿🌿🌿🌿ओ३म्🌿🌿🌿🌿 🌺🌼🌹🌻🌿🌺🍀🌹🍀🌺

🌹क्या हनुमान बन्दर थे?

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हनुमान से जब श्रीराम पहली बार मिले तो हनुमान को भाषा शैली और व्यवहार में अतीव निपुण देखकर श्रीराम ने लक्ष्मण से जो हनुमान जी की विद्वता का वर्णन किया है,वह बहुत ही प्रशंसनीय है―
नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिण:।
नासामवेदविदुष: शक्यमेवं प्रभाषितुम् ।।
नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम् ।
बहुव्याहरताऽनेन न किंचिदपशब्दितम् ।।(किष्किन्धा० ३ सर्ग)

अर्थात्―हे लक्ष्मण! जिस व्यक्ति ने ऋग्वेद,यजुर्वेद,सामवेद न पढे हों वह ऐसी संस्कृत भाषा नहीं बोल सकता है।
निश्चित रुप से इसने सम्पूर्ण व्याकरण को भी पढा है,क्योंकि इसके भाषण में कही भी व्याकरण की दृष्टि से एक भी अशुद्धि नहीं हुई।

ऐसे वेद-वेदांगों के महाविद्वान वीर हनुमान जी को जो व्यक्ति बन्दर मानकर उनकी बन्दर जैसी मूर्ति बनाकर पूजते हैं,उन्हें श्रीराम के उपर्युक्त वचनों पर अवश्य ध्यान देना चाहिये।
क्या कभी बन्दर भी वेद वेदांगों को पढकर शुद्ध भाषण कर सकते है?

वीर हनुमान सीता की खोज करता हुआ लंका नगरी में,विशेष रुप में रावण के अन्त:पुर में प्रविष्ट होकर सब जगह घूम आये,किन्तु कोई इन्हें न देख सका।
रामायण में लिखा है-

चतुरंगुलमात्रोऽपि नावकाश: स विद्यते।
रावणान्त: पुरे तस्मिन् यं कपिर्न जगाम स:।।(सुन्दर० १२वां सर्ग)

अर्थात् रावण के अन्त:पुर में कोई चार अंगुल परिणाम वाला स्थान भी नहीं रहा था,जहां हनुमान न गये हो।
स्थान स्थान पर पहरेदारों से घिरे अन्त:पुर में प्रवेश करना कोई सरल कार्य नहीं था ।

जैसा कि योग दर्शन में लिखा है―
कायाकाशयो: सम्बन्ध संयमात् लघुतूलसमापत्तेश्च आकाशगमनम् ।।(योग द० ३ । ४१)
अर्थात्―शरीर और आकाश के सम्बन्ध संयम से शरीर रुई की भांति हल्का हो जाता है।
वैसे तो यह योगियों की साधना का क्षेत्र है,पुनरपि शास्त्र वचन से ऐसी सिद्धियां प्राप्त करना क्या बन्दरों के लिए संभव है?

आर्य विद्वानों की खोज के अनुसार हनुमान सुग्रीव आदि वानर तो थे,परन्तु बन्दर नहीं।
रामायण में प्रयुक्त वानर,कपि आदि शब्दों का प्रयोग फिर किस अर्थ से होता था,इसका समाधान आर्य विद्वानों की दृष्टि में इस प्रकार किया गया है-

वानर―जैसे वर्तमान में मनुष्य जाति में अनेक उपजातियां मिलती हैं,वैसे ही रामायण काल में भी।वानर जाति को ‘वानर’ कहने का भाव यह हो सकता है-वानर=वा+नर=एक विषेश प्रकार के नर=नेतृत्व गुण युक्त मनुष्य अथवा वन में रहने के कारण उनका नाम वानर पडा हो।
इस जाति के व्यक्तियों में स्थान भेद से कुछ आकृति भेद तो हो सकता है,जैसे कि नेपाल व चीन आदि मनुष्यों का भैद देखने में आता है।

परन्तु ये थे मनुष्य ही,मनुष्यों जैसी भाषा बोलते थे,इनके सभी व्यवहार मनुष्यों की तरह ही थे।

🌻कपि―इस शब्द का अर्थ बन्दर अवश्य है,परन्तु इसके अन्य अर्थ भी हैं।वैदिक साहित्य में कपि, तथा ‘वृषाकपि’ शब्द आये हैं।
जिनका अर्थ है~कपि=कम्पाने वाला या धर्म सुख या जलादि की वर्षा करने वाला अथवा अपनी शूरवीरता से दुष्टों को कंपाने वाला।

ओर महाभारत के शान्तिपर्व में (३४२ अ० ८९ श्लोक में) कहा है―
कपिर्वराह: श्रेष्ठश्च ।।
अर्थात् कपि शब्द का अर्थ श्रेष्ठ भी है।

अपने यशस्वी एवं परम आदर्श हनुमान जैसे पात्रों का पूंछ आदि लगाकर जो उनका अपमान करते रहते हैं,वे यथार्थ में अतीव निन्दनीय हैं।
केसरी,अन्जनी,हनुमान,सुग्रीव आदि नाम भी इन्हें बंदर सिद्ध नहीं करते।क्योंकि बन्दर जाति के नाम होते ही नहीं।

आर्यजाति हनुमान के चित्रों की विकृत रचना करके तो अज्ञानवश पूजा करती है,किन्तु हमें उनके आदर्श चरित्र व शौर्यपूर्ण गाथाओं की ही पूजा अपने आचरण व व्यवहार में करनी

पाखण्ड खंडिनी 🚩🚩

हनुमान आदि बन्दर नहीं थे ? – स्वामी विद्यानन्द सरस्वती :

वानर – वने भवं वानम , राति ( रा आदाने ) गृह्णाति ददाति वा. वानं वन सम्बन्धिनम फलादिकम् गृह्णाति ददाति वा – जो वन उत्पन्न होने वाले फलादि खाता है वह वानर कहलाता है. वर्तमान में जंगलों व पहाड़ों में रहने और वहाँ पैदा होने वाले पदार्थों पर निर्वाह करने वाले “गिरिजन” कहाते हैं.

इसी प्रकार वनवासी और वानप्रस्थ वानर वर्ग में गिने जा सकते हैं. वानर शब्द से किसी योनि विशेष जाति प्रजाति अथवा उपजाति का बोध नहीं होता।

जिसके द्वारा जाति एवं जाति के चिन्हों को प्रगट किया जाता है वह आकृति है. प्राणिदेह के अवयवों की नियत रचना जाति का चिन्ह होती है.

सुग्रीव बाली आदि के जो चित्र देखने में आते हैं उनमें उनके पूंछ लगी दिखाई है परन्तु उनकी स्त्रियों के पूंछ नहीं होती। नर मादा में इस प्रकार का भेद अन्य किसी वर्ग में देखने में नहीं आता. इसलिए पूंछ के कारण हनुमान आदि को बन्दर नहीं माना जा सकता।

हनुमान से रामचन्द्र जी की पहली बार भेंट ऋष्यमूक पर्वत पर हुयी थी. दोनों में परस्पर बातचीत के बाद रामचंद्र जी लक्ष्मण से बोले

नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारण: नासामवेद विदुषः शक्यमेव प्रभाषितुम नूनं व्याकरणम् कृतसमनेन बहुधा

श्रुतम बहु व्यवाहरतानेंन न किंचिद पशब्दितम संस्कार क्रम सम्पन्नामद्रु तामविलम्बिताम्। उच्चारयति कल्याणी वाचं हृदयहारिणीम्। कि-३/२८।, २९ , ३२

ऋग्वेद के अध्ययन से अनभिज्ञ और यजुर्वेद का जिसको बोध नहीं है तथा जिसने सामवेद का अध्ययन नहीं किया है वह व्यक्ति इस प्रकार परिष्कृत बातें नहीं कर सकता।

निश्चय ही इन्होने सम्पूर्ण व्याकरण का अनेक बार अभ्यास किया है क्योंकि इतने समय तक बोलने में इन्होने किसी भी अशुद्ध शब्द का उच्चारण नहीं किया है संस्कार संपन्न शास्त्रीय पद्धिति से उच्चारण की हुयी इनकी कल्याणी वाणी हृदय को हर्षित कर रही है.

वस्तुतः हनुमान अनेक भाषाविद थे. वह अवसर के अनुकूल भाषा का व्यवहार करते थे, इसका संकेत हमें सुन्दर काण्ड में मिलता है.

लंका पहुँच कर हनुमान ने सीता को अशोक वाटिका में राक्षसियों के बीचबैठे देखा .वृक्षों की शाखाओं के बीच छुपकर बैठे हनुमान सोचने लगे:-

यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संकृताम् रावणं मन्यमाना माम सीता भीता भविष्यति सेमयालोक्य मे

रूपम जानकी भाषितं तथा रक्षोमिस्त्रासिता पूर्वं भूयस्त्रासं गमिष्यति ततो जातपरित्रासा शब्दम कुर्यान्मनिस्विनी जानाना माम विशालाक्षी रावणं काम रूपिणम् सुन्दर ३०/१८ , २०

यदि द्विजाति ( ब्राह्मण – क्षत्रिय – वैश्य )के सामान परिमार्जित संस्कृत भाषा का प्रयोग करूँगा तो सीता मुझे रावण समझकर भय से संत्रस्त हो जायेगी।

मेरे इस वनवासी रूप को देखकर तथा नागरिक संस्कृत को सुनकर पहले ही राक्षसों से डरी हुयी यह सीता और भयभीत जो जायेगी। मुझको कामरूपी रावण समझकर भयातुर विशालाक्षी सीता कोलाहल आरम्भ कर देगी

इसलिए – अहम् त्वतितनुश्चैव वानरश्च विशेषतः वाचं चोदहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम् – १७

मैं सामान्य नागरिक के सामान परिमार्जित भाषा का प्रयोग करूँगा इससे प्रतीत होता है कि लंका की सामान्य भाषा संस्कृत थी जबकि जन साधारण संस्कृत से भिन्न किन्तु तत्सम अथवा तद्भव शब्दों का व्यवहार करते थे.

कुछ टीकाकारों के अनुसार हनुमान ने अयोध्या के आस पास की भाषा से काम लिया था

बाली पुत्र अंगद के विषय में वाल्मीकि ने लिखा है कि हनुमान बालिपुत्र अंगद को अष्टांग बुद्धि से संपन्न चार प्रकार के बल से युक्त और राजनीति के चौदह गुणों से युक्त मानते थे। किष्किन्धा -५४/२

अष्टांग बुद्धि शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा उपापोहार्थ विज्ञानं तत्वज्ञानम च धीगुणा :

सुनने की इच्छा, सुनना, सुनकर धारण करना, उहापोह कर,ना अर्थ या तात्पर्य को ठीक ठीक समझना, विज्ञानं व तत्वज्ञान – बुद्धि के ये अंग हैं

चतुर्बल – साम दाम भेद दण्ड शत्रु को वश में करने के लिए नीति शाश्त्र में चार उपाय बताये गए हैं उन्ही को यहाँ चार प्रकार का बल कहा है. किन्ही किन्ही के मत से बाहुबल मनोबल उपाय बल और बन्धुबल – ये चार बल हैं

चतुर्दश गुण –

१ देश काल का ज्ञान

२ दृडता

३ कष्ट सहिष्णुता

४ सर्व विज्ञानता

५ दक्षता

६ उत्साह

७ मंत्रगुप्ति

८ एकवाक्यता

९ शूरता

१० भक्ति ज्ञान

११ कृतज्ञता

१२ शरणागतवत्सला

१३ अधर्म के प्रति क्रोध

१४ गम्भीरता।

और बाली की पत्नी एवं अंगद की माता तारा को वाल्मीकि ने ‘ मंत्रवित’ बताया है ( कि १६/१२ )

मरते समय बाली ने तारा की योग्यता का बखान करते हुए सुग्रीव को परामर्श दिया.

सुषेण दुहिता चेयमर्थ् सूक्षम विनश्चये औतपातीके च विविधे सर्वतः परिनिष्ठता यादेश साध्विति ब्रूयात कार्यं तनमुक्त संशयम् न ही तारामतम किंचिदन्यथा परिवर्तते। कि २३/१३ -१४

सुषेण की पुत्री यह तारा सूक्ष्म विषयों के निर्णय करने तथा नाना प्रकार के उत्पातों के चिन्हों को समझने में सर्वथा निपुण है. जिस बताये उसे निःसंग होकर करना। तारा की किसी भी सम्मति का परिणाम अन्यथा नहीं होता

बाली कि अंत्येष्टि के समय सुग्रीव ने आज्ञा दी – मेरे ज्येष्ठ बंधू आर्य का संस्कार राजकीय नियम के अनुसार शास्त्रानुकूल किया जाए. कि – २५/३०

तदनन्तर सुग्रीव के राजतिलक के समय सोलह सुन्दर कन्यायें अक्षत अंगराज गोरोचन मधु घृत आदि लेकर आई और वेदी पर प्रज्वलित अग्नि में (२६/१०) मंत्रोच्चार पूर्वक हविष्म के द्वारा मंत्रविद विद्वानों ने हवन किया।

इस सारे वर्णन और विवरण को बुद्धिपूर्वक पढने के बाद कौन मान सकता है कि हनुमान और तारा आदि मनुष्य न होकर पेड़ों पर उछल कूद मचने वाले बन्दर बंदरिया थे |

सनातन धर्म में सनातन क्या है?

हम आज बहुत गर्व से राम-कथा में अथवा भागवत-
कथा में, कथा के अंत में कहते हैं ,
बोलिए — सत्य सनातन धर्म कि जय ।
तनिक विचारें ? सनातन का क्या अर्थ है ?
सनातन अर्थात जो सदा से है, जो सदा रहेगा,
जिसका अंत नहीं है और जिसका कोई आरंभ नहीं है
वही सनातन है और सत्य में केवल हमारा धर्म
ही सनातन है, यीशु से पहले ईसाई मत नहीं था, मुहम्मद से पहले इस्लाम मत नहीं था। केवल सनातन धर्मं
ही सदा से है, सृष्टि के आरंभ से किन्तु ऐसा क्या है हिंदू धर्मं में जो सदा से है ?
श्री कृष्ण की भागवत कथा श्री कृष्ण के जन्म से पहले
नहीं थी अर्थात कृष्ण भक्ति सनातन नहीं है ।
श्री राम की रामायण तथा रामचरितमानस
भी श्री राम जन्म से पहले नहीं थी अर्थात श्री राम
भक्ति भी सनातन नहीं है ।
श्री लक्ष्मी भी, (यदि प्रचलित सत्य-असत्य कथाओ
के अनुसार भी सोचें तो), तो समुद्र मंथन से पहले
नहीं थी अर्थात लक्ष्मी पूजन भी सनातन नहीं है ।
गणेश जन्म से पूर्व गणेश का कोई अस्तित्व नहीं था,
तो गणपति पूजन भी सनातन नहीं है ।
शिव पुराण के अनुसार शिव ने विष्णु व
ब्रह्मा को बनाया तो विष्णु भक्ति व
ब्रह्मा भक्ति सनातन नहीं हैं।
विष्णु पुराण के अनुसार विष्णु ने शिव और
ब्रह्मा को बनाया तो शिव भक्ति और
ब्रह्मा भक्ति सनातन नहीं।
ब्रह्म पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने विष्णु और शिव
को बनाया तो विष्णु भक्ति और शिव भक्ति सनातन
नहीं ।
देवी पुराण के अनुसार देवी ने ब्रह्मा, विष्णु और शिव
को बनाया तो यहाँ से तीनो की भक्ति सनातन
नहीं रही
यहाँ तनिक विचारें ये सभी ग्रन्थ एक दूसरे से बिलकुल उल्टी बात कर रहे हैं, तो इनमें से अधिक से अधिक एक
ही सत्य हो सकता है बाकि झूठ, लेकिन फिर भी सब
हिंदू इन चारो ग्रंथो को सही मानते हैं ,
अहो! दुर्भाग्य !!
फिर ऐसा सनातन क्या है? जिसका हम जयघोष करते
हैं?
वो सत्य सनातन है परमात्मा की वाणी ।
आप किसी मुस्लमान से पूछिए, परमात्मा ने ज्ञान
कहाँ दिया है ? वो कहेगा कुरान में।
आप किसी ईसाई से पूछिए परमात्मा ने ज्ञान
कहाँ दिया है ? वो कहेगा बाईबल में ।
लेकिन आप हिंदू से पूछिए परमात्मा ने मनुष्य
को ज्ञान कहाँ दिया है ?
हिंदू निरुतर हो जाएगा ।
आज दिग्भ्रमित हिंदू ये
भी नहीं बता सकता कि परमात्मा ने ज्ञान
कहाँ दिया है ?
आधे से अधिक हिंदू तो केवल हनुमान चालीसा का ही नाम बता पाएंगे , परंतु ये तो मात्र 400 साल पहले तुलसीदास जी ने लिखा
जो कुछ और अधिक धार्मिक होते हैं
वो गीता का नाम ले देंगे, किन्तु भूल जाते हैं
कि गीता तो योगीश्वर श्री कृष्ण देकर गए हैं 5000 वर्ष पहले।
कुछ रामायण का नाम लेंगे , परन्तु श्री राम और उनके पूर्वजो ने कभी गुरुकुलों में रामायण नही पढ़ी।
परमात्मा का ज्ञान तो उस से पहले
भी होगा या नहीं ? अर्थात वो ज्ञान
जो श्री कृष्ण संदीपनी मुनि के गुरुकुल में पढ़े थे और श्री राम महृषि वशिष्ठ के गुरुकुल में पढ़े थे
जो कुछ अधिक ज्ञानी होंगे वो उपनिषद कह देंगे,
परंतु उपनिषद तो ऋषियों की वाणी है
न् कि परमात्मा की ।
तो परमात्मा का ज्ञान कहाँ है ?
वेद !! जो स्वयं परमात्मा की वाणी है,
उसका अधिकांश हिंदुओं को केवल नाम ही पता है ।
वेद, परमात्मा ने मनुष्यों को सृष्टि के प्रारंभ में दिए।
जैसे कहा जाता है कि “गुरु बिना ज्ञान नहीं”,
तो संसार का आदि गुरु कौन था?
वो परमात्मा ही था |
निवेदक: आर्य दिव्य प्रकाश 9654992445

सृष्टि या ब्रह्माण्ड की रचना

💎( 1 ) प्रश्न : – ब्रह्माण्ड की रचना किससे हुई ?
☀उत्तर : – ब्रह्माण्ड की रचना प्रकृति से हुई ।

💎( 2 ) प्रश्न : – ब्रह्माण्ड की रचना किस ने की ?
☀उत्तर : — ब्रह्माण्ड की रचना निराकार ईश्वर ने की जो कि सर्वव्यापक है । कण – कण में विद्यमान है ।

💎( 3 ) प्रश्न : – साकार ईश्वर सृष्टि क्यों नहीं रच सकता ?
☀उत्तर : – क्योंकि साकार रूप में वह प्रकृति के सूक्ष्म परमाणुओं को आपस में संयुक्त नहीं कर सकता ।

💎( 4 ) प्रश्न : – लेकिन ईश्वर तो सर्वशक्तिमान है । अपनी शक्ति से वो ये भी कर सकता है ।
☀उत्तर : – ईश्वर की शक्ति उसका गुण है न कि द्रव्य । जो गुण होता है वो उसी पदार्थ के भीतर रहता है न कि पदार्थ से बाहर निकल सकता है । तो यदि ईश्वर साकार हो तो उसका गुण उसके भीतर ही मानना होगा तो ऐसे में केवल एक ही स्थान पर खड़ा होकर पूरे ब्रह्माण्ड की रचना कैसे कर सकेगा ? इससे ईश्वर अल्प शक्ति वाला सिद्ध हुआ । अत : ईश्वर निराकार है न कि साकार ।

💎( 5 ) प्रश्न : – लेकिन हम मानते हैं कि ईश्वर साकार भी है और निराकार भी ।
☀उत्तर : – एक ही पदार्थ में दो विरोधी गुण कभी नहीं होते हैं । या तो वो साकार होगा या निराकार । अब सामने खड़ा जानवर या तो घोड़ा है या गधा । वह घोड़ा और गधा दोनों ही एक साथ नहीं हो सकता ।

💎( 6 ) प्रश्न : – ईश्वर पूरे ब्रह्माण्ड के कण – कण में विद्यमान है ये कैसे सिद्ध होता है ?
☀उत्तर : – एक नियम है — ( क्रिया वहीं पर होगा जहाँ उसका कर्ता होगा ) तो पूरे ब्रह्माण्ड में कहीं कुछ न कुछ बन रहा है तो कहीं न कहीं कुछ बिगड़ रहा है । और सारे पदार्थ भी ब्रह्माण्ड में गति कर रहे हैं । तो ये सब क्रियाएँ जहाँ पर हो रही हैं वहाँ निश्चित ही कोई न कोई अति सूक्ष्म चेतन सत्ता है । जिसे हम ईश्वर कहते हैं ।

💎( 7 ) प्रश्न : – यदि ईश्वर सर्वत्र है तो क्या संसार की गंदी – गंदी वस्तुओं में भी है ? जैसे मल , मूत्र , कूड़े करकट के ढेर आदि ?
☀उत्तर : – अवश्य है क्योंकि ये जो गंदगी है वो केवल शरीर वाले को ही गंदा करती है न कि निराकार को । अब आप स्वयं सोचें कि मल मूत्र भी किसी न किसी परमाणुओं से ही बने हैं तो क्या परमाणु गंदे होते हैं ? बिलकुल भी नहीं होते । बल्की जब ये आपस में मिल कर कोई जैविक पदार्थ का निर्माण करते हैं तो ये कुछ तो शरीर के लिए बेकार होते हैं जिन्हें हम गूदा द्वार या मूत्रेन्द्रीय से बाहर कर देते हैं । इसी कारण से ईश्वर सर्वत्र है । गंदगी उस चेतन के लिए गंदी नहीं है ।

💎( 8 ) प्रश्न : – ईश्वर के बिना ही ब्रह्माण्ड अपने आप ही क्यों नहीं बन गया ?
☀उत्तर : – क्योंकि प्रकृति जड़ पदार्थ है और ईश्वर चेतन है । बिना चेतन सत्ता के जड़ पदार्थ कभी भी अपने आप गति नहीं कर सकता । इसी को न्यूटन ने अपने पहले गति नियम में कहा है : – ( Every thing persists in the state of rest or of uniform motion , until and unless it is compelled by some external force to change that state – Newton ‘ s First Law of Motion ) तो ये चेतन का अभिप्राय ही यहाँ External Force है

💎( 9 ) प्रश्न : – क्यों External Force का अर्थ तो बाहरी बल है तो यहाँ पर आप चेतना का अर्थ कैसे ले सकते हो ?
☀उत्तर : – क्योंकि बाहरी बल जो है वो किसी बल वाले के लगाए बिना संभव नहीं । तो निश्चय ही वो बल लगाने वाला मूल में चेतन ही होता है । आप एक भी उदाहरण ऐसी नहीं दे सकते जहाँ किसी जड़ पदार्थ द्वारा ही बल दिया गया हो और कोई दूसरा पदार्थ चल पड़ा हो ।

💎( 10 ) प्रश्न : – तो ईश्वर ने ये ब्रह्माण्ड प्रकृति से कैसे रचा ?
☀उत्तर : – उससे पहले आप प्रकृति और ईश्वर को समझे ।

💎( 11 ) प्रश्न : – प्रकृति के बारे में समझाएँ ।
☀उत्तर : – प्रकृति कहते हैं सृष्टि के मूल परमाणुओं को । जैसे किसी वस्तु के मूल अणु को आप Atom के नाम से जानते हो । लेकिन आगे उसी Atom ( अणु ) के भाग करके आप Electron ( ऋणावेष ) , Protion ( धनावेष ) , Neutron ( नाभिकीय कण ) , तक पहुँच जाते हो । और उससे भी आगे इन कणों को भी तोड़ते हो तो positrons , Neutrinos , Quarks मैं बढ़ते जाते है । इस प्रकार से विभाजन करते – करते आप जाकर एक निश्चित मूल पर टिक जाओगे । और वह मूल जो परमाणु में जोड़ – जोड़ कर बड़े – बड़े कण बनते चले गए हैं वे ही प्रकृति के परमाणु कहलाते हैं । प्रकृति के तो परमाणु होते हैं । सत्य ( Positive + ) रजस् ( Negative – ) तमस् ( Neutral0 ) इन तीनों को सामूहिक रूप में प्रकृति कहा जाता है ।

💎( 12 ) प्रश्नः – क्या प्रकृति नाम का कोई एक ही परमाणु नहीं है ?
☀उत्तर : – नहीं , ( सत्व , रज और तम ) तीनों प्रकार के मूल कणों को सामूहिक रूप में प्रकृति कहा जाता है । कोई एक ही कण का नाम प्रकृति नहीं है ।

💎( 13 ) प्रश्न : – तो क्या सृष्टि के किसी भी पदार्थ की रचना इन प्रकृति के परमाणुओं से ही हुई है ?
☀उत्तर : – जी अवश्य ही ऐसा हुआ है । क्योंकि सृष्टि के हर पदार्थ में तीनों ही गुण ( Positive , Negative & Neutral ) पाए जाते हैं ।

💎( 14 ) प्रश्न : – ये स्पष्ट कीजिए कि सृष्टि के हर पदार्थ में तीनों ही गुण होते हैं , क्योंकि जैसे Electron होता है वो तो केवल Negative ही होता है यानि के रजोगुण से युक्त तो बाकी के दो गुण उसमें कहाँ से आ सकते हैं ?
☀उत्तर : – नहीं ऐसा नहीं है , उस ऋणावेष यानी Electron में भी तीनों गुण ही हैं । क्योंकि होता ये है कि पदार्थ में जिस गुण की प्रधानता होती है वही प्रमुख गुण उस पदार्थ का हो जाता है । तो ऐसे ही ऋणावेष में तीनों गुण सत्व रजस् और तमस तो हैं लेकिन ऋणावेष में रजोगुण की प्रधानता है परंतु सत्वगुण और तमोगुण गौण रूप में उसमें रहते हैं । ठीक वैसे ही Proton यानी धनावेष में सत्वगुण की प्रधानता अधिक है परंतु रजोगुण और तमोगुण गौणरूप तीनों ही में हैं । और ऐसे ही तीसरा कण Neutron यानी कि नाभिकीय कण में तमोगुण अधिक प्रधान रूप में है और सत्व एवं रज गौणरूप में हैं । तो ठीक ऐसे ही सृष्टि के सारे पदार्थों का निर्माण इन गुणों से हुआ है । पर इन गुणों की मात्रा हर एक पदार्थ में भिन्न – भिन्न है । इसीलिए सारे पदार्थ एक दूसरे से भिन्न दिखते हैं ।

💎( 15 ) प्रश्न : – तीनों गुणों को और स्पष्ट करें ।
☀उत्तर : – सत्व गुण कहते हैं आकर्षण से युक्त को , तमोगुण निषक्रिय या मोह वाला होता है , रजोगुण होता है चंचल स्वभाव को । इसे ऐसे समझे : – नाभिकम् ( Neucleus ) में जो नाभिकीय कण ( Neucleus ) है वो मोह रूप है क्योंकि इसमें तमोगुण की प्रधानता है । और इसी कारण से ये अणु के केन्द्र में निषक्रिय पड़ा रहता है । और जो धनावेष ( Proton ) है वे भी केन्द्र में है पर उसमें सत्वगुण की प्रधानता होने से वो ऋणावेष ( Electron ) को खींचे रहता है । क्योंकि आकर्षण उसका स्वभाव है । तीसरा जो ऋणावेष ( ELectron ) है उसमें रजोगुण की प्रधानता होने से संचल स्वभाव है इसीलिए वो अणु के केन्द्र नाभिकम् की परिक्रमा करता रहता है । दूर – दूर को दौड़ता है ।

💎( 16 ) प्रश्न : – तो क्या सृष्टि के सारे ही पदार्थ तीनों गुणों से ही बने हैं ? तो फिर सबमें विलक्षणता क्यों है ! सभी एक जैसे क्यों नहीं ?
☀उत्तर : – जी हाँ , सारे ही पदार्थ तीनों गुणों से बने हैं । क्योंकि सब पदार्थों में तीनों गुणों का परिमाण भिन्न – भिन्न है । जैसे आप उदाहरण के लिए लोहे का एक टुकड़ा ले लें तो उस टुकड़े के हर एक भाग में जो अणु हैं वो एक से हैं और वो जो अणु हैं उनमें सत्व रज और तम की निश्चित मात्रा एक सी है ।

💎( 17 ) प्रश्न : – पदार्थ की उत्पत्ति ( Creation ) किसको कहते हैं ?
☀उत्तर : – जब एक जैसी सूक्ष्म मूलभूत इकाईयाँ आपस में संयुक्त होती चली जाती हैं तो जो उन इकाईयों का एक विशाल समूह हमारे समाने आता है उसे ही हम उस पदार्थ का उत्पन्न होना मानते हैं । जैसे ईटों को जोड़ – जोड़ कर कमरा बनता है , लोहे के अणुओं को जोड़ जोड़ कर लोहा बनता है , सोने के अणुओं को जोड़ – जोड़कर सोना बनता है आदि । सीधा कहें तो सूक्ष्म परमाणुओं का आपस में विज्ञानपूर्वक संयुक्त हो जाना ही उस पदार्थ की उत्पत्ति है ।

💎( 18 )प्रश्न : – पदार्थ का नाश ( Destruction ) किसे कहते हैं ?
☀उत्तर : – जब पदार्थ की जो मूलभूत इकाईयाँ थीं वो आपस में एक – दूसरे से दूर हो जाएँ तो जो पदार्थ हमारी इन्द्रियों से ग्रहीत होता था वो अब नहीं हो रहा उसी को उस पदार्थ का नाश कहते हैं । जैसे मिट्टी का घड़ा बहुत समय तक घिसता – घिसता वापिस मिट्टी में लीन हो जाता है , कागज को जलाने से उसके अणुओं का भेदन हो जाता है आदि । सीधा कहें तो वह सूक्ष्म परमाणु जिनसे वो पदार्थ बना है , जब वो आपस में से दूर हो जाते हैं और अपनी मूल अवस्था में पहुँच जाते हैं उसी को हम पदार्थ का नष्ट होना कहते है ।

💎( 19 ) प्रश्न : – सृष्टि की उत्पत्ति किसे कहते हैं ?
☀उत्तर : – जब मूल प्रकृति के परमाणु आपस में विज्ञान पूर्वक मिलते चले जाते हैं तो अनगिनत पदार्थों की उत्पत्ति होती चली जाती है । हम इसी को सृष्टि या ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कहते हैं ।

💎( 20 ) प्रश्न : – सृष्टि का नाश या प्रलय किसको कहते हैं ?
☀उत्तर : – जब सारी सृष्टि के परमाणु आपस में एक – दूसरे से दूर होते चले जाते हैं तो सारे पदार्थ का नाश होता जाता है और ऐसे ही सारी सृष्टि अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाती है । इसी को हम सृष्टि या ब्रह्याण्ड का नाश कहते हैं