• “स्वाहा” शब्द का अर्थ •

• Meaning of the word “Swaahaa” •
————————–

– स्वामी दयानन्द सरस्वती

• [संस्कृत में अर्थ] :

(स्वाहा) – अत्र स्वाहा-शब्दार्थे प्रमाणं निरुक्तकारा आहुः –

स्वाहाकृतयः, स्वाहेत्येतत्सु आहेति वा स्वा वागाहेति वा स्वं प्राहेति वा स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा। तासामेषा भवति॥

– निरु॰ अ॰ 8। खं॰ 20॥

स्वाहाशब्दस्यायमर्थः

(सु आहेति वा) सु सुष्ठु कोमलं मधुरं कल्याणकरं प्रियं वचनं सर्वैर्मनुष्यैः सदा वक्तव्यम्।

(स्वा वागाहेति वा) या ज्ञानमध्ये स्वकीया वाग्वर्त्तते, सा यदाह तदेव वागिन्द्रियेण सर्वदा वाच्यम्।

(स्वं प्राहेति वा) स्वं स्वकीयपदार्थं प्रत्येव स्वत्वं वाच्यं, न परपदार्थं प्रति चेति

(स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा) सुष्ठु रीत्या संस्कृत्य संस्कृत्य हविः सदा होतव्यमिति स्वाहाशब्दपर्य्यायार्थाः।

• [आर्यभाषा = हिंदी में अर्थ] :

(स्वाहा॰) इस शब्द का अर्थ निरुक्तकार यास्कमुनि जी ने अनेक प्रकार से कहा है। सो लिखते हैं कि –

(सु आहेति वा) सब मनुष्यों को अच्छा, मीठा, कल्याण करने वाला और प्रिय वचन सदा बोलना चाहिए।

(स्वा वागाहेति वा) अर्थात् मनुष्यों को यह निश्चय करके जानना चाहिए, कि जैसी बात उनके ज्ञान के बीच में वर्त्तमान हो, जीभ से भी सदा वैसा ही बोलें, उस से विपरीत नहीं।

(स्वं प्राहेति वा) सब मनुष्य अपने ही पदार्थ को अपना कहें, दूसरे के पदार्थ को कभी नहीं अर्थात् जितना जितना धर्मयुक्त पुरुषार्थ से उन को पदार्थ प्राप्त हो, उतने ही में सदा सन्तोष करें।

(स्वाहुतं ह॰) अर्थात् सर्व दिन अच्छी प्रकार सुगन्धादि द्रव्यों का संस्कार करके सब जगत् के उपकार करने वाले होम को किया करें और ‘स्वाहा’ शब्द का यह भी अर्थ है कि सब दिन मिथ्यावाद को छोड़ के सत्य ही बोलना चाहिए।

[स्रोत : ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथेश्वरस्तुतिप्रार्थनायाचना-समर्पणोपासनाविद्याविषयः प्रकरण]

महर्षि जी ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में भी लिखा है –

“स्वाहा’ शब्द का अर्थ यह है कि जैसा ज्ञान आत्मा में हो वैसा ही जीभ से बोले, विपरीत नहीं।”

[प्रस्तुतकर्ता: भावेश मेरजा]
samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

rajistertion call-9977987777, 9977957777, 9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

राजाराम मोहन राय ,सस्वर वेद पाठ और सती प्रथा

(राजाराम मोहन राय पर विशेष रूप से प्रचारित)

पूरे देश में सामान्यत: परन्तु बंगाल में विशेषत: सती दाह
प्रथा का ताण्डव भयंकर रूप में छाया हुआ था। यह 19 वीं
शती की घटना है।राजाराम मोहन राय ने तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक के समय में कोलकाता उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर
की।इसका पौराणिक पण्डितों ने तीव्र विरोध किया व सती दाह
प्रथा को वेदानुकूल घोषित करते हुए यह वेदमन्त्र प्रस्तुत किया-
—————–
इमा नारीरविधवा: सुपत्नीराञ्जनेन सर्पिषा सं विशंतु।
अनश्रवोऽनमीवा: सुरत्ना आरोहन्तु जनयो योनिमग्ग्रे।।
ऋग्वेद10/18/7
——–
अर्थात ये पति से युक्त स्त्रियाँ गृहकार्य में प्रवीण होकर घृतादि
पोषक भोज्य पदार्थ से शोभित हो स्वगृह में निवास करें। वे अश्रुरहित,
रोगरहित, सुन्दर रत्न युक्त एवं रम्य गुणों वाली बनाकर उत्तम सन्तानों को जन्म देने वाली स्त्रियां आदर सहित पहले गृह में प्रवेश करें (=घर में
आएं)।
——————-
बंगाल के दुष्ट व अन्धविश्वासी पण्डितों ने इस मन्त्र
को थोड़ा बदलकर न्यायालय में रखा। मन्त्र के ‘नारीरविधवा: शब्द का संधिविछेद बनता है-नारी: अविधवा:। इसे बदलकर ‘नारी विधवा कर दिया।
पदच्छेद के समय ‘र का ‘अ बना परन्तु उन्होंने ‘र को हटा ही दिया। आगे के अर्थ वही रखे-”पतिव्रता,घृतादि सुगन्धित पदार्थ से शोभित व अश्रुरहित होकर। मन्त्र के अन्त में आए शब्द ‘योनिमग्रे का अर्थ है आदरपूर्वक गृह में प्रवेश करे। इसे भी परिवर्तित करके उन्होंने इसे ‘योनिमग्ने कर दिया। जिसका अर्थ यह हो जाएगा-अग्नि में प्रवेश करे। राम मोहनराय स्वयं तो वेदों के विद्वान् न थे। अत: उन्होंने इधर-उधर सम्पर्क किया, तो पता चला कि दक्षिण भारत में कुछ पण्डित हैं, जो जटा-पाठ विधि से बोलकर इस मन्त्र का शुद्ध रूप प्रस्तुत कर सकते हैं। उन्हें बुलाया गया व उन्होंने इस मन्त्र को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा-‘नारीरविधवा: का पदच्छेद ‘नारी: अविधवा: ही बनेगा एवं ‘योनिमग्रे ही मन्त्र में है, ‘योनिमग्ने नहीं है। इस आधार पर याचिका स्वीकार की गई तथा सतीदाह कर्म पर प्रतिबन्ध लगाया गया। मिलावट पर विजय पाने की यह प्रेरक घटना है।

इस प्रकार से वेद के मन्त्रों के असत्य अर्थ निकाल कर सती प्रथा को वैदिक सिद्ध किया गया था। धन्य हैं आधुनिक भारत के विचारक राजा राममोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद जिनके प्रयासों से सती प्रथा का प्रचलन बंद हुआ।

इस मंत्र में वधु को अग्नि नहीं अपितु अग्रे अर्थात गृह में प्रवेश के समय आगे चलने को कहा गया हैं।

हमारे ऋषियों ने वेदों को कैसे सुरक्षित रखा?

(स्वामी विद्यानंद सरस्वती)

जब कोई आर्य बंधू हमारे भाइयों के ये बताने की कोशिश करता हैं की हमारे ज्यादातर ग्रंथों में मिलावट की गई है तो वो वेदों पर भी ऊँगली उठाते हैं की अगर सभी में मिलावट की गई है तो वेदों में भी किसी ने मिलावट की होगी…. मैं उन्हें बताना चाहता हूँ की हमारे ने किस तरह वेदों को सुरखित रखा… इस लेख को पूरा पढने के बाद आपको अपने भारतीय होने पे गर्व होगा की हमने ऐसे देश में और ऐसे धर्म (वैदिक ना की हिन्दू) में जन्म लिया है जो दुनिया में सबसे महान हैं…

वेदों को सुरक्षित रखने के लिए उनकी अनुपुर्वी, एक-एक शब्द और एक एक अक्षर को अपने मूल रूप में बनाये रखने के लिए जो उपाय किये गए उन्हें आज कल की गणित की भाषा में ‘Permutation and combination’ कहा जा सकता हैं.. वेद मन्त्र को स्मरण रखने और उनमे एक मात्रा का भी लोप या विपर्यास ना होने पाए इसके लिए उसे 13 प्रकार से याद किया जाता था…. याद करने के इस उपाय को दो भागों में बनता जा सकता हैं..

.. प्रकृति-पाठ और विकृति-पाठ…. प्रकृति पाठ का अर्थ हैं मन्त्र को जैसा वह है वैसा ही याद करना.
… विकृति- पाठ का अर्थ हैं उसे तोड़ तोड़ कर पदों को आगे पीछे दोहरा-दोहरा कर भिन्न-भिन्न प्रकार से याद करना..

.. याद करने के इन उपायों के 13 प्रकार निश्चित किये गए थे— संहिता-पाठ, पद-पाठ, कर्म-पाठ, जटा-पाठ, पुष्पमाला-पाठ, कर्ममाला-पाठ, शिखा-पाठ, रेखा-पाठ, दण्ड-पाठ, रथ-पाठ, ध्वज-पाठ, धन-पाठ और त्रिपद धन-पाठ…. पाठों के इन नियमों को विकृति वल्ली नमक ग्रन्थ में विस्तार से दिया गया हैं…. परिमाणत: श्रोतिय ब्राह्मणों (जिन्हें मैक्समूलर ने जीवित पुस्तकालय नाम से अभिहित किया हैं) के मुख से वेद आज भी उसी रूप में सुरक्षित हैं जिस रूप में कभी आदि ऋषिओं ने उनका उच्चारण किया होगा… विश्व के इस अदभुत आश्चर्य को देख कर एक पाश्चात्य विद्वान् ने आत्मविभोर होकर कहा था की यदि वेद की सभी मुद्रित प्रतियाँ नष्ट हो जाएँ तो भी इन ब्राह्मणों के मुख से वेद को पुनः प्राप्त किया जा सकता हैं….

मैक्समूलर ने ‘India-What can it teach us’ (प्रष्ठ 195) में लिखा हैं —- आज भी यदि वेद की रचना को कम से कम पाच हजार वर्ष (मैक्समूलर के अनुसार) हो गए हैं… भारत में ऐसे श्रोतिय मिल सकते हैं जिन्हें समूचा वैदिक साहित्य कंठस्थ हैं …. स्वयं अपने ही निवास पर मुझे ऐसे छात्रों से मिलने का सोभाग्य मिला हैं जो न केवल समूचे वेद को मौखिक पाठ कर सकते हैं वरन उनका पाठ सन्निहित सभी आरोहावरोह से पूर्ण होता हैं…. उन लोगो ने जब भी मेरे द्वारा सम्पादित संस्करणों को देखा और जहाँ कही भी उन्हें अशुद्धि मिली उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के उन अशुद्धियों की और मेरा ध्यान आकर्षित किया….

मुझे आश्चर्य होता है उनके इस आत्मविश्वास पर जिसके बल पर वे सहज ही उन अशुद्धियों को ध्यान में ला देते थे जो हमारे संस्करणों में जहाँ-तहाँ रह जाती थी…. वेदों की रक्षा के लिए किये गए इन प्रयत्नों की सराहना करते हुए मैक्समूलर ने अपने ग्रन्थ ‘Origin of Religion’ के प्रष्ठ 131 पर लिखा हैं — “The text of the Vedas has been handed down to us with such accuracy that there is hardly a various reading in the proper sense of the work or even an uncertain aspect in the whole of the Rigveda”. Regeda Vol. I part XXV में मैक्समूलर ने पुनः लिखा —- :As far as we are able to judge we can hardly speak of various readings in the Vedic hymns in the usual sense of the word. Various readings to be gathered from a collection manuscripts, now accessible to us there are none.”

वेदों को शुद्धरूप में सुरक्षा का इतना प्रबंध आरम्भ से ही कर लिया गया था की उनमे प्रक्षेप करना संभव नही था….
इन उपायों के उद्देश्य के सम्बंध में सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता डॉ.भंडारकर ने अपने ‘India Antiquary’ के सन् 1874 के अंक में लिखा था—“The object of there different arrangements is simply he most accurate preservation of the sacred text of the Vedas.
वेदों के पाठ को ज्यों का त्यों सुरक्षित रखने के लिए जो दूसरा उपाय किया गया था वह यह था की वेदों की छंद- संख्या, पद-संख्या, तथा मंत्रानुक्र्म से छंद, ऋषि, देवता को बताने के लिए उनके अनुक्रमणियां तैयार की गई जो अब भी शौनकानुक्रमणी, अनुवाकानुक्रमणी, सुक्तानुक्रमणी, आर्षानुक्रमणी, छंदोंनुक्रमणी, देवतानुक्रमणी, कात्यायनीयानुक्रमणी, सर्वानुक्रमणी, ऋग्विधान, ब्रहद्देवता, मंत्रार्षार्ध्याय, कात्यायनीय, सर्वानुक्रमणी, प्रातिशाख्यसूत्रादि, के नामों से पाई जाती हैं

….इन अनुक्रमणीयों पर विचार करते हुए मैक्समूलर ने `Ancient Sanskrit Literature’ के प्रष्ठ 117 पर लिखा है की ऋग्वेद की अनुक्रमणी से हम उनके सूक्तों और पदों की पड़ताल करके निर्भीकता से कह सकते हैं की अब भी ऋग्वेद के मन्त्रों शब्दों और पदों की वही संख्या हैं जो कभी कात्यायन के समय में थी….

इस विषय में प्रो. मैकडानल ने भी स्पष्ट लिखा हैं की आर्यों ने अति प्राचीन कल से वैदिक पाठ की शुद्धता रखने और उसे परिवर्तन अथवा नाश से बचाने के लिए असाधारण सावधानता का उपयोग किया हैं…. इसका परिणाम यह हुआ की इसे ऐसी शुद्धता के साथ रक्खा गया है जो साहित्य के इतिहास में अनुपम हैं.
samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

rajistertion call-9977987777, 9977957777, 9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

स्वामी श्रद्धानन्द और महात्मा गाँधी

स्वामी श्रद्धानन्द और महात्मा गाँधी

स्वामी श्रद्धानन्द और महात्मा गाँधी

जिन्होंने इतिहास के उन पन्नो को पलटा है, जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे थे, तब उन्होंने आर्थिक सहायता के लिये अभ्यर्थना भारत से की | उन दिनों गुरुकुल कांगड़ी में २-३ अंग्रेजी अख़बार आते थे | स्वामी श्रद्धानंद ने उन अखबारों के आधार पर गांधीजी की सहायता करने की सोची | गुरुकुल के छात्रों ने दिसम्बर की ठण्ड में गंगा किनारे कुछ श्रम कर कुछ रुपये इकठ्ठे करके ‘गुरुकुल सहायता’ के नाम से उनको भेजे |
स्वामी श्रद्धानंद आयु, ज्ञान, अनुभव तथा सेवा में गांधी से श्रेष्ठ और ज्येष्ठ तो थे ही | इस कारण गांधी उन्हें बड़े आदर से ‘बड़े भाई जी’ शब्द से सम्बोधित किया करते थे | स्वामी श्रद्धानंद कांग्रेस में देश सेवा हेतु शामिल हुए थे, परन्तु हिन्दू-मुस्लिम एकता के नाम पर मुसलमानों की चापलूसी, हिन्दू हितो की अपेक्षा, खिलाफत आन्दोलन को समर्थन, दंगो की निन्दा तक न करना, अछूतों (दलित) कहे जाने वाले ८ करोड़ हिन्दुओ के हित में कोई कदम न उठाना जैसे अनेक विषय थे जिनके कारण स्वामीजी को कांग्रेस से अलग होना पड़ा। आर्य समाज महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा गठित की गई वैदिक व समाजिक संस्था है, जो वेद के रहस्य को प्रचारित करती है। यह संस्था मुस्लिम समुदाय द्वारा देश में फैलाए जा रहे कुव्यवस्थाओं को उजागर करता रहा है। इसलिए मुसलमानों को आर्य समाज के गतिविधियाँ ख़ासकर भारत को मुस्लिम राष्ट्र घोषित करने के उनके लक्ष्य में बाधा लगता था। लिहाजा गाँधी ने मुसलमानों को खुश रखने के लिए आर्य समाज पर हमले कराने जैसे पतित कार्य को भी किया था।

यह खुलासा गोपाल गोडसे ने अपनी पुस्तक में की है। उन्होंने लिखा है कि मुस्लिम समुदाय नाराज न हो इसके लिए गाँधी किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे। आर्यसमाज ने बहुत ही सभ्य ढंग से जब गाँधी के इस घृणित कार्य का उत्तर दिया तब गाँधी ने राजनैतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके आर्य समाज को कमजोर करने के लिए षडयंत्र रचा। वास्तविकता तो यह है कि स्वामी दयानन्द सरस्वती का कोई भी अनुयायी गाँधी पथ पर नहीं चल सकता, क्योंकि दोनों की स्थितियाँ एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं, परन्तु कुछ लोग नेता बनने की इच्छा से दोहरी चाल चलते रहे। एक ओर, वे आर्यसमाजी रहे और दूसरी ओर, गाँधीवादी काँग्रेसी। इसका परिणाम यह हुआ कि जब सिन्ध में गाँधी के ईशारे पर ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर प्रतिबंध लगा तो आर्य समाज इस विषय में अधिक कुछ न कर सका।
इसलिए आर्य समाज का प्रभाव और भी कम होता गया। आर्य समाज के सदस्य पक्के देशभक्त होते हैं। लाला लाजपतराय और स्वामी श्रद्धानन्द, दो पक्के आर्य समाजी थे, परन्तु अंत तक कांग्रेस के नेता रहे। वे गाँधी के अनुयायी नहीं थे, प्रत्युत उनकी मुसलमानों का पक्ष लेने की नीति के विरोधी थे, परन्तु वे महापुरुष शांत हो चुके थे। बहुत से आर्य समाजी वैसे ही रहे जैसे कि वे थे, किन्तु प्रायः स्वार्थी लोग उनका मार्ग दर्शन करते रहे और गाँधी के कारण आर्य समाज की वह शक्ति न रही जो किसी समय थी।
अलबत्ता, गाँधी ने जिस मकसद से आर्य समाज की निन्दा की थी, उससे गाँधी मुसलमानों में उतने लोकप्रिय नहीं हुए। प्रत्युत उनके इस आचरण ने मुसलमानों को उकसा दिया और एक मुसलमान युवक ने आरोप लगाया कि यह संस्था बुरी भावना फैलाने वाली है। यह आरोप नितांत असत्य था। प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि आर्य समाज ने हिन्दू समाज में अनेक सुधार किये हैं।
आर्य समाज ने विधवा विवाह प्रारंभ किए। आर्य समाज ने जातपात को समाप्त करने के क्रांतिकारी प्रयत्न किए और हिन्दुओं की ही नहीं, प्रत्युत उनकी एकता का प्रचार किया जो आर्य समाज के सिद्धांतों को मानते हों। तत्कालीन समाचार माध्यमों, अख़बारों और गाँधी के संस्थाएँ इस बात पर पर्दा डालने में सफल रहे कि गाँधी ने आर्य समाज को कितनी हानि पहुँचाई है। देश के आम लोग भी गाँधी के महिमा मंडन में उनके राष्ट्रविरोधी कार्यों को भूल गए हैं।
१९१९ में हुए जलियांवाला कांड के कारण भयभीत जनता ने एक जुलूस निकला जिसका नेतृत्व स्वामी श्रद्धानंद कर रहे थे | जब जुलूस चांदनी चौक पहुंचा तो वहां मौजूद सेना की टुकड़ी में एक सिपाही ने बन्दूक स्वामीजी के सीने पर तान दी | स्वामीजी ने सिंहगर्जना करते हुए अपने छाती पर पड़ी चादर हटा दी और कहा “साहस है तो चलाओ गोली” लाखों की भीड़ का नेतृत्व करने वाले संन्यासी दुनिया को गरजते देख रही थी | कहते हैं इस घटना के पश्चात ३ दिनों तक पूरे दिल्ली प्रदेश में स्वामीजी का अघोषित राज कायम रहा | हिन्दू ही नही सैकड़ो मुस्लिम इस वीतराग संन्यासी के पास आते और अपनी समस्यायों का समाधान पाकर संतुष्ट होकर जाते | स्वामी श्रद्धानंद की अद्वितीय प्रभाव की खबर गांधी के कान तक पहुंचायी गयी| गांधी अपने प्रभाव की बागडोर फिसलते देखने लगे | उनमें ईर्ष्या की आग भड़क उठी | जिन्होंने गांधी के राजनैतिक क्रियाकलापों को नज़दीक से देखा है, उनका स्पष्ट कथन है कि गांधी अपने बराबर किसी अन्य नेता को उठते नही देख सकते थे | उन्होंने अपने मार्ग में आने वाले हर नेता को चाहे वो नरम दल का रहा हो या गरम दल का, उसे किसी भी प्रकार हटाकर अपना मार्ग प्रशस्त किया | और ये एक कटु सत्य है कि उनकी इस राजनीति का पहला शिकार स्वामी श्रद्धानंद ही बने थे |
दिल्ली की जामा मस्जिद के गुम्बद से स्वामीजी ने यह वेदमंत्र पढ़ा था-
“त्वं हि पिता वसो त्वं माता सखा त्वमेव । शतक्रतो बभूविथ । अधा ते सुम्नमी महे ।।”
संसार के इतिहास की ये एकलौती घटना है जब ‘एक काफ़िर’ मस्जिद के मिम्बर से वेदमंत्र का उच्चारण कर रहा था | इसके बाद मुसलमानों ने अन्य मस्जिदों में भी उनके व्याख्यान करवाये | मुसलमानों पर स्वामीजी के अमिट प्रभाव की खबर गांधी को लगी | अपनी लोकप्रियता के आड़े आते श्रद्धानंद उनको अपनी व्यक्तिगत पूजा में बाधा लगे | टर्की के बादशाह और अंग्रेजो का संघर्ष को लेकर ‘खिलाफत आन्दोलन’ जो की भारत के लिये निरर्थक था, गांधी ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिये अकारण ही ये आन्दोलन छेड़ जनशक्ति को भ्रमित किया| इससे कई नेता गांधी से असंतुष्ट होकर संघठन से अलग होने लगे | इनमे स्वामीजी भी थे | कोड़ोनाडा कांग्रेस सम्मलेन में देश के ८ करोड़ अछूतों के उद्धार की जो घृणित योजना बनी, उसके कारण भी काफी असंतोष फैला | योजना के मुताबिक अछूतों को हिन्दू और मुसलमानों में बराबर बांटने की बात कही गयी | यानि हिन्दू समाज के अभिन्न अंग करीब ४ करोड़ लोगों को सीधे सीधे इस्लाम की गोदी में सौंपने का षड़यंत्र था | ये बात स्वामीजी के लिये असहनीय थी क्यूंकि उन्होंने तो अपना जीवन ही अछूतों के उद्धार को समर्पित कर दिया था | वे कांग्रेस से सदा के लिये अलग हो गये | उनके पीछे पीछे सेठ बिड़ला और मदन मोहन मालवीयजी ने भी कांग्रेस छोड़ दी | इस घटना ने गांधी की ईर्ष्या की आग को और भड़का दिया | उन्होंने अपने पत्रों में आर्यसमाज और स्वामीजी के विरुद्ध विषवमन किया और उनके फैलाये सांप्रदायिक जाल ने आखिर अपना रंग दिखाया और २३ दिसम्बर १९२६ को स्वामी श्रद्धानंद की हत्या एक मुस्लिम के हांथो करा दी गयी | स्वामीजी की शहादत पर गांधी ने भी ऐसी वीरोचित मृत्यु की कामना की थी | वैसी मृत्यु तो खैर उनको नही मिली पर भारत के बंटवारे के कारण लाखों-करोड़ो हिन्दुओ की आँहों से भरी मृत्यु अवश्य मिली | भगवान सबकी इच्छा पूर्ण नही करता | पर स्वामीजी का बलिदान व्यर्थ नही गया | करोड़ो आर्यसमाजी सदा के लिये कांग्रेस से अलग हो गये और कांग्रेस मात्र एक सांप्रदायिक पार्टी बनकर रह गयी |samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

rajistertion call-9977987777, 9977957777, 9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

शुद्ध-पवित्र और यज्ञमय जीवन हमारा होना चाहिए।आज का वैदिक विचार,today thought,vaidik_rashtra

ओ३म्
“ऋषि दयानन्द ने विश्व को सद्धर्म और उसके लाभों से परिचित कराया”
===============
महर्षि दयानन्द (1825-1883) ने देश में वैदिक धर्म के सत्यस्वरूप को प्रस्तुत कर उसका प्रचार किया था। उनके समय में धर्म का सत्यस्वरूप विस्मृत हो गया था। न कोई धर्म को जानता था न अधर्म को। धर्म पालन से लाभ तथा अधर्म से होने वाली हानियों का भी मनुष्यों को ज्ञान नहीं था। ईश्वर का सत्यस्वरूप भी देश देशान्तर के लोगों को पता नहीं था। आत्मा के सत्यस्वरूप से प्रायः सभी लोग अनभिज्ञ थे। यह सृष्टि किसने, कब व क्यों बनाई तथा हमारी आत्मा का स्वरूप क्या व कैसा है? हमारी आत्मा इस जन्म में कब, कैसे आयी अथवा शरीर से संयुक्त हुई और इसके जन्म का उद्देश्य क्या है? इन प्रश्नों से सभी लोग अनभिज्ञ थे। सभी मनुष्य प्रचलित मत-मतान्तरों की जीवन शैली व उपासना पद्धतियों को बिना विचार व सत्यासत्य की परीक्षा किये ही मानते चले आ रहे थे। मत-मतान्तरों को भी ईश्वर, जीवात्मा व सृष्टि विषयक अनेक शंकाओं व प्रश्नों का समाधान विदित नहीं था। सबका एक ही उद्देश्य था कि मत की पुस्तकों की शिक्षाओं का बिना विचार व शंका किये आस्थापूर्व रीति से सेवन करना है और जीवन में सुखों का भोग करना है। ऋषि दयानन्द दिव्य मनुष्य, महापुरुष व ऋषि थे। उन्होंने प्रत्येक बात को मानने से पूर्व उसके सत्यस्वरूप को जाना और उसे धर्म व कर्तव्य से जोड़कर उसकी प्रासंगिकता तथा आवश्यकता पर गहन विचार किया। यदि वह बात ईश्वरीय ज्ञान वे के सम्मत हुई और उससे किसी मनुष्य व मनुष्य समाज किंवा देश को हानि नहीं होती थी, तभी वह करणीय व मानने योग्य स्वीकार की। उनके इस सिद्धान्त व वेदों के प्रचार से मत-मतान्तरों की बहुत सी बातें मनुष्य, समाज व देश के लिये हितकर सिद्ध नहीं हुईं। अतः उन्हें छोड़ना आवश्यक था। ऋषि दयानन्द ने तर्क, युक्ति तथा विद्या के आधार पर कर्तव्य व अकर्तव्य सहित ईश्वर की वेदों में आज्ञा के अनुरूप धर्म का प्रचार किया। इससे मत-मतान्तरों की मिथ्या बातों की पोल खुल गई। सभी विधर्मी लोग सावधान हो गये। वह सत्य को स्वीकार करने के लिये तत्पर नहीं हुए।

ऋषि दयानन्द के समय में मत-मतान्तरों के अनुयायियों की स्थिति यह थी कि वह न तो धर्म सम्बन्धी सत्यासत्य विषयक ज्ञान रखते थे और न ही अपने मत के आचार्यों की इच्छाओं के विरुद्ध ऋषि दयानन्द की बातों में विद्यमान सत्य को अनुभव करते हुए भी उन्हें स्वीकार कर सकते थे। ऋषि दयानन्द ने अपनी सदाशयता का अनेक प्रकार से परिचय दिया परन्तु अविद्या व स्वार्थों के कारण अधिकांश लोगों ने उनकी मानव व प्राणीमात्र की हितकारी धर्म विषयक मान्यताओं को स्वीकार नहीं किया। इस कारण संसार सत्य के ज्ञान व आचरण से वंचित रहा और आज तक बना हुआ है। ऋषि दयानन्द और उनके अनुयायियों ने वेदों का जो प्रचार किया उसका समाज के एक वर्ग पर ही प्रभाव हुआ जो आज भी उन पर पूरी श्रद्धा व निष्ठा रखते हुए पालन करता है। वह दूसरे मतों को भी वेद व वेद मत के प्रमुख ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश की परीक्षा करने की चुनौती देता है और सत्य को स्वीकार करने तथा असत्य को छोड़ने की प्रेरणा करता है। इसके विपरीत आज का मानव समाज अंग्रेजी शिक्षा पद्धति सहित भौतिक सुख सुविधाओं को ही अधिक महत्व देता है जिससे वह वैदिक धर्म के शाश्वत व हितकारी सिद्धान्तों के पालन से होने वाले लाभों को ग्रहण व प्राप्त नहीं हो पा रहा है। इसका वेदमार्ग के विपरीत आचरण करने वाले लोगों को वर्तमान व भविष्य में जो मूल्य चुकाना होगा, उसका अनुमान लगाया जा सकता है। वेद मार्ग पर चलने से मनुष्य का परजन्म सुधरता व उन्नत होता है। मनुष्य का पुनर्जन्म इस जन्म के संचित कर्मों के आधार पर ही होना है। यदि उसने इस जन्म में वेदों का ज्ञान प्राप्त कर ईश्वर को जाना नहीं और वेदोक्त विधि से उपासना व यज्ञादि कर्म नहीं किये तो उसका पुनर्जन्म भी उन सुखों व लाभों से वंचित रहेगा जो कि एक वेदोक्त मार्ग पर चलने व आचरण करने वाले मनुष्यों को प्राप्त होते हैं।

ऋषि दयानन्द ने अथक व कठोर तप एवं पुरुषार्थपूर्वक योग एवं वेद विद्या को प्राप्त कर अपने गुरु प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी की प्रेरणा से संसार से अविद्या दूर करने हेतु ईश्वरीय ज्ञान वेदों का प्रचार आरम्भ किया था। उन्होंने देश व समाज के सामने ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति तथा मनुष्य के कर्तव्य व अकर्तव्य विषयक वेद की मान्यताओं को प्रस्तुत किया था। उन्होंने सब मनुष्यों को मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त बातों से भी उन्हें अवगत कराया। वेद की मान्तयाओं के आचरण तथा वेद विरुद्ध मतों की जीवनशैली के अनुसार जीवन व्यतीत करने से होने वाली हानियों से भी उन्होंने लोगों को परिचित कराया था। सभी मत-मतान्तर उनके विरुद्ध एकत्रित व लामबन्द हो गये थे। ऐसी स्थिति में ऋषि दयानन्द ने अपने कर्तव्य को महत्व दिया और देश के विभिन्न भागों में जाकर वेद मत का प्रचार करते रहे। बहुत से लोग उनके विचारों से प्रभावित हुए। उनके सत्य वेद धर्म के प्रचार से प्रभावित होने वाले लोगों में सभी मतों के लोग थे। उनके अनेक प्रश्नों का उत्तर वेदेतर मतों के पास नहीं था। ऋषि दयानन्द ने ऐसे सभी विषयों को वैदिक विचारधारा के आधार पर प्रस्तुत कर लोगों की जिज्ञासों को शान्त करने सहित उनकी भ्रान्तियों को दूर किया। अपने भक्तों की प्रेरणा से उन्होंने वेद विषयक मान्यताओं सहित मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त मान्यताओं का प्रकाश करने के लिये विश्व का एक अद्वितीय ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश लिखा और उसका प्रकाशन कराया।

सत्यार्थप्रकाश पढ़कर ईश्वर, जीव व प्रकृति के सत्यस्वरूप का ज्ञान होने के साथ ईश्वर, समाज, परिवार तथा अपने निजी कर्तव्यों का ज्ञान होता है। सत्यार्थप्रकाश से मनुष्य को अपने सभी कर्तव्यों एवं अकर्तव्यों का ज्ञान होने से उसे कर्तव्यों का आचरण तथा अकर्तव्यों वा असत्य का त्याग करने की प्रेरणा मिलती है। वह वेदेतर सभी मतों के अविद्या से युक्त यथार्थस्वरूप से भी परिचित हो जाता है। उसे यह भी विदित होता है कि संसार में सृष्टिकर्ता एक ही सत्ता है जिसके ईश्वर, परमेश्वर, सच्चिदानन्दस्वरूप सृष्टिकर्ता आदि अनेक नाम है। ईश्वर दो, तीन व अधिक नहीं अपितु वह एक ही सत्ता है। भिन्न-भिन्न मतों में ईश्वर के जो नाम आये हैं वह ईश्वर से पृथक सत्तायें नहीं हैं। सभी जीव ईश्वर की सन्तानें हैं। इस आधार पर ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ एवं ‘सभी मनुष्य व प्राणी एक ही ईश्वर की सन्तान’ का सिद्धान्त अस्तित्व में आया है। जिस प्रकार माता-पिता व समाज में विद्वान परिवार व समाज से अविद्या व अज्ञान को दूर करते हैं, उसी प्रकार से सभी विद्वानों का कर्तव्य है कि वह वृहद विश्व मानव समाज से ईश्वर व आत्मा विषयक अविद्या को दूर कर सभी को सत्योपदेश से उपकृत करें। यही काम ऋषि दयानन्द और उनके प्रमुख अनुयायियों ने किया और आज भी पद प्रतिष्ठिा व स्वार्थों से मुक्त आर्य समाज के विद्वान इस कार्य को करते हुए अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। यही काम मनुष्य जाति की उन्नति व समाज व विश्व में शान्ति स्थापित करने का एकमात्र आधार है। इस दृष्टि से ऋषि दयानन्द को देखें तो वह हमें विश्व में प्रथम विश्वशान्ति की योजना प्रस्तुत करने व क्रियान्वित करने वाले महापुरुष के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं।

ऋषि दयानन्द ने बताया कि धर्म जीवन में सद्गुणों व सत्कर्मों को धारण करने को कहते हैं। अग्नि ने ताप व प्रकाश सहित रूप को धारण किया हुआ है। यही उसका धर्म है। जल ने शीतलता को तथा वायु ने स्पर्श गुण व धर्म को धारण किया हुआ है। इसी प्रकार से मनुष्य को भी सत्य गुणों व सत्य कर्तव्यों को धारण करना चाहिये। मत-मतान्तर को मानना धर्म व कर्तव्य नहीं है। मत-मतान्तरों की परीक्षा कर सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना ही धर्म होता है। ईश्वर ने जीवों को सुख व कल्याण प्रदान करने के लिये सृष्टि की रचना की व इसका धारण व पोषण कर रहा है। उसी ने सभी जीवों को उनके पूर्वजन्मों के कर्मानुसार मनुष्यादि योनियों में जन्म दिया है। वह धर्माचार करने वाले मनुष्यों को सुख देता है और अधर्माचरण करने वालों को इस जन्म सहित परजन्म में भी पाप कर्मों का फल भुगाता व दुःख देता है। पाप कर्मों का फल दुःख है, इसी लिये धर्म व धर्म पालन की आवश्यकता मनुष्य के लिये है। महर्षि दयानन्द ने स्वयं अपने जीवन में धर्म को धारण कर उसका आदर्श रूप प्रस्तुत किया था। उनके अनुयायी उनके बतायें मार्ग का अनुसरण करते हुए वेदाध्ययन, सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन सहित ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र आदि कर्मों को करते वह देश व समाज के लिये हितकारी कार्य करते हैं। देश व धर्म दोनों पूरक हैं। धर्म और देश अपनी अपनी जगह दोनों ही बड़े हैं। इन दोनों में परस्पर कोई स्पर्धा है। देशभक्ति व देश की सेवा भी मनुष्य का धर्म है। अतः जो लोग देश को धर्म व मत की तुलना में गौण मानते हैं वह गलती करते हैं। संसार के सभी मनुष्यों को ईश्वर के बताये वेद मार्ग को अपनाना चाहिये व उस पर ही चलना चाहिये।

ऋषि दयानन्द ने अपने समय में संसार को वेदों का महत्व बताया। वेद सभी मनुष्यों के लिए सर्वोपरि धर्म ग्रन्थ हैं। वेदों के अनुसार आचरण करना ही सभी मनुष्यों का कर्तव्य है। वेदों को समझने के लिये सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेदभाष्य, आर्याभिविनय सहित उपनिषद एवं दर्शन ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिये। सबको वैदिक विधि से सन्ध्या एवं अग्निहोत्र यज्ञ करने चाहिये। अन्धविश्वासों व मिथ्या परम्पराओं का त्याग करना चाहिये। प्रत्येक कार्य सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिये। ऋषि दयानन्द ने बताया है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र, वेदज्ञान का दाता, जीवात्माओं के कर्मानुसार जन्म व सुख-दुख प्रदान करने वाला और सृष्टिकर्ता है। वही सब मनुष्यों के द्वारा स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना करने के योग्य है।

ऋषि दयानन्द के समय में विश्व ईश्वर तथा धर्माधर्म के सत्यस्वरूप से वंचित था। ऋषि दयानन्द ने वेदप्रचार तथा सतयार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का प्रणयन कर विश्व से अविद्या को दूर करने का महनीय कार्य किया। उनको सादर नमन हैं। जिन्हें ईश्वर की न्यायव्यवस्था का डर हो तथा जो अपना वर्तमान, भविष्य व परजन्म सुधारना चाहते हों, उनके लिये एकमात्र आश्रय स्थान ऋषि दयानन्द का साहित्य का अध्ययन, वैदिक धर्म का पालन और आर्यसमाज ही है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

rajistertion call-9977987777, 9977957777, 9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

आदिगुरु शंकराचार्य

आदिगुरु शंकराचार्य

आदिगुरु शंकराचार्य

आदि शंकराचार्य का जन्म केरल में हुआ था. 650 ईसवी के बाद यह वो दौर था, जिसमें भारत में विशाल और स्थिर साम्राज्यों का युग समाप्त हो चला था. साम्राज्य की इच्छा रखने वाले राज्यों में निरन्तर संघर्ष और उत्थान-पतन की लीला ने भारत की राजनीतिक एकता और स्थिरता को हिलाकर रख दिया. कश्मीर, कन्नौज और गौंड के संघर्ष ने और फिर पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट नरेशों की खींचातानी ने उत्तरापथ को आंदोलित कर डाला था. ठीक वैसे ही दक्षिण में चालुक्य, पल्लव और पाण्डय शासकों की लड़ाइयों ने भारत को विचलित कर रखा था. पश्चिम से अरब सेनाओं और व्यापारियों के प्रवेश ने इस परिस्थिति में नया आयाम जोड़ दिया.

बढ़ती अराजकता और असुरक्षा के वातावरण में स्थानीय अधिकारियों और शासकों का प्रभाव बढ़ने लगा. साम्राज्य की जगह सामंती व्यवस्था आकार लेने लगी. किसानों और ग्राम पंचायतों के अधिकार अभी बरकरार थे पर यह सही है कि इस समय राजसत्ता बिखर चुकी थी. आदि शंकराचार्य के समय तक भारत में प्राचीन स्मृतियों और पुराणों का युग बीत चुका था और अनेक अप्रमाणिक ग्रंथ भी रचे जाने लगे थे. उदारवादी और कट्टर प्रवृत्तियों में टकराहट की आहटें भी सुनायी पड़ने लगी थीं. धर्म के क्षेत्र में तंत्र- मंत्र और प्रतिमा पूजन की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही थी. पुराने वैदिक देवताओं को नया रूप दिया जा रहा था और साथ ही बौद्धों के अनेक संप्रदाय भी प्रचलन में आ गए थे.

आदि शंकराचार्य के समय की धार्मिक परिस्थिति को वेद के प्रमाण को मानने वाली आस्तिक और उसे न मानने वाली नास्तिक धाराओं के संगम और संघर्ष का युग भी कहा जाता है. शंकराचार्य इसी संक्रांति काल में भारत में अवतरित हुए. उन्होंने अपने प्रखर ज्ञान और साधना के बल से तत्कालीन भारतीय समाज में धर्म के ह्रास को रोकने के लिए अनेक नास्तिक संप्रदायों का सामना कर वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा में अपना जीवन समर्पित किया.

आदि शंकराचार्य – महर्षि दयानन्द की दृष्टि में

आर्य समाज के प्रवर्त्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने 1875 ई० में पूना में दिए गए अपने प्रवचन में स्वामी शंकराचार्य को स्मरण करते हुए कहा था –

“पंचशिख और शंकराचार्य – इनका इतिहास देखना चाहिए कि उन्होंने सदा सत्य और सदुपदेश ही किए, उसी प्रकार संन्यासी मात्र को सदुपदेश करना चाहिए ।”

(‘उपदेश-मंजरी’ अथवा ‘पूना-प्रवचन’, तीसरा प्रवचन)

पूना में ही दिए गए अपने एक अन्य प्रवचन में महर्षि ने कहा –

“इनके पश्चात् श्रीयुत गौड़पादाचार्य के प्रसिद्ध शिष्य स्वामी शंकराचार्य जी प्रादुर्भूत हुए । शंकर स्वामी वेद-मार्ग और वर्णाश्रम धर्म के मानने वाले थे । उनकी योग्यता कैसी उच्च कक्षा की थी, यह उनके बनाये शारीरक भाष्य से विदित होता है । शंकर स्वामी के समय में जो अनेक पाखण्ड मत चले थे और जिनका कि उन्होंने खण्डन किया है, वह ‘शंकर-दिग्विजय’ के निम्नलिखित श्लोक से प्रकट होते हैं –

🌹श्लोक🌹

‘शाक्तैः पशुपतैरपि क्षपणकैः कापालिकैर्वैष्णवै-
रन्यैरप्यखिलेः खलु खलैर्दुर्वादिभिर्वैदिकम् ॥’

इससे अनुमान किया जा सकता है कि श्रीमान् स्वामी शंकराचार्य ने वेद-विरुद्ध मतों के खण्डन में कितना उद्योग किया है ।”

(‘उपदेश-मंजरी’ अथवा ‘पूना-प्रवचन’, बारहवां प्रवचन)

‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ ग्रन्थ के ‘वेदनित्यत्वविचारः’ प्रकरण में महर्षि दयानन्द ने वेदान्त दर्शन का ‘शास्त्र्योनित्वात्’ (1.1.3) सूत्र प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है ।

वहां महर्षि ने इस सूत्र का संस्कृत में ‘अस्यायमर्थ…’ और हिन्दी में ‘इस सूत्र के अर्थ में शंकराचार्य ने भी वेदों को नित्य मान के व्याख्यान किया है कि …’ – ऐसा लिखकर जो अर्थ प्रस्तुत किया है वह स्वामी शंकराचार्य जी के वेदान्त दर्शन के भाष्य से ही लिया गया है ।

महर्षि दयानन्द ने ‘सत्यार्थप्रकाश’ के ग्यारहवें समुल्लास में स्वामी शंकराचार्य के सम्बन्ध में निम्न बातें लिखी हैं –

(1) शंकराचार्य बाईस सौ (आज से लगभग तेईस सौ) वर्ष पूर्व हुए ।

(2) वे द्रविड़ देशोत्पन्न ब्राह्मण थे ।

(3) उन्होंने ब्रह्मचर्य से व्याकरणादि सब शास्त्रों को पढ़ा था ।

(4) वे सोचते थे कि सत्य आस्तिक वेद मत का छूटना और जैन नास्तिक मत का चलना बड़ी हानि की बात हुई है । वे जैन – नास्तिक मत को हटाना चाहते थे ।

(5) शंकराचार्य शास्त्र तो पढ़े ही थे, परन्तु उन्होंने जैन मत के ग्रन्थ भी पढ़े थे ।

(6) शंकराचार्य की युक्ति भी बहुत प्रबल थी ।

(7) उन्होंने जैन पण्डितों से शास्त्रार्थ किया । जिसमें उनका पक्ष वेद मत का स्थापन और जैनियों के मत का खण्डन था ।

(8) जैन पण्डितों के विरुद्ध शंकराचार्य का मत था कि – ‘अनादि सिद्ध परमात्मा ही जगत् का कर्ता है । यह जगत् और जीव झूठा है, क्योंकि उस परमेश्वर ने अपनी माया से जगत् बनाया है, वही धारण और प्रलय कर्ता है । और यह जीव और प्रपंच (जगत्) स्वप्नवत् है । परमेश्वर आप ही सब रूप होकर लीला कर रहा है ।’ शास्त्रार्थ में शंकराचार्य का मत अखण्डित रहा । जैन मत का पराजय हुआ ।

(9) शंकराचार्य ने दस वर्ष के भीतर आर्यावर्त में सर्वत्र घूमकर जैनियों का खण्डन और वेदों का मण्डन किया ।… उसी समय से सब के यज्ञोपवीत होने लगे और वेदों का पठन-पाठन भी चला ।

(10) शंकराचार्य के पूर्व शैवमत भी थोड़ा-सा प्रचलित था, उसका भी उन्होंने खण्डन किया । उन्होंने वाममार्ग का भी खण्डन किया ।

(11) जब वेद मत का स्थापन हो चुका और विद्या-प्रचार करने का विचार करते ही थे, उतने में शंकराचार्य का शरीर छूट गया । शंकराचार्य जिन दो व्यक्तियों पर अति प्रसन्न थे ऐसे दो कपटमुनिओं ने उन्हें ऐसी विषयुक्त वस्तु खिलाई कि छः महीने के भीतर उनका शरीर छूट गया ।

(12) शंकराचार्य के देहावसान से सब लोग निरुत्साही हो गये और जो विद्या का प्रचार होने वाला था, वह भी न हो पाया ।

(13) शंकराचार्य ने जो-जो शारीरक भाष्यादि बनाये थे उनके शिष्य उनका प्रचार करने लगे अर्थात् शंकराचार्य ने जो जैनियों के खण्डन के लिए ‘ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या’ और ‘जीव-ब्रह्म की एकता’ कथन की थी, उसका उपदेश उनके शिष्य लोग करने लगे ।

(14) इसमें विचारना चाहिए कि जो ‘जीव-ब्रह्म की एकता’ और ‘जगत् मिथ्या’ – यह शंकराचार्य का निज मत था तो वह अच्छा मत नहीं; और जो जैनियों के खण्डन के लिए शंकराचार्य ने उस मत का स्वीकार किया हो तो कुछ अच्छा है ।

(15) अनुमान है कि शंकराचार्य आदि ने तो जैनियों के मत के खण्डन करने ही के लिए यह मत (‘जीव-ब्रह्म की एकता’ और ‘जगत् मिथ्या’) स्वीकार किया हो; क्योंकि देश-काल के अनुकूल अपने पक्ष को सिद्ध करने के लिए बहुत-से स्वार्थी विद्वान् अपने आत्मा के ज्ञान से विरुद्ध भी कर लेते हैं । और जो शंकराचार्य इन बातों को अर्थात् ‘जीव-ब्रह्म की एकता’ और ‘जगत् मिथ्या’ – आदि व्यवहार सच्चा ही मानते थे तो उनकी बात सच्ची नहीं हो सकती ।

अन्य ध्यातव्य तथ्य :

(1) महर्षि ने सत्यार्थ प्रकाश में ‘नवीन-वेदान्त’ (अर्थात् ‘जीव-ब्रह्म की एकता’ और ‘जगत् मिथ्या’ आदि मानने वालों की विचारधारा ) का सर्वाधिक खण्डन किया है – मूर्तिपूजा के खण्डन से भी अधिक ! उन्होंने 7वें, 8वें, 9वें और 11वें – इन चार समुल्लासों में नवीन वेदान्त (अथवा मायावाद, शांकर मत आदि) का खण्डन किया है ।

(2) महर्षि ने नवीन वेदान्त के खण्डन में ‘वेदान्ति-ध्वान्त-निवारण’ नामका एक स्वतन्त्र लघु ग्रन्थ लिखा है । इस ग्रन्थ में शांकर मत का खण्डन किया गया है, परन्तु उसमें उन्होंने शंकराचार्य के नाम का कहीं पर भी उल्लेख नहीं किया है ।

(3) वेदान्त दर्शन के मान्य – प्रामाणिक भाष्य के रूप में अथवा पठन-पाठन के लिए मान्य ग्रन्थों की सूची में महर्षि ने शंकराचार्य कृत किसी भी ग्रन्थ या भाष्य का समावेश नहीं किया है ।

(4) महर्षि ने अपने किसी भी ग्रन्थ में शंकराचार्य के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में कहीं पर भी नकारात्मक टीका-टिप्पणी नहीं की है ।

(5) महर्षि के जीवन-चरित्र और उनके ग्रन्थों एवं शास्त्रार्थों के अनुशीलन करने से तथा उनके धर्मान्दोलन के स्वरूप और शैली पर विचार करने से हमें उन पर कहीं-न-कहीं शंकराचार्य का प्रभाव अवश्य दृष्टिगत होता है ।

(6) आर्य समाज के प्रसिद्ध विद्वान् स्वामी श्री विद्यानन्द जी सरस्वती रचित ‘आदि शंकराचार्य वेदान्ती नहीं थे’ ग्रन्थ पठनीय है ।

ऐसे दिव्य महापुरुष,वेदों के उच्च विद्वान, महान सन्यासी, भारत में पुनः वैदिक धर्म को स्थापित करने वाले महान आदिगुरु शंकराचार्य जी को नमन !!

sarvjatiy parichay samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

rajistertion call-9977987777, 9977957777, 9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

यम-नियम

यम-नियम

यम-नियम

साभार -धर्म शिक्षा

लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

यम-नियम – परमात्मा की प्राप्ति का साधन है

महर्षि पतञ्जलि ने योगदर्शन में अष्टाङ्गयोग (योग के आत अडों) का वर्णन किया है। उनमें प्रारम्भ के दो अङ्ग यम और नियम हैं।

ये दोनों अङ्ग दिव्य मानव जीवन आवश्यक हैं, अतः उनका वर्णन यहाँ दिया जा रहा हे

यम पाँच हैं

१. अहिंसा-मन, वचन, कर्म से किसी प्राणी के प्रति वैर की भावना न रखना

२. सत्य-मन, वचन, कर्म से सत्य का पालन करना।

३. अस्तेय-चोरी न करना। बिना स्वामी आज्ञा के किसी पदार्थ को न उठाना।

४. ब्रह्मचर्य-ईश्वर में विचरण करना, वेदअध्ययन करना, ज्ञानोपार्जन और वीर्य की रक्षा करना

५. अपरिग्रह-अभिमानी न होना और पदार्थों का आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना।

नियम भी पाँच हैं

१. शौच-बाहर और भीतर की पवित्रता रखना।

२. सन्तोष-अपनी शक्ति के अनुसार प्रबल पुरुषार्थ करना और उस पुरुषार्थ से जो फल मिले उसमें सन्तुष्ट रहना।

३. तपः-गर्मी-सर्दी, भूख-प्यास, हानि-लाभ, मान-अपमान, निन्दा-स्तुति में सम रहना, शोक और हर्ष से ऊपर उठना। . वेदादि

. ४. स्वाध्याय-जीवन को ऊँचा उठाने वाले वेदादि शास्त्रों का अध्ययन करनाओम् का जप करना और ‘मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, कहाँ जाना -इन तत्त्वों पर विचार करना

५. ईश्वरप्रणिधान-अपने-आपको ईश्वर के अर्पित कर देना।

प्रभु की आज्ञा में चलना, उसकी आज्ञा के विरुद्ध कोई भी कार्य न करना। वैयक्तिक और सामाजिक उन्नति के लिए यमनियमों का पालन आवश्यक है। ये सार्वभौम महाव्रत हे |

साभार -धर्म शिक्षा

लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

sarvjatiy parichay samelan,marriage buero for all hindu cast,love marigge ,intercast marriage ,arranged marriage

rajistertion call-9977987777,9977957777,9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

“ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया”

“ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया”

ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया

ऋषि दयानन्द एक सत्यान्वेषी सत्पुरुष थे। वह सच्चे ईश्वर को प्राप्त करने तथा मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिये अपनी आयु के बाईसवें वर्ष में अपने घर से निकले थे। उन्होंने देश के अनेक भागों में जाकर धार्मिक पुरुषों के दर्शन करने सहित उनसे उपदेश ग्रहण किये थे। इसके साथ ही उन्होंने यात्रा में मिले ग्रन्थों का अध्ययन किया था तथा अनेक गुरुओं से योग की शिक्षा भी प्राप्त की थी। उनके योग के दो गुरु श्री ज्वालानन्द पुरी तथा श्री शिवानन्द गिरी थे। इन गुरुओं से उन्हें योग विद्या का ज्ञान हुआ तथा योग के अभ्यास द्वारा समाधि की सिद्धि हुई। स्वामी जी के योगी बन जाने और ईश्वर साक्षात्कार कर लेने पर भी उनकी विद्या प्राप्ति की पिपासा शान्त नहीं हुई थी। उन्हें अपने संन्यास गुरु स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती से अपने एक शिष्य प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती का पता मिला था जो मथुरा में रहकर एक पाठशाला में अपने शिष्यों को वेद व्याकरण का अध्ययन कराते थे और शिष्यों के धर्म व विद्या विषयक शंकाओं के समाधान करते थे। स्वामी दयानन्द सन् 1860 में उनके पास पहुंचे थे और उनका शिष्यत्व ग्रहण किया था। स्वामी दयानन्द जी की विद्या लगभग 3 वर्ष में पूरी हुई थी। विद्या पूरी होने पर गुरु दक्षिणा के अवसर पर गुरु विरजानन्द जी ने ऋषि दयानन्द को अपनी हृदय की इच्छा को दयानन्द जी के सम्मुख प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा था कि महाभारत यद्ध के बाद से वेद विद्या का ह्रास होते होते वेद ज्ञान विलुप्ति के कागार पर है। तुम वेद विद्या वा ज्ञान से सम्पन्न हो। देश के लोग अविद्या के कारण नाना प्रकार के दुःख व कष्ट भोग रहे हैं। इन सबका कारण अविद्या व अविद्यायुक्त मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध जैसी परम्परायें व क्रियायें हैं। ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की भावनाओं को यथावत् समझ लिया था। वह जान गये थे गुरुजी मुझसे अविद्या व अन्धविश्वासों का खण्डन तथा वेदज्ञान व मान्यताओं का मण्डन कराना चाहते हैं। गुरु जी चाहते थे कि दयानन्द जी संसार से मत-मतान्तरों की अविद्या को दूर कर वेद विद्या के आधार पर एक ज्ञान व विज्ञान से युक्त देश व समाज का निर्माण करें। ऋषि दयानन्द ने कुछ क्षणों में ही गुरु जी के प्रस्ताव पर विचार किया और उन्हें अपनी स्वीकृति दी थी। उन्होंने कहा था कि आप आने वाले दिनों में देखेंगे कि आपका यह शिष्य आपको दिये गये अपने वचनों का प्राणपण से पालन कर रहा है।

गुरु को वचन देने के बाद स्वामी दयानंद मथुरा से आगरा आकर कई महीनों तक रहे और वहां कथा तथा प्रवचन करते रहे। इसके साथ ही वह अपने प्रचार की भावी योजना भी तैयार करते रहे थे। यहां रहकर स्वामी दयानन्द जी ने मूल वेदों को प्राप्त करने का प्रयास किया था। न मिलने पर वह इसकी खोज में आगरा से ग्वालियर, धौलपुर, जयपुर, करौली आदि स्थानों पर गये थे। इनमें से किसी एक स्थान से आपको चार वेदों की मन्त्र संहितायें प्राप्त हुई थी, ऐसा हमारा अनुमान है। इसके बाद आपने करौली में कई महीने रहकर वेदों की परीक्षा कर अपने सिद्धान्तों को अन्तिम रूप दिया था। इसी क्रम में हम देखते हैं कि स्वामी जी पुष्कर के मेले में जाते हैं और वहां प्रचार और सुधार के काम करने आरम्भ करते हैं। आपका ईसाईयों से संवाद भी होता है। पुष्कर से स्वामी अजमेर आये थे और यहां उन्होंने पादरी राबिन्सन, ग्रे और शुल्बे्रड के साथ जीव, ईश्वर, सृष्टिक्रम तथा वेद विषय पर तीन दिन तक संवाद किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वामी जी ने इससे पूर्व मत-मतान्तरों के प्रमुख ग्रन्थों का अध्ययन भी कर लिया था जिससे उन्हें सत्यासत्य के निर्णयार्थ खण्डन-मण्डन करने सहित मत-मतान्तरों के लोगों को सत्य का ग्रहण कराने और असत्य को छुड़वाने में सफलता प्राप्त हो सके।

लगभग इन्हीं दिनों हरिद्वार में कुम्भ का मेला आरम्भ होने वाला था। यहां देश भर से पौराणिक धर्म भावना व आस्था रखने वाले बन्धु आते हैं। यहां प्रचार का अवसर देखकर स्वामी जी हरिद्वार पहुंचे थे और यहां आपने पाखण्ड खण्डिनी पताका भी लगाई थी। यहां रहकर आपने जो प्रचार किया उसका लोगों पर वह प्रभाव नहीं हो रहा था जो होना चाहिये था। इससे स्वामी जी को कुछ निराशा रही होगी। इसी कारण उन्होंने मौन व्रत भी रख लिया था। तभी उन्हें अहसास हुआ कि मौन रहने से तो उद्देश्य सिद्ध नहीं होगा। उसके लिये तो वेद प्रचार व खण्डन-मण्डन आवश्यक है, अतः आपने अपना मौन व्रत भी तोड़ दिया था। यहां स्वामी जी ने जो चिन्तन किया उसका लाभ उनके भावी जीवन के कार्यक्रमों में दृष्टिगोचर होता है। हरिद्वार के बाद स्वामी जी का मुख्य पड़ाव हम काशी में देखते हैं जहां उन्होंने काशी के दिग्गज विद्वानों से मूर्तिपूजा को वेदों का प्रमाण देकर सिद्ध करने की चुनौती दी थी। अनेक बार स्वामी जी की चुनौती की उपेक्षा करने पर काशी नरेश ईश्वरी नारायण सिंह की आज्ञा देने पर काशी के पण्डित स्वामी जी से शास्त्रार्थ करने के लिये तैयार हुए। इसके लिये 16 नवम्बर, सन् 1869 की तिथि निर्धारित की गई थी।

निर्धारित तिथि को शास्त्रार्थ हुआ। स्वामी दयानन्द अकेले थे और दूसरी ओर लगभग 30 विद्वान थे जिनसे स्वामीजी ने शास्त्रार्थ किया। मूर्तिपूजा पर काशी के पण्डितों को वेदों से प्रमाण वा वेद वचन प्रस्तुत करने थे परन्तु वह ऐसा नहीं कर सके। वहां जो प्रश्नोत्तर व बातें हुई वह काशी शास्त्रार्थ में वर्णित हैं। काशी के लगभग शीर्ष 30 पण्डितों में से कोई एक भी मूर्तिपूजा के पक्ष में वेदों का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका। अतः मूर्तिपूजा का आधार वेद न होकर वेद विरुद्ध कल्पना व मान्यता ही स्वीकार किया जा सकता है। इस शास्त्रार्थ में पौराणिकों ने अनेक प्रकार के विघ्न डाले। काशी नरेश पौराणिक पक्ष की ओर झुके थे। वह न्याय का पालन नहीं कर सके और उन्होंने भी स्वामी दयानन्द के विरुद्ध अपना मत दिया जबकि वास्तविकता यह थी कि काशी के पण्डित शास्त्रार्थ अधूरा छोड़कर चले गये थे। इसके बाद सत्य को स्वीकार न करने, पण्डितों के मूर्तिपूजा व पौराणिक कर्मकाण्डों यथा तीर्थ महत्व व उनमें स्नान आदि से स्वार्थ जुड़े होने के कारण स्थिति यथापूर्व रही। स्वामी जी का मूर्तिपूजा आदि अन्धविश्वासों को छुड़वाने का प्रयत्न सफल न हो सका। इस कारण स्वामी जी ने अपने उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिये नये उपायों पर विचार किया और इसके बाद हम देखते हैं कि वह कोलकत्ता सहित बंगाल के अनेक स्थानों, महाराष्ट्र के पूना तथा मुम्बई आदि अनेक स्थानों सहित राजस्थान की कुछ रिसायतों में जाकर वहां के प्रमुख व्यक्तियों व रजवाड़ों आदि से मिलकर वेद प्रचार करते हैं। स्वामी जी ने अपनी पूरी सामथ्र्य लगाकर लोगों को वैदिक मत को स्वीकार कराने का प्रयत्न किया। स्वामी जी ने कालान्तर में पंजाब का भी दौरा किया। उन दिनों पूरा पाकिस्तान पंजाब का भाग था। स्वामी जी ने पंजाब के अनेक स्थानों में आर्यसमाजें स्थापित की। वहां उन्हें अन्य स्थानों से अधिक सफलता मिली। पंजाब में ही उन्हें स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, पं. लेखराम, महात्मा हंसराज, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द आदि अनेक सहयोगी मिले जिन्होंने आर्यसमाज के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्वामी दयानन्द जी ने अपने गुरु को दिये वचन को पूरा करने के लिये मुम्बई में उनके कुछ शिष्यों के अनुरोध पर वेद धर्म के प्रचार के लिए आर्यसमाज संगठन व संस्था की स्थापना चैत्र शुक्ल पंचमी तदनुसार 10 अप्रैल, सन् 1875 को की थी। इसका मुख्य उद्देश्य वेद को सब सत्य विद्याओं का पुस्तक बताकर वेदों को पढ़ने व पढ़ाने तथा वेदों के सुनने व सुनाने को परम धर्म निश्चित किया गया था। आर्यसमाज की स्थापना के अनन्तर ऋषि ने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया जिसमें सर्वप्रमुख सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, पंचमहायज्ञविधि, गोकरुणाविधि आदि हैं। स्वामी जी ने यजुर्वेद भाष्य से वेदभाष्य लेखन का कार्य आरम्भ किया था और यजुर्वेद तथा ऋग्वेद का साथ-साथ भाष्य किया। यह भाष्य वह संस्कृत व हिन्दी दोनों भाषाओं में कर रहे थे। यजुर्वेद की मन्त्र संख्या कम होने से वह पहले समाप्त हो गया। ऋग्वेद का भाष्य का कार्य चल रहा था। उसके बाद सामवेद तथा अथर्ववेद का भाष्य भी आरम्भ किया जाना था। ऋग्वेद के सातवें मण्डल का भाष्य चल रहा था तभी स्वामी जी को जोधपुर में एक षडयन्त्र के अन्तर्गत उनके पाचक के द्वारा विषपान कराया गया। इसके कुछ दिनों बाद 30 अक्टूबर सन् 1883 को अजमेर में दिवाली के दिन ऋषि दयानन्द का देहावसान हो गया जिससे वेदभाष्य का कार्य पूरा न हो सका। इस कार्य को उनके बाद उनके अनेक शिष्यों ने पूरा किया। वर्तमान में अनेक वेदभाष्यकारों के वेदानुकूल प्रामाणिक भाष्य उपलब्ध हैं। अपनी मृत्यु से पूर्व तक ऋषि ने देश के अनेक भागों में जाकर वेद प्रचार किया था। अनेक स्थानों पर आर्यसमाजें स्थापित हुई थीं जहां नियमित रूप से सत्संग होने लगे थे। सत्यार्थप्रकाश तथा अन्य ग्रन्थों का पाठ भी होता था। प्रवचन व भजन आदि भी किये जाते थे।

ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में अपने गुरु स्वामी विरजानन्द जी को दिये वचन का प्राणपण से पालन किया। इसका पूरा ज्ञान ऋषि दयानन्द के पं. लेखराम, पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, स्वामी सत्यानन्द, श्री हर विलास शारदा, राम विलास शारदा, मास्टर लक्ष्मण आर्य तथा डा. भवानी लाल भारतीय आदि के जीवन चरितों को पढ़कर प्राप्त किया जा सकता है। स्वामी श्रद्धानन्द और पं. लेखराम जी द्वारा आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब की ओर से ऋषि दयानन्द के विस्तृत जन्म चरित की खोज कराकर व उसका सम्पादन व प्रकाशन कराकर एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। यदि यह दो व्यक्ति न होते तो आज हम ऋषि दयानन्द जी के जीवन से जिस व्यापकता से परिचित होते हैं, वह न हो पाते। इन महापुरुषों को हम नमन करते हैं। इस लेख में हम यह बताना चाहते हैं कि मथुरा में गुरु विरजानन्द जी को अविद्या दूर करने तथा वेदों के प्रचार का ऋषि दयानन्द ने जो वचन दिया था उसे उन्होंने एक अद्वितीय सच्चे शिष्य के रूप में पूरा करने का भरसक प्रयास किया। उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया। वह जीवन में अनेक विपत्तियों के होते हुए भी कभी निराश नहीं हुए। ईश्वर के भरोसे वह आगे बढ़ते रहे। वेद प्रचार के लिये ही उन्होंने विषपान करके अपनी भौतिक देह को वैदिक धर्म की वेदी पर समर्पित किया। हमें संसार में ऋषि दयानन्द के समान दूसरा कोई महापुरुष व वेदों वाला ऋषि दृष्टिगोचर नहीं होता। आज का आर्यसमाज उनके उद्देश्यों व स्वप्नों को पूरा करने में शिथिल दीखता है। आर्यों को अपनी महत्वाकांक्षायें छोड़कर संगठन को मजबूत करना होगा। गुण, कर्म व स्वभाव को महत्व देना होगा। समाज के सिद्धान्तों को समर्पित होकर पालन करने के साथ दिग्दिगन्त वेद प्रचार करना होगा तभी वैदिक धर्म व संस्कृति बच सकेगी। आज हमारा उद्देश्य कृण्वन्तो विश्वमार्यम् बहुत पीछे रह गया है। आज की चुनौती वैदिक धर्म की रक्षा करने की है। कल क्या होगा कोई नहीं जानता। हमें अपने आन्तरिक शत्रुओं को भी पहचानना होगा और उन्हें बाहर करना होगा। इति ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

sarvjatiy parichay samelan,marriage buero for all hindu cast,love marigge ,intercast marriage ,arranged marriage

rajistertion call-9977987777,9977957777,9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अनुसार विश्व कल्याण का आधार वेद।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अनुसार विश्व कल्याण का आधार वेद।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अनुसार विश्व कल्याण का आधार वेद।

आज संसार में अनेक भाषायें और अनेक मत-मतान्तर प्रचलित हैं। मत-मतान्तरों को ही लोग धर्म मानने लगे हैं जबकि इन दोनों में अन्तर है। मत-मतान्तर इतिहास के किसी काल विशेष में किसी मनुष्य विशेष द्वारा वा उसके बाद उसके अनुयायियों द्वारा उसके नाम पर उनकी मान्यताओं के आधार पर चलाया जाता है जबकि धर्म का आरम्भ सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर से होता है। मत-मतान्तर अपनी त्रुटियों व न्यूनताओं को छुपाने व उसे ईश्वर प्रदत्त बताने के लिए अपने अपने मत को धर्म कह देते हैं। धर्म शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है। संस्कृत से ही हिन्दी व विश्व की अन्य भाषायें बनी हैं। हिन्दी में संस्कृत के अधिकांश शब्द बिना किसी प्रकार के परिवर्तन के स्वीकार कर लिये गये हैं जबकि अन्य भाषायें में संस्कृत शब्दों के स्वरूप कहीं न्यून तो कहीं अधिक बदल गये हैं व कुछ उनके अपने निजी भी शब्द भी हैं। अंग्रेजी व संस्कृत एवं हिन्दी से इतर किसी भाषा में धर्म शब्द का पर्यायवाची शब्द नहीं है। धर्म का अर्थ होता है मनुष्यों के द्वारा श्रेष्ठ मनुष्योचित गुण, कर्म व स्वभाव का धारण वा आचरण। इसमें सृष्टिकर्ता व जगतपति ईश्वर का यथार्थ ज्ञान व उसके गुणों को जानकर उसकी उपासना करना भी सम्मिलित है। ईश्वर की यथार्थ उपासना का संसार में प्रमुख ग्रन्थ योग दर्शन है। योग आत्मा को परमात्मा से जोड़ने को कहते हैं। मनुष्य अपनी आत्मा को जब ईश्वर के गुण कर्म व स्वभाव का विचार कर परमात्मा में अपने ध्यान व चिन्तन को स्थिर करता है तो उसे ईश्वरोपासना कहते हैं। उपासना में ईश्वर के मनुष्य जाति पर उपकारों को भी उपासक द्वारा स्मरण किया जाता है। परमात्मा व आत्मा का सम्बन्ध वैसा ही है जैसा कि माता-पिता के साथ पुत्र का होता है। जिस प्रकार माता-पिता की सत्य आज्ञाओं का पालन सन्तान के लिए धर्म होता है उसी प्रकार ईश्वर की वेदाज्ञाओं का पालन भी सभी मनुष्यों के धर्म होता है। यह भी ध्यातव्य है कि मनुष्य ने न तो ब्रह्माण्ड बनाया न पृथिवी, समुद्र, नदी, पर्वत, वन और अन्नादि पदार्थ। यह सब ईश्वर ने मनुष्यों के लिए बनाये हैं। मनुष्यों को भी ईश्वर ने ही बनाया है। मनुष्यों के लिए जिस जिस चीज की आवश्यकता थी सब ईश्वर ने मनुष्यों को इस सृष्टि के द्वारा दी हैं। देखने के लिए आंखें चाहिये तो आंखे दी। सुनने के लिए कान चाहियें तो श्रवण इन्द्रिय दी। इसी प्रकार से मनुष्यों को अपने कर्तव्यों का ज्ञान चाहिये। यह भी ईश्वर ने मनुष्यों को सृष्टि के आरम्भ में वेद ज्ञान देकर कराया है। वेद में ईश्वर ने तृण से लेकर प्रकृति, आत्मा व ईश्वर सभी का यथार्थ सत्य ज्ञान दिया है।
मनुष्यों को स्वस्थ शरीर व उसमें स्वस्थ ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रियों की अत्यावश्यकता है। मनुष्यों कानों से सुनता और मुंह वा वाक् इन्द्रिय से बोलता है। सुनकर ही वह ज्ञान प्राप्त करता है। माता, पिता व आचार्य उसको ज्ञान कराने वाले मुख्य लोग होते हैं। माता-पिता व आचार्य भी अपने अपने माता-पिता व आचार्य से ज्ञान प्राप्त करते हैं। सृष्टि की आदि में परमात्मा अमैथुनी सृष्टि करते हैं। तब आरम्भ में युवा-स्त्री व पुरुष उत्पन्न होते हैं। उनके माता-पिता व आचार्य नहीं होते। परमात्मा ही उस अमैथुनी सृष्टि के सबसे योग्य चार ऋषियों को चार वेदों का ज्ञान देता है। वही चार ऋषि एक अन्य सबसे योग्य पुरुष ब्रह्मा जी चारों वेदों का ज्ञान कराते हैं। यह ऋषि ही अन्य सभी मनुष्यों के माता-पिता व आचार्य कहलाते हैं। इन्हीं से सभी मनुष्यों को भाषा का ज्ञान सहित वेदों की शिक्षाओं व कर्तव्यों का ज्ञान कराया जाता है। आदि गुरु परमात्मा होता है। वह चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को ज्ञान देता है जिसमें भाषा व उसका ज्ञान भी मुख्य है। ज्ञान भाषा में ही निहित होता है। ज्ञान व भाषा को पृथक नहीं किया जा सकता। ज्ञान होगा तो भाषा अवश्य होगी। संस्कृत हर प्रकार से पूर्ण भाषा है जो ऋषियों को ईश्वर से प्राप्त हुई। लौकिक संस्कृत भाषा वैदिक भाषा का किंचित सरलीकरण है, यह बाद के ऋषियों व विद्वानों द्वारा किया गया है। अतः मूल भाषा भी वेदज्ञान के साथ ही प्राप्त हुई थी व वही किंचित विकारों के साथ व शुद्ध रूप में भी चली आ रही है। देश-काल, भौगोलिक कारणों व मनुष्यों के उच्चारण दोष आदि कारणों से इसमें किंचित परिवर्तन व विकार होना भी सम्भव होता है। अतः इसी प्रकार होते होते सृष्टि की उत्पत्ति के 1.96 अरब वर्ष हो जाने पर संसार में आज सहस्रों भाषायें अस्तित्व में आ गई हैं। सभी भाषाओं की उत्पत्ति प्रायः इसी प्रकार या ऐसे अनेक कारणों से होना सम्भव प्रतीत होती है।
वेदों सहित वेदों पर ऋषियों के उपलब्ध ग्रन्थों का अध्ययन कर धर्म का सर्वांग शुद्ध रूप प्राप्त होता है। यह महाभारत काल व उसके कुछ बाद के वर्षों तक अस्तित्व व व्यवहार में रहा है। इसी को वैदिक धर्म कहते हैं। इसमें किसी अन्य मान्यता व सिद्धान्त को जोड़ने व मिलाने का कहीं अवकाश ही नहीं था। अतः किसी नये धर्म के प्रचलन का प्रश्न उत्पन्न नहीं होता। यह सत्य है कि महाभारत युद्ध के बाद वेद के सत्य अर्थों का यत्र तत्र लोप हो गया था। मूल वेद सुरक्षित रहे और उनकी मध्यकालीन व्याख्यायें भी विद्यमान रहीं। इनमें कुछ भ्रान्तियां थीं। ईसा की अट्ठारहवीं शती में ऋषि दयानन्द सरस्वती (1825-1883) का प्रादुर्भाव रहता है। वह अपने अपूर्व पुरुषार्थ, तप व विद्याबल से वेद व वेदज्ञान को प्राप्त करते हैं और वेदभाष्य सहित अनेक महत्वपूर्ण वैदिक ग्रन्थों की रचना करते हैं। ऋषि दयानन्द जी ने कोई नई बात नहीं कही है। उन्होंने जो कहा व लिखा है वह वही है जो सृष्टि काल के आरम्भ से देश देशान्तर में विद्यमान रहा था परन्तु उनके समय में वह सर्वत्र उपलब्ध नहीं था। उन्होंने उस अलभ्य वैदिक ज्ञान को स्वपुरुषार्थ से प्राप्त किया, अपने विवेक से उसकी परीक्षा व सत्यासत्य का निर्णय किया और उसे देशवासियों के सम्मुख सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने सबल युक्तियों से सिद्ध किया कि मनुष्यों का एक ही धर्म है और वह वेद प्रतिपादित कर्तव्य कर्म व आचरण ही हैं। संसार में जितने भी मत-मतान्तर चल रहे हैं वह अविद्या के काल में चलें जिनकी अब आवश्यकता नहीं है। मत-मतान्तरों में अनेक न्यूनतायें और इनकी अनेक बातें स्त्री व पुरुषों में भेदभाव भी करती हैं। ईश्वरोपासना और वायु-जल-पर्यावरण की शुद्धि हेतु यज्ञ का विधान व विज्ञान की आवश्यक बातों का ज्ञान भी इन मत-मतान्तरों की पुस्तकों में नहीं है। इनसे इन मत के वर्तमान आचार्यों और अनुयायियों की इस रूप में हानि हो रही है कि वह उचित रीति से ईश्वरोपासना एवं अन्य वैदिक कर्मों व अनुष्ठानों को न करने से उससे प्राप्त होने वाले लौकिक व पारलौकिक लाभों से वंचित हो रहे हैं। अतः सभी को वैदिक धर्म की ही शरण लेकर उसी को अपनाना व धारण करना चाहिये। वेदों के आधार पर एक ऐसे समाज, देश व विश्व का निर्माण किया जा सकता है जहां किसी से भेदभाव न होता हो, सब शिक्षित हों, सब अपने अपने कर्तव्यों का पालन करें, सबको उन्नति के समान अवसर मिले, जहां जन्मना जाति व वर्गवाद आदि न हो, लोग मनुष्यों को ही नहीं प्राणीमात्र को ईश्वर की सन्तान व अपना मित्र जानें आदि आदि। वेदों को अपनाकर व उनकी शिक्षाओं के द्वारा विश्व में सुख व शान्ति को स्थापित किया जा सकता है। सृष्टि के आरम्भ से महाभारतकाल पर्यन्त तक के 1.960848 अरब वर्षों तक भारत वा आर्यावर्त्त के आर्यों का ही विश्व में एकमात्र निरन्तर वैदिक धर्म पर आधारित चक्रवर्ती राज्य रहा है जहां सब मनुष्य आध्यात्मिक व भौतिक दृष्टि से सुखी थे। तब न कोई मत-मतान्तर था न उसकी आवश्यकता थी। आज भी नहीं है। आवश्यकता केवल विचार, सोच व चिन्तन बदल कर उचित चिन्तन व सत्य निर्णय करने की है।
देश व विश्व में सुख व शान्ति की स्थापना को लक्ष्य में करके वेद का मंथन किया जाना चाहिये और इससे जो रत्न प्राप्त हों उसे देश व विश्व में विस्तार व वितरण कर एक सत्य मत धर्म की स्थापना करनी चाहिये। ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश एक ऐसा ही प्रयास था। ऐसे मंथन पहले भी हुए व हुए होंगे। आज इसकी सर्वाधिक आवश्यकता है। ऋषि दयानन्द ने यह कार्य आरम्भ किया था। यह कार्य अधूरा पड़ा है। यह कार्य केवल ऋषि दयानन्द के अनुयायियों का ही कार्य नहीं है अपितु यह संसार के सभी मनुष्यों का अपना कार्य है। इसी से विश्व का कल्याण होने के साथ आध्यात्मिक व भौतिक उन्नति हो सकती है और उससे संसार के सभी लोग लाभान्वित हो सकते हैं।
sarvjatiy parichay samelan,marriage buero for all hindu cast,love marigge ,intercast marriage ,arranged marriage

rajistertion call-9977987777,9977957777,9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

“ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया”

“ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया”

ओ३म्
“ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया”
===========
ऋषि दयानन्द एक सत्यान्वेषी सत्पुरुष थे। वह सच्चे ईश्वर को प्राप्त करने तथा मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिये अपनी आयु के बाईसवें वर्ष में अपने घर से निकले थे। उन्होंने देश के अनेक भागों में जाकर धार्मिक पुरुषों के दर्शन करने सहित उनसे उपदेश ग्रहण किये थे। इसके साथ ही उन्होंने यात्रा में मिले ग्रन्थों का अध्ययन किया था तथा अनेक गुरुओं से योग की शिक्षा भी प्राप्त की थी। उनके योग के दो गुरु श्री ज्वालानन्द पुरी तथा श्री शिवानन्द गिरी थे। इन गुरुओं से उन्हें योग विद्या का ज्ञान हुआ तथा योग के अभ्यास द्वारा समाधि की सिद्धि हुई। स्वामी जी के योगी बन जाने और ईश्वर साक्षात्कार कर लेने पर भी उनकी विद्या प्राप्ति की पिपासा शान्त नहीं हुई थी। उन्हें अपने संन्यास गुरु स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती से अपने एक शिष्य प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती का पता मिला था जो मथुरा में रहकर एक पाठशाला में अपने शिष्यों को वेद व्याकरण का अध्ययन कराते थे और शिष्यों के धर्म व विद्या विषयक शंकाओं के समाधान करते थे। स्वामी दयानन्द सन् 1860 में उनके पास पहुंचे थे और उनका शिष्यत्व ग्रहण किया था। स्वामी दयानन्द जी की विद्या लगभग 3 वर्ष में पूरी हुई थी। विद्या पूरी होने पर गुरु दक्षिणा के अवसर पर गुरु विरजानन्द जी ने ऋषि दयानन्द को अपनी हृदय की इच्छा को दयानन्द जी के सम्मुख प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा था कि महाभारत यद्ध के बाद से वेद विद्या का ह्रास होते होते वेद ज्ञान विलुप्ति के कागार पर है। तुम वेद विद्या वा ज्ञान से सम्पन्न हो। देश के लोग अविद्या के कारण नाना प्रकार के दुःख व कष्ट भोग रहे हैं। इन सबका कारण अविद्या व अविद्यायुक्त मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध जैसी परम्परायें व क्रियायें हैं। ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की भावनाओं को यथावत् समझ लिया था। वह जान गये थे गुरुजी मुझसे अविद्या व अन्धविश्वासों का खण्डन तथा वेदज्ञान व मान्यताओं का मण्डन कराना चाहते हैं। गुरु जी चाहते थे कि दयानन्द जी संसार से मत-मतान्तरों की अविद्या को दूर कर वेद विद्या के आधार पर एक ज्ञान व विज्ञान से युक्त देश व समाज का निर्माण करें। ऋषि दयानन्द ने कुछ क्षणों में ही गुरु जी के प्रस्ताव पर विचार किया और उन्हें अपनी स्वीकृति दी थी। उन्होंने कहा था कि आप आने वाले दिनों में देखेंगे कि आपका यह शिष्य आपको दिये गये अपने वचनों का प्राणपण से पालन कर रहा है।

गुरु को वचन देने के बाद स्वामी दयानंद मथुरा से आगरा आकर कई महीनों तक रहे और वहां कथा तथा प्रवचन करते रहे। इसके साथ ही वह अपने प्रचार की भावी योजना भी तैयार करते रहे थे। यहां रहकर स्वामी दयानन्द जी ने मूल वेदों को प्राप्त करने का प्रयास किया था। न मिलने पर वह इसकी खोज में आगरा से ग्वालियर, धौलपुर, जयपुर, करौली आदि स्थानों पर गये थे। इनमें से किसी एक स्थान से आपको चार वेदों की मन्त्र संहितायें प्राप्त हुई थी, ऐसा हमारा अनुमान है। इसके बाद आपने करौली में कई महीने रहकर वेदों की परीक्षा कर अपने सिद्धान्तों को अन्तिम रूप दिया था। इसी क्रम में हम देखते हैं कि स्वामी जी पुष्कर के मेले में जाते हैं और वहां प्रचार और सुधार के काम करने आरम्भ करते हैं। आपका ईसाईयों से संवाद भी होता है। पुष्कर से स्वामी अजमेर आये थे और यहां उन्होंने पादरी राबिन्सन, ग्रे और शुल्बे्रड के साथ जीव, ईश्वर, सृष्टिक्रम तथा वेद विषय पर तीन दिन तक संवाद किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वामी जी ने इससे पूर्व मत-मतान्तरों के प्रमुख ग्रन्थों का अध्ययन भी कर लिया था जिससे उन्हें सत्यासत्य के निर्णयार्थ खण्डन-मण्डन करने सहित मत-मतान्तरों के लोगों को सत्य का ग्रहण कराने और असत्य को छुड़वाने में सफलता प्राप्त हो सके।

लगभग इन्हीं दिनों हरिद्वार में कुम्भ का मेला आरम्भ होने वाला था। यहां देश भर से पौराणिक धर्म भावना व आस्था रखने वाले बन्धु आते हैं। यहां प्रचार का अवसर देखकर स्वामी जी हरिद्वार पहुंचे थे और यहां आपने पाखण्ड खण्डिनी पताका भी लगाई थी। यहां रहकर आपने जो प्रचार किया उसका लोगों पर वह प्रभाव नहीं हो रहा था जो होना चाहिये था। इससे स्वामी जी को कुछ निराशा रही होगी। इसी कारण उन्होंने मौन व्रत भी रख लिया था। तभी उन्हें अहसास हुआ कि मौन रहने से तो उद्देश्य सिद्ध नहीं होगा। उसके लिये तो वेद प्रचार व खण्डन-मण्डन आवश्यक है, अतः आपने अपना मौन व्रत भी तोड़ दिया था। यहां स्वामी जी ने जो चिन्तन किया उसका लाभ उनके भावी जीवन के कार्यक्रमों में दृष्टिगोचर होता है। हरिद्वार के बाद स्वामी जी का मुख्य पड़ाव हम काशी में देखते हैं जहां उन्होंने काशी के दिग्गज विद्वानों से मूर्तिपूजा को वेदों का प्रमाण देकर सिद्ध करने की चुनौती दी थी। अनेक बार स्वामी जी की चुनौती की उपेक्षा करने पर काशी नरेश ईश्वरी नारायण सिंह की आज्ञा देने पर काशी के पण्डित स्वामी जी से शास्त्रार्थ करने के लिये तैयार हुए। इसके लिये 16 नवम्बर, सन् 1869 की तिथि निर्धारित की गई थी।

निर्धारित तिथि को शास्त्रार्थ हुआ। स्वामी दयानन्द अकेले थे और दूसरी ओर लगभग 30 विद्वान थे जिनसे स्वामीजी ने शास्त्रार्थ किया। मूर्तिपूजा पर काशी के पण्डितों को वेदों से प्रमाण वा वेद वचन प्रस्तुत करने थे परन्तु वह ऐसा नहीं कर सके। वहां जो प्रश्नोत्तर व बातें हुई वह काशी शास्त्रार्थ में वर्णित हैं। काशी के लगभग शीर्ष 30 पण्डितों में से कोई एक भी मूर्तिपूजा के पक्ष में वेदों का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका। अतः मूर्तिपूजा का आधार वेद न होकर वेद विरुद्ध कल्पना व मान्यता ही स्वीकार किया जा सकता है। इस शास्त्रार्थ में पौराणिकों ने अनेक प्रकार के विघ्न डाले। काशी नरेश पौराणिक पक्ष की ओर झुके थे। वह न्याय का पालन नहीं कर सके और उन्होंने भी स्वामी दयानन्द के विरुद्ध अपना मत दिया जबकि वास्तविकता यह थी कि काशी के पण्डित शास्त्रार्थ अधूरा छोड़कर चले गये थे। इसके बाद सत्य को स्वीकार न करने, पण्डितों के मूर्तिपूजा व पौराणिक कर्मकाण्डों यथा तीर्थ महत्व व उनमें स्नान आदि से स्वार्थ जुड़े होने के कारण स्थिति यथापूर्व रही। स्वामी जी का मूर्तिपूजा आदि अन्धविश्वासों को छुड़वाने का प्रयत्न सफल न हो सका। इस कारण स्वामी जी ने अपने उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिये नये उपायों पर विचार किया और इसके बाद हम देखते हैं कि वह कोलकत्ता सहित बंगाल के अनेक स्थानों, महाराष्ट्र के पूना तथा मुम्बई आदि अनेक स्थानों सहित राजस्थान की कुछ रिसायतों में जाकर वहां के प्रमुख व्यक्तियों व रजवाड़ों आदि से मिलकर वेद प्रचार करते हैं। स्वामी जी ने अपनी पूरी सामथ्र्य लगाकर लोगों को वैदिक मत को स्वीकार कराने का प्रयत्न किया। स्वामी जी ने कालान्तर में पंजाब का भी दौरा किया। उन दिनों पूरा पाकिस्तान पंजाब का भाग था। स्वामी जी ने पंजाब के अनेक स्थानों में आर्यसमाजें स्थापित की। वहां उन्हें अन्य स्थानों से अधिक सफलता मिली। पंजाब में ही उन्हें स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, पं. लेखराम, महात्मा हंसराज, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द आदि अनेक सहयोगी मिले जिन्होंने आर्यसमाज के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्वामी दयानन्द जी ने अपने गुरु को दिये वचन को पूरा करने के लिये मुम्बई में उनके कुछ शिष्यों के अनुरोध पर वेद धर्म के प्रचार के लिए आर्यसमाज संगठन व संस्था की स्थापना चैत्र शुक्ल पंचमी तदनुसार 10 अप्रैल, सन् 1875 को की थी। इसका मुख्य उद्देश्य वेद को सब सत्य विद्याओं का पुस्तक बताकर वेदों को पढ़ने व पढ़ाने तथा वेदों के सुनने व सुनाने को परम धर्म निश्चित किया गया था। आर्यसमाज की स्थापना के अनन्तर ऋषि ने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया जिसमें सर्वप्रमुख सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, पंचमहायज्ञविधि, गोकरुणाविधि आदि हैं। स्वामी जी ने यजुर्वेद भाष्य से वेदभाष्य लेखन का कार्य आरम्भ किया था और यजुर्वेद तथा ऋग्वेद का साथ-साथ भाष्य किया। यह भाष्य वह संस्कृत व हिन्दी दोनों भाषाओं में कर रहे थे। यजुर्वेद की मन्त्र संख्या कम होने से वह पहले समाप्त हो गया। ऋग्वेद का भाष्य का कार्य चल रहा था। उसके बाद सामवेद तथा अथर्ववेद का भाष्य भी आरम्भ किया जाना था। ऋग्वेद के सातवें मण्डल का भाष्य चल रहा था तभी स्वामी जी को जोधपुर में एक षडयन्त्र के अन्तर्गत उनके पाचक के द्वारा विषपान कराया गया। इसके कुछ दिनों बाद 30 अक्टूबर सन् 1883 को अजमेर में दिवाली के दिन ऋषि दयानन्द का देहावसान हो गया जिससे वेदभाष्य का कार्य पूरा न हो सका। इस कार्य को उनके बाद उनके अनेक शिष्यों ने पूरा किया। वर्तमान में अनेक वेदभाष्यकारों के वेदानुकूल प्रामाणिक भाष्य उपलब्ध हैं। अपनी मृत्यु से पूर्व तक ऋषि ने देश के अनेक भागों में जाकर वेद प्रचार किया था। अनेक स्थानों पर आर्यसमाजें स्थापित हुई थीं जहां नियमित रूप से सत्संग होने लगे थे। सत्यार्थप्रकाश तथा अन्य ग्रन्थों का पाठ भी होता था। प्रवचन व भजन आदि भी किये जाते थे।

ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में अपने गुरु स्वामी विरजानन्द जी को दिये वचन का प्राणपण से पालन किया। इसका पूरा ज्ञान ऋषि दयानन्द के पं. लेखराम, पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, स्वामी सत्यानन्द, श्री हर विलास शारदा, राम विलास शारदा, मास्टर लक्ष्मण आर्य तथा डा. भवानी लाल भारतीय आदि के जीवन चरितों को पढ़कर प्राप्त किया जा सकता है। स्वामी श्रद्धानन्द और पं. लेखराम जी द्वारा आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब की ओर से ऋषि दयानन्द के विस्तृत जन्म चरित की खोज कराकर व उसका सम्पादन व प्रकाशन कराकर एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। यदि यह दो व्यक्ति न होते तो आज हम ऋषि दयानन्द जी के जीवन से जिस व्यापकता से परिचित होते हैं, वह न हो पाते। इन महापुरुषों को हम नमन करते हैं। इस लेख में हम यह बताना चाहते हैं कि मथुरा में गुरु विरजानन्द जी को अविद्या दूर करने तथा वेदों के प्रचार का ऋषि दयानन्द ने जो वचन दिया था उसे उन्होंने एक अद्वितीय सच्चे शिष्य के रूप में पूरा करने का भरसक प्रयास किया। उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया। वह जीवन में अनेक विपत्तियों के होते हुए भी कभी निराश नहीं हुए। ईश्वर के भरोसे वह आगे बढ़ते रहे। वेद प्रचार के लिये ही उन्होंने विषपान करके अपनी भौतिक देह को वैदिक धर्म की वेदी पर समर्पित किया। हमें संसार में ऋषि दयानन्द के समान दूसरा कोई महापुरुष व वेदों वाला ऋषि दृष्टिगोचर नहीं होता। आज का आर्यसमाज उनके उद्देश्यों व स्वप्नों को पूरा करने में शिथिल दीखता है। आर्यों को अपनी महत्वाकांक्षायें छोड़कर संगठन को मजबूत करना होगा। गुण, कर्म व स्वभाव को महत्व देना होगा। समाज के सिद्धान्तों को समर्पित होकर पालन करने के साथ दिग्दिगन्त वेद प्रचार करना होगा तभी वैदिक धर्म व संस्कृति बच सकेगी। आज हमारा उद्देश्य कृण्वन्तो विश्वमार्यम् बहुत पीछे रह गया है। आज की चुनौती वैदिक धर्म की रक्षा करने की है। कल क्या होगा कोई नहीं जानता। हमें अपने आन्तरिक शत्रुओं को भी पहचानना होगा और उन्हें बाहर करना होगा। इति ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

sarvjatiy parichay samelan,marriage buero for all hindu cast,love marigge ,intercast marriage ,arranged marriage

rajistertion call-9977987777,9977957777,9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app