अंधविश्वास

🌷अंधविश्वास 🌷

  अंधविश्वास वह बीमारी है जिससे हमनें अतीत में इतना कुछ गवांया। इसकी पूर्ति करने में पता नहीं हमें कितने वर्ष और लगेंगे। हम जब इतिहास उठाते है भारत की अनेकों हार का कारण जानना चाहते तो उसमें सबसे बड़ा कारण हमेशा अंधविश्वास के रूप में सामने पाते हैं। याद कीजिए सोमनाथ के मंदिर का इतिहास जब सोमनाथ मंदिर का ध्वंस करने महमूद गजनवी पहुंचा था। तब सोमनाथ मंदिर के पुजारी इस विश्वास में आनन्द मना रहे थे कि गजनवी की सेना का सफाया करने के लिए भगवान सोमनाथ जी काफी है। लोग किले की दीवारों पर बैठे इस विचार से प्रसन्न हो रहे थे कि ये दुस्साहसी लुटेरों की फौज अभी चंद मिनटों में नष्ट हो जाएगी। वे गजनवी की सेना को बता रहे थे कि हमारा देवता तुम्हारे एक-एक आदमी को नष्ट कर देगा, किन्तु जब महमूद की सेना ने नरसंहार शुरू किया कोई ५० हजार हिंदू मंदिर के द्वार पर मारे गए और मंदिर तोड़कर महमूद ने करोड़ों की सम्पत्ति लूट ली। यदि उस समय ५० हजार हिन्दू इस अंधविश्वास में ना रहे होते और एक-एक पत्थर भी उठाकर गजनवी के सेना पर फेंकते तो सोमनाथ का मंदिर बच जाता और भारतीय धराधाम का सम्मान भी।

    यह कोई इकलौती कहानी नहीं हैं जब धर्म की सच्ची शिक्षा देने वाले ऋषि-मुनियों के अभाव में अज्ञान व अन्धविश्वास, पाखण्ड एवं कुरीतियां वा मिथ्या परम्परायें आरम्भ हो गईं उनके स्थान पर ढोंगी, पाखंडियों के डेरे सजने लगे तब इसका परिणाम देश की गुलामी था। इनके कारण देश को अनेक विषम परिस्थितियों से गुजरना पड़ा और आज भी देश की धार्मिक व सामाजिक स्थिति सन्तोषजनक नहीं है। इस स्थिति को दूर कर विजय पाने के लिए देश से अज्ञान व अन्धविश्वासों का समूल नाश करना जरुरी हैं वरना धार्मिक तबाही पिछली सदी से कई गुना बड़ी होगी।

    सोमनाथ की भयंकर त्रासदी के बाद भी तथाकथित स्वयंभू लोगों ने जागरूकता फैलाना उचित नहीं समझा और इस एक मन्त्र के सहारे लोगों को प्रतीक्षा में बैठाकर कायर बना दिया कि “जब-जब धर्म की हानि होगी तब मैं अवतार बनकर आऊंगा” इसी अंधविश्वास में वीर जातियां धोखा खाती रही।

दुर्भाग्य आज सूचना क्रांति और तमाम तरक्की के इस दौर में भी यह संघर्ष जारी है, पाखंड जारी है, अंधविश्वास जारी हैं और आज ये लुटेरे अपने नये रूप धारण कर नये हमले कर रहे है। कोई बंगाली बाबा बनकर, भूत-प्रेत वशीकरण के नाम पर, कोई नौकरी दिलाने के बहाने मसलन आज भी ये गजनवी आशु महाराज के खोल से निकल रहे हैं।

      काल बदले कलेंडर बदले, लेकिन अंधश्रद्धा अपनी जगह खड़ी रही। लोग झाड़-फूंक के जरिये गर्भ में पल रहे शिशु के लिंग का पता लगाने और उसे बदलने के दावें कर महिलाओं को आसानी से शिकार बना रहे है, धर्म-मजहब  के नाम पर महिलाओं और लड़कियों के यौन शोषण को अंजाम दे रहे हैं।
यदि देखा जाये तो आज समाज में अंधविश्वास का बाजार इतना बड़ा और बढ़ चूका है कि जिसकी चपेट में पढ़े लिखें भी उसी तरह आते दिख रहे है जिस तरह अशिक्षित लोग। जबकि यह लंबे संघर्ष के बाद मानव सभ्यता द्वारा अर्जित किए गए आधुनिक विचारों और खुली सोच का गला घोंटने की कोशिश है। यदि सरकार राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाकर अंधविश्वास फैलाने वाले तत्वों के खिलाफ, उसका प्रचार-प्रसार कर रहे लोगो के खिलाफ एक्शन लेने का प्रावधान बना दे आज भी काफी कुछ समेटा जा सकता है। ये सच है कि कानून तो अमल के बाद ही समाज के लिए उपयोगी बन पाता हैं, किन्तु फिर भी उम्मीद है कि  २१ वीं सदी के दूसरे दशक में पहुंच चुके हमारे समाज को ऐसे ऐतिहासिक कानून की आंच में विश्वास और अंधविश्वास के बीच अंतर समझने में कुछ तो मदद मिलेगी। हमारा अतीत भले ही कैसा रहा हो पर आने वाली नस्लों का भविष्य तो सुधर ही जायेगा… 

  अंधविश्वासों से छुटकारा पाने के लिए पढ़िये महर्षि दयानंद सरस्वती का कालजयी ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश।

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गीता मे आतंकवाद नहीं है

गीता मे आतंकवाद नहीं है
लेखक श्री विष्णु शर्मा

पिछले भाग में यह स्पष्ट किया गया था कि महाभारत युद्ध में कौरवों का वध क्यों आवश्यक था किंतु अब प्रश्न यह उठता है कि तब परिस्थितियां भिन्न थी मगर अब यदि कोई सामान्य रूप से गीता का अध्ययन करेगा तो क्या उसके मन में युद्ध – हिंसा का विचार नहीं आएगा क्योंकि वहां लगातार युद्ध का उपदेश है ??

उत्तर – नहीं आएगा क्योंकि गीता में युद्ध को एक रूपक माना गया है। मुख्य रूप से गीता का प्रतिपाद्य विषय है कर्म। निठल्ले बैठे रहना गीता की नज़र में पाप है इसलिए निष्काम कर्म की विधि को विस्तार से समझाया गया है कि मन में कोई दुविधा न लाते हुए केवल अपना नियत कर्म करते रहें क्योंकि आपका नियत कर्म ही आपकी जीविका का साधन है –

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥

तू अपना नियत कर्तव्य कर्म कर; क्योंकि अकर्म की अपेक्षा कर्म श्रेष्ठ है तथा अकर्म से तो तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा । (गीता – 3/8)

क्योंकि अर्जुन क्षत्रिय था इसलिए आततायियों को मारना उसका नियत कर्म था बिल्कुल वैसे जैसे किसी आर्मी जवान का काम सीमा पर देश की रक्षा का होता है या फिर जैसे किसी डॉक्टर का शल्यक्रिया ( ऑपरेशन) करना होता है।

वस्तुतः किसी भी इच्छा को पूरा करने के लिए युद्ध करने का आदेश गीता नहीं देती क्योंकि गीता की नज़र में भौतिक वस्तुओं से सुख मिलता ही नहीं और जो मिलता है वह देखने में तो अमृत लगता है किंतु वास्तव में वह ज़हर ही होता है –

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ।।

जो सुख विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होता
है, वह पहले–भोगकालमें अमृतके तुल्य प्रतीत
होनेपर भी परिणाममें विषके तुल्य है; इसलिये
वह सुख राजस कहा गया है। ( गीता – 18/36)

स्वार्थ के लिए उत्पीड़न या हिंसा आदि करना गीता की दृष्टि में तामसी कार्य है –

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ।।

जो तप मूढ़ता पूर्वक हठ से, मन, वाणी और
शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरेका अनिष्ट
करने के लिये किया जाता है – वह तप तामस
कहा गया है॥ ( गीता – 17/19)

इस श्लोक में दो अति महत्वपूर्ण शब्द हैं – तप और तामसी जिनका अर्थ क्रमशः इस प्रकार है-

1. तप का अर्थ होता है कठिन परिश्रम ( hard work)

2. तामसी – तामसी शब्द का अर्थ है तम से सम्बन्ध रखने वाला और तम का शाब्दिक अर्थ है अंधकार
अतः तामसी का अर्थ हुआ अंधकारयुक्त कोई तत्व या कार्य

इस प्रकार इस श्लोक का मतलब है कि जो कठिन परिश्रम खुद को या दूसरों को नुकसान पहुंचाने या किसी का उत्पीड़न करने के लिए किया जाता है वह परिश्रम व्यक्ति को अंधेरे गर्त में पहुंचा देता है जिससे उसे न तो यश ही मिलता है और न शांति। उसे सारा का सारा समाज दुत्कारता है , कड़वे वचन बोलता है, बददुआएं देता है।

इसके उलट , गीता में यज्ञ करने को कहा गया है जिसमें सबका विकास निहित होता है –

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ॥

भावार्थ : यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मुनष्य समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे अर्जुन! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्य कर्म कर। ( गीता – 3/9)

इस श्लोक में यज्ञ शब्द देखने लायक है। शतपथ ब्राह्मण में यज्ञ का लक्षण इस प्रकार दिया गया है-
“यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म” अर्थात यज्ञ इस संसार में सबसे श्रेष्ठ कार्य है।

स्वयं गीता भी चार प्रकार के यज्ञों का विधान करती है –

1. द्रव्य यज्ञ – जब द्रव्य अर्थात धन को लोक कल्याण में लगाया जाता है तब वह द्रव्य यज्ञ कहलाता है जैसे – अपने धन के द्वारा कुएं खुदवाना , विद्यालय अस्पताल आदि बनवाना, किसी की भूख मिटाना इत्यादि इत्यादि।

2. तपोयज्ञ – जब कोई अपने लक्ष्य के लिए पूरी तरह समर्पित हो जाता है और लक्ष्य के मार्ग में आने आनी वाली बाधाओं को सहन करना सीख जाता है तब उसकी ये लगन तपोयज्ञ कहलाती है।

3. योगयज्ञ – जब कोई सफलता या असफलता को एक समान मानने लगता है या जब कोई अपने सुख दुख को खुद के ऊपर हावी नहीं होता तो उसकी यह क्रिया ‘ योग’ कहलाती है जिसका लक्षण गीता में ही है –

योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय । सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

भावार्थ : हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर, समत्व (जो कुछ भी कर्म किया जाए, उसके पूर्ण होने और न होने में तथा उसके फल में समभाव रहने का नाम ‘समत्व’ है।) ही योग कहलाता है।

इसी योग का पालन करना योगयज्ञ है।

4. ज्ञानयज्ञ – ज्ञान का तात्पर्य अच्छे बुरे की पहचान से है जोकि विद्या द्वारा ही संभव है इसलिए स्वाध्याय, वेद उपनिषद शास्त्रों का अध्ययन और निःशुल्क विद्या दान ज्ञानयज्ञ है।

गीता के अतिरिक्त मनु स्मृति में भी पांच तरह के यज्ञ बताए गए हैं –

1.ब्रह्मयज्ञ – ब्रह्म यज्ञ तात्पर्य है अन्य लोगों को ज्ञान बांटना, उनमें उचित अनुचित का विवेक जगाना, उन्हें आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करना आदि ।

2. पितृ यज्ञ – अपने बड़ो के उचित आदेश को मानना , वृद्धजनों की सेवा करना, उनके प्रति आभार मानना, पूर्वजों या वृद्धों के शुभ कार्यों का अनुसरण करना इत्यादि पितृयज्ञ कहलाता है।

3. देवयज्ञ – देवयज्ञ का मतलब देवों के लिए किया जाने वाले हवन से है। सूर्य चन्द्र अग्नि जल आकाश आदि तत्व जीने में हमारी सहायता करते हैं इसलिए ये देव भी कहलाते हैं। अग्नि द्वारा इन्हें हवि देना देवयज्ञ है।

4. भूतयज्ञ – भूत का अर्थ यहां जीवित प्राणियों से है। अपने भोजन का कुछ भाग अन्य प्राणियों को देना भूतयज्ञ कहलाता है।मनुस्मृति में कहा गया है कुत्ता, गरीब, चांडाल, कुष्ठरोगी, कौओं, चींटी व कीड़ों आदि के लिए अन्न को बर्तन से निकालकर कर साफ जगह पर रखने के बाद दान दे देना चाहिए। यही भूत यज्ञ कहा जाता है।

5. अतिथि यज्ञ – इस यज्ञ में ‘ अतिथि देवो भव’ की भावना चरितार्थ होती है। घर आए अतिथि का आदर सत्कार करना , उसे अन्न जल आदि से तृप्त करना अतिथि यज्ञ कहलाता है।

इस प्रकार यज्ञ शब्द में सम्पूर्ण शुभ कार्य आ जाते हैं।

इन सबसे बढ़कर गीता बिना बुद्धि का उपयोग किये गए कार्य को गलत मानती है। गीता के अनुसार किसी शास्त्र को अमल में लाने से पहले अच्छी तरह से सोच विचार कर लेना चाहिए। बिना सोचे समझे किसी की भी बात नहीं चाहिए चाहे वो व्यक्ति अथवा शास्त्र कितना भी लोकप्रिय या किसी भी समुदाय का आदर्श ही क्यों न हो –

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।

इस प्रकार समस्त गोपनीयों से अधिक गुह्य ज्ञान मैंने तुमसे कहा इस पर पूर्ण विचार (विमृश्य) करने के पश्चात् तुम्हारी जैसी इच्छा हो , वैसा ही तुम करो। ( गीता – 18/63)

इस प्रकार गीता की विषयवस्तु से भी जिहाद को समर्थन नहीं मिलता।

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प्रोफेसर राममूर्ति नायडू

प्रोफेसर राममूर्ति नायडू

https://youtu.be/jSOC-b0O9WAhttp://https://youtu.be/jSOC-b0O9WA

भारत के प्रसिद्ध पहलवान इनके करतबों को देखकर ,सामान्यजन से लेकर ब्रिटिश शासन तक, दांतों तले उंगली दबा लेते थे ।
जिनका डंका लंदन के बकिंघम पैलेस तक बजता था ।
जानिए प्रोफेसर राममूर्ति नायडू के बारे में जिनके नाम से राममूर्ति दंड – बैठक का नाम उनके नाम पर पड़ा। जिन्होंने अंग्रेज राज में भी ब्रिटिश महारानी को खुद को ” इंडियन सेन्ड्रोस” पुकारे जाने पर साफ-साफ कह दिया कि मैं कलयुगी भीम हूं ।
प्रोफेसर राममूर्ति नायडू भारत के अमूल्य रत्न थे।
उनके बारे में वैदिक राष्ट्र यूट्यूब चैनल पर जानिए ।
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How Ambedkar busted the myth of ‘Ganga Jamuni Tehzeeb’ through his speeches and book ‘Pakistan or Partition of India

How Ambedkar busted the myth of ‘Ganga Jamuni Tehzeeb’ through his speeches and book ‘Pakistan or Partition of India’

-Saket Suryesh

This is so true. There are two ways of killing the thoughts of an illuminated mind which do not work well with the modern day politics- Burning their books and reducing them to symbolic caricatures. When I look at the blue, often ill-made, wrongly proportioned statues of Dr. Bhimrao Ambedkar, the head of the drafting committee of the Constitution of Independent India, dotting the numerous Ambedkar Nagars around India, and then I find how little Ambedkar is read by the current generation, I find how well the intellectual class of India, which constituted mostly the descendants of elite Raibahadurs from the Raj, used this principle.

Ambedkar is respected by all but read by very few. The reason that all the memories of Ambedkar have been reduced to those idols, all his intellectual marks have been erased seems to be its in-congruence with the Leftist intellectualism. This leftist intellectualism is grand on slogans but weak on substance. This shows in the hollow Communist regimes around the world which collapsed under their own weight within less than a century of coming to power.

In India, the Communists did the same with Dr Ambedkar. They turned an iconoclast Ambedkar into an idol who speaks nothing, contradicts nothing. An ideologue speaks to the generations after him with his words, his writings, and his speeches. The Left, once it adopted Ambedkar, tried its best to wipe out his thoughts and his words. They went after Ambedkar with such a vengeance that now we see Ambedkar everywhere but know very little about him.

Ambedkar was, in reality, always wary of the Communists and their propensity of creating chaos and anarchy. In his speech ‘The Grammar of Anarchy”, which he made on 25th November, 1949, he famously said referring to the criticism of the Constitution by the Communists (yes, the same people who are touring the nation making the youth read the Preamble of Constitution amended by Indira Gandhi during Emergency),

“The condemnation of the Constitution largely comes from two quarters, the Communist Party and the Socialist Party. Why do they condemn the Constitution? Is it because it is really a bad Constitution? I venture to say no’. The Communist Party want a Constitution based upon the principle of the Dictatorship of the Proletariat. They condemn the Constitution because it is based upon parliamentary democracy.The Socialists want two things. The first thing they want is that if they come in power, the Constitution must give them the freedom to nationalize or socialize all private property without payment of compensation. The second thing that the Socialists want is that the Fundamental Rights mentioned in the Constitution must be absolute and without any limitations so that if their Party fails to come into power, they would have the unfettered freedom not merely to criticize, but also to overthrow the State.“

The leftists who create violence under the Pictures of Ambedkar will never want people to know his views about the Communists. They pretend to own Ambedkar while they crush and kill his thought. The sagacity of Ambedkar is clear as we see the direction of leftist propaganda in the second stage as predicted by Ambedkar. The Congress, post-independence, having rid itself of all the intellectual giants like Dr Rajendra Prasad, KM Munshi and all became a party of intellectual pigmies which found its legitimacy in Gandhi.

Appropriating Gandhi’s name for the dynasty of dimwits that Nehru established a cottage industry of pliant intellectuals was created to broad-brush history of Indian independence. To understand the history correctly, it is very important to see the history from someone who wrote about his times with dispassionate eyes of a neutral intellectual. In this sense, Ambedkar’s book “Pakistan or Partition of India”is a brilliant book and an eye-opener. Going through this book one realizes why the left-leaning Academia would have wanted this book to disappear from public view.

This book breaks many carefully and cunningly-crafted fake narratives of the Communists, which they widely use to misguide the youth. Many people, blindfolded, follow their narrative, often thinking it to be ordained by Dr Ambedkar himself to follow the left. How could, say the left educate the Ambedkarites of today that Indian Partition was because of Savarkar’s ideology? How could they be sold into anti-Hindu propaganda, into a belief that Hindus wanted partition?

He mentions how the Hindu politicians worked for long on the faith that India was one nation and how Hindus felt betrayed when the Muslims insisted that they were another nation. Ambedkar writes, “This assertion cuts the whole ground from under the feet of the Hindu politicians. It is natural that they should feel annoyed at it and call it a stab in the back.” Ambedkar however, does not make a case of united India or Akhand Bharat of Savarkarites.

He rather makes a case that Partition (of course, he proposes complete human transfer) will be good for Hindus, although at one point he also hopes, much like Savarkarites that in a decade or so, Muslims will see the futility of the nonsensical entity created merely on the basis of fear and insecurity and come back to the Indian fold. He picks equivalence from Europe and explains that when there are two nations exist under the skin of one manufactured unity, they will fight one another, and eventually escape. He quotes Renan that there ought to be a sense of forgetfulness to achieve unity when the history divides two people.

He explains that the sense of Muslim isolation is because of the distrust the Muslims had towards the Congress. Ambedkar connects the distrust between the two communities with history, where unlike the modern historians he refuses to sugarcoat the events of the ancient past. When we are talking about reparation for the Blacks in the west for the cruelties of the past, it is pertinent that the truth be faced, accepted if not apologized for before moving ahead, in India as well.

He writes about how Mohammad Bin Qasim’s first invasion was not only a political event and after trying to forcefully convert people of Debul by forced circumcision, he killed all those above the age of 17 and turned all those below 17 into slaves. He writes quoting tabaquat-i-Nasir about Bakhtiar Khilji’s invasion in Bihar, mentioning, – most of the inhabitants were Brahmins with shaven heads. They were put to death. Large number of books were found.. but no one could explain their contents as all the men had been killed in the fort and the city being a place of study.

He quotes the period of Shahjahan, whitewashed as great lover, on account of building Tajmahal, from Badshahnamah, how about the temples which were coming up, in Benaras, His majesty, the defender of the faith, gave orders that at Benares and throughout all his dominions in every place all temples that had begun should be cast down. It was reported from the province of Allahabad that 76 temples had been destroyed in the city of Benares.

These facts are inconvenient in today’s world where except for smaller secular sanctuaries, the globe is split between two major military and missionary religions. But to forget things, they must be known and accepted first. This is what Ambedkar wrote about, this is what Ambedkarites do not want people to read for the fear of the effect it might have on their politico-religious plank. Regarding a great deal of propaganda about Savarkar agreeing to the breaking up of nation spread by the left and modern-day Ambedkarites alike, it is to be noted that he write,

“Mr Jinnah says that India should be cut up into Pakistan and Hindustan, the Muslim nation to occupy Pakistan and the Hindu nation to occupy Hindustan. Mr Savarkar, on the other hand, insists that, although there are two nations in India, India shall not be divided into two parts, one for Muslims and the other for the Hindus; that the two nations shall dwell in one country and shall live under the mantle of one single constitution..in his scheme Minority is to be no justification for privilege and majority is to be no ground for a penalty.”

As we see, this is what the Indian nation eventually strives to do. Ambedkar further writes- This alternative of Mr Savarkar to Pakistan has about it a frankness, a boldness and definiteness which distinguishes it from the irritating vagueness and indefiniteness which characterizes congress declarations about minority rights.

Ambedkar finds the fidgety attitude of Congress to be connected with the fear of Muslims not joining the struggle for the independence of India. Another fact which is thrown often at the face of modern right by Islamist intellectuals posing as intellectuals, about Hindus not being a part of Freedom struggle. Ambedkar calls it out when he quotes Savarkar, regarding latter’s address to the Indian Muslims in regard to support for freedom struggle-

“If you come, with you, if you don’t without you; and if you oppose, in spite of you- the Hindus will continue to fight for their national freedom as best as they can.”

And then Ambedkar does something which has been turned into an act of blasphemy in democratic, independent India. He pushes his knife inside the myth of Gandhi which has been created by the modern-day Congressmen. He calls out the bluff of Gandhi when he entered the Indian political scene claiming to get freedom in six months. He put some conditions to be able to do that and Hindu-Muslim unity was one of those conditions. Gandhi began his career in India on 2nd March 1919 call for Satyagrah which he quickly ended on 18th April 1919.

In his 23rd March 1919 Manifesto, Gandhi adds a call for Hindus and Muslims not to clash with one another, while Ambedkar says, there was no reason for this to be mentioned as the fight was against the British. He sears into the overdose of secularism which bordered on a clear case of appeasement which Gandhi brought in, while struggling to find a space for himself in Indian politics. To me, it seems much like the way modern-day Babas act to establish and expand their base.

Then Ambedkar writes about Khilafat which has long been presented to the students of history as something of a fight for independence of India. Ambedkar plainly writes that the objective of Khilafatwas two-fold: to preserve Caliphate and to maintain the integrity of the Turkish Empire. While it shows that India did not fit anywhere in the plans of Khilafat, Ambedkar says both the ideas were untenable. One, Turkish people themselves wanted Turkey to be a republic and even the Arabs did not want to live under the Caliphate.

He tears into the general perception that Non-Cooperation Movement was started as a nationalist movement to which the Muslims joined in in the name of Khilafat. Ambedkar writes that this is done by quoting special session of Congress in Calcutta on 7th and 8th of September, 1920. He then explains that Non-Cooperation was a tool of Khilafatists,which was adopted by the Congress. Khilafat started on 27th of October, 1919. On 23rd November, 1919, first Khilafat meeting was held and the proposal for non-cooperation was discussed.

On 10th of March, 1920, Khilafat adopted non-cooperation as a tool of opposition to the British. On 22nd June, 1920, Khilafatists notified the British warning them of Non-Cooperation unless Turkish matter is resolved before 1st of August, 1920. He thereby prove that rather than the Khilafatists joining the Congress, it was the Congress which joined them in the interest of Caliphate not in the interest of Swarajya.

This is not to say that Non-Cooperation was not Gandhi’s brain child. It was. Gandhi attended the first Khilafat’s first meeting and gave this proposal. Ambedkar says that this idea of inviting Gandhi to the meeting was to gain the support of Hindus for the cause of Turkish Caliphate. The notice of non-cooperation was given to the British on 1st July 1920, by Gandhi, not by the Khilafatists.

Next two month Gandhi toured the nation with Ali brothers, to build support for Non-Cooperation. Gandhi, tried to explain this alignment with Pan-Islamists as a way of getting their help to Hindu cause. He wrote in Young India on 20th October, 1921, opposing Modern Review article which claimed that while Ali Brothers were touring in favor of Caliphate, Gandhi was touring for Swarajya-

“I claim that with us both the Khilafat is the central act, with Maulana Mahomed Ali because it is his religion, with me because, in laying down my life for the Khilafat, I ensure safety of the cow, that is my religion, from the Musalman’s life.”

Ambedkar then explains that this was a fake position Gandhi put forth. He goes back and explains that when Muslims sought support of Hindus for the Turkish cause, Hindus were divided in three factions. The first faction opposed Non-Cooperation on principle, the second was willing to come around and support provided Muslims agreed to stop cow slaughter and the third was worried if the success of movement might lead to invasion of India from Afghanistan.

On 10th December, 1919, Gandhi urged Hindus to not bring the Cow slaughter issue, stating the test of friendship is assistance in adversity, and that too, unconditional assistance… I do not want to make the stopping of cow-killing a condition precedent to co-operation.” And then we find Ambedkar admitting which many misguided woke found in Anti-CAA protests as well, when there were riots in Delhi, internal conflicts with secularists and Delhi Minority Commission Chief threatened inviting Islamic nations to invade India.

He quotes Gandhi from Young India, 4th May, 1921, admitting that Muslims were getting impatient when he wrote that “In their impatient anger, the Musalmans ask for more energetic and more prompt action by the Congress and Khilafat organizations.” What went worse was the action Muslims took. Ambedkar writes: The Muslims were not prepared to wait for Swaraj. They were in a hurry to find the most expeditious means of helping Turkey and saving the Khalifat…They invited the Amir of Afghanistan to invade India.

While the project did not succeed, Ambedkar sticks out his neck to claim that- In his (Gandhi’s) misguided zeal for Swaraj and his obsession on Hindu-Moslem unity, as the only means of achieving it, led him to support the project. Gandhi thundered that – “I would, in a sense, certainly assist the Amir of Afghanistan if he waged war against the British Government.”

Ambedkar than questions aloud – Can any sane man go so far for the sake of Hindu-Moslem unity? But Mr Gandhi was so attached to Hindu-Moslem unity that he did not stop to enquire what he was really doing in this mad endeavor. Ambedkar also refers to the Muslim appeasement policy when he write that Gandhi has never called the Muslims to account even when they have been guilty of gross crimes against Hindus.

Ambedkar writes quoting the murder of Swami Shraddhanand and others, that while number of Hindus murdered is not important what is important is that the leading Muslims never condemned these acts. Ambedkar writes that Gandhi even condoned large-scale Moplah violence when he said- ‘brave God-fearing Moplahs who were fighting for what they consider as religion and in a manner which they consider as religious and that the Hindus must have the courage and faith to feel that they can protect their religion in spite of such fanatical eruptions.

Congress resolution on the matter was watered down to mention in the end that the provocations beyond endurance was given to the Moplahs and the reports published were exaggerated. Then Dr. Ambedkar lists out the numerous riots to bring home the point about failure of all these efforts by Gandhi to bring communal unity by appeasing one of the community. Ambedkar then proceeds to make the case for Partition, explaining the reason of incompatibility of Muslim community in tolerant co-existence with competing faith (I think, I agree more with Savarkar who thought it possible).

He mentions the status of women in Muslim society, about Purdah, about acceptance of slavery in Islam. He writes “The Muslims have no interest in politics as such. Their predominant interest is religion (wasn’t Tharoor boo-ed in Shaheen Bagh on charge of secularism). The Muslim constituency does not care to examine the programme of the candidate. All that the constituency wants from the candidate is that he should agree to replace the old lamps of the Masjid by supplying the new ones at his costs, to provide a new carpet for the Masjid or to repair the Masjid because it has become dilapidated.

He says that while there are social evils among Hindus, some of them are conscious of their existence and agitate for their removal. The Muslims, on the other hand, do not realize that they are evil and do not therefore agitate for their removal. He calls Muslims all over the world as unprogressive people. He quotes Renan thatthe Mussalman, remaining faithful to his religion, has not progressed; he has remained stationary in a world of swiftly moving modern forces.

Ambedkar tries to analyze the mind of Indian Muslim and writes that Muslim mind is always feeling that the Hindus around him are encroaching upon him and de-Mussalmanising him. There are other things, very factual and deeply analytical, Ambedkar wrote about the difficulties on Hindus and Muslims being in a unified nation, the financial and security-related advantages of partition. However, these excerpts are enough to show the truth of Gandhi and Savarkar in Partition in the writings of Ambedkar and his own views about Partition.

This goes against the contrived narrative of mendacity, falsehood and conspiracy built by the leftist media in connivance with a Islamist supremacist mob to twist the truth of Ambedkar to ensure the headcount in the name of Dalit-Muslim unity only to bring down a numerically superior but largely secular and unsuspecting Hindu population. The truth is that the only religion working against this nation is that of Marx and Mao.

“Not everything that is faced can be changed. But nothing can be changed until it is faced.” – James Baldwin

Source-OpIndia
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कुरान का विचित्र विज्ञान

कुरान का विचित्र विज्ञान

1) – सूरज दलदल में ड़ूबजाता है.”यहाँतक कि वह सूर्यास्त की जगह पहुँच गया,उसने देखा कि सूरज एक काले कीचड़ (muddy spring ) में ड़ूब रहा था.सूरा.अलकहफ़ (कुरान 18 :86)

2) – अल्लाह ने प्रथ्वी को ठहरा रखा है.”वहकौन है,जिसने प्रथ्वी को एक स्थान पर ठहरा दिया है. (made the earth fixed ) सूरा -अन नमल ( कुरान27 :61)

3) – धरती झूलती रहती है.”वही है जिसने तुम्हारे लिए धरती को पालना बनाया (resting झूला)सूरा – अज जुखुरुफ (कुरान 43 :10)

4) – धरती फैलायी जा सकती है. “और धरती को जैसा चाहा फैलाया(spread the earth) सूर -अस शम्श (कुरान 91 :6)

5) रात और दिन लपेटे जा सकते है और वह रात को दिन पर लपेटता है एवं दिनको रात पर लपेटता है.सूरा – अज जुमुर (कुरान39 :5)

6) – वही है जिसने तुम्हारे लिए जमीन को फर्श और आसमान को छत बनाया,और आकाश से पानी उतारा। (कुरान 2:22)

7) अल्ला ने आकाश को धरती पर गिरने से रोक रखा है (कुरान 22:65) भाई आकाश क्या है? कोई छत या दिवार है क्या?

8) अल्ला ने आकाशको बनाया फ़िर उसकी उचाई खूब उचाकरके उसे ठिक ठाककिया (कुरान 79:28)

9)निश्चय ही इसके लिए (चंद्रमा पर जाने के लिए ) तुम्हें एक केबाद एक सीढी चढ़ना पड़ेगीं “सूरा -इन शिकाक (कुरान 84 :18)

10) अल्लाह ने कहा कि ,हे मनुष्य औरजिन्नों के समूहों यदि तुम में सामर्थ्य हो तो ,इस धरती कीपरिधि से निकल कर आकाश की सीमा में प्रवेश करके अन्दरघुसकरआगे निकल जाओ ” सूरा -रहमान (कुरान55:33)

11) न तो तुमधरती की सीमा से बहार निकल सकते हो,और न आकाश कीसीमा में प्रवेश कर सकते हो “सूरा – अनकबूत (कुरान29:22)

12) जब आकाशकी खाल उतार ली जाएगी (कुरान81:11)

13) अल्ला नेआकाश को बिना पिलर के उचा उठाया है (कुरान13:2)

14) कयामत के दिनअल्ला आकाश को ऐसे लपटेगा जैसे किताब को पन्ने मे लपेटतेहै (कुरान 21:104)

15)अल्ला चाहे तो आकाश के टूकडे गिरा दे (कुरान34:9)

Source-Facebook
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Some aspects of Vedic Dharma and Culture

Some aspects of Vedic Dharma and Culture

by SL Sharma ( Bangalore Arya Samaj )

An Arya is any person who believes in and worships the one true God, who lives according to the teachi…ngs of the Vedas, who follows the dictates of Dharma, and who strives to spread the Light of Truth to all people. Being an Arya is a spiritual and moral condition of an individual, and is in no way determined by external factors such as race or nationality. An Arya is a person who is, above all else, devoted to Truth.

An Arya worships and communes with the one true God daily through the performance of Sandhya and Agnihotra and lives according to the 10 Principles of Dharma (righteousness), namely: steadfastness (dritih), tolerance (kshamaa), contentment (damah), non-covetousness (asteyam), cleanliness (showcham), restraint of the senses (indriya nigrahah), practice (dheeh), knowledge (vidyaa), truth (satyam) and benevolence (akrodhah). An Arya does not consume meat, use intoxicants or recreational drugs of any kind, or indulge in sex outside of marriage.

God Soul And Nature

According to Vaidika Dharma, God (OM), the Soul (Purusha) and Nature (Prakriti) are the 3 Eternal Noumena, meaning that they have always existed and will forever continue to exist. Though later thinkers developed a number of varying metaphysical positions, the philosophy of the Vedas, the original Divine Revelation, clearly posits the beginningless existence of God, the Soul and Nature – an eternal truth that has come to be referred to as Traita or Traitavada, meaning the ‘Wisdom of the Three’.
However, though God, the Soul and Nature are three distinct entities, they are at no time completely separate from one another. The relationship between God and Creation is that between the Pervader and that which is pervaded, respectively. God fills and pervades every corner of existence, including the eternal Soul of man.
The relationship between God and man, therefore, is more intimate than any other relationship an individual shall ever experience. Indeed, God knows all our thoughts and desires, our hopes and dreams, our fears and worries. He is our Eternal Father, our Highest Master, our True Friend, Teacher and Guide in one.

The Purusharthas:
The Ends of Noble Society

The Purusharthas are the goals of earthly life. It is towards these ends that any noble society strives. They are four in number:
1. Dharma or Duty: This is the state in which one’s actions, serving the good of all, are in accordance with one’s own nature. Thus, to practice Dharma is to establish congruence and harmony between one’s inner and outer life.
Swami Dayanand on Dharma: “The practice of equitable justice together with that of truthfulness in word, deed and thought and the like (virtues) – in a word, that which is in conformity with the Will of God, as embodied in the Vedas – even that I call Dharma (righteousness). But the practice of that which is not free from partiality and injustice as well as of untruthfulness in word, deed and thought, – in a word, that which is opposed to the Will of God, as embodied in the Vedas – even that I term Adharma (unrighteousness).” (Satyarth Prakash 726)
Dharma is the fundament of the Purusharthas, for without it, none of the others can be attained with righteousness. And a good attained without righteousness is paramount to a positive evil.
2. Artha or Wealth: This is the attainment of wealth in any form (material or spiritual) through righteous means and the avoidance of goods gained through ignoble means.
Swami Dayanand on Artha: “Righteously acquired wealth alone constitutes Artha, while that which is acquired by foul means is called Anarth.” (Satyarth Prakash 728)
3. Kaama or Enjoyment: This is the attainment of satisfaction of one’s noble and righteous desires and the pleasure derived thereof.
Swami Dayanand on Kaama: “The enjoyment of legitimate desires with the help of honestly-acquired wealth (Artha) constitutes Kaama.” (Satyarth Prakash 728)
4. Moksha or Salvation: This is the attainment of freedom from the bonds of ignorance and its result, pain.

Swami Dayanand on Moksha: “The emancipation of the soul from pain and suffering of every description and a subsequent career of freedom in the All-pervading God and His immense Creation for a fixed period of time and its resumption of earthly life after the expiration of that period constitute Moksha or salvation. The means of salvation are the worship of God, i.e., the practice of yoga, the performance of righteous deeds, the acquisition of true knowledge by the practice of Brahmacharya, the society of the wise and the learned, love of true knowledge, purity of thought, a life of activity and so on.” (Satyarth Prakash 727)
Just as Dharma is the foundation of the Purusharthas, so, too, is Moksha the pinnacle of the same. To attain Moksha is to reach life‘s ultimate goal, which goes beyond even the bounds of earthly life, and leads one into a state of unbroken communion (Upaasanaa) with God.
It is important to note that Vedic Wisdom does not entail a life of mendicancy or severity. As long as one follows the dictates of Dharma, one is encouraged to enjoy the good things of this earthly life. God, in His Infinite Wisdom, has seen it fit to grant us the ability to experience great happiness and pleasure while on this earth, and we are encouraged to seek it out through righteous means.

Ashrama:
The 4 Phases of Life

Vedic Wisdom teaches that each individual goes through certain phases during the course of life, and that each of these phases should provide the opportunity to master the knowledge and skills required for making real progress toward the attainment of the Purusharthas. The systematic organization of these phases, known as Ashrama, foresees three main segments in the life of man.
1. Brahmacharya or Student Life: This is the stage of life in which the child receives a solid education in Vaidika Dharma, including the sciences and the arts. It entails living a celibate and simple life, free from the distractions of sensuality and materialism, hearing and studying the Vedas, and developing virtuous qualities such as discipline, purity in thought, word and deed, cleanliness, humility, etc.
Swami Dayanand on the purpose of Brahmacharya: “Brahmacharya (or the 1st stage of life) is meant for perfecting one’s body and acquiring knowledge and culture.” (Satyarth Prakash 159)
Brahmacharya is the foundation of the noble life, for it imparts the knowledge of one‘s proper place and function in society and in God‘s creation, as well as training in skills one will make use of in all the subsequent stages of life.
2. Grihastha or Household Life: This is the stage of life in which the individual learns and practices a profession suited to their nature, i.e., their natural gifts and talents. It is also the stage in which a person usually gets married and starts a family, and entails the careful observance of prescribed duties and Yajnas or ritual sacrifices.
Swami Dayanand on the purpose of Grihastha: “Grihastha (or the 2nd stage of life) is for the pursuit of useful occupation and professions, marriage, etc.” (Satyarth Prakash 159)
In many ways, Grihastha is the pillar of all the other phases of life, as Householders are the ones who support both children and the elderly on the one hand, as well as temples and priests on the other.
3. Vaanaprastha or Retired Life: This is the stage of life in which the individual, having fulfilled his duties to his children and his community, withdraws from his professional role in society, making way for the next generation, and turns his attention inward, devoting himself more fully to the practice of yoga and the search for divine wisdom.
Swami Dayanand on the purpose of Vaanaprastha: “Vaanaprastha (or the 3rd stage of life) is for meditation, concentration of the mind on abstruse subjects, the perfection of one’s character and the acquisition of divine knowledge.” (Satyarth Prakash 159)
For most people, this stage represents the culmination of all their efforts. They have the freedom to spend the remainder of their days absorbed in the contemplation and worship of God and in altruistic actions. However, for Braahmanas, there is one additional stage which can be taken as an option.
4. Sanyaasa or Renounced Life: This is the stage of life in which the individual renounces all ties to worldly existence, focusing all his energy upon the propagation of Vedic Wisdom and the teaching of the same to others.
Swami Dayanand on the purpose of Sanyaasa: “Sanyaasa (or the 4th stage of life) is meant for disseminating knowledge of the Veda and the Shaastras, practicing virtue and renouncing vice, preaching the gospel of truth and dispelling doubts and ignorance of the people. … Therefore, it behooves Sanyaasis to devote themselves assiduously to the preaching of Truth and enlightening the minds of the people who are in doubt, to the studies of the Vedas and the Shaastras and the propagation of the Vedic religion, thereby promote the good (physical, social, mental and spiritual) of the whole world.” (Satyarth Prakash 159)
Braahmanas may also go directly from Brahmacharya to Sanyaasa, as they are alone qualified through knowledge and piety to execute the duties of a true Sanyaasi, and as it is sometimes the case that they have little if anything left to learn from the stages of Grihastha and Vaanaprastha.

Varna:
The Classes of Society

Vedic Wisdom teaches that every individual is unique in their constellation of strengths and weaknesses, making them suited for a particular type of work and a certain position in society. Vedic Society is divided into four classes or Varnas.
1. Shudras: These are the artisans and manual laborers. They are gifted with dexterity, endurance and great skill in producing manual works of all sorts which are necessary for the healthy functioning of any society. Shudras enjoy greater freedom of movement and employment than the other classes, as they are not required to be financially self-sufficient and are allowed to take on work from others as they choose.
2. Vaishyas: These are the farmers, merchants and business owners. It is their duty to make sure that society is supplied with all of the goods it requires for it‘s proper functioning. Though they often have more wealth than members of other classes, Vaishyas are faced with the responsibility of maintaining their businesses and taking care of their employees. However, a Vaishyas is gifted with business savvy and enjoys the challenges running a successful enterprise entails.
3. Kshatriyas: These are the soldiers, police officers and public administrators. It is their duty to ensure the safety and smooth running of society. Though granted political power, they have the responsibility of using that power wisely and fairly, making sure that justice and the rule of law prevails. Kshatriyas are gifted with great strength and determination in order to execute their duties as the protectors of society, and they are not infrequently called upon to make the greatest sacrifice – that of their own life for the good of society.
4. Braahmanas: These are the intellectuals, teachers and priests. It is their duty to ensure that society as a whole is headed in the right direction – towards the fulfillment of the Purusharthas. To do this, they are required to study and teach the Vedas, to perform sacrifices for the benefit of all, and to live a simple and frugal life, devoted to preaching the Truth.
It is absolutely vital to recognize that Varna is not based upon birth or heredity, but on the nature and merits of the individual. Swami Dayanand proclaims: “The Class and Order of an individual should be determined by his merits alone.” (Satyarth Prakash 728) The caste system as it is known in India today is a perversion of Varna, and should be denounced by all noble individuals as the source of grave social injustice.

The Sanskars:
The 16 Sacraments of Life

In the Vedic Tradition, there are sixteen religious ceremonies known as Sanskars or the Sacraments of Life. The Sanskars are performed for the physical, social, and spiritual development of the individual. These are:

1. Garbhadhana: Performed shortly after the conception of a child, to ensure a healthy beginning for the new life.

2. Punsavana: Performed during the second or third month of pregnancy, to ensure the healthy development of all the extremities and vital organs of the fetus.

3. Simantonnayana: Performed during the last phases of pregnancy, to ensure the correct functioning of all the sensory organs and to bring the development of the fetus to a successful close.

4. Jatakarma: Performed after the birth of the child, to welcome the newborn as a new member of society.

5. Namakarana: Performed on the 11th or 12th day after birth, to give the child the name he or she will forthwith be known by.

6. Niskramana: Performed when the child is 2 to 4 months old, to invoke God’s protection and blessings as the child leaves the home for the first time.

7. Annaprasana: Performed when the child is 4 to 6 months old, to celebrate the child’s first consumption of solid food.

8. Chudakarma: Performed when the child is 1 year old, to support the development of self-awareness and autonomy in the child.

9. Karnavedha: Performed when the child is 3 to 5 years old, to support the development of self-esteem and self-respect.

10. Upanayana: Performed when the child is 5 to 7 years old, to celebrate the entrance of the child into the institution of formal education and the investment with the sacred thread, signalling the beginning of Brahmacharya or Student Life. Also known as Yajnopaveet.

11. Vedarambha: Performed when the child is 5 to 7 years old, to solidify the commitment of the child to receiving a good education.

12. Samavartana: Performed upon the completion of studies, to welcome the young adult as a valued member of society, ready to embark on the next stage of life, known as Grihastha or Household Life.

13. Vivaha: The marriage ceremony (usually undertaken around 25 years of age), to celebrate the happy union of the individual with a spouse of their choice who is suited to their nature and ready to embark upon Household Life.

14. Vaanaprastha Ashram: Undertaken upon retiring from one’s chosen profession (usually between 50 and 75 years of age), to celebrate the completion of the duties of Household Life and the entrance into the phase of reflection and meditation known as Vaanaprastha Ashram.

15. Sanyaasa Ashram: Undertaken either after the completion of Brahmacharya (Student Life) or Vaanaprastha (Retired Life), to celebrate the renunciation of all worldly desires and absolute dedication to the service of mankind through spreading Vedic Wisdom.

16. Antyesti: Performed upon the death of the individual, when the body is consumed by fire and it’s constituent elements are returned to Nature. This is the last ceremony. Also known as Antyesti, Naramedha and Purusmedha.

Pancha Mahayajnas:
The 5 Great Daily Duties

Aryas are enjoined to perform 5 duties on a daily basis. The performance of the 5 Great Daily Duties (Pancha Mahayajnas) ensures that the individual maintains a righteous relationship to all those he or she comes into contact with. These are:
1. Brahma Yajna: The contemplation of and communion with God (Sandhya) twice daily, morning and evening.
2. Deva Yajna: The burning of Samagree (odoriferous, nutritive, sweet, curative, and similar other substances) with Ghee (clarified butter) in the sacred fire, also called Homa, or the Agnihotra.
3. Pitri Yajna: The ministering to the comfort of the elders, the wise and the learned, as well as serving the same individuals with love and faith.
4. Balivaishva Yajna: The feeding and support of poor and destitute individuals, as well as that of wild animals.
5. Atithi Yajna: The discharge of hospitality to guests, especially towards individuals who are wise and learned, whose time of arrival and departure is unknown.
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उत्तरपथसेग्रांटट्रंकरोड

—————– #झूठे_इतिहासकार ——————

————– #उत्तरपथसेग्रांटट्रंकरोड ————–
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इतिहास विजेता की कलम लिखती है और वही लिखती है जो वो चाहता है , लेकिन ये प्रश्न हमेसा रहेगा कि स्वतंत्र भारत का इतिहास जब लिखा जा रहा था तो झूठे प्रतिमान क्यों गढ़े गए ??

रोमिला थापर ;एक वामपंथी इतिहासकार हैं तथा उनके अध्ययन का मुख्य विषय “प्राचीन भारत का इतिहास” रहा है। पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज से ए.एल. बाशम के मार्गदर्शन में 1958 में डॉक्टरेट(वाचस्पति) की उपाधि प्राप्त की। वह 1983 में भारतीय इतिहास कांग्रेस की जनरल प्रेसिडेंट और 1999 में ब्रिटिश अकादमी की कॉरेस्पोंडिंग फेलो चुनी गई थीं। क्लूज पुरस्कार (द अमेरिकन नोबेल) पाने के साथ उन्हें दो बार पद्म विभूषण पुरस्कार की पेशकश की गई, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार करने से मना कर दिया।

यह उन्हीं कथित बुद्धिजीवियों में से एक हैं ,जिन्होंने इतिहास को अपने राजनीतिक पूर्वाग्रहों व औपनिवेशिक विचारधाराओं के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। पुराने घटनाक्रमों का वही विश्लेषण स्वीकार किया गया जो साम्यवादी और वामपंथी इतिहासकारों को पसंद थे। उनकी मूल स्थापनाएं ही विकृत तथ्यों से भरी थी और इन्होंने प्राचीन भारत के ऐतिहासिक घटनाक्रमों को व्यवस्थित रूप से कभी पेश नहीं किया। रोमिला थापर हों या इरफान हबीब या रामशरण शर्मा या उनके जैसे अनेक वामपंथी विचारक प्राचीन इतिहास के श्रोता की विश्वसनीयता का मखौल उड़ाने से कभी नहीं चूकते थे।

रोमिला थापर उन इतिहासकारों में से एक है ,जिन्होंने इस देश की अगली पीढ़ी के लिए एक ऐसा इतिहास लिखा और अपने साथी इतिहासकारों से भी लिखवाया कि आज के युवा अपने देश की कम और आक्रांताओं का इतिहास ज्यादा जानते है। इन सभी ने एक ऐसे इतिहास को लिखा ,जिसे पढ़ने के बाद अगली पीढ़ी हीन भावना से ग्रसित हो और उसे रामायण और महाभारत एक कहानी लगे।

झूठे प्रतिमानों का पुलिंदा आज से तथ्यों और तर्कों की रोशनी में खोला और खंगाला जाएगा …….

ग्रांड ट्रंक रोड और शेर शाह शूरी –

ग्रैंड ट्रंक रोड, दक्षिण एशिया के सबसे पुराने एवं सबसे लम्बे मार्गों में से एक है। दो सदियों से अधिक काल के लिए इस मार्ग ने भारतीय उपमहाद्वीप के पूर्वी एवं पश्चिमी भागों को जोड़ा है। यह हावड़ा के पश्चिम में स्थित बांगलादेश के चटगाँव से प्रारंभ होता है और लाहौर (पाकिस्तान) से होते हुए; अफ़ग़ानिस्तान में काबुल तक जाता है। पुराने समय में इसे, उत्तरपथ ,शाह राह-ए-आजम,सड़क-ए-आजम और बादशाही सड़क के नामों से भी जाना जाता था। और आप ने भी यही पढा होगा कि इस सड़क का निर्माण शेर शाह शूरी ने करवाया था ।

लेकिन क्या ये सच है???? आइये तथ्यों और तर्कों की रोशनी में देखते हैं ।

प्राचीन भारत के दो प्रमुख मार्ग थे, उत्तरपथ और दक्षिणपथ था।प्रथम था उत्तरमार्ग ,पुराणों में कैकेय वासियों को गंधर्व, यवन, शक, परद, बाह्लीक, कंबोज, दरदास, बर्बर, चीनी, तुषार, पहलव आदि की गिनती में जोड़ा गया है। इन्हें #उदीच्य के लोग कहा गया है। उदीच्य यानि उत्तरपथ की उत्तरी मंडल । केकैय ने वर्तमान झेलम, शाहपुर और गुजरात (पाकिस्तान) के क्षेत्रों में निवास किया था। मार्ग वही जो आज की ग्रांड ट्रंक रोड है, इसका उल्लेख महाभारत से ही मिलता है । मौर्य साम्राज्य के शिलालेख , अभिलेखों में भी इस पथ का स्पष्ट उल्लेख है । दूसरा मार्ग दक्षिणापथ था, जो तमिलनाडु तक जाता था। दोनों मार्गों का उपयोग व्यापार, धर्म और लोगों के लिए किया जाता था। ये दोनों ही मार्ग का केंद्र इलाहाबाद और वाराणसी के बीच था ,जहाँ ये दोनों मार्ग जुड़ते थे।

उत्तरापथ ,सिर्फ एक भूमि मार्ग नहीं था; क्योंकि इस मार्ग का जुड़ाव नदियों से जुड़े क्षेत्रों से था। ये मार्ग गंगा नदी के किनारे की बगल से होते हुए, गंगा के मैदान के पार, पंजाब के रास्ते से तक्षशिला को जाता था। इस रास्ते का पूर्वी छोर तमलुक में था ,जो गंगा नदी के मुहाने पर स्थित एक शहर है। भारत के पूर्वी तट पर समुद्री बंदरगाहों के साथ समुद्री संपर्कों में वृद्धि की वजह से मौर्य साम्राज्य के काल में इस मार्ग का महत्व बढा और इसका व्यापार के लिए उपयोग होने लगा। बाद में, उत्तरापथ शब्द का प्रयोग पूरे उत्तर मार्ग के प्रदेश को दर्शाने के लिए किया जाने लगा।

कई राजवंश आये और गये और हर नए राज में इस मार्ग में बदलाव किये गये ,लेकिन इस मार्ग का महत्व किसी भी शासन के लिए कम नहीं हुआ क्योंकि किसी भी शासक के पास ग्रैंड ट्रंक रोड के अलावा और कोई बेहतर विकल्प नहीं दिखा। उत्तरपथ और दक्षिणापथ का उल्लेख प्राचीन संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों में किया गया है क्योंकि इस मार्ग का धार्मिक महत्व भी था। गौतम बुद्ध ने अपने पहले उपदेश के लिए सारनाथ स्थान को चुना था ,कारण; ये दोनों ही मार्गों का केंद्र बिंदु था। समृद्ध व्यापारियों, नौकरशाहों और शाही सदस्य अक्सर इस जगह पर जाते थे, इसलिए समाज के प्रभावशाली सदस्यों के बीच नए विचारों को लोकप्रिय बनाने के लिए ये सबसे अच्छी जगह थी। उत्तरापथ उत्तर-पश्चिम भारत में चला गया, भारत-गंगा मैदानों को पार कर बंगाल की खाड़ी में ताम्रलिप्ति बंदरगाह से जुड़ गया। यक्ष उत्तरापथ के व्यापारियों के लिए देवता था और इस मार्ग पर उनकी बड़ी मूर्तियां प्राप्त हुई हैं।

#विशेष – आज ग्रैंड ट्रंक रोड 2,500 किलोमीटर (लगभग 1,600मील) से अधिक की दूरी तक है। इसका प्रारम्भ दक्षिण बंगाल के चटगांव से है। मध्य बंगाल के सोनारगाँव से होते हुए यह भारत में प्रवेश करती है और कोलकाता, बर्धमान, दुर्गापुर, आसनसोल, धनबाद, औरंगाबाद, देहरी, सासाराम, मोहानिया, मुग़लसराय, वाराणसी, इलाहाबाद, कानपुर, एटा, आगरा, मथुरा, दिल्ली, करनाल, अम्बाला, लुधियाना, जालंधर, अमृतसर होते हुए जाती है। इसका मुख्य व्यस्त भाग दिल्ली और कोलकाता के बीच है। यहाँ पर यह NH-2 (राष्ट्रीय राजमार्ग-2) के नाम से जानी जाती है और दिल्ली – वाघा बार्डर के बीच यह NH-1(राष्ट्रीय राजमार्ग 1) के नाम से जाना जाता है।

पाकिस्तान सीमा से ग्रैंड ट्रंक रोड N-5 लाहौर, गुजराँवाला, गुजरात, झेलम, रावलपिंडी अटोक ज़िले से होते हुए पेशावर तक जाती है। इसके बाद यह अफ़ग़ानिस्तान में प्रवेश करती है और पश्चिम में जलालाबाद से होकर क़ाबुल में खत्म हो जाती है। वर्तमान में ग्रैंड ट्रंक रोड का यह भाग अफ़ग़ानिस्तान में जलालाबाद- काबुल रोड के नाम से जाना जाता है ।

जो पहले से ही अस्तित्व में है ,उसका निर्माण नहीं हो सकता है। पुनर्निर्माण या उद्धारीकरण जरूर हो सकता है , लेकिन जब आप ये बोलेंगे की शेर शाह शूरी ने ग्रांट ट्रंक रोड का पुनर्निर्माण करवाया तो आपको ये भी बताना पड़ेगा ;कि ये महाभारत काल से अस्तित्व में है। आपको फिर महाभारत के बारे में बताना पड़ेगा फिर भारत के गौरवशाली इतिहास के बारे में भी जिसका परिणाम होगा कि जो हीन भावना हमारे भीतर खुद के इतिहास को लेकर है वो खत्म हो जाएगी , तो न रहेगा बांस न बजेगी बाँसुरी ।
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ईश्वर कैसा है, कहाँ रहता है, उसका रंग कैसा है, कोई उसका रूप या हुलिया तो बताइये?

ईश्वर कैसा है, कहाँ रहता है, उसका रंग कैसा है, कोई उसका रूप या हुलिया तो बताइये?

प्रियांशु सेठ

जब तक इन बातों का ज्ञान न हो जाय, तब तक अपने प्रियतम को कैसे पहचाने? कैसे समझे कि हम किसके दर्शन कर रहे हैं या हमें दर्शन हो गए?

याज्ञवल्क्य ने एक बार गार्गी से कहा था-
“ब्रह्म के जाननेवाले उसे अक्षर, अविनाशी, कूटस्थ कहते हैं। वह न मोटा है, न पतला। न छोटा है, न लम्बा। न अग्नि की तरह लाल है। यह बिन स्नेह के है, बिना छाया के और बिना अंधेरे के है। न वायु है, न आकाश है। वह अप्रसंग है। रस से रहित, गन्ध से रहित है। उसके नेत्र नहीं, कान नहीं, वाणी नहीं, मुख नहीं, मात्रा नहीं।” -बृह० ३।७।७

“वह महान् है। दिव्य है। अचिन्त्य रूप है। सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर प्रतीत होता है। वह दूर से अधिक दूर है। तथापि यहां ही हमारे निकट है। देखनेवालों के लिए वह यहीं (हृदय की गुफा में) छिपा हुआ है।”
फिर इसी उपनिषद् (२।२।१) में लिखा है-

“वह हर जगह प्रकट है, निकट है। गुहाचर (हृदय की गुफा में विचरनेवाला) प्रसिद्ध है। वह एक बड़ा आधार है, जिसमें यह सब पिरोया हुआ है, जो चलता है, सांस लेता है और आंख झपकता है। यह सारा स्थूल और सूक्ष्म, जो तुम जानते हो, यह सब उसी में पिरोया हुआ है। वह पूजा के योग्य है। सबसे श्रेष्ठ है। प्रजाओं की समझ से परे है।”

वेदों में उसका वर्णन इस प्रकार है-

१.
एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुष:।
पादोअस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।। -ऋ० १०।९०।३; यजु० ३१।३।।

‘इतनी बड़ी (भूत, भविष्यत् और वर्तमान काल से सम्बद्ध जितना जगत् है, यह सारी) इस प्रभु की महिमा है और प्रभु स्वयं इससे बड़ा है। (तीनों कालों में होने वाले) सारे भूत इसका एक पाद है और इसका (शेष) विपाद जो अमृत एवं अविनाशी-स्वरूप है, वह अपने प्रकाश में है।”

प्रयोजन यह है कि उसकी तो कोई सीमा है नहीं। हां, कुछ दिग्दर्शन कराने के लिए कह दिया कि यह सारी दुनिया, ये सारे लोक, ये सारी पृथिवियाँ, ये सारे नक्षत्र इत्यादि, ये सब उसके एक पैर में आते हैं। बाकी तीन पैर अभी और हैं।

२.
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:।। -ऋ० १।१६४।४६।।

“उस एक शक्ति को अनेक रूपों में वर्णन करते
हैं; इन्द्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं। वही दिव्य सौन्दर्य का
भण्डार है। उसी प्रकाशस्वरूप प्रभु को यम और मातरिश्वा कहते हैं।”

३.
तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमा:।
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ता आप: स प्रजापति:।। -यजु० ३२।१।।

“वही अग्नि, वही आदित्य, वही वायु, वही चन्द्रमा, वही शुक्र, वही ब्रह्म, वही जल और वही प्रजापति है।”

४.
य: पृथिवीं व्यथमानामदृंहद्य: पर्वतान् प्रकुपितां अरम्णात्।
यो अन्तरिक्षं विममे वरीयो यो द्यामस्तभ्नात् स जनास इन्द्र:।। -ऋ० २।१२।२।।

“जिसने (आदि में पिघली हुई होने के कारण) लहराती हुई पृथिवी को दृढ़ जमा दिया और जिसने प्रकुपित हुए (आदि में अग्नि-वर्षण करते हुए) पर्वतों को शान्त किया, जिसने अन्तरिक्ष को बड़ा विशाल बनाया, जिसने द्यौ को धारण किया, हे मनुष्यों! वही शक्तिशाली प्रभु है।”

५.
यं स्मा पृच्छन्ति कुह सेति घोरमुतेमाहुर्नैषो अस्तीत्येनम्।
सो अयं पुष्टीर्विज इवा मिनाती श्रदस्मै धत्त स जनास इन्द्र:।। -ऋ० २।१२।५।।

“जिसके विषय में पूछते हैं वह कहाँ है और कई यहां तक कह देते हैं कि वह नहीं है, वही है जो कि भयंकर बनकर ऐसे शत्रुओं (घमण्ड में उनकी प्रजा की पीड़ित करनेवालों) की पुष्टियों को शक्तियों की तरह मरोड़ डालता है, उसके लिए श्रद्धा रखो। हे मनुष्यों, वही शक्तिशाली प्रभु है।”

६.
यो रघ्रस्य चोदिता य: कृशस्य यो ब्रह्मणो नाधमानस्य कीरे:।
युक्तग्राव्णो योअविता सुशिप्र: सुतसोमस्य स जनास इन्द्र:।। -ऋ० २।१२।६।।

“जो दीन-दुःखियों को हिम्मत बंधाता है, जो विपद्ग्रस्त भक्त की पुकार सुनता है, जो यज्ञमय जीवन-धारियों का प्रतिपालक है, लोगों!वही सुन्दर और छबीला देव इन्द्र है।”

७.
यस्य भूमि: प्रमान्तरिक्षमुतोदरम्।
विवं यश्चक्रे मूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नम:।। -अ० १०।७।३२।।

“भूमि उसकी पाद-प्रतिष्ठा है। अन्तरिक्ष उसका उदर है। द्युलोक उसका माथा है। उस परम ब्रह्म को प्रणाम हो!”

८.
यस्य सूर्यश्चक्षुश्चन्द्रमाश्च पुनर्णव:।
अग्निं यश्चक्र आस्य तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नम:।। -अ० १०।७।३३।।

“सूर्य और नित्य नया चन्द्रमा उसकी आंखें हैं, आग उसका मुख है। उस परम ब्रह्म को नमस्कार हो!”

९.
प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरदृश्यमानो बहुधा वि जायते।
अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्ध कतम: स केतु:।। -अ० १०।८।१३।।

“वह प्रजापति (सबके) अन्दर विराजमान है। वह दिखाई नहीं देता (पर) नाना प्रकार से प्रकट हो रहा है। सकल संसार उस (की शक्ति) के एक भाग का फल है। शेष भाग की क्या कहें? और कैसे कहें?”

१०.
यत: सूर्य उदेत्यस्तं यत्र च गच्छति।
तदेव मन्येअहं ज्येष्ठं तदु नात्येति किं चन।। -अ० १०।८।१६।।

“सूर्य उसी से उदय होता और उसी में लीन हो जाता है। सचमुच वही सबसे बड़ा है। उसके बराबर और कोई नहीं हो सकता।”

ऐसा ईश्वर रहता कहाँ है? कोई भी तो ऐसा स्थान नहीं, जहां वह न रहता हो। परन्तु उसके दर्शन हृदय ही में होते हैं। उपनिषद् ने उसका पूरा पता भी बता दिया है-

सर्वाननशिरोग्रीव: सर्वभूतगुहाशय:।
सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात्सर्वगत: शिव:।। -श्वेताश्वतर ३।११।।

“वह भगवान् सब ओर मुख, सिर और ग्रीवावाला है। सर्वव्यापी है और समस्त प्राणियों की हृदयरूपी गुफा में निवास करता है। इसलिए वह (शिव) कल्याण-स्वरूप प्रभु सब जगह पहुंचा हुआ है।”

अंगुष्ठमात्र: पुरुषोअन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्ट:।
हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति।। -श्वेताश्वतर ३।१३।।

“अंगुष्ठ-मात्र परिणामवाला अन्तर्यामी परम पुरुष (परमेश्वर) सदा ही मनुष्यों के हृदय में सम्यक् प्रकार से स्थित है। मन का स्वामी है तथा निर्मल हृदय और शुद्ध मन से ध्यान में लाया जाता है (प्रत्यक्ष होता है)। जो इस परब्रह्म परमेश्वर को जान लेते हैं; वे अमर हो जाते हैं।”

अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोअस्य जन्तो:।
तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातु: प्रसादान्महिमानमीशम्।। -श्वेता० ३।२०।।

“वह सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म और बड़े से भी बहुत बड़ा परमात्मा, जीव-हृदयरूपी गुफा में छिपा हुआ है। उस सबकी रचना करने वाले, प्रभु की कृपा से (जो भक्त) इस संकल्प-रहित प्रभु को और उसकी महिमा को देख लेता है, वह सब प्रकार के दुःखों से रहित हो जाता है।”

एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नात: परं वेदितव्यं हि किञ्चित्। -श्वेता० १।१२।।

“इसको जानो, जो सदा तुम्हारे आत्मा में वर्तमान है। इससे परे कुछ जानने योग्य नहीं है।”

शंकर भगवान् ने ‘शिवधर्मोत्तर’ से जो श्लोक आत्मदर्शन के सम्बन्ध में प्रमाण दिए हैं, उनमें से पहले श्लोक में यह लिखा है-
शिवमात्मनि पश्यन्ति प्रतिमासु न योगिन:।
“योगीजन शिव को अपने आत्मा में देखते हैं, न कि प्रतिमाओं में।”

यहां निम्न उदाहरणों द्वारा प्रश्नों का उत्तर देकर सरलतापूर्वक समझाने का प्रयत्न किया है।
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कन्या को दुहिता क्यो कहा जाता है?

🔥| आर्ष दृष्टि |🔥

🌷 कन्या को दुहिता क्यो कहा जाता है?

“निरूक्त में लिखा है कि कन्या का ‘दुहिता’ नाम इस कारण से है कि इसका विवाह दूर देश (स्थान) में होने से हितकारी होता है, निकट करने में नहीं |”

~~ स्वामी दयानन्द सरस्वती ( सत्यार्थ प्रकाश चतुर्थ समुल्लास )

वधू का अर्थ क्या होता है ?

वधू का अर्थ वर्धन करनेवाली किया जा सकता है।
वर्धन अर्थात बढ़ाना। स्त्री पुत्र पुत्रियों
को जन्म देकर वंश वृद्धि करती है।
इसलिए उसे वधू कहा जाता है।

वधू के घर में आते ही परिवार में हर्ष
की वृद्धि हो जाती है। पति को सुख मिलता है। सास ससुर को सुख मिलता है। मित्र रिश्तेदारों को सुख मिलता है। सबके सुखों में वृद्धि हो जाती है।

इसलिए पत्नी को वधू या बहू कहा जाता है।

पति का अर्थ क्या होता है?

पति रक्षति इति पतिः
जो पत्नी की हर तरह से रक्षा करता है
वह पति होता है।

पत्नी का अर्थ क्या होता है?

पत्नी का अर्थ है
पतनात् त्रायते इति पत्नी ।
अर्थात पति को जो पतन से बचाती है, उसे पत्नी कहा जाता है।

काम, क्रोध , मद , लोभ , मोह , ईर्ष्या , द्वेष आदि सप्त विकार ही मनुष्य के पतन का कारण बनते हैं।

स्त्री इन सब दोषों से पुरुष को बचाती है , इसलिए उसे पत्नी कहा जाता है।

स्त्री का क्या अर्थ है?

” स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ ” ( ऋग्वेद ८\३३\१९ ) स्त्री स्वयं विदुषी होते हुए अपनी सन्तान को सुशिक्षित बनाती है। ब्रह्म ज्ञान का अधिष्ठाता हैं। ब्रह्मा ही यज्ञों का संचालन करता है। वह ज्ञान- विज्ञान मे श्रेष्ठ होता है, अतः उसे यज्ञ में सर्वोच्च स्थान दिया जाता है, उसी प्रकार नारी को ज्ञान-विज्ञान में निपुण होने के कारण ब्रह्म बताया गया है ।

वेदों में नारी का गौरवमय स्थान इससे भी ज्ञात होता है कि नारी को ही घर कहाँ गया है-

जायेदस्तं मधवन्त्सेदु योनि स्तदित्वा युक्ता हरयो वहन्ति ।( ऋग्वेद ३\५३\४ )

अर्थात घर, घर नहीं है अपितु गृहिणी ही गृह है। गृहिणी के द्वारा ही घर का अस्तित्व है।यही भाव एक संस्कृत सुभाषित में कहाँ गया है कि गृहिणी ही घर है ” न गृहं गृहमित्याहु:, गृहिणी गृहमुच्यते “।

यही नहीं स्त्री को सरस्वती का रूप मानते हुए कहा गया —

प्रति तिष्ठ विराडसि, विष्णुरिवेह सरस्वती ।सिनीवालि प्र जायतां भगस्य सुमतावसत्।।( अथर्ववेद १४\२\१५)

हे नारी ! तुम यहाँ प्रतिष्ठित हो।तुम तेजस्विनी हो । हे सरस्वती! तुम यहाँ विष्णु के तुल्य प्रतिष्ठित हो।हे सौभाग्यवती नारी! तुम संतान को जन्म देना और सौभाग्य देवता की कृपा दृष्टि में रहना ।

मनु महाराज का कहना है —

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रा फला: क्रिया:।।

अर्थात – जहाँ नारियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं।जहाँ इनका सम्मान नही होता, वहाँ प्रगति, उन्नति की सारी क्रियाएं निष्फल हो जाती है ।
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ऋषि दयानन्द ने मत-मतान्तरों के सत्यासत्य की परीक्षा कर सत्य के ग्रहण करने का सिद्धान्त दिया”

“ऋषि दयानन्द ने मत-मतान्तरों के सत्यासत्य की परीक्षा कर सत्य के ग्रहण करने का सिद्धान्त दिया”
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ऋषि दयानन्द ने अपने ज्ञान व ऊहा से वेदों को सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों को सर्वव्यापक परमात्मा से प्राप्त सत्य ज्ञान के ग्रन्थ स्वीकार किया था। इस सिद्धान्त व मान्यता की उन्होंने डिण्डिम घोषणा की है। इसके पक्ष में उन्होंने उदाहरणों सहित एवं तर्क युक्त बातें विस्तार से अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘‘सत्यार्थप्रकाश” में प्रस्तुत की हैं। उन्होंने इससे जुड़ी अनेक शंकाओं को प्रस्तुतकर स्वयं उनका समाधान भी किया है। ऋषि ने बताया है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप एवं न्यायकारी सत्ता है। सच्चिदानन्दस्वरूप होने से ही वह सत्यस्वरूप एवं असत्य विचारों व व्यवहारों से सर्वथा रहित व दूर है। ईश्वर सत्याचरण करता है तथा अपने बनाये मनुष्यों को भी सत्य का आचरण करने की प्रेरणा करता है। जो सत्य का आचरण करते हैं वह जीवन में सुख व समृद्धि को प्राप्त होते हैं और जो सत्य के स्थान पर असत्य का आचरण करते हैं, उसका दण्ड ईश्वर उन्हें जन्म-जन्मान्तरों में देता है। हमारे ऋषियों ने सत्यासत्य की विवेचना कर सिद्ध किया है कि सत्य ही ग्राह्य एवं करणीय है तथा असत्य अग्राह्य एवं त्यागकरने योग्य है। ऐसा करने से ही मनुष्य की आत्मा सन्तुष्ट होती है तथा उसकी उन्नति होती है।

वेदों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि मनुष्य को ईश्वर में निहित सभी सत्य गुणों के अनुसार अपने जीवन व व्यवहार को बनाने का प्रयत्न करना चाहिये। इस विषय में वेदाध्ययन करते हुए इन बातों पर प्रकाश पड़ता है। ऋषि दयानन्द ने अपने सभी ग्रन्थों में इस विषय पर चिन्तन व मार्गदर्शन किया है। वेदों में मनुष्यों के सभी करणीय कर्तव्यों का विधान है तथा निषिद्ध कर्मों पर भी प्रकाश डाला गया है। मनुष्यों को अपनी आत्मा के ज्ञान व प्रेरणा के विपरीत कोई कार्य नहीं करना चाहिये। धर्म सत्य के आचरण तथा असत्य का त्याग करने को कहते हैं। धर्म एवं सत्य समानार्थक शब्द है। जो आचरण, व्यवहार व विद्या सत्य नहीं है, उसका मनुष्यों को त्याग कर देना चाहिये। ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थ में मत-मतान्तरों की अविद्या पर भी प्रकाश डाला है। अविद्या मानव जाति की व्यक्तिगत व संस्थारूप में शत्रु है। इससे उसे हानि होती है, लाभ नहीं होता। इसीलिए ऋषि दयानन्द ने अविद्या के नाश एवं विद्या की वृद्धि करने का नियम बनाया है। आश्चर्य है कि मत-मतान्तर हजारों वर्ष पुराने अपने धर्म ग्रन्थों की परीक्षा नहीं करते। वह बिना परीक्षा किये ही उसकी सत्यासत्य सभी बातों को सत्य स्वीकार कर लेते हैं। यह विज्ञान एवं यथार्थ वैदिक धर्म के सिद्धान्तों के विपरीत है। संसार में वैदिक धर्मी आर्यसमाज संगठन ही एक मात्र ऐसा आन्दोलन है जो धर्म विषयक प्रत्येक बात को सत्य की कसौटी पर कसता है और सत्य पायी जाने पर ही उसे स्वीकार करता व उसको करने की आज्ञा देता है। सृष्टि के आरम्भ से वैदिक धर्मी ऋषि-मुनि सत्य के ग्रहण व असत्य के त्याग का ही प्रचार करते रहे हैं। वेद भी सर्वत्र सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग की ही प्रेरणा करता है।

ऋषि दयानन्द के सन् 1863 में सामाजिक जीवन में प्रवेश करने से पूर्व विश्व में अनेक मत-मतान्तर प्रचलित थे जिनकी मान्यतायें सत्य-असत्य मिश्रित थी। ईश्वर विषयक सत्य ज्ञान मत-मतान्तरों वेदों के समान पूर्ण न होकर अधूरा था। वेद, उपनिषद तथा दर्शनों में ईश्वर विषयक जो विशद सत्य ज्ञान प्राचीन काल से उपलब्ध है उसका बहुत कम भाग मत-मतान्तरों में पाया जाता है। मत-मतान्तरों के अनुयायी मनुष्यों की अनेक परम्परायें भी बुद्धि व ज्ञान-विज्ञान के अनुकूल नहीं है। अतः ऋषि दयानन्द ने सामाजिक जीवन में प्रविष्ट होने के साथ असत्य का खण्डन तथा सत्य का मण्डन करना आरम्भ किया था। इस कारण से मत-मतान्तरों में प्रतिक्रिया स्वरूप उनका विरोध हुआ। ऋषि दयानन्द जो बातें कहा करते थे उनका प्रमाण मत-मतान्तरों के लोगों व आचार्यों के पास नहीं था। उनकी प्रत्येक बात के साथ न केवल वेदों का प्रमाण होता था अपितु वह उसे तर्क व युक्ति से भी सत्य सिद्ध करते थे। उनके सम्मुख जो विद्वान अपने पक्ष के समर्थन में चर्चा या शास्त्रार्थ करने आते थे, वह उनके तर्कों को सुनकर पराजित हो जाते थे। ऋषि दयानन्द का यह प्रभाव भी देखने को मिला कि बहुत से निष्पक्ष श्रोता उनके विचारों को सुनकर उनके मत को स्वीकार कर लेते थे। वह देश भर में घूम घूम कर प्रचार करते रहे जिससे सभी मतों के कुछ व अनेक बुद्धिमान लोग वेद व वैदिक धर्म की तर्क व युक्ति से सत्य सिद्ध मान्यताओं को स्वीकार कर वैदिक धर्म में प्रविष्ट होने लगे थे।

ऋषि दयानन्द के देश के अनेक भागों में धर्म प्रचार कार्यों के कारण ही अनेक मतों व अंग्रेज सरकार उनकी अप्रत्यक्ष रूप से विरोधी थी। इसके परिणाम स्वरूप ही उनका विष द्वारा प्राणान्त कर दिया गया। मृत्यु से पूर्व ऋषि दयानन्द ने वेदों की अधिकांश वा समस्त मान्यताओं का प्रकाश अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में कर दिया था। उन्होंने चार वेदों के भाष्य की भूमिका के रूप में एक ग्रन्थ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का प्रणयन भी किया। यह ग्रन्थ वैदिक साहित्य के प्रमुख व शीर्ष ग्रन्थों में से एक है। विदेशी विद्वान प्रो. मैक्समूलर ने इस ग्रन्थ को वैदिक साहित्य के प्रमुख ग्रन्थों में स्वीकार करते हुए कहा है कि वैदिक साहित्य का आरम्भ ऋग्वेद से होता है और समाप्ति ऋषि दयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पर होती है। ऋषि दयानन्द ने अन्य अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ और भी लिखे हैं। उन्होंने संस्कारविधि नाम से 16 संस्कारों के परिचय व उनकी विधि पर भी इस ग्रन्थ को लिख कर एक महान कार्य किया है। आर्याभिविनय भी ऋषि दयानन्द की ईश्वर की उपासना पर एक महत्वपूर्ण एवं लाभकारी ग्रन्थ है। ऐसा ग्रन्थ व इसके अनुरूप ज्ञान मत-मतान्तरों के किसी ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं होता। ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में जो बातें लिखी हैं वह सब अखण्डनीय हैं। इसके अतिरिक्त ऋषि दयानन्द के पत्र और विज्ञापन तथा शास्त्रार्थों के संग्रह सहित अनेक विद्वानों द्वारा लिखे गये उनके जीवन चरित्र, उनके उपदेश तथा आर्य विद्वानों के वैदिक विषयों पर सत्य के जिज्ञासुओं को ईश्वर, जीवात्मा व सृष्टि विषयक ज्ञान मिलता है जो कि अन्य किसी मत-मतान्तर के ग्रन्थों से प्राप्त नहीं होता। इस कारण से महर्षि दयानन्द के जीवन व उनके समग्र साहित्य का मानव जाति की उन्नति तथा संसार में शान्ति स्थापित करने की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है।

ऋषि दयानन्द ने सत्यासत्य की परीक्षा करने और सत्य के ग्रहण तथा असत्य के त्याग का आग्रह क्यों किया? इस पर विचार करने पर हमें ज्ञात होता है कि ऋषि को बाल्यकाल में 14 वर्ष की आयु में शिवरात्रि के दिन मूर्ति पूजा करते हुए शिवलिंग पर चूहों को अबाध क्रीड़ा करते देख उस मूर्ति की शक्ति पर संदेह हुआ था। उन्होंने अपने विद्वान पिता तथा अन्य सभी पुरोहित पण्डितों से मूर्ति की शक्ति पर प्रश्न किये थे जिसका उन्हें जीवन भर किसी से उत्तर नहीं मिला। इससे उन्हें लगा था कि मूर्ति व एक साधारण जड़ गुणो ंवाले पाषण में कोई अन्तर नहीं है। ईश्वर की जो शक्तियां हैं, उनका कोई चिन्ह व संकेत मूर्ति के किसी कार्य से नहीं होतां। इसके बाद के जीवन में सत्य की खोज करते हुए उन्हें अनेक धार्मिक मान्यताओं में असत्य मिश्रित होने का विश्वास हुआ था। अतः देश व विश्व के लोगों को असत्य व अंधविश्वासों से बचाने के लिये उन्होंने मत-मतान्तरों की सत्यासत्य मान्यताओं की परीक्षा पर बल दिया था। इसकी उन्होंने पूरी तैयारी की थी और मत-मतान्तरों की परीक्षा कर नमूने के तौर उनमें विद्यमान असत्य व अन्धविश्वासों को अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के अन्तिम चार समुल्लासों में समीक्षा सहित प्रस्तुत किया था। सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर मनुष्य को ऋषि दयानन्द के विचारों पर विश्वास हो जाता है। मत-मतान्तरों पर ऋषियों दयानन्द के आक्षेपों का आज तक कोई उत्तर नहीं मिला है। ऋषि दयानन्द एक स्थान पर यह भी कहते हैं कि सत्य का ग्रहण और उसी का आचरण करना ही मनुष्य व मनुष्य जाति की उन्नति का कारण होता है। मनुष्य जाति की उन्नति के लिये ही उन्होंने वेदों का प्रचार कर वेदों में निहित सत्य को देशवासियों के सम्मुख प्रस्तुत किया था। उनके इन प्रयत्नों का प्रभाव सभी मत-मतान्तरों पर पड़ा। प्रायः सभी मतों के आचार्यों ने अपने अपने मत की परीक्षा की और उनके बुद्धियुक्त उत्तर ढूंढने के प्रयत्न किये। यह ध्रुव सत्य है कि असत्य को सत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। इस कारण ऋषि दयानन्द आज भी विजित हैं एवं धर्म विषयक विश्व धर्म गुरु सिद्ध होते हैं। हम उनको सादर नमन करते हैं। ओ३म् शम।

-मनमोहन कुमार आर्य
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