मनुष्य — मनुष्य बनो ।

मनुष्य — मनुष्य बनो ।

आज का वैदिक विचार है ।मनुष्य — मनुष्य बनो ।

दिखने में सभी व्यक्ति मनुष्य दिखाई देते हैं और आज मनुष्य का शरीर उनके पास में है किंतु उनके गुण कर्म स्वभाव के अनुसार वह मनुष्य नहीं है ।

आज का समाज मनुष्य को हिंदू ,मुसलमान, सिख, इसाई व अन्य मत-सम्प्रदायों में दीक्षित करना चाहता है ,बनाना चाहता है।

हिंदू बनाना चाहता है, मुसलमान बनना चाहता है ,इसाई बनाना चाहता है , संसार में जितने भी मत- मतांतर- संप्रदाय-मजहब हैं ,वह अपने आप को धर्म मानते हैं किंतु वह धर्म नहीं है, मजहब है, संप्रदाय हैं ,मत हैं , इसलिए बंधुओं धर्म तो केवल एक ही है, वह है – वैदिक धर्म ,मनुष्य धर्म ,उसको समझे, उसको जाने वेद ही एकमात्र ऐसा ग्रंथ है, वैदिक धर्म में ही ऐसा एक धर्म है ,जो कहता है कि मनुष्य बनो।

एक ही बात कहता है मनुष्य बनो । मानवता को अपने जीवन में धारण करो, मनुष्य बनना बड़ा कठिन है ,मनुष्य का अर्थ होता है जो सोच कर ,विचार कर ,चिंतन कर, कार्य करता है वह मनुष्य के कहलाता है ।

मनुष्य हमेशा अपने जीवन में उन्नति के पथ पर जाना चाहता है ,मनुष्य स्वार्थी नहीं होता मनुष्य अपने लिए हि कार्य नही करता है अपितु मनुष्य प्रत्येक प्राणी के हित के लिए कार्य करता है ।

मनुष्य, देवता और राक्षस तीन प्रकार के लोग दुनिया में पाए जाते हैं ।

देवता नहीं बन सकते तो कम से कम मनुष्य बने यही बात यह मंत्र कहता है।

मनुष्य बनकर दिव्य संतानों को उत्पन्न करो ।

मनुष्य बनकर दिव्य समाज का निर्माण करो ।

आज का वैदिक विचार आप देख रहे थे, देख रहे हैं ,वैदिक राष्ट्र चैनल आपने अभी तक सब्क्राइब नहीं किया तो वैदिक राष्ट्र यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें । धन्यवाद । आचार्य भानु प्रताप वेदालंकार इन्दौर मध्यप्रदेश आर्य समाज इंदौर मध्य प्रदेश गुरु विरजानंद गुरुकुल इंदौर मध्य प्रदेश 9977987777 9977957777

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सफलता का रहस्य

सफलता का रहस्य

नमस्ते जी ,आप देख रहे हैं वे वैदिक राष्ट्र यू ट्यूब चैनल की ओर से प्रस्तुत प्रेरणादायक कहानी ।

आज की कहानी है हमें बताती है कि हम अपने जीवन में सफलता को कैसे प्राप्त करें|

सफलता प्राप्ति का क्या रहस्य है |

जीवन में सफलता प्राप्त करनी है तो हमें कठोर परिश्रम निरंतर करना होता है ।

जीवन में कभी भी अपने लक्ष्य की और विश्राम नहीं करना है, निरंतर आगे बढ़ते ही रहना होता है ।

यदि हम अपने परिश्रम में शिथिलता करते हैं तो निश्चित रूप से हम पीछे रह सकते हैं इसलिए आओ हम पुरुषार्थ करें किंतु निरंतर पुरुषार्थ करें तो हमें सफलता मिलती रहेगी।

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धन्यवाद आर्य समाज इंदौर मध्य प्रदेश आज का विचार वैदिक विचार भी सुनें प्रेरणादायक कहानी भी सुनें। वैदिक सिद्धांतों से प्रेरित भजन भी आप सुनते रहें । इसी तरह आपका स्नेह प्रेम मिलता रहे पुनः धन्यवाद। 9977967777

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अकर्मा दस्यु

अकर्मा दस्यु

वेद का विचार है

वेद कहता है — जो व्यक्ति आलसी है ,निकम्मा है ,कामचोर है, वह दस्यु है – वह राक्षस है ।

वह निम्न कोटि का प्राणी है। वह मनुष्य नहीं है, इसलिए आओ हम कर्म करें ,कर्म करने से ही व्यक्ति देव देवता बनता है । कर्महीन व्यक्ति को कुछ नहीं मिलता है ,कर्म करने से ही व्यक्ति सद्गति को प्राप्त होता है।

बिना पुरुषार्थ के ,बिना श्रम के बिना मेहनत के, हमें कुछ भी नहीं – कुछ भी नहीं प्राप्त होता है।

इसलिए आओ हम सब मिलकर पुरुषार्थ करें ,सब पुरुषार्थ करें ,अच्छे कार्य करें। हमारा लक्ष्य है धर्म अर्थ काम और मोक्ष इन सब में पुरुषार्थ करना चाहिए ।

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तू ओम् का स्मरण कर।

आज का विचार
May 1, 2020 • आचार्य भानु प्रताप वेदालंकार • Vaidik sidhant वैदिक सिन्द्धांत
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है क्रतु! तू ओम् का स्मरण कर। जीवात्मा तू ओम का स्मरण कर । यह वैदिक विचार आज आप सुन रहे हैं जीवात्मा को क्रतु कहा गया है । जीवात्मा को कहा गया है — है जीवात्मा तू ओम का स्मरण कर– यजुर्वेद के 40 वें अध्याय में यह मंत्र है । अधिक जानकारी के लिए आप वैदिक राष्ट्र यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें। धन्यवाद

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आचार्य भानु प्रताप वेदालंकार
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जवानों! जवानी यूं ही न गंवाना

जवानों! जवानी यूं ही न गंवाना

जवानों! जवानी यूं ही न गंवाना

[ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करने से मनुष्य ऐश्वर्यशाली बनता है। आज नौजवान ब्रह्मचर्य के व्रत को भूलकर भोगवाद की ओर भाग रहे हैं। ब्रह्मचर्य के अभाव में मनुष्य शारीरिक, मानसिक और आत्मिक उन्नति से वंचित हो रहा है। आर्यसमाज के सुप्रसिद्ध विद्वान् स्व० पं० बुद्धदेव विद्यालंकार जी (स्वामी समर्पणानन्द जी) का यह लेख ‘आर्य गजट’ हिन्दी (मासिक) के मार्च १९७४ के अंक में प्रकाशित हुआ था। ब्रह्मचर्य की शक्ति को जानने के लिए नौजवानों यह लेख अवश्य पढ़ना चाहिए।

मूर्ख और बुद्धिमान में बड़ा अन्तर होता है। मूर्ख अच्छी बात को भी बुरा बना लेता है और बुद्धिमान बुरी चीज को भी अच्छी बना लेता है। काजल का अगर सही प्रयोग किया जाये तो आंखों में डाला हुआ सुन्दरता को चार चांद लगा देता है मगर गलत ढंग से प्रयोग किया हुआ वही काजल इधर-उधर लग जाये तो अच्छी सूरत को भी भद्दा बना देता है। एक बुद्धिमान पुरुष ने आग पर चढ़ी हुई देगची को देखा, उसने अनुभव किया कि वो पानी जो पहले चुपचाप था भाप बनकर कितना जबरदस्त बन गया है जिसने ढक्कन को धकेल कर फेंक दिया है, बुद्धिमान ने इस शक्ति को संभाला और इंजिन तैयार कर लिया- मूर्ख ने पानी और आग को इक्ट्ठा किया और हुक्का बनाकर गुड़गुड़ करता रहा और अपना समय और स्वास्थ्य खराब करता रहा, मनुष्य पर भी एक समय आता है जब उसके सामने अपनी शक्ति सम्भालने का अवसर आता है, जवानी मस्तानी बनकर आता है। जब वह चलता है तो कन्धे मारकर चलता है। पूछो तो कहेगा देखते नहीं जवानी आ रही है। स्टीम पैदा हो रही है। समझदार ने इसे संभाला और लाखों लोगों को पीछे लगा लिया लेकिन मूर्ख यह कहता रहा।
इस दिल के टुकड़े हजार हुए,
कोई यहां गिरा कोई वहां गिरा।

अपनी जवानी का नाश कर लेता है, नौजवानों में ही संभलने का समय होता है लेकिन आज का नौजवान कौन-सी ऐसी खराबी है जिसको निमन्त्रण नहीं देता, मैंने एक जानकार नौजवान को जिसको शराब की लत लग गई थी कहा कि क्यों अपना नाश कर रहे हो, कहने लगा पण्डित जी, आपने कभी पी ही नहीं- शेख क्या जाने मय का मजा, पूछो कम्बख्त ने कभी पी है। पी लेते तो ऐसा न कहते। मैंने कहा पीने से क्या होता है, कहने लगा सब गम गलत हो जाते हैं। मैंने कहा और होश? तो कहने लगा कि होश रहता ही नहीं। मैंने कहा कि इससे बढ़कर और क्या बेवकूफी होगी कि मनुष्य पैसे खर्च कर अपने होश खो दे, अरे मजा तो तब है कि होश कायम हों और फिर नशा चढ़ा रहे।
नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात।
(लेकिन उस नानक के पुजारी आज सबसे अधिक शराब पीते हैं।)

अभिमन्यु की लाश पड़ी है, सब रोते हैं। सुभद्रा का बुरा हाल है, कृष्ण आते हैं। कहते हैं कि सुभद्रा क्या कर रही हो, सुभद्रा रो पड़ती है। कहती है कि भाई तुम मुझे यह कह रहे हो कि क्या कर रही हो? मेरा जवान बेटा छिन गया है। मैं अधीर न होऊं तो क्या करूँ? कृष्ण कहते हैं कि सुभद्रा तू याद कर, तू क्षत्रिय की पुत्री है, क्षत्रिय की बहिन है, क्षत्रिय की पत्नी है और उस क्षत्रिय वीर की माता है। जो धर्म पर वीर गति को प्राप्त हुआ है क्षत्रिय का सबसे बड़ा कर्तव्य धर्म और न्याय की रक्षा के लिए मर मिटना है। तेरा पुत्र तो अमर हो गया है और तू रो रही है। सुभद्रा को होश आ जाता है। उसका चेहरा दमक उठता है। यह है वो खुमारी। पुत्र सामने मरा पड़ा है और होश कायम रखे जाते हैं। यह हालत तब आती है जब मनुष्य नाम की खुमारी में रंग जाये। ब्रह्मचारी बने। ब्रह्मचारी का मतलब है जो ब्रह्म में निवास करे, अपने सत को, वीर्य को संभाल कर रखे यह वीर्य असली रसायन है इससे बढ़कर और कोई रसायन नहीं, आज तो लोग असली रसायन को खोकर फिर इंजेक्शन लगवाने लगते हैं। मूर्खता और किसको कहोगे। आज सुन्दरता के लिए सुरखी और लिपस्टिक लगाये जाते हैं, होठों और गालों पर सुरखी और लाली लगायी जाती है। इस रहस्य को भुला दिया है कि असली खूबसूरती और लाली होठों और गालों पर कैसे आती है। आओ आपको इसका रहस्य भी बतला दें। होंठ बहुत कोमल हिस्सा होता है। वहां खून की लाली उभरती है। शरीर में खून हो और उसका दौरा ठीक हो तो होठों पर लाली खुद-ब-खुद आ जाती है। शरीर में खून हो इस तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। नकली रंग लगाकर बाह्यप्रदर्शन किया जाता है। अच्छा भला आदमी हो, कुछ देर पानी में रहे तो खून का दौरा रुक कर होंठ नीले पड़ जाते हैं। ये खून के करिश्मे हैं, अरे अपने सत को, वीर्य को कायम रख कर तो देखो कितना आनन्द आता है? गंवाने में तो क्षणिक मजा और फिर पछतावा लगा रहता है लेकिन इसे कायम रख कर देखो कितना आनन्द आयेगा।

आप कहेंगे पण्डित जी क्यों तरसा रहे हो। इसे कायम रखने के लिए कोई रास्ता तो बताओ। रास्ता सुन लो आपको ब्रह्मचारी बनना होगा और हमेशा प्रभु की याद रखनी होगी, कहा जाता है कि प्रभुभजन और प्रभु भक्ति तो बुढ़ापे की चीज है। याद रखना अगर आपने अभी से आदत न बनाई तो बुढ़ापे में कुछ न होगा।
सावन का महीना है। आमों का टोकरा सामने पड़ा है। मनुष्य आम चूस कर गुठलियों को एक थाली में सजा-सजा कर रख रहा है। मैंने पूछा ये क्यों सजाई जा रही है? कहने लगे यह भगवान की भेंट होगी। अरे मीठा रस तो शैतान के लिए और गुठलियां भगवान के लिए। जब शरीर काम का न रहेगा खाक भगवान की याद करोगे। जवानी बेकार खो दी तो बुढ़ापे में भगवान हाथ न आएगा। एक यह भी सवाल किया जाता है कि प्रभुभजन क्या करें दिल तो लगता नहीं, लगेगा पहले भूख पैदा करो। भोजन और भजन का एक ही कानून है। भोजन तभी अच्छा लगता है जब भूख हो, भूख में सूखे टुकड़े भी मजा देते हैं। परमात्मा के भजन के लिए भी भूख की जरूरत है। गीता ने चार प्रकार के भक्त कहे हैं।

पहला भक्त वह होता है जो दु:खी हो। आप कहेंगे क्या हम दु:खी हो जायें? हां! आप कहोगे अच्छे उपदेश देने बैठे। माता-पिता जीवित हैं, घर में सबकुछ है, किसी चीज की कमी नहीं, खाने को खूब मिलता है। दु:खी क्यों हों? इस पर भी दु:खी हो जाओ। अपने लिए नहीं, दूसरों के दु:ख को अपना दु:ख समझ लो। अगर तुम्हारे पास कोई भूखा आये तो पहिले उसे खिलाओ। कोई दु:खी है तो उसका दु:ख दूर करो। परोपकार करो। सब कुछ रखते हुए सेवा का व्रत धारण करो। सबसे बड़ी ईश्वर भक्ति यही है। किसी के काम आकर तो देखो कितना आनन्द आता है। दुनियां में जितने दुःख और झगड़े हैं उनके तीन कारण हैं, इनमें से एक तुम ले लो। आज शिक्षा के रहस्य को लोगों ने भुला दिया है, हमारे ऋषियों ने इसे खूब समझा था। वो विद्यार्थियों को दुनिया के इन तीन प्रकारों के दु:खों को दूर करने के लिए तैयार करते थे। हमारी वैदिक शिक्षा सच्चे देश, सच्चे क्षत्रिय और सच्चे ब्राह्मण पैदा करने के लिए होती थी, जो तीन प्रकार के दु:ख दूर करने के लिए तैयार किये जाते थे।

पहला दु:ख अभाव से पैदा होता है। देश का काम है कि वह वस्तुओं का निर्माण करे और सब लोगों को दे लेकिन आज का देश तो ब्लैक मार्कीटियों का हो रहा है। वो अपना स्टाक भर लेता है, वस्तुएं गायब हो जाती हैं, न मिलें तो सब दु:खी। अगर देश अपने धर्म पर कायम है तो ब्लैक मार्कीट और अभाव न आयेगा। बांट ठीक हो तो दु:ख न होगा।
दूसरा दुःख का कारण अन्याय है। कुछ गुण्डे उठते हैं और दूसरों की वस्तु छीन कर घर में डाल लेते हैं। क्षत्रिय का काम है ऐसे लोगों से समाज को बचाये। कोई चोर न हो, कोई डाकू न हो। कोई किसी पर अन्याय न करे, सब सुखी हो जायें। इस काम के लिए क्षत्रिय तैयार किये जाते थे जो न्याय को कायम रखने के लिए व्रत लेते थे और अन्याय को मिटाने के लिए जान पर भी खेल जाते थे।
तीसरा दु:ख अविद्या की वजह से होता है। अविद्या और अज्ञान को दूर करने का काम ब्राह्मण करता था। सारा संसार सुखी था। ये तीन प्रकार के दुनिया के दु:खों को दूर करने के लिए ही शिक्षा दी जाती थी और यही प्रभुभक्ति है। जो प्रभु को याद रखता है और सेवा और परोपकार की जिन्दगी व्यतीत करता है, वही प्रभु-भक्त है।

ऐसा ब्रह्मचारी ब्रह्म में विचरता है और मृत्युन्जय हो जाता है। नौजवानों दुनिया पर और अपने आप पर विजय पानी है तो ब्रह्मचर्य-व्रत को धारण करो। प्रभु-भजन और सेवा का व्रत लो, संसार तुम्हें सर पर उठाएगा।

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दोहरेपन में फँसे राष्ट्रवादी

◆ दोहरेपन में फँसे राष्ट्रवादी
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हाल में एक बड़े हिन्दू राष्ट्रवादी नेता का बयान छपा कि “कुछ तबलीगियों के काम को पूरे समुदाय का प्रतिबिंब नहीं मानना चाहिए।” जब अनुयायियों से पूछा गया कि आशय पूरी तबलीगी जमात से है या पूरा मुस्लिम समुदाय? तो चुप्पी रही। किसी ने कहा कि अखबार ने बयान विकृत करके छापा है। लेकिन जमात पर उनका आधिकारिक मूल्यांकन क्या है – इस का जवाब नहीं मिला।

यही स्थिति इस्लाम, गाँधीवाद, समाजवाद, देवबंदी आंदोलन, आदि अनेक विषयों पर है। ये सब गंभीर मुद्दे हैं जिन से भारत लंबे समय से अत्यंत प्रभावित हो रहा है। मुख्यतः हानिकारक प्रभाव। लेकिन राष्ट्रवादी सोचने की परवाह नहीं करते। तबलीगी जमात पर आज तक उन का कोई प्रस्ताव या किसी बड़े नेता का कोई लेख खोजना कठिन है, जबकि जमात सौ साल से सक्रिय है, जिस ने भारतीय मुसलमानों को घोर अलगाववाद और हिन्दू-विरोध की सीख दी है। जो दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है, जिस के कारनामे दर्जनों देशों में कुख्यात हैं, जिसे सऊदी अरब समेत कई देशों ने ‘मुस्लिम ब्रदरहुड से भी अधिक खतरनाक’ कहकर प्रतिबंधित कर रखा है, और जिस का मुख्यालय भारत में है – उस पर हिन्दू नेताओं का कोई विचार ही नहीं है!

इस से भी दु:खद उनके द्वारा दोहरी नैतिकता अपना लेना है। किसी घटना, संस्था या मतवाद पर वे कभी एक, कभी दूसरी, गोल-मोल टिप्पणी करते हैं। फलतः अधिकांश नेताओं, कार्यकर्ताओं में नासमझी या खालीपन रहता है। यह नेतृत्व के नाम पर नेतृत्वहीनता है जिस से किसी कठिन क्षण में हिन्दू समाज मारा जा सकता है। पश्चिमी पंजाब, सिंध, पूर्वी बंगाल और कश्मीर में यही हुआ था।

हमारे दोस्त-दुश्मन इन संगठनों को ‘हिन्दू’ संगठन मानते हैं, जबकि ये अपने को ‘राष्ट्रीय’ कहते हैं। उसी “सेक्यूलरिज्म” की दुहाई देते हैं जिसे नेहरूवाद, वामपंथ, इस्लामियों ने मिलकर गढ़ा है। इसलिए भी वे हिन्दू धर्म-समाज की रक्षा में खुल कर आने में हिचकते हैं। कोई विकट स्थिति उभरने पर उस का प्रतिकार करना संबंधित क्षेत्रीय आम हिन्दुओं का कर्तव्य मानते हैं। भाव कुछ यह लगता है कि हिन्दू-विरोधियों को रोकना, समझाना-बुझाना सरकार या स्थानीय हिन्दुओं का सिरदर्द है। यह हिन्दू समुदाय का नेतृत्वहीन, असहाय होना ही हुआ!

इसीलिए ऐसे संगठनों द्वारा प्राकृतिक विपदाओं में राहत कार्य करना और स्वयं प्रसन्न होना विचित्र है। क्या वे इसीलिए बने थे? उनका मूल लक्ष्य व स्वरूप राजनीतिक है। फिर उस राहत हेतु सरकार, कारपोरेट, व्यापारी, मठ-मंदिर, रेड-क्रॉस, आदि अनेक संस्थाएं पहले से हैं। वे इन राष्ट्रवादियों से सैकड़ों गुनी अधिक मात्रा में सहायता करती हैं। अकेले हजारों गुरुद्वारे सालो भर लोगों को निःशुल्क भोजन कराते हैं। पर कभी इस की फोटो दिखाते हुए आत्म-मुग्ध नहीं होते। अतः ‘मानवतावादी’ कार्य से “राष्ट्रवादी” संगठन अपना खालीपन ही छिपाते लगते हैं।

यह भी दोहरापन है कि संगठन के सत्ताधारी कोई नीति बनाकर लागू करते हैं, तो उसी समय सत्ता से बाहर दूसरे नेता उस की आलोचना में बोलते हैं। परन्तु संगठन कोई आधिकारिक स्टैंड नहीं लेता। जैसे, क्या राजा पृथ्वीराज चौहान की हत्या कराने वाले सूफी की कब्र पर चादर चढ़ाना हिन्दू संगठनों की नीति है? क्या ‘प्रोफेट मुहम्मद के रास्ते पर चलने’ की सीख, एवं ‘एक हाथ में कुरान और दूसरे में कंप्यूटर’ देना उनकी नीति है? क्या हिन्दू-निंदकों को शक्ति-सम्मान देना, तथा दुर्लभ हिन्दू मनीषियों, योद्धाओं को भी उपेक्षित बल्कि निंदित तक करना राष्ट्रवादी नीति है? शिक्षा-संस्कृति में ज्ञान का लोप और राजनीतिक दुष्प्रचार को बढ़-चढ़ सहयोग देना उनकी नीति है? नए-नए मुस्लिम संस्थान बनाना, बनवाना, परन्तु कोई हिन्दू संस्थान न बनाना, क्या उनकी नीति है? ऐसे प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं मिलता। विभिन्न राष्ट्रवादी इस पर ‘व्यक्तिगत’ विचार देते रहते हैं, जिस पर सिर मारना बेमतलब है!

हरेक कार्यकर्ता किसी विषय को जानने-समझने, सोचने-विचारने के बदले मुख्यतः अपने संगठन का बचाव करते हैं। इस के लिए अंतर्विरोधी, अनुमानित बातें बोलते हैं, किन्तु ऐसे दोहरेपन और गलत नीतियों से धर्म, समाज, देश की क्या हानि हुई? इस पर ध्यान नहीं देते। यदि संगठन से बाहर कोई दे, तो उस से भी अपेक्षा मात्र यह रहती है कि राष्ट्रवादी संगठनों, नेताओं की बड़ाई करे। यानी वही दोहरापन अपना ले। जीती मक्खी निगल ले, चाहे समाज-देश चोट खाता रहे! इस से देश का मार्गदर्शन होगा, या वह बिन पतवार नाव की तरह हिचकोले खाता रहेगा?

अधिकांश राष्ट्रवादी अपने संगठन की प्रशंसा/निंदा के सिवा दूसरों की किसी बात से स्पंदित नहीं होते। लोगों द्वारा हिन्दू धर्म, समाज, महापुरुषों पर चोट करने, या कोई मूल्यवान कार्य करने पर भी निर्विकार रहते हैं। मानो उस के प्रतिकार या प्रसार के लिए उन्हें कुछ करने की आवश्यकता नहीं! किन्तु जैसे ही किसी ने उन के संगठन की प्रशंसा/निंदा की, सभी उठ कर खड़े हो जाते हैं। यह तो केवल अपना नेतृत्व करना हुआ! अपने संगठन का, संगठन के द्वारा, संगठन के लिए। इति। बाकी समाज अपनी परवाह खुद करे। स्पष्टतः यह समाज और संगठन का बुनियादी विलगाव है! चाहे संगठन कितना भी फैलता जाए। सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की तरह।

यहाँ राष्ट्रवादियों ने मान रखा है कि केवल संगठन फैलाते जाना अपने-आप में संपूर्ण काम है। देश-समाज के लिए सोच-विचार, किसी स्थिति, समस्या का अध्ययन विश्लेषण कर सुविचारित नीति बनाना, उसे प्रकाशित कर समाज को जाग्रत करना, समाज की रक्षा हेतु सन्नद्ध रहना, संकट में आगे खड़े होना, आदि उन का काम नहीं है।

ऐसी प्रवृत्ति इस्लामी चुनौती के सामने और घातक है। क्योंकि दोहरी नैतिकता पर इस्लाम का कॉपी-राइट है। यह उसका मूल सिद्धांत है! काफिरों के लिए एक, मोमिनों के लिए दूसरी नीति। कहीं मिथ्याचार, कहीं तलवार। कभी एक बात, कभी दूसरी। इस तरह, काफिरों को गफलत में रख, उन से छूट और सहायता ले-लेकर अंततः उनका विनाश कर देना। ऐसा दोहरापन हिन्दू नहीं अपना सकता। हिन्दू धर्म-दर्शन की मूल शक्ति सत्यनिष्ठा है। अपने धर्म-स्वभाव पर टिक कर ही हिन्दू इस्लाम को हरा सकते हैं। पारंपरिक हिन्दू समाज इस्लाम का मर्म जानता है। उस में कहावत है: ‘मुसलमान बढ़े कुनेम से’। यह तो गत सौ साल से हिन्दू नेता हैं जिन्होंने गाँधीजी से मिथ्याचार, दोहरापन सीख कर हिन्दुओं को भ्रमित करने की जी-तोड़ कोशिशें कर रहे हैं। इसी से इस्लामी तबलीग को फैलने में आसानी हुई।

जबकि हिन्दू अपने नियम, सत्यनिष्ठा पर दृढ़ होकर, आम मुसलमानों को उनके मतवाद के दोहरेपन से दूर कर मानवीय नैतिकता में बनाए रख सकते थे। किन्तु उलटे हिन्दू नेताओं, बौद्धिकों ने दोहरापन अपना लिया। फलतः इस खेल में हिन्दू बुरी तरह पिट रहे हैं। क्योंकि उन के नेताओं ने स्वधर्म छोड़ कर परधर्म ओढ़ लिया। सत्यनिष्ठा के बदले दोहरापन। यह राष्ट्रवादी संगठनों की मुस्लिम नीति में साफ दिखता है। इन के बनाए “सर्वपंथ समादर मंच” और “राष्ट्रीय मुस्लिम मंच” केवल इस्लाम की चापलूसी करने वाले बन कर रह गए। इस्लामी नेताओं ने अपनी दोमुँही बातों से सहज ही उन्हें इस्लाम का आदर-प्रचार करने को विवश किया! जबकि अपना काफिर-विरोधी अभियान चालू रखा। इसीलिए “राष्ट्रीय मुस्लिम मंच” प्रोफेट मुहम्मद का जयंती-समारोह मनाता है, किन्तु श्रीनगर, मालदा या शाहीनबाग जाकर मुसलमानों को ‘ला इलाहा इलल्लाह…’ की कट्टरता और हिन्दू-विरोध से दूर करने को एक तिनका नहीं उठाता। भारत में कहीं भी हिन्दू जब अपने मुस्लिम पड़ोसियों के कारण संकट में फँसते हैं, तो “राष्ट्रीय मुस्लिम” महानुभाव वहाँ नजर नहीं आते।

राष्ट्रवादी हिन्दू संगठन अपनी ही बनाई कैद में बंदी लगते हैं। इस कैद का विस्तार कितना भी हो जाए, वह हिन्दू समाज से अलग ही रहेगा, क्योंकि दोहरापन और एकात्मता दो विपरीत स्थितियाँ हैं।

– डॉ. शंकर शरण (२८ अप्रैल २०२०)

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आदिगुरु शंकराचार्य

आदिगुरु शंकराचार्य

आदिगुरु शंकराचार्य

आदि शंकराचार्य का जन्म केरल में हुआ था. 650 ईसवी के बाद यह वो दौर था, जिसमें भारत में विशाल और स्थिर साम्राज्यों का युग समाप्त हो चला था. साम्राज्य की इच्छा रखने वाले राज्यों में निरन्तर संघर्ष और उत्थान-पतन की लीला ने भारत की राजनीतिक एकता और स्थिरता को हिलाकर रख दिया. कश्मीर, कन्नौज और गौंड के संघर्ष ने और फिर पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट नरेशों की खींचातानी ने उत्तरापथ को आंदोलित कर डाला था. ठीक वैसे ही दक्षिण में चालुक्य, पल्लव और पाण्डय शासकों की लड़ाइयों ने भारत को विचलित कर रखा था. पश्चिम से अरब सेनाओं और व्यापारियों के प्रवेश ने इस परिस्थिति में नया आयाम जोड़ दिया.

बढ़ती अराजकता और असुरक्षा के वातावरण में स्थानीय अधिकारियों और शासकों का प्रभाव बढ़ने लगा. साम्राज्य की जगह सामंती व्यवस्था आकार लेने लगी. किसानों और ग्राम पंचायतों के अधिकार अभी बरकरार थे पर यह सही है कि इस समय राजसत्ता बिखर चुकी थी. आदि शंकराचार्य के समय तक भारत में प्राचीन स्मृतियों और पुराणों का युग बीत चुका था और अनेक अप्रमाणिक ग्रंथ भी रचे जाने लगे थे. उदारवादी और कट्टर प्रवृत्तियों में टकराहट की आहटें भी सुनायी पड़ने लगी थीं. धर्म के क्षेत्र में तंत्र- मंत्र और प्रतिमा पूजन की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही थी. पुराने वैदिक देवताओं को नया रूप दिया जा रहा था और साथ ही बौद्धों के अनेक संप्रदाय भी प्रचलन में आ गए थे.

आदि शंकराचार्य के समय की धार्मिक परिस्थिति को वेद के प्रमाण को मानने वाली आस्तिक और उसे न मानने वाली नास्तिक धाराओं के संगम और संघर्ष का युग भी कहा जाता है. शंकराचार्य इसी संक्रांति काल में भारत में अवतरित हुए. उन्होंने अपने प्रखर ज्ञान और साधना के बल से तत्कालीन भारतीय समाज में धर्म के ह्रास को रोकने के लिए अनेक नास्तिक संप्रदायों का सामना कर वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा में अपना जीवन समर्पित किया.

आदि शंकराचार्य – महर्षि दयानन्द की दृष्टि में

आर्य समाज के प्रवर्त्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने 1875 ई० में पूना में दिए गए अपने प्रवचन में स्वामी शंकराचार्य को स्मरण करते हुए कहा था –

“पंचशिख और शंकराचार्य – इनका इतिहास देखना चाहिए कि उन्होंने सदा सत्य और सदुपदेश ही किए, उसी प्रकार संन्यासी मात्र को सदुपदेश करना चाहिए ।”

(‘उपदेश-मंजरी’ अथवा ‘पूना-प्रवचन’, तीसरा प्रवचन)

पूना में ही दिए गए अपने एक अन्य प्रवचन में महर्षि ने कहा –

“इनके पश्चात् श्रीयुत गौड़पादाचार्य के प्रसिद्ध शिष्य स्वामी शंकराचार्य जी प्रादुर्भूत हुए । शंकर स्वामी वेद-मार्ग और वर्णाश्रम धर्म के मानने वाले थे । उनकी योग्यता कैसी उच्च कक्षा की थी, यह उनके बनाये शारीरक भाष्य से विदित होता है । शंकर स्वामी के समय में जो अनेक पाखण्ड मत चले थे और जिनका कि उन्होंने खण्डन किया है, वह ‘शंकर-दिग्विजय’ के निम्नलिखित श्लोक से प्रकट होते हैं –

🌹श्लोक🌹

‘शाक्तैः पशुपतैरपि क्षपणकैः कापालिकैर्वैष्णवै-
रन्यैरप्यखिलेः खलु खलैर्दुर्वादिभिर्वैदिकम् ॥’

इससे अनुमान किया जा सकता है कि श्रीमान् स्वामी शंकराचार्य ने वेद-विरुद्ध मतों के खण्डन में कितना उद्योग किया है ।”

(‘उपदेश-मंजरी’ अथवा ‘पूना-प्रवचन’, बारहवां प्रवचन)

‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ ग्रन्थ के ‘वेदनित्यत्वविचारः’ प्रकरण में महर्षि दयानन्द ने वेदान्त दर्शन का ‘शास्त्र्योनित्वात्’ (1.1.3) सूत्र प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है ।

वहां महर्षि ने इस सूत्र का संस्कृत में ‘अस्यायमर्थ…’ और हिन्दी में ‘इस सूत्र के अर्थ में शंकराचार्य ने भी वेदों को नित्य मान के व्याख्यान किया है कि …’ – ऐसा लिखकर जो अर्थ प्रस्तुत किया है वह स्वामी शंकराचार्य जी के वेदान्त दर्शन के भाष्य से ही लिया गया है ।

महर्षि दयानन्द ने ‘सत्यार्थप्रकाश’ के ग्यारहवें समुल्लास में स्वामी शंकराचार्य के सम्बन्ध में निम्न बातें लिखी हैं –

(1) शंकराचार्य बाईस सौ (आज से लगभग तेईस सौ) वर्ष पूर्व हुए ।

(2) वे द्रविड़ देशोत्पन्न ब्राह्मण थे ।

(3) उन्होंने ब्रह्मचर्य से व्याकरणादि सब शास्त्रों को पढ़ा था ।

(4) वे सोचते थे कि सत्य आस्तिक वेद मत का छूटना और जैन नास्तिक मत का चलना बड़ी हानि की बात हुई है । वे जैन – नास्तिक मत को हटाना चाहते थे ।

(5) शंकराचार्य शास्त्र तो पढ़े ही थे, परन्तु उन्होंने जैन मत के ग्रन्थ भी पढ़े थे ।

(6) शंकराचार्य की युक्ति भी बहुत प्रबल थी ।

(7) उन्होंने जैन पण्डितों से शास्त्रार्थ किया । जिसमें उनका पक्ष वेद मत का स्थापन और जैनियों के मत का खण्डन था ।

(8) जैन पण्डितों के विरुद्ध शंकराचार्य का मत था कि – ‘अनादि सिद्ध परमात्मा ही जगत् का कर्ता है । यह जगत् और जीव झूठा है, क्योंकि उस परमेश्वर ने अपनी माया से जगत् बनाया है, वही धारण और प्रलय कर्ता है । और यह जीव और प्रपंच (जगत्) स्वप्नवत् है । परमेश्वर आप ही सब रूप होकर लीला कर रहा है ।’ शास्त्रार्थ में शंकराचार्य का मत अखण्डित रहा । जैन मत का पराजय हुआ ।

(9) शंकराचार्य ने दस वर्ष के भीतर आर्यावर्त में सर्वत्र घूमकर जैनियों का खण्डन और वेदों का मण्डन किया ।… उसी समय से सब के यज्ञोपवीत होने लगे और वेदों का पठन-पाठन भी चला ।

(10) शंकराचार्य के पूर्व शैवमत भी थोड़ा-सा प्रचलित था, उसका भी उन्होंने खण्डन किया । उन्होंने वाममार्ग का भी खण्डन किया ।

(11) जब वेद मत का स्थापन हो चुका और विद्या-प्रचार करने का विचार करते ही थे, उतने में शंकराचार्य का शरीर छूट गया । शंकराचार्य जिन दो व्यक्तियों पर अति प्रसन्न थे ऐसे दो कपटमुनिओं ने उन्हें ऐसी विषयुक्त वस्तु खिलाई कि छः महीने के भीतर उनका शरीर छूट गया ।

(12) शंकराचार्य के देहावसान से सब लोग निरुत्साही हो गये और जो विद्या का प्रचार होने वाला था, वह भी न हो पाया ।

(13) शंकराचार्य ने जो-जो शारीरक भाष्यादि बनाये थे उनके शिष्य उनका प्रचार करने लगे अर्थात् शंकराचार्य ने जो जैनियों के खण्डन के लिए ‘ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या’ और ‘जीव-ब्रह्म की एकता’ कथन की थी, उसका उपदेश उनके शिष्य लोग करने लगे ।

(14) इसमें विचारना चाहिए कि जो ‘जीव-ब्रह्म की एकता’ और ‘जगत् मिथ्या’ – यह शंकराचार्य का निज मत था तो वह अच्छा मत नहीं; और जो जैनियों के खण्डन के लिए शंकराचार्य ने उस मत का स्वीकार किया हो तो कुछ अच्छा है ।

(15) अनुमान है कि शंकराचार्य आदि ने तो जैनियों के मत के खण्डन करने ही के लिए यह मत (‘जीव-ब्रह्म की एकता’ और ‘जगत् मिथ्या’) स्वीकार किया हो; क्योंकि देश-काल के अनुकूल अपने पक्ष को सिद्ध करने के लिए बहुत-से स्वार्थी विद्वान् अपने आत्मा के ज्ञान से विरुद्ध भी कर लेते हैं । और जो शंकराचार्य इन बातों को अर्थात् ‘जीव-ब्रह्म की एकता’ और ‘जगत् मिथ्या’ – आदि व्यवहार सच्चा ही मानते थे तो उनकी बात सच्ची नहीं हो सकती ।

अन्य ध्यातव्य तथ्य :

(1) महर्षि ने सत्यार्थ प्रकाश में ‘नवीन-वेदान्त’ (अर्थात् ‘जीव-ब्रह्म की एकता’ और ‘जगत् मिथ्या’ आदि मानने वालों की विचारधारा ) का सर्वाधिक खण्डन किया है – मूर्तिपूजा के खण्डन से भी अधिक ! उन्होंने 7वें, 8वें, 9वें और 11वें – इन चार समुल्लासों में नवीन वेदान्त (अथवा मायावाद, शांकर मत आदि) का खण्डन किया है ।

(2) महर्षि ने नवीन वेदान्त के खण्डन में ‘वेदान्ति-ध्वान्त-निवारण’ नामका एक स्वतन्त्र लघु ग्रन्थ लिखा है । इस ग्रन्थ में शांकर मत का खण्डन किया गया है, परन्तु उसमें उन्होंने शंकराचार्य के नाम का कहीं पर भी उल्लेख नहीं किया है ।

(3) वेदान्त दर्शन के मान्य – प्रामाणिक भाष्य के रूप में अथवा पठन-पाठन के लिए मान्य ग्रन्थों की सूची में महर्षि ने शंकराचार्य कृत किसी भी ग्रन्थ या भाष्य का समावेश नहीं किया है ।

(4) महर्षि ने अपने किसी भी ग्रन्थ में शंकराचार्य के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में कहीं पर भी नकारात्मक टीका-टिप्पणी नहीं की है ।

(5) महर्षि के जीवन-चरित्र और उनके ग्रन्थों एवं शास्त्रार्थों के अनुशीलन करने से तथा उनके धर्मान्दोलन के स्वरूप और शैली पर विचार करने से हमें उन पर कहीं-न-कहीं शंकराचार्य का प्रभाव अवश्य दृष्टिगत होता है ।

(6) आर्य समाज के प्रसिद्ध विद्वान् स्वामी श्री विद्यानन्द जी सरस्वती रचित ‘आदि शंकराचार्य वेदान्ती नहीं थे’ ग्रन्थ पठनीय है ।

ऐसे दिव्य महापुरुष,वेदों के उच्च विद्वान, महान सन्यासी, भारत में पुनः वैदिक धर्म को स्थापित करने वाले महान आदिगुरु शंकराचार्य जी को नमन !!

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मातृभूमि प्रेम

मातृभूमि प्रेम

मातृभूमि प्रेम

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जापान का एक चित्रकार भगवान बुद्ध के जीवन के अनूठे प्रसंगों को

अपनी तूलिका से चित्रित करने के उद्देश्य सारनाथ आया हुआ था।

वह बुद्ध के प्रसंगों को दीवारों पर अंकित करने के कार्य में दिन भर

मनोयोग से जुटा रहता रात के समय बटलोई में

कुछ चावल, दाल और आलू डालकर अपने लिए खिचड़ी बना लेता

एक दिन एक बौद्ध ने उसे एक डिब्बे में से चावल के कुछ दाने निकालकर

चावलों में मिलाते हुए देखा ।

उसने पूछा, ‘क्या चावल इन दानों में कोई विशेषता है, जो तुमने डिब्बे में निकालकर मिलाए

चित्रकार ने उत्तर दिया, ‘बंधु चावल के ये दाने मेरे देश जापान में उपजे हैं।

मैं इन्हें मातृभूमि का पवित्र प्रसाद मानकर प्रतिदिन अपने भोजन में मिला लेता हूं

इस माध्यम से मैं अपनी मातृभूमि से जुड़ा महसूस करता हूं।

बौद्ध भिक्षु जापानी चित्रकार का मातृभूमि प्रेम देखकर हतप्रभ रह गया

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यम-नियम

यम-नियम

यम-नियम

साभार -धर्म शिक्षा

लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

यम-नियम – परमात्मा की प्राप्ति का साधन है

महर्षि पतञ्जलि ने योगदर्शन में अष्टाङ्गयोग (योग के आत अडों) का वर्णन किया है। उनमें प्रारम्भ के दो अङ्ग यम और नियम हैं।

ये दोनों अङ्ग दिव्य मानव जीवन आवश्यक हैं, अतः उनका वर्णन यहाँ दिया जा रहा हे

यम पाँच हैं

१. अहिंसा-मन, वचन, कर्म से किसी प्राणी के प्रति वैर की भावना न रखना

२. सत्य-मन, वचन, कर्म से सत्य का पालन करना।

३. अस्तेय-चोरी न करना। बिना स्वामी आज्ञा के किसी पदार्थ को न उठाना।

४. ब्रह्मचर्य-ईश्वर में विचरण करना, वेदअध्ययन करना, ज्ञानोपार्जन और वीर्य की रक्षा करना

५. अपरिग्रह-अभिमानी न होना और पदार्थों का आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना।

नियम भी पाँच हैं

१. शौच-बाहर और भीतर की पवित्रता रखना।

२. सन्तोष-अपनी शक्ति के अनुसार प्रबल पुरुषार्थ करना और उस पुरुषार्थ से जो फल मिले उसमें सन्तुष्ट रहना।

३. तपः-गर्मी-सर्दी, भूख-प्यास, हानि-लाभ, मान-अपमान, निन्दा-स्तुति में सम रहना, शोक और हर्ष से ऊपर उठना। . वेदादि

. ४. स्वाध्याय-जीवन को ऊँचा उठाने वाले वेदादि शास्त्रों का अध्ययन करनाओम् का जप करना और ‘मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, कहाँ जाना -इन तत्त्वों पर विचार करना

५. ईश्वरप्रणिधान-अपने-आपको ईश्वर के अर्पित कर देना।

प्रभु की आज्ञा में चलना, उसकी आज्ञा के विरुद्ध कोई भी कार्य न करना। वैयक्तिक और सामाजिक उन्नति के लिए यमनियमों का पालन आवश्यक है। ये सार्वभौम महाव्रत हे |

साभार -धर्म शिक्षा

लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

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क्या सीता की अग्नि परीक्षा हुई थी।

आओ इस रहस्य को भी जाने रामायण के प्रमाणों के साथ

क्या सीता की अग्नि परीक्षा हुई थी।

अग्निपरीक्षा के प्रसंग में पौराणिक पंडितों ने काफी मिलावट की है मगर बारीकी से अवलोकन करने से यह विदित होता है कि श्री राम ने समस्त विश्व के आंगन में मां सीता के पवित्र चरित्र को सिद्ध करने के लिए ऐसा किया था इस वर्णन में संक्षेप में है कि जब विभीषण ने मां सीता को अलंकृत करके श्रीराम की सेवा में भेजा तब श्री राम ने उनको कहा कि तुम बहुत समय तक राक्षस के घर में रह कर आई हो अतः मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर सकता तुम चाहो तो सुग्रीव लक्ष्मण या विभीषण के यहां रहो या जहां इच्छा हो वहां जाओ परंतु मैं तुम्हें ग्रहण नहीं करूंगा ऐसा आप स्वयं का अपमान होते देख मां सीता ने ओजस्वी वाणी में श्रीराम को उत्तर दिया उसके बाद उन्होंने अपने पति द्वारा त्यागे जाने पर चिता में भस्म होने का निश्चय किया उनके आदेश पर लक्ष्मण ने चिता सजा दी जब मां सीता सीता की अग्नि की परिक्रमा करते हुए जैसे ही उसने प्रवेश करने वाली थी श्री रामचंद्र ने उनको रोक लिया पता तथा सबके सामने उनके पवित्र होने की साक्षी दी यदि वह ऐसा नहीं करते तो लोगापवाद हो जाता कि रघुकुल नंदन राम अत्यंत कामी व्यक्ति है जिसने दूसरे के यहां आ रही अपनी स्त्री को ऐसे ही स्वीकार कर लिया। अतः यह आवश्यक था।
अग्नि का गुण है कि चाहे जो भी हो,वह उसे जला देती है।फिर चाहे मां सीता हो या अन्य कोई स्त्री उसका अग्नि में जलना अवश्यंभावी है। जिस स्त्री को अग्नि ना जला पाए वह पतिव्रता है -यह कदापि संभव नहीं है , तथा हास्यास्पद,बुद्धिविरुद्ध बात है।यह अग्नि का धर्म है कि उसमें प्रवेश करने वाला हर व्यक्ति जलता है ।पुराणों में तो होलि का नाम की राक्षसी का उल्लेख है ।उसे भी अग्नि में ना जलने का वरदान था ।तो क्या इसे वह प्रति पतिव्रता हो जाएगी?? दरअसल अपने पति द्वारा त्यागी जाने पर मां सीता ने अपने प्राणों को तिनके की तरह त्यागने का निश्चय किया।उनके अग्निसमाधि लेने के निश्चय से सिद्ध हो गया कि श्री राम के सिवा उनके मन में सपने में भी किसी अन्य पुरुष की प्रति (पति समान)प्रेम भाव नहीं था। अतः मां सीता को चिता के पास जाने से रोक कर श्रीराम ने समस्त विश्व के सामने उनकी पवित्रता को प्रमाणित कर दिया जो स्त्री अपने पति द्वारा त्यागे जाने पर एक क्षण भी जीना पसंद नहीं करती तथा अपने शरीर को अग्नि में झुककर मरना चाहती है उसका चरित्र अवश्य ही असंदिग्ध एवं परम पवित्र है इस तथ्य से मां सीता का चरित्र पावनतम था। ✍🏻 कार्तिक अय्यर

(अधिक जानकारी के लिये आर्यसमाज के विद्वान आर्यमुनिजी व स्वामी जगदीश्वरानंदकृत रामायण की टीका को पढ़ें)

[ स्वामी जगदीश्वरानंदकृत वाल्मीकि रामायण की टीका ]
🔥 तां तु पार्श्वैस्थितां प्रह्मां रामः सम्रक्ष्ये मैथिलीम् । हृदयान्तर्गतक्रोधो व्याहतुमुपचक्रमे ॥
लज्जा के कारण सिर झुकाए सीता को अपने निकट खड़ी देख श्रीराम ने अपने हृदयान्तर्गत क्रोध को प्रकट करना प्रारम्भ किया।

🔥 एषाऽसि निर्जिता भद्र शत्रु जित्वा मया रणे।
पौरुषाद्यदनुष्ठेयं तदेतदुपादितम् ।।
वे कहने लगे — हे भद्र ! मैंने युद्ध में शत्रु को परास्त कर तुम्हें पुन : प्राप्त कर लिया । पुरुषार्थ से जो कुछ किया जा सकता था वह मैंने कर दिखाया ।

🔥 गतोऽस्म्यन्तममर्षस्य धर्षणा सम्प्रमार्जिता ।
अवमानश्च शत्रुश्च मया युगपदुद्धृतौ ।।
अब मेरे क्रोध का अन्त हो गया है । रावण ने तुम्हारा अपहरण कर मुझे जो नीचा दिखाया था उसका बदला भी मैंने ले लिया है । मैंने तिरस्कार और तिरस्कार करनेवाला शत्रु दोनों को एक साथ उखाड़ फेंका है ।

🔥 अद्यि मे पौरुषं दृष्टमद्य मे सफल: श्रम: ।
अद्य तीर्णप्रतिज्ञत्वात् प्रभवामीह चात्मन: ॥
आज लोगों ने मेरा पराक्रम देख लिया । आज मेरा सारा परिश्रम सफल हो गया । आज मैं रावण का वध करके तुम्हें पाने की प्रतिज्ञा से पार हो गया और आज मैं स्वतन्त्र हो गया ।

🔥 यां त्वं विरहिता नीता चलचित्तेन राक्षसा ।
दैवसम्पादितो दोषी मानुषेण मया जितः ॥
मेरी अनुपस्थिति में चश्चल चित्त रावण तुम्हारा अपहरण कर तुम्हें पश्चवटी से यहाँ ले आया था । उस देवकृत अपमान को मैंने अपने प्रयत्न से दूर कर दिया ।

🔥 यत्कर्तव्यं मनुष्येण धर्षणां परिमार्जता ।
तत्कृतं सकलं सीते मयेदं मानकाङ्क्षिणा ॥
हे सीते ! देखो , अपना अपमान दूर करने के लिए मनुष्य को जो कुछ करना उचित है वह सब मैंने रावण को मारकर कर दिखाया।

🔥 विदितश्चास्तु ते भद्रे योऽयं रणपरिश्रम: ।
स तीर्ण: सुहृदां वीर्यान्न त्वदर्थ मया कृतः ॥
परन्तु हे भद्र ! तुम्हें यह भी जान लेना चाहिए कि मैंने इष्ट – मित्रों के बल – पराक्रम से युद्ध में जो विजय प्राप्त की है , यह परिश्रम तुम्हारे लिए नहीं किया है ।

🔥 रक्षता तु मया वृत्तमपवादं च सर्वश: ।
प्रख्यातस्यात्मवंशस्य न्यङ्ग च परिक्षता ।।
रावण को मारकर मैंने अपने चरित्र की रक्षा की है और अपनी बदनामी को बचाया है तथा अपने विख्यात वंश के अपयश को धो डाला है ।

🔥 प्राप्तचारित्रसन्देहा मम प्रतिमुखे स्थिता ।
दीपो नेत्रातुरस्येव प्रतिकूलासि मे दृढा ॥
हे सीते ! मुझे तुम्हारे चरित्र में सन्देह उत्पन्न हो गया है , अत : तुम मेरे समक्ष खड़ी हुई मेरे लिए उसी प्रकार असह्य हो रही हो जिस प्रकार नेत्ररोग से पीड़ित मनुष्य को सामने रखा हुआ दीपक असह्य जान पड़ता है

🔥 तद्गच्छ ह्यभ्यनुज्ञाता यथेष्टं जनकात्मजे।
एता दश दिशो भद्रे कार्यमस्ति न मे त्वया ॥
हे जनकदुलारी ! ये दसों दिशाएँ तुम्हारे लिए खुली पड़ी हैं । मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि जिधर तुम्हारी इच्छा हो तुम उधर चली जाओ । मुझे तुमसे अब कोई प्रयोजन नहीं है ।

🔥 कः पुमान् हि कुले जातः स्त्रियं परगृहोषिताम् ।
तेजस्वी पुरादद्यात् सुहृल्लेखेन चेतसा ॥
हे सीते ! ऐसा कौन तेजस्वी पुरुष होगा जो उच्चकुल में उत्पन्न होकर दूसरे के घर में रही हुई स्त्री को सुहृद समझकर ( अपनी समझकर ) फिर स्वीकार कर लेगा ?

🔥 रावणङ्कपरिभ्रष्टां दृष्टां दूष्टेन चक्षुषा ।
कथ त्वां पुनरादद्यां कुल व्यपदिशन् महत् ॥
रावण की गोद में बैठने के कारण भ्रष्ट और उसकी कुदृष्टि से देखी हुई तुमको — इतने बड़े कुल में उत्पन्न होकर , मैं भला किस प्रकार ग्रहण कर सकता हूँ ?

🔥 यदर्थं निर्जिता मे त्वं यश : प्रत्याह्रतं मया ।
नास्ति मे त्वय्यभिष्वङ्गो यथेष्टं गम्यतामितः ।।
जिस कीर्ति के लिए मैंने तुम्हारा उद्धार किया था वह मुझे प्राप्त हो गई । अब मुझे तुमसे कोई प्रयोजन नहीं है । अब तुम जहाँ चाहो वहाँ जा सकती हो ।

🔥 इति प्रव्याहृतं भद्र मयैतत् कृतबुद्धिना ।
लक्ष्मणे भरते वा त्वं कुरु बुद्धिं यथा सुखम् ।।
🔥 सुग्रीवे वानरेन्द्रे वा राक्षसेन्द्रे विभीषणे ।
निवेशय मनः सीते यथा वा सुखमात्मना ॥
हे भद्रे ! मैंने यह बात सोच – विचार कर ही तुमसे कही है । लक्षमण , भरत , वानरेन्द्र सुग्रीव अथवा राक्षसेन्द्र विभीषण में से जिसके यहाँ रहना तुम पसन्द करो अथवा जहाँ तुम्हें सुख मिलने की आशा हो तुम वहाँ रह सकती हो ।

🔥 एवमुक्ता तु वैदेही परूषं रोमहर्षणम् ।
राघवेण सरोषेण भृशं प्रव्यथिताऽभवत् ॥
जब श्रीराम ने कुद्ध होकर इस प्रकार के कठोर और रोमांचकारी वचन कहे तब सीताजी अत्यन्त व्यथित हुई ।

🔥 ततो बाष्पपरिक्लिष्टिं प्रमार्जन्ती स्वमाननम् ।
शनैर्गद्गदया वाचा भतरिमिदमब्रवीत् ॥
तब आसुंओं से भरे अपने मुख को पोंछती हुई सीता गद्गद वाणी से धीरे – धीरे अपने पति से यह बोली

🔥 किं मामसदृशं वाक्यमीदृशं श्रोत्रदारुणम् ।
रूक्षं श्रावयसे वीर प्राकृत: प्राकृतामिव ॥
हे वीर ! तुम ऐसी अनुचित , कर्णकटु और रूखी बातें मुझसे उसी प्रकार क्यों कह रहे हो जैसे गंवार मनुष्य अपनी गंवार स्त्री से कहा करते हैं ?

🔥 न तथाऽस्मि महाबाहो यथा त्वमवगच्छसि ।
प्रत्ययं गच्छ मे स्वेन चारित्रेणैव ते शपे ॥
हे महाबाहो ! आपने मुझे जैसा समझ रखा है मैं वैसी नहीं हूँ । मैं अपने पतिव्रत धर्म की शपथ खाकर कहती हूँ , मेरे ऊपर विश्वास करो

🔥 पृथक्स्त्रीणां प्रचारेण जातिं त्वं परिशङ्कसे ।
परित्यजेमां शङ्कां तु यदि तेऽहं परीक्षिता ॥
गाँवार स्त्रियों के चरित्र से सारी – की – सारी स्त्री जाति के ऊपर सन्देह करना उचित नहीं है । यदि आप मेरे स्वभाव से परिचित हैं तो मेरे चरित्र के सम्बन्ध में अपने मन को संदेह को दूर कर दो ।

🔥 यद्यहं गात्रसंस्पर्श गतास्मि विवशा प्रभो ।
कामकारो न मे तत्र दैवं तत्रापराध्यति ॥
हे स्वामिन् ! जिस समय रावण ने मुझे पकड़ा था उस समय उसने मेरा शरीर अवश्य स्पर्श किया था , परन्तु तब मैं विवश थी , मेरी इच्छा से उसने मेरा शरीर नहीं छुआ था । इसमें मेरा कोई दोष नहीं । यह तो भाग्यवश ही हुआ ।

🔥 मदधीनं तु यत्तन्मे हृदयं त्वयि वर्तते ।
पराधीनेषु गात्रेषु किं करिष्याम्यनीश्वरी ॥
मेरे आपमें ही अधीन तो मेरा अपना मन है , वह लगा रहता है ( उसे कोई छू नहीं सकता ) । मेरा शरीर पराधीन था । उस अवस्था में परवशा मैं क्या कर सकती थी ?

🔥 सह संवृद्धभावाच्य संसर्गेण च मानद ।
यद्यहं ते न विज्ञाता हता तेनास्मि शाश्वतम् ॥ ८ ॥
हे मानप्रद ! इतने दिनों साथ रहने पर भी , साथ ही साथ पालन और पोषण होने पर भी यदि आप मेरे भावों को नहीं जान पाये तो मैं सदा के लिए ही मार डाली गई ।

🔥 त्वया तु नरशार्दूल क्रोधमेवानुवर्तता
लघुनेव मनुष्येणा स्त्रीत्वमेव पुरस्कृतम् ॥
हे नरशार्दूल ! तुमने ओछे मनुष्यों की भाँति क्रोध के वशीभूत होकर मुझे भी साधारण स्त्रियों के समान समझ लिया ।

🔥 न प्रमाणीकृत : पाणिर्बाल्ये बालेन पीडितः ।
मम भक्तिश्व शील च सर्व ते पृष्ठतः कृतम् ॥
विवाह के समय तुमने मेरा जो हाथ पकड़ा था उसका भी कोई प्रमाण नहीं माना और आपके प्रति मेरी भक्ति और मेरे शील की ओर से भी आपने अपना मुँह फेर लिया ।

🔥 एवं ब्रुवाणा रुदती बाष्यगदगदभाषिणी ।
अब्रवीलक्ष्मण सीता दीनं ध्यानपरं स्थितम् ॥
ऐसा कहकर रोती और आँसू बहाती हुई सीता गद्गद होकर लक्ष्मणजी से , जो उस समय उदास हो , एकाग्र मन से कुछ सोच रहे थे बोली —

🔥 चितां मे कुरु सौमित्रे व्यसनस्यास्य भेषजम् ।
मिथ्योपघातोपहता नाहं जीवितुमुत्सहे ॥
हे लक्ष्मण ! इस मिथ्यापवाद से पीड़ित हो मैं अब जीना नहीं चाहती , अत : तुम मेरे लिए चिता तैयार करो , क्योंकि ऐसे रोग की एकमात्र यही औषध है ।

🔥 अप्रीतस्य गुणैर्भर्तुस्यताया जलसंसदि ।
या क्षमा मे गतिर्गन्तुं प्रवेक्ष्ये हव्यवाहनम् ॥
मेरे गुणों से अप्रसन्न होकर सब लोगों के समक्ष मेरे पति ने मेरा परित्याग कर दिया है , अत : अब मेरे लिए यही उचित है कि मैं अग्रि में भस्म हो जाऊ

🔥 एवमुक्तस्तु वैदेह्मा लक्ष्मण: परवीरहा ।
अमर्षवशमापन्नो राघवाननमैक्षत ॥
जब सीताजी ने शत्रुसंहारक लक्ष्मणजी से ऐसा कहा तब लक्ष्मणजी ने क्रोध में भरकर श्रीरामचन्द्रजी के मुख की ओर ( उनका अभिप्राय जानने के लिए ) देखा ।

🔥 स विज्ञाय मनश्छन्दं रामस्याकारसूचितम् ।
चितां चकार सौमित्रिर्मते रामस्य वीर्यवान् ॥
श्रीराम की मुखाकृति से लक्ष्मण ने जान लिया कि उनका भी यही अभिप्राय है , अत: महापराक्रमी श्रीराम के आदेशानुसार उन्होंने चिता बनाकर तैयार कर दी ।

🔥 अधोमुखं तदा रामं शनैः कृत्वा प्रदक्षिणम् ।
उपासर्पत वैदेही दीप्यमानं हुताशनम्॥
चिता तैयार होने पर सीताजी ने नीचे की ओर मुख किये हुए धीरे – धीरे श्रीराम की प्रदक्षिणा की । तत्पश्चात् वे धधकती हुई अग्रि के निकट आई ।

🔥 प्रणम्य दैवतेभ्यश्च ब्राह्मणोभ्यश्च मैथिली ।
बद्धाङ्जलिपुटा चेदमुवाचाग्निसमीपत: ॥
सीताजी ने विद्वानों और ब्राह्मणों को प्रणाम कर अग्रि के पास खड़े होकर तथा हाथ जोड़कर यह कहा

🔥 यथा मे हृदयं नित्यं नापसर्पति राघवात् ।
तथा लोकस्य साक्षी मां सर्वतः पातु पावक : ॥
जिस प्रकार मेरा तन श्रीराम की ओर से कभी चलायमान नहीं हुआ उसी प्रकार सब लोगों के साक्षी अग्रिदेव सब प्रकार से मेरी रक्षा करें ।

🔥 कर्मणा मनसा वाचा यथा नातिचराम्यहम् ।
राघवं सर्वधर्मज्ञं तथा मां पातु पावक : ॥
मन , वचन और कर्म से यदि मैं सर्वधर्मज्ञ श्रीराम को छोड़ अन्य किसी को पतिरूप में न जानती होऊँ तो अग्रिदेव मेरी रक्षा करें ।

🔥 एवमुक्त्वा तु वैदेही परिक्रम्य हुताशनम् ।
उद्यतोऽभूत् प्रवेष्टु तं निस्सङे्गनान्तरात्मना ॥
ऐसा कहकर चिता की परिक्रमा कर तथा अपने अग्रि में शरीर की तनिक भी परवाह न कर सीता कूदने के लिए उद्यत हुई ।

🔥 जन: स सुमहांस्त्रसतो बालवृद्धसमाकुल : ।
ददर्श मैथिलीं तत्र प्रविशन्तीं हुताशनम् ॥
उधर जब वहाँ उपस्थित बालक और बूढ़ों ने सीताजी को अग्रि में प्रविष्ट होते ( प्रविष्ट होने के लिए उद्यत देखा ) देखा तब वे सब भयभीत हो गये ।

🔥 तदा प्रीतमना रामो प्रविशन्तीं हुताशनम् ।
वारयित्वा तु वैदेहीमुवाच हरिराक्षसान् ll
सीताजी को अग्रि में कूदने के लिए तैयार देख श्रीराम ने प्रसन्न होकर ( उनकी शुद्धता के कारण ) उन्हें ऐसा करने से रोका और फिर वे वहाँ उपस्थित वानर और राक्षसों से कहने लगे

🔥 अवश्यं त्रिषु लोकेषु न सीता पापमर्हति ।
दीर्घकालोषिता हीयं रावणान्तःपुरे शुभा ॥
निश्चय ही सीताजी तीनों लोकों में शुद्ध एवं पवित्र हैं , परन्तु यह सौभाग्यवती बहुत दिनों तक रावण की अशोकवाटिका में रही हैं।

🔥 बालिश: खलु कामात्मा रामो दशरथात्मज: ।
इति वक्ष्यन्ति मां सन्तो जानकीमविशोध्य हि ॥
यदि मैं सीताजी की शुद्धता की परीक्षा न कराता तो सब लोग यही कहते कि महाराज दशरथ के पुत्र राम बड़े कामी और मूर्ख हैं ।

🔥 अनन्यहृदयां भक्तां मच्चित्तपरिवर्तिनीम् ।
अहमप्यवगच्छामि मैथिलीं जनकात्मजाम् ॥
मैं जानता हूँ कि सीता मुझमें अनन्य अनुराग रखती है , सीताजी मुझे छोड़कर अपने मन में अन्य किसी को स्थान नहीं दे सकतीं ।

🔥 अनन्या हि मया सीता भास्करेण प्रभा यथा ।
न हि हातुमियं शक्या कीर्तिरात्मवता यथा ॥
सीता मुझमें ही अनन्यरूप से अनुरागवती है – मुझसे अभिन्न है जैसे प्रभा सूर्य से । मैं भी इन्हें वैसे ही नहीं त्याग सकता जैसे यशस्वी पुरुष अपनी कीर्ति को नहीं त्याग सकता ।

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