Mahrshi Dayanand Sarasvati

1_कोई प्रभु-भक्त है तो विद्वान नही,
कोई विद्वान है तो योगी नही,
कोई योगी है तो सुधारक नही,
कोई सुधारक है तो दिलेर नही,
कोई दिलेर है तो ब्रह्मचारी नही,
कोई ब्रह्मचारी है तो लेखक नही,
कोई लेखक है तो सदाचारी नही,
कोई सदाचारी है तो परोपकारी नही,
कोई परोपकारी है तो कर्मठ नही,
कोई कर्मठ है तो त्यागी नही,
कोई त्यागी है तो देशभक्त नही,
कोई देशभक्त है तो वेदभक्त नही,
कोई वेदभक्त है तो उदार नही,
कोई उदार है तो शुद्धाहारी नही,
कोई शुद्धाहारी है तो योद्धा नही,
कोई योद्धा है तो सरल नही,
कोई सरल है तो सुन्दर नही,
कोई सुन्दर है तो बलिष्ठ नही,
कोई बलिष्ठ है तो दयालु नही,
कोई दयालु है तो सयंमी नही…
परन्तु यदि आप ये सभी गुण एक ही स्थान पर देखना चाहे
तो “महर्षि दयानन्द” को देखो.—-महान समाज सुधारक , वेदों का उद्धारक , अंधश्रद्धा निर्मूलन के महान योद्धा ,शारीरिक ,आत्मिक ,सामाजिक उन्नतिके प्रणेता , स्वराज शब्द के जनक ,अपने देश में अपना राज के मंन्त्र दृष्टा , मानव मात्र के उद्धारक ,आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के जन्म दिवस की बधाई ।

*मृतक श्राध्द एक पाखण्ड*
श्राध्द और तृपण के सत्य वैदिक स्वरूप को जाने… और अन्ध विश्वास को त्यागे…!!!
प्रिय बन्धुओं !
अपने हिन्दू समाज में अनेक भ्रान्त प्रथायें प्रचलित हैं | उनमें *मृतकों का श्राध्द* भी एक बहुत ही विचित्र तथा भ्रान्ति पूर्ण प्रथा है | वास्तव में बहुत से लोगों ने *पितर, श्राध्द और तृपण* शब्दों के अर्थ का अनर्थ कर इनहें अपनी जीविका का साधन बना रखा है |
इस लेख के माध्यम से हम आपके सामने “पितर, श्राध्द और तृपण” के वैदिक स्वरूप को रखेगें जिससे आप “मृतक श्राध्द” रूपी पाखण्ड से बच सके और अपना व समाज का उपकार कर सके |
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अनुसार…
“श्रत्सत्यं दधाति यया क्रियया सा श्रध्दा, श्रध्दया यत्क्रियते तच्छ्राध्दम्”
अर्थात्
जिससे सत्य को ग्रहण किया जाये उसको ‘श्रध्दा’ और जो-जो श्रध्दा से सेवारूप कर्म किये जाए उनका नाम *श्राध्द* है ||
तृप्यन्ति तर्पयन्ति येन पितृन् तत्तर्पणम्
अर्थात्
जिस-जिस कर्म से तृप्त अर्थात् विद्यमान मातादि पितर प्रसन्न किये जायें, उसका नाम *तर्पण* है ||
उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि श्रध्दा से सेवाकर पितरो को तृप्त करना ही श्राध्द और तृपण कहलाता है |
अब प्रश्न उठता है कि पितर किसे कहते है जिसकी सेवा द्वारा श्राध्द और तर्पण किया जा सके…
महर्षि मनु के अनुसार पितर पाँच है या अग्रलिखित पाँच को कहते हैं…
“जनकश्चोपनेता च यश्च विद्यां प्रयच्छति | अन्नदाता भयत्राता पञ्चेते पितरः स्मृतः ||
अर्थात्
पितर पाँच है...
(१) जन्म देने वाले ‘माता-पिता’ |
(२) उपनयन की दीक्षा देने वाला ‘आचार्य’ |
(३) विद्या पढ़ाने वाला ‘गुरू’ |
(४) अन्न देने वाला |
(५) रक्षा करने वाला |
यदि थोड़ी सी बुध्दि लगाए तो ये पाँचों ही ‘जीवित पितर’ है न कि मृतक |
अतः श्रध्दा से उपर्युक्त आये पाँचो यथा माता पिता आचार्य आदि जीवित जनों की प्रति दिन सेवा करना ही *श्राध्द* कहलाता है |
तथा वो सेवा ऐसी हो जिससे ये जीवित पितर तृप्त अर्थात् संतुष्ट हो जाये इसी का नाम *तृपण* है |
परन्तु मित्रों आज कल उलटा ही देखा जा रहा है जब तक माता पिता जीवित रहते है तब तक तो सन्तान प्रायः उनकी उपेक्षा करता है | सेवा आदि की बात तो दूर उनको जल और भोजन भी समय पर नहीं दिया जाता | गुरूओं के साथ भी विद्यार्थी प्रायः अभद्र व्यवहार करते है |
और मृतक श्राध्द को करना अपने कर्त्तव्य की मूर्ति मान रहे है | यही कारण है कि वर्तमान में प्रत्येक गृहस्थी दुःखी है |
अतः मृतक श्राध्द रूपी पाखण्ड का त्याग करो और जीवित माता पिता आचार्य आदि की सेवा करो यही सच्चा और श्राध्द का वैदिक स्वरूप है |
इति ओ३म् …!
धर्म की जय हो ! पाखण्ड का नाश हो !!
aryasamaj indore 9977987777,आर्य समाज बैंक कालोनी,आर्य समाज मंदिर पलासिया ,आर्य समाज मुसाखेरी इंदौर.

महर्षि दयानन्द सरस्वती
om1महर्षि दयानन्द समस्त विश्व के गुरू वा आचार्य थे। उन्होंने पक्षपात रहित होकर संसार के सभी मनुष्यों के प्रति भ्रातृभाव रखते हुए उनके कल्याण की भावना से वेदों के ज्ञान से उनका शुभ करने के लिए वेद प्रचार का प्रशंसनीय व अपूर्व कार्य किया था। बहुत से मताग्रही लोगों ने उनके यथार्थ अभिप्राय को जानने का प्रयास नहीं किया और उनके विरोधी बन गये। हम विदेशी मतों व सम्प्रदायों की बात तो क्या करें, स्वयं हमारे देश के वेद को मानने वाले पौराणिक लोगों ने उनका विरोध ही नहीं किया अपितु अनेक लोगों ने उनके प्राणहरण की अनेक बार कुचेष्टायें की। महर्षि ने जब वेद प्रचार कार्य आरम्भ किया था, तभी से वह जानते थे कि देश व विदेशी मतों के अज्ञानी व स्वार्थी लोग उनका विरोध करेंगे और उनके प्राण संकटग्रस्त रहेंगे। इस पर भी उन्होंने वेद प्रचार के मार्ग को चुना था क्योंकि सत्य को जाने, अपनायें व धारण किये बिना मनुष्य जाति की उन्नति सम्भव नहीं थी। यह सब कुछ होने पर भी अनेक मत-मतान्तरों के अनेक सुधी व निष्पक्ष लोगों ने स्वामी जी व उनके कार्यों के महत्व को समझा था और उन्होंने निःसंकोच भाव से उसे सार्वजनिक रूप से प्रकट भी किया था। ऐसे ही एक ‘युगपुरूष हिन्दी के साहित्यकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी’ थे। आज हम उनकी महर्षि दयानन्द को दी गई श्रद्धाजलि के शब्दों को प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रद्धाजंलि में प्रस्तुत शब्दों को बार-बार पढ़ने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि यदि संसार के सभी मतावलम्बी निष्पक्ष होकर महर्षि दयानन्द व उनके कार्यों का अवलोकन करते तो भले ही वह उनके अनुयायी बनते या न बनते, परन्तु उनका निष्कर्ष अवश्य ही महावीरप्रसाद द्विवेदी जी के विचारों के अनुरूप होता। यहां यह भी उल्लेख कर दें कि हम कुछ समय पूर्व उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द जी के महर्षि दयानन्द के चित्र को अपने घरों में लगाने के समर्थन व यह चित्र लगाना मूर्तिपूजा न होकर उन्हें किस प्रकार से उनके कर्तव्यों की प्रेरणा करता है, सम्बंधी विचारों को प्रस्तुत कर चुके हैं। उसकी पुष्टि महावीर प्रसाद द्विवेद्वी जी के लेख से भी हो रही है। अब द्विवेदी जी द्वारा प्रस्तुत विचार प्रस्तुत हैं: ‘‘सनातन धर्मावलम्बियों की सन्तति होने और देवी-देवताओं के सम्मुख सिर झुकाने पर भी मेरे हृदय में श्री स्वामी दयानन्द जी सरस्वती पर अगाध श्रद्धा है। वे बहुत बड़े समाज-संस्कर्ता, वेदों के बहुत बड़े ज्ञाता तथा समयानुकूल भाष्यकर्त्ता और आर्य संस्कृति के बहुत बड़े पुरस्कर्ता थे। उन्होंने जिस समाज की संस्थापना की है, उससे भी अपने देश, अपने धर्म और अपनी भाषा को बहुत लाभ पहुंच रहा है। मैं स्वामी जी की विद्वता और उनके कार्यकलाप को अभागे भारत के सौभाग्य का सूचक चिन्ह समझता हूं। उनका चित्र चिरकाल तक मेरे नेत्रों के सामने रहकर मेरी आत्मा को बल का तथा मेरे बैठने के कमरे को शोभा का, दान देता रहा है। स्वामी जी के विषय में इससे अधिक लिखने की शक्ति इस समय मेरे जराजीर्ण शरीर में नहीं। अतएव- धन्यंच प्राज्ञमूर्धन्यं दयानन्दं दयाधनम्। स्वामिनं तमहं वन्दे वारं वारंच सादरम्।।” हम अपने पौराणिक विद्वानों से पूछना चाहिते हैं कि क्या वह श्री महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के इस कथन से असहमति रखते हैं? जो व्यक्ति महर्षि दयानन्द सरस्वती के किसी व किन्हीं विचारों से असहमति रखते हैं वह स्वयं से प्रश्न करें कि क्या उन्होंने निष्पक्ष भाव से महर्षि दयानन्द के ग्रन्थों का अध्ययन किया है? हमारे पास ऐसे अनेकों प्रमाण हैं कि जब किसी निष्पक्ष पौराणिक विद्वान ने महर्षि दयानन्द के विचारों व सिद्धान्तों का निष्पक्ष भाव से अध्ययन किया तो वह सदा सदा के लिए उनका अनुयायी बन गया। अनेक मतों में भी उनके ऐसे अनुयायी हुए या बने हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए हम स्वामी सर्वदानन्द सरस्वती का नाम प्रस्तुत करते हैं जो कट्टर पौराणिक साधू थे परन्तु रोगग्रस्त होने पर एक आर्यसमाजी द्वारा उनकी सेवा सुश्रुषा करने और विदाई के समय उस बन्धु द्वारा उन्हें कपड़ें में लपेट कर सत्यार्थप्रकाश भेंट करने और उनसे विनती करने कि जब समय मिले इस पुस्तक को अवश्य पढ़े। सेवाभावी आर्यसमाजी भक्त के इन शब्दों व विपदकाल में उनकी सेवा ने स्वामीजी को पुस्तक पढ़ने के लिए विवश किया और पुस्तक पढ़ने के बाद स्वामी जी पूरी तरह बदल गए और महर्षि दयानन्द के अनुयायी बन गये। उन्होंने मृत्यु पर्यन्त आर्य सन्यासी बनकर देश व वैदिक धर्म की अनेकविध प्रशंसनीय सेवा की।
आर्य समाज संचार नगर,इंदौर( म.प्र.)9977987777,