वैदिक धर्म सर्वोत्तम व सबके लिए लाभकारी होने पर भी लोगों का मत-मतान्तरों को महत्व देना आश्चर्यज

वैदिक धर्म सर्वोत्तम व सबके लिए लाभकारी होने पर भी लोगों का मत-मतान्तरों को महत्व देना आश्चर्यज

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       मनुष्य यद्यपि अन्य प्राणियों की तरह ही एक प्राणी है परन्तु इसकी विशेषता है कि परमात्मा ने इसको बुद्धि दी है, दो पैर चलने के लिये तथा दो हाथ अनेकानेक कार्यों को सम्पादित करने के लिये दिये हैं। मनुष्यों की तरह इस प्रकार की सुविधा अन्य प्राणियों के पास नहीं है। यह सत्य है कि अनेक बातों में पशु व पक्षी मनुष्यों से भी अधिक लाभ में है। पशुओं को अपना जीवन व्यतीत करने के लिये मनुष्यों की तरह न तो बड़े-बड़े सुविधाजनक भवन चाहियें, न धन और न सुख सुविधा की वस्तुयें कार व वस्त्र आदि। सभी पशु जल में तैरना जानते हैं। राजस्थान जहां रेगिस्तान है वहां के भी यदि किसी पशु को किसी नदी या सरोवर में डाल दिया जाये तो वह तैरना जानता है जबकि उसने कभी नदी व सरोवर के दर्शन नहीं किये होते।

       सभी पक्षी जन्म लेने के कुछ ही दिन बाद उड़ना सीख जाते हैं परन्तु मनुष्यों का पक्षियों की तरह वायु में उड़ना सम्भव नहीं है। मनुष्य ने अपनी बुद्धि बल से उन सब साधनों को प्राप्त किया है जो अन्य प्राणियों को सुलभ हैं। वह पानी के जहाज या नाव में बैठकर एक प्रकार से पानी पर चल सकता व दौड़ सकता है तथा वायुयानों में बैठकर पशुओं से भी अधिक तीव्र गति से एक स्थान से दूसरे स्थान पर आ जा सकता है। मनुष्य के पास बुद्धि है जिसका विषय ज्ञान प्राप्ति व उसका सदुपयोग करना है। जो व्यक्ति ज्ञानहीन होता है उसे बुद्धिहीन कहा जाता है। ज्ञान उसे कहते हैं जिससे किसी भी वस्तु, पदार्थ तथा विषय को सत्य, यथार्थ व वास्तविक रूप में जाना जाये। मनुष्य इस संसार को देखता है तो जिज्ञासा होती है कि यह संसार स्वयं बना या किसी सत्ता के द्वारा बनाया गया है। इस प्रश्न का उत्तर ज्ञान से मिलता है।

       वर्तमान युग में ज्ञान की पर्याप्त मात्रा में उन्नति हो जाने पर भी शिक्षित व विद्वान कहे जाने वाले बुद्धिजीवियों को भी इस प्रश्न का यथार्थ उत्तर पता नहीं है। ज्ञान व तर्क आदि से विवेचन करने पर यह ज्ञात होता है कि संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो स्वतः बिना बनाये बन जाये। इसलिये इस संसार की रचना भी किसी सत्ता व शक्ति, जो चेतन ही हो सकती है, हुई है। इसका उत्तर न तो विज्ञान की पुस्तकों में और न ही मत-मतान्तरों की पुस्तकों में ठीक-ठीक मिलता है। जो मत-मतान्तर ईश्वर या सृष्टिकर्ता की सत्ता को मानते हैं, वह भी ईश्वर के सत्यस्वरूप से परिचित व सुविज्ञ नहीं है। उनकी मतों की पुस्तकों को देखने पर विदित होता है कि उनके मत में ईश्वर का जो स्वरूप है वह तर्क एवं युक्तिसंगत नहीं है। ईश्वर का सत्य स्वरूप केवल वेद और वेदविश्वासी ऋषियों के ग्रन्थ यथा दर्शन एवं उपनिषदों में ही सुलभ होता है। न केवल ईश्वर का स्वरूप व उसके गुण, कर्म व स्वभावों का ज्ञान वेद एवं वैदिक साहित्य से होता है अपितु अन्य अनेक विषयों जीवात्मा का स्वरूप व उसके गुण, कर्म व स्वभाव, मनुष्यों के कर्तव्य, उपासना की विधि, वायु, जल व पर्यावरण शुद्धि के उपाय व साधन ‘अग्निहोत्र यज्ञ’ आदि अनेक विषयों का ज्ञान भी वेद एवं वैदिक साहित्य से होता है। अतः वेदों का स्थान मत-मतान्तरों की पुस्तकों से कहीं अधिक ऊंचा है।

       वैदिक धर्म की विशेषता यह है कि वेदों में ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति का सत्यस्वरूप पाया जाता है। वेद सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर से मनुष्यों को प्राप्त धर्म के ग्रन्थ हैं। वेदों में सभी सत्य विद्यायें बीज रूप में पायी जाती हैं। वेदों की भाषा संसार की सभी भाषाओं से श्रेष्ठ होने के साथ सब भाषाओं की जननी भी है। संस्कृत भाषा का शब्द भण्डार भी अन्य सब भाषाओं से अधिक है। वेदों में जो संस्कृत है उसके सभी शब्द रूढ़ न होकर यौगिक व योगरूढ़ हैं।

     सभी शब्दों की रचना का एक निश्चित कारण व नियम है। संसार की अन्य सभी भाषाओं के शब्द रूढ़ हैं। देवनागरी लिपि भी संसार की सर्वश्रेष्ठ लिपि है। वेदों का अध्ययन करने पर मनुष्य जीवन का उद्देश्य क्या है, इसका ज्ञान होता है जबकि मत-मतान्तरों की पुस्तकों से जीवन के उद्देश्य वा लक्ष्य का ज्ञान नहीं होता। वेद ईश्वर, जीवात्मा और मूल-प्रकृति को अनादि व नित्य तथा नाशरहित मानते हैं जबकि मत-मतान्तरों की पुस्तकों में इस विषयक प्रामाणिक ज्ञान का अभाव है। यह सृष्टि किसने बनाई इसका वैदिक उत्तर है कि ईश्वर ने समस्त चराचर जगत व सृष्टि को बनाया है। क्यों बनाया है, इसका भी उत्तर मिलता है।

     ईश्वर इस सृष्टि को अनादि व नित्य जीवात्माओं को पूर्व कल्प, सृष्टि व जन्मों के कर्मों के सुख व दुःख रूपी फलों का भोग कराने के लिये बनाया है। जीवात्माओं को उनके पूर्वजन्मों के कर्मों के अनुसार सुख व दुःख रूपी फल का भोग कराने के लिये ही परमात्मा ने आत्माओं को नाना प्रकार के शरीर दिये हैं। संसार में जो सुख व दुःख की वस्तुयें हैं, वह भी परमात्मा ने जीवों को उनके कर्मों का फल प्रदान करने के लिये ही बनाईं हैं। अतः इन सब सत्यज्ञानयुक्त बातों के कारण संसार में वेद सभी मत-मतान्तरों के ग्रन्थों से अधिक सार्थक, उपयोगी व लाभकारी है। ऋषि दयानन्द ने अपने वेदों के वैदुष्य के आधार पर कहा है कि सभी मत-मतान्तर अविद्या से युक्त हैं और विषसम्पृक्त अन्न के समान त्याज्य हैं।

     ऐसा होने पर भी मत व पन्थों के आचार्य अपनी अविद्या एवं स्वार्थों के कारण अपने अनुयायियों को वेद की सच्चाईयों को न तो स्वयं बताते हैं और न उन्हें जानने का ही परामर्श देते हैं। वर्तमान में तो अनेक मतमतान्तरों का उद्देश्य संसार में अपनी जनसंख्या बढ़ाकर उन उन देशों की सत्ता पर कब्जा करना भी है। इन मतों वा इनके अनुयायियों में निर्दोष मनुष्यों के प्रति अहिंसा का भाव भी दृष्टिगोचर नहीं होता जो कि किसी भी धर्म या मत के लिये अनिवार्य होना चाहिये। अतः संसार में ऐसे लोगों को देखकर आश्चर्य होता है कि यह सत्य से अपरिचित होकर अपना अनमोल अमृत जीवन वृथा कर रहे हैं जिसमें यह लोग स्वयं व उनके आचार्य भी समान रूप से दोषी व उत्तरदायी हैं।

       ज्ञान विज्ञान से परिपूर्ण ऋषियों की मान्यता है कि वेदों का ज्ञान सत्य एवं यथार्थ हैं तथा इसमें मनुष्य के जीवन को व्यतीत करने के लिये सत्य सिद्धान्तों का सभी मनुष्यों की आवश्यकता के अनुरूप ज्ञान व विधान है। मनुष्य का धर्म मानवीय गुणों को धारण करना है।

      मनुस्मृति में धर्म के 10 लक्षण बताते हुए कहा गया है कि मनुष्य धार्मिक है या नहीं इसकी पहचान धर्म के दस लक्षणों से होती है। यह दस लक्षण धैर्य, क्षमा, इच्छाओं का दमन, चोरी न करना, शरीर, मन, विचारों व भावों की शुद्धता व पवित्रता, इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धिमान वा ज्ञानवान होना, विद्यावान होना, सत्याचरण करना, क्रोध न करना ही धर्म के दस आवश्यक लक्षण है। यह धर्म के दस लक्षण राम, कृष्ण, दयानन्द जी आदि के जीवन में पूर्णतः विद्यमान थे। आजकल जितने भी मत-मतान्तर हैं, उनमें इन गुणों में से अनेक गुणों का अभाव देखा जाता है। वह इन सभी गुणों को धारण करने पर बल नहीं देते।

      इन गुणों के विपरीत गुण वा अवगुण भी उनमें पाये जाते हैं तथा उन्हें बुरा नहीं माना जाता। मांसाहार भी ऐसी ही बुराई है। मत-मतान्तरों की पुस्तकों में इन सभी गुणों का उल्लेख नहीं है। देश, समाज व व्यक्तिगत उन्नति का एक नियम है कि अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। वैदिक धर्मियों को इसका पालन करने की पूरी छूट है व वह ऐसा करते भी हैं। मत-मतान्तरों में अकल अर्थात् बुद्धिपूर्वक सही व गलत मान्यताओं के पक्ष-विपक्ष में सोचने व प्रश्न करने की छूट नहीं है। कहा जाता है कि धर्म में अकल का दखल नहीं है।

      ऐसी अनेक बातों के कारण केवल वैदिक मत ही सच्चा मानव धर्म सिद्ध होता है। आश्चर्य है कि सच्चे मानव धर्म वैदिक धर्म को मानने वाले संसार में कम लोग हैं और इसके विपरीत मानने वाले लोगों की संख्या कहीं अधिक हैं। इस स्थिति में कोई सच्चा बुद्धिमान व विवेकी पुरुष क्या कह सकता है? ऋषि दयानन्द ने लोगों तक धर्म की सत्य मान्यताओं का प्रचार करने का भरसक व प्राणपण से प्रयत्न किया परन्तु उसका सीमित प्रभाव ही हुआ है। संसार के 90 प्रतिशत से अधिक लोग इस ज्ञान व विज्ञान के युग में भी ईश्वर के सत्य स्वरूप को नहीं जानते हैं। उन्हें ईश्वर की उपासना की सत्य विधि भी ज्ञात नहीं है। हमारे कर्म सत्य पर आधारित होने के साथ परोपकार, देश व समाजहित में होने चाहिये, इसका ज्ञान भी आज के शिक्षित लोगों को नहीं है। सत्य एक होता है परन्तु इसके विपरीत देश में नाना सामाजिक एवं राजनैतिक विचारधारायें हैं। जितने बड़े-बड़े घोटाले होते हैं वह सब शिक्षित व उच्च शिक्षित लोग ही करते हैं।

       सत्य को ग्रहण करने और असत्य का त्याग करने में सब मनुष्यों को सदैव तत्पर रहना चाहिये, इस नियम का आचरण आज की परिस्थितियों में होना सम्भव नहीं दीखता। सभी मतों के लोगों का आपस में मिलकर सत्य का निर्धारण न करना और अपने पुराने सत्यासत्य विचारों व मान्यताओं को ही मानते जाना, ज्ञान विज्ञान की दृष्टि तथा जीवात्मा व मनुष्य के भावी जीवन अर्थात् पुनर्जन्म के लिये उचित व सुखद नहीं है। मनुष्यों को अपने सभी अच्छे व बुरे अर्थात् सत्य व असत्य कर्मों के फलों को भोगना है। ईश्वर जीवों के सभी कर्मों का साक्षी होता है। वही कर्मफल प्रदाता व न्यायाधीश है। अतः कर्मों का फल मिलना अनिवार्य है। मत-मतान्तर के आचार्य व उनके अनुयायी यद्यपि सत्यासत्य का विचार नहीं करते, अतः यह आज के ज्ञान-विज्ञान के युग में आश्चर्यजनक है। इसका परिणाम सुखद कदापि न होकर सभी मनुष्यों के लिये असुखद व हानिकर ही होने की सम्भावना है।

      हमें वैदिक धर्म संसार का श्रेष्ठ व हितकर धर्म प्रतीत होता है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में महर्षि दयानन्द जी ने इस बात को स्पष्ट व सिद्ध किया है। इस वैदिक धर्म को स्वीकार न कर मत-मतान्तरों की विषसम्पृक्त अन्न के समान मान्यताओं को ही अधिकांश लोगों को मानना हमें आश्चर्यजनक एवं उनके लिये अहितकर प्रतीत होता है। इसलिये हमने इस विषयक कुछ चर्चा इस लेख में की है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

लोकनाथ बल

लोकनाथ बल

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      4 सितम्बर का दिन, सन 1930 में चटगाँव शस्त्रागार पर हमला करके अंग्रेजों को नाकों चने चबवा देने वाले क्रातिकारियों में से एक और इस हमले की अगुआई कर रहे मास्टर सूर्य सेन के साथी लोकनाथ बल का निर्वाण दिवस है| वर्तमान बांग्लादेश के चटगाँव जिले के धोरिया नामक गाँव में प्राणकृष्ण बल के घर 8 मार्च 1908 को जन्में लोकनाथ प्रारम्भ से ही माँ भारती को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने के स्वप्न देखने लगे थे| अपने इसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने स्वयं को सशस्त्र क्रान्ति की राह में झोंक दिया|

       18 अप्रैल 1930 को उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों के एक समूह ने उस आक्जलरी फ़ोर्स ऑफ़ इंडिया (AFI) के शस्त्रागार पर कब्ज़ा कर लिया, जो ब्रिटिश फ़ौज के अंतर्गत एक स्वैच्छिक और पार्ट टाइम फ़ोर्स थी| 22 अप्रैल को उनके ही नेतृत्व में ब्रिटिश फ़ौज और पुलिस के संयुक्त दल से क्रान्तिकारियों से सीधा मोर्चा लिया| इस भिडंत में लोकनाथ के छोटे भाई हरगोपाल बल सहित 12 क्रान्तिकारी माँ की बलिवेदी पर शहीद हो गए| लोकनाथ बच निकले और फ़्रांस के कब्जे वाले चन्द्रनगर पहुँच गए|

      बाद में 1 सितम्बर 1930 को वो ब्रिटिश पुलिस के साथ एक मुठभेड़ में पकडे गए और उन पर मुकदमा चलाया गया| 1 मार्च 1932 को उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गयी और सेल्युलर जेल भेज दिया गया, जहाँ से वो 1946 में स्वतंत्र हुए| मुक्ति के बाद वो महेन्द्रनाथ राय की रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी में शामिल हो गए|

     बाद में वो कांग्रेस में शामिल हो गए और आज़ादी के बाद 1 मई 1952 से 19 जुलाई 1962 तक कलकत्ता कारपोरेशन के सैकेंड डिप्टी कमिश्नर रहे| 20 जुलाई 1962 को उन्हें प्रोन्नत कर फर्स्ट डिप्टी कमिश्नर बनाया गया जिस पद पर वह 4 सितम्बर 1964 तक रहे, जब उनकी मृत्यु हो गयी| उनके निर्वाण दिवस पर कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

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लालबहादुर शास्त्री

लालबहादुर शास्त्री

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        ”हम चाहे रहें या न रहें, हमारा देश और तिंरगा झंडा रहना चाहिए और मुझे पूरा विश्वास है कि हमारा तिंरगा हमेशा ऊंचा रहेगा, भारत विश्व के देशों में सर्वोच्च होगा। यह उन सबमें अपनी गौरवाशाली विरासत का संदेश पहुंचाएगा।” ये शब्द भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री के हैं, जो उन्होंने लालकिले की प्राचीर से 15 अगस्त, 1965 को कहे थे।

       छोटी कद काठी में विशाल हृदय रखने वाले श्री शास्त्री के पास जहां अनसुलझी समस्याओं को आसानी से सुलझाने की विलक्षण क्षमता थी, वहीं अपनी खामियों को स्वीकारने का अदम्य साहस भी उनमें विद्यमान था। हृदय में छिपी देशप्रेम की चिंगारी से शास्त्रीजी को स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ जूझ मरने की शक्ति प्राप्त हुई। सन् 1965 में जब पड़ोसी देश पाकिस्तान ने हमारी सीमाओं का अतिक्रमण करने की भूल की तो उनका सरल स्वभाव उग्र होकर दहक उठा। उनकी ललकार का मनोबल पाकर भारतीय सैनिकों ने पाक-सेना को अपने इरादे बदलने के लिए विवश कर दिया। शास्त्रीजी के नारे ‘जय जवान, जय किसान’ ने किसानों और सैनिकों के माध्यम से देश में चमत्कार भरा उत्साह फूंक दिया।

      शास्त्रीजी प्रतिनिधि थे एक ऐसे आम आदमी के, जो अपनी हिम्मत से विपरीत परिस्थितियों की दिशाएं मोड़ देता है। एक साधारण परिवार में जन्मे और विपदाओं से जूझते हुए सत्य, स्नेह, ईमानदारी कर्तव्यनिष्ठा एवं निर्भीकता के दम पर विश्व के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश भारत के प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने की अपने आपमें एक अनोखी मिसाल हैं-लालबहादुर शास्त्री। आज देश को ऐसे ही सशक्त नेतृत्व की जरूरत है।

       लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को मुगलसराय, उत्तर प्रदेश में एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव (जो बाद में भारत सरकार के राजस्व विभाग के क्लर्क के पद पर आसीन हुए) और उनकी धर्मपत्नी रामदुलारी के पुत्र के रूप में हुआ था। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण बालक लालबहादुर श्रीवास्तव को परिवार वाले प्यार से नन्हें कहकर ही बुलाया करते थे। जब वे अठारह महीने का हुए, तब दुर्भाग्य से पिता का निधन हो गया और माँ रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्ज़ापुर चली गयीं। कुछ समय बाद नाना भी नहीं रहे और ऐसे में बिना पिता के बालक नन्हें की परवरिश करने में बालक के मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी माँ का बहुत सहयोग किया।

         ननिहाल में रहते हुए ही लालबहादुर ने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की और उसके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल में हुई। 17 वर्ष की अल्पायु में ही गाँधीजी की स्कूलों और कॉलेजों का बहिष्कार करने की अपील पर वे पढ़ाई छोड़कर असहयोग आंदोलन से संलग्न हो गए। परिणामस्वरूप वे जेल भेज दिए गए। जेल से रिहा होने के पश्चात्‌ उन्होंने काशी विद्यापीठ (वर्तमान महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ) में पढ़ाई आरंभ की। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलते ही उन्होंने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे शास्त्री लगा लिया और इसके पश्चात ‘शास्त्री’ शब्द ‘लालबहादुर’ के नाम के साथ ऐसा समबद्ध हुआ कि लोग इसे ही उनकी जाति समझने लग गए।

       स्नातकोत्तर के बाद वह गांधी के अनुयायी के रूप में फिर राजनीति में लौटे। सन्‌ 1926 में शास्त्रीजी ने इलाहाबाद को अपना कार्य-क्षेत्र चुना और 1929 में उन्होंने श्री पुरुषोत्तम दास टंडन के साथ ‘भारत सेवक संघ’ के इलाहाबाद इकाई के सचिव के रूप में काम किया। बाद में वे इलाहाबाद नगर पालिका, तदोपरांत इम्प्रुवमेंट ट्रस्ट के भी सदस्य रहे| स्वाधीनता आंदोलन के दौरान वे कुल सात बार जेल गए और अपने जीवन में कुल मिलाकर 9 वर्ष उन्हें कारावास की यातनाएँ सहनी पड़ीं। 1928 में उनका विवाह श्री गणेशप्रसाद की पुत्री ‘ललिता’ से हुआ। ललिता जी से उनके छ: सन्तानें हुईं, चार पुत्र- हरिकृष्ण, अनिल, सुनील व अशोक; और दो पुत्रियाँ- कुसुम व सुमन। उनके चार पुत्रों में से दो- अनिल शास्त्री और सुनील शास्त्री प्रभुकृपा से अभी भी हैं, शेष दो दिवंगत हो चुके हैं।

      अपने राजनैतिक सफ़र में उन्होंने संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) की कांग्रेस पार्टी में प्रभावशाली पद ग्रहण किए और 1937 एवं 1946 में वे संयुक्त प्रांत की विधायिका में निर्वाचित हुए। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात शास्त्री जी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था। वो गोविंद बल्लभ पंत के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में गृह एवं यातायात मंत्री बने। यातायात मंत्री के समय में उन्होंनें प्रथम बार किसी महिला को संवाहक (कंडक्टर) के पद में नियुक्त किया। प्रहरी विभाग के मंत्री होने के बाद उन्होंने भीड़ को नियंत्रण में रखने के लिए लाठी के जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारंभ कराया।

      1951 में जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व में वह अखिल भारत काँग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये। 1952 में वह संसद के लिये निर्वाचित हुए और केंद्रीय रेलवे व परिवहन मंत्री बने। इसी पद पर कार्य करते समय शास्त्रीजी की प्रतिभा पहचान कर 1952 के पहले आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी के चुनाव आंदोलन को संगठित करने का भार नेहरू जी ने उन्हें सौंपा। चुनाव में कांग्रेस भारी बहुमत से विजयी हुई जिसका बहुत कुछ श्रेय शास्त्रीजी की संगठन कुशलता को दिया गया। 1952 में ही शास्त्रीजी राज्यसभा के लिए चुने गए और उन्हें बहुत ही महत्वपूर्ण “रेल मंत्रालय” का दायित्व मिला।

      वर्ष 1954 में इलाहाबाद में महाकुंभ मेला लगा जिसमें करीब 20 लाख तीर्थयात्रियों के लिए व्यवस्था की गई। दुर्भाग्यवश मौनी अमावस्या स्नान के दौरान बरसात होने के फलस्वरूप बांध पर फिसलन होने से प्रात: 8.00 बजे दुर्घटना हो गई। सरकारी आंकड़ों ने 357 मृत व 1280 को घायल बताया, परंतु ग्राम सेवादल कैंप जिसकी देखरेख मृदुला साराभाई व इंदिरा गांधी कर रही थीं, की गणना के अनुसार यह संख्या दोगुनी थी। दुर्घटना पर जांच कमीशन बैठा जिसने डेढ़ वर्ष बाद रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और रेल अव्यवस्था को दोषी करार दिया। 1956 के मध्य में भी कुछ और रेल दुर्घटनाएं हो गईं, जिसमें 1956 में हुयी अडियालूर रेल दुर्घटना, जिसमें कोई डेढ़ सौ से अधिक लोग मारे गए थे, प्रमुख थी। शास्त्रीजी ने अपना नैतिक दायित्व मानते हुए रेलमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया और इनके इस निर्णय का देशभर में स्वागत किया गया|

      शास्त्रीजी को कभी किसी पद या सम्मान की लालसा नहीं रही। उनके राजनीतिक जीवन में अनेक ऐसे अवसर आए जब शास्त्रीजी ने इस बात का सबूत दिया। इसीलिए उनके बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि वे अपना त्यागपत्र सदैव अपनी जेब में रखते थे।

     अपने सद्गुणों व जनप्रिय होने के कारण 1957 के द्वितीय आम चुनाव में वे विजयी हुए और पुनः केंद्रीय मंत्रिमंडल में परिवहन व संचार मंत्री के रूप में सम्मिलित किए गए। सन्‌ 1958 में वे वाणिज्य व उद्योगे मंत्री बनाए गए। पं. गोविंद वल्लभ पंत के निधन के पश्चात्‌ सन्‌ 1961 में वे गृहमंत्री बने, किंतु सन्‌ 1963 में जब कामराज योजना के अंतर्गत पद छोड़कर संस्था का कार्य करने का प्रश्न उपस्थित हुआ तो उन्होंने सबसे आगे बढ़कर बेहिचक पद त्याग दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू जब अस्वस्थ रहने लगे तो उन्हें शास्त्रीजी की बहुत आवश्यकता महसूस हुई। जनवरी 1964 में वे पुनः सरकार में अविभागीय मंत्री के रूप में सम्मिलित किए गए और नेहरू की मृत्यु के बाद चीन के हाथों युद्ध में पराजय की ग्लानि के समय 9 जून 1964 को उन्हें प्रधानमंत्री का पद सौंपा गया।

       शास्त्रीजी को प्रधानमंत्रित्व के 18 माह की अल्पावधि में अनेक समस्याओं व चुनौतियों का सामना करना पड़ा किंतु वे उनसे तनिक भी विचलित नहीं हुए और अपने शांत स्वभाव व अनुपम सूझ-बूझ से उनका समाधान ढूँढने में कामयाब होते रहे। स्व. पुरुषोत्तमदास टंडन ने शास्त्री जी के बारे में ठीक ही कहा था कि उनमें कठिन समस्याओं का समाधान करने, किसी विवाद का हल खोजने तथा प्रतिरोधी दलों में समझौता कराने की अद्भुत प्रतिमा विद्यमान थी।

        कश्मीर की हजरत बल मस्जिद से हजरत मोहम्मद के पवित्र बाल उठाए जाने के मसले को, जिससे सांप्रदायिक अशांति फैलने की आशंका उत्पन्न हो गई थी, शास्त्रीजी ने जिस ढंग से सुलझाया वह सदा अविस्मरणीय रहेगा। देश में खाद्यान्न संकट उत्पन्न होने पर अमेरिका के प्रतिमाह अन्नदान देने की पेशकश पर तो शास्त्रीजी तिलमिला उठे किंतु संयत वाणी में उन्होंने देश का आह्वान किया- ‘पेट पर रस्सी बाँधो, साग-सब्जी ज्यादा खाओ, सप्ताह में एक शाम उपवास करो। हमें जीना है तो इज्जत से जिएँगे वरना भूखे मर जाएँगे। बेइज्जती की रोटी से इज्जत की मौत अच्छी रहेगी।’

       हालांकि भारत की आर्थिक समस्याओं से प्रभावी ढंग से न निपट पाने के कारण शास्त्री जी की आलोचना हुई, लेकिन जम्मू-कश्मीर के विवादित प्रांत पर पड़ोसी पाकिस्तान के साथ वैमनस्य भड़कने पर उनके द्वारा दिखाई गई दृढ़ता के लिये उन्हें बहुत लोकप्रियता मिली| उनको चाहने वाले लोगों को वो दिन आज भी याद आता है जब 1965 में अचानक पाकिस्तान ने भारत पर सायं 7.30 बजे हवाई हमला कर दिया था तो उस समय तीनों रक्षा अंगों के चीफ ने लालबहादुर शास्त्री से पूछा ‘सर आप क्या चाहते है आगे क्या किया जाए…आप हमें हुक्म दीजिए’ तो ऐसे में शास्त्री जी ने कहा कि “आप देश की रक्षा कीजिए और मुझे बताइए कि हमें क्या करना है?” ऐसे प्रधानमंत्री बहुत कम ही होते हैं जो अपने पद को सर्वोच्च नहीं वल्कि अपने पद को जनता के लिए कार्यकारी मानकर चलते है|

         सन्‌ 1965 के भारत-पाक युद्ध में उन्होंने विजयश्री का सेहरा पहना कर देश को ग्लानि और कलंक से मुक्त करा दिया। छोटे कद के विराट हृदय वाले शास्त्रीजी अपने अंतिम समय तक शांति की स्थापना के लिए प्रयत्नशील रहे। सन्‌ 1965 के भारत-पाक युद्ध विराम के बाद उन्होंने कहा था कि ‘हमने पूरी ताकत से लड़ाई लड़ी, अब हमें शांति के लिए पूरी ताकत लगानी है।’ शांति की स्थापना के लिए ही उन्होंने 10 जनवरी 1966 को ताशकंद में पाकिस्तानी राष्ट्रपति अय्यूब खाँ के साथ ‘ताशकंद समझौते’ पर हस्ताक्षर किए।

      भारत की जनता के लिए यह दुर्भाग्य ही रहा कि ताशकंद समझौते के बाद वह इस छोटे कद के महान पुरुष के नेतृत्व से हमेशा-हमेशा के लिए वंचित हो गई। 11 जनवरी सन्‌ 1966 को इस महान पुरुष का ताशकंद में ही हृदयगति रुक जाने से निधन हो गया। मरणोपरांत सन्‌ 1966 में उन्हें भारत के सर्वोच्च अलंकरण ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया गया। राष्ट्र के विजयी प्रधानमंत्री होने के नाते उनकी समाधि का नाम भी ‘विजय घाट’ रखा गया। भारत के अद्वितीय प्रधानमन्त्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री जी भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उनके द्वारा स्थापित नैतिक मूल्यों का वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में अभी भी महत्व है|

      शास्त्री जी के पुत्र सुनील शास्त्री की पुस्तक ‘लालबहादुर शास्त्री, मेरे बाबूजी’ के अनुसार शास्त्री जी आज के राजनीतिज्ञों से बिल्कुल भिन्न थे। उन्होंने कभी भी अपने पद या सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग नहीं किया। अपनी इस दलील के पक्ष में एक नजीर देते हुए उन्होंने लिखा है, ‘शास्त्री जी जब 1964 में प्रधानमंत्री बने, तब उन्हें सरकारी आवास के साथ ही इंपाला शेवरले कार मिली, जिसका उपयोग वह न के बराबर ही किया करते थे। वह गाड़ी किसी राजकीय अतिथि के आने पर ही निकाली जाती थी।’ किताब के अनुसार एक बार उनके पुत्र सुनील शास्त्री किसी निजी काम के लिए इंपाला कार ले गए और वापस लाकर चुपचाप खड़ी कर दी। शास्त्रीजी को जब पता चला तो उन्होंने ड्राइवर को बुलाकर पूछा कि कल कितने किलोमीटर गाड़ी चलाई गई और जब ड्राइवर ने बताया कि चौदह किलोमीटर तो उन्होंने निर्देश दिया, ‘लिख दो, चौदह किलोमीटर प्राइवेट यूज।’ शास्त्रीजी यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने अपनी पत्नी को बुलाकर निर्देश दिया कि उनके निजी सचिव से कह कर वह सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में पैसे जमा करवा दें।

       शास्त्रीजी की सादगी और किफायत का यह आलम था कि एक बार उन्होंने अपना फटा हुआ कुर्ता अपनी पत्नी को देते हुए कहा, ‘इनके रूमाल बना दो।’ इस सादगी और किफायत की कल्पना तो आज के दौर के किसी भी राजनीतिज्ञ से नहीं की जा सकती। पुस्तक में कहा गया है, ‘वे क्या सोचते हैं, यह जानना बहुत कठिन था, क्योंकि वे कभी भी अनावश्यक मुंह नहीं खोलते थे। खुद कष्ट उठाकर दूसरों को सुखी देखने में उन्हें जो आनंद मिलता था, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।’

     लालबहादुर शास्त्री अपनी सारी व्यस्ताओं के बावजूद अपनी मां के साथ कुछ पल बिताना नहीं भूलते थे और बाहर से चाहे वे कितना ही थककर आयें अगर मां आवाज देती थीं तो वह उनके पास जाकर जरूर बैठते थे। पुस्तक ”लालबहादुर शास्त्री, मेरे बाबूजी” में बताया गया है कि शास्त्री जी की मां उनके कदमों की आहट से उनको पहचान लेती थीं और बड़े प्यार से धीमी आवाज में कहती थीं ”नन्हें, तुम आ गये? और शास्त्री जी चाहे कितनी ही परेशानियों से लदे हुए आये हों, मां की आवाज सुनते ही उनके कदम उस कमरे की तरफ मुड़ जाते थे, जहां उनकी मां की खाट पड़ी थी।

       पुस्तक के अनुसार शास्त्री जी की मां रामदुलारी 1966 में शास्त्री जी के निधन के बाद नौ माह तक जीवित रहीं और इस पूरे समय उनकी फोटो सामने रख उसी प्यार एवं स्नेह से उन्हें चूमती रहती थीं, मानों वह अपने बेटे को चूम रही हों। सुनील शास्त्री के अनुसार उनकी दादी कहती थीं, इस नन्हे ने जन्म से पहले नौ महीने पेट में आ बड़ी तकलीफ दी और नहीं जानती थी कि वह इस दुनिया से कूच कर मुझे नौ महीने फिर सतायेगा। किताब के अनुसार शास्त्री जी के निधन के ठीक नौ माह बाद उनकी माता का निधन हो गया था। लेखक लिखते हैं, दादी का प्राणांत बाबूजी के दिवंगत होने के ठीक नौ महीने बाद हुआ। पता नहीं कैसे दादी को मालूम था कि नौ महीने बाद ही उनकी मृत्यु होगी।

       शास्त्रीजी की मृत्यु को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे। बहुतेरे लोगों का, जिनमें उनके परिवार के लोग भी शामिल हैं, मत है कि शास्त्रीजी की मृत्यु हार्ट अटैक से नहीं बल्कि जहर देने से ही हुई। पहली इन्क्वायरी राज नारायण ने करवायी थी, जो बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गयी ऐसा बताया गया। मजे की बात यह कि इण्डियन पार्लियामेण्ट्री लाइब्रेरी में आज उसका कोई रिकार्ड ही मौजूद नहीं है। यह भी आरोप लगाया गया कि शास्त्रीजी का पोस्ट मार्टम भी नहीं हुआ। 2009 में जब यह सवाल उठाया गया तो भारत सरकार की ओर से यह जबाव दिया गया कि शास्त्रीजी के प्राइवेट डॉक्टर आर० एन० चुघ और रूस के कुछ डॉक्टरों ने मिलकर उनकी मौत की जाँच तो की थी परन्तु सरकार के पास उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। बाद में प्रधानमन्त्री कार्यालय से जब इसकी जानकारी माँगी गयी तो उसने भी अपनी मजबूरी जतायी।

         शास्त्रीजी की मौत में संभावित साजिश की पूरी पोल आउटलुक नाम की एक पत्रिका ने खोली। 2009 में, जब साउथ एशिया पर सीआईए की नज़र (CIA’s Eye on South Asia) नामक पुस्तक के लेखक अनुज धर द्वारा सूचना के अधिकार के तहत माँगी गयी जानकारी पर प्रधानमन्त्री कार्यालय की ओर से यह कहना कि “शास्त्रीजी की मृत्यु के दस्तावेज़ सार्वजनिक करने से हमारे देश के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध खराब हो सकते हैं तथा इस रहस्य पर से पर्दा उठते ही देश में उथल-पुथल मचने के अलावा संसदीय विशेषधिकारों को ठेस भी पहुँच सकती है। ये तमाम कारण हैं जिससे इस सवाल का जबाव नहीं दिया जा सकता।”, यही बतलाता है कि कहीं कुछ है जो गड़बड़ है।

       यही नहीं, कुछ समय पूर्व प्रकाशित एक अन्य अंग्रेजी पुस्तक में लेखक पत्रकार कुलदीप नैयर ने भी, जो उस समय ताशकन्द में शास्त्रीजी के साथ गये थे, इस घटना चक्र पर विस्तार से प्रकाश डाला है। गत वर्ष जुलाई 2012 में शास्त्रीजी के तीसरे पुत्र सुनील शास्त्री ने भी भारत सरकार से इस रहस्य पर से पर्दा हटाने की माँग की थी, जिनका कहना था कि जब शास्त्री जी के शव को उन्होंने देखा था तो उनकी छाती, पेट और पीठ पर नीले निशान थे जिन्हें देखकर साफ लग रहा था कि उन्हें जहर दिया गया है। लालबहादुर शास्त्री की पत्नी ललिता शास्त्री का भी यही कहना था कि लालबहादुर शास्त्री की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी| सबसे पहले सन् 1978 में प्रकाशित मदनलाल ‘क्रान्त ‘ की काव्य-कृति ‘ललिता के आँसू’ में शास्त्रीजी की मृत्यु की करुण कथा को स्वाभाविक ढँग से उनकी धर्मपत्नी ललिता शास्त्री के माध्यम से कहलवाया गया था, जो उस समय जीवित थीं।

हे मर्यादा के शुचि प्रतीक! ओ मानवता के पुण्य धाम!
हे अद्वितीय इतिहास पुरुष! शास्त्री! तुमको शत-शत प्रणाम!!
तुमने स्वदेश का कल देखा, अपने जीवन का आज नहीं;
तुमने मानव-मन की पुकार को किया नजर अंदाज नहीं.
तुमने तारों की प्रभा लखी,सूना आकाश नहीं देखा;
तुमने पतझड़ की झाड़ सही,कोरा मधुमास नहीं देखा.
तुमने प्रतिभा की पूजा की, प्रतिमा को किया न नमस्कार;
तुम सिद्धान्तों के लिए लड़े, धर्मों का किया न तिरस्कार.
तुमने जलते अंगारों पर, नंगे पैरों चलना सीखा;
तुमने अभाव के आँगन में भी, भली-भाँति पलना सीखा.
तुमने निर्धनता को सच्चा वरदान कहा, अभिशाप नहीं;
तुमने बौद्धिक विराटता का, माना कोई परिमाप नहीं.
तुमने आदर्शवाद माना, माना कोई अपवाद नहीं;
तुमने झोंपड़ियाँ भी देखीं, देखे केवल प्रासाद नहीं.
तुम वैज्ञानिक बन आये थे, खोजने सत्य विश्वास शान्ति;
तुमने आवरण नहीं देखा, खोजी अन्तस की छुपी कान्ति.
तुमने केवल पाया न अकेले ललिता का ही ललित प्यार;
तुमको जीवन पर्यन्त मिला, माँ रामदुलारी का दुलार.
तुमने शासन का रथ हाँका पर मंजिल तक पहुँचा न सके;
तुम हाय! अधर में डूब गये, जीवित स्वदेश फिर आ न सके.
तुम मरे नहीं हो गये अमर, इतना है दृढ विश्वास मगर;
रह गया अधूरा “जय किसान” इसकी अब लेगा कौन खबर?
तुम थे गुलाब के फूल मगर दोपहरी में ही सूख गये;
तुमने था लक्ष्य सही साधा पर अन्तिम क्षण में चूक गये.
जो युद्ध-क्षेत्र में नहीं छुटा, पथ शान्ति-क्षेत्र में छूट गया;
जो ह्रदय रहा संकल्प-निष्ठ, क्यों अनायास ही टूट गया?
यह प्रश्न आज सबके उर में शंका की तरह उभरता है;
पर है वेवश इतिहास मौन, कोई टिप्पणी न करता है?
जो कठिन समस्या राष्ट्र अठारह वर्षों में सुलझा न सका;
भारत का कोई भी दुश्मन तुमको भ्रम में उलझा न सका.
वह कठिन समस्या मात्र अठारह महिने में सुलझा दी थी;
चढ़ चली जवानी अरि-दल पर तुमने वह आग लगा दी थी.
अत्यल्प समय के शासन में सम्पूर्ण राष्ट्र हुंकार उठा;
उठ गयी तुम्हारी जिधर दृष्टि उस ओर लहू ललकार उठा.
तुम गये आँसुओं से आँचल माँ वसुन्धरा का भीग गया;
जन-जन की श्रद्धांजलियों से पावन इतिहास पसीज गया.
हे लाल बहादुर! आज तुम्हारी चिर-प्रयाण-तिथि पर अशान्त-
मन से अपनी यह श्रद्धांजलि, तुमको अर्पित कर रहा ‘क्रान्त’|

      गरीबी में जन्मे, पले और बढ़े शास्त्रीजी को बचपन में ही गरीबी की मार की भयंकरता का बोध हो गया था, फलतः उनकी स्वाभाविक सहानुभूति उन अभावग्रस्त लोगों के साथ रही जिन्हें जीवनयापन के लिए सतत संघर्ष करना पड़ता है। वे सदैव इस हेतु प्रयासरत रहे कि देश में कोई भूखा, नंगा और अशिक्षित न रहे तथा सबको विकास के समान साधन मिलें। शास्त्रीजी का विचार था कि देश की सुरक्षा, आत्मनिर्भरता तथा सुख-समृद्धि केवल सैनिकों व शस्त्रों पर ही आधारित नहीं बल्कि कृषक और श्रमिकों पर भी आधारित है और इसीलिए उन्होंने नारा दिया, ‘जय जवान, जय किसान।’ उन्हें शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

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सुब्रमण्यम भारती

सुब्रमण्यम भारती

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        11 दिसंबर तमिल भाषा के महाकवि सुब्रमण्यम भारती का जन्मदिवस है , एक ऐसे साहित्यकार जो सक्रिय रूप से स्वतंत्रता आंदोलन में स्वयं तो शामिल रहे ही, उनकी रचनाओं से प्रेरित होकर दक्षिण भारत में बड़ी तादाद में आम लोग भी आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। 11 दिसंबर 1882 को तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी की एत्त्यापुरम नामक गाँव में जन्में भारती देश के महान कवियों में एक थे जिनका गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर समान अधिकार था। भारती जब छोटे ही थे तभी माता-पिता का निधन हो गया और वह कम उम्र में ही वाराणसी गए थे जहाँ उनका परिचय अध्यात्म और राष्ट्रवाद से हुआ। इसका उनके जीवन पर काफी प्रभाव पड़ा|

       उन्होंने ज्ञान के महत्व को समझा और पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने काफी दिलचस्पी ली। इस दौरान वह कई समाचार पत्रों के प्रकाशन और संपादन से जुड़े रहे।उनकी रचनाओं में एक ओर जहाँ गूढ़ धार्मिक बातें होती थी वहीं रूस और फ्रांस की क्रांति तक की जानकारी होती थी। वह समाज के वंचित वर्ग और निर्धन लोगों की बेहतरी के लिए प्रयासरत रहते थे।

        भारती 1907 की ऐतिहासिक सूरत कांग्रेस में शामिल हुए थे जिसने नरम दल और गरम दल के बीच की तस्वीर स्पष्ट कर दी थी। भारती ने तिलक, अरविन्द तथा अन्य नेताओं के गरम दल का समर्थन किया था। इसके बाद वह पूरी तरह से लेखन और राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हो गए। वर्ष 1908 में अंग्रेज सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए जिस से बचने के लिए वह पांडिचेरी चले गए जो उन दिनों फ्रांसीसी शासन में था।

      भारती पांडिचेरी में भी कई समाचार पत्रों के प्रकाशन संपादन से जुड़े रहे और अंग्रेजों के खिलाफ लोगों में देशभक्ति की अलख जगाते रहे। पांडिचेरी में प्रवास के दिनों में वह गरम दल के कई प्रमुख नेताओं के संपर्क में रहे। वहाँ उन्होंने कर्मयोगी तथा आर्या के संपादन में अरविन्द की सहायता भी की थी। भारती 1918 में ब्रिटिश भारत में लौटे और उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया।

        उन्हें कुछ दिनों तक जेल में रखा गया। बाद के दिनों में उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा और 11 सितंबर 1921 को निधन हो गया। भारती 40 साल से भी कम समय तक जीवित रहे और इस अल्पावधि में भी उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में काफी काम किया और उनकी रचनाओं की लोकप्रियता ने उन्हें अमर बना दिया। इस विद्रोही महाकवि को उनके जन्मदिवस पर कोटिशः नमन|

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करतार सिंह सराबा

करतार सिंह सराबा

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सेवा देश दी जिंदडीए बड़ी औखी, गल्लां करनियाँ बहुत सुखल्लियाँ ने,
जिन्ना देश सेवा विच पैर पाया, उन्ना लाख मुसीबतां झल्लियाँ ने।

        24 मई एक ऐसे अमर शहीद का जन्मदिवस है जिसका नाम भी हम में से बहुतों ने नहीं सुना होगा पर जिसने उस आयु में जब हम आप अपने परिवार के प्रति भी अपना उत्तरदायित्व नहीं समझते, खुद को देश पर बलिदान कर दिया| मात्र 19 वर्ष की आयु में मातृभूमि के लिए अपने प्राणों को न्योछावर करने वाले इस हुतात्मा का नाम है- करतार सिंह सराबा| 24 मई 1896 में पंजाब में लुधियाना के सराबा गाँव में एक जाट सिख परिवार के सरदार मंगल सिंह और साहिब कौर के पुत्र के रूप में जन्मे करतार ने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया था और उनका तथा उनकी छोटी बहन धन्न कौर का लालन पालन उनके दादा जी द्वारा किया गया| मंगल सिंह के दो भाई और थे- उनमें से एक उत्तर प्रदेश में इंस्पेक्टर के पद पर प्रतिष्ठित था तथा दूसरा भाई उड़ीसा में वन विभाग के अधिकारी के पद पर कार्यरत था।

      अपने गांव से प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद करतार सिंह ने लुधियाना के मालवा खालसा हाई स्कूल में दाखिला लिया और दसवीं की परीक्षा पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए अपने चाचा के पास उड़ीसा चले गए। जब वे केवल 15 वर्ष के थे, उनके अभिभावकों ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका भेज दिया गया, जहाँ पहुँचने पर उन्होंने पाया कि जहाँ और देशों के नागरिकों से थोड़ी बहुत ही पूछताछ की जाती है, वहीँ भारतीयों से अपराधियों की तरह सवाल जवाब किये जाते हैं| किसी सहयात्री से पूछा तो बताया गया कि हम गुलाम देश के वासी हैं इसलिए हमारी यही इज्जत है| इस घटना ने उनके मन पर अमिट प्रभाव डाला। उस समय भारतीय लोग विदेशों में जाकर या तो बंधुआ श्रमिकों के रूप में काम करते थे या फिर अंग्रेजी फौज में शामिल होकर उनके साम्राज्यवाद को बढ़ाने में अपनी जान दे देते थे। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिर्फोनिया एट बर्कले में दाखिला लेने के बाद करतार सिंह ने अन्य लोगों से मिलकर ऐसे भारतीयों को संगठित कर भारत को आजाद कराने के लिए कार्य करना शुरू किया।

       21 अप्रैल, 1913 को कैलिफोर्निया में रह रहे भारतीयों ने एकत्र हो एक क्रांतिकारी संगठन गदर पार्टी की स्थापना की जिसका मुख्य उद्देश्य सशस्त्र संघर्ष द्वारा भारत को अंग्रेजी गुलामी से मुक्त करवाना और लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना करना था। 1 नवंबर, 1913 को इस पार्टी ने गदर नामक एक समाचार पत्र का प्रकाशन करना प्रारंभ किया जो हिंदी और पंजाबी के अलावा बंगाली, गुजराती, पश्तो और उर्दू में भी प्रकाशित किया जाता था। करतार सिंह ग़दर पार्टी के तो संस्थापक सदस्य थे ही, गदर समाचार पत्र का सारा काम भी वही देखते थे। यह समाचार पत्र सभी देशों में रह रहे भारतीयों तक पहुंचाया जाता था। इसका मुख्य उद्देश्य अंग्रेजी शासन की क्रूरता और हकीकत से लोगों को अवगत करना था। कुछ ही समय के अंदर गदर पार्टी और समाचार पत्र दोनों ही लोकप्रिय हो गए।

      1914 में प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजी सेना युद्ध के कार्यों में अत्याधिक व्यस्त हो गई थी। इस अवसर को अपने अनुकूल समझ उसका लाभ लेने एवं ब्रिटिश शासन की चूलें हिलाने की दृष्टि से गदर पार्टी के सदस्यों ने 5 अगस्त, 1914 को प्रकाशित समाचार पत्र में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध डिसिजन ऑफ डेक्लेरेशन ऑफ वार नामक लेख प्रकाशित किया| हर छोटे-बड़े शहर में इस इस लेख की प्रतियां वितरित की गईं। करतार सिंह एवं अन्य कई साथी भारत आये और युगांतर के संपादक जतिन मुखर्जी के परिचय पत्र के साथ रास बिहारी बोस से मिले। करतार सिंह ने बोस को बताया कि जल्द ही 20,000 अन्य गदर कार्यकर्ता भारत पहुंच सकते हैं। वे रास बिहारी बोस के साथ मिलकर उपयुक्त योजना का निर्माण करने का प्रयास करने लगे ताकि विद्रोह एक साथ शुरू किया जा सके|

       ब्रिटिश सरकार की नज़रों से ये प्रयास छुप ना सका और कुछ एक गद्दारों की वजह से काफी लोग पकड़े गये और मारे गए| सरकार ने विभिन्न पोतों पर गदर पार्टी के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया, लेकिन फिर भी लुधियाना के एक ग्राम में गदर सदस्यों की सभा हुई, जिसमें 25 जनवरी, 1915 को रास बिहारी बोस के आने के बाद 21 फरवरी से सक्रिय आंदोलन की शुरूआत करना निश्चित किया गया। कृपाल सिंह नामक पुलिस के एक मुखबिर ने अंग्रेजी पुलिस को इस दल के कार्यों और योजनाओं की सूचना दे दी, जिसके बाद पुलिस ने कई गदर कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। इस अभियान की असफलता के बाद सभी लोगों ने अफगानिस्तान जाने की योजना बनाई पर परन्तु जब करतार सिंह वजीराबाद पहुँचे, तो उनके मन में यह विचार आया कि इस तरह छिपकर भागने से अच्छा है कि वे देश के लिए फाँसी के फंदे पर चढ़कर अपने प्राण निछावर कर दें।

        लौटकर करतार सिंह ने सरगोधा के पास सैनिक छावनी में विद्रोह का प्रचार करना शुरू कर दिया और जब तक वो अंग्रेज सरकार की गिरफ्त में आये, उनका नाम क्रांति का पर्याय बन गया| भगत सिंह जैसे महान क्रन्तिकारी ने उन्हें अपने गुरु, सखा और भाई के रूप में स्वीकार किया है और यही करतार सिंह के व्यक्तित्व को बताने के लिए काफी है| सराभा ने अदालत में अपने अपराध को स्वीकार करते हुए ये शब्द कहे, “मैं भारत में क्रांति लाने का समर्थक हूँ और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अमेरिका से यहाँ आया हूँ। यदि मुझे मृत्युदंड दिया जायेगा, तो मैं अपने आपको सौभाग्यशाली समझूँगा, क्योंकि पुनर्जन्म के सिद्धांत के अनुसार मेरा जन्म फिर से भारत में होगा और मैं मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए काम कर सकूँगा।”

        लाहौर षड़यंत्र केस के नाम पर माँ भारती के इस सच्चे सपूत को मात्र 19 वर्ष की आयु में 16 नवम्बर 1915 में उनके छह अन्य साथियों – बख्शीश सिंह (ज़िला अमृतसर), हरनाम सिंह (ज़िला स्यालकोट), जगत सिंह (ज़िला लाहौर), सुरैण सिंह व सुरैण दोनों (ज़िला अमृतसर) व विष्णु गणेश पिंगले (ज़िला पूना महाराष्ट्र)- के साथ लाहौर जेल में फांसी दे दी गयी और माँ का ये रत्न माँ की ही वेदी पर बलिदान हो गया|

      भाई परमानन्द जी ने सराभा के जेल के जीवन का वर्णन करते हुए लिखा है, “सराभा को कोठरी में भी हथकड़ियों और बेड़ियों से युक्त रखा जाता था। उनसे सिपाही बहुत डरते थे। उन्हें जब बाहर निकाला जाता था, तो सिपाहियों की बड़ी टुकड़ी उनके आगे-पीछे चलती थी। उनके सिर पर मृत्यु सवार थी, किन्तु वे हँसते-मुस्कराते रहते थे।” भाई परमानन्द जी ने सराभा के सम्बन्ध में आगे और लिखा है, “मैंने सराभा को अमेरिका में देखा था। वे ग़दर पार्टी के कार्यकर्ताओं में मुख्य थे। वे बड़े साहसी और वीर थे। जिस काम को कोई भी नहीं कर सकता था, उसे करने के लिए सराभा सदा तैयार रहते थे। उन्हें कांटों की राह पर चलने में सुख मालूम होता था, मृत्यु को गले लगाने में आनन्द प्राप्त होता था।” इस महान हुतात्मा को उनके जन्मदिवस पर शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि। |

        कुछ पंक्तियाँ, जो कि यह विश्वास किया जाता है कि उनकी ही रचना है, को देने का लोभ संवरण मैं नहीं कर पा रहा हूँ, जो मातृभूमि के प्रति उनके निस्वार्थ प्रेम को प्रकट करती है|

यही पाओगे महशर में जबाँ मेरी , बयाँ मेरा|
मैं बंदा हिंद वालों का हूँ, है हिन्दोस्ताँ मेरा|
मैं हिंदी, ठेठ हिंदी, खून हिंदी, जात हिंदी है,
यही मजहब, यही भाषा, यही है खानदाँ मेरा|
मैं इस उजड़े हुए भारत के खंडहर का इक जर्रा हूँ|
बस यही इक पता मेरा, यही नामोनिशाँ मेरा|
कदम लूँ मादरे भारत तेरे, मैं बैठते उठते|
कहाँ किस्मत मेरी ऐसी, नसीबा यह कहाँ मेरा|
तेरी किस्मत में ऐ भारत यह सर जाये, यह जाँ जाये|
तो मैं समझूंगा यह मरना हयात-ऐ-जादवां मेरा|

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कान्होजी आंग्रे

कान्होजी आंग्रे

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          मराठा नौ सेना के सर्वाधिक प्रसिद्द सेनानायक, अठ्ठाहरवीं शताब्दी में ब्रिटिश, डच एवं पुर्तगाली नौ सेनाओं के छक्के छुड़ा देने वाले, भारत को प्रथम बार नौ सेना की महत्ता से अवगत कराने वाले एवं अपने अंत समय तक अपराजित रहे महान योद्धा कान्होजी आंग्रे उपाख्य सरखेल आंग्रे की आज पुण्यतिथि है|

       1669 को कोकण के रत्नागिरी जिले में जन्में कान्हो जी के पिता तानोजी आंग्रे छत्रपति शिवाजी की सेना में नायक थे और इस कारण प्रारंभ से ही कान्होजी युद्ध कौशल में निपुण हो गए| युवावस्था प्राप्त करने पर उन्हें सतारा के प्रमुख द्वारा पश्चिमी तट का प्रशासक नियुक्त किया गया और यहीं से शुरू हुआ समुद्र के साथ उनका तारतम्य जो उनके जीवन के अंत तक रहा|

        छत्रपति शाहू जी द्वारा उनकी योग्यता को देखते हुए उन्हें मराठा नौ सेना का प्रमुख नियुक्त किया गया और अपने कौशल के बल पर उन्होंने इसे उस ऊँचाई पर पहुंचा दिया कि ब्रिटिश, डच और पुर्तगाली उनके नाम से भी भय खाते थे| ये कान्होजी आंग्रे ही हैं जिन्हें अंडमान द्वीप समूह को भारत से जोड़ने का श्रेय दिया जाता है क्योंकि उन्होंने ही पहली बार वहां अपना बेस स्थापित किया|

       उनके युद्धकौशल और रणनीतिक चातुर्य का पता इसी बात से चलता है कि विदेशी ताकतों के मिले जुले अभियान भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके और वे अपने अंत समय तक अपराजित रहे| 4 जुलाई 1729 को ये महान नौसेनानायक इस संसार से विदा हो गया पर अपने पीछे एक सशक्त मराठा नौसेना छोड़ गया जिसकी धमक कई वर्षों तक विदेशियों के दिलों में बनी रही|

        स्वतंत्रता पूर्व भारत के सबसे महान नौसेनानायक माने जाने वाले कान्होजी आंग्रे के सम्मान में भारतीय नौसेना की पश्चिमी कमान का नाम 15 सितम्बर 1951 से आई.एन.एस. आंग्रे कर दिया गया और दक्षिणी मुंबई के नेवल डाकयार्ड में उनकी प्रतिमा भी स्थापित की गयी| आज उनकी पुण्यतिथि पर कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

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कल्पना दत्त

कल्पना दत्त

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        27 जुलाई चटगाँव शस्त्रागार केस से प्रसिद्द और उस दौर में आज़ादी की लड़ाई में हथियार उठाने वाली, जब लड़कियां घर से भी बाहर नहीं निकलती थी, कल्पना दत्त का जन्मदिवस है पर अफ़सोस हममें से किसी ने उन्हें याद नहीं किया | उनका जन्म वर्तमान बंग्लादेश के चटगांव ज़िले के श्रीपुर गांव में एक मध्यम वर्गीय परिवार में 27 जुलाई 1913 को हुआ था| 1929 में चटगाँव से मैट्रिक पास करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए ये कलकत्ता आ गयीं| यहाँ अनेकों प्रसिद्ध क्रान्तिकारियों की जीवनियाँ पढ़कर वह प्रभावित हुईं और शीघ्र ही स्वयं भी कुछ करने के लिए आतुर हो उठीं।

        कल्पना और उनके साथियों ने क्रान्तिकारियों का मुकदमा सुनने वाली अदालत के भवन को और जेल की दीवार उड़ाने की योजना बनाई। लेकिन पुलिस को सूचना मिल जाने के कारण इस पर अमल नहीं हो सका। पुरुष वेश में घूमती कल्पना दत्त गिरफ्तार कर ली गईं, पर अभियोग सिद्ध न होने पर उन्हें छोड़ दिया गया। उनके घर पुलिस का पहरा बैठा दिया गया, लेकिन अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए इन्होनें प्रसिद्द क्रांतिकारी मास्टर सूर्यसेन के दल से नाता जोड़ लिया।

      वह वेश बदलकर क्रांतिकारियों को गोला-बारूद आदि पहुँचाया करती थीं। इस बीच उन्होंने सटीक निशाना लगाने का भी अभ्यास कर लिया। 18 अप्रैल 1930 ई. को मास्टर सूर्यसेन के नेतृत्व में रोंगटे खड़े कर देने वाली ‘चटगांव शस्त्रागार लूट’ की घटना होते ही कल्पना दत्त कोलकाता से वापस चटगांव चली गईं और उनके अभिन्न साथी तारकेश्वर दस्तीदार जी के साथ मास्टर दा को अंग्रेजों से छुड़ाने की योजना बनाई लेकिन योजना पर अमल होने से पहले ही यह भेद खुल गया और सन 1933 में तारकेश्वर, कल्पना दत्ता व अपने अन्य साथियों के साथ पकड़ लिए गए|

       सरकार ने मास्टर सूर्य सेन जी, तारकेश्वर दा और कल्पना दत्त पर मुकद्दमा चलाने के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना की और 12 जनवरी 1934 को मास्टर सूर्य सेन को तारकेश्वर दा के साथ फांसी दे दी गयी| लेकिन फांसी से पूर्व उन्हें ऐसी अमानवीय यातनाएं दी गयीं कि रूह काँप जाती है|
निर्दयतापूर्वक हथोड़े से उनके दांत तोड़ दिए गए , नाखून खींच लिए गए , हाथ-पैर तोड़ दिए गए और जब वह बेहोश हो गए तो उन्हें अचेतावस्था में ही खींच कर फांसी के तख्ते तक लाया गया| क्रूरता और अपमान की पराकाष्टा यह थी कि उनकी मृत देह को भी उनके परिजनों को नहीं सोंपा गया और उसे धातु के बक्से में बंद करके बंगाल की खाड़ी में फेंक दिया गया |

      21 वर्षीया कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी| 1937 ई. में जब पहली बार प्रदेशों में भारतीय मंत्रिमंडल बने, तब कुछ प्रमुख नेताओं के प्रयासों से 1939 में कल्पना जेल से बाहर आ सकीं। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और वह कम्युनिस्ट पार्टी में सम्मिलित हो गईं | 1943 ई. में उनका कम्युनिस्ट नेता पी.सी. जोशी से विवाह हो गया और वह कल्पना जोशी बन गईं। बाद में कल्पना बंगाल से दिल्ली आ गईं और ‘इंडो सोवियत सांस्कृतिक सोसायटी’ में काम करने लगीं। सितम्बर 1979 ई. में कल्पना जोशी को पुणे में ‘वीर महिला’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। 8 फरबरी 1995 को कोलकाता में उनका निधन हो गया|

        बहुत कम लोग जानते होंगे कि पूरन चंद जोशी और कल्पना जोशी के दो पुत्र थे- चाँद जोशी और सूरज जोशी| चाँद जोशी अंग्रेजी के एक प्रसिद्द पत्रकार थे और उन्होंने हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए काम किया| इन्हीं चाँद जोशी की पत्नी मानिनी (चटर्जी ) के द्वारा चटगाँव शस्त्रागार केस पर एक बहुत ही प्रसिद्द पुस्तक लिखी गयी थी, जिसका नाम है डू एंड डाई: दि चटगाँव अपराइजिंग 1930-34। इसी पुस्तक को आधार बनाकर कुछ दिन पहले एक फिल्म आई थी ‘खेलें हम जी जान से’, जिसमे दीपिका पादुकोने ने कल्पना दत्त की भूमिका निभाई थी।

       हालाँकि बाडीगार्ड, दबंग, राऊडी राठोड़, रेडी और इसी तरह की बेसिर पैर फिल्मों के ज़माने में ‘खेलें हम जी जान से’ देखने कौन जाता और किसको फुर्सत है कि ये जाने कि आज़ादी की लड़ाई बिना खड्ग, बिना ढाल नहीं, खून बहाकर और खुद को गलाकर मिली है। पर ना हो किसी को फुर्सत, ना हो किसी को परवाह; इससे कल्पना दत्त जैसी क्रांतिकारियों का निस्वार्थ योगदान कम तो नहीं हो जाता| उनको कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

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जोरावर सिंह और फतेह सिंह

जोरावर सिंह और फतेह सिंह

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       आज दशम गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज के 6 व 8 साल के पुत्रों बाबा फतेह सिंह और जोरावर सिंह का बलिदान दिवस है, जिन्हें आज से से 309 साल पहले 27 दिसंबर को को क्रूर मुग़ल शासन ने दीवार में चिनवा दिया गया था। सरहिंद के नवाब ने उन बच्चों को मुसलमान बनने के लिए मजबूर किया था, मगर वीर बालक ना डरे, ना लोभ में अपना धर्म बदलना स्वीकार किया और दुनिया को बेमिसाल शहीदी पैगाम दे गए। वे दुनिया में अमर हो गए।

       भारतीय इतिहास में सिख गुरुओं के त्याग, तपस्या व बलिदान का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह उस समय की बात है जब भारत पर मुगल साम्राज्य था। मुग़ल शासक औरंगजेब एक कट्टर मुसलमान था और धर्मांध होकर इस्लाम स्वीकार कराने के लिए उसने हिन्दुओं को अनेक प्रकार के कष्ट दिये। वह सम्पूर्ण भारत को इस्लाम का अनुयायी बनाना चाहता था। उसके आदेशों पर अनेकों स्थानों पर मंदिरों को तोडकर मस्जिदें बनायी गयीं, हिन्दुओं पर नाना प्रकार के कर लगाये गये, कोई भी हिन्दू शस्त्र धारण नहीं कर सकता था, घोडे पर सवारी करना भी हिन्दुओं के लिए वर्जित था। औरंगजेब भारतीय संस्कृति तथा धर्म को जड़मूल से समाप्त कर देना चाहता था।

        हिन्दुओं में आपसी कलह के कारण जुल्मों का विरोध नहीं हो रहा था। इन्हीं जुल्मों के खिलाफ आवाज उठाई दशम पिता गुरू गोबिन्द सिंह जी ने, जिन्होंने निर्बल हो चुके हिन्दुओं में नया उत्साह और जागृति पैदा करने का मन बना लिया। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए गुरू गोबिन्द सिंह जी ने 1699 को बैसाखी वाले दिन आनन्दपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की। कई स्थानों पर सिखों और हिन्दुओं ने खालसा पंथ की स्थापना का विरोध किया। मुगल शासकों के साथ साथ कट्टर हिन्दुओं और उच्च जाति के लोगों ने भी खालसा पंथ की स्थापना का विरोध किया। सरहंद के सूबेदार वजीर खान और पहाड़ी राजे एकजुट हो गए और 1704 में गुरू गोबिन्द सिंह जी पर आक्रमण कर दिया। मुगलों ने पहाडी नरेशों की सहायता से आनंदपुर के किले को चारों ओर से घेर लिया जहाँ गुरु गोविन्दसिंह जी मौजूद थे, पर मुगल सेना अनेक प्रयत्नों के बाद भी किले पर विजय पाने में असफल रही। सिखों ने बड़ी दलेरी से इनका मुकाबला किया और सात महीने तक आनन्दपुर के किले पर कब्जा नहीं होने दिया।

         हताश होकर औरंगजेब ने गुरुजी को संदेश भेजा और कुरान की कसम खाकर गुरू जी से किला खाली करने के लिए विनती की और कहा कि यदि गुरुगोविन्द सिंह आनंदपुर का किला छोडकर चले जाते हैं तो उनसे युद्ध नहीं किया जायेगा। गुरुजी को औरंगजेब के कथन पर विश्वास नहीं था, पर फिर भी सिखों से सलाह कर गुरु जी घोडे से सिख-सैनिकों के साथ 20 दिसम्बर 1704 की रात को किला खाली कर बाहर निकले और रोपड़ की और कूच कर गए। जब इस बात का पता मुगलों को लगा तो उन्होंने सारी कसमें तोड़ डाली और गुरू जी पर हमला कर दिया। लड़ते–लड़ते सिख सिरसा नदी पार कर गए और चमकौर की गढ़ी में गुरू जी और उनके दो बड़े साहिबजादों ने मोर्चा संभाला। ये जंग अपने आप में खास है क्योंकि 80 हजार मुगलों से केवल 40 सिखों ने मुकाबला किया था। जब सिखों का गोला बारूद खत्म हो गया तो गुरू गोबिन्द सिंह जी ने पांच पांच सिखों का जत्था बनाकर उन्हें मैदाने जंग में भेजा। सिख सैनिक बहुत कम संख्या में थे, फिर भी उन्होंने मुगलों से डटकर मुकाबला किया और मुगल-सेना के हजारों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। इस लड़ाई में गुरू जी से इजाजत लेकर बड़े साहिबजादें भी शामिल हो गए। लड़ते लड़ते वो सिरसा नदी पार कर गए और वीरता के साथ लडते हुए 18 वर्षीय अजीतसिंह और 15 वर्षीय जुझारसिंह वीरगति को प्राप्त हो गए।

      आनंदपुर छोडते समय ही गुरुगोविन्दसिंह जी का परिवार बिखर गया था। गुरुजी के दोनों छोटे पुत्र जोरावरसिंह तथा फतेहसिंह अपनी दादी माता गुजरी के साथ आनंदपुर छोडकर आगे बढे। जंगलों, पहाडों को पार करते हुए वे एक नगर में पहुँचे, जहाँ कम्मो नामक पानी ढोने वाले एक गरीब मजदूर ने गुरुपुत्रों व माता गुजरी की प्रेमपूर्वक सेवा की। इन सभी के साथ में गंगू नामक एक ब्राम्हण, जो कि गुरु गोविन्दसिंह के पास 22 वर्षों से रसोइए का काम कर रहा था, भी आया हुआ था। उसने रात में माता जी की सोने की मोहरों वाली गठरी चोरी कर ली और सुबह जब माता जी ने गठरी के बारे में पूछा तो वो न सिर्फ आग बबूला ही हुआ बल्कि उसने धन के लालच में गुरुमाता व बालकों से विश्वासघात किया और एक कमरे में बाहर से दरवाजा बंद कर उन्हें कैद कर लिया तथा मुगल सैनिकों को इसकी सूचना दे दी। मुगलों ने तुरंत आकर गुरुमाता तथा गुरु पुत्रों को पकडकर कारावास में डाल दिया। कारावास में रात भर माता गुजरी बालकों को सिख गुरुओं के त्याग तथा बलिदान की कथाएं सुनाती रहीं। दोनों बालकों ने दादी को आश्वासन दिया कि वे अपने पिता के नाम को ऊँचा करेंगे और किसी भी कीमत पर अपना धर्म नहीं छोडेंगे।

        प्रात: ही सैनिक बच्चों को लेने आ पहुँचे। निर्भीक बालक तुरन्त खडे हो गये और दोनों ने दादी के चरण स्पर्श किये। दादी ने बालकों को सफलता का आशीर्वाद दिया और बालक मस्तक ऊँचा किये सीना तानकर सिपाहियों के साथ चल पडे। लोग बालकों की कोमलता तथा साहस को देखकर उनकी प्रशंसा करने लगे। गंगू आगे-आगे चल रहा था, जिसे देख अनेक स्त्रियां घरों से बाहर निकलकर उसे कोसने लगीं। बालकों के चेहरे पर एक विशेष प्रकार का तेज था, जो नगरवासियों को बरबस अपनी ओर सहज ही आकर्षित कर लेता था। बालक निर्भीकता से नवाब वजीर खान के दरबार में पहुँचे । दीवान के सामने बालकों ने सशक्त स्वर में जय घोष किया – जो बोले सो निहाल, सत श्री आकाल। वाहि गुरुजी का खालसा, वाहि गुरुजी की फतह।

       दरबार में उपस्थित सभी लोग इन साहसी बालकों की ओर देखने लगे। बालकों के शरीर पर केसरी वस्त्र, पगडी तथा कृपाण सुन्दर दिख रही थी । उनका नन्हा वीर वेश तथा सुन्दर चमकता चेहरा देखकर नवाब वजीर खान ने चतुरता से कहा-”बच्चों तुम बहुत सुन्दर दिखाई दे रहे हो। हम तुम्हें नवाबों के बच्चों जैसा रखना चाहते हैं, पर शर्त यह है कि तुम अपना धर्म त्यागकर इस्लाम कबूलकर लो। बोलो, तुम्हें हमारी शर्त मंजूर है?”
दोनों बालक एक साथ बोल उठे–’हमें अपना धर्म प्राणों से भी प्यारा है। हम, उसे अंतिम सांस तक नहीं छोड सकते।’
नवाब ने बालकों को फिर समझाना चाहा-”बच्चों अभी भी समय है, अपनी जिन्दगी बर्बाद मत करो। यदि तुम इस्लाम कबूल कर लोगे तो तुम्हें मुँह माँगा इनाम दिया जायेगा। इसलिए हमारी शर्त मान लो और शाही जिंदगी बसर करो।”
बालक निर्भयता से ऊँचे स्वर में बोले- ‘हम गुरुगोविन्दसिंह के पुत्र हैं। हमारे दादा गुरु तेगबहादुर जी धर्म रक्षा के लिए कुर्बान हो गये थे। हम उन्हीं के वंशज हैं । हम अपना धर्म कभी नहीं छोडेंगे क्योंकि हमें अपना धर्म प्राणों से भी प्यारा है।’
         उसी समय दीवान सुच्चानन्द उठा और बालकों से कहने लगा-‘अच्छा बच्चों, यह बताओ कि यदि तुम्हें छोड दिया जाये तो तुम क्या करोगे?’
       बालक जोरावरसिंह बोले-”हम सैनिक एकत्र करेंगे और आपके अत्याचारों को समाप्त करने के लिए युद्ध करेंगे।”
       ‘यदि तुम हार गये तो?’–दीवान ने कहा। ‘हार हमारे जीवन में नहीं है। हम सेना के साथ उस समय तक युद्ध करते रहेंगे, जब तक अत्याचार करने वाला शासन समाप्त नहीं हो जाता या हम युद्ध में वीरगति को प्राप्त नहीं हो जाते।’, जोरावर सिंह ने दृढता से उत्तर दिया।

        साहसपूर्ण उत्तर सुनकर नवाब वजीर खान बौखला गया। दूसरी ओर दरबार में उपस्थित सभी व्यक्ति बालकों की वीरता की सराहना करने लगे। नवाब ने क्रुद्ध होकर कहा ”इन शैतानों को फौरन दीवार में चुनवा दिया जाये।” उस समय मलेरकोटला का नवाब शेर मुहम्मद खां भी वहां उपस्थित था, जिसने इस बात का विरोध किया पर उसकी आवाज को अनसुना कर दिया गया। दिल्ली के सरकारी जल्लाद शिशाल बेग तथा विशाल बेग उस समय दरबार में ही उपस्थित थे। दोनों बालकों को उनके हवाले कर दिया गया। कारीगरों ने बालकों को बीच में खडा कर दीवार बनानी आरम्भ कर दी। नगरवासी चारों ओर से उमड पडे। काजी पास ही में खड़ा था जिसने एक बार फिर बच्चों को इस्लाम स्वीकार करने को कहा। बालकों ने फिर साहसपूर्ण उत्तर दिया–”हम इस्लाम स्वीकार नहीं कर सकते । संसार की कोई भी शक्ति हमें अपने धर्म से नहीं डिगा सकती।”

      दीवार शीघ्रता से ऊंची होती जा रही थी। नगरवासी नन्हें बालकों की वीरता देखकर आश्चर्य कर रहे थे। धीरे-धीरे दीवार बालकों के कान तक ऊंची हो गयी । बडे भाई जोरावरसिंह ने अंतिम बार अपने छोटे भाई फतेहसिंह की ओर देखा और उसकी आंखें भर आयीं। फतेहसिंह भाई की आंखों में आंसू देखकर विचलित हो उठा। ”क्यों वीरजी, आपकी आँखों में ये आंसू? क्या आप बलिदान से डर रहे हैं?” बडे भाई जोरावरसिंह के हृदय में यह वाक्य तीर की तरह लगा। फिर भी वे खिलखिलाकर हँस दिये और फिर कहा ‘फतेह सिंह तू बहुत भोला है। मौत से मैं नहीं डरता बल्कि मौत मुझसे डरती है। इसी कारण तो वह पहले तेरी ओर बढ रही है। मुझे दुख केवल इस बात का है कि तू मेरे पश्चात संसार में आया और मुझसे पहले तुझे बलिदान होने का अवसर मिल रहा है। भाई मैं तो अपनी हार पर पछता रहा हूँ।” बडे भाई के वीरतापूर्ण वचन सुनकर फतेहसिंह की चिंता जाती रही।

        जब दीवार गुरू के लाडलों के घुटनों तक पहुंची तो घुटनों की चपनियों को तेसी से काट दिया गया ताकि दीवार टेढी न हो जाए। इधर दीवार तेजी से ऊँची होती जा रही थी और उधर सूर्य अस्त होने का समय भी समीप था। राजा-मिस्त्री जल्दी-जल्दी हाथ चलाने लगे और दोनों बालक आँख मूंदकर अपने आराध्य का स्मरण करने लगे। धीरे-धीरे दीवार बालकों की अपूर्व धर्मनिष्ठा को देखकर अपनी कायरता को कोसने लगी। अंत में दीवार ने उन महान वीर बालकों को अपने भीतर समा लिया। कुछ समय पश्चात दीवार गिरा दी गई। दोनों वीर बालक बेहोश हो चुके थे, पर जुल्म की इंतहा तो तब हो गई जब उस अत्याचारी शासन के आदेशानुसार दोनों जल्लादों ने उन बेहोश बालकों के शीश काट कर साहिबजादों को शहीद कर दिया। इतने से भी इन जालिमों का दिल नहीं भरा और लाशों को खेतों में फेंक दिया गया।

         छोटे साहिबजादों की शहीदी की खबर सुनकर उनकी दादी स्वर्ग सिधार गई। जब इस बात की खबर सरहंद के हिन्दू साहूकार टोडरमल को लगी तो उन्होंने संस्कार करने की सोची। उसको कहा गया कि जितनी जमीन संस्कार के लिए चाहिए, उतनी जगह पर सोने की मोहरें बिछानी पड़ेगी और कहते हैं कि टोडरमल जी ने उस जगह पर अपने घर के सब जेवर और सोने की मोहरें बिछा कर साहिबजादों और माता गुजरी का दाह संस्कार किया। संस्कार वाली जगह पर बहुत ही सुन्दर गुरूद्वारा ज्योति स्वरूप बना हुआ है जबकि शहादत वाली जगह पर बहुत बड़ा गुरूद्वारा है। छोटे साहिबजादे बाबा फतेह सिंह के नाम पर इस स्थान का नाम फतेहगढ़ साहिब रखा गया, जहाँ हर साल 25 से 27 दिसम्बर तक साहिबजादों की याद में तीन दिवसीय शहीदी जोड़ मेला लगता है, जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं ताकि इस महान शहादत को वो श्रद्धा सुमन अर्पित कर सकें।

       जब दोनों बालकों की हत्या हुई तब बालक जोरावरसिंह की आयु मात्र 7 वर्ष, 11 महीने तथा फतेह सिंह की आयु 5 वर्ष, 10 महीने थी। विश्व के इतिहास में छोटे बालकों की इस प्रकार निर्दयतापूर्वक हत्या की कोई दूसरी मिसाल नहीं है। दूसरी ओर बालकों द्वारा दिखाया गया अपूर्व साहस संसार के किसी भी देश के इतिहास में नहीं मिलता। धन्य हैं गुरुगोविन्दसिंह, धन्य है गुरुगद्दी परम्परा, धन्य हैं माता गुजरी, धन्य हैं गुरु पुत्र और धन्य है हमारी पुण्यधरा। हमारे भीतर भी ऐसी ही धर्म के प्रति निष्ठा व राष्ट्र के प्रति समर्पण हो, तो गौरवशाली भारत निर्माण का स्वप्न दूर नहीं। इस महान शहादत के बारे में हिन्दी के कवि मैथिलीशरण गुप्त ने ठीक ही लिखा है–

जिस कुल जाति देश के बच्चे भी दे सकते हैं बलिदान,
उसका वर्तमान कुछ भी हो पर भविष्य है सदा महान।

      आज दशम गुरु के लाडले साहिबजादों बाबा जोरावर सिंह और बाबा फ़तेह सिंह को उनके शहीदी दिवस पर कोटि कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

 

वीरांगना झलकारीबाई

वीरांगना झलकारीबाई

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         आज 4 अप्रैल उस महान वीरांगना को याद करने का दिन है जिसकी वीरता किसी भी मायने में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई से कम नहीं थी पर उसे इतिहास और हमारे हृदयों में वो स्थान नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए था| ये महान वीरांगना थी, झलकारीबाई जो झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की नियमित सेना में, महिला शाखा दुर्गा दल की सेनापति थीं। 22 नवंबर 1830 को झांसी के पास के भोजला गाँव में एक निर्धन कोली परिवार में सदोवर सिंह और जमुना देवी के घर में जन्मी झलकारी को कोई औपचारिक शिक्षा तो प्राप्त नहीं हो पाई, लेकिन उन्होनें घुड़सवारी और हथियारों का प्रयोग करने में महारत हासिल करके खुद को एक अच्छे योद्धा के रूप में विकसित कर लिया। उनकी बहादुरी ही झाँसी की सेना के सिपाही पूरन कोरी से उनके विवाह का माध्यम बनी जो अपनी वीरता के लिए पूरे झाँसी में प्रसिद्द था|

          एक बार गौरी पूजा के अवसर पर झलकारी गाँव की अन्य महिलाओं के साथ महारानी को सम्मान देने झाँसी के किले मे गयीं, वहाँ रानी लक्ष्मीबाई उन्हें देख कर अवाक रह गयी क्योंकि झलकारी बिल्कुल रानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखतीं थीं (दोनो के रूप में आलौकिक समानता थी)। अन्य औरतों से झलकारी की बहादुरी के किस्से सुनकर रानी लक्ष्मीबाई बहुत प्रभावित हुईं। रानी ने झलकारी को दुर्गा सेना में शामिल करने का आदेश दिया। झलकारी ने यहाँ अन्य महिलाओं के साथ बंदूक चलाना, तोप चलाना और तलवारबाजी की प्रशिक्षण लिया। यह वह समय था जब झांसी की सेना को किसी भी ब्रिटिश दुस्साहस का सामना करने के लिए मजबूत बनाया जा रहा था। चूँकि वे रानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल भी थीं इस कारण शत्रु को धोखा देने के लिए वे रानी के वेश में भी युद्ध करती थीं। अपने अंतिम समय में भी वे रानी के वेश में युद्ध करते हुए वे अंग्रेज़ों के हाथों पकड़ी गयीं और रानी को किले से भाग निकलने का अवसर मिल गया। कहा जाता है कि झलकारी बाई का पति पूरन किले की रक्षा करते हुए शहीद हो गया लेकिन झलकारी ने बजाय अपने पति की मृत्यु का शोक मनाने के, ब्रिटिशों को धोखा देने की एक योजना बनाई।

        जब किले का पतन निश्चित हो गया तो रानी के सेनापतियों और झलकारी बाई ने उन्हें कुछ सैनिकों के साथ किला छोड़कर भागने की सलाह दी। योजनानुसार महारानी लक्ष्मीबाई एवं झलकारी दोनों पृथक-पृथक द्वार से किले बाहर निकलीं। झलकारी ने तामझाम अधिक पहन रखा था जिस कारण शत्रु ने उन्हें ही रानी समझा और उन्हें ही घेरने का प्रयत्न किया। रानी अपने घोड़े पर बैठ अपने कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ झांसी से दूर निकल गईं। शत्रु सेना से घिरी झलकारी भयंकर युद्ध करने लगी। एक भेदिए ने पहचान लिया और उसने भेद खोलने का प्रयत्न किया। वह भेद खोले, इसके पूर्व ही झलकारी ने उसे अपनी गोली का निशाना बनाया। दुर्भाग्य से वह गोली एक ब्रिटिश सैनिक को लगी और वह गिरकर मर गया। वह भेदिया तो बच गया पर झलकारी घेर ली गई। ब्रिटिश शिविर में पहँचने पर उसने चिल्लाकर कहा कि वो जनरल ह्यूग रोज़ से मिलना चाहती है। रोज़ और उसके सैनिक प्रसन्न थे कि न सिर्फ उन्होने झांसी पर कब्जा कर लिया है बल्कि जीवित रानी भी उनके कब्ज़े में है। जनरल ह्यूग रोज़, जो उसे रानी ही समझ रहा था, ने झलकारी बाई से पूछा कि उसके साथ क्या किया जाना चाहिए? तो उसने दृढ़ता के साथ कहा,मुझे फाँसी दो। एक अन्य ब्रिटिश अफसर ने कहा–“मुझे तो यह स्त्री पगली मालूम पड़ती है।” जनरल रोज ने इसका तत्काल उत्तर देते हुए कहा—“यदि भारत की एक प्रतिशत नारियाँ इसी प्रकार पागल हो जाएँ तो हम अंग्रेजों को सब कुछ छोड़कर यहाँ से चले जाना होगा।”

       उधर डोली में बैठी झलकाराई बाई को देखकर फिरंगी दल भौंचक्का रह गया। रानी आ गई, झांसी की रानी ने समर्पण कर दिया है, जैसी चर्चा हर सैनिक कर रहा था। डोली जैसे ही सेना के बीच पहुंची, गद्दार दूल्हाजू ने शोर मचा दिया कि अरे यह रानी नहीं है झलकारी है।उसेके बताने पर पता चला कि यह रानी लक्ष्मी बाई नहीं बल्कि महिला सेना की सेनापति झलकारी बाई है जो अग्रेंजी सेना को धोखा देने के लिए रानी लक्ष्मीबाई बन कर लड़ रही है। ब्रिटिश सेनापति रोज ने झलकारी को डपटते हुए कहा कि-“आपने रानी बनकर हमको धोखा दिया है और महारानी लक्ष्मीबाई को यहाँ से निकालने में मदद की है। आपने हमारे एक सैनिक की भी जान ली है। मैं भी आपके प्राण लूँगा।” झलकारी ने गर्व से उत्तर देते हुए कहा-“मार दे गोली, मैं प्रस्तुत हूँ।” सैनिक डोली पर झपटे कि झलकारी तुरन्त घोड़े पर सवार हो गई। तलवार म्यान से बाहर निकाल कर मारकाट करने लगी। ह्यूरोज जमीन पर गिर पड़ा, घबराकर बोला बहादुर औरत शाबास। जिस रानी की नौकरानी इतनी बहादुर है वह रानी कैसी होगी। झलकारी बाई ने बढ़ती हुई अंग्रेज सेना को रोका और द्रुतगति से मारकाट करने लगी। काफी संघर्ष के बाद जनरल रोज ने झलकारी को एक तम्बु में कैद कर लिया। इसके आगे इस विषय पर कुछ मतभेद है कि झलकारी बाई का अंत कैसे हुआ।

        वृंदावनलाल वर्मा, जिन्होने पहली बार झलकारीबाई का उल्लेख उनकी “झांसी की रानी” पुस्तक में किया था, के अनुसार रानी और झलकारीबाई के संभ्रम का खुलासा होने के बाद ह्यूरोज ने झलकारीबाई को मुक्त कर दिया था। उनके अनुसार झलकारी बाई का देहांत एक लंबी उम्र जीने के बाद हुआ था (उनके अनुसार उन्होने खुद झलकारीबाई के नाती से जानकारी ली थी)। बद्री नारायण अपनी Women heroes and Dalit assertion in north India: culture, identity and politics किताब में वर्मा जी से सहमत दिखते हैं। इस किंवदंती के अनुसार जनरल ह्यूरोज झलकारी का साहस और उसकी नेतृत्व क्षमता से बहुत प्रभावित हुआ, और झलकारी बाई को रिहा कर दिया था पर वो अंग्रेज जिन्होंने लाखों निर्दोष मनुष्यों और अनगिनत क्रांतिकारियों को कूर तरीकों से मारा था उनसे इस काम की आशा की ही नहीं जा सकती अतः यह केवल एक कयास मात्र लगता है। दूसरे पक्ष के कुछ इतिहासकारों का कहना है कि उन्हें अंग्रेजों द्वारा फाँसी दे दी गई, वहीँ कुछ का कहना है कि उनका अंग्रेजों की कैद में जीवन समाप्त हुआ। इसके विपरीत कुछ इतिहासकार मानते हैं कि झलकारी इस युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हुई जो कि सही मालूम पड़ता है । श्रीकृष्ण सरल ने अपनी Indian revolutionaries: a comprehensive study, 1757-1961, Volume 1 पुस्तक में उनकी मृत्यू लड़ाई के दौरान हुई थी, ऐसा वर्णन किया है। अखिल भारतीय युवा कोली राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. नरेशचन्द्र कोली के अनुसार 4 अप्रैल 1857 को झलकारी बाई ने वीरगति प्राप्त की।

       झलकारी बाई की गाथा आज भी बुंदेलखंड की लोकगाथाओं और लोकगीतों में सुनी जा सकती है। वीरांगना झलकारी बाई का सबसे पहले उल्लेख बुन्देलखण्ड के सुप्रसिद्ध साहित्यिक इतिहासकार वृन्दावन लाल वर्मा ने अपने उपन्यास लक्ष्मीबाई में किया था जिसके बाद में धीरे – धीरे अनेक विद्वानों, सहित्यकारों, इतिहासकारों ने झलकारी के स्वतन्त्रता संग्राम के योगदान का उदघाटित किया। अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल (21-10-1993 से 16-05-1999 तक) और श्री माता प्रसाद ने झलकारी बाई की जीवनी की रचना की है। इसके अलावा चोखेलाल वर्मा ने उनके जीवन पर एक वृहद काव्य लिखा है, मोहनदास नैमिशराय ने उनकी जीवनी को पुस्तकाकार दिया है और भवानी शंकर विषारद ने उनके जीवन परिचय को लिपिबद्ध किया है। झलकारी बाई का विस्तृत इतिहास भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण के प्रकाशन विभाग ने झलकारी बाई शीर्षक से ही प्रकाशित किया है। झांसी के इतिहासकारों में अधिकतर ने वीरांगना झलकारी बाई को नियमित स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में नहीं सम्मलित किया किन्तु बुन्देली के सुप्रसिद्ध गीतकार महाकवि अवधेश ने झलकारी बाई शीर्षक से एक नाटक लिखकर वीरांगना झलकारीबाई की ऐतिहासिकता प्रमाणित की है।

       वीरांगना झलकारी बाई के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में दिये गये योगदान से देश का अधिकतर जनमानस तो परिचित नहीं है किन्तु एक नकारात्मक घटना ने उन्हें कम से कम बुंदेलखंड क्षेत्र में जन – जन से परिचित करा दिया। हुआ यों कि मार्च 2010 में आगरा के दो प्रकाशकों चेतना प्रकाशन और कुमार पाब्लिकेशन ने बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी के पाठयक्रम के अनुसार एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने बहु विकल्पीय प्रश्नों में वीरांगना झलकारी को नर्तकी की श्रेणी में प्रकाशित कर वीरांगना को अपमानित करने का प्रयास किया। इन दोनों प्रकाशनों का राजनैतिक व्यक्तियों, सामाजिक संगठनों, बुद्धजीवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों ने कड़ा विरोध किया और प्रकाशक के विरोध में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से व्यक्त किये गये आक्रोश से स्वयंसिद्ध हो गया कि राष्ट्र के लिए त्याग और बलिदान की मिसाल पेश करने वाली वीरांगना को नर्तकी की श्रेणी में रखना केवल वीरांगना झलकारीबाई का ही अपमान नहीं था बल्कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम और देश की आजादी के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले शहीदों का घोर अपमान था| लोगों का गुस्सा तब शान्त हुआ जब झांसी के मण्डलायुक्त के आदेश पर प्रकाशक के विरूद्ध मुकदमा पंजीकृत हो गया। वीरांगना झलकारी बाई के बारे में इस प्रकार की अपमान जनक टिप्पणी प्रकाशित करने के पहले भले ही आम जनमानस उनके योगदान को न जानता रहा हो किन्तु उस समय से समाज के सजग पाठक अवश्य परिचित हो गये है।

        यूँ तो भारत सरकार ने 22 जुलाई 2001 में झलकारी बाई के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया है था परन्तु कड़वा सच यही है कि हम कृतघ्नों ने अपने इन महान पूर्वजों को बिसरा दिया और ख़ास तौर पर उन्हें जिनका सम्बन्ध तथाकथित उच्च वर्ग से नहीं था| हमें अपनी इस गलती को सुधारना चाहिए और इन महान आत्माओं को उचित स्थान देना चाहिए| त्याग और बलिदान की अनूठी मिसाल पेश करने वाली वीरांगना झलकारीबाई को शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

         राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने झलकारी की बहादुरी को निम्न प्रकार पंक्तिबद्ध किया है –

जा कर रण में ललकारी थी, वह तो झाँसी की झलकारी थी।
गोरों से लड़ना सिखा गई, है इतिहास में झलक रही,
वह भारत की ही नारी थी।

जतिन्द्रनाथ मुखर्जी (जतिन बाघा)

जतिन्द्रनाथ मुखर्जी (जतिन बाघा)

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      कल 7 दिसंबर को क्रांतिकारी संगठन युगांतर के प्रमुख नेता, वीरता की प्रतिमूर्ति, बंगाल के प्रसिद्द क्रांतिकारी और कितने ही युवकों के प्रेरणाश्रोत जतिन्द्रनाथ मुखर्जी उपाख्य जतिन बाघा का जन्म दिवस था, पर अफ़सोस हम इस क्रांतिधर्मा को याद करना भूल गए| उनका जन्म वर्तमान बंगलादेश के नाड़िया जिले के कुश्तिया तालुका के कयाग्राम नामक स्थान पर उमेशचंद्र बनर्जी और शरतशशि के यहाँ 7 दिसंबर 1879 को हुआ था। जब वह 5 वर्ष के थे, उनके पिता की मृत्यु हो गयी और उनका लालन पालन उनकी माँ ने किया। जल्द ही वो अपने शारीरिक शक्ति के कारण लोगों में पहचाने जाने लगे और केवल एक खुखरी के बल पर अपने गाँव में आतंक मचा रहे रायल बंगाल टाइगर को मारने के कारण उन्हें जतिन बाघा कहा जाने लगा|

       उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता आने पर वो स्वामी विवेकान्द के संपर्क में आये और उनसे अत्यधिक प्रभावित हुए। क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए महर्षि अरविन्द के छोटे भाई बारीन्द्र घोष के साथ मिलकर जतिन ने देवघर के पास एक बम फैक्ट्री स्थापित की जबकि बारीन ने ऐसी ही एक फैक्ट्री कोलकाता के मानिकतला में लगायी। अलीपुर बम केस में युगांतर पार्टी के सभी प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जतिन ने इसका काम संभाला और बंगाल के दुसरे हिस्सों और अन्य प्रदेशों के क्रांतिकारियों से भी संपर्क स्थापित किया।

       हावड़ा षड़यंत्र केस में गिरफ्तारी के दौरान हावड़ा जेल में उनका अनेकों प्रमुख क्रांतिकारियों से परिचय हुआ जो अपने अपने क्षेत्रों में अंग्रेजी प्रशासन के काल थे। यहीं उन्हें ज्ञात हुआ कि जर्मनी अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध छेड़ने वाला है, जिससे उनके मन में भारतीय सनिकों द्वारा विद्रोह का विचार आया। 1911 में सबूतों के अभाव में वो हावड़ा केस से बरी हो गए और पुनः युगांतर पार्टी को मजबूत करने में जुट गए। मिदनापुर और हुगली में आई भीषण बाढ़ में के समय अलग अलग क्रांतिकारी संगठनों द्वारा चलाये गए सहायता कार्यों में ये सब एक दुसरे के संपर्क में आये और सबने मिलकर बघा जतिन और रासबिहारी बोस को उत्तर भारत के लिए अपना नेता चुन लिया।

       उन्होंने अपने एक लेख में उन्हीं दिनों लिखा था-‘ पूंजीवाद समाप्त कर श्रेणीहीन समाज की स्थापना क्रांतिकारियों का लक्ष्य है। देसी-विदेशी शोषण से मुक्त कराना और आत्मनिर्णय द्वारा जीवनयापन का अवसर देना हमारी मांग है।’ 

        प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ होते ही यूरोप स्थित क्रांतिकारियों ने ने मिलकर इंडिया इंडिपेंडेंस पार्टी बनायीं और जर्मन सरकार से सहयोग हासिल करने में सफल रहे। इन सबके सहयोग से अस्त्र शस्त्र हासिल कर जतिन देश के भीतर विद्रोह की तैयारी कर रहे थे और इस हेतु अंग्रेजी सरकार के ठिकानों पर एक के बाद एक डकैती डाली गयी, क्योंकिं क्रांतिकारियों के पास आन्दोलन के लिए धन जुटाने का प्रमुख साधन डकैती ही था।

         दुलरिया नामक स्थान पर भीषण डकैती के दौरान अपने ही दल के एक सहयोगी की गोली से क्रांतिकारी अमृत सरकार घायल हो गए। विकट समस्या यह खड़ी हो गयी कि धन लेकर भागें या साथी के प्राणों की रक्षा करें! अमृत सरकार ने जतींद्र नाथ से कहा कि धन लेकर भागो। जतींद्र नाथ इसके लिए तैयार न हुए तो अमृत सरकार ने आदेश दिया- ‘मेरा सिर काट कर ले जाओ ताकि अंग्रेज पहचान न सकें।’ इन डकैतियों में ‘गार्डन रीच’ की डकैती बड़ी मशहूर मानी जाती है। इसके नेता यतींद्र नाथ मुखर्जी थे। कलकत्ता में उन दिनों राडा कम्पनी बंदूक-कारतूस का व्यापार करती थी। इस कम्पनी की एक गाडी रास्ते से गायब कर दी गयी थी जिसमें क्रांतिकारियों को 52 माउजर पिस्तौलें और 50 हजार गोलियाँ प्राप्त हुई थीं। ब्रिटिश सरकार हो ज्ञात हो चुका था कि ‘बलिया घाट’ तथा ‘गार्डन रीच’ की डकैतियों में यतींद्र नाथ का हाथ था।

        पुलिस के सतर्क होने पर अपने साथियों के परामर्श पर जतिन उडीसा के बालासोर में रहने चले गए जो समुद्र तट के निकट होने के कारण जर्मनी से आने वाले हथियारों को जहाज से उतारने के लिए बहुत उपयुक्त था। कुछ समय बाद जतिन मयूरभंज जिले के कप्तिपदा गाँव में एक ठिकाने पर चले गए और जब वहां से भी किसी दूसरी जगह जाने की तैयारी कर रहे थे, अंग्रेजी फौज के एक बड़े दल द्वारा घेर लिए गए। जतिन और उनके साथ जंगलों और पहाड़ों से होते हुए भागते रहे पर

        अंत में 9 सितम्बर 1915 को घेर लिए गए। दोनों तरफ से जबरदस्त गोलीबारी शुरू हो गयी। जतींद्र के अचूक निशाने से पुलिस अधिकारी राज महन्ती वहीं ढेर हो गया। यह समाचार बालासोर के जिला मजिस्ट्रेट किल्वी तक पहुंचा दिया गया। किल्वी दल बल सहित वहाँ आ पहुंचा। यतीश नामक एक क्रांतिकारी बीमार था और जतींद्र उसे अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। चित्तप्रिय नामक क्रांतिकारी उनके साथ था। 5 क्रांतिकारियों और पुलिस के एक बड़े दल के मध्य हुयी गोलीबारी में अंग्रेजों को काफी क्षति उठानी पड़ी और उनके बहुत लोग मारे गए। क्रांतिकारियों में चित्तप्रिय राय चौधरी बलिदान हुए, जतिन और जतीश गंभीर रूप से घायल हुए और मनोरंजन सेन गुप्ता और निरेन गोला बारूद ख़त्म होने पर पकडे गए।

       इसी बीच यतींद्र नाथ का शरीर गोलियों से छलनी हो चुका था। वह जमीन पर गिर कर ‘पानी-पानी’ चिल्ला रहे थे। मनोरंजन उन्हें उठा कर नदी की और ले जाने लगा। तभी अंग्रेज अफसर किल्वी ने गोलीबारी बंद करने का आदेश दे दिया। गिरफ्तारी देते वक्त जतींद्र नाथ ने किल्वी से कहा- ‘गोली मैं और चित्तप्रिय ही चला रहे थे। बाकी के सभी साथी बिल्कुल निर्दोष हैं। अगले ही दिन 10 सितम्बर को बाघा जतिन बालासोर के अस्पताल में ये नश्वर संसार छोड़ गए और माँ भारती के चरणों पर बलिदान हो गए। उनके जन्म दिवस पर कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

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