“हमारा अनादि व शाश्वत सखा है ईश्वर”

“हमारा अनादि व शाश्वत सखा है ईश्वर”

          हमें मनुष्य का जन्म मिला और हम जन्म से लेकर अब तक अपने पूर्व जन्मों सहित इस जन्म के क्रियमाण कर्मों के फल भोग रहे हैं। हम जीवात्मा हैं, शरीर नहीं है। जीवात्मा चेतन पदार्थ है। चेतन का अर्थ है कि यह जड़ न होकर संवेदनशील है और ज्ञान प्राप्ति एवं कर्म करने की सामर्थ्य से युक्त है। यह सुख व दुःख का अनुभव करता है। जीवात्मा अल्प परिमाण अर्थात् सूक्ष्म, एकदेशी व ससीम सत्ता है। यह अनादि व अमर है।

          जीवात्मा का कभी नाश अर्थात् अभाव नहीं होता, अतः इसे अविनाशी कहा जाता है। जीवात्मा अपने शरीर की इन्द्रियों यथा नेत्र तथा मन आदि की सहायता से स्थूल जड़ पदार्थों को देखता है परन्तु स्वयं अपने को अर्थात् अपनी आत्मा व सृष्टिकर्ता ईश्वर को नहीं देख पाता। कारण यही है कि जीवात्मा अत्यन्त सूक्ष्म है और परमात्मा आत्मा से भी सूक्ष्म अर्थात् सूक्ष्मतम है। हम वायु, जल की भाप, वायु में विद्यमान गैसों, धूल के सूक्ष्म कणों तथा दूर के पदार्थों को नहीं देख पाते। अतः यदि हम अपनी व दूसरों की आत्माओं तथा परमात्मा को नहीं देख पाते तो इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। किसी भी पदार्थ व उसके अस्तित्व को उसके लक्षणों से जाना जाता है।

          नदी में यदि जल का स्तर बढ़ जाता है तो अनुमान होता है कि नदी के ऊपरी भाग में कहीं भारी वर्षा हुई है। आकाश में धुआं देखते हैं तो हमें अग्नि का ज्ञान होता है। किसी मनुष्य व उसके बच्चे को देखते हैं तो ज्ञात होता है कि इसके माता-पिता अवश्य होंगे। यह हो सकता है कि पहले उसके जन्म, उससे पूर्व पश्चात वह रहे हों परन्तु अब दिवंगत हो गये हों। अतः आत्मा व परमात्मा को भी इनकी क्रियाओं, रचनाओं व कार्यों के द्वारा जाना जाता है। आत्मा की उपस्थिति का अनुमान शरीर की जीवित अवस्था में इसमें होने वाली क्रियाओं से भी होता है। यदि शरीर में आत्मा न हो तो यह मृत कहलाता है और मृतक शरीर में किसी प्रकार की क्रियायें जो जीवित शरीर में होती हैं, नहीं होती। ईश्वर को भी हम उसकी अपौरुषेय रचनाओं व कृतियों के द्वारा जानते हैं। संसार का अस्तित्व है।

           वैज्ञानिक भी संसार के अस्तित्व को मानते हैं। वैज्ञानिकों की विडम्बना यह है कि वह संसार को बनाने वाली सत्ता परमात्मा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। इसका कारण यह है कि ईश्वर का अस्तित्व प्रयोगशाला में सिद्ध नहीं किया जा सकता जैसा कि भौतिक पदार्थों का होता है। इसी बात को दशर्नों में ईश्वर को अतीन्द्रिय अर्थात् ईश्वर इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता कहकर बताया गया है। ईश्वर हमारी ज्ञान इन्द्रियों से पकड़ में नहीं आता तथापि उसे वेद, दर्शन व उपनिषद पढ़कर तथा चिन्तन-मनन-ध्यान आदि के द्वारा जाना जा सकता है।

           हम योगियों, ईश्वर का ध्यान व चिन्तन करने वाले विद्वानों तथा स्वाध्यायशील लोगों की संगति से भी जान सकते है। सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय, आर्यसमाज के दूसरे नियम आदि के स्वाध्याय, अध्ययन व चिन्तन-मनन से भी ईश्वर का ज्ञान होता है। इस प्रकार से जीवात्मा एवं ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है।

           विज्ञान भौतिक पदार्थों का अध्ययन करता है। जीवात्मा और परमात्मा भौतिक नहीं नहीं हैं अपितु चेतन वा अभौतिक पदार्थ हैं, अतः इनका निर्भ्रान्त ज्ञान केवल वेद एवं वैदिक ग्रन्थों के स्वाध्याय सहित योग, ध्यान, स्तुति, प्रार्थना? उपासना व समाधि आदि के द्वारा ही किया जा सकता है। बहुत से वैज्ञानिक ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते परन्तु ऐसे भी शीर्ष वैज्ञानिक हुए हैं जिन्होंने ब्रह्माण्ड में सृष्टिकर्ता एवं सृष्टि के पालक ईश्वर के होने की सम्भावना व्यक्त की है।

           ईश्वर है और वह सच्चिदानन्दस्वरूप है। इसका सत्यस्वरूप ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के सातवें समुल्लास सहित आर्यसमाज के दूसरे नियम में प्रस्तुत किया है। आर्यसमाज के दूसरे नियम में वह बताते हैं कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरुप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना करनी योग्य है।

           ऋषि दयानन्द ने इन शब्दों में ईश्वर के सम्बन्ध में जो कहा है वह यथार्थ सत्य है। हमें इसके एक एक शब्द पर विचार करना चाहिये। आर्यसमाज की स्थापना से पूर्व ईश्वर को जानने के लिये ईश्वर भक्तों को वर्षों तक स्वाध्याय, साधना एवं विद्वानों की संगति करनी पड़ती थी। तब जो ज्ञान प्राप्त होता था, हम समझते हैं कि ऋषि दयानन्द ने कृपा करके वही समस्त ज्ञान हमें एक दो वाक्यों में दे दिया है। यह नियम आध्यात्मिक जगत का अमृत है। ऋषि दयानन्द का मानवता पर यह बहुत बड़ा उपकार वा ऋण है। सभी मत-मतान्तरों के आचार्यों को इससे लाभान्वित होना चाहिये और अपने मतों में ईश्वर विषयक इस मान्यता व दृष्टिकोण के आधार पर संशोधन करना चाहिये।

           ईश्वर अनादि सत्ता है। जीवात्मा भी अनादि सत्ता है। दोनों, अजर, अमर सत्ता व अस्तित्व वाले हैं। आत्मा सूक्ष्म है तथा परमात्मा आत्मा से भी सूक्ष्म है। ईश्वर सर्वव्यापक तथा सर्वान्तर्यामी है। वह आत्मा के भीतर भी व्यापक है और हमारी आत्मा अर्थात् हमें हमसे भी अधिक जानता है। ईश्वर को हमारे अतीत का पूर्ण ज्ञान है। हमें अपने पूर्वजन्मों तथा इस जन्म की भी बहुत सी बातों का ज्ञान नहीं है। हमारी भूलने की प्रवृत्ति है। ईश्वर और जीवात्मा का व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध अनादि काल से है और अनन्त काल तक अबाध रूप से सदैव बना रहेगा। कभी समाप्त नहीं होगा। हमारा उपास्य ईश्वर है। हम उपासक है, हमारा यह सम्बन्ध भी नित्य सम्बन्ध है। हम ईश्वर की उपासना करें या न करें परन्तु हमारा सम्बन्ध हर काल व क्षण उससे बना रहता है। दोनों में देश व काल की दूरी नहीं है अपितु दोनों साथ-साथ रह रहे हैं।

          दोनों एक दूसरे के इतने निकट हैं कि हमारे इतना निकट अन्य कोई पदार्थ नहीं है। हमें जन्म-मरण तथा सुखों को देने वाला भी ईश्वर ही है। हमारे कर्मानुसार वह हमें मनुष्य सहित अनेकानेक योनियों में जन्म-मृत्यु देकर व सृष्टि की उत्पत्ति-स्थिति व प्रलय का चक्र चलाकर वह हमें घुमाता रहता है। वह हमारे किसी दुःख व सुख में हमारा साथ कभी नहीं छोड़ता। ईश्वर के हमारे ऊपर अनन्त उपकार हैं। हम कितना भी कर लें, उसके उपकारों रूपी ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकते। हम केवल उसके उपकारों के लिये मनुष्य जीवन में उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना ही कर सकते हैं। उसकी आज्ञा का पालन कर भी हम उसे प्रसन्न कर सकते हैं और उससे सुख व सुख के साधन प्राप्त कर सकते हैं।

          ईश्वर ने वेदों में मनुष्यों के कर्तव्य व अकर्तव्यों का ज्ञान कराया है। हमें नित्य प्रति वेदों का अध्ययन करना चाहिये। ऋषि दयानन्द एवं आर्य विद्वानों का भाष्य पढ़कर हम वेदों का स्वाध्याय कर सकते हैं और ईश्वर की वेदों के माध्यम से सभी मनुष्यों को की गई प्रेरणाओं को जानकर व उसका आचरण कर हम अपना कल्याण कर सकते हैं। यही हमारा कर्तव्य व धर्म है। वेदों का स्वाध्याय एवं उसके अनुसार आचरण ही संसार में एकमात्र धर्म है। हम जिन्हें धर्म कहते हैं उनमें से कोई भी धर्म न होकर सभी मत-मतान्तर, सम्प्रदाय, रिलीजन, मजहब आदि हैं। धर्म तो केवल वेदनिहित व वेदविहित ईश्वर की सत्य आज्ञाओं का पालन करना ही है।

         ऐसा करके ईश्वर हमारा मित्र व सखा बन जाता है। उपासना करके हम ईश्वर के जितना निकट जायेंगे उतने हमारी आत्मा के मल दूर होते जायेंगे। हम ज्ञान प्राप्त करेंगे और ईश्वर की इस सृष्टि में सब प्राणियों को अपने एक परिवार के रूप में जानेंगे और व्यवहार करेंगे। इसी कारण हमारी संस्कृति में ”वसुधैव कुटुम्बकम्” का विचार आया है जो कि सत्य व यथार्थ है।

         हम कुछ वर्ष पूर्व इस संसार में जन्में हैं। कुछ वर्ष बात हमारी मृत्यु निश्चित है। जन्म से पूर्व भी हमारी आत्मा का अस्तित्व था और मृत्यु के बाद भी हमारी आत्मा का अस्तित्व रहेगा। अनादि काल से हमारे अगण्य जन्म हो चुके हैं। अगण्य बार हम मृत्यु को प्राप्त हुए हैं। प्रायः सभी अगण्य योनियों में कर्मानुसार हमारा जन्म हुआ है और आगे भी होगा। अनेक बार हम मोक्ष में गये हैं और मोक्ष से लौटे भी हैं। इन सब अवस्थाओं में ईश्वर ही एकमात्र हमारा साथी, मित्र व सखा रहा है और आगे भी रहेगा। यह ध्रुव सत्य है। इसे हमें अनुभव करना है और इसके आधार हमें अपने भावी जीवन के निर्वाह की योजना बनानी है।

         हमारे प्राचीन ऋषियों ने सभी मनुष्यों के लिये पंचमहायज्ञों का विधान किया है। इन यज्ञों को करके हम अपनी आत्मा की उन्नति करते हैं और मोक्ष के निकट पहुंचते हैं। मोक्ष में भी हम ईश्वर के साथ रहते हैं और उससे शक्तियों को प्राप्त करके आनन्द से युक्त रहते हैं। जन्म व मरण तथा इन दोनों के बीच जितने व जिस प्रकार के अनेकानेक क्लेश होते हैं, मोक्ष प्राप्त होने पर हम उनसे बचे रहते हैं। सभी मनुष्यों का एकमात्र परम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति के लिये पुरुषार्थरत, तपस्यारत व उपासनारत रहना है। वैदिक पथ पर चलकर ही हमारी उन्नति हो सकती है।

       अन्य मार्ग मनुष्य को गुमराह करते हैं व बन्धन में डालकर उसे नरकगामी बनाते हैं। वेदतर मत मनुष्य को न तो उसकी आत्मा का यथार्थ स्वरूप बतातें हैं और न ईश्वर के सच्चे स्वरूप से ही परिचित कराते हैं। संसार में वेदों व ऋषियों के वेदानुकूल ग्रन्थों का ज्ञान मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पत्ति है। जो मनुष्य इससे वंचित हैं वह वस्तुतः ज्ञान व कर्मों की पूंजी की दृष्टि से दरिद्र हैं। बिना वेद-ज्ञान मनुष्य दुःखो व दरिद्रताओं से नहीं छूट सकता। ज्ञान वह है जो सत्य व असत्य का यथार्थ ज्ञान कराये। ईश्वर व आत्मा विषयक सत्य ज्ञान प्राप्त करना ही मनुष्य का प्रथम, मुख्य एवं अनिवार्य कर्तव्य है।

       इससे हम ईश्वर व आत्मा को जानकर अपना व अन्यों का कल्याण कर सकते हैं जैसा कि अतीत में ऋषि दयानन्द सहित अन्य ऋषियों व आर्य महापुरुषों ने किया है। निष्कर्ष यह है कि हम ईश्वर व उसके गुणों को जानकर उसके शाश्वत संखा बने और अपने भावी जन्म-जन्मान्तरों के दुःखों को दूर करें। उन्नति का अन्य कोई मार्ग नहीं है। ओ३म् शम्।

–मनमोहन कुमार आर्य

ब्रिटिश बंदूक और भारतीय सन्यासी का सीना

ब्रिटिश बंदूक और भारतीय सन्यासी का सीना

          ठीक आज से 100 वर्ष पहले साल 1919 मार्च का महीना था। देश पर विदेशी शासन था और भारतीय नागरिक गुलामी की जिन्दगी जीने को मजबूर थे। हालाँकि देश में जगह क्रांति के अंकुर फूट चुके थे पर अंग्रेजी सरकार उन अंकुरों को अपने विदेशी बूटों से कुचल भी रही थी। ऐसे माहौल में एक अंग्रेज अधिकारी जिनका नाम था सर सिडनी रौलेट उनकी अध्यक्षता वाली सेडिशन समिति की शिफारिशों के आधार पर काला कानून (रॉलेट ऐक्ट) बनाया गया। यह कानून देश में स्वतंत्रता के उभरते स्वर को दबाने के लिए था। इसके अनुसार अंग्रेजी सरकार को यह अधिकार प्राप्त हो गया था कि वह किसी भी भारतीय पर अदालत में बिना मुकदमा चलाए उसे जेल में बंद कर जो जुल्म चाहे  कर सकती थी।

         इस कानून के तहत अपराधी को उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने वाले का नाम जानने का अधिकार भी समाप्त कर दिया गया था। यूँ तो इस कानून के विरोध में देशव्यापी हड़तालें, जूलूस और प्रदर्शन होने लगे। ये राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक उथल-पुथल का युग था। अधिकांश भारतीय मौन थे लेकिन आर्य समाज के सिपाही उस समय सीना ताने अंग्रेजी सरकार के सामने खड़े हो गये थे। इस आन्दोलन के सिपाही भारत माँ के एक बहादुर लाल का नाम था स्वामी श्रदानंद जो गुलामी के घनघोर अँधेरे में आजादी का पथ खोजने के लिए स्वामी दयानन्द जी महाराज से प्रेरणा लेकर आजादी की मशाल लेकर चल निकला था। तब गाँधी जी ने कहा था की आर्यसमाज हिमालय से टकरा रहा हैं। वो हिमालय था भारत में ब्रिटिश सरकार जिनके बारे में कहा जाता है कि उनके राज्य में सूरज भी नहीं डूबता । लेकिन चट्टानों से ज्यादा आर्य समाज के होसले कहीं ज्यादा बुलंद निकले।

         30 मार्च 1919 ई. के दिन रौलट एक्ट के विरोध में आन्दोलन शुरु हुए। दिल्ली में इस सत्याग्रही सेना के प्रथम सैनिक और मार्गदर्शक स्वामी श्रद्धानन्द ही थे। सब यातायात बन्द हो गये। स्वयंसेवक पुलिस द्वारा पकड़ लिए गए। भीड़ ने साथियों की रिहाई के लिए प्रार्थना की तो पुलिस ने गोलियां चला दी। सांयकाल के समय बीस पच्चीस हजार की अपार भीड़ एक कतार में भारत माता की जय के नारे लगाती हुई घंटाघर की और स्वामी जी के नेतृत्व में चल पड़ी। अचानक कम्पनी बाग के गोरखा फौज के किसी सैनिक ने गोली चला दी जनता क्रोधित हो गई। लोगों को वहीं खडे़ रहने का आदेश देकर स्वामी जी आगे जा खडे़ हुए और धीर गम्भीर वाणी में पूछा- तुमने गोली क्यों चलाई?

        सैनिकों ने बन्दुकों की संगीने आगे बढ़ाते हुए कहा- “हट जाओ नहीं तो हम तुम्हें छेद देंगे”। स्वामी जी एक कदम और आगे बढ़ गए अब संगीन की नोक स्वामी जी की छाती को छू रही थी। स्वामी जी शेर की भांति गरजते हुए बोले- “मेरी छाती खुली है हिम्मत है तो चलाओ गोली” अंग्रेज अधिकारी के आदेश से सैनिकों ने अपनी संगीने झुका ली और जलूस फिर चल पड़ा।

       इस घटना के बाद सब और उत्साह का वातावरण बना। 4 अप्रैल को दोपहर बाद मौलाना अब्दुला चूड़ी वाले ने ऊँची आवाज में स्वामी श्रद्धानन्द की तकरीर (भाषण) होनी चाहिए। कुछ नौजवान स्वामी जी को उनके नया बाजार स्थित मकान से ले आए। स्वामी जी मस्जिद की वेदी पर खडे़ हुए। उन्होंने ऋग्वेद के मन्त्र ‘त्वं हि नः पिता….. से अपना भाषण प्रारम्भ किया। भारत ही नहीं इस्लाम के इतिहास में यह प्रथम घटना थी कि किसी गैर मुस्लिम ने मस्जिद के मिम्बर से भाषण किया हो।

         पर होनी को कुछ और मंजूर था 13 अप्रैल आते-आते भारत के पंजाब प्रान्त के अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर के निकट जलियाँवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 (बैसाखी के दिन) रौलेट एक्ट का विरोध करने के लिए एक सभा हो रही थी। जिसमें जनरल डायर नामक एक अँग्रेज ऑफिसर ने अकारण उस सभा में उपस्थित भीड़ पर गोलियाँ चलवा दीं जिसमें 1000 से अधिक व्यक्ति मरे और 2000 से अधिक घायल हुए। इस घटना के बाद स्वामी श्रद्धानन्द जी ने दिल्ली में आसन जमाया। उसी समय काँग्रेस का अधिवेशन अहमदाबाद में हुआ। इसकी अध्यक्षता स्वामी जी ने की। पंजाब सरकार स्वामी जी को गिरफ्तार करना चाहती थी। अमृतसर में अकालियों ने गुरु का बाग में सरकार से मोर्चा ले रखा था। स्वामी जी अमृतसर पहुंच गए। स्वर्ण मन्दिर में पहुंचकर ‘अकाल तख्त’ पर एक ओजस्वी भाषण दे डाला। ‘गुरु का बाग’ में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर 1 वर्ष 4 मास की जेल की सजा दे दी। बाद में 15 दिन में ही रिहा कर दिया गया। इसके बाद मानो स्वामी जी क्रांति की एक ऐसी मशाल बन गये जो सोये भारत के युवाओं के रक्त अग्नि बनकर धधकने लगे। माना जाता है कि यह घटना ही भारत में ब्रिटिश शासन के अंत की शुरुआत बनी और देश को अंग्रेजी शाशन से मुक्ति मिली। इस महान सन्यासी स्वामी श्रद्धानन्द को उनके इस साहस और त्याग के 100 वर्ष पुरे होने पर आर्य समाज का नमन.

स्कूलों में बच्चे कितने सुरक्षित हैं

स्कूलों में बच्चे कितने सुरक्षित हैं

           एक समय था जब स्कूलों में छात्रों के आपसी झगडे में या तो किताब कॉपी के एक दो पन्ने फट जाते थे या स्कूल ड्रेस का कोई बटन या हुक टूट जाया करता था। इसकी सजा के रूप में स्कूल में दोनों को मुर्गा बनकर और घर में अलग से मार खानी पड़ती थी। पर आज ऐसा नहीं रहा, यदि अखबारों की खबरें देखें तो अब स्कूलों में आपसी झगडे का नतीजा हत्या, हिंसा के रूप में देखने को मिल रहा है और माता-पिता बच्चों के अपराध करने के जुर्म में कोर्ट के चक्कर काटते दिखाई दे रहे है।

         अभी की ताजा घटना देखें तो देहरादून के एक बोर्डिंग स्कूल में एक बारह साल के बच्चे की निर्मम हत्या से एक बार फिर शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले स्कूल के दामन पर खून के धब्बे दिखाई दे रहे है। इस हत्याकांड में स्कूल प्रबन्धन पर भी सवाल उठ रहे है। सातवीं वीं कक्षा में पढ़ने वाले छात्र वसु यादव को दो 12वीं के छात्रों ने क्रिकेट बैट से पीट-पीटकर मार डाला और आश्चर्य की बात ये है कि स्कूल प्रशासन ने बिना किसी को बताए यहां तक कि बच्चे के अभिभावकों को भी बिना बताए बच्चे को स्कूल परिसर में ही दफना दिया। इससे फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि स्कूलों में बच्चे कितने सुरक्षित हैं।

         पिछले दिनों की कुछ घटनाओं को देखें तो दिल्ली के करावल नगर के जीवन ज्योति स्कूल की पहली मंजिल के बाथरूम में पंद्रह साल के एक छात्र वैभव की लाश मिली थी। जनवरी, 2018 को लखनऊ के एक स्कूल में पहली कक्षा के 7 वर्षीय छात्र ऋतिक शर्मा को 12 वर्षीय चौथी कक्षा में पढ़ने वाली एक छात्रा ने स्कूल के शौचालय में बंद करके उसकी छाती और पेट में छुरा घोंप कर गंभीर रूप से घायल कर दिया था। इसी दौरान दिल्ली के ज्योति नगर इलाके के एक सरकारी स्कूल में कुछ छात्रों ने 10वीं के छात्र की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। दिल्ली से सटे गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में हुए बहुचर्चित प्रद्युम्न हत्याकांड से कौन अनभिज्ञ होगा, इसके बाद देश के अन्य क्षेत्रों को देखें तो गुजरात के वड़ोदरा में एक छात्र की चाकू से 31 बार वार कर हत्या कर दी थी। 21 जुलाई को जींद में पिल्लूखेड़ा के एक प्राइवेट स्कूल में 12वीं कक्षा के 18 वर्षीय छात्र अंकुश को उसके कुछ साथी छात्रों ने छुरा घोंप कर घायल कर दिया था जिससे अगले दिन उसकी मौत हो गयी थी। देशभर में इस तरह की न जाने कितनी घटनाएं हैं, जो स्कूली छात्रों में पनप रही हिंसा की प्रवृत्ति की ओर इशारा करती हैं और ये घटनाएं समाज के लिए खतरे की घंटी हैं।

        ऐसे सभी मामलों में पुलिस हत्या का कारण बच्चों में आपसी झगड़ा बताकर अपनी रिपोर्ट पूरी करती है या फिर इन हत्याओं में शामिल छात्रों को गिरफ्तार कर जेल भेज देती है। किन्तु इसकी बाद अगली कहानी फिर वही से शुरू हो जाती है कि आखिर स्कूली बच्चों अन्दर ये हिंसा कुंठा आ कहाँ रही है? जो विवाद आपसी संवाद से सुलझाये जा सकते है, उन्हें हत्या या हिंसा से क्यों सुलझाया जा रहा हैं। अभी तक ऐसे मामले पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका के राज्यों में देखने सुनने को मिलते थे। बंदूक संस्कृति में पैदा हुए वहां के बच्चें अपना जरा सा हित टकराते ही स्कूलों में गोलाबारी की घटनाओं को अंजाम देते रहते है। पिछले साल फ्लोरिडा में हुई गोलीबारी में 14 छात्रों सहित 17 लोगों की जानें गईं थी और टेक्सास के एक हाई स्कूल में हुई हिंसक घटना में कम से कम 10 छात्रों की मौत हुई थी।

        अब सवाल ये उभरता है कि आखिर हमारे देश में ऐसा क्यों होने लगा है, अचानक बच्चों के अन्दर ये हिंसा कैसे पनप रही है? इस सवाल हल तलाश करने की कोशिश करें तो इसके दो सबसे बड़े कारण दिखाई देते है। एक तो आज के मोडर्न स्कूलों या संस्थानों में प्रबन्धन अपना मुनाफा ज्यादा देखता हैं। वह बच्चों के अन्दर प्रतिस्पर्धा तो पैदा करते है लेकिन इस प्रतिस्पर्धा में नैतिकता और सयम की शिक्षा नहीं दे पा रहे है।

        इस कारण आगे निकलने की दौड़ में अमूमन छात्रों के अन्दर ईर्ष्या के भाव पैदा होने लगते है, जो कई बार हिंसात्मक भी हो जाते हैं। दूसरा कारण ध्यान दीजिए कहीं हिंसा के पीछे स्मार्टफोन या टीवी तो नहीं! क्योंकि वीडियो गेम्स जिसमें खूब मार-धाड़ हो या मार पीट करने वाली फिल्में आदि भी बच्चों के दिमाग पर गहरा असर करती है और वे कई बार वो खुद को वीडियो गेम्स के हीरो समझने लगते हैं। एक कारण घर का माहौल भी बनता है। जिसमें पिता द्वारा माता को पीटना या पिता का बच्चों को मारना शामिल है। कई बार अभिभावक बात मनवाने के लिए हिंसा का इस्तेमाल करते हैं। जैसे थप्पड़ मारना। ऐसा होने पर बच्चों के मन में ये धारणा घर कर जाती है कि हिंसा का इस्तेमाल सही है और वह भी ऐसा करके अपनी बात को बड़ा रख सकते हैं। अब बच्चें तो जो देखेंगे वहीं सीखेंगे। आप उन्हें रचनात्मक गतिविधियों में लगाएं, तो उनका मन वहां लगेगा सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान न दें, सिर्फ पाठ्यक्रम पढ़ाने से बच्चों का भला नहीं होगा। उनका भला होगा संस्कारो से परिपूर्ण शिक्षा से। वरना सभ्य आचरण, उत्तम व्यवहार, नैतिकता और शिक्षा के मंदिरों में ऐसी हिंसात्मक आपदा क्यों आ रही है? इसके लिए स्कूल जिम्मेदार है या परिवार या फिर आधुनिक समाज का रहन सहन आदि यदि आज इन सवालों के जवाब नहीं तलाशे गये तो शायद कल पछतावे के अलावा हमारे पास कुछ नहीं बचेगा।

विष्णु गणेश पिंगले

विष्णु गणेश पिंगले

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       १८८८ में महाराष्ट्र के पुणे जनपद में जनपद में जन्मे अमर क्रांतिकारी विष्णु गणेश पिंगले ९ भाई बहनों में सबसे छोटे एवं सभी के दुलारे थे| विद्यालयी जीवन में ही वे राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रभाव में आ गए और स्वतंत्र्य वीर सावरकर के साथ बढ़ चढ़ कर इनमे भाग लिया| इस समय पर पढ़े प्रभाव ने पिंगले पर अमिट छाप छोड़ी और बाद में जब वे मुंबई गए तो अनेकों राष्ट्रवादियों से उनका परिचय हुआ और यहीं उन्होंने विस्फोटकों पर काम करना सीखा| चूँकि उनकी इच्छा इंजीनियर बनाने की थी अतः इस उद्देश्य से वे अमेरिका गए और १९१२ में वाशिंगटन यूनिवर्सटी में मेकैनिकल इंजीनियर की पढाई के लिए प्रवेश लिया| शीघ्र ही वे ग़दर पार्टी के संपर्क में आ गए और उसके सक्रिय सदस्यों में गिने जाने लगे| प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों को फँसा देख इस स्थिति का लाभ उठाने के लिए ग़दर पार्टी ने भारत के क्रांतिकारियों से संपर्क कर विदेश सत्ता को उखाड़ फेंकने हेतु योजना पर काम करना शुरू किया और इस हेतु ग़दर पार्टी के कई वरिष्ठ लोग जिनमें करतार सिंह सराबा, पिंगले, सत्येन सेन आदि शामिल हैं, १९१४ में कलकत्ता पहुंचे| पिंगले प्रमुख क्रांतिकारी रासबिहारी बोस से बनारस में मिले और उनके साथ आगे की योजना पर चर्चा की| इस दौरान पिंगले ने यू.पी. एवं पंजाब में घनघोर काम किया और और कई अन्य साथियों के साथ मिलकर सशस्त्र विद्रोह का पूरा खाका तैयार किया जिसमें भारतीय सैनिकों के भी शामिल होने की पूरी आशा एवं तैय्यारी थी| पर दुर्भाग्य, ब्रिटिश पुलिस का एक भारतीय सिपाही इस पूरे दौर में क्रांतिकारी के रूप में खुद को प्रदर्शित करता हुआ, सारे घटनाक्रम का गवाह रहा और जब ये योजना पूरे परवान पर थी, उसकी मदद से सरकार ने इस पूरे आन्दोलन का शुरू होने से पहले ही कुचल डाला| अधिकांश प्रमुख नेता पकड़े गए परन्तु सराबा और पिंगले जैसे रण बांकुरों ने अंतिम दम तक हार ना मानने की भारतीय परंपरा का निर्वाह करते हुए मेरठ छावनी में विद्रोह भड़काने का प्रयास किया| इस प्रयास में भी असफल पिंगले मेरठ में पुलिस के हाथ पड़ गए और सराबा लाहौर पुलिस के हाथ| अन्य कई साथियों के साथ पिंगले पर भी लाहौर षड़यंत्र केस के नाम से अप्रैल १९१५ में मुकदमा चलाया गया और जैसा कि सबको पता था कि क्या होना है, १६ नवम्बर १९१५ को उन्हें लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दे दी गयी और इस तरह माँ भारती की कोख से जन्मा उसका ये वीर पुत्र माँ की गोद में ही सो गया| महान हुतात्मा को कोटिशः नमन|

Why our children are more prone towards suicides

Why our children are more prone towards suicides

         In the meantime, on December 6, there was news of Babri structure, the AgustaWestland scandal to Mallya’s confession and CBI dispute in the newspaper to discuss or debate with anyone, but there was a small news in the meantime that the due to scared of scolding by his class teacher- A class VII student allegedly committed suicide in Indrapuri area of Delhi. For a moment, it has appeared just like a general news, but in the second moment suddenly a question arose that just because of the scolding of teacher the student has committed suicide. This news took me to an old and tragic memory when several years ago in my village, one boy of class X residing in my neighborhood had committed suicide because his father had scolded him on his failure in Metric.

          One more such incident happened last year in Anuppur district of Madhya Pradesh, where a 10th student hurled by the principal’s scolding- committed suicide. After this and I remember, a few years ago, a tenth student at the Army School in Delhi Cantt had taken poison after coming home after being scandalized by the computer teacher in the school. In fact, the news is so common now that on one or other occasions, Delhi and nearby Delhi, such news is printed on every corner of the newspaper, and people do not pay attention to this in their busy lives.

      Breaking the trap of this news, I remembered the days of my school, when the teacher not only beat up on the mistake but also many times he used to be scolded without any fault. Still, such a horrific thought had never come to our mind. But today, how easily the students they take such steps merely on a little scolding of them. Although, in the past few years, beating up of the children has been completely banned in the schools, yet these cases cannot be halted till now. It seems that rather than inculcating the desire to do something worthwhile in life, children of today are more fascinated with the way to erase themselves.

        The first thing to do is to find the problem so that the solution can be discussed. If you talk about the problem with respect to schools, then, of course, today, the schools have banned the corporal punishment altogether, but in return, the introduction of mental punishment is more dangerous. In this, the students are repeatedly threatened to be evicted from school, calling their parents or humiliating in front of all the students in the classroom. An emotionally strong student would tolerate this, but the students who are emotionally weak cannot take this up. However, the schools can play a key role in normalizing issues which have become taboo for new disciplines in the last few years.

      The second one, today the school has become the landlocked place, where the children receive only bookish education, secondly, the house has also been reduced to the periphery inside of the walls. Even if the colony is being equipped with modern amenities, even though they are being given modern facilities, remember that the children are alone, they do not have a joint family, so that if the mother rebuked, then grandmother, Tai or Bua could give affection. Hence, a sense of insecurity is inculcating inside them. People must play with their children, give them time, and make them emotionally strong, this will never let negativity to rise within them. The schools should also understand that they have not taken the contract of providing paper knowledge only but also have the responsibility to strengthen them on the social level and emotional level. The biggest thing in it is to think that apart from being to a student, these are also the children of gentle heart and mind. If they do not do mischief in this age, then when will they do it, the better solution is that children should have time-period to mischief in schools so that it does not keep hurting them in the future.

      Today even, after paying a heavy amount of money by parents, most of the cases of suicides in the students are coming from modern schools, and coaching institutes. When I saw data released by the National Crime Records Bureau in the past, 100 cases of suicides were registered in Kota alone in 2014, out of which 45 were coaching students, and in 2015 there were cases of suicides by 20 students.

     Actually, the nature of educational institutions is that they only take care of the students till the classroom and afterward the students themselves have to look after that how they will cope with the culture of the outside world. In such a situation, some find ease in having love relationships while some become victims of loneliness. The feelings of the mind and the bodily reactions are inter-connected to each other. Just like emotions will be the body’s reaction. So, If you constantly keep scolding your children for good numbers, careers, jobs, habits, etc., then they will narrow down to their own world and eventually when their mental pain becomes unbearable, then they will take this step.

      Thirdly, it is well known that up to a certain age, students need financial assistance, resources, and materialistic things to move forward. Many times, they get easily all these things but hardly get moral, mental support in the times of stress and pressure that was previously found in joint families. You do not consider the children to be mature even at the age of 20, because at this stage he cannot solve the problems of all his problems alone, so be their companion, their partner and give them the courage and inspiration to face the problems.

       Now what has happened is that in many cases, both the parents are working. By just admitting the children into expensive schools, parents understand that they have carried out their full responsibility. And, buying them expensive toys in the name of love, will make them happier for a moment but somewhere within him, the depression and loneliness starts budding in. Another biggest mistake is putting pressure by the parents every day is keep saying to their children that how much we are spending money on you, and if you do not score well in exams, our social respect will go done.

    Parents today will have to understand that the definition of loving your child, nurturing is not confined to their admissions to Big-schools, buying them expensive toys, and many more clothes to wear. If you are heavily investing in them, do not keep showing your pride to them all the times. These children are not your horses, that you are betting on them that if they lose it then your stakes will be worthless. Instead of showing the pride and arrogance, let them realize the importance of their life. Tell them that living life is the most beautiful thing and confront the challenges of life without fearing is the real bravery. Tell them that the failures are the obvious parts of life, no one takes birth as a winner, instead, all are born as players. And that, we become players only when we play well on every single field of life, this will possibly help them in solving their problems of life otherwise the feelings like- suffocation, loneliness, irritability, mental retardation, will make them more prone to miseries like suicide. Help nurture your children with positivity.

वीर सुरेन्द्र साईं

वीर सुरेन्द्र साईं

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       23 जनवरी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के जन्मदिवस के साथ साथ एक और क्रांतिवीर का जन्मदिवस भी है, वीर सुरेन्द्र साईं का जिनका जन्म 23 जनवरी 1809 में उडीसा के संबलपुर से 40 किलोमीटर उत्तर में खिंडा नामक गाँव में धर्मसिंह के यहाँ हुआ था। वो संबलपुर के चतुर्थ चौहान राजा मधुकर साईं के वंशज थे और इस कारण 1827 में वहां के राजा महाराजा साईं की निस्संतान मृत्यु के बाद सिंहासन के उत्तराधिकारी थे। परन्तु अंग्रेजों ने कुटिलता से सुरेन्द्र साईं के अधिकार को दरकिनार करते हुए पहले महाराज साईं की पत्नी और उसके असफल होने पर दासी से उत्पन्न नारायण सिंह को शासन का भार सौंपा जिसने सुरेन्द्र साईं और उनके समर्थकों के मन में विद्रोह का बीज अंकुरित कर दिया।

       विद्रोह का बिगुल बजते ही अंग्रेजों ने सुरेन्द्र साईं, उनके भाई उदयन्त साईं और चाचा बलराम सिंह को गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल में डाल दिया जहाँ कुछ समय बाद बलराम सिंह की मृत्य हो गयी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के शुरू होते ही सिपाहियों ने सुरेन्द्र साईं को उनके भाई सहित मुक्त कर दिया और वो संबलपुर पहुंचकर अपने समर्थकों के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति में शामिल हो गए। उन्होंने पददलित और आदिवासी लोगों को अंग्रेजों और अभिजात्य भारतीयों के विरुद्ध संगठित किया और 1827 में 18 वर्ष की आयु में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रारम्भ किये अपने अभियान को 1857 में पश्चिमी उडीसा के पहाड़ी इलाकों में पहुंचा दिया, जो 1862 में उनके आत्मसमर्पण तक अनवरत चला।

       हालांकि और स्थानों पर अंग्रेजों ने 1858 तक स्थिति पर नियंत्रण कर लिया था पर संबलपुर में वीर सुरेन्द्र साईं के सामने उन्हें नाकों चने चबाने पड़े और उनकी हर चाल नाकामयाब रही। बरसों का संघर्ष भी जब इस लड़ाई को कुचल नहीं पाया तो अंग्रेजी सेना के सेनापति मेजर इम्पी को समझ आया कि लड़ाई में यहाँ जीतना उसके लिए मुश्किल है, इसलिए उसने शांति और बातचीत का रास्ता अपनाया और उसकी बातों पर भरोसा कर उस सेनानी ने जिसे कोई ताकत कभी झुका नहीं पायी, आत्मसमर्पण कर दिया पर इम्पी के मृत्यु होते ही अंग्रेजी प्रशासन ने अपने सारे वादे भुला दिए और वीर सुरेन्द्र साईं के साथ दुश्मन वाला सलूक करना शुरू कर दिया।

       पहले ही 17 वर्ष जेलों में बिता चुका ये सेनानी इस समर्पण के बाद फिर से 20 वर्षों के लिए जेल भेज दिया गया। अपनी मातृभूमि से बहुत दूर असीरगढ़ किले की जेल में वीर सुरेन्द्र साईं की 23 मई 1884 को मृत्यु हो गयी। पश्चिमी उडीसा में वीर सुरेन्द्र साईं को भगवान का सा दर्जा दिया जाता है और लोग उन्हें और उनके उन तमाम साथियों को जो या तो फांसी के फंदे पर झूल गए और या अंडमान की सेल्युलर जेल में जीवन होम कर गए, लोकगीतों में याद करते हैं। पर दुर्भाग्यवश सरकारों ने उनके बारे में कोई सुध नहीं ली और अन्य अनेकों क्रांतिकारियों की भांति वीर सुरेन्द्र साईं का बलिदान भी बिसरा दिया गया। शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

Listen to the call of Mother Earth

Listen to the call of Mother Earth

          One mother is that who gives birth to us, up bring us. Another ‘mother’ is the one who is known to the world as Mother Earth. It gives us breath, food, and drink, gives space to live. Let it be said that after the birth, the things seen in the world, everything is the same as the Mother Earth Mother. When our biological mother fell ill then we get upset, we take care of her each day and night in her treatment but when the Mother Earth which has millions of ‘sons and daughters’, fell sick and is calling today but no one has the time to take care of her.

         After all, why have we become the ignorant of this ‘mother’ today? The green trees are  being cut down, its inner side has been spoiled and filled with chemicals and waste materials and thus made poisonous. We have tapped so much water that many parts of the world have become waterless. Out of the total water left in the world at present, 97.5 percent of the water is oceanic, which is saline. The remaining 1.5 percent is in the form of ice. Only 1 percent of the water is left with us which is potable. By 2025, half the population of India and 1.8 percent of the world population will not have drinking water and by 2030 global demand will increase by 40 percent more than supply.

           After this, due to a further increase in the use of natural resources like mineral substances such as coal, asbestos etc, we are continuously exploiting this mother earth.  Moreover, if the rate of consumption of developed countries is considered, then by 2050, the exploitation will reach by 140 billion tonnes per year. That is, it will make the earth be completely hollow. Just think about what will happen when the earth will not have water inside it and trees outside it. The same thing will happen which we have always heard, then there will be a huge upheaval in nature. Due to the earthquake, the entire country and civilizations will fall into the womb of the earth. Wherever the civilizations have created, will transform into the ocean.

         Everyone knows that in the form of nature, God has given humans a very beautiful gift. But we are proved to be failing to keep this gift alive, and later we will have to bear the brunt of this nature. Apart from the beautiful nature, we have many other things such as food, water, trees, energy, minerals etc. etc. But if we do not wake up in time, we will lose these substances and then finally how will we survive?

         We know that the necessity is the mother of invention. But if we adopt inventions with respect to our requirements, then we can save a lot to the earth or to our next generation. Today, the biggest fuel used in the production of power is coal which is being exploited regularly from the earth’s inner self. But for how long? In the next few years, coal resources will be completely exhausted. We can not deny the fact that the population of the country is increasing rapidly. Most of the electricity (about 53 percent) in the country is produced from coal and it has been predicted that after 2040-50, the stocks of coal in the country will end. What will the world do then for the electricity?

         Most will answer- water! But when looking at global warming, climate change etc it does not seem to be the right answer! You yourself look around you, see how many small rivers and rivulets have been transformed today. They have either dried up or become dirty nallahs. Seeing this, it can be easily estimated that the life of our rivers is no longer prolonged. Now, in the end, the next answer can be the solar energy which is probably the most appropriate option in our hands in the future.

         Apart from being an incomparable source of solar energy, one of the best options in India’s other non-conventional energies is Solar Energy. It causes no harm to nature, and today solar energy is the best and cleanest way to meet our growing demand for energy requirements in India. In this direction, the country’s oldest social organization, Arya Samaj, is also going to launch a good initiative in which each Arya Samaj temple and Arya Institute will support the cause of nature by using solar energy in the near future or we can say that it will act as a son to save its mother earth.

        Figures show that in almost all the square meters of India, sunlight is obtained by an average of 4 to 7-kilowatt hours per hour. In India, the sun rises around 2,300 to 3,200 hours per year. Due to this a large amount of electricity can be produced using solar energy.

        At the same time, we will also work to generate the awareness of rainwater harvesting in houses or buildings to increase the level of geological water and through working in the direction of elimination of the use of polyethylene, we will the work to save our environment. We will urge People to take care of trees in their surroundings and make the careful use of water. We all know that even after years of efforts, scientists around the world cannot find the ‘Second Earth’. Therefore, it becomes the duty of each of us to come forward to protect the Mother Earth. Otherwise, we will be left with no  thing except repenting.

विनायक दामोदर सावरकर

विनायक दामोदर सावरकर

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   विनायक दामोदर सावरकर उपाख्य वीर सावरकर भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के अग्रिम पंक्ति के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा (हिन्दुत्व) को विकसित करने का बहुत बडा श्रेय सावरकर को ही जाता है। वे न केवल स्वाधीनता संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे, अपितु महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे। वे एक ऐसे इतिहासकार भी थे जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र की विजय के इतिहास को प्रामाणिक ढँग से लिपिबद्ध किया। उन्होंने 1857 के प्रथम स्वातंत्र्य समर का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिला कर रख दिया था।

       8 जुलाई विश्व में तहलका मचानेवाली छलांग, इन्हीं वीर सावरकर की समुद्र में छलांग को स्मरण करने का दिन है| अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े गये भारत के स्वाधीनता संग्राम में वीर विनायक दामोदर सावरकर का अद्वितीय योगदान है। उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर देश ही नहीं, विदेशों में भी क्रांतिकारियों को तैयार किया। इससे अंग्रेजों की नाक में दम हो गया। अतः ब्रिटिश शासन ने उन्हें लंदन में गिरफ्तार कर मोरिया नामक पानी के जहाज से मुंबई भेजा, जिससे उन पर भारत में मुकदमा चलाकर दंड दिया जा सके। पर सावरकर बहुत जीवट के व्यक्ति थे। उन्होंने ब्रिटेन में ही अंतरराष्ट्रीय कानूनों का अध्ययन किया था। 8 जुलाई, 1910 को जब वह जहाज फ्रांस के मार्सेलिस बंदरगाह के पास लंगर डाले खड़ा था, तो उन्होंने एक साहसिक निर्णय लेकर जहाज के सुरक्षाकर्मी से शौच जाने की अनुमति मांगी।

       अनुमति पाकर वे शौचालय में घुस गये तथा अपने कपड़ों से दरवाजे के शीशे को ढककर दरवाजा अंदर से अच्छी तरह बंद कर लिया। शौचालय से एक रोशनदान खुले समुद्र की ओर खुलता था। सावरकर ने रोशनदान और अपने शरीर के आकार का सटीक अनुमान किया और समुद्र में छलांग लगा दी। बहुत देर होने पर सुरक्षाकर्मी ने दरवाजा पीटा और कुछ उत्तर न आने पर दरवाजा तोड़ दिया; पर तब तक तो पंछी उड़ चुका था। सुरक्षाकर्मी ने समुद्र की ओर देखा, तो पाया कि सावरकर तैरते हुए फ्रांस के तट की ओर बढ़ रहे हैं। उसने शोर मचाकर अपने साथियों को बुलाया और गोलियां चलानी शुरू कर दीं।

       कुछ सैनिक एक छोटी नौका लेकर उनका पीछा करने लगे; पर सावरकर उनकी चिन्ता न करते हुए तेजी से तैरते हुए मार्सेलिस के सागर तट की दीवार पर चढ़कर मार्सेलिस बंदरगाह पर पहुंच गये। उन्होंने स्वयं को फ्रांसीसी पुलिस के हवाले कर वहां राजनीतिक शरण मांगी। अंतरराष्ट्रीय कानून का जानकार होने के कारण उन्हें मालूम था कि उन्होंने फ्रांस में कोई अपराध नहीं किया है, इसलिए फ्रांस की पुलिस उन्हें गिरफ्तार तो कर सकती है; पर किसी अन्य देश की पुलिस को नहीं सौंप सकती। इसलिए उन्होंने यह साहसी पग उठाया था। उन्होंने फ्रांस के तट पर पहुंच कर स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। तब तक ब्रिटिश पुलिसकर्मी भी वहां पहुंच गये और उन्होंने अपना बंदी वापस मांगा।

       सावरकर ने अंतरराष्ट्रीय कानून की जानकारी फ्रांसीसी पुलिस को दी, पर दुर्भाग्य से फ्रांस की पुलिस दबाव में आ गयी। ब्रिटिश पुलिस वालों ने सम्भवतः उन्हें कुछ घूस भी खिला दी। अतः उन्होंने सावरकर को ब्रिटिश पुलिस को सौंप दिया। उन्हें कठोर पहरे में वापस जहाज पर ले जाकर हथकड़ी और बेड़ियों में कस दिया गया। मुंबई पहुंचकर उन पर मुकदमा चलाया गया, जिसमें उन्हें 50 वर्ष कालेपानी की सजा दी गयी।

       सावरकर का समुद्र में छलांग लगाकर मार्सेलिस पहुँचने का उपक्रम ब्रिटिशों द्वारा उन्हें अवैध तरीके से पुनः हिरासत में लेने के कारण विफल भले ही रहा हो, फिर भी उनकी इस छलांग का ऐतिहासिक महत्व है और इसके कारण पूरे विश्व में तहलका मच गया। इसके फलस्वरूप जो तीव्र वैश्विक प्रतिक्रिया हुई, उसके चलते पूरे विश्व का ध्यान भारत में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम की ओर आकर्षित हुआ। इसका फ्रांस की आंतरिक राजनीति पर दूरगामी परिणाम हुआ। फ्रांस की इस कार्यवाही की उनकी संसद के साथ ही विश्व भर में निंदा हुई और फ्रांस के राष्ट्रपति को त्यागपत्र देना पड़ा।

       सावरकर को फिर से फ्रांस सरकार को सौंपा जाए, यह मांग पूरे फ्रांस ही नहीं अपितु पूरे विश्व में हुई। इस तीव्र प्रतिक्रिया से फ्रांस के सार्वभौमत्व को आंच पहुंची और और फ़्रांस में ब्रिटिश सरकार की कार्यवाही के विरोध में आन्दोलन शुरू हो गया जिसका समर्थन विश्व भर के जाने माने लोगों ने किया, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं–
1. कार्ल मार्क्स के पौत्र जीन लांग्वे और उनका प्रचंड पाठक वर्ग वाले समाचार पत्र ‘एल ह्यूमिनिटी’।
2. मार्सेलिस का महापौर और फ्रांस का महान समाजवादी नेता ज्वारे।
3. मानव अधिकार संघ के अध्यक्ष फ्रांसिस इ प्रेसेन्से।
4. फ्रांस के सभी छोटे-बडे समाचार पत्र।
5. इंग्लैंड के समाचार पत्र ‘हेरल्ड ऑफ रिवोल्ट’ और उसके युवा संपादक गाय-ए-अल्ड्रेड (इस संपादक को सावरकर की मुक्ति के लिए प्रचार और प्रयत्न करने के कारण डेढ़ वर्ष का कारावास भी भुगतना पडा)
6. सोशल डेमोक्रेटिक दल के प्रमुख हिंडमन और मुखपत्र ‘जस्टिस’ जिन्होंने ब्रिटिश सरकार की कठोर आलोचना शुरु कर दी। सावरकर को स्वतंत्र करने की मांग इंग्लैंड के ‘द मार्निंग पोस्ट’ और ‘दे डेली न्यूज’ ने भी की।
7. सावरकर मुक्तता समिति, लंदन।
8. स्पेन के ब्रिटेन स्थित उप राजदूत मॉनशूर पीएरॉ, लेटिन अमेरिका पेराग्वे देश के राजदूत मॉन्सूर जॉमबा और पुर्तगाल देश के राजदूत।
9. यूरोप के सभी बडे समाचार पत्र, जिनमें स्विट्ज़रलैंड से जर्मन भाषा में प्रकाशित ‘डेर वाण्डरर’ भी शामिल हैं।
10. यूरोप की सोशलिस्ट कांफ्रेन्स के सितंबर 1910 में कोपनहेगन में आयोजित अधिवेशन में सावरकर को स्वतंत्र कर फ्रांस भेजने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया। इसके प्रस्तावक थे विश्वविख्यात कम्यूनिस्ट क्रांति के महानायक ब्लादिमिर लेनिन। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि ”हम मानव मात्र की स्वतंत्रता की मांग करते हैं; इस कारण भारत की स्वतंत्रता के लिए लडने के सावरकर के अधिकार को हमारा पूर्ण समर्थन है। फ्रेंच गणतंत्र को अपनी सार्वभौमिकता की रक्षा के लिए तो सावरकर की स्वतंत्रता का आग्रह करना चाहिए।”
10. जापान के संसद डाएट के सदस्य मोयो।
11. ब्रिटिश राजनेता सर हेनरी कॉटन। सर विपिनचंद्र पाल के घर में 1911 के नववर्ष समारोह में उन्होंने कहा कि ‘सामने की दीवार पर सावरकर का चित्र है, सावरकरजी के बौद्धिक धैर्य और स्वदेश भक्ति की मैं प्रशंसा करता हूं। सावरकरजी को विदेश में आश्रय लेने का अधिकार है। मुझे आशा है कि ब्रिटिश सरकार सावरकर को फ्रेंच सरकार को सौंपेगी।” हेनरी कॉटन का यह भाषण जब ब्रिटेन के समाचार पत्रों में छपा तब ‘लंदन टाईम्स’ ने लिखा कि ‘कॉटन की सर पदवी छिन ली जाना चाहिए और उनका निवृति वेतन भी बंद कर दिया जाना चाहिए।”
12. मॅडम कामा, पंडित श्यामजी कृष्ण वर्मा।
13. जर्मनी के सभी समाचार पत्रों ने भी सावरकरजी की अवैध हिरासत की तीव्र आलोचना की। ‘बर्लिन पोस्ट’ ने इसे अंतर्राष्ट्रीय कानून की बलि निरुपित किया।
14. बेल्जियम और अन्य राष्ट्र।

       प्रख्यात व्यक्तियों और समाचार पत्रों द्वारा अनवरत तीव्र आलोचना के कारण ब्रिटेन को झुकना पडा और सावरकर की फ्रांस की भूमि पर किए गए अवैध हिरासत के मामले को अंतर्राष्ट्रीय हेग न्यायलय को सौंपने का करार करना पडा। वहां इसकी विस्तृत चर्चा हुई और ब्रिटिश कार्यवाही की निंदा की गयी; पर सावरकर तो तब तक मुंबई ले जाये जा चुके थे, इसलिए अब कुछ नहीं हो सकता था।

       सावरकरजी के इस महान पराक्रम से पूरी दुनिया हिल उठी और भारत को भी विश्व प्रसिद्धि मिली। ऐसे महान पराक्रमी वीर सावरकर के 26 फरवरी 2003 के पुण्य स्मरण दिवस पर भारत की संसद में तैलचित्र को प्रतिष्ठित कर उनके प्रति समग्र राष्ट्र की श्रद्धा अर्पण करने के अवसर पर अत्यंत श्रद्धा एवं प्रसन्नता से तत्कालीन राष्ट्रपति श्री एपीजे कलाम जी ने वीर सावरकर की ऐतिहासिक समुद्र छलांग का उल्लेख कर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विचार प्रकट करते हुए कहा था कि ”किसी व्यक्ति के द्वारा राष्ट्रहित महान कार्य किए जाने पर, राष्ट्र को चाहिए कि उस व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य को देखें, उसके द्वारा किया गया छोटा काम भी यदि राष्ट्र की दृष्टि से बडा हो तो उस काम का सम्मान करना मेरा कर्तव्य है। अतः आज की मेरी उपस्थिति कर्तव्य के रुप में है।”

       स्वाधीन भारत में सावरकर के प्रेमियों ने फ्रांस शासन से इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में बंदरगाह के पास एक स्मारक बनाने का आग्रह किया। सावरकर की इस अदभुत पराक्रमी और विश्व को चमत्कृत कर देनेवाली विश्व प्रसिद्ध छलांग की स्मृति चिरंतन रहे इसके लिए फ्रांस सरकार ने मार्सेलिस में स्मारक निर्माण के लिए स्थान भी 1998 में ही उपलब्ध करा दिया। सर्वप्रथम स्मारक निर्माण के मुद्दे को उठाने वाले थे मुंबई के महापौर रहे रमेश प्रभु और संघ के वयोवृद्ध कार्यकर्ता श्री रामभाऊ बर्वे, जिन्होनें इस संबंध में सावरकर सेवा केंद्र विलेपार्ले (मुंबई) के माध्यम से मार्सेलिस नगर के महापौर के साथ पत्राचार किया और सफलता पाई। मार्सेलिस नगर के महापौर श्री जीन क्लाऊडे ने उनका प्रस्ताव स्वीकारते हुए उन्हें उचित माध्यम यानी भारत सरकार के माध्यम से प्रस्ताव भेजने को कहा।

       सावरकर सेवा केंद्र के श्री बर्वे और श्री प्रभु ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल जी से इस संबंध में अनुरोध किया, जिन्होेंने यह मामला विदेश विभाग को सौंप दिया। परंतु, दुर्भाग्य कि भाजपानीत एनडीए ने एक पत्र भी इस सम्बन्ध में नहीं भेजा और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। परंतु, विश्व में तहलका मचा देनेवाली इस छलांग के शताब्दी वर्ष 2010 में यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया और लोकसभा में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई।

       भाजपा ने सरकार से पूछा कि आखिर वह फ्रांस के मारसेल्स शहर में स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर की प्रतिमा लगाने के लिए फ्रांस सरकार को इजाजत देनें में क्यों टालमटोल क्यों कर रही है। विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने लोकसभा में सरकार से जानना चाहा कि फ्रांस के मारसेल्स शहर के मेयर ने अपने यहां वीर सावरकर की प्रतिमा लगाने के बारे में भारत सरकार को जो पत्र लिखा है उस बारे में वस्तु स्थिति क्या है और इसपर सरकार का क्या रवैया है। यह बात अलग है कि अय्यर जैसे विघ्न संतोषी कुछ लोगों ने इस चर्चा तक का विरोध किया।

       सावरकर स्मारक समिति भगूर, जिला नासिक (महाराष्ट्र) के पदाधिकारियों की विदेश मंत्री श्री एस.एम. कृष्णा के साथ इस संबंध में बैठकें भी हुईं पर धरातल पर कुछ हो नहीं पाया। जगह जगह गांधी जी की मूर्तियों का विमोचन कर रहे और गांधी को ही प्रेरणा पुरुष बना बैठे वर्तमान प्रधानमंत्री से भी इस सम्बन्ध में कोई आशा करना व्यर्थ ही दिखता है, क्योंकि गांधी वैश्विक ब्रांड हैं, सावरकर नहीं और वर्तमान प्रधानमंत्री मार्केटिंग के फंडों को बखूबी समझते हैं।

       अफ़सोस, आज हम उस मुकाम पर खड़े हैं, जहाँ से इतिहास हमें चुनौती दे रहा है| आज की पीढ़ी सावरकर को लगभग बिसरा चुकी है। धर्मनिरपेक्षता का रोना रोने वालों ने देश में क्रांति का उदघोष करने वालों से अन्याय किया और उनका पूरा इतिहास सामने ही नहीं आने दिया| लाल रंग में रंगे, बिके हुए इतिहासकारों ने क्रांतिकारियों के इतिहास को पूरी तरह विकृत कर दिया | पाठ्य पुस्तकों से उनके जीवन सम्बन्धी लेख हटा दिए गए और हर वो प्रयास किया गया कि इन हुतात्माओं का नाम तक मिटाया जा सके। हमारा सत्ता तंत्र इस महान सेनानी को लोगों की स्मृति से दूर करने के अपने उद्देश्य में लगभग सफल हो गया है| हमारा कर्तव्य है कि हम स्वतंत्रता संग्राम के इस महान योद्धा की स्मृति को अक्षुण रखें| इस महान सेनानी को कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

वीर कुँवर सिंह

वीर कुँवर सिंह

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     23 अप्रैल का दिन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महान सिपाहियों में से एक बाबू वीर कुँवर सिंह का जन्मदिवस है जिन्होंने 80 वर्ष की आयु में भी ईस्ट इंडिया कंपनी से जबरदस्त लोहा लिया और बहुत से युद्धों में विजय हासिल कर अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिये| वीर कुंवर सिंह का जन्म 23 अप्रैल 1777 को बिहार के शाहाबाद (अब भोजपुर) जिले के जगदीशपुर में महाराज विक्रमादित्य और राजा भोज के वंशज माने जाने वाले उज्जैनी क्षत्रिय (परमार) परिवार में पिता राजा साहबजादा सिंह और माँ पंचरत्न देवी के पुत्र के रूप में हुआ था| साहबजादा सिंह को चार पुत्र थे- कुँवर सिंह, दयाल सिंह, राजपति सिंह और अमर सिंह जिनमें कुँवर सिंह सबसे बडे थे। बचपन और युवावस्था घोड़े की सवारी, निशानेबाजी और शिकारी जीवन में बीतने के कारण किसी प्रकार फारसी में गुलिस्ताँ तक की ही शिक्षा प्राप्त कर सके। जैसे-जैसे वे बडे होते गये, बेहतर योद्धा के रूप में चर्चित होने लगे। इस बीच उनके पिता मुकदमे में फँसे और उनकी आर्थिक स्थिति जर्जर हो गयी। 1804 में बाबू साहबजादा सिंह मुकदमा जीतकर जगदीशपुर के स्वामी बने।

       कहा जाता है कि बाबू कुँवर सिंह चापलूसों से दूर रहते थे, इसीलिए उनकी पिता से नहीं पटती थी। उनके पिता के दरबार में कई चापलूस थे, जिन्हें हटाने के लिए कुँवर सिंह ने पिता को सलाह दी थी पर जब चापलूसों को नहीं हटाया गया, तो वे अलग रहने लगे और जितौरा में अपना आवास बनाया। अपने पिता बाबू साहबजादा सिंह की मृत्यु के बाद वे 1237 फसली (1830 ईसवी) में जगदीशपुर की गद्दी पर बैठे। उनकी जमींदारी का विस्तार बिहार प्रदेश के आरा जिले के जगदीशपुर, पीरो परगना, नोनार, आरा, बारहगाँवा आदि अनेक मौजों और परगनों तक था, जिसकी वार्षिक आय लगभग साढ़े 9 लाख रुपए थी। बाबू कुँवर सिंह गद्दी पर बैठते ही जगदीशपुर के विकास में लग गये। उन्होंने अपने जमींदारी काल में काफी जनसेवा की। जितौरा में शिकारगाह, जगदीशपुर में शिवमंदिर और तालाब, आरा में धर्मन बीबी की मसजिद, अनेक महल, धर्मशालाएँ, बाग बगीचे तथा जंगलों को कटवाकर गरीबों के लिए बस्तियों का निर्माण आदि अनेक कीर्तिकार्य किए।

       इसी बीच अँगरेज शासकों द्वारा कतिपय युद्धों में लड़ने के लिए देशी सिपाहियों को धर्मविरुद्ध समुद्रमार्ग होकर बाहर जाने की आज्ञा, नई बंदूकों के टोटे पर गौ और सूअर की चर्बी चढ़ाए जाने की अफवाह तथा देशी रियासतों, राजे रजवाड़ों एवं देश की तत्कालीन विक्षोभजनक परिस्थिति के कारण बंगाल के देशी सिपाहियों के दल से 1857 ई. में जो विप्लव शुरू हुआ, वह कुछ ही महीनों के भीतर दिल्ली, लखनऊ , कानपुर, झाँसी, ग्वालियर, प्रयाग, पटना आदि स्थानों में फैल गया। बिहार में तो स्वतंत्रता संग्राम की तैयारियाँ वर्ष 1855 से ही प्रारम्भ हो गई थी। उस समय वहाबी मुसलमानों की गतिविधियों का केन्द्र बिहार ही था। नाना साहब पेशवा का संदेश मिलते ही पूरे बिहार में गुप्त बैठकों का दौर शुरू हो गया। पटना में किताबें बेचने वाले पीर अली क्रांतिकारी संगठन के मुखिया थे। सन् 57 की 10 मई को मेरठ के भारतीय सैनिकों की स्वतंत्रता का उद्घोष बिहार में भी सुनाई दिया। पटना का कमिश्नर टेलर बड़ा धूर्त था। मेरठ की क्रांति का समाचार मिलते ही उसने पटना में जासूसों का जाल बिछा दिया। दैवयोग से एक क्रांतिकारी वारिस अली अंग्रेजों की गिरफ्त मे आ गये। उनके घर से कुछ और लोगों के नाम-पते मिल गये। परिणाम स्वरूप अधिकांश स्वतंत्रता सैनानी पकड़ लिये गये और संगठन कमजोर पड़ गया।

       फिर भी पीर अली ने सबकी सलाह से 3 जुलाई को क्रांति का बिगुल बजाने का निर्णय ले लिया। 3 जुलाई को दो सौ क्रान्तिकारी शस्त्र सज्जित हो गुलामी का जुआ उतारने के लिये पटना में निकल पड़े, लेकिन अंग्रेजों ने सिख सैनिको की सहायता से उन्हें परास्त कर दिया। पीर अली सहित कई क्रांतिकारी पकड़ गये, और तुरत-फुरत सभी को फाँसी पर लटका दिया गया। पीर अली को मृत्यदण्ड दिए जाने का समाचार दानापुर की सैनिक छावनी में पहुँचा। छावनी के भारतीय सैनिक तो तैयार ही बैठे थे। 25 जुलाई को तीन पलटनों ने स्वराज्य की घोषणा करते हुए अंग्रेजों के खिलाफ शस्त्र उठा लिये। छावनी के अंग्रेजों को यमलोक पहुँचा कर क्रातिकारी भारतीय सैनिक जगदीशपुर की ओर चल पड़े। सैनिक जानते थे कि अंग्रेजों से लड़ने के लिये कोई योग्य नेता होना जरूरी है और जगदीशपुर के 80 साल के नवयुवक यौद्धा कुँवर सिंह ही सक्षम नेतृत्व दे सकते हैं। दानापुर के सैनिकों के पहुँचते ही वीर कुँवर सिंह ने 25 जुलाई को उनकी कमान सम्हाल ली|

      इसके 2 दिनों के बाद 27 जुलाई 1857 को कुँवरसिंह की सेना ने आरा शहर पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की और वहां के खजाने पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजों ने पीठ दिखाने में ही अपनी कुशल समझी। अब स्वातंत्र्य सैनिक पास की गढ़ी की ओर बढ़े तथा उसको घेर लिया। अंग्रेजों ने कप्तान डनबार की अगुवाई में एक सेना गढ़ी की घेराबन्दी तोड़ने को भेजी। यह सेना सोन नदी पार कर आरा के नजदीक आ गई। रात्रि का समय था किन्तु चाँद की रोशनी हो रही थी। डनबार अपने जवानों के साथ आरा के वन-प्रदेश में घुस गया। वीर कुँवर सिंह ने अब अपनी वृक-युद्ध कला का परिचय दिया। वृक-युद्ध कला छापामार युद्ध का ही दूसरा नाम है। इसका अर्थ है- शत्रु को देखते ही पीछे हट कर लुप्त हो जाओ और अवसर मिलते ही असावधान शत्रु पर हमला कर दो। कुँवर सिंह और तात्या टोपे दोनों ही इस रणनीति के निष्णात थे। आरा पर कब्जे के बाद बाबू कुँवर सिंह स्वतंत्रता-संग्राम के करीब पाँच हजार क्रांतिकारी सिपाहियों के शौर्यमान नेता और भोजपुरी-भाषी जनता के चहेते बन गये। जनता ने उन्हें ‘तेगवां बहादुर’ कहकर बुलाना षुरू कर दिया। कुँवर सिंह का प्रभाव इतना बढ गया कि खेत-खलिहानों में कुँवर सिंह पर गाने गाये जाने लगे। बिहार में जो विद्रोह हुआ, उसका व्यापक प्रभाव पडा इसमें जनता ने खुलकर भाग लिया। पूरे शाहाबाद में विद्रोह का क्रांतिकारी तेवर अपना रूप ले चुका था। छोटे-मोटे जमींदार और सभी राजपूत कुँवर सिंह के विद्रोह के साथ थे।

       2 अगस्त को बीबीगंज और 12 अगस्त को दिलावर ग्राम में अंग्रेजों की बड़ी सेना से क्रांतिकारी पराजित हुए। 3 अगस्त को मेजर विंसेंट आयर के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने कुँवर सिंह को पराजित कर दिया और जगदीशपुर को तहस नहस कर दिया| आरा और जगदीशपुर पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया। परंतु कुँवरसिंह ने हार न मानी, वे सहसराम और रोहतासदुर्ग की ओर बढ़े। सरकारी सैन्य की 40 वीं पल्टन उनकी सेना से आ मिली। रींवा पर आक्रमण करने के बाद कुँवरसिंह ने कानपुर में तात्या टोपे, नाना साहब और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई से मिलकर क्रांति की योजनाएँ बनाई। कालपी की लड़ाई में उनके पौत्र बीरभंजनसिंह खेत रहे। कुँवरसिंह छह महीने तक बाँदा, सुल्तानपुर, गोंडा, लखनऊ, प्रयाग, मिरजापुर, बनारस (वाराणसी) और गाजीपुर आदि जिलों में क्रांति की लहर दौड़ाते आजमगढ़ पहुँचे और अतरौलिया नामक ग्राम पर 17 मार्च 1858 को आक्रमण पर उसे अपने अधिकार में कर लिया।

       80 वर्ष के यौद्धा कुँवर सिंह लगातार नौ महीनों से युद्ध के मैदान में थे। अब वे गंगा पार कर अपनी जन्म-भूमि जगदीशपुर जाने की तैयारी कर रहे थे। अंग्रेज जनरल डगलस भी घोड़े दौड़ाता हुआ उनका पीछा कर रहा था। यहाँ कुँवर सिंह ने युक्ति से काम लिया। उन्होंने अफ़वाह फैला दी कि वे बलिया के निकट हाथियों से अपनी सेना को गंगा पार करायेंगे। कुँवर सिंह की पैतरे-बाज़ियों से परेशान हो चुके अँग्रेज़ों ने फिर करारा धोखा खाया। अँग्रेज़ सेनापति डगलस वहाँ पहुँच कर प्रतीक्षा करने लगा और इधर बलिया से सात मील दूर शिवराजपूर में नावों पर चढ़कर कुँवर सिंह की सेना पार हो रही थी। डगलस हैरान था कि आख़िर कुँवर सिंह गंगा पार करने आ क्यों नहीं रहे। तभी उसे समाचार मिला कि कुँवर सिंह तो सात मील आगे नावों से पुण्य-सलिला गंगा को पार कर रहे हैं। वह तुरंत उधर ही दौड़ा पर जब तक डगलस शिवराजपुर पहुँचता पूरी सेना पार हो चूकी थी। अंतिम नौका पार हो रही थी जिसमें स्वयं कुँवर सिंह सवार थे। अँग्रेज़ी सेना ने उन पर गोली बरसाना प्रारंभ कर दिया। एक गोली कुँवर सिंह के बाएँ हाथ में लगी। ज़हर फैलने की आशंका को देख कुँवर सिंह ने स्वयं अपनी तलवार से कोहनी के पास से हाथ काटकर गंगा को अर्पित कर दिया।

       23 अप्रैल 1858 को कुँवरसिंह ने जनरल ली ग्रांड की सेना को पराजित कर अपनी राजधानी जगदीशपुर पर पुन: अधिकार कर लिया। लेकिन गोली का विष पूरे शरीर में फैल ही गया और 3 दिन बाद ही 26 अप्रैल को उन्होंने प्राणोत्सर्ग कर दिया। गौरवशाली मृत्यु का वरण कर स्वतंत्रता संघर्ष में कुँवर सिंह अजर-अमर हो गए। जब तक जीवित रहे इस वीर बांकुड़ा ने अंग्रेजों के छक्के छुडा दिए और मरते समय तक उन्होंने जगदीशपुर को आजाद रखा| बाबु वीर कुँवर सिंह की याद और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनकी अमूल्य भूमिका के लिए 23 अप्रैल 1966 में भारत सरकार ने 1 रुपये के डाक टिकट जारी किये| इस महान योद्धा को कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

मनुष्य का आहार क्या है

मनुष्य का आहार क्या है

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सत्त्व, रज और तम की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है । भोजन की भी तीन श्रेणियां हैं । प्रत्येक व्यक्ति अपने रुचि वा प्रवृत्ति के अनुसार भोजन करता है । श्रीकृष्ण जी महाराज ने गीता में कहा है –

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः

          सभी मनुष्य अपनी प्रवृत्ति के अनुसार तीन प्रकार के भोजन को प्रिय मानकर भक्षण करते हैं । अर्थात् सात्त्विक वृत्ति के लोग सात्त्विक भोजन को श्रेष्ठ समझते हैं । राजसिक वृत्ति वालों को रजोगुणी भोजन रुचिकर होता है । और तमोगुणी व्यक्ति तामस भोजन की ओर भागते हैं । किन्तु सर्वश्रेष्ठ भोजन सात्त्विक भोजन होता है ।

सात्त्विक भोजन

आयुः – सत्त्व – बलारोग्य – सुख – प्रीति – विवर्धनाः ।

रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥

         आयु, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले रसीले, चिकने स्थिर, देर तक ठीक रहने वाले एवं हृदय के लिये हितकारी – ऐसा भोजन सात्त्विक जनों को प्रिय होता है । अर्थात् जिस भोजन के सेवन से आयु, बल, वीर्य, आरोग्य आदि की वृद्धि हो, जो सरस, चिकना, घृतादि से युक्त, चिरस्थायी और हृदय के लिये बल शक्ति देने वाला है, वह भोजन सात्त्विक है ।

         सात्त्विक पदार्थ – गाय का दूध, घी, गेहूं, जौ, चावल, मूंग, मोठ, उत्तम फल, पत्तों के शाक, बथुवा आदि, काली तोरई, घीया (लौकी) आदि मधुर, शीतल, स्निग्ध सरस, शुद्ध पवित्र, शीघ्र पचने वाले तथा बल, ओज अवं कान्तिप्रद पदार्थ हैं वे सात्त्विक हैं । बुद्धिमान् व्यक्तियों का यही भोजन है ।

गोदुग्ध सर्वोत्तम भोजन है । वह बलदायक, आयुवर्द्धक, शीतल, कफ पित्त के विकारों को शान्त करता है । हृदय के लिये हितकारी है तथा रस और पाक में मधुर है । गोदुग्ध सात्त्विक भोजन के सभी गुणों से ओतप्रोत है ।

        प्राकृतिक आहार दूध ही है । मनुष्य-जन्म के समय भगवान् ने मनुष्य के लिये माता के स्तनों में दूध का सुप्रबन्ध किया है । मनुष्य के शरीर और मस्तिष्क का यथोचित पालन पोषण करने के लिये पोषक तत्त्व जिन्हें आज का डाक्टर विटेमिन्स (vitamins) नाम देता है, सबसे अधिक और सर्वोत्कृष्ट रूप में दूध में ही पाये जाते हैं जो शरीर के प्रत्येक भाग अर्थात् रक्त, मांस और हड्डी को पृथक्-पृथक् शक्ति पहुंचाते हैं । मस्तिष्क अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इस अन्तःकरण चतुष्टय को शुद्ध करके गोदुग्ध सब प्रकार का बल प्रदान करता है । इसमें ऐतिहासिक प्रमाण है –

महात्मा बुद्ध तप करते-करते सर्वथा कृशकाय हो गये थे । वे चलने फिरने में भी सर्वथा असमर्थ हो गये थे । उस समय अपने वन के इष्ट देवता की पूजार्थ गोदुग्ध से बनी खीर लेकर एक वैश्य देवी सुजाता नाम की वहां पहुंची जहां वट-वृक्ष के नीचे महात्मा बुद्ध निराश अवस्था में (मरणासन्न) बैठे थे । उस देवी ने उन्हें ही अपना देवता समझा और उसी की पूजार्थ वह खीर उसके चरणों में श्रृद्धापूर्वक उपस्थित कर दी । महात्मा बुद्ध बहुत भूखे थे, उन्होंने उस खीर को खा लिया । उससे उन्हें ज्योति मिली, दिव्य प्रकाश मिला । जिस तत्त्व की वे खोज में थे, उसके दर्शन हुए । निराशा आशा में बदल गई । शरीर और अन्तःकरण में विशेष उत्साह, स्फूर्ति हुई । यह उनके परम पद अथवा महात्मा पद की प्राप्ति की कथा वा गौरव गाथा है । सभी बौद्ध इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि सुजाता की खीर ने ही महात्मा बुद्ध को दिव्य दर्शन कराये । वह खीर उस देवी ने बड़ी श्रद्धा से बनाई थी । उनके घर पर एक हजार दुधारू गायें थीं । उन सबका दूध निकलवाकर वह १०० गायों को पिला देती थी और उन १०० गायों का दूध निकलवाकर १० गौवों को पिला देती थी और दस गौवों का दूध निकालकर १ गाय को पिला देती थी ।

इस गाय के दूध से खीर बनाकर वन के देवता की पूजार्थ ले जाती । उसका यह कार्यक्रम प्रतिदिन चलता था । इस प्रकार से श्रद्धापूर्वक बनायी हुई वह खीर महात्मा बुद्ध के अन्तःकरण में ज्ञान की ज्योति जगाने वाली बनी ।

         छान्दोग्य उपनिषद् में लिखा है –

आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः ।

स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः ॥

        आहार के शुद्ध होने पर अन्तःकरण मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार शुद्ध हो जाते हैं । अन्तःकरण की शुद्धि होने पर स्मरणशक्ति दृढ़ और स्थिर हो जाती है । स्मृति के दृढ़ होने से हृदय की सब गांठें खुल जाती हैं । अर्थात् जन्म-मरण के सब बन्धन ढीले हो जाते हैं । अविद्या, अन्धकार मिटकर मनुष्य दासता की सब श्रृंखलाओं से छुटकारा पाता है और परमपद मोक्ष की प्राप्ति का अधिकारी बनता है । निष्कर्ष यह निकला कि शुद्धाहार से मनुष्य के लोक और परलोक दोनों बनते हैं । योगिराज श्रीकृष्ण जी ने भी गीता में इसकी इस प्रकार पुष्टि की है –

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥६-१७॥

         यथायोग्य आहार-विहार करने वाले, यथोचित कर्म करनेवाले, उचित मात्रा में निद्रा (सोने और जागने) का यह योग दुःखनाशक होता है । शुद्ध आहार-विहार करने वाले मनुष्य के सब दुःख दूर हो जाते हैं ।

इसी के अनुसार महात्मा बुद्ध को सुजाता की खीर से ज्ञान का प्रकाश मिला । दूसरी ओर इससे सर्वथा विपरीत हुआ, अर्थात् महात्मा बुद्ध को उनके एक भक्त ने सूवर का मांस खिला दिया, यही उनकी मृत्यु का कारण बना । उनको भयंकर अतिसार (दस्त) हुये । कुशीनगर में उन्हें यह शरीर छोड़ना पड़ा । मांस तो रोगों का घर है और रोग मृत्यु के अनुचर सेवक हैं । अतः गोदुग्ध की बनी सुजाता की खीर सात्त्विक भोजन ने ज्ञान और जीवन दिया तथा तमोगुणी भोजन मांस ने महात्मा बुद्ध को रोगी बनाकर मृत्यु के विकराल गाल में धकेल दिया । इसीलिये प्राचीनकाल से ही गोदुग्ध को सर्वोत्तम और पूर्ण भोजन मानते आये हैं ।

         आयुर्वेद के ग्रन्थों में सात्त्विक आहार की बड़ी प्रशंसा की है –

आहारः प्रणितः सद्यो बलकृद् देहधारणः ।

स्मृत्यायुः-शक्ति वर्णौजः सत्त्वशोभाविवर्धनः ॥(भाव० ४-१)

         भोजन से तत्काल ही शरीर का पोषण और धारण होता है, बल्कि वृद्धि होती है तथा स्मरणशक्ति आयु, सामर्थ्य, शरीर का वर्ण, कान्ति, उत्साह, धैर्य और शोभा बढ़ती है । आहार ही हमारा जीवन है । किन्तु सात्त्विक सर्वश्रेष्ठ है । और सात्त्विक आहार में गोदुग्ध तथा गोघृत सर्वप्रधान और पूर्ण भोजन है ।

        धन्वन्तरीय निघन्टु में लिखा है –

पथ्यं रसायनं बल्यं हृद्यं मेध्यं गवां पयः ।

आयुष्यं पुंस्त्वकृद् वातरक्तविकारानुत् ॥१६४)

(सुवर्णादिः षष्ठो वर्यः)

          गोदुग्ध पथ्य सब रोगों तथा सब अवस्थाओं (बचपन, युवा तथा वृद्धावस्था) में सेवन करने योग्य रसायन, आयुवर्द्धक, बलकारक, हृदय के लिये हितकारी, मेधा बुद्धि को बनाने वाला, पुंस्त्वशक्ति अर्थात् वीर्यवर्द्धक, वात तथा रक्तपित्त के विकारों रोगों को दूर करनेवाला है । गोदुग्ध को सद्यः शुक्रकरं पयः तत्काल वीर्य बलवर्द्धक लिखा है । इस प्रकार आयुर्वेद के सभी ग्रन्थों में गोदुग्ध के गुणों का बखान किया है और इसकी महिमा के गुण गाये हैं । अतः इस सर्वश्रेष्ठ और पूर्णभोजन का सभी मनुष्यों को सेवन करना चाहिये । यह सर्वश्रेष्ठ सात्त्विक आहार है । जैसे अपनी जननी माता का दूध बालक एक से दो वा अधिक से अधिक तीन वर्ष तक पीता रहता है । माता के दुग्ध से उस समय बच्चा जितना बढ़ता और बलवान् बनता है उतना यदि वह अपनी आयु के शेष भाग में ४० वर्ष की सम्पूर्णता की अवस्था तक भी बढ़ता रहे तो न जाने कितना लम्बा और कितना शक्तिशाली बन जाये । माता का दूध छोड़ने के पश्चात् लोग गौ, भैंस, बकरी आदि पशुवों के दूध को पीते हैं । यदि केवल गोदुग्ध का ही सेवन करें तो सर्वतोमुखी उन्नति हो । बल, लम्बाई, आयु आदि सब बढ़ जावें । जैसे स्वीडन, डैनमार्क, हालैण्ड आदि देशों में गाय का दूध मक्खन पर्याप्त मात्रा में होता है । इसलिये स्वीडन में २०० वर्ष में ५ इंच कद बढ़ा है और भारतीयों के भोजन में पचास वर्ष से गोदुग्ध आदि की न्यूनता होती जा रही है, अतः इन तीस वर्षों में २ इंच कद घट गया । महाभारत के समय भारत देश के वासियों को इच्छानुसार गाय का घृत वा दुग्ध खाने को मिलता था । अतः ३०० और ४०० वर्ष की दीर्घ आयु तक लोग स्वस्थ रहते हुए सुख भोगते थे । महर्षि व्यास की आयु ३०० वर्ष से अधिक थी । भीष्म पितामह १७६ वर्ष की आयु में एक महान् बलवान् योद्धा थे । कौरव पक्ष के मुख्य सेनापति थे, अर्थात् सबसे बलवान् थे । महाभारत में चार पीढ़ियां युवा थी और युद्ध में भाग ले रही थी । जैसे शान्तनु महाराज के भ्राता बाह्लीक अर्थात् भीष्म के चचा युद्ध में लड़ रहे थे । उनका पुत्र सोमदत्त तथा सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा और भूरिक्षवा – ये सब युद्ध में रत अपना युद्ध कौशल दिखा रहे थे । इस प्रकार चार पीढ़ियां युवा थीं । ६ फीट से कम लम्बाई किसी की नहीं थी । १०० वर्ष से पूर्व कोई नहीं मरता था । यह सब गोदुग्धादि सात्त्विक आहार का ही फल था । सत्यकाम जाबाल को ऋषियों की गायों की सेवा करते हुए तथा गोदुग्ध के सेवन से ही ब्रह्मज्ञान हुआ । गोदुग्ध की औषध मिश्रित खीर से ही महाराज दशरथ के चार पुत्ररत्न उत्पन्न हुए । इसीलिये गाय के दूध को अमृत कहा है । संसार में अमृत नाम की वस्तु कोई है तो वह गाय का घी-दूध ही है ।

          गाय के घी के विषय में राजनिघन्टु में इस प्रकार लिखा है –

गव्यं हव्यतमं घृतं बहुगुणं भोग्यं भवेद्‍भाग्यतः ॥२०४॥

         गौ का घी हव्यतम अर्थात् हवन करने के लिये सर्वश्रेष्ठ है और बहु-गुण युक्त है, यह बड़े सौभाग्यशाली मनुष्यों को ही खाने को मिलता है । यथार्थ में गोपालक ही शुद्ध गोघृत का सेवन कर सकते हैं । गाय के घी को अमृत के समान गुणकारी और रसायन माना है । सब घृतों में उत्तम है । सात्त्विक पदार्थों में सबसे अधिक गुणकारी है । इसी प्रकार गाय की दही, तक्र, छाछ आदि भी स्वास्थ्य रक्षा के लिये उत्तम हैं । दही, तक्र के सेवन से पाचनशक्ति यथोचित रूप में भोजन को पचाती है । इसके सेवन से पेट के सभी विकार दूर होकर उदर नीरोग हो जाता है । निघण्टुकार ने कितना सत्य लिखा है – न तक्रसेवी व्यथते कदाचित् – तक्र का सेवन करनेवाला कभी रोगी नहीं होता । गौ के घी, दूध, दही, तक्र – सभी अमृत तुल्य हैं । इसीलिये हमारे ऋषियों ने इसे माता कहा है । वेद भगवान् ने इस माता को आप्यायध्वमघ्न्या न मारने योग्य, पालन और उन्नत करने योग्य लिखा है अर्थात् गोमाता का वध वा हिंसा कभी नहीं करनी चाहिये क्योंकि यह सर्वश्रेष्ठ सात्त्विक भोजन के द्वारा संसार का पालन पोषण करती है । इसकी नाभि से अमृतस्य नाभिः अमृतरूपी दूध झरता है । यह सात्त्विक आहार का स्रोत है ।

राजसिक भोजन

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।

आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ (गीता १७।९॥

         कड़वे, खट्टे, नमकीन, अत्युष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष दाह, जलन उत्पन्न करने वाले नमक, मिर्च, मसाले, इमली, अचार आदि से युक्त चटपटे भोजन राजसिक हैं । इनके सेवन से मनुष्य की वृत्ति चंचल हो जाती है । नाना प्रकार के रोगों से ग्रस्त होकर व्यक्ति विविध दुःखों का उपभोग करता है और शोकसागर में डूब जाता है । अर्थात् अनेक प्रकार की आधि-व्याधियों से ग्रस्त होकर दुःख ही पाता है । इसलिये उन्नति चाहने वाले स्वास्थ्यप्रिय व्यक्ति इस रजोगुणी भोजन का सेवन नहीं करते । उपर्युक्त रजोगुणी पदार्थ अभक्ष्य नहीं, किन्तु हानिकारक हैं । किसी अच्छे वैद्य के परामर्श से औषधरूप में इनका सेवन हो सकता है । भोजनरूप में प्रतिदिन सेवन करने योग्य ये रजोगुणी पदार्थ नहीं होते ।

 तामसिक भोजन

यातयामं गतरसं पूतिपर्युषितं च यत् ।

उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥गीता १७।१०॥

          बहुत देर से बने हुए, नीरस, शुष्क, स्वादरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी, उच्छिष्ट (जूंठे) और बुद्धि को नष्ट करने करनेवाले भोजन तमोगुणप्रधान व्यक्ति को प्रिय होते हैं । जो अन्न गला सड़ा हुआ बहुत विलम्ब से पकाया हुआ, बासी, कृमि कीटों का खाया हुआ अथवा किसी का झूठा, अपवित्र किया हुआ, रसहीन तथा दुर्गन्धयुक्त माँस, मछली, अण्डे, प्याज, लहसुन, शलजम आदि तामसिक भोजन हैं । इनका सेवन नहीं करना चाहिये । ये अभक्ष्य मानकर सर्वथा त्याज्य हैं । जो इन तमोगुणी पदार्थों का सेवन करता है, वह अनेक प्रकार के रोगों में फंस जाता है । उसका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है, आयु क्षीण हो जाती है, बुद्धि, मन तथा आत्मा इतने मलिन हो जाते हैं कि उनको अपने हिताहित और धर्माधर्म का भी ज्ञान और ध्यान नहीं रहता । अतःएव तमोगुणी व्यक्ति मलिन, आलसी, प्रमादी होकर पड़े रहते हैं । चोरी, व्यभिचार आदि अनाचारों का मूल ही तामसिक भोजन है (इन तमोगुणी भोजनों में भी मांस, अण्डा, मछली सबसे अधिक तमोगुणी है । वैसे तो सभी तमोगुणी भोजन हानिकारक होने से सर्वथा त्याज्य हैं किन्तु मांस, मछली आदि तो सर्वथा अभक्ष्य है । इनको खाना तो दूर, कभी भूल कर स्पर्श भी नहीं करना चाहिये ।)

संस्कृत में मांस का नाम आमिष है, जिसका अर्थ है – अमन्ति रोगिणो भवन्ति येन भक्षितेन तदामिषम् जिस पदार्थ के भक्षण से मनुष्य रोगी हो जाये, वह आमिष कहलाता है । आजकल सभी मानते हैं कि मांसाहारी लोगों को कैंसर, कोढ़, गर्मी के सभी रोग, दांतों का गिर जाना, मृगी, पागलपन, अन्धापन, बहरापन आदि भयंकर रोग लग जाते हैं । मांस मनुष्य को रोगी करने वाला अभक्ष्य पदार्थ है । मनुष्य को इनसे सदैव दूर रहना चाहिये । इस विचार के मानने वाले लोग योरुप में भी हुये हैं ।

अंग्रेजी भाषा के ख्यातिनाम साहित्यकार बर्नाड शॉ ने मांस खाना छोड़ दिया था । वे मांस के सहभोज में नहीं जाते थे । मांस भक्षण के पक्षपाती डाक्टरों ने उनसे कहा कि मांस नहीं खाओगे तो शीघ्र मर जावोगे । उन्होंने उत्तर दिया मुझे परीक्षण कर लेने दो, यदि मैं नहीं मरा तो तुम निरामिषभोजी बन जाओगे अर्थात् मांस खाना छोड़ दोगे । बर्नाड शॉ लगभग १०० वर्ष की आयु के होकर मरे और मरते समय तक स्वस्थ रहे । उन्होंने एक बार कहा था – “मेरी स्थिति बड़ी गम्भीर है, मुझसे कहा जाता है गोमांस खाओ, तुम जीवित रहोगे । मैंने अपने वसीयत (स्वीकार पत्र) लिख दी है कि मेरे मरने पर मेरी अर्थी के साथ विलाप करती हुई गाड़ियों की आवश्यकता नहीं । मेरे साथ बैल, भेड़ें, गायें, मुर्गे और मछलियां रहेंगी क्योंकि मैंने अपने साथी प्राणियों को खाने की अपेक्षा स्वयं का मरना अच्छा समझा है । हजरत नूह की किस्ती को छोड़कर यह दृश्य सबसे अधिक और महत्त्वपूर्ण होगा ।”

इसी प्रकार आर्य जगत् के प्रसिद्ध विद्वान् स्व० पं० गुरुदत्त एम. ए. विद्यार्थी एक बार रोगी हो गये थे । डाक्टरों ने परामर्श दिया कि गुरुदत्त जी मांस खा लें तो बच सकते हैं । पं० गुरुदत्त जी ने उत्तर दिया कि यदि मैं मांस खाने पर अमर हो जाऊं, पुनः मरना ही न पड़े तो विचार कर सकता हूँ । डाक्टर चुप हो गये ।