गर्भाधान संस्कार

गर्भाधान संस्कार

डा . अशोक आर्य 

       संस्कारों का अभिप्रायः मानव केनवनिर्माण से है। यह संस्कार दो प्रकार के होते हैंवंशानुगत संस्कार या जन्मस्थ संस्कार। इस कोटि के संस्कारमाता पिता की परम्पराओं से प्राप्त होते हैं। दूसरेपर्या वर्णीय संस्कार होते हैंयह संस्कार वातावरण से प्राप्त होते हैंइच्छित पर्यावरण प्राप्त कर माता पिता के सरंकारों को भी बदला या प्रभावित किया जा सकता है। ऐसा हमारा मानना है। प्रथम प्रकार के संस्कार वह हैं जो जन्म से पूर्व किये जाते हैं। इनमें गर्भाधान , पुंसवन व सीमन्तोनयन संस्कार सम्मिलित हैं शेष सभी संस्कार जन्म के बाद होते हैं। जहां तक गर्भाधान संस्कार का प्रश्न है , यह संस्कार मानव के निर्माण से सम्बन्ध रखता है |

      गर्भाधान संस्कार जाति की वृद्धि के लिए होता है। इस का माध्यम माता पिता होते हैं। इसी कारण साधारणतया कहा जाता है कि जैसे माता पिता होंगे वैसे ही उनकी सन्तान होगी। इस का भाव यह है कि माता पिता की सोच, परम्परा, प्रवृतियों आदि का प्रभाव उनकी सन्तान पर अवश्य पडता है। यही कारण है कि बुरी प्रवृति वाले माता पिता की सन्तान भी उन्हीं के अनुरूप होती है जबकि अच्छी आदतों के माता पिता की सन्तान भी उनका नाम रोशन करने का कारण बनती है |। तिहागणदाही अत्यधिक देखने को मिलते हैं कि बुरे पतक प्राव वाले बच्चे भी अच्छे निकलते हैं। इसका क्या कारण हो शकता है। इस बात का उत्तर महर्षि दयानन्द सरस्वती ने दिया है कि संकाय ग मान्य कपैतृक प्रभाव पर डांकुश लगा कर उन्हें बदला जा सकता है। यहां पर महर्षि दयानन्द सरस्वती की इसी बात का ही उल्ट फेर करते हुए आधुनिक वैज्ञानिकों ने इसे विज्ञान का आधार देते हुए कहा है कि मानव स्वभाव का कारण जीन्स होते हैं, जो वंशानुगत परम्परा से आते हैं। इन्हें बदलने के लिए मानव में नए प्रकार के जीन्य का प्रवेश कराना पडेगा । एक प्रकार के जीन्स से एक ही परिवर्तन होता है। यदि अनेक परिवर्तन लाने हैं तो हमें अनेक जीन्स का प्रवेश उस में कराना होगा। डा0 हरगोविन्द खुराना ने इसी विषय पर कार्य किया है तथा इस प्रकार के जीन्स की खोज करने में सफलता पाई है।

      कछ लोगों का यह मानना है कि माता पिता के रज वीर्य के योगदान के प्रभाव को सन्तानों से मिटाया नहीं जा सकता । यदि ऐसा होता तो महर्षि ने संस्कारों के महत्व पर कभी बल न दिया होता। यह तो भारतीय परम्परा आरम्भ से ही चली आ रही है, जिसके अन्तर्गत कहा जाता है कि बच्चों को अच्छे संस्कार देकर अच्छा बनाने का मार्ग खोलो । यदि एज वीर्य ही सब कुछ होते तो विश्व की सिरमौर भारतीय संस्कृति कभी भी संस्कारों पर बल न देती । जीव विज्ञानी भी मानने लगे है कि मानव निर्माण कला की नींव रखी जा चुकी है। इसी के आधार पर उच्च कोटि के मानव का निमोण होने जा रहा है। इसके माध्यम से हम स्वेच्छा से कवि , चित्रकार, विद्वान् आदि जैसे मानव की आवश्यकता समझें, वैसा ही कर सकते है। अतः मानव के निर्माण में वंशानगत परम्पराएं किसी भी प्रकार मार्ग नहीं रोकतीं। मानव इस वंश परम्परा रूपी बहती नदी का मार्ग बदलने की शक्ति रखता हैइसके लिए परिश्रम की आवश्यकता है। 

      महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने इसी बात को स्पष्ट करने के लिए ही सस्कार पद्धति का निर्माण किया है। उनका यही सन्देश है कि संस्कारों से मानव के वंशानुगत प्राप्त परम्पराओं को बदल कर उसे जैसा चाहे बनाया जा सकता हैइसको हम टार्जन के उदाहरण से भी स्पष्ट कर सकते हैं, जो था तो मानव पुत्र किन्तु किसी कारण से वह जंगली पशुओं के हाथ में पड गया। अब वह पशुओं की भान्ति ही रहने, खाने, पीने व विचरण करने लगा। यदि माता पिता का रज व वीर्य ही सब कुछ होता तो वह कभी भी मानवीय आदतों को न छोड पाता किन्तु यहां तो सरकार प्रभावी दिखाई देते हैं। जिनके कारण वह मनुष्य रूपी कोई भी कार्य न कर सकता था । बस यह ही संस्कारों का परिणाम हैअतः महर्षि ने मानव नव निर्माण का स्वप्न संस्कारों के माध्यम से लिया । तभी तो उन्हों ने गर्भाधान को भी संस्कार पद्धति के अन्तर्गत एक स्वतन्त्र संस्कार स्वरूप स्थान दिया । बच्चे की परिस्थितियों को बदलने से ही उसे उन्नत बनाया जा सकता है। अतः संस्कार पद्धति में वर्णित गर्भाधान संस्कारविधि स्वरूप महर्षि ने हमें एक ऐसी प्रक्रिया प्रदान की है, जिसके प्रयोग से हम मन चाही सन्तान पैदा करने में सक्षम हो जाते हैं। वृहदारण्यक उपनिषद् ने भी गर्भाधान संसकार पर बहुत बल दिया है। इससे भी स्पष्ट होता है कि संस्कार व्यक्ति के निर्मा ण की क्षमता रखते हैं। 

      गर्भाधान संस्कार का मनुष्य के विवाह से विशेष सम्बन्ध है | 

यह विवाह ही है जो भावी पीढी के जन्म का कारण बनता है। यदि हमारी सामाजिक परम्पराओं में विवाह नामक संस्था न होती तो हमारी अवस्था भी पशुओं से कम न होती। अतः यह विवाह संस्कार ही तो है जिसने हमें मानव कहलाने का अधिकार दिया है। भारत में मुस्लिम राज्य के दिनों में हमारी विवाह संस्था पर संकट आया । इसी के परिणाम स्वरूप ही बाल विवाह, बहु विवाह के रूप में हमारी वैवाहिक परम्पराएं दूषित हुई। इससे हमारी जाति को बहुत हानि उठानी पड़ीऐसे समय में विवाह हो जाना जबकि प्रजनन शक्ति ही पैदा नहीं हुई, तो विवाह का औचित्य ही क्या रह जाता है, किन्तु तो भी लम्बे समय तक यह परम्पराएं चलीं। महर्षि ने इसका खुल कर विरोध किया तथा कहा कि सोलह वर्ष से पूर्व कन्या तथा पच्चीस वर्ष से पूर्व बालक का विवाह किसी भी अवस्था में न हो। किशोरावस्था में जीवनीय शक्ति तो आ सकती है किन्तु इसे मजबूती युवावस्था में ही मिलती है। जब तक यह मजबूती नहीं आती तब तक इनसे होने वाली सन्तान भी मजबूत नहीं बन पाती। इस कारण ही महर्षि ने पूर्ण युवावस्था को प्राप्त होने से पूर्व विवाह की अनुमति नहीं दी । महर्षि ने एतदर्थ सुश्रुत के उदाहरण देते हुए अपने विचारों को स्थिरता दी है। उन्होंने कहा है कि इससे पूर्व विवाहितों की सन्तान जन्म से पूर्व ही न ट हो जावेगी अथवा दुर्ब ल या अल्पजीवी होगी।

      महर्षि ने गर्भाधान संस्कार के लिए ऋतुदान शब्द का विशेष रूप से प्रयोग किया है। इस शब्द का अभिप्रायः समझे बिना यह सब व्याख्या अधूरी ही रह जाती है। साधरणतया प्रजनन की क्षमता का प्रदर्शन कन्याओं में उस समय होता है जब उसके गर्भाशय से रक्त का : प्रवाह बाहर को आने लगता है। यह स्राव तीन चार दिन होता है । यह गर्भाधान के समय का सूचक होता है। इसी समय को ऋतु व स्राव को कतनाव कहते हैं। इस समय स्त्री में गर्भधारण करने की क्षमता तो आ जाती है किन्तु उत्तम सन्तान के लिए इसका पुष्ट होना भी आवश्यक है। यही रक्त गर्भ स्थापित होने पर बन्द हो कर शिशु के पालन में तथा जन्म पर यही रक्त बालक के दूध का कारण बनता है। जब वह दूध पीना छोड देता है तो समय आने पर पुनः गर्भस्राव आरम्भ हो जाता है जो जीवन के लगभग पचास वर्ष की आयु पर्यन्त होता है | 

      स्ट स्त्री शरीर में तो गर्भस्राव से विवाह के लक्षण आ जाते हैं किन्तु पुरुष के लिए चरक का कहना है कि २५ से ४० वर्ष आयु ही वह समय है जिसमें जीवनीय शक्ति के उच्च गुण होते हैं । यह समय ही उसके लिए उपयुक्त है। यदि इस आयु में संयम पूर्वक गृहस्थी की जावे तो शास्त्र इसे भी बह्मचर्य स्वीकार करते हैं । युवा ऋतुगामी स्त्री तथा पच्चीस से चालीस वर्ष के मध्य के पुरुष ही सन्तानोत्पति के सक्षम होते हैं। इससे पूर्व ब्रह्मचर्य व पश्चात् वानपस्थाश्रम होता है, जिनमें सन्तोनोत्पत्ति नहीं हो सकती । अतः दोनों के मध्य का यह काल ही सन्तोन्पत्ति का काल है।

      केवल महर्षि ने ही नहीं अपितु चरक व मनु स्मृति ने भी यही कहा है, जिसके उद्धरण संस्कारविधि में देते हुए कहा गया है कि स्त्री व पुरुष केवल ऋतुकाल में ही सन्तानोत्पत्ति के उपाय करें। वह भी केवल अपनी स्त्री या अपने पति से, अन्य से नहीं । यदि ऐसा न करेंगे तो आयु की हानि होगी। इसमें भी कहा है कि रजोदर्शन के सोलह दिनों में प्रथम चार दिन वर्जित हैं। शेष काल वही है जिसमें स्त्री में एतदर्थ हाती है यह अवस्था केवल स्त्री में होती है। इसी का पालन पुरुष को भी करना चाहिये । गर्भ धारण कर दम्पति जैसी सन्तान चाहते हैं स्त्री को चाहिये कि अपने आप को वैसे वातावरण में ही रखेशूरवीर बनाने के लिए वीरों की कथाएं करे, सुने, वीरों के ही चित्र देखे तथा हर समय वीरो के जीवन का ही चिन्तन करे।

      वैदिक संस्कृति में इस संस्कारको अत्यन्त धार्मिक महत्ता प्रदान की गई है। यह इस संसार में नई आत्मा के प्रवेश का एक मात्र मार्ग है । मानव के नव निर्माण के लिए वैदिक महापुरुषों ने सर्वप्रथम इसी संस्कार पर अपना ध्यान केन्द्रित किया । बलि ष्ठ शरीर व उत्तम आत्माओं को बुलाने के लिए गृहस्थ की इस क्रिया की ओर हमारे महापुरुषों का ध्यान जाना आवश्यक भी था क्योंकि इसी से पवित्र होने पर ही उत्तम आत्माओं का इस संसार में आगमन होता है। सरकार विधि धार्मिक व पवित्र कार्यों का ही एक गुलदस्ता हैइस रंस्कार से पवित्र यज्ञ जो संसार को गति देने वाला होता है , को गृहस्थ लोग आरम्भ करते हैं। इस यज्ञ का परिणाम समग्र विश्व के लिए होता हैइसे पवित्र क्रिया का नाम देने वाले इसे एक सामाजिक कर्तव्य मानते थे । यही कारण था कि बीजारोपण के समय ही उत्तम सन्तान की कामना के लिए यह यज्ञ किया गयास्वस्थ शरीर व स्वस्थ मन का गर्भाधान पर विशेष प्रभाव होता है। तभी तो चरक जैसे आयु – वेदाचार्य ने कहा है कि जैसी सन्तान की इच्छा हो ,गर्भस्थ रत्री गर्भकाल में वैसे विचार,वातावरण,

      व्यवहार व कथा प्रसंग में रत रहे। यह तो सर्वविदित ही है कि अभिमन्यु ने गर्भावस्था में ही चक्रव्यूह भेदन की कला जान ली थी, जो कि गर्भावस्था में पति पत्नि की चर्चा का विषय बनी थी। ऐसे भी महर्षि हए हैं जिन्होंने गर्भावस्था में ही उच्चकोटि का ज्ञान पा लिया था अष्टावक्र भी इनमें से एकथे । इसी प्रकार गर्भस्थ अवस्था के ज्ञान से ही बहुत से क्रूर लोग भी इस धरती पर आए। एक माता गर्भावस्था में सैनिकपरेड देखते हुए विजय गान सुना करती थी ,उससे पैदा हुआ बालक नैपोलियन नामक महान् योद्धा बना।

      इन सभी दृष्टांतों से यह बात स्पष्ट होती है कि गर्भाधान संस्कार धार्मिक होने के साथ ही साथ सृष्टि की अभिवृद्धि का कारण भी है। यदि गर्भाधान संस्कार को महर्षि के बताए ढंग से पूर्ण वैदिक रीति से किया जावे तथा जैसी संन्तान की कामना हो गर्भस्थ स्त्री अपने आपको उसी वातावरण में रखे । पति-पत्नी में उन्हीं विषयों पर ही चर्चा हो परिवार में किसी प्रकार का कोई क्लेश न हो तो निश्चित ही कामधेनू के समान इच्छित सन्तान पैदा होगी। जिस से संशारकी सुख समृद्धि तो होगी ही ,परिवार, माता पिता व सन्तान का नाम भी सर्वत्र गौरव के साथ लिया जावेगा । अतः सभी का यह कर्तव्य बन जाता है कि विवाह संस्कार के पश्चात् घर लौटने पर सर्व प्रथम गर्भाधान संस्कार यज्ञ अपने परिवार में अवश्य करें। 

राजनीति की नर्सरी बनाए जाने से बर्बाद हो रहा जवाहरलाल_नेहरू_विश्वविद्यालय ——————–

राजनीति की नर्सरी बनाए जाने से बर्बाद हो रहा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
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यह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की स्थापना का पचासवां साल है। ऐसे में उसकी उपलब्धियों की पड़ताल की जानी चाहिए। आज तक वहां से किसी चर्चित शोध, अध्ययन या लेखन संबंधी कोई समाचार सुनने को नहीं मिला। न केवल ज्ञान के क्षेत्र में, बल्कि खेलकूद, रंगमंच, कला या राष्ट्रीय नीति-निर्माण में भी उसका कोई योगदान नहीं रहा। जबकि पश्चिम के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय सामाजिक चिंतन, शोध, वैदेशिक अध्ययन आदि में उल्लेखनीय योगदान करते हैं। इसीलिए वे प्रसिद्धि पाते हैं, किंतु जेएनयू से आज तक कोई ऐसी पत्रिका तक प्रकाशित नहीं हो सकी, जिसे कोई जानता हो।

सवाल है कि ऐसा क्यों? दरअसल जहां राजनीति का सर्वाधिकार हो वहां गंभीर अध्ययन, लेखन नहीं पनप सकता। इसीलिए केवल वामपंथी राजनीति के समाचारों से ही जेएनयू चर्चा में रहा है। नवीनतम समाचार स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का अपमान है, जिसे रफा-दफा करने के लिए फीस वृद्धि को लेकर हंगामा खड़ा किया गया। पिछली बार भी ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे…!’ और ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं’ वाली कुख्याति को दबाने के लिए वामपंथियों ने राष्ट्रवाद पर भड़कीली बहस की मुहिम चलाई थी।

दरअसल असली बात को दबाकर ध्यान बंटाने की वामपंथी तकनीक इसलिए सफल हो जाती है, क्योंकि उनके प्रतिद्वंद्वियों में समझ का अभाव है। उन्होंने मामले को सिर से पकड़ने के बजाय लजाते हुए ‘राष्ट्रवाद’ की अपनी नीति को स्थापित करने की कोशिश की है। फलत: वामपंथी निश्चिंत होकर हमले करते रहते हैं। इस प्रकार जिन्हें सफाई देनी थी, वही कोतवाल बन जाते हैं और जिन्हें हिसाब लेना था, वही अपना हिसाब देने लगते हैं। कायदे से वामपंथियों को कठघरे में खड़ा करना चाहिए था, क्योंकि वे आरंभ से ही जेएनयू के शैक्षिक वातावरण को विषाक्त करते रहे हैं।

एक बार भारत-पाक क्रिकेट मैच के दौरान जेएनयू में भारत विरोधी नारे लगे थे। भारत की जीत पर खुशी मनाने वालों पर हमला हुआ था। उससे पहले अशोक स्तंभ वाले राष्ट्रीय चिन्ह को जूते के नीचे मसले जाते पोस्टर लगाए गए थे। करगिल यु्द्ध लड़ने वाले सैनिकों को जेएनयू में पीटा गया था, क्योंकि उन्होंने वहां एक मुशायरे में चल रही पाकिस्तानपरस्ती एवं भारत-निंदा का विरोध किया था। एक बार नक्सलियों द्वारा 70 सुरक्षाकर्मियों की हत्या किए जाने पर जेएनयू में जश्न मनाया गया था।

ऐसे ही समाचारों से जेएनयू सुर्खियों में आता है। वहां आरंभ से ही देसी-विदेशी भारत निंदकों को मंच मिलता है, किंतु देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री तक को बोलने नहीं दिया जाता। ऐसा कोई भाजपा के मंत्रियों के साथ ही नहीं हुआ है, बल्कि इंदिरा गांधी और पी. चिदंबरम भी ऐसी स्थिति से गुजर चुके हैं। उनके विश्वविद्यालय में आगमन तक के विरुद्ध आंदोलन हुआ था। देखा जाए तो जेएनयू में स्वतंत्र या देशभक्त स्वरों को वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा माओवादियों, जिहादियों को मिला है।

जेएनयू में वामपंथियों को अरुण शौरी जैसे विशिष्ट विद्वान का व्याख्यान नागवार गुजरता था, जबकि स्टालिन, माओ और अराफात के लिए वे आहें भरते थे। वहां के नामी प्रोफेसर ‘स्टालिन या त्रॉत्सकी’ पर ‘रात भर चलने’ वाली बहसों के सिवा कुछ याद नहीं कर पाते कि उन्होंने वहां दशकों तक क्या किया? दरअसल जेएनयू में बेहतरीन सुविधाओं के कारण यह बात छिपी रही है कि ज्ञान हासिल करने के नाम पर वहां बताने के लिए कुछ नहीं है।

कुछ वर्ष पहले जब किसी पत्रकार ने जेएनयू की चार दशक की उपलब्धियों के बारे में वहां के रेक्टर से पूछा तो उनका जवाब था कि जेएनयू से अब तक सिविल सर्विस में इतने छात्र चुने गए हैं। सवाल है कि क्या इसीलिए यह विश्वविद्यालय बना था कि वहां नौकरी की तैयारी या माओवादियों, जिहादियों तथा विविध देशद्रोही, उग्र राजनीतिबाजी के आरामदेह अड्डे बनें? आखिर जिन छात्रों ने स्वामी विवेकानंद का अपमान किया, उन्हें किन संगठनों और सीखों ने ऐसा करने को प्रेरित किया?

सरकार को यही चिंता करनी चाहिए कि वहां सामाजिक विषयों की शिक्षा में क्या पढ़ाया जाता है और क्या नहीं? यही मूल गांठ है, जिसे खोलने पर ऐसी लज्जास्पद घटनाओं के दोहराव से मुक्ति मिलेगी। सरकार को जेएनयू में सियासी गतिविधियों और छात्रसंघ को खत्म कर देना चाहिए, जिसके जरिये वहां देश विरोधी राजनीतिक गतिविधियां होती रही हैं। अभिभावक भी ऐसे छात्रसंघ को समाप्त करने के पक्ष में होंगे, जो उनके बच्चों को देश विरोधी या हानिकर गतिविधियों में खींच कर उनका समय या जीवन खराब करता रहा है।

राजनीतिक नारे लगाने वाले छात्रों को शायद ही किसी समस्या का वास्तविक ज्ञान रहता है। वे कश्मीर, इस्लामिक स्टेट या हिंदुत्व के बारे में उतना ही जानते हैं, जितना जेएनयू में चहकने वाले पंछी। इसलिए उनका इस्तेमाल बाहरी, भारत-विरोधी, हिंदू-विरोधी रणनीतिकार करते हैं। अबोध उग्र छात्र भावना, जोश और अज्ञानता में अदृश्य ताकतों की सेवा कर रहे हैं।

चूंकि देश-विदेश के महान शिक्षा चिंतकों ने कभी यह अनुशंसा नहीं की है कि विश्वविद्यालयों को ‘राजनीति की नर्सरी’ बनाया जाए, इसलिए उसे रोकना उचित ही नहीं, अनिवार्य भी है। यदि ऑक्सफोर्ड जैसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में जेएनयू जैसे छात्रसंघ नहीं हैं तो वहां के छात्र कोई वंचित-पीड़ित तो नहीं हैं। छात्रों की भलाई के लिए भी विश्वविद्यालयों में राजनीतिक गतिविधियों का खात्मा जरूरी है।

छात्रों को केवल साहित्य, कला, संगीत, खेलकूद आदि के लिए ही सुविधाएं, प्रोत्साहन मिलने चाहिए। साथ ही समाज विज्ञान और मानविकी विषयों के पाठ्यक्रम की समीक्षा भी जरूरी है। जेएनयू में वामपंथी राजनीति का जीवन स्रोत यही रहा है।

इन विषयों में पढ़ाई का मुख्य लक्ष्य छात्रों में एक खास राजनीतिक मनोभाव भरना है। इसे बदले बिना इतिहास, दर्शन, साहित्य के मामूली शिक्षक भी पैदा नहीं हो सकते, विद्वान बनना तो दूर की बात है। यहां पढ़ाए जाने वाले साहित्य, इतिहास, राजनीति शास्त्र आदि में वामपंथी और हिंदू-विरोधी मतवाद के तत्व जगह-जगह, सुचिंतित रूप से जमाए गए हैं।

किसी महान लेखक, पुस्तक या महत्वपूर्ण प्रसंग को हटाकर मामूली पाठ या प्रसंग इसीलिए डाले गए हैं, ताकि छात्रों में इससे ‘प्रगतिशील’ यानी हिंदू-विरोधी मनोभाव को बल मिले। जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में समाज विज्ञान और मानविकी के संपूर्ण पाठ्यक्रम, पाठ्यसूची, शोध-दिशा आदि की आमूल समीक्षा होनी चाहिए। इसके बिना केवल जहां-तहां विवेकानंद की मूर्तियां लगवाकर उनका अपमान करवाना कोई समझदारी नहीं है।

विश्वविद्यालयों में एक एक्टिविज्म का जवाब दूसरे एक्टिविज्म से नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि तमाम राजनीतिक एक्टिविज्म को खत्म करके शुद्ध शिक्षा को स्थापित किया जाना चाहिए। यही शिक्षा का वातावरण बनाने का सही रास्ता है।

– डॉ. शंकर शरण

 भारतीय कालगणना विवेचन

 भारतीय कालगणना विवेचन7

भारतीय संस्कृति का मूलाधार वेद है। वेद से ही हमें अपने धर्म और सदाचार का ज्ञान प्राप्त होता है। सब सत्यविद्याओं का आदि स्रोत वेद ही है। वेदों के छः अंग कहे गये हैं – १. शिक्षा, २. कल्प, ३. व्याकरण, ४. निरुक्त,५. छन्द तथा ६. ज्योतिष्। इन्हें षड् वेदांगों की संज्ञा दी गयी है। वेदों का सम्यक्ज्ञान प्राप्त करने के लिए इन छः अंगों को पढ़ना अनिवार्य है।

महर्षि पाणिनि ने ज्योतिष को वेद का नेत्र कहा है-‘ज्योतिषामनयनं चक्षुः’। भूतल, अन्तरिक्ष एवं भूगर्भ के प्रत्येक प्रदार्थ का त्रैकालिक यथार्थ ज्ञान जिस शास्त्र से हो वह ज्योतिषशास्त्र है।

वह ज्योतिषशास्त्र है। विश्वगुरु भारत ज्ञान के क्षेत्र में सदा से ही अग्रगण्य रहा है। ब्रह्मगुप्त, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य आदि गणितज्ञों ने नक्षत्रों, ग्रहों आदि की गति, परिभ्रमण और परिक्रमण के मार्ग का अवलोकन कर उनके आधार पर कालगणना का सिद्धान्त निर्धारित किया तथा ज्योतिषविज्ञान के क्षेत्र में विश्व का मार्गदर्शन किया है। विश्व ने उन सिद्धान्तों को कालान्तर में परखा और सही पाया तथा स्वीकारा। यह निर्विवाद सत्य है कि आज का साधनसम्पन्न विज्ञान भी प्राचीन भारत के उस सूक्ष्मतम ज्ञान तक नहीं पहुंच पाया है। ज्योतिषीय कालगणना को वर्तमान सन्दर्भ में प्रस्तुत किया जा रहा है –

ज्योतिषीय गणनात्मक काल दो प्रकार का है – १. स्थूलकाल (मूर्तकाल) २. सूक्ष्मकाल (अमूर्तकाल)सामन्यतः स्थूल काल की गणना जगत् व्यवहार में की जाती है। प्राणादि को सूक्ष्मकाल कहा जाता है। इसकी सूक्ष्मतम इकाई परमाणु या त्रुटि है। स्थूलकाल की महत्तम ईकाई कल्प है। यहाँ संक्षेप में कालगणना का मान प्रस्तुत है –

१  परमाणु = काल की सूक्ष्मतम अवस्था।

२ परमाणु = .. १ अणु

३ अणु = १ त्रसरेणु

३ त्रिसरेणु = १ त्रुटि

१० त्रुटि= १ परमाणु

१० प्राण १ वेध

३ वेध १ लव

३ लव १ निमेष

१ निमेष १ पलक झपकने का समय

२ निमेष १ विपल

३ निमेष १ क्षण

५ निमेष २.५ त्रुटि

२.५ त्रुटि १ सेकण्ड

२० निमेष १० विपल = ४ सेकण्ड

५ क्षण १ काष्ठा

१५ काष्ठा १ दण्ड-१ लघु

२ दण्ड १ मुहूर्त

१५ लघु १ घटी-१ नाड़ी

१ घटी२४ मिनट

३ मुहूर्त १ प्रहर

२ घटी १ मुहूर्त = ४८ मिनट

१ प्रहर १ याम

६० घटी १ अहोरात्र (दिन-रात)

८ प्रहर १ अहोरात्र

१५ दिन-रात = १ पक्ष

२ पक्ष _ = १ मास

२ मास १ ऋतु

३ ऋतु ६ मास

६ मास = १ अयन

२ अयन = १ वर्ष

६ ऋतु = १ वर्ष

१ संवत्सर = १ अब्द

१० अब्द = १ दशाब्द

१०० अब्द = १ शताब्द

(घटी, घटिका, घड़ी, नाड़ी, नाड़िका, दण्ड-ये समानार्थ हैं।६० तत्प्रति विकला = : १ प्रति विकला

६० प्रति विकला = १ विकला

६० विकला १ कला

६० कला ___ = १ अंश (डिग्री)

३० अंश १ राशि

|१२ राशि १ भचक्र, भगण

(अन्य कालगणनाक्रम)

१ त्रुटि कमलपत्र को सूई की नोक से एकबार छेदने का समय

६० त्रुटि ६० रेणु

१ लव ६० लव

१ लीक्षक (१/१५ सेकण्ड)

६० लीक्षक १ प्राण (४ सेकण्ड)

१ प्राण १० विपक (४ सेकण्ड)

६० विपक १ पल ६० पल

१ घटी (२४ मिनट)

१ नाड़ी (२४ मिनट)

१ नाड़ी १ दण्ड (२४ मिनट)

६० घटी १ दिन-रात (२४ घण्टे)

३० दिन-रात  = १ मास

१२ मास =१ वर्ष

युगप्रमाण

युगप्रमाण एक सृष्टि (कल्प)= १४ मन्वन्तर

१ मन्वन्तर = ७१ चतुर्युग

१ चतुर्युग सतयुग (१७,२८,००० वर्षत्रेतायुग (१२,९६,००० वर्षद्वापरयुग (८,६४,००० वर्षकलियुग (४,३२,००० वर्षकलयोग = ४३,२०,०००

७१ चतुर्युग – ३०,६७,२०,००० वर्ष । (४३,२०,०००%७१) |

१४ मन्वन्तर = ४,२९,४०,८०,००० वर्ष र (३०,६७,२०,०००%१४)

र (३०,६७,२०,०००%१४) कलियुग से दुगुना द्वापर, तिगुना त्रेतायुग और चौगुना सतयुग होता है। एक चतुर्युगी कलियुग से दस गुनी होती हैमन्वन्तरों के नाम____ मन्वन्तर १४ हैं- (१) स्वायम्भुव, (२) स्वारोचिष३) औत्तमि, (४) तामस, (५) रैवत, (६) चाक्षुष(७) वैवस्वत, (८) सावर्णि, (९) दक्षसावर्णि, (१०) ब्रह्मसावर्णि, (११) धर्मसावर्णि, (१२) रुद्रसावर्णि, (१३) रोच्यदेवसावर्णि (१४) इन्द्रसावर्णि। (१३) रोच्यदेवसावर्णि (१४) इन्द्रसावर्णि।

वर्तमान में विश्वसृष्टि

कुल सृष्टि की आयु = ४,२९,४०,८०,००० वर्ष

सृष्टि की वर्तमान आयु६ मन्वन्तर =(४३,२०,०००%६) १,८४,०३,२०,००० वर्ष

२७ चतुर्युग =(४३,२०,०००%२७) +११६६४०००० वर्ष

२८ वें महायुग के तीन युग= +३८८८००० वर्ष

सतयुग (१७,२८,००० वर्ष)

त्रेतायुग (१२,९६,००० वर्ष)

द्वापरयुग (८,६४,००० वर्ष)

वर्तमान कलियुग के बीते वर्ष = +५११९ वर्ष

सृष्टि की वर्तमान आयु = १,९६,०८,५३,११९ वर्ष

इस प्रकार वर्तमान विक्रम सम्वत् (२०७५) में सृष्टि की आयु कुल आयु से घटाने पर सृष्टि की आयु २,३३,३२,२६,८८१ अभी शेष रहती है। यह वैवस्वत् नामक सातवाँ मन्वन्तर वर्तमान में चल रहा है। प्रथम छ: मन्वन्तर व्यतीत हो चुके हैं। वर्तमान सातवें मन्वन्तर के २७ वाँ महायुग चल रहा है, जिसके प्रथम तीन युग (सत्ययुग, त्रेता और द्वापरयुग) बीत चुके हैं और चौथा युग’कलियुग’ चल रहा है। अभी कलियुग का प्रथम चरण है।

संवत्सर ६० होते हैं। एक के बाद दूसरा संवत्सर आता है। इन संवत्सरों के नाम एवं क्रम निश्चित हैं। ६० संवत्सरों के नाम तथा क्रम इस प्रकार हैं – १. प्रभव, २. विभव, ३. शुक्ल, ४. प्रमोद, ५. प्रजापति, ६. अंगिरा, ७. श्रीमुख, ८. भाव, ९. युवा१०. धाता, ११. ईश्वर, १२. बहुधान्य, १३. प्रमाथी, १४. विक्रम, १५. विषु, १६. चित्रभानु, १७. स्वभानु, १८. तारण, १९. पार्थिव, (२०. व्यय, २१. सर्वजित्, २२. सर्वधारी, २३. विरोधी, |२४. विकृति, २५. खर, २६ नन्दन, २७ विजय, २८. जय, २९. मन्मथ, ३०. दुर्मुख, ३१. हेमलम्ब, ३२. विलम्ब, ३३. विकारी, ३४. शर्वरी, ३५. प्लव, ३६. शुभकृत, ३७. शोभन, ३८. क्रोधी, ३९. विश्वावसु, ४०. पराभव. |४१. प्लवग, ४२. कीलक, ४३. सौम्य, ४४. साधारण. ४५. विरोधकृत्, ४६. परिधावी, ४७. प्रमादी, ४८. आनन्द, |४९. राक्षस, ५०. नल, ५१. पिंगल, ५२. काल, ५३. सिद्धार्थ, ५४. रोद्रि, ५५. दुर्मति, ५६. दुंदुभि, ५७. रुधिरोद्गारी, ५८. रक्ताक्ष,५९. क्रोधन तथा ६०. अक्षय।

अयन –

___अयन दो होते हैंउत्तरायण तथा दक्षिणायनये छ:-छः मासों के होते हैं। पृथ्वी की धुरी तिरछी होने के कारण उसका वार्षिक गति के फलस्वरूप सूर्य दिनांक २२ जून को कर्करेखा पर दृष्टिगोचर होता है तथा २१ दिसम्बर को मकररेखाइस अवधि को दक्षिणायन कहते हैं। अर्थात् कर्करेखा से दक्षिणायन की ओर (मकररेखा तक) सूर्य का प्रस्थान दक्षिणायन कहलाता है। दिनांक २२ दिसम्बर (सूर्य-उत्तरायण) से सूर्य उत्तर में गमन करता है तथा २१ जून (सूर्य-दक्षिणायन) को ककरेखा पर पुनः दृष्टिगोचर होने लगता है। यह छः मास का समय उत्तरायण कहलाता है। विषुवत् रेखा से कर्क रेखा तक सूर्य के गमन एवं कर्म रेखा से विषुवत् रेखा पर लौटने के काल को उत्तरगोल तथा विषुवत् रेखा से मकर रेखा तक जाने एवं मकर रेखा से वापस विषुवत् रेखा पर आने तक के काल को दक्षिणगोल कहते हैं।

ऋतुएँ –

के म एक वर्ष में छ: ऋतुएँ होती हैं। प्रत्येक ऋतु दो-दो मास की होती है – १. वसन्तऋतु – चैत्र, वैशाख। २. ग्रीष्मऋतु – ज्येष्ठ, आषाढ़। ३. वर्षाऋतु – श्रावण, भाद्रपद ४. शरदऋतु – आश्विन, कार्तिक । ५. शिशिरऋतु – मार्गशीर्ष, पौष। ६. हेमन्तऋतु – माघ, फाल्गुन। महीना (मास) – र – मास १२ हैं। ये एक के बाद एक क्रम से आते हैं। इनके नाम एवं क्रम निश्चित हैंएक वर्ष या सम्वत् में १२ मास होते हैं। इनके नाम हैं – १. चैत्र (मधु), २. वैशाख(माधव), ३. ज्येष्ठ (शुक्र),४. आषाढ़ (शुचि),५. श्रावण) (नभस्), ६. भाद्रपद (नभस्य), ७. आश्विन (ईष), ८. कार्तिक (ऊर्ज), ९. मार्गशीर्ष (सहस्), १०. पौष (सहस्य), ११. माघ (तपस्) तथा १२. फाल्गुन (तपस्य)। प्रत्येक मास में ३० तिथि होती हैं। किसी-किसी मास में तिथि-क्षय तथा तिथि-वृद्धि भी होती है। कभी-कभी मास-वृद्धि तथा मास-क्षय भी होता है।

भारतीय संस्कृति में सूर्य एवं चन्द्र दोनों को समान महत्त्व दिया गया है। महिनाओं के रूप में जहाँ चान्द्रमास को प्रधानता दी गयी, वहाँ वर्ष के रूप में सौरवर्ष को स्वीकार किया गया है। सौरमास (एक वर्ष) का मान ३६५ दिन ६ घण्टे ९ मिनट १०.८ सेकेण्ड के लगभग तथा चान्द्रमास (एक वर्ष) ३५४ दिन के लगभग होता है। यदि इन दोनों में एकरूपता नहीं लायी जाय तो हमारे त्योहार भी मोहर्रम की भाँति कभी ग्रीष्मऋतु में तथा कभी शिशिरऋतु में आयेंगे, ऐसा न हो, इसलिये निरयन सौरवर्ष एव चान्द्रवर्ष के लगभग ११ दिन के अन्तर को मिटाने के लिये अधिकमास या मलमास की व्यवस्था की गयी। ३२ मास १६ दिन ४ घटी उपरान्त अधिकमास पुनः आता है। अधिकमास ज्ञात करने हेत वर्तमान शक-सम्वत् में से ९२५ घटायें। शेष में १९ का भाग दें। यदि शेष ३ बचे तो चैत्र, ११ बचे तो वैशाख, ८ बचे बचे तो ज्येष्ठ, १६ बचे तो आषाढ़, ५ बचे तो श्रावण, १३ बचे तो भाद्रपद, २ शेष रहे तो आश्विन मास की वृद्धि होगी। अन्य शेष रहे तो अधिकमास नहीं होगा।

अधिकमास –

या जिस चान्द्रमास में सूर्य की संक्रान्ति नहीं होती, उसे अधिकमास कहते हैंजिस राशि पर सूर्य जाता है, वह उस राशि की संक्रान्ति कहलाती है। अर्थात् जब दो पक्षों में लगातार सूर्य-संक्रान्ति नहीं होती, तब वह अधिकमास की संज्ञा में आता है। इसे मलमास और पुरुषोत्तममास भी कहते।। हर तीसरे वर्ष चान्द्र एवं सौर वर्षों के समयान्तर का सामंजस्य करने के लिये अधिमास करने का विधान है। माघ, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन ये नौ मास अधिकमास होते हैं।

क्षयमास –

जिस चान्द्रमास के दोनों पक्ष में सर्यसंक्रान्ति होतीहै. उसे क्षयमास कहते हैं। क्षयमास केवल कार्तिक, मार्गशीर्ष |और पौष – इन तीन महीनों में से किसी एक महीने में पड़ता है, वर्ष के अन्य मासों में नहीं। जिस वर्ष क्षयमास होता है, उस एक वर्ष के भीतर दो अधिकमास होते हैं

पक्ष –

चान्द्रमास के शुक्ल एवं कृष्ण दो पक्ष होते हैं। बढ़ता चन्द्रमा अर्थात् अमावस्या से पूर्णिमा तक की १५ तिथियों का शुक्लपक्ष और घटता चन्द्रमा अर्थात् पूर्णिमा से अमावस्या तक १५ तिथियों का कृष्ण पक्ष होता है।

तिथि –

चन्द्रमा की एक कला को तिथि कहते हैं। तिथियाँ |१ से ३० तक एक मास में ३० होती हैं। ये पक्षों में विभाजित हैं। प्रत्येक पक्ष में १५-१५ तिथियाँ होती हैं। इनकी क्रम संख्या ही इनके नाम हैं। ये हैं – १. प्रतिपदा, २. द्वितीय, ३. तृतीया, |४. चतुर्थी, ५. पंचमी, ६. षष्ठी, ७. सप्तमी, ८. अष्टमी, ९. नवमी, १०. दशमी, ११. एकादशी, १२. द्वादशी, |१३. त्रयोदशी, १४. चतुर्दशी तथा १५. पूर्णिमा और ३०. अमावस्या। शुक्लपक्ष की अन्तिम तिथि १५ वीं पूर्णमासी या पूर्णिमा है तथा कृष्ण पक्ष की अन्तिम तिथि ३० वीं अमावस्या है |

सूर्य और चन्द्र के बीच की १२ डिग्री दूरी को एक तिथि कहा जाता हैअमावस्या को सूर्य और चन्द्र एक राशि के समान अंश पर होते हैं। ०° से १२° तक दूरी प्रतिपदा, |१२ से २४ से ३६° तक दूरी होने पर तृतीया होती है। इसी प्रकार पूर्णिमा को सूर्य परस्पर १८०° से तक (अन्तर) शुक्लपक्ष तथा १८०° (उलटे) ०° तक कृष्णपक्ष होता है। १८०° से १६८° तक कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, में १६८° से १५६° तक द्वितीया, दूसरे रूप में इस क्रम की प्रस्तुति इस प्रकार भी हो सकती है। चूंकि क्रान्तिवृत्त में कुल ३६०° ही हो सकते हैं तथा पूर्णिमा को चन्द्र सूर्य से १८०° पर होता है। अतः १८० से १९२° तक कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, १९२° से २०४° तक द्वितीया होगी। इस प्रकार १८०° से ३६० तक कृष्णपक्ष की क्रमशः प्रतिपदा से अमावस्या तक की तिथियाँ होंगी।

संक्षेप में हम इस प्रकार से समझें कि- चन्द्रमा की गति सूर्य से प्रायः तेरह गुना अधिक है। जब इन दोनों कीगति में १२ अंश का अन्तर आ जाता है. तब एक तिथि बनती है। इस प्रकार ३६० अंशवाले ‘भचक्र’ (आकाश-मण्डल) में ३६०: १२-३० तिथियों का निर्माण होता है।यह नैसर्गिक क्रम निरन्तर चल रहा है

 

चन्द्र की दैनिक औसत गति ८०० कला अर्थात् १३.५° मानी गयी है, जिसमें हास और वृद्धि दृष्टिगोचर होती है, क्योंकि सूर्य के चारों ओर घूमती हुई पृथ्वी को समान एवंविपरीत दिशा में चलकर चन्द्र पार करता है। यही कारण हैकि तिथिमान भी घटता-बढ़ता रहता है

तिथिक्षय-वृद्धि

एक तिथि का मान १२ अंश होता है, कम न अधिकसर्योदय के साथ ही तिथि नाम एवं संख्या बदल जाती है। यदि किसी तिथि का अंशादि मान आगामी सर्योदयकाल से पर्व ही समाप्त हो रहा होता है तो वह तिथिसमाप्त होकर आने वाली तिथि प्रारम्भ मानी जायगी और सूर्योदयकाल पर जो तिथि वर्तमान है, वही तिथि उस दिन आगे रहेगीयदि तिथि का अंशादि मान आगामी सूर्योदयकाल के उपरान्त तक चाहे थोड़े ही काल के लिये सही रहता है तो वह तिथि-वृद्धि मानी जायगीयदि दो सूर्योदय काल के भीतर दो तिथियाँ आ जाती हैं तो दूसरी तिथि का क्षय माना जायगा और उस क्षयतिथि की क्रमसंख्या पंचांग में नहीं लिखी जाती तथा वह तिथि अंक छोड़ देते हैं। आशय यह हैकि सूर्योदयकाल तक जिस भी तिथि का अंशादि मान वर्तमान रहता है। चाहे कुछ मिनटों के लिये ही सही, वही तिथिवर्तमान में मानी जाती है। तिथि-क्षय-वृद्धि का आधार सूर्योदयकाल है।

वार (दिन) –

पृथ्वी और सूर्य से घनिष्ठ सम्बन्ध रखने वाले ७ ग्रहों की कक्षानुसार ७ वार निश्चित किये गये, जो सम्पूर्ण विश्व में प्रचलित हैं। वार शब्द (वासर) दिन का ही संक्षिप्त रुप है। १. रविवार या आदित्यवार, २. चन्द्रवार या सोमवार, ३. मंगलवार या भौमवार, ४. बुधवार, ५. गुरुवार या बृहस्पतिवार, ६. शुक्रवार तथा ७. शनिवार । इन वारों के नाम ग्रहों के प्रथम होरा (घण्टा) के आधार पर रखे गये हैं। ग्रहों की स्थिति आकाश में पृथ्वी से ऊपर इस प्रकार है – सबसे निकट चन्द्रमा, उससे ऊपर बुध, उससे उससे ऊपर शुक्र) ऊपर सर्य, सूर्य से ऊपर मंगल, मंगल से ऊपर गरु और सबसे ऊपर शनि। ‘अहोरात्र’ शब्द में प्रथम तथा अन्तिम अक्षर को हटाकर जो शब्द बनता है वह होरा हैएक दिन-रात में २४ होरा होते हैं। होरा का मान १ घण्टे के बराबर है। सृष्टि-रचना के समय सर्वप्रथम सूर्य का प्रथम होरा ||घण्टा) उदय हुआ, अतः प्रथम दिन का नाम ‘रवि होरा’ के आधार पर ‘रविवार’ रखा गया। २४ होराओं में सातों ग्रहों के २४:६-३, (तीन) फेरों के बाद, चौथे फेरे में पहला होरा चन्द्रमा का पड़ा तो अगले वार का नाम चन्द्रमा पर चन्द्रवार अर्थात् सोमवार रखा गयाइसके बाद क्रमश: मंगल, बुध, गरु, शक्र और अन्त में शनि का प्रथम होरा आने पर इन ग्रहों के नाम पर शेष वारों के नाम रखे गये। यह नामकरण सर्वत्र प्रचलित है। इनका क्रम नहीं बदलता।

ईसवी सन्, विक्रम सम्वत्, शक सम्वत्, हिजरी सन् आदि में सामंजस्य

ईसवी सन् + ५७ = विक्रम सम्वत्ई

सवी सन् (-) ७८ = शक सम्वत्

शक सम्वत् + ७८ ईसवी सन्

विक्रम सम्वत् (-)५७ = ईसवी सन्

विक्रम सम्वत् (-) १३५ शक सम्वत्

ईसवी सन् (-) ५८३ = हिजरी सन्

हिजरी सन् (-) १० = फसली सन्

फसली सन् (-) १ . = बँगला सन्

शक सम्वत् (-) ५०० = हिजरी सन्

प्रचलित ईसवी सन्, सम्वत्सर आदि ईसवी सन् –

ईसा मसीह के जन्मदिन से माना जाता है। जनवरीमाह से प्रारम्भ होकर दिसम्बर माह तक १२ माह का हो ।

विक्रम सम्वत् –

यह सम्वत् उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य ने चलाया था। यह प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ला प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है। इसमें दिन, वार और तिथि का प्रारम्भ सूर्योदय से माना जाता है। शक सम्वत्/राष्ट्रिय सम्वत् –

यह सम्वत् शालिवाहन नामक हैं। नृपति ने चलाया थाइसे अब राष्ट्रिय सम्वत् की मान्यता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार कनिष्क प्रथम को इस सम्वत् का प्रवतक माना जाता है। भारत में केन्द्र सरकार के निर्णय के अनुसार २२ मार्च १९५७ से शक सम्वत् को ‘राष्ट्रियसम्वत्’ घोषित कर रखा है। यह प्रतिवर्ष २२ मार्च से प्रारम्भ होता है।

बाँगला सम्वत् –

बाँगला सम्वत् मेष की संक्रान्ति से प्रारम्भ होता है। मीन की संक्रान्ति से बंगाली चैत्रमास तथा मेष की संक्रान्ति से वैशाख मास प्रारम्भ होता है। वर्षारम्भ संक्रान्ति के दूसरे दिन से पहली तारीख गिनते हैं|

इस प्रकार से यह निर्विवाद सत्य है कि भारतीय कालगणना विश्व की प्राचीनतम, सूक्ष्मतम, शुद्धतम तथा विश्वनीय गणना है। यह हमारी संस्कृति की अनुपम देन है। हम सबका यह कर्तव्य है कि हम भारतीय काल-गणना का सही ज्ञान अपनी भावी पीढ़ी को करायें, ताकि वे पश्चिम के अन्धभक्त न बनकर भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान की महानता को स्वीकार करते हुए उसके संरक्षण एवं संवर्द्धन का सतत प्रयास करते रहें(स्रोत : सूर्यसिद्धान्त)

प्रेमचंद का शनिश्चरी किस्सा

 

प्रेमचंद का शनिश्चरी किस्सा

(सम्पादकीय टिप्पणी – उत्तरप्रदेश के जिला प्रतापगढ़ स्थित कालाकांकर रियासत के तत्कालीन राजकुमार श्री सुरेशसिंह जी का अपन बड़े भाई एवं कालाकांकार के राजा श्रीयत अवधेश सिंह के साथ हिन्दी के प्रख्यात कथाकार एवं उपन्यासलेखक मुखी प्रेमचन्द के साथ सन् १९२८ में जो मलाकात हई थी. उसका एक रोचक एवं सत्रीय चित्रण हिन्दी को प्रख्यात मासिक पत्रिका कादम्बिनी के जुलाई १९७० के अंक में प्रकाशित हुआ था।

ज्ञातव्य है कि कालाकांकर के समीपस्थ ही जिला सुलतानपुर की अमेठी रियासत भी है, जिसके राजा रणञ्जय सिंह एवं उनके पूर्वज भी आर्यसमाज से बहुत प्रभावित थेराजा रणजय सिंह तो वर्षों तक उत्तरप्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान भी रहे हैं।

कालाकांकर के राजा अवधेश सिंह द्वारा प्रदत्त जमीन पर ही आर्यसमाज प्रतापगढ़ आज भी स्थापित है। इस प्रकार ये दोनों राजपरिवार आर्यसमाज के सिद्धान्तों एवं मान्यताओं पर प्रगाढ़ निष्ठा रखते थे|

आर्यसमाज के महोपदेशक एवं प्रसिद्धसंस्कृत-लेखक डॉ. प्रशस्यमित्र शास्त्री ने हिन्दी की सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘कादम्बिनी’ में लगभग पचास वर्ष पूर्व प्रकाशित यह विवरण हमें उपलब्ध कराया है। हम डॉ. शास्त्री जी को धन्यवाद देते हुए यह विवरण अविकल प्रकाशित कर रहे हैं। इसे पढ़कर आप जान सकेंगे कि कैसे आज भी शनिश्चर आदि ग्रहों की पूजा एवं उनका भय दिखाकर पण्डे पुजारी सामान्य जन को लूटते रहते हैं तथा अन्धविश्वासी लोग इनके फेर में पड़कर दु:ख प्राप्त करते हैं                                  – शिवदेव आर्य (कार्यकारी सम्पादक))

                10-

लखनऊ में वे अक्सर प्रेमचन्द जी से मिलने उनके |घर जाते थे। एकबार मैं भी उनके साथ गया और उस (महान् साहित्यकार के दर्शन किए। उस समय वहाँ अन्य  सज्जन भी बैठे थे। हम लोग भी उस गोष्ठी में सम्मिलित हो गए और इधर-उधर की बातें होने लगीं। उसी समय एक पण्डित जी हाथ में तेल भरा कटोरा लिए जिसमें लोहे के शानिश्चर भगवान की मूर्ति आकंठ डूबी थीवे प्रत्येक पर दरवारे पर जाकर शनिश्चर भगवान के आगमन की सूचना , देकर लोगों से पैसे वसूल कर रहे थे। प्रायः प्रत्येक घर से स्त्रियाँ उन्हें कुछ-न-कुछ दे रही थीं।

मेरे भाई साहब कट्टर आर्यसमाजी थे. अतः उन्होंने प्रमचन्द जी से कहा – ‘आपने शनिश्चर भगवान को कल आपत नहीं किया, कहीं वे खफा न हो जाएं।”

प्रेमचन्द जी बोले – मेरे शनिश्चर भगवान क्या करेंगे? आपको इसी सम्बन्ध में एक किस्सा सुनाता हूँ। एक सज्जन के ग्रह खराब थे। साढ़े साती शनिश्चर का प्रकोप थालोगों ने उन्हें सलाह दी कि वे किसी पण्डित से शान्ति का उपाय पता करें।

वे एक पण्डित जी के पास गए और अपनी सारी दुःख-गाथा सुनाई। पण्डित जी ने यह सोचकर कि अच्छा आदमी है, कहा – ‘इसमें तो काली वस्तु का दान लिखा है। गज-दान से आपका संकट टल जाएगा|

उन्होंने कहा – ‘अरे महाराज! गज-दान तो मेरे सामर्थ्य के बाहर की बात है। कुछ ऐसा बताइए जो मैं कर सकूँ ।’

पण्डित जी ने कहा – ‘तो कौस्तभ मणि नीलम |मणि-ऐसी ही किसी मणि का दान करो।’

वे इसके  लिए भा तयार न हुए ता पाण्डत जा न विचार करके कहा – ‘तो एक भैंस का दान कर दोसंकट टल जाएगा’ लेकिन भैंस देने के लिए भी यजमान राजी नहीं हुआ

पण्डित जी ने कुछ सोचकर कहा – ‘तब ऐसा करो एक बोरा उड़द का दान कर दो, संकट दूर हो जाएगा’ लेकिन उसके लिए एक बोरा उड़द देना भी सम्भव नहीं था।’

पण्डित जी ने कहा – ‘तब एक काली कमली काप्रवन्ध करो।’ लेकिन काली कमली भी आजकल पन्द्रह-बीस रुपये से कम में नहीं आती, अत: उन्होंने इससे भी इनकार कर दिया। पण्डित जी का धैर्य टूट रहा था, लेकिन वे अपने यजमान को छोड़ना नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने कहा ‘तो लोहे की एक छुरी का ही दान कर दो।’ लेकिन लोहे की छुरी मुफ्त में तो मिलती नहीं, उसमें भी डेढ-दो रुपये लगते ही हैं। यजमान ने उसके लिए भी अपनी असमर्थता प्रकट की

इतना कहकर प्रेमचन्द जी बोले ‘राजा साहब ! मेरी भी हालत उसी आदमी की तरह है। मेरा भला शनिश्चर क्या बिगाड़ेंगे? आप आर्यसमाजी हैं, आपको भी कुछ डर नही नहीं है। उनसे तो धनवानों को डरना चाहिए।’

उनके द्वारा बताई इस रोचक कथा के कारण उनका प्रथम दर्शन आज भी मेरी स्मृति में ताजा बना हुआ है।

दुर्गा-पूजा दुर्गा-अष्टमी |

दुर्गा-पूजा दुर्गा-अष्टमी

बंगाल से लेकर पूरे देश में इसका बड़ा महात्म्य है | बड़े-बड़े पण्डित आयेंगे, दुर्गा-पूजन से लेकर दुर्गा-हवन तक करेंगे | यजमान को प्रभावित करने के लिए उसके सामने बहुत सारे मन्त्र बोले जायेंगे | यजमान को यह लगना चाहिये कि दुर्गा-पूजा के अवसर पर दुर्गा से सम्बन्धित मन्त्र भी बोला गया इसलिए वेद-मन्त्र भी खोजना होगा ताकि वह प्रभावित हो (ब्राह्मणों का एक अकथित नियम सा बन गया है की यजमान को प्रकाशित न करो परन्तु प्रभावित कर दो और दक्षिणा लेकर चलते बनो, इसमें दोष यजमानों का भी है क्यों कि वे “आँख के अन्धे-गाँठ के पूरे” बने बैठे रहते हैं जिसका लाभ ब्राह्मण-वर्ग उठाता रहता है | यदि यजमान ने रुचिपूर्वक और ब्राह्मण ने ज्ञान-पूर्वक संस्कार करवाया होता तो आज की स्थिति कहीं अच्छी होती इसलिए दोष दोनों का है|)

अपने यजमान को प्रभावित करने के लिए ही ब्राह्मण प्रायः निम्न प्रयोग करते रहते हैं :-

१) यदि शनैश्चर (शनि-देवता) की पूजा करनी है तो “शन्नो देवीरभिष्टये” (यजुर्वेद 36/12) मन्त्र बोला जाता है | जिसका शनि के साथ निकट का नहीं तो दूर का भी सम्बन्ध नहीं है |

२) राहू की पूजा करने के लिए “कया नश्चित्रा” मन्त्र का पाठ करते हैं

३) बुध ग्रह पूजा के लिए “उद् बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि” (यजुर्वेद 15/54) बोला जाता है

इसी प्रकार से दुर्गा की पूजा करनी हो तो निम्न वेद-मन्त्र का पाठ करते हैं |

जा॒तवे॑दसे सुनवाम॒ सोम॑मरातीय॒तो नि द॑हाति॒ वेद॑: ।

स न॑: पर्ष॒दति॑ *दु॒र्गाणि॒* विश्वा॑ ना॒वेव॒ सिन्धुं॑ दुरि॒तात्य॒ग्निः ॥

ऋग्वेद 01/99/01

पाठक स्पष्ट देख पा रहे होंगे की इस मन्त्र में दुर्गा पद आया है (फिर चाहे वह दुर्गाणि ही क्यों न हो) | ब्राह्मण भी जब मन्त्र बोलते हैं तब दुर्गा(णि) आने पर जोर से बोलते हैं ताकि यजमान को पता चल जाये की दुर्गा का विशेष मन्त्र बोला गया |

यहाँ विचार करना है की दुर्गा देवी के साथ दुर्गाणि का सम्बन्ध कैसे है ?

मन्त्र में “दुर्गाणि” शब्द आया है, जिसका अर्थ (महर्षि दयानन्द जी को छोड़ भी दिया जाये तब भी) सायणाचार्य जी ने “विश्वा विश्वानि सर्वाणि दुर्गाणि दुर्गमनानि भोक्तुमावश्यकानि दुःखानि” किया है | दुःखों को तैरने (पार करने) के लिए प्रार्थना की गई है | दुर्गाणि का अर्थ दुर्गम स्थितियाँ है |

देखने वाली बात यह है कि :- महर्षि दयानन्द जी को न मानने वाले और सायणाचार्य जी को ही मानने वाले पण्डित/ब्राह्मण इस मन्त्र का दुर्गापूजा में किस प्रकार गलत तरीके से प्रयोग करते हैं, सायणाचार्य जी को भी मात कर दिया है और दुर्गा पूजा में इस मन्त्र को जोड़ा जाने लगा |

महर्षि दयानन्द जी ने अपने वेद-मन्त्र भाष्य में दु॒र्गाणि॒ पद का अर्थ किया है “दुःखेन गन्तुं योग्यानि स्थानानि” किया है | अब बतलाइये ! दुर्गा के लिए दु॒र्गाणि॒ पद वाला मन्त्र पढ़ना कितना उचित है | ऐसा ही अर्थ/भाष्य ऋग्वेद 07/60/12 में भी में किया है “दुःख से जाने योग्य कामों का” ।

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पाठक की स्वाभाविक इच्छा होगी की इस मन्त्र का विनियोग किसने कब कहाँ किया है ? तो एक पुस्तक है पूना से छपी है जिसका नाम है संस्काररत्नमाला जिसमें इसका प्रयोग “दुर्गाप्रीत्यर्थ बलिदाने विनियोग:” (पृष्ठ 118) अर्थात् दुर्गा की प्रीति के लिए बलिदान करते समय इस मन्त्र को बोलना चाहिये | आगे लिखा है “दुर्गावाहने विनियोग:” अर्थात् दुर्गा के वाहन में इस मन्त्र को बोलना चाहिए | जबकि दुर्गा का वेद मन्त्र में नाम तक नहीं है |

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विनियोग का अर्थ होता है वि(विशेषतया) + नि (निश्चय से) योग (लगाना) = अर्थात् किसी मन्त्र का किसी क्रिया में लगाना , Application of a mantra । यदि किसी मन्त्र का जो अर्थ है वह उस क्रिया के साथ ठीक बैठ जाता है तब वह विनियोग ठीक है । यदि कोई व्यक्ति “शन्नो देवी’ मन्त्र बोल कर व्यायाम करें तो यह विनियोग ठीक नहीं माना जायेगा परन्तु आचमन करे तो विनियोग उचित कहलायेगा । *यह विनियोग ऋषिकृत है या पुरुषकृत है, ईश्वरकृत या अपौरुषेय नहीं है ।*

इस के साथ यजमानों से निवेदन है की कृपया मेरी इस प्रस्तुति/पोस्ट को ब्राह्मणों के विरुद्ध न लें परन्तु अपने विरुद्ध लें और जागृत बनें, शब्द-अर्थ को जानें, *योग्य-विद्वान्-सात्त्विक-धार्मिक-परोपकारप्रिय-सत्योपदेष्टा ब्राह्मण से ही संस्कार करवायें और स्वयं भी सीखें | यज्ञ-संस्कार आदि सीखने के लिए आर्य समाज नियमित आयें |*

धन्यवाद

*सादर*

विदुषामनुचर

विश्वप्रिय वेदानुरागी

*(प्रस्तुत लेख का आधार पण्डित ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु के लेखों का संग्रह “जिज्ञासु रचना मञ्जरी” पृष्ठ 238-239 है | वेदमन्त्रों का विनियोग नामक लेख को पाठक विस्तार से पढ़ें |)*

घर-वापसी का ऐतिहासिक आकलन

ईसाइयत और इस्लाम में चले गए हिन्दुओं को वापस हिन्दू समाज में लाने के कार्य को हमारे आधुनिक मनीषियों ने भी महत्वपूर्ण बताया था। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, महामना मदन मोहन मालवीय, और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने ही नहीं, बल्कि स्वामी विवेकानन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर, और श्रीअरविन्द ने इस का समर्थन किया था। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे राजनीतिक आंदोलन से भी अधिक महत्वपूर्ण माना था। श्रीअरविन्द ने भी कहा था, ‘‘हिन्दू-मुस्लिम एकता ऐसे नहीं बन सकती कि मुस्लिम तो हिन्दुओं को धर्मांतरित कराते रहें जबकि हिन्दू किसी भी मुस्लिम को धर्मांतरित न करें।’’ डॉ. श्रीरंग गोडबोले ने ‘शुद्धि आंदोलन का संक्षिप्त इतिहास: सन 712 से 1947 तक’ नामक पुस्तक में इसी का संक्षिप्त,प्रामाणिक आकलन किया है।

हिन्दू समाज ने प्राचीन काल से ही अनेक बाहरी लोगों को अपनाया था। महाभारत के शान्ति पर्व (65वें अध्याय) में भी यवनादि विदेशियों को वैदिक धर्म में शामिल करने का परामर्श मिलता है। प्रसिद्ध विद्वान आर. जी भंडारकर (1837-1925) ने भी प्राचीन काल में विदेशियों को हिन्दू समाज में अपनाने का विवचेन किया है। जाने-माने अरब यात्री अल बिलादुरी ने जिक्र किया है कि सिंध में पहली मुस्लिम जीत के बाद बने मुसलमान जल्द ही पुन: हिन्दू धर्म में आ गए। इतिहासकार डेनिसन रॉस ने भी यह लिखा है। मुस्लिम देशों से पलायन कर भारत आए गुलामों के शुद्धिकरण का वर्णन अल-बरूनी ने भी किया है। गुजरात के राजा भीमदेव के सामने महमूद गजनवी की पराजय के बाद भी अनेक मुसलमान शुद्ध होकर राजपूतों में शामिल किए गए थे।

खिलजी वंश का नाश भी एक जबरन धर्मांतरित मुस्लिम, खुश्रु खान ने ही हिन्दुओं के सहयोग से किया था। फिर उसने अपने महल और मस्जिद में हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा शुरू करवा दी, गोहत्या बंद कराई और हिन्दू राज्य कायम किया। यह वर्णन प्रसिद्ध लेखक जियाउद्दीन बरनी ने किया है। सुलतान मुहम्मद तुगलक के काल में दक्षिण भारत में हरिहर और बुक्का के धर्मांतरित होने और स्वामी विद्यारण्य (1296-1391) की प्रेरणा से पुन: हिन्दू होकर विजयनगर साम्राज्य बनाने की कथा भी जानी- मानी है। जियाउद्दीन बरनी ने फिरोज शाह तुगलक के समय एक ब्राह्मण को दंडस्वरूप जिंदा जलाए जाने का वर्णन भी किया है, जो मुसलमानों को हिन्दू धर्म के प्रति श्रद्धावान बनाया करता था। डॉ. गोडबोले ने इसे ‘शुद्धि’ के लिए प्रथम बलिदान का उदाहरण माना है। कश्मीर का सुलतान गियासुद्दीन (15वीं सदी) भी अपनी हिन्दू श्रद्धा के लिए जाना जाता है। उस ने पहले बलपूर्वक बनाए गए मुसलमानों को पुन: हिन्दू बनने के लिए प्रोत्साहन दिया।

14वीं सदी में कश्मीर के शाह मीर ने अपनी कुछ बेटियों का विवाह ब्राह्मण सरदारों से किया था। सिकंदर बुतशिकन के समय मुसलमान बने अनेक लोग पुन: हिन्दू धर्म में आ गए थे, इस का वर्णन तबकाते-अकबरी के लेखक ख्वाजा निजामुद्दीन अहमद (16वीं सदी) ने भी किया है। पंडित कंठ भट्ट या निर्मल कंठ ने व्यवस्थित रूप से शुद्धिकरण परिषद आयोजित की थी, यह उल्लेख मिलता है। कश्मीर में 19वीं सदी में भी राजा सर रणवीर सिंह ने बाकायदा एक ‘श्रीरणवीर कारित प्रायश्चित ग्रंथ’ का ही निर्माण करवाया था, जिस में म्लेच्छ बने लोगों की शुद्धि- व्यवस्था पर अध्याय दिया गया है। 16वीं सदी में जोधपुर के राजा सूरजमल ने आक्रमणकारी पठानों द्वारा अपहृत 140 हिन्दू बालिकाओं को छुड़ाने में ही अपने प्राणों की आहुति दी थी। उसी सदी में जैसलमेर के महारावल लूणकरण ने एक विशाल यज्ञ करा कर विगत सदियों में जबरन धर्मांतरित हुए लोगों की शुद्धि करवायी।

17वीं सदी में औरंगजेब के काल में भी शुद्धि के अनेक प्रयत्न हुए। पंजाब के होशियारपुर के एक हिन्दू का इस्लाम में धर्मांतरण हुआ था। उसकी शुद्धि पर उसे बंदी बना लिया गया। विरोध में होशियारपुर के हिन्दुओं ने हड़ताल की थी। स्पष्ट है कि शुद्धिकृत व्यक्ति के प्रति हिन्दू समाज की सहानुभूति हुआ करती थी। 17वीं सदी में ही कीरतपुर (होशियारपुर) के संन्यासी कल्याण भारती के फारस जाकर मुसलमान बन जाने, मगर अनुभव से पुन: इस्लाम त्यागकर हिन्दू बनने की घटना भी मिलती है। स्वदेश आगमन पर उस का भव्य स्वागत हुआ था। यह वर्णन दबिस्ताने मजाहिब के लेखक फानी (19वीं सदी) ने दिया है। उस ने कई मुस्लिमों के वैष्णव बैरागी बनने की जानकारी भी दी है। डॉ. गोडबोले के अनुसारए शुद्धि आंदोलन के सब से प्रमुख प्रणेता संतशिरोमणि स्वामी रामानन्द (1299-1410) को ही मानना चाहिए। उस समय दिल्ली में तुगलक वंश का राज था। स्वामी जी ने मुसलमान बने हजारों राजपूतों को अयोध्या में विलोम-मंत्र द्वारा समारोह पूर्वक हिन्दू बनाया।

संत रैदास (15-16वीं सदी) के प्रभाव से भी कुछ मुस्लिम हिन्दू बने थे। उसी काल में चैतन्य महाप्रभु भी हुए जिनके प्रभाव में भी मुसलमान के हिन्दू बन जाने के विवरण मिलते हैं। उन के अंतरंग शिष्य ठाकुर हरिदास पहले मुसलमान ही थे।

अपनों को अपनाने का अभियान:

मराठों ने 17वीं सदी में शुद्धिकरण की व्यवस्था ही खड़ी की थी। दबाव के कारण बने मुसलमान को शुद्ध कर स्वयं छत्रपति शिवाजी ने पुन: हिन्दू बनाने का कार्य किया था। हिन्दवी स्वराज्य में भ्रष्ट किए व्यक्तियों को शुद्ध करने की चार व्यवस्थाएं दी गई हैं। यह कार्य करवाने के लिए ‘पंडितराव’ उपाधि धारक अधिकारी भी नियुक्त किया गया था। शुद्ध हुए व्यक्ति को शुद्धिकरण का आधिकारिक प्रमाण-पत्र दिया जाता था और उस का पंजीकरण भी स्थानीय कोतवाली में होता था। 1665-70 ई. में पुर्तगाल-शासित प्रदेशों को जीतने के बाद शिवाजी ने पुर्तगाली शासन को बलपूर्वक ईसाइयत में धर्मांतरित हिन्दुओं की शुद्धि के भी आदेश दिए थे। शिवाजी की नीति बाद के वंशजों ने भी जारी रखी। उन्होंने कई चर्चों को देवी मंदिर के रूप में परिवर्तन भी किया। 19वीं सदी में शंकराचार्य नित्यानन्द सरस्वती ने वसई में असंख्य लोगों के पुन: हिन्दू धर्म में प्रवेश का स्वागत किया था। जब वसई के ब्राह्मणों ने उनका अनुष्ठान करने से इंकार किया तो शंकराचार्य ने आज्ञापत्र निकाल कर उन्हें इसे स्वीकार करने को कहा। आधुनिक युग में संगठित रूप से शुद्धि आंदोलन के बड़े प्रणेता स्वामी दयानन्द सरस्वती (1824-1883) हुए।

1877 ई.में पंजाब में उन्होंने इस प्रश्न पर पहली बार संबोधित किया। शुद्धि पर भाषण दिया और एक ईसाई की शुद्धि की। 1879 ई.में देहरादून में मुहम्मद उमर नामक मुस्लिम को शुद्ध कर उसे ‘अलखधारी’ नाम दिया। उन्होंने अमृतसर में ईसाइयत में धर्मांतरित होने जा रहे अनेक हिन्दू छात्रों को भी रोका। कुछ यूरोपीय ईसाई भी स्वामी जी के प्रभाव से हिन्दू बने। उन की बनाई गई राष्ट्रवादी संस्था आर्य समाज ने शुद्धि कार्य को व्यापक रूप से क्रियान्वित किया। आर्य समाज के पंडित लेखराम (1858-1897) ने शुद्धि के लिए अपना बलिदान भी किया। पंजाब में 1896 ई. में अकाल पड़ने पर ईसाई मिशनरियों ने अछूत हिन्दुओं को निशाना बनाया। तब आर्य समाज ने ऐसे अनेक हिन्दुओं को बचाया। उन्हें यज्ञोपवीत देकर और गायत्री मन्त्र पढ़ाकर सार्वजनिक कुएं भी उपलब्ध कराए। पंजाब,सिंध, अजमेर में मुस्लिम प्रभाव वाले हिन्दुओं को शुद्ध करके उन्हें सचेत किया। 1904 ई. में दारउ ल-उलूम देवबंद के एक मौलवी को भी शुद्ध किया गया। 1920-21 ई. में मोपला जिहाद के दौरान बीस हजार से अधिक हिन्दुओं की हत्या की गई। मृत्यु के भय से चार हजार से अधिक हिन्दू मुसलमान बन गये थे। इस भयावह घटनाक्रम से पूरे देश में आक्रोश की लहर उठी थी।

पंजाब में लाला हंसराज की अध्यक्षता में आर्य समाज की बैठक हुई, जिस में धर्मांतरित हिन्दुओं को शुद्ध करने का संकल्प लिया गया। पंडित ऋषिराम, लाला खुशालचन्द जैसे प्रतिनिधि मलाबार जाकर स्थानीय ब्राह्मणों का सहयोग लेकर लगभग ढाई हजार धर्मांतरितों को शुद्ध कर पुन: हिन्दू बनाने में सफल हुए। इस से देश भर में आर्य समाज का नाम विख्यात हुआ। मलाबार की सफलता के बाद देश के अन्य भागों में भी पहले बलात् धर्मांतरित कराए गए बंधुओं को पुन: हिन्दू समाज में लाने की भावना उठी। भारत में अनेक ऐसी नव-मुस्लिम जातियां थीं, कई आचार विचार पारंपरिक रूप से हिन्दुओं जैसे थे। जैसे, मलकाना राजपूत (संयुक्त प्रांत), मेव (मध्य राजस्थान), शेख (लरकाना, सिंध), मोरे सलाम (मध्य गुजरात) मातिया पीराना पंथी पाटीदार (दक्षिण गुजरात) आदि। इन लोगों को किसी युग में हिन्दू से जबरन मुस्लिम बना दिए जाने के सिवा पारिस्थितिक कारणों से उन पर कोई कड़ी इस्लामी पद्धतियां नहीं लादी जा सकी थीं।

उन में अधिकांश लोग पुन: हिन्दू समाज में वापस आना चाहते थे, लेकिन हिन्दुओं में रूढ़िवादी लोग इससे कतराते थे। इस का समाधान करने में कुछ जातिगत संगठनों ने अच्छी भूमिका निभाई। 1909 ई. में आगरे में पंडित भोजदत्त द्वारा स्थापित राजपूत शुद्धि सभा ने सैकड़ों नव-मुस्लिमों को हिन्दू धर्म में वापस लिया था। लेकिन राजपूत समुदाय द्वारा उन की उपेक्षा हो रही थी, जिस से वे डांवाडोल हो रहे थे। क्षत्रिय उपकारिणी सभा ने उन्हें सहारा देकर रोका। 30-31 मई 1923 को वृंदावन में भी एक विराट सम्मेलन हुआ, जिस में राजपूतों की सभी जातियां शामिल हुईं। उन्होंने मलकानों को शुद्ध करके हुक्के का संबंध जोड़ने का निर्णय किया। लाला हंसराज ने कड़ी गर्मी के महीनों में मैनपुरी में 147 गांवों को शुद्ध करने में सफलता पाई।

राष्ट्र मनीषियों ने निभायी भूमिका

शुद्धि आंदोलन में स्वामी श्रद्धानन्द (1856- 1926) का स्थान अमर है। आगरा में 13 फरवरी,1923 की क्षत्रिय उपकारिणी सभा की बैठक में उन्हें बुलाया गया था। इसमें सनातनी, आर्यसमाजी, सिख, जैन भी आए थे। यहीं ‘भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा’ का गठन हुआ। इसी के दस दिन बाद स्वामी जी की महत्वपूर्ण पुस्तिका ‘सेव द डाइंग रेस’ प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने नव-मुस्लिमों को शीघ्र अपने पुराने कुटुम्ब में लाने की आवश्यकता पर बल दिया। अगले दो महीनों में वे लगभग सौ गांवों में गए। पहले महीने में ही लगभग पांच हजार मलकानों को वापस लाया गया। उस वर्ष के अंत तक यह संख्या तीस हजार हो गई थी। इस कार्य पर जमीयत उलेमा और कांग्रेस के नेताओं ने आपत्ति भी की, लेकिन स्वामी जी अडिग रहे। 31 मार्च 1923 को भारत धर्म महामंडल और दरभंगा महाराज की ओर से काशी के पंडितों, पंजाब और महाराष्ट्र की विविध धर्म-सभाओं एवं जाति संगठनों ने भी स्वामी जी का समर्थन दिया। 4-5 अप्रैल 1923 को बनारस के सभाओं में भी इस विषय को रखा गया। फलत: काशी के कुछ रुढ़िवादी पंडितों ने भी मलकानों में काम करने का संकल्प लिया। मलकाना मुस्लिम राजपूतों की शुद्धि का काम पूरे हिन्दू समाज ने अपना लिया। स्वयं डॉ. अांबेदकर ने शुद्धि आंदोलन से अपनी सहानुभूति लिखित रूप से जताई थी। स्वामी श्रद्धानन्द ने 1924 ई. में दनकौर, बुलंदशहर में कई मुस्लिमों को शुद्ध किया।

मेरठ, मुजफ्फरनगर और बुलंदशहर में वे लगभग डेढ़ सौ ईसाइयों को भी पुन: हिन्दू समाज में ले आये। उन के सहयोगी रामभज दत्त और मंगल सेन इसी कार्य के लिए अन्य स्थानों पर गए। दिल्ली में मार्च 1926 में कराची से आई हुई महिला असगरी बेगन अपने बच्चों के साथ शुद्ध हुईं और उन्हें शान्ति देवी नाम दिया गया। इस पर असगरी के परिवारवालों ने स्वामी श्रद्धानन्द पर मुकदमा भी किया, किन्तु अदालत ने स्वामी जी को निर्दोष करार दिया। इसके बाद कुछ कट्टरपंथी मुसलमानों ने स्वामी जी को इस्लाम का शत्रु घोषित किया। इसी प्रचार के वशीभूत एक मतांध मुस्लिम ने 23 दिसंबर, 1926 को स्वामी जी को उन के घर में बीमार अवस्था में धोखे से मार डाला। यह निस्संदेह, शुद्धि के लिए ही स्वामी जी का बलिदान था। दुर्भाग्यवश, गांधी जी ने ठीक इसी काम के लिए स्वामी श्रद्धानन्द को बुरा-भला कहा था। इसमें संदेह नहीं कि गांधी जी और कुछ अन्य कांग्रेस नेताओं के बयानों ने कट्टरपंथी मुसलमानों को उग्र होने का हौसला दिया। यद्यपि कांग्रेस नेतृत्व के भी एक हिस्से में शुद्धि आंदोलन के प्रति उत्साह था। 30 दिसंबर, 1922 को गया (बिहार) में कांग्रेस के पंडाल में आयोजित हिन्दू महासभा के वार्षिक अधिवेशन में मोपला के पीड़ित हिन्दुओं के प्रति संवेदना प्रकट की गई। मलाबार के लोगों से धर्मांतरित लोगों को पुन: हिन्दू धर्म में स्वीकार करने के लिए भी आह्वान किया गया। इस अधिवेशन के अध्यक्ष पंडित मदन मोहन मालवीय तथा स्वागताध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे।

बहरहाल, ‘भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा’ के प्रयासों से सन 1923 से 1931 के बीच लगभग 1,83,3422 नव-मुस्लिमों को शुद्ध किया गया। इसी दौरान लगभग साठ हजार अछूत कहलाने वाले लोगों को हिन्दू धर्म छोड़ने से भी बचाया गया। 127 शुद्धि सम्मेलन हुए, 156 पंचायतें हुईं और 81 छोटे-बड़े सहभोज किए गए। सभा की ओर से शुद्धि समाचार नामक एक मासिक पत्र भी निकलता था, जिसके चौदह हजार ग्राहक थे। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा का सातवां अधिवेशन मालवीय जी की अध्यक्षता में 19-20 अगस्त 1923 को बनारस में हुआ था। उन्होंने अध्यक्षीय भाषण में शुद्धि कार्य का जोरदार समर्थन किया। वहां बाबू भगवान दास (काशी विद्यापीठ के संस्थापक, थियोसोफिस्ट, 1955 ई. में ‘भारत-रत्न’से सम्मानित) ने भी शुद्धि के समर्थन में अतिविद्वतापूर्ण भाषण दिया था। सर्वसम्मति से अहिन्दुओं के हिन्दू धर्म में प्रवेश संबंधी प्रस्ताव पास हुए।

अ.भा. हिन्दू महासभा का आठवां अधिवेशन 11 अप्रैल, 1925 को कोलकाता में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हुआ था। लालाजी ने इस्लाम में बलात धर्मांतरित हिन्दुओं की शुद्धि का समावेश किया। महासभा के नौ उद्देश्यों में इसे भी शामिल किया गया। बाद में भी हिन्दू महासभा के अध्यक्ष पद से कई महापुरुषों ने शुद्धि का समर्थन किया। वीर सावरकर ने भी इस तथा अन्य मंचों से शुद्धि का समर्थन और प्रत्यक्ष शुद्धि का कार्य भी किया। वीर सावरकर ने अंडमान के भयावह सेल्यूलर जेल में अपने भाइयों गणेश तथा बाबाराव के साथ मिलकर शुद्धि कार्य किया था। वहां कुछ मुस्लिम कारापाल अल्पवयस्क हिन्दू बंदियों को फुसलाकर या यातना देकर मुसलमान बनाते थे। उनमें से अनेक को सावरकर बंधुओं ने विधिपूर्वक शुद्ध कराया था। इसका पता चलने पर बाबाराव सावरकर पर जानलेवा हमला भी हुआ, किन्तु वे अडिग रहे। इस का उल्लेख उनकी आत्मकथा में एक स्वतंत्र अध्याय के रूप में है। उन्होंने डॉ. हेगडेवार के संपादकत्व में ‘स्वातंत्य दैनिक’ में शुद्धि संबंधी लेख भी लिखे थे। एक नाटक ‘संगीत उ: शाप’ भी लिखा। सार्वजनिक व्याख्यान भी दिए।

– डॉ. शंकर शरण

मनुस्मृति और नारी जाति

मनुस्मृति और नारी जाति

डॉ विवेक आर्य

भारतीय समाज में एक नया प्रचलन देखने को मिल रहा है। इस प्रचलन को बढ़ावा देने वाले सोशल मीडिया में अपने आपको बहुत बड़े बुद्धिजीवी के रूप में दर्शाते है। सत्य यह है कि वे होते है कॉपी पेस्टिया शूरवीर। अब एक ऐसी ही शूरवीर ने कल लिख दिया मनु ने नारी जाति का अपमान किया है। मनुस्मृति में नारी के विषय में बहुत सारी अनर्गल बातें लिखी है। मैंने पूछा आपने कभी मनुस्मृति पुस्तक रूप में देखी है। वह इस प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर एक नया कॉपी पेस्ट उठा लाया। उसने लिखा-

“ढोल, गंवार , शूद्र ,पशु ,नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।”

मेरी जोर के हंसी निकल गई। मुझे मालूम था कॉपी पेस्टिया शूरवीर ने कभी मनुस्मृति को देखा तक नहीं है। मैंने उससे पूछा अच्छा यह बताओ। मनुस्मृति कौनसी भाषा में है? वह बोला ब्राह्मणों की मृत भाषा संस्कृत। मैंने पूछा अच्छा अब यह बताओ कि यह जो आपने लिखा यह किस भाषा में है। वह फिर चुप हो गया। फिर मैंने लिखा यह तुलसीदास की चौपाई है। जो संस्कृत भाषा में नहीं अपितु अवधी भाषा में है। इसका मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। मगर कॉपी पेस्टिया शूरवीर मानने को तैयार नहीं था। फिर मैंने मनुस्मृति में नारी जाति के सम्बन्ध में जो प्रमाण दिए गए है, उन्हें लिखा। पाठकों के लिए वही प्रमाण लिख रहा हूँ। आपको भी कोई कॉपी पेस्टिया शूरवीर मिले तो उसका आप ज्ञान वर्धन अवश्य करना।

मनुस्मृति में नारी जाति

यत्र नार्य्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रऽफलाः क्रियाः। मनुस्मृति 3/56

अर्थात जिस समाज या परिवार में स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्यगुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं।

पिता, भाई, पति या देवर को अपनी कन्या, बहन, स्त्री या भाभी को हमेशा यथायोग्य मधुर-भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रखना चाहिए और उन्हें किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं पहुंचने देना चाहिए। -मनुस्मृति 3/55

जिस कुल में स्त्रियां अपने पति के गलत आचरण, अत्याचार या व्यभिचार आदि दोषों से पीड़ित रहती हैं। वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल में स्त्री-जन पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है। -मनुस्मृति 3/57

जो पुरुष, अपनी पत्नी को प्रसन्न नहीं रखता, उसका पूरा परिवार ही अप्रसन्न और शोकग्रस्त रहता है और यदि पत्नी प्रसन्न है तो सारा परिवार प्रसन्न रहता है। – मनुस्मृति 3/62

पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं, अत: साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति-पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए।-मनुस्मृति 9/96

ऐश्वर्य की कामना करने हारे मनुष्यों को योग्य है कि सत्कार और उत्सव के समयों में भूषण वस्त्र और भोजनादि से स्त्रियों का नित्यप्रति सत्कार करें। मनुस्मृति

पुत्र-पुत्री एक समान। आजकल यह तथ्य हमें बहुत सुनने को मिलता है। मनु सबसे पहले वह संविधान निर्माता है जिन्होंने जिन्होंने पुत्र-पुत्री की समानता को घोषित करके उसे वैधानिक रुप दिया है- ‘‘पुत्रेण दुहिता समा’’ (मनुस्मृति 9/130) अर्थात्-पुत्री पुत्र के समान होती है।

पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार मनु ने माना है। मनु के अनुसार पुत्री भी पुत्र के समान पैतृक संपत्ति में भागी है। यह प्रकरण मनुस्मृति के 9/130 9/192 में वर्णित है।

आज समाज में बलात्कार, छेड़खानी आदि घटनाएं बहुत बढ़ गई है। मनु नारियों के प्रति किये अपराधों जैसे हत्या, अपहरण , बलात्कार आदि के लिए कठोर दंड, मृत्युदंड एवं देश निकाला आदि का प्रावधान करते है। सन्दर्भ मनुस्मृति 8/323,9/232,8/342

नारियों के जीवन में आनेवाली प्रत्येक छोटी-बडी कठिनाई का ध्यान रखते हुए मनु ने उनके निराकरण हेतु स्पष्ट निर्देश दिये है।

पुरुषों को निर्देश है कि वे माता, पत्नी और पुत्री के साथ झगडा न करें। मनुस्मृति 4/180 इन पर मिथ्या दोषारोपण करनेवालों, इनको निर्दोष होते हुए त्यागनेवालों, पत्नी के प्रति वैवाहिक दायित्व न निभानेवालों के लिए दण्ड का विधान है। मनुस्मृति 8/274, 389,9/4

मनु की एक विशेषता और है, वह यह कि वे नारी की असुरक्षित तथा अमर्यादित स्वतन्त्रता के पक्षधर नहीं हैं और न उन बातों का समर्थन करते हैं जो परिणाम में अहितकर हैं। इसीलिए उन्होंने स्त्रियों को चेतावनी देते हुए सचेत किया है कि वे स्वयं को पिता, पति, पुत्र आदि की सुरक्षा से अलग न करें, क्योंकि एकाकी रहने से दो कुलों की निन्दा होने की आशंका रहती है। मनुस्मृति 5/149, 9/5- 6 इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनु स्त्रियों की स्वतन्त्रता के विरोधी है| इसका निहितार्थ यह है कि नारी की सर्वप्रथम सामाजिक आवश्यकता है -सुरक्षा की। वह सुरक्षा उसे, चाहे शासन-कानून प्रदान करे अथवा कोई पुरुष या स्वयं का सामर्थ्य।

उपर्युक्त विश्‍लेषण से हमें यह स्पष्ट होता है कि मनुस्मृति की व्यवस्थाएं स्त्री विरोधी नहीं हैं। वे न्यायपूर्ण और पक्षपातरहित हैं। मनु ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा जो निन्दा अथवा आपत्ति के योग्य हो।

मनुस्मृति और नारी जाति

मनुस्मृति और नारी जाति

डॉ विवेक आर्य

भारतीय समाज में एक नया प्रचलन देखने को मिल रहा है। इस प्रचलन को बढ़ावा देने वाले सोशल मीडिया में अपने आपको बहुत बड़े बुद्धिजीवी के रूप में दर्शाते है। सत्य यह है कि वे होते है कॉपी पेस्टिया शूरवीर। अब एक ऐसी ही शूरवीर ने कल लिख दिया मनु ने नारी जाति का अपमान किया है। मनुस्मृति में नारी के विषय में बहुत सारी अनर्गल बातें लिखी है। मैंने पूछा आपने कभी मनुस्मृति पुस्तक रूप में देखी है। वह इस प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर एक नया कॉपी पेस्ट उठा लाया। उसने लिखा-

“ढोल, गंवार , शूद्र ,पशु ,नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।”

मेरी जोर के हंसी निकल गई। मुझे मालूम था कॉपी पेस्टिया शूरवीर ने कभी मनुस्मृति को देखा तक नहीं है। मैंने उससे पूछा अच्छा यह बताओ। मनुस्मृति कौनसी भाषा में है? वह बोला ब्राह्मणों की मृत भाषा संस्कृत। मैंने पूछा अच्छा अब यह बताओ कि यह जो आपने लिखा यह किस भाषा में है। वह फिर चुप हो गया। फिर मैंने लिखा यह तुलसीदास की चौपाई है। जो संस्कृत भाषा में नहीं अपितु अवधी भाषा में है। इसका मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। मगर कॉपी पेस्टिया शूरवीर मानने को तैयार नहीं था। फिर मैंने मनुस्मृति में नारी जाति के सम्बन्ध में जो प्रमाण दिए गए है, उन्हें लिखा। पाठकों के लिए वही प्रमाण लिख रहा हूँ। आपको भी कोई कॉपी पेस्टिया शूरवीर मिले तो उसका आप ज्ञान वर्धन अवश्य करना।

मनुस्मृति में नारी जाति

यत्र नार्य्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रऽफलाः क्रियाः। मनुस्मृति 3/56

अर्थात जिस समाज या परिवार में स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्यगुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं।

पिता, भाई, पति या देवर को अपनी कन्या, बहन, स्त्री या भाभी को हमेशा यथायोग्य मधुर-भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रखना चाहिए और उन्हें किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं पहुंचने देना चाहिए। -मनुस्मृति 3/55

जिस कुल में स्त्रियां अपने पति के गलत आचरण, अत्याचार या व्यभिचार आदि दोषों से पीड़ित रहती हैं। वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल में स्त्री-जन पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है। -मनुस्मृति 3/57

जो पुरुष, अपनी पत्नी को प्रसन्न नहीं रखता, उसका पूरा परिवार ही अप्रसन्न और शोकग्रस्त रहता है और यदि पत्नी प्रसन्न है तो सारा परिवार प्रसन्न रहता है। – मनुस्मृति 3/62

पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं, अत: साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति-पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए।-मनुस्मृति 9/96

ऐश्वर्य की कामना करने हारे मनुष्यों को योग्य है कि सत्कार और उत्सव के समयों में भूषण वस्त्र और भोजनादि से स्त्रियों का नित्यप्रति सत्कार करें। मनुस्मृति

पुत्र-पुत्री एक समान। आजकल यह तथ्य हमें बहुत सुनने को मिलता है। मनु सबसे पहले वह संविधान निर्माता है जिन्होंने जिन्होंने पुत्र-पुत्री की समानता को घोषित करके उसे वैधानिक रुप दिया है- ‘‘पुत्रेण दुहिता समा’’ (मनुस्मृति 9/130) अर्थात्-पुत्री पुत्र के समान होती है।

पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार मनु ने माना है। मनु के अनुसार पुत्री भी पुत्र के समान पैतृक संपत्ति में भागी है। यह प्रकरण मनुस्मृति के 9/130 9/192 में वर्णित है।

आज समाज में बलात्कार, छेड़खानी आदि घटनाएं बहुत बढ़ गई है। मनु नारियों के प्रति किये अपराधों जैसे हत्या, अपहरण , बलात्कार आदि के लिए कठोर दंड, मृत्युदंड एवं देश निकाला आदि का प्रावधान करते है। सन्दर्भ मनुस्मृति 8/323,9/232,8/342

नारियों के जीवन में आनेवाली प्रत्येक छोटी-बडी कठिनाई का ध्यान रखते हुए मनु ने उनके निराकरण हेतु स्पष्ट निर्देश दिये है।

पुरुषों को निर्देश है कि वे माता, पत्नी और पुत्री के साथ झगडा न करें। मनुस्मृति 4/180 इन पर मिथ्या दोषारोपण करनेवालों, इनको निर्दोष होते हुए त्यागनेवालों, पत्नी के प्रति वैवाहिक दायित्व न निभानेवालों के लिए दण्ड का विधान है। मनुस्मृति 8/274, 389,9/4

मनु की एक विशेषता और है, वह यह कि वे नारी की असुरक्षित तथा अमर्यादित स्वतन्त्रता के पक्षधर नहीं हैं और न उन बातों का समर्थन करते हैं जो परिणाम में अहितकर हैं। इसीलिए उन्होंने स्त्रियों को चेतावनी देते हुए सचेत किया है कि वे स्वयं को पिता, पति, पुत्र आदि की सुरक्षा से अलग न करें, क्योंकि एकाकी रहने से दो कुलों की निन्दा होने की आशंका रहती है। मनुस्मृति 5/149, 9/5- 6 इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनु स्त्रियों की स्वतन्त्रता के विरोधी है| इसका निहितार्थ यह है कि नारी की सर्वप्रथम सामाजिक आवश्यकता है -सुरक्षा की। वह सुरक्षा उसे, चाहे शासन-कानून प्रदान करे अथवा कोई पुरुष या स्वयं का सामर्थ्य।

उपर्युक्त विश्‍लेषण से हमें यह स्पष्ट होता है कि मनुस्मृति की व्यवस्थाएं स्त्री विरोधी नहीं हैं। वे न्यायपूर्ण और पक्षपातरहित हैं। मनु ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा जो निन्दा अथवा आपत्ति के योग्य हो।

वेद सन्देश जीवन के संदर्भ में

वेदा वदन्ति ।

सन्देश पीपल के पत्तों का

अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता । यजु-३५-४

अश्वत्थ ( पीपल के वृक्ष ) पर तुम्हारी बैठना है ,पत्ता तुम्हारा वसति:-वास है ।

You are sitting on अश्वत्थ tree and live on the leaves.

हम तनिक अपनी मानसिकता पर विचार करें । हम प्राय: असत्य को सत्य ,चंचल को स्थिर ,जड़ को चेतन ,अनित्य को नित्य ,अपयश को यश ,बुराईको अच्छाई समझते हैं । हम संसार में आकर समझते हैं कि हमें सदैव यहाँ रहना है और मौज मस्ती करनी है ।
महात्मा युधिष्ठिर से यक्ष ने पूछा – इस संसार में आश्चर्य क्या है ,उन्हों ने जो उत्तर दिया वह त्रिकाल सत्य है ,उन्हों ने कहा –
अहन्यहनि गच्छन्ति भूता इह यमालयम् ।
अन्ये स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमत: परम् ।।
प्रतिदिन अर्थियों पर प्राणी श्मशान की ओर जा रहे हैं ,लोग अपने बन्धु बान्धवों को अपने हाथों से चितायें बना बना कर जलारहे हैं । परन्तु उन्हें कभी यह विचार नहीं आता कि उनकी गति भी ऐसी हीहै ।दो पाटन के बीच में ख़ाली रहा न कोय ।इस संसार रूपी चक्की में सभी पिस रहे हैं ।यहाँ कोई भी स्थिर नहीं है ,यहाँ जैसे ही कोई उत्पत्ति होती है उसके साथ ही साथ विनाश भी प्रारम्भ हो जाता है ,संयोगाः विप्रयोगान्ता: , हमारा जन्मदिवस नहीं है परन्तु आयुन्यूनता सूचक दिवस है – हमारी इतनी आयु कम हो गई – यह बताता है ।तब भी अपनी शेष आयु के लिये सावधान नहीं होते , असाध्य को साध्य समझते हुये पूरी जीवन उसी में बिता देते हैं । ये इन्द्रियों के भोग ,विषय ,धन दौलत जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिये साधन हैं ,ये मानव ता के घातक नहीं साधक हैं ।
किसी भी पदार्थ में जब स्थिरता नहीं है तो फिरहम स्थिरता की कामना ही क्यों करते हैं ? उपरोक्त वेद की सूक्ति स्पष्ट ही हमारी अस्थिरता को बता रही है – वह कहती है अश्वत्थ पर तुम्हारी बैठक है ,अश्वत्थ पीपल का वृक्ष होता है ,यह संस्कृत शब्द बडा ही सार्थक है – य: श्वो न स्थास्यति स: – जो कल नहीं ठहरेगा । भोगापवर्गार्थं दृश्यम् – हम अपने नैतिक जीवन निर्माण के कार्यों को ,परमात्म प्राप्ति के उपायों को ,ज्ञानादि मोक्ष के साधनों को कल पर छोड़ते हुये चले जाते हैं अभी तो समय नहीं है कल कर लेंगे जब कि शुभस्य शीघ्रं होना चाहिये । कौन जानता है कि वह कल आयेगा भी या नहीं ,कल तक रह भी पायेंगे या नहीं । इसका क्या प्रमाण है । अश्वत्थ को चलदल भी कहते हैं ,जिसका अर्थ है चंचल पत्तों वाला । पीपल के पत्ते प्रायः हिलते रहते हैं मानों वे घोषणा कर रहे हैं – पर्णे वो वसतिश्कृता – पत्ते पर तुम्हारा वास है – पता नहीं कब वायु का झोंका आये और वह नीचे गिर जाये जो स्वयं क्षण भंगुर है उसका आश्रय लेने वाला भीनिश्चित ही क्षण भंगुर है ।

निस्सन्देह यह सब दृश्यमान जगत् अस्थायी है परन्तु इसमें एक अमर तत्त्व भी विद्यमान है जिसे हम संसार के द्वारा ,क्षण भंगुर शरीरके द्वाराही प्राप्तकर सकते हैं । इसी में हमारी कुशलताहै किइस अचेतन तत्त्व से चेतन तत्त्व को प्राप्त करें ,अनित्य सेनित्य चेतन को प्राप्तकरें ।

महर्षि याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषद में मैत्रेयी से कहते हैं-य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोन्तरो -जो परमेश्वर – आत्मा अर्थात् जीव में स्थित हो कर भी जीव से भिन्न है , जिसको मूढ़ जीवात्मा नहीं जानता है कि वह परमात्मा मेरे अन्दर व्यापक है ,यदि जानता होता तो वह कभी कुकर्म नहीं करता , मानव बनता। दानव नहीं ,सदाचारी बनता दुराचारी नहीं ,रक्षक बनता भक्षक नहीं ,परमात्मा की वेदोपदिश्ट आज्ञाओं का पालन करके मोक्षाधिकारी बनता ,जन्मजन्मान्तर तक भटकता नहीं ।इस लिये कहा जैसे शरीर में जीव रहता है वैसे ही जीव में परमेश्वर व्यापक है ,उसको तू जान । अन्यत्र कहा – आत्मा वा अरे श्रोतव्यो ,मन्तव्यो ,निदिध्यासितव्य इति एषोपनिषत् ,एषा वेदोपनिषत् ।

क्षण भंगुर शरीर में रहने वाले जीवों की यही सार्थकता है कि हम उस परमेश्वर को ज्ञान के द्वारा ,योगांगों के द्वारा जानने का प्रयास करें ,जिसके लिये हमारे जन्म जन्मांतर व्यतीत हो जाते हैं ।उसी परमेश्वर के लिये आता है –
नित्यो sनित्यानां ,चेतनश्चेतनानाम् ,
एको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तमात्मस्थं येsनुपश्यन्ति धीरा: ,
तमाहुरग्र्यं पुरुषं प्रमाणम् ।।

उतो तदद्य विद्याम यतस्तत् परिषिच्यते । वेद ।
हम सब का कर्तव्य है उस सत्ता को जानें जिससे सबको जीवन मिलता है ।