उत्तर देने की आर्यसमाजी कला

उत्तर देने की आर्यसमाजी कला

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कुछ तड़प-कुछ झड़प

      उत्तर  देने की कलाः गत तीन चार मास में बिजनौर के आर्यवीर श्री विजयभूषण जी तथा कुछ अन्य नगरों के आर्य सज्जनों ने भी चलभाष पर दो बातें विशेष रूप से इस लेखक को कहीं। . आपकी उत्तर देने की कला बहुत अनूठी है। २. आप तड़प-झड़प में इतिहास की ठोस सामग्री देते हैं। इसमें अलभ्य लेखों, पत्र-पत्रिकाओं तथा इस समय अप्राप्य साहित्य की पर्याप्त चर्चा होने से बहुत जानकारी मिलती है। अनेक बन्धुओं विशेष रूप से युवकों के मुख से ये बातें सुनकर उत्तर देने की कला पर दो-चार बार कुछ विस्तार से लिखने का विचार बना।

       मैं गत दस-बारह वर्षों से मेधावी लगनशील युवकों से बहुत अनुरोध से यह बात कहता चला आ रहा हूँ कि वैदिक धर्म पर वार-प्रहार करने वालों को उत्तर देना सीखो। अब भी आर्य समाज में कुछ अनुभवी विद्वान् ऐसे हैं, जिनकी उत्तर देने की शैली मौलिक, विद्वतापूर्ण  तथा हृदयस्पर्शी है। श्री डॉ. धर्मवीर जी को जब उत्तर देना होता है तो उनकी लेखनी की रंगत ही कुछ निराली होती है। श्री राम जेठमलानी ने श्री रामचन्द्र जी पर एक तीखा प्रश्न उठाया। संघ परिवार के ही श्री विनय कटियार ने उनके स्वर में स्वर मिला दिया।

     राम मन्दिर आन्दोलन का एक भी कर्णधार श्रीयुत् राम जेठमलानी के आक्षेप का सप्रमाण यथोचित उत्तर न दे सका। मेरे जैसे आर्यसमाजी रामभक्त भी तरसते रहे कि उमा भारती जी, श्री मुरली मनोहर जी अथवा सर संघचालक आदरणीय भागवत जी इस आक्षेप का कुछ सटीक उत्तर दें, परन्तु ऐसा कुछ भी न हुआ। परोपकारी का सम्पादकीय पढ़कर अनेक पौराणिकों ने भी यह माँग की कि श्री धर्मवीर जी श्री राम के जीवन पर इसी शैली में २५०-३०० पृष्ठों की एक मौलिक पुस्तक लिख दें।

     श्री डॉ. ज्वलन्त कुमार जी भी जानदार उत्तर देते हैं। परोपकारी में श्री आचार्य सोमदेव जी तथा आदरणीय सत्यजित् जी द्वारा शंका समाधान की शैली प्रभावशाली व प्रशंसनीय है।

     आर्यसमाज में श्री राजवीर जी जैसे उदीयमान लेखक तथा अनुभवी गम्भीर विद्वान् डॉ. सुरेन्द्र कुमार जी ने भी इस विनीत से एक दो बार कहा, ‘आपने उत्तर देते हुए चुटकी लेना कहाँ से सीखा?’

      मैंने कहा, ‘अपने बड़ों से और विशेष रूप से पूज्य पं. चमूपति जी से।’

      प्रिय राजवीर जी तथा श्री धर्मेन्द्र जी ‘जिज्ञासु’ ने तो कुछ श्रम करके उत्तर देने की कला सीखी व विकसित की है, परन्तु बहुत से युवक इस दिशा में कुछ करके दिखा नहीं सके और राजवीर जी तथा धर्मेन्द्र जी भी समय के अभाव में जितना उन्हें बढ़ना चाहिये, बढ़ नहीं सके। कई युवक ऐसे भी मिले हैं, जो गुरु तो बनाने की ललक रखते हैं, परन्तु उनमें विनम्रता व श्रद्धा से सीखने की ललक नहीं। घर बैठे तो यह विद्या आती नहीं।

      आइये, उत्तर देने की आर्यसमाजी कला का कुछ इतिहास यहाँ देते हैं। मैंने जो पूर्वजों (इस कला के आचार्यों) के मुख से जो कुछ सुना व पढ़ा है, इस कला के जनक तो स्वयं पूज्य ऋषिवर दयानन्द जी महाराज थे। उनके पश्चात् इस कला के सिद्धहस्त कलाकार पं. लेखराम जी मैदान में उतरे। यह मेरा ही मत नहीं है, लाला लाजपतराय जी ने भी अपनी लौह लेखनी से ऐसा ही लिखा है। बड़े-बड़े मौलवियों तथा सनातन धर्मी नेता पं. दीनदयाल जी का भी ऐसा ही मत था। मौलाना अ दुल्ला मेमार तथा मौलाना रफ़ीक दिलावरी जी का भी ऐसा ही मत था।

       तनिक महर्षि जी की उत्तर देने की कला पर भी इतिहास शास्त्र का निर्णय सुना दें। आर्यसमाजी लेखक जो ऋषि जीवन की तोता रटन लगाते रहते हैं, वे इतिहास के इस निर्णय को जानते ही नहीं और परोपकारी में पढ़-सुनकर इसे आगे प्रचारित ही नहीं करते।

      १. वैद्य शिवराम पाण्डे ऋषि के साथ प्रयाग रहे। वे काशी की पाठशाला में भी रहे। वे आर्यसमाजी तो नहीं थे, परन्तु ऋषि की संगत की रंगत मानते थे। आपका एक दुर्लभ लेख हमारे पास है। वे लिखते हैं कि ऋषि एक ही प्रश्न का उत्तर कई प्रकार से देना जानते थे। श्री गोस्वामी घनश्याम जी मुल्तान निवासी बाल शास्त्री की कोटि के विद्वानों में से एक थे। काशी शास्त्रार्थ के समय आप काशी में नहीं थे। जब काशी शास्त्रार्थ के पश्चात् मूर्तिपूजकों ने देशभर में यह प्रचार करना चाहा कि स्वामी दयानन्द शास्त्रार्थ में हारे तो गोस्वामी झट से काशी गये। बाल शास्त्री से मिलकर पूछा, सच-सच बताओ! क्या स्वामी दयानन्द हारे या काशी के पण्डित?

       तब बाल शास्त्री जी ने वीतराग दयानन्द के गुणों का बखान करते हुए कहा था कि हम जैसे निर्बल संसारी उन्हें हराने वाले कौन?

      चाँदापुर के शास्त्रार्थ में पादरी महोदय ने कहा था, ”सुनो भाई मौलवी साहबो! पण्डित जी इसका उत्तर हजार प्रकार से दे सकते हैं। हम और तुम हजारों मिलकर भी इनसे बात करें तो भी पण्डित जी बराबर उत्तर दे सकते हैं, इसलिए इस विषय में अधिक कहना उचित नहीं।”

      पादरी जी का यह कथन आर्यसमाज में प्रचारित करने वाले चल बसे। पुस्तकों की सूचियाँ बनाने वाले सम्पादक लेखक शास्त्रार्थ कला (विधा) को समझ ही न सके।

पं. लेखराम जी की उत्तर देने की कला की एक घटना ‘आर्य मुसाफिर’ मासिक की फाईलों में छपे उनके एक शास्त्रार्थ से मिली। सीमा प्रान्त के एक नगर में प्रतिमा पूजन पर एक शास्त्रार्थ में पण्डित जी ने ‘न तस्य प्रतिमाऽअस्ति’ इस वेद वचन से अपने कथन की पुष्टि की तो विरोधी ने कहा कि यहाँ ‘नतस्य’ है अर्थात् प्रतिमा के आगे झुकने की बात है। यहाँ ‘तस्य’ शब्द  नहीं। तब पण्डित जी ने कहा कि यदि यहाँ ‘तस्य’ शब्द  नहीं तो फिर इस मन्त्र में ‘यस्य’ शब्द  किसके लिए है? वहाँ पौराणिक पण्डितों ने भी पण्डित जी के इस तर्क व प्रमाण का लोहा माना। यह किसी भी शास्त्रार्थ में किसी संस्कृतज्ञ आर्य ने तर्क न दिया। श्रद्धेय पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी ने इस प्रसंग में हमें कहा था, ”यह तो पं. लेखराम जी के जन्म-जन्मान्तरों का संस्कार और उनकी ऊहा का चमत्कार मानना पड़ेगा।”

अब इस प्रसंग में इतिहास का एक और निचोड़ देना लाभप्रद होगा। पं. गणपति शर्मा जी तथा श्री स्वामी दर्शनानन्द जी की उत्तर देने की कला भी विलक्षण थी। इनके पश्चात् आर्यसमाज में अपनी-अपनी कला से उत्तर देने में कई सुदक्ष कलाकार विद्वान् हुए, परन्तु स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी, श्री पं. गंगाप्रसाद जी उपाध्याय, पं. रामचन्द्र जी देहलवी, पं. लक्ष्मण जी आर्योपदेशक, स्वामी सत्यप्रकाश जी- इन पाँच महापुरुषों के दृष्टान्त, तर्क व प्रमाण अत्यन्त प्रभावशाली, मौलिक व हृदयस्पर्शी होते थे। स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज ने चार बार पूरे भारत का पैदल भ्रमण किया। उनके पास दृष्टान्तों का अटूट भण्डार व जीवन के बहुत अनुभव थे।

आचार्य रामदेव जी, मेहता जैमिनि जी तथा श्री पं. धर्मदेव जी को विश्व साहित्य के असंख्य उद्धरण कण्ठाग्र थे। इन तीनों की उत्तर देने की कला भी बड़ी न्यारी व प्यारी थी। मैं बाल्यकाल में अपने छोटे से ग्राम के आर्यों की परस्पर की चर्चा सुन-सुनकर ग्राम के एक आर्य युवक कार्यकर्ता से पूछा करता था कि आचार्य रामदेव जी की वक्तृत्व कला की क्या विशेषता है? उनका  उत्तर था- उन्हें सब कुछ कण्ठाग्र है। मैं अपने निजी अनुभव से यह बताना चाहूँगा कि मैं सब पूज्य विद्वानों को ध्यान से सुना करता था। उनसे चर्चा किया करता था, फिर चिन्तन करने का अभ्यास हो गया। इससे मेरी भी उत्तर देने की कला विकसित हुई।

स्वामी वेदानन्द जी तीर्थ ने मेरे आरम्भिक काल में अत्यन्त प्यार से, कुछ डाँटकर कहा कि जो पढ़ो व सुनो, उसपर विचार कर स्वयं उत्तर खोजो, फिर उ उत्तर न सूझे तो आकर पूछा करो। अब इन उतावले युवकों का न गहन अध्ययन है, न बड़ों से कुछ सीखने की भूख है। प्राणायाम की चर्चा सुनकर तथा दो योग शिविरों में भाग लेकर ये सब नौ सिखिये योगाचार्य बनकर ध्यान शिविर लगाने व अपना आश्रम या अड्डा बनाने में लग जाते हैं। यह प्रवृत्ति  धर्मप्रचार में बाधक रोड़ा बन रही है।

सुब्रमण्यम भारती

सुब्रमण्यम भारती

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 आज तमिल भाषा के महाकवि सुब्रमण्यम भारती का जन्मदिवस है , एक ऐसे साहित्यकार जो सक्रिय रूप से स्वतंत्रता आंदोलन में स्वयं तो शामिल रहे ही, उनकी रचनाओं से प्रेरित होकर दक्षिण भारत में बड़ी तादाद में आम लोग भी आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। 11 दिसंबर 1882 को तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी की एत्त्यापुरम नामक गाँव में जन्में भारती देश के महान कवियों में एक थे जिनका गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर समान अधिकार था। भारती जब छोटे ही थे तभी माता-पिता का निधन हो गया और वह कम उम्र में ही वाराणसी गए थे जहाँ उनका परिचय अध्यात्म और राष्ट्रवाद से हुआ। इसका उनके जीवन पर काफी प्रभाव पड़ा|

       उन्होंने ज्ञान के महत्व को समझा और पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने काफी दिलचस्पी ली। इस दौरान वह कई समाचार पत्रों के प्रकाशन और संपादन से जुड़े रहे।उनकी रचनाओं में एक ओर जहाँ गूढ़ धार्मिक बातें होती थी वहीं रूस और फ्रांस की क्रांति तक की जानकारी होती थी। वह समाज के वंचित वर्ग और निर्धन लोगों की बेहतरी के लिए प्रयासरत रहते थे।

       भारती 1907 की ऐतिहासिक सूरत कांग्रेस में शामिल हुए थे जिसने नरम दल और गरम दल के बीच की तस्वीर स्पष्ट कर दी थी। भारती ने तिलक, अरविन्द तथा अन्य नेताओं के गरम दल का समर्थन किया था। इसके बाद वह पूरी तरह से लेखन और राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हो गए। वर्ष 1908 में अंग्रेज सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए जिस से बचने के लिए वह पांडिचेरी चले गए जो उन दिनों फ्रांसीसी शासन में था।

       भारती पांडिचेरी में भी कई समाचार पत्रों के प्रकाशन संपादन से जुड़े रहे और अंग्रेजों के खिलाफ लोगों में देशभक्ति की अलख जगाते रहे। पांडिचेरी में प्रवास के दिनों में वह गरम दल के कई प्रमुख नेताओं के संपर्क में रहे। वहाँ उन्होंने कर्मयोगी तथा आर्या के संपादन में अरविन्द की सहायता भी की थी। भारती 1918 में ब्रिटिश भारत में लौटे और उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया।

       उन्हें कुछ दिनों तक जेल में रखा गया। बाद के दिनों में उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा और 11 सितंबर 1921 को निधन हो गया। भारती 40 साल से भी कम समय तक जीवित रहे और इस अल्पावधि में भी उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में काफी काम किया और उनकी रचनाओं की लोकप्रियता ने उन्हें अमर बना दिया। इस विद्रोही महाकवि को उनके जन्मदिवस पर कोटिशः नमन|

तीर्थराज पुष्कर में महर्षि के प्रचार का प्रभाव

तीर्थराज पुष्कर में महर्षि के प्रचार का प्रभाव

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         महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का प्रभाव केवल धनी-मानी सम्पन्न लोगों एवं राजा महाराजाओं पर ही नहीं पड़ा, अपितु सामान्य लोगों पर भी पड़ा। ”आर्य प्रेमी” पत्रिका के फरवरी-मार्च १९६९ के महर्षि श्रद्धाञ्जलि अंक में प्रकाशित आलेख हम पाठकों के लाभार्थ प्रकाशित कर रहे हैं।                     

        ‘मेरी अन्त्येष्टि संस्कार विधि के अनुसार हो’

        वेदोद्धारक महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जब तीर्थराज पुष्कर पधारते थे तब सुप्रसिद्ध ब्रह्मा जी के मन्दिर में विराजते थे।

        मन्दिर के महन्त पारस्परिक मतभेदों की उपेक्षा करते हुए संन्यासी मात्र का स्वागत सत्कार करते थे।

        महर्षि का आसन दक्षिणाभिमुख तिबारे में लगता था और महर्षि इसी तिबारे में विराजकर वेदभाष्य करते थे। सांयकालीन आरती के पश्चात् महर्षि के प्रवचन ब्रह्मा जी के घाट पर होते थे पुष्कर के पण्डे पोपलीला का खण्डन सुन बहुत ही कुढ़ते थे परन्तु ब्रह्मा जी के मन्दिर के महन्त के आतंक के कारण कुछ कर नहीं पाते थे। मन्दिरों में पुरुषों की अपेक्षा देवियाँ अधिक आती हैं।

        इन देवियों में पुष्करवासिनी एक देवी जब-जब मन्दिर आती अथवा घाट पर महर्षि के प्रवचन सुनती उनसे उसकी श्रद्धा महर्षि के प्रति बढ़ती गई।

      कालान्तर में वह देवी वृद्धा हुई और अन्तिम काल निकट आ गया। परन्तु अत्यन्त छटपटाने पर भी प्राण नहीं छूटते थे।

      देवी के पुत्र ने अत्यन्त कातर हो माता से पूछा कि माँ तेरे प्राण कहाँ अटक रहे हैं। देवी ने उत्तर  दिया- बेटा यह न बताने में ही मेरा और तेरा भला है। बताकर मैं तुझे काल के गाल में नहीं डालूँगी।

       पुत्र ने जब अत्यन्त आग्रह किया तो देवी ने कहा कि ब्रह्मा जी के मन्दिर में जो तेजस्वी महाराज तिबारे में बिराज कर शास्त्र लिखते थे और घाट पर पोपों का खण्डन करते थे, उनकी लिखी संस्कार विधि के अनुसार मेरा दाग करे तो मेरे प्राण छूटे। पर बेटा ऐसा नहीं होने पावेगा। दुष्ट पण्डे तेरा अटेरण कर देगें। पुत्र ने कहा- माँ तू निश्चिन्त हो प्राण छोड़। अथवा तो तेरी अन्त्येष्टि संस्कारविधि के अनुसार होगी और नहीं तो मेरा और तेरा दाग साथ ही चिता पर होगा। वृद्धा ने शरीर त्याग दिया। उन दिनों पुष्कर में आर्य समाज का कोई चिह्न नहीं था।

      अजमेर के तत्कालीन आर्य समाज में संभवतया अधिक से अधिक १०-१५ सभासद होंगे। वृद्धा के पुत्र ने अजमेर आर्य समाज के मन्त्री जी के पास अपनी माता की अन्तिम इच्छा की सूचना भिजवाई और कहलाया कि आपके सहयोग की प्रतीक्षा उत्कंठापूर्वक करुँगा। मंत्री जी ने उत्तर भिजवाया कि निश्चित रहो, प्रातः काल होते हम अवश्य आवेंगे और जैसी परिस्थिति होगी उस का सामना करेंगे। मंत्री जी ने स्थानीय सब सभासदों को सूचना भिजवाई।

     इन सभासदों में एक सभासद ऐसे थे कि जो तुर्रा गाने वालों और खेल-तमाशों के स्थानीय अखाड़ों के उस्ताद थे।

     इन सभासद के पास जब सन्देश पहुँचा तो उन्होंने अखाड़ों के चौधरी से कहा कि तुम मेरी जगह किसी और को अखाड़ों का उस्ताद बनाओ। मैं पुष्कर जा रहा हूँ और सम्भव है जीवित नहीं आऊँ। चौधरी ने पूछा क्या बात है और वास्तविकता जान कर कहा, ये देवी तो हमारी बिरादरी की है। तत्काल चौधरी जी ने बिरादरी में खबर कराई और लगभग ३००-३५० व्यक्ति रातोंरात पुष्कर पहुँचे। इधर अन्य आर्य सभासद भी हवन सामग्री लेकर प्रातःकाल होते ही पहुँच गये। इतना समारोह और बलिदान भाव देख कर पण्डों का साहस विरोध करने को नहीं हुआ। अन्त्येष्टि किस धूमधाम से हुई होगी इस का अनुमान पाठक स्वयं कर लें। कहते हैं उस दिन पुष्करराज की किसी दुकान में घृत और नारियल नहीं बचे सब खरीद लिये गये। इस अन्त्येष्टि का प्रभाव चिरकाल तक रहा।

 

श्यामजी कृष्ण वर्मा

श्यामजी कृष्ण वर्मा

” alt=”” aria-hidden=”true” />       संसार का इतिहास साक्षी है कि क्रान्ति की ज्वाला पहले किसी भी समाज के सर्वोत्तम मस्तिष्कों में जन्म लेती है और फिर धीरे धीरे पूरे समाज को प्रभावित करती है। भारतीय सन्दर्भ में इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं, प्रखर राष्ट्रभक्त श्यामजी कृष्ण वर्मा, जिन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में क्रान्ति की पाठशाला के नाम से जाना जाता है और जिनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित रहा पर दुर्भाग्य इस देश ने उन्हें वह मान सम्मान नहीं दिया, जिसके वे अधिकारी थे। 4 अक्टूबर 1857 को गुजरात की कच्छ रियासत के मांडवी में कृष्ण भानुशाली एवं गोमतीबाई के यहाँ जन्में श्याम जी की प्रारंभिक शिक्षा उनके गाँव मांडवी में और उच्च शिक्षा भुज में हुयी। 1875 में उनका विवाह मुंबई के एक बड़े व्यापारी सेठ छबीलदास लालूभाई की पुत्री भानुमती से संपन्न हुआ। जब और अधिक उच्च शिक्षा के लिए वे मुंबई गए तो वहां महर्षि दयानंद सरस्वती के संपर्क में आये और उनसे अत्यंत प्रभावित हुए। स्वामी जी के अपने ऊपर पड़े प्रभाव के चलते उन्होंने वैदिक साहित्य का गहन अध्ययन किया और शीघ्र ही संस्कृत और वेद-वेदांगों में पारंगत हो गए| वे महर्षि द्वारा मुंबई में स्थापित भारत के प्रथम आर्य समाज के प्रधान बनाये गए। वैदिक ज्ञान पर उनका इतना अधिकार हो गया कि वो वैदिक धर्म और दर्शन के ऊपर सम्पूर्ण भारत में प्रवचन देने लेगे जिसने उन्हें एक जाना माना नाम बना दिया | वे पहले गैर-ब्राह्मण थे जो अपनी विद्वता के कारण काशी के विद्वान् पंडितों द्वारा पंडित की उपाधि से सम्मानित किये गए|

       उनकी विद्वता से प्रभावित होकर आक्सफोर्ड में संस्कृत के प्रोफ़ेसर मोनिअर विलियम्स ने उन्हें अपने सहायक के रूप में कार्य करने के लिए आमंत्रित किया| वे 25 अप्रैल 1879 को इंग्लैंड पहुंचे और संस्कृत के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के तौर पर अपनी सेवाएँ दीं| बाद में उन्होंने टेम्पल इन में प्रवेश लिया और भारत के पहले बार-एट-ला बने। 1885 में वे भारत लौट आये और मुंबई उच्च न्यायालय में वकालत प्रारंभ की| कालांतर में उन्होंने कई कार्य किये और रतलाम, अजमेर और जूनागढ़ जैसी कई रियासतों के दीवान रहे| 1897 के आस पास, एक ब्रिटिश एजेंट के साथ उनके कटु अनुभव ने ब्रिटिश राज्य के प्रति उनके मन में नफरत की ज्वाला को और भड़का दिया और उसके बाद उनका पूरा जीवन अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ते ही बीता| वो लोकमान्य तिलक की गरम नीति से अत्यंत प्रभावित थे और इस कारण उनके साथ अत्यंत मधुर सम्बन्ध बनाकर उन्होंने खुद को राष्ट्रीय आन्दोलन में जोड़ दिया| 1897 में पुणे में प्लेग के दौरान भारतीयों पर किये गए बर्बर अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाने पर जब तिलक को जेल भेज दिया गया तो श्याम जी को लगा कि यहाँ रह कर वो उतने स्वतंत्र भाव से कार्य नहीं कर सकते जितना बाहर रह कर| अपने शानदार कैरिअर को लात मारकर उन्होंने देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने का मार्ग चुना और उस पर चल पड़े|

       1899 में वे एक बार फिर से लन्दन पहुंचे और अपने ज्ञान, प्रतिभा, कौशल, संघर्ष शक्ति और साधनों के कारण देखते ही देखते ब्रिटेन में भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे युवाओं के एकछत्र सेनापति बन गए। उन्होंने लन्दन से एक मासिक पत्रिका ‘इंडियन सोश्योलाजिस्ट’ निकाली जो क्रान्ति के विचारों का वाहक बन गयी। 1905 में उन्होंने भारत पर ब्रिटिश सरकार की दमन नीतियों के विरुद्ध ‘द इंडियन होमरूल सोसायटी’ नामक संस्था की स्थापना की | वे जितना कमाते थे, उतना ही देश पर लुटाते थे | प्रसिद्द दार्शनिक हर्बर्ट स्पेंसर के प्रसिद्द कथन कि आक्रमण के विरुद्ध संघर्ष ना केवल न्यायोचित है बल्कि आवश्यक भी, को अपना मन्त्र मानने वाले श्याम जी ने उनकी समाधि पर श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए एक ऐसे केंद्र की स्थापना का संकल्प किया जो ब्रिटेन में भारतीय क्रांतिकारियों का गढ़ बने और जहाँ से ऐसे सेनानी निकले जो स्वयं को देश के लिए समर्पित कर दें। अपने इसी संकल्प के फलस्वरूप 1905 में ही पंडित श्यामजी ने लंदन में ‘इंडिया हाउस’ नामक छात्रवास की स्थापना की, जिसके उदघाटन के अवसर पर लाला लाजपत राय, दादाभाई नौरोजी और मैडम भीका जी कामा जैसे लोग उपस्थित थे। यह भवन शीघ्र ही भारतीय क्रांतिकारियों और नेताओं का गढ़ बन गया| 50 कमरों के इस छात्रवास में भारत के अनेक क्रांतिकारी पले और बढ़े, जिनमें विनायक दामोदर सावरकर, गणेश दामोदर सावरकर, लाला हरदयाल, वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, वी . वी . एस . अय्यर, आसफ अली, सिकन्दर हयात खान और ब्रिटिश भूमि पर शहीद होने वाले पहले भारतीय मदनलाल धींगरा आज भी हमारे हृदयों में बसे हुए हैं| कुछ क्रांतिकारी वहॉं रहते थे और कुछ नियमित आया जाया करते थे |

     अपने पैसों से श्यामजी ने क्रांतिकारियों को जीवनयापन, शास्त्र और शस्त्र् आदि की खरीद में सक्रिय सहायता दी | उन्होंने महाराणा प्रताप, शिवाजी, महारानी लक्ष्मीबाई और महर्षि दयानंद के नाम से विदेशों में अध्ययन के इच्छुक भारतीय छात्रों के लिए अनेकों छात्रवृत्तियां स्थापित कीं पर इसे पाने की शर्त यही थी कि इन छात्रवृत्तियों को लेनेवाले छात्र् लंदन से लौटकर अंग्रेज सरकार की चाकरी नहीं करेंगे| इनके पीछे उद्देश्य ये था कि अधिक से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में आकर देश की आज़ादी की लड़ाई को आगे बढायें। ये छात्रवृत्तियां अनेक प्रांतों के नवयुवकों को मिलीं, उनमें मुसलमान भी थे | श्यामजी की छात्रवृत्तियां का लाभ वीर सावरकर, भाई परमानंद, लाला हरदयाल, बिपिनचंद्र पाल, मदनलाल ढींगरा जैसे क्रान्तिवीरों ने उठाया और अंग्रेजों को उनके घर में घुसकर चुनौती दी | बाल गंगाधर तिलक जैसे लोग श्यामजी को पत्र भेजकर छात्रों के नाम प्रस्तावित करते थे| अपने पत्रकों के जरिये श्याम जी ने ब्रिटेन में जहाँ एक तरफ भारतीयों के मन में देश की आज़ादी की लौ जलाई, वहीँ दूसरी तरफ अंग्रेजों के मन में भय उत्पन्न कर दिया। उनके द्वारा लिखे गए ये पत्रक इतिहास की अमूल्य निधि हैं जो बताते हैं कि देश की स्वतंत्रता के लिए उनके मन में कितनी पीड़ा थी।

       भारत के आज़ादी के लिए अपने अपने तरीकों से कार्य कर रहे विभिन्न लोगों से श्याम जी के सम्बन्ध मधुर थे पर कांग्रेस को लेकर उनके मन में अप्रसन्नता का भाव था। 1899 में दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए जब गाँधी जी ने अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे बोअर्स के विरोध में अंग्रेजों का साथ दिया तो श्याम जी को अत्यंत क्लेश हुआ। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि एक गुजराती और एक भारतीय के रूप में मैं शर्मिंदा हूँ कि अपने सम्मान और आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे बोअर्स के विरुद्ध मोहनदास करमचंद गांधी ने साम्राज्यवादी अंग्रेजों का साथ दिया है। गांधी जी से उनके सम्बन्ध बाद में और भी कटु हो गए थे जब गाँधी जी भारत लौट कर आज़ादी की लड़ाई के सबसे बड़े सेनानी के तौर पर जाने जा रहे थे और मदनलाल धींगरा द्वारा कर्जन वायली की हत्या का समर्थन करने पर गाँधी जी ने श्याम जी से सम्बन्ध विच्छेद कर लिए थे ।

       श्याम जी की गतिविधियाँ को लेकर ब्रिटिश सरकार के मन में संदेह गहराता जा रहा था और वो उन पर हर घडी नजर रखने लगी थी| ऐसे में इंडिया हाउस का काम वीर सावरकर के हाथों में छोड़ कर श्याम जी ने अपना मुख्यालय पेरिस बना लिया और ब्रिटिश सरकार की आँखों में धुल झोंक कर 1911 में फ़्रांस चले गए और वहीँ से मातृभूमि की स्वतंत्र के लिए अनवरत प्रयास करते रहे| उनकी गतिविधियों से घबरा कर ब्रिटिश सरकार ने फ़्रांस पर उन्हें गिरफ्तार करने और प्रत्यर्पित करने का दवाब डाला पर श्याम जी पहले ही परिस्थिति को समझ 1914 में जेनेवा चले गए और वहीँ से गुप्त रूप से क्रांतिकारियों की सहायता करते रहे|

       अनवरत प्रवास और कठिन जीवन से उनके शरीर को तोड़ दिया था और परिणामतः भारत माता का यह वीर सपूत माँ के आंचल से बहुत दूर जेनेवा में 30 मार्च 1930 को चिरनिद्रा में सो गया और साथ ही बुझ गया क्रांति के पथ पर ना जाने कितने ही क्रांतिवीरों का पथप्रदर्शन करने वाला दीप| वो भारत माता को पराधीनता के बेड़ियों से मुक्त देखने के लिए दुनिया में नहीं रहे और उनका अंतिम संस्कार भी उनकी मातृभूमि से बहुत दूर जेनेवा में ही हुआ। उनकी मृत्यु के समाचार को अंग्रेजी सरकार ने दबाने का प्रयास किया पर इसमें सफल ना हो सकी। उनसे विरोध के चलते कांग्रेस और गाँधी जी ने इस महान हुतात्मा को श्रद्धांजलि देना भी गवारा ना किया। पर लाहौर जेल में अमर क्रांतिकारी भगत सिंह और उनके साथियों ने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले इस हुतात्मा को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। लोकमान्य तिलक के पत्र मराठा ने उनकी स्मृति में लेखों की एक श्रृंखला प्रकाशित कर उन्हें श्रद्धापुष्प अर्पित किये। उनकी मृत्यु के कुछ समय बाद ही साये की तरह उनका साथ निभाने वाली उनकी पत्नी भानुमती का भी निधन हो गया और उनका अंतिम संस्कार भी जेनेवा में ही कर दिया गया। पर आज़ादी के बाद उनकी उपेक्षा का सिलसिला अनवरत जारी रहा और कांग्रेसी सरकारों ने उनकी स्मृति को अक्षुण बनाये रखने के लिए कोई प्रयास नहीं किया और ना ही श्याम जी और उनकी पत्नी की इच्छा के अनुरूप उनके अस्थिकलश को भारत लाने का कोई प्रयास किया।

       अनेकों प्रयासों के फलस्वरूप, स्वतंत्रता प्राप्ति के पूरे 51 वर्ष बाद उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया गया। भुज में उनकी स्मृति में क्रन्तिगुरु श्यामजी कृष्ण वर्मा कच्छ विश्वविद्यालय भी स्थापित किया गया है। उनकी मृत्यु के 73 वर्ष बाद एवं स्वतंत्रता के पूरे 55 वर्ष बाद 22 अगस्त 2003 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री एवं वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों से श्याम जी और भानुमती जी की अस्थियाँ भारत लायी गयीं। राज्य सरकार ने इन अवशेषों को उनके जन्मस्थान मांडवी तक ले जाने के लिए वीरांजल यात्रा निकाली और मार्ग में पड़ने वाले 17 जिलों के प्रशासन को इस यात्रा को सफल बनाने और इसमें जन भागीदारी कराने के लिए निर्देशित किया गया। मांडवी में ये अस्थियाँ श्याम जी की स्मृति में बने भव्य स्मारक (इसके बारे में नीचे प्रथम कमेन्ट में लिंक दिया गया है जिससे इस स्मारक के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है) में स्थापित की गयी और वर्षों बाद ही सही, माँ का उसके योग्य बेटे से मिलन हुआ| भारत माता के इस महान सपूत श्याम जी को कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

शहीद ठाकुर रोशन सिंह

शहीद ठाकुर रोशन सिंह

” alt=”” aria-hidden=”true” />       काकोरी काण्ड के शहीद क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जनपद में कस्बा फतेहगंज से 10 किलोमीटर दूर स्थित गाँव नबादा में 22 जनवरी 1892 को ठाकुर जंगी सिंह एवं कौशल्या देवी के पुत्र के रूप में हुआ था। पूरा परिवार आर्य समाज से अनुप्राणित था और महर्षि दयानंद में अगाध श्रद्धा रखता था और इसी ने ठाकुर रोशन सिंह में देश के प्रति समर्पण का भाव उत्पन्न किया। पाँच भाई-बहनों में सबसे बडे रोशन सिंह ने असहयोग आन्दोलन में उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर और बरेली जिले के ग्रामीण क्षेत्र में अद्भुत योगदान दिया था। यही नहीं, बरेली में हुए गोली-काण्ड में एक पुलिस वाले की रायफल छीनकर जबर्दस्त फायरिंग शुरू कर दी थी जिसके कारण हमलावर पुलिस को उल्टे पाँव भागना पडा। बाद में इन पर मुकदमा चला और सेण्ट्रल जेल बरेली में दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा काटनी पडी।

      गान्धी जी द्वारा सन 1922 में हुए चौरी चौरा काण्ड के विरोध स्वरूप असहयोग आन्दोलन वापस ले लिये जाने पर पूरे हिन्दुस्तान में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। इसी प्रकरण से उद्वेलित होकर ठाकुर साहब ने भी राजेन्द्र नाथ लाहिडी़, रामदुलारे त्रिवेदी व सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य आदि के साथ शाहजहाँपुर शहर के आर्य समाज पहुँच कर राम प्रसाद बिस्मिल से गम्भीर मन्त्रणा की जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित कोई बहुत बड़ा क्रान्तिकारी संगठन बनाने की रणनीति तय हुई। इसी रणनीति के तहत ठाकुर रोशनसिंह को संगठन में शामिल किया गया था क्योंकि इस दर्जे के पक्के निशानेबाज थे कि उडती हुई चिडिया को भी मार गिरा सकते थे।

       संगठन को सबसे अधिक आवश्यकता थी पैसे की और इसके लिए रास्ता तय हुआ डकैती का जिसे संगठन की ओर से नाम दिया गया-एक्शन। ऐक्शन के नाम पर पहली डकैती पीलीभीत जिले के एक गाँव बमरौली में 25 दिसम्बर 1924 को क्रिसमस के दिन अंग्रेजों के एक पिट्ठू व्यापारी बल्देव प्रसाद के यहाँ डाली गयी जिसमें 4000 रुपये और कुछ सोने-चाँदी के जेवरात क्रान्तिकारियों के हाथ लगे। परन्तु मोहनलाल पहलवान नाम का एक आदमी, जिसने डकैतों को ललकारा था, ठाकुर रोशन सिंह की रायफल से निकली एक ही गोली में ढेर हो गया और यही बाद में रोशन सिंह की फाँसी की सजा का कारण बना।

       इस संगठन ने अगला निशाना बनाया सरकारी खजाने को। 9 अगस्त 1925 को काकोरी स्टेशन के पास जो सरकारी खजाना लूटा गया था, वास्तव में उसमें ठाकुर रोशन सिंह शामिल नहीं थे, किन्तु इन्हीं की आयु (36 वर्ष) के केशव चक्रवर्ती (छद्म नाम), अवश्य शामिल थे जो बंगाल की अनुशीलन समिति के सदस्य थे, पर पकडे गए रोशन सिंह और चूँकि वो बमरौली डकैती में शामिल थे ही और इनके खिलाफ सारे साक्ष्य भी मिल गये थे अत: पुलिस ने सारी शक्ति ठाकुर रोशन सिंह को फाँसी की सजा दिलवाने में ही लगा दी और केशव चक्रवर्ती को खो़जने का कोई प्रयास ही नहीं किया। खानापूरी के बाद उन्हें फाँसी की सजा दे दी गयी।

       अपना अंत समय जान उन्होंने अपनी माँ के नाम एक भावुक पत्र लिखा जो आज भी इलाहबाद के संग्रहालय में देखा जा सकता है। ये मार्मिक पत्र ठाकुर रोशन सिंह की विचारधारा से तो अवगत कराता ही है, साथ ही अपने पीछे भरा पूरा परिवार अनाथ छोड़ कर जा रहे व्यक्ति के दुःख को भी व्यक्त करता है।
इलाहाबाद में नैनी स्थित मलाका जेल में फाँसी से पहली रात ठाकुर साहब कुछ घण्टे सोये फिर देर रात से ही ईश्वर-भजन करते रहे। प्रात:काल शौचादि से निवृत्त हो यथानियम स्नान ध्यान किया कुछ देर गीता-पाठ के बाद गीता हाथ में लेकर निर्विकार भाव से फाँसी घर की ओर चल दिये। फाँसी के फन्दे को चूमा फिर जोर से तीन वार वन्दे मातरम् का उद्घोष किया और वेद-मन्त्र – “ओ३म् विश्वानि देव सवितुर दुरितानि परासुव यद भद्रम तन्नासुव” – का जाप करते हुए 27 दिसम्बर 1927 को फन्दे से झूल गये।

       ठाकुर साहब की मृत्यु के बाद उनके परिवार को अपार कष्ट भोगने पड़े और उनका परिवार एक एक दाने का मोहताज हो गया। उनकी विवाह योग्य बेटी के विवाह में धनाभाव के कारण अडचने आने लगी और कोई भी हाथ उनकी सहायता के लिए आगे नहीं बढ़ा। ऐसे में प्रसिद्द पत्रकार और प्रताप के सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी ने उनके परिवार की सहायता की और उनकी बेटी का कन्यादान भी किया। हालांकि एक आतंकवादी (गाँधी जी की कांग्रेस के दृष्टिकोण से) के परिवार की सहायता करने के लिए विद्यार्थी जी को कांग्रेस के अपने सहयोगियों का कोपभाजन बनना पड़ा पर ये उनका बडप्पन ही था कि उन्होंने कभी भी क्रांतिकारियों को अलग नहीं माना और सदैव उनकी हरसंभव सहायता की।

     इलाहाबाद की नैनी स्थित मलाका जेल के फाँसी घर के सामने अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की आवक्ष प्रतिमा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके अप्रतिम योगदान का उल्लेख करते हुए लगायी गयी है। वर्तमान समय में इस स्थान पर अब एक मेडिकल कालेज स्थापित हो चुका है। मूर्ति के नीचे ठाकुर साहब की कही गयी ये पंक्तियाँ भी अंकित हैं –

जिन्दगी जिन्दा-दिली को जान ऐ रोशन!
वरना कितने ही यहाँ रोज फना होते हैं।

       शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि। (ये देश का दुर्भाग्य है कि शाहजहांपुर के थाना सिंधौली के पैना गांव में रहने वाली अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की विधवा प्रपौत्री इंदु सिंह, जो नरेगा मजदूर है और अपने नाबालिग बच्चों के पेट भरने के लिए खेतों में मजदूरी करती है, की कुछ समय पहले अराजक तत्वों ने पिटाई की और फायरिंग करते हुए झोपड़ी में आग लगा कर सारी गृहस्थी ख़ाक कर गए पर कई बार शिकायत करने पर भी अभियुक्तों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुयी। सच में ये देश अपने शहीदों का सम्मान करना नहीं जानता।)

विश्व को ऋषी दयानन्द की देन

विश्व को ऋषी दयानन्द की देन

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       महर्षि दयानन्द जी का प्रादुर्भाव विश्व इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। महर्षि का बोध पर्व उससे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण  घटना है। आज पूरे विश्व में मानव के अधिकारों तथा मानव की गरिमा का मीड़िया में बहुत शोर मचाया जाता है। ऋषि के प्रादुर्भाव से पूर्व मानव के अस्तित्व का धर्म व दर्शन में महत्व ही क्या था?

      बाइबिल की उत्पत्ति  की पुस्तक में आता है कि परमात्मा ने जीव, जन्तु, पक्षी, प्राणी पहले बनाये फिर उसने कहा, ”Let us make man in our image” अब नये बाइबिल में श     द बदल गये हैं। अब हमें पढ़ने को मिलता है, ”Let us make human beings in our image, in our likeness.” अर्थात् परमात्मा ने कहा हम ‘पुरुष को’ (अब मानवों को) अपनी आकृति जैसा और अपने सरीखा बनायें। यह कार्य छठे दिन किया गया। मानव की इसमें गरिमा क्या रही? वह जीव-जन्तुओं से पीछे बनाया गया और क्यों बनाया गया? इसका उत्तर  ही नहीं।

      इस्लाम में मनुष्य को बन्दः कहा जाता है और भक्ति को उपासना को बन्दगी कहा जाता है। बन्दः का अर्थ है दास और बन्दगी का अर्थ दासता, सेवा करना आदि। तो यहाँ भी मानव की गरिमा क्या हुई? अबादत का अर्थ भी बन्दगी-दासता ही है। हिन्दू तो जगत् को मिथ्या व ब्रह्म को-केवल ब्रह्म की सत्ता  को स्वीकार करते थे। कुछ आत्मा को अनादि भी मानते थे। सब कुछ अस्पष्ट था।

       महर्षि दयानन्द जी ने सिंह गर्जना करके कहा कि ईश्वर, जीव तथा प्रकृति तीनों अनादि हैं। तीनों की सत्ता है। जीव की कर्म करने की स्वतन्त्रता का घोष करके ऋषि मानव की गरिमा पहली बार इस युग में संसार को बताई।

      जहाँ कर्ता  है, वहीं क्रिया होगी और जहाँ क्रिया है वहाँ कर्ता को मानना पड़ता है। सूर्य, चन्द्र, तारे, ग्रह, उपग्रह सब गति करते हैं। गति देने वाले परमात्मा की सत्ता  तो स्वतः सिद्ध हो गई। उपादान कारण के बिना आज भी कुछ बनते नहीं देखा गया सो जगत् के उपादान कारण प्रकृति का अनादित्व भी सिद्ध हो गया। विज्ञान ऐसा ही मानता है। यह महर्षि दयानन्द की विश्व को बहुत बड़ी देन है।

        मनुष्य की उत्पत्ति  की बात चली तो यह भी जान लें कि बाइबिल में आता है I give you every seed bearing plant on the face of the whole earch and every tree that has fruit with seed in it. They will be yours for fodd.  फिर लिखा है,  Trees that were pleasing to the eyes and good for food.

       अर्थात् दो बार ईश्वर ने बाइबिल के अनुसार शाकाहार को मानव का पवित्र भोजन बताया व बनाया। यही वेदादेश है परन्तु ईसाई व मुसलमान ही मांसाहार व पशुहिंसा में अग्रणी हैं। ऋषि ने पेड़, पौधों, जलचर, नभचर व गाय आदि सब प्राणियों की मानव कल्याण व विश्व शान्ति के लिये सुरक्षा को आवश्यक बताया।

      ऋषि बोध पर्व के दिन ऋषि के जन्म-जन्मान्तरों के संस्कार जाग उठे। उन्हें पता चला कि ईश्वर वह नहीं जिसे हम बनाते हैं। ईश्वर वह है जो सृष्टि का कर्ता  है। ईश्वर खाता नहीं, वह खिलाता है। वह भोक्ता नहीं भोग देता है। वह द्रष्टा है। कर्म फल का भोग करने वाला जीव है। सर सैयद अहमद ने लिखा कि शिवरात्रि के दिन दयानन्द जी को जो ज्ञान हुआ क्या वह इलहाम (ईश्वरीय ज्ञान) नहीं था? आत्मा को प्रभु की आवाज सुनाई न दे तो दोष किसका? ऋषि ने स्वयं लिखा है कि आत्मा में नित्य गूञ्जने वाली आपकी आवाज को प्रभु हम सुनते रहें। मन में भय, लज्जा और शङ्का जो दुष्कर्म, पाप करते समय मनुष्य के मन में उत्पन्न होती है, ऋषि ने इसे ईश्वर की आवाज बताया है। पश्चिम के विद्वान् ने भी इसी बात को इन शब्दों  में कहा है, there is a candle of the lord within us अर्थात् हमारे भीतर प्रभु की एक बत्ती  प्रकाश करती रहती है।

        महर्षि दयानन्द अपनी काया से बलवान् थे, वे अपने मन व मस्तिष्क से बलवान् थे और अपने आत्मा से भी महान् व बलवान् थे। कोलकाता विश्वविद्यालय के एक पूर्व दार्शनिक विद्वान् डॉ. महेन्द्रनाथ जी ने अत्यन्त मार्मिक शब्दों  में लिखा है-  Strong is the epithet that can be applied in truth to Dayanand, strong in intellect strong in adventures strong in heart and strong and organizing forces. And his teachings through life and writings cab summed up in one word STRENGTH  अर्थात् बलवान् एक ऐसी उपाधि है जो दयानन्द पर ठीक-ठीक चरितार्थ होती है, विचारों में- मस्तिष्क से बलवान्, साहसिक कार्य के कारण बलवान्, हृदय से बलवान् तथा शक्तियों के गठन करने में बलवान् और उसके जीवन एवं साहित्य द्वारा उसकी शिक्षाओं को एक शब्द  में बताना है तो वह है ‘शक्ति’

      इससे अधिक हम ऋषि की महानता पर क्या कहें? ऋषि ने अपने सन्देश, उपदेश व जीवन द्वारा मानव समाज को प्रकाश दिया और मृतकों में नवजीवन का संचार किया। उनके बोध पर्व पर हम उन्हें शत बार नमन करते हैं।

शिवराम हरि राजगुरु

शिवराम हरि राजगुरु

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     24 अगस्त भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी शिवराम हरि राजगुरु का भी जन्मदिवस है जिन्होनें भारतमाता को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए भगत सिंह और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को हँसते हँसते फाँसी का फंदा चूम लिया था| राजगुरु का जन्म भाद्रपद के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी सम्वत् 1965 (विक्रमी) तदनुसार 24 अगस्त सन् 1908 में पुणे जिला के खेडा गाँव में हुआ था।

       6 वर्ष की आयु में पिता का निधन हो जाने से इनका पालन पोषण इनकी माता और बड़े भैया ने किया | बहुत छोटी उम्र में ही ये वाराणसी विद्याध्ययन करने एवं संस्कृत सीखने आ गये थे। इन्होंने हिन्दू धर्म-ग्रंन्थों तथा वेदो का अध्ययन तो किया ही, साथ ही लघु सिद्धान्त कौमुदी जैसा क्लिष्ट ग्रन्थ बहुत कम आयु में कण्ठस्थ कर लिया था। इन्हें कसरत (व्यायाम) का बेहद शौक था और छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध-शैली के बडे प्रशंसक थे।

       वाराणसी में विद्याध्ययन करते हुए राजगुरु का सम्पर्क अनेक क्रान्तिकारियों से हुआ । चन्द्रशेखर आजाद से ये इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से तत्काल जुड़ गये। आजाद की पार्टी के अन्दर इन्हें रघुनाथ के छद्म-नाम से जाना जाता था; राजगुरु के नाम से नहीं। पण्डित चन्द्रशेखर आज़ाद, सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि क्रान्तिकारी इनके अभिन्न मित्र थे।

       राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज भी थे। साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव का पूरा साथ दिया था जबकि चन्द्रशेखर आज़ाद ने छाया की भाँति इन तीनों को सामरिक सुरक्षा प्रदान की थी। कार्यवाही के पश्चात भगत सिंह अंग्रेजी साहब बन कर, राजगुरु उनके सेवक बन कर और चंद्रशेखर आजाद सन्यासी बनकर सुरक्षित पुलिस की दृष्टि से बच कर निकल गए | समय ने करवट बदली और भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त के असेम्बली में बम फोड़ने और स्वयं को गिरफ्तार करवाने के पश्चात चंद्रशेखर आजाद को छोड़ कर सुखदेव सहित दल के सभी सदस्य गिरफ्तार कर लिए गए | केवल राजगुरु ही इससे बचे रहे जो आजाद के कहने पर पुलिस से बचने के लिए कुछ दिनों के लिए महराष्ट्र चले गए किन्तु लापरवाही के कारण छुटपुट संघर्ष के बाद पकड़ लिए गए |

       अंग्रेजों ने चंद्रशेखर आजाद का पता जानने के लिए राजगुरु पर अनेकों अमानवीय अत्त्याचार किये किन्तु कोई भी कष्ट उन्हें विचलित नहीं कर सका, लेशमात्र भी नहीं| सांडर्स वध के अपराध में राजगुरु ,सुखदेव और भगत सिंह को मृत्युदंड दिया गया और 23 मार्च 1931 को राजगुरु ने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फाँसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में हमेशा के साथ दर्ज करा दिया। उनकी जयंती पर उनको शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

शहीद-ए-आजम भगतसिंह

शहीद-ए-आजम भगतसिंह

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       सशस्त्र क्रान्ति की बात हो और उसमें शहीद-ए-आजम भगतसिंह का नाम ना आये, ये असंभव है क्योंकि केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास में भी शायद ही ऐसा कोई उदाहरण हो, जहाँ मात्र तेईस वर्ष पाँच माह और सत्ताईस दिन की अल्पायु में ही कोई युवा क्रान्तिपथ के राही के रूप में अपना एक अलग ही स्थान बना गया हो। शहीद-ए-आजम भगतसिंह का जन्म पंजाब के जालंधर जिले की नवाँनगर तहसील के बंगा थाने के एक छोटे से गाँव खटकरकलां में अश्विन शुक्ल त्रयोदशी संवत् 1964 विक्रमी यानि 28 सितम्बर 1907 को दिन शनिवार प्रात: नौ बजे सरदार किशनसिंह एवं उनकी पत्नी विद्यावती के द्वितीय पुत्र के रूप में हुआ था। वीरता और मातृभूमि के लिए समर्पण उन्हें विरासत में मिला था।

         जब महाराज रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद पंजाब पर अंग्रेजों की गिद्ध दृष्टि जमने लगी थी तो सरदार भगतसिंह के प्रपितामह सरदार फ़तेहसिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने के की शपथ लेते हुए स्वयं को पूरी तरह अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में झोंक दिया था। बाद में 1857 की क्रान्ति के समय कई अन्य प्रमुख व्यक्तियों की भाँति सरदार फ़तेहसिंह को भी अंग्रेजों की सहायता के लिए ये कहते हुए आमंत्रित किया गया कि इसके ऐवज में उन्हें अंग्रेज-सिख युद्ध में भाग लेने के कारण जब्त की गयी सारी जमींदारी वापस मिल जाएगी। पर अपने परिवार की परम्परा के अनुरूप सरदार फ़तेहसिंह ने बिना एक क्षण लगाये अपने ही देशवासियों के विरुद्ध अंग्रेजों की सहायता करने से साफ़ इनकार कर दिया। इस सबने सरदार फ़तेहसिंह में जो विद्रोही घृणा जगा दी थी, वह पारिवारिक धरोहर के रूप में उनके पुत्र सरदार अर्जुनसिंह को मिली। यह धरोहर ही थी जो परिवर्तन की प्यास बनकर उन्हें सामाजिक क्रान्ति के यज्ञ-मण्डप में ले आई।

         उस दौर में अधिकांश भारतीय सोचते थे कि हम कमजोर हैं, अलग-अलग हैं, निहत्थे हैं। इसके विरुद्ध अंग्रेज शक्तिशाली हैं; संगठित हैं, इसलिए हम उनका कुछ नहीं कर सकते, कुछ बिगाड़ नहीं सकते। कोई देश गिरकर उठता है स्वदेशाभिमान और जातीय गर्व के प्रकाश में पनपे आत्मगौरव से, पर हीनता की उस घनी आंधी में स्वदेशाभिमान और जातीय गौरव के दीपक कहां जल सकते थे? ऋषि दयानन्द के आत्मतेज की बलिहारी कि उन्होंने नई पृष्ठभूमि की खोज की और अतीत गौरव की उपजाऊ भूमि में स्वाभिमान और स्वदेशाभिमान के वृक्ष रोपे। शीघ्र ही इन पर जागरण और उद्बोधन के पुष्प महके और देश विचार-क्रान्ति से उद्बुद्ध हो उठा।

        सरदार अर्जुनसिंह ने ऋषि दयानन्द को देखा तो आकर्षित हुए, उनका भाषण सुना तो प्रभावित हुए और बातचीत की तो पूरी तरह उनके हो गए। सरदार अर्जुनसिंह इस विशाल देश के पहले सिख नागरिक थे, जो इस विचार क्रान्ति में भागीदार हुए। उनमें धुन थी, देशभक्ति की, आस्था की, कर्मठता थी; वे शीघ्र ही अपने क्षेत्र में इस विचार क्रान्ति का यज्ञ-मण्डप बन गए। सरदार अर्जुनसिंह के घर में तीन पुत्र जन्मे—सरदार किशनसिंह, सरदार अजीतसिंह, सरदार स्वर्णसिंह और तीनों ही ने देश के लिए किये गए संघर्षों में सर्वस्व समर्पित कर दिया।

        ये कहना अतिश्योक्ति ना होगी कि महर्षि दयानंद की शिक्षाओं से प्रभावित होकर सरदार अर्जुनसिंह ने साहस कर अन्धविश्वास और परम्परावाद की जड़ता से बन्द अपने घर के द्वार खोल दिए और ऊबड़-खाबड़ मार्ग को साफ कर अपने आंगन में यज्ञवेदी बना दी। सरदार किशनसिंह ने उस द्वार के आंगन तक के क्षेत्र को लीप-पोत कर उस यज्ञवेदी पर एक विशाल हवन-कुण्ड प्रतिष्ठित कर दिया। सरदार अजीतसिंह ने उस हवन-कुण्ड में समधाएं सजा कर एक दहकता अंगारा रख दिया। सरदार स्वर्णसिंह ने उसे झपटकर लपट में बदल दिया। बस फिर क्या था, लपटें उठीं और खूब उठीं। सरदार अजीतसिंह उन लपटों के लिए ईंधन की तलाश में दूर चले गए और जल्दी लौट न सके। वे लपटें बुझ जातीं, पर सरदार किशनसिंह उनके अंगरक्षक बने रहे, उन्हें बचाए रहे। भगतसिंह ने इधर-उधर ईंधन की तलाश न कर अपने जीवन को ही ईंधन बना झोंका और लपटों को पूरी तरह उभारकर इस तरह उछाल दिया कि वे देश-भर में फैल गईं, देश का हर आंगन एक हवन-कुण्ड बन गया।

         भगतसिंह की प्रारंभिक शिक्षा गाँव के प्राइमरी स्कूल में हुई। बाद में उनके माता-पिता लाहौर चले गए और वहाँ भगतसिंह का नाम डी.ए.वी. कॉलेज में लिखा दिया गया, जबकि ज़्यादातर सिख खालसा स्कूलों में ही पढ़ते थे। भगतसिंह को कॉलेज के माहौल तथा घर के वातावरण ने वैचारिक रूप से परिपक्व बना दिया और धीरे-धीरे वे क्रांति की दहलीज पर अपनी पेंग बढ़ाने लगे। 13 अप्रैल सन् 1919 को जालियाँवाला बाग़, अमृतसर में जो कुछ हुआ उससे बारह वर्षीय भगतसिंह का मन उद्वेलित हो उठा। शायद यही पहला अवसर था जब भगतसिंह ने निश्चय कर लिया था कि उन्हें आज़ादी की लड़ाई में कूदना है।

        1921 में जब वे नौंवी कक्षा में पढ़ रहे थे तो उन्हें लगा कि अब वक़्त आ गया है कि अंग्रेजों के अत्याचारों का उत्तर पुरज़ोर तरीक़े से दिया जाए। उन्होंने हिम्मत तो कर ली पर अपने पिता से कहने का साहस नहीं जुटा पाए। परंतु जब उनके पिता को पता चला कि भगतसिंह आज़ादी की लड़ाई में शामिल होना चाहते हैं तो उन्होंने बड़े उत्साह से इजाज़त दे दी। बस, यहीं से भगतसिंह का क्रांति का सफ़र आरंभ हुआ। भगतसिंह अपने आसपास होने वाले घटनाक्रम से जुड़ने लगे जिनमें विदेशी वस्त्रों तथा चीजों का बहिष्कार तथा स्वदेशी का प्रचार मुख्य था। इसी दौरान भगतसिंह ने एफ.ए. पास किया और बी.ए. में दाख़िला लाहौर के प्रसिध्द नेशनल कॉलेज में ले लिया। नेशनल कॉलेज उस समय भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष करने वालों के लिए कार्यशाला के रूप में जाना जाता था। यहाँ से भगतसिंह भी आग में तप कर खरे सोने की भाँति निकले।

         इस उम्र में भगत सिंह अपने चाचाओं की क्रान्तिकारी किताबें पढ़ कर सोचते थे कि इनका रास्ता सही है कि नहीं ? गांधी जी का असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गान्धी जी के अहिंसात्मक तरीकों और क्रान्तिकारियों के हिंसक आन्दोलन में से अपने लिये रास्ता चुनने लगे। गान्धी जी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने के कारण देश के तमाम नवयुवकों की भाँति उनमें भी रोष हुआ और अन्ततः उन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिये क्रान्ति का मार्ग अपनाना अनुचित नहीं समझा। उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। कुछ समय बाद भगत सिंह अमर शहीद करतार सिंह सराभा के संपर्क में आये जिन्होंने भगत सिंह को क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने की सलाह दी और साथ ही वीर सावरकर की किताब 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पढने के लिए दी| भगत सिंह इस किताब से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने इस किताब के बाकी संस्करण भी छापने के लिए सहायता प्रदान की|

       वर्ष 1923 में भगतसिंह के जीवन में एक तूफ़ान आया। उन्होंने अपना घर छोड़कर आज़ादी के लिए संघर्ष करने हेतु कानपुर जाने का फ़ैसला कर लिया। इस कठिन फ़ैसले के पीछे भी एक विशेष कारण था। उनकी दादी ने भगतसिंह को विवाह के बंधन में जकड़ने के लिए पिता किशनसिंह को राज़ी कर लिया था और उनकी सगाई भी लहौर के एक धनी व्यक्ति की बेटी से तय हो गई थी। भगतसिंह उन दिनों प्रसिध्द क्रान्तिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल के सान्निध्य में थे। जब सान्याल दादा से भगतसिंह ने अपनी सगाई की बात बताई तो उन्होंने भगतसिंह से कहा कि यदि तुम्हें विवाह के बंधन में बंधना है तो बेशक़ सगाई करो, अन्यथा अपने लक्ष्य की ओर बढ़ो। जून 1924 में भगत सिंह वीर सावरकर से येरवडा जेल में मिले और क्रांति की पहली गुरुशिक्षा ग्रहण की, यही से भगत सिंह के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया|

         वे कानपुर आ गए, जहाँ उनकी मुलाक़ात बटुकेश्वर दत्त, योगेशचन्द्र चटर्जी, अजय घोष तथा गणेशशंकर विद्यार्थी से हुई। गणेशशंकर विद्यार्थी ने अपने पत्र ‘प्रताप’ के संपादन विभाग से जोड़कर भगतसिंह के खाने-पीने की मुश्क़िल भी आसान कर दी। प्रताप में भगतसिंह के लेख बलवन्त सिंह के नाम से छपते थे। भगतसिंह ने कानपुर के अलावा दिल्ली में भी वहाँ से छपने वाले पत्र ‘दैनिक अर्जुन’ के संपादकीय विभाग में काम किया और अपने क्रांतिकारी विचारों को रखने के लिए बलवंत सिंह के नाम से ही लेख लिखते रहे। कुछ दिन दिल्ली में रहकर भगतसिंह लाहौर लौट आए और अपने साथ कानपुर और दिल्ली की क्रान्ति की तपिश भी लेते आए।

        यहाँ आकर उन्होंने ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना की और प्रथम जनरल सेक्रेटरी बने। अब तक भगतसिंह जो भी कार्य कर रहे थे उनसे उन्हें लेखक, विचारक तथा चिन्तक के रूप में पारिभाषित किया जा रहा था। उसी दौरान काकोरी काण्ड में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ सहित 4 क्रान्तिकारियों को फाँसी व 16 अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि पण्डित चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड गये और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। इस संगठन का उद्देश्य सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना और सशस्त्र क्रान्ति के जरिये देश को दासता के बंधनों से मुक्त कराना था।

       अक्टूबर 1928 को भारत में साइमन कमीशन आया, जिसका विरोध पूरे देश में होना था। लाहौर में लाला लाजपतराय के नेतृत्व में विरोध जुलूस निकला। पुलिस अधीक्षक स्कॉट के कहने पर सांडर्स ने लाठियाँ चलाईं और लालाजी बुरी तरह घायल हो गए और 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई। भगतसिंह और साथियों ने इसे देश का अपमान माना और सांडर्स को गोली मारकर लालाजी की मौत का बदला ले लिया। रातों-रात भगतसिंह अंग्रेजों के लिए चुनौती बन गए। चूँकि सांडर्स को मारते समय एक सिख नवयुवक को अंग्रेजों ने देख लिया था, अत: तय किया गया कि भगतसिंह को लाहौर में ख़तरा है, इसलिए उन्हें यहाँ से कलकत्ता भेज दिया जाए। उसी समय भगतसिंह को अपने बाल कटवाने पड़े और उनकी फेल्ट कैप वाली नई छवि लोगों के सामने आई।

       भगतसिंह कलकत्ता पहुँच तो गए परंतु उनका मन दिल्ली के आसपास होने वाली गतिविधियों पर लगा रहता था। उनके मन में यही तड़प थी कि कुछ ऐसा काम किया जाए जिससे पूरे राष्ट्र के नौजवान प्रभावित होकर क्रान्ति की राह में कूद पड़ें। ठीक उसी समय वायसराय भारत के दौरे पर आने वाले थे और असेंबली में जनसुरक्षा बिल तथा औद्योगिक विवाद बिल भी पेश होने वाले थे, जिसके लिए वायसराय ने असेंबली में आने का न्यौता स्वीकार कर लिया था।

       भगतसिंह, राजगुरु, आज़ाद तथा जयदेव कपूर ने एक कार्य-योजना बनाई कि केन्द्रीय असेंबली में बम फेंका जाए, जो सिर्फ़ बहरों को जगाने के मक़सद से हो न कि किसी को आहत करने के लिए। भगतसिंह को छोड़कर सभी साथ चाहते थे कि बम फेंककर भाग लिया जाए, लेकिन भगतसिंह की सोच ये थी कि यदि इस सोये हुए राष्ट्र को जागृत करना है तो बम फेंकने के बाद उस व्यक्ति को अपने-आप को गिरफ़्तार कराना चाहिए, ताकि केस चलने पर अदालतों के ज़रिए पूरे राष्ट्र को जागृत किया जा सके।

        8 अप्रैल 1929 को जयदेव कपूर, भगतसिंह और बटुकेशवर दत्त को केन्द्रीय असेंबली में बैठा आए और जैसे ही पहला बिल पेश हुआ भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंकना शुरू किया और इंक़लाब ज़िन्दाबाद, साम्राज्यवाद का नाश हो के नारे लगाने शुरू कर दिए। वे चाहते तो भाग सकते थे क्योंकि पूरा अंग्रेजी प्रशासन सकते में आ गया था परन्तु अपनी नीति के अनुसार दोनों ने गिरफ़्तारी दी। उनके ऐसा करने से वास्तव में तूफ़ान आ गया और भगतसिंह एक नायक बन गए। भगतसिंह को अन्य साथियों के साथ गिरफ़्तार कर लिया गया और लाहौर जेल भेज दिया गया। उन पर सांडर्स-वध तथा असेंबली बम कांड के लिए मुक़द्दमे दायर किए गए।

       अंग्रेज समझते थे कि उन्होंने भगतसिंह पर मुक़द्दमा चलाकर भारत में चल रहे क्रांतिकारी आन्दोलन को दबा दिया है, पर भगतसिंह अपने मक़सद में क़ामयाब होते जा रहे थे। जो काम वे लाखों रुपये ख़र्च करके नहीं कर सकते थे वही विचार उन्होंने अदालतों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचा दिया था। अब पूरा देश क्रांति की आग में धधकने लगा था। भगतसिंह अपनी पैरवी के ज़रिए भारतवर्ष में अपना संदेश पहुँचा रहे थे। जेल में भगत सिंह ने करीब 2 साल रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रान्तिकारी विचार व्यक्त करते रहे। जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। उनके उस दौरान लिखे गये लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ?” जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने 64 दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।

        अन्त में अंग्रेजों ने भगतसिंह, राजगुरु तथा सुखदेव को फाँसी की सज़ा सुनाई और बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास दिया। इन लोगों की फाँसी का दिन 24 मार्च 1931 तय हुआ था लेकिन अंग्रेज उस समय भारत में चल रहे आंदोलनों तथा क्रान्तिकारियों की गतिविधियों से इतना डर गए थे कि इन तीनों को 23 मार्च 1931 की शाम को ही लाहौर में फाँसी दे दी गई। फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की नहीं बल्कि राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ की जीवनी पढ़ रहे थे जो सिन्ध (वर्तमान पाकिस्तान का एक सूबा) के एक प्रकाशक भजन लाल बुकसेलर ने आर्ट प्रेस, सिन्ध से छापी थी। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- “ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।”

         फाँसी के बाद अंग्रेजों ने इन तीनों के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और शवों को बोरियों में भरकर लाहौर से दूर सतलुज नदी के किनारे हुसैनीवाला (फिरोज़पुर) में लाकर मिट्टी का तेल डालकर जला दिया। उन्हें इस बात का भय था कि शव देखकर लोग आपे से बाहर न हो जाएँ। हुआ भी वही। दूसरे दिन जब लोगों को पता चला कि इन तीनों को फाँसी दे दी गई है तो भारत का कोई शहर, कोई क़स्बा नहीं बचा जहाँ जुलूस न निकले हों। आज़ादी के बाद हुसैनीवाला के उसी स्थान पर जहाँ भगतसिंह का दाह-संस्कार किया गया था, सरकार ने शहीद स्मारक बनवा दिया। वहाँ पर भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव की काँस्य प्रतिमाएँ तथा तीनों महावीरों की समाधि भी बनी है और उनकी वीरगाथाओं की याद दिलाती है।

        भगतसिंह को फांसी दे देने भर से भगतसिंह की आवाज बंद ना होकर और बुलंद हो गयी क्योंकि अब हर युवा के मन में भगतसिंह बनने की इच्छा पैदा हो गयी। कवि राजगोपाल सिंह के शब्दों में—–

उनका मकसद था 
आवाज को दबाना 
अग्नि को बुझाना 
सुगंध को कैद करना। 
तुम्हारा मकसद था 
आवाज को बुलंद करना 
अग्नि को हवा देना 
सुगंध को विस्तार देना।
वे कायर थे 
उन्होंने तुम्हें असमय मारा 
तुम्हारी राख को ठंडा होने से पहले ही 
प्रवाहित कर दिया जल में। 
जल ने 
अग्नि को और भड़का दिया 
तुम्हारी आवाज शंखनाद में तब्दील हो गयी 
कोटि कोटि जनता की प्राणवायु हो गए तुम।

        जेल के दिनों में उनके लिखे खतों व लेखों से उनके विचारों का अन्दाजा लगता है। उन्होंने भारतीय समाज में लिपि (पंजाबी की गुरुमुखी व शाहमुखी तथा हिन्दी और अरबी एवम् उर्दू के सन्दर्भ में विशेष रूप से), जाति और धर्म के कारण आयी दूरियों पर दुःख व्यक्त किया था। उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग पर किसी भारतीय के प्रहार को भी उसी सख्ती से सोचा जितना कि किसी अंग्रेज के द्वारा किये गये अत्याचार को| भगत सिंह को हिन्दी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भी आती थी जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी । उनका विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये । इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था।

       पं० राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ ने अपनी आत्मकथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे, भगत सिंह ने उनका अक्षरश: पालन किया। उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाये तथा फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये। फाँसी के पहले 3 मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था –

उसे यह फ़िक्र है हरदम,
नया तर्जे-जफ़ा (अन्याय) क्या है?
हमें यह शौक देखें,
सितम की इंतहा क्या है?
दहर (दुनिया) से क्यों खफ़ा रहे,
चर्ख (आसमान) का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू (दुश्मन) सही,
आओ मुकाबला करें।
कोई दम का मेहमान हूँ,
ए-अहले-महफ़िल,
चरागे सहर हूँ,
बुझा चाहता हूँ।
मेरी हवाओं में रहेगी,
ख़यालों की बिजली,
यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी,
रहे रहे न रहे।

         इन जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। चन्द्रशेखर आजाद से पहली मुलाकात के समय जलती हुई मोमबती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खायी थी कि उनकी जिन्दगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी वह कसम पूरी कर दिखायी।

         भगत सिंह और उनके मित्रों की शहादत को आज ह‍ी नही तत्‍कालीन मीडिया और युवाओं 
ने भी गांधीजी के अंग्रेज परस्‍ती गांधीवाद पर देशभक्तों का तमाचा बताया था। दक्षिण भारत में पेरियार ने उनके लेख मैं नास्तिक क्यों हूँ पर अपने साप्ताहिक पत्र कुडई आरसु में के 22-29 मार्च, 1931 के अंक में तमिल में संपादकीय लिखा । इसमें भगतसिंह की प्रशंसा की गई थी तथा उनकी शहादत को गांधीवाद के पर विजय के रूप में देखा गया था । तत्‍कालीन गांधीगीरी वाली मानसिकता आज के भारत सरकार में भी विद्यमान है, और आज भी कांग्रेस का हर संभव प्रयास यही रहता है कि नेहरु-गाँधी खानदान को छोड़कर देश किसी और हुतात्मा से परिचित न हो जाये। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद हमें ये सुनने को मिलता है कि भगतसिंह सरकारी तौर पर शहीद की श्रेणी में नहीं हैं। इनता तो तय है कि अंग्रेजों द्वारा बनाई गई कांग्रेस और अंग्रेजों में कोई फर्क नही है। न वह सेनानियों का सम्‍मान करते थे और न ही काग्रेस|कितना कड़वा सच बयान किया है कवि ने इन पंक्तियों में—

भगतसिंह ! इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सज़ा मिलेगी फाँसी की !
यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे–
बम्ब सम्ब की छोड़ो, भाषण दिया कि पकड़े जाओगे !
निकला है कानून नया, चुटकी बजते बँध जाओगे,
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे,
काँग्रेस का हुक्म; ज़रूरत क्या वारंट तलाशी की !
मत समझो, पूजे जाओगे क्योंकि लड़े थे दुश्मन से,
रुत ऐसी है आँख लड़ी है अब दिल्ली की लंदन से,
कामनवैल्थ कुटुम्ब देश को खींच रहा है मंतर से–
प्रेम विभोर हुए नेतागण, नीरा बरसी अंबर से,
भोगी हुए वियोगी, दुनिया बदल गई बनवासी की !
गढ़वाली जिसने अँग्रेज़ी शासन से विद्रोह किया,
महाक्रान्ति के दूत जिन्होंने नहीं जान का मोह किया,
अब भी जेलों में सड़ते हैं, न्यू-माडल आज़ादी है,
बैठ गए हैं काले, पर गोरे ज़ुल्मों की गादी है,
वही रीति है, वही नीति है, गोरे सत्यानाशी की !
सत्य अहिंसा का शासन है, राम-राज्य फिर आया है,
भेड़-भेड़िए एक घाट हैं, सब ईश्वर की माया है !
दुश्मन ही जब अपना, टीपू जैसों का क्या करना है ?
शान्ति सुरक्षा की ख़ातिर हर हिम्मतवर से डरना है !
पहनेगी हथकड़ी भवानी रानी लक्ष्मी झाँसी की !

—-शैलेन्द्र

          लेकिन सुखद यह है कि देश की नयी पीढ़ी लगातार भगतसिंह से जुड़ रही है और इस बात को समझने लगी है कि किस तरह से उसे आज़ादी के महानायकों से दूर रखा गया और कुछ गिने चुने लोगों को ही आज़ादी की लड़ाई का नायक बना कर उसके सामने पेश किया गया। भगतसिंह तथा उनके साथियों को फांसी दिए जाने पर लाहौर के उर्दू दैनिक समाचारपत्र पयाम ने लिखा था —पूरा हिन्दुस्तान इन तीनों शहीदों को पूरे ब्रितानिया से ऊंचा समझता है । अगर हम हजारों-लाखों अंग्रेजों को मार भी गिराएं, तो भी हम पूरा बदला नहीं चुका सकते । यह बदला तभी पूरा होगा, अगर तुम हिन्दुस्तान को आजाद करा लो, तभी ब्रितानिया की शान मिट्टी में मिलेगी। ओ! भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव, अंग्रेज खुश हैं कि उन्होंने तुम्हारा खून कर दिया। लेकिन वो गलती पर हैं। उन्होंने तुम्हारा खून नहीं किया, उन्होंने अपने ही भविष्य में छुरा घोंपा है। तुम जिन्दा हो और हमेशा जिन्दा रहोगे। सच में भगतसिंह और अन्य हुतात्मा हमेशा जीवित रहेंगे, हमारे हृदयों में, हमारे विचारों में। कोटि कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि आज़ादी की लड़ाई के इस महानायक को।

महर्षि दयानन्द दर्शन का विश्वव्यापी प्रभाव

महर्षि दयानन्द दर्शन का विश्वव्यापी प्रभाव

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       महर्षि दयानन्द दर्शन का विश्वव्यापी प्रभावः– सस्ता साहित्य मण्डल ने ‘हमारी परम्परा’ नाम से एक ग्रन्थ का प्रकाशन किया है। इसके संकलनकर्ता अथवा सम्पादक प्रसिद्ध गाँधीवादी श्री वियोगीहरि जी ने आर्यसमाज विषय पर भी एक उ      ाम लेख देने की उदारता दिखाई है। उनसे ऐसी ही आशा थी। वे आर्यसमाज द्वेषी नहीं थे। इन पंक्तियों के लेखक से भी उनका बड़ा स्नेह था। प्रसंगवश यहाँ बता दें कि आप स्वामी सत्यप्रकाश जी का बहुत सम्मान करते थे।

       इस ग्रन्थ में छपे आर्यसमाज विषयक लेख के लेखक आर्य पुरुष यशस्वी हिन्दी साहित्यकार स्वर्गीय श्री विष्णु प्रभाकर जी हैं। आपने इसमें एक भ्रमोत्पादक बात लिखी है जिसका निराकरण करना हम अपना पुनीत व आवश्यक कर्     ाव्य मानते हैं। आपने लिखा है कि आर्यसमाज के समाज सुधार सम्बन्धी कार्यों का जितना प्रभाव पड़ा है वैसा प्रभाव आर्यसमाज के दर्शन का नहीं पड़ा। हम इस भ्रमोत्पादक कथन के लिए मान्य विष्णु प्रभाकर जी को कतई दोष नहीं देते। उनका कथन इस दृष्टि से यथार्थ है कि ऋषि-दर्शन का जितना प्रचार होना चाहिए था उतना प्रचार इस समय नहीं हो रहा है। एक भावनाशील आर्य होने के नाते आपने जो अनुभव किया सो ठीक है। तथ्य यही है कि आर्यसमाज के नेताओं की तीन पीढ़ियों ने असह्य दुःख कष्ट झेलकर, जानें वारकर, रक्तरंजित इतिहास रचकर ऋषि दर्शन की संसार पर अमिट व गहरी छाप लगाई। चौथी पीढ़ी आन्तरिक शत्रु की  घेराबन्दी में फंसकर हतोत्साहित ही नहीं हुई पूर्णतया पराजित व असहाय हो गई।

      पराभव कैसे हुआ?ः- यह घेराबन्दी संस्थावादियों या स्कूल पन्थियों ने की। आर्यसमाज संस्थावाद के कीच-बीच फंसकर शिक्षा व्यापार मण्डल का रूप धारण कर गया। वैदिक दर्शन का प्रचार तो कुछ व्यक्ति तथा कुछ ही संस्थायें कर रही हैं। यहाँ पहली तीन पीढ़ी के महापुरुषों के कुछ नाम देकर उनके प्रति कृतज्ञता का प्रकाश करना हमारा कर्     ाव्य बनता है।

       तीन पीढ़ियों के आग्नेय नेताः पं. गुरुद     ा विद्यार्थी और वीर शिरोमणि पं. लेखराम प्रथम पीढ़ी की दो विभूतियाँ थीं।

       श्री स्वामी नित्यानन्द महाराज, स्वामी श्रद्धानन्द महाराज, स्वामी दर्शनानन्द महाराज, स्वामी योगेन्द्रपाल, पं. गणपति शर्मा, आचार्य रामदेव दूसरी पीढ़ी के तपस्वी सर्वस्व त्यागी मिशनरी नेता थे।

    महात्मा नारायण स्वामी, स्वामी स्वतन्त्रानन्द, पं. धर्मभिक्षु, पं. रामचन्द्र देहलवी, भूमण्डल प्रचारक मेहता जैमिनि, पं. गंगाप्रसाद द्वय, आचार्य चमूपति, वीर शिरोमणि श्याम भाई, क्रान्तिवीर नरेन्द्र, कर्मवीर लक्ष्मण आर्योपदेशक, कुँवर सुखलाल, स्वामी अभेदानन्द, पं. अयोध्याप्रसाद तीसरी पीढ़ी के समर्पित नेता थे।

      चौथी पीढ़ी के नेता जोड़-तोड़ वादी कुर्सी भक्त, चुनाव तनाव के चक्करों में उलझकर मिशन को गौण बनाने का कलङ्क लेकर संसार से गये। ये लोग शिक्षा व्यापार मण्डल के सुनियोजित संगठन का सामना न कर पाये। गुरुकुल भी निष्प्राण हो गये। बड़ों से सम्पदा तो अपार मिल गई परन्तु न तो श्रीमद्दयानन्द उपदेशक विद्यालय लाहौर का स्थान कोई संस्था ले पाई और न स्वामी   स्वतन्त्रानन्द के रिक्त स्थान की पूर्ति ही समाज कर पाया।

       भूमि के गुरुत्व आकर्षण का नियमः– तथापि यह मानना पड़ेगा कि पहली तीन पीढ़ियों ने इतना ठोस और व्यापक प्रचार किया कि सकल विश्व के वैचारिक चिन्तन तथा व्यवहार में भूमि के गुरुत्व आकर्षण के नियम के सदृश महर्षि दयानन्द के गुरुत्व आकर्षण का नियत ओतप्रोत है। जैसे यह नियम सब मानवीय गतिविधियों में ओतप्रोत है परन्तु दिखाई नहीं देता ठीक इसी प्रकार सब मत पन्थों के मानने वालों की सोच और व्यवहार में महर्षि दयानन्द का दर्शन ओतप्रोत है। यह छाप और प्रभाव भले ही देखने वालों को दिखाई न दे परन्तु इतिहास इसकी साक्षी दे रहा है। यह सब कुछ आपके सामने है। हाँ! हमें यह तो मान्य है कि अन्धविश्वासों की अन्धी आँधी सब मत पन्थों को उड़ाकर ले जाती दीख रही है। लीजिये महर्षि दयानन्द जी महाराज के वैदिक दर्शन को दिग्विजय के कुछ तथ्य कुछ बिन्दु इस लेखमाला में देते हैंः-

      शैतान कहाँ है?ः- ईसाई तथा इस्लामी दर्शन का आधार शैतान के अस्तित्व पर है। शैतान सृष्टि की उत्प      िा के समय से शैतानी करता व शैतानी सिखलाता चला आ रहा है। उसी का सामना करने व सन्मार्ग दर्शन के लिए अल्लाह नबी भेजता चला आ रहा है। मनुष्यों से पाप शैतान करवाता है। मनुष्य स्वयं ऐसा नहीं सोचता। पूरे विश्व में आज पर्यन्त किसी भी कोर्ट में किसी ईसाई मुसलमान जज के सामने किसी भी अभियुक्त ईसाई व मुसलमान बन्धु ने यह गुहार नहीं लगाई कि मैंने पाप नहीं किया। मुझ से अपराध करवाया गया है। पाप के लिए उकसाने वाला तो शैतान है।

     किसी न्यायाधीश ने भी कहीं यह टिप्पणी नहीं की कि तुम शैतान के बहकावे में क्यों आये? दण्ड कर्ता को ही मिलता है। कर्ता की पूरे विश्व के कानूनविद् यही परिभाषा करते हैं जो सत्यार्थप्रकाश में लिखी है अर्थात् ‘स्वतन्त्रकर्ता’ कहिये शैतान कहाँ खो गया? फांसी पर तो इल्मुद्दीन तथा अ    दुल रशीद चढ़ाये गये। क्या यह महर्षि दयानन्द दर्शन की विजय नहीं है? अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इरान, पाकिस्तान व मिश्र में इसी नियम के अनुसार अपराधी फांसी पर लटकाये जाते हैं और कारागार में पहुँचाये जाते हैं।

      सर सैयद अहमद का लेख याद कीजियेः मुसलमानों के सर्वमान्य नेता तथा कुरान के भाष्यकार सर सैयद अहमद खाँ ने अपने ग्रन्थ में एक कहानी दी है। एक मौलाना को सपने में शैतान दीख गया। मौलाना ने झट से उसकी दाढ़ी को कसकर पकड़ लिया। एक हाथ से उसकी दाढ़ी को खींचा और दूसरे हाथ से शैतान की गाल पर कस कर थप्पड़ मार दिया। शैतान की गाल लाल-लाल हो गई। इतने में मौलाना की नींद खुल गई। देखता क्या है कि उसके हाथ में उसी की दाढ़ी थी जिसे वह खींच रहा था और थप्पड़ की मार से उसी का गाल लाल-लाल हो गया था।

       इस पर सर सैयद की टिप्पणी है कि शैतान का अस्तित्व कहीं बाहर नहीं (खारिजी वजूद) है। तुम्हारे मन के पाप भाव ही तुम से पाप करवाते हैं। अब प्रबुद्ध पाठक अपने आपसे पूछें कि यह क्रान्ति किसके पुण्य प्रताप से हो पाई? यह किसका प्रभाव है? मानना पड़ेगा कि यह उसी ऋषि का जादू है जिसने सर्वप्रथम शैतान वाली फ़िलास्फ़ी की समीक्षा करके अण्डबण्ड-पाखण्ड की पोल खोली।

       ‘जवाहिरे जावेद’ के छपने परः- देश की हत्या होने से पूर्व एक स्वाध्यायशील मुसलमान वकील आर्य सामाजिक साहित्य का बड़ा अध्ययन किया करता था। उस पर महर्षि के वैदिक सिद्धान्त का गहरा प्रभाव पड़ता गया परन्तु एक वैदिक मान्यता उसके गले के नीचे नहीं उतर रही थी। जब जीव व प्रकृति भी अनादि हैं, इन्हें परमात्मा ने उत्पन्न नहीं किया तो फिर परमात्मा इनका स्वामी कैसे हो गया? प्रभु जीव व प्रकृति से बड़ा कैसे हो गया? तीनों ही तो समान आयु के हैं। न कोई बड़ा और न ही छोटा है।

        आचार्य चमूपति की मौलिक दार्शनिक कृति ‘जवाहिरे जावेद’ के छपते ही उसने इसे क्रय करके पढ़ा। पुस्तक पढ़कर वह स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी के पास आया। महाराज के ऐसे कई मुसलमान प्रेमी भक्त थे। उसने स्वामी जी से कहा कि आर्यसमाज की सब मान्यताएँ मुझे जँचती थीं, अपील करती थीं परन्तु प्रकृति व जीव के अनादि व का सिद्धान्त मैं नहीं समझ पाया था। पं. चमूपति जी की इस पुस्तक को पढ़कर मेरी सब शंकाओं का उ ार मिल गया।

       मित्रो! कहो कि यह किस की दिग्विजय है। इसी के साथ यह बता दें कि दिल्ली के चाँदनी चौक बाजार में किसी गली में एक प्रसिद्ध मुस्लिम मौलाना महबूब अली रहते थे। मूलतः आप चरखी दादरी (हरियाणा) के निवासी थे। आपने भी यह अद्भुत पुस्तक पढ़ी। फिर आपने एक बड़ा जोरदार लेख लिखा। श्री सत्येन्द्र सिंह जी ने हमें उस लेख का हिन्दी अनुवाद करने की प्रेरणा दी। अब समय मिलेगा तो कर देंगे। इस लेख में पण्डित जी के एतद्विषयक तर्कों को पढ़कर मौलाना ने सब मौलवियों से कहा था कि यदि प्रकृति व जीव के अनादित्व को स्वीकार न किया जावे तो कुरान वर्णित अल्लाह के सब नाम निरर्थक सिद्ध होते हैं। मौलाना की यह युक्ति अकाट्य है। कैसे? अल्लाह के कुरान में ९९ नाम हैं यथा न्यायकारी, पालक, मालिक, अन्नधन (रिजक) देने वाला आदि। अल्लाह के यह गुण व नाम भी तो अनादि हैं। जब जीव नहीं थे तो वह किसका पालक, मालिक था? किसे न्याय देता था? प्रकृति उत्पन्न नहीं हुई थी तो जीवों को देता क्या था? तब वह स्रष्टा (खालिक) कैसे था? किससे सृजन करता था? मौलाना की बात का प्रतिवाद कोई नहीं कर सका। अब प्रबुद्ध पाठक निर्णय करें कि यह किस की छाप है? यह वैदिक दर्शन की विजय है या नहीं?

       मरयम कुमारी थी क्या?ः- मुसलमान व ईसाई दोनों ही हज़रत ईसा का जन्म कुमारी मरयम से मानते आये हैं। अब विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक बर्ट्रैण्ड रस्सल तथा सर सैयद की कोटि के विचारक ऐसा नहीं मानते। सर सैयद अहमद खाँ ने तो लाहौर के एक पठित मुस्लिम युवक के प्रश्न का उत्तर  देते हुए श्री ईसा के जन्म विषयक तर्क भी वही दिया जो पं. लेखराम जी ने कुल्लियात आर्य मुसाफिर में दिया है। अमेरिका से प्रकाशित एक पुस्तक में कई युवा पादरियों ने अनेक ऐसे-ऐसे वैदिक विचारों को स्वीकार किया है।

      पुराण व्यासकृत नहींः हरिद्वार के सन् १८७९ के कुम्भ तक ऋषि विरोधियों का सबसे बड़ा सनातनी सेनापति पं. श्रद्धाराम फिलौरी था। वह ऋषि की शत्रुता में काशी वालों से भी तब तक कहीं आगे था। उसने लिखा है कि १८ पुराण व्यासकृत नहीं। यह सन्देश इस युग में सर्वप्रथम ऋषि ने सुनाया। यह छाप ऋषि की वैदिक विचारधारा की नहीं तो किसकी है?

      वेद संहितायें चार ही हैंः– पौराणिक तो उपनिषद् ब्राह्मण ग्रन्थ सबको वेद ही मानते थे। महर्षि का घोष था कि चार संहितायें ही ईश्वरीय वाणी हैं। त्रिवेदी और चतुर्वेदी ब्राह्मण तो पाये जाते हैं परन्तु कई विद्वानों को सात उपनिषदें कण्ठाग्र हैं फिर वे सप्तवेदी और आठ-दस उपनिषदों के विद्वान् अष्टवेदी, दशवेदी और एकदशवेदी क्यों नहीं? अमेरिका से प्रकाशित स्द्गष्ह्म्द्गह्ल ञ्जद्गड्डष्द्धद्बठ्ठद्दह्य शद्घ ञ्जद्धद्ग ङ्कद्गस्रड्डह्य के ईसाई लेखक ने तथा डॉ. अविनाशचन्द्र वसु सरीखे सब लेखकों ने चार संहिताओं को ही वेद माना है। यह किसके पुण्य प्रताप का फल है।

       वेद के यौगिक अर्थः वेद भाष्यकारों को महर्षि ने आर्ष ग्रन्थों के आधार पर वेदभाष्य करने के लिये यौगिक अर्थों की कुञ्जी दी। ॥…….. पुस्तक के अमेरिकन लेखक ने भी डंके की चोट से महर्षि की वेदभाष्य की इस विधा को स्वीकार किया है। कौन है जो इस मूलभूत आर्ष मान्यता की इस दिग्विजय को महर्षि दयानन्द का विश्वव्यापी प्रभाव न मानेगा?

       न्याय की रात या न्याय का दिनः ईसाई मुसलमान सभी प्रलय की रात (या दिन) को ईश्वरीय न्याय के सिद्धान्त को मानते आये हैं। इसी को अंग्रेजी में —— कहा जाता है। अब डॉ. गुलाम जेलानी की लोकप्रिय पुस्तकों में इस्लाम का नया दार्शनिक दृष्टिकोण सामने आया है। वह यह घोषणा कर रहे हैं कि अल्लाह ताला प्रतिपल न्याय करता है। जिसकी आँखें हैं वे देख रहे हैं कि सारे संसार पर ऋषि की दार्शनिक छाप का गहरा प्रभाव है। आर्यसमाज की वेदी से ही दार्शनिक सिद्धान्तों का प्रचार बन्द होने से स्कूल खोले, नारी उद्धार किया, स्वराज्य के मन्त्र द्रष्टा की रट लगाने वालों के दुष्प्रचार को प्रमुखता मिलने से भ्रामक विचार फैल गया कि आर्यसमाज के दार्शनिक विचारों का संसार पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।

सरदार अजीतसिंह

सरदार अजीतसिंह

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          सशस्त्र क्रान्ति की बात हो और उसमें शहीद-ए-आजम भगतसिंह का नाम ना आये, ये असंभव है क्योंकि केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास में भी बहुत कम आयु में ही क्रान्तिपथ के राही के रूप में वो अपना एक अलग स्थान बना गए। पर कितने लोग जानते हैं कि भगतसिंह को क्रान्तिपथ को चुनने की प्रेरणा कहीं और से नहीं बल्कि अपने पिता सरदार किशनसिंह और दो चाचाओं सरदार अजीतसिंह और सरदार स्वर्णसिंह से मिली थी। इनमें भी विशेषकर सरदार अजीतसिंह के जीवन, देश की आज़ादी के लिए किये गए उनके संघर्ष और उनके अथक कार्यों ने दादी और माँ के लाडले भगतसिंह को वो क्रांतिधर्मा भगतसिंह बनाया जो युवाओं के आदर्श बन गए और जिनका नाम लेते ही मन में स्वयं को देश के लिए बलिदान करने की भावना हिलोरें मारने लगती है। जी हां, ये सरदार अजीतसिंह ही थे जो भगतसिंह की प्रेरणा थे जिनके आदर्शों पर चलकर ही भगतसिंह ने स्वयं को देश के लिए कुर्बान कर दिया। सच कहा जाये तो भगतसिंह के क्रांतिकारी जीवन की नींव ही सरदार अजीतसिंह के हाथ से पड़ी।

       भगत सिंह ने अपने होश संभालते हुए तीन बातें खास तौर पर सुनी थीं। वह थीं–अपने चाचा अजीतसिंह के निर्वासित होने की, भारत से फरार होकर विदेश चले जाने की एंव अंग्रेजों के खिलाफ उनके द्वारा की गई बगावत की । भगतसिंह ने सबसे पहले सरदार अजीतसिंह का ही साहित्य पढ़ा और उसी ने उनके मन में देश के लिए समर्पण का भाव जगाया। उन्होंने आगे चलकर अपनी चाची हरनाम कौर (सरदार अजीतसिंह की धर्मपत्नी) की आँखों से आसुँओं की बहती धारा देखी। भगतसिंह ने बाल्यकाल में उन्हें हर रोज पूछते सुना था, ”भागोंवाले, तुम्हारे चाचाजी का कोई पत्र आया?” ये सब बातें ऐसी थी, जो भगत सिंह के मानसपटल पर अंकित हो गई और बिना अपने चाचा से मिले ही वो उनके घनघोर प्रशंसक हो गए। हालांकि उन्हें गिरफ्तार होने तक यही मालूम न था कि सरदार अजीतसिंह जीवित भी है या नहीं ।

       भगतसिंह के मन मस्तिष्क में अपने चाचा सरदार अजीतसिंह का क्या स्थान था, इसे उनकी उन भावनाओं से समझा जा सकता है जो फाँसी की प्रतीक्षा करते हुए भी भगतसिंह के मन में भारत की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले अपने चाचा के लिए थीं। हम सब जानते हैं कि धन-संपदा की वसीयत करना तो आम बात हैं, पर भावनाओं की वसीयत के उदाहरण बिरले ही देखने को मिलते हैं और भगतसिंह ने अपने स्वनामधन्य चाचा के मामले में भावनाओं की ही वसीयत की थी। सरदार भगत सिंह के होश सँभालने से पहले ही उनके चाचा सरदार अजीतसिंह अंग्रेजी सरकार से विद्रोह करने के सिलसिले में फरार हो चुके थे और भगतसिंह को उसके बाद उनके दर्शन कभी न हो सके। भगत सिंह अपने प्रिय चाचा के पदचिन्हों पर चलकर ही देश के लिए मर मिटे और मरते दम तक उनकी ख्वाहिश रही कि उनको अपने उन चाचा के एक बार दर्शन हो जाते, जिन्होनें देशभक्ति की प्रबल उमंगे अनदेखे सूत्रों से उन्हे सौंप दी थीं।

       जिस समय भगतसिंह और उनके साथी क्रांतिकारी लाहौर जेल में अदालत और जेल में अपने साथियों के साथ किये गये दुर्व्यवहार और राजनैतिक कैदियों के साथ अपराधियों की तरह बर्ताव करने के विरुद्ध प्रतिवाद स्वरूप भूख हड़ताल कर रहे थे, उसी समय लाहौर में ही होने के कारण पंडित जवाहरलाल नेहरु इन सब क्रांतिकारियों से मिलने जेल में गए थे। भगतसिंह द्वारा अपने चाचा के बारे में जानने की इच्छा का वर्णन उन्होंने अपनी आत्मकथा में  इस प्रकार किया है–

        मैं लाहौर में ही था, जब भूख-हड़ताल एक महीने की हो चुकी थी। मुझे जेल में कुछ बन्दियों से मुलाकात की अनुमति दी गयी और मैं मिलने गया। मैंने पहली बार भगत सिंह, यतीन्द्रनाथ दास तथा कुछ दूसरे लोगों को देखा| भगतसिंह का चेहरा आकर्षक और बुद्धिजीवियों जैसा था–खूब शान्त। उसमें कोई क्रोध प्रतीत नहीं हुआ। उन्होंने अतीव सज्जनतापूर्वक निहारा तथा बातें की| भगतसिंह की मुख्य इच्छा अपने चाचा सरदार अजीतसिंह को देखना या कम से कम उनका समाचार जान लेना प्रतीत हुई, जिनको 1907 में लाला लाजपत राय के साथ देश-निकाला दिया गया था| अनेक वर्षों तक वह विदेशों में निर्वासित रहे थे| कुछ अनिश्चित रिपोर्टें थीं कि वह दक्षिणी अमेरिका में बस गये थे, मगर मैं नहीं सोचता कि उनके बारे में कोई निश्चित जानकारी है| मैं यह भी नहीं जानता कि वह जीवित हैं या मर गये|

        भगतसिंह को क्रांतिपथ का राही बनाने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले लाला पिंडीदास लिखते हैं, मैं भगतसिंह से आखिरी बार मिला तो पूछा–”कहो भगत कोई आखिरी ख्वाहिश, कोई आखिरी पयाम?” भगतसिंह ने जवाब दिया, ”चाचाजी, सिर्फ और सिर्फ एक ख्वाहिश है कि काश कोई मरने से पहले मेरे चाचा (स॰ अजीतसिंह) से मिला दे, देखूँ उन्हें, मैं जिनका आशिक बना, जिनके नक्शे कदम पर चलकर मैंने इस अश्क की वादी में कदम रखा और जिनके प्यार ने मुझे मंजिल तक पहुँचा दिया।” “आँखों पर रूमाल रखे मैं लौट आया।” मुनासिब मुकाम तक इस ख्वाहिश को पहुँचाया भी गया पर कोई कामायाबी न मिली और मेरा भगत अपनी आखिरी ख्वाहिश दिल में लिए ही इस जहाँ से रुखसत हो गया।

        सरदार अजीतसिंह, ये वो नाम है जिनके बारे में एक बार प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गर्म दल के अगुआ माने जाने वाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने कहा था कि, “वो स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति बनने योग्य हैं”। जब तिलक ने इन शब्दों से सरदार अजीतसिंह के संघर्ष, बलिदान और देश के लिए उनके समर्पण का प्रशस्तिगान किया था तब अजीतसिंह की आयु मात्र २५ वर्ष थी। तब तिलक कहाँ जानते होंगे कि देश को आज़ादी मिलने के साथ ही आयेगी विभाजन की त्रासदी, जिस कष्ट को ना सह पाने की वजह से अंग्रेजों की नाक में दम कर देने वाला ये योद्धा स्वतंत्रता के समाराहों और चहल-पहल से कहीं दूर इस संसार से विदाई ले लेगा।

         शहीद-ए-आजम भगतसिंह के चाचा और ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने वाले पंजाब के आरम्भिक विप्लवियों में से एक सरदार अजीतसिंह का जन्म पंजाब के जालंधर जिले की नवाँनगर तहसील के बंगा थाने के एक छोटे से गाँव खटकरकलां में 23 जनवरी 1881 को सरदार अर्जनसिंह के द्वितीय पुत्र के रूप में हुआ था। उनके बड़े भाई शहीद भगतसिंह के पिता सरदार किशनसिंह थे, जबकि छोटे भाई सरदार स्वर्णसिंह थे। जिस जमींदार की जमींदारी में ये गाँव आता था, उसके इस गाँव में स्थित किले के अलावा भी अन्य गांवों में कई छोटे छोटे किले थे, जिस कारण इस बड़े किले के नाम पर इस जगह को गढ़ कलां (बड़ा किला) कहने लगे थे। सरदार अजीतसिंह के पूर्वज मूलतः लाहौर के नारली गाँव के रहने वाले थे। ये उन दिनों की बात है, जब भारत में मुग़ल शासन था। सरदार अजीत सिंह जी के एक पूर्वज अपनी युवाववस्था में अपने उन पारिवारिक सदस्यों का अस्थिकलश लेकर, जिनका अंतिम संस्कार नारली में ही किया गया था, हरिद्वार में गंगा में प्रवाहित करने के लिए नारली से हरिद्वार की तरफ चले। मार्ग में एक रात विश्राम करने के लिए उन्होंने गढ़ कलां के चौकीदार से रात भर ठहरने की अनुमति मांगी। विधि का विधान कि वो चौकीदार जमींदार साहब के पास अनुमति के वास्ते चला गया, जिन्होंने उस युवा को अपने अपने कक्ष में बुला लिया , जहाँ वह अपनी पत्नी और युवा पुत्री के साथ बैठे बातचीत कर रहे थे। उस युवा से हुयी ढेर सारी बातों से ये पूरा परिवार, विशेषकर वह युवती, अत्यंत प्रभावित हुयी और अगले दिन विदा करने से पूर्व ये जानने के बाद कि उस युवा का अभी विवाह नहीं हुआ है, उन जमींदार साहब ने हरिद्वार से वापस लौटते समय भी उस युवा से पुनः उनके किले में ठहरने का अनुरोध किया। वह युवा भी उनके मंतव्य को समझ गया था और जब वह हरिद्वार में अस्थिविसर्जन कर वापस लौटा, जमींदार साहब ने अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ अत्यंत धूमधाम से करते हुए अपने इस बड़े किले को भी दहेज़ के रूप में इस नवविवाहित दंपत्ति को निवास करने के लिए सौंप दिया। इसी के बाद से वह किला गढ़ कलां (बड़ा किला) के स्थान पर खट गढ़ कलां (दहेज़ बड़ा किला) कहलाने लगा, जो कालांतर में अपभ्रंश होकर खटकरकलां हो गया। इसी युवा दंपत्ति के वंशजों के परिवार में जन्म हुआ था, हमारे नायक सरदार अजीतसिंह जी का।

       विवाहोपरांत इस किले और आसपास के क्षेत्रों की जमींदारी मिलने के बाद से सरदार अजीतसिंह के पूर्वज इस इलाके के जमींदार माने जाने लगे और वे मुगलों के विरुद्ध संघर्षों में प्रांत के शासकों को एक निश्चित संख्या में सैनिकों की खेप भेजा करते थे और विशेषकर महाराज रणजीत सिंह जी के शासनकाल में तो वो तन मन धन से उनका सहयोग करने लगे। सिखों का आन बान शान का प्रतीक उनका राष्ट्रीय धवज सरदार अजीतसिंह के पूर्वजों की सरपरस्ती में ही बनाया और फहराया गया था जिसके लिए एक विशेष भवन का निर्माण किया गया था, जहाँ ये ध्वज दिन रात फहराता था और जिसके सम्मान में दूर दूर से लोग वहां एकत्रित होते थे। ये स्थान झंडा जी के नाम से जाना जाता है। अजीतसिंह जी के पूर्वज इस ध्वज को इतना ऊंचा स्थान देते थे कि जब उनके मूल निवास नारोली से लोग उन्हें वापस लौट चलने के लिए प्रार्थना करने आये तो उन्होंने कहा कि ये ध्वज उन्हें अपने जीवन से भी प्यारा है और इसे छोड़कर कहीं जाने की वो सोच भी नहीं सकते। इस परिवार में अपने देश धर्म के लिए भावनाएं इतनी प्रबल थीं कि जब महाराज रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद पंजाब पर अंग्रेजों की गिद्ध दृष्टि जमने लगी तो सरदार अजीतसिंह के पितामह सरदार फ़तेहसिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने के की शपथ लेते हुए स्वयं को पूरी तरह अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में झोंक दिया। उन्होंने प्रथम अंग्रेज-सिख युद्ध के 18 दिसंबर 1845 को फिरोजपुर से लगभग 20 मील दूर स्थित छोटे से गाँव मुदकी में हुए प्रारंभिक युद्ध, 28 जनवरी 1846 को अलीवाल में हुयी झड़प और 10 फरवरी 1846 को सतलुज नदी के किनारे स्थित गाँव सबरान में हुए निर्णायक युद्ध में वीरतापूर्वक भाग लिया था।

        अंग्रेजों के विरुद्ध इन युद्धों में भाग लेने का परिणाम ये हुआ कि सरदार फ़तेहसिंह की जमींदारी का अधिकांश भाग जब्त कर लिया गया और उनके परिवार को अत्यंत कष्ट उठाने पड़े, पर उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। बाद में जब 1857 की क्रान्ति के समय कई राजाओं, सामंतों और जमीदारों ने अपने ही उन लोगों के विरुद्ध, जो अंग्रेजों से स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे, अंग्रेजों का साथ दिया, तब एक धनवान जागीरदार और अंग्रेजों द्वारा नियुक्त आनरेरी मजिस्ट्रेट मजीठिया सरदार सूरतसिंह ने, जिसे 1857 में अंग्रेजों की सहायता करने के बदले अंग्रेजों से बड़ी बड़ी जागीरें प्राप्त हुयी थीं, सरदार फ़तेहसिंह को भी अंग्रेजों की सहायता के लिए ये कहते हुए आमंत्रित किया कि इसके ऐवज में उन्हें अंग्रेज-सिख युद्ध में भाग लेने के कारण जब्त की गयी सारी जमींदारी वापस मिल जाएगी। पर अपने परिवार की परम्परा के अनुरूप सरदार फ़तेहसिंह ने बिना एक क्षण लगाये अपने ही देशवासियों के विरुद्ध अंग्रेजों की सहायता करने से साफ़ इनकार कर दिया। इस सबने सरदार फ़तेहसिंह में जो विद्रोही घृणा जगा दी थी, वह पारिवारिक धरोहर के रूप में उनके पुत्र सरदार अर्जुनसिंह को मिली। यह धरोहर ही थी जो परिवर्तन की प्यास बनकर उन्हें सामाजिक क्रान्ति के यज्ञ-मण्डप में ले आई।

        उस दौर में अधिकांश भारतीय सोचते थे कि हम कमजोर हैं, अलग-अलग हैं, निहत्थे हैं। इसके विरुद्ध अंग्रेज शक्तिशाली हैं; संगठित हैं, इसलिए हम उनका कुछ नहीं कर सकते, कुछ बिगाड़ नहीं सकते। 1857 में प्रयत्न करके तो हमने देख लिया, पर क्या हुआ सिवाय इसके कि हम और पिटे, पिसे और अपमानित हुए। वे अब शासक हैं और हम अब शासित हैं। उन्हें अब शासक रहना है, हमें अब शासित रहना है। गुलामी और गुलामी, बस यही हमारा भाग्य है और यही हमारा भविष्य है। देश की परिस्थितियों और अंग्रेजों की कूटनीति चालों से जब हमारा देश हीनता के इस अवसाद में डूबा हुआ था, तो देश के पुनरुत्थान की सब आशाएं समाप्त हो गई थीं। कोई देश गिरकर उठता है स्वदेशाभिमान और जातीय गर्व के प्रकाश में पनपे आत्मगौरव से, पर हीनता की उस घनी आंधी में स्वदेशाभिमान और जातीय गौरव के दीपक कहां जल सकते थे? ऋषि दयानन्द के आत्मतेज की बलिहारी कि उन्होंने नई पृष्ठभूमि की खोज की और अतीत गौरव की उपजाऊ भूमि में स्वाभिमान और स्वदेशाभिमान के वृक्ष रोपे।

         शीघ्र ही इन पर जागरण और उद्बोधन के पुष्प महके और देश विचार-क्रान्ति से उद्बुद्ध हो उठा। सरदार अर्जुनसिंह ने ऋषि दयानन्द को देखा तो आकर्षित हुए, उनका भाषण सुना तो प्रभावित हुए और बातचीत की तो पूरी तरह उनके हो गए। सरदार अर्जुनसिंह इस विशाल देश के पहले सिख नागरिक थे, जो इस विचार क्रान्ति में भागीदार हुए। उनमें धुन थी, देशभक्ति की, आस्था की, कर्मठता थी; वे शीघ्र ही अपने क्षेत्र में इस विचार क्रान्ति का यज्ञ-मण्डप बन गए। सरदार अर्जुनसिंह के घर में तीन पुत्र जन्मे—सरदार किशनसिंह, सरदार अजीतसिंह, सरदार स्वर्णसिंह। सरदार किशनसिंह का व्यक्तित्व समुद्र की तरह विस्तृत और गहरा था। लोकमान्य तिलक से लेकर महात्मा गांधी के सब आन्दोलनों में उन्होंने पूरे जोश से हिस्सा लिया। उनपर भारत की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन में सरकार ने 42 बार राजनीतिक मुकदमे चलाये। उन्हें अपने जीवन में लगभग ढाई वर्ष की कैद की सजा हुई तथा दो वर्ष नजरबन्द रखा गया। दूसरी दिशा में जो विद्रोह और क्रान्ति के तूफान उठे, चाहे वह लार्ड हार्डिग पर फेंके गए बम का मुकदमा था, चाहे ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ की पहली किसान-क्रान्ति, चाहे जेलों में मानवीय अधिकारों का संघर्ष और चाहे गदर-आन्दोलन, वे उन सब के भी सहयोगी-सलाहकार रहे।

         सरदार अजीतसिंह ने अपना सार्वजिनक जीवन आरम्भ तो किया कांग्रेस के आन्दोलन से, पर शीघ्र ही उनका विकास एक नई दिशा में बदल गया। देश में चाफेकर-बन्धुओं के द्वारा पूना में 22 जून 1917 को प्लेग-कमिश्नर रैण्ड और लैफ्टीनैण्ट मिस्टर आयर्स की हत्या कर सशस्त्र विद्रोह की नींव रखी गई थी। सरदार अजीतसिंह ने उस धारा से स्वतन्त्र देशव्यापी जन-क्रान्ति (1857 के गदर की पूर्णता) की नींव रखी। उनका व्यक्तित्व इतना प्रचण्ड था कि यह नींव शीघ्र ही एक भवन का रूप लेने लगी। इस भवन का नक्शा कितना विशाल था, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि सरदार अजीतसिंह ने अपनी क्रांति-संस्था ‘भारतमाता सोसायटी’ के द्वारा प्रथम विश्वयुद्ध का (जब किसी दूसरे के स्वप्न में भी वह न आया था) यथार्थ अनुमान कर अपने सहकर्मी लाला हरदयाल को अमेरिका, सूफी अम्बाप्रसाद को अफगानिस्तान-ईरान, सरदार निरंजन सिंह को ब्राजील और इसी तरह कई दूसरे साथियों को दूसरे देशों में भेजने का निश्चय किया कि ये लोग विदेशों में सशस्त्रशक्ति का संगठन करें, जो युद्ध के समय भारत के भीतर उभरी शक्ति से आ मिलें। स्वयं सरदार अजीतसिंह भारत में ही रहे और यहीं सेनाओं और राजनेताओं के साथ लेकर जन-क्रान्ति की तैयारी करें। परिस्थितियां ऐसी हुई कि सरदार अजीतसिंह को भी विदेश जाना पड़ा। वहां उन्होंने 39 साल तक भारतीय क्रान्ति की ज्वाला जलाई और दोनों विश्वयुद्धों में सबसे पहले आज़ाद हिन्द सेना का संगठन किया।

        सरदार स्वर्ण सिंह भारतमाता के द्वारा क्रान्ति की रोशनी घर-घर पहुंचाने वाले मशालची थे। वाणी और कलम दोनों उनके अस्त्र थे। जेल की यातनाओं ने उन्हें तोड़ दिया और वे 23 वर्ष की भरी जवानी में शहीद हो गए। सरदार किशनसिंह के घर में जन्में भगतसिंह। उनकी मृत्युंजयी वीरता का जन-मानस पर ऐसा सिक्का बैठा कि उग्रक्रांति की धारा को अपने चाचा सरदार अजीतसिंह द्वारा स्थापित जन-क्रान्ति की धारा में बदल देने का उनका ऐतिहासिक कार्य सबकी आंखों से ओझल ही रह गया। देश की नयी पीढ़ी को यह बताया ही नहीं गया कि भारत का प्रथम संविधान सरदार अजीतसिंह ने ही लिखा था और देश की नई पीढ़ी को यह भी नहीं बताया गया कि सरदार भगतसिंह ही इस देश में समाजवाद के प्रथम उद्घोषक थे|

        ये कहना अतिश्योक्ति ना होगी कि महर्षि दयानंद की शिक्षाओं से प्रभावित होकर सरदार अर्जुनसिंह ने साहस कर अन्धविश्वास और परम्परावाद की जड़ता से बन्द अपने घर के द्वार खोल दिए और ऊबड़-खाबड़ मार्ग को साफ कर अपने आंगन में यज्ञवेदी बना दी। सरदार किशनसिंह ने उस द्वार के आंगन तक के क्षेत्र को लीप-पोत कर उस यज्ञवेदी पर एक विशाल हवन-कुण्ड प्रतिष्ठित कर दिया। सरदार अजीतसिंह ने उस हवन-कुण्ड में समधाएं सजा कर एक दहकता अंगारा रख दिया। सरदार स्वर्णसिंह ने उसे झपटकर लपट में बदल दिया। बस फिर क्या था, लपटें उठीं और खूब उठीं। सरदार अजीतसिंह उन लपटों के लिए ईंधन की तलाश में दूर चले गए और जल्दी लौट न सके। वे लपटें बुझ जातीं, पर सरदार किशनसिंह उनके अंगरक्षक बने रहे, उन्हें बचाए रहे। भगतसिंह ने इधर-उधर ईंधन की तलाश न कर अपने जीवन को ही ईंधन बना झोंका और लपटों को पूरी तरह उभारकर इस तरह उछाल दिया कि वे देश-भर में फैल गईं, देश का हर आंगन एक हवन-कुण्ड बन गया।

         सरदार अजीतसिंह की प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही हुयी और उन्हें फ़ारसी, उर्दू और अरबी भाषाओँ का ज्ञान अपने पिता से प्राप्त हुआ जो इन भाषाओँ के अच्छे जानकार थे और साथ भी यूनानी चिकित्सा पद्धति के भी अच्छे ज्ञाता थे। मिडिल की परीक्षा अजीत सिंह जी ने बंगा के एक विद्यालय से प्राप्त की। जब वह मिडिल में थे, तभी एक दिन आर्य समाज के प्रशंसक उनके पिता जी उन्हें स्थानीय आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव में ले गए, जहाँ एक वक्ता ने स्वदेशी के मह्त्व पर अत्यंत सारगर्भित भाषण दिया। इसका परिणाम ये हुआ कि गाँव वापस लौटते ही पूरे परिवार ने विदेशी वस्त्रों को तिलांजलि दे दी और स्वदेशी को पूरी तरह अपने जीवन में उतार लिया। इस बात का अजीतसिंह पर गहरा प्रभाव पड़ा और उनके मन में ये विश्वास दृढ हो गया कि बिना अंग्रेजी दासता से मुक्त हुए देश की तरक्की और इसके निवासियों की ख़ुशी का कोई और उपाय नहीं।

         अजीतसिंह के चचेरे भाई एक मिशन स्कूल में पढ़ते थे, जहाँ भारतीयों को नीची निगाह से देखा जाता था और उनकी धर्म-संस्कृति का उपहास किया जाता था। जब इस बात की चर्चा घर पर होती तो अजीतसिंह को इससे अत्यंत क्लेश होता और इसीलिए उन्होंने अपने चाचा से आग्रह किया कि हमें जालंधर में अपना विद्यालय आरम्भ करना चाहिए जहाँ के शिक्षक देशभक्त हों और छात्रों में राष्ट्रप्रेम की भावनाएं जागृत करें। जालंधर के स्थानीय आर्यसमाजी भी वहां एक विद्यालय शुरू करने के इच्छुक थे, अतः सरदार अजीतसिंह के चाचा ने स्थानीय लोगों के सहयोग से जालंधर में एक विद्यालय की स्थापना की, जिसके प्रधानाध्यापक के रूप में वहां के प्रमुख आर्य समाजी विद्वान् और प्रखर देशभक्त सुन्दरदास ने कार्यभार संभाला। देश के प्राचीन इतिहास और वीरों के बारे में लिखी उनकी पुस्तकें पढ़ कर विद्यार्थियों में देश के लिए कुछ कर गुजरने की भावना बलवती होती थी और ऐसे में पहले से इस तरह के संस्कारों वाले अजीतसिंह पर इन सबका प्रभाव कैसे ना पड़ता। I893 में इस स्कूल से मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने डी.ए.वी. कालेज लाहौर में प्रवेश लिया जहाँ के प्रधानाचार्य श्री हंसराज के विचारों को सुनने से, पुस्तकालय में गैरीबाल्डी और मैजिनी की जीवनियों को पढने से और मुल्कराज भल्ला लिखित शहीदों की कहानियां नामक पुस्तक के अध्ययन से उनके विचार देशसेवा के प्रति और दृढ होते गए। यहाँ से अध्ययन समाप्त करने के बाद वो लॉ कालेज बरेली से कानून के अध्ययन के लिए गए परन्तु बीच में ही पिता के पदचिन्हों पर चलकर समाज सेवा के कार्यों में संलग्न हो जाने के कारण वो ये पढाई पूरी नहीं कर सके|

       उस समय देश अतिवृष्टि और अनावृष्टि की विभीषिका से जूझ रहा था। अपने बड़े भाई सरदार किशनसिंह के साथ मिलकर अजीतसिंह ने बरार (मध्य प्रदेश, 1898), अहमदाबाद और अन्य क्षेत्र (गुजरात, 1900) के अकाल प्रभावित क्षेत्रों, श्रीनगर (कश्मीर, 1904) के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों और कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश, 1905) के भूकंप प्रभावित क्षेत्रों का सघन दौरा किया और बीमार, असहाय और भूखे-प्यासे लोगों की दिल-ओ-जान से सेवा की। इन सब स्थानों पर उनके अनुभवों ने उन्हें इतना अच्छे से समझा दिया कि इन सब समस्याओं का कोई स्थायी समाधान तब तक नहीं निकाला जा सकता, जब तक भारत से ब्रिटिश राज ख़त्म नहीं होता और देश में एक सच्चे लोकतंत्र की स्थापना नहीं होती। यहीं से उन्होंने देश की स्वतंत्रता को अपने जीवन का मिशन बना लिया। अपने इन्हीं सेवा कार्यों के दौरान 1903 में उनकी मुलाक़ात अकाल की व्जह से अनाथ हो गयी नमो (बाद में हरनाम कौर) से हुयी और जाति-पाँति और ऊँच-नीच के भेदभाव से बहुत ऊपर उठकर उन्होंने नमो के साथ विवाह कर समाज के समक्ष एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया।

         बरेली में रहते हुए अजीतसिंह जी ने क्रांतिकारी गतिविधियों को ठोस आधार प्रदान करने के लिए अपने बड़े भाई सरदार किशनसिंह के साथ मिलकर नेपाल के राजा से सम्बन्ध बनाने और नेपाल-भारत सीमा पर जमीन खरीदने का विचार किया ताकि क्रांति की घटनाओं को अंजाम देने के बाद क्रांतिकारी नेपाल में शरण ले सकें। इसी समय जनवरी 1903 में तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन ने एक दरबार का आयोजन किया जिसमें सभी भारतीय राजाओं-रजवाड़ों को आमंत्रित किया गया। अजीतसिंह भी अपने बड़े भाई किशनसिंह जी के साथ इस दरबार में इस उद्देश्य के साथ गए कि अंग्रेजों के विरुद्ध उन सभी का एक सशक्त संयुक्त मोर्चा खडा किया जा सके। कश्मीर और जोधपुर रियासतों के मंत्रियों से और बड़ोदा के महाराज से दरबार शुरू के पहले ही अजीतसिंह ने अच्छे सम्बन्ध बना लिए और इस बात के लिए तैयार कर लिया कि वो सभी रियासतों के प्रमुखों को इस बात के लिए तैयार करें कि वो एक दूसरे के साथ निकट के सम्बन्ध बनायें और रोटी-बेटी के सम्बन्ध करें। इस के पीछे सोच ये थी कि सभी रियासतों को एकजुट कर अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 की तर्ज पर एक सशक्त विद्रोह खडा किया जा सके।

         इस दरबार में अजीतसिंह जी और किशनसिंह जी को अपेक्षानुरूप सफलता मिली। बाद में आर्यसमाजी सन्यासियों स्वामी प्रकाशानंद और स्वामी शंकरानंद ने वैदिक धर्म प्रचारकों के रूप में पूरे देश में घूम घूम कर इस कार्य में अजीतसिंह की बहुत सहायता की। कई रियासतों से क्रांतिकारियों को अस्त्र-शस्त्र मुहैया कराने को लेकर भी उन्हें ठोस आश्वासन मिल गया। इन सारे प्रयासों के बारे में जो कुछेक लोग ही जानते थे, उनमें आनंद बाज़ार पत्रिका के प्रोप्राइटर मोतीलाल घोष और ट्राइब्यून के सम्पादक कालीचरण चटर्जी मुख्य थे। इस विद्रोह के पहले अजीतसिंह जी अंग्रेजों की मानसिकता और उनके बारे में अच्छे से जान लेना चाहते थे और इसी बात को ध्यान में रखकर उन्होंने ब्रिटिश अधिकारीयों, मिशनरियों आदि को उर्दू और पंजाबी सिखाने के काम शुरू कर दिया, जिसने उन्हें अंग्रेजों और मिशनरियों के दिमाग को पढने में बहुत सहायता की।

         1906 में कलकत्ता में कांग्रेस का एक विशाल अधिवेशन हुआ, जिसमें अजीतसिंह जी भी ये सोचकर गए कि अंग्रेजो के सामने भीख मांगने की कांग्रेस की नीति से असंतुष्ट लोगों को एक मंच पर लाने में संभवतः वहां कुछ सहायता मिल सके। वहां जाने पर उनका बंगाल में अंग्रेजों के विरुद्ध काम कर रही कई संस्थाओं से संपर्क हुआ, जिनसे प्रभावित होकर उन्हें पंजाब में भी इसी प्रकार की एक संस्था के गठन का निर्णय किया। पंजाब वापस आते ही उन्होंने सरदार किशनसिंह, स्वर्णसिंह, लाला घसीटाराम और सूफी अम्बा प्रसाद के साथ मिलकर भारतमाता सोसाइटी की स्थापना की, जो एक गुप्त संगठन था और जिसका उद्देश्य भारत को पराधीनता की बेड़ियों से किसी भी तरह से मुक्त कराना था| इस संस्था के दो प्रमुख अस्त्र थे–भाषण और प्रकाशन। इस हेतु अजीतसिंह ने भारतमाता बुक एजेंसी की स्थापना की थी, जो सरकार विरोधी साहित्य के प्रकाशन का प्रमुख केंद्र थी। इसके पीछे के प्रमुख व्यक्ति थे महान देशभक्त और क्रांतिकारियों में बौद्धिकता के स्तम्भ माने जाने वाले सूफी अम्बाप्रसाद। भारतमाता (हिंदी), इंडिया (अंग्रेजी), पेशवा (उर्दू) और पंजाबी (अंग्रेजी), वो समाचार पत्र थे जो इस संस्था के बैनर तले प्रकाशित होते थे। इसके अतिरिक्त ना जाने कितने ही पत्रक और पुस्तकें भी सोसाइटी द्वारा प्रकाशित की गयीं जिनमें से अधिकांश में सशस्त्र विद्रोह की आवाज थी। हालाँकि सरकार इन्हें जब्त करती थी पर इससे इनकी प्रसिद्धि और ज्यादा फैलती थी। सरकारी तंत्र में तो भारतमाता सोसाइटी की गतिविधियों को ‘छोटा 1857’ कहा जाने लगा था।

        इसी समय पंजाब में ब्रिटिश शासन द्वारा अतिशय भूमिकर लगाने और गलत नीतियाँ अपनाने के कारण किसानों में जबरदस्त असंतोष फैलने लगा, जिसे अजीतसिंह ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लोगों को खड़ा करने का एक सुनहरा अवसर समझा और शीघ्र ही वो इस विद्रोह के सेनानायक बन कर सामने आये क्योंकि लाला लाजपतराय ने ये कहकर उन किसानों को, जो उनसे अपने आन्दोलन का नेतृत्व करने का अनुरोध करने गए थे, निराश कर दिया कि चूँकि अब बिल पास हो चूका है तो कांग्रेस इसमें कुछ भी नहीं कर सकती है। पूरे क्षेत्र में सरकर विरोधी माहौल बनाने के बाद और लोगों को सरकारी बिलों का उनकी खेती पर पड़ने वाला दुष्परिणाम समझाने के बाद 3 मार्च 1907 को लायलपुर में अजीतसिंह ने सरकार के विरुद्ध एक बहुत बड़ी रैली का आयोजन किया जिसमें अखबार ‘झांग सयाल’ के सम्पादक बांकेदयाल ने पगड़ी सम्हाल जट्टा, पगली सम्हाल नामक गीत प्रस्तुत किया| इस गीत की प्रसिद्धि इतनी फैली कि ये संघर्ष कर रहे किसानों के लिए मंत्र बन गया और सरदार अजीतसिंह का ये आन्दोलन पगड़ी सम्हाल जट्टा आन्दोलन के नाम से जाना जाने लगा|

         यूँ लाला जी इस आन्दोलन में शामिल नहीं हुए थे पर अजीतसिंह चाहते थे कि वो इसमें शामिल हों और इस हेतु उन्होंने रामभज दत्त नामक व्यक्ति के जरिये लाला जी और उनके साथियों को इस रैली में आने का निमंत्रण उन्हें बिना ये बताये भिजवाया कि इस रैली के मुख्य कर्ताधर्ता अजीतसिंह हैं। लाला जी इस रैली में शामिल हुए और और अपने ओजस्वी भाषण से लोगों को अन्दर तक झकझोर दिया। चूँकि ये वर्ष 1907 था अर्थात 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पचासवीं वर्षगाँठ, इसलिए अंग्रेजी सरकार बहुत ज्यादा डरी हुयी थी कि कहीं ये आन्दोलन उसके लिए समस्याएं ना खड़ी कर दे, अतः एक सर्कुलर जारी कर सेना में शामिल भारतीय जवानों को हिदायत दी गयी कि वो अजीतसिंह की बातों को कतई ना सुने पर इसने उनकी प्रसिद्धि और ज्यादा फैला दी। लायलपुर की रैली के बाद उन्होंने पंजाब के लगभग सभी प्रमुख नगरों का दौरा किया और लोगों को अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध खड़े होने के लिए प्रेरित किया। उनका प्रभाव इस हद तक बढ़ गया था कि सेना में शामिल भारतीय जवान उनके पास आकर उन्हें पूर्ण समर्थन का वचन देते थे।

         2 अप्रैल को रावलपिंडी में एक बड़ी रैली का आयोजन किया गया, जिसमें भाग लेने के लिए अजीतसिंह और लाला जी दोनों ही वहां गए पर प्रशासन ने रैली पर प्रतिबन्ध लगा दिया। लाला जी इस बारे में कार्यवाही हेतु कोर्ट चले गए जबकि अजीतसिंह जी ने एकत्रित जनसमूह को संबोधित करना शुरू कर दिया। ये देख मिलिट्री कमांडर ने लोगों को तितिर हो जाने का आदेश दिया और ना मानने पर सैनिकों को गोलियां चलाने का आदेश दिया। पर पासा उलटा पड़ गया और भारतीय सैनिकों ने ये कहते हुए बंदूकें उसकी तरफ घुमा दीं कि दोबारा ऐसा आदेश मिलने पर वो उस पर गोलियां चला देंगे। स्थिति बिगड़ते देख वो कमांडर तो लौट गया पर सैनिकों को अपने साथ देख लोगों के हौसले बुलंद हो गए। नतीजा ये हुआ कि लोगों ने अंग्रेजों को परेशान करना, सरकारी कार्यालयों और चर्चों को जलाना, और पटरियों और तारों को उखाड़ना शुरू कर दिया और स्थिति यहाँ तक बिगड़ गयी कि लगभग समस्त पंजाब में अंग्रेजों के लिए स्थिति नियंत्रण करना असंभव सा हो गया। पंजाब के गवर्नर लार्ड लाब्टसन ने लार्ड हार्डिंग को भेजे अर्जेंट टेलीग्राम में लिखा कि पंजाब अजीतसिंह और उनके साथियों के नेतृत्व में विद्रोह की कगार पर है और इसे रोकने के लिए तुरंत कुछ करना आवश्यक है। इसके पहले 29 अगस्त 1906 को लार्ड मिंटो भारत मंत्री लार्ड मारले को पत्र लिख कर बता चुका था कि ये सारा उपद्रव कहने को किसान आन्दोलन के नाम पर है पर इसका असल मकसद भारतीय सैनिकों की सहायता से सशस्त्र विद्रोह करना है।

        इन सब स्थितियों और विद्रोह की आशंका से घबरा कर सरकार ने सरदार किशन सिंह, सरदार स्वर्णसिंह, लाला घसीटाराम, लाला गोवर्धनदास और पंडित रामचन्द्र पेशावरी आदि को गिरफ्तार कर लिया और 4 मई 1907 को सरदार अजीतसिंह और लाला लाजपत राय के विरुद्ध वारंट जारी कर दिया। लाला जी को 9 मई को गिरफ्तार कर लिया गया पर अजीतसिंह फरार हो गए और सोसाइटी से सम्बंधित आवश्यक काम निपटाने के बाद ही उन्होंने 2 जून को आत्मसमर्पण किया। लालाजी की तरह की उन्हें भी बर्मा की उसी मांडले जेल में निर्वासित कर दिया गया, जहाँ 1857 के संग्राम के बाद बहादुरशाह ज़फर और 1882 के कूका विद्रोह के बाद बाबा रामसिंह कूका को निर्वासित किया गया था। इस निर्वासन के बाद जहाँ कांग्रेस ने लाला जी का मुक्त कराने के लिए हर संभव प्रयास किया, वहीँ अजीतसिंह जी को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। कांग्रेस लालाजी के बचाव में इस हद तक नीचे चली गयी कि उसने लालाजी को सरदार अजीतसिंह के साथ सम्बंधित करने को लालाजी का अपमान माना। कांग्रेस के दवाब में लालाजी को तो रिहा कर दिया गया पर सरकार अजीतसिंह को रिहा करने के पक्ष में कतई नहीं थी पर थोड़े ही दिन में उसे अनुभव हुआ कि मुक्त अजीतसिंह उसके खिलाफ जितना आक्रोश खड़ा नहीं कर, पाएंगे उससे ज्यादा बंदी अजीतसिंह कर रहे हैं, क्योंकि उनके द्वारा खड़ा किया ‘पगड़ी संभाल आन्दोलन’ फैलता ही जा रहा है। ऐसे में जार्ज पंचम के राज्यारोहण के अवसर पर ख़ुशी प्रकट करने का बहाना करते हुए सरकार ने उन्हें भी छोड़ दिया।

       ये वो समय था, जब सरदार अर्जुनसिंह के तीनों पुत्र जेल में बंद थे, सरदार किशनसिंह स्वतंत्रता की लड़ाई में भाग लेने के कारण सेंट्रल जेल में बन्द थे, सरदार अजीतसिंह मांडले जेल में तथा सरदार स्वर्णसिंह अपने बड़े भाई सरदार किशनसिंह के साथ ही सजा भुगत रहे थे। ऐसे में ही उनके घर पर उनकी बड़ी पुत्रवधू यानि सरदार किशनसिंह की पत्नी ने 27 सितंबर 1907 अपने दूसरे पुत्र को जन्म दिया। इस बच्चे के जन्म के समय घर में केवल उसकी माँ श्रीमती विद्यावती, दादा अर्जुनसिंह तथा दादी जयकौर ही थे। किन्तु पता नहीं इस बालक का जन्म ही शुभ था अथवा दिन ही अच्छे आ गये थे कि उनके जन्म के तीसरे ही दिन उसके पिता सरदार किशनसिंह तथा चाचा सरदार स्वर्णसिंह जमानत पर छूट कर घर आ गये तथा लगभग इसी समय दूसरे चाचा सरदार अजीतसिंह भी रिहा कर दिये गये। इस प्रकार उनके जन्म लेते ही घर में यकायक खुशियों की बाहर आ गयी, अत: उनके जन्म को शुभ समझा गया। इस भाग्यशाली बालक का नाम उनकी दादी ने भागा वाला अर्थात् अच्छे भाग्य वाला रखा। इसी नाम के आधार पर बाद में यह बालक भगत सिंह कहा जाने लगा।

       अपनी मुक्ति के थोड़े ही दिन बाद अजीतसिंह ने दिसंबर के अंत में सूरत में हुए कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में भाग लिया और उदारवादियों के विरुद्ध तिलक के गर्म विचारों का समर्थन किया। उनके क्रांतिकारी विचारों और कार्यशैली से प्रभावित होकर ही तिलक ने उनके बारे में वो कथन कहा था, जिसका जिक्र ऊपर एक जगह आया है। पंजाब लौटकर अजीतसिंह ने भारतमाता सोसाइटी और भारतमाता बुक एजेंसी पर फिर से ध्यान देना शुरू किया और थोड़े ही दिन में उर्दू में प्रकाशित होने वाले ‘पेशवा’ को जागरूक पंजाबियों के जीवन का भाग जैसा बना दिया। ख़ुफ़िया पुलिस की नज़रों से बचने के लिए अजीतसिंह ने कार्य को गुप्त और मुक्त दो भागों में बाँट कर गुप्त कार्य का जिम्मा हरदयाल सिंह को सौंपा और मुक्त कार्य अपने पास रखा ताकि बिना किसी विघ्न के कार्य संपन्न हो सके। दिल्ली-लाहौर षड्यंत्र मामले में फांसी की सजा पाने वाले मास्टर अमीरचंद को उनकी अद्भुत लेखकीय क्षमता के कारण क्रांतिकारी साहित्य को लिखने और प्रकाशित करने का कार्य अजीतसिंह जी ने ही सौंपा था।

        उनके कार्यों, पत्रकों, सम्पादकीयों, भाषणों और वक्तव्यों के धारदार क्रांतिकारी पुट ने फिर से अंग्रेजी सरकार को उनके प्रति सशंकित कर दिया और ऐसी ख़बरें उड़ने लगीं कि इस बार उन्हें गिरफ्तार कर मृत्युदंड ही दिया जायेगा। 
इसकी भनक लगते ही भारत की आज़ादी के अपने संकल्प को पूरा करने के लिए मिर्ज़ा हसन खान नाम से वो अपने साथियों सूफी अम्बाप्रसाद, जिया-उल-हक और हरकेश लाठा के साथ वो 1908 के अंतिम दिनों में कराची होते हुए इरान पहुँच गए और अपने प्रयासों से इसे ब्रिटिश सत्ता के विरोध में भारतीयों का केंद्र बना दिया। 1910 तक इनकी गतिविधियाँ और समाचार पत्र ‘हयात’ ब्रिटिश सरकार की आँखों में कांटे की तरह चुभने लगे और ब्रिटिश शासन के दबाव में इरानी सरकार ने कार्यवाही करते हुए सभी गतिविधियों को बंद करा दिया, क्योंकि ब्रिटिश सरकार को अंदेशा था कि जर्मनी तुर्की और इरान को एकजुट कर अफगानिस्तान के रास्ते भारत की तरफ बढ़ सकता है जो अंग्रेजी सरकर के लिए बहुत बड़ा सरदर्द हो जाता। ऐसी परिस्थिति में वहां रहने को औचित्यहीन समझ अपने सबसे भरोसेमंद साथी सूफी अम्बाप्रसाद को शिराज़ में क्रांतिकारी गतिविधियाँ करते रहने के लिए छोड़ बाकू (रूस), तुर्की और जर्मन होते हुए पेरिस पहुंचे और इंडियन रिव्ल्युशनरी एसोशियेशन की स्थापना की।

         शीघ्र ही उन्होंने विदेशों में भारत की स्वतंत्रता के लिए कार्य कर रहे श्यामजी कृष्ण वर्मा, मैडम भीखा जी कामा, वीर सावरकर, वीरेन्द्रनाथ चटोपाध्याय (सरोजिनी नायडू के भाई) और महादेव राव (रासबिहारी बोस के अत्यंत निकटस्थ सहयोगी) जैसे महानुभावो और संगठनों के साथ सम्बन्ध बना लिए। पेरिस से वो स्विट्जरलैंड गए जहाँ उन्होंने एक अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी संगठन के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध बना लिए जिसमें दुनिया भर के देशों के क्रांतिकारी शामिल थे और जो एकजुट होकर साम्राज्यवादों शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष का सशक्त मंच था। 1913 तक स्विट्जरलैंड में रहने के बाद वो जर्मनी में निवास करने लगे। इस सबके बीच उन्होंने लेनिन और ट्रोटोस्की जैसे साम्यवादी नेताओं और बाद में फासिज्म का प्रतीक बन कर उभरे मुसोलिनी जैसे नेताओं से सम्बन्ध बनाकर भारत की आज़ादी के लिए अपने प्रयास जारी रखे। प्रथम विश्व युद्ध में यूरोप के हालात बिगड़ने लगे थे, इसलिए अपने लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण के उद्देश्य से वे ब्राज़ील चले गए। सूफी अम्बाप्रसाद बाद में प्रथम विश्व युद्ध में इरानी राष्ट्रवादियों के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करते हुए शहीद हो गए। आज भी उनकी समाधि इरानी नगर शिराज़ में इस प्रतीक्षा में है कि कोई उनके पार्थिव अवशेषों को भारत लाकर भारतमाता के उस वीर पुत्र का माँ से मिलन कराएगा पर अफ़सोस, जिस देश में लोग सूफी अम्बाप्रसाद का नाम ही ना जानते हों, वहां ये अपेक्षा करना भी व्यर्थ है।

        ब्राजील में रहते हुए 1918 में वो ग़दर पार्टी के संपर्क में आये और इसके साथ जुड़ कर अहर्निश काम किया| इसी दौरान उन्होंने भगतसिंह को एक पत्र भी लिखा था जिसमें उन्होंने युवा भगत को ब्राजील आकर विभिन्न देशों के क्रांतिकारी संघर्षों के अध्ययन का सुझाव दिया था। भगतसिंह ने उन्हें प्रत्युत्तर में उनसे ये कहते हुए भारत लौटने का आग्रह किया था कि चूँकि देश क्रान्ति के लिए तैयार है, इसलिए उन्हें भारत आकर इस संघर्ष की बागडोर संभालनी चाहिए। 1939 में वे पुनः यूरोप लौटे और क्रान्ति के प्रयासों में संलग्न हो गए। इसी दौरान उनकी भेंट नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से हुयी, जिनको उन्होंने हिटलर से मिलवाया और भारत की आज़ादी की लड़ाई में सहायता का आग्रह किया पर बाद में दोनों महानुभावों द्वारा ये अनुभव करने पर कि हिटलर केवल भारतीयों को अंग्रेजों के विरुद्ध इस्तेमाल करना चाहता है, इन्होनें उससे सम्बन्ध समाप्त कर लिए।

        इसके बाद वे इटली आये और फ्रेंड्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की, जिसका उद्देश्य भारत की आज़ादी की लड़ाई में इटली का सहयोग प्राप्त करना था। वो हिन्दुस्तानी और फ़ारसी में रोम रेडियो, जिसे वो आजाद हिन्द रेडियो कहते थे, के जरिये भाषण और कार्यक्रमों का प्रसरण करते थे और श्रोताओं, विशेषकर सैनिकों से अंग्रेजी राज के विरुद्ध खड़े होने का आव्हान करते थे। इसी बीच मोहम्मद शैदाई नामक भारतीय राष्ट्रवादी की सहायता से अजीतसिंह ने इटली द्वारा गिरफ्तार अंग्रेजी सेना के भारतीय सैनिकों को नेता जी की आज़ाद हिन्द फ़ौज की तरफ से अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए तैयार करने का बड़ा काम शुरू कर दिया था। उनके संगठनात्मक कौशल, प्रभावी भाषण और जबरदस्त प्रचार के चलते 10,000 से अधिक भारतीय सैनिक अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए जी जान से तैयार हो गए। इटली सरकार और अजीतसिंह के बीच ये तय हुआ था कि ये सैनिक अंग्रेजों के विरुद्ध केवल भारत की आज़ादी के लिए भारतीय जमीन पर ही लड़ेंगे और उनका कहीं और उपयोग नहीं किया जायेगा पर राजनैतिक अस्थिरता और इटली की हार के चलते ये योजना असफल हो गयी।

       द्वितीय विश्व युद्ध में इटली की हार के बाद मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने 2 मई 1945 को अजीतसिंह को गिरफ्तार कर लिया और मई 1945 से दिसंबर 1946 तक इटली और जर्मनी की विभिन्न जेलों में बंदी जीवन व्यतीत करते हुए उन्हें अंत में लन्दन लाया गया। उनका स्वास्थ्य अनवरत गिरता जा रहा था और जैसे ही ये समाचार भारत पहुंचा, उन्हें मुक्त करने और भारत लाने की आवाजों ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया। स्वतंत्रता अब निकट ही थी, 2 सितम्बर 1946 को अंतरिम सरकार कामकाज संभाल चुकी थी, इसलिये अजीतसिंह के पुराने साथियों और कई कांग्रेसी नेताओं ने नेहरु पर उनकी मुक्ति के लिए दवाब बनाना शुरू कर दिया। परिणामतः उन्हें लन्दन में भारतीय दूतावास के अधिकारियों के सुपुर्द कर दिया गया पर नेहरु से प्राप्त निर्देशों के चलते दूतवास ने उन्हें उनके सम्मान में आयोजित कार्यक्रमों और समारोहों में भाग लेने से रोक दिया। अंत में वह दिन भी आ गया जब पूरे 38 वर्ष बाद अजीतसिंह उसी कराची वापस लौटे जिसे वे 1908 में अंग्रेजों के दमनचक्र से बचने के लिए छोड़ गए थे। रेल कर्मचारियों और सामान्य जनता ने उनका भव्य स्वागत किया।

       पर उन्होंने अनुभव कर लिया कि उनकी पत्नी हरनाम कौर को अब भी यकीन नहीं है कि वो ही उनके पति हैं। ये स्वाभाविक भी था क्योंकि जब अजीतसिंह देश छोड़ कर गए थे, तब वे मात्र 28 वर्ष के थे और जब वे वापस लौटे, उनकी आयु हो चुकी थी 66 वर्ष। वक़्त तो क्या कुछ नहीं बदल देता, फिर यहाँ तो 38 वर्ष का अन्तराल हो चुका था। इन वर्षों में 40 भाषाओं के ज्ञानी हो चुके थे और यह पहचानना बहुत ही मुश्किल था कि ये वही अजीतसिंह है या कोई और। विश्वास न कर पाने पर हरनाम कौर ने पहचान के लिए कई सवाल पूछे, जिनका सही जवाब मिलने के बाद भी उनकी पत्नी को विश्वास नही हो पाया। होता भी कैसे, लगभाग 40 वर्षों तक जिस व्यक्ति की उन्होंने रात दिन प्रतीक्षा की हो और जिसकी स्मृतियों के सहारे एकाकी और तपस्वी जीवन बिताया हो, वो कैसे मान ले कि उसका वो पति उसके पास आ चुका है। इतिहास उन्हें तो याद रखता है जो उसके प्रमुख पात्र होते हैं पर वह उन पात्रों को बिसरा देता है जिनके सहारे ही प्रमुख पात्र अपना भाग पूरा करते हैं। जब तक हरनाम कौर जी के समर्पण को याद नहीं किया जायेगा, सरदार अजीतसिंह की स्मृति भी अधूरी है क्योंकि ठीक है कि सबकों दूर से क्रान्ति की मशाल दिखाई देती है और वे हाथ भी, जो मशाल को थामे रहते हैं, पर उस मशाल को रौशन तो रखते हैं तिल-सरसों के वे दाने ही, जो कोल्हू में पिस कर उस मशाल की लौ को प्रदीप्त रखने के लिए अपना तेल दे, अपने को निःसत्व कर लेते हैं।

      अजीतसिंह भी इस बात को बखूबी जानते थे और इसीलिए एक दिन उन्होंने हरनाम कौर के पैर छूकर उनके प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया था। हरनाम कौर ने लगभग पूरा जीवन एकाकी ही बिता दिया, जेठानी के पुत्रों जगतसिंह (जिसकी 11 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गयी थी) और भगत सिंह पर अपना प्यार दुलार लुटा कर। वो रोज पूछती थीं कि जगत तेरे चाचा की कोई चिठ्ठी आई है क्या और रोज जगतसिंह अपने सीने पर हाथ मार कर कहता, चाची तू चिंता ना कर, चाचा को ढूंढ़ कर मैं लाऊंगा। पर क्रूर काल का घात हुआ और चाची को दिलासा देने वाला जगतसिंह सबको रोते बिलखते छोड़ कर चला गया। दिन बीते और चाची का सवाल अब अब भगतसिंह से होता कि क्यों भागोवाले, तेरे चाचा का कोई ख़त आया क्या और भगत भी अपने भाई की तरह सीने पर हाथ मार कर कहता, चाची तू चिंता न कर, चाचा को मैं ले कर आऊंगा। ये बच्चे ही उनका सहारा थे वरना वो पहले भी अकेली थीं और पति के लौट कर आने के कुछ दिनों बाद फिर से अकेली हो गयीं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी इच्छा के अनुरूप उनका अंतिम संस्कार भगतसिंह की समाधि के पास ही किया गया। उनका बलिदान भी कभी बिसराया नहीं जा सकता।

       खैर, हम लोग बात कर रहे थे अजीतसिंह जी की जो कराची के बाद कुछ समय के लिए देहली गए, जहाँ उन्होंने देश के भविष्य के बारे में नेहरु से वार्तालाप किया। 9 अप्रैल 1947 को वो लाहौर गए जहाँ समाज के सभी वर्गों के लोगों द्वारा उनका भावभीना स्वागत किया गया। पर तब तक भारत विभाजन के बीज विषैला वृक्ष बन कर खड़े हो गए थे और हर तरफ हिंसा और मारकाट का बाजार गर्म था। इस सबने उन्हें अन्दर तक तोड़ दिया क्योंकि ये वो भारत नहीं था, ये वो आज़ादी नहीं थी, जिसके लिए उन्होंने और उनके साथियों ने अपने आप को गलाया था और अपना सब कुछ अर्पण कर दिया था। इस सदमें ने उनके ख़राब स्वास्थ्य को और बिगड़ दिया। उन्हें आराम के लिए हिमाचल के पहाड़ी इलाके डलहौजी ले जाया गया, पर स्वास्थ्य बिगड़ता ही गया। 15 अगस्त 1947 को जब सारा भारत आज़ादी की खुशियाँ मना रहा था, स्वतंत्रता की देवी अपने नेत्रों को खोल रही थी, आज़ादी की लड़ाई का ये सेनानी इन शब्दों के साथ अपनी आँखें मूँद रहा था कि भगवान तेरा शुक्रिया, मेरा लक्ष्य पूरा हुआ| डलहौजी के नजदीक पंजपुला में बनी उनकी समाधि हमें हमेशा प्रेरणा देती रहेगी| आश्चर्य कि भारतीयों को पीड़ित करने वाले डलहौजी का नाम अब भी एक स्थान के रूप इस देश में अमर है और अपने को तिल तिल कर गला देने वाले सरदार अजीतसिंह गुमनाम हो गए। जिस देश में सेल्युलर जेल से कोई वास्ता ना होने वाले गाँधी जी के नाम पर वहां पट्टिका लगायी जा सकती है, केदारनाथ जैसे स्थान के सरोवर का नाम गाँधी सरोवर किया जा सकता है, क्या वहां इस डलहौजी का नाम बदलकर अजीतसिंह नगर नहीं होना चाहिए था?

       इन पंक्तियों के साथ इस हुतात्मा को कोटि कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि–

ये क्या समझेंगे कीमत इस आज़ादी की,
इन सबने तो घर पर बैठे आज़ादी पाई है। 
कैसे समझाऊँ इन्हें कि तुमने खुद को गला दिया, 
तभी अँधेरा मिटा था और नयी रौशनी आई है।