Ayodhya Diaries: When Nehru tried to impose his ‘Aurangzeb diktat’, an ICS officer KK Nair refused to budge

Ayodhya Diaries: When Nehru tried to impose his ‘Aurangzeb diktat’, an ICS officer KK Nair refused to budge

[Ram Janmabhoomi movement spearheaded by KK Nair was later continued by tall leaders like of LK Advani, Ashok Kumar, Kalyan Singh, Vinay Katiyar, and Uma Bharti.]

The Ram Janmabhoomi movement is the manifestation of the relentless pursuit and perseverance of leaders who kept everything at stake to ensure that a majestic Ram Mandir is built. When India celebrates Bhoomi Pujan on August 5, it will mark the conclusion of a long-standing struggle by generations of Hindus in rendering justice to Lord Ram in His own country. Despite political pressure and illustrious career at stake, one such man decided to forego everything to ensure that the dream of a magnificent Ram Mandir comes alive.

The man was Kandangalathil Karunakaran Nair, abbreviated as KK Nair. Born in Kerala on September 11, 1907, the erstwhile Indian Civil Service officer was the frontrunner in safeguarding the Fundamental right to worship of Hindus even before India became a Republic. His life began from the village of Kuttanad in Alappuzha in Kerala. After completing his education in the State, Nair went to England for higher studies and cleared the Indian Civil Service (ICS) exam at the age of 21. He was then posted as the Deputy Commissioner cum District Magistrate of Faizabad, the earlier name of Ayodhya, on June 1, 1949.

Demand for a Ram Mandir left Nehru irked

His endeavour in Ayodhya eventually became the highlight of his career. After receiving a letter from the State government of Uttar Pradesh to do a report on the Ram Janmabhoomi issue, Nair sent his assistant Guru Datt Singh to submit a report on the same. On October 10, 1949, Singh, in his report, recommended the construction of a majestic Ram temple at the site. Singh had visited the site and observed that both Hindus and Muslims performed their ceremonies, side by side.

He wrote, “Hindu public has put in this application with a view to erecting a decent and Vishal temple instead of the small one which exists at present. There is nothing on the way and permission can be given as the Hindu population is very keen to have a nice temple at the place where Bhagwan Ram Chandra Ji was born. The land where the temple is to be erected is of Nazul (government land)”.

KK Nair refused to bow down to Nehru

However, on the directions of an irked Prime Minister Jawaharlal Nehru, the Chief Minister of Uttar Pradesh Govind Vallabh Pant tried to evict the Hindus from the Ram Mandir. However, the KK Nair refused to budge and decided not to implement the order. He highlighted that the Hindus were performing Puja at the site and forcing them to leave would stir riots. He also refused to remove the idols from the site. Nair was eventually suspended by Govind Vallabh Pant from his designation as the District Magistrate.

However, he moved the court against the then Congress government and secured a judgment in his favour. On being reinstated as an ICS officer yet again, Nair bid adieu to civil services. He took the decision in the wake of the growing resentment against Nehru. Nair refused to bow down to the ‘Aurangzebi diktat‘ of Nehru. His open defiance of the then Prime Minister and his firm resolve to ensure justice to the millions of Hindus earned him a place in the hearts of people. As a gesture of endearment, he was called as ‘Nair Sahab’ by people.

KK Nair strives for Ram Mandir politically

Following his resignation from ICS, he started practising as a lawyer in the Allahabad High Court. To strive for the cause of building a Ram Mandir in Ayodhya, KK Nair and his family joined the Jan Sangh. His wife Shakuntala Nair contested elections and became a member of the Uttar Pradesh Legislative Assembly in 1952.

Both Nair and his wife eventually became the members of the Lok Sabha in 1962. Interestingly, their driver was also elected as a member of the Legislative Assembly of Uttar Pradesh. Reportedly, Nair and his wife were arrested during the dark days of the National emergency that was proclaimed by President Fakhruddin Ali Ahmed on the behest of Prime Minister Indira Gandhi.

KK Nair continues to inspire a generation of Hindus

KK Nair passed away on September 7, 1977. He dedicated his life to Jan Sangh and the cause of Ram Mandir. Although he was a celebrated figure in the state of Uttar Pradesh, he received a lot of recognition in his home state of Kerala. Reportedly, the nationalists in the state of Kerala have decided to build a memorial on the land donated by Vishva Hindu Parishad in his village. A Trust by the name of KK Nair Memorial Charitable Trust has also been set up. Besides welfare activities, the trust provides training for civil service aspirants and scholarships for students.

Ram Janmabhoomi movement spearheaded by KK Nair was later continued by tall leaders like of LK Advani, Ashok Kumar, Kalyan Singh, Vinay Katiyar, and Uma Bharti. Following the historic judgment by the supreme court in 2019, a trust has been constituted to build the Majestic Ram Mandir at the same site for which Nair espoused his career. Although KK Nair is no more in this mortal world, yet his contribution to the movement will be cherished for years to come.

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रामजन्म भूमि और नेहरू

रामजन्म भूमि और नेहरू

जवाहर लाल नेहरू भी रामलला को गर्भगृह से बेदखल करने पर अमादा थे। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में ​विस्तार से इस घटना का ब्यौरा दिया है। नेहरू के मॅंसूबों को केरल के रहने वाले आईसीएस अधिकारी केकेके नायर, जो उस समय फैजाबाद के जिलाधिकारी थे ने विफल कर दिया था।

हेमंत शर्मा लिखते हैं, “उत्तर प्रदेश के कुछ मुस्लिम नेताओं और देवबंद के उलेमाओं ने नेहरू को तार भेजकर उनका ध्यान अयोध्या की ओर दिलाया। नेहरू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत और राज्य के गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री को तत्काल मस्जिद से मूर्तियों को हटाने के निर्देश दिए। लगातर केंद्र से संदेश लखनऊ आते और वैसे ही तार लखनऊ से फैजाबाद भेजे जाते कि मूर्तियॉं तुरंत हटाई जाएँ। 24 और 25 दिसंबर 1949 को लखनऊ में इस मुद्दे पर दिन भर उच्च स्तरीय बैठक होती रही। तय किया गया कि मूर्तियों को गर्भगृह से बाहर ले जाकर राम चबूतरे पर रखा जाएगा। पर फैजाबाद के सिटी मजिस्ट्रेट केकेके नायर इस बात पर अड़े रहे कि मूर्ति हटाने की घोषणा से मात्र से खून-खराबा होगा।”

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव भगवान सहाय ने इस संबंध में फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी केकेके नायर को 23 दिसंबर को निर्देश दिए। जवाब में 26 दिसंबर को नायर ने लिखा, “मैं आज भी इसकी कल्पना नहीं कर पा रहा कि मूर्ति को वहॉं से कैसे हटाया जाए। यदि इस कार्य को धार्मिक रीति के अनुसार किया जाना है तो मुझे कोई ऐसा योग्य हिंदू पुजारी नहीं मिलेगा, जो इस काम के लिए अपने जीवन और मोक्ष को दॉंव पर लगाने का इच्छुक हो। यदि ऐसा किसी भी तरह या किसी के द्वारा भी किया जाना है तो इसके परिणामस्वरुप हिंदुओं के सभी वर्गों के विरोध का सामना सरकार को करना पड़ सकता है। मुझे स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि क्या सरकार उस स्थिति का सामना करने के लिए तैयार है।”
इससे पहले की इस पर सरकार कोई प्रतिक्रिया देती अगले ही दिन नायर ने मुख्य सचिव को फिर एक चिट्ठी दाग दी। इस बार उन्होंने लिखा, “यदि सरकार किसी भी कीमत पर मूर्ति हटाने का फैसला लेती है तो मैं अनुरोध करूँगा कि मुझे कार्यमुक्त किया जाए और मेरा कार्यभार किसी ऐसे अधिकारी को दिया जाए, जिसे इस समाधान में वह अच्छाई दिखती हो जो मुझे दिखाई नहीं देती। जहॉं तक मेरा सवाल है मेरा विवेक मुझे ऐसा करने की इजाजत नहीं देता।”

नायर की चिट्ठियों से राज्य सरकार दबाव में आ गई। घबराए सहाय ने उन्हें फोन कर कहा कि वे मौके पर जैसा ठीक समझें करें। लेकिन, नेहरू लगातार अपनी चिंता जताते रहे। जब नायर सरकार की सुनने को तैयार नहीं थे तो नेहरू ने 26 नवंबर 1949 को पंत को एक तार भेजता। इसमें कहा, “अयोध्या में हुई घटनाओं से मैं परेशान हूँ। मैं गंभीरतापूवर्क उम्मीद करता हूँ कि आप इस विषय पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देंगे। वहॉं आपत्तिजनक उदाहरण रखे जा रहे हैं जिनके परिणाम घातक होंगे।”
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स्वाध्याय संदोह से नमूने के लिए 1 मंत्र की व्याख्या —

स्वाध्याय संदोह से नमूने के लिए 1 मंत्र की व्याख्या —
सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते। -ऋ० १०/१९१/२
शब्दार्थ- यथा= जैसे पूर्वे= पूर्ववर्त्ती अथवा पूर्ण देवा:= विद्वान् सं+जानाना= भली प्रकार जानते हुए भागम्= सेवन करने योग्य मोक्ष, प्रभु की उपासते= उपासना करते हैं, वैसे ही तुम सब सं+ गच्छध्वम्= एक-सा चलो, सं वदध्वम्= एक-सा बोलो। व:+जानताम्= तुम ज्ञानियों के मनांसि= मन सम्= एक-समान हों।
व्याख्या- ऋग्वेद [१०/१९१/१] में भगवान् से प्रार्थना की गई है कि प्रभो! हमें धन दो। भगवान् ने तीन मन्त्रों में धन-साधन का उपदेश दिया है। उन तीनों में से यह पहला मन्त्र है। भगवान् का आदेश है-
१. सं गच्छध्वम्= तुम सब एक-सा चलो, अथवा एक-साथ चलो। किसी कार्य की सिद्धि के लिए कार्य करने वालों की चाल, गति भिन्न-भिन्न होगी, तो कार्यसिद्धि में बड़ी बाधा आ खड़ी होगी, अतः सभी की गति, कृति, आचार एक-सा होना चाहिए।
२. वदध्वम्= तुम सब एक-सा बोलो। चाल की समानता के लिए बोल की समानता अत्यन्त आवश्यक है। बोली= भाषा के भेद के कारण बहुधा विचित्र किन्तु निरर्थक झगड़े हुए हैं। एकता स्थापित करने के लिए एक भाषा का होना अत्यन्त आवश्यक है। एक भाषाभाषी एक गुट बना लेते हैं, प्रायः उनका दूसरी भाषा बोलने वालों से सम्पर्क न्यून ही रहता है, फलतः उनसे उचित सम्बन्ध स्थापित नहीं हो पाता, अतः मनुष्यों की बोली, भाषा, उक्ति, उच्चार एक-सा होना चाहिए।
३. सं वो मनांसि जानताम्= तुम ज्ञानियों के मन एक-समान हों। एक-जैसा बोल तभी हो सकता है, जब मनों के भाव एक-से हों, अर्थात् जब तक मनुष्यों का ज्ञान, विचार एक-सा न हो, तब तक उच्चार और आचार की एकता असम्भव है। उच्चार और आचार का मूल विचार है, क्योंकि जो कुछ मन में होता है, वही वाणी पर आता है और जो वाणी से बोला जाता है, वहीं कर्म में परिणत होता है। पूर्ण विद्वान् सदा ही एक-सा व्यवहार करता हैं। अथर्ववेद [६/६४/१] में भी इसी प्रकार का मन्त्र है। उसके पूर्वार्द्ध में थोड़ा-सा भेद है। उसे यहां उद्धृत करते हैं- ‘सं जानीध्वं सं पृच्यध्वं सं वो मनांसि जानताम्’- एक-सा चलो, एक-साथ मिलो। तुम सब ज्ञानियों के मन एक-समान हों।
ऋग्वेद में ‘संवदध्वम्’ है, अथर्ववेद में ‘संपृच्यध्वम्’ है। इस एक शब्द के भेद ने बहुत ही चमत्कार किया है। ज्ञानीजन यह कहते हैं कि अपने ज्ञान द्वारा विचार में समानता उत्पन्न करके उच्चारों, आचारों में समानता ला दें, किन्तु अज्ञानियों के विचारों में एकता नहीं हो सकती। अथर्ववेद के मन्त्र में उसी का साधन बताया है- तुम सब इकठ्ठे चलो, और एक-दूसरे के साथ मिल जाओ, तब ज्ञानियों के समान तुम्हारे विचार भी एक-से हो जाएंगे। ऋग्वेद में साध्य से पहले कहा है। अथर्ववेद में उन्हीं शब्दों द्वारा, केवल एक शब्द का भेद करके, साधन-सिद्धि का उपाय बतला दिया है।
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वैदिक विनय से 1 मंत्र की व्याख्या
आ हि ष्मा सूनवे पितापिर्यजत्यापये।
सखा सख्ये वरेण्यः।। ऋग्वेद 1.26.3।।
व्याख्याकार- आचार्य अभयदेव विद्यालंकार (वैदिक विनय पुस्तक से )
शब्दार्थ- पिता सूनवे=पिता पुत्र के लिए हि स्म आयजति=सर्वथा सहायता प्रदान करता है, उसकी कमी को पूरी करता है आपिः आपये=बन्धु, बन्धु के लिए वरेण्यः सखा सख्ये=श्रेष्ठ मित्र, मित्र के लिए सर्वथा सहायता प्रदान करता है।l
व्याख्या –
संसार में पिता पुत्र-वात्सल्य से प्रेरित होकर पुत्र के लिए क्या नहीं करता ! बन्धु, बन्धु के लिए जी-जान से पूरी सहायता करता है। श्रेष्ठ मित्र अपने मित्र के लिए सब कुछ अर्पण करने को उद्यत रहता है। पर हे प्रभो! तुम मेरे सब-कुछ हो। तुम्हारे होते हुए मुझे किसी चीज की क्यों कमी रहनी चाहिए। तुमसे मेरा जो सम्बन्ध है वह घनिष्ठ, अटूट सम्बन्ध है, तुम्हें मैं किस नाम से पुकारूँ? उस परिपूर्ण सम्बन्ध का वर्णन नहीं हो सकता। मैं संसार की भाषा में तुझे कभी पिता, कभी बन्धु, कभी सखा पुकारता हूँ, पर हे प्यारे ! हे मेरी आत्मा ! इन शब्दों में मेरा-तेरा वह सम्बन्ध व्यक्त नहीं हो सकता। जब मैं देखता हूँ कि तुम मेरे पैदा करने वाले और लगातार पालने वाले हो, तब मैं अपनी भक्ति और प्रेम को प्रकट करने के लिए तुम्हें “पिता-पिता’ पुकारने लगता हूँ और तुमसे पुत्र-वात्सल्य पाने के लिए रोने लगता हूँ। जब मुझे तुम्हारे घनिष्ठ सम्बन्ध की याद आती है, उस अटूट सम्बन्ध की जो मेरा संसार में और किसी से भी नहीं है, तब मैं बन्धु-भाव में विभोर होकर तुमसे बातें करने लगता हूँ और जब देखता हूँ कि मैं भी तुम्हारी तरह आत्मा हूँ और चेतन हूँ, तुम भले ही मुझसे बहुत बड़े “वरेण्य’ होओ, तो मैं सखा बनकर तुम्हे “वरेण्य सखा’ नाम से सम्बोधित करता हूँ। हे प्रभो! तुम मुझे पुत्र मानो, बन्धु या सखा मानो, कुछ मानो, हर तरह मैं तेरा हूँ और तुम मेरे हो। हे मेरे! तो मुझ अपने को तुम कैसे छोड़ सकते हो? मैं अपूर्ण, अशक्त बालक तेरा हूँ इसलिए मेरी सहायता किये बिना तुम कैसे रह सकते हो? तुम परिपूर्ण हो, तुम्हें सदा मुझे देते रहने के सिवा और कार्य ही क्या है? यही मेरे लिए तुम्हारा यजन है। तुम मुझे देते रहो और मैं लेता रहूँ, यही तुम्हारी ओर से मेरा यजन है। तुमसे मेरा सम्बन्ध इसी रूप में स्थिर है। बड़ा छोटे को दिया ही करता है, इसलिए मैं क्या मॉंगूँ? मेरी आवश्यकता को समझना और पूरी तरह पूर्ण करना। हे मेरे! तुम स्वयं ही करोगे। बस, मैं तेरा हूँ और क्या कहूँ! हे मेरे सर्वस्व! हे मेरे सब-कुछ! मैं तेरा हूँ।
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The Red Phone!!!

The Red Phone!!!

There was a simple and little Hindu priest who lived in Mathura. Once he had the chance to go visit the Pope at the Vatican in Italy. After traveling to the Vatican, he walked up the steps and through the halls of the opulent building where the Pope stayed. He looked in awe at the beautiful marble floors and majestic columns. Then he came into the Pope’s office and he greeted the Pope who was seated behind his desk. The little Hindu priest sat nearby and they exchanged pleasantries. Then the Hindu priest noticed a red phone sitting at the end of the desk. So the Hindu priest asked what it was.

“Oh, that’s my hotline to God,” replied the Pope. “Whenever things get too difficult and I need to have a personal talk with God, I give Him a call.”

“Oh,” said the priest. “Would you mind if I tried it?”

“No, not at all,” the Pope responded.

So the little Hindu priest picked up the phone, dialed the number, and sure enough, he got through to God. So he offered his respects and prayers, said he was very happy to talk to Him, and then hung up the phone after only five minutes. He was a simple priest and did not have much more to say to God. He then thanked the Pope for the privilege of using the special red phone.

The Pope replied, “Oh that is quite all right. By the way, that will be $75.”

“Seventy-five dollars?” inquired the Hindu priest.

“Oh yes,” said the Pope. “You know, long distance charges. It’s a long way from here to God, you know.”

So the priest pulled out his wallet and gave the pope the seventy-five dollars.

Several months later, the Pope had the opportunity to visit India, and it was arranged for him to come to Mathura and visit the little Hindu priest. So the Pope approached the little hut of the Hindu priest, ducking his head as he walked through the door. He sat in a chair in front of the little table where the Hindu priest was pleased to again meet the Pope. They exchanged greetings when the Pope noticed the same kind of red phone on the priest’s table as he had at the Vatican. So the Pope asked what that was.

“Why, I also have a hotline to God,” replied the Hindu priest.

“Do you mind if I use it?” asked the Pope. “I really have a lot on my mind.”

“Please do,” responded the priest.

So the Pope got on the phone and got a good connection and managed to get through to God. He offered his prayers, but then had many things to discuss. He talked about the trouble in the Vatican, the difficulties with the priests and legal charges in the United States, the changing attitudes of the congregation in England and Europe, and so on. Fifteen minutes went by, then a half-hour, then finally after nearly an hour he was able to put the phone down. Then he said, “Thank you very much. I feel a lot better now. I had so much to talk about. By the way, how much will that be?”

The Hindu priest thought a moment and then said, “Two rupees.”

“What,” the Pope replied, surprised at how inexpensive it was. “Why so cheap?”

“Why don’t you know?” asked the little Hindu priest. “Here it is a local call.
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गौरक्षा- सवा शेर

गौरक्षा- सवा शेर
पहला हत्था तोड़ने का किस्सा-23July1930
टोहाना में मुस्लिम राँघड़ो का एक गाय काटने का एक कसाईखाना था।वहां की 52 गांवों की नैन खाप ने इसका कई बार विरोध किया।कई बार हमला भी किया जिसमें नैन खाप के कई नौजवान शहीद हुए व कुछ कसाइ भी मारे गए।लेकिन सफलता हासिल नहीं हुई।क्योंकि ब्रिटिश सरकार मुस्लिमों के साथ थी।और खाप के पास हथियार भी नहीं थे।
तब नैन खाप ने वीर हरफूल को बुलाया व अपनी समस्या सुनाई।हिन्दू वीर हरफूल भी गौहत्या की बात सुनकर लाल पीले हो गए और फिर नैन खाप के लिए हथियारों का प्रबंध किया।हरफूल ने युक्ति बनाकर दिमाग से काम लिया। उन्होंने एक औरत का रूप धरकर कसाईखाने के मुस्लिम सैनिको और कसाइयों का ध्यान बांट दिया।फिर नौजवान अंदर घुस गए उसके बाद हरफूल ने ऐसी तबाही मचाई के बड़े बड़े कसाई उनके नाम से ही कांपने लगे।उन्होंने कसाइयों पर कोई रहम नहीं खाया।अनेकों को मौत के घाट उतार दिया।और गऊओ को मुक्त करवाया।अंग्रेजों के समय बूचड़खाने तोड़ने की यह प्रथम घटना थी।

इस महान साहसिक कार्य के लिए नैन खाप ने उन्हें सवा शेर की उपाधि दी व पगड़ी भेंट की।
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उसके बाद तो हरफूल ने ऐसी कोई जगह नहीं छोड़ी जहां उन्हें पता चला कि कसाईखाना है वहीं जाकर धावा बोल देते थे।
उन्होंने जींद,नरवाना,गौहाना,रोहतक आदि में 17 गौहत्थे तोड़े।ऊनका नाम पूरे उत्तर भारत में फैल गया।कसाई उनके नाम से ही थर्राने लगे ।उनके आने की खबर सुनकर ही कसाई सब छोड़कर भाग जाते थे। मुसलमान और अंग्रेजों का क्साइवाड़े का धंधा चौपट हो गया।
इसलिए अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लग गयी। मगर हरफूल कभी हाथ न आये।कोई अग्रेजो को उनका पता बताने को तैयार नहीं हुआ।

गरीबों का मसीहा-
वीर हरफूल उस समय चलती फिरती कोर्ट के नाम से भी मशहूर थे।जहाँ भी गरीब या औरत के साथ अन्याय होता था वे वहीं उसे न्याय दिलाने पहुंच जाते थे।उनके न्याय के भी बहुत से किस्से प्रचलित हैं।

हरफूल की गिरफ्तारी व बलिदान

अंग्रेजों ने हरफूल के ऊपर इनाम रख दिया और उन्हें पकड़ने की कवायद शुरू कर दी।

इसलिए हरफूल अपनी एक ब्राह्मण धर्म बहन के पास झुंझनु(रजस्थान) के पंचेरी कलां पहुंच गए। इस ब्राह्मण बहन की शादी भी हरफूल ने ही करवाई थी।
यहां का एक ठाकुर भी उनका दोस्त था।
वह इनाम के लालच में आ गया व उसने अंग्रेजों के हाथों अपना जमीर बेचकर दोस्त व धर्म से गद्दारी की।

अंग्रेजों ने हरफूल को सोते हुए गिरफ्तार कर लिया।कुछ दिन जींद जेल में रखा लेकिन उन्हें छुड़वाने के लिये हिन्दुओ ने जेल में सुरंग बनाकर सेंध लगाने की कोशिश की और विद्रोह कर दिया।सलिये अंग्रेजों ने उन्हें फिरोजपुर जेल में चुपके से ट्रांसफर कर दिया।
बाद में 27 जुलाई 1936 को चुपके से पंजाब की फिरोजपुर जेल में अंग्रेजों ने उन्हें रात को फांसी दे दी। उन्होंने विद्रोह के डर से इस बात को लोगो के सामने स्पष्ट नहीं किया। व उनके पार्थिव शरीर को भी हिन्दुओ को नहीं दिया गया। उनके शरीर को सतलुज नदी में बहा दिया गया।

इस तरह देश के सबसे बड़े गौरक्षक, गरीबो के मसीहा, उत्तर भारत के रॉबिनहुड कहे जाने वाले वीर हरफूल सिंह ने अपना सर्वस्व गौमाता की सेवा में कुर्बान कर दिया।

वीर हरफूल का जन्म 1892 ई० में भिवानी जिले के लोहारू तहसील के गांव बारवास में एक जाट क्षत्रिय परिवार में हुआ था।उनके पिता एक किसान थे।
बारवास गांव के इन्द्रायण पाने में उनके पिता चौधरी चतरू राम सिंह रहते थे।उनके दादा का नाम चौधरी किताराम सिंह था। 1899 में हरफूल के पिताजी की प्लेग के कारण मृत्यु हो गयी। इसी बीच ऊनका परिवार जुलानी(जींद) गांव में आ गया।यहीं के नाम से उन्हें वीर हरफूल जाट जुलानी वाला कहा जाता है।

सेना में 10 साल
उसके बाद हरफूल सेना में भर्ती हो गए।उन्होंने 10 साल सेना में काम किया।उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध में भी भाग लिया। उस दौरान ब्रिटिश आर्मी के किसी अफसर के बच्चों व औरत को घेर लिया।तब हरफूल ने बड़ी वीरता दिखलाई व बच्चों की रक्षा की।अकेले ही दुश्मनों को मार भगाया। फिर हरफूल ने सेना छोड़ दी।जब सेना छोड़ी तो उस अफसर ने उन्हें गिफ्ट मांगने को कहा गया तो उन्होंने फोल्डिंग गन मांगी।फिर वह बंदूक अफसर ने उन्हें दी।
उसने अपना बाद का जीवन गौरक्षा व गरीबों की सहायता में बिताया।
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मगर कितने शर्म की बात है कि बहुत कम लोग आज उनके बारे में जानते हैं।कई गौरक्षक सन्गठन भी उनको याद नहीं करते। गौशालाओं में भी गौमाता के इस लाल की मूर्तियां नहीं है।

ऐसे महान गौरक्षक को मैं नमन करता हूँ।
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Constructing a Hindu temple in an Islamic state is ‘haram’, even non-Muslim citizens cannot spend their money on it: Zakir Naik on proposed Islamabad temple

Constructing a Hindu temple in an Islamic state is ‘haram’, even non-Muslim citizens cannot spend their money on it: Zakir Naik on proposed Islamabad temple

After Islamic extremists and fundamentalists impeded the construction of Hindu temple in Islamabad, slamming the Imran Khan government’s decision to fund the project, controversial radical Islamist Zakir Naik has voiced his discontent with the Pakistani government for allowing construction of a temple in Islamabad.

Naik said that the Imran Khan government has committed a sin, as it is haram (forbidden) according to Sharia (Islamic law) for an Islamic nation to pay or donate to a worship house of a non-Muslim, be it a temple or a church.

Speaking at a live session on his Islamic YouTube channel, BelievingBeings, the terror influencer, who fled India to Malaysia in 2016, said that all Muslim scholars, imams and ulemas stood united in their views that “a Muslim cannot donate, support or construct a house of worship of non-Muslims”, and by using Muslim taxpayers money to fund the Krishna temple in Islamabad, Pakistan is committing shirk (sin).

“There are several fatwas (rulings) that a Muslim cannot donate or build or support a house of worship of a non-Muslim. Over the ages, scholars have maintained this,” Naik said while answering to questions from his followers and others on his weekly programme.

He furthered that the Quran, the holy book of the Muslims also discourages cooperation “in sins and transgressions”, therefore, if any Muslim associates with the building of any non-Muslism worship place, he is committing a sin.

Even a non-Muslim living in an Islamic nation cannot donate for a place of their worship: Zakir Naik

The fugitive Islamic hate preacher furthered that while there was no question of a Muslim living in an Islamic nation spending from his wealth to build a temple, even a non-Muslim living in an Islamic nation should not be allowed to use his money for building a place of worship (for non-Islamic religions).

“Fuqaha (experts in Islamic law) have agreed that even a non-Muslim’s money cannot be used to build a temple in a Muslim land. So where is the question of using Muslim money or taxpayers money (to construct a temple)?” he wondered.

The radical Islamic preacher said that if a non-Muslim house of worship is expanded by a Muslim rule, there is complete justification in destroying it. The Islamic government has no right to build new places of worship for the non-Muslims, but can only protect the existing ones, said Naik.

Politics over the proposed Hindu temple in Islamabad

The politics over the construction of a Krishna temple in Islamabad exposed the hypocrisy of the Imran Khan-led Pakistani government. Days after giving a ‘go-ahead’ for the construction of the Hindu temple in Islamabad and announcing a sanction of 10 crore Pakistani rupees (approximately Indian Rs 4.47 crore) for its construction, the Imran Khan government stopped construction of the boundary wall of the Hindu temple being built in Pakistan’s capital city Islamabad citing legal reasons. The Pakistan assembly speaker also batted against the temple construction on Islamic land saying that it is against Islam and an insult to the Islamic kingdom.

It even faced the wrath of the radical Islamists and fundamentalist, who went out of the way to stop the construction of the Hindu temple. A Fatwa was issued against the under-construction temple. Thereafter the radical extremists destroyed the under-construction boundary wall of the temple. Azan was read at the temple site. Videos of Muslim citizens of Pakistan issuing threats and warning against the temple were flooded on social media sites.

If constructed, the temple would have been the first Hindu temple in the Pakistani capital.
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अथर्ववेद के पृथिवी सूक्त में राष्ट्रभक्ति –

अथर्ववेद के पृथिवी सूक्त में राष्ट्रभक्ति –
मिल कर रास्ट्र की समृद्धि में लगें
डा.अशोक आर्य
देश समृद्ध होगा तो ही देश के नागरिक समृद्ध होंगे| देश की समृद्धि के बिना राष्ट्र की उन्नति संभव ही नहीं है| देश की समृद्धि के लिए केवल सरकारों के प्रयासों से कार्य संपन्न नहीं होता अपितु इसके लिए नागरिकों को भी एकजुट होकर पुरुषार्थ करना होता है| जब नागरिक संगठित हैं, जब नागरिक पुरुषार्थी हैं और यह पुरुषार्थ एकजुट होकर करते हैं तो परिणाम भी उत्तम होते हैं| इस बात पर ही यह मन्त्र इस प्रकार प्रकाश डाल रहा है :-
यस्याश्चतस्त्र: प्रदिश: पृथिव्या यस्यामन्नं कृष्टय: संबभूव: |
या बिभर्ति बहुधा प्राणवेजत् सा नो भूमिर्गोष्वप्यन्ने दधातु || अथर्ववेद १२.१.४ || १.१२.४ || ?
इस मन्त्र में नागरिकों के संगठन पर प्रकाश डाला गया है| मन्त्र की भावना है कि देश की समृद्धि के लिए देश के नागरिकों में संगठन की, ऐक्य की भावना का होना आवश्यक है| जहाँ ऍक्य नहीं है, वहां देश की प्रगति संभव नहीं है अपितु देश के ह्रास की संभावना अधिक है| इस आलोक में आओ हम मन्त्र के भावों को विस्तार से समझें |
विस्तीर्ण दिशाओं में खेती
जिस देश में चारों दिशाएं दूर–दूर तक विस्तीर्ण दिखाई दें| देश की इन खुली दिशाओं में, खुली होते हुए भी कोई स्थान खाली न दिखाई दे, प्रत्येक स्थान पर अनेक प्रकार की वनस्पतियों की खेती होती हो | भूमि का कोई खलिहान एसा न हो, जहां वनस्पतियों की हरी–भरी फसलें न लहलहा रही हों, जहाँ फूलों से लदी लताएँ अठखेलियां न कर रही हों और जहाँ फलों से लदे पेड़ अठखेलियें न कर रहे हों| भाव यह है कि देश के प्रत्येक क्षेत्र में अन्नादि से खलिहान भरे हों, लताएँ फूलों व सब्जियों से भरी हों और वृक्ष समय पर फलों से भर जाते हों| एसा देश पूर्ण रूप से संपन्न हो जाता है क्योंकि इस देश के नागरिकों के सामने कभी भरण–पौषण की समस्या नहीं आती| यह अत्यधिक पैदा होने वाला अन्नादि न केवल देश के नागरिकों के भरण–पौषण की समस्या को दूर करता है अपितु बचा हुआ अन्नादि विदेशों में भी व्यापार द्वारा भेज कर अर्थ लाभ प्राप्त किया जा सकता है, जिससे देश की अन्य आवश्यकताएं पूर्ण करने के लिए देश अर्थ साधनों से भी संपन्न हो जाता है|
नागरिक मिलकर रहें
देश के सब नागरिक मिलकर रहें| एकता में बहुत शक्ति होती है| जब नागरिक एक हैं तो किसी अन्य देश को इस देश पर आँख तक उठाने का साहस नहीं होता| इसके साथ ही साथ जब नागरिक संगठित हैं और प्रत्येक कार्य संगठित हो कर सामूहिक हित के लिए सामूहिक रूप से करते हैं तो परिणाम भी अत्यंत उत्तम आते हैं| इसलिए नागरिकों का संगठित होना तथा मिलजुल कर कार्य करना प्रत्येक देश की उन्नति के लिए, रक्षा के लिए आवश्यक होता हैं| अत: देश के नागरिकों को देश की उन्नति के लिए सामूहिक रूप से कार्य करना चाहिये|
मातृभूमि दुग्ध व अन्न से भरण–पौषण करे
कोई भी माता एसी नहीं, जो अपनी संतान का भरण–पौषण न करती हो| वह अपनी संतानों की उन्नति के स्वप्न सदा संजोये रखती है| उसे यदि कुछ भी अभाव दिखाई देता है तो वह उसे दूर करने के लिए अपना सब कुछ लगा देती है| इस प्रकार ही हमारी यह मातृभूमि निरंतर इस चेष्टा में रहती है कि उसके संतानों(नागरिकों) का ठीक प्रकार से भरण-पौषण कर सके| इस मातृभूमि के कारण ही गो आदि पशुओं का पौषण होता है और इन गौ आदि पशुओं से नागरिकों को पौषण के लिए गोदुग्ध मिलता है| हमारी मातृभूमि ने अपने गर्भ से जो अन्नादि पदार्थ पैदा किये हैं, उन सब के सेवन से वह हमारा पौषण करे अर्थात् इस अन्नादि पदार्थों का सेवन कर हम अपने शरीर को पौषित करते हैं|
प्रत्येक व्यक्ति की उन्नति के उपाय
ऊपर बताया गया है कि मातृभूमि गो–दुग्ध व अन्नादि पदार्थों से अपने देश के नागरिकों का भरण -पौषण करे| इन पंक्तियों का भाव है कि इस मातृभूमि के प्रत्येक नागरिक के पास, उसकी उन्नति के लिए सब मार्ग खुले रहें| यह उन्नति के मार्ग कैसे खुलेंगे? इन मार्गों को खोलने की चाबी भी इस मन्त्र के अनुसार परमपिता परमात्मा ने अपनी संतान के हाथों में ही दे दी है| मन्त्र उपदेश कर रहा है कि हे मातृभूमि के वीर सपूतो! उठो, आगे बढ़ो. पुरुषार्थ करो और संगठित होकर मातृभूमि पर कुदाल चलाओ, हल चलाओ, फावड़ा चलाओ| आप के इस सामूहिक पुरुषार्थ के परिणाम स्वरूप कृषि करने से हमें उत्तम और विपुल मात्रा में अनादि पदार्थ मिलेंगे| जब हम संगठित हो कर अपने पुरुषार्थ को कलकारखानों में लगावेंगे तो इन कारखानों से निकलने वाले अनेक प्रकार के पदार्थों के उपभोग तथा व्यापार से देश को अत्यधिक धन-संपदा प्राप्त होगी| यह धन संपदा देश को उन्नति के शीर्ष पर ले जाने में सफल होगी| इसलिए देश के प्रत्येक नागरिक को मन्त्र की भावना को न केवल समझना होगा अपितु संगठित होकर इस पर कार्य भी करना होगा| यदि सब नागरिक अपना कर्तव्य समझते हुए कार्य में लगेंगे तो निश्चय ही परिणाम उत्तम होंगे|

डा. अशोक आर्य
पाकेट १/६१ प्रथम तल रामप्रस्थ ग्रीन
सेक्टर ७ वैशाली २०१०१२ गाजियाबाद उ.प्र.भारत
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एक गोत्र में शादी क्यों वर्जित है

एकगोत्रमेंशादीक्योंवर्जितहै

पिता का गोत्र पुत्री को प्राप्त नही होता। अब एक बात ध्यान दें की स्त्री में गुणसूत्र xx होते है और पुरुष में xy होते है। इनकी सन्तति में माना की पुत्र हुआ (xy गुणसूत्र). इस पुत्र में y गुणसूत्र पिता से ही आया यह तो निश्चित ही है क्यू की माता में तो y गुणसूत्र होता ही नही !
और यदि पुत्री हुई तो (xx गुणसूत्र). यह गुण सूत्र पुत्री में माता व् पिता दोनों से आते है।

१. xx गुणसूत्र ;- xx गुणसूत्र अर्थात पुत्री . xx गुणसूत्र के जोड़े में एक x गुणसूत्र पिता से तथा दूसरा x गुणसूत्र माता से आता है . तथा इन दोनों गुणसूत्रों का संयोग एक गांठ सी रचना बना लेता है जिसे Crossover कहा जाता है।

२. xy गुणसूत्र ;- xy गुणसूत्र अर्थात पुत्र . पुत्र में y गुणसूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्यू की माता में y गुणसूत्र है ही नही । और दोनों गुणसूत्र असमान होने के कारन पूर्ण Crossover नही होता केवल ५ % तक ही होता है । और ९ ५ % y गुणसूत्र ज्यों का त्यों (intact) ही रहता है।

तो महत्त्वपूर्ण y गुणसूत्र हुआ । क्यू की y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत है की यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है। बस इसी y गुणसूत्र का पता लगाना ही गौत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य है जो हजारों/लाखों वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने जान लिया था।

वैदिक गोत्र प्रणाली और y गुणसूत्र । Y Chromosome and the Vedic Gotra System
अब तक हम यह समझ चुके है की वैदिक गोत्र प्रणाली य गुणसूत्र पर आधारित है अथवा y गुणसूत्र को ट्रेस करने का एक माध्यम है।

उदहारण के लिए यदि किसी व्यक्ति का गोत्र कश्यप है तो उस व्यक्ति में विधमान y गुणसूत्र कश्यप ऋषि से आया है या कश्यप ऋषि उस y गुणसूत्र के मूल है
। चूँकि y गुणसूत्र स्त्रियों में नही होता यही कारन है की विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र से जोड़ दिया जाता है।

वैदिक/ हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारन यह है की एक ही गोत्र से होने के कारन वह पुरुष व् स्त्री भाई बहिन कहलाये क्यू की उनका पूर्वज एक ही है। परन्तु ये थोड़ी अजीब बात नही? की जिन स्त्री व् पुरुष ने एक दुसरे को कभी देखा तक नही और दोनों अलग अलग देशों में परन्तु एक ही गोत्र में जन्मे , तो वे भाई बहिन हो गये??

इसका एक मुख्य कारन एक ही गोत्र होने के कारन गुणसूत्रों में समानता का भी है । आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो तो उनकी सन्तति आनुवंशिक विकारों का साथ उत्पन्न होगी।

ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता। ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है। विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात् मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से सगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था।
इस गोत्र का संवहन यानी उत्तराधिकार पुत्री को एक पिता प्रेषित न कर सके, इसलिये विवाह से पहले #कन्यादान कराया जाता है और गोत्र मुक्त कन्या का पाणिग्रहण कर भावी वर अपने कुल गोत्र में उस कन्या को स्थान देता है, यही कारण था कि विधवा विवाह भी स्वीकार्य नहीं था। क्योंकि, कुल गोत्र प्रदान करने वाला पति तो मृत्यु को प्राप्त कर चुका है।

इसीलिये, कुंडली मिलान के समय वैधव्य पर खास ध्यान दिया जाता और मांगलिक कन्या होने से ज्यादा सावधानी बरती जाती है। आत्मज़् या आत्मजा का सन्धिविच्छेद तो कीजिये।
आत्म+ज या आत्म+जा। आत्म=मैं, ज या जा =जन्मा या जन्मी। यानी जो मैं ही जन्मा या जन्मी हूँ।
यदि पुत्र है तो 95% पिता और 5% माता का सम्मिलन है। यदि पुत्री है तो 50% पिता और 50% माता का सम्मिलन है। फिर यदि पुत्री की पुत्री हुई तो वह डीएनए 50% का 50% रह जायेगा, फिर यदि उसके भी पुत्री हुई तो उस 25% का 50% डीएनए रह जायेगा, इस तरह से सातवीं पीढ़ी मेंपुत्री जन्म में यह % घटकर 1% रह जायेगा।

अर्थात, एक पति-पत्नी का ही डीएनए सातवीं पीढ़ी तक पुनः पुनः जन्म लेता रहता है, और यही है सात जन्मों का साथ। लेकिन, जब पुत्र होता है तो पुत्र का गुणसूत्र पिता के गुणसूत्रों का 95% गुणों को अनुवांशिकी में ग्रहण करता है और माता का 5% (जो कि किन्हीं परिस्थितियों में एक % से कम भी हो सकता है) डीएनए ग्रहण करता है, और यही क्रम अनवरत चलता रहता है, जिस कारण पति और पत्नी के गुणों युक्त डीएनए बारम्बार जन्म लेते रहते हैं, अर्थात यह जन्म जन्मांतर का साथ हो जाता है।
इसीलिये, अपने ही अंश को पित्तर जन्मों जन्म तक आशीर्वाद देते रहते हैं और हम भी अमूर्त रूप से उनके प्रति श्रधेय भाव रखते हुए आशीर्वाद आशीर्वाद ग्रहण करते रहते हैं, और यही सोच हमें जन्मों तक स्वार्थी होने से बचाती है, और सन्तानों की उन्नति के लिये समर्पित होने का सम्बल देती है।

एक बात और, माता पिता यदि कन्यादान करते हैं, तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे कन्या को कोई वस्तु समकक्ष समझते हैं, बल्कि इस दान का विधान इस निमित किया गया है कि दूसरे कुल की कुलवधू बनने के लिये और उस कुल की कुल धात्री बनने के लिये, उसे गोत्र मुक्त होना चाहिये। डीएनए मुक्त हो नहीं सकती क्योंकि भौतिक शरीर में वे डीएनए रहेंगे ही, इसलिये मायका अर्थात माता का रिश्ता बना रहता है, गोत्र यानी पिता के गोत्र का त्याग किया जाता है। तभी वह भावी वर को यह वचन दे पाती है कि उसके कुल की मर्यादा का पालन करेगी यानी उसके गोत्र और डीएनए को करप्ट नहीं करेगी, वर्णसंकर नहीं करेगी, क्योंकि कन्या विवाह के बाद कुल वंश के लिये #रज् का रजदान करती है और मातृत्व को प्राप्त करती है। यही कारण है कि हर विवाहित स्त्री माता समान पूज्यनीय हो जाती है।
यह रजदान भी कन्यादान की तरह उत्तम दान है जो पति को किया जाता है।

यह सुचिता अन्य किसी सभ्यता में दृश्य ही नहीं है।

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Cheating Tactics used for Conversion of Hindus by So called messengers of peace the Sufis

Cheating Tactics used for Conversion of Hindus by So called messengers of peace the Sufis

(Most of readers have heard that Islam Spread through Sword, This is Truth in every sense if we concern History of our country but very few people have heard that Islam had spread through Cheating, Seduction, Treachery, Ill Tactics, Deceit, fake, fraud and betrayal. This Article is referred from book “The Preaching of Islam by Sir Thomas Walker Arnold ” Page 224-227. Muslims of Gujarat Specially in Kutch Area, Sindh and Area of western India Should Identify this Truth and return Back to their original roots. This act will be a true homage to their Forefather’s who were once cheated by so called messengers of Peace-The Sufis.)

One of the most famous of these missionaries was the celebrated saint, Sayyid Yusufu-ddin who came to Sind in 1422;after labouring there for ten years, he succeeded in winning over to Islam 700 families of the
Lohana caste, who followed the example of two of their number, by name Sundarji and Hansraj; these men embraced Islam, after seeing some miracles performed by the saint, and on their conversion received the names of Adamjl and Taj Muhammad respectively. Under the leadership of the grandson of the former, these people afterwards migrated to Cutch, where their numbers were increased by converts from among the Cutch Lohanas. 1 Sind was also the scene of the labours of Pir Sadru-d
Din, a missionary of the Ismailian sect, whose doctrines he introduced into India about 400 years ago. In accordance with the principles of accommodation practised by this sect, he took a Hindu name and made certain concessions to the religious beliefs of the Hindus whose conversion he sought to achieve and
introduced among them a book entitled Dasavatar in which ‘All was made out to be the tenth Avatar or incarnation of Visnu ; this book has been from the beginning the accepted scripture of the Khojah sect and it is always read by the bedside of the dying, and periodically at many festivals ; it assumes the
nine incarnations of Visnu to be true as far as they go, but to fall short of the perfect truth, and supplements this imperfect Vaisnav system by the cardinal doctrine of the Isma’ilians, the incarnation and coming manifestation of ‘All. Further he made
out Brahma to be Muhammad, Visnu to be ‘All and Adam Siva. The first of Pir Sadru-d Din’s converts were won in the villages and towns of Upper Sind : he preached also in Cutch and from these parts the doctrines of this sect spread southwards through Gujarat to Bombay ; and at the present day Khojah communities are to be found in almost all the large trading towns of Western
India and on the seaboard of the Indian Ocean.
Pir Sadru-d Din was not however the first of the Isma’ilian missionaries that came into India. Some centuries before, a preacher of this sect known by the name of Nur Satagar, had been sent into India from Alamut, the stronghold of the Grand Master of the Isma’ilians, and reached Gujarat in the reign of the
Hindu king, Siddha Raj (1094-1143 a.d.). He adopted a Hindu name but told the Muhammadans that his real name was Sayyid Sa’adat ; he is said to have converted the Kanbis, Kharwas and Koris, low castes of Gujarat.Many of the Cutch Musalmans that are of Hindu descent rever-
ence as their spiritual leader Dawal Shah Pir, whose real name was Malik ‘Abdu-1 Latif the son of one of the nobles of Mahmiid Bigarrah (1459-1511), the famous monarch of the Muhammadan dynasty of Gujarat, to whose reign popular tradition assigns the date of the conversion of many Hindus.

To the efforts of the same monarch has been ascribed the conversion of the Borahs, a large and important trading community of Shi’ahs, of Hindu origin, who are found in considerable numbers in the chief commercial centres of the Bombay Presidency, but as various earlier dates have also been assigned, such as the beginning of the fourteenth century s and even the
eleventh century, when the early Shiah preachers are said to have been treated with great kindness by the Hindu kings of Anhilvada in Northern Gujarat, it is probable that their conversion was the work of several generations. A Shiah historian has left us the following account of the labours of a missionary
named Mulla ‘All, among these people, about the beginning of the fourteenth century. As the inhabitants of Gujarat were pagans, and were guided by an aged priest, a recreant, in whom they had a great confidence, and whose disciples they were, the
missionary judged it expedient, first to offer himself as a pupil to the priest, and after convincing him by irrefragable proofs, and making him participate in the declaration of faith, then to undertake the conversion of others. He accordingly passed some years in attendance on that priest, learnt his language, studied his sciences, and became conversant with his books. By degrees he opened the articles of the faith to the enlightened priest, and persuaded him to become a Musalman. Some of his people changed their religion in concert with their old instructor. The circumstances of the priest’s conversion being made known to the
principal minister of the king of the country, he visited the priest, adopted habits of obedience towards him, and became a Muslim. But for a long time, the minister, the priest, and the rest of the converts dissembled their faith, and sought to keep it
concealed, through dread of the king.

At length the intelligence of the minister’s conversion reached the monarch. One day he repaired to his house, and finding him in the humble posture of prayer, was incensed against him. The minister knew the motive of the king’s visit, and perceived that his anger arose from the suspicion that he was reciting prayers and performing adoration. With presence of mind inspired by divine providence, he immediately pretended that his
prostrations were occasioned by the sight of a serpent, which appeared in the corner of the room, and against which he was employing incantations. The king cast his eyes towards the corner of the apartment, and it so happened that there he saw a serpent ; the minister’s excuse appeared credible, and the king’s suspicions were lulled.

After a time, the king himself secretly became a convert to the Muslim faith ; but dissembled the state of his mind, for reasons of state. Yet, at the point of death he ordered, by his will, that his corpse should not be burnt, according to the customs of the pagans.

Subsequently to his decease, when Sultan Zafar, one of the trusty nobles of Sultan Firuz Shah, sovereign of Delhi (1531-88), conquered the province of Gujarat, some learned men, who accompanied him, used arguments to make the people embrace the faith according to the doctrines of such as revere the traditions ” (i.e. the Sunnis). But, though some of the Borahs are Sunnis, for example in the district of Kaira, the majority of them are Shiahs.

Another missionary who laboured in Gujarat in the latter part of the fourteenth century was Shayjdi Jalal, commonly known under the appellation of Makhdum-i-Jahaniyan, who came and settled in Gujarat, where he and his descendants were instrumental in the conversion of large numbers of Hindus.

Dr Vivek Arya
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डी ऐ वी संस्थानों के संस्थापक व अद्भुत प्रतिभा के धनी पं गुरुदत्त विद्यार्थी-

डी ऐ वी संस्थानों के संस्थापक व अद्भुत प्रतिभा के धनी पं गुरुदत्त विद्यार्थी-
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पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी ( 26 अप्रैल 1864-1890 ), महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनन्य शिष्य एवं कालान्तर में आर्यसमाज के प्रमुख नेता थे। उनकी गिनती आर्य समाज के पाँच प्रमुख नेताओं में होती है। मात्र छब्बीस वर्ष की अल्पायु में ही उनका देहान्त हो गया किन्तु उतने ही समय में उन्होने अपनी विद्वता की छाप छोड़ी,अनेकानेक विद्वतापूर्ण ग्रन्थों की रचना की और डी ऐ वी कालेज की स्थापना की।

डीएवी, “दयानंद एंग्लो वैदिक” का संक्षिप्त रूप है। प्राचीन वैदिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा देने के उद्देश्य से इसका नाम दयानंद एंगलों वैदिक रखा गया । डीएवी निजी क्षेत्र में भारत का सबसे बड़ी शिक्षण संस्थान है। डीएवी वैदिक आध्यात्मिक उपदेष्टा स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों पर आधारित है। डीएवी स्कूली शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक की शिक्षा देता है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की जिसका लक्ष्य भारतीय समाज को बौद्धिक, वैचारिक एवं आध्यात्मिक रूप से पुनर्जीवित करना था। उन्होने “वेदों की ओर वापस” जाने का आह्वान किया जिसका वास्तविक अर्थ “शिक्षा का प्रसार” करना था। स्वामी दयानन्द का विश्वास था कि शिक्षा के प्रसार के द्वारा ही देश के कोने-कोने में जागृति आयेगी। महर्षि दयानन्द की स्मृति को चिरस्थाई करने व उनके सपनों को साकार करने के लिये पं गुरुदत्त विद्यार्थी ने अपने सहयोगियों से मिल कर “दयानन्द ऐंग्लो वैदिक कॉलेज ट्रस्ट तथा प्रबन्धन समिति” का गठन किया । एक जून सन् 1886 में इस समिति का पंजीयन (रजिस्ट्रेशन) हुआ। 1886 में ही समिति का पहला डीएवी स्कूल लाहौर में स्थापित हुआ और लाला हंसराज इसके अवैतनिक प्रधानाचार्य बनाये गये। इस प्रकार एक शैक्षिक आन्दोलन की नींव पड़ी। अनेक दूरदर्शी एवं राष्ट्रवादी जैसे लाला लाजपत राय, भाई परमानन्द, लाला द्वारका दास, बक्शी रामरतन, बक्शी टेक चन्द आदि ने इस आन्दोलन को आगे बढ़ाया और इसे पूरे देश में फैलाया। महात्मा नारायण दास ग्रोवर (15 नवम्बर 1923 – 6 फ़रवरी 2008) भारत के महान शिक्षाविद थे। वे आर्य समाज के कार्यकर्ता थे जिन्होने ‘दयानन्द ऐंग्लो वैदिक कालेज आन्दोलन’ (डीएवी आंदोलन) के प्रमुख भूमिका निभायी। उन्होने अपना पूरा जीवन डीएवी पब्लिक स्कूलों के विकास में लगा दिया। उन्होंने इस संस्था की आजीवन अवैतनिक सेवा प्रदान की। इस समय देश विदेश में इसकी हजारों शाखाएं हैं। इसके अतिरिक्त दयानंद विश्वविद्यालय, पोलीटेक्निक कालेज, मैडिकल कॉलेज भी हैं।

जिस उद्देश्य को लेकर पं गुरुदत्त विद्यार्थी जी ने इसकी स्थापना की थी वह पूरा नहीं हो पा रहा। वर्तमान अधिकारियों का यह परम कर्तव्य है कि वे इस ओर विशेष ध्यान दें। प्रवेश के समय विद्यार्थियों व अध्यापकों को सत्यार्थप्रकाश भेंट किया जाए और कक्षाओं में हर सप्ताह वैदिक विद्वानों के व्याख्यानों की व्यवस्था की जाए।

(In order to save and flourish the pious Vedic Culture and to spread education in english as well as in Anglo Education System (i.e. modern science and maths), DAVs were set up. Hence the Name ANGLO (English) – VEDIC (Vedic culture). Actually, DAV Institution was started or founded as a means to educate the youth about Vedic Culture, but only teaching that wasn’t and still isn’t enough to let a child have a good future ( by good future I mean good job), since that time was of Britons. So, in order to save and flourish the pious Vedic Culture and to spread education in English as well as in Anglo Education System (i.e. modern science and maths), DAVs were set up. Hence the Name ANGLO (English) – VEDIC (Vedic culture). It holds the record for producing the largest number of CBSE (class Xth and XIIth) toppers as a single institution in the last many years)
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अद्भुत प्रतिभा, अपूर्व विद्वत्ता एवं गम्भीर वक्तृत्व-कला के धनी पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी का जन्म 26 अप्रैल 1864 को मुल्तान के प्रसिद्ध ‘वीर सरदाना’ कुल में हुआ था। आपके पिता लाला रामकृष्ण फारसी के विद्वान थे। आप पंजाब के शिक्षा विभाग में झंग में अध्यापक थे।

विशिष्ट मेधा एवं सीखने की उत्कट लगन के कारण वे अपने साथियों में बिल्कुल अनूठे थे। किशोरावस्था में ही उनका हिन्दी, उर्दू, अरबी एवं फारसी पर अच्छा अधिकार हो गया था तथा उसी समय उन्होंने ‘द बाइबिल इन इण्डिया’ तथा ‘ग्रीस इन इण्डिया’ जैसे बड़े-बड़े ग्रन्थ पढ़ लिये। कॉलेज के द्वितीय वर्ष तक उन्होंने चार्ल्स ब्रेडले, जेरेमी बेन्थम, जॉन स्टुअर्ट मिल जैसे पाश्चात्त्य विचारकों के शतशः ग्रन्थ पढ़ लिये। वे मार्च, 1886 में पंजाब विश्वविद्यालय की एम ए (विज्ञान, नेचुरल साईन्स) में सर्वप्रथम रहे। तत्कालीन महान समाज सुधरक महर्षि दयानन्द के कार्यों से प्रभावित होकर उन्होंने 20 जून 1880 को आर्यसमाज की सदस्यता ग्रहण की। महात्मा हंसराज व लाला लाजपत राय उनके सहाध्यायी तथा मित्र थे। वे ‘द रिजेनरेटर ऑफ आर्यावर्त’ के वे सम्पादक रहे। 1884 में उन्होने ‘आर्यसमाज साईन्स इन्स्टीट्यूशन’ की स्थापना की।

अपने स्वतन्त्र चिन्तन के कारण इनके अन्तर्मन में नास्तिकता का भाव जागृत हो गया। दीपावली (1883) के दिन, महाप्रयाण का आलिंगन करते हुए महर्षि दयानन्द के अन्तिम दर्शन ने गुरुदत्त की विचारधरा को पूर्णतः बदल दिया। अब वे पूर्ण आस्तिक एवं भारतीय संस्कृति एवं परम्परा के प्रबल समर्थक एवं उन्नायक बन गए। वे डीएवी के मन्त्रदाता एवं सूत्रधार थे। पूरे भारत में साईन्स के सीनियर प्रोफेसर नियुक्त होने वाले वह प्रथम भारतीय थे। वे गम्भीर वक्ता थे, जिन्हें सुनने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती थी। उन्होंने कई गम्भीर ग्रन्थ लिखे, उपनिषदों का अनुवाद किया। उनका सारा कार्य अंग्रेजी में था। उनकी पुस्तक ‘द टर्मिनॉलॅजि ऑफ वेदास्’ को आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की पाठ्यपुस्तक के रूप में स्वीकृत किया गया। उनके जीवन में उच्च आचरण, आध्यात्मिकता, विद्वत्ता व ईश्वरभक्ति का अद्भुत समन्वय था। उन्हें वेद और संस्कृत से इतना प्यार था कि वे प्रायः कहते थे कि – “कितना अच्छा हो यदि मैं समस्त विदेशी शिक्षा को पूर्णतया भूल जाऊँ तथा केवल विशुद्ध संस्कृतज्ञ बन सकूँ।” ‘वैदिक मैगजीन’ के नाम से निकाले उनके रिसर्च जर्नल की ख्याति देश-विदेश में फैल गई। यदि वे दस वर्ष भी और जीवित रहते तो भारतीय संस्कृति का बौद्धिक साम्राज्य खड़ा कर देते। पर, विधि के विधान स्वरूप उन्होंने 19 मार्च 1890 को चिरयात्रा की तरफ प्रस्थान कर लिया। पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ ने 2000 ई में उनके सम्मान में अपने रसायन विभाग के भवन का नाम ‘पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी हाल’ रखा है।
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– डा मुमुक्षु आर्य
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