वेद रक्षा कैसे की गई

वेद रक्षा कैसे की गई ?

क्या वेदों में मिलावट की जा सकती है ?
समाधान: वेद नित्य ईश्वर का नित्य ज्ञान है। इसलिए जिस रूप में वेद इस
कल्प में आज उपलब्ध होते हैं, उसी रूप में वे पिछले कल्पों में भी
अनादिकाल से ईश्वर द्वारा प्रकट किये जाते रहे हैं तथा भविष्य में आने
वाले अनंत कालों में भी वे इसी रूप में प्रकट किये जाते रहेंगे। स्वामी
दयानंद इस विषय को स्पष्ट रूप से लिखते हैं कि ‘जैसे इस कल्प की सृष्टि
में शब्द, अक्षर और सम्बन्ध वेदों में है, इसी प्रकार से पूर्व कल्प में थे और
आगे भी होंगे, क्योंकि जो ईश्वर की विद्या है सो नित्य एक ही रस बनी
रहती है। उनके एक अक्षर का भी विपरीत भाव कभी नहीं होता। सो ऋग्वेद
से लेके चारों वेदों की संहिता अब जिस प्रकार की हैं, इनमें शब्द, अर्थ,
सम्बन्ध, पद और अक्षरों का जिस क्रम से वर्तमान है, इसी प्रकार का क्रम
सब दिन बना रहता है। क्योंकि ईश्वर का ज्ञान नित्य है। उसकी वृद्धि, क्षय
और विपरीतता कभी नहीं होती।’
इस तथ्य को पाणिनि ने अष्टाध्यायी में भी नित्य माना है। ‘वेद में स्वर तथा
वर्णानुपूर्वी भी नित्य होती है।’ निरुक्त में यास्क भी वेदमंत्रों की शब्द रचना और उनकी आनुपूर्वी को नियत मानते हैं।
वेदों की नित्यता के पश्चात् वेदों की शुद्धता की रक्षा का प्रबंध भी इतना
वैज्ञानिक है कि उसमें प्रक्षेप करना असंभव है। क्रम के अतिरिक्त जटा,
माला, शिक्षा, लेखा, ध्वजा, दण्ड, रथ, घन इन आठ प्रकारों से वेद मन्त्रों
के उच्चारण का विधान किया गया है। इस पाठक्रम का विधान ऐतरेय
आरण्यक, प्रतिशाख्यादि में भी उल्लेख है। वेदों के शुद्ध पाठ को सुरक्षित
रखने के लिए इसी प्रकार से अनुक्रमणियां भी पाई जाती हैं।
विदेशी से लेकर स्वदेशी विद्वान वेदों की शुद्धता की रक्षा पर मोहित होकर
अपने विचार लिखते हैं-
मैक्समूलर महोदय-Ancient Sanskrit Literature Page 117 में लिखते
हैं- ऋग्वेद की अनुक्रमणी से हम उसके सूक्तों और पदों की पड़ताल
करके निर्भीकता से कह सकते हैं कि अब भी ऋग्वेद के मन्त्रों, शब्दों और
पदों की वही संख्या है, जो कात्यायन के समय थी।
Origin of Relgion Page 131
वेदों के पाठ हमारे पास इतनी शुद्धता से पहुंचाये गए हैं कि कठिनाई से कोई
पाठभेद अथवा स्वरभेद तक सम्पूर्ण ऋग्वेद में मिल सके।
मक्डोनेल महोदय-
A History of Sanskrit Literature Page 50में
लिखते हैं- आर्यों ने प्राचीन काल से असाधारण सावधानता का वैदिक पाठ
की शुद्धता रखने और उसे परिवर्तन अथवा नाश से बचाने के लिए उपयोग
किया। यह इतनी शुद्धता से सुरक्षित रखा गया है जो साहित्यिक इतिहास में
अनुपम है।

जब प्रोफेसर मोनियर विलियम्स ने महर्षि दयानंद जी से “धर्म” शब्द की परिभाषा पूछी •

जब प्रोफेसर मोनियर विलियम्स ने महर्षि दयानंद जी से “धर्म” शब्द की परिभाषा पूछी •
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– भावेश मेरजा

आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने धर्म शब्द को अनूठे ढंग से व्याख्यायित किया है। उन्होंने धर्म शब्द की ऐसी व्याख्या की है कि जिसमें ज्ञान के साथ साथ आचरण को भी अर्थात् सत्य के अनुसंधान एवं सत्याचरण दोनों को समुचित स्थान दिया है।

सर मोनियर विलियम्स प्राच्य विद्याविद् थे। वे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में संस्कृत के प्रोफेसर रहे। 1876 में जब वे मुंबई में थे तब उन्होंने स्वामी दयानंद जी के व्याख्यान सुने थे एवं उनसे वार्तालाप भी किया था। इसी वार्तालाप के दौरान उन्होंने स्वामी जी से “धर्म” की परिभाषा पूछी थी। इस प्रसंग को उन्होंने अपनी “ब्राह्मनिजम एंड हिंदुइजम” पुस्तक में लिपिबद्ध किया है। वे लिखते हैं –

“I made his (Dayanand’s) acquaintance in 1876 and much struck by his fine countenance and eloquent discourse on the religious development of the Aryan race. He began by repeating a hymn to Varun (iv-16), preceded by the syllable Om protating the vowel in deep sonorous tones. (p. 529)… In one of my interviews with him I asked him of his definition of religion (dharma). He replied in Sanskrit. Religion (dharma) is a true and just view and the abandonment of all prejudice and partiality, that is to say, it is an impartial enquiry in to the truth by means of senses and other instruments of knowledge, reason and revelation (Vedas).”

[Source: Brahmanism and Hinduism, by M. M. Williams, London, 4th Edition, p. 529-530, 1891]

अर्थात् 1876 में बम्बई में मेरा स्वामी दयानन्द से परिचय हुआ था। मैं उनकी भव्य मुखाकृति से बहुत प्रभावित हुआ। यहीं मैंने ‘आर्य जाति के धार्मिक विकास’ विषय पर उनका एक प्रभावशाली भाषण सुना। उन्होंने अपने भाषण के आरंभ में वरुण (ईश्वर) की स्तुति में रचित एक वेदमन्त्र का ओम् के मधुर ध्वनि में उच्चारणपूर्वक गान किया। अपने एक बार के वार्तालाप में मैंने जब उनसे ‘धर्म’ की परिभाषा पूछी तो उन्होंने संस्कृत में कहा कि – “धर्म वह है जो सत्य तथा न्याय से युक्त होता है, जिसमें पक्षपात का लेशमात्र भी नहीं होता; जिसे ज्ञानन्द्रियों तथा ज्ञानप्राप्ति के अन्य साधनों के अतिरिक्त तर्क एवं वेदप्रमाण (वेदाज्ञा) से भी जाना जा सकता है।”

स्वामी जी ने सत्यार्थप्रकाश के अंत में दिए गए स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश में तथा आर्योद्देश्यरत्नमाला पुस्तक में भी धर्म की ऐसी ही परिभाषा दी है। जैसे कि –

“जो पक्षपातरहित न्यायाचरण, सत्यभाषणादि युक्त, ईश्वराज्ञा, वेदों से अविरुद्ध है, उसको ‘धर्म’ और जो पक्षपातसहित अन्यायाचरण, मिथ्याभाषणादि ईश्वराज्ञाभङ्ग, वेदविरुद्ध है, उसको ‘अधर्म’ मानता हूँ।” (स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश, क्रम 3)

“धर्म – जिसका स्वरूप ईश्वर की आज्ञा का यथावत् पालन और पक्षपातरहित न्याय, सर्वहित करना है, जो कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से सुपरीक्षित और वेदोक्त होने से सब मनुष्यों के लिए यही एक मानने योग्य है, उसको ‘धर्म’ कहते हैं।” (आर्योद्देश्यरत्नमाला, क्रम 2)

आजाद हिन्द फौज की जासूस नीरा आर्या की आत्मकथा का एक अंश

आजाद हिन्द फौज की जासूस नीरा आर्या की आत्मकथा का एक अंश
……………

‘‘मैं जब कोलकाता जेल में थी, तो हमारे रहने का स्थान वे ही कोठरियाँ थीं, जिनमें अन्य महिला राजनैतिक अपराधी रही थी अथवा रहती थी। हमें रात के 10 बजे कोठरियों में बंद कर दिया गया और चटाई, कंबल आदि का नाम भी नहीं सुनाई पड़ा। मन में चिंता होती थी कि क्या इसी प्रकार की स्वतंत्राता गहरे समुद्र में अज्ञात द्वीप में मिलेगी कि अभी से ओढ़नी अथवा बिछाने का ध्यान छोड़ने की आवश्यकता आ पड़ी है? जैसे-तैसे जमीन पर ही लोट लगाई और नींद भी आ गई। लगभग 12 बजे एक पहरेदार दो कम्बल लेकर आया और बिना बोले-चाले ही ऊपर फेंककर चला गया। कंबलों का गिरना और नींद का टूटना भी एक साथ ही हुआ। बुरा तो लगा, परंतु कंबलों को पाकर संतोष भी आ ही गया। अब केवल वही एक लोहे के बंधन का कष्ट और रह-रहकर भारत माता से जुदा होने का ध्यान साथ में था।12
‘‘सूर्य निकलते ही मुझको खिचड़ी मिली और लुहार भी आ गया। हाथ की सांकल काटते समय थोड़ा-सा चमड़ा भी काटा, परंतु पैरों में से आड़ी बेड़ी काटते समय, केवल दो-तीन बार हथौड़ी से पैरों की हड्डी को जाँचा कि कितनी पुष्ट है। मैंने एक बार दुःखी होकर कहा, ‘‘क्या अंधा है, जो पैर में मारता है?’’
‘‘पैर क्या हम तो दिल में भी मार देंगे, क्या कर लोगी?’’ उसने मुझे कहा था।
‘‘बंधन में हूँ तुम्हारे कर भी क्या सकती हूँ…’’ फिर मैंने उनके ऊपर थूक दिया था, ‘‘औरतों की इज्जत करना सीखो?’’
जेलर भी साथ थे, तो उसने कड़क आवाज में कहा, ‘‘तुम्हें छोड़ दिया जाएगा, यदि तुम बता दोगी कि तुम्हारे नेताजी सुभाष कहाँ हैं?’’
‘‘वे तो हवाई दुर्घटना में चल बसे,’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘सारी दुनिया जानती है।’’
‘‘नेताजी जिंदा हैं….झूठ बोलती हो तुम कि वे हवाई दुर्घटना में मर गए?’’ जेलर ने कहा।
‘‘हाँ नेताजी जिंदा हैं।’’
‘‘तो कहाँ हैं…।’’
‘‘मेरे दिल में जिंदा हैं वे।’’ जैसे ही मैंने कहा तो जेलर को गुस्सा आ गया था और बोले, ‘‘तो तुम्हारे दिल से हम नेताजी को निकाल देंगे।’’
और फिर उन्होंने मेरे आँचल पर ही हाथ डाल दिया और मेरी आँगी को फाड़ते हुए फिर लुहार की ओर संकेत किया…लुहार ने एक बड़ा सा जंबूड़ औजार जैसा फुलवारी में इधर-उधर बढ़ी हुई पत्तियाँ काटने के काम आता है, उस ब्रेस्ट रिपर को उठा लिया और मेरे दाएँ उरोज को उसमें दबाकर काटने चला था…लेकिन उसमें धार नहीं थी, ठूँठा था और उरोजों (स्तनों) को दबाकर असहनीय पीड़ा देते हुए दूसरी तरफ से जेलर ने मेरी गर्दन पकड़ते हुए कहा, ‘‘अगर फिर जबान लड़ाई तो तुम्हारे ये दोनों गुब्बारे छाती से अलग कर दिए जाएँगे…’’
उसने फिर चिमटानुमा हथियार मेरी नाक पर मारते हुए कहा, ‘‘शुक्र मानो महारानी विक्टोरिया का कि इसे आग से नहीं तपाया, आग से तपाया होता तो तुम्हारे दोनों उभार पूरी तरह उखड़ जाते।’’
………
एक चित्र नीरा आर्य के वास्तविक चित्र की अनुकृति और एक उनकी आत्मकथा के आधार पर रेखांकित…एक वास्तविक फोटो में महिला जासूसी दल सुभाष को रिपोर्ट करता हुआ, जिसमें नीरा भी हैं।

aaj ka mantra

श्रिये ते पादा दुव आ मिमिक्षु-
र्धृष्णुर्वज्री शवसा दक्षिणावान्।
वसानो अत्कं सुरभिं दृशे कं
स्वर्ण नृतविषिरो बभूथ।।
— ऋग्वेद ६.२९.३.

तेरे श्रीचरणों में
_____

तेरे श्रीचरणों में मेरी पूजा समर्पित है,
तू समर्थ है रिपुओं का दमन करने में।
तू वह सब दे देता है हमें
जिसके याचक हैं हम।

तू नृत्य करता है
तो ब्रह्मांड नाच उठता है
और तेरा आभामंडल
कवच बन कर ढँक लेता है हमें।

हे दाता !
तू सूर्य की तरह हमारा पथ-प्रदर्शक,
तू ही आनंदमय,
तेरा ही दर्शन मंगलमय।

तेरे श्रीचरणों में

श्रिये ते पादा दुव आ मिमिक्षु-
र्धृष्णुर्वज्री शवसा दक्षिणावान्।
वसानो अत्कं सुरभिं दृशे कं
स्वर्ण नृतविषिरो बभूथ।।
— ऋग्वेद ६.२९.३.

तेरे श्रीचरणों में
_____

तेरे श्रीचरणों में मेरी पूजा समर्पित है,
तू समर्थ है रिपुओं का दमन करने में।
तू वह सब दे देता है हमें
जिसके याचक हैं हम।

तू नृत्य करता है
तो ब्रह्मांड नाच उठता है
और तेरा आभामंडल
कवच बन कर ढँक लेता है हमें।

हे दाता !
तू सूर्य की तरह हमारा पथ-प्रदर्शक,
तू ही आनंदमय,
तेरा ही दर्शन मंगलमय।

🙏 गृहस्थियों द्वारा नित्यकर्म त्यागने के दुष्परिणाम🙏

🙏 गृहस्थियों द्वारा नित्यकर्म त्यागने के दुष्परिणाम🙏

साथियों हमारे धर्म ग्रन्थों में कुछ नियमों को पालन करने के लिए विवाह संस्कार के समय ही बता दिया जाता था। जिसमें ब्रह्ममुहर्त में उठकर शौच स्नान आदि से निवृत्त होकर पांच यज्ञों का विधान वेदों में किया है। नित्यकर्म को करते रहने से आपको कोई खास सुख की अनुभूति नहीं होती। परंतु न करने से आपकी और समाज की बहुत बड़ी हानि होती है जिसको हम आज विषाणु जनित सामाजिक रोगों के रूप में देख रहे हैं।
आइये मैं आपको समझाने का प्रयास करता हूं। आप नित्य प्रति स्नान करते हैं  तो आप प्रसन्न और स्वस्थ रहते हैं । परंतु आप दो-तीन दिन स्नान न करें तो आपके शरीर में  दुर्गंध आनी शुरू हो जाएगी और आपके परिवार के लोग भी आप से दूर रहने लगेंगे, आप बीमार भी पड़ सकते हैं, समाज में  आपकी प्रतिष्ठा भी नष्ट हो जाएगी।ठीक इसी प्रकार इन पंच यज्ञों को न करने के कारण हम कितने दुख उठा रहे हैं।आओ इनको समझते हैं।

ब्रह्मयज्ञ – इस यज्ञ में स्नानादि करके परमेश्वर का चिंतन करना, उपासना करना और मोक्षदायिनी सद ग्रंथों का स्वाध्याय करना जैसे वेद उपनिषद और छः दर्शन आदि। ऐसा करने से आप के विचार पवित्र और सात्विक रहेंगे और न करने से आपके विचार दूषित हो जाएंगे और आप अनाचार अत्याचार की ओर प्रवृत्त हो सकते हैं। इसी ब्रह्मयज्ञ के न करने के कारण ही समाज में भ्रष्टाचार अत्याचार बढ़ रहा है।  हमें नित्य प्रति प्रातः सायं काल में अच्छे ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए और ईश्वर का ध्यान करना चाहिए।

देवयज्ञ- इसमें सुगंधित, पौष्टिक, रोगनाशक,मिष्ठ पदार्थों की सामग्री बनाकर गाय के घी से नित्य प्रातः सायं हवन करना होता है जिससे हमारा पर्यावरण शुद्ध रहता है, वायु और जल प्रदुषित नही होते और रोगोत्पादक विषाणु नष्ट होते रहते हैं।घर घर में इस यज्ञ के न करने कारण हमारे जीवित रहने योग्य वायु, जल, भूमि आदि प्रदुषित होता जा रहा है। अतः हमें नित्य प्रति यज्ञ करना आवश्यक है।

पितृयज्ञ- उपरोक्त हवन करके तीसरा पितृ यज्ञ करना आवश्यक है अर्थात जीवित माता-पिता की सेवा करना, भोजन वस्त्र आदि से तृप्त रखना पितृयज्ञ कहलाता है।यदि हम ऐसा नहीं करते जो कि प्रायः छोड़ ही दिया है तो हमारी संताने संस्कारवान नहीं बनेंगी। इसी कारण से आज वृद्ध माता-पिता वृद्धाश्रमों में अधिक दिखाई दे रहे हैं।जिसका दुष्प्रभाव हम विद्यालयों और महाविद्यालयों में दुर्व्यसनों में फंसे युवकों के रूप में देख रहे हैं।

बलिवैश्वदेव यज्ञ- पाकशाला में क्षार और लवण को छोड़ कर जो पका हो उससे अग्नि में दश आहुतियाँ देना तथा कुत्ता, पतित, चांडाल, पाप रोगी, काक, और कृमि आदि को भोजन कराना बलिवैश्वदेव यज्ञ कहलाता है। अर्थात समाज में जो भी जीव जंतु हैं उनकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। यदि हम उनका ही भक्षण करने  लगें तो समाज में विषाणु जनित रोग फैल जाएंगे।

अतिथि यज्ञ- धार्मिक, परोपकारी, सत्य उपदेशक, पक्षपातरहित, शांत, सर्वहितकारक विद्वानों की अन्नादि से सेवा, उनसे प्रश्नोत्तर आदि करके विद्या की प्राप्ति करना, अतिथियज्ञ कहाता है। उसे नित्य क्या करें। यदि हम ऐसा नहीं करते तो अविद्या और अज्ञान के कारण हम अनाचार में प्रवृत्त हो जाते हैं।

अतः मनुष्यों को सुखी जीवन के लिये और समाज को सुखी, समृद्धशाली बनाने के लिए कभी भी नित्यकर्मों का त्याग नही करना चाहिए।

चैत्र शुक्ल पंचमी २०७७

आपका दिन शुभ हो 🌹

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चैत्र शुक्ल पंचमी २०७७

🌷 29 मार्च 2020 🌷
~~~~~
दिन —– रविवार
तिथि — पंचमी
नक्षत्र ——- रोहिणी
पक्ष —— शुक्ल
माह– — चैत्र
ऋतु ——– 💐बसन्त
सूर्य उत्तरायणे,उत्तर गोले
विक्रम सम्वत –2077
दयानंदाब्द — 196
शक सम्बत -1941
मन्वन्तर —- वैवस्वत
कल्प सम्वत–1972949122
मानव,वेदोत्पत्ति सृष्टिसम्वत-१९६०८५३१२२
सूर्योदय -((दिल्ली)–6:20
सूर्यास्त–6:37
.🍅 पहला सुख निरोगी काया

फलों से स्वस्थ होने वाले अंग: दिमाग अखरोट से, आँख बादाम से , दांत अनार से, फेफड़े अंगूर से , आँत अंजीर से , मांस केला व सेव से ,जिगर पपीता से , त्वचा सब्जी से , खोपड़ी नारियल से ।

धनादि भूमौ पशवश्च गोष्ठे, भार्या गृहद्वारि जन: श्मशाने। देहश्चितायां परलोकमार्गे,कर्मानुगो गच्छति जीव एक:

सुभाषितानि 🕉🙏

🌷धनादि भूमौ पशवश्च गोष्ठे, भार्या गृहद्वारि जन: श्मशाने। देहश्चितायां परलोकमार्गे,कर्मानुगो गच्छति जीव एक: ( भर्तृहरिशतकत्रयम्)

💐 अर्थ:- मनुष्य जब मरता है तब सारी धन- सम्पत्ति भूमि पर ही पड़ी रह जाती है, पशु बाड़े में खड़े रहते है, जीवन- साथी घर के दरवाजे तक साथ देता है, मित्रबन्थु- सम्बन्धी शमशान तक साथ चलते हैं और यह शरीर चिता पर जलकर भस्म हो जाता है ।यदि जीवात्मा के साथ परलोक में कोई चलता है, तो वह कर्म ही है, जो उसने जीवित रहते हुए अच्छा- बुरा किया है, और कोई साथ नहीं चलता । क्या प्रयोजन? यदि उत्तम् विद्या है, तो धन की क्या आवश्यकता है? और यदि अपयश है, तो फिर मृत्यु की क्या आवश्यकता है ?

आज का वैदिक भजन  🙏316
जय जय पिता परम आनन्द दाता
जगदादि कारण मुक्ति प्रदाता
जय जय पिता परम आनन्द दाता

अनन्त और अनादि विशेषण हैं तेरे
अनन्त और अनादि विशेषण हैं तेरे
तू सृष्टि का स्रष्टा तू धर्ता संहर्ता
जय जय पिता परम आनन्द दाता

सूक्ष्म से सूक्ष्म तू है स्थूल इतना
सूक्ष्म से सूक्ष्म तू है स्थूल इतना
कि जिसमें यह ब्रह्माण्ड सारा समाता
जय जय पिता परम आनन्द दाता

मिटाओ मेरे भय को आवागमन के
मिटाओ मेरे भय को आवागमन के
फिरूँ ना जन्म पाता और बिलबिलाता
जय जय पिता परम आनन्द दाता

करो शुद्ध निर्मल मेरी आत्मा को
करो शुद्ध निर्मल मेरी आत्मा को
करूँ मैं विनय नित्य सायं व प्रातः
जय जय पिता परम आनन्द दाता

बिना तेरे हैं कौन दीनों का बन्धु
बिना तेरे हैं कौन दीनों का बन्धु
कि जिसको मैं अपनी अवस्था सुनाता
जय जय पिता परम आनन्द दाता

“अमीं” रस पिलाओ कृपा कर के मुझको
“अमीं” रस पिलाओ कृपा कर के मुझको
रहूँ सर्वदा तेरे गुणगान गाता
जय जय पिता परम आनन्द दाता
जय जय पिता परम आनन्द दाता
जगदादि कारण मुक्ति प्रदाता
जय जय पिता परम आनन्द दाता

राग :- रामकली
ताल :- झप
रचनाकार :-भक्त अमीचन्द मेहता

प्रस्तुत भजन व संलग्न गाये हुए भजन में निम्न छन्द नहीं गाया है परन्तु मूल भजन में यह भी हैं इसलिए साधक इन्हें भी इसी धुन/राग में गा सकते हैं या गायें ऐसा आग्रह है | 👇👇
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मैं लालित व पालित हूँ पितृ स्नेह का
मैं लालित व पालित हूँ पितृ स्नेह का
यह प्राकृत सम्बन्ध है तुझसे ताता
जय जय पिता परम आनन्द दाता
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उल्लेखनीय है की भक्त अमीचन्द जी, महर्षि दयानन्द जी के कृपापात्र थे | महर्षि दयानन्द जी के एक वचन “अमीचन्द!!! तुम हो तो हीरा, पर कीचड़ में पड़े हो” को सुनकर पतित अमीचन्द ने समस्त दोषों को छोड़ दिया और भक्त बन गये | यह रचना उसी का एक उदाहरण मात्र हैं |

सादर
विदुषामनुचर
विश्वप्रिय वेदानुरागी👏💐🙏

भगत सिंह के नाम पर सुनियोजित षड्यंत्र

डॉ विवेक आर्य

(23 मार्च भगत सिंह के बलिदान दिवस के अवसर पर प्रकाशित)

‘मैं नास्तिक क्यों हूँ? शहीद भगतसिंह की यह छोटी सी पुस्तक वामपंथी, साम्यवादी लाबी द्वारा आजकल नौजवानों में खासी प्रचारित की जा रही है, जिसका उद्देश्य उन्हें भगत सिंह के जैसा महान बनाना नहीं अपितु उनमें नास्तिकता को बढ़ावा देना है। कुछ लोग इसे कन्धा भगत सिंह का और निशाना कोई और भी कह सकते हैं। मेरा एक प्रश्न उनसे यह है की क्या भगत सिंह इसलिए हमारे आदर्श होने चाहिएँ कि वे नास्तिक थे, अथवा इसलिए कि वे एक प्रखर देशभक्त और अपने सिद्धान्तों से किसी भी कीमत पर समझौता न करने वाले बलिदानी थे? सभी कहेंगे कि इसलिए कि वे देशभक्त थे। भगतसिंह के जो प्रत्यक्ष योगदान है उसके कारण भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष में उनका कद इतना उच्च है कि उन पर अन्य कोई संदिग्ध विचार धारा थोंपना कतई आवश्यक नहीं है। इस प्रकार के छद्म प्रोपगंडा से भावुक एवं अपरिपक्व नौजवानों को भगतसिंह के समग्र व्यक्तित्व से अनभिज्ञ रखकर अपने राजनैतिक उद्देश्य तो पूरे किये जा सकते हैं, भगतसिंह के आदर्शों का समाज नहीं बनाया जा सकता। किसी भी क्रांतिकारी की देशभक्ति के अलावा उनकी अध्यात्मिक विचारधारा अगर हमारे लिए आदर्श है तब तो भगत सिंह के अग्रज महान् कवि एवं लेखक, भगत सिंह जैसे अनेक युवाओं के मार्ग द्रष्टा, जिनके जीवन में क्रांति का सूत्रपात स्वामी दयानंद द्वारा रचित अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश को पढऩे से हुआ था, कट्टर आर्यसमाजी, पंडित राम प्रसाद बिस्मिल जी जिनका सम्पूर्ण जीवन ब्रह्मचर्य पालन से होने वाले लाभ का साक्षात् प्रमाण था, क्यों हमारे लिए आदर्श और वरण करने योग्य नहीं हो सकते?

क्रान्तिकारी सुखदेव थापर वेदों से अत्यंत प्रभावित एवं आस्तिक थे एवं संयम विज्ञान में उनकी आस्था थी। स्वयं भगत सिंह ने अपने पत्रों में उनकी इस भावना का वर्णन किया है। हमारे लिए आदर्श क्यों नहीं हो सकते?

‘आर्यसमाज मेरी माता के समान है और वैदिक धर्म मेरे लिए पिता तुल्य है। ऐसा उदघोष करने वाले लाला लाजपतराय जिन्होंने जमीनी स्तर पर किसान आन्दोलन का नेतृत्व करने से लेकर उच्च बौद्धिक वर्ग तक में प्रखरता के साथ देशभक्ति की अलख जगाई और साइमन कमीशन का विरोध करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। वे क्यों हमारे लिए वरणीय नहीं हो सकते? क्या इसलिए कि वे आस्तिक थे? वस्तुत: देशभक्त लोगों के प्रति श्रद्धा और सम्मान रखने के लिए यह एक पर्याप्त आधार है कि वे सच्चे देशभक्त थे और उन्होंने देश की भलाई के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों और सपनों सहित अपने जीवन का बलिदान कर दिया, इससे उनके सम्मान में कोई कमी या व्द्धि नहीं होती कि उनकी आध्यात्मिक विचारधारा क्या थी। रामप्रसाद के बलिदान का सम्मान करने के साथ अशफाक के बलिदान का केवल इस आधार पर अवमूल्यन करना कि वे इस्लाम से सम्बंधित थे, केवल मूर्खता ही कही जाएगी।

ऐसे हजारों क्रांतिकारियों का विवरण दिया जा सकता है जिन्होंने न केवल मातृभूमि की सेवा में अपने प्राण न्योछावर किये थे अपितु मान्यता से वे सब दृढ़ रूप से आस्तिक भी थे। क्या उनकी बलिदान और भगत सिंह के बलिदान में कुछ अंतर हैं? नहीं। फिर यह अन्याय नहीं तो और क्या है?

अब यह भी विचार कर लेना चाहिए कि भगत सिंह की नास्तिकता क्या वाकई में नास्तिकता है? भगत सिंह शहादत के समय एक 23 वर्ष के युवक ही थे। उस काल में 1920 के दशक में भारत के ऊपर दो प्रकार की विपत्तियाँ थीं। 1921 में परवान चढ़े खिलाफत के मुद्दे को कमाल पाशा द्वारा समाप्त किये जाने पर कांग्रेस एवं मुस्लिम संगठनों की हिन्दू-मुस्लिम एकता ताश के पत्तों के समान उड़ गई और सम्पूर्ण भारत में दंगों का जोर आरंभ हो गया। हिन्दू मुस्लिम के इस संघर्ष को भगत सिंह द्वारा आज़ादी की लड़ाई में सबसे बड़ी अड़चन के रूप में महसूस किया गया, जबकि इन दंगों के पीछे अंगे्रजों की फूट डालो और राज करो की नीति थी। इस विचार मंथन का परिणाम यह निकला कि भगत सिंह को “धर्म” नामक शब्द से घृणा हो गई। उन्होंने सोचा कि दंगों का मुख्य कारण धर्म है। उनकी इस मान्यता को दिशा देने में माक्र्सवादी साहित्य का भी योगदान था, जिसका उस काल में वे अध्ययन कर रहे थे। दरअसल धर्म दंगों का कारण ही नहीं था, दंगों का कारण मत-मतान्तर की संकीर्ण सोच थी। धर्म पुरुषार्थ रुपी श्रेष्ठ कार्य करने का नाम है, जो सार्वभौमिक एवं सर्वकालिक है। जबकि मत या मज़हब एक सीमित विचारधारा को मानने के समान हैं, जो न केवल अल्पकालिक हैं अपितु पूर्वाग्रह से युक्त भी हैं। उसमें उसके प्रवर्तक का सन्देश अंतिम सत्य होता है। माक्र्सवादी साहित्य की सबसे बड़ी कमजोरी उसका धर्म और मज़हब शब्द में अंतर न कर पाना है।

उस काल में अंग्रेजों की विनाशकारी नीतियों के कारण भारत देश में गरीबी अपनी चरम सीमा पर थी और अकाल, बाढ़, भूकंप, प्लेग आदि के प्रकोप के समय उचित व्यवस्था न कर पाने के कारण थोड़ी सी समस्या भी विकराल रूप धारण कर लेती थी। ऐसे में चारों ओर गरीबी, भूखमरी, बीमारियाँ आदि देखकर एक देशभक्त युवा का निर्मल ह्रदय का व्यथित हो जाना स्वाभाविक है। परन्तु इस प्रकोप का श्रेय अंग्रेजी राज्य, आपसी फूट, शिक्षा एवं रोजगार का अभाव, अन्धविश्वास आदि को न देकर ईश्वर को देना कठिन विषय में अंतिम परिणाम तक पहुँचने से पहले की शीघ्रता के समान है। दुर्भाग्य से भगत सिंह जी को केवल 23 वर्ष की आयु में देश पर अपने प्राण न्योछावर करने पड़े, वर्ना कुछ और काल में विचारों में प्रगति होने पर उनका ऐसा मानना कि संसार में दुखों का होना इस बात को सिद्ध करता है कि ईश्वर नाम की कोई सत्ता नहीं हैं, वे स्वयं ही अस्वीकृत कर देते।

संसार में दु:ख का कारण ईश्वर नहीं अपितु मनुष्य स्वयं हैं। ईश्वर ने तो मनुष्य के निर्माण के साथ ही उसे वेद रूपी उपदेश में यह बता दिया कि उसे क्या करना है और क्या नहीं करना है? अर्थात् मनुष्य को सत्य-असत्य का बोध करवा दिया था। अब यह मनुष्य का कर्तव्य है कि वो सत्य मार्ग का वरण करे और असत्य मार्ग का त्याग करे। पर यदि मनुष्य अपनी अज्ञानता से असत्य मार्ग का वरण करता है तो आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधिदैविक तीनों प्रकार के दुखों का भागी बनता है। अपने सामथ्र्य के अनुसार कर्म करने में मनुष्य स्वतंत्र है- यह निश्चित सिद्धांत है मगर उसके कर्मों का यथायोग्य फल मिलना भी उसी प्रकार से निश्चित सिद्धांत है। जिस प्रकार से एक छात्र परीक्षा में अत्यंत परिश्रम करता है उसका फल अच्छे अंकों से पास होना निश्चित है, उसी प्रकार से दूसरा छात्र परिश्रम न करने के कारण फेल होता हैं तो उसका दोष ईश्वर का हुआ अथवा उसका हुआ। ऐसी व्यवस्था संसार के किस कर्म को करने में नहीं हैं? सकल कर्मों में हैं और यही ईश्वर की कर्मफल व्यवस्था है। फिर किसी भी प्रकार के दु:ख का श्रेय ईश्वर को देना और उसके पीछे ईश्वर की सत्ता को नकारना निश्चित रूप से गलत फैसला है। भगत सिंह की नास्तिकता वह नास्तिकता नहीं है जिसे आज के वामपंथी गाते हैं। यह एक 23 वर्ष के जोशीले, देशभक्त नौजवान युवक की क्षणिक प्रतिक्रिया मात्र है, व्यवस्था के प्रति आक्रोश है। भगतसिंह की जीवन शैली, उनकी पारिवारिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि और सबसे बढऋकर उनके जीवन-शैली से सिद्ध होता है कि किसी भी आस्तिक से आस्तिकता में कमतर नहीं थे। वे परोपकार रूपी धर्म से कभी अलग नहीं हुए, चाहे उन्हें इसके लिए कितनी भी होनि उठानी पड़ी। महर्षि दयानन्द ने इस परोपकार रूपी ईश्वराज्ञा का पालन करना ही धर्म माना है और साथ ही यह भी कहा है कि इस मनुष्य रूपी धर्म से प्राणों का संकट आ जाने पर भी पृथक न होवे। भगतसिंह का पूरा जीवन इसी धर्म के पालन का ज्वलंत उदाहरण है। इसलिए उनकी आस्तिकता का स्तर किसी भी तरह से कम नहीं आंका जा सकता।

मेरा इस विषय को यहाँ उठाने का मंतव्य यह स्पष्ट करना है कि भारत माँ के चरणों में आहुति देने वाला हर क्रांतिकारी हमारे लिए महान और आदर्श है। उनकी वीरता और देश सेवा हमारे लिए वरणीय है। भगत सिंह की क्रांतिकारी विचारधारा और देशभक्ति का श्रेय नास्तिकता को नहीं अपितु उनके पूर्वजों द्वारा माँ के दूध में पिलाई गयी देश भक्ति कि लोरियां हैं, जिनका श्रेय स्वामी दयानंद, करतार सिंह साराभा, भाई परमानन्द, लाला लाजपत राय, प्रोफेसर जयदेव विद्यालंकार, भगत सिंह के दादा आर्यसमाजी सरदार अर्जुन सिंह और उनके परिवार के अन्य सदस्य, सिख गुरुओं की बलिदान की गाथाओं को जाता है, जिनसे प्रेरणा की घुट्टी उन्हें बचपन से मिली थी और जो निश्चित रूप से आस्तिक थे। भगत सिंह की महानता को नास्तिकता के तराजू में तोलना साम्यवादी लेखकों द्वारा शहीद भगत सिंह के साथ अन्याय के समान है। वैसे साम्यवादी लेखको कि दोगली मानसिकता के दर्शन हमें तब भी होते हैं जब वे भगत सिंह द्वारा गोरक्षा के लिए हुए कुका आंदोलन एवं वंदे मातरम के आज़ादी के उद्घोष के समर्थन में उनके द्वारा लिखे हुए साहित्य कि अनदेखी इसलिए करते हैं क्यूंकि यह उनकी पार्टी के एजेंडे के विरुद्ध जाता हैं। प्रबुद्ध पाठक स्वयं पइस आशय को समझ सकते हैं।

 

 

 


वैदिक विचार

एक ही बात को अनेक प्रकार से कहा जा सकता है। परंतु जब कोई बात सकारात्मक शब्दों में कही जाती है, तो वह उत्साहवर्धक होती है। और यदि आप नकारात्मक भाव से किसी चीज को कहते हैं, तो उसका प्रभाव  निराशाजनक होता है।
उदाहरण के लिए, जैसे किसी ने कहा कि यह ग्लास पानी से आधा भरा हुआ है। यह सकारात्मक भाव से कथन है। इससे उत्साह बढ़ता है, कि चलो आधा पानी तो है।
अब इसी बात को दूसरे शब्दों में यूं भी कहा जा सकता है, कि, इस ग्लास में तो आधा ही पानी है! इस कथन में उत्साह नहीं बढ़ता, बल्कि भंग होता है, निराशा आती है।
तो हमें बोलते समय ध्यान रखना चाहिए कि हम किसी बात को इस प्रकार से अभिव्यक्त करें, कि लोगों का उत्साह बढ़े।  लोग अच्छाई की ओर प्रवृत्त हों, और निराशा एवं बुराई से बचें।
यदि आप ऐसा कहते हैं कि संसार में बहुत से अच्छे लोग हैं, जो मनुष्यों की और प्राणियों की सेवा तथा रक्षा करते हैं। तो यह कथन उत्साहवर्धक है। और यदि आप इसी बात को इस प्रकार से कहें, कि दुनिया में कुछ ऐसे दुष्ट लोग हैं, जिन्होंने दुनियाँ का जीना हराम कर रखा है।  इस कथन से उत्साह भंग होता है, और निराशा बढ़ती है।
इसलिए सब जगह पर विचारने तथा बोलने में ध्यान रखें। उत्तम जीवन जीने के लिए उत्साह की आवश्यकता है। अच्छे तथा सकारात्मक शब्द बोलें। अपना और दूसरों का उत्साह बढ़ाएं.