प्रजातंत्र ही क्यों

प्रजातंत्र ही क्यों

महामात्य चाणक्य ने सुशासन के लिए दण्ड को सर्वोपरि साधन माना है । एक समय सारे देश में यह माग्यता प्रचलित रही है कि राज्य में जब दण्ड खड़ा रहता है तब धर्म, नीति, सदाचार, आदि सबकी सुस्थिति होती है । ऐसी स्थिति में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि प्रजातंत्र में दण्ड का क्या स्थान होना चाहिए ? महाभारत में कहा गया है कि पहले न राज्य था, न दण्ड देने वाला राजा; प्रजा स्वेच्छा से अपने अपने धर्म का पालन करती हुई परस्पर शासन कर लिया करती थी। यह आदिम प्रजातन्त्र की पद्धति थी। प्रजातांत्रिक व्यवस्था के विषय में जब जब भी चिन्तन किया जायगा तब-तब प्रादिम प्रजातंत्र की यह व्यवस्था हमारे लिए प्रेरक सिद्ध होगी।

दण्ड क्यों दिया जाता है ? राजा तो उसको दण्ड दिया करता था जो उसकी इच्छा के अनुरूप कार्य नहीं करता था। लोगों को प्रातंकित करने के लिए भी दण्ड दिया जाता था। प्रजातंत्र में ऐसी व्यवस्था नहीं चल सकती। यहाँ तो सामूहिक इच्छा के विपरीत आचरण करने वाले को ही दण्ड दिया जा सकता है सामूहिक इच्छा सदाचार के विरुद्ध हो तो उसको एक अकेला प्रादमी भी चुनौती दे सकता है। उसे कालकोठरी में डाल दिया जाय तो भी वह अनौचित्य के प्रति विद्रोह कर सकता है। यों कहा जा सकता है कि प्रजातंत्र में समूह की शक्ति को नियन्त्रित करने के लिए समझदार व्यक्ति सदैव समूह के अनुचित निर्णयों को चुनौती देते हैं। इसलिए यह उक्ति प्रसिद्ध हो गई है कि प्रजातंत्र में ईमानदार और स्पष्ट वक्ता अधिकतर जेल में ही अपना जीवन बिताते हैं । फिर भी लोगों को राजा के निरंकुश शासन की अपेक्षा प्रजातंत्र ही प्रिय लगता हैइसका एक कारण यह है कि प्रजातंत्र में भिन्न-भिन्न रुचियों वाले लोग निर्णय लेते हैं इसलिए अनुचित दण्ड से बचने की संभावना अधिक होती हैं। दूसरा पक्ष यह भी है कि इसी संभावना के कारण प्रजातत्र में अपराधों की संख्या बढ़ने लगती है।

वस्तुत: प्रजातंत्र ऐसी आदर्श व्यवस्था है जिसमें अपराध पनपने की संभावना ही नहीं होती । कैकेयी के भ्राता अश्वपति ने अपनी प्रजातांत्रिक व्यवस्था की विशेषता उद्घोषित करते हुए कहा था कि उनके राज्य में न चोर है, न झूठ बोलने वाला; कोई स्वैर नहीं हैं तब स्वैरिणी कहाँ से होगी। इस तरह की घोषणा वही कर सकता है जो स्वयं सदाचारी हो । नेता सदाचारी न हों तो नागरिक सदाचारी हो ही नहीं सकते हमारे पड़ोसी राष्ट्रों में प्रजातत्र नेताओं के अनाचार के कारण नष्ट हुअा है। हमारे देश में सब नेता तो सदाचारी नहीं है; पर कुछ अवश्य ही अपने चरित्र को पवित्र रखना चाहते हैं । देश उन्हीं के बल पर चल रहा है। प्रजातंत्र में दण्ड का लक्ष्य यही हो सकता है कि सदाचारी और व्यवस्थाप्रिय लोगों को उसका संरक्षण मिले । वह कठोर तो हो; पर उसका उपयोग कम से कम करना पड़े।

-पंचोली

प्रजातंत्र ही क्यों

प्रजातंत्र ही क्यों

महामात्य चाणक्य ने सुशासन के लिए दण्ड को सर्वोपरि साधन माना है । एक समय सारे देश में यह माग्यता प्रचलित रही है कि राज्य में जब दण्ड खड़ा रहता है तब धर्म, नीति, सदाचार, आदि सबकी सुस्थिति होती है । ऐसी स्थिति में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि प्रजातंत्र में दण्ड का क्या स्थान होना चाहिए ? महाभारत में कहा गया है कि पहले न राज्य था, न दण्ड देने वाला राजा; प्रजा स्वेच्छा से अपने अपने धर्म का पालन करती हुई परस्पर शासन कर लिया करती थी। यह आदिम प्रजातन्त्र की पद्धति थी। प्रजातांत्रिक व्यवस्था के विषय में जब जब भी चिन्तन किया जायगा तब-तब प्रादिम प्रजातंत्र की यह व्यवस्था हमारे लिए प्रेरक सिद्ध होगी।

दण्ड क्यों दिया जाता है ? राजा तो उसको दण्ड दिया करता था जो उसकी इच्छा के अनुरूप कार्य नहीं करता था। लोगों को प्रातंकित करने के लिए भी दण्ड दिया जाता था। प्रजातंत्र में ऐसी व्यवस्था नहीं चल सकती। यहाँ तो सामूहिक इच्छा के विपरीत आचरण करने वाले को ही दण्ड दिया जा सकता है सामूहिक इच्छा सदाचार के विरुद्ध हो तो उसको एक अकेला प्रादमी भी चुनौती दे सकता है। उसे कालकोठरी में डाल दिया जाय तो भी वह अनौचित्य के प्रति विद्रोह कर सकता है। यों कहा जा सकता है कि प्रजातंत्र में समूह की शक्ति को नियन्त्रित करने के लिए समझदार व्यक्ति सदैव समूह के अनुचित निर्णयों को चुनौती देते हैं। इसलिए यह उक्ति प्रसिद्ध हो गई है कि प्रजातंत्र में ईमानदार और स्पष्ट वक्ता अधिकतर जेल में ही अपना जीवन बिताते हैं । फिर भी लोगों को राजा के निरंकुश शासन की अपेक्षा प्रजातंत्र ही प्रिय लगता हैइसका एक कारण यह है कि प्रजातंत्र में भिन्न-भिन्न रुचियों वाले लोग निर्णय लेते हैं इसलिए अनुचित दण्ड से बचने की संभावना अधिक होती हैं। दूसरा पक्ष यह भी है कि इसी संभावना के कारण प्रजातत्र में अपराधों की संख्या बढ़ने लगती है।

वस्तुत: प्रजातंत्र ऐसी आदर्श व्यवस्था है जिसमें अपराध पनपने की संभावना ही नहीं होती । कैकेयी के भ्राता अश्वपति ने अपनी प्रजातांत्रिक व्यवस्था की विशेषता उद्घोषित करते हुए कहा था कि उनके राज्य में न चोर है, न झूठ बोलने वाला; कोई स्वैर नहीं हैं तब स्वैरिणी कहाँ से होगी। इस तरह की घोषणा वही कर सकता है जो स्वयं सदाचारी हो । नेता सदाचारी न हों तो नागरिक सदाचारी हो ही नहीं सकते हमारे पड़ोसी राष्ट्रों में प्रजातत्र नेताओं के अनाचार के कारण नष्ट हुअा है। हमारे देश में सब नेता तो सदाचारी नहीं है; पर कुछ अवश्य ही अपने चरित्र को पवित्र रखना चाहते हैं । देश उन्हीं के बल पर चल रहा है। प्रजातंत्र में दण्ड का लक्ष्य यही हो सकता है कि सदाचारी और व्यवस्थाप्रिय लोगों को उसका संरक्षण मिले । वह कठोर तो हो; पर उसका उपयोग कम से कम करना पड़े।

-पंचोली

एक स्पष्ट सी बात

बात है क्रान्तिकारियों की, हिंसा में विश्वास करनेवाली टोली की। भगतसिंह की, बटुकेश्वर दत्त की, अशफ़ा- कुल्ला, रामप्रसाद बिस्मिल की, चन्द्रशेखर ‘प्राज़ाद’ की और उनकी टोली की। उस टोली के सदस्य अपने लक्ष्य की प्राप्ति और अपने मार्ग की बाधाओं को नष्ट करने के लिए जिस व्यवस्था, अनुशासन और प्रतिज्ञा से प्राबद्ध होते थे उसमें ‘प्राण जाइ पर बचन न जाई’ का रूप मूर्त रहता था। प्राणपण से भारत की स्वतन्त्रता के लिए परितः निबद्ध आस्थावाले, विश्वतः परखे हुए और खरे व्यक्तित्व-वाले जन ही उस टोली के सदस्य हो सकते थे।

कभी समय था जब आर्यसमाज के सदस्य भी ऐसे ही सरल, स्पष्ट, और खरे जन होते थे। तभी सम्पूर्ण मही पर आर्यसमाज का आन्दोलन सफल जन-पान्दोलन बना जिसकी छिटकी हुई चिंगारियां आज भी यत्र तत्र विकीर्ण हैं । पर आज आर्यसमाज में सदस्यों की संख्या सोद्देश्य और जीवन-निष्ठ व्यक्तित्व में नहीं रह गई है। अब सदस्यों की भर्ती, आर्य-सदस्यों की छाँट और संख्या उन सदस्यों में से की जाती है जिनकी कथनी और करनी में कहीं भी कोई मेल नहीं है । और, यही हाल है तथा- कथित सनातन-धर्मी संस्थाओं और धर्मावलम्बियों का। राजनीतिक पार्टियों का हाल तो और भी बदतर है। निष्ठा के अभाव में सदस्यता निरर्थक हो गई है। देश की स्वतन्त्रता (सामाजिक, आर्थिक और अात्मिक) को सुरक्षित रखने के लिए देश में कर्तव्यनिष्ठ और वास्तविक नेतृत्व की अब महती आवश्यकता हैअच्छा नेतत्व भी तब उपजेगा जब हमारा समाज समष्टि रूप से उन्नत, जागरूक होगाऐसे समाज में जहां जात- पति के मनमाने और मगढन्त बन्धन हैं, जहां छूत और अछतों का झगड़ा है, जहां शिक्षा अक्षरज्ञान-मात्र है, जहां पढ़े-लिखे समझे जानेवाले लोग विदेशी प्राचार और व्यवहार के भक्त हैं एवं अपढ़ तथा तथाकथित शिक्षित भी मूर्ख, गवार, अज्ञानी पुरोहितों, पुजारियों और मुल्लानों के अधीन हैं वहां किसी महान् नेतृत्व का उत्पन्न होना और उभरना कैसे सम्भव होगा ? जहां नेतृत्व स्वयं धूर्त, ठग, स्वार्थी और दुराचारी हो वहां देशोद्धार, समाजोद्धार और आत्मिक उद्धार कैसे सम्भव होगा!

चोरबाजारी, कालाबाजारी, रिश्वत, बेईमानी से धन, कीर्ति और कमाई का सम्पादन करनेवाले व्यापारी, वकील, डॉक्टर, और भ्रष्ट नौकरशाही के मात्र डिग्रीया सर्टीफ़िकेट-धारी, ये भर गए हैं सभी धर्मों, सम्प्रदायों और राजनीतिक टोलियों में । बस, यही कारण है कि भारतमही में दुःख, द्वन्द्व, क्लेश, और मन, वचन, कर्म की भ्रष्टता दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ती जारही है और महाप्रलय को बुलावा देरही है। चारों ओर अनाचार और चीत्कार भर गया है। न कोई सुनता है, और सुनकर भी, सुनाकर भी कुछ होता नहीं है।

वेद-शिक्षक और वेद की शिक्षाए भी अाज धरी रह जानी हैं। कौन अपनाएगा या अपनारहा है वेद को और वेद की शिक्षानों को जिनका प्र+चार, प्र+सार काम्य है ‘वेद-सविता’ के मोती से शब्दों में । काश, वेद-संस्थान के सदस्य (संस्थान-परिवार) ‘वेद-सविता’ के अ+क्षरों और शब्दों में आस्थावान् बनें और नवनिर्माण करें समाज का ! आइए, संख्या को छोड़, गुण-ग्राहकता की परिवृद्धि की ओर ध्यान दीजिए और बूद बूद से जीवनसागर का निर्माण कीजिए। तब कोई वास्तविक नेतृत्व पैदा होगा जो वास्तविक क्रान्ति संजो सकेगा; भ्रष्टता, संकोच, अशालीनता, अनुशासन-भ्रष्टता और अभद्रता को अपदस्थ कर उसके स्थान पर विनय, शील, सौम्यता, ‘भद्रता, आर्यता और चरित्र को स्थापित करेगा ।

जब कथनी और करनी का अन्तर समाप्त हो जाएगा तब भ्रष्टता, भय और भ्रम की हिंसा से जो अहिंसा (सत्य, न्याय) उभरेगी वह अपनी परिभाषा करेगी. ‘हिंसा से विरति ही अहिंसा है’ जो व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन का प्राण है, क्रान्ति का सोपान है।

गुरुदेव को नमन

य मे छिद्रं चक्षुषों, हृदयस्य, मनसो वातितृष्णं, बृहस्पतिर् मे तद् दधातु ।

शं नो भवतु भुवनस्य यस् पतिः ।

बहस्पति परमात्मा का नाम है । वेद के विद्वान् आचार्य को भी बृहस्पति कहा जा सकता हैहमारे जीवन की वटियाँ गुरुदेव ही दूर करते हैं । राम को विश्वामित्र ने, पाण्डवों को द्रोणाचार्य ने, शिवाजी को. समर्थ राम- दास ने और ऋषि दयानन्द को स्वामी विरजानन्द ने योग्य बनाया। अनादि काल से हमारे देश में गुरु-शिष्य की पवित्र परंपरा चली आती है।

प्रत्येक प्रात्मा मानव देह में श्राकर सुख, शान्ति, आनन्द चाहता है। किंतु ये मिलते उसी को हैं जिन पर उस भवनपति की कृपा हो गई हो और बृहस्पति गुरु की शरण में जा पड़ा हो जब तक जीवन में दोषों, विकारों के छिद्र हैं तब तक सुख, शान्ति, आनन्द मिलना असंभव है।

ईश्वर ने इस सृष्टि को अति सुन्दर बनाया है जब भी हम सौन्दर्य को देखकर हमारे मन अथ वा शरीर किसी भी इन्द्रिय में विकार आता है तो हमारे जीवन में छिद्र या दोष या जाता है। किसी के प्रति हमारे मन में द्वेष उत्पन्न होता है तो समझो हमारा मन कट गया है, उसमें तरेड़ आ गई है, छिद्र हो गया है किसी के प्रति हमारे मन में दुर्भावना पाती है तो, जानो हमारे मन में छिद्र हो गया है । यही सब कुवास- नायों की तरे. व छिद्र जीवन को अशान्त व वेहाल कर देते हैं। उस व्याकुलता के समय ईशकृपा और वहस्पति गुरु के सहारे ही मानव मुक्ति प्राप्त करता है। मेरे जीवन की त्रुटियों को गुरु दूर करे ताकि एक एक व्यक्ति के पवित्र होने से सर्वत्र सुख हो-परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व में सुख शान्ति हो ।

छिद्र का होना अत्यन्त हानिकारक हैशरीर के एक अंग में फोड़ा निकला तो सारा शरीर दु:खी होगा। परिवार का एक सदस्य बिगड़ा तो सारा परिवार उसका फल भोगेगाराष्ट्र का एक हिस्सा विद्रोह करेगा तो सारा राष्ट्र कमजोर होगा। मैं मेरी त्रुटियां दूर करू तो मेरा परिवार, समाज और राष्ट्र सभी सुख-शान्ति का अनुभव करेंगे।

यदि शीतल जल के कलश में छिद्र हो जाय तो सारा कलश खाली हो जायेगा। यात्रियों से भरी नाव में छिद्र हो जाय तो नाव डूबने से सभी मरेंगे । पैर की एड़ी में तरेड़ पड़ जाती है तो शरीर कितना कष्ट पाता है। बांध में तरेड़ पड़ने पर कई गांवों के डूबने का ख़तरा उपस्थित हो जाता है। किसी के प्रति मन में तरेड़ पा जाय तो परिवारों से सूख-शान्ति विदा हो जाती है। पूज्य स्वामी दयानन्द के मिशन के सच्चे मिशनरी गुरुदेव स्वामी विद्यानंद जी ‘विदेह’ ने त जाने कितने लोगों और परिवारों के दोषों को दर करके समाज और जाति का कल्याण किया है। ‘विदेह’ जी के ‘वेदालोक’ में इस और ऐसे अनेक मंत्रों की सन्दर व्याख्या को श्रद्धापूर्वक पढ़। वेदमाता जीवन के सब छिद्रों को पूरेगीं । असीम सख की वष्टि होगी और जीवन सार्थक होगा।

          पूज्य गुरुदेव ‘विदेह’ को सश्रद्ध नमन !

गुरुदेव को नमन

य मे छिद्रं चक्षुषों, हृदयस्य, मनसो वातितृष्णं, बृहस्पतिर् मे तद् दधातु ।

शं नो भवतु भुवनस्य यस् पतिः ।

बहस्पति परमात्मा का नाम है । वेद के विद्वान् आचार्य को भी बृहस्पति कहा जा सकता हैहमारे जीवन की वटियाँ गुरुदेव ही दूर करते हैं । राम को विश्वामित्र ने, पाण्डवों को द्रोणाचार्य ने, शिवाजी को. समर्थ राम- दास ने और ऋषि दयानन्द को स्वामी विरजानन्द ने योग्य बनाया। अनादि काल से हमारे देश में गुरु-शिष्य की पवित्र परंपरा चली आती है।

प्रत्येक प्रात्मा मानव देह में श्राकर सुख, शान्ति, आनन्द चाहता है। किंतु ये मिलते उसी को हैं जिन पर उस भवनपति की कृपा हो गई हो और बृहस्पति गुरु की शरण में जा पड़ा हो जब तक जीवन में दोषों, विकारों के छिद्र हैं तब तक सुख, शान्ति, आनन्द मिलना असंभव है।

ईश्वर ने इस सृष्टि को अति सुन्दर बनाया है जब भी हम सौन्दर्य को देखकर हमारे मन अथ वा शरीर किसी भी इन्द्रिय में विकार आता है तो हमारे जीवन में छिद्र या दोष या जाता है। किसी के प्रति हमारे मन में द्वेष उत्पन्न होता है तो समझो हमारा मन कट गया है, उसमें तरेड़ आ गई है, छिद्र हो गया है किसी के प्रति हमारे मन में दुर्भावना पाती है तो, जानो हमारे मन में छिद्र हो गया है । यही सब कुवास- नायों की तरे. व छिद्र जीवन को अशान्त व वेहाल कर देते हैं। उस व्याकुलता के समय ईशकृपा और वहस्पति गुरु के सहारे ही मानव मुक्ति प्राप्त करता है। मेरे जीवन की त्रुटियों को गुरु दूर करे ताकि एक एक व्यक्ति के पवित्र होने से सर्वत्र सुख हो-परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व में सुख शान्ति हो ।

छिद्र का होना अत्यन्त हानिकारक हैशरीर के एक अंग में फोड़ा निकला तो सारा शरीर दु:खी होगा। परिवार का एक सदस्य बिगड़ा तो सारा परिवार उसका फल भोगेगाराष्ट्र का एक हिस्सा विद्रोह करेगा तो सारा राष्ट्र कमजोर होगा। मैं मेरी त्रुटियां दूर करू तो मेरा परिवार, समाज और राष्ट्र सभी सुख-शान्ति का अनुभव करेंगे।

यदि शीतल जल के कलश में छिद्र हो जाय तो सारा कलश खाली हो जायेगा। यात्रियों से भरी नाव में छिद्र हो जाय तो नाव डूबने से सभी मरेंगे । पैर की एड़ी में तरेड़ पड़ जाती है तो शरीर कितना कष्ट पाता है। बांध में तरेड़ पड़ने पर कई गांवों के डूबने का ख़तरा उपस्थित हो जाता है। किसी के प्रति मन में तरेड़ पा जाय तो परिवारों से सूख-शान्ति विदा हो जाती है। पूज्य स्वामी दयानन्द के मिशन के सच्चे मिशनरी गुरुदेव स्वामी विद्यानंद जी ‘विदेह’ ने त जाने कितने लोगों और परिवारों के दोषों को दर करके समाज और जाति का कल्याण किया है। ‘विदेह’ जी के ‘वेदालोक’ में इस और ऐसे अनेक मंत्रों की सन्दर व्याख्या को श्रद्धापूर्वक पढ़। वेदमाता जीवन के सब छिद्रों को पूरेगीं । असीम सख की वष्टि होगी और जीवन सार्थक होगा।

          पूज्य गुरुदेव ‘विदेह’ को सश्रद्ध नमन !

इच्छा करना ही पर्याप्त नहीं है

अधिकतर लोग अपने घर में चुपचाप पड़े रहते हैं। दुनियां में क्या होरहा है, इसकी उनको कोई परवाह नहीं होती। उनसे कोई पूछे कि ख़ामोश क्यों बैठे हो तो वे जवाब देंगे-अकेले हम क्या कर सकते हैं ? ‘

अकेला भी नगण्य तो नहीं होतारेत का कण कितना छोटा होता है; पर वही अन्य कणों के साथ मिल कर समुद्र का किनारा बनाता है। पानी की बूद छोटी होती है; पर समुद्र उसी से बनता है ।

सन्त भी आदमी ही होता है साढ़े तीन हाथ का। प्राणिमात्र से प्रेम का व्यवहार करके वह मानव से महा- मानव बन जाता है। आप सुख, शान्ति और आनन्द तो चाहते हैं, यश भी चाहते हैं; पर इसके लिए कर क्या रहे हैं ? जो आप चाहते हो उसके लिए आप कुछ कीजिए भी। केवल इच्छा करना पर्याप्त नहीं है । वैठे रहने से काम नहीं चलेगासफलता की चोटी पर पहुँचने वाले हर व्यक्ति ने बिलकुल नीचे से उठना प्रारम्भ किया था ।

एक जलती हुई बत्ती कई वत्तियों के जलने के लिए सहारा बनती हैअपनी बत्ती जलायो दूसरों को भी बत्ती जलाने में मदद करो। तब अंधकार भागेगाअंधकार को कोसने के बदले एक बत्ती जलाना बेहतर है।

इसलिए अपनी और दूसरों की भलाई के लिए, लक्ष्य को पाने के लिए केवल इच्छा ही मत रखिए । उठिए, आगे बढ़िये, काम कीजिए, धीरज धरिये और सफलता पाईये ।

अमर बलिदानी खुदीराम बोस

3 दिसंबर जन्म-दिवस पर प्रकाशित

भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में अनेक कम आयु के वीरों ने भी अपने प्राणों की आहुति दी है। उनमें खुदीराम बोस का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है। उन दिनों अनेक अंग्रेज अधिकारी भारतीयों से बहुत दुर्व्यवहार करते थे। ऐसा ही एक मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड उन दिनों मुज्जफरपुर, बिहार में तैनात था। वह छोटी-छोटी बात पर भारतीयों को कड़ी सजा देता था। अतः क्रान्तिकारियों ने उससे बदला लेने का निश्चय किया।

कोलकाता में प्रमुख क्रान्तिकारियों की एक बैठक में किंग्सफोर्ड को यमलोक पहुँचाने की योजना पर गहन विचार हुआ। उस बैठक में खुदीराम बोस भी उपस्थित थे। यद्यपि उनकी अवस्था बहुत कम थी; फिर भी उन्होंने स्वयं को इस खतरनाक कार्य के लिए प्रस्तुत किया। उनके साथ प्रफुल्ल कुमार चाकी को भी इस अभियान को पूरा करने का दायित्व दिया गया।

योजना का निश्चय हो जाने के बाद दोनों युवकों को एक बम, तीन पिस्तौल तथा 40 कारतूस दे दिये गये। दोनों ने मुज्जफरपुर पहुँचकर एक धर्मशाला में डेरा जमा लिया। कुछ दिन तक दोनों ने किंग्सफोर्ड की गतिविधियों का अध्ययन किया। इससे उन्हें पता लग गया कि वह किस समय न्यायालय आता-जाता है; पर उस समय उसके साथ बड़ी संख्या में पुलिस बल रहता था। अतः उस समय उसे मारना कठिन था।

अब उन्होंने उसकी शेष दिनचर्या पर ध्यान दिया। किंग्सफोर्ड प्रतिदिन शाम को लाल रंग की बग्घी में क्लब जाता था। दोनों ने इस समय ही उसके वध का निश्चय किया। 30 अपै्रल, 1908 को दोनों क्लब के पास की झाड़ियों में छिप गये। शराब और नाच-गान समाप्त कर लोग वापस जाने लगे। अचानक एक लाल बग्घी क्लब से निकली। खुदीराम और प्रफुल्ल की आँखें चमक उठीं। वे पीछे से बग्घी पर चढ़ गये और परदा हटाकर बम दाग दिया। इसके बाद दोनों फरार हो गये।

परन्तु दुर्भाग्य की बात कि किंग्सफोर्ड उस दिन क्लब आया ही नहीं था। उसके जैसी ही लाल बग्घी में दो अंग्रेज महिलाएँ वापस घर जा रही थीं। क्रान्तिकारियों के हमले से वे ही यमलोक पहुँच गयीं। पुलिस ने चारों ओर जाल बिछा दिया। बग्घी के चालक ने दो युवकों की बात पुलिस को बतायी। खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी सारी रात भागते रहे। भूख-प्यास के मारे दोनों का बुरा हाल था। वे किसी भी तरह सुरक्षित कोलकाता पहुँचना चाहते थे।

प्रफुल्ल लगातार 24 घण्टे भागकर समस्तीपुर पहुँचे और कोलकाता की रेल में बैठ गये। उस डिब्बे में एक पुलिस अधिकारी भी था। प्रफुल्ल की अस्त व्यस्त स्थिति देखकर उसे संदेह हो गया। मोकामा पुलिस स्टेशन पर उसने प्रफुल्ल को पकड़ना चाहा; पर उसके हाथ आने से पहले ही प्रफुल्ल ने पिस्तौल से स्वयं पर ही गोली चला दी और बलिपथ पर बढ़ गये।

इधर खुदीराम थक कर एक दुकान पर कुछ खाने के लिए बैठ गये। वहाँ लोग रात वाली घटना की चर्चा कर रहे थे कि वहाँ दो महिलाएँ मारी गयीं। यह सुनकर खुदीराम के मुँह से निकला – तो क्या किंग्सफोर्ड बच गया ? यह सुनकर लोगों को सन्देह हो गया और उन्होंने उसे पकड़कर पुलिस को सौंप दिया। मुकदमे में खुदीराम को फाँसी की सजा घोषित की गयी। 11 अगस्त, 1908 को हाथ में गीता लेकर खुदीराम हँसते-हँसते फाँसी पर झूल गये। तब उनकी आयु 18 साल 8 महीने और 8 दिन थी। जहां वे पकड़े गये, उस पूसा रोड स्टेशन का नाम अब खुदीराम के नाम पर रखा गया है।

#KhudiramBose
#खुदीराम_बोस

अक्ल बड़ी या भैस

अक्ल बड़ी या भैस

             बुद्धि  से सब काम हल किये जा सकते हैं। एक जंगल में एक बहुत बलशाली शेर रहता था। उससे सब जानवर परेशान थे क्यों कि वह किसी को भी मारकर खा जाया करता था। सबने  मिलकर शेर से प्रार्थना की कि हम प्रतिदिन एक पशु दे देंगे, निरीह पशुओं की हत्या मत करो ।

           शेर ने बात मान ली। बोला, ‘यदि किसी भी दिन मेरे लिए समय पर भोजन न पाया तो मैं जंगल के सारे पशुओं को मार डालूगा।’

            अब जंगल में पशु भी निश्चित थे और शेर भी। प्रतिदिन एक जानवर की बारी पाती थी और शेर को बिना परिश्रम भोजन मिल जाता था।.

           ऐसा करते-करते एक दिन खरगोश की बारी आई। उसने एक योजना बनाई

          वह शेर के पास कुछ देर से पहुंचा। शेर बहुत गुस्सा हो रहा था । बोला, ‘एक तो ऐसे ही तू तीन तोले का है, और दूसरे इतनी देर लगाकर पाया । तुझे खाने के बाद आज मैं सारे पशुओं को मार डालूगा ।

           खरगोश गिड़गिड़ाते हए बोला, ‘स्वामी ! देर से पाने का कारण आप पहले सुन लीजिए, इसमें हमारा कोई अपराध नहीं है।’ 

            खरगोश ने कहा, ‘महाराज ! आज आपके भोजन के लिए मेरे अलावा चार खरगोश और भेजे गए थे। रास्ते में एक दूसरा शेर मिल गया। चार को वह खा गया । मैं जान बचा कर आपको  सूचना देने आया हूँ।’

            शेर बोला, ‘मुझे उसके पास ले चलो। आज मैं उसका खून पीकर रहूंगा।’

             खरगोश बोला, ‘स्वामी ! दूसरा शेर एक किले में रहता है । उस पर विजय पाना बहुत मुश्किल है ।’

          खरगोश शेर को एक कुए के पास ले गया और बोला, ‘महाराज ! पापको दूर से ही देखकर वह अपने किले के भीतर भाग गया है । आप चाहें तो मैं आपको उसकी सूरत दिखा सकता हूँ।’

          खरगोश शेर को कुए की जगत पर ले गया। शेर ने अपनी छाया को कुए में देखा और उसे दूसरा शेर समझा। वह बहुत जोर से गरजा उसकी प्रतिध्वनि कुएं से लौट आई। उस प्रतिध्वनि को उसने दूसरे शेर की ललकार समझा। गुस्से से वह अपनी छाया पर ही कूद गया। उसके प्राण पखेरू उड़ गये ।

           शेर की मृत्यु का समाचार सुनकर सारे जानवर अतिप्रसन्न हुए । खरगोश को बहुत सम्मान दिया गया ।

          जिसके पास बुद्धिबल है वही बलशाली होता है ।

यज्ञ का क्रय-विक्रय

पूर्णा दर्वि परा पत सुपूर्णा पुनरार्पत। वस्नेव विक्रीणावहाऽइषमूर्ज शतक्रतो॥ -यजु० ३।४९ (दर्वि) हे सुवा! तू (पूर्णा) घृत से भरी हुई (परापत) यज्ञकुण्ड में जाकर गिर। वहाँ से (सुपूर्णा) खूब भरी हुई (पुनः आ पत) फिर हमारे पास आ । इस प्रकार हे (शतक्रतो) सैंकड़ों यज्ञों के कर्ता इन्द्र परमेश्वर ! हम (वस्ना इव) जैसे मूल्य से किसी वस्तु का क्रय-विक्रय किया जाता है, वैसे ही (इषम्) अन्न, रस आदि तथा (ऊर्जम्) बल, प्राण, स्वास्थ्य आदि (वि क्रीणावहै) विशेषरूप से खरीदें। क्या तुम सोचते हो कि यज्ञ में घृत से भरी हुई खुवा जब अग्नि में घृत उंडेलती है, तब हमारे पास वापिस आती हुई वह खाली होती है? यदि ऐसा सोचते हो तो तुम भ्रम में हो। यदि ऐसा होता तो वेदादि शास्त्रों में यज्ञ की असीम महिमा वर्णित न होती। यज्ञ तो देने-लेने का व्यापार है। उसमें व्यय भी है, आय भी है। भौतिकता की दृष्टि से देखें तो हम अग्नि को हवि देते हैं, बदले में अग्नि जल-वायु की शुद्धि करके तथा हमारे शरीर में श्वास के साथ स्वास्थ्यवर्धक हवि का अंश पहुँचा कर हमें स्वास्थ्य तथा दीर्घायुष्य प्रदान करता है। अग्नि की ऊर्ध्वगामी ज्वालाओं से हम ऊर्ध्वगामी होने की प्रेरणा लेते हैं। अग्नि के ताप और प्रकाश से हम तपस्वी और प्रकाशवान् होने का सन्देश ग्रहण करते हैं। अग्नि के मलिनताओं को भस्म करने के गुण से हम अपने पाप-ताप को भस्म करने का व्रत लेते हैं। जब हम ‘इन्द्राय स्वाहा’ बोलकर इन्द्र को आहुति प्रदान करते हैं, तब शतक्रतु इन्द्र से अर्थात् इन्द्र प्रभु के सृष्ट्युत्पत्ति, सृष्टिसञ्चालन, ऋतु-निर्माण, संवत्सर-रचना, जल-वाष्पीकरण, वृक्षारोपण, पुष्प-विकास, नदी-प्रवाह, ग्रहोपग्रह-व्यवस्था, तारकावलि-प्रकाशन आदि शत-शत यज्ञों की साधनारूप खुवा से हम यज्ञभावना को अपने अन्दर जागृत करते हैं। इस प्रकार यज्ञ की खुवा जब अग्नि में आहुति डाल कर वापिस आती है, तब वह खाली नहीं होती, प्रत्युत वह स्वास्थ्य, दीर्घायुष्य, ऊध्र्वज्वलन, तप, प्रकाश, निष्पापता, त्याग, आस्तिकता आदि से भरपूर होती है। जितनी बार सुवा से हम अग्नि में हवि का त्याग करते हैं, उतनी ही बार वह उत्तम ऐश्वर्यों से भरी-पूरी होती हुई हमारे पास वापिस आकर उन ऐश्वर्यों को हमारे मानस में उंडेल देती है। इस प्रकार जैसे कोई मूल्य देकर बदले में बहुमूल्य वस्तुएँ प्राप्त करता है वैसे ही अग्नि में हवि देकर बदले में हम नाना भौतिक एवं आध्यात्मिक ऐश्वर्यों को प्राप्त कर लेते हैं। एवं यह क्रय विक्रय का व्यापार अग्निहोत्र में निरन्तर चलता रहता है। इस मन्त्र के दयानन्दभाष्य के भावार्थ में लिखा है-“जो मनुष्यों द्वारा सुगन्धि आदि द्रव्य अग्नि में होम किया जाता है। वह ऊपर जाकर वायु, वृष्टिजल आदि को शुद्ध करके पुनः पृथिवी पर आ जाता है, जिससे यव आदि ओषधियाँ शुद्ध होकर सुख और पराक्रम को देनेवाली हो जाती हैं। जैसे व्यापारी रुपया आदि दे-लेकर अन्न आदि अन्य द्रव्यों को खरीदते-बेचते हैं, वैसे ही अग्नि में द्रव्यों की आहुति देकर वृष्टि, सुख आदि को खरीदता है और वृष्टि, ओषधि आदि को लेकर पुनः वृष्टि के लिए अग्नि में होम करता है।”

रामनाथ विद्यालंकार

वेद, वेद मंत्र, वेद विशेष, हिन्दी अग्न्याधान

अग्न्याधान ऋषिः प्रजापतिः।

देवताः अग्नि-वायु-सूर्याः।

छन्दः क. दैवीबृहती, र.

निवृद् आर्षी बृहती। भूर्भुवः स्वर्’ द्यौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा। तस्यास्ते पृथिवि देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादमुन्नाद्ययोदधे। -यजु०३।५ ( भूःभुवःस्वः ) सत्-चित्-आनन्द, पृथिवी-अन्तरिक्षद्यौ, अग्नि-वायु-आदित्य, ब्रह्म-क्षत्र-विट् का ध्यान करता हूँ। मैं ( भूम्ना) बाहुल्य से ( द्यौःइव) द्युलोक के समान हो जाऊँ, ( वरिम्णा) विस्तार से ( पृथिवी इव) भूमि के समान हो जाऊँ। ( देवयजनिपृथिवि ) हे देव यज्ञ की स्थली भूमि! ( तस्याःतेपृष्ठे ) उस तुझे भूमि के पृष्ठ पर ( अन्नादम्अग्निम्) हव्यान्न का भक्षण करने वाली अग्नि को ( अन्नाद्याय) अदनीय अन्नादि का भक्षण करने के लिए ( आदधे ) आधान करता हूँ/करती हूँ। अग्न्याधान से पूर्व व्याहृतियों द्वारा सच्चिदानन्दस्वरूप परमेश्वर का स्मरण करते हैं। शतपथ ब्राह्मण में भूः, भुवः, स्व: पूर्वक आहवनीय अग्नि के आधान का विधान करते हुए इन का सम्बन्ध क्रमशः पृथिवी-अन्तरिक्ष-द्यौ, ब्रह्म-क्षत्र-विट् तथा आत्मा-प्रजा-पशुओं से बताया गया है। इन सब में अपने-अपने प्रकार की अग्नि का वास है। तैत्तिरीय आरण्यक एवं तैत्तिरीय उपनिषद्में इन व्याहृतियों को क्रमशः भूलोक अन्तरिक्ष लोक-द्युलोक, अग्नि-वायु-आदित्य, ऋक्-साम-यजुः और प्राण-अपान-उदान का वाचक कहा है। वहाँ इनके द्वारा विधि करने का फल यह बताया गया है कि भू: के द्वारा अग्नि में, भुवः के द्वारा वायु में और स्वः के द्वारा आदित्य में प्रतिष्ठित हो जाता है, अर्थात् इन-इन के ऐश्वर्य का अधिकारी हो जाता है। इनका ध्यान करने वाला आत्मराज्य को और मन सस्पति को प्राप्त कर लेता है। वह वाक्पति, चक्षुष्पति, श्रोत्रपति हो जाता है, क्योंकि अध्यात्म में भूः, भुवः, स्व: का सम्बन्ध वाक्, चक्षु और श्रोत्र से भी है। आगे यजमान कहता है कि बाहुल्य (भूमा) में मैं द्युलोक के समान हो जाऊँ, अर्थात जैसे द्यलोक में बहत-से नक्षत्र हैं। और इनकी रश्मियाँ हैं, वैसे ही मेरे अन्दर भी बहुत से सद्गुण रूप नक्षत्र एवं दिव्य अन्त: प्रकाश की किरणें उत्पन्न हों। फिर कहता है कि विस्तार में मैं पृथिवी के समान हो जाऊँ, अर्थात् मेरे आत्मा में अपनत्व का विकास इतना हो जाए कि सारी वसुधा को ही अपना कुटुम्ब मानने लगूं। फिर वह पृथिवी को सम्बोधन कर कहता है कि तुम ‘देवयजनी’ हो, अर्थात् तुम्हारे पृष्ठ पर सदा ही देवयज्ञ या अग्निहोत्र होते रहे हैं। अतः मैं भी तुम्हारे पृष्ठ पर अन्नाद (हव्यान्नभक्षी) अग्नि का आधान करता हूँ, जिससे वह अग्नि अदनीय (भक्षणीय) अन्नादि हव्य का भक्षण करके उसकी सुगन्ध को चारों ओर फैलाकर वातावरण को शुद्ध एवं रोग-परमाणुओं से रहित कर सके। शतपथ ब्राह्मण कहता है कि जैसे नवजात बच्चे को उस के भक्षण योग्य मातृ स्तन का दूध दिया जाता है, ऐसे ही नवजात अग्नि को उसके अदन के योग्य ही हव्यान्न दिया जाना चाहिए, अतःअन्नाद्य ( अद्य-अन्न) शब्द रखा गया है। * अन्नाद्याय’ का दूसरा भाव यह भी हो सकता है कि ‘भक्षणीयअन्न’ की प्राप्ति के लिए मैं अग्नि का आधान करता हूँ। अग्नि में डाली हुई आहुति आकाश में मेघमण्डल उत्पन्न करके वृष्टि द्वारा अन्नोत्पत्ति में कारण बनेगी और मुझे भक्षणीय अन्न प्राप्त होगा।* अग्न्याधान पाद–टिप्पणियाँ १.श०२.१.४.१०-१४॥ २. तै०आ०७.५.१-३, तै०उ०शिक्षावल्ली५.१-४।। ३. भूरित्यग्नौप्रतितिष्ठति।भुवइतिवायौ।सुवरियादित्ये। | मह इतिब्रह्मणि।आप्नोति स्वाराज्यम्।आप्नोतिमनसस्पतिम्।। वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः।श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिःएतत्ततोभवति। -तै० आ०७.६.१.२, तै०उ०शिक्षावल्ली६.१,२। ४. यथासौद्यौर्बह्नी नक्षत्रैरैवंबहुर्भूयासम्इत्येवैतदाहयदाहद्यौरिवभूम्नेति। | –शे०२.१.४.८५.पृथिवीव वरिण्णेति । यथेयं पृथिवी उर्वी एवम् उरुर्भूयासम् इत्येवैतदाह। —श० २.१.४.२८अन्नाद्याय। अन्नं च तद् अद्यं चेति अन्नाद्यम् । ‘अद्यान्नाय’ इति प्राप्त आहिताग्न्यादित्वात्परनिपातः, पा० २.२.३६ ।।७. श० २.१.५.१। अग्न्याधान Post navigation PREVIOUS POST रामका परम मित्र महावीर हनुमानको आदर्श तथा अनुकरणीय जीवन