सदाचार

सदाचार
https://youtu.be/3XBgUmYgY7M

साभार -धर्म शिक्षा

लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

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सदाचार

सत्परुषों का आचार सदाचार कहलाता है। जीवन में सदाचार का पालन करते हैं, वे शिष्ट और सभ्य कहलाते हैं, जो सदाचार का पालन नहीं करते अशिष्ट और असभ्य कहलाते हैं।

यहाँ पालन करने योग्य सदाचार के कुछ नियम लिखे जा रहे हैं

१. प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठना चाहिए व्यक्ति सूर्योदय से पूर्व उठते हैं, वे स्वस्थ, मेधावी धन-सम्पन्न बनते हैं

२. उठते ही प्रभु का गुणगान करना चाहिए प्रभु से जीवन में सब प्रकार की समृद्धि, उत्थान कल्याण की प्रार्थना करनी चाहिए।

३. प्रात: अथवा जब भी प्रथम मिलें तभी मातापिता आदि वृद्धजनों का अभिवादन करना चाहिएचरण-स्पर्श पूर्वक उन्हें नमन करना चाहिए। ऐसा करने से आयु, विद्या, यश और बल की प्राप्ति होती हे

४. नित्यप्रति व्यायाम करना स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त आवश्यक है। व्यायाम से शरीर नीरोग, स्वस्थ एवं हृष्ट-पुष्ट बनता है। आसन, प्राणायाम, भ्रमणदण्ड-बैठक-किसी-न-किसी प्रकार का व्यायाम अवश्य करें।

५. प्रतिदिन स्नान अवश्य करें। यथासम्भव ठण्डे जल से स्नान करें।

६. भोजन शुद्ध और सात्त्विक होना चाहिए अण्डे, मांस, मछली, शराब, बीड़ी-सिगरेट, पानचाय, काफी, सोडा, बोतल में बन्द कोई भी कोला आदि नहीं लेना चाहिए। सदा स्मरण रक्खें-‘सादा खाना, पानी पीना और सौ वर्ष जीना’- यह स्वस्थ रहने और दीर्घायु प्राप्त करने का स्वर्णिम सिद्धान्त है

७. बड़ों का आदर करें। शिक्षकों का मानसम्मान करें।

८. महापुरुषों का सत्सङ्ग करें। गन्दे गानों, नाचथियेटर, सिनेमा और टी०वी० के चरित्र-हार से बचें__

_९. खड़े होकर पेशाब न करें। हृदय-गति बन्द होने का यह भी एक कारण है।

१०. सदा मीठा बोलें। सत्य और प्रिय बोलें। किसी को गाली न दें।

साभार -धर्म शिक्षा

लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

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क्या हनुमान बंदर थे

क्या हनुमान बंदर थे

नमस्ते जी,वेदज्ञ महावीर हनुमानजी वानर थे ? विश्लेषणात्मक विचार अवश्य सुनिए, आपके विचार यूट्यूब के कमेंट में भेजिए,।
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आचार्य भानुप्रताप वेदालंकार
आर्यसमाज संचार नगर इन्दौर मध्यप्रदेश
9977987777
9977957777
धन्यवाद

साभार -शुद्ध हनुमच्चरित

लेखक -आचार्य प्रेम भिक्षुः

वीर-व्रती हनुमान्, बाली, सुग्रीव और अंगद आदि मनुष्य थे, बन्दर इस विषय में प्रथम वाल्मीकि रामायण के प्रमाण देखें

(१) हनुमान की बातचीत सुन राम, लक्ष्मण को कहते हैं कि यह ऋग्वेद, यजुर्वेद और साम को अच्छी तरह जानता है तथा इसने अनेक बार व्याकरण पढ़ा है-किष्कि० सर्ग ३।२८

(२) राम-सुग्रीव की मैत्री के समय हनुमान् ने याज्ञिक ब्राह्मणों अरणियों से अग्नि को निकाल कर हवन कुण्ड में स्थापन किया-किष्किन्धा १४

(३) हनुमान् माता अञ्जना और पिता केसरी बन्दर न थे धार्मिक पुरुष थे, और मनुष्य की संतान पशु, पक्षी कभी नहीं हो सकतीदेखो वा० रा० कि० सर्ग ६६८

(४) वर्षा काल बीतने पर राज्य पर बैठे सुग्रीव को सीता की तलाश करने के लिए महामन्त्री के नाते जो उपदेश हनुमान ने दिया क्या उसे काइ वेदवित् विद्वान् के बिना कर सकता है ? देखो कि० २८/८-२७

(५) सीता की सुध के लिए जब हनुमान लंका की अशोक वाटिका । पहिले सीता ने उसे रावण समझ कर बातचीत में संकोच किया पर पीछे जब हनुमान ने विश्वास दिलाया कि मैं राम का संदेश लेकर जा हूँ, तथा राक्षसों के डर से रात को लंका में दाखिल हुआ हूँ, तब र प्रसन्नता प्रगट की। देखो सु० कां सर्ग ३५।

हनुमान बन्दर न का भ्रम न होता। दूसरे हनुमान लंका, पशु-पक्षियों की भाँति सरे हनमान लंका में रात को न आते बल्कि दिन को अन्य पशु-पक्षियों की भाँति आते। फिर राज्य के गुप्तचर भी विदेशी पुरुषों की देख किया करते हैं, न कि पशु-पक्षियों की

(६ ) हनुमान सीता को संस्कृत भाषा में राम का यशोगान सुनाते हैं, क्या यह बन्दर द्वारा सम्भव है ?

(७) श्रीराम हनुमान् के प्रति कृतज्ञता प्रकट करके उन्हें (युद्ध ११७) में पुरुषोत्तम’ कहते हैं। क्या बन्दर के लिये यह प्रयोग सम्भव है?

(८) बाली की राम से बातचीत, सुग्रीव को सन्देश, अंगद को उपदेश तथा मानुषी धर्म शास्त्रानुसार छोटे भाई की स्त्री से बलात् अकाल में सम्बन्ध करने के अपराध में वध रूप दण्ड, श्री राम के हाथ से मिलने और अन्त को द्विजों की भाँति वे-रीति अनुसार संस्कार करने वा कराने से प्रतीत होता है कि वह बन्दर न था।

(९ ) उत्तर काण्ड में भी लिखा है कि जब रावण युद्ध के लिए आया ता बाली समुद्रतट पर सन्ध्या कर रहा था। देखो (उत्तर काँ० सर्ग ३४) स्पष्ट है कि वह न केवल साधारण पुरुष था किन्तु वैदिक धर्मी उच्च वर्ण का राजा था हमारे विचार में तो वह सूर्य वंश की किसी बिछुड़ी हुई शाखा था, क्योंकि उसके पिता का नाम अंशुमान और वृद्धों का नाम सूर्य वंशी लिखा है देखो वा० रा० कि० कां० सर्ग ४।१६

(१०) सुग्रीव को जो बाली का भाई था ‘भास्करात्मज’ सूर्यपुत्रो महावीर्यः के विशेषण से स्मरण किया है।

(११) बाली के मरने पर उसकी स्त्री ने उसे ‘आर्य’ कह कर विला किया है*-देखो कि० २०१३

(१२) जो लोग सुग्रीव को बन्दर मानते हैं वे तनिक विचार कर वाल्मीकीय रामायण पढ़कर बतादें कि-क्या कभी बन्दरों के भी कभी वेदवेत्ता ब्राह्मण मन्त्री होते हैं ? -कि० ३।२६-३५

(१३) क्या बन्दरों की शरण में भी कभी रामचन्द्र जैसे विद्वान वा योद्धा जाया करते हैं ? कि० ४/१८-१६

(१४) क्या कभी बन्दर भी अग्निहोत्र कर वेद मन्त्रों से मैत्री दृढ़ किया करते हैं ? कि० ५।१४–१६

(१५) क्या कभी बन्दरों में भी शास्त्र विहित पाप-पुण्य की मर्यादा देखी है ? कि० सर्ग १८।४।४१।।

(१६) क्या कभी बन्दरों का राजतिलक, रत्न, धूप, दीप वा औषधों के जल से स्नान और हवन यज्ञ से होता है वा उनमें राज्याधिकार की पद्धति ऐसी ही होती है जैसी कि सुग्रीव के वंश में थी ? कि० २६ ।२४

(१७) क्या किसी बन्दर को ‘आर्य’ भी कहा जाता है ? कि० ५५७

(१८) क्या बन्दरों में कभी तारा * रूमा, अञ्जना जैसी पतिव्रता और शास्त्र जानने वाली स्त्रियाँ देखी हैं ? देखो कि० कि० सर्ग ३५।३५

* समीक्ष्य व्यथिता भूमौ सभ्रान्ता नियपातह।

सुप्त्येव पुनरुत्थाय आर्य पुत्रेति शोचती।।

सुषेण दुहिता चेद मर्थ सूक्ष्म विनिर्णये।’

औत्पाति के च विविध सर्वतः परिनिष्ठिता।। कि० २२१३

कि क्या बन्दरों की पत्नी बन्दरी की जगह नारियाँ हो सकती हैं

(२०) क्या कभी किसी बन्दर को विद्वानों वा राजाओं की सभामें बलाया गया था ? उत्तर कां० सर्ग ४०।

_ (२१) इसी प्रकर अंगद द्वारा अपने पिता महाराज बाली के अन्त्येष्टि संस्कार के पश्चात् नवीन यज्ञोपवीत धारण ‘ततोऽविन् विधिवत्वा सोऽप सव्यं चकारह’ (कि० २५१५०) पढ़कर और महावीर हनुमान् के लिए ‘काँधे पूँज जनेऊ छाजै’ (हनुमान चालीसा) की रट लगाकर भी आप इस आर्य-रत्न को बन्दर कहने का दुस्साहस करेंगे

साभार -शुद्ध हनुमच्चरित

लेखक -आचार्य प्रेम भिक्षुः

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“ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया”

“ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया”

ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया

ऋषि दयानन्द एक सत्यान्वेषी सत्पुरुष थे। वह सच्चे ईश्वर को प्राप्त करने तथा मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिये अपनी आयु के बाईसवें वर्ष में अपने घर से निकले थे। उन्होंने देश के अनेक भागों में जाकर धार्मिक पुरुषों के दर्शन करने सहित उनसे उपदेश ग्रहण किये थे। इसके साथ ही उन्होंने यात्रा में मिले ग्रन्थों का अध्ययन किया था तथा अनेक गुरुओं से योग की शिक्षा भी प्राप्त की थी। उनके योग के दो गुरु श्री ज्वालानन्द पुरी तथा श्री शिवानन्द गिरी थे। इन गुरुओं से उन्हें योग विद्या का ज्ञान हुआ तथा योग के अभ्यास द्वारा समाधि की सिद्धि हुई। स्वामी जी के योगी बन जाने और ईश्वर साक्षात्कार कर लेने पर भी उनकी विद्या प्राप्ति की पिपासा शान्त नहीं हुई थी। उन्हें अपने संन्यास गुरु स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती से अपने एक शिष्य प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती का पता मिला था जो मथुरा में रहकर एक पाठशाला में अपने शिष्यों को वेद व्याकरण का अध्ययन कराते थे और शिष्यों के धर्म व विद्या विषयक शंकाओं के समाधान करते थे। स्वामी दयानन्द सन् 1860 में उनके पास पहुंचे थे और उनका शिष्यत्व ग्रहण किया था। स्वामी दयानन्द जी की विद्या लगभग 3 वर्ष में पूरी हुई थी। विद्या पूरी होने पर गुरु दक्षिणा के अवसर पर गुरु विरजानन्द जी ने ऋषि दयानन्द को अपनी हृदय की इच्छा को दयानन्द जी के सम्मुख प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा था कि महाभारत यद्ध के बाद से वेद विद्या का ह्रास होते होते वेद ज्ञान विलुप्ति के कागार पर है। तुम वेद विद्या वा ज्ञान से सम्पन्न हो। देश के लोग अविद्या के कारण नाना प्रकार के दुःख व कष्ट भोग रहे हैं। इन सबका कारण अविद्या व अविद्यायुक्त मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध जैसी परम्परायें व क्रियायें हैं। ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की भावनाओं को यथावत् समझ लिया था। वह जान गये थे गुरुजी मुझसे अविद्या व अन्धविश्वासों का खण्डन तथा वेदज्ञान व मान्यताओं का मण्डन कराना चाहते हैं। गुरु जी चाहते थे कि दयानन्द जी संसार से मत-मतान्तरों की अविद्या को दूर कर वेद विद्या के आधार पर एक ज्ञान व विज्ञान से युक्त देश व समाज का निर्माण करें। ऋषि दयानन्द ने कुछ क्षणों में ही गुरु जी के प्रस्ताव पर विचार किया और उन्हें अपनी स्वीकृति दी थी। उन्होंने कहा था कि आप आने वाले दिनों में देखेंगे कि आपका यह शिष्य आपको दिये गये अपने वचनों का प्राणपण से पालन कर रहा है।

गुरु को वचन देने के बाद स्वामी दयानंद मथुरा से आगरा आकर कई महीनों तक रहे और वहां कथा तथा प्रवचन करते रहे। इसके साथ ही वह अपने प्रचार की भावी योजना भी तैयार करते रहे थे। यहां रहकर स्वामी दयानन्द जी ने मूल वेदों को प्राप्त करने का प्रयास किया था। न मिलने पर वह इसकी खोज में आगरा से ग्वालियर, धौलपुर, जयपुर, करौली आदि स्थानों पर गये थे। इनमें से किसी एक स्थान से आपको चार वेदों की मन्त्र संहितायें प्राप्त हुई थी, ऐसा हमारा अनुमान है। इसके बाद आपने करौली में कई महीने रहकर वेदों की परीक्षा कर अपने सिद्धान्तों को अन्तिम रूप दिया था। इसी क्रम में हम देखते हैं कि स्वामी जी पुष्कर के मेले में जाते हैं और वहां प्रचार और सुधार के काम करने आरम्भ करते हैं। आपका ईसाईयों से संवाद भी होता है। पुष्कर से स्वामी अजमेर आये थे और यहां उन्होंने पादरी राबिन्सन, ग्रे और शुल्बे्रड के साथ जीव, ईश्वर, सृष्टिक्रम तथा वेद विषय पर तीन दिन तक संवाद किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वामी जी ने इससे पूर्व मत-मतान्तरों के प्रमुख ग्रन्थों का अध्ययन भी कर लिया था जिससे उन्हें सत्यासत्य के निर्णयार्थ खण्डन-मण्डन करने सहित मत-मतान्तरों के लोगों को सत्य का ग्रहण कराने और असत्य को छुड़वाने में सफलता प्राप्त हो सके।

लगभग इन्हीं दिनों हरिद्वार में कुम्भ का मेला आरम्भ होने वाला था। यहां देश भर से पौराणिक धर्म भावना व आस्था रखने वाले बन्धु आते हैं। यहां प्रचार का अवसर देखकर स्वामी जी हरिद्वार पहुंचे थे और यहां आपने पाखण्ड खण्डिनी पताका भी लगाई थी। यहां रहकर आपने जो प्रचार किया उसका लोगों पर वह प्रभाव नहीं हो रहा था जो होना चाहिये था। इससे स्वामी जी को कुछ निराशा रही होगी। इसी कारण उन्होंने मौन व्रत भी रख लिया था। तभी उन्हें अहसास हुआ कि मौन रहने से तो उद्देश्य सिद्ध नहीं होगा। उसके लिये तो वेद प्रचार व खण्डन-मण्डन आवश्यक है, अतः आपने अपना मौन व्रत भी तोड़ दिया था। यहां स्वामी जी ने जो चिन्तन किया उसका लाभ उनके भावी जीवन के कार्यक्रमों में दृष्टिगोचर होता है। हरिद्वार के बाद स्वामी जी का मुख्य पड़ाव हम काशी में देखते हैं जहां उन्होंने काशी के दिग्गज विद्वानों से मूर्तिपूजा को वेदों का प्रमाण देकर सिद्ध करने की चुनौती दी थी। अनेक बार स्वामी जी की चुनौती की उपेक्षा करने पर काशी नरेश ईश्वरी नारायण सिंह की आज्ञा देने पर काशी के पण्डित स्वामी जी से शास्त्रार्थ करने के लिये तैयार हुए। इसके लिये 16 नवम्बर, सन् 1869 की तिथि निर्धारित की गई थी।

निर्धारित तिथि को शास्त्रार्थ हुआ। स्वामी दयानन्द अकेले थे और दूसरी ओर लगभग 30 विद्वान थे जिनसे स्वामीजी ने शास्त्रार्थ किया। मूर्तिपूजा पर काशी के पण्डितों को वेदों से प्रमाण वा वेद वचन प्रस्तुत करने थे परन्तु वह ऐसा नहीं कर सके। वहां जो प्रश्नोत्तर व बातें हुई वह काशी शास्त्रार्थ में वर्णित हैं। काशी के लगभग शीर्ष 30 पण्डितों में से कोई एक भी मूर्तिपूजा के पक्ष में वेदों का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका। अतः मूर्तिपूजा का आधार वेद न होकर वेद विरुद्ध कल्पना व मान्यता ही स्वीकार किया जा सकता है। इस शास्त्रार्थ में पौराणिकों ने अनेक प्रकार के विघ्न डाले। काशी नरेश पौराणिक पक्ष की ओर झुके थे। वह न्याय का पालन नहीं कर सके और उन्होंने भी स्वामी दयानन्द के विरुद्ध अपना मत दिया जबकि वास्तविकता यह थी कि काशी के पण्डित शास्त्रार्थ अधूरा छोड़कर चले गये थे। इसके बाद सत्य को स्वीकार न करने, पण्डितों के मूर्तिपूजा व पौराणिक कर्मकाण्डों यथा तीर्थ महत्व व उनमें स्नान आदि से स्वार्थ जुड़े होने के कारण स्थिति यथापूर्व रही। स्वामी जी का मूर्तिपूजा आदि अन्धविश्वासों को छुड़वाने का प्रयत्न सफल न हो सका। इस कारण स्वामी जी ने अपने उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिये नये उपायों पर विचार किया और इसके बाद हम देखते हैं कि वह कोलकत्ता सहित बंगाल के अनेक स्थानों, महाराष्ट्र के पूना तथा मुम्बई आदि अनेक स्थानों सहित राजस्थान की कुछ रिसायतों में जाकर वहां के प्रमुख व्यक्तियों व रजवाड़ों आदि से मिलकर वेद प्रचार करते हैं। स्वामी जी ने अपनी पूरी सामथ्र्य लगाकर लोगों को वैदिक मत को स्वीकार कराने का प्रयत्न किया। स्वामी जी ने कालान्तर में पंजाब का भी दौरा किया। उन दिनों पूरा पाकिस्तान पंजाब का भाग था। स्वामी जी ने पंजाब के अनेक स्थानों में आर्यसमाजें स्थापित की। वहां उन्हें अन्य स्थानों से अधिक सफलता मिली। पंजाब में ही उन्हें स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, पं. लेखराम, महात्मा हंसराज, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द आदि अनेक सहयोगी मिले जिन्होंने आर्यसमाज के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्वामी दयानन्द जी ने अपने गुरु को दिये वचन को पूरा करने के लिये मुम्बई में उनके कुछ शिष्यों के अनुरोध पर वेद धर्म के प्रचार के लिए आर्यसमाज संगठन व संस्था की स्थापना चैत्र शुक्ल पंचमी तदनुसार 10 अप्रैल, सन् 1875 को की थी। इसका मुख्य उद्देश्य वेद को सब सत्य विद्याओं का पुस्तक बताकर वेदों को पढ़ने व पढ़ाने तथा वेदों के सुनने व सुनाने को परम धर्म निश्चित किया गया था। आर्यसमाज की स्थापना के अनन्तर ऋषि ने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया जिसमें सर्वप्रमुख सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, पंचमहायज्ञविधि, गोकरुणाविधि आदि हैं। स्वामी जी ने यजुर्वेद भाष्य से वेदभाष्य लेखन का कार्य आरम्भ किया था और यजुर्वेद तथा ऋग्वेद का साथ-साथ भाष्य किया। यह भाष्य वह संस्कृत व हिन्दी दोनों भाषाओं में कर रहे थे। यजुर्वेद की मन्त्र संख्या कम होने से वह पहले समाप्त हो गया। ऋग्वेद का भाष्य का कार्य चल रहा था। उसके बाद सामवेद तथा अथर्ववेद का भाष्य भी आरम्भ किया जाना था। ऋग्वेद के सातवें मण्डल का भाष्य चल रहा था तभी स्वामी जी को जोधपुर में एक षडयन्त्र के अन्तर्गत उनके पाचक के द्वारा विषपान कराया गया। इसके कुछ दिनों बाद 30 अक्टूबर सन् 1883 को अजमेर में दिवाली के दिन ऋषि दयानन्द का देहावसान हो गया जिससे वेदभाष्य का कार्य पूरा न हो सका। इस कार्य को उनके बाद उनके अनेक शिष्यों ने पूरा किया। वर्तमान में अनेक वेदभाष्यकारों के वेदानुकूल प्रामाणिक भाष्य उपलब्ध हैं। अपनी मृत्यु से पूर्व तक ऋषि ने देश के अनेक भागों में जाकर वेद प्रचार किया था। अनेक स्थानों पर आर्यसमाजें स्थापित हुई थीं जहां नियमित रूप से सत्संग होने लगे थे। सत्यार्थप्रकाश तथा अन्य ग्रन्थों का पाठ भी होता था। प्रवचन व भजन आदि भी किये जाते थे।

ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में अपने गुरु स्वामी विरजानन्द जी को दिये वचन का प्राणपण से पालन किया। इसका पूरा ज्ञान ऋषि दयानन्द के पं. लेखराम, पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, स्वामी सत्यानन्द, श्री हर विलास शारदा, राम विलास शारदा, मास्टर लक्ष्मण आर्य तथा डा. भवानी लाल भारतीय आदि के जीवन चरितों को पढ़कर प्राप्त किया जा सकता है। स्वामी श्रद्धानन्द और पं. लेखराम जी द्वारा आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब की ओर से ऋषि दयानन्द के विस्तृत जन्म चरित की खोज कराकर व उसका सम्पादन व प्रकाशन कराकर एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। यदि यह दो व्यक्ति न होते तो आज हम ऋषि दयानन्द जी के जीवन से जिस व्यापकता से परिचित होते हैं, वह न हो पाते। इन महापुरुषों को हम नमन करते हैं। इस लेख में हम यह बताना चाहते हैं कि मथुरा में गुरु विरजानन्द जी को अविद्या दूर करने तथा वेदों के प्रचार का ऋषि दयानन्द ने जो वचन दिया था उसे उन्होंने एक अद्वितीय सच्चे शिष्य के रूप में पूरा करने का भरसक प्रयास किया। उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया। वह जीवन में अनेक विपत्तियों के होते हुए भी कभी निराश नहीं हुए। ईश्वर के भरोसे वह आगे बढ़ते रहे। वेद प्रचार के लिये ही उन्होंने विषपान करके अपनी भौतिक देह को वैदिक धर्म की वेदी पर समर्पित किया। हमें संसार में ऋषि दयानन्द के समान दूसरा कोई महापुरुष व वेदों वाला ऋषि दृष्टिगोचर नहीं होता। आज का आर्यसमाज उनके उद्देश्यों व स्वप्नों को पूरा करने में शिथिल दीखता है। आर्यों को अपनी महत्वाकांक्षायें छोड़कर संगठन को मजबूत करना होगा। गुण, कर्म व स्वभाव को महत्व देना होगा। समाज के सिद्धान्तों को समर्पित होकर पालन करने के साथ दिग्दिगन्त वेद प्रचार करना होगा तभी वैदिक धर्म व संस्कृति बच सकेगी। आज हमारा उद्देश्य कृण्वन्तो विश्वमार्यम् बहुत पीछे रह गया है। आज की चुनौती वैदिक धर्म की रक्षा करने की है। कल क्या होगा कोई नहीं जानता। हमें अपने आन्तरिक शत्रुओं को भी पहचानना होगा और उन्हें बाहर करना होगा। इति ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अनुसार विश्व कल्याण का आधार वेद।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अनुसार विश्व कल्याण का आधार वेद।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अनुसार विश्व कल्याण का आधार वेद।

आज संसार में अनेक भाषायें और अनेक मत-मतान्तर प्रचलित हैं। मत-मतान्तरों को ही लोग धर्म मानने लगे हैं जबकि इन दोनों में अन्तर है। मत-मतान्तर इतिहास के किसी काल विशेष में किसी मनुष्य विशेष द्वारा वा उसके बाद उसके अनुयायियों द्वारा उसके नाम पर उनकी मान्यताओं के आधार पर चलाया जाता है जबकि धर्म का आरम्भ सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर से होता है। मत-मतान्तर अपनी त्रुटियों व न्यूनताओं को छुपाने व उसे ईश्वर प्रदत्त बताने के लिए अपने अपने मत को धर्म कह देते हैं। धर्म शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है। संस्कृत से ही हिन्दी व विश्व की अन्य भाषायें बनी हैं। हिन्दी में संस्कृत के अधिकांश शब्द बिना किसी प्रकार के परिवर्तन के स्वीकार कर लिये गये हैं जबकि अन्य भाषायें में संस्कृत शब्दों के स्वरूप कहीं न्यून तो कहीं अधिक बदल गये हैं व कुछ उनके अपने निजी भी शब्द भी हैं। अंग्रेजी व संस्कृत एवं हिन्दी से इतर किसी भाषा में धर्म शब्द का पर्यायवाची शब्द नहीं है। धर्म का अर्थ होता है मनुष्यों के द्वारा श्रेष्ठ मनुष्योचित गुण, कर्म व स्वभाव का धारण वा आचरण। इसमें सृष्टिकर्ता व जगतपति ईश्वर का यथार्थ ज्ञान व उसके गुणों को जानकर उसकी उपासना करना भी सम्मिलित है। ईश्वर की यथार्थ उपासना का संसार में प्रमुख ग्रन्थ योग दर्शन है। योग आत्मा को परमात्मा से जोड़ने को कहते हैं। मनुष्य अपनी आत्मा को जब ईश्वर के गुण कर्म व स्वभाव का विचार कर परमात्मा में अपने ध्यान व चिन्तन को स्थिर करता है तो उसे ईश्वरोपासना कहते हैं। उपासना में ईश्वर के मनुष्य जाति पर उपकारों को भी उपासक द्वारा स्मरण किया जाता है। परमात्मा व आत्मा का सम्बन्ध वैसा ही है जैसा कि माता-पिता के साथ पुत्र का होता है। जिस प्रकार माता-पिता की सत्य आज्ञाओं का पालन सन्तान के लिए धर्म होता है उसी प्रकार ईश्वर की वेदाज्ञाओं का पालन भी सभी मनुष्यों के धर्म होता है। यह भी ध्यातव्य है कि मनुष्य ने न तो ब्रह्माण्ड बनाया न पृथिवी, समुद्र, नदी, पर्वत, वन और अन्नादि पदार्थ। यह सब ईश्वर ने मनुष्यों के लिए बनाये हैं। मनुष्यों को भी ईश्वर ने ही बनाया है। मनुष्यों के लिए जिस जिस चीज की आवश्यकता थी सब ईश्वर ने मनुष्यों को इस सृष्टि के द्वारा दी हैं। देखने के लिए आंखें चाहिये तो आंखे दी। सुनने के लिए कान चाहियें तो श्रवण इन्द्रिय दी। इसी प्रकार से मनुष्यों को अपने कर्तव्यों का ज्ञान चाहिये। यह भी ईश्वर ने मनुष्यों को सृष्टि के आरम्भ में वेद ज्ञान देकर कराया है। वेद में ईश्वर ने तृण से लेकर प्रकृति, आत्मा व ईश्वर सभी का यथार्थ सत्य ज्ञान दिया है।
मनुष्यों को स्वस्थ शरीर व उसमें स्वस्थ ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रियों की अत्यावश्यकता है। मनुष्यों कानों से सुनता और मुंह वा वाक् इन्द्रिय से बोलता है। सुनकर ही वह ज्ञान प्राप्त करता है। माता, पिता व आचार्य उसको ज्ञान कराने वाले मुख्य लोग होते हैं। माता-पिता व आचार्य भी अपने अपने माता-पिता व आचार्य से ज्ञान प्राप्त करते हैं। सृष्टि की आदि में परमात्मा अमैथुनी सृष्टि करते हैं। तब आरम्भ में युवा-स्त्री व पुरुष उत्पन्न होते हैं। उनके माता-पिता व आचार्य नहीं होते। परमात्मा ही उस अमैथुनी सृष्टि के सबसे योग्य चार ऋषियों को चार वेदों का ज्ञान देता है। वही चार ऋषि एक अन्य सबसे योग्य पुरुष ब्रह्मा जी चारों वेदों का ज्ञान कराते हैं। यह ऋषि ही अन्य सभी मनुष्यों के माता-पिता व आचार्य कहलाते हैं। इन्हीं से सभी मनुष्यों को भाषा का ज्ञान सहित वेदों की शिक्षाओं व कर्तव्यों का ज्ञान कराया जाता है। आदि गुरु परमात्मा होता है। वह चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को ज्ञान देता है जिसमें भाषा व उसका ज्ञान भी मुख्य है। ज्ञान भाषा में ही निहित होता है। ज्ञान व भाषा को पृथक नहीं किया जा सकता। ज्ञान होगा तो भाषा अवश्य होगी। संस्कृत हर प्रकार से पूर्ण भाषा है जो ऋषियों को ईश्वर से प्राप्त हुई। लौकिक संस्कृत भाषा वैदिक भाषा का किंचित सरलीकरण है, यह बाद के ऋषियों व विद्वानों द्वारा किया गया है। अतः मूल भाषा भी वेदज्ञान के साथ ही प्राप्त हुई थी व वही किंचित विकारों के साथ व शुद्ध रूप में भी चली आ रही है। देश-काल, भौगोलिक कारणों व मनुष्यों के उच्चारण दोष आदि कारणों से इसमें किंचित परिवर्तन व विकार होना भी सम्भव होता है। अतः इसी प्रकार होते होते सृष्टि की उत्पत्ति के 1.96 अरब वर्ष हो जाने पर संसार में आज सहस्रों भाषायें अस्तित्व में आ गई हैं। सभी भाषाओं की उत्पत्ति प्रायः इसी प्रकार या ऐसे अनेक कारणों से होना सम्भव प्रतीत होती है।
वेदों सहित वेदों पर ऋषियों के उपलब्ध ग्रन्थों का अध्ययन कर धर्म का सर्वांग शुद्ध रूप प्राप्त होता है। यह महाभारत काल व उसके कुछ बाद के वर्षों तक अस्तित्व व व्यवहार में रहा है। इसी को वैदिक धर्म कहते हैं। इसमें किसी अन्य मान्यता व सिद्धान्त को जोड़ने व मिलाने का कहीं अवकाश ही नहीं था। अतः किसी नये धर्म के प्रचलन का प्रश्न उत्पन्न नहीं होता। यह सत्य है कि महाभारत युद्ध के बाद वेद के सत्य अर्थों का यत्र तत्र लोप हो गया था। मूल वेद सुरक्षित रहे और उनकी मध्यकालीन व्याख्यायें भी विद्यमान रहीं। इनमें कुछ भ्रान्तियां थीं। ईसा की अट्ठारहवीं शती में ऋषि दयानन्द सरस्वती (1825-1883) का प्रादुर्भाव रहता है। वह अपने अपूर्व पुरुषार्थ, तप व विद्याबल से वेद व वेदज्ञान को प्राप्त करते हैं और वेदभाष्य सहित अनेक महत्वपूर्ण वैदिक ग्रन्थों की रचना करते हैं। ऋषि दयानन्द जी ने कोई नई बात नहीं कही है। उन्होंने जो कहा व लिखा है वह वही है जो सृष्टि काल के आरम्भ से देश देशान्तर में विद्यमान रहा था परन्तु उनके समय में वह सर्वत्र उपलब्ध नहीं था। उन्होंने उस अलभ्य वैदिक ज्ञान को स्वपुरुषार्थ से प्राप्त किया, अपने विवेक से उसकी परीक्षा व सत्यासत्य का निर्णय किया और उसे देशवासियों के सम्मुख सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने सबल युक्तियों से सिद्ध किया कि मनुष्यों का एक ही धर्म है और वह वेद प्रतिपादित कर्तव्य कर्म व आचरण ही हैं। संसार में जितने भी मत-मतान्तर चल रहे हैं वह अविद्या के काल में चलें जिनकी अब आवश्यकता नहीं है। मत-मतान्तरों में अनेक न्यूनतायें और इनकी अनेक बातें स्त्री व पुरुषों में भेदभाव भी करती हैं। ईश्वरोपासना और वायु-जल-पर्यावरण की शुद्धि हेतु यज्ञ का विधान व विज्ञान की आवश्यक बातों का ज्ञान भी इन मत-मतान्तरों की पुस्तकों में नहीं है। इनसे इन मत के वर्तमान आचार्यों और अनुयायियों की इस रूप में हानि हो रही है कि वह उचित रीति से ईश्वरोपासना एवं अन्य वैदिक कर्मों व अनुष्ठानों को न करने से उससे प्राप्त होने वाले लौकिक व पारलौकिक लाभों से वंचित हो रहे हैं। अतः सभी को वैदिक धर्म की ही शरण लेकर उसी को अपनाना व धारण करना चाहिये। वेदों के आधार पर एक ऐसे समाज, देश व विश्व का निर्माण किया जा सकता है जहां किसी से भेदभाव न होता हो, सब शिक्षित हों, सब अपने अपने कर्तव्यों का पालन करें, सबको उन्नति के समान अवसर मिले, जहां जन्मना जाति व वर्गवाद आदि न हो, लोग मनुष्यों को ही नहीं प्राणीमात्र को ईश्वर की सन्तान व अपना मित्र जानें आदि आदि। वेदों को अपनाकर व उनकी शिक्षाओं के द्वारा विश्व में सुख व शान्ति को स्थापित किया जा सकता है। सृष्टि के आरम्भ से महाभारतकाल पर्यन्त तक के 1.960848 अरब वर्षों तक भारत वा आर्यावर्त्त के आर्यों का ही विश्व में एकमात्र निरन्तर वैदिक धर्म पर आधारित चक्रवर्ती राज्य रहा है जहां सब मनुष्य आध्यात्मिक व भौतिक दृष्टि से सुखी थे। तब न कोई मत-मतान्तर था न उसकी आवश्यकता थी। आज भी नहीं है। आवश्यकता केवल विचार, सोच व चिन्तन बदल कर उचित चिन्तन व सत्य निर्णय करने की है।
देश व विश्व में सुख व शान्ति की स्थापना को लक्ष्य में करके वेद का मंथन किया जाना चाहिये और इससे जो रत्न प्राप्त हों उसे देश व विश्व में विस्तार व वितरण कर एक सत्य मत धर्म की स्थापना करनी चाहिये। ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश एक ऐसा ही प्रयास था। ऐसे मंथन पहले भी हुए व हुए होंगे। आज इसकी सर्वाधिक आवश्यकता है। ऋषि दयानन्द ने यह कार्य आरम्भ किया था। यह कार्य अधूरा पड़ा है। यह कार्य केवल ऋषि दयानन्द के अनुयायियों का ही कार्य नहीं है अपितु यह संसार के सभी मनुष्यों का अपना कार्य है। इसी से विश्व का कल्याण होने के साथ आध्यात्मिक व भौतिक उन्नति हो सकती है और उससे संसार के सभी लोग लाभान्वित हो सकते हैं।
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असुर/ दैत्य/दस्यु कौन

असुर/ दैत्य/दस्यु कौन

असुर/ दैत्य/दस्यु कौन

पूरा विश्व कोरोना के कहर से पीड़ित है। पूरे विश्व में इस रोग से हजारों लोग मारे जा चुके हैं। 22 मार्च को प्रधानमंत्री जी ने जनता कर्फ़्यू का आदेश किया है। कुछ विशिष्ट समुदाय के लोग इसका भी विरोध कर रहे हैं। वे दुष्ट अपना ही नहीं सारे समाज का जीवन खतरे मे डाल रहे हैं।

वेद मे इन्हे ही असुर या दैत्य कहा है। इनका बहिष्कार करना अनिवार्य है। शासक को इन्हे मृत्युदंड देने का आदेश है।

अकर्मा दस्युरभि नो अमन्तुरन्यव्रतो अमानुष: ।
त्वं तस्यामित्रहन् वध: दासस्य दम्भय ।।
ऋग्वेद 10/22/8

ऋग्वेद कहता है –
(1)”अकर्मा दस्यु: “। जो कर्मशील नही है, जो निष्क्रिय है, उदासीन है, जो आनंद प्रमोद में मस्त है, वह अकर्मा है । जिसका अच्छा खाना-पीना और मौज करना ही लक्ष्य है, वह अकर्मा है । जो अन्य के लिए कुछ सोचता नहि, वह अकर्मा है । अच्छे कार्य क्या क्या है, वह जानते हुए भी उसमें जो प्रवृत नहीं होता, वह अकर्मा है । अकर्मा दस्यु है । जो मनुष्य करनेयोग्य कार्य करने मे

(2) अमन्तु: दस्यु: – अर्थात् जो मंतव्यहीन है, जो मर्यादाओ का उल्लंघन करनेवाला है,जो मनमानी करेवाला है, वह दस्यु है , बिना सोचे समझे काम करनेवाले अमन्तु है । उद्वेगी, असहनशीलता, छिछोरापन, नासमझी दस्युपन है, हेय है, हानिकारक है ।

(3) अन्यव्रत: दस्यु: – अर्थात् जो अन्य व्रती है, विपरीत व्यवहार करनेवाला है , वह निंदनीय है ।

(4) अमानुष: दस्यु: – जिस मानव में मानवता नहि, वह अमानुष है, दस्यु है । जिस मनुष्य में मनुष्यता का अभाव है, उसे अमानुष कहते है ।

असुरता, दस्युपन, अनार्यता, दानवता प्राणिमात्र के लिए दुःखदायक है, कलंकित है ।इनका लक्ष्य ‘येन केन प्रकारेण’ केवल धन हो गया है । कैसे भी हो, सभी को बहुत जल्दी , बहुत सारा धन चाहिए, पद- प्रतिष्ठा चाहिए, कंचन- कामिनी चाहिए । नेता लोग अपने कुछ स्वार्थ के लिए राष्ट्र को बेचने के तक तैयार हो जाते है । नेताओ को केवल वोट चाहिए । कैसे भी अपना काम होना ही चाहिए । कुछ भी हो जाए, कितनी भी मारपीट करनी पड़े, जरूर हो तो दंगल – फसाद भी किया जाए, किन्तु अपनी गद्दी सलामत रहनी चाहिए । सारा समाज, सभी क्षेत्र, सारे आश्रम, सारी वर्णव्यवस्था नष्ट – भ्रष्ट हो चुकी है । अच्छे व्यक्तिओ की कोई सुनता नही, सज्जन लोग निष्क्रिय हो गए है । थोड़े से गुंडे, थोड़े से देशद्रोही सारे राष्ट्र पर हावी हो गए है । राष्ट्र खतरे में है, मानवजाति खतरे में, हिंदु (आर्य) जाति सिकुड़ चुकी है । क्या होगा मानवजीति का ? क्या होगा धर्म का, वेद का, सत्य ज्ञानविज्ञान का ?

वेद उत्तर देता है (तस्य दासस्य दंभय) उस दस्यु का नाश करो ।

हे परमेश्वर ! ऐसे दस्युओं का विनाश हो, विभिन्न नारकीय योनियों में डाले जाए । हमें भी ऐसी शक्ति, साहस, ओजस्वीता, बल व उत्साह प्रदान करे, जिससे संगठित होकर उसे हम रोक सके और परिवार, समाज, राष्ट्र तथा विश्व की रक्षा कर सके ।

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“ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया”

“ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया”

ओ३म्
“ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया”
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ऋषि दयानन्द एक सत्यान्वेषी सत्पुरुष थे। वह सच्चे ईश्वर को प्राप्त करने तथा मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिये अपनी आयु के बाईसवें वर्ष में अपने घर से निकले थे। उन्होंने देश के अनेक भागों में जाकर धार्मिक पुरुषों के दर्शन करने सहित उनसे उपदेश ग्रहण किये थे। इसके साथ ही उन्होंने यात्रा में मिले ग्रन्थों का अध्ययन किया था तथा अनेक गुरुओं से योग की शिक्षा भी प्राप्त की थी। उनके योग के दो गुरु श्री ज्वालानन्द पुरी तथा श्री शिवानन्द गिरी थे। इन गुरुओं से उन्हें योग विद्या का ज्ञान हुआ तथा योग के अभ्यास द्वारा समाधि की सिद्धि हुई। स्वामी जी के योगी बन जाने और ईश्वर साक्षात्कार कर लेने पर भी उनकी विद्या प्राप्ति की पिपासा शान्त नहीं हुई थी। उन्हें अपने संन्यास गुरु स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती से अपने एक शिष्य प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती का पता मिला था जो मथुरा में रहकर एक पाठशाला में अपने शिष्यों को वेद व्याकरण का अध्ययन कराते थे और शिष्यों के धर्म व विद्या विषयक शंकाओं के समाधान करते थे। स्वामी दयानन्द सन् 1860 में उनके पास पहुंचे थे और उनका शिष्यत्व ग्रहण किया था। स्वामी दयानन्द जी की विद्या लगभग 3 वर्ष में पूरी हुई थी। विद्या पूरी होने पर गुरु दक्षिणा के अवसर पर गुरु विरजानन्द जी ने ऋषि दयानन्द को अपनी हृदय की इच्छा को दयानन्द जी के सम्मुख प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा था कि महाभारत यद्ध के बाद से वेद विद्या का ह्रास होते होते वेद ज्ञान विलुप्ति के कागार पर है। तुम वेद विद्या वा ज्ञान से सम्पन्न हो। देश के लोग अविद्या के कारण नाना प्रकार के दुःख व कष्ट भोग रहे हैं। इन सबका कारण अविद्या व अविद्यायुक्त मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध जैसी परम्परायें व क्रियायें हैं। ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की भावनाओं को यथावत् समझ लिया था। वह जान गये थे गुरुजी मुझसे अविद्या व अन्धविश्वासों का खण्डन तथा वेदज्ञान व मान्यताओं का मण्डन कराना चाहते हैं। गुरु जी चाहते थे कि दयानन्द जी संसार से मत-मतान्तरों की अविद्या को दूर कर वेद विद्या के आधार पर एक ज्ञान व विज्ञान से युक्त देश व समाज का निर्माण करें। ऋषि दयानन्द ने कुछ क्षणों में ही गुरु जी के प्रस्ताव पर विचार किया और उन्हें अपनी स्वीकृति दी थी। उन्होंने कहा था कि आप आने वाले दिनों में देखेंगे कि आपका यह शिष्य आपको दिये गये अपने वचनों का प्राणपण से पालन कर रहा है।

गुरु को वचन देने के बाद स्वामी दयानंद मथुरा से आगरा आकर कई महीनों तक रहे और वहां कथा तथा प्रवचन करते रहे। इसके साथ ही वह अपने प्रचार की भावी योजना भी तैयार करते रहे थे। यहां रहकर स्वामी दयानन्द जी ने मूल वेदों को प्राप्त करने का प्रयास किया था। न मिलने पर वह इसकी खोज में आगरा से ग्वालियर, धौलपुर, जयपुर, करौली आदि स्थानों पर गये थे। इनमें से किसी एक स्थान से आपको चार वेदों की मन्त्र संहितायें प्राप्त हुई थी, ऐसा हमारा अनुमान है। इसके बाद आपने करौली में कई महीने रहकर वेदों की परीक्षा कर अपने सिद्धान्तों को अन्तिम रूप दिया था। इसी क्रम में हम देखते हैं कि स्वामी जी पुष्कर के मेले में जाते हैं और वहां प्रचार और सुधार के काम करने आरम्भ करते हैं। आपका ईसाईयों से संवाद भी होता है। पुष्कर से स्वामी अजमेर आये थे और यहां उन्होंने पादरी राबिन्सन, ग्रे और शुल्बे्रड के साथ जीव, ईश्वर, सृष्टिक्रम तथा वेद विषय पर तीन दिन तक संवाद किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वामी जी ने इससे पूर्व मत-मतान्तरों के प्रमुख ग्रन्थों का अध्ययन भी कर लिया था जिससे उन्हें सत्यासत्य के निर्णयार्थ खण्डन-मण्डन करने सहित मत-मतान्तरों के लोगों को सत्य का ग्रहण कराने और असत्य को छुड़वाने में सफलता प्राप्त हो सके।

लगभग इन्हीं दिनों हरिद्वार में कुम्भ का मेला आरम्भ होने वाला था। यहां देश भर से पौराणिक धर्म भावना व आस्था रखने वाले बन्धु आते हैं। यहां प्रचार का अवसर देखकर स्वामी जी हरिद्वार पहुंचे थे और यहां आपने पाखण्ड खण्डिनी पताका भी लगाई थी। यहां रहकर आपने जो प्रचार किया उसका लोगों पर वह प्रभाव नहीं हो रहा था जो होना चाहिये था। इससे स्वामी जी को कुछ निराशा रही होगी। इसी कारण उन्होंने मौन व्रत भी रख लिया था। तभी उन्हें अहसास हुआ कि मौन रहने से तो उद्देश्य सिद्ध नहीं होगा। उसके लिये तो वेद प्रचार व खण्डन-मण्डन आवश्यक है, अतः आपने अपना मौन व्रत भी तोड़ दिया था। यहां स्वामी जी ने जो चिन्तन किया उसका लाभ उनके भावी जीवन के कार्यक्रमों में दृष्टिगोचर होता है। हरिद्वार के बाद स्वामी जी का मुख्य पड़ाव हम काशी में देखते हैं जहां उन्होंने काशी के दिग्गज विद्वानों से मूर्तिपूजा को वेदों का प्रमाण देकर सिद्ध करने की चुनौती दी थी। अनेक बार स्वामी जी की चुनौती की उपेक्षा करने पर काशी नरेश ईश्वरी नारायण सिंह की आज्ञा देने पर काशी के पण्डित स्वामी जी से शास्त्रार्थ करने के लिये तैयार हुए। इसके लिये 16 नवम्बर, सन् 1869 की तिथि निर्धारित की गई थी।

निर्धारित तिथि को शास्त्रार्थ हुआ। स्वामी दयानन्द अकेले थे और दूसरी ओर लगभग 30 विद्वान थे जिनसे स्वामीजी ने शास्त्रार्थ किया। मूर्तिपूजा पर काशी के पण्डितों को वेदों से प्रमाण वा वेद वचन प्रस्तुत करने थे परन्तु वह ऐसा नहीं कर सके। वहां जो प्रश्नोत्तर व बातें हुई वह काशी शास्त्रार्थ में वर्णित हैं। काशी के लगभग शीर्ष 30 पण्डितों में से कोई एक भी मूर्तिपूजा के पक्ष में वेदों का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका। अतः मूर्तिपूजा का आधार वेद न होकर वेद विरुद्ध कल्पना व मान्यता ही स्वीकार किया जा सकता है। इस शास्त्रार्थ में पौराणिकों ने अनेक प्रकार के विघ्न डाले। काशी नरेश पौराणिक पक्ष की ओर झुके थे। वह न्याय का पालन नहीं कर सके और उन्होंने भी स्वामी दयानन्द के विरुद्ध अपना मत दिया जबकि वास्तविकता यह थी कि काशी के पण्डित शास्त्रार्थ अधूरा छोड़कर चले गये थे। इसके बाद सत्य को स्वीकार न करने, पण्डितों के मूर्तिपूजा व पौराणिक कर्मकाण्डों यथा तीर्थ महत्व व उनमें स्नान आदि से स्वार्थ जुड़े होने के कारण स्थिति यथापूर्व रही। स्वामी जी का मूर्तिपूजा आदि अन्धविश्वासों को छुड़वाने का प्रयत्न सफल न हो सका। इस कारण स्वामी जी ने अपने उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिये नये उपायों पर विचार किया और इसके बाद हम देखते हैं कि वह कोलकत्ता सहित बंगाल के अनेक स्थानों, महाराष्ट्र के पूना तथा मुम्बई आदि अनेक स्थानों सहित राजस्थान की कुछ रिसायतों में जाकर वहां के प्रमुख व्यक्तियों व रजवाड़ों आदि से मिलकर वेद प्रचार करते हैं। स्वामी जी ने अपनी पूरी सामथ्र्य लगाकर लोगों को वैदिक मत को स्वीकार कराने का प्रयत्न किया। स्वामी जी ने कालान्तर में पंजाब का भी दौरा किया। उन दिनों पूरा पाकिस्तान पंजाब का भाग था। स्वामी जी ने पंजाब के अनेक स्थानों में आर्यसमाजें स्थापित की। वहां उन्हें अन्य स्थानों से अधिक सफलता मिली। पंजाब में ही उन्हें स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, पं. लेखराम, महात्मा हंसराज, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द आदि अनेक सहयोगी मिले जिन्होंने आर्यसमाज के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्वामी दयानन्द जी ने अपने गुरु को दिये वचन को पूरा करने के लिये मुम्बई में उनके कुछ शिष्यों के अनुरोध पर वेद धर्म के प्रचार के लिए आर्यसमाज संगठन व संस्था की स्थापना चैत्र शुक्ल पंचमी तदनुसार 10 अप्रैल, सन् 1875 को की थी। इसका मुख्य उद्देश्य वेद को सब सत्य विद्याओं का पुस्तक बताकर वेदों को पढ़ने व पढ़ाने तथा वेदों के सुनने व सुनाने को परम धर्म निश्चित किया गया था। आर्यसमाज की स्थापना के अनन्तर ऋषि ने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया जिसमें सर्वप्रमुख सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, पंचमहायज्ञविधि, गोकरुणाविधि आदि हैं। स्वामी जी ने यजुर्वेद भाष्य से वेदभाष्य लेखन का कार्य आरम्भ किया था और यजुर्वेद तथा ऋग्वेद का साथ-साथ भाष्य किया। यह भाष्य वह संस्कृत व हिन्दी दोनों भाषाओं में कर रहे थे। यजुर्वेद की मन्त्र संख्या कम होने से वह पहले समाप्त हो गया। ऋग्वेद का भाष्य का कार्य चल रहा था। उसके बाद सामवेद तथा अथर्ववेद का भाष्य भी आरम्भ किया जाना था। ऋग्वेद के सातवें मण्डल का भाष्य चल रहा था तभी स्वामी जी को जोधपुर में एक षडयन्त्र के अन्तर्गत उनके पाचक के द्वारा विषपान कराया गया। इसके कुछ दिनों बाद 30 अक्टूबर सन् 1883 को अजमेर में दिवाली के दिन ऋषि दयानन्द का देहावसान हो गया जिससे वेदभाष्य का कार्य पूरा न हो सका। इस कार्य को उनके बाद उनके अनेक शिष्यों ने पूरा किया। वर्तमान में अनेक वेदभाष्यकारों के वेदानुकूल प्रामाणिक भाष्य उपलब्ध हैं। अपनी मृत्यु से पूर्व तक ऋषि ने देश के अनेक भागों में जाकर वेद प्रचार किया था। अनेक स्थानों पर आर्यसमाजें स्थापित हुई थीं जहां नियमित रूप से सत्संग होने लगे थे। सत्यार्थप्रकाश तथा अन्य ग्रन्थों का पाठ भी होता था। प्रवचन व भजन आदि भी किये जाते थे।

ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में अपने गुरु स्वामी विरजानन्द जी को दिये वचन का प्राणपण से पालन किया। इसका पूरा ज्ञान ऋषि दयानन्द के पं. लेखराम, पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, स्वामी सत्यानन्द, श्री हर विलास शारदा, राम विलास शारदा, मास्टर लक्ष्मण आर्य तथा डा. भवानी लाल भारतीय आदि के जीवन चरितों को पढ़कर प्राप्त किया जा सकता है। स्वामी श्रद्धानन्द और पं. लेखराम जी द्वारा आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब की ओर से ऋषि दयानन्द के विस्तृत जन्म चरित की खोज कराकर व उसका सम्पादन व प्रकाशन कराकर एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। यदि यह दो व्यक्ति न होते तो आज हम ऋषि दयानन्द जी के जीवन से जिस व्यापकता से परिचित होते हैं, वह न हो पाते। इन महापुरुषों को हम नमन करते हैं। इस लेख में हम यह बताना चाहते हैं कि मथुरा में गुरु विरजानन्द जी को अविद्या दूर करने तथा वेदों के प्रचार का ऋषि दयानन्द ने जो वचन दिया था उसे उन्होंने एक अद्वितीय सच्चे शिष्य के रूप में पूरा करने का भरसक प्रयास किया। उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया। वह जीवन में अनेक विपत्तियों के होते हुए भी कभी निराश नहीं हुए। ईश्वर के भरोसे वह आगे बढ़ते रहे। वेद प्रचार के लिये ही उन्होंने विषपान करके अपनी भौतिक देह को वैदिक धर्म की वेदी पर समर्पित किया। हमें संसार में ऋषि दयानन्द के समान दूसरा कोई महापुरुष व वेदों वाला ऋषि दृष्टिगोचर नहीं होता। आज का आर्यसमाज उनके उद्देश्यों व स्वप्नों को पूरा करने में शिथिल दीखता है। आर्यों को अपनी महत्वाकांक्षायें छोड़कर संगठन को मजबूत करना होगा। गुण, कर्म व स्वभाव को महत्व देना होगा। समाज के सिद्धान्तों को समर्पित होकर पालन करने के साथ दिग्दिगन्त वेद प्रचार करना होगा तभी वैदिक धर्म व संस्कृति बच सकेगी। आज हमारा उद्देश्य कृण्वन्तो विश्वमार्यम् बहुत पीछे रह गया है। आज की चुनौती वैदिक धर्म की रक्षा करने की है। कल क्या होगा कोई नहीं जानता। हमें अपने आन्तरिक शत्रुओं को भी पहचानना होगा और उन्हें बाहर करना होगा। इति ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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वेदों का दार्शनिक महत्त्व

लेखक- स्वामी दर्शनानन्द जी
प्रस्तोता- प्रियांशु सेठ

प्यारे मित्रों! आप एक और भी ध्यान रखें कि जिस समय संसार में सूर्य की किरणें आनी आरम्भ होती हैं तो अन्धेरा एकदम से उड़ जाता है लेकिन दीपकों के प्रकाश से अन्धेरा बहुत कम उड़ता है और उसका प्रकाश दूर तक नहीं पहुंचता, इसलिये जिस पुस्तक से संसार की सम्पूर्ण मूर्खता नष्ट हो जाय और मनुष्यों में से द्वेष भाव हटकर एकता पैदा हो जाय वही ईश्वरकृत पुस्तक है। अब हम वेद में इन्हीं बातों की ढूंढ (खोज) करेंगे। यदि इस समय देश में देखा जाय कि कितनी बातें ऐसी हैं कि जिनके कारण मनुष्य आपस में भाई-भाई होने पर भी और बुद्धिमान् हो करके भी एक दूसरे के दुःखदाई शत्रु बन रहे हैं, जब हम भले प्रकार सोचते हैं तो ज्ञात होता है कि पहिली बात जिसने संसार को टुकड़ा-टुकड़ा किया ईश्वर के न मानने का है। जो लोग नास्तिक हैं वे ईश्वर का होना नहीं मानते। दूसरी बात ईश्वर की गणना की है अर्थात् ईश्वर एक है या अनेक? क्योंकि ईसाई तीन मानते हैं बाप, बेटा और पवित्र आत्मा। यवन एक मानते हैं। हिन्दू तीन मानते हैं, अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, शिव। जैनी २४ मानते हैं, वरन् इससे भी अधिक, और आर्य एक मानते हैं। सारांश यह है कि इस बात में भिन्नता है।

तीसरा झगड़ा ईश्वर के स्थान का है अर्थात् ईश्वर कहाँ है? कोई सातवें आकाश पर मानता है अर्थात् यवन। ईसाई चौथे आकाश पर मानते हैं। जैनी मोक्षशिला (सिद्ध शिला) पर मानते हैं। हिन्दू वैकुण्ठ में मानते हैं। कोई क्षीर सागर में मानता है, कोई गोलोक में मानता है, शैवी कैलाश पर मानते हैं, सारांश यह कि इस बात में बड़ी-बड़ी भिन्नता विद्यमान हैं। चौथा झगड़ा इस बात का है कि ईश्वर कर्मों का फल किस प्रकार देता है? जैनी तो ईश्वर को फलदाता मानते ही नहीं। यवन कहते हैं कि “मुनकिर और नकीर” फरिश्ते कबर (समाधि) पर आकर मृतक से प्रश्न करते हैं और कयामत के दिन उनका हिसाब होता है। ईसाई भी कयामत के मानने वाले हैं। और हिन्दुओं का यह मत है कि यमदूत उसको यम लोक में ले जाते हैं। वहां चित्रगुप्त यमराज का मीर मुन्शी बही-खाता लिखता रहता है और उसके अनुसार हिसाब होकर कर्म फल दिया जाता है। तात्पर्य यह है कि इस बात में और भी बहुत-सी भिन्नतायें हैं। पांचवां झगड़ा इस बात का है कि ईश्वर ने संसार को किस वस्तु से पैदा किया। यवन कहते हैं कि अवस्तु से वस्तु को उत्पन्न किया अर्थात् ‘कुन’, कहते ही सब सृष्टि उत्पन्न हो गई। ईसाई भी अवस्तु से वस्तु मानने वालों के साथी हैं। जैनी तो उसकी उत्पत्ति मानते ही नहीं। हिन्दुओं में भी इस बात में बड़ी भिन्नता है। कोई तो अविद्या से जगत् की उत्पत्ति मानता है, कोई पंच भूतों से। तात्पर्य यह है कि यह बात भी झगड़े में पड़ी हुई है। छठा झगड़ा इस बात का है कि जीव और ईश्वर में भेद है या नहीं? यवन तो हमेओस्त (सर्वव्यापक) के मानने वाले हैं, हिन्दुओं में विशिष्टाद्वैत, अद्वैत, शुद्धाद्वैत इत्यादि बहुत प्रकार की भिन्नता है। सातवां झगड़ा इस बात का है कि अनादि पदार्थ कितने हैं। यवन एक, हिन्दू भिन्न-भिन्न, ईसाई तीन, जैनी सब संसार को अनादि मानते हैं। आठवां झगड़ा वह है जो इन सब झगड़ों की जड़ है। वह है कि मुक्ति किस प्रकार हो सकती है? जैनी कर्म से, यवन प्रार्थना से, ईसाई कुफारा से, हिन्दू उपासना-ज्ञान-कर्म इत्यादि भिन्न-भिन्न नियमों से मुक्ति मानते हैं।

प्यारे पाठकगण! ये आठ झगड़े हैं जिसके कारण इस समय संसार में आत्मिक और शारीरिक दोनों प्रकार की लड़ाई हो रही है। अब देखना यह है कि वैदिक शिक्षा इन आठ झगड़ों को दूर कर सकती है या नहीं? मैं इस समय केवल उपनिषद् का एक वाक्य जो ऋग्वेद के एक मन्त्र का स्पष्ट अनुवाद है प्रस्तुत करता हूं-

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा य: करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतन्नेतरेषाम्।।१२।।
पहिला प्रश्न यह था कि ईश्वर है या नहीं। दूसरा यह था कि ईश्वर एक है या अनेक। उसका उत्तर मिला कि एक है, क्योंकि नहीं का उत्तर ‘है’ कहने से और बहुत का उत्तर ‘एक’ कहने से आ गया। अब प्रश्न उत्पन्न हुआ कि एक क्यों है! और वह कहां है? उसका उत्तर मिला कि सर्वव्यापक है, क्योंकि जहां दो होंगे वहां बीच की दूरी अवश्य होगी और जहां दूरी हो वह परिमित होगा, इसलिये जो परमात्मा अनन्त है वह एक ही है और उसमें झगड़ा भी मिट गया कि वह कहां है, क्योंकि चौथे-सातवें आकाश या वैकुण्ठ, क्षीर सागर इत्यादि में मानने से परिमित हो जाता है। फिर प्रश्न उत्पन्न हुआ कि कहां व्यापक है। उसका उत्तर मिला कि (सर्वभूतान्तरात्मा) अर्थात् कुल जीवों और पदार्थों के भीतर विद्यमान है और ऐसा कहने से इस प्रश्न का उत्तर ही मिल गया कि ईश्वर कर्मों का फल किस प्रकार देते हैं अर्थात् वह प्रत्येक जीवात्मा के भीतर सब के कर्मों का साक्षी होकर देखता है और स्वयं ही उनका फल देता है। बहुत-से मित्र कहेंगे कि हिन्दुओं के यमलोक का सिद्धान्त क्यों न माना जाय लेकिन याद रहे कि एजेण्ट, पैगम्बर या दूत का मानना परिमित होने के रोग का निदान है, चूंकि परमेश्वर को यह रोग नहीं इसलिये उसके एजेण्ट या कारिन्दा, दूत इत्यादि कोई नहीं है। और न उसके दूत माने जा सकते हैं, क्योंकि जहां परमात्मा स्वयं विद्यमान न हो वहां पर उसके पैगम्बर, एजेण्ट और दूत काम करते हैं। इसलिये ऐसा कहने से सिवाय परमात्मा की अप्रतिष्ठा करने के और कोई लाभ नहीं। बही-खाते का रखना यह भूल के रोग की चिकित्सा है। क्योंकि परमात्मा को भूल का रोग नहीं है इसलिये उसके दरबार में लिखने का कोई काम नहीं। यह केवल सांसारिक राजाओं की जो थोड़े ज्ञान और थोड़ी शक्ति वाले हैं आवश्यकता है। कुछ मित्र यह कहेंगे कि ‘मुनकिर’ ‘नकीर’ के प्रश्नोत्तर को क्यों न मान लिया जाय? प्रथम तो यह वाक्य इस बात से मिथ्या है कि जब जीव शरीर से निकल जाता है तब उसको कबर में गाड़ते हैं। उस समय जो प्रश्न कबर पर किये जावेंगे वे शरीर से होंगे न कि जीव से। दूसरे, प्रश्न वह मनुष्य करता है जिसको उत्तर मिलने से पहले उसका ज्ञान नहीं होता, चूंकि ईश्वर सबका जानने वाला है इसलिये उस पर प्रश्न तथा उत्तर का अभियोग लगाना भी ठीक नहीं। तीसरे कयामत का सिद्धान्त तो सर्वांश में मिथ्या है, क्योंकि प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जीव मर कर कुल एक स्थान पर जाते हैं या अलग-अलग स्थानों पर? यदि कहो कि एक स्थान पर तो भलों को बुरों के साथ में बन्दीगृह में रखना ईश्वर के न्याय पर धब्बा है। यदि कहो कि नेकों को अच्छे स्थान पर भेजा जाता है और बुरों को दूसरे स्थान पर, तो बस समझो कि न्याय यहीं हो चुका, कयामत की आवश्यकता ही नहीं रही। यह सिद्धान्त तो केवल मूर्ख लोगों ने संसारी बादशाहों के बन्दीगृहों और कारागार को देखकर गढ़ लिया है, क्योंकि दुनिया में न्याय तिथि तक अपराधी बन्दीगृह में रहता है और उसके पश्चात् या तो वह छूट जाता है या कारागार में भेजा जाता है। पांचवां झगड़ा यह है कि ईश्वर ने संसार को किस वस्तु से बनाया? कुछ तो यह कहते हैं कि ईश्वर ने संसार को उत्पन्न ही नहीं किया, जैसा कि जैनी और बौद्ध, परन्तु उनका यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि बदलने वाली वस्तु अनादि नहीं हो सकती और यह दुनिया बदलने वाली है, इसलिये यह अनादि तो नहीं हो सकती। अब यवन कहते हैं कि असत् से सत् में आ गये परन्तु उनका यह कहना भी मिथ्या है, क्योंकि अवस्तु से वस्तु की उत्पत्ति या आग से सर्दी की उत्पत्ति मानना बुद्धि और ज्ञान के विरुद्ध है, परन्तु हमारे यवन भाई कहते हैं कि जब ईश्वर ने ‘कुन’ कहा तो दुनिया उत्पन्न हो गई। यहां पर सोचना चाहिए कि ‘कुन’ किसको कहा, क्योंकि ‘कुन’ विधि है और आज्ञा दूसरे पर होती है। जब दूसरा है ही नहीं तो ‘कुन’ कहना नितान्त झूठ हो गया। बहुत से हिन्दू कहते हैं कि अविद्या से जगत् बन गया परन्तु यह सिवाय ईश्वर के किसी दूसरी वस्तु को मानते ही नहीं, अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि तुम्हारी अविद्या कोई वस्तु है या नहीं। यदि कहें कोई वस्तु है तो स्वयं उनका सिद्धान्त मिथ्या हो गया क्योंकि वस्तु नहीं तो अवस्तु से वस्तु की उत्पत्ति हो नहीं सकती। इन सारी अशुद्धियों को देखकर वेद ने उनके दूर करने के लिए उत्तर दिया कि ‘जो एक सूक्ष्म प्रकृति से अर्थात् वस्तुओं के परमाणुओं से बहुत प्रकार की स्थूल वस्तुएं बनाता है।’

छठा झगड़ा संसार में यह पड़ा हुआ है कि जीव और ब्रह्म एक हैं या अलग-अलग? इसका उत्तर दिया गया कि उस आत्मा में रहने वाले को, अर्थात् जीव और ईश्वर का आधार-आधेयभाव सम्बन्ध है, सम्बन्ध सदैव दो में होता है इसलिये जीव और ब्रह्म दो पदार्थ हैं।

सातवां झगड़ा यह था कि पदार्थ अनादि कितने हैं, उत्तर मिला जो उसके भीतर दीखते हैं अर्थात् देखने वाला जीव और देखने की वस्तु प्रकृति और उसके भीतर देखने के योग्य परमात्मा यह तीन पदार्थ ही अनादि हैं।

फिर प्रश्न यह था कि मुक्ति किस प्रकार हो सकती है? उत्तर मिला, जो ईश्वर एक सारे जगत् में व्याप्त रूप सब की आन्तरिक अवस्था को जानने वाला और अपने आप कर्म का फल देने वाला प्रकृति से जगत् का उत्पादक और जीव ब्रह्म का भेद, इन तीन पदार्थों को अनादि मानते हैं उन्हीं की मुक्ति हो सकती है दूसरों की नहीं। प्यारे पाठकगण! हमारे मित्र बहुधा कह उठेंगे कि तुम्हारी मुक्ति उसी तरह की है जिस तरह की ईसाई कहते हैं कि ईसामसीह पर विश्वास लाने से मुक्ति होती है। मुसलमान मुहम्मद के अनुग्रह से मुक्ति मानते हैं, लेकिन उनका यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि यह तो प्रत्येक मनुष्य जानता है कि जिस स्थान पर पुलिस अफसर मौजूद हो वहां पर कोई भी चोरी नहीं करता जबकि उसको विश्वास हो कि मैं घूंस देकर बच नहीं सकता। इसी तरह जो मनुष्य ईश्वर को सब स्थानों में और सब कर्मों का फल देने वाला मानता है वह कहीं भी पाप नहीं कर सकता, फिर उसे कष्ट किस तरह हो सकता है! और जो ईश्वर को परिमित मानते हैं उनके मत में तो ईश्वर का होना न होना बराबर है और प्रकृति से जगत् की उत्पत्ति मानने का तात्पर्य यह है कि जिससे ज्ञात रहे कि इस जगत् में आनन्द नहीं क्योंकि सत् प्रकृति है, सत्चित् जीव अर्थात् आत्मा और सत्चित् आनन्द परमात्मा है। जब प्रकृति सत् ठहरी और जगत् उसका कार्य है तो जगत् से आनन्द की इच्छा करना ठीक नहीं और तीन पदार्थों के नित्य मानने से यह लाभ है कि प्रकृति की उपासना से दुःख होता है और परमात्मा की उपासना से सुख होता है। और जीव, सुख-दुःख और बन्ध-मोक्ष दोनों से भिन्न साक्षीरूप है। और संसार के जितने मत हैं सब में इस बात के अज्ञान से सहस्त्रों त्रुटियां हो गईं कि पाप कौन कराता है, पुण्य कहां से होता है। परन्तु उचित उत्तर नहीं था, वैदिक धर्म ने उसका उत्तर ऐसा दिया कि अब कहने का अवकाश नहीं अर्थात् प्रकृति संसर्ग से मूर्खता और पाप उत्पन्न होता है जिसका फल दुःख है और परमात्मा के संसर्ग से पुण्य उत्पन्न होता है जिसका फल सुख है।

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शिक्षा कैसी होनी चाहिये।

शिक्षा कैसी होनी चाहिये।
प्रत्येक व्यक्ति सुखी रहना चाहता है। मोटे तौर पर हम देखते हैं जो लोग स्कूल कॉलेज आदि में पढ़कर विद्वान बुद्धिमान हो जाते हैं, वे, दूसरे अनपढ़ व्यक्तियों की तुलना में कुछ अधिक आसानी से अपने काम पूरे कर लेते हैं, तथा स्वयं को सुखी मानते हैं।
परंतु वे उतने सुखी तो नहीं होते, जितने कि वे अपने आप को सुखी प्रदर्शित करते हैं। बल्कि अनेक बार तो इस वर्तमान स्कूल कॉलेज की शिक्षा को प्राप्त करके, वे सुखी होने के स्थान पर अपना एवं दूसरों का दुख ही बढ़ाते हैं।
अगर आपने कुछ गहराई से इस विषय में अध्ययन किया हो, तो आप भी इस बात को समझते होंगे, कि आज के तथाकथित प्रगतिशील वातावरण में स्कूल कॉलेज के उच्च शिक्षा प्राप्त लोग, संसार को अधिक दुख देते हैं। जबकि उनकी तुलना में ग्रामीण अंचल के प्रायः अनपढ़ अथवा कम पढ़े लिखे लोग, संसार को उतना दुख नहीं देते।
इससे पता चलता है कि वर्तमान शिक्षा उतनी सार्थक नहीं है, अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पा रही, जैसा कि शिक्षा का उद्देश्य था।
आजकल की शिक्षा में, विद्यार्थी, कुछ वस्तुओं के नाम, नगरों के नाम रट लेता है। कुछ व्यापार करना आदि क्रियाएं भी सीख लेता है। और इसके साथ-साथ धन कमाने के गलत तरीके (झूठ छल कपट चोरी डकैती लूटमार रिश्वतखोरी आदि) भी सीख लेता है, जिससे वह स्वयं तो दुखी होता ही है, बल्कि दूसरों को भी बहुत दुख देता है। झूठ छल कपट चोरी बेईमानी रिश्वतखोरी इत्यादि पाप कर्म करता है। उसमें आस्तिकता लगभग नहीं दिखाई देती , नास्तिकता का ही प्रभाव अधिक दिखता है। जिसके परिणाम स्वरुप चारों ओर दुख ही दुख फैल चुका है।

प्राचीन वैदिक शिक्षा पद्धति से व्यक्ति में सेवा परोपकार ईमानदारी सच्चाई बड़ों का आदर सम्मान सभ्यता ईश्वरभक्ति प्राणियों पर दया इत्यादि उत्तम गुण देखे जाते हैं। इसलिए प्राचीन वैदिक शिक्षा पद्धति ही उत्तम है। वही हमारे जीवन के उद्देश्य को पूर्ण करने वाली है। यहां तक कि वह जन्म मरण से भी छुड़ाकर हमारे अंतिम उद्देश्य = मोक्ष तक पहुंचाने वाली है।
वैदिक शिक्षा हमें सही सोचना सिखाती है, सही बोलना और सही आचरण करना सिखाती है, जिससे हम सब प्रकार से सुखी हो सकते हैं। यही वास्तविक शिक्षा पद्धति है । इसी को अपनाना चाहिए, इसी से जीवन सार्थक होगा। अपना और सबका कल्याण होगा।
यदि संसार के लोग, फिर से वेदो की ओर लौटें, वेदों को पढ़ें, उन पर आचरण करें, वैदिक शिक्षा नीति को संसार में लागू करें, तभी संसार में सुख बढ़ेगा, अन्यथा नहीं।
स्वामी विवेकानंद परिव्राजक

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सेक्युलरिज़्म के नाम पर भारत का विनाश कैसे किया गया?

सेक्युलरिज़्म के नाम पर भारत का विनाश कैसे किया गया? जिस गांधी को इतना महान बताया गया उनकी सच्चाई क्या थी?
सुनिए शंकर शरण जी से।

हमारे देश की पाठ्य-पुस्तकों में जवाहरलाल नेहरू का गुण-गान होते रहना कम्युनिस्ट देशों वाली परंपरा की नकल है। वस्तुतः खुद नेहरू ने जीवन-भर जिन बातों को सब से अधिक दुहराया था, उसमें यह भी एक था – ‘हमें रूस से सीखना चाहिए’। और सचमुच नेहरू और पीछे-पीछे पूरे भारत ने कम्युनिस्ट रूस से अनेकों नारे और हानिकारक चीजें सीखीं।

तब क्या अब कुछ अच्छा नहीं सीखना चाहिए?

जिस तरह रूसियों ने लेनिन-पूजा बंद कर दी, हमें भी नेहरू और गाँधी-पूजा खत्म करनी चाहिए।
रूस और चीन में इस अंध-पूजा के पटाक्षेप के लिए कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं हुई। जनता ने सर्वसम्मति से उस कथित महानता का अध्याय बंद किया। क्योंकि वह पूजा उन पर दशकों तक जबरन थोपी हुई थी। लेनिन, माओ की महानता की गाथाएं सत्ता की ताकत के बल पर गढ़ी और प्रचारित की गई थी। उन के जीवन के हर काले अध्याय पर पर्दा डाल कर रूसी-चीनी जनगण के दिमाग को लेनिन-माओमय बना डाला गया था। इसीलिए, जैसे ही वह जबरदस्ती हटी, लोगों ने वह लज्जास्पद पूजा बंद कर दी। इस पर रूस या चीन में मामूली विवाद तक न हुआ। सहमति इतनी साफ थी। आज रूस और चीन में टॉल्सटॉय और कन्फ्यूशियस ही सर्वोच्च चिंतक माने जाते हैं, लेनिन और माओ नहीं।

अतः इस बिन्दु पर भी नेहरू को लेनिन से तुलनीय बनाने का समय आ गया है। जैसे कम्युनिस्ट पार्टी ने रूस पर लेनिन-पूजा थोपी थी, उसी तरह नेहरू परिवार ने यहाँ नेहरू-गाँधी पूजा थोपी।
उसी तरह, किस तर्क से गाँधी को राष्ट्र-पिता घोषित किया गया? गाँधी-जयंती स्थाई राष्ट्रीय अवकाश घोषित हो गया, जबकि ‘राष्ट्र-पितामह’ स्वामी दयानन्द सरस्वती को वैसा मान नहीं मिला? ऐसी अनगिनत बातें गाँधी-नेहरू को भारतीय मानस पर जबरन थोपे जाने की पुष्टि करती हैं।

यहाँ तक कि नेहरू का व्यक्तिगत जीवन भी अनुकरणीय नहीं था। यह नेहरू के वरिष्ठतम सहयोगियों समेत अनगिनत समकालीनों ने लिखा है। एक विदेशी स्त्री, लेडी माउंटबेटन, के अंतरंग प्रभाव में नेहरू ने देश-विभाजन, कश्मीर की ऐसी-तैसी तथा कम्युनिस्ट षडयंत्रकारियों की मदद की। कश्मीर को विवादित और पाकिस्तान को स्थाई लोलुप बनाने में नेहरू का सब से बड़ा हाथ है। और यह सब उन्होंने अपने गृह मंत्री सरदार पटेल को अँधेरे में रख कर किया था! यह सब कोई आरोप नहीं, जग-जाहिर तथ्य हैं जिन के प्रमाण सर्व-सुलभ हैं।

तब ऐसे ‘प्रथम’ मार्गदर्शक के बारे में हम पाठ्य-पुस्तकों में क्या बताएं? क्या वही झूठ दुहराते रहें जो नेहरूवंशी सत्ता ने जोर-जबरदस्ती और छल-प्रपंच से स्थापित की है? क्या रूसी और चीनी जनता से इस मामले में कुछ न सीखें?
किसी भ्रम में न रहें। नेहरू की विरुदावली और ‘योगदान’ के जितने भी किस्से और तर्क दिए जाते थे, वे ठीक वैसे ही हैं जैसे सोवियत सत्ता के दिनों में लेनिन के पक्ष में मिलते थे। अतः बिना उन गंभीर दोषों के, जो नेहरू में थे, बावजूद हमारी पाठ्य-पुस्तकों में यदि प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद की कोई चर्चा नहीं रहती – तो कोई कारण नहीं कि अनगिन लज्जास्पद कार्यों के बावजूद हम नेहरू पर देश के बच्चों को अनुचित गर्व करना सिखाते रहें।

जयंती, स्मारक, संस्थाओं, योजनाओं के नामकरण, आदि प्रक्रियाओं में गाँधी-नेहरू की अंध-पूजा किस सिद्धांत के तहत होती रही है? दूसरी ओर, पतंजलि, पाणिनि, चाणक्य, जैसे शाश्वत मूल्य के अनगिन मनीषी ही नहीं; स्वामी दयानन्द, बंकिमचन्द्र, श्रद्धानंद, श्रीअरविन्द, जगदीशचंद्र बोस, जदुनाथ सरकार, मेजर ध्यानचंद, आदि भारत के समकालीन सच्चे महापुरुषों को कितना सरकारी-राष्ट्रीय आदर मिला है? यहाँ लगभग अशिक्षित नेताओं के नाम पर बीसियों विश्वविद्यालय खोले गए हैं, और महान इतिहासकार जदुनाथ सरकार या महाकवि निराला के नाम पर एक भी नहीं! इस का लज्जास्पद तर्क केवल सोवियत व्यवस्था से मिलता है। जहाँ पूरी शिक्षा को लेनिन-स्तालिनमय कर दी गई थी, जबकि दॉस्ताएवस्की, सोल्झेनित्सिन जैसे मनीषी पुस्तकालयों तक से बहिष्कृत थे।

हमें अपने देश के मनीषियों, महापुरुषों की पहचान, सम्मान और सीखने का सच्चा मानदंड बनाना होगा। नहीं तो विश्व-मंच पर हमारी वही निस्तेज, बुद्धि-हीन छवि बनी रहेगी जो नेहरू ने बनाई थी।

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एक पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश जो बदल देगी जीवन!

📕 एक पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश जो बदल देगी जीवन!

1. देश के लिए बलिदान होने वाला पहला क्रांतिकारी मंगल पांडे स्वामी दयानंद का शिष्य था। मंगल पांडे को चर्बी वाले कारतूस प्रयोग करने के कारण पानी न पिलाने वाले स्वामी दयानंद ही थे। प्रमाण: महान स्वतंत्रता सेनानी आचार्य दीपांकर की पुस्तक पढे: 1857 की क्रांति और मेरठ

2. सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी खुदीराम बोस ने मरने से पहले गीता और सत्यार्थ प्रकाश के दर्शन किए, जब जेलर ने पूछा इन किताब में क्या है, उसने बताया, गीता मुझे दोबारा जन्म लेने की प्रेरणा देती है और सत्यार्थ प्रकाश स्वदेशी राज्य की प्राप्ति का मार्ग सुझाती है। इसलिए मैं जन्म लेकर दोबारा आउंगा और आजादी प्राप्त करूंगा।
प्रमाण: खुदीराम की जीवनी तेजपाल आर्य की लिखी पढ़े।
और देश के सबसे वृद्ध क्रांतिकारी लाला लाजपत राय पर जब लाठियां बरस रही थी, उनके हाथ में तब भी सत्यार्थ प्रकाश था।

3. पं. मदनमोहन मालवीय जी ने आर्यसमाज का यहां तक विरोध किया कि सनातन धर्म सभा तक बना डाली, लेकिन जब मरने लगे तो काशी के सब पंडित उनके दर्शन करने आए और बोले, महामना जी हमारा मार्गदर्शन अब कौन करेगा? तो मदनमोहन मालवीय जी ने उन्हें सत्यार्थप्रकाश देते हुए कहा, ‘‘सत्यार्थ प्रकाश आपका मार्गदर्शन करेगा।’’
प्रमाण: घोर पौराणिक लेखक अवधेश जी की पुस्तक महामना मालवीय पढ़े, जो हिन्द पॉकेट बुक्स से छपी है।

4. सत्यार्थप्रकाश पढकर एक तांगा चलाने वाला दुनिया में मशालों का शहंशाह बन गया: एमडीएच मशाले और सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर एक पिंक्चर लगानेवाला हीरो ग्रुप का अध्यक्ष बन गया: ओमप्रकाश मूंजाल।
5 सत्यार्थप्रकाश पढ़कर ही एक पौराणिक साधु आत्मप्रकाश आर्य समाज के प्रसिद्ध भजनोपदेश स्वामी भीष्म बने जिन्होंने 95 वर्ष तक आर्य समाज का प्रचार किया और 85 भजनोपदेशक व उपदेशक तैयार कर वैदिक धर्म के प्रचार में लगाए।

6. सत्यार्थ प्रकाश पढकर होमी भाभा ने भारत में परमाणु युग की शुरूआत की और डॉक्टर कलाम ने गीता के साथ-साथ सत्यार्थप्रकाश भी अनेक बार पढा है।
गॉड पार्टिकल और हिग्स बोसोन की खोज के कारण जिन विदेशियों को नोबेल पुरस्कार मिला, जानते हो मेरे पास 1966 की एक हिन्दी पत्रिका नवनीत है, उसमें ये सिद्धांत तब के ही लिखे हैं और वह लेख लिखा हुआ है सत्येंद्रनाथ बोस का, जो आर्य समाज के सदस्य थे और वैज्ञानिक भी, अब इतने दिन बाद पुरस्कार कोई और ले गया। चलो फिर भी विज्ञान में न सही अभी समाज सेवा में कैलासजी को नोबेल मिला, वे भी सत्यार्थ प्रकाश पढने वाले ही हैं और जनज्ञान प्रकाशन की पंडिता राकेश रानी के दामाद हैं। जनज्ञान प्रकाशन ने कभी सबसे सस्ते वेद प्रकाशित किए थे।

7. सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर फीजी, गुयाना, मोरीशस में कई व्यक्ति राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बन गए।

8. सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने वाले लाल बहादुर शास्त्री और चौधरी चरण सिंह देश के सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री कहलाए। चरणसिंह की राजनीति कैसी भी रही हो, लेकिन जमींदारी उन्मूलन के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। नेहरूजी सहकारिता के नाम पर हिन्दुस्तान की सारी जमीन रूस को देने वाले थे, ऐसे ही जैसे उन्होंने आजाद भारत में माउंटबेटन को गवर्नर बना दिया। यदि सत्यार्थप्रकाश पढने वाले चरणसिंह न होते तो आज हमारे किसानो के आका रूस के लोग होते और देश रूस का गुलाम होता।
प्रमाण: कमलेश्वर की इंदिरा की जीवनी अंतिम सफर (संपूर्ण मूल संस्करण, क्योंकि यह संक्षिप्त भी है) पुस्तक पढे, कमलेश्वर इंदिरा जी के चहेते थेे, उनकी मौत पर दूरदर्शन से कमेंटरी उन्होंने ही की थी।

9. सत्यार्थप्रकाश जिसने भी पढा, वह शेर बन गया, रामप्रसाद बिस्लिम, श्याम कृष्णवर्मा, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, डॉक्टर हेडेगेवार के पिताश्री बलिराम पंत हेडगेवार जो आर्य समाज के पुरोहित थे आदि और आज के युग में भी शेर ही होते हैं। सुनो कहानी: सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर साहित्यकार तेजपाल सिंह धामा ने भारत माता का नग्न चित्र बनानेवाले एमएफ हुसैन को 15 वर्ष पहले हैदराबाद में पत्रकार सम्मेलन में सबके सामने जोरदार चांटा जडा, अपमानित होकर बेचारे हुसैन देश ही छोड गए और हैदराबाद जैसे मुस्लिम शहर में रंगीला रसूल का पुनः प्रकाशन भी किया और सौ से अधिक पुस्तके आर्य समाज से संबंधित लिखी।
10. सत्यार्थ प्रकाश पर 2008 में प्रतिबंध के लिए जब भारत भर के मुल्ला-मौलवी एकत्र हुए और अदालत में पहुंचे तो फैसला सुनाने वाले जज ने न केवल सत्यार्थ प्रकाश के पक्ष में फैसला दिया वरन स्वयं आर्य समाजी हो गया और मुसलमानो का एक मुस्लिम वकील भी आर्य समाजी बन गया, बेचारे ने भूल से सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन किया था ताकि गलत तथ्य निकाल सके। आर्यसमाज की ओर से यह मुकदमा विमल वधावनजी ने लडा था, विमलजी भी सत्यार्थ प्रकाश पढनेवाले ही हैं।

11. सत्यार्थप्रकाश पढकर ही मुंशी प्रेमचंद भारत के सबसे लोकप्रिय लेखक बने, उनकी धर्मपत्नी ने ही ऐसा लिखा है।

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