अक्ल बड़ी या भैस

अक्ल बड़ी या भैस

             बुद्धि  से सब काम हल किये जा सकते हैं। एक जंगल में एक बहुत बलशाली शेर रहता था। उससे सब जानवर परेशान थे क्यों कि वह किसी को भी मारकर खा जाया करता था। सबने  मिलकर शेर से प्रार्थना की कि हम प्रतिदिन एक पशु दे देंगे, निरीह पशुओं की हत्या मत करो ।

           शेर ने बात मान ली। बोला, ‘यदि किसी भी दिन मेरे लिए समय पर भोजन न पाया तो मैं जंगल के सारे पशुओं को मार डालूगा।’

            अब जंगल में पशु भी निश्चित थे और शेर भी। प्रतिदिन एक जानवर की बारी पाती थी और शेर को बिना परिश्रम भोजन मिल जाता था।.

           ऐसा करते-करते एक दिन खरगोश की बारी आई। उसने एक योजना बनाई

          वह शेर के पास कुछ देर से पहुंचा। शेर बहुत गुस्सा हो रहा था । बोला, ‘एक तो ऐसे ही तू तीन तोले का है, और दूसरे इतनी देर लगाकर पाया । तुझे खाने के बाद आज मैं सारे पशुओं को मार डालूगा ।

           खरगोश गिड़गिड़ाते हए बोला, ‘स्वामी ! देर से पाने का कारण आप पहले सुन लीजिए, इसमें हमारा कोई अपराध नहीं है।’ 

            खरगोश ने कहा, ‘महाराज ! आज आपके भोजन के लिए मेरे अलावा चार खरगोश और भेजे गए थे। रास्ते में एक दूसरा शेर मिल गया। चार को वह खा गया । मैं जान बचा कर आपको  सूचना देने आया हूँ।’

            शेर बोला, ‘मुझे उसके पास ले चलो। आज मैं उसका खून पीकर रहूंगा।’

             खरगोश बोला, ‘स्वामी ! दूसरा शेर एक किले में रहता है । उस पर विजय पाना बहुत मुश्किल है ।’

          खरगोश शेर को एक कुए के पास ले गया और बोला, ‘महाराज ! पापको दूर से ही देखकर वह अपने किले के भीतर भाग गया है । आप चाहें तो मैं आपको उसकी सूरत दिखा सकता हूँ।’

          खरगोश शेर को कुए की जगत पर ले गया। शेर ने अपनी छाया को कुए में देखा और उसे दूसरा शेर समझा। वह बहुत जोर से गरजा उसकी प्रतिध्वनि कुएं से लौट आई। उस प्रतिध्वनि को उसने दूसरे शेर की ललकार समझा। गुस्से से वह अपनी छाया पर ही कूद गया। उसके प्राण पखेरू उड़ गये ।

           शेर की मृत्यु का समाचार सुनकर सारे जानवर अतिप्रसन्न हुए । खरगोश को बहुत सम्मान दिया गया ।

          जिसके पास बुद्धिबल है वही बलशाली होता है ।

यज्ञ का क्रय-विक्रय

पूर्णा दर्वि परा पत सुपूर्णा पुनरार्पत। वस्नेव विक्रीणावहाऽइषमूर्ज शतक्रतो॥ -यजु० ३।४९ (दर्वि) हे सुवा! तू (पूर्णा) घृत से भरी हुई (परापत) यज्ञकुण्ड में जाकर गिर। वहाँ से (सुपूर्णा) खूब भरी हुई (पुनः आ पत) फिर हमारे पास आ । इस प्रकार हे (शतक्रतो) सैंकड़ों यज्ञों के कर्ता इन्द्र परमेश्वर ! हम (वस्ना इव) जैसे मूल्य से किसी वस्तु का क्रय-विक्रय किया जाता है, वैसे ही (इषम्) अन्न, रस आदि तथा (ऊर्जम्) बल, प्राण, स्वास्थ्य आदि (वि क्रीणावहै) विशेषरूप से खरीदें। क्या तुम सोचते हो कि यज्ञ में घृत से भरी हुई खुवा जब अग्नि में घृत उंडेलती है, तब हमारे पास वापिस आती हुई वह खाली होती है? यदि ऐसा सोचते हो तो तुम भ्रम में हो। यदि ऐसा होता तो वेदादि शास्त्रों में यज्ञ की असीम महिमा वर्णित न होती। यज्ञ तो देने-लेने का व्यापार है। उसमें व्यय भी है, आय भी है। भौतिकता की दृष्टि से देखें तो हम अग्नि को हवि देते हैं, बदले में अग्नि जल-वायु की शुद्धि करके तथा हमारे शरीर में श्वास के साथ स्वास्थ्यवर्धक हवि का अंश पहुँचा कर हमें स्वास्थ्य तथा दीर्घायुष्य प्रदान करता है। अग्नि की ऊर्ध्वगामी ज्वालाओं से हम ऊर्ध्वगामी होने की प्रेरणा लेते हैं। अग्नि के ताप और प्रकाश से हम तपस्वी और प्रकाशवान् होने का सन्देश ग्रहण करते हैं। अग्नि के मलिनताओं को भस्म करने के गुण से हम अपने पाप-ताप को भस्म करने का व्रत लेते हैं। जब हम ‘इन्द्राय स्वाहा’ बोलकर इन्द्र को आहुति प्रदान करते हैं, तब शतक्रतु इन्द्र से अर्थात् इन्द्र प्रभु के सृष्ट्युत्पत्ति, सृष्टिसञ्चालन, ऋतु-निर्माण, संवत्सर-रचना, जल-वाष्पीकरण, वृक्षारोपण, पुष्प-विकास, नदी-प्रवाह, ग्रहोपग्रह-व्यवस्था, तारकावलि-प्रकाशन आदि शत-शत यज्ञों की साधनारूप खुवा से हम यज्ञभावना को अपने अन्दर जागृत करते हैं। इस प्रकार यज्ञ की खुवा जब अग्नि में आहुति डाल कर वापिस आती है, तब वह खाली नहीं होती, प्रत्युत वह स्वास्थ्य, दीर्घायुष्य, ऊध्र्वज्वलन, तप, प्रकाश, निष्पापता, त्याग, आस्तिकता आदि से भरपूर होती है। जितनी बार सुवा से हम अग्नि में हवि का त्याग करते हैं, उतनी ही बार वह उत्तम ऐश्वर्यों से भरी-पूरी होती हुई हमारे पास वापिस आकर उन ऐश्वर्यों को हमारे मानस में उंडेल देती है। इस प्रकार जैसे कोई मूल्य देकर बदले में बहुमूल्य वस्तुएँ प्राप्त करता है वैसे ही अग्नि में हवि देकर बदले में हम नाना भौतिक एवं आध्यात्मिक ऐश्वर्यों को प्राप्त कर लेते हैं। एवं यह क्रय विक्रय का व्यापार अग्निहोत्र में निरन्तर चलता रहता है। इस मन्त्र के दयानन्दभाष्य के भावार्थ में लिखा है-“जो मनुष्यों द्वारा सुगन्धि आदि द्रव्य अग्नि में होम किया जाता है। वह ऊपर जाकर वायु, वृष्टिजल आदि को शुद्ध करके पुनः पृथिवी पर आ जाता है, जिससे यव आदि ओषधियाँ शुद्ध होकर सुख और पराक्रम को देनेवाली हो जाती हैं। जैसे व्यापारी रुपया आदि दे-लेकर अन्न आदि अन्य द्रव्यों को खरीदते-बेचते हैं, वैसे ही अग्नि में द्रव्यों की आहुति देकर वृष्टि, सुख आदि को खरीदता है और वृष्टि, ओषधि आदि को लेकर पुनः वृष्टि के लिए अग्नि में होम करता है।”

रामनाथ विद्यालंकार

वेद, वेद मंत्र, वेद विशेष, हिन्दी अग्न्याधान

अग्न्याधान ऋषिः प्रजापतिः।

देवताः अग्नि-वायु-सूर्याः।

छन्दः क. दैवीबृहती, र.

निवृद् आर्षी बृहती। भूर्भुवः स्वर्’ द्यौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा। तस्यास्ते पृथिवि देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादमुन्नाद्ययोदधे। -यजु०३।५ ( भूःभुवःस्वः ) सत्-चित्-आनन्द, पृथिवी-अन्तरिक्षद्यौ, अग्नि-वायु-आदित्य, ब्रह्म-क्षत्र-विट् का ध्यान करता हूँ। मैं ( भूम्ना) बाहुल्य से ( द्यौःइव) द्युलोक के समान हो जाऊँ, ( वरिम्णा) विस्तार से ( पृथिवी इव) भूमि के समान हो जाऊँ। ( देवयजनिपृथिवि ) हे देव यज्ञ की स्थली भूमि! ( तस्याःतेपृष्ठे ) उस तुझे भूमि के पृष्ठ पर ( अन्नादम्अग्निम्) हव्यान्न का भक्षण करने वाली अग्नि को ( अन्नाद्याय) अदनीय अन्नादि का भक्षण करने के लिए ( आदधे ) आधान करता हूँ/करती हूँ। अग्न्याधान से पूर्व व्याहृतियों द्वारा सच्चिदानन्दस्वरूप परमेश्वर का स्मरण करते हैं। शतपथ ब्राह्मण में भूः, भुवः, स्व: पूर्वक आहवनीय अग्नि के आधान का विधान करते हुए इन का सम्बन्ध क्रमशः पृथिवी-अन्तरिक्ष-द्यौ, ब्रह्म-क्षत्र-विट् तथा आत्मा-प्रजा-पशुओं से बताया गया है। इन सब में अपने-अपने प्रकार की अग्नि का वास है। तैत्तिरीय आरण्यक एवं तैत्तिरीय उपनिषद्में इन व्याहृतियों को क्रमशः भूलोक अन्तरिक्ष लोक-द्युलोक, अग्नि-वायु-आदित्य, ऋक्-साम-यजुः और प्राण-अपान-उदान का वाचक कहा है। वहाँ इनके द्वारा विधि करने का फल यह बताया गया है कि भू: के द्वारा अग्नि में, भुवः के द्वारा वायु में और स्वः के द्वारा आदित्य में प्रतिष्ठित हो जाता है, अर्थात् इन-इन के ऐश्वर्य का अधिकारी हो जाता है। इनका ध्यान करने वाला आत्मराज्य को और मन सस्पति को प्राप्त कर लेता है। वह वाक्पति, चक्षुष्पति, श्रोत्रपति हो जाता है, क्योंकि अध्यात्म में भूः, भुवः, स्व: का सम्बन्ध वाक्, चक्षु और श्रोत्र से भी है। आगे यजमान कहता है कि बाहुल्य (भूमा) में मैं द्युलोक के समान हो जाऊँ, अर्थात जैसे द्यलोक में बहत-से नक्षत्र हैं। और इनकी रश्मियाँ हैं, वैसे ही मेरे अन्दर भी बहुत से सद्गुण रूप नक्षत्र एवं दिव्य अन्त: प्रकाश की किरणें उत्पन्न हों। फिर कहता है कि विस्तार में मैं पृथिवी के समान हो जाऊँ, अर्थात् मेरे आत्मा में अपनत्व का विकास इतना हो जाए कि सारी वसुधा को ही अपना कुटुम्ब मानने लगूं। फिर वह पृथिवी को सम्बोधन कर कहता है कि तुम ‘देवयजनी’ हो, अर्थात् तुम्हारे पृष्ठ पर सदा ही देवयज्ञ या अग्निहोत्र होते रहे हैं। अतः मैं भी तुम्हारे पृष्ठ पर अन्नाद (हव्यान्नभक्षी) अग्नि का आधान करता हूँ, जिससे वह अग्नि अदनीय (भक्षणीय) अन्नादि हव्य का भक्षण करके उसकी सुगन्ध को चारों ओर फैलाकर वातावरण को शुद्ध एवं रोग-परमाणुओं से रहित कर सके। शतपथ ब्राह्मण कहता है कि जैसे नवजात बच्चे को उस के भक्षण योग्य मातृ स्तन का दूध दिया जाता है, ऐसे ही नवजात अग्नि को उसके अदन के योग्य ही हव्यान्न दिया जाना चाहिए, अतःअन्नाद्य ( अद्य-अन्न) शब्द रखा गया है। * अन्नाद्याय’ का दूसरा भाव यह भी हो सकता है कि ‘भक्षणीयअन्न’ की प्राप्ति के लिए मैं अग्नि का आधान करता हूँ। अग्नि में डाली हुई आहुति आकाश में मेघमण्डल उत्पन्न करके वृष्टि द्वारा अन्नोत्पत्ति में कारण बनेगी और मुझे भक्षणीय अन्न प्राप्त होगा।* अग्न्याधान पाद–टिप्पणियाँ १.श०२.१.४.१०-१४॥ २. तै०आ०७.५.१-३, तै०उ०शिक्षावल्ली५.१-४।। ३. भूरित्यग्नौप्रतितिष्ठति।भुवइतिवायौ।सुवरियादित्ये। | मह इतिब्रह्मणि।आप्नोति स्वाराज्यम्।आप्नोतिमनसस्पतिम्।। वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः।श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिःएतत्ततोभवति। -तै० आ०७.६.१.२, तै०उ०शिक्षावल्ली६.१,२। ४. यथासौद्यौर्बह्नी नक्षत्रैरैवंबहुर्भूयासम्इत्येवैतदाहयदाहद्यौरिवभूम्नेति। | –शे०२.१.४.८५.पृथिवीव वरिण्णेति । यथेयं पृथिवी उर्वी एवम् उरुर्भूयासम् इत्येवैतदाह। —श० २.१.४.२८अन्नाद्याय। अन्नं च तद् अद्यं चेति अन्नाद्यम् । ‘अद्यान्नाय’ इति प्राप्त आहिताग्न्यादित्वात्परनिपातः, पा० २.२.३६ ।।७. श० २.१.५.१। अग्न्याधान Post navigation PREVIOUS POST रामका परम मित्र महावीर हनुमानको आदर्श तथा अनुकरणीय जीवन

कैसा है वह वृहस्पति प्रभु

रामनाथ विद्यालंकार

यो रेवान् योऽअमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्द्धनः। स नः सिषक्तु यस्तुरः॥ -यजु० ३। २९ (यः) जो बृहस्पति जगदीश्वर (रेवान्) विद्या आदि धनों से युक्त है, (यः) जो (अमीवहार) आत्मिक एव शारीरिक रोगों को नष्ट करने वाला, (वसुवित्) ऐश्वर्य प्राप्त कराने वाला, और (पुष्टिवर्धनः) पुष्टि बढ़ानेवाला है, तथा (यः तुर:) जो शीघ्रकारी है (सः) वह (नः सिषक्तु) हमें प्राप्त हो। क्या तुम गर्व करते हो अपनी विशाल बहुमंजिली कोठियों पर, गगनचुम्बी रत्नजटित महलों पर, विस्तृत भूमिक्षेत्र पर, अपार धन-दौलत पर, हरे-भरे रसीले फलों वाले बाग बगीचों पर ? यह तुम्हारा गर्व क्षण- भर में चूर हो जायेगा, जब तुम बृहस्पति परमेश्वर के समस्त ब्रह्माण्ड में फैले हुए अपार ऐश्वर्य पर दृष्टि डालोगे। सूर्य, नक्षत्र और इनके असंख्य ग्रह। उपग्रहों को थोड़ी देर के लिए आँख से ओझल करके भी अपनी छोटी-सी भूमि के ऐश्वर्य को ही देख लो, तो भी तम्हारा ऐश्वर्यशाली होने का गर्व समाप्त हो जायेगा। पृथिवी पर फैली हुई प्रभु की सम्पदा सोना, चाँदी, रत्न, हीरे, मोती, पन्ने, विविध बहुमूल्य पदार्थों की खाने, नदियाँ, पर्वत, समुद्र, स्रोत, झरने, वनस्पतियाँ, रङ्ग-विरङ्गे पुष्प, रसभरे फल, अमृत पेय से अपनी छोटी-सी सम्पत्ति की तुलना तो करो। फिर यह भी सोचो कि जिस सम्पदा को तुम अपनी कह रहे हो वह भी तो तुम्हारी नहीं, प्रभु की ही बनायी और दी हुई है। तब शीष झुक जाएगा तुम्हारा उस ‘रेवान्’, अर्थात् रयिमान् यो धनवान् प्रभु के सम्मुख। फिर केवल भौतिक धनों का ही नहीं, अपितु विद्या, न्याय आदि धनों को भी वह स्वामी है। अन्य अनेक गुण भी उसके अन्दर हैं। वह ‘अमीवहा’ है, हमारे आत्मिक, मानसिक और शारीरिक रोगों को हर कर हमें स्वस्थ बनानेवाला है। प्रभुकृपा की रोगह अद्भुत बूटी के बिना ब्रह्माण्ड में फैली हुई असंख्यों बूटियाँ और उनके प्रयोक्ता सहस्रों चिकित्सकों की अनवरत चिकित्सा विफल हो जाती है। फिर इस बात को भी मत भूलो कि पृथिवी पर फैली हुई असंख्य ओषधियाँ भी तो प्रभु की ही उत्पन्न की हुई हैं। प्रभु ‘वसुविद्’ भी है, आध्यात्मिक और भौतिक धन मनुष्य को प्राप्त करानेवाला तथा धन-कुबेर बनानेवाला भी वही है। बृहस्पति प्रभु ‘पुष्टिवर्धन’ भी है, हमारी आत्मिक और शारीरिक पष्टि की पूँजी को बढ़ानेवाला भी है। वह प्रभ ‘तुरः’ है, त्वराशील है, हर क्षेत्र में त्वरा करनेवाला है। उसकी त्वरा या शीघ्रकारिता के बिना ब्रह्माण्ड के कार्य अलस गति से चलते हुए कभी पूर्ण ही न हों। सूर्योदय, चन्द्रोदय, ऋतुचक्र प्रवर्तन, ब्रह्माण्डलीलाप्रचालन सबको वह त्वराशील प्रभु ही करा रहा है। परन्तु परमेश्वर के इन गुणवर्णनों से कोई कार्य सिद्ध होनेवाला नहीं है, जब तक स्वयं अपने अन्दर इन गुणों को धारण न करें। इसीलिए भाष्यकार महर्षि दयानन्द स्वामी इस मन्त्र के भावार्थ में लिखते हैं-”मनुष्य जैसी प्रार्थना ईश्वर से करते हैं, वैसा उन्हें पुरुषार्थ भी करना चाहिए। ईश्वर ‘रेवान्’ अर्थात् विद्या आदि धनवाला है, ऐसा विशेषण कह सुन कर कोई कृतकृत्य नहीं हो सकता, अपितु उसे स्वयं भी परम पुरुषार्थ द्वारा विद्या आदि धन की वृद्धि और रक्षा निरन्तर करनी चाहिए। जैसे परमेश्वर अविद्या आदि रोगों को दूर करनेवाला है, वैसे मनुष्यों को भी उचित है कि स्वयं भी अविद्या आदि रोगों को निरन्तर दूर करें । जैसे वह सबकी पुष्टि को बढ़ाता है, वैसे मनुष्य भी सबके पुष्टि आदि गुणों को निरन्तर बढ़ावें । जैसे वह शीघ्रकारी है, वैसे ही मनुष्य भी अभीष्ट कार्य त्वरा से करें ।”

#राजा_महेंद्र_प्रताप_सिंह

आजाद हिंद सरकार के संस्थापक महान स्वतन्त्रता सेनानी #राजा_महेंद्र_प्रताप_सिंह(1 दिसम्बर 1886-29 अप्रैल1979) जयंती

राजा महेंद्र प्रताप का जन्म मुरसान के राजा बहादुर घनश्याम सिंह के यहाँ खड्ग सिंह के रूप में हुआ।
बाद में उन्हें #हाथरस के राजा हरिनारायण सिंह ने गोद ले लिया व उनका नाम महेंद्र प्रताप रखा।

उन्होने #निर्बल समाचार पत्र की स्थापना की व भारतीयों में स्वतन्त्रता के प्रति जागरूकता लाने का काम किया।

वे विदेश गए कई देशों से भारत की स्वतंत्रता के लिए सहयोग मांगा और इसके बाद #काबुल अफगानिस्तान में देश की प्रथम #आजाद_हिंद_सरकार की स्थापना की।
वहां आजाद हिंद फौज बनाई और अखंड भारत के प्रथम राष्ट्रपति के मानक पद पर आसीन हुए। लेकिन सु वे वहां कामयाब नहीं हो सके।
अंग्रेजों ने इनके #सिर पर इनमे रख दिया था व इसके बाद उनका राज्य हड़प लिया था।

इसके बाद वे दुनिया भर के देशों में समर्थन के लिए घूमे जापान में उन्होंने एग्जेक्युटिव बोर्ड ऑफ इंडिया की स्थापना की और रास बिहारी बोस उनके उपाध्यक्ष थे।
इस दौरान उन्हें
जापान से मार्को पोलो, जर्मनी ने ऑर्डर ऑफ रेड ईगल की उपाधि दी थी। वे चीन की संसद में भाषण देने वाले पहले भारतीय थे।
वे दलाई लामा से भी मिले थे।

बहुत से देशों में पहुँचे व भारतीयों पर हो रहे अत्याचार के बारे में विश्व को जागृत किया।दुनियाभर में फैले भारतीयों व उनके संगठनों को एक किया व फौज के निर्माण के।लिए प्रोत्साहित किया

उन्होंने ग़दर पार्टी के साथ मिलकर भी आजादी के लिए कार्य किया व फौज तैयार करने के लिए सारी योजनाएं बना ली।

फिर जापान से सब तैयार कर लिया लेकिन ऐन मौके पर जापानी मनमानी करते दिखे और अपमानजनक शर्ते रखने लगे तो राजा साहब ने उन्हें फटकार दिया और कहा कि वे अपने अनुसार कार्य करेंगे वे देश को आजाद कराने के लिए लड़ रहे हैं न कि फिर से गुलाम करने के लिए। इस पर जापानी बिफर पड़े उन्हके नजरबंद कर दिया। उसके बाद राजा साहब की सहमति से रास बिहारी बोस जी अध्यक्ष बने। इसी बोर्ड का नाम योजना के हिसाब से आजाद हिंद फौज रखा गया और दूसरी आजाद हिंद फौज तैयार हुई। इस तरह यह फौज एक दिन में नहीं बनी थी बल्कि राजा साहब के पूरे जीवनकाल का तप थी। उसके कुछ समय बाद आजाद हिंद फौज की बागडोर संभालने के लिए नेताजी को बुलाया गया था।

वे विश्वयुद्ध में अंग्रेजो का साथ देने के विरुद्ध थे और उन्होंने इस पर गांधी जी का विरोध किया।

उन्होंने विश्व मैत्री संघ की स्थापना की,उसी तर्ज पर आज uno बनने की शुरुआत हुई थी।

वे 32 सालों तक देश के लिए अपना परिवार छोड़कर दुनिया भर की खाक छानते रहे।
जब वे वापिस भारत पहुंचे तो #सरदार_पटेल जी की बेटी #मणिकाबेन उन्हें हवाई अड्डे पर लेने पहुंची थी।

1952 में उन्हें #नोबल पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया था।

1909 में वृन्दावन में #प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की जो तकनीकी शिक्षा के लिए भारत में प्रथम केन्द्र था। मदनमोहन मालवीय इसके उद्धाटन समारोह में उपस्थित रहे। ट्रस्ट का निर्माण हुआ-अपने पांच गाँव, वृन्दावन का राजमहल और चल संपत्ति का दान दिया। राजा साहब #श्रीकृष्ण भक्त थे उन्ही के नाम पर उन्होंने देश का यह प्रथम तकनीकी प्रेम महाविद्दालय खोला था।उन्होंने अपनी आधी सम्पति इस विद्यालय को दान कर दी थी।

बनारस #हिंदू विश्वद्यालय, अलीगढ़ विद्द्यालय, #कायस्थ पाठशाला के लिए जमीन दान में दी। हिन्दू विश्वविद्यालय के बोर्ड के #सदस्य भी रहे।

उनकी दृष्टि विशाल थी। वे जाति, वर्ग, रंग, देश आदि के द्वारा मानवता को विभक्त करना घोर अन्याय, पाप और अत्याचार मानते थे। ब्राह्मण-भंगी को भेद बुद्धि से देखने के पक्ष में नहीं थे।

वृन्दावन में ही एक विशाल फलवाले उद्यान को जो 80 एकड़ में था, 1911 में #आर्य_प्रतिनिधि_सभा उत्तर प्रदेश को दान में दे दिया। जिसमें आर्य समाज द्वारा संचालित वृन्दावन गुरुकुल है और राष्ट्रीय विश्वविद्यालय भी है।

मथुरा में किसानों के लिए #बैंक खोला, अपने राज्य के गांवों में प्रारंभिक #पाठशालाएं खुलवाई।

उनकी राष्ट्रवादी सोच के कारण कांग्रेस के नेता उन पर RSS का #एजेंट होने का आरोप लगाते रहते थे।

उन्होंने चुनावों में बड़े बड़े दिग्गजों को धूल चटा दी थी।
उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार होते हुए भी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री #अटल बिहारी वाजपेयी जी की जमानत जब्त करवा दी थी।

उन्होंने छुआछूत को कम करने के लिए दलितों के साथ एक राजा होते हुए भी खाना खाया जो उस समय एक असामान्य बात थी।उन्होके #चर्मकार समाज को जाटव की उपाधि दी थी।

उन्होंने अपनी सारी #संपत्ति देश और शिक्षा के लिए दान कर दी थी।
अपनी अफगानिस्तान यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी जी ने भी अपने भाषण में इनको नमन किया था।

आप गर्व से अपने नाम के आगे “आर्य पेशवा” लगाते थे। आपने अनेक आर्यसमाजों को अनुदान भी दिया था और स्थापना भी की थी। जिसमें से एक झज्जर जिले का खेड़ी आसरा आर्यसमाज हैं।

ऐसे महान दानवीर स्वतन्त्रता सेनानी राष्ट्रवादी समाज सुधारक राजा महेंद्र प्रताप को उनकी जयंती पर उन्हें कोटि कोटि नमन।

आविष्कार 

आविष्कार 

         गणित संख्याओं का विज्ञान है जानते हो, संख्या का अर्थ क्या होता है ? ‘संख्या’ का अर्थ होता है पूर्ण ज्ञान, निश्चयात्मक ज्ञान, पूरी जानकारी। गणित में जानकारी तो निश्चयात्मक होती है; पर निश्चय तक पहुंचने के लिए कल्पना का सहारा भी लेना पड़ता है। गणित के सवाल हल करते समय कभी तुमने भी इस तरह की कल्पना की होगी- ‘माना कि….’ । ऐसी कल्पना हम किसी के भी बारे में कर सकते हैं। आयो ! आज ऐसा ही एक सवाल करें।

           माना कि तुम दुनिया के पहले आदमी  हो और सोते से जागने पर पूरब की दिशा में उषा के सौंदर्य को देख रहे हो। अंधेरे के बाद उषा का लाल लाल प्रकाश बहुत आनंद दे रहा है न ! मालूम पड़ रहा होगा जैसे सारा सुख तुम्हारे ऊपर उंडेला जा रहा हो । सूरज की पहली किरण भी देखी होगीजैसे वही है हाथ, जो तुम पर सुख और आनन्द की वर्षा कर रहा है। हाथ अकेला है । वर्षा करनेवाला दिखाई नहीं देता। उषा भी अकेली, और यह हाथ भी अकेला, और तुम ? तुम भी अकेले । क्या लगता है यह सब तुम्हें ? अनुभव होता होगा, ‘मैं हूँ और यह उषा है, और यह हाथ है, सुख और आनंद बरसाने वाला’। कल्पना अच्छी लग रही है न ? मन में इच्छा जाग रही होगी कि उसको देखें जो सुख बरसाता है, जो आनंद बरसाता है, जो प्रकाश बरसाता है और अंधकार का नाश करता है । जानना चाहते होंगे कि कौन है वह ? कैसा होगा वह ? कितना बड़ा होगा वह ? कितने रूप वाला होगा वह ? हाँ, यह तो मन में निश्चित रूप से होगा कि वह रात के अंधेरे की तरह नहीं हो सकता; उससे भिन्न होगा; प्रकाश का केंद्र होगा। वह केवल मेरे लिए होगा, किसी और के लिए नहीं होगा। मैं सिर्फ उसके लिए होऊंगा, किसी और के लिए नहीं।

          मान रहे हो न तुम, कि तुम सबसे पहले आदमी हो और सबसे पहली उषा को देख रहे हो. सबसे पहली किरण को देख रहे हो ? लो, तैयार हो जाओ, वह आ रहा है जिसकी सबसे पहली किरण, पहला हाथ देख रहे थे। वह सुख का दाता, प्रकाश का दाता, आनन्द का दाता । कौन है वह ? वह गोले का ऊपरी हिस्सा दिखा । वह ऊंचा होता जा रहा है । आधा गोला हो गया। अब पूरा हो रहा है । तपे हुए सोने का गोला । सुनहरा प्रकाश का गोला। सूख और आनंद और प्रकाश क्या इसी में भरे हुए थे ? हां, इसी में । क्या यह किसी की गेंद है या गुब्बारा है जिसमें सुख भरा हुआ है ? अगर ऐसा होता तो यह फूटता, तब.सुख बिखेरता। यह तो सुख का पुज है, प्रकाश का पूज है। पता नहीं चलता कि इसने कौन से हाथ से सुख बरसाया था ? न जाने कितने हाथ हैं इसके ? कहां छिपे थे ये सब ? क्या रात के अंधेरे में ? अंधेरे में तो नहीं छिप सकते। अंधेरा इसको रहता है वहां अंधेरा नहीं रह सकता। यह आज पहली बार ही थोड़े आया है। रोज़ाना आता होगा, रोज़ाना आता रहेगा। कैसे सोचा यह तुमने ? तुम तो पहले आदमी हो न ? निश्चय ही तुम्हारा मन कहता होगा कि यह इतना सुख एक दिन में नहीं बटोरा जा सकता; इसे बार बार बरसना चाहिए । और, इसके साथ ही, मन यह भी कहता होगा कि ‘हाँ, यह रोजाना बरसेगा क्यों कि इस सुख बरसाने वाले के अनेक हाथ हैं। कभी इससे बरसाएगा, कभी उससे बरसाएगा; पर बरसाएगा रोज़ । नियम से आकर बरसाएगा। यह मेरा मित्र है । बड़ा प्यारा मित्र, परम मित्र । ऐसा न होता तो मेरे लिए इतना सब कुछ क्यों लाता ।

समय बड़ा बलवान 

समय बड़ा बलवान

          जीवन में समय का बड़ा महत्त्व है समय से ही जीवन है । समय की शक्ति अपार है। अंगरेजी कहावत है, Time is money, समय धन है । समय बल भी है। समय को व्यर्थ खोना धन एवं शक्ति को खोना है।

         एक दार्शनिक ने कहा था- ‘समय के सिर पर प्रागे की तरफ लम्बे बाल हैं, पीछे का हिस्सा गंजा है जब वह सामने आ रहा हो तो पकड़ा जा सकता है । निकल गया तो हाथ मलते ही रह जायोगे अब पछताये होत वया, जब चिड़िया चुग गई खेत ।

           धन-दौलत तो परिश्रम और बुद्धि-कौशल से अजित कर लो, स्वास्थ्य पौष्टिक आहार एवं उचित उपचार से पुन: प्राप्त कर लो; भूली हुई विद्या भी अभ्यास से स्मरण कर लो; किन्तु बीता हुअा समय लौटाया नहीं जा सकताकाल का पहिया आगे ही आगे बढ़ता है, पीछे नहीं र लौटता ।

           सिकन्दर की चन्द साँसें ही शेष थीं। वह अन्त समय में अपनी मां से मिलना चाहता था। सब धन-दौलत, राज-पाट देने को तैयार था। पर उससे कुछ ज्ञान भी नहीं खरीद सका । सामान सौ बरस का, पल की खबर नहीं।

          रावण भी शुभ हितकारी कार्यों को कल पर टालता रहा । कल तो कभी पाया नहीं; काल आगया इसी लिए कहा है-

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।

पल में परले होयगी, फेरि करेगो कब ॥

         युधिष्ठिर ने एक भिक्ष से कहा-कल पाना, हम कल देंगे । भीम ने उठकर ढोल बजाना शुरू किया, और कहा, ‘धर्मराज ने काल को जीत लिया है। इन्हें कल के बारे में पक्का पता है। कल ये रहेंगे, भिक्षु भी रहेगा, धन भी रहेगा और देने का मन भी रहेगा। युधिष्ठिर का भूल का अहसास हुआ । उसी समय दान किया। यह जीवन थोड़ा है। कब यमराज का बुलावा पाजाये, क्या पता ? अतः पल-पल का सदुपयोग कर लेना है । एक पल से अधिक हमारे हाथ और कुछ भी नहीं है । प्राने बाला क्षण भविष्य है; जाने वाला क्षगा भूत है वर्तमान क्षण ही तो हमारी मम्पदा है । उसे सम्हाल लो, भूतभविष्य दोनों सम्हल जायेंगे । गप्पा में, व्यर्थ की चर्चानों में, दुव्यसनों में समय नहीं गंवाना है । सिनेमा, शतरंज, ताश. ग्रादि मैं मग्न होकर कहते हैं समय काट रहे हैं। ममय काट रहे हैं या ममय हमें काट रहा है ? जो समय की उपेक्षा करते हैं, समय उन्हें बरबाद कर देता है। समय बड़ा बलवान है-

तुलसी नर का पया बड़ा, समय बड़ा बलवान ।

नीलन लूटी गोफि  का, यहि अर्जुन वहि बाण ॥

         गांधी जी बहुत व्यस्त होते हुए भी समय का पूरा लाभ उठाते थे । दातीन करते समय मन में गीता के एक प्रलोक का मनन करते-करते उसे कठस्थ कर लेते थे । इस प्रकार उन्होंने अनेक श्लोक, मंत्र कंठस्थ किये थे। समय के बदले विद्या, वृद्धि, ग्रारोग्य, लक्ष्मी. ध्यान. समाधि ग्रादि को खरीदा जा सकता हैं । भगवान ने हमें प्रचुर समय रूपी धन देकर भेजा है। हम उसे कैसे खर्च कर रहे हैं ? सीता मासे जीवन निर्माण के लिए या विनाश के लिए ? स्वामी ‘विदेह’ की ‘गाथा’ पढ़ कर विदित हुया कि वे किम प्रकार नियम व अनुशासन से समय का लाभ उठाते थे, तभी तो अल्प समय में इतना वेद-प्रचार का कार्य कर पाये । स्वामी जी प्राय: प्रवचन में कहते थे, ‘कलाई में बंधी घड़ी भी हंसती है, रोती है। जो घड़ी का ख्याल करके ठीक समय पर कार्य करते हैं उन की घड़ी हँसती है । जो समय की उपेक्षा करते है उनकी घड़ी रोती है। हम निरीक्षण करें अपनी २४ घण्टे की दिनचर्या को । किस प्रकार का है हमारा समय विभाजन । आलस्य, प्रमाद को त्यागना है । समय के मूल्य को प्रांकना है। एक-एक क्षण का भरपूर सलाम लेना है। न अपना समय व्यर्थ करना है, न दूसरों के समय को नष्ट करना है। वक्त की कद्र करनी है।

ब्रह्म की आंधी

ब्रह्म की आंधी

यथा वातश् च्यावयति भूम्या रेणुमन्तरिक्षा चाभ्रम् ।

एवा मत सर्व दुर्भूतं ब्रह्मनुत्तमपायति ।

          जब मैं ईश्वरीय नियमों के अनुसार प्रकृति में घटित होने- वाले घटनाचक्र पर दृष्टिपात करता हूँ तब मेरा मानस किसी किसी घटनाचक्र से तरंगित हो उठता है। मैं सोचने लगता है कि यह घटना मेरे अन्दर भी क्यों नहीं घटित होतीआज मेरा ध्यान ‘वायु’ की ओर गया है। अभी प्रबल झंझावात आया था, सामने के मैदान की धूल को उड़ा ले गया और अब यह भू-प्रदेश नितान्त स्वच्छ हो गया है। इस वायु की एक और करामात देखो, अांधी के बाद वृष्टि होने लगी है। आकाश में जो मेघ- घटाएं छायी हुई थीं, उन्हें झकझोर कर वायु ने नीचे बरसा दिया है जिससे भूमि वर्षा से स्नात होकर और भी अधिक निखर उठी है।

         मैं चाहता हूँ कि मेरे अन्दर भी झंझावात उठे, ब्रह्म की अांधी पाये, ईश्वरीय भावों और वैदिक भावनाओं का सांय-सांय करता हुया अंधड़ उठे । मेरे हृत्पटल पर और मस्तिष्क-भूमि में जो दुर्भावों, पापों और वासनाओं की बहुत सी धूल एकत्र हो गई है उसे वह उड़ा ले जाये तथा मेरे अन्तःकरण और मस्तिष्क को निर्मल कर दे । जैसे कभी-कभी आकाश में जल-भरे बादल छाये रहने पर भी बरसते नहीं, वैसे ही मेरे प्रात्माकाश में भी सद्भावों और सद्गुणों के बादल छाए हुए हैं । पर बरस नहीं रहे। ब्रह्म-रूप पवन, ईश्वर और वेद का प्रबल प्रभंजन उन सद्भावों और सद् गणों को झकझोर कर मेरे हृदय और मस्तिष्क पर बरसा दे। दुर्भावों के उड़ चुकने से निर्मल हुया हृदय और मस्तिष्क उन सद्भावों और सद्गुणों को आत्मसात् कर लेने के लिए योग्य भूमि सिद्ध होगा

         प्रायो, साधना द्वारा हम अपने अन्दर ब्रह्म की आंधी  उठाए और समस्त ‘दुर्भूत’ को उस आंधी के झोंके से उड़ाकर मन और मस्तिष्क की भूमियों को पवित्र कर लेवें।

वैदिक ईश्वर भक्ति

वैदिक ईश्वर भक्ति

    इस वर्णाश्रम धर्म के पालन में मनुष्य को अविचल और समर्थ बनाने के लिये है। कर्त्तव्य-पालन की शक्ति प्राप्ति के लिये हम शक्ति-भण्डार प्रभु के चरणों में बैठते हैं। ईश्वर शक्ति का अर्थ ईश्वर को रिश्वत देना खुशामद करना या गा, रिझाकर पापों के फल से छुट्टी पा लेना नहीं है, किन्तु ऐसी शक्ति और स्वभाव प्राप्त करना है। जिससे पाप और अपराध होवें ही नहीं। वेद की ईश्वर भक्ति अत्यन्त सरल हैईश्वर एक है- दो चार या दस बीस नहीं। यों उस एक ही ईश्वर के गुण कर्म और स्वभाव परक असंख्य नाम हैं पर उसका मुख्य और निज नाम ‘ओ३म्’ है। सारे संसार के मनुष्य उस एक ओ३म् प्रभु के पुत्र होने से सभी आपस में भाई-भाई हैं। पिता को प्रसन्नता इसी में है कि सभी भाई परस्पर मिलकर प्रेम पूर्वक रहें और एक दूसरे को सूखी बनाने के विचार से कार्य करें। परम पिता परमात्मा की सच्ची पूजा भी प्रभु की प्रजा की निष्काम सेवा-साधना ही है. ‘पञ्च महायज्ञों’ का विधान इसी दृष्टि से है। सब सबके सुख के लिए सोचें, सब सबके सुख के लिए कार्य करें। सब सबके सुख के लिए जियें यही वैदिक ईश्वर भक्ति का व्यावहारिक रूप है।

वैदिक ईश्वर भक्ति

वैदिक ईश्वर भक्ति

   इस वर्णाश्रम धर्म के पालन में मनुष्य को अविचल और समर्थ बनाने के लिये है। कर्त्तव्य-पालन की शक्ति प्राप्ति के लिये हम शक्ति-भण्डार प्रभु के चरणों में बैठते हैं। ईश्वर शक्ति का अर्थ ईश्वर को रिश्वत देना खुशामद करना या गा, रिझाकर पापों के फल से छुट्टी पा लेना नहीं है, किन्तु ऐसी शक्ति और स्वभाव प्राप्त करना है। जिससे पाप और अपराध होवें ही नहीं। वेद की ईश्वर भक्ति अत्यन्त सरल हैईश्वर एक है- दो चार या दस बीस नहीं। यों उस एक ही ईश्वर के गुण कर्म और स्वभाव परक असंख्य नाम हैं पर उसका मुख्य और निज नाम ‘ओ३म्’ है। सारे संसार के मनुष्य उस एक ओ३म् प्रभु के पुत्र होने से सभी आपस में भाई-भाई हैं। पिता को प्रसन्नता इसी में है कि सभी भाई परस्पर मिलकर प्रेम पूर्वक रहें और एक दूसरे को सूखी बनाने के विचार से कार्य करें। परम पिता परमात्मा की सच्ची पूजा भी प्रभु की प्रजा की निष्काम सेवा-साधना ही है. ‘पञ्च महायज्ञों’ का विधान इसी दृष्टि से है। सब सबके सुख के लिए सोचें, सब सबके सुख के लिए कार्य करें। सब सबके सुख के लिए जियें यही वैदिक ईश्वर भक्ति का व्यावहारिक रूप है।