एक_दिन_माटी_में_मिल_जाना। भजन

एक_दिन_माटी_में_मिल_जाना।
भजन -स्वर ,यादवेंद्र_शास्त्री आर्यसमाज
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धन्यवाद । आचार्य भानु प्रताप वेदालंकार इंदौर मध्य प्रदेश आर्य समाज संचार नगर इंदौर मध्य प्रदेश गुरु विरजानन्द गुरुकुल इंदौर मध्य प्रदेश

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आज का वैदिक विचार

आज का वैदिक विचार

आज का वैदिक विचार
यज्ञ का संदेश – यह मेरा नहीं है ।
यज्ञ -अग्निहोत्र-हवन करते समय अनेकों मंत्र में स्वाहा के पश्चात कहा जाता है इदम् न मम। यह मेरा नहीं है क्योंकि जब हम यज्ञ में घी,हवन सामग्री आदि आहूत करके अग्नि में डालते हैं तो वह सुगंधी केवल यजमान के लिए या उसके परिवार के लिए नहीं होती अपितु संसार में जहां तक वह वायु पहुंचेगी सबके लिए वह समान रूप से यह यज्ञ की सुगंधित पहुंच जाती है । इस प्रकार से यह यज्ञ में डाला हुआ पदार्थ है, मेरा नहीं है उसी प्रकार से हमें अपने जीवन में भी यह मेरा नहीं है भाव रहना चाहिए। हमारे जीवन में अहंकार नहीं होना चाहिए।
विनम्रता होने चाहिए।
अहंकार शून्यता होनी चाहिए ,इस प्रकार का भाव, हमारा जीवन उज्जवल करता है।
कहा है-
पूजनीय प्रभु हमारे भाव उज्जवल कीजिए ।छल कपट को छोड़ देवें।
बंधुओं इस वीडियो में आप सुनेंगे कि हम महापुरुषों के बताए हुए मार्ग पर उनके जीवन से, प्रेरणा लेते हुए हम कैसे अहंकार से अंहकारशून्य – निरभिमानी होते है ।
आओ आज का विचार सुने, देखें ,समझें और अपने जीवन को स्वस्ति के मार्ग पर चलें । कल्याण के मार्ग पर ले चलें ।
धन्यवाद
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आचार्य भानुप्रताप वेदालंकार
आर्य समाज इंदौर मध्य प्रदेश
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वैदिक का अवैदिक कृत्य

वैदिक का अवैदिक कृत्य

वैदिक का अवैदिक कृत्य

वैदिक का अवैदिक कृत्य। लेखक-डॉ सोमदेव शास्त्री-मुंबई श्री वैदिकजी वेदप्रताप वैदिक के अवैदिक कृत्य-अल्लाय नमः,मोहम्मदाय नमःआदि अवैदिक कृत्यों का समर्थन करते हुए दो दो सभाओं के मंत्री विट्ठलराव जी आर्य ने मुँह में दही क्यों जम गया-बात का बतंगड-कौन सा पहाड़ टूट गया आदि शब्दों का प्रयोग कर केअपनी और दोनों सभाओं की तथा इनके साथ कार्यरत सम्माननीय पदाधिकारियों की गरिमा का भी अवमूल्यन किया है? चाहिये तो यह था कि वैदिक जी के विचारों के प्रति अपनी असहमति व्यक्त करते या आगे भविष्य में ऐसी कोई वेद विरुद्ध गतिविधि न हो-सुझाव दिया जाता ,पर श्री आर्य जी यह भी भूल गए कि वे जिस संस्था या पद पर बैठे हैं उस स्थान पर स्वामी श्रद्धानंदजी -महात्मा नारायणस्वामी ,स्वामी अभेदानंद,स्वामी ध्रुवानंद, डॉ दु:खनराम ,पं.गंगाप्रसाद, घनश्याम सिंह गुप्त जैसे महानुभाव प्रतिष्ठित रहे हैं ।जिस सभा ने स्वामी स्वतंत्रानंद जी के नेतृत्व में हैदराबाद जैसी सशक्त रियासत को असत्य और अवैदिक कृत्यों को छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया था,आज उस सभा का अपमान करते हुए अल्लाय स्वाहा का समर्थन कर रहे हैं। क्या आप ऋषि दयानन्द के शब्दों को-मनुष्य का आत्मा सत्य को जानने वाला है किन्तु अपने हठ और दुराग्रहों व स्वार्थ और प्रयोजनवश दूसरे के सत्य को असत्य और अपने असत्य को सत्य सिद्ध करने में लगा रहता है-यह चरितार्थ कर रहे हैं। यज्ञ की विधि और प्रक्रिया है-यज्ञ में घी और सामग्री डालने से वातावरण शुद्ध होता है तो क्या पूरा डिब्बा घी तथा 100 किलो सामग्री एक साथ डालने से वातावरण अधिक शुद्ध हो जायेगा? शास्त्र की तो यही आज्ञा है कि दो आहुति (स्वाहा) देने के बीच में वेदमंत्र बोला जाए,जिससे पहले दी गई आहुति अग्नि का हिस्सा (भस्म)हो जाती है,तब दूसरी आहुति दी जाती है। मुसलमान, ईसाई आदि को यज्ञ कराने के स्थान पर प्रत्येक आर्य को अपने घर में यज्ञ करना चाहिए। यज्ञ किए बिना ही जो आर्य भोजन करता है, वह अन्न नहीं पाप खाता है (भुञ्जते ते त्वद्यं पापा:-व्यास) यह प्रेरणा वैदिक जी देते जो वैदिक के अनुरूप है। क्या कोई मुसलमान व ईसाई अपने घरों में वेद व गीता पढ़ने या यज्ञादि करने का साहस कर सकेगा? मुल्ला मौलवी ऐसा करने देंगे? आप या वैदिक जी इस विषय में आश्वस्त हैं तो उनके नामों का उल्लेख करने की कृपा करें। अन्यथा सस्ती लोकप्रियता को छोड़ कर प्रत्येक आर्य को पंचमहायज्ञ ,सोलह संस्कार, वर्णाश्रम-व्यवस्था का पालन करने तथा अंधविश्वास पाखंड को छोड़कर वैदिक मान्यताओं को अपनाने की प्रेरणा दीजिए। ध्यान रहे– महर्षि दयानन्द सरस्वती ने कभी असत्य को स्वीकार नहीं किया, सत्य को प्रकट करने के लिए विषपान भी किया और हमें आदेश दिया कि सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सदा तत्पर रहना चाहिए।

#डॉ_वेदप्रताप_वैदिक_के #अवैदिक_मार्ग के समर्थक प्रो•#विठ्ठलराव_आर्य को प्रत्युत्तर #डॉ_सोमदेव_शास्त्री#मुम्बई नमस्ते जी, #डॉ वेद_प्रताप_वैदिक के द्वारा अल्लाहाय नमः, मोहम्मदाय नमः माता मरियमाय नमः इत्यादि शब्दों के द्वारा हवन करने के लिए जो वीडियो वायरल हुआ था उसके प्रत्युत्तर में वैदिक विद्वान #डॉ_सोमदेव_शास्त्री मुंबई के द्वारा एक वैदिक समाधान युक्त प्रत्युत्तर दिया गया था । डा वेदप्रताप वैदिक के वीडियो को विरोध ना करते हुए उसके समर्थन में सभा मंत्री #प्रोफेसर_विठ्ठलराव_आर्य ने #डॉ_वेदप्रताप_वैदिक के अवैदिक मार्ग का समर्थन किया , डॉ सोमदेव शास्त्री मुंबई ने सीधे प्रोफेसर विठ्ठलराव आर्य को यह जो पत्र लिखा है ,वह इस वीडियो में सुन सकते हैं , देख सकते हैं। आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य देवें । जो व्यक्ति अवैदिक कार्य करता है ,सिद्धांत विरोधी,गलत कार्य करता है उसके समर्थक भी अवैदिक माने जाएंगे। जो भी व्यक्ति वेद प्रताप वैदिक जैसे अवैदिक का समर्थक है वह निश्चित रूप से वह भी अवैदिक मार्ग का अनुसरण करता है . । ऐसा हमने देखा है कि बहुत सारे लोग मौन रह जाते हैं विरोध नहीं करते हैं जो मौन रहते हैं वह भी कहीं ना कहीं गलत बातों का समर्थन कर रहे हैं । इसलिए आओ हम इस वीडियो को देखें _समझें और अपनी प्रतिक्रियाएं हमें अवश्य देवें । आप पहले क्राफ्ट यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करें। अपने विचारों को हमारे साथ साझा करें। धन्यवाद। आचार्य भानुप्रताप वेदालंकार इंदौर मध्य प्रदेश आर्य समाज इंदौर मध्य प्रदेश। 9977987777 9977957777

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है_ज्ञानवान्_भगवन्

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नमस्ते जी, सुंदर भजन सुन रहे है आप श्री #दिनेश_आर्य_पथिक जी के द्वारा ।

आप ऐसे मधुर-भजनों को सुनने के लिए श्री #दिनेश_पथिक जी को आमंत्रित कर सकते हैं ।

इनका संपर्क नंबर 9872955 841,. 9815260605 है ।

आप मधुर सुंदर भजनों को सुनने के लिए वैदिक राष्ट्र आप वैदिक राष्ट्र यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें। बेल 🔔 को अवश्य दबाएं जिससे कि आपको वैदिक राष्ट्र की सूचनाएं मिलती रहे 👉 🔔।

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हम अपने शरीर को कैसे सजाएं

हम अपने शरीर को कैसे सजाएं

हम अपने शरीर को कैसे सजाएं
शरीर को सजाने का तात्पर्य हम अपने आंतरिक गुणों का विकास कैसे करें| क्या शरीर की सुंदरता ब्यूटी पार्लर से होगी या हमारे गुणों के विकास से होगी।
एक बहुत सुंदर शरीरवालि किंतु अवगुण, दुर्गुणवाला मनुष्य है तो क्या वह सुंदरता का पर्याय होगा| नहीं होगा अर्थात बुद्धि के द्वारा व्यक्तित्व विकास करना, पर्सनैलिटी डेवलपमेंट करना वास्तव में शरीर को सजाना कहलाता है। व्यक्ति विकास हम कैसे करें ? जिससे कि हमारे हमारी शारीरिक सुंदरता बन जाये।
संसार ,पूरा समाज बाहरी सुंदरता की ओर दौड़ रहा है जबकि बहारी सुंदरता से अत्यधिक आंतरिक सुंदरता की आवश्यकता होती है और वह आंतरिक सुंदरता केवल मात्र सद्गुणों से आ सकती है । यही बात आज के वैदिक विचार में कहीं जा रही है कि जिस प्रकार से यज्ञ वेदी हवन की वेदी को हम सजाते हैं वैसे ही हम अपने शरीर को आंतरिक गुणों से सजाएं ।। हमारे व्यक्तित्व को विकसित करें – उन्नत करें। पर्सनालिटी डेवलपमेंट करना है तो हम आंतरिक गुणों का हि विशेष रूप से विकास करें ।
धन्यवाद sarvjatiy parichay samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

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मनुष्य — मनुष्य बनो ।

मनुष्य — मनुष्य बनो ।

आज का वैदिक विचार है ।मनुष्य — मनुष्य बनो ।

दिखने में सभी व्यक्ति मनुष्य दिखाई देते हैं और आज मनुष्य का शरीर उनके पास में है किंतु उनके गुण कर्म स्वभाव के अनुसार वह मनुष्य नहीं है ।

आज का समाज मनुष्य को हिंदू ,मुसलमान, सिख, इसाई व अन्य मत-सम्प्रदायों में दीक्षित करना चाहता है ,बनाना चाहता है।

हिंदू बनाना चाहता है, मुसलमान बनना चाहता है ,इसाई बनाना चाहता है , संसार में जितने भी मत- मतांतर- संप्रदाय-मजहब हैं ,वह अपने आप को धर्म मानते हैं किंतु वह धर्म नहीं है, मजहब है, संप्रदाय हैं ,मत हैं , इसलिए बंधुओं धर्म तो केवल एक ही है, वह है – वैदिक धर्म ,मनुष्य धर्म ,उसको समझे, उसको जाने वेद ही एकमात्र ऐसा ग्रंथ है, वैदिक धर्म में ही ऐसा एक धर्म है ,जो कहता है कि मनुष्य बनो।

एक ही बात कहता है मनुष्य बनो । मानवता को अपने जीवन में धारण करो, मनुष्य बनना बड़ा कठिन है ,मनुष्य का अर्थ होता है जो सोच कर ,विचार कर ,चिंतन कर, कार्य करता है वह मनुष्य के कहलाता है ।

मनुष्य हमेशा अपने जीवन में उन्नति के पथ पर जाना चाहता है ,मनुष्य स्वार्थी नहीं होता मनुष्य अपने लिए हि कार्य नही करता है अपितु मनुष्य प्रत्येक प्राणी के हित के लिए कार्य करता है ।

मनुष्य, देवता और राक्षस तीन प्रकार के लोग दुनिया में पाए जाते हैं ।

देवता नहीं बन सकते तो कम से कम मनुष्य बने यही बात यह मंत्र कहता है।

मनुष्य बनकर दिव्य संतानों को उत्पन्न करो ।

मनुष्य बनकर दिव्य समाज का निर्माण करो ।

आज का वैदिक विचार आप देख रहे थे, देख रहे हैं ,वैदिक राष्ट्र चैनल आपने अभी तक सब्क्राइब नहीं किया तो वैदिक राष्ट्र यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें । धन्यवाद । आचार्य भानु प्रताप वेदालंकार इन्दौर मध्यप्रदेश आर्य समाज इंदौर मध्य प्रदेश गुरु विरजानंद गुरुकुल इंदौर मध्य प्रदेश 9977987777 9977957777

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सफलता का रहस्य

सफलता का रहस्य

नमस्ते जी ,आप देख रहे हैं वे वैदिक राष्ट्र यू ट्यूब चैनल की ओर से प्रस्तुत प्रेरणादायक कहानी ।

आज की कहानी है हमें बताती है कि हम अपने जीवन में सफलता को कैसे प्राप्त करें|

सफलता प्राप्ति का क्या रहस्य है |

जीवन में सफलता प्राप्त करनी है तो हमें कठोर परिश्रम निरंतर करना होता है ।

जीवन में कभी भी अपने लक्ष्य की और विश्राम नहीं करना है, निरंतर आगे बढ़ते ही रहना होता है ।

यदि हम अपने परिश्रम में शिथिलता करते हैं तो निश्चित रूप से हम पीछे रह सकते हैं इसलिए आओ हम पुरुषार्थ करें किंतु निरंतर पुरुषार्थ करें तो हमें सफलता मिलती रहेगी।

आपने अभी तक वैदिक राष्ट्र यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब नहीं किया तो अवश्य करें ।

धन्यवाद आर्य समाज इंदौर मध्य प्रदेश आज का विचार वैदिक विचार भी सुनें प्रेरणादायक कहानी भी सुनें। वैदिक सिद्धांतों से प्रेरित भजन भी आप सुनते रहें । इसी तरह आपका स्नेह प्रेम मिलता रहे पुनः धन्यवाद। 9977967777

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अकर्मा दस्यु

अकर्मा दस्यु

वेद का विचार है

वेद कहता है — जो व्यक्ति आलसी है ,निकम्मा है ,कामचोर है, वह दस्यु है – वह राक्षस है ।

वह निम्न कोटि का प्राणी है। वह मनुष्य नहीं है, इसलिए आओ हम कर्म करें ,कर्म करने से ही व्यक्ति देव देवता बनता है । कर्महीन व्यक्ति को कुछ नहीं मिलता है ,कर्म करने से ही व्यक्ति सद्गति को प्राप्त होता है।

बिना पुरुषार्थ के ,बिना श्रम के बिना मेहनत के, हमें कुछ भी नहीं – कुछ भी नहीं प्राप्त होता है।

इसलिए आओ हम सब मिलकर पुरुषार्थ करें ,सब पुरुषार्थ करें ,अच्छे कार्य करें। हमारा लक्ष्य है धर्म अर्थ काम और मोक्ष इन सब में पुरुषार्थ करना चाहिए ।

आप सुन रहे हैं वैदिक राष्ट्र यूट्यूब चैनल आपने अभी तक सब्क्राइब नहीं किया सब्क्राइब करें । लाइक करें। शेयर करें कमेंट करें बेल की घंटी को अवश्य जाएं । धन्यवाद ।

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तू ओम् का स्मरण कर।

आज का विचार
May 1, 2020 • आचार्य भानु प्रताप वेदालंकार • Vaidik sidhant वैदिक सिन्द्धांत
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है क्रतु! तू ओम् का स्मरण कर। जीवात्मा तू ओम का स्मरण कर । यह वैदिक विचार आज आप सुन रहे हैं जीवात्मा को क्रतु कहा गया है । जीवात्मा को कहा गया है — है जीवात्मा तू ओम का स्मरण कर– यजुर्वेद के 40 वें अध्याय में यह मंत्र है । अधिक जानकारी के लिए आप वैदिक राष्ट्र यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें। धन्यवाद

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जवानों! जवानी यूं ही न गंवाना

जवानों! जवानी यूं ही न गंवाना

जवानों! जवानी यूं ही न गंवाना

[ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करने से मनुष्य ऐश्वर्यशाली बनता है। आज नौजवान ब्रह्मचर्य के व्रत को भूलकर भोगवाद की ओर भाग रहे हैं। ब्रह्मचर्य के अभाव में मनुष्य शारीरिक, मानसिक और आत्मिक उन्नति से वंचित हो रहा है। आर्यसमाज के सुप्रसिद्ध विद्वान् स्व० पं० बुद्धदेव विद्यालंकार जी (स्वामी समर्पणानन्द जी) का यह लेख ‘आर्य गजट’ हिन्दी (मासिक) के मार्च १९७४ के अंक में प्रकाशित हुआ था। ब्रह्मचर्य की शक्ति को जानने के लिए नौजवानों यह लेख अवश्य पढ़ना चाहिए।

मूर्ख और बुद्धिमान में बड़ा अन्तर होता है। मूर्ख अच्छी बात को भी बुरा बना लेता है और बुद्धिमान बुरी चीज को भी अच्छी बना लेता है। काजल का अगर सही प्रयोग किया जाये तो आंखों में डाला हुआ सुन्दरता को चार चांद लगा देता है मगर गलत ढंग से प्रयोग किया हुआ वही काजल इधर-उधर लग जाये तो अच्छी सूरत को भी भद्दा बना देता है। एक बुद्धिमान पुरुष ने आग पर चढ़ी हुई देगची को देखा, उसने अनुभव किया कि वो पानी जो पहले चुपचाप था भाप बनकर कितना जबरदस्त बन गया है जिसने ढक्कन को धकेल कर फेंक दिया है, बुद्धिमान ने इस शक्ति को संभाला और इंजिन तैयार कर लिया- मूर्ख ने पानी और आग को इक्ट्ठा किया और हुक्का बनाकर गुड़गुड़ करता रहा और अपना समय और स्वास्थ्य खराब करता रहा, मनुष्य पर भी एक समय आता है जब उसके सामने अपनी शक्ति सम्भालने का अवसर आता है, जवानी मस्तानी बनकर आता है। जब वह चलता है तो कन्धे मारकर चलता है। पूछो तो कहेगा देखते नहीं जवानी आ रही है। स्टीम पैदा हो रही है। समझदार ने इसे संभाला और लाखों लोगों को पीछे लगा लिया लेकिन मूर्ख यह कहता रहा।
इस दिल के टुकड़े हजार हुए,
कोई यहां गिरा कोई वहां गिरा।

अपनी जवानी का नाश कर लेता है, नौजवानों में ही संभलने का समय होता है लेकिन आज का नौजवान कौन-सी ऐसी खराबी है जिसको निमन्त्रण नहीं देता, मैंने एक जानकार नौजवान को जिसको शराब की लत लग गई थी कहा कि क्यों अपना नाश कर रहे हो, कहने लगा पण्डित जी, आपने कभी पी ही नहीं- शेख क्या जाने मय का मजा, पूछो कम्बख्त ने कभी पी है। पी लेते तो ऐसा न कहते। मैंने कहा पीने से क्या होता है, कहने लगा सब गम गलत हो जाते हैं। मैंने कहा और होश? तो कहने लगा कि होश रहता ही नहीं। मैंने कहा कि इससे बढ़कर और क्या बेवकूफी होगी कि मनुष्य पैसे खर्च कर अपने होश खो दे, अरे मजा तो तब है कि होश कायम हों और फिर नशा चढ़ा रहे।
नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात।
(लेकिन उस नानक के पुजारी आज सबसे अधिक शराब पीते हैं।)

अभिमन्यु की लाश पड़ी है, सब रोते हैं। सुभद्रा का बुरा हाल है, कृष्ण आते हैं। कहते हैं कि सुभद्रा क्या कर रही हो, सुभद्रा रो पड़ती है। कहती है कि भाई तुम मुझे यह कह रहे हो कि क्या कर रही हो? मेरा जवान बेटा छिन गया है। मैं अधीर न होऊं तो क्या करूँ? कृष्ण कहते हैं कि सुभद्रा तू याद कर, तू क्षत्रिय की पुत्री है, क्षत्रिय की बहिन है, क्षत्रिय की पत्नी है और उस क्षत्रिय वीर की माता है। जो धर्म पर वीर गति को प्राप्त हुआ है क्षत्रिय का सबसे बड़ा कर्तव्य धर्म और न्याय की रक्षा के लिए मर मिटना है। तेरा पुत्र तो अमर हो गया है और तू रो रही है। सुभद्रा को होश आ जाता है। उसका चेहरा दमक उठता है। यह है वो खुमारी। पुत्र सामने मरा पड़ा है और होश कायम रखे जाते हैं। यह हालत तब आती है जब मनुष्य नाम की खुमारी में रंग जाये। ब्रह्मचारी बने। ब्रह्मचारी का मतलब है जो ब्रह्म में निवास करे, अपने सत को, वीर्य को संभाल कर रखे यह वीर्य असली रसायन है इससे बढ़कर और कोई रसायन नहीं, आज तो लोग असली रसायन को खोकर फिर इंजेक्शन लगवाने लगते हैं। मूर्खता और किसको कहोगे। आज सुन्दरता के लिए सुरखी और लिपस्टिक लगाये जाते हैं, होठों और गालों पर सुरखी और लाली लगायी जाती है। इस रहस्य को भुला दिया है कि असली खूबसूरती और लाली होठों और गालों पर कैसे आती है। आओ आपको इसका रहस्य भी बतला दें। होंठ बहुत कोमल हिस्सा होता है। वहां खून की लाली उभरती है। शरीर में खून हो और उसका दौरा ठीक हो तो होठों पर लाली खुद-ब-खुद आ जाती है। शरीर में खून हो इस तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। नकली रंग लगाकर बाह्यप्रदर्शन किया जाता है। अच्छा भला आदमी हो, कुछ देर पानी में रहे तो खून का दौरा रुक कर होंठ नीले पड़ जाते हैं। ये खून के करिश्मे हैं, अरे अपने सत को, वीर्य को कायम रख कर तो देखो कितना आनन्द आता है? गंवाने में तो क्षणिक मजा और फिर पछतावा लगा रहता है लेकिन इसे कायम रख कर देखो कितना आनन्द आयेगा।

आप कहेंगे पण्डित जी क्यों तरसा रहे हो। इसे कायम रखने के लिए कोई रास्ता तो बताओ। रास्ता सुन लो आपको ब्रह्मचारी बनना होगा और हमेशा प्रभु की याद रखनी होगी, कहा जाता है कि प्रभुभजन और प्रभु भक्ति तो बुढ़ापे की चीज है। याद रखना अगर आपने अभी से आदत न बनाई तो बुढ़ापे में कुछ न होगा।
सावन का महीना है। आमों का टोकरा सामने पड़ा है। मनुष्य आम चूस कर गुठलियों को एक थाली में सजा-सजा कर रख रहा है। मैंने पूछा ये क्यों सजाई जा रही है? कहने लगे यह भगवान की भेंट होगी। अरे मीठा रस तो शैतान के लिए और गुठलियां भगवान के लिए। जब शरीर काम का न रहेगा खाक भगवान की याद करोगे। जवानी बेकार खो दी तो बुढ़ापे में भगवान हाथ न आएगा। एक यह भी सवाल किया जाता है कि प्रभुभजन क्या करें दिल तो लगता नहीं, लगेगा पहले भूख पैदा करो। भोजन और भजन का एक ही कानून है। भोजन तभी अच्छा लगता है जब भूख हो, भूख में सूखे टुकड़े भी मजा देते हैं। परमात्मा के भजन के लिए भी भूख की जरूरत है। गीता ने चार प्रकार के भक्त कहे हैं।

पहला भक्त वह होता है जो दु:खी हो। आप कहेंगे क्या हम दु:खी हो जायें? हां! आप कहोगे अच्छे उपदेश देने बैठे। माता-पिता जीवित हैं, घर में सबकुछ है, किसी चीज की कमी नहीं, खाने को खूब मिलता है। दु:खी क्यों हों? इस पर भी दु:खी हो जाओ। अपने लिए नहीं, दूसरों के दु:ख को अपना दु:ख समझ लो। अगर तुम्हारे पास कोई भूखा आये तो पहिले उसे खिलाओ। कोई दु:खी है तो उसका दु:ख दूर करो। परोपकार करो। सब कुछ रखते हुए सेवा का व्रत धारण करो। सबसे बड़ी ईश्वर भक्ति यही है। किसी के काम आकर तो देखो कितना आनन्द आता है। दुनियां में जितने दुःख और झगड़े हैं उनके तीन कारण हैं, इनमें से एक तुम ले लो। आज शिक्षा के रहस्य को लोगों ने भुला दिया है, हमारे ऋषियों ने इसे खूब समझा था। वो विद्यार्थियों को दुनिया के इन तीन प्रकारों के दु:खों को दूर करने के लिए तैयार करते थे। हमारी वैदिक शिक्षा सच्चे देश, सच्चे क्षत्रिय और सच्चे ब्राह्मण पैदा करने के लिए होती थी, जो तीन प्रकार के दु:ख दूर करने के लिए तैयार किये जाते थे।

पहला दु:ख अभाव से पैदा होता है। देश का काम है कि वह वस्तुओं का निर्माण करे और सब लोगों को दे लेकिन आज का देश तो ब्लैक मार्कीटियों का हो रहा है। वो अपना स्टाक भर लेता है, वस्तुएं गायब हो जाती हैं, न मिलें तो सब दु:खी। अगर देश अपने धर्म पर कायम है तो ब्लैक मार्कीट और अभाव न आयेगा। बांट ठीक हो तो दु:ख न होगा।
दूसरा दुःख का कारण अन्याय है। कुछ गुण्डे उठते हैं और दूसरों की वस्तु छीन कर घर में डाल लेते हैं। क्षत्रिय का काम है ऐसे लोगों से समाज को बचाये। कोई चोर न हो, कोई डाकू न हो। कोई किसी पर अन्याय न करे, सब सुखी हो जायें। इस काम के लिए क्षत्रिय तैयार किये जाते थे जो न्याय को कायम रखने के लिए व्रत लेते थे और अन्याय को मिटाने के लिए जान पर भी खेल जाते थे।
तीसरा दु:ख अविद्या की वजह से होता है। अविद्या और अज्ञान को दूर करने का काम ब्राह्मण करता था। सारा संसार सुखी था। ये तीन प्रकार के दुनिया के दु:खों को दूर करने के लिए ही शिक्षा दी जाती थी और यही प्रभुभक्ति है। जो प्रभु को याद रखता है और सेवा और परोपकार की जिन्दगी व्यतीत करता है, वही प्रभु-भक्त है।

ऐसा ब्रह्मचारी ब्रह्म में विचरता है और मृत्युन्जय हो जाता है। नौजवानों दुनिया पर और अपने आप पर विजय पानी है तो ब्रह्मचर्य-व्रत को धारण करो। प्रभु-भजन और सेवा का व्रत लो, संसार तुम्हें सर पर उठाएगा।

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