दुर्गा भाभी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों की प्रमुख सहयोगी थी।

मुझे भी सौभाग्य मिला था इनके दर्शन का –
“दुर्गा भाभी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों की प्रमुख सहयोगी थी। 18 दिसम्बर 1928 को भगत सिंह ने इन्हीं दुर्गा भाभी के साथ वेश बदल कर कलकत्ता-मेल से यात्रा की थी। दुर्गा भाभी क्रांतिकारी भगवती चरण बोहरा की धर्मपत्नी थी।”

“महान क्रांतिकारी “दुर्गा भाभी” को उनकी जन्मतिथि 7 अक्टूबर पर “आर्य परिवार संस्था, कोटा” की ओर से हार्दिक शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।”

दुर्गा भाभी (दुर्गावती देवी) का जन्म 7 अक्टूबर 1902 को शहजादपुर ग्राम अब कौशाम्बी जिला में पंडित बांके बिहारी के यहां हुआ। इनके पिता इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में नाजिर थे और इनके बाबा महेश प्रसाद भट्ट जालौन जिला में थानेदार के पद पर तैनात थे। इनके दादा पं॰ शिवशंकर शहजादपुर में जमींदार थे जिन्होंने बचपन से ही दुर्गा भाभी के सभी बातों को पूर्ण करते थे।
दस वर्ष की अल्प आयु में ही इनका विवाह लाहौर के भगवती चरण बोहरा के साथ हो गया। इनके ससुर शिवचरण जी रेलवे में ऊंचे पद पर तैनात थे। अंग्रेज सरकार ने उन्हें राय साहब का खिताब दिया था। भगवती चरण बोहरा राय साहब का पुत्र होने के बावजूद अंग्रेजों की दासता से देश को मुक्त कराना चाहते थे। वे क्रांतिकारी संगठन के प्रचार सचिव थे। वर्ष 1920 में पिता जी की मृत्यु के पश्चात भगवती चरण वोहरा खुलकर क्रांति में आ गए और उनकी पत्‍‌नी दुर्गा भाभी ने भी पूर्ण रूप से सहयोग किया। सन् 1923 में भगवती चरण वोहरा ने नेशनल कालेज बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की और दुर्गा भाभी ने प्रभाकर की डिग्री हासिल की। दुर्गा भाभी का मायका व ससुराल दोनों पक्ष संपन्न था। ससुर शिवचरण जी ने दुर्गा भाभी को 40 हजार व पिता बांके बिहारी ने पांच हजार रुपये संकट के दिनों में काम आने के लिए दिए थे लेकिन इस दंपती ने इन पैसों का उपयोग क्रांतिकारियों के साथ मिलकर देश को आजाद कराने में उपयोग किया। मार्च 1926 में भगवती चरण वोहरा व भगत सिंह ने संयुक्त रूप से नौजवान भारत सभा का प्रारूप तैयार किया और रामचंद्र कपूर के साथ मिलकर इसकी स्थापना की। सैकड़ों नौजवानों ने देश को आजाद कराने के लिए अपने प्राणों का बलिदान वेदी पर चढ़ाने की शपथ ली। भगत सिंह व भगवती चरण वोहरा सहित सदस्यों ने अपने रक्त से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किए। 28 मई 1930 को रावी नदी के तट पर साथियों के साथ बम बनाने के बाद परीक्षण करते समय वोहरा जी शहीद हो गए। उनके शहीद होने के बावजूद दुर्गा भाभी साथी क्रांतिकारियों के साथ सक्रिय रहीं।
9 अक्टूबर 1930 को दुर्गा भाभी ने गवर्नर हैली पर गोली चला दी थी जिसमें गवर्नर हैली तो बच गया लेकिन सैनिक अधिकारी टेलर घायल हो गया। मुंबई के पुलिस कमिश्नर को भी दुर्गा भाभी ने गोली मारी थी जिसके परिणाम स्वरूप अंग्रेज पुलिस इनके पीछे पड़ गई। मुंबई के एक फ्लैट से दुर्गा भाभी व साथी यशपाल को गिरफ्तार कर लिया गया। दुर्गा भाभी का काम साथी क्रांतिकारियों के लिए राजस्थान से पिस्तौल लाना व ले जाना था। चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लड़ते वक्त जिस पिस्तौल से खुद को गोली मारी थी उसे दुर्गा भाभी ने ही लाकर उनको दी थी। उस समय भी दुर्गा भाभी उनके साथ ही थीं। उन्होंने पिस्तौल चलाने की ट्रेनिंग लाहौर व कानपुर में ली थी।
भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त जब केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने जाने लगे तो दुर्गा भाभी व सुशीला मोहन ने अपनी बांहें काट कर अपने रक्त से दोनों लोगों को तिलक लगाकर विदा किया था। असेंबली में बम फेंकने के बाद इन लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया तथा फांसी दे दी गई।
साथी क्रांतिकारियों के शहीद हो जाने के बाद दुर्गा भाभी एकदम अकेली पड़ गई। वह अपने पांच वर्षीय पुत्र शचींद्र को शिक्षा दिलाने की व्यवस्था करने के उद्देश्य से वह साहस कर दिल्ली चली गई। जहां पर पुलिस उन्हें बराबर परेशान करती रहीं। दुर्गा भाभी उसके बाद दिल्ली से लाहौर चली गई, जहां पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और तीन वर्ष तक नजरबंद रखा। फरारी, गिरफ्तारी व रिहाई का यह सिलसिला 1931 से 1935 तक चलता रहा। अंत में लाहौर से जिलाबदर किए जाने के बाद 1935 में गाजियाबाद में प्यारेलाल कन्या विद्यालय में अध्यापिका की नौकरी करने लगी और कुछ समय बाद पुन: दिल्ली चली गई और कांग्रेस में काम करने लगीं। कांग्रेस का जीवन रास न आने के कारण उन्होंने 1937 में छोड़ दिया। 1939 में इन्होंने मद्रास जाकर मारिया मांटेसरी से मांटेसरी पद्धति का प्रशिक्षण लिया तथा 1940 में लखनऊ में कैंट रोड के (नजीराबाद) एक निजी मकान में सिर्फ पांच बच्चों के साथ मांटेसरी विद्यालय खोला। आज भी यह विद्यालय लखनऊ में मांटेसरी इंटर कालेज के नाम से जाना जाता है। 14 अक्टूबर 1999 को गाजियाबाद में उन्होंने सबसे नाता तोड़ते हुए इस दुनिया से अलविदा कर लिया।

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वेदों के पुनर्स्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती जी

वेदों के पुनर्स्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती जी https://youtu.be/0xiWejF93ig
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महर्षि दयानन्द सरस्वती का नाम राष्ट्र निर्माताओं में सदैव आदरपूर्वक लिया जाएगा। उन्होंने आध्यात्मिक, धार्मिक एवं सामाजिक क्षेत्र में जागृति का शंखनाद तो फूँका ही था, उन्होंने देशवासियों को स्वराज्य के महत्व से भी अवगत कराया था।
उस समय की राजनैतिक दासता की स्थिति के कारण उनका हृदय विह्वल था।

उन्होंने अपने अमर ग्रंथ सत्यार्थप्रकाश के अष्टम समुल्लास में लिखा है-

‘‘अब अभाग्योदय से और आर्यों के आलस्य, प्रमाद, परस्पर विरोध से अन्य देशों के राज्य करने की तो कथा ही क्या कहनी, किन्तु आर्यावर्त में भी आर्यों का अखण्ड, स्वतन्त्र, स्वाधीन, निर्भय राज्य इस समय नहीं है। जो कुछ भी है सो भी विदेशियों से पादाक्रान्त हो रहा है। दुर्दिन जब आता है, तब देशवासियों को अनेक प्रकार का दुःख भोगना पड़ता है। कोई कितना भी करे, परन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है, सर्वोपरि उत्तम होता है। अथवा मतमतान्तर के आग्रह रहित, माता-पिता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है। परन्तु भिन्न-भिन्न भाषा, पृथक-पृथक शिक्षा अलग-अलग व्यवहार का छूटना अति दुष्कर है। बिना इसके छूटे परस्पर का पूरा उपकार और अभिप्राय सिद्ध होना कठिन है।”

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने वेद को ही परम प्रमाण माना।
वेद स्वतः प्रमाण हैं।
महर्षि ने वेदों के उद्धार के लिए अत्यधिक परिश्रम किया। वेद ईश्‍वरीय ज्ञान हैं।
उनमें कोई बात ईश्‍वर के गुण-कर्म-स्वभाव से विपरीत नहीं है। कोई बात सृष्टि क्रम के विपरीत नहीं है। वेद का ज्ञान परमात्मा ने मनुष्यों को उन्नति करने में सहायता देने के लिए दिया है।
वेद का अर्थ प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणों के अनुकूल होना चाहिए। वेद में सभी सत्य विद्या एवं विज्ञानों का वर्णन है। महर्षि के प्रभाव के परिणामस्वरूप आज वेदों का अध्ययन भारत में ही नहीं, विश्‍व के अनेकों देशों में किया जा रहा है। साथ ही वर्तमान वेद भाष्य ऋषि दयानन्द सरस्वती की भाष्य शैली से प्रभावित एवं अनुप्राणित है।
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🌹महर्षि दयानंद सरस्वती का वेद-विषयक दृष्टिकोण🌹

आर्यसमाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद सरस्वती (१८२५-१८८३) ने वर्तमान युग में वेदों के संबंध में कई मूलभूत वातों की ओर संसार का ध्यान आकर्षित किया है।

१. ऋक्‌, यजुः, साम और अथर्व – ये चार मंत्र संहिताएं ही ‘वेद’ हैं। इन चार मंत्र संहिताएं ही ईश्वर-प्रणीत अथवा अपौरुषेय ज्ञान-पुस्तकें हैं। इन चार के अतिरिक्त जो भी पुस्तकें हैं – मान्य या अमान्य, वे सब मनुष्यों द्वारा रचित अर्थात् पौरुषेय हैं।

२. वेदों में ज्ञान, विज्ञान, कर्म और उपासना – ये चार विषयों का अथवा ईश्वर, जीव और प्रकृति (तथा प्रकृति से उत्पन्न सृष्टि) के संबंध में निर्भ्रान्त ज्ञान वर्णित है। वेद-ज्ञान की सहायता से मनुष्य अपने जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।

३. वेदों में किसी राजा, प्रजा, देश, व्यक्ति आदि का बिलकुल इतिहास नहीं है। वेदों तो सृष्टि के आरंभ में प्रकाशित हुए हैं। उनमें किसी मनुष्य का इतिहास नहीं है। मनुष्यों ने वेदाविर्भाव के पश्चात् अपनी आवश्यकता अनुसार व्यक्तिओं, देशों, पर्वतों, नदियों तथा समुद्रों आदि के नाम वेदों के शब्दों के आधार पर निश्चित किए हैं।
वेदों के शब्दों के आधार पर नाम रखने की यह परंपरा आज पर्यंत चली आ रही है। परंतु इससे वेदों में इन नामों वाले व्यक्तियों का इतिहास वर्णित है, ऐसा मान लेना तो बिलकुल ही अयोग्य समझा जाएगा।
वेदों में मानवीय अनित्य इतिहास का नितान्त अभाव है।

हां, सृष्टि की रचना कैसे होती है, प्रथम क्या बनता है, बाद में क्या बनता है, इसका चक्र कैसे चलता है, किन नियमों से सृष्टि चलती है, इत्यादि प्रश्नों के वैज्ञानिक समाधान के रूप में सृष्टि का नित्य इतिहास तो वेदों में है, परंतु उनमें किसी प्रकार का अनित्य मानवीय इतिहास बिल्कुल नहीं है।
समस्त वैदिक साहित्य इस बात को प्रमाणित करता है कि वेदों में किसी भी देश, समाज या व्यक्ति का इतिहास नहीं है।
इसलिए वे लोग जो वेदों में मानवीय इतिहास की कड़ियाँ या संकेत ढूंढने में विश्वास रखते हैं और इसी हेतु से कार्यरत हैं, वे वास्तव में वेदों के यथार्थ स्वरूप को समझने में भारी भूल कर रहे हैं।

४. वेदों में तीन पदार्थों को अनादि, अनुत्पन्न, नित्य स्वीकार किए गए हैं –
ईश्वर,
जीव
और प्रकृति।

इन तीनों पदार्थ की सत्ता सदैव बनी ही रहती है। इसलिए उनका कभी भी अभाव नहीं होता है। ये तीनों सत्ताएं अनादि हैं, वे कभी भी उत्पन्न नहीं होतीं हैं। ये तीनों तो बस ऐसे ही सदा से हैं और आगे भी सदैव बनी रहेंगी।
ये तीनों सत्ताएं अनादि – अनंत काल से अपना अस्तित्व रखती आयी हैं और अनंत काल तक ऐसे ही विद्यमान रहने वाली हैं।
उनका कभी भी अभाव होने वाला नहीं है। इसके अतिरिक्त, ये तीनों सत्ताएं एक में से दूसरी ऐसे परिवर्तित भी कभी नहीं होती हैं।
अर्थात् ईश्वर कभी जीव या प्रकृति नहीं बनता है; जीव कभी ईश्वर या प्रकृति नहीं बनता है; और प्रकृति कभी ईश्वर या जीव नहीं बनती है। ये तीनों सत्ताएं अपने-अपने स्वाभाविक गुणों के आधार पर एक-दूसरे से सदैव भिन्न ही बनी रहती हैं; कभी भी अभिन्न – समान – एक नहीं हो जातीं। ईश्वर और जीव चेतन हैं, जबकि प्रकृति जड़ है। ईश्वर जीवों के कल्याण के लिए – उनकों उन्नति का – मोक्ष-प्राप्ति का अवसर प्रदान करने के लिए प्रकृति में से सृष्टि बनाता है। यह सृष्टि आज पर्यंत अनंत बार बनी-बिगड़ी है, और भविष्य में भी अनंत बार बनने-बिगड़ने वाली है। सृष्टि-प्रलय का यह क्रम भी अनंत है।

५. वेदों में मनुष्य के चरम विकास एवं उन्नति के लिए अपेक्षित समस्त ज्ञान वर्णित है।
वेदों में सर्व प्रकार का ज्ञान-विज्ञान निहित है।
वेदों में ईश्वर-प्राप्ति अथवा मोक्ष-प्राप्ति को मानव जीवन का चरम लक्ष्य बताया गया है।
वेदों का प्रधान विषय यही अध्यात्म विज्ञान है। वेदों में भौतिक जीवन के प्रति भी अनादर के भाव नहीं हैं, उसके उत्कर्ष के लिए भी पर्याप्त सामग्री वेदों में उपलब्ध है; फिर भी आध्यात्मिक ऐश्वर्य की तुलना में भौतिक ऐश्वर्य को गौण जरूर बताया गया है।
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६. वेद जगत् को वास्तविक एवं सप्रयोजन मानते हैं। जगत् को स्वप्नवत्‌ मिथ्या मानते हुए अपने शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक अभ्युदय की प्राप्ति के लिए बिल्कुल कामना या यत्न ही न करना – इस प्रकार के निराशावादी चिंतन का वेदों में अभाव है। वेद हमें ज्ञान-कर्म-उपासनामय कर्मठ जीवन के पाठ पढ़ाते हैं।

७. वेदों में विशुद्ध एकेश्वरवाद का प्रतिपादन किया गया है। एक ही सच्चिदानंद-स्वरूप, सर्वव्यापक, निराकार, अनंत, सर्वशक्तिमान, चेतन ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव का ज्ञान कराने के लिए वेदों में उसकी अनेकानेक नामों से स्तुति – यथार्थ वर्णन किया गया है। इसलिए वेदों में ईश्वर के लिए प्रयुक्त इन्द्र, वरुण, प्रजापति, सविता, विधाता, अग्नि, गणपति इत्यादि नामों को देखकर ऐसा निष्कर्ष निकाल लेना कि वेदों में तो अनेक ईश्वर की स्तुति है, वेदों तो बहुदेवतावादी हैं, एक गंभीर भूल ही मानी जाएगी। वेद एक ही ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना करने की शिक्षा देते हैं।

८. वेद मानवोपयोगी समस्त विद्याओं के मूल हैं। वेदों में मानव जीवन के सभी अंगो के विषय में – व्यष्टि एवं समष्टि दोनों के विषय में ज्ञान प्रस्तुत किया गया है। वेदों में भौतिक विज्ञान के रहस्य भी उपलब्ध हैं, परंतु वेदों में ये सब विद्याएं मूलवत् अर्थात् बीज या सूत्र रूप में वर्णित हैं। वेदों में किसी ‘शास्त्र’ के रूप में अमुक विद्या या विज्ञान-शाखा का सांगोपांग विस्तार या विशद विवेचन प्रस्तुत नहीं किया गया है। परंतु वेदों में से भौतिक जगत् विषयक संकेतों को ठीक से समझ कर उनके अवलंबन से सृष्टि का गहन वैज्ञानिक अध्ययन करके मनुष्य भौतिक जगत् की भी अनेक सच्चाइयों का अन्वेषण कर सकते हैं।

९. वेदों में यज्ञ, संस्कार आदि कर्मकांड का भी यथोचित वर्णन किया गया है। वेदों में वेदार्थ आधारित सार्थक एवं वैज्ञानिक कर्मकांड को समुचित स्थान दिया गया है। वेदों में ‘यज्ञ’ शब्द को अत्यंत विस्तृत अर्थ में प्रयुक्त किया गया है, जिसकी अर्थ-परिघि में उन सभी प्रकार के उत्तम कर्मों का समावेश हो जाता है, जो किसी सद्‌भावना से प्रेरित होकर किए जाते हैं और जिनके द्वारा सुखों की वृद्धि और दुःखो तथा क्लेशों का शमन होता हैं। फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए वेद केवल द्रव्यमय यज्ञों या कर्मकांड के लिए ही प्रवृत्त नहीं हुए हैं। वेद ज्ञान के – सत्य विद्याओं के ग्रंथ हैं; ये याज्ञिक कर्मकांड के ही या मानवीय अनित्य इतिहास के ग्रंथ नहीं हैं। कर्मकांड में भी जो विनियोग होता है वह मंत्र के अर्थ के आधीन होना अपेक्षित है।

१०. वेद और सृष्टि दोनों ईश्वरीय हैं। जैसे वेद ईश्वर-प्रणीत हैं, ईश्वरीय ज्ञान के ग्रंथ हैं, वैसे ही यह सृष्टि अथवा जगत् भी वही ईश्वर द्वारा रचित एवं संचालित है। इसलिए इन दोनों में अर्थात् वेद तथा सृष्टि में अ-विरोध है, दोनों में पूरी संगति है, पक्का समन्वय है। सृष्टि विषयक जो बातें वेदों में वर्णित हैं, वही बातें हमें सृष्टि में उपस्थित व कार्यरत दिखाई पड़ती हैं। इसलिए वेद सर्वथा वैज्ञानिक हैं। वेदों में ऐसी एक भी बात नहीं है, जो सृष्टिक्रम के विरुद्ध हो या जिसका सृष्टि-विज्ञान से मेल न बैठता हो। इस तरह वेदों की रचना बुद्धिपूर्वक – ज्ञान-विज्ञानपूर्वक है, जो उनका ईश्वरीय होना सिद्ध करता है।

११. वेदों में मानव समाज का ब्राह्मण आदि चार वर्णों में विभाजन किया गया है; परंतु इस विभाजन का आधार व्यक्ति का जन्म नहीं, बल्कि उसके गुण-कर्म-स्वभाव हैं। जन्म आधारित जाति प्रथा न केवल वेदबाह्य है, बल्कि वेद-विरुद्ध भी है।

१२. वेदों को यथार्थ रूप में समझने के लिए ब्राह्मण-ग्रंथ, वेदांग, उपांग, उपवेद, प्रमुख – मौलिक उपनिषद् तथा मनुस्मृति आदि पुरातन वैदिक ग्रंथो का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। पाणिनि मुनि कृत अष्टाध्यायी, पतंजलि मुनि कृत महाभाष्य तथा यास्क मुनि कृत निरुक्त तथा निघंटु के अध्ययन से वेदों की भाषा तथा वेदों के अर्थ समझने में अनन्य सहायता प्राप्त हो सकती है।
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१३. वेदों की शिक्षाएं –

उपदेश सर्वथा उदात्त, सार्वभौम, सर्वजनोपयोगी और प्राणीमात्र के लिए हितकारी हैं। वेद मानवमात्र का ही नहीं, जीवमात्र का हित करने वाली बातों का उपदेश करते हैं। वेदों में जिसे संकीर्ण, एकांगी या सांप्रदायिक कहा जा सके ऐसा कुछ भी नहीं है। सभी का कल्याण और सर्वविध उन्नति कराने वाली सुभद्र बातों को प्रकाशित करने वाले वेद वैश्विक धर्म के प्रतिनिधि हैं। वेदों में उन समस्त विषयों का उल्लेख पाया जाता है, जिनका स्वीकार व आचरण कर कोई भी देश, समाज या व्यक्ति उन्नति के शिखर पर पहुंच सकता है और सभी लोग विश्व, देश, समाज या परिवार में सुख एवं शांतिपूर्वक रहकर जीवन व्यतीत कर सकते हैं। मनुष्यों को आज पर्यंत जिन-जिन सत्य विद्याओं की आवश्यता अनुभव हुई है और भविष्य में उन्हें जिन-जिन सत्य विद्याओं की आवश्यकता अनुभव होगी, उन सब सत्य विद्याओं का बीज रूप में समावेश वेदों में हुआ है।

१४. वेद ईश्वरीय ज्ञान है। अतः उन पर मानवमात्र का समान मौलिक अधिकार है। किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह अन्य किसी को उसके वेदाधिकार से वंचित कर सके।

१५. मनुष्य के आत्मा में अपना जीवस्थ स्वाभाविक ज्ञान तो होता ही है, परंतु वह इतना अल्प होता है कि केवल उससे वह उन्नति नहीं कर सकता है। उन्नति तो होती है – नैमित्तिक ज्ञान से जिसे अर्जित या प्राप्त किया जाता है। वेद ईश्वर-प्रदत्त नैमित्तिक ज्ञान है। वह सर्वज्ञ ईश्वर का ज्ञान होने से निर्भ्रांत है और इसीलिए ‘परम-प्रमाण’ अथवा ‘स्वतः-प्रमाण’ है। वह सूर्य अथवा प्रदीप के समान स्वयं प्रमाणरूप है। उसके प्रमाण होने के लिए अन्य ग्रंथों की अपेक्षा नहीं होती है। चार वेदों के अतिरिक्त समस्त वैदिक अथवा वेदानुकूल साहित्य अति महत्त्वपूर्ण होते हुए भी मानवीय – पौरुषेय होने के कारण परत-प्रमाण है। इन ग्रंथों में जो कुछ वेदानुकूल है वह प्रमाण और ग्राह्य है, और जो कुछ वेदविरुद्ध है वह अप्रमाण और अग्राह्य है।

१६. वेदों के समस्त शब्द यौगिक या योगरूढ हैं, इसलिए वे आख्यातज हैं; रूढ या यदृच्छारूप नहीं हैं। इसलिए वैदिक शब्दों का तात्पर्य जानने के लिए व्याकरणशास्त्र के अनुसार यथायोग्य धातु-प्रत्यय संबंध पूर्वक अर्थ समझने का प्रयत्न करना चाहिए। धातुएं अनेकार्थक होने से मंत्र भी अनेकार्थक होते हैं और उनके आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक अर्थ किए जा सकते हैं। दूसरे शब्दों में – प्रकरण आदि का विचार करके वेदमंत्रों के पारमार्थिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार के अर्थ करने का प्रयास करना चाहिए।

१७. पिछली दो शताब्दियों में पश्चिम के अनेक विद्वानों ने वेदों पर कार्य किया है और तत्संबंधी ग्रंथ आदि भी लिखे हैं, जिनमें मेक्समूलर, मोनियर विलियम्स, ग्रिफिथ इत्यादि के नाम प्रसिद्ध हैं। ये पाश्चात्य विद्वान् वेदों को वास्तविक रूप में प्रस्तुत नहीं कर सके हैं; क्योंकि एक तो वे वेद तथा वेदार्थ की पुरातन आर्ष परंपरा से अपरिचित थे और दूसरा यह कि वे लोग अपने ईसाई मत के प्रति आग्रह रखते थे और विकासवाद को अंतिम सत्य मानकर चलते थे। इसलिए पाश्चात्यों का वेद विषयक कार्य प्रायः वेदों की प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाने वाला ही सिद्ध हुआ है। इसी प्रकार सायण, महीधर आदि मध्ययुगीन भारतीय पंडित भी अपनी कुछ गंभीर मिथ्या धारणाओं के कारण वेदों को यथार्थ रूप में व्याख्यायित करने में असफल रहे हैं।

१८. वेदों में सत्य में श्रद्धा और असत्य में अश्रद्धा रखने की प्रेरणा दी गई है। वेद हमें विद्या की वृद्धि और अविद्या का नाश करने के लिए तथा वैज्ञानिक चिंतन को जाग्रत करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। मूर्तिपूजा, अवतारवाद, अद्वैतवाद, पैगम्बरवाद, मृतक-श्राद्ध, फलित ज्योतिष, जन्म आधारित जातिप्रथा, चमत्कारवाद, नास्तिकवाद इत्यादि वेदविरुद्ध होने से खण्डनीय एवं त्याज्य हैं।

(स्वामी दयानन्द के वेद सम्बन्धी दृष्टिकोण को जानने के लिए स्वामी जी कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका अवश्य पढ़िए।)

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आज का वेद मंत्र 

आज का वेद मंत्र 

ओ३म् विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्नि: स्वस्तये।  देवा अवन्त्वृभव: स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्र: पात्वंहस: ( ऋग्वेद ५|५१|१३ )

अर्थ  :- आज सब विद्वान लोग हमारे कल्याण के लिए हो। सब मनुष्यों में वर्तमान सर्वव्यापक ज्ञान-स्वरूप परमात्मा हमारा कल्याण करे। दुष्टों को दण्ड देने वाला प्रभु  ! हमें पापों से सदा दूर रखें ताकि हमारा सदा कल्याण हो।

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ज्ञानी और विद्यावान हो

कोई कितना ही ज्ञानी और विद्यावान हो , यदि वह अपने आचरण में विद्या और ज्ञान का उपयोग नही करता तो वह मूर्ख ही नही महामूर्ख हैं। वह उस जानवर की तरह है जिस पर बहुत सी किताबें लदी होती है पर वह उन पुस्तकों के ज्ञान से लाभ नही उठा पाता। जैसे तपेली और कलछी को स्वादिष्ट व्यंजन के स्वाद का आनन्द नही मिलता।

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ऋषि दयानन्द ने सत्य के निर्णयार्थ सब धर्माचार्यों से शास्त्रार्थ किये थे

ओ३म्
ऋषि दयानन्द ने सत्य के निर्णयार्थ सब धर्माचार्यों से शास्त्रार्थ किये थे
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सभी मनुष्य बुद्धि रखते हैं जो ज्ञान प्राप्ति में सहायक होने के साथ सत्य व असत्य का निर्णय कराने में भी सहायक होती है। एक ही विषय में अनेक मनुष्यों व आचार्यों के विचार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। यह भी सत्य एवं प्रामणिक तथ्य है कि एक विषय में सत्य एक ही होता है। गणित में दो व दो चार होते हैं। कोई गणित का विद्वान व आचार्य इससे भिन्न मान्यता वाला नहीं होता है। इसी प्रकार से धर्म विषय में मुख्यतः ईश्वर के स्वरूप, गुण-कर्म-स्वभाव, आत्मा के स्वरूप व गुण-कर्म-स्वभाव तथा उपासना की विधि आदि विषयों की चर्चा करके एक सत्य सिद्धान्त स्थापित किया जा सकता है व करना भी चाहिये। वर्तमान में व महाभारत के बाद से इन विषयों में एक मत न होकर अनेक आचार्यों के भिन्न-भिन्न मत व विचार रहे हैं। महाभारत के बाद स्वामी आदि शंकराचार्य जी ऐसे आचार्य हुए हैं जिन्होंने जैन मत के आचार्यों से ईश्वर के अस्तित्व पर शास्त्रार्थ किया था और शास्त्रार्थ में जो निष्कर्ष व तथ्य सामने आये थे, वह स्वामी शंकराचार्य जी का अद्वैत मत था जिसे शास्त्रार्थ की शर्तों के अनुसार सभी आचार्यों व राजाओं आदि ने भी स्वीकार किया था। इसके बाद से यह परम्परा बन्द पड़ी थी। ऋषि दयानन्द (1825-1883) का काल आते-आते धर्म विषयक सन्देह व भ्रान्तियां अपनी चरम सीमा पर थी। इन्हें धार्मिक अन्धविश्वास भी कहते हैं। ऋषि दयानन्द अपनी बाल्यावस्था से ही जिज्ञासु थे। वह सत्य ज्ञान को प्राप्त करने के इच्छुक थे। उन्होंने शिवरात्रि, 1839 के दिन मूर्तिपूजा पर इसी कारण सन्देह किया था कि ईश्वर के जो गुण, कर्म व स्वभाव शास्त्रों में वर्णित हैं, वह मूर्ति में साक्षात दृष्टिगोचर नहीं होते थे। उन्होंने विद्वानों से शंकायें की थीं परन्तु कोई विद्वान उनका समाधान नहीं कर सकता था। इसी कारण सच्चे शिव व मृत्यु से रक्षा व विजय प्राप्त करने के लिये उन्होंने सत्य के अनुसंधान हेतु अपना पितृ-गृह छोड़कर देश भर में विद्वानों की खोज की व उन्हें प्राप्त होकर उनसे ज्ञान प्राप्ति सहित अपना शंका समाधान किया था। 

ऋषि दयानन्द ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिये अपूर्व तप किया और बाद में वह अपनी सभी शंकाओं के उत्तर प्राप्त करने में सफल हुए। उन्हें सच्चे शिव का सत्यस्वरूप भी विदित हुआ था तथा मृत्यु पर विजय प्राप्ति के साधनों का ज्ञान भी हुआ था जिसे उन्होंने अपने जीवन में धारण कर उसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया है। ऋषि दयानन्द को सत्य ज्ञान रूपी विद्या अपने विद्यागुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी से मथुरा में 1860 से 1863 के मध्य तीन वर्ष वेदांगों का अध्ययन कर प्राप्त हुई थी। इससे पूर्व वह समाधि सिद्ध योगी भी बन चुके थे। विद्या प्राप्त कर लेने, सभी शंकाओं व भ्रमों से निवृत्त होने सहित सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी तथा सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार कर लेने के बाद उन्होंने संसार से अज्ञान व अविद्या दूर करने के कार्य को अपना मिशन व उद्देश्य बनाया था। इसी कार्य को करते हुए ही उन्होंने अपने जीवन का उत्सर्ग किया और भारत सहित विश्व को अविद्या के कूप से निकाला। ऋषि दयानन्द ने महाभारत युद्ध से पूर्व प्रचलित ईश्वर प्रदत्त वेद ज्ञान के सत्यस्वरूप व वेदार्थों का प्रकाश किया। उन्होंने पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा रचित वैदिक आर्ष साहित्य के सत्य सिद्धान्तों को निश्चित कर उनकी सत्य व्याख्याओं का मार्ग भी प्रशस्त किया। उनकी ही देन है कि आज हमारे पास सभी वेदों के सत्य वेदार्थों से युक्त वेदभाष्य व सभी वैदिक ग्रन्थों व विषयों के अनेकानेक व्याख्या ग्रन्थ हिन्दी आदि भाषाओं में उपलब्ध हंै जिसको साधारण हिन्दी पठित व्यक्ति भी जान व समझ कर विद्वान एवं सत्य वैदिक धर्म का सच्चा अनुयायी बन सकता है तथा जीवन के लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को सिद्ध कर सकता है। 

विद्या प्राप्त कर मनुष्य का मुख्य कर्तव्य उस विद्या की रक्षार्थ उसका मौखिक व लेखन के द्वारा प्रचार करना होता है। यही कार्य ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में किया। विद्वान का एक प्रमुख कार्य व कर्तव्य अज्ञान व अविद्या को नष्ट करना तथा ज्ञान व विद्या की वृद्धि करना भी होता है। इस कार्य को करने के लिये ही ऋषि दयानन्द ने अज्ञान में पड़े हुए विश्व के लोगों को अज्ञान व अविद्या के दुःखमय जीवन से बाहर निकालने के लिये अपने विद्यामृतमयी व्याख्यानों व उपदेशों से देश भर में घूम कर वैदिक सत्य मान्यताओं का प्रचार किया। वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है जिसका पढ़ना-पढ़ाना व सुनना-सुनाना सब मनुष्यों का परम धर्म होता है। वस्तुतः मनुष्य को मनुष्य इसी लिये कहा जाता है कि यह मननशील प्राणी है। मनन का अर्थ सत्य व असत्य का विचार करना तथा असत्य का त्याग और सत्य को अपनाना व स्वीकार करना होता है। मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिये ही वस्तुतः ऋषि दयानन्द ने मिथ्या ग्रन्थों का खण्डन व सत्य ज्ञान से युक्त वेदों का प्रचार व प्रसार किया। सत्य के प्रचार के लिये असत्य का खण्डन करना आवश्यक होता। माता-पिता व आचार्य भी अपने शिष्यों व बालकों की अविद्या व असत्य बातों को दूर करने के लिये असत्य बातों के दोष बताकर अपने शिष्यों से सत्य सिद्धान्तों को ग्रहण कराते हैं। यही कार्य ऋषि दयानन्द ने भी परोपकार व परहितार्थ किया। वह अपने व्याख्यानें में सत्योपदेश करते थे। प्रसंगानुसार असत्य छुड़ाने के लिए असत्य मान्यताओं व परम्पराओं का खण्डन तथा सत्य मान्यताओं का मण्डन व समर्थन करते थे। वह सत्यासत्य पर चर्चा करने व सत्य का निर्णय करने के लिये सभी मतों के अनुयायियों व आचार्यों को निमंत्रण भी देते थे। बहुत से स्वधर्मी व परमतावलम्बी विद्वान उनके पास आकर अपनी अपनी शंकाओं का समाधान करते थे। सन् 1863 से अपनी मृत्यु 30 अक्टूबर 1883 तक उन्होंने इस कार्य को देश के अनेक स्थानों में जाकर जारी रखा और सभी लोगों को सत्य ज्ञान अमृत का पान कराकर संतृप्त किया था। 

प्राचीन काल में सत्य का निर्णय करने के लिये परस्पर संवाद, लेखन तथा शास्त्रार्थ की परम्परा थी। इन विधियों से ही सत्य का निर्णय होता है। ऋषि दयानन्द ने संवाद, लेखन व शास्त्रार्थ का भरपूर उपयेाग किया। सभी मतों के आचार्य व अनुयायी उनके पास आते व अपने सन्देह दूर करते थे। उन्होंने सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पंचमहायज्ञविधि, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, गोकरुणानिधि, व्यवहारभानु आदि अनेक ग्रन्थों का प्रणयन व प्रचार अविद्या को दूर करने के लिये किया। संसार में उनके समय में वेद तो अत्यन्त परिश्रम करने पर उपलब्ध हो सकते थे परन्तु वेदों के सत्य वेदार्थ उपलब्ध नहीं थे। इस अभाव को भी ऋषि दयानन्द व उनके बाद उनके अनुयायी विद्वानों ने पूरा किया। ऋषि दयानन्द ने वेदकालीन परिपाटी के अनुसार वेदों के सत्य अर्थों का अपने ऋग्वेद तथा यजुर्वेद भाष्य में प्रकाश किया है। ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज की स्थापना भी सत्य विद्या के ग्रन्थ वेदों के प्रचार व प्रसार के लिये ही की। उन्होंने आर्यसमाज का मुख्य उद्देश्य वेदों के प्रचार प्रसार सहित अविद्या के नाश तथा विद्या की वृद्धि को बनाया है। 

ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में अनेक शास्त्रार्थ किये। उनका काशी में 16 नवम्बर, 1869 को सनातनी पौराणिक मत के आचार्यों से मूर्तिपूजा की वेदमूलकता व तर्क एवं युक्तिसंगत होने पर हुआ शास्त्रार्थ प्रसिद्ध है। इस शास्त्रार्थ में सम्मिलित पौराणिक मत के 30 से अधिक शीर्ष विद्वान भी मूर्तिपूजा के समर्थन में वेदों का एक भी मन्त्र प्रस्तुत नहीं कर पाये थे। आज तक भी किसी पौराणिक विद्वान को वेदों में ईश्वर की मूर्तिपूजा करने का कोई संकेत उपलब्ध नहीं हुआ है। वेद ईश्वर व आत्मा के सत्यस्वरूप का प्रतिदिन करते हैं। वेदों के अनुसार ईश्वर का सत्यस्वरूप सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। ईश्वर सर्वज्ञ है, उसने जीवों के कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल-भोग कराने व मुक्ति प्रदान करने के लिये साधन रूप में इस सृष्टि को बनाया है। ईश्वर जीवों के कर्म फलों का विधाता व व्यवस्थापक है। वह वेदज्ञान का दाता है। जीव सत्य व चेतन स्वरूपवाली अल्पज्ञ, अनादि, अमर, अविनाशी, एकदेशी, ससीम, जन्म-मरण धर्मा, वेदाचारण से जन्म मरण से मुक्त होने वाली तथा मोक्षानन्द को प्राप्त होने वाली सत्ता है। ईश्वर सभी जीवों हिन्दू, ईसाई, जैन, बौद्ध, सिख आदि सबका साध्य है तथा यह प्रकृति व सृष्टि सब जीवों को मुक्ति प्राप्त करने-कराने का साधन है। ऋषि दयानन्द व उनके परवर्ती विद्वानों के साहित्य सहित वेद, उपनिषद, दर्शन व मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में भी इस पर प्रकाश पड़ता है। अतः सबको वेदों की शरण में आकर शुभकर्मों को करते हुए मुक्ति प्राप्त करने के साधनों को करना चाहिये। आर्यसमाज को जितना अपेक्षित था, वह प्रचार नहीं कर सका। जितना प्रचार किया उतनी अविद्या दूर हुई है परन्तु लक्ष्य की दृष्टि से यह उपलब्धि बहुत ही अल्प मात्रा में है। आज वैदिक धर्म व मानवता पर अनेक प्रकार के संकट मंडरा रहे हैं। इसकी ओर भी आर्यसमाज सहित सभी हिन्दु बन्धुओं को ध्यान देना चाहिये। यदि अब भी नहीं जागेंगे तो जाति का अस्तित्व समाप्त हो सकता है। अतः ईश्वर को मानने वाले सभी सच्चे आस्तिक जनों को एकजुट व संगठित होकर अपने हितों पर विचार कर सगठित होकर परस्पर सहयोग कर धर्म पर उत्पन्न सभी संकटों को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये। 

ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में सभी मतों के आचार्यों से सत्य के निर्णयार्थ शास्त्रार्थ व शास्त्रार्थ चर्चायें करके सबका समाधान किया था। उनके शताधिक शास्त्रों व शंका समाधानों से सम्बन्धित अनेक ग्रन्थ प्रकाशित हैं। आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली ने सन् 1981 में ‘दयानन्द शास्त्रार्थ-संग्रह तथा विशेष शंका समाधान’ नाम से एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ का प्रकाशन किया था। पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी ने भी ‘ऋषि दयानन्द के शास्त्रार्थ और प्रवचन’ नाम से एक अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं उपयोगी ग्रन्थ का प्रकाशन किया है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ से भी सभी विषयों में मनुष्यों का सन्देह निवारण होता है। अन्य विद्वानों ने इन विषयों पर अनेक ग्रन्थ थी लिखे हैं। इन ग्रन्थों का अध्ययन कर मनुष्य सभी धर्म विषयक मान्यताओं में निभ्र्रान्त हो सकते हैं। ऋषि दयानन्द ने अपने समय में शास्त्रार्थ की परम्परा का पुनद्धार किया था। उनका कार्य आज भी प्रासंगिक हैै। आर्यसमाज व सभी मतों को इसे अपनाना चाहिये। सत्यधर्म मतावलम्बियों का तो यह कर्तव्य है कि वह सत्य के प्रचारार्थ शास्त्रार्थ परम्परा को पुनर्जीवित करें। विज्ञान में भी सत्य का निर्णय संवाद, लेखन, चर्चा, गोष्ठियों व बहस करके ही होता है। विज्ञान में इसे अच्छा माना जाता है। सभी वैज्ञानिक सत्य का आदर करते हैं। इसी लिये विज्ञान आज बुलन्दियों पर पहुंचा है। मत-मतान्तर ज्ञान विषयक अपनी न्यूनताओं को जानते हैं। इसलिये वह शास्त्रार्थ करना तो दूर, शास्त्रार्थ के नाम की चर्चा करने से बचते हैं। उनके शास्त्रार्थ करने के विरुद्ध ही प्रायः है। बिना संवाद, लेख, चर्चा व शास्त्रार्थ के सत्य का निर्णय नहीं हो सकता। अतः सभी मतों के विद्वानों को मिलकर सत्य के अनुसंधान व उसके प्रचार के लिये धर्म चर्चा, संवाद व शास्त्रार्थ को अपनाना चाहिये। ऋषि दयानन्द को शास्त्रार्थ परम्परा का निर्वहन करने व सत्यार्थप्रकाश में तर्क व युक्ति से सत्य का निर्णय करने के लिये संसार द्वारा हमेशा स्मरण किया जायेगा। ऋषि दयानन्द को हमारा सादर नमन है। ओ३म् शम्। Intercast Marriage ,The Vivah Sanskar will be solemnised,16sanskaro ke liye smpark kre 9977987777

-मनमोहन कुमार आर्य

मनुष्य का आत्मा कर्म करने में स्वतन्त्र और फल भोगने में परतंत्र है”

ओ३म्
“मनुष्य का आत्मा कर्म करने में स्वतन्त्र और फल भोगने में परतंत्र है”
==========https://youtu.be/s_rCeN2lLqc
हमें ज्ञात है व ज्ञात होना चाहिये कि संसार में तीन अनादि व नित्य पदार्थों का अस्तित्व है। यह तीन पदार्थ ईश्वर, जीव व प्रकृति हैं। ईश्वर व जीव सत्य एवं चेतन पदार्थ हैं। ईश्वर स्वभाव से आनन्द से युक्त होने से आनन्दस्वरूप है तथा जीव आनन्द व सुख से युक्त न होने के कारण आनन्द व सुख प्राप्ति की चेष्टा करता है। ईश्वर जीव को सुख व आनन्द देने में सहायक होता है। जीवों को सुख आदि देने के लिये ही ईश्वर इस सृष्टि को रचा है व वही इसका पालन करता है जिससे सभी जीवों को उनके जन्म-जन्मान्तरों के सभी शुभ व अशुभ कर्मों का यथायोग्य सुख व दुःखी कर्मों फल प्राप्त हो सके। परमात्मा ने इस सृष्टि वा ब्रह्माण्ड को प्रकृति नामी अनादि पदार्थ से बनाया है। यदि यह तीन अनादि व नित्य पदार्थ न होते तो हम भी न होते, न ही ईश्वर होता और न ही यह संसार व ब्रह्माण्ड होता। इस ब्रह्माण्ड में ईश्वर एक मात्र सत्ता है। संसार में दूसरा व तीसरा कोई ईश्वर व इसके समान सत्ता नहीं है। जीवात्मायें सब एक समान हैं जो अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेकर अपने पूर्वकृत कर्मों का सुख व दुःख रूपी फलों का भोग कर रही हैं व परमात्मा इनको भोग प्रदान कर रहा है। संसार में जीव संख्या में अनन्त हैं। इनकी संख्या इतनी अधिक है कि उसको गणित की दृष्टि से नहीं जाना व बताया जा सकता परन्तु ईश्वर के ज्ञान में जीवों की यह अनन्त संख्या भी सीमित ही मानी जाती है। इस प्रकार ईश्वर से रचित यह संसार अस्तित्व में आकर जीवों के द्वारा कर्म भोग के लिये चलता जाता है। अनादि काल से यह चल रहा है और अनन्त काल तक इसी प्रकार से चलता रहेगा। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय परमात्मा के द्वारा होती रहती है। एक सृष्टि की आयु 4 अरब 32 करोड़ वर्ष होती है। इसे ईश्वर का एक दिन कहा जाता है। इतनी ही बड़ी रात्रि होती है। यह दोनों मिलकर 8 अरब 64 करोड़ वर्षों का एक दिन होता है। सृष्टि के इस कल्प के 1 अरब 96 करोड़ वर्षों का भोग हो चुका है। शेष काल का भोग अभी होना है। इससे ज्ञात होता है कि अभी यह सृष्टि अपनी 4 अरब 32 करोड़ वर्ष की आयु को प्राप्त कर प्रलय को प्राप्त होगी। 

ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानना प्रत्येक मनुष्य के लिये आवश्यक एवं अनिवार्य है अन्यथा मनुष्य का जीवन सार्थक नहीं होगा। ऋषि दयानन्द ने ईश्वर प्रदत्त वेद ज्ञान के आधार पर बताया है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। हमारा यह ईश्वर सर्वज्ञ है, उसी ने जीवों के कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल का भोग कराने व मुक्ति प्रदान करने के लिये साधन रूप में इस सृष्टि को बनाया है। ईश्वर जीवों के कर्म फलों का विधाता व व्यवस्थापक है। वह वेदज्ञान का दाता भी है। जीव सत्य व चेतन स्वरूपवाली अल्पज्ञ, अनादि, अमर, अविनाशी, एकदेशी, ससीम, जन्म-मरण धर्मा, वेदाचरण से जन्म मरण से मुक्त होने वाली तथा मोक्षानन्द को प्राप्त होने वाली सत्ता है। ईश्वर ने सृष्टि जीवात्माओं के भोग के लिये बनाई है। वेदों में ईश्वर की आज्ञा है कि जीव इस सृष्टि का भोग त्यागपूर्वक करे। वेद में यह भी बताया गया है कि मनुष्य को लोभ व लालच नहीं करनी चाहिये। मृत्यु होने पर यह सब धन व पदार्थ सभी यहीं रह जाते हैं, जीवात्मा के साथ परलोक में नहीं जाते। जीवात्मा के साथ उसके ज्ञान आदि कर्म व संस्कार ही रहते हैं व परजन्म में भी साथ जाते हैं। इसलिये विवेकशील मनुष्यों को भौतिक पदार्थों व सम्पत्ति का अधिक मात्रा में संचय न कर दैवीय गुणों का धारण व परोपकार के कार्यों को करके सद्कर्म-सम्पत्ति का संचय करना चाहिये। इसी से जीव का कल्याण होता है। ऐसा करके ही संसार के सभी जीव अपने लिये आवश्यकता की सुख की सामग्री को प्राप्त कर सकते हैं। अधिक संचय से दूसरे प्राणियों के भोग में बाधा पहुंचती हैं, इसलिये आवश्यकता से अधिक संचय का विचार व मान्यता अनुचित होने से जीवों के हित में नहीं होती। ऐसा ही वेद से भी अनुमोदित होता है। 

परमात्मा की व्यवस्था में सभी जीव कर्म करने में स्वतन्त्र हैं। कर्म का फल जीवों को अनेक जन्म लेकर भी भोगना पड़ता है। कोई भी कर्म उसका बिना भोग किये छूटता व निष्फल नहीं होता है। कर्म के फलों की प्राप्ति में सभी जीव ईश्वर के अधीन होते हैं। कोई आचार्य व धर्माचार्य भी कर्म फल भोग से अपने आप को बचा नहीं सकता। ईश्वर का कर्म फल सिद्धान्त अटल है। वह पक्षपात रहित होकर सभी जीवों, विद्वानों, आचार्यों व मत-पन्थ सम्प्रदायों के प्रवर्तकों को भी उनके कर्मों के अनुसार न्यायकर करते हुए कर्मों का फल प्रदान करता है। संसार में कुछ मतों ने यह मिथ्या सिद्धान्त प्रवृत्त है कि किसी मत विशेष को मानने से मनुष्य के पाप रूपी फल क्षमा कर दिये जाते हैं। यह सिद्धान्त मिथ्या है। इस सिद्धान्त को तर्क की कसौटी पर सत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। यदि इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया जाये तो इसका अर्थ है कि सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक तथा सर्वज्ञ परमेश्वर की न्यायव्यवस्था का भंग होना। पाप क्षमा करने की मान्यता मत-मतान्तरों की मिथ्या कल्पना है। इसका तर्क व उचित हेतु नहीं है। सभी जीवों वा मनुष्यों को अपने-अपने कर्मों के फल भोगने ही पड़ते हैं। 

सर्वव्यापक और सर्वान्तर्यामी ईश्वर की दृष्टि से किसी जीव का कोई कर्म छुपता नही है। कोई भी जीव रात्रि के गहन अन्धकार में भी जो शुभ व अशुभ विचार करते हैं वह सर्वान्तर्यामी ईश्वर को विदित होता है। अतः ईश्वर को जीवों को उनके सभी कर्मों का फल देने में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होती। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में तर्क व युक्तियों से कर्म फल भोग व ईश्वर द्वारा पाप क्षमा न करने के सिद्धान्त को पुष्ट किया है। सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर कर्म फल भोग के इस सिद्धान्त को समझा जा सकता है कि सभी जीव अपने अपने कर्मों का फल भोगने में ईश्वर की व्यवस्था में परतन्त्र हैं। उन्हें कोई भी सत्ता व साधन कर्मों का फल भोगने से बचा नहीं सकते। शुभ व पुण्य कर्मों का फल सुख तथा अशुभ व पाप कर्मों का फल दुःख सभी जीवों को भोगना ही पड़ता है। अतः सभी मनुष्यों को वेद व सत्यार्थप्रकाश आदि वैदिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिये और भविष्य तथा जन्म-जन्मान्तर में उन्हें किसी प्रकार के दुःख न हों, इसके लिये वेदविहित शुभ कर्मों का आश्रय लेने के साथ वेद निषिद्ध अशुभ कर्मों का सर्वथा त्याग कर देना चाहिये। ऐसा करके ही जीव की उन्नति होकर उसे सुख व आनन्द की प्राप्ति होती व हो सकती है। संसार में हम मनुष्य व इतर योनियों में जीवों को जो दुःख भोगते हुए देखते हैं उनमें से उनके अनेक दुःखों का कारण पूर्वजन्म के कर्म हुआ करते हैं। पूर्वजन्म के कर्मों के कारण ही मनुष्य को नाना प्राणी योनियों में से एक योनि जिसे जाति कहा जाता है, परमात्मा से प्राप्त होती है। आयु सहित सुख व दुःख भी पूर्वजन्मों के अभुक्त कर्मों के आधार पर ही परमात्मा द्वारा प्रदान किये जाते हैं। मनुष्य स्वयं विचार कर अथवा शास्त्रों का अध्ययन कर स्वयं इन सिद्धान्तों को समझ सकते हैं। 

हमारे इस संसार का अस्तित्व परमात्मा के कारण है। परमात्मा ने ही इस जगत को बनाया है। यह संसार ईश्वर की कृति है और उसके अस्तित्व के होने का साक्षात प्रमाण है। संसार में यह सिद्धान्त भी प्रवृत्त है कि रचना को देखकर रचयिता का ज्ञान होता है। हम मनुष्य निर्मित कोई भी रचना देखते हैं तो हमें विदित होता है कि यह किसी मनुष्य ने बनाई अथवा मनुष्यों द्वारा किसी उद्योग में बनाई गई है। यदि मनुष्य न होते तो मनुष्यकृत रचनायें भी न होती। इसी प्रकार से इस सृष्टि व इसके भिन्न-भिन्न सूर्य, चन्द्र, गृह, उपग्रह, पृथिवी, अग्नि, जल, वायु, आकाश, अन्न, ओषधि, प्राणी आदि सभी को ईश्वर ने ही बनाया है। ईश्वर है इसी लिये यह बनें हैं। यदि वह न होता तो न बनते। यह सृष्टि व पदार्थ किसी अन्य सत्ता द्वारा बनायें नहीं जा सकते थे। इसलिये ईश्वर का अस्तित्व यथार्थ एवं सिद्ध है। मनुष्य योनि हो व अन्य प्राणी योनियां, सर्वत्र हम सब प्राणियों को सुख व दुःख से युक्त देखते हैं। इससे भी ईश्वर व उसकी व्यवस्था का ज्ञान होता है। यजुर्वेद में कहा गया है कि मनुष्य को वेदविहित शुभ कर्मों को करते हुए ही एक सौ व कुछ अधिक वर्ष जीनें की इच्छा करनी चाहिये। कर्मफल सिद्धान्त पर एक संस्कृत श्लोक से अच्छा प्रकाश पड़ता है। इस श्लोक के कुछ शब्द हैं ‘अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।’ अर्थात् मनुष्य को अपने किये हुए शुभ व अशुभ कर्मों के फल अवश्य ही भोगने होते हैं। यह सिद्धान्त विचार व चिन्तन करने पर सत्य सिद्ध होता है। सत्यार्थप्रकाश में ऋषि दयानन्द ने इस विषयक जो चिन्तन प्रस्तुत किया है उससे भी इस सिद्धान्त की पुष्टि होती है। 

हम जीव हैं, अनादि व नित्य सत्ता हैं, हम जन्म व मरण धर्मा हैं। हमारा अर्थात् हमारी आत्मा का जन्म व मरण होता है। मरण के बाद पुनर्जन्म होता है तथा जन्म से पूर्व मरण हुआ होता है। इन सब व्यवस्थाओं को ईश्वर भली प्रकार से क्रियान्वित करते हैं। जीव कर्म करने में स्वतन्त्र हैं। ईश्वर किसी जीव को किसी कर्म करने से रोकते नहीं हैं। हां, वह आत्मा मं। अशुभ कर्मों को न करने तथा शुभ कर्मों की प्रेरणा अवश्य करते हैं। हम जो कर्म करते हैं उसका फल हमें अवश्य ही भोगना पड़ता है। इससे हम व कोई अन्य जीव बच नहीं सकता। हम इस सिद्धान्त को समझेंगे तो हमें इससे इस जन्म व परजन्मों में भी लाभ होगा। इसी लिये हमने इस सिद्धान्त को इस लेख में प्रस्तुत किया है। सब मनुष्यों की अपनी उन्नति के लिये वैदिक धर्म की शरण में आना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन करना चाहिये। इससे वैदिक धर्म के पालन का मार्ग प्रशस्त होगा। इति ओ३म् शम्। 

-मनमोहन कुमार आर्य

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स्वामी दयानंद के सत्य व अहिंसा के प्रयोग 

ओउम् 
    स्वामी दयानंद के सत्य व अहिंसा के प्रयोग 
                                    डा. अशोक आर्य  https://youtu.be/lfI1oA6TmAo
           
           भारतीय तथा पाश्चात्य महापुरुषों में एक मूलभूत अंतर रहा है| भारतीय महापुरुषों ने अपने जीवन की उन महत्वपूर्ण घटनाओं को सदा ही छुपाने का यत्न किया है| यहाँ तक कि अपनी जन्म तिथि तक इतिहास को नहीं बताई ताकि उनके जन्मदिन के नाम से कहीं भारतीय जन मानस उनका स्तुतिगान आरम्भ न कर दे| दूसरी और जब हम पश्चिमी महापुरुषों के जीवनों पर दृष्टि डालते हैं, तो हम पाते हैं कि उन्होंने अपने जीवन की छोटी छोटी घटनाओं (जिनसे किसी को कुछ भी प्रेरणा मिलती हो) को संजो कर रखा है| वह चाहते थे कि उनका जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जावे, जबकि भारतीयों ने सदा वेद,उपनिषद्, दर्शन तथा ब्राहमण ग्रन्थों को ही प्रेरणा का स्रोत माना| इस कारण अपने जीवनों को तथा इस की छोटी बड़ी घटनाओं को तुच्छ मानते हुए इसे छुपाये रखा, इसे कुछ भी महत्त्व नहीं दिया| विदेश के कुछ लोगों ने तो अपने जीवन की छोटी सी घटना को भी अत्यधिक बढ़ा चढ़ा कर प्रकाशित किया है| वह इस में ही अपना गौरव मानते थे|
    इस सब के विपरीत जब हम स्वामी दयानंद सरस्वती जी के जीवन पर एक विहंगम दृष्टि डालते हैं तो हम पाते हैं कि स्वामी जी ने अठारह अठारह घंटे की समाधि लगाकर, अभ्यास करके  भी अपने लिए कभी कुछ भी पाने की इच्छा नहीं की| इस समाधि के माध्यम से भी जो कुछ भी पाने की कामना की, वह सब समाज की भलाई के लिए, समाज के हित के लिए तथा राज्य के सर्वोपरी हित के लिए किया, इनकी त्रुटियों को दूर करने के लिए किया| 
    जब स्वामी जी इस प्रकार के परोपकार के कार्य कर रहे थे तो उन्हें अनेक पेटपंथियों, थोथेश्वर पूजकों तथा विधर्मियों के कोप का भाजन भी बनना पड़ा, इन विरोधियों ने उन पर  अनेक बार प्राण घातक आक्रमण किये| इन आक्रमणों में से कुछ आक्रमण तो अत्याधिक घातक थे| स्वामी दयानंद सरस्वती सच्चे अर्थों में संन्यासी थे| इतना ही नहीं वह पूर्ण सत्यवादी थे और अहिंसा को अपना परम धर्म भी मनाते थे| इसलिए स्वामी जी ने न तो कभी किसी भी आक्रमण कारी को दंड ही दिया और न ही उसे कभी पुलिस को ही सौंपा| अनेक बार आक्रमणकारी पकडे भी गए तो स्वामी जी ने यह कहते हुए उन्हें छुड़ा दिया कि “ मैं संसार को कैद करने नहीं, कैद से छुड़ाने आया हूँ|” यह तो स्वामी जी की एक बहुत बड़ी महानता की झलक मात्र ही थी| आओ हम इन पंक्तियों में स्वामी जी पर हुए कुछ इस प्रकार के ही प्राण घातक आक्रमणों में से कुछेक को जानें|
                मैं मनुष्य को छुडाने आया हूँ
    स्वामी दयानंद सरस्वती अनूपशहर में वेद सन्देश देने के लिए निकले हुए थे| स्वामी जी के इस प्रचार से त्रस्त होकर किसी व्यक्ति ने स्वामी जी को एक पान खाने के लिये भेंट किया| इस पान में विष डाला हुआ था| पान स्वामी जी ने लिया और उसकी श्रद्धा को देखते हुए तत्काल मुख में डाल लिया| पान को मुख में रखते ही स्वामी जी को कुटिलता का पता चल गया| उन्होंने पान देने वाले को कुछ नहीं कहा, उसे वहीँ पर ही छोड़ कर गंगा की और चल दिए| वहां जाकर स्वामी जी ने न्योली क्रिया की और पान के सब विष को वमन करके बाहर निकाल दिया| इस बात का वहां के तहसीलदार को पता चला| तहसीलदार ने पान देने वाले उस दुष्ट को पकड लिया और उसे पकड़ कर स्वामी जी के सामने प्रस्तुत किया किन्तु स्वामी जी ने यह कहते हुए उसे छुड़वा दिया कि “मैं तो मनुष्यों को बंधवाने नहीं छुड़वाने आया हूँ|”
      इस प्रकार की ही एक घटना काशी की मिलती है| यहाँ पर भी एक व्यक्ति स्वामी जी के प्रति अत्यधिक श्रद्धा दर्शाते हुए उनके भक्त का रूप धारण करके आया| उसने भी स्वामी जी को पान भेंट किया| ज्यों ही स्वामी जी ने पान उसके हाथ से पकड़ा और इसे खोलकर देखने लगे तो कपटी दुष्ट पकडे जाने के भय से भाग खडा हुआ क्योंकि इस पान में भी तीव्र विष डाला गया था|
                                बाबा डूब गया
   स्वामी जी जहाँ भी जाते वहां सदा ही वैदिक धर्म का प्रचार कर इसे अपनाने के लिए जन जन को प्रेरित करते और अन्य मतावलम्बियों की कमियों को प्रकाशित करते हुए कहा करते थे यदि यह मतावलंबी अपने मत की इन कमियों को दूर कर लें तो वह शेष्ठ बन जावेंगे| इस प्रकार की ही एक घटना काशी की मिलती है| स्वामी जी अन्य मतावंबियों की कमियों की चर्चा करते समय इस्लाम की चर्चा कर रहे थे| इस चर्चा को कुछ मुसलमान भी सुन रहे थे| स्वामी जी इस चर्चा को समाप्त कर जब गंगा की और गए तथा गंगा किनारे समाधी अवस्था में बैठ गए| इस समय दो हट्टे कटे मुसलमान आये| उन्होंने स्वामी जी को मजबूती से पकड़ा और गंगा में फैंकने लगे किन्तु स्वामी जी ने अपने हाथों को बड़ी मजबूती से भींच लिया और गंगा में छलांग लगा दी| उन दोनों विधर्मियों को गंगा में कुछ गोते खिलाये और फिर बाहर लाकर छोड़ दिया और स्वयं एक बार फिर से गंगा में कूद गए| इतना होने पर भी वह दोनों दुष्ट बाहर आकर पत्थर उठा स्वामी जी के बाहर आने की प्रतीक्षा करने लगे ताकि वह स्वामी जी को पत्थरों से मार सकें| स्वामी जी उन दोनों की भावना को पहले से ही जानते थे| अत: स्वामी जी गंगा के अन्दर ही समाधि लगाकर बैठ गए| बहुत समय बीतने के बाद भी स्वामी जी जब गंगा से बाहर न आये तो यह दोनों विधर्मी गुंडे यह कहते हुए लौट गए कि “बाबा तो डूब गया है|”
      यहाँ की ही एक अन्य घटना है| इस घटना के अनुसार एक लठैत स्वामी जी का पीछा कर रहा था| अकस्मात् स्वामी जी ने उसकी और देखते हुए हुंकार की| स्वामी जी की हुंकार मात्र से ही भयभीत वह लठैत भाग खडा हुआ| 
     इस प्रकार की ही एक अन्य घटना सोरो की भी मिलती है| यहाँ पर हुए शास्त्रार्थ में स्वामी जी से पराजित एक चाक्रांकित क्रोध से कांपते हुए स्वामी जी को मारने के लिए आया| वह सोते हुए व्यक्ति को पहचान न पाया और एक अन्य साधु को सोते हुए खाट सहित उठा कर गंगा में फैंक दिया|
                          ईश्वर सत्य मार्ग दिखावे 
      सोरों की ही एक अन्य घटना है| इसके अनुसार स्वामी जी की चल रही सभा में अकस्मात् एक लठैत आकर जोर से बोला तुम ठाकुर का खंडन करते हो, इसलिए बताओ तुम्हें यह लट्ठ कहाँ पर मारूं| स्वामी जी ने उसे घूरते हुए प्रत्युत्तर दिया, खंडन करने का दोष तो मेरे सिर का है, इसी को ही मारो| इस उत्तर को सुनकर श्रोता लोग अवाक् से रह गए| इसके साथ ही यह उत्तर सुनकर दुष्ट के अन्दर की दुष्टता धुल गई तथा वह रोने लगा स्वामी जी ने उसे क्षमा करते हए कहा “ भगवान तुम्हें सत्य मार्ग पर लाये|”
                       संन्यासी मारपीट नहीं करते 
   विगत अनुभवों के अनुसार ही जब स्वामी जी मिर्जापुर में सभा कर रहे थे तो दो लठैत सभा स्थल पर आ धमके और गड़बड़ करने लगे| इस पर स्वामी जी ने एक जोरदार हुंकार की| इस हुंकार को सुनते ही दोनों लठैत गुंडे बेहोश होकर गिर गए| दोनों का मल भी निकल गया| स्वामी जी  नेप्रथम उपचार  कर उन्हें होश में लाये और उन्हें होश आने पर स्वामी जी ने कहा कि “संन्यासी लोग कभी किसी को मारा पीटा नहीं करते|” इसलिए डरो नहीं| उठो कपडे संभाल कर निर्भयता से चले जाओ| 
     इस स्थान की ही एक अन्य घटना भी सामने आती है| एक सेठ के सहयोग से स्वामी जी को समाप्त करने का पुनश्चरण आरम्भ किया गया| ज्योंही कार्य बढ़ता गया सेठ जी के शरीर पर एक फोड़ा निकल आया और यह तेजी से बढ़ने लगा| अंत में सेठ जी ने पुनश्चरण को बंद करवाने के लिए कहा| वह समझते थे कि जब तक दयानंद का सिर कटेगा, उससे पहले तो मैं ही इस फोड़े के कारण कट जाउंगा| 
     यहीं पर ही एक अन्य घटना भी सामने आती है| अक भयानक प्रकृति का व्यक्ति एक सौ गुंडों के साथ स्वामी जी की सभा के स्थल पर आया और गड़बड़ करने लगा| स्वामी जी ने बड़ी दृढ़ता से कहा कि इस हाल के सब दरवाजे बंद करा दो, मैं अकेला ही इन सब से निपट लूंगा| यह सुनते ही भयभीत होकर वह व्यक्ति सीधा होकर बैठ गया|
                          जयपुर में भीडो जाकर 
     कर्णवास में स्वामी जी एक सभा में बोला रहे थे| अकस्मात् बरौली के राव कर्णवास आकर स्वामी जी को गालियाँ देने लगे| गालियाँ देने के साथ ही साथ, वह तलवार भी घुमाने लगे| उसकी इस अवस्था को देखकर स्वामी जी ने उसे कहा की अगर शास्त्रार्थ करना है तो अपने गुरु रंगाचारी को बुला लो,यदि शस्त्रार्थ करना है तो जयपुर जोधपुर(के राजाओं)से जाकर भिडो किन्तु वह नहीं माना तो स्वामी जी ने उसके हाथ से तलवार छीन कर दो टुकडे कर दिए|
       यहाँ जिस पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर स्वामी जी प्रचार कर रहे थे, उसे जड़ सहित निकाल कर यहाँ भूगर्भ में एक कमरा बनाया गया है और इस मैदान में स्वामी जी की स्मृति में एक ओषधालय चल रहा है| मैं जब १९९२ में अलीगढ युनिवर्सिटी में रेफ्रेशर कोर्स करने गया था तो इस स्थान को भी देखने के लिए दो बार गया था|
                               हम तो सत्य ही कहेंगे 
   बरेली में भी स्वामी जी ने एक सभा में ईसाई मत की कमियाँ सब के सामने रखीं| ईसाईयों की इस आलोचना को सुनकर वहाँ का कलेक्टर कुपित हो उठा| उन्होंने स्वामी जी के व्याख्यान बंद करवाने की धमकी तत्काल दे डाली| इसके उत्तर में स्वामी जी ने कहा, “लोग कहते हैं सत्य का प्रकाश न कीजिए क्योंकि कलेक्टर कुपित हो जावेगा….चाहे चक्रवर्ती राजा भी क्यों न अप्रसन्न हो जावे, हम तो सत्य ही कहेंगे…..|” इस दिन रविवार होने के कारण स्काट साहिब गिरजा गए थे, इस पर स्वामी जी भी गिरजा चले गए| स्वामी जी को देखकर स्काट इन्हें मंच पर ले गए, जहाँ स्वामी जी ने एक घंटा तक व्याख्यान दिया|
                          मेरे रक्षक  परमात्मा हैं 
     फर्रुखाबाद में कुछ गुंडे स्वामी जी को हानि पहुंचाने स्वामी जी की सभा में आये किन्तु मात्र स्वामी जी के चेहरे पर अदभुत तेज देखते ही वहां से भाग खड़े हुए| जब सुरक्षा की दृष्टि से स्वामी जी को अन्दर रहने को कहा गया तो स्वामी जी से उत्तर मिला “ मेरी रक्षा तो सर्वत्र परमात्मा ही करते हैं|”
      इसी स्थान की ही एक अन्य घटना है| स्वामी जी एक सभा में अपना व्याख्यान दे रहे थे| अकस्मात् सभा में आये एक शराबी ने स्वामी जी पर जूता फैंक दिया| इस पर उपस्थित लोग उस शराबी को पकड़ने लगे किन्तु स्वामी जी ने यह कहते हुए उसे छुड़वा दिया कि जूता तो हमें  लगा ही नहीं, फिर यह भी नशे के कारण होश में नहीं है, इसलिए इसे छोड़ देना ही उत्तम रहेगा|
     यहाँ की ही एक अन्य घटना भी सामने आती है| स्वामी जी की सभा चल रही थी| इस सभा में एक लठैत ने आकर स्वामी जी से पूछा तुम ईश्वर को नहीं मानते हो? इस पर स्वामी जी ने उससे ईश्वर का स्वरूप पूछा तो उसने ईश्वर को निराकार ही बताया| तो स्वमी जी ने कहा कि तो इसमें मूर्ति पूजा कहाँ से आ गई? स्वामी जी के इतने से उत्तर से वह भी सत्य का पुजारी बनते हुए स्वामी जी का अनुगामी बन गया| 
     यहाँ की ही एक अन्य घटना भी मिलती है| स्वामी जी भ्रमण कर रहे थे कि एक व्यक्ति ने आकर स्वामी जी को गालियाँ देना आरम्भ कर दिया| इतना ही नहीं वह व्यक्ति स्वामी जी को परेशान करने के लिए उनके निवास पर भी आ धमाका| इस पर स्वामी जी ने हंसते हुए उस दुष्ट व्यक्ति का स्वागत् किया| स्वामी जी के इस वयवहार से उस व्यक्ति की दुष्टता भाग गई तथा अपनी भूल के लिए पश्चाताप करने लगा| 
                             मैं तुम्हें लड्डू देता हूँ 
      स्वामी जी अमृतसर में व्याख्यान दे रहे थे कि एक अध्यापक के आदेश से उसके नन्हे छात्र स्वामी जी पर कंकर फैंकने लगे| जब वह पकडे गए तो उन बच्चों ने रोते हुए कहा कि उन्हें ऐसा करने के लिए अध्यापक ने कहा था| अध्यापक ने कहा था कि यदि तुम इस साधू को पत्थर मारोगे तो मैं तुम्हें लड्डू दूंगा| स्वामी जी ने उन बच्चों को लड्डू देते हुए कहा की “अध्यापाक तो संभव है न दे सके, लो मैं तुम्हें दिए देता हूँ|”
                       हमारा काम वैद्य का है|
     अमृतसर में ही स्वामी जी का एक शाश्त्रार्थ निर्धारित हुआ किन्तु इसके लिए विरोधी बहुत देर से आये तथा आते ही शास्त्रार्थ करने के स्थान पर ईंटें बरसाने लगे| पुलिस तो भयभीत होकर वहां से भाग खडी हुई किन्तु ऋषि भक्तों का क्रोध शांत न हुआ| इसे देखते हुए स्वामी जी ने कहा कि “हमारा काम ईंटें खाने का है….यही लोग कभी आप पर पुष्प वर्षा करेंगे|”
     यहाँ की ही एक अन्य घटना है| कुछ लोग दुष्टों से स्वामी जी को बचाने के लिए उनके रक्षक बनकर स्वामी जी के पास ही सोने लगे| जब स्वामी जी को इस बात का पता चला कि निहंगों से उनकी रक्षार्थ यह सब लोग उनके पास सो रहे हैं तो स्वामी जी ने उन्हें रोकते हुए कहा कि  हम अकेले ही रहेंगे| जिस की आज्ञा का मैं पालन कर रहा हूँ वही परमेश्वर मेरा रक्षक है|
                             उपद्रवी भाग गए 
      वजीराबाद के शास्त्रार्थ में झगड़े को तैयार होकर आये कुछ लोगों ने आते ही स्वामी जी पर इंटों की वर्षा आरम्भ कर दी| इस पर स्वामी जी कमरे के अन्दर चले गए और दरवाजा अन्दर से बंद कर दिया तथा हंसने लगे| इस सब व्यवस्था के समय स्वामी जी का एक सेवक बाहर रह गया| जब स्वामी जी को पता चला कि सेवक बाहर पिट रहा है तो स्वामी जी ने दरवाजा खोलकर जोर से हुंकार की| इस हुंकार से दुष्ट इतने भयभीत हो गए कि तत्काल भाग गए|
                                 मैं मारा नहीं जाउंगा 
     मुम्बई में कुछ लोग स्वामी जी की ह्त्या करना चाहते थे| इसके लिए लालच देकर उन्होंने स्वामी जी के सेवक को अपने साथ कर लिया| स्वामी जी इस दुष्कार्य को भांप गए| इस पर स्वामी जी ने उस सेवक से पूछताछ की तो सेवक ने सब कुछ उगल दिया| इस पर स्वामी जी ने उसे कहा, “जिसे परमेश्वर न मारे उसे मारने के लिए कोई समर्थ नहीं हो सकता| बनारस में मुझे हलाहल विष  दिया गया, राव कर्ण सिंह ने पान में विष दिलवाया, अन्य भी अनेक स्थानों पर विष के विषम प्रयोग किये गए, परन्तु मेरा प्राणांत नहीं हुआ| स्मरण रखो, अब भी मैं मारा नहीं जाउंगा|”
                      तुम मेरा हनन करना चाहते हो?
      मुंबई के कुछ पन्थाइयों के आग्रह पर स्वामी जी के वध के लिए प्रात: भ्रमण का समय चुना गया तथा इसके लिए प्रात:काल चार गुंडे स्वामी जी का पीछा करने लगे| स्वामी जी यह सब भांप गए और मुडकर उनसे कहा, “तुम मेरा हनन करना चाहते हो?” स्वामी जी के इतना कहते ही गुंडे भयभीत हो गए तथा उन्होंने स्वामी जी का पीछा करना बंद कर दिया|
                               ईंटें मेरे लिए पुष्प हैं 
      सूरत में स्वामी जी के व्याख्यान में एक व्यक्ति ने स्वामी जी से कुछ प्रश्न किये किन्तु वह स्वामी जी के उत्तर सुनने पर ऐसा लगा कि वह स्वामी जी के सामने टिक नहीं पा रहा था| इस पर उस प्रश्नकर्ता व्यक्ति के साथी स्वामी जी पर पत्थर फैंकने लगे| इस पर स्वामी जी के भक्तों ने कुछ समय के लिए स्वामी जी से व्याख्यान रोकने का आग्रह किया| स्वामी जी बोले, “ अपने भाइयों द्वारा फैंके पत्थर मेरे लिए पुष्पों की वर्षा है ये तो हमारे भाई हैं|”
      भडौंच में स्वामी जी के व्याख्यान चल रहे थे कि एक दक्षिणी पंडित वहां आकर स्वामी जी को इंगित करते हुए अपशब्द बोलने लगा| इस पर उपस्थित श्रोता भड़क उठे| इस सब को देखकर स्वामी जी ने कहा, “ ये तो हमारे भाई हैं,इन्हीं की कल्याण कामना करते हुए दिन बीतते हैं|”
                       आग को आग शांत नहीं करती
     यहीं की ही एक अन्य घटना है| यहाँ पार्सी से ईसाई हुए एक व्यक्ति ने स्वामी जी की उपस्थिति में स्वामी जी के लिए अपशब्द बोलने आरम्भ कर दिए| उसकी इस हरकत से उपस्थित लोग भड़क उठे| इस पर स्वामी जी ने कहा, “आग में आग डालने से आग शांत नहीं होती, वैसे ही द्वेष बुद्धि उसके साथ द्वेष करने से दूर नहीं हो सकती |”  
                             जन्म से सब नीच हैं 
     पूना प्रवाचन के समापन पर स्वामी जी की हाथी पर शोभा यात्रा निकल रही थी| उपद्रवकारियों ने यह अवसर भी हाथ से न जाने दिया और उन्होंने एक व्यक्ति का मुंह काला करके उसे दयानंद कहते हुए गधे पर बैठाकर, उसका जुलूस निकालते हुए, उसे गालियाँ देते तथा उस पर पत्थर आदि फैंक रहे थे| ऋषि भक्त इसे सहन न कर सके और उन्होंने यह सब कुछ स्वामी जी को बताया| इस पर स्वामी जी ने कहा, “अच्छा है गालियों से पेट खाली हो लेगा, सच्चे दयानन्द को तो कालिमा नहीं लगी| हाँ, बनावटी का मुख काला होना ही चाहिए, कल पत्थर पूजते थे आज पत्थर फैंकते हैं| सो मेरी बात मान ली, मैं भी तो यही कहता हूँ कि जन्म से सब नीच हैं| जिसने पढ़ा पढ़ाया, वह ब्राहमण हो गया, जो धर्म के लिए युद्ध में लड़ा वह क्षत्रिय हो गया, जिसने व्यापार पशुपालन या कृषि की वह वैश्य हुआ नहीं तो शुद्र| मैंने ब्राहमण के यहाँ जन्म लिया था| ब्राह्मण के पुत्र को नीच माना तो मेरे ही सिद्धांत पर आये, मुझे तो यह बात सुनकर अत्यंत प्रसन्ता हुई|
     एक बार स्वामी जी  बंगाल के किसी स्थान पर व्याख्यान दे रहे थे कि इस मध्य किसी ने स्वामी जी पर सांप फैंक दिया| स्वामी जी ने इस विषधर को पैर से कुचल दिया| 
     शाहजहाँ पुर के चांदापुर में शाक्त लोगों ने स्वामी जी की बलि देवी को देने का प्रयास किया किन्तु स्वामी जी ने पुजारी से तलवार छीन ली और मंदिर से बाहर आ गए| एक बार कुछ साधुओं ने रात्रि के समय स्वामी जी की कुटिया को आग लगा दी| किन्तु स्वामी जी इस आग में से भी जीवित बाहर निकल आये| 
     जब जयपुर राज्य ने स्वामी जी को हानि पहुंचाने की सोची तो एक कर्मचारी के आग्रह पर स्वामी जी ने उसे कहा, “आप लोग मेरी चिंता मत करो आप राज कर्मचारी हैं अत: मेरे पास न आया करो ताकि आपकी हानि न हो|”
      जोधपुर राज दरबार में जब स्वामी जी गए तो वहां दरबार में वैश्या उपस्थित थी| स्वामी जी ने इस पर राजा को अच्छी लताड़ लगाईं तथा वापिस लौट कर उसे एक पत्र भी लिखा| इस वैश्या की दरबार में अच्छी साख थी, वह अपमान का बदला लेना चाहती थी| अब उस वैश्या के साथ अनेक दुष्ट भी मिल गए| उन्होंने रसोइये घूड मिश्र को (यहाँ जान लें कि स्वामी जी को विष देने वाले रसोइये का जो प्रचलित नाम जगन्नाथ चला आ रहा है, वह गलत है|) भी पटा लिया और उसके माध्यम से दूध में विष(राजस्थान में विष को कांच कहते हैं) मिलवा कर स्वामी जी को दिलवा दिया| यही विष ही अंत में स्वामी जी के बलिदान का कारण बना|
      स्वामी जी को इस विष देने की घटना को आर्य समाज के कुछ विद्वान् नकारने लगे हैं| इस सन्दर्भ में कुछ लोग तो अपने आप को इस क्षेत्र से सम्बंधित होने का राग अलापते हुए कहने लगे कि उन्होंने सरकारी रिकार्ड देखा है| वास्तव में उनका यह दावा सत्य से कोसों दूर है| उनमें से किसी ने भी यह उस समय का सरकारी रिकार्ड नहीं देखा| मैं डी ऐ वी कालेज अबोहर में कार्यरत था| उन दिनों प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु जी भी अबोहर में ही कार्यरत थे| उनके पत्र भारी संख्या में आते रहते थे| जब वह कहीं बाहर गये होते थे तो उनके पत्रों को देखकर मैं कुछ साधारण पत्रों के उत्तर दे दिया करता था| 
     इन्हीं दिनों जोधपुर से भैरव सिंह जी ( आर्य समाज गुलाब सागर जोधपुर) के अनेक पत्र जिज्ञासु जी के नाम से आये| इन सब पत्रों का उत्तर मैंने उनको दिया| इस कारण भैरव सिंह जी मुझे जिज्ञासु जी का पुत्र समझने लगे| उन्हीं के आग्रह पर मैं आर्य युवक समाज अबोहर का साहित्य लेकर इसके विक्रयार्थ मेरठ आर्य महासम्मलेन मेरठ में गया| यह सम्मलेन सन् १९७२ के लगभग हुआ था| भैरव सिंह जी यहाँ जोधपुर राज्य का वह सब रिकार्ड( उसकी नकलें) जो स्वामी जी से सम्बंधित था, साथ लाये थे| वह सारा रियासती रिकार्ड मुझे दिखाया और बताया तथा इसे महीनता से समझाते हुए कहा कि इसे (आपके पिता जी के अतिरिक्त कोई नहीं समझ सकता|) मैंने यहाँ पर उन्हें बताया कि जिज्ञासु जी मेरे पिता नहीं साथी हैं| यहाँ पर उन्होंने मुझे स्वामी जी को विष देने के दस्तावेज भी दिखाए| इस सब के आधार पर मैं दावे के साथ कहता हूँ कि स्वामी जी को जोधपुर में भयंकर विष दिया गया था| यह विष दिलवाने वाली वही वैश्या ही थी जो राज दरबार में स्वामी जी ने देखी थी| उस वैश्या का नाम नन्हीं ही था| अत; यह कहने का कुछ भी तात्पर्य नहीं रह जाता कि वह वैश्या नहीं थी या उसका नाम नन्हीं नहीं था या फिर उस वैश्या ने विष दिलवाया ही नहीं|      यदि ऐसा कहते हैं तो इसका यह प्रयास तत्कालीन जोधपुर राज्य के वर्तामान उत्तराधिकारियों को, उनके परिवार के वर्त्तमान के लोगों को जोधपुर पर लगे कलंक को मिटाने का एक प्रयास मात्र ही कहा जा सकता है, जिसके लिए यह परिवार उन्हें कुछ धन देता है, ऐसा हो सकता है| इसके अतिरिक्त अन्य कोई प्रयोजन नहीं| 
     यहाँ एक बात और लिखना चाहूँगा कि भैरव सिंह जी ने भरसक प्रयत्न किये कि वह इस सन्दर्भ में हमारे जिज्ञासु जी से एक बार मिल लें और सम्बंधित सब रिकार्ड उन्हें सौंप दें किन्तु पहले चाहे वह उन्हें कितनी बार भी मिले हों तो भी इस सन्दर्भ में अपनी यह अभिलाषा मन में ही संजोये इस जगत् से विदा हो गए और जिज्ञासु जी को नहीं मिल पाए| हां! जाने से पहले यह सब कुछ मुझे दिखाकर आर्य जगत् को यह विश्वास अवश्य दे गए कि कोई भी इस कपट पूर्ण व्याख्यान का विरोध कर सत्य को जन जन तक ला सकें| मैं आपने आप को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि स्वामी जी से सम्बंधित जोधपुर रियासत का रिकार्ड देखने वाला इस समय कोई जीवित है तो वह एकमात्र मैं ही हूँ| 
     सो आज मैंने उनकी यह अंतिम अभिलाषा इस लेख की अंतिम पंक्तियों में पूर्ण करने का प्रयास करते हुए एक बार फिर यह बात कहता हूँ कि स्वामी जी को जो जीवन में अनेक बार  मारने की असफल चेष्टाएँ की गईं किन्तु अंत में जोधपुर में नन्ही वैश्या ने स्वामी जी के रसोइये को(यह रसोइया शाहपुर नरेश ने स्वामी जी के जोधपुर जाते समय साथ में दिया था) अपने साथ मिलाकर जो विष दिलाया, वही विष ही स्वामी जी के बलिदान का कारण बना| विष दिलवाने वाली दरबारी वैश्या थी, उसका नाम नन्ही था तथा उसी ने रसोइये घूड मिश्र (जिसे इतिहास में आज जगन्नाथ कहा जाता है) से विष दिलवाया| विष देने वाले रसोइये का नाम घूड मिश्र ही था| आर्य समाज तथा जोधापुर के इतिहास की यह एक सत्य घटना है| लाख प्रयास करने पर भी इसे झुठलाया नहीं जा सकता| जो इसे झुठलाने का प्रयास करते हैं, वह कलुषित मानसिकता वाले स्वार्थी लोग ही हो सकते हैं|
डा. अशोक आर्य 
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२०१०१२ गाजियाबाद उ. प्र. भारत 
चलभाष ९३५४८४५४२६ व्हट्स एप्प ९७१८५ २८०६८ 
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संसार में वेदों की अप्रवृत्ति होने से अविद्यायुक्त मत उत्पन्न हुए

ओ३म्
‘संसार में वेदों की अप्रवृत्ति होने से अविद्यायुक्त मत उत्पन्न हुए’
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संसार में वर्तमान समय में सहस्राधिक अवैदिक मत प्रचलित हैं जिनकी प्रवृत्ति व प्रचलन पांच हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध के बाद हुआ है। सभी मतों का आधार चार प्रमुख मत हैं जो पुराण, जैन मत के ग्रन्थों, बाईबल तथा कुरान आदि ग्रन्थों के आधार पर प्रचलित हुए हैं। महाभारत युद्ध से पूर्व व महाभारत के दो हजार से अधिक वर्ष पश्चात तक वेद मत कुछ परिवर्तित अविद्यायुक्त मान्यताओं सहित प्रचलित था। महर्षि दयानन्द (1825-1883) धर्म के सत्यस्वरूप तथा धार्मिक इतिहास के मर्मज्ञ विद्वान थे। उन्होंने सृष्टि के आरम्भ से महाभारत महायुद्ध तक देश देशान्तर में प्रचलित रहीं वैदिक सत्य मान्यताओं का प्रकाश अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में किया है। इस ग्रन्थ में उन्होंने वेदों के पराभव तथा मत-मतान्तरों की उत्पत्ति के कारणों पर भी प्रकाश डाला है। सत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास की अनुभूमिका में वह इस विषय में बताते हैं कि यह सिद्ध बात है कि पांच सहस्र वर्षों के पूर्व वेदमत से भिन्न दूसरा कोई भी मत न था क्योंकि वेदोक्त सब बातें विद्या से अविरुद्ध हैं। वेदों की अप्रवृत्ति होने का कारण महाभारत युद्ध हुआ। वेदों की अप्रवृत्ति से अविद्यान्धकार के भूलोक में विस्तृत होने से मनुष्यों की बुद्धि भ्रमयुक्त होकर जिस के मन में जैसा आया वैसा मत चलाया। उन सब मतों में चार मत अर्थात् जो वेद-विरुद्ध पुराणी, जैनी, किरानी और कुरानी सब मतों के मूल हैं, वे क्रम से एक के पीछे दूसरा तीसरा चौथा चला है। अब इन चारों मतों की शाखायें एक सहस्र से कम नहीं हैं। इसी क्रम में ऋषि दयानन्द ने यह भी कहा है कि सब मतवादियों, इन के चेलों और अन्य सब को परस्पर सत्य और असत्य के विचार करने में अधिक परिश्रम न करना पड़े, इसलिये उन्होंने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ बनाया है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ सभी मत-वादियों व उनके अनुयायियों सहित सभी धर्म जिज्ञासुओं को अविद्या से मुक्त सत्य मत के निर्णय करने में सहायता करता है। अतः सभी मनुष्यों का परम कर्तव्य है कि सत्यमत को प्राप्त होने के लिये वह सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अवश्य ही अध्ययन करें।

ऋषि दयानन्द ने अपने उपुर्यक्त शब्दों में जो कहा है उस पर उन्होंने सत्यार्थप्रकाश के पूर्व के दस सम्मुलासों में प्रकरणानुसार संक्षेप में प्रकाश डाला है। हमारा यह संसार ईश्वर का बनाया हुआ है। ईश्वर का सत्यस्वरूप वेदों से प्राप्त होता है। इसको यदि संक्षेप में जानना हो तो वह ऋषि दयानन्द के बनाये आर्यसमाज के दूसरे नियम को पढ़कर जाना जा सकता है। इस नियम में ऋषि ने बताया है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी परमात्मा की सबको उपासना करनी योग्य है। ईश्वर सर्वज्ञ है अर्थात् सर्वज्ञानमय है। वह सब जीवों को उनके जन्म जन्मान्तरों के अभुक्त कर्मों का भोग कराने वा कर्मों के अनुसार सुख व दुःख प्रदान करने के लिये इस सृष्टि की रचना व पालन करते हैं। जीव संख्या में अगणित व अनन्त हैं जो स्वभावतः जन्म-मरण धर्मा हैं। मोक्ष के उपायों को करने पर जीवात्मा की निश्चित अवधि के लिये मुक्ति हो जाती है जिसके बाद सभी जीवन पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं। ईश्वर की उपासना से जीवन ईश्वर के आनन्द को प्राप्त कर दुःखों से सर्वथा रहित हो जाता है। मोक्ष में जीवात्मायें ईश्वर के सान्निध्य में आनन्द का भोग करती हैं। यही आनन्द समाधि अवस्था में भी योगीजनों को प्राप्त हुआ करता है। इसी के लिये जिज्ञासु व विद्वान यौगिक जीवन को महत्व देते रहे हैं व भोगों से युक्त सांसारिक जीवन को गौण समझते हैं। जैसा इस कल्प में वैसा ही सृष्टिक्रम अनादि काल से यह सृष्टि की उत्पत्ति, पालन तथा प्रलय का चला आ रहा है और भविष्य में अनन्त काल तक परमात्मा के द्वारा चलाया जाता रहेगा। इसमें किंचित भी परिवर्तन व अवरोध नहीं होगा। 

महाभारत युद्ध से पूर्व के आर्यावर्त का वर्णन करते हुए ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि यह आर्यावर्त देश ऐसा देश है कि जिसके सदृश भूगोल में दूसरा कोई देश नहीं है। इसीलिये इस भूमि का नाम सुवर्णभूमि है क्योंकि यही सुवर्णादिरत्नों को उत्पन्न करती है। इसीलिये सृष्टि की आदि में आर्य लोग इसी देश में आकर बसे। ऋषि बताते हैं कि आर्य नाम उत्तम पुरुषों का है और आर्यों से भिन्न मुनष्यों का नाम दस्यु हैं। जितने भूगोल में देश हैं वे सब इसी देश की प्रशंसा करते और आशा रखते हैं कि पारसमणि पत्थर सुना जाता है वह बात तो झूठी है परन्तु आर्यावर्त देश ही सच्चा पारसमणि है कि जिसको लोहेरूप दरिद्र विदेशी छूते के साथ ही सुवर्ण अर्था् धनाढ्य हो जाते हैं। आज भी हमारा देश सुवर्णभूमि है। ऋषि दयानन्द ने अपने समय में वेदों का प्रचार कर तथा वेदप्रचारार्थ सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय तथा वेदों का भाष्य करके व वेदभाष्य के सत्यार्थ की पद्धति बता कर एवं आर्य विद्वानों द्वारा उपनिषदों, दर्शनों तथा मनुस्मृति, बाल्मीकि रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों का सम्पादन कर भारत भूमि को पुनः सुवर्ण भूमि बना दिया है। आज हमारे देश में मनुष्य की आत्मा को योगी बनाने, समाधि अवस्था में ईश्वर का साक्षात्कार करने तथा मोक्ष प्राप्ति के सभी साधन करने का ज्ञान व विधि उपलब्ध है। हमारा अनुमान है कि ऋषि दयानन्द समाधि सिद्ध व ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए योगी थे जिनको मोक्ष प्राप्त हुआ है। 

प्राचीन वैदिक युग की विशेषता बताते हुए ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में लिखा है कि सृष्टि से ले के पांच सहस्र वर्षों से पूर्व समय पर्यन्त आर्यों का सार्वभौम चक्रवर्ती अर्थात् भूगोल में सर्वोपरि एकमात्र राज्य था। अन्य देशों में माण्डलिक अर्थात् छोटे-छोटे राजा रहते थे क्योंकि कौरव पाण्डव पर्यन्त यहां के राज्य और राज शासन में सब भूगोल के सब राजा और प्रजा चले थे क्योंकि यह मनुस्मृति जो सृष्टि की आदि में हुई है उस का प्रमाण है। इसी आर्यावर्त देश में उत्पन्न हुए ब्राह्मण अर्थात् विद्वानों से भूगोल के मनुष्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, दस्यु, म्लेच्छ आदि सब अपने-अपने योग्य विद्या चरित्रों की शिक्षा और विद्याभ्यास करें। और महाराज युधिष्ठिर जी के राजसूय यज्ञ और महाभारत युद्धपर्यन्त यहां के राज्याधीन सब राज्य थे। ऋषि लिखते हैं….. सुनों! चीन का भगदत्त, अमेरिका का बब्रुवाहन, यूरोप देश का विडालाक्ष अर्थात् मार्जार के सदृश आंख वाले, यवन जिस को यूनान कह आये और ईरान का शल्य आदि सब राजा राजसूय यज्ञ और महाभारतयुद्ध में सब आज्ञानुसार आये थे। जब रघुगण राजा थे तब रावण भी यहां के आधीन था। जब रामचन्द्र के समय में विरुद्ध हो गया तो उस को रामचन्द्र ने दण्ड देकर राज्य से नष्ट कर उस के भाई विभीषण को राज्य दिया था। 

ऋषि दयानन्द ने आर्यावर्त व भारत देश की कुछ हजार वर्ष पूर्व के काल में महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि स्वायम्भुव राजा से लेकर पाण्डवपर्यन्त आर्यों का चक्रवर्ती राज्य रहा। तत्पश्चात् आपस के विरोध से लड़ कर नष्ट हो गये क्योंकि इस परमात्मा की सृष्टि में अभिमानी, अन्यायकारी, अविद्वान् लोगों का राज्य बहुत दिन तक नहीं चलता। और यह संसार की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि जब बहुत सा धन असंख्य प्रयोजन से अधिक होता है तब आलस्य, पुरुषार्थरहितता, ईष्र्या, द्वेष, विषयासक्ति और प्रमाद बढ़ता है। इस से देश में विद्या सुशिक्षा नष्ट होकर दुर्गुण और दुष्ट व्यसन बढ़ जाते हैं। जैसे कि मद्य-मांससेवन, बाल्यवस्था में विवाह और स्वेच्छाचारादि दोष बढ़ जाते हैं। और जब युद्ध विद्या कौशल और सेना इतने बढ़े कि जिस का सामना करने वाला भूगोल में दूसरा न हो तब उन लोगों में पक्षपात अभिमान बढ़ कर अन्याय बढ़ जाता है। जब ये दोष हो जाते हैं तब आपस में विरोध होकर अथवा उन से अधिक दूसरे छोटे कुलों में से कोई ऐसा समर्थ पुरुष खड़ा होता है कि उन का पराजय करने में समर्थ होवे। जैसे मुसलमानों की बादशाही के सामने शिवाजी, गोविन्दसिंह जी (व महाराणा प्रताप आदि) ने खड़े होकर मुसलामनों के राज्य को छिन्न-भिन्न कर दिया। 

ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास में मैत्रयुपनिषद के प्रमाण के आधार पर देश के कुछ चक्रवर्ती राजाओं के नाम भी लिखें हैं। उन्ीके यहां प्रस्तुत करने का लोभ भी हम छोड़ नहीं पा रहे हैं। वह लिखते हैं कि सृष्टि से लेकर महाभारत पर्यन्त चक्रवर्ती सार्वभौम राजा आर्यकुल में ही हुए थे। अब इनके सन्तानों का अभाग्योदय होने से राजभ्रष्ट होकर विदेशियों के पादाक्रान्त हो रहे हैं। जैसे यहां सुद्युम्न, भूरिद्युम्न, इन्द्रद्युम्न, कुवलयाश्व, यौवनाश्व, वद्ध्रयश्व, अश्वपति, शशविन्दु, हरिश्चन्द्र, अम्बरीश, ननवतु, शर्याति, ययाति, अनरण्य, अक्षसेन, मरुत और भरत सार्वभौम सब भूमि में प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजाओं के नाम लिखे हैं वैसे स्वायम्भुवादि चक्रवर्ती राजाओं के नाम स्पष्टरूप में मनुस्मृति, महाभारत ग्रन्थों में लिखे हैं। इन को मिथ्या करना अज्ञानियों व पक्षपातियों का काम है। भारत के अतीत का यह कैसा स्वर्णिम चित्रण है जिसे हमारे देश के राजनेताओं व एक विशेष मानसिकता व विचारधारा से प्रभावित लोगों ने पक्षपात के कारण सामने नहीं आने दिया। 

सृष्टि के आरम्भ से वेदों द्वारा प्रवर्तित वेद मत वैदिक धर्म ही समस्त भूगोल व विश्व में प्रचलित रहा है। वेद मत सब सत्य विद्याओं पर आधारित सत्य धर्म था तथा इससे मानव मात्र तथा विश्व का कल्याण होता था, अब भी होता है। वेद मत के मानने से देश के अन्दर व बाहर व संसार में उपद्रव या तो होते नहीं थे अथवा नाम मात्र के होते थे। महाभारत काल व उसके बाद वेदों की अप्रवृति होने से ही सब अविद्यायुक्त वेदविरुद्ध मत अस्तित्व में आयें हैं जिनसे मानवता को लाभ के स्थान पर अनेक प्रकार की हानियां ही हुई हैं। इन सब मतों का पुनः सत्य वैदिक मत में प्रवेश करने व कराने के लिये ही ऋषि दयानन्द ने मानव जाति के हित की दृष्टि से वेद प्रचार कर सबको अविद्या छोड़ने और सत्य विद्याओं से युक्त वेद मत को स्वीकार करने के लिये वेद प्रचार किया था तथा अपने अनेकानेक ग्रन्थों का प्रणयन किया थां। आज भी उनका लिखित व प्रचारित साहित्य हमें वेदों की महत्ता सहित सत्य धर्म, इसके लाभों व महत्ता को बताता है। बिना वेद मत का प्रचार किये व उसे विश्व भर में अपनाये मानव जाति का हित नहीं हो सकता और न ही विश्व में शान्ति लाई जा सकती है। सभी मतों के विद्वानों का कर्तव्य है कि वह सत्यार्थप्रकाश सहित ऋषि दयानन्द के वेद भाष्य आदि ग्रन्थों को पढ़े और अपनी विवेक बुद्धि व हिताहित को देखकर निष्पक्ष होकर सत्य धर्म का ग्रहण व इसे अपनाने का निर्णय करें। ओ३म् शम्।  
 
-मनमोहन कुमार आर्य

प्रभु उपासना से हम पवित्र बनें

प्रभु उपासना से हम पवित्र बनें
                            डा.अशोक आर्य                          
          मानव विनाशक वृतियों का दास बन जाता है किन्तु मन्त्र इन वृतियों से बचने की प्रार्थना का उपदेश करते हुए परमपिता से प्रर्थना करता है कि हम एसी प्रवृतियों का नाश कर स्वयं को सुरक्षित करें। हमारे हृदय में दैवीय वृतियां आवें तथा हे प्रभु! आप के समीप निवास कर हम पवित्र बनें। इस बात को ही यह मन्त्र उपदेश कर रहा है:-        
   धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योऽस्मान् धूर्वति तं धूर्व यं वयं धूर्वाम:।
देवानामसि वह्नितमं सस्नितमं पप्रितमं जुष्टतमं देवहूतमम्॥8॥

        इस मन्त्र में पांच प्रकार का उपदेश किया गया है। जो इस प्रकार है:- 
१. हमारी आदान वृति का नाश हो :-
       हे परमपूज्य प्रभो! आप हमारे अन्दर की राक्षसी प्रवृतियों को, जो हमारा नाश करने वाली आदतें हैं, इन सब प्रकार की दुष्ट वृतियों का आप ही नाश करने वाले हैं। इन बुरी आदतों से आप ही हमें बचाने वाले हैं। आप के सहयोग के परिणाम स्वरूप हम इन बुराईयों से बच पाते हैं। इसलिए आप हमें इन राक्षसी प्रवृतियों से इन अदान की वृतियों से, दूसरों का सहयोग करने से रहित हमारी आदतों का सुधार कर इन बुराईयों से हमें बचाते हुए इन्हें हम से दूर कर दीजिए, इन का नाश कर दीजिए, इनका संहार कर दीजिए। 
      जब हमारे अन्दर अदान की वृतियां आती हैं तो हम विभिन्न प्रकार के भोगों में आसक्त हो जाते हैं, इस कारण हम अनेक बार हिंसक भी हो जाते हैं।  आप हम पर कृपा करें तथा इन अदान की वृतियों को हम से दूर कीजिए, हमें दानशील बना दीजिए। जिस अदान व राक्षसी वृति से हम हिंसक हो जाते हैं, प्रभु!  आप उस पर हिंसा कीजिए अर्थात् इन बुरी वृतियों का नाश कर हमारी रक्षा कीजिए। ये सब बुरी वृतियां हमारा नाश करने को कटिबद्ध हैं, हर हालत में, हर अवस्था में हमारा नाश करना चाहती हैं। आप की जब हमारे पर कृपा होगी, दया होगी, तब ही हम इन का विनाश करने में सक्षम हो पावेंगे। आप की दया होगी तब ही हम इन बुरी वृतियों को नष्ट कर स्वयं को रक्षित कर सकेंगे, अपनी रक्षा कर सकेंगे। हम दिव्य जीवन का आरम्भ करना चाहते हैं किन्तु यह भोगवाद हमें दिव्य जीवन की ओर जाने ही नहीं देते| आप कृपा कर हमें इस भोगवाद से बचावें तथा हमें दिव्य जीवन आरम्भ करने का मार्ग बतावें , हमारे लिए दिव्य जीवन पाने का मार्ग प्रशस्त करें। 
२. प्रभु कृपा से दिव्यगुण मिलते हैं :-
     जीव को दिव्यगुण देने वाले वह परमपिता परमात्मा ही हैं। वह प्रभु ही हमें अत्यधिक व भारी संख्या में दिव्य गुण देने वाले हैं। यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि हमें जिन दिव्य गुणों की आवश्यकता है, यथा हमने स्वयं को सुबुद्धि-युक्त करना है। यह सुबुद्धि तब ही आती है, जब हम उग्र हो जाते हैं, अत्याचारों का मुकाबला करने की, प्रतिरोध करने की शक्ति के स्वामी हो जाते हैं। हम दिव्य तब बनते हैं जब हमारे में उदात्त भावनाएं आ जाती हैं। हम स्वयं को उत्तम बना कर दूसरों को भी उत्तम बनाने का यत्न करते हैं, प्रयास करते हैं। जब हम ज्ञानी बन कर अतुल ज्ञान का भण्डार अपने अन्दर संकलित कर लेते हैं तथा दूसरों में यह ज्ञान बांट कर उन्हें भी ज्ञानी बनाने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार हम सब प्रकार के तत्वों के स्वामी बन कर तत्वद्रष्टा हो कर ऋषि के आसन पर आसीन हो जाते हैं, सब प्रकार की सद्बुद्धियों के स्वामी हो जाते हैं ।
३. प्रभु चरणों में सब मलिनताएं मर जाती हैं :-
         हे प्रभो! एक आप ही हैं, जो हमारे जीवनों को शुद्ध व पवित्र बनाते हो  । हमारे जीवनों में जितनी भी शुद्धता व पवित्रता है, वह आप के ही आशीर्वाद के कारण है, आप की ही दया के कारण है, आप की ही कृपा के कारण है। आप ही हमें अधिकाधिक शुद्ध व पवित्र बनाते हो। जब हम आपके चरणों में आते हैं तो हमारी सब मलिनताएं दग्ध हो जाती हैं, नष्ट हो जाती हैं, जल कर दूर हो जाती हैं । जब हम आप की उपासना करते हैं, आप के समीप आसन लगाकर बैठते हैं, आप की निकटता को पाने में सफ़ल होते हैं तो हमारा जीवन आप की निकटता रुपि जल से एक प्रकार से धुल जाता है तथा हम शुद्ध ओर पवित्र हो जाते हैं ।
४. आप हमें देवीय शस्य से भर देते हो :-
         प्रभो! जब आप हमारे जीवन को शुद्ध कर देते हो, हमारे जीवन को पवित्र कर देते हो, तो बुराइयाँ निकलने से हमारे अन्दर बहुत सा स्थान रिक्त हो जाता है। आप जानते हो कि रिक्त स्थान तो कहीं रह ही नहीं सकता, जहां भी कुछ रिक्तता आती है तो आप कुछ न कुछ उस स्थान पर रख कर उसे भरने का कार्य भी करते हो। जब आप ने हमारे जीवन की सब बुराईयों को निकाल बाहर कर दिया तो इस रिक्तता को पूरित करने के लिए आप उस शुद्ध हुए शरीर में, दिव्य गुणों के बीज डाल देते हो। दिव्य गुणों की खेती कर देते हो। इन बीजों से हमारे अन्दर दिव्य गुणों के अंकुर फ़ूटते हैं, नन्हें-नन्हें पौधे निकलते हैं। यह अंकुर दैवीय सम्पदा की ओर इंगित करने वाले होते हैं, हमें इंगित करते हैं कि हम किसी दैवीय सम्पदा के भण्डारी बनने वाले हैं। इस प्रकार हम सद्गुण रूपी देवीय सम्पदा के स्वामी बन इस सम्पदा से परिपूर्ण हो जाते हैं।  
५. प्रभु ज्ञान का दीपक पा कर देव बनते हैं :-
        हे पिता! इस जगत् में जितने भी समझदार व सूझवान लोग हैं, आप उन से प्रीति-पूर्वक सेवन किये जाते हो। एसे लोग प्रतिक्षण आप की ही प्रार्थना करते हैं, आप की ही सेवा करते हैं। इस प्रकार के ज्ञान से भरपूर लोग ही देवता कहलाते हैं| अत: आप इन देवाताओं के द्वारा बार-बार पुकारे जाते हो, इन देवताओं के द्वारा बार-बार याद किये जाते हो, यह लोग बार-बार आप के समीप आते है और आप की समीपता से देव बन जाते हैं।
       देव कैसे बनते हैं? मानव को देव की श्रेणी प्राप्त करने का साधन है आप की निकटता। आपकी समीपता पाए बिना कोई देव नहीं बन सकता। अत: आप का उपसन, आप के निकट आसन लगा कर हम देव बन जाते हैं। जब हम आप के समीप आसन लगा कर बैठ जाते हैं तो हमारे अन्दर के काम आदि दुष्ट विचारों का दहन हो जाता है, हनन हो जाता है, नाश हो जाता है, यह सब बुराईयां जल कर नष्ट हो जाती हैं, राख बन जाती हैं। यह काम रूप व्रत्र अर्थात् यह हमारी आंखों पर पर्दा डालने वाले जितने भी दोष हैं, इन सब का आप विनाश कर देते हो तथा इस दोषों के विनाश के पश्चात् हम उपासकों का ह्रदय ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो जाता है, जगमगाने लगता है, आलोकित हो जाता है। इस ज्ञान के प्रकाश को पा कर ही हम देव तुल्य बन जाते हैं। 
                                                                                       
डा.अशोक आर्य 
पाकेट १/६१ रामप्रस्थ ग्रीन से.७ वैशाली 
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 वीरांगणा रानी दुर्गावती

ओउम् 
     वीरांगणा रानी दुर्गावती – ले.डा.अशोक आर्य 
   भारत देश वीर वीरांगणाओं का देश है| इस देश पर जब भी कभी संकट आया हो, यहाँ की नारियों ने पुरुष के कंधे से कंधा मिला कर देश की रक्षा का कार्य किया| विश्व जानता  है की जब अयोध्या के राजा दशरथ को युद्ध में जाना पडा तो उसकी दूसरी पत्नी कैकेयी भी उनके साथ गई थी| इस प्रकार की परम्परा ही रही है की जब जब देश को संकट ने घेरा यहाँ की वीर नारियों ने पुरुषों के साथ ही नहीं, पुरुषों से आगे बढ़ कर देस्श की रक्षा के लिए तलवार उठाई| इस प्रकार की नारियों में वीरानणा दुर्गावती भी एक थी| 
     मैं जब छोटा था तो उन दिनों एक गीत गुनगुनाया करता था:-
        जब दुर्गावती रण में निकली 
              हाथों में थी तलवारे दो |
                   धरती कांपी आकाश हिला 
                          जब चलने लगी तलवारें दो ||
               गुस्से से चेहरा ला हुआ 
                   आँखों से अन्गास्र बरसते थे|
                         उन गोर गोर हाथों में जब 
                                 चमक उठी तलवारें दो|| जब दुर्गावती …….
 
    रानी दुर्गावती का जन्म ५ अक्टूबर १५२४ ईस्वी में महोबा के राज परिवार में हुआ| बड़े लाड प्यार में इस बालिका का पालन हुआ तथा जवान होने पर इसका विवाह गढ़मंडल के राजा दलपति शाह से हुआ| यह सोलहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत का एक छोटा सा राज्य था| छोटा तो था किन्तु इस राज्य के पास अपार धन संपदा होने के कारण इसकी प्रसिद्धि दूर दूर तक फैली हुई थी| 
     इस प्रकार की रानी दुर्गावती का विवाह हुए मात्र एक वर्ष ही हुआ था कि उसके पिता का देहांत हो गया| वह महोबा के शासक थे| उस समय देश पर विदेशी मुगलों का राज्य था और इस समय मुगल बादशाह अकबर राज्य पर आसीन था| महोबा नरेश का देहांत होते ही अकबर की लालची निगाहें महोबा पर आ टिकीं क्योंकि अकबर को धन की आवश्यकता थी ताकि देश के विशाल क्षेत्र को युद्ध करके अपने क्षेत्र में मिलाया जा सके| उसने सुना रखा था कि रानी दुर्गावती के पास आकूत धन है और वह एक साधारण सी महिला ही तो है, उस पर विजय पाना क्या कठिन है?  शीघ्र ही उसने आक्र्रमण करके महोबा के एक भाग कालिंजर पर कब्जा कर लिया जबकि वहां के पूर्व राजा की बेटी दुर्गावती अब तक पिता की मृत्यु के कारण संभल नहीं पाई थी| इस मध्य ही विवाह के मात्र चार वर्ष पश्चात् ही उसके पति राजा दलपति शाह जी का भी देहांत हो गया| अब राज्य के साथ ही साथ अपने तीन वर्षीय शिशु के लालन पालन का कार्य भी दुर्गावती के जिम्मे आ गया| वह सब और से प्राकृतिक विपत्तियों से घिरी हुई थी तो शासन की व्यवस्था की दृष्टि से अकबर की बुरी नजर उसके राज्य को अपने राज्य में मिलाने के लिए लालायित थी| 
    रानी दुर्गावती इन सब विपत्तियों से घीरी थी किन्तु उसने साहस को कभी हाथ से न जाने दिया तथा सब प्रकार की विपत्तियों का सामना करने के लिए सदा ही तत्पर रहती थी| उस ने राज्य की सब व्यवस्थाएं अपने हाथ में ले लीं और अपने इस राज्य का बड़ी कुशलता से संचालन किया| प्रबंध पटु रानी  दुर्गावती के राज्य में सब व्यवस्थाएं इतनी व्यवस्थित तथा सुन्दर थीं कि देखते ही रह जाओ| इस प्रकार सब प्रकार की व्यवस्था करते हुए मात्र दस वर्ष में जबलपुर, जिसे उस समय गोंडवाना कहा जाता था, को सब रूप में संपन्न और दृढ कर दिया| 
     इस मध्य मुग़ल बादशाह अकबर ने आवश्यकता से अधिक अनुमान लगाते हुए भारत की महिला की वीरता का अनुमान न लगा पाया और उसके राज्य को हडपने की योजना बना डाली| इस योजना को क्रियान्वित करते हुए उसने अपने एक सेनापति, जिसका नाम आसिफखान था, को गोंडवाना पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया| अकबर का विचार था दुर्गावती महिला होने के कारण उसका मुकाबला नहीं कर पाएगी और पूरा गोंडवाना उसके आधीन हो जावेगा किन्तु उसका यह अनुमान उस समय गलत सिद्ध हुआ जब रानी दुर्गावती पुरुषों के सैनिक वेश से सुसज्जित रणक्षेत्र में आ खडी हुई| उसे सामने देखकर आसिफखान की आँखें चुंधिया गई और वह लड़ने के स्थान पर कुच्छ समय के लिए वह एकटक दुर्गावती को देखता ही रह गया| 
    रानी ने दोनों हाथों में तलवारें ले रखी थीं और युद्ध आरम्भ होते ही दोनों तलवारे चपला सी चमकने लगीं| जिधर भी रानी आगे बढती उधर ही लाशॉन का ढेर लग जाता| रानी को देखते ही मुग़ल सैनिक भागने का प्रयास करते किन्तु तीव्रगामी रानी उन्हें भागने का अवसर भी नहीं दे रही थी| रानी के हाथों पूरी की पूरी मुग़ल सेना गाजर मुली की तरह कट कर रणक्षेत्र में पड़ी थी और उसका सेनापति किसी प्रकार अपनी जाना बचाकर भाग पाने में सफल रहा और मुंह लटकाए अकबर के पास जा पहुंचा| रानी के वीरता भरे चर्चे सुनकर तो अकबर भी घबरा गया|
     रानी दुर्गावती से अकबर ने पराजय का स्वाद चखे अभी मात्र डेढ़ वर्ष ही बिता था कि भारत पर राज्य करने की उसकी इच्छा एक बार फिर बलवती हुई और इस इच्छा की पूर्ति से पूर्व उसने एक बार फिर उसे महिला मात्र मानते हुए रानी की वीरता के आंकलन में भूल की और एक बार फिर से अपने उस पराजित सेनापति  आसिफखान को ही फिर से रानी पर आक्रमण करने के लिए रवाना कर दिया| आसिफखान ने जाते ही तत्काल गोंडवाना राज्य पर पुन:हमला बोला दिया| इस बार मुग़ल सेना पहले से भी अधिक तैयारी करके आई तथा पूरा तोपखाना साथ लेकर आये थे| एक और से तोपें चल रहीं थीं तो दूसरी और दोनों हाथों से रानी की तलवारें चल रहीं थी| रानी की तलवारों के सामने तोपों की गति भी धीरे धीरे मंद पड़ती जा रही थीं और राणांगण पूरी तरह से मुगलों के मुंडों से भरने लगा था| सब और खून की धाराएं बह रहीं थीं| यहाँ तक कि रानी ने तोप चलाने वाले तोपचियों के सर भी काट दिए| इस बार भी आसिफखान रणभूमि से किसी प्रकार भाग कर अपना काला पराजित चेहरा लेकर अपने बादशाह अकबर के दरबार में जा खडा हुआ| 
    एक महिला से पराजिर्ट होने के कारण आसिफखान अपने आप को बड़ा अपमानित अनुभव कर रहा था| वह विरोध की अग्नि में जकल रहा था किन्तु रानी के सामने सीधे रूप से खड़े होने का वह अब साहस नहीं कर पा रहा था| मुग़ल तो होते ही कुटिल है| अत: अब उसने घोर कुटिलता का मार्ग अपनाते हुए लालच देकर रानी के कुछ प्रमुख सिपहसालारों को गुप्त रूप से अपने साथ मिला लिया|
    इस बार की विजय के कारण गोंडवाना की सेना खुलकर खुशी मनाना चाहती थी, जिसे रानी ने स्वीकार करते हुए स्वयं भी इस खुशियों के अवसर पर अपने सैनिकों के साथ खुशियाँ मनाने में व्यस्त हो गई| वह अपनी प्रजा को भी प्रसन्न करना चाहती थी, इस कारण प्रजा को भी इन खुशियों का भाग बनाया गया था| खुशियों के इस अवसर पर ही अवसर पाकर दुर्गावती के एक गद्दार सेनापति ने इसकी सूचना आसिफखान को देते हुए कहा कि यह रानी को हराने का उत्तम अवसर है और उस पर तत्काल आक्रमण करने की आवश्यकता है| अत: उसी सेनापति आसिफखान के नेतृत्व में अकवर की सेना ने अब तीसरी बार दुर्गावती के गोंडवाना पर आक्रमण कर दिया| 
     खुशियाँ मना रही रानी को इस आक्रमण ने संभलने और युद्ध की व्यवस्था करने का अवसर न दिया| जिस अवस्था में, जो सैनिक जहाँ था, वहीँ से ही इस आक्रमण का प्रतिरोध आरम्भ किया गया| राणीने अपने सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा की “ देश पर मर मिटने वाले वीरो! तैयार हो जाओ| आज तुम्हारी जन्म भूमि विपत्ति की सूचना पाकर क्रंदन कर रही है| उसकी स्वाधीनता की रक्षा करना तुम्हारा धर्म है| तुम दुशमन को दिखला दो कि जब तक एक भी राजपूत जीता रहेगा, तब तक गढ़मंडल पर मुगलों का शासन नहीं हो सकता| मैं जीते- जी गढ़मंडल में शत्रुओं को पैर नहीं रखने दूंगी| वीरो! चलो मेरे साथ गढ़मंडल की कीर्ति अमर करने! शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो अथवा रण यज्ञ में प्राणों की आहुति देकर अक्षय यश और दुर्लभ स्वर्ग सुख प्राप्त करो|”
     रानी का यह  उद्घोष सुनते ही राजपूत विरोंकी छातियाँ फड़क उठीं, आखोंसे चिन्गारियान्निकलाने लगीं| राणीने एक बार फिर कहा,” माना कि यवनों की शक्ति बर्बरता की सीमा पार कर चुकी है; आतत्तायीपन का नंगा नाच आरम्भ हो गया है| बाबर के वंशज ने विधवा रियासत पर हमला बोल दिया है| परन्तु जिस समय तुम लोग रण में कूद पड़ोगे, एक एक हिन्दू वीर सैंकड़ों यवानों को मार भगाएगा| यदि तुम सच्चे वीर हो और नि:संदेह तुम सच्चे वीर हो ही, तो तुम अपनी इस वीर माता की सहायता करो|” रानी ने इस बार सावधानी बरतते हुए सेना की दो टुकड़ियां बनाईं| एक का नेतृत्व उसका मात्र अठारह वर्षीय  पुत्र वीर नारायण कर रहा था और दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व रानी स्वयं कर रही थी| दोनों टुकडियां अलग अलग दिशाओं से शत्रु का बड़ी वीरता से प्रतिरोध करने लगीं| इस युद्ध में रानी का पुत्र नारायण बुरी तरह से घायल हो गया| 
     नारायण के घायल होने की सूचना रानी को दी गई और उन्हें बताया गया कि उनके पुत्र के अवस्था अत्यंत शोचनीय है और वह किसी समय भी देह त्याग कर सकता है| रानी को चाहिए कि वह तत्काल जाकर अपने सुपुत्र के अंतिम दर्शनकर ले| वह इस समय एक सुरक्षित स्थान पर लाया गया था| रानी कोई साधारण महिला नहीं थी| वीरता उसके रग रग में थी| वह स्वयं एक साध्वी के समान थी| उसने पुत्र वियोग से देश रक्षा को अधिक महत्व देते हए कहा कि एक राजा के लिए उसकी अपनी संतान ही नहीं पूरी प्रजा ही उसकी संतान होती है|  इस समय म,अं अपनी मातृभूमि का ऋण चुकाने में व्यस्त हूँ| मेरी प्रजा संकट में है, उसे बचाना है, जिस प्रकार नारायण मेरी संतान है, उस प्रकार ही इस युद्ध में लड़ रहे यह सब सैनिक भी मेरी ही संतान है, इन को रणभूमि में अकेला छोड़ कर मैं नारायण को देखने कैसे जा सकती हूँ?” इतना कुछ बोलते बोलते रानी ने तेजी से घोड़े की लगाम को खींचा और एक बार फिर घोडा सरपट भागने लगा और रानी के हाथों की तलवारे एक बार फिर से मुग़ल सेना को गाजर मूली की भाँति काटने लगी|
     इस प्रकार रानी ने चंडी का रूप धारणकर लिया और जिस ओर भी आगे बढती, उस और से ही मुग़ल सैनिकों में हाहाकार मच जाती| शत्रु मैदान छोड़ कर भागने लगते किन्तु विधाता को इस बार कुछ और ही मंजूर था| इस कारण ईश्वर की व्यवस्था को उलाहना तो नहीं दे सकते किन्तु शीघ्र ही गोंडवाना का दुर्भाग्य सामने आ गया क्योंकि युद्ध भूमि में किसी एक सैनिक का तीर आकर रानी की आँख में जा लगा| अभी वह तीर के इस प्रहार से संभल भी नहीं पाई थी और आँख में घसे इस तीर को निकालने का प्रयास कर रही थी कि  एक और तीर उसकी गर्दन में आ लगा| 
     अब रानी दुर्गावाती को अपना अंतिम समय दिखाई देने लगा और वह यह भी जानती थी कि मुग़ल सेना और उसके शासक जब किसी महिला को जीवित पकड़ लेते हैं तो उसके साथ वह कितना घिनौना व्यवहार करते हैं| इस प्रकार का विचार आते ही रानी ने अपने कमर से एक छुरा खींचा और बिना कुछ भी समय गँवाए यह छुरा अपनी छाती में घोंप लिया| यह देख कर मुगलों ने दांतों तले  अंगुलियाँ दबा लीं| वह चकित थे कि इस देश की महिलाएं कितनी वीर और आत्म सम्मान रखने वाली होती हैं| 
     रानी दुर्गावती के पास कितना पराक्रम था, कितना आत्म बल था, कितना सतीत्व था, इस का सही आंकलन तो हमारे इतिहासकार भी नहीं कर सके| इस प्रकार रानी ने अवगाहन करके स्वयं को पवित्र किया| वह पराजित होकर भी विजयी हुई| चाहे अकबर ने गढ़मंडल पर धोखे से अपना अधिपत्य जमा लिया किन्तु उसकी जो हानि हुई उसे वह धन से नहीं भर सकता था| हाँ! गढ़मंडल की आकुत धन संपदा से उसका खजाना अवश्य भर गया किन्तु वह दुर्गावती जैसे रत्न को पाने में असमर्थ रहा|
डा. अशोक आर्य 
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