विवाह संस्कार

विवाह संस्कार

डा. अशोक आर्य 

         वैदिक संस्कृति विश्व की महानतम संस्कृति का गौरव प्राप्त कर रही है। इस के समतुल्य कोई अन्य संस्कृति नहीं हैक्षेत्र में वसू ब्रह्मचारी निम्नतम माना गया है। इसे भी का बाइस वर्ष की आयु तक शिक्षार्थ गुरुकुल मे रहना आवश्यक था। ली पश्चात् वह गुरुकुल से वापिस आ करचोबीस वर्ष की आय पर्णा के पश्चात् ही उसका विवाह होता था अतः हमारी संस्कृति में अथवा किशोर विवाह का तो प्रश्न ही नहीं था । जो रुद्र शिक्षा पाने का अभिल षी होता था, वह ३६ वर्ष के बाद तथा इससे भी आगे पढने वाला आदित्य कहलाता था । ऐसा व्यक्ति ४८ वर्ष की आयु में विवाह करता था। इस सब से स्पष्ट पता चलता है कि बाल, किशोर विवाह जैसे विवाह तो उस युग में सोचे भी नहीं जा सकते थे।

      _. आज भारत में आठ प्रकार के विवाह हो रहे हैं यथा बाल विवाह अर्थात् अल्पायु में किया गया विवाह,देव विवाह विशाल यज्ञों के अवसर पर होने वाले विवाह इस श्रेणी में आते हैं । इस में बाहय दिखावा अधिक होता था। आर्ष विवाह में कन्या का पिता एक गाय आदि लेकर कन्या दान करता था, प्राजापात्य विवाह में कोई दिखावा न करते हुए केवल प्रजाति वृद्धि के लिए ही विवाह होता था।, आसुर विवाह में कन्या के पिता को धन देकर विवाह किया जाता है। गन्धर्व विवाह में बिना विवाह परस्पर इच्छा पूर्वक संयोग ही इस श्रेणी में आता है। , राक्षस विवाह किसी से जबरदस्ती कर उठा लाना तथा अपने घर में रख लेना इस प्रकार का विवाह है और पैशाच विवाह में सोती या नशे में धुत हो किसी कन्या को कलंकित करना ही पैशाचता है।

      वैदिक संस्कृति की श्रेष्ठता इसी बात में है कि विवाह एक धार्मिक संस्कार मानती है, जो जीवन में एक ही बार होता हैएक बार हो गया तो आजीवन रहेगा, कभी टूटेगा नहीं। इसका मुख्य उद्देश्य पितृ ऋण के भार से मुक्त होना है। माता पिता ने हमें जन्म दे कर व हमारा पालन कर एक प्रकार से हमें उधार के नीचे दबा दिया । इसे हम आगे सन्तान बढाकर ही चुका सकते हैं, जिसके लिए विवाह आवश्यक है। वैदिक विवाह एक धार्मिक विधि होने के कारण इस में किए जाने वाली विधियों से हमारी धार्मिक नीवं दृढ से भी दृढतर होती चली जाती हैजो भी आगन्तुक हमारे घर आवे, उसका यथोचित सत्कार हो, इस परम्परानुसार घर आए वर का स्वागत स्नानादि करवा आसन देकर, पैर धोकर, हाथ मुंह धुला कर, आचमन व मधुपर्क देकर किया जाता है। इस अवसर पर वर को गोदान दिया जाता है ताकि भावी सन्तान पुष्ट हो । इसके पश्चात् वर के दाएं हाथ में कन्या के माता पिता कन्या का दायां हाथ रखते हुए कन्या दान करते हैं |

      Sihl अब वर भी वधु का सत्कार करते हुए उसे वस्त्राभूषण आदि देता है। भाव यह है कि जिस प्रकार की वस्तुएं कन्या को उपहार में दी गई हैं, वह भी ससुराल में जाकर ऐसी वस्तुएं तैयार करे। इतना होने पर यज्ञ किया जाता है। इसी यज्ञ के समक्ष ही शेष क्रियाएं की जाती है। वसर पर की जाने वाली प्रथम विधि पाणि ग्रहण है। वर बैठी हाथ अपने हाथ में लेता हैहुई वधु के सामने खडा हो झुककर उसका हाथ तथा कहता है कि तेरे सौभाग्य के लिए तेरा हाथ लेता हू, यह मैं नहीं मानो संसार का उत्पादन करने वाली सविता ने तेरा हाथ पकडा है त मेरी धर्म की पत्नी है, मै तेरा पति हूं। तेरा पोषण करना मेरा धर्म है। हमारे साथ सन्तान की उत्पति करते हुए सौ वर्ष तक जीवन व्यतीत कर । पुनः वधू का हाथ पकड क्र अग्नि की प्रदक्षिणा करते हुए सौ वर्ष का का मनस्वी जीवन बिताने वाली हृष्ट पुष्ट सन्तान पैदा करने का संकल्प लेते हैं व पत्थर समान मजबूत रहने की प्रेरणा दी जाती है।

      लाजा होम जिसे फेरेभी कहते हैं, विवाह संस्कारकी एक महत्वपूर्ण किया हैलाजाहोम करते हुए वधु परमात्मा से प्रार्थना करती है कि प्रभु उसे पति कुल से कभी अलग न करे , पति की लम्बी आयु व समृद्ध परिवार की कामना करती है। परस्पर अनुराग व प्रभु के सहायी होने की कामना करती है। इन्हीं भावनाओं के साथ चार फेरे लेते हैंकेवल चोथे फेरे में वधु आगे होती है, शेष तीनो में वर। यह सब समाज के सम्मुख आने के लिए होता है। एक प्रकार की समाज के सामने गवाही होती है। यही रीत्यानुरूप विवाह की स्वीकृति मानी जाती है।

      विवाह संकार में सप्तपदी का भी फेरों के समान ही महत्व हैइसमें पति पत्नी विविध प्रतिज्ञाएं करते हैं यह प्रतिज्ञाएं सखी पारिवारिक जीवन के लिए होती हैं । तदन्तर जीवन पर्यन्त सूर्य से अपनी देखरेख की प्रार्थना की जाती है तथा यह भी प्रार्थना की जाती हैकि हमें सौ वर्षीय आयु प्राप्त हो तथा जीवन पर्यन्त सभी इन्द्रियां ठीक से काम करती रहें। हृदय स्पर्श से भी दोनों एक दूसरे पर आश्रित होते हए एक दूसरे के समीप आते हैं तथा जन समुदाय को भी वधू के दर्शन कराए जाते हैं । ध्रुव व अरुन्धती दर्शन से भी पारिवारिक जीवन मखमय व स्थिर बनाने का निर्णय लिया जाता है

      कहा वादेक विवाह में वास्तव में प्राचीन परम्परा स्वयंवर की रही है। इसका सबसे पुष्ट कारण यह रहा होगा कि इस के होने से आज के प्रेम विवाह की अवस्था से बचा जा सकता है। हमारे आचार्यों ने तो हा है कि विवाह से पूर्व स्त्री पुरुष एक दूसरे को देखे भी नहीं। इसका MAविशेष प्रयोजन यही रहा होगा कि विवाह तक पवित्रता बनी रहेदिक संस्कृति विवाह को एक आवश्यक धार्मिक कर्तव्य मानती है। आज कपेम विवाह में भावना की प्रधानता रहती है। वैदिक संस्कृति कहती है के विवाह के पश्चात् ही प्रेम का आरम्भ होता है, जो जीवन भर चलता । पश्चिम संस्कृति इससे उलट करते हुए पहले प्रेम तथा फिर विवाह मकरने के कारण , उनमें विवाह के पश्चात् साधारणतया कलह का जन्म होता है जो तलाक के रूप में अन्त को प्राप्त होता है। अतः वैदिक केव विवाह ही जीवन का सुखमय बनाने की सीढी है । इस का आदर्श जब्रह्मचर्य से जीवन को तपा कर तथा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् वाही विवाह की स्वीकृति होती थी। जब इस प्रकार सुशिक्षित होने पर स्वयंवर से विवाह किया जाता था तो जीवन पर्यन्त न केवल पति पत्नी मैत्री भाव से रहते हुए सुखी होते थे अपितु अपने परिजनों व समाज में भी सुख बांटते रहते थे। उत्तम सन्तान की उत्पत्ति इसी सखा भाव का ही परिणाम होता था। वैदिक संस्कृति में संतति सुधार के जो उपाय दिये ए हैं, वह भी अपने आप में कीर्ति स्थापित करते हैं, उनका अवलम्बन ही तो सन्तान को ऊपर उठाने वाला होता है |

      वैदिक गृहस्थ में स्त्री की स्थिति सदा ही विशेष आदर वाली रही ।इसे घरकी सम्राज्ञी अथवा रानी कहा गया है। वह घर की समाज्ञा कारण सभी प्रकारकी देख रेख व क्रिया व्यवहार उसी के ही कन्धे पर आता है। वह अपनी चतुराई व योग्यता से परिवार को सुखी व खर्गिक बनाती है। वैदिक विवाह वास्तव में अमृत प्राप्त करने के समान हैपति के साथ ब्रह्म का निवास होता है। यह उसके प्रयत्नों का ही परिणाम होता है। इस प्रकार पति पत्नी बडप्पन को प्राप्त करते हैं। अब परार्थ ही उनका मुख्य कर्तव्य बन जाता है। तब ही तो कहा गया है। कि यह तो गृहस्थ ही है जिस पर मानव जीवन के सभी आश्रम टिके हुए हैं तभी तो वह गृहस्थ की आयु पूरी कर वन निवास करते थे | 

      5 वैदिक संस्कृति में सफल गृहरथी उसी को माना गया है जो एक निश्चित आयु के पश्चात् इसे त्याग कर जन कल्याण की भावना को सम्मुख रखते हुए अपने परिवार की सभी व्यवस्था अपने बच्चों कन्धों पर डाल कर अपने शरीर को पुनः तपा कर समाज सेवा के लिए तैयार करने के लिए एक बार फिर जंगलों में आवास कर तथा धर्म ग्रन्थों यथा वेद ,उपनि पदों आदि का पुनः अध्ययन करते हुए अपने आपको संन्यास के लिए तैयार करे। ताकि वह स्थान स्थान पर धूमते हुए जन कल्याण करते हुए खय भी ब्रह्म में विचरण करे। संसार में जहां एकता जीवन है तो भिन्नता या अनेकता मृत्यु का मार्ग है। वैदिक संरकति गृहरथ के माध्यम से अनेकता को समाप्त कर स्थापित करने की प्रेरणा देती हैयह हमें एकता की और ले जीवन के उच्च आदर्शों को प्राप्त कराने का मार्ग खोलती है। ताकी और ले जाते हुएमार्गखोलती है। समरस्ता की और जाने के रास्ते बताती है। इसी का नाम की का नाम वैदिक नाम वैदिक संकृति संकृति ने विवाह का आदर्श कहा हैयदि इसे पाने का प्रयास किया जावेगा तो वैदिक विवाह का आदर्श पाने में निश्चित ही सफलता मिलेगी।

वानप्रस्थ संस्कार

वानप्रस्थ संस्कार

डा. अशोक आर्य 

        मानव जीवन भोग और वासना का मिला जुला स्वरूप हैइशोपनिषद् के प्रथम मन्त्र “ईशावास्यं इदं सर्वं…” ने भी इसी और इंगित करते हुए कहा है कि परम पिता परमात्मा ने इस संसार में बहुत कुछ भोग के लिए बनाया हैहे मानव ! तूं इन पर आसक्ति मत कर। इसे त्याग पूर्वक भोग । यह तेरा नहीं है यह सब परमपिता परमात्मा का है। जितना भोग , उतना ही विश्व का कल्याण भी कर। इसी उद्देश्य को सामने रखते हुए ही गृहस्थ के पश्चात् ऋषियों ने वानप्रस्थाश्रम की व्यवस्था की हैगृहस्थ में जो कुछ भोग किया, वासनाएं कीं , उससे शरीर में शिथिलता आ गई। अब यह शरीर इतना बलहीन हो गया है कि जो कुछ ब्रह्मचर्य में अर्जित किया था, वह सब कुछ खो चुका है। अब शक्ति का कोष रिक्त है। इसलिए, इस खजाने को पुनः भरने की आवश्यकता है। यदि खाली खजाने को भरने का प्रयास न किया गया तो शेष जीवन का निर्वाह कैसे हो सकेगा ? अतः गृहस्थ से शक्ति का जो खजाना समाप्त हो चुका है,उसे पुनः अर्जित करने के प्रयास का नाम ही वानप्रस्थ है।

      वानप्रस्थाश्रम माया मोह को त्यागने का अवसर चुके शरीरको पुनः तपा करकुन्दन बनाने का अवसर है, यह अपने आप को पुनः समाज की सेवा के लिए तैयार करने का अवसर आश्रम का अभिप्राय हमारे एक निश्चित उद्देश्य,पडाव अथवा जीवन यात्रा के एक पडाव के रूप में लिया जा सकता हैहम जीवन में एक पडाव पार कर दूसरेव फिर तीसरे पडाव में डेरा डालते हुए निरन्तर आगे बढते चले जाते हैं,किन्तु आज मोह माया के बन्धन जटिल हो गए हैं। इसी कारण हम गृहस्थ रूपी पडाव को छोड़ने को तैयार ही नहीं हो रहे। विश्व की किसी भी धर्मशाला या होटल में दो चार दिन से अधिक रुकने की आज्ञा नहीं है तो फिर गृहस्थ रुपी सराय को एक दिन तो छोडना ही होगा यदि हम इसे हंसते हुए छोड कर वानप्रस्थ हो जावें तो उत्तम है, अन्यथा प्रभु स्वयं हमें धकेल कर यहां से निकाल देगा। यदि हम मान सम्मान से चल दें तो अच्छा अन्यथा आज हो क्या रहा है । घरों में बडे बूढों का अपमान हो रहा है। माता पिता दुःखी कहते हैं हमें उचित सम्मान नहीं मिल रहा सरकार इसी कारण वृद्धाश्रम बना रही है। यहां भी उन्हें आराम नहीं है। हमारे पूर्वजों ने इसी झमेले से बचने के लिए वानप्रस्थाश्रम की व्यवस्था की थी। हो थान पर इसे त्यागने की प्रवृति को पुनः लाना होगा। यदि केराजनेता भी समझें तो एक निश्चित आयु के मोट करदेश के युवको को यह राष्ट्रीय सम्पत्ति मी खींच तान न आने पावेगी, जो वर्ष इसी व्यवस्था को आज के राजनेता भी समोर पश्चात् राज सुख को छोड कर देश के या सौप देवे तो राज सत्ता में ऐसी खींच तान २००७ में हुए राष्ट्रपति के चुनाव में आई है। हम ऐ ही क्यो दे कि हमारी सन्तान हमे घसीट करन .. सब सम्बन्धों को तोड कर संसार से सम्बन्धी आई है। हम ऐसी अवस्था आने कर बाहर फेंके । यह आश्रम अजोडता है। इतने विशाल की तो कहते हैं कि यह मेरा संसारको हमारा परिवार बना देता है। तभी तो नहीं। यही हमारे इस आश्रम का लक्ष्य है |

      पाचीन काल में तो पचास साठ वर्ष की आयु में कोई भी अपने ही में नहीं रहता था इस आयु के होते ही, अपने सभी अधिकार अपनी सुयोग्य सन्तान को सौपकर परिवार का त्याग कर जंगलों में जाकर तप से अपने को तपा कर पुनः कुन्दन बना कर संन्यास आश्रम की तैयारी करता था ताकि उस के संकटों का बखूबी सामना कर सके। अब वहां भोग छोड कर त्याग को अपनाता था ताकि दूसरों को भी निवृति मार्ग का सफलता पूर्वक उपदेश दे सकें |

      हमारे देश की इसी प्राचीन प्रणाली का ही परिणाम था कि यहां उच्चतम शिक्षा भी निशुल्क दी जाती थी। सभी उच्च शिक्षित होते थे तथा इस का ही परिणाम था कि भारत को विश्वगुरु माना जाने लगा था । विश्व के सभी देशों के लोग यहां शिक्षा पाने आते थे। हम विश्व भर में आध्यात्मिकता ही नहीं प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी थेप्राचीन काल से ही गृहस्थ सभी आश्रमों का पालक रहा है। सभी आश्रमों का भरण पोषण गृहस्थ ही करते थे। अन्य किसी भी आश्रम में किसी को भी कोई व्यवसाय करने का अधिकार नहीं थागृहस्थ पलकें बिछाए अतिथि की प्रतिक्षा किया करते थे। अतिथि सत्कार उनका परम धर्म था। वानप्रस्थ लेने के पश्चात् जब तपस्वी का जीवन व्यतीत किया जाता था तो यह गृहस्थी ही थे जो उनके जीवन यापन की प्रसन्नता से व्यवस्था करते थे । यदि ऐसा न होता तो कोई वानप्रस्थ में क्योंकरजाता। वानप्रस्थाश्रम में न जाने से सारा बोझ व्यवसायों व सरकारपरपडता तथा किसी भी नए व्यक्ति को कोई भी व्यवसाय करने का अवसर ही न मिलता | पुराना व्यक्तिस्थान छोडे तो ही नया व्यक्ति उसके व्यवसाय को सम्भाल सके (संसार में अभाव का कारण आज इसी आश्रम व्यवस्था टूटना ही तो है) जीवन में यथेष्ट कमाने के पश्चात् ही वानप्रस्थान मिलता था । अब तो वह अपने जीवन के अनुभव बाटकर संसार कल्याण करता था तथा संसार उसके भरण पोषण की व्यवस्था था। इस से ही उसे आत्म तत्त्व मिलता था। 

      इस आश्रम में आने से जहां भोगवाद की समाप्ति के साथ ही साथ नए लोगों को व्यवसाय मिलने से बेकारी दूर होती थी, वहां जो क छ उन्होंने जीवन में सीखा होता था, उसे अब संसार के नवयुवकों में बांटने का काम करने लगते थे। आज की रिटायारमैंट इस का ही एक रूप कुछ सीमा तक कहा जा सकता है। इस आश्रम में आने पर जंगल वाशी होते हुए तप पूर्वक अपने शरीर में शक्ति संचय करते थे। इनके आश्रम गुरुकुल का रूप ले लेते थे। योग्य शिष्य आकर यहां से शिक्षा पाते थे। जिन के बच्चे यहां शिक्षा पाते थे, वह तो यहां सहायता करते ही थे, जिस से जीवन की अनेक आवश्यकताओं को पूरा किया जाता था किन्तु भोजन की आवश्यकता भिक्षा से ही पूरी की जाती थी। इससे नम्रता की शिक्षा भी मिलती थी । इन स्थानों पर सब को बिना किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा दी जाती थी , सभी को आश्रम का कार्य भी समान रूप से ही करना होता था तथा सभी को समान रूप से ही भिक्षा के लिए जाना होता थायहां कोई बडे छोटे, ऊंच नीच व राजा रंक का भेदभाव नहीं था । किसी से कोई शुल्क आदि नहीं लिया जाता था। यही कारण था कि उस युग में राजा की और से शिक्षा पर कुछ भी व्यय करने की आवश्यकता नहीं थी तथा समाज के सभी लोग समान रूप से शिक्षा प्राप्त करते थे तथा कोई भी अशिक्षित न था। अत: इय परम्परा को आज पुनः लाने की महती आवश्यक्ता है।

अन्त्येष्टी संस्कार 

अन्त्येष्टी संस्कार 

डा. अशोक आर्य

      भारत में प्राचीन काल से ही अन्त्येष्टी क्रिया को एक रूप में किया जाता है, जिसकी एक निश्चित विधि भी की संसार में अन्तिम संस्कार की प्रायः चार विधियां प्रचलित लोग मृतक शरीर को भूमि में गाडते हैं , कुछ इसे नदी में हैं, कुछ इसे खुली हवा में रख देते हैं ताकि पक्षी अथवा जीवन खा कर अपनी क्षुधा की तृप्ति कर लेवें तथा कुछ ऐसे भी समह १ जो मृतक शरीर को जला कर राख में बदल देते हैं। इन चारों विपिन पर विचार करने पर जो विधि उत्तम दिखाई देती है, वह है जला वाली विधि । हमारे ऋषियों ने जो कुछ भी किया अथवा जो कुछ भी करने का आदेश दिया, वह सदैव विज्ञान सम्मत होता था। वैदिक,भारतीय पद्धति में मृतक शरीर को जलाने के आदेश दिये, इसके पीछे भी विज्ञान ही काम करता है। आओ हम इस पर कुछ विचार करें :-

 जल में बहाना :-

       संसार की कुछ जातियां मृतक शरीर को पानी में बहाने की परम्परा को अपनाए हुए हैं। उनका कहना है कि इससे जलीय जीव अपने उदर की पूर्ति कर पावेंगे। जब हम इस पर विचार करते हैंइसके कई दोष हमें दिखाई देते हैं । यथा इससे पानी दूषित हो जावेगा। इसे जल के जीवों के खाने पर बहुत से टुकडे पानी में मिल जाने से यदि मृतक शरीर किसी भयंकर व्याधि से पीडित था तो वह व्याधि भी इस पानी का प्रयोग करने वाले तक पहुंच जावेगी। शरीरको खाने के पश्चात् जो हड्डियों पर कुछ मांस के टुकडे रह जावें गे तो वह भी व्याधि फैलाने का कारण बने गे। इस कारण अन्तिम संस्कार की यह क्रिया उत्तम नहीं है। 

 वायु में रखना :-

        जो लोग पक्षियों के भोजन के लिए मृतक के शरीर को वायु में रख देते हैं, उनमें भी वही दोष होता है। व्याधि फैलती है, सडांद आती है तथा मांस युक्त हड्डियां इधर उधर फैल जाती हैं | 

भूमि में गाडना :-

       भूमि में गडे शरीर को भी पशु जमीन से निकाल लेते हैं तथा मृतक शरीर को बैंचते हुए उस के शरीर के टुकड़े इधर उधर बिखेरते रहते हैं। इस प्रकार उापर्युक्त हानियां तो होती ही हैंइन के अतिरिक्त एक अन्य भयंकर हानि मृतक को गाडने की यह है कि प्रथम तो गाडने से भूमि नष्ट होती है। जहां शरीरको गाडा गया है, वहां की भूमि का कोई अन्य प्रयोग नहीं रह जाता, जिससे भूमि की कमी आ जाती है। दूसरे कुछ गन्दी प्रकार के कलुषित लोग गाडे गए शरीर को निकाल कर उसके साथ कुचेष्टाएं करते भी देखे गए हैं,जो अत्यन्त घृणित कार्य है। 

      अतः मृतक शरीर को गाडना न केवल व्याधि का कारण है पतु नैतिकता के पतन व भूमि के नाश का भी कारण भी है। 

 मम्मियों में सस्रक्षित रखना :-

        मिश्र आदि में मृतक शरीर की मम्मी बना क्छ सुरक्षित रखने की परम्परा रही है। इसके साथ बहुत सा सामान भी रखा जाता था, जिसे चुराने के लिए लुटेरे लोग कबरों तथा मम्मियों को तोडते भी देखे गए हैं। उनका मानना रहा है कि मृतक का सम्बन्ध इस संसार से समाप्त नहीं होता । इस कारण उस का शरीर सुरक्षित रखा जाना चाहिये। इन्हें पिरामिडों में औषधियों के साथ रखा जाता था। इनकी पत्नियां , नौकर चाकर व आवश्यक सामान भी साथ में दफना दिया जाता था। यह सब भी बेकार ही है | 

      मृतक दाह : भारतीय वैदिक परम्परा मृतक शरीर का दाह संस्कार करना या जलाना ही विश्व में मृतक का सर्वोत्तम संस्कार हैइससे न तो जल दूषित होता है, न वायु तथा न ही भूमि ही दूषित होती है। मात्र छ : फुट के स्थान पर चाहे सारे संसार का दाह संस्कार कर दो। इस से नैतिकता का पतन भी नहीं होता। मृतक के शरीर में यदि कोई रोग रहा होगा तो वह भी जल जावेगा तथा वायु मण्डल साफ हो जावेगा। 

        विश्व में अन्तिम संस्करका यह वैदिक विधान ही सर्वोत्तम है । जिन पंचतत्त्वों से शरीर का निर्माण हुआ है , मृत्यु के पश्चात् उन्हीं पंचतत्त्वों में मानव विलीन हो जाता है। आज विश्व के अनेक देशों ने विधि से इस परम्परा का अनुकरण करने का प्रयास किया है। यरोप व अमरीका में इस हेतू विधि भी बने। रोम के आधिपत्य काल में वहां मदों को जलाया जाता था। उन्हीं को देख कर वहां विचार उठा । यह परम्परा उन्हें ग्रीस से मि परम्परा उन्हें ग्रीस से मिली थी, जो भारत से सावित रहा था। ईसाईयत के प्रचारने मृतक शरीर को जलाने पर लगाई। अब तो चीन जैसे देश भी हाह विधि अपना रहे हैं । शव से प्रभावित होकर इंग्लैंड में शवदाह सोसायटी बनी। गर थाम्परान डरा हेत एक पुस्तक भी लिखी। तात्कालीन इंग्लैंड के विचारकों ने पर थाम्पसनके विचारों को समर्थन किया। यहा १३ जनवरी १८७८ किमेशन सोसायटी आफ इंग्लैंड की स्थापना हुई। इस संस्था के प्रयास से १८७८ के लगभग सरे नामक स्थान पर प्रथम शव दाह ग्रह स्थापित किया गया। १८८३ में वहां इसे वैधानिक स्वीकृति मिली१९०२ में वहां एतदर्थ विधेयक भी पास किया गया। आज वहां दो सौ से भी अधिक मृतक दाह गृह हैं। इसी प्रकार कन्टेनेवियन देशों ,न्यूजीलैण्ड ,आस्ट्रेलिया में भी ऐसे विधि बने । अमेरिका में भी १८७६ से शव दाह आरम्भ हुआ। यहां भी आज तीन सौ से अधिक शव दाह केन्द्र हैं। इतना ही नहीं यूरोप व अमेरिका के प्रायः सभी देशों में शवदाह संस्थाएं बन गई हैं। इन्हों ने अन्तर्राष्ट्रीय शवदाह संगठन भी बना लिया। जिस का लंदन मुख्यालय बना। इनकी शवदाह को प्रोत्साहन देने के लिए त्रैवार्षिक कान्फेंस भी होती है। इससे स्पष्ट है कि विश्व में भारतीय वैदिक शव दाह प्रथा को अपनाने की होड़ सी लग गई है। यही इसकी श्रेष्ठता का परिचायक है। इसका मुख्य कारण तो भूमि की बचत है ही। साथ ही अन्य भी कुछ कारण इस प्रकार हैं:

      मृतक के रोगों से वाय मण्डल दूषित नहीं होता, निकट से निकलने वाले जल में भी दोष नहीं आता , अब शरीरको पशु उखाड नहा पाते। इससे रोगाणु फैलने का भय समाप्त हो जाता है । कफन स बचा जा सकता है तथा अनाचारकी घटनाएं नहीं हो सकती।, मात्रा में भूमि की बचत होती है, जिसे विकास के अन्य कार्यों में उपयोग में लाया जा सकता है। इससे कब्र पूजा खयमेव ही समाप्त हो जाती है। इस से कमाई खाने वाले अब समाज के उत्थान में लगेंगेअनेक पाखण्डों की समाप्ति होती है। इन कबरों तक आने जाने वार चढावा चढाने से होने वाले व्यय की बचत होती है, जिससे विकास अन्य विकास कार्यों के लिए संसाधन सभव हो पाते हैं । हमारे यहां ही नहीं विश्व में अरबों रुपए के व्यय से सहस्रों मकबरे बने हैं। यदि मुर्दा जलाने की प्रथा को अपनाया जावे तो इन मकबरों पर होने वाले व्ययार को बचाकर इसे राष्ट्रोत्थान के कार्यों पर व्यय किया जा सकेगा। अनेक लोग तो कबरों से मुर्दे निकाल कर उनसे कुकर्म करते हैं तथा अनेकालोग इन कबरों के एकान्त में इन पर बैठ कर जुआ खेलने व शराबपीने जैसे भद्दे काम भी करते हैं। ऐसे लोगों से भी कुछ तो छुटकारा पाया ही जा सकेगा। 

      अतः मानवीय स्वास्थ्य की रक्षा के साथ ही साथ भूमि की कमी को दूर करने व विपुल धन सम्पत्ति को मुर्दे को मात्र जलाने से ही बचाया जा सकता है। संस्कृत में तो मृत्यु के लिए कहा भी गया है कि पञ्चतत्व में विलीन हो गया। इस का भाव है कि यह शरीर पृथ्वी , वायु, जल, अग्नि तथा आकाश के मेल से बना है। मृत्यु के पश्चात् इसे जितनी शीघ्रता से इन्हीं पांचों तत्वों के रूप में बदला जा सके उतना ही अच्छा है। इसे शीघ्र ही इन पांच तत्वों में बदलने का साधन अग्नि में जलाना ही है। अन्य कोई साधन नहीं है। इसी साधन से ही यह कार्य शीघ्र हो पाता है। इस लिए हमारे ऋषियों ने दाह कर्म को ही इस हेतु सर्वोत्तम कर्म स्वीकार किया है। अथर्ववेद के अध्याय १८, सूक्त २ मन्त्र ३८ में भी इसी बात के ही स्पष्ट निर्देश दिये गए हैं। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने तो इस की विधि भी निर्धारित की है तथा लिखा हैसम्पन्न मृतक व्यक्ति बाह संस्कार में किया वसके। आज की महंगाई तक व्यक्ति के भार के बराबर घी व सामग्री का प्रयोग कार में किया जावे ताकि वायु मण्डल पूरी तरह से शुद्ध हो की महंगाई को देखते हुए इतना तो सम्भव नहीं हो पा रहा यथाशक्ति जितना अधिक से अधिक घी सामग्री, केसर कपूर का प्रयोग सम्भव हो सके किया जावे ताकि वायु मण्डल रोग मुक्त तथा मृतक व्यक्ति के रोगाणुओं का किसी अन्य पर प्रभाव न हो सके ।

      वैदिक भारतीय संस्कृति कितनी महान् है, जिसने मरने पर भी सम्पूर्ण विश्व के भले की कामना करते हुए इस के पार्थिव शरीर को दबाने, जल में फेंकने या खुले में रखने के स्थान पर दाह कर्म की पद्धति रचकर सर्व संसार के सुख की कामना ही की है। हमारे ऋषि जानते थे कि जल में मृतक को डालने से, कबर में दफनाने से तथा वायु मण्डल में मुर्दे को खुला रखने से न केवल उसके रोगाणु फैल कर विनाश का कारण बनते हैं, लोगों को बुरे कार्य करने को प्रेरित करते , भूमि की कमी का कारण बनते हैं, अपितु मृतक को शीघ्र पंच तत्त्व में विलीन होने में भी बाधक होते हैं। इसीलिए उन्हों ने इन सब से दाह संस्कार को ही उत्तम माना । यह उनकी महान् विजय ही है जो आज विश्व के बडे बडे देश भी न केवल सामाजिक व्यवहार से अपितु विधि से भी इसे स्वीकार करने लगे हैं | 

संन्यास संस्कार

डा. अशोक आर्य 

       हमारे प्राचीन ऋषियों ने मानव को बार बार यह स्मरण दिलाने के लिए कि हे मानव ! तूं ने अपने जीवन को अच्छा बनाना है, परोपकारी बनाना है, दूसरों की सेवा करनी है,माता पिता व गुरूजनों का आदर करना है ,धर्म व जाति का रक्षक बनना है , जहां सोलह सरंकारों का व्यवधान रचा, वहीं चार आश्रमों की भी व्यवस्था की । ताकि सभी लोग समान रूप से समाज की रचना प्रक्रिया में अपनी सहभागिता दर्शा सकें। जहां तक संन्यास का प्रश्न है, यह जहां सोलह संस्कारों का एक महत्त्व पूर्ण अंग है वहीं चार आश्रमों में भी विशेष कामाचा रूप से शोभायमान है |

      सोलह संस्कारों में जन्म के पश्चात् होने वाले सरकारों में बारहवां संस्कार तथा कुल सोलह संस्कारों में पन्द्रहवां संस्कार ही सिंन्यास संस्कार है। जहा तक आश्रम व्यवस्था का प्रश्न है, इसमें भी चार संस्कार सम्मिलित किए गए हैं , जो पहले से ही सोलह कारों का अंग हैंयथा ब्रह्मचर्य संस्कारों में गयारहवां संस्कारहै तो श्रम व्यवस्था में प्रथम आश्रम है। गृहस्थ संस्कारों में तेरहवां संस्कार है तो हमारी आश्रम व्यवस्था इसे दूसरे स्थान पर रखती हैवानप्रस्थ हमारी संस्कार व्यवस्था में चोदहवां संस्कार है तो आश्रम व्यवस्था में तीसरा । इसी प्रकार संन्यास सस्कार प्रणाली का पन्न संस्कार है तो हमारी आश्रम व्यवस्था इसे अन्तिम व चोथा आप स्वीकार करती है। वास्तव में मानव जीवन को हमारी महान् वैदिक संस्कृति १०० वर्ष का मानती है तथा कहती है कि यदि हम खली जलवा ग्रहण करते हुए एक निश्चित व्यवस्था में जीवन यापन करें तो हमारी आयु निश्चित रूप से कम से कम एक सौ वर्ष की होगी। इसी आधार पर इसके चार पडाव, ठहराव या रथल बनाए गए हैं , जिन्हें चार आश्रमों का नाम दिया गया तथा प्रत्येक आश्रम में ठहरने की अवधि पच्चीस वर्ष निश्चित की गई। यही चार पडाव ही चार आश्रम हैं, जा कि संस्कारों में भी अपना स्थान बनाए हुए हैं।

      आश्रमों में केवल गृहस्थ को छोडकर शेष तीनों आश्रमों का सम्बन्ध जंगलों , पहाडों व नदियों की खुली वायु में विचरण करने व प्रकृति की गोद में रहकरशीतल व स्वास्थ्य प्रद शुद्ध जलवायु का सेवन करना होता था । जबकि गृहस्थ लोग नगरों में रहते थे। इस प्रकार शतव र्षीय जीवन का तीन चौथाई अर्थात् जीवन के पिचहत्तर वर्ष जंगलों की खली वायु में विचरण करना होता था। यही ही हमारे उत्तम स्वास्थ्य का कारण था |

      गहस्थ जीवन में आई दुर्बलताओं को दूर करने व परोपकाएकी भावनानुसार निशुल्क अपने अनुभवों को बांटने के लिए की व्यवस्था थी। पच्चीस वर्ष तक इस आश्रम में रहते परी प्रकार से बलिष्ठ होकर तप जाता था, किसी की असर करने का उस पर कुछ भी प्रभाव नहीं होता था, तब वह नभवों को बांटने के लिए वानप्रस्थाश्रम इस आश्रम में रहते हुए जब मनुष्य होता था, तब वह संन्यास ले लेता था तथा जीवित अवस्था में था। यह आश्रम व्यवस्था का अन्तिम आश्रम था तथा जीवित अवस्था में होने वाले संस्कारों में अन्तिम संस्कार थाइसके पश्चात् केवल अन्तिम संस्कार अर्थात मृतक संस्कारही शेष रह जाता था |

      आज संन्यास का अभिप्राय ठगी या बेकारों के समूह के अर्थों में लिया जाता है किन्तु हमारे ऋषियों ने इस आश्रम को अति महत्व पूर्ण माना हैइस आश्रम में आने वाले व्यक्ति सभी सम्बन्धों से , सीमाओं से, वैभव से ऊपर उठ जाते हैं। अब सारा संसार ही उसका निवास स्थान होता है। देशीय सीमाएं उसके लिए कुछ भी अर्थ नहीं रखती थीं। सारे संसार के लोग उसका परिवार होता है,व्यक्तिगत परिवार भी सांसारिक लोगों की ही भाँति होता है। संसार के सभी लोग ही उसके सम्बन्धी होते हैं । वह जहां चाहे चला जाता है, जहां चाहे रुक जाता है। किसी को नहीं पता होता कि अमुक व्यक्ति आज कहां है तथा किसे क्या उपदेश दे रहा है । इस प्रकार केवल संसार का उपकार करना ही उसका एकमात्र ध्येय होता है। इसी ध्येय की पूर्ति के लिए वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमता रहता हैकिसी भी एक स्थान पर वह अधिक समय तक नहीं रुकता । स्वयं को इस समय अग्नि के तपाता है तथा इसलिए ही काषाय वस्त्र धारण करता है। अपने पवचनों का प्रसाद वह सवेत्र बाटते हुए कुछ मिला ता खाया नहीं तो यं दीपमते हुए कब व कहा उसकी मृत्यु हो जाती है ,उसका अन्तिम कौन करता है। इसका उसके निजी परिजनों को भी पता नहीं पाता । विश्व में कहीं भी ऐसा संस्कार वैदिक संस्कृति के अतिरिक्त ही नहीं मिलेगा । यही ही हमारी संस्कृति व इस संस्कार की महानता व श्रेष्ठता हैप्रभु संस्कारों का युग पुनः लौटावे तो संसार पुनः समागे पर चले |

वेदारम्भ संस्कार

डा. अशोक आर्य 

       मानव जीवन के सोलह संस्कारों में से गयारहवां तथा बारहवां, सानो संस्कार ही एक ही उद्देश्य से किये जाने के कारण दोनों का भाव समान ही है । बस अन्तर इतना है कि जब माता पिता एक निश्चित आय पर पहुंचने के कारण बालक को शिक्षार्जन के योग्य समझते हैं तो अपने ही निवास पर उपनयन संस्कार करके उसे गुरुकूल भेज देते तथा गुरू भी बालक को अपने गुरुकुल में स्थान देते हुए उसे अपने कु ल का भाग बनाने के लिए एक संस्कार करता है , जिसे वेदारम्भ संस्कारकहते हैं। दोनों संस्कारों का सम्बन्ध शिक्षा प्राप्त करना आरम्भ करने से हैइसी कारण इन दोनों संस्कारों को एक दूसरे का पूरक माना जाता है |

      प्राचीन गुरुकुलों में न तो आज सरीखे भवनों को ही केन्द्र मानकर महत्त्व दिया जाता था और न ही अन्य साज सज्जा की सामग्री को , क्योंकि इस का सम्बन्ध बालक की शिक्षा से होता था। अतः इनके केन्द्र या आधार बालक ही होते थे। इसी भावना को आज के शिक्षाविद् पुनः समझने लगे हैं। अतः आज पूनः यह स्वर मुखरित होने लगे हैं कि स्कूलों में बालकों महत्त्व को समझना चाहिये तथा इन्हें ही केन्द्र मानकर शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिये ।ऐसी व्यवस्था में गुरु बालक के विगत जन्म के संस्कारों का उसके व्यवहार से अध्ययन क्दरता है, माता पिता के संस्कारों का भी अध्ययन करता है तथा वर्तमान वातावरण ,जिसे पर्यावरण कहते हैं,का भी अध्ययन दर तदनुसार बालक की अभिरुचि के अनुसार इसे शिक्षा देता है |

      जहां तक संस्कारों का प्रश्न है, पहले भी बताया जा चुका है कि मानव जीवन के संस्कारों को दो भागों में बांटा गया है। प्रथम भाग में प्रसव पूर्व के तीन संस्कार रखे गए हैं तथा दूसरे भाग में जन्म के पश्चात् के शेष तेरह सरकार सम्मिलित हैं। इन संस्कारों से तो बालक को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती ही है, उसके भावी जीवन के निर्माण के लिए पर्यावरण, शिष्य व ब्रह्मचारी, गुरुया आचार्य पढने के विषय चयन, पढने व पढाने की विधि व जीवन का लक्ष्य कैसे प्राप्त हो आदि पर शिक्षा प्रारम्भ करने से पूर्व वैदिक आचार्य विचार करते हैं। 

     वातावरण का बाल शिक्षा पर खूब प्रभाव होता है किन्तु इससे बालक को बचाया जा सकता है। गन्दे वातावरण के बच्चों में अच्छे संस्कारों की बहुलता उसे इससे बचा कर प्रगति पथ पर ला सकती हैयही कारण है कि गन्दे पर्यावर्णीय बालक अच्छे भी देखे गए हैं जबकि अच्छे पर्यावरणं में पले बच्चे भी देखभाल के अभाव में गन्दे हो सकतेहै। यह विगत जन्म के संस्कारों के बलवान् होने का परिवार सकता है । पारिवारिक पयोवरण का भी इस पर प्रभाव को परिवार में लडाई, कलह आदि प्रमादि व्यवहार होता बुराई की और जाना स्वाभाविक है। इसी कारण वैदिक पमादि व्यवहार होता है तो बालक का भीपरिवार में प्रतिदिन संध्या, यज्ञादि करते हुए उसके पर्यात रखा जावे। इसी प्रकार जिस समाज में बालक कार करते हुए उसके पर्यावरण को स्वच्छ में बालक का निवास है, उसका भी अच्छा होना उसके भी उसे अपने पर शिक्षणालयों को सके भावी जीवन की उत्तमता का आधार है। शाला में अपने परिवार का सा वातावरण मिले, इसीलिए वैदिक लियों को कुल कहा गया है। ताकि बालक इसे अपने परिवार आत्मसात् कर गुरु को पिता व सहपाठियों के साथ भाईयों का यवहार करते व प्रेम से रहते हुए शिक्षा प्राप्त करे। यही कारण है न आधुनिक स्कूल भी अपने आप को गुरुकुल कहलवाने में गौरव साव्यव त करने लगे है। अनुभव करने लगे हैं |

      शिक्षा प्राप्ति आरम्भ करते ही बालक को जो प्रक्रियाएं करनी होती थीं, उनमें सर्व प्रथम था आश्रम में निवास करना आश्रम एक कठिन तपस्या का नाम है । इस प्रकार इस में निवास करने के लिए से संकट पूर्ण अवस्था में साधना करते हुए भी हंसते रहने का निर्णय लेना होता था। उसे गुरु के पास जा कर एक बार पुनः ऐसी अवस्था में जाना होता था जैसे जन्म से पूर्व मां के गर्भ में था । अर्थात् अब गुरु आदेश ही उसका सब कुछ है तथा उसी के पालन में ही उसका कल्याण व भावी जीवन का उत्थान है। इस समय वह शिष्य तो है किन्तु क्योंकि गुरु ने उसे अपने में समा लिया है, अपने कुल का भाग बना लिया है, अतः अब गुरुचरणों में बैठ कर उसे ब्रह्म में विचरण करना है। गुरु उपदेश के अनुसार शिक्षा प्राप्त क्रना है गुरू आचार व्यवहार भी सिखाता है, इसलिए उसे आचार्य भी कहते हैं। इस समय शि ष्य समिधा समान है। जैसे समिधा आग के साथ से प्रदीप्त होती है। इसी प्रकार शिष्य भी गुरु से उपदेश पाकर स्वयं को आलौकित करता हैअतः शुरू का पूर्ण विद्वान् होना भी आवश्यक है |

      जहां तक पढाने के विषयों का प्रश्न है, वेदादि शास्त्र तो पढाए भी करे कि बार बालक को करे। जबकि इन दृष्टाः की निगमन पई शिक्षा देते सभः ही जावेंइसके अतिरिक्त गुरु इस बात की जांच की की चि किस विषय में है, उसकी विशेष शिक्षा बालक दृष्टांत देकर पढाना आगमन पद्धति की शिक्षा है जी को जीवन में उतार कर दिखाया जावे तो इसे शिक्षा की कहते हैं। गुरु को चाहिये कि दोनों विधियों को ही शिक्षा प्रयोग करे। इस के अतिरिक्त कई प्रकार की कौशल युक्त शिव देनी चाहियें। इसमें गौ पालन कृषि आदि को रखा जा सकता है |

      वैदिक शिक्षा जीवन को एक निश्चित दिशा देती हैजीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बालक को समर्थ बनाया जाता । अतः शिक्षा समाप्ति पर आचार्य दीक्षान्त उपदेश देते हुए कहता है। आज से तुम्हारे से यह आशा की जाती है कि तुम सत्य का आचर करोगे, धार्मिक जीवन व्यतीत करते हुए माता पिता की सेवा व बड़ों सम्मान करोगे। यह केवल विदाई के समय ही गुरू नहीं कहता अपि कुल में प्रवेश के समय ही उसने बालक के समक्ष एक निश्चित योजः रखी थी। कुल आवास में रहते हुए उसी योजना से ही शिक्षा दी तथा यहां से पूनः लौटाकर कार्यक्षेत्र में भेजते समय गुरु चेताव स्वरूप पुनः यही उपदेश ही दोहराता है कि जो तुझे समझाया गया है उसका प्रतिक्षण पालन करना । यही जीवन की सफलता का मापदण् होगा।

      वेदारम्भ संस्कार में दण्ड धारण करना, भिक्षा कर भोजः लाना, मेखला धारण करना तथा कौपीन में रहना, यह कुछ आवश्यक विधियां हैं। ब्रह्मचारी के लिए उस युग में दण्ड धारण करना आवश्यक था, क्योंकि जंगली आवास के समय अपनी रक्षार्थ व दूसरों की रक्षा यह सहायक होता था। फिर यह क होता था । नदी नाले पार करते समय भी काम में आता कर यह तो कहा ही गया है कि महान् बनने के लिए पहाडों से न व नदी के तटीय स्थान उत्तम होते हैं । ऐसे ही स्थान में संलग्न व नदी के गरुकुल स्थित होते थे। 

      गरुकला में भिक्षा वृत्ति एक आवश्यक अंग थी। इससे गुरुकुल खर्च का बोझ तो कम होता ही था , बालक में निराभिमानता भी आती थी, झुकने के संस्कार भी मिलते थे। अहंकार का भी नाश होता या। इसमें सभी बालक समान रूप से भिक्षाटन करते थेकहीं कोई भेदभाव नहीं होता था । भिक्षा से प्राप्त सब सामग्री लाकर बालक गुरु चरणों के अर्पण कर देता था। इसी को ही सभी मिलजुल कर ग्रहण करते थे। यह समरसता लाने का एक सुन्दर मार्ग था । अतः वैदिक विधि विधान बालपन से ही उसे समानता का सन्देश देता था । यह उपदेश व्यवहारिक रूप से इसके मस्ति ष्क में डाल दिया जाता थाइसी कारण सभी बालक अपने समय का सदुपयोग करते हुए खूब मेहनत करते हुए शिक्षा प्राप्त करते थे। इस भिक्षा वृत्ति से सरकार या गुरुकुल संचालक पर अर्थका अधिक बोझ नहीं पडता था । आवश्यकताएं सीमित होने से , इसी से ही सब कार्य सिद्ध हो जाते थे। दयानन्द मठ दीनानगर में आज भी दोपहर का भोजन भिक्षा से लाने की प्रथा निर्बाध रूप से चल रही है। लंगोट व मेखला भी इस आश्रम के मुख्य बिन्दु हैं। यह बालक को सदाचारी रखते हुए वीर्यवान् बनाते हैंइससे चुस्ती भी आती है।

      इस विवरण से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उपनयन संस्कार के साथ ही साथ वेदारम्भ संस्कार भी बालक को गुणवान् व विद्वान् बनाने की दिशा में बढ़ाया गया एक कदम है। इस समय बालक मातृव पितृ गोदी से निकल कर गरु की गोढी में चला जाता है । जहा गुरु बालक को विद्वान् बनने की प्रतिज्ञा लेते हए बालक के लिए कुछ नियम निर्धारित करता है । वहीं बालक भी इस कुल मे अप है। वहीं बालक भी इस कल में अपने निवास केक्षणों में पर्णतया सच्चरित रहते हए पर्ण तन्मयता से एकाग्रचित्हा , पद्य उपदेश के अनुसार अपनी दिनचर्या रखते हुए, सभी सुखा स दूर रहते हुए, तपश्चर्या का जीवन व्यतीत करते हुए, भिक्षाटन से भाजन लाकर सब के साथ समान रूप से उसका उपभोग कर बडे प्रेम पूर्वक मेहनत से सब प्रकार की विद्याओं को प्राप्त करता है।

गर्भाधान संस्कार

गर्भाधान संस्कार

डा . अशोक आर्य 

       संस्कारों का अभिप्रायः मानव केनवनिर्माण से है। यह संस्कार दो प्रकार के होते हैंवंशानुगत संस्कार या जन्मस्थ संस्कार। इस कोटि के संस्कारमाता पिता की परम्पराओं से प्राप्त होते हैं। दूसरेपर्या वर्णीय संस्कार होते हैंयह संस्कार वातावरण से प्राप्त होते हैंइच्छित पर्यावरण प्राप्त कर माता पिता के सरंकारों को भी बदला या प्रभावित किया जा सकता है। ऐसा हमारा मानना है। प्रथम प्रकार के संस्कार वह हैं जो जन्म से पूर्व किये जाते हैं। इनमें गर्भाधान , पुंसवन व सीमन्तोनयन संस्कार सम्मिलित हैं शेष सभी संस्कार जन्म के बाद होते हैं। जहां तक गर्भाधान संस्कार का प्रश्न है , यह संस्कार मानव के निर्माण से सम्बन्ध रखता है |

      गर्भाधान संस्कार जाति की वृद्धि के लिए होता है। इस का माध्यम माता पिता होते हैं। इसी कारण साधारणतया कहा जाता है कि जैसे माता पिता होंगे वैसे ही उनकी सन्तान होगी। इस का भाव यह है कि माता पिता की सोच, परम्परा, प्रवृतियों आदि का प्रभाव उनकी सन्तान पर अवश्य पडता है। यही कारण है कि बुरी प्रवृति वाले माता पिता की सन्तान भी उन्हीं के अनुरूप होती है जबकि अच्छी आदतों के माता पिता की सन्तान भी उनका नाम रोशन करने का कारण बनती है |। तिहागणदाही अत्यधिक देखने को मिलते हैं कि बुरे पतक प्राव वाले बच्चे भी अच्छे निकलते हैं। इसका क्या कारण हो शकता है। इस बात का उत्तर महर्षि दयानन्द सरस्वती ने दिया है कि संकाय ग मान्य कपैतृक प्रभाव पर डांकुश लगा कर उन्हें बदला जा सकता है। यहां पर महर्षि दयानन्द सरस्वती की इसी बात का ही उल्ट फेर करते हुए आधुनिक वैज्ञानिकों ने इसे विज्ञान का आधार देते हुए कहा है कि मानव स्वभाव का कारण जीन्स होते हैं, जो वंशानुगत परम्परा से आते हैं। इन्हें बदलने के लिए मानव में नए प्रकार के जीन्य का प्रवेश कराना पडेगा । एक प्रकार के जीन्स से एक ही परिवर्तन होता है। यदि अनेक परिवर्तन लाने हैं तो हमें अनेक जीन्स का प्रवेश उस में कराना होगा। डा0 हरगोविन्द खुराना ने इसी विषय पर कार्य किया है तथा इस प्रकार के जीन्स की खोज करने में सफलता पाई है।

      कछ लोगों का यह मानना है कि माता पिता के रज वीर्य के योगदान के प्रभाव को सन्तानों से मिटाया नहीं जा सकता । यदि ऐसा होता तो महर्षि ने संस्कारों के महत्व पर कभी बल न दिया होता। यह तो भारतीय परम्परा आरम्भ से ही चली आ रही है, जिसके अन्तर्गत कहा जाता है कि बच्चों को अच्छे संस्कार देकर अच्छा बनाने का मार्ग खोलो । यदि एज वीर्य ही सब कुछ होते तो विश्व की सिरमौर भारतीय संस्कृति कभी भी संस्कारों पर बल न देती । जीव विज्ञानी भी मानने लगे है कि मानव निर्माण कला की नींव रखी जा चुकी है। इसी के आधार पर उच्च कोटि के मानव का निमोण होने जा रहा है। इसके माध्यम से हम स्वेच्छा से कवि , चित्रकार, विद्वान् आदि जैसे मानव की आवश्यकता समझें, वैसा ही कर सकते है। अतः मानव के निर्माण में वंशानगत परम्पराएं किसी भी प्रकार मार्ग नहीं रोकतीं। मानव इस वंश परम्परा रूपी बहती नदी का मार्ग बदलने की शक्ति रखता हैइसके लिए परिश्रम की आवश्यकता है। 

      महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने इसी बात को स्पष्ट करने के लिए ही सस्कार पद्धति का निर्माण किया है। उनका यही सन्देश है कि संस्कारों से मानव के वंशानुगत प्राप्त परम्पराओं को बदल कर उसे जैसा चाहे बनाया जा सकता हैइसको हम टार्जन के उदाहरण से भी स्पष्ट कर सकते हैं, जो था तो मानव पुत्र किन्तु किसी कारण से वह जंगली पशुओं के हाथ में पड गया। अब वह पशुओं की भान्ति ही रहने, खाने, पीने व विचरण करने लगा। यदि माता पिता का रज व वीर्य ही सब कुछ होता तो वह कभी भी मानवीय आदतों को न छोड पाता किन्तु यहां तो सरकार प्रभावी दिखाई देते हैं। जिनके कारण वह मनुष्य रूपी कोई भी कार्य न कर सकता था । बस यह ही संस्कारों का परिणाम हैअतः महर्षि ने मानव नव निर्माण का स्वप्न संस्कारों के माध्यम से लिया । तभी तो उन्हों ने गर्भाधान को भी संस्कार पद्धति के अन्तर्गत एक स्वतन्त्र संस्कार स्वरूप स्थान दिया । बच्चे की परिस्थितियों को बदलने से ही उसे उन्नत बनाया जा सकता है। अतः संस्कार पद्धति में वर्णित गर्भाधान संस्कारविधि स्वरूप महर्षि ने हमें एक ऐसी प्रक्रिया प्रदान की है, जिसके प्रयोग से हम मन चाही सन्तान पैदा करने में सक्षम हो जाते हैं। वृहदारण्यक उपनिषद् ने भी गर्भाधान संसकार पर बहुत बल दिया है। इससे भी स्पष्ट होता है कि संस्कार व्यक्ति के निर्मा ण की क्षमता रखते हैं। 

      गर्भाधान संस्कार का मनुष्य के विवाह से विशेष सम्बन्ध है | 

यह विवाह ही है जो भावी पीढी के जन्म का कारण बनता है। यदि हमारी सामाजिक परम्पराओं में विवाह नामक संस्था न होती तो हमारी अवस्था भी पशुओं से कम न होती। अतः यह विवाह संस्कार ही तो है जिसने हमें मानव कहलाने का अधिकार दिया है। भारत में मुस्लिम राज्य के दिनों में हमारी विवाह संस्था पर संकट आया । इसी के परिणाम स्वरूप ही बाल विवाह, बहु विवाह के रूप में हमारी वैवाहिक परम्पराएं दूषित हुई। इससे हमारी जाति को बहुत हानि उठानी पड़ीऐसे समय में विवाह हो जाना जबकि प्रजनन शक्ति ही पैदा नहीं हुई, तो विवाह का औचित्य ही क्या रह जाता है, किन्तु तो भी लम्बे समय तक यह परम्पराएं चलीं। महर्षि ने इसका खुल कर विरोध किया तथा कहा कि सोलह वर्ष से पूर्व कन्या तथा पच्चीस वर्ष से पूर्व बालक का विवाह किसी भी अवस्था में न हो। किशोरावस्था में जीवनीय शक्ति तो आ सकती है किन्तु इसे मजबूती युवावस्था में ही मिलती है। जब तक यह मजबूती नहीं आती तब तक इनसे होने वाली सन्तान भी मजबूत नहीं बन पाती। इस कारण ही महर्षि ने पूर्ण युवावस्था को प्राप्त होने से पूर्व विवाह की अनुमति नहीं दी । महर्षि ने एतदर्थ सुश्रुत के उदाहरण देते हुए अपने विचारों को स्थिरता दी है। उन्होंने कहा है कि इससे पूर्व विवाहितों की सन्तान जन्म से पूर्व ही न ट हो जावेगी अथवा दुर्ब ल या अल्पजीवी होगी।

      महर्षि ने गर्भाधान संस्कार के लिए ऋतुदान शब्द का विशेष रूप से प्रयोग किया है। इस शब्द का अभिप्रायः समझे बिना यह सब व्याख्या अधूरी ही रह जाती है। साधरणतया प्रजनन की क्षमता का प्रदर्शन कन्याओं में उस समय होता है जब उसके गर्भाशय से रक्त का : प्रवाह बाहर को आने लगता है। यह स्राव तीन चार दिन होता है । यह गर्भाधान के समय का सूचक होता है। इसी समय को ऋतु व स्राव को कतनाव कहते हैं। इस समय स्त्री में गर्भधारण करने की क्षमता तो आ जाती है किन्तु उत्तम सन्तान के लिए इसका पुष्ट होना भी आवश्यक है। यही रक्त गर्भ स्थापित होने पर बन्द हो कर शिशु के पालन में तथा जन्म पर यही रक्त बालक के दूध का कारण बनता है। जब वह दूध पीना छोड देता है तो समय आने पर पुनः गर्भस्राव आरम्भ हो जाता है जो जीवन के लगभग पचास वर्ष की आयु पर्यन्त होता है | 

      स्ट स्त्री शरीर में तो गर्भस्राव से विवाह के लक्षण आ जाते हैं किन्तु पुरुष के लिए चरक का कहना है कि २५ से ४० वर्ष आयु ही वह समय है जिसमें जीवनीय शक्ति के उच्च गुण होते हैं । यह समय ही उसके लिए उपयुक्त है। यदि इस आयु में संयम पूर्वक गृहस्थी की जावे तो शास्त्र इसे भी बह्मचर्य स्वीकार करते हैं । युवा ऋतुगामी स्त्री तथा पच्चीस से चालीस वर्ष के मध्य के पुरुष ही सन्तानोत्पति के सक्षम होते हैं। इससे पूर्व ब्रह्मचर्य व पश्चात् वानपस्थाश्रम होता है, जिनमें सन्तोनोत्पत्ति नहीं हो सकती । अतः दोनों के मध्य का यह काल ही सन्तोन्पत्ति का काल है।

      केवल महर्षि ने ही नहीं अपितु चरक व मनु स्मृति ने भी यही कहा है, जिसके उद्धरण संस्कारविधि में देते हुए कहा गया है कि स्त्री व पुरुष केवल ऋतुकाल में ही सन्तानोत्पत्ति के उपाय करें। वह भी केवल अपनी स्त्री या अपने पति से, अन्य से नहीं । यदि ऐसा न करेंगे तो आयु की हानि होगी। इसमें भी कहा है कि रजोदर्शन के सोलह दिनों में प्रथम चार दिन वर्जित हैं। शेष काल वही है जिसमें स्त्री में एतदर्थ हाती है यह अवस्था केवल स्त्री में होती है। इसी का पालन पुरुष को भी करना चाहिये । गर्भ धारण कर दम्पति जैसी सन्तान चाहते हैं स्त्री को चाहिये कि अपने आप को वैसे वातावरण में ही रखेशूरवीर बनाने के लिए वीरों की कथाएं करे, सुने, वीरों के ही चित्र देखे तथा हर समय वीरो के जीवन का ही चिन्तन करे।

      वैदिक संस्कृति में इस संस्कारको अत्यन्त धार्मिक महत्ता प्रदान की गई है। यह इस संसार में नई आत्मा के प्रवेश का एक मात्र मार्ग है । मानव के नव निर्माण के लिए वैदिक महापुरुषों ने सर्वप्रथम इसी संस्कार पर अपना ध्यान केन्द्रित किया । बलि ष्ठ शरीर व उत्तम आत्माओं को बुलाने के लिए गृहस्थ की इस क्रिया की ओर हमारे महापुरुषों का ध्यान जाना आवश्यक भी था क्योंकि इसी से पवित्र होने पर ही उत्तम आत्माओं का इस संसार में आगमन होता है। सरकार विधि धार्मिक व पवित्र कार्यों का ही एक गुलदस्ता हैइस रंस्कार से पवित्र यज्ञ जो संसार को गति देने वाला होता है , को गृहस्थ लोग आरम्भ करते हैं। इस यज्ञ का परिणाम समग्र विश्व के लिए होता हैइसे पवित्र क्रिया का नाम देने वाले इसे एक सामाजिक कर्तव्य मानते थे । यही कारण था कि बीजारोपण के समय ही उत्तम सन्तान की कामना के लिए यह यज्ञ किया गयास्वस्थ शरीर व स्वस्थ मन का गर्भाधान पर विशेष प्रभाव होता है। तभी तो चरक जैसे आयु – वेदाचार्य ने कहा है कि जैसी सन्तान की इच्छा हो ,गर्भस्थ रत्री गर्भकाल में वैसे विचार,वातावरण,

      व्यवहार व कथा प्रसंग में रत रहे। यह तो सर्वविदित ही है कि अभिमन्यु ने गर्भावस्था में ही चक्रव्यूह भेदन की कला जान ली थी, जो कि गर्भावस्था में पति पत्नि की चर्चा का विषय बनी थी। ऐसे भी महर्षि हए हैं जिन्होंने गर्भावस्था में ही उच्चकोटि का ज्ञान पा लिया था अष्टावक्र भी इनमें से एकथे । इसी प्रकार गर्भस्थ अवस्था के ज्ञान से ही बहुत से क्रूर लोग भी इस धरती पर आए। एक माता गर्भावस्था में सैनिकपरेड देखते हुए विजय गान सुना करती थी ,उससे पैदा हुआ बालक नैपोलियन नामक महान् योद्धा बना।

      इन सभी दृष्टांतों से यह बात स्पष्ट होती है कि गर्भाधान संस्कार धार्मिक होने के साथ ही साथ सृष्टि की अभिवृद्धि का कारण भी है। यदि गर्भाधान संस्कार को महर्षि के बताए ढंग से पूर्ण वैदिक रीति से किया जावे तथा जैसी संन्तान की कामना हो गर्भस्थ स्त्री अपने आपको उसी वातावरण में रखे । पति-पत्नी में उन्हीं विषयों पर ही चर्चा हो परिवार में किसी प्रकार का कोई क्लेश न हो तो निश्चित ही कामधेनू के समान इच्छित सन्तान पैदा होगी। जिस से संशारकी सुख समृद्धि तो होगी ही ,परिवार, माता पिता व सन्तान का नाम भी सर्वत्र गौरव के साथ लिया जावेगा । अतः सभी का यह कर्तव्य बन जाता है कि विवाह संस्कार के पश्चात् घर लौटने पर सर्व प्रथम गर्भाधान संस्कार यज्ञ अपने परिवार में अवश्य करें। 

राजनीति की नर्सरी बनाए जाने से बर्बाद हो रहा जवाहरलाल_नेहरू_विश्वविद्यालय ——————–

राजनीति की नर्सरी बनाए जाने से बर्बाद हो रहा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
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यह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की स्थापना का पचासवां साल है। ऐसे में उसकी उपलब्धियों की पड़ताल की जानी चाहिए। आज तक वहां से किसी चर्चित शोध, अध्ययन या लेखन संबंधी कोई समाचार सुनने को नहीं मिला। न केवल ज्ञान के क्षेत्र में, बल्कि खेलकूद, रंगमंच, कला या राष्ट्रीय नीति-निर्माण में भी उसका कोई योगदान नहीं रहा। जबकि पश्चिम के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय सामाजिक चिंतन, शोध, वैदेशिक अध्ययन आदि में उल्लेखनीय योगदान करते हैं। इसीलिए वे प्रसिद्धि पाते हैं, किंतु जेएनयू से आज तक कोई ऐसी पत्रिका तक प्रकाशित नहीं हो सकी, जिसे कोई जानता हो।

सवाल है कि ऐसा क्यों? दरअसल जहां राजनीति का सर्वाधिकार हो वहां गंभीर अध्ययन, लेखन नहीं पनप सकता। इसीलिए केवल वामपंथी राजनीति के समाचारों से ही जेएनयू चर्चा में रहा है। नवीनतम समाचार स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का अपमान है, जिसे रफा-दफा करने के लिए फीस वृद्धि को लेकर हंगामा खड़ा किया गया। पिछली बार भी ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे…!’ और ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं’ वाली कुख्याति को दबाने के लिए वामपंथियों ने राष्ट्रवाद पर भड़कीली बहस की मुहिम चलाई थी।

दरअसल असली बात को दबाकर ध्यान बंटाने की वामपंथी तकनीक इसलिए सफल हो जाती है, क्योंकि उनके प्रतिद्वंद्वियों में समझ का अभाव है। उन्होंने मामले को सिर से पकड़ने के बजाय लजाते हुए ‘राष्ट्रवाद’ की अपनी नीति को स्थापित करने की कोशिश की है। फलत: वामपंथी निश्चिंत होकर हमले करते रहते हैं। इस प्रकार जिन्हें सफाई देनी थी, वही कोतवाल बन जाते हैं और जिन्हें हिसाब लेना था, वही अपना हिसाब देने लगते हैं। कायदे से वामपंथियों को कठघरे में खड़ा करना चाहिए था, क्योंकि वे आरंभ से ही जेएनयू के शैक्षिक वातावरण को विषाक्त करते रहे हैं।

एक बार भारत-पाक क्रिकेट मैच के दौरान जेएनयू में भारत विरोधी नारे लगे थे। भारत की जीत पर खुशी मनाने वालों पर हमला हुआ था। उससे पहले अशोक स्तंभ वाले राष्ट्रीय चिन्ह को जूते के नीचे मसले जाते पोस्टर लगाए गए थे। करगिल यु्द्ध लड़ने वाले सैनिकों को जेएनयू में पीटा गया था, क्योंकि उन्होंने वहां एक मुशायरे में चल रही पाकिस्तानपरस्ती एवं भारत-निंदा का विरोध किया था। एक बार नक्सलियों द्वारा 70 सुरक्षाकर्मियों की हत्या किए जाने पर जेएनयू में जश्न मनाया गया था।

ऐसे ही समाचारों से जेएनयू सुर्खियों में आता है। वहां आरंभ से ही देसी-विदेशी भारत निंदकों को मंच मिलता है, किंतु देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री तक को बोलने नहीं दिया जाता। ऐसा कोई भाजपा के मंत्रियों के साथ ही नहीं हुआ है, बल्कि इंदिरा गांधी और पी. चिदंबरम भी ऐसी स्थिति से गुजर चुके हैं। उनके विश्वविद्यालय में आगमन तक के विरुद्ध आंदोलन हुआ था। देखा जाए तो जेएनयू में स्वतंत्र या देशभक्त स्वरों को वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा माओवादियों, जिहादियों को मिला है।

जेएनयू में वामपंथियों को अरुण शौरी जैसे विशिष्ट विद्वान का व्याख्यान नागवार गुजरता था, जबकि स्टालिन, माओ और अराफात के लिए वे आहें भरते थे। वहां के नामी प्रोफेसर ‘स्टालिन या त्रॉत्सकी’ पर ‘रात भर चलने’ वाली बहसों के सिवा कुछ याद नहीं कर पाते कि उन्होंने वहां दशकों तक क्या किया? दरअसल जेएनयू में बेहतरीन सुविधाओं के कारण यह बात छिपी रही है कि ज्ञान हासिल करने के नाम पर वहां बताने के लिए कुछ नहीं है।

कुछ वर्ष पहले जब किसी पत्रकार ने जेएनयू की चार दशक की उपलब्धियों के बारे में वहां के रेक्टर से पूछा तो उनका जवाब था कि जेएनयू से अब तक सिविल सर्विस में इतने छात्र चुने गए हैं। सवाल है कि क्या इसीलिए यह विश्वविद्यालय बना था कि वहां नौकरी की तैयारी या माओवादियों, जिहादियों तथा विविध देशद्रोही, उग्र राजनीतिबाजी के आरामदेह अड्डे बनें? आखिर जिन छात्रों ने स्वामी विवेकानंद का अपमान किया, उन्हें किन संगठनों और सीखों ने ऐसा करने को प्रेरित किया?

सरकार को यही चिंता करनी चाहिए कि वहां सामाजिक विषयों की शिक्षा में क्या पढ़ाया जाता है और क्या नहीं? यही मूल गांठ है, जिसे खोलने पर ऐसी लज्जास्पद घटनाओं के दोहराव से मुक्ति मिलेगी। सरकार को जेएनयू में सियासी गतिविधियों और छात्रसंघ को खत्म कर देना चाहिए, जिसके जरिये वहां देश विरोधी राजनीतिक गतिविधियां होती रही हैं। अभिभावक भी ऐसे छात्रसंघ को समाप्त करने के पक्ष में होंगे, जो उनके बच्चों को देश विरोधी या हानिकर गतिविधियों में खींच कर उनका समय या जीवन खराब करता रहा है।

राजनीतिक नारे लगाने वाले छात्रों को शायद ही किसी समस्या का वास्तविक ज्ञान रहता है। वे कश्मीर, इस्लामिक स्टेट या हिंदुत्व के बारे में उतना ही जानते हैं, जितना जेएनयू में चहकने वाले पंछी। इसलिए उनका इस्तेमाल बाहरी, भारत-विरोधी, हिंदू-विरोधी रणनीतिकार करते हैं। अबोध उग्र छात्र भावना, जोश और अज्ञानता में अदृश्य ताकतों की सेवा कर रहे हैं।

चूंकि देश-विदेश के महान शिक्षा चिंतकों ने कभी यह अनुशंसा नहीं की है कि विश्वविद्यालयों को ‘राजनीति की नर्सरी’ बनाया जाए, इसलिए उसे रोकना उचित ही नहीं, अनिवार्य भी है। यदि ऑक्सफोर्ड जैसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में जेएनयू जैसे छात्रसंघ नहीं हैं तो वहां के छात्र कोई वंचित-पीड़ित तो नहीं हैं। छात्रों की भलाई के लिए भी विश्वविद्यालयों में राजनीतिक गतिविधियों का खात्मा जरूरी है।

छात्रों को केवल साहित्य, कला, संगीत, खेलकूद आदि के लिए ही सुविधाएं, प्रोत्साहन मिलने चाहिए। साथ ही समाज विज्ञान और मानविकी विषयों के पाठ्यक्रम की समीक्षा भी जरूरी है। जेएनयू में वामपंथी राजनीति का जीवन स्रोत यही रहा है।

इन विषयों में पढ़ाई का मुख्य लक्ष्य छात्रों में एक खास राजनीतिक मनोभाव भरना है। इसे बदले बिना इतिहास, दर्शन, साहित्य के मामूली शिक्षक भी पैदा नहीं हो सकते, विद्वान बनना तो दूर की बात है। यहां पढ़ाए जाने वाले साहित्य, इतिहास, राजनीति शास्त्र आदि में वामपंथी और हिंदू-विरोधी मतवाद के तत्व जगह-जगह, सुचिंतित रूप से जमाए गए हैं।

किसी महान लेखक, पुस्तक या महत्वपूर्ण प्रसंग को हटाकर मामूली पाठ या प्रसंग इसीलिए डाले गए हैं, ताकि छात्रों में इससे ‘प्रगतिशील’ यानी हिंदू-विरोधी मनोभाव को बल मिले। जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में समाज विज्ञान और मानविकी के संपूर्ण पाठ्यक्रम, पाठ्यसूची, शोध-दिशा आदि की आमूल समीक्षा होनी चाहिए। इसके बिना केवल जहां-तहां विवेकानंद की मूर्तियां लगवाकर उनका अपमान करवाना कोई समझदारी नहीं है।

विश्वविद्यालयों में एक एक्टिविज्म का जवाब दूसरे एक्टिविज्म से नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि तमाम राजनीतिक एक्टिविज्म को खत्म करके शुद्ध शिक्षा को स्थापित किया जाना चाहिए। यही शिक्षा का वातावरण बनाने का सही रास्ता है।

– डॉ. शंकर शरण

 भारतीय कालगणना विवेचन

 भारतीय कालगणना विवेचन7

भारतीय संस्कृति का मूलाधार वेद है। वेद से ही हमें अपने धर्म और सदाचार का ज्ञान प्राप्त होता है। सब सत्यविद्याओं का आदि स्रोत वेद ही है। वेदों के छः अंग कहे गये हैं – १. शिक्षा, २. कल्प, ३. व्याकरण, ४. निरुक्त,५. छन्द तथा ६. ज्योतिष्। इन्हें षड् वेदांगों की संज्ञा दी गयी है। वेदों का सम्यक्ज्ञान प्राप्त करने के लिए इन छः अंगों को पढ़ना अनिवार्य है।

महर्षि पाणिनि ने ज्योतिष को वेद का नेत्र कहा है-‘ज्योतिषामनयनं चक्षुः’। भूतल, अन्तरिक्ष एवं भूगर्भ के प्रत्येक प्रदार्थ का त्रैकालिक यथार्थ ज्ञान जिस शास्त्र से हो वह ज्योतिषशास्त्र है।

वह ज्योतिषशास्त्र है। विश्वगुरु भारत ज्ञान के क्षेत्र में सदा से ही अग्रगण्य रहा है। ब्रह्मगुप्त, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य आदि गणितज्ञों ने नक्षत्रों, ग्रहों आदि की गति, परिभ्रमण और परिक्रमण के मार्ग का अवलोकन कर उनके आधार पर कालगणना का सिद्धान्त निर्धारित किया तथा ज्योतिषविज्ञान के क्षेत्र में विश्व का मार्गदर्शन किया है। विश्व ने उन सिद्धान्तों को कालान्तर में परखा और सही पाया तथा स्वीकारा। यह निर्विवाद सत्य है कि आज का साधनसम्पन्न विज्ञान भी प्राचीन भारत के उस सूक्ष्मतम ज्ञान तक नहीं पहुंच पाया है। ज्योतिषीय कालगणना को वर्तमान सन्दर्भ में प्रस्तुत किया जा रहा है –

ज्योतिषीय गणनात्मक काल दो प्रकार का है – १. स्थूलकाल (मूर्तकाल) २. सूक्ष्मकाल (अमूर्तकाल)सामन्यतः स्थूल काल की गणना जगत् व्यवहार में की जाती है। प्राणादि को सूक्ष्मकाल कहा जाता है। इसकी सूक्ष्मतम इकाई परमाणु या त्रुटि है। स्थूलकाल की महत्तम ईकाई कल्प है। यहाँ संक्षेप में कालगणना का मान प्रस्तुत है –

१  परमाणु = काल की सूक्ष्मतम अवस्था।

२ परमाणु = .. १ अणु

३ अणु = १ त्रसरेणु

३ त्रिसरेणु = १ त्रुटि

१० त्रुटि= १ परमाणु

१० प्राण १ वेध

३ वेध १ लव

३ लव १ निमेष

१ निमेष १ पलक झपकने का समय

२ निमेष १ विपल

३ निमेष १ क्षण

५ निमेष २.५ त्रुटि

२.५ त्रुटि १ सेकण्ड

२० निमेष १० विपल = ४ सेकण्ड

५ क्षण १ काष्ठा

१५ काष्ठा १ दण्ड-१ लघु

२ दण्ड १ मुहूर्त

१५ लघु १ घटी-१ नाड़ी

१ घटी२४ मिनट

३ मुहूर्त १ प्रहर

२ घटी १ मुहूर्त = ४८ मिनट

१ प्रहर १ याम

६० घटी १ अहोरात्र (दिन-रात)

८ प्रहर १ अहोरात्र

१५ दिन-रात = १ पक्ष

२ पक्ष _ = १ मास

२ मास १ ऋतु

३ ऋतु ६ मास

६ मास = १ अयन

२ अयन = १ वर्ष

६ ऋतु = १ वर्ष

१ संवत्सर = १ अब्द

१० अब्द = १ दशाब्द

१०० अब्द = १ शताब्द

(घटी, घटिका, घड़ी, नाड़ी, नाड़िका, दण्ड-ये समानार्थ हैं।६० तत्प्रति विकला = : १ प्रति विकला

६० प्रति विकला = १ विकला

६० विकला १ कला

६० कला ___ = १ अंश (डिग्री)

३० अंश १ राशि

|१२ राशि १ भचक्र, भगण

(अन्य कालगणनाक्रम)

१ त्रुटि कमलपत्र को सूई की नोक से एकबार छेदने का समय

६० त्रुटि ६० रेणु

१ लव ६० लव

१ लीक्षक (१/१५ सेकण्ड)

६० लीक्षक १ प्राण (४ सेकण्ड)

१ प्राण १० विपक (४ सेकण्ड)

६० विपक १ पल ६० पल

१ घटी (२४ मिनट)

१ नाड़ी (२४ मिनट)

१ नाड़ी १ दण्ड (२४ मिनट)

६० घटी १ दिन-रात (२४ घण्टे)

३० दिन-रात  = १ मास

१२ मास =१ वर्ष

युगप्रमाण

युगप्रमाण एक सृष्टि (कल्प)= १४ मन्वन्तर

१ मन्वन्तर = ७१ चतुर्युग

१ चतुर्युग सतयुग (१७,२८,००० वर्षत्रेतायुग (१२,९६,००० वर्षद्वापरयुग (८,६४,००० वर्षकलियुग (४,३२,००० वर्षकलयोग = ४३,२०,०००

७१ चतुर्युग – ३०,६७,२०,००० वर्ष । (४३,२०,०००%७१) |

१४ मन्वन्तर = ४,२९,४०,८०,००० वर्ष र (३०,६७,२०,०००%१४)

र (३०,६७,२०,०००%१४) कलियुग से दुगुना द्वापर, तिगुना त्रेतायुग और चौगुना सतयुग होता है। एक चतुर्युगी कलियुग से दस गुनी होती हैमन्वन्तरों के नाम____ मन्वन्तर १४ हैं- (१) स्वायम्भुव, (२) स्वारोचिष३) औत्तमि, (४) तामस, (५) रैवत, (६) चाक्षुष(७) वैवस्वत, (८) सावर्णि, (९) दक्षसावर्णि, (१०) ब्रह्मसावर्णि, (११) धर्मसावर्णि, (१२) रुद्रसावर्णि, (१३) रोच्यदेवसावर्णि (१४) इन्द्रसावर्णि। (१३) रोच्यदेवसावर्णि (१४) इन्द्रसावर्णि।

वर्तमान में विश्वसृष्टि

कुल सृष्टि की आयु = ४,२९,४०,८०,००० वर्ष

सृष्टि की वर्तमान आयु६ मन्वन्तर =(४३,२०,०००%६) १,८४,०३,२०,००० वर्ष

२७ चतुर्युग =(४३,२०,०००%२७) +११६६४०००० वर्ष

२८ वें महायुग के तीन युग= +३८८८००० वर्ष

सतयुग (१७,२८,००० वर्ष)

त्रेतायुग (१२,९६,००० वर्ष)

द्वापरयुग (८,६४,००० वर्ष)

वर्तमान कलियुग के बीते वर्ष = +५११९ वर्ष

सृष्टि की वर्तमान आयु = १,९६,०८,५३,११९ वर्ष

इस प्रकार वर्तमान विक्रम सम्वत् (२०७५) में सृष्टि की आयु कुल आयु से घटाने पर सृष्टि की आयु २,३३,३२,२६,८८१ अभी शेष रहती है। यह वैवस्वत् नामक सातवाँ मन्वन्तर वर्तमान में चल रहा है। प्रथम छ: मन्वन्तर व्यतीत हो चुके हैं। वर्तमान सातवें मन्वन्तर के २७ वाँ महायुग चल रहा है, जिसके प्रथम तीन युग (सत्ययुग, त्रेता और द्वापरयुग) बीत चुके हैं और चौथा युग’कलियुग’ चल रहा है। अभी कलियुग का प्रथम चरण है।

संवत्सर ६० होते हैं। एक के बाद दूसरा संवत्सर आता है। इन संवत्सरों के नाम एवं क्रम निश्चित हैं। ६० संवत्सरों के नाम तथा क्रम इस प्रकार हैं – १. प्रभव, २. विभव, ३. शुक्ल, ४. प्रमोद, ५. प्रजापति, ६. अंगिरा, ७. श्रीमुख, ८. भाव, ९. युवा१०. धाता, ११. ईश्वर, १२. बहुधान्य, १३. प्रमाथी, १४. विक्रम, १५. विषु, १६. चित्रभानु, १७. स्वभानु, १८. तारण, १९. पार्थिव, (२०. व्यय, २१. सर्वजित्, २२. सर्वधारी, २३. विरोधी, |२४. विकृति, २५. खर, २६ नन्दन, २७ विजय, २८. जय, २९. मन्मथ, ३०. दुर्मुख, ३१. हेमलम्ब, ३२. विलम्ब, ३३. विकारी, ३४. शर्वरी, ३५. प्लव, ३६. शुभकृत, ३७. शोभन, ३८. क्रोधी, ३९. विश्वावसु, ४०. पराभव. |४१. प्लवग, ४२. कीलक, ४३. सौम्य, ४४. साधारण. ४५. विरोधकृत्, ४६. परिधावी, ४७. प्रमादी, ४८. आनन्द, |४९. राक्षस, ५०. नल, ५१. पिंगल, ५२. काल, ५३. सिद्धार्थ, ५४. रोद्रि, ५५. दुर्मति, ५६. दुंदुभि, ५७. रुधिरोद्गारी, ५८. रक्ताक्ष,५९. क्रोधन तथा ६०. अक्षय।

अयन –

___अयन दो होते हैंउत्तरायण तथा दक्षिणायनये छ:-छः मासों के होते हैं। पृथ्वी की धुरी तिरछी होने के कारण उसका वार्षिक गति के फलस्वरूप सूर्य दिनांक २२ जून को कर्करेखा पर दृष्टिगोचर होता है तथा २१ दिसम्बर को मकररेखाइस अवधि को दक्षिणायन कहते हैं। अर्थात् कर्करेखा से दक्षिणायन की ओर (मकररेखा तक) सूर्य का प्रस्थान दक्षिणायन कहलाता है। दिनांक २२ दिसम्बर (सूर्य-उत्तरायण) से सूर्य उत्तर में गमन करता है तथा २१ जून (सूर्य-दक्षिणायन) को ककरेखा पर पुनः दृष्टिगोचर होने लगता है। यह छः मास का समय उत्तरायण कहलाता है। विषुवत् रेखा से कर्क रेखा तक सूर्य के गमन एवं कर्म रेखा से विषुवत् रेखा पर लौटने के काल को उत्तरगोल तथा विषुवत् रेखा से मकर रेखा तक जाने एवं मकर रेखा से वापस विषुवत् रेखा पर आने तक के काल को दक्षिणगोल कहते हैं।

ऋतुएँ –

के म एक वर्ष में छ: ऋतुएँ होती हैं। प्रत्येक ऋतु दो-दो मास की होती है – १. वसन्तऋतु – चैत्र, वैशाख। २. ग्रीष्मऋतु – ज्येष्ठ, आषाढ़। ३. वर्षाऋतु – श्रावण, भाद्रपद ४. शरदऋतु – आश्विन, कार्तिक । ५. शिशिरऋतु – मार्गशीर्ष, पौष। ६. हेमन्तऋतु – माघ, फाल्गुन। महीना (मास) – र – मास १२ हैं। ये एक के बाद एक क्रम से आते हैं। इनके नाम एवं क्रम निश्चित हैंएक वर्ष या सम्वत् में १२ मास होते हैं। इनके नाम हैं – १. चैत्र (मधु), २. वैशाख(माधव), ३. ज्येष्ठ (शुक्र),४. आषाढ़ (शुचि),५. श्रावण) (नभस्), ६. भाद्रपद (नभस्य), ७. आश्विन (ईष), ८. कार्तिक (ऊर्ज), ९. मार्गशीर्ष (सहस्), १०. पौष (सहस्य), ११. माघ (तपस्) तथा १२. फाल्गुन (तपस्य)। प्रत्येक मास में ३० तिथि होती हैं। किसी-किसी मास में तिथि-क्षय तथा तिथि-वृद्धि भी होती है। कभी-कभी मास-वृद्धि तथा मास-क्षय भी होता है।

भारतीय संस्कृति में सूर्य एवं चन्द्र दोनों को समान महत्त्व दिया गया है। महिनाओं के रूप में जहाँ चान्द्रमास को प्रधानता दी गयी, वहाँ वर्ष के रूप में सौरवर्ष को स्वीकार किया गया है। सौरमास (एक वर्ष) का मान ३६५ दिन ६ घण्टे ९ मिनट १०.८ सेकेण्ड के लगभग तथा चान्द्रमास (एक वर्ष) ३५४ दिन के लगभग होता है। यदि इन दोनों में एकरूपता नहीं लायी जाय तो हमारे त्योहार भी मोहर्रम की भाँति कभी ग्रीष्मऋतु में तथा कभी शिशिरऋतु में आयेंगे, ऐसा न हो, इसलिये निरयन सौरवर्ष एव चान्द्रवर्ष के लगभग ११ दिन के अन्तर को मिटाने के लिये अधिकमास या मलमास की व्यवस्था की गयी। ३२ मास १६ दिन ४ घटी उपरान्त अधिकमास पुनः आता है। अधिकमास ज्ञात करने हेत वर्तमान शक-सम्वत् में से ९२५ घटायें। शेष में १९ का भाग दें। यदि शेष ३ बचे तो चैत्र, ११ बचे तो वैशाख, ८ बचे बचे तो ज्येष्ठ, १६ बचे तो आषाढ़, ५ बचे तो श्रावण, १३ बचे तो भाद्रपद, २ शेष रहे तो आश्विन मास की वृद्धि होगी। अन्य शेष रहे तो अधिकमास नहीं होगा।

अधिकमास –

या जिस चान्द्रमास में सूर्य की संक्रान्ति नहीं होती, उसे अधिकमास कहते हैंजिस राशि पर सूर्य जाता है, वह उस राशि की संक्रान्ति कहलाती है। अर्थात् जब दो पक्षों में लगातार सूर्य-संक्रान्ति नहीं होती, तब वह अधिकमास की संज्ञा में आता है। इसे मलमास और पुरुषोत्तममास भी कहते।। हर तीसरे वर्ष चान्द्र एवं सौर वर्षों के समयान्तर का सामंजस्य करने के लिये अधिमास करने का विधान है। माघ, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन ये नौ मास अधिकमास होते हैं।

क्षयमास –

जिस चान्द्रमास के दोनों पक्ष में सर्यसंक्रान्ति होतीहै. उसे क्षयमास कहते हैं। क्षयमास केवल कार्तिक, मार्गशीर्ष |और पौष – इन तीन महीनों में से किसी एक महीने में पड़ता है, वर्ष के अन्य मासों में नहीं। जिस वर्ष क्षयमास होता है, उस एक वर्ष के भीतर दो अधिकमास होते हैं

पक्ष –

चान्द्रमास के शुक्ल एवं कृष्ण दो पक्ष होते हैं। बढ़ता चन्द्रमा अर्थात् अमावस्या से पूर्णिमा तक की १५ तिथियों का शुक्लपक्ष और घटता चन्द्रमा अर्थात् पूर्णिमा से अमावस्या तक १५ तिथियों का कृष्ण पक्ष होता है।

तिथि –

चन्द्रमा की एक कला को तिथि कहते हैं। तिथियाँ |१ से ३० तक एक मास में ३० होती हैं। ये पक्षों में विभाजित हैं। प्रत्येक पक्ष में १५-१५ तिथियाँ होती हैं। इनकी क्रम संख्या ही इनके नाम हैं। ये हैं – १. प्रतिपदा, २. द्वितीय, ३. तृतीया, |४. चतुर्थी, ५. पंचमी, ६. षष्ठी, ७. सप्तमी, ८. अष्टमी, ९. नवमी, १०. दशमी, ११. एकादशी, १२. द्वादशी, |१३. त्रयोदशी, १४. चतुर्दशी तथा १५. पूर्णिमा और ३०. अमावस्या। शुक्लपक्ष की अन्तिम तिथि १५ वीं पूर्णमासी या पूर्णिमा है तथा कृष्ण पक्ष की अन्तिम तिथि ३० वीं अमावस्या है |

सूर्य और चन्द्र के बीच की १२ डिग्री दूरी को एक तिथि कहा जाता हैअमावस्या को सूर्य और चन्द्र एक राशि के समान अंश पर होते हैं। ०° से १२° तक दूरी प्रतिपदा, |१२ से २४ से ३६° तक दूरी होने पर तृतीया होती है। इसी प्रकार पूर्णिमा को सूर्य परस्पर १८०° से तक (अन्तर) शुक्लपक्ष तथा १८०° (उलटे) ०° तक कृष्णपक्ष होता है। १८०° से १६८° तक कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, में १६८° से १५६° तक द्वितीया, दूसरे रूप में इस क्रम की प्रस्तुति इस प्रकार भी हो सकती है। चूंकि क्रान्तिवृत्त में कुल ३६०° ही हो सकते हैं तथा पूर्णिमा को चन्द्र सूर्य से १८०° पर होता है। अतः १८० से १९२° तक कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, १९२° से २०४° तक द्वितीया होगी। इस प्रकार १८०° से ३६० तक कृष्णपक्ष की क्रमशः प्रतिपदा से अमावस्या तक की तिथियाँ होंगी।

संक्षेप में हम इस प्रकार से समझें कि- चन्द्रमा की गति सूर्य से प्रायः तेरह गुना अधिक है। जब इन दोनों कीगति में १२ अंश का अन्तर आ जाता है. तब एक तिथि बनती है। इस प्रकार ३६० अंशवाले ‘भचक्र’ (आकाश-मण्डल) में ३६०: १२-३० तिथियों का निर्माण होता है।यह नैसर्गिक क्रम निरन्तर चल रहा है

 

चन्द्र की दैनिक औसत गति ८०० कला अर्थात् १३.५° मानी गयी है, जिसमें हास और वृद्धि दृष्टिगोचर होती है, क्योंकि सूर्य के चारों ओर घूमती हुई पृथ्वी को समान एवंविपरीत दिशा में चलकर चन्द्र पार करता है। यही कारण हैकि तिथिमान भी घटता-बढ़ता रहता है

तिथिक्षय-वृद्धि

एक तिथि का मान १२ अंश होता है, कम न अधिकसर्योदय के साथ ही तिथि नाम एवं संख्या बदल जाती है। यदि किसी तिथि का अंशादि मान आगामी सर्योदयकाल से पर्व ही समाप्त हो रहा होता है तो वह तिथिसमाप्त होकर आने वाली तिथि प्रारम्भ मानी जायगी और सूर्योदयकाल पर जो तिथि वर्तमान है, वही तिथि उस दिन आगे रहेगीयदि तिथि का अंशादि मान आगामी सूर्योदयकाल के उपरान्त तक चाहे थोड़े ही काल के लिये सही रहता है तो वह तिथि-वृद्धि मानी जायगीयदि दो सूर्योदय काल के भीतर दो तिथियाँ आ जाती हैं तो दूसरी तिथि का क्षय माना जायगा और उस क्षयतिथि की क्रमसंख्या पंचांग में नहीं लिखी जाती तथा वह तिथि अंक छोड़ देते हैं। आशय यह हैकि सूर्योदयकाल तक जिस भी तिथि का अंशादि मान वर्तमान रहता है। चाहे कुछ मिनटों के लिये ही सही, वही तिथिवर्तमान में मानी जाती है। तिथि-क्षय-वृद्धि का आधार सूर्योदयकाल है।

वार (दिन) –

पृथ्वी और सूर्य से घनिष्ठ सम्बन्ध रखने वाले ७ ग्रहों की कक्षानुसार ७ वार निश्चित किये गये, जो सम्पूर्ण विश्व में प्रचलित हैं। वार शब्द (वासर) दिन का ही संक्षिप्त रुप है। १. रविवार या आदित्यवार, २. चन्द्रवार या सोमवार, ३. मंगलवार या भौमवार, ४. बुधवार, ५. गुरुवार या बृहस्पतिवार, ६. शुक्रवार तथा ७. शनिवार । इन वारों के नाम ग्रहों के प्रथम होरा (घण्टा) के आधार पर रखे गये हैं। ग्रहों की स्थिति आकाश में पृथ्वी से ऊपर इस प्रकार है – सबसे निकट चन्द्रमा, उससे ऊपर बुध, उससे उससे ऊपर शुक्र) ऊपर सर्य, सूर्य से ऊपर मंगल, मंगल से ऊपर गरु और सबसे ऊपर शनि। ‘अहोरात्र’ शब्द में प्रथम तथा अन्तिम अक्षर को हटाकर जो शब्द बनता है वह होरा हैएक दिन-रात में २४ होरा होते हैं। होरा का मान १ घण्टे के बराबर है। सृष्टि-रचना के समय सर्वप्रथम सूर्य का प्रथम होरा ||घण्टा) उदय हुआ, अतः प्रथम दिन का नाम ‘रवि होरा’ के आधार पर ‘रविवार’ रखा गया। २४ होराओं में सातों ग्रहों के २४:६-३, (तीन) फेरों के बाद, चौथे फेरे में पहला होरा चन्द्रमा का पड़ा तो अगले वार का नाम चन्द्रमा पर चन्द्रवार अर्थात् सोमवार रखा गयाइसके बाद क्रमश: मंगल, बुध, गरु, शक्र और अन्त में शनि का प्रथम होरा आने पर इन ग्रहों के नाम पर शेष वारों के नाम रखे गये। यह नामकरण सर्वत्र प्रचलित है। इनका क्रम नहीं बदलता।

ईसवी सन्, विक्रम सम्वत्, शक सम्वत्, हिजरी सन् आदि में सामंजस्य

ईसवी सन् + ५७ = विक्रम सम्वत्ई

सवी सन् (-) ७८ = शक सम्वत्

शक सम्वत् + ७८ ईसवी सन्

विक्रम सम्वत् (-)५७ = ईसवी सन्

विक्रम सम्वत् (-) १३५ शक सम्वत्

ईसवी सन् (-) ५८३ = हिजरी सन्

हिजरी सन् (-) १० = फसली सन्

फसली सन् (-) १ . = बँगला सन्

शक सम्वत् (-) ५०० = हिजरी सन्

प्रचलित ईसवी सन्, सम्वत्सर आदि ईसवी सन् –

ईसा मसीह के जन्मदिन से माना जाता है। जनवरीमाह से प्रारम्भ होकर दिसम्बर माह तक १२ माह का हो ।

विक्रम सम्वत् –

यह सम्वत् उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य ने चलाया था। यह प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ला प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है। इसमें दिन, वार और तिथि का प्रारम्भ सूर्योदय से माना जाता है। शक सम्वत्/राष्ट्रिय सम्वत् –

यह सम्वत् शालिवाहन नामक हैं। नृपति ने चलाया थाइसे अब राष्ट्रिय सम्वत् की मान्यता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार कनिष्क प्रथम को इस सम्वत् का प्रवतक माना जाता है। भारत में केन्द्र सरकार के निर्णय के अनुसार २२ मार्च १९५७ से शक सम्वत् को ‘राष्ट्रियसम्वत्’ घोषित कर रखा है। यह प्रतिवर्ष २२ मार्च से प्रारम्भ होता है।

बाँगला सम्वत् –

बाँगला सम्वत् मेष की संक्रान्ति से प्रारम्भ होता है। मीन की संक्रान्ति से बंगाली चैत्रमास तथा मेष की संक्रान्ति से वैशाख मास प्रारम्भ होता है। वर्षारम्भ संक्रान्ति के दूसरे दिन से पहली तारीख गिनते हैं|

इस प्रकार से यह निर्विवाद सत्य है कि भारतीय कालगणना विश्व की प्राचीनतम, सूक्ष्मतम, शुद्धतम तथा विश्वनीय गणना है। यह हमारी संस्कृति की अनुपम देन है। हम सबका यह कर्तव्य है कि हम भारतीय काल-गणना का सही ज्ञान अपनी भावी पीढ़ी को करायें, ताकि वे पश्चिम के अन्धभक्त न बनकर भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान की महानता को स्वीकार करते हुए उसके संरक्षण एवं संवर्द्धन का सतत प्रयास करते रहें(स्रोत : सूर्यसिद्धान्त)

प्रेमचंद का शनिश्चरी किस्सा

 

प्रेमचंद का शनिश्चरी किस्सा

(सम्पादकीय टिप्पणी – उत्तरप्रदेश के जिला प्रतापगढ़ स्थित कालाकांकर रियासत के तत्कालीन राजकुमार श्री सुरेशसिंह जी का अपन बड़े भाई एवं कालाकांकार के राजा श्रीयत अवधेश सिंह के साथ हिन्दी के प्रख्यात कथाकार एवं उपन्यासलेखक मुखी प्रेमचन्द के साथ सन् १९२८ में जो मलाकात हई थी. उसका एक रोचक एवं सत्रीय चित्रण हिन्दी को प्रख्यात मासिक पत्रिका कादम्बिनी के जुलाई १९७० के अंक में प्रकाशित हुआ था।

ज्ञातव्य है कि कालाकांकर के समीपस्थ ही जिला सुलतानपुर की अमेठी रियासत भी है, जिसके राजा रणञ्जय सिंह एवं उनके पूर्वज भी आर्यसमाज से बहुत प्रभावित थेराजा रणजय सिंह तो वर्षों तक उत्तरप्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान भी रहे हैं।

कालाकांकर के राजा अवधेश सिंह द्वारा प्रदत्त जमीन पर ही आर्यसमाज प्रतापगढ़ आज भी स्थापित है। इस प्रकार ये दोनों राजपरिवार आर्यसमाज के सिद्धान्तों एवं मान्यताओं पर प्रगाढ़ निष्ठा रखते थे|

आर्यसमाज के महोपदेशक एवं प्रसिद्धसंस्कृत-लेखक डॉ. प्रशस्यमित्र शास्त्री ने हिन्दी की सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘कादम्बिनी’ में लगभग पचास वर्ष पूर्व प्रकाशित यह विवरण हमें उपलब्ध कराया है। हम डॉ. शास्त्री जी को धन्यवाद देते हुए यह विवरण अविकल प्रकाशित कर रहे हैं। इसे पढ़कर आप जान सकेंगे कि कैसे आज भी शनिश्चर आदि ग्रहों की पूजा एवं उनका भय दिखाकर पण्डे पुजारी सामान्य जन को लूटते रहते हैं तथा अन्धविश्वासी लोग इनके फेर में पड़कर दु:ख प्राप्त करते हैं                                  – शिवदेव आर्य (कार्यकारी सम्पादक))

                10-

लखनऊ में वे अक्सर प्रेमचन्द जी से मिलने उनके |घर जाते थे। एकबार मैं भी उनके साथ गया और उस (महान् साहित्यकार के दर्शन किए। उस समय वहाँ अन्य  सज्जन भी बैठे थे। हम लोग भी उस गोष्ठी में सम्मिलित हो गए और इधर-उधर की बातें होने लगीं। उसी समय एक पण्डित जी हाथ में तेल भरा कटोरा लिए जिसमें लोहे के शानिश्चर भगवान की मूर्ति आकंठ डूबी थीवे प्रत्येक पर दरवारे पर जाकर शनिश्चर भगवान के आगमन की सूचना , देकर लोगों से पैसे वसूल कर रहे थे। प्रायः प्रत्येक घर से स्त्रियाँ उन्हें कुछ-न-कुछ दे रही थीं।

मेरे भाई साहब कट्टर आर्यसमाजी थे. अतः उन्होंने प्रमचन्द जी से कहा – ‘आपने शनिश्चर भगवान को कल आपत नहीं किया, कहीं वे खफा न हो जाएं।”

प्रेमचन्द जी बोले – मेरे शनिश्चर भगवान क्या करेंगे? आपको इसी सम्बन्ध में एक किस्सा सुनाता हूँ। एक सज्जन के ग्रह खराब थे। साढ़े साती शनिश्चर का प्रकोप थालोगों ने उन्हें सलाह दी कि वे किसी पण्डित से शान्ति का उपाय पता करें।

वे एक पण्डित जी के पास गए और अपनी सारी दुःख-गाथा सुनाई। पण्डित जी ने यह सोचकर कि अच्छा आदमी है, कहा – ‘इसमें तो काली वस्तु का दान लिखा है। गज-दान से आपका संकट टल जाएगा|

उन्होंने कहा – ‘अरे महाराज! गज-दान तो मेरे सामर्थ्य के बाहर की बात है। कुछ ऐसा बताइए जो मैं कर सकूँ ।’

पण्डित जी ने कहा – ‘तो कौस्तभ मणि नीलम |मणि-ऐसी ही किसी मणि का दान करो।’

वे इसके  लिए भा तयार न हुए ता पाण्डत जा न विचार करके कहा – ‘तो एक भैंस का दान कर दोसंकट टल जाएगा’ लेकिन भैंस देने के लिए भी यजमान राजी नहीं हुआ

पण्डित जी ने कुछ सोचकर कहा – ‘तब ऐसा करो एक बोरा उड़द का दान कर दो, संकट दूर हो जाएगा’ लेकिन उसके लिए एक बोरा उड़द देना भी सम्भव नहीं था।’

पण्डित जी ने कहा – ‘तब एक काली कमली काप्रवन्ध करो।’ लेकिन काली कमली भी आजकल पन्द्रह-बीस रुपये से कम में नहीं आती, अत: उन्होंने इससे भी इनकार कर दिया। पण्डित जी का धैर्य टूट रहा था, लेकिन वे अपने यजमान को छोड़ना नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने कहा ‘तो लोहे की एक छुरी का ही दान कर दो।’ लेकिन लोहे की छुरी मुफ्त में तो मिलती नहीं, उसमें भी डेढ-दो रुपये लगते ही हैं। यजमान ने उसके लिए भी अपनी असमर्थता प्रकट की

इतना कहकर प्रेमचन्द जी बोले ‘राजा साहब ! मेरी भी हालत उसी आदमी की तरह है। मेरा भला शनिश्चर क्या बिगाड़ेंगे? आप आर्यसमाजी हैं, आपको भी कुछ डर नही नहीं है। उनसे तो धनवानों को डरना चाहिए।’

उनके द्वारा बताई इस रोचक कथा के कारण उनका प्रथम दर्शन आज भी मेरी स्मृति में ताजा बना हुआ है।

दुर्गा-पूजा दुर्गा-अष्टमी |

दुर्गा-पूजा दुर्गा-अष्टमी

बंगाल से लेकर पूरे देश में इसका बड़ा महात्म्य है | बड़े-बड़े पण्डित आयेंगे, दुर्गा-पूजन से लेकर दुर्गा-हवन तक करेंगे | यजमान को प्रभावित करने के लिए उसके सामने बहुत सारे मन्त्र बोले जायेंगे | यजमान को यह लगना चाहिये कि दुर्गा-पूजा के अवसर पर दुर्गा से सम्बन्धित मन्त्र भी बोला गया इसलिए वेद-मन्त्र भी खोजना होगा ताकि वह प्रभावित हो (ब्राह्मणों का एक अकथित नियम सा बन गया है की यजमान को प्रकाशित न करो परन्तु प्रभावित कर दो और दक्षिणा लेकर चलते बनो, इसमें दोष यजमानों का भी है क्यों कि वे “आँख के अन्धे-गाँठ के पूरे” बने बैठे रहते हैं जिसका लाभ ब्राह्मण-वर्ग उठाता रहता है | यदि यजमान ने रुचिपूर्वक और ब्राह्मण ने ज्ञान-पूर्वक संस्कार करवाया होता तो आज की स्थिति कहीं अच्छी होती इसलिए दोष दोनों का है|)

अपने यजमान को प्रभावित करने के लिए ही ब्राह्मण प्रायः निम्न प्रयोग करते रहते हैं :-

१) यदि शनैश्चर (शनि-देवता) की पूजा करनी है तो “शन्नो देवीरभिष्टये” (यजुर्वेद 36/12) मन्त्र बोला जाता है | जिसका शनि के साथ निकट का नहीं तो दूर का भी सम्बन्ध नहीं है |

२) राहू की पूजा करने के लिए “कया नश्चित्रा” मन्त्र का पाठ करते हैं

३) बुध ग्रह पूजा के लिए “उद् बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि” (यजुर्वेद 15/54) बोला जाता है

इसी प्रकार से दुर्गा की पूजा करनी हो तो निम्न वेद-मन्त्र का पाठ करते हैं |

जा॒तवे॑दसे सुनवाम॒ सोम॑मरातीय॒तो नि द॑हाति॒ वेद॑: ।

स न॑: पर्ष॒दति॑ *दु॒र्गाणि॒* विश्वा॑ ना॒वेव॒ सिन्धुं॑ दुरि॒तात्य॒ग्निः ॥

ऋग्वेद 01/99/01

पाठक स्पष्ट देख पा रहे होंगे की इस मन्त्र में दुर्गा पद आया है (फिर चाहे वह दुर्गाणि ही क्यों न हो) | ब्राह्मण भी जब मन्त्र बोलते हैं तब दुर्गा(णि) आने पर जोर से बोलते हैं ताकि यजमान को पता चल जाये की दुर्गा का विशेष मन्त्र बोला गया |

यहाँ विचार करना है की दुर्गा देवी के साथ दुर्गाणि का सम्बन्ध कैसे है ?

मन्त्र में “दुर्गाणि” शब्द आया है, जिसका अर्थ (महर्षि दयानन्द जी को छोड़ भी दिया जाये तब भी) सायणाचार्य जी ने “विश्वा विश्वानि सर्वाणि दुर्गाणि दुर्गमनानि भोक्तुमावश्यकानि दुःखानि” किया है | दुःखों को तैरने (पार करने) के लिए प्रार्थना की गई है | दुर्गाणि का अर्थ दुर्गम स्थितियाँ है |

देखने वाली बात यह है कि :- महर्षि दयानन्द जी को न मानने वाले और सायणाचार्य जी को ही मानने वाले पण्डित/ब्राह्मण इस मन्त्र का दुर्गापूजा में किस प्रकार गलत तरीके से प्रयोग करते हैं, सायणाचार्य जी को भी मात कर दिया है और दुर्गा पूजा में इस मन्त्र को जोड़ा जाने लगा |

महर्षि दयानन्द जी ने अपने वेद-मन्त्र भाष्य में दु॒र्गाणि॒ पद का अर्थ किया है “दुःखेन गन्तुं योग्यानि स्थानानि” किया है | अब बतलाइये ! दुर्गा के लिए दु॒र्गाणि॒ पद वाला मन्त्र पढ़ना कितना उचित है | ऐसा ही अर्थ/भाष्य ऋग्वेद 07/60/12 में भी में किया है “दुःख से जाने योग्य कामों का” ।

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पाठक की स्वाभाविक इच्छा होगी की इस मन्त्र का विनियोग किसने कब कहाँ किया है ? तो एक पुस्तक है पूना से छपी है जिसका नाम है संस्काररत्नमाला जिसमें इसका प्रयोग “दुर्गाप्रीत्यर्थ बलिदाने विनियोग:” (पृष्ठ 118) अर्थात् दुर्गा की प्रीति के लिए बलिदान करते समय इस मन्त्र को बोलना चाहिये | आगे लिखा है “दुर्गावाहने विनियोग:” अर्थात् दुर्गा के वाहन में इस मन्त्र को बोलना चाहिए | जबकि दुर्गा का वेद मन्त्र में नाम तक नहीं है |

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विनियोग का अर्थ होता है वि(विशेषतया) + नि (निश्चय से) योग (लगाना) = अर्थात् किसी मन्त्र का किसी क्रिया में लगाना , Application of a mantra । यदि किसी मन्त्र का जो अर्थ है वह उस क्रिया के साथ ठीक बैठ जाता है तब वह विनियोग ठीक है । यदि कोई व्यक्ति “शन्नो देवी’ मन्त्र बोल कर व्यायाम करें तो यह विनियोग ठीक नहीं माना जायेगा परन्तु आचमन करे तो विनियोग उचित कहलायेगा । *यह विनियोग ऋषिकृत है या पुरुषकृत है, ईश्वरकृत या अपौरुषेय नहीं है ।*

इस के साथ यजमानों से निवेदन है की कृपया मेरी इस प्रस्तुति/पोस्ट को ब्राह्मणों के विरुद्ध न लें परन्तु अपने विरुद्ध लें और जागृत बनें, शब्द-अर्थ को जानें, *योग्य-विद्वान्-सात्त्विक-धार्मिक-परोपकारप्रिय-सत्योपदेष्टा ब्राह्मण से ही संस्कार करवायें और स्वयं भी सीखें | यज्ञ-संस्कार आदि सीखने के लिए आर्य समाज नियमित आयें |*

धन्यवाद

*सादर*

विदुषामनुचर

विश्वप्रिय वेदानुरागी

*(प्रस्तुत लेख का आधार पण्डित ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु के लेखों का संग्रह “जिज्ञासु रचना मञ्जरी” पृष्ठ 238-239 है | वेदमन्त्रों का विनियोग नामक लेख को पाठक विस्तार से पढ़ें |)*