Sanskar

16 संस्कारों का महत्त्व
16 SANSKARS
In the Vedic Tradition, there are sixteen religious ceremonies known as Sanskars or the Sacraments of Life. The Sanskars are performed for the physical, social, and spiritual development of the individual. We at Arya Samaj Gandhidham have good and learned priests who perform these 16 Sanskaras. These 16 Sanskaras are
GARBHADHAN
This sanskara is performed for the fulfillment of one’s parental obligation and a continuation of the human race. This is a fervent prayer for the impregnation of the foetus with the life-giving soul force. Garbha means womb and Dhana means give or donate. This sanskara is performed after marriage and before the conception of a child. In this sanskara, the couple chants Vedic mantras for a healthy, loving and happy married life and the wish for a son or daughter that would bring new joy in the home.
PUNSAVAN
During the third or fourth month of pregnancy the Punsavana (protection of the fetus) sanskara is performed for the physical growth of the child.
SIMANTONNAYAN
This sanskara is performed during the seventh month of pregnancy. The parents to be and their relatives offer prayers to the Almighty mental growth of the child.
JATAKARM
The Jatakarma sanskara (the child’s nativity) should be done immediately after the birth of the child. This sanskara is done to welcome the new-born child. The father writes AUM on the tongue of the child with a thin bar of gold dipped in honey. He whispers the word “VEDO-ASI” (You are Veda – knowledge) in the ear of the child
NAMAKARAN
Nama literally means ‘name’ and Karan means ‘to make, to effect’. Thus, in this sanskara the child is given a name. This sanskara should be performed on the 11th day after the birth of the child.
NISHKRAMAN
The 4th month after the birth of the child, the Nishkramana sanskara is performed. Here the child is taken outside the home for the first time to be exposed to the different elements of nature.
ANNA-PRAASHAN
Anna means ‘food’ and Prashana mean ‘eating, feeding’ thus, giving solid food to the child for the very first time performs this sanskara.
MUNDAN
This sanskara can be performed between the ages of 1-3 years old. In this sanskara the hair from the child’s head is shaved off for the very first time. Prayers for good health and development are being recited.
KARNAVEDH
The piercing of the lower lobes of the child’s ears at the age of three performs the Karnavedha sanskara. Prayers are offered to the Almighty for the physical well being of the child.
UPANAYAN
Upanayana or the thread ceremony is performed anytime between the ages of five to eight years old. Upa mean ‘approaching towards’ and Nayanam means ‘leading’. In this sanskara the child is given the yajnopavit (sacred thread), which is made from three strands representing the three letters of AUM. The three strands also symbolize the three discipline of life, which are knowledge, action and devotion.
VEDARAMBH
This sanskara is done immediately after the upanaya sanskara. Now the child becomes a student. The child will now gain knowledge from the Vedas and other religious text as well the other branches including mathematics and science. Thus the child will be able to progress in life spiritually as well as materially.
SAMAVARTAN
Between the ages of twenty-one and twenty-five years this sanskara is performed. This student should have now completed all his/her studies and start a new life of self-realization and independence.
VIVAH
Vivaha sanskara is performed when the student decides to get marry. This is one of the most important sanskara among the sixteen Vedic sacraments. This is the foundation that forms the very basis for a coordinated family life.
VAANAPRASTH
At age fifty-one years old, a person performs the vaanaprastha sanskara by relinquishing all livelihood from which he/she will gain personal benefits. All the family responsibilities will be given to the children.
SANNYAAS
This sanskara is performed at the age of seventy-five years. In this sanskara a person forsake all material things and starts to lead a life of meditation and contemplation onto the Almighty.
ANTYESHTI
The antyeshti is the last sanskara performed when the individual dies. After death this sanskara is performed when the body is cremated. As the atma (soul) is immortal, it cannot be destroyed; but the body which is made of clay, water, fire, air and ether once again returns to these elements
sabhi saskaron ko karane ke liye–ARYASAMAJ 219 SANCAR NAGAR,INDORE M.P.,9977987777,9977957777
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आर्यसमाज  का राष्ट्र को योगदान arya14

                                                         || ओ३म् ||

संसार में आर्य समाज एकमात्र ऐसा संगठन है जिसके द्वारा धर्म, समाज, और राष्ट्र तीनों के लिए अभूतपूर्व कार्य किए गए हैं, इनमे से कुछ इस प्रकार है –

वेदों से परिचय – वेदों के संबंध में यह कहा जाता था कि वेद तो लुत्प हो गए, पाताल में चले गए। किन्तु महर्षि दयानन्द के प्रयास से पुनः वेदों का परिचय समाज को हुआ और आर्य समाज ने उसे देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी पहुँचाने का कार्य किया। आज अनेक देशों में वेदो ऋचाएँ गूंज रही हैं, हजारों विद्वान आर्य समाज के माध्यम से विदेश गए और वे प्रचार कार्य कर रहे हैं। आर्य समाज कि यह समाज को अपने आप में एक बहुत बड़ी दें है।

सबको पढ़ने का अधिकार –  वेद के संबंध में एक और प्रतिबंध था। वेद स्त्री और शूद्र को पढ़ने, सुनने का अधिकार नहीं था। किन्तु आज आर्य समाज के प्रयास से हजारों महिलाओं ने वेद पढ़कर ज्ञान प्रपट किया और वे वेद कि विद्वान हैं। इसी प्रकार आज बिना किसी जाति भेद के कोई भी वेद पढ़ और सुन सकता है। यह आर्य समाज का ही देंन है।

जातिवाद का अन्त – आर्य समाज जन्म से जाति को नहीं मानता। समस्त मानव एक ही जाति के हैं। गुण कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था को आर्य समाज मानता है। इसीलिए निम्न परिवारों में जन्म लेने वाले अनेक व्यक्ति भी आज गुरुकुलों में अध्यन कर रहे हैं। अनेक व्यक्ति शिक्षा के पश्चात आचार्य शास्त्री, पण्डित बनकर प्रचार कर रहे हैं।

स्त्री शिक्षा  – स्त्री को शिक्षा का अधिकार नहीं है, ऐसी मान्यता प्रचलित थी। महर्षि दयानन्द ने इसका खण्डन किया और सबसे पहला कन्या विद्यालय आर्य समाज की ओर से प्रारम्भ किया गया। आज अनेक कन्या गुरुकुल आर्य समाज के द्वारा संचालित किए जा रहे हैं।

विधवा विवाह – महर्षि दयानन्द के पूर्व विधवा समाज के लिए एक अपशगून समझी जाति थी। सतीप्रथा इसी का एक कारण था। आर्य समाज ने इस कुरीति का विरोध किया तथा विधवा विवाह को मान्यता दिलवाने का प्रयास किया।

छुआछूत का विरोध – आर्य समाज ने सबसे पहले जातिगत ऊँचनीच के भेदभाव को तोड़ने की पहल की। इस आधार पर बाद में कानून बनाया गया। अछूतोद्धार के सम्बन्ध में आर्य सन्यासी स्वामी श्रद्धानन्द ने अमृतसर काँग्रेस अधिवेशन में सबसे पहले यह प्रस्ताव रखा था जो पारित हुआ था।

देश की स्वतन्त्रता में योगदान – परतंत्र भारत को आजाद कराने में महर्षि दयानन्द को प्रथम पुरोधा कहा गया। सन् 1857 के समय से ही महर्षि ने अंग्रेज़ शासन के विरुद्ध जनजागरण प्रारम्भ कर दिया था। सन् 1870 में लाहौर में विदेशी कपड़ो की होली जलाई। स्टाम्प ड्यूटी व नमक के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ा परिणाम स्वरूप आर्यसमाज के अनेक कार्यकर्ता व नेता स्वतन्त्रता संग्राम में देश को आजाद करवाने के लिए कूद पड़े।

स्वतन्त्रता आंदोलनकारियों के सर्वेक्षण के अनुसार स्वतन्त्रता के लिए 80 प्रतिशत व्यक्ति आर्यसमाज के माध्यम से आए थे। इसी बात को काँग्रेस के इतिहासकार डॉ॰ पट्टाभि सीतारमैया ने भी लिखी है। लाला लाजपतराय, पं॰ रामप्रसाद बिस्मिल, शहीदे आजम भगत सिंह, श्यामजी कृष्ण वर्मा, मदनलाल ढींगरा, वीर सावरकर, महात्मा गांधी के राजनैतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले आदि बहुत से नाम हैं।

गुरुकुल – सनातन धर्म की शिक्षा व संस्कृति के ज्ञान केंद्र गुरुकुल थे, प्रायः गुरुकुल परम्परा लुप्त हो चुकी थी। आर्य समाज ने पुनः उसे प्रारम्भ किया। आज सैकड़ों गुरुकुल देश व विदेश में हैं।

गौरक्षा अभियान – ब्रिटिश सरकार के समय में ही महर्षि दयानन्द ने गाय को राष्ट्रिय पशु घोषित करने व गोवध पर पाबन्दी लगाने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया था। गौ करुणा निधि नामक पुस्तक लिखकर गौवंश के महत्व को बताया और गाय के अनेक लाभों को दर्शाया। महर्षि दयानन्द गौरक्षा को एक अत्यंत उपयोगी और राष्ट्र के लिए लाभदायक पशु मानकर उसकी रक्षा का सन्देश दिया। ब्रिटिश राज के उच्च अधिकारियों से चर्चा की, 3 करोड़ व्यक्तियों के हस्ताक्षर गौवध के विरोध में करवाने का का कार्य प्रारम्भ किया,। गौ हत्या के विरोध में कई आन्दोलन आर्य समाज ने किए। आज गौ रक्षा हेतु लाखो गायों का पालन आर्य समाज द्वारा संचालित गौशालाओं में हो रहा है।

हिन्दी को प्रोत्साहन – महर्षि दयानन्द सरस्वती ने राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने के लिए एक भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिलाने के लिए सर्वप्रथम प्रयास किया। उसका प्रत्यक्ष उदाहरण है अहिन्दी भाषी प्रदेशों या विदेशों में जहाँ-जहाँ आर्य समाज हैं वहाँ हिन्दी का प्रचार है।

यज्ञ – सनातन धर्म में यज्ञ को बहुत महत्व दिया है। जीतने शुभ कर्म होते हैं उनमे यज्ञ अवश्य किया जाता है। यज्ञ शुद्ध पवित्र सामाग्री व वेद के मन्त्र बोलकर करने का विधान है। किन्तु यज्ञ का स्वरूप बिगाड़ दिया गया था। यज्ञ में हिंसा हो रही थी। बलि दी जाने लगी थी।

वेद मंत्रो के स्थान पर दोहे और श्लोकों से यज्ञ किया जाता था। यज्ञ का महत्व  भूल चुके थे। ऐसी स्थिति में यज्ञ के सनातन स्वरूप को पुनः आर्य समाज ने स्थापित किया, जन-जन तक उसका प्रचार किया और लाखों व्यक्ति नित्य हवन करने लगे। प्रत्येक आर्य समाज में जिनकी हजारों में संख्या है, सभी में यज्ञ करना आवश्यक है। इस प्रकार यज्ञ के स्वरूप और उसकी सही विधि व लाभों से आर्य समाज ने ही सबको अवगत करवाया।

शुद्धि संस्कार व सनातन धर्म रक्षा – सनातन धर्म से दूर हो गए अनेक हिंदुओं को पुनः शुद्धि कर सनातन धर्म में प्रवेश देने का कार्य आर्य समाज ने ही प्रारम्भ किया। इसी प्रकार अनेक भाई-बहन जो किसी अन्य संप्रदाय में जन्में यदि वे सनातन धर्म में आना चाहते थे, तो कोई व्यवस्था नहीं थी, किन्तु आर्य समाज ने उन्हे शुद्ध कर सनातन धर्म में दीक्षा दी, यह मार्ग आर्य समाज ने ही दिखाया। इससे करोड़ों व्यक्ति आज विधर्मी होने से बचे हैं। सनातन धर्म का प्रहरी आर्य समाज है। जब-जब सनातन धर्म पर कोई आक्षेप लगाए, महापुरुषों पर किसी ने कीचड़ उछाला तो ऐसे लोगों को आर्य समाज ने ही जवाब देकर चुप किया। हैदराबाद निजाम ने सांप्रदायिक कट्टरता के कारण हिन्दू मान्यताओं पर 16 प्रतिबंध लगाए थे जिनमें – धार्मिक, पारिवारिक, सामाजिक रीतिरिवाज सम्मिलित थे। सन् 1937 में पंद्रह हजार से अधिक आर्य व उसके सहयोगी जेल गए तीव्र आंदोलन किया, कई शहीद हो गए।

निजाम ने घबराकर सारी पाबन्दियाँ उठा ली, जिन व्यक्तियों ने आर्य समाज के द्वारा चलाये आंदोलन में भाग लिया, कारागार गए उन्हे भारत शासन द्वारा स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों की भांति सम्मान देकर पेंशन दी जा रही है।

सन् 1983 में दक्षिण भारत मीनाक्षीपुरम में पूरे गाँव को मुस्लिम बना दिया गया था। शिव मंदिर को मस्जिद बना दिया गया था। सम्पूर्ण भारत से आर्यसमाज के द्वारा आंदोलन किया गया और वहाँ जाकर हजारों आर्य समाजियों ने शुद्धि हेतु प्रयास किया और पुनः सनातन धर्म में सभी को दीक्षित किया, मंदिर की पुनः स्थापना की।

कश्मीर में जब हिंदुओं के मंदिर तोड़ना प्रारम्भ हुआ तो उनकी ओर से आर्य समाज ने प्रयास किया और शासन से 10 करोड़ का मुआवजा दिलवाया।

ऐसे अनेक कार्य हैं, जिनमें आर्य समाज सनातन धर्म की रक्षा के लिए आगे आया और संघर्ष किया बलिदान भी दिया।

इस प्रकार आर्य समाज मानव मात्र की उन्नति करने वाला संगठन है, जिसका उद्देश्य शारीरिक, आत्मिक व सामाजिक उन्नति करना है। वह अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहकर सबकी उन्नति में अपनी उन्नति मानता है।

इसलिए आर्य समाज को जो मानव मात्र की उन्नति के लिए, सनातन संस्कृति के लिए प्र्यत्नरत है उसके सहयोगी बनें। परंतु आर्य समाज के प्रति भ्रम होने से कुछ ऐसा है –

                                        जिन्हें फिक्र है ज़ख्म की, उन्हे कातिल समझते हैं।

                                          फिर तो, यो ज़ख्म कभी ठीक हो नहीं सकता  हैं aryasamaj indore m.p.9977987777,9977957777,

आर्यसमाज  का राष्ट्र को योगदान arya14

                                                         || ओ३म् ||

               || ओ३म् ||

arya13arya12

                      संस्कार से ही मानव का निर्माण होता हैं.

                                  

16 संस्कारों का महत्त्व

            16 SANSKARS

In the Vedic Tradition, there are sixteen religious ceremonies known as Sanskars or the Sacraments of Life. The Sanskars are performed for the physical, social, and spiritual development of the individual. We at Arya Samaj Gandhidham have good and learned priests who perform these 16 Sanskaras. These 16 Sanskaras are

GARBHADHAN

This sanskara is performed for the fulfillment of one’s parental obligation and a continuation of the human race. This is a fervent prayer for the impregnation of the foetus with the life-giving soul force. Garbha means womb and Dhana means give or donate. This sanskara is performed after marriage and before the conception of a child. In this sanskara, the couple chants Vedic mantras for a healthy, loving and happy married life and the wish for a son or daughter that would bring new joy in the home.

PUNSAVAN

During the third or fourth month of pregnancy the Punsavana (protection of the fetus) sanskara is performed for the physical growth of the child.

SIMANTONNAYAN

This sanskara is performed during the seventh month of pregnancy. The parents to be and their relatives offer prayers to the Almighty mental growth of the child.

JATAKARM

The Jatakarma sanskara (the child’s nativity) should be done immediately after the birth of the child. This sanskara is done to welcome the new-born child. The father writes AUM on the tongue of the child with a thin bar of gold dipped in honey. He whispers the word “VEDO-ASI” (You are Veda – knowledge) in the ear of the child

NAMAKARAN

Nama literally means ‘name’ and Karan means ‘to make, to effect’. Thus, in this sanskara the child is given a name. This sanskara should be performed on the 11th day after the birth of the child.

NISHKRAMAN

The 4th month after the birth of the child, the Nishkramana sanskara is performed. Here the child is taken outside the home for the first time to be exposed to the different elements of nature.

ANNA-PRAASHAN

Anna means ‘food’ and Prashana mean ‘eating, feeding’ thus, giving solid food to the child for the very first time performs this sanskara.

MUNDAN

This sanskara can be performed between the ages of 1-3 years old. In this sanskara the hair from the child’s head is shaved off for the very first time. Prayers for good health and development are being recited.

KARNAVEDH

The piercing of the lower lobes of the child’s ears at the age of three performs the Karnavedha sanskara. Prayers are offered to the Almighty for the physical well being of the child.

UPANAYAN

Upanayana or the thread ceremony is performed anytime between the ages of five to eight years old. Upa mean ‘approaching towards’ and Nayanam means ‘leading’. In this sanskara the child is given the yajnopavit (sacred thread), which is made from three strands representing the three letters of AUM. The three strands also symbolize the three discipline of life, which are knowledge, action and devotion.

VEDARAMBH

This sanskara is done immediately after the upanaya sanskara. Now the child becomes a student. The child will now gain knowledge from the Vedas and other religious text as well the other branches including mathematics and science. Thus the child will be able to progress in life spiritually as well as materially.

SAMAVARTAN

Between the ages of twenty-one and twenty-five years this sanskara is performed. This student should have now completed all his/her studies and start a new life of self-realization and independence.

VIVAH

Vivaha sanskara is performed when the student decides to get marry. This is one of the most important sanskara among the sixteen Vedic sacraments. This is the foundation that forms the very basis for a coordinated family life.

VAANAPRASTH

At age fifty-one years old, a person performs the vaanaprastha sanskara by relinquishing all livelihood from which he/she will gain personal benefits. All the family responsibilities will be given to the children.

SANNYAAS

This sanskara is performed at the age of seventy-five years. In this sanskara a person forsake all material things and starts to lead a life of meditation and contemplation onto the Almighty.

ANTYESHTI

The antyeshti is the last sanskara performed when the individual dies. After death this sanskara is performed when the body is cremated. As the atma (soul) is immortal, it cannot be destroyed; but the body which is made of clay, water, fire, air and ether once again returns to these elements

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  • The Upnayan sanskar (Yahyopavit Sanskar)

    denotes the rising of Man’s consciousness towards God.The sacred thread ceremony is very significant in the life of a Hindu man.In Indian culture its an taking pledge to lead disciplines, dignified spiritual life.

After Yagyopaveet , the child left his Home saying goodbye to all relatives who had gathered for this Goodbye.It indeed gives “new birth” to a person.His life would change. Discipline would then become the center point of his life.The child went to his Guru’s place and learn the art of living and develop vision to see things in a proper way and to know what is ‘wrong’ and what is ‘right’. Therefore, Upnayan is essential to handle household life.

The twist in the thread symbolizes strength and honesty. Gayatri Mantra is given to the child who promises to lead a good human life as per the rules of Vedas.This shikha is placed at a point, which is very important for positive impact of yoga and meditation.

If you want to perform  it for your Son…

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Pt. Shastri ji

ARYA SAMAJ INDORE M.P.
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महर्षि दयानन्द सरस्वती

om1महर्षि दयानन्द समस्त विश्व के गुरू वा आचार्य थे। उन्होंने पक्षपात रहित होकर संसार के सभी मनुष्यों के प्रति भ्रातृभाव रखते हुए उनके कल्याण की भावना से वेदों के ज्ञान से उनका शुभ करने के लिए वेद प्रचार का प्रशंसनीय व अपूर्व कार्य किया था। बहुत से मताग्रही लोगों ने उनके यथार्थ अभिप्राय को जानने का प्रयास नहीं किया और उनके विरोधी बन गये। हम विदेशी मतों व सम्प्रदायों की बात तो क्या करें, स्वयं हमारे देश के वेद को मानने वाले पौराणिक लोगों ने उनका विरोध ही नहीं किया अपितु अनेक लोगों ने उनके प्राणहरण की अनेक बार कुचेष्टायें की। महर्षि ने जब वेद प्रचार कार्य आरम्भ किया था, तभी से वह जानते थे कि देश व विदेशी मतों के अज्ञानी व स्वार्थी लोग उनका विरोध करेंगे और उनके प्राण संकटग्रस्त रहेंगे। इस पर भी उन्होंने वेद प्रचार के मार्ग को चुना था क्योंकि सत्य को जाने, अपनायें व धारण किये बिना मनुष्य जाति की उन्नति सम्भव नहीं थी। यह सब कुछ होने पर भी अनेक मत-मतान्तरों के अनेक सुधी व निष्पक्ष लोगों ने स्वामी जी व उनके कार्यों के महत्व को समझा था और उन्होंने निःसंकोच भाव से उसे सार्वजनिक रूप से प्रकट भी किया था। ऐसे ही एक ‘युगपुरूष हिन्दी के साहित्यकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी’ थे। आज हम उनकी महर्षि दयानन्द को दी गई श्रद्धाजलि के शब्दों को प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रद्धाजंलि में प्रस्तुत शब्दों को बार-बार पढ़ने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि यदि संसार के सभी मतावलम्बी निष्पक्ष होकर महर्षि दयानन्द व उनके कार्यों का अवलोकन करते तो भले ही वह उनके अनुयायी बनते या न बनते, परन्तु उनका निष्कर्ष अवश्य ही महावीरप्रसाद द्विवेदी जी के विचारों के अनुरूप होता। यहां यह भी उल्लेख कर दें कि हम कुछ समय पूर्व उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द जी के महर्षि दयानन्द के चित्र को अपने घरों में लगाने के समर्थन व यह चित्र लगाना मूर्तिपूजा न होकर उन्हें किस प्रकार से उनके कर्तव्यों की प्रेरणा करता है, सम्बंधी विचारों को प्रस्तुत कर चुके हैं।  उसकी पुष्टि महावीर प्रसाद द्विवेद्वी जी के लेख से भी हो रही है। अब द्विवेदी जी द्वारा प्रस्तुत विचार प्रस्तुत हैं:   ‘‘सनातन धर्मावलम्बियों की सन्तति होने और देवी-देवताओं के सम्मुख सिर झुकाने पर भी मेरे हृदय में श्री स्वामी दयानन्द जी सरस्वती पर अगाध श्रद्धा है। वे बहुत बड़े समाज-संस्कर्ता, वेदों के बहुत बड़े ज्ञाता तथा समयानुकूल भाष्यकर्त्ता और आर्य संस्कृति के बहुत बड़े पुरस्कर्ता थे। उन्होंने जिस समाज की संस्थापना की है, उससे भी अपने देश, अपने धर्म और अपनी भाषा को बहुत लाभ पहुंच रहा है। मैं स्वामी जी की विद्वता और उनके कार्यकलाप को अभागे भारत के सौभाग्य का सूचक चिन्ह समझता हूं। उनका चित्र चिरकाल तक मेरे नेत्रों के सामने रहकर मेरी आत्मा को बल का तथा मेरे बैठने के कमरे को शोभा का, दान देता रहा है। स्वामी जी के विषय में इससे अधिक लिखने की शक्ति इस समय मेरे जराजीर्ण शरीर में नहीं। अतएव-   धन्यंच प्राज्ञमूर्धन्यं दयानन्दं दयाधनम्।                         स्वामिनं तमहं वन्दे वारं वारंच सादरम्।।”   हम अपने पौराणिक विद्वानों से पूछना चाहिते हैं कि क्या वह श्री महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के इस कथन से असहमति रखते हैं? जो व्यक्ति महर्षि दयानन्द सरस्वती के किसी व किन्हीं विचारों से असहमति रखते हैं वह स्वयं से प्रश्न करें कि क्या उन्होंने निष्पक्ष भाव से महर्षि दयानन्द के ग्रन्थों का अध्ययन किया है? हमारे पास ऐसे अनेकों प्रमाण हैं कि जब किसी निष्पक्ष पौराणिक विद्वान ने महर्षि दयानन्द के विचारों व सिद्धान्तों का निष्पक्ष भाव से अध्ययन किया तो वह सदा सदा के लिए उनका अनुयायी बन गया। अनेक मतों में भी उनके ऐसे अनुयायी हुए या बने हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए हम स्वामी सर्वदानन्द सरस्वती का नाम प्रस्तुत करते हैं जो कट्टर पौराणिक साधू थे परन्तु रोगग्रस्त होने पर एक आर्यसमाजी द्वारा उनकी सेवा सुश्रुषा करने और विदाई के समय उस बन्धु द्वारा उन्हें कपड़ें में लपेट कर सत्यार्थप्रकाश भेंट करने और उनसे विनती करने कि जब समय मिले इस पुस्तक को अवश्य पढ़े। सेवाभावी आर्यसमाजी भक्त के इन शब्दों व विपदकाल में उनकी सेवा ने स्वामीजी को पुस्तक पढ़ने के लिए विवश किया और पुस्तक पढ़ने के बाद स्वामी जी पूरी तरह बदल गए और महर्षि दयानन्द के अनुयायी बन गये। उन्होंने मृत्यु पर्यन्त आर्य सन्यासी बनकर देश व वैदिक धर्म की अनेकविध प्रशंसनीय सेवा की।

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