मनुस्मृति और नारी जाति

मनुस्मृति और नारी जाति

डॉ विवेक आर्य

भारतीय समाज में एक नया प्रचलन देखने को मिल रहा है। इस प्रचलन को बढ़ावा देने वाले सोशल मीडिया में अपने आपको बहुत बड़े बुद्धिजीवी के रूप में दर्शाते है। सत्य यह है कि वे होते है कॉपी पेस्टिया शूरवीर। अब एक ऐसी ही शूरवीर ने कल लिख दिया मनु ने नारी जाति का अपमान किया है। मनुस्मृति में नारी के विषय में बहुत सारी अनर्गल बातें लिखी है। मैंने पूछा आपने कभी मनुस्मृति पुस्तक रूप में देखी है। वह इस प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर एक नया कॉपी पेस्ट उठा लाया। उसने लिखा-

“ढोल, गंवार , शूद्र ,पशु ,नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।”

मेरी जोर के हंसी निकल गई। मुझे मालूम था कॉपी पेस्टिया शूरवीर ने कभी मनुस्मृति को देखा तक नहीं है। मैंने उससे पूछा अच्छा यह बताओ। मनुस्मृति कौनसी भाषा में है? वह बोला ब्राह्मणों की मृत भाषा संस्कृत। मैंने पूछा अच्छा अब यह बताओ कि यह जो आपने लिखा यह किस भाषा में है। वह फिर चुप हो गया। फिर मैंने लिखा यह तुलसीदास की चौपाई है। जो संस्कृत भाषा में नहीं अपितु अवधी भाषा में है। इसका मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। मगर कॉपी पेस्टिया शूरवीर मानने को तैयार नहीं था। फिर मैंने मनुस्मृति में नारी जाति के सम्बन्ध में जो प्रमाण दिए गए है, उन्हें लिखा। पाठकों के लिए वही प्रमाण लिख रहा हूँ। आपको भी कोई कॉपी पेस्टिया शूरवीर मिले तो उसका आप ज्ञान वर्धन अवश्य करना।

मनुस्मृति में नारी जाति

यत्र नार्य्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रऽफलाः क्रियाः। मनुस्मृति 3/56

अर्थात जिस समाज या परिवार में स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्यगुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं।

पिता, भाई, पति या देवर को अपनी कन्या, बहन, स्त्री या भाभी को हमेशा यथायोग्य मधुर-भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रखना चाहिए और उन्हें किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं पहुंचने देना चाहिए। -मनुस्मृति 3/55

जिस कुल में स्त्रियां अपने पति के गलत आचरण, अत्याचार या व्यभिचार आदि दोषों से पीड़ित रहती हैं। वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल में स्त्री-जन पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है। -मनुस्मृति 3/57

जो पुरुष, अपनी पत्नी को प्रसन्न नहीं रखता, उसका पूरा परिवार ही अप्रसन्न और शोकग्रस्त रहता है और यदि पत्नी प्रसन्न है तो सारा परिवार प्रसन्न रहता है। – मनुस्मृति 3/62

पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं, अत: साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति-पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए।-मनुस्मृति 9/96

ऐश्वर्य की कामना करने हारे मनुष्यों को योग्य है कि सत्कार और उत्सव के समयों में भूषण वस्त्र और भोजनादि से स्त्रियों का नित्यप्रति सत्कार करें। मनुस्मृति

पुत्र-पुत्री एक समान। आजकल यह तथ्य हमें बहुत सुनने को मिलता है। मनु सबसे पहले वह संविधान निर्माता है जिन्होंने जिन्होंने पुत्र-पुत्री की समानता को घोषित करके उसे वैधानिक रुप दिया है- ‘‘पुत्रेण दुहिता समा’’ (मनुस्मृति 9/130) अर्थात्-पुत्री पुत्र के समान होती है।

पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार मनु ने माना है। मनु के अनुसार पुत्री भी पुत्र के समान पैतृक संपत्ति में भागी है। यह प्रकरण मनुस्मृति के 9/130 9/192 में वर्णित है।

आज समाज में बलात्कार, छेड़खानी आदि घटनाएं बहुत बढ़ गई है। मनु नारियों के प्रति किये अपराधों जैसे हत्या, अपहरण , बलात्कार आदि के लिए कठोर दंड, मृत्युदंड एवं देश निकाला आदि का प्रावधान करते है। सन्दर्भ मनुस्मृति 8/323,9/232,8/342

नारियों के जीवन में आनेवाली प्रत्येक छोटी-बडी कठिनाई का ध्यान रखते हुए मनु ने उनके निराकरण हेतु स्पष्ट निर्देश दिये है।

पुरुषों को निर्देश है कि वे माता, पत्नी और पुत्री के साथ झगडा न करें। मनुस्मृति 4/180 इन पर मिथ्या दोषारोपण करनेवालों, इनको निर्दोष होते हुए त्यागनेवालों, पत्नी के प्रति वैवाहिक दायित्व न निभानेवालों के लिए दण्ड का विधान है। मनुस्मृति 8/274, 389,9/4

मनु की एक विशेषता और है, वह यह कि वे नारी की असुरक्षित तथा अमर्यादित स्वतन्त्रता के पक्षधर नहीं हैं और न उन बातों का समर्थन करते हैं जो परिणाम में अहितकर हैं। इसीलिए उन्होंने स्त्रियों को चेतावनी देते हुए सचेत किया है कि वे स्वयं को पिता, पति, पुत्र आदि की सुरक्षा से अलग न करें, क्योंकि एकाकी रहने से दो कुलों की निन्दा होने की आशंका रहती है। मनुस्मृति 5/149, 9/5- 6 इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनु स्त्रियों की स्वतन्त्रता के विरोधी है| इसका निहितार्थ यह है कि नारी की सर्वप्रथम सामाजिक आवश्यकता है -सुरक्षा की। वह सुरक्षा उसे, चाहे शासन-कानून प्रदान करे अथवा कोई पुरुष या स्वयं का सामर्थ्य।

उपर्युक्त विश्‍लेषण से हमें यह स्पष्ट होता है कि मनुस्मृति की व्यवस्थाएं स्त्री विरोधी नहीं हैं। वे न्यायपूर्ण और पक्षपातरहित हैं। मनु ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा जो निन्दा अथवा आपत्ति के योग्य हो।

वेद सन्देश जीवन के संदर्भ में

वेदा वदन्ति ।

सन्देश पीपल के पत्तों का

अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता । यजु-३५-४

अश्वत्थ ( पीपल के वृक्ष ) पर तुम्हारी बैठना है ,पत्ता तुम्हारा वसति:-वास है ।

You are sitting on अश्वत्थ tree and live on the leaves.

हम तनिक अपनी मानसिकता पर विचार करें । हम प्राय: असत्य को सत्य ,चंचल को स्थिर ,जड़ को चेतन ,अनित्य को नित्य ,अपयश को यश ,बुराईको अच्छाई समझते हैं । हम संसार में आकर समझते हैं कि हमें सदैव यहाँ रहना है और मौज मस्ती करनी है ।
महात्मा युधिष्ठिर से यक्ष ने पूछा – इस संसार में आश्चर्य क्या है ,उन्हों ने जो उत्तर दिया वह त्रिकाल सत्य है ,उन्हों ने कहा –
अहन्यहनि गच्छन्ति भूता इह यमालयम् ।
अन्ये स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमत: परम् ।।
प्रतिदिन अर्थियों पर प्राणी श्मशान की ओर जा रहे हैं ,लोग अपने बन्धु बान्धवों को अपने हाथों से चितायें बना बना कर जलारहे हैं । परन्तु उन्हें कभी यह विचार नहीं आता कि उनकी गति भी ऐसी हीहै ।दो पाटन के बीच में ख़ाली रहा न कोय ।इस संसार रूपी चक्की में सभी पिस रहे हैं ।यहाँ कोई भी स्थिर नहीं है ,यहाँ जैसे ही कोई उत्पत्ति होती है उसके साथ ही साथ विनाश भी प्रारम्भ हो जाता है ,संयोगाः विप्रयोगान्ता: , हमारा जन्मदिवस नहीं है परन्तु आयुन्यूनता सूचक दिवस है – हमारी इतनी आयु कम हो गई – यह बताता है ।तब भी अपनी शेष आयु के लिये सावधान नहीं होते , असाध्य को साध्य समझते हुये पूरी जीवन उसी में बिता देते हैं । ये इन्द्रियों के भोग ,विषय ,धन दौलत जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिये साधन हैं ,ये मानव ता के घातक नहीं साधक हैं ।
किसी भी पदार्थ में जब स्थिरता नहीं है तो फिरहम स्थिरता की कामना ही क्यों करते हैं ? उपरोक्त वेद की सूक्ति स्पष्ट ही हमारी अस्थिरता को बता रही है – वह कहती है अश्वत्थ पर तुम्हारी बैठक है ,अश्वत्थ पीपल का वृक्ष होता है ,यह संस्कृत शब्द बडा ही सार्थक है – य: श्वो न स्थास्यति स: – जो कल नहीं ठहरेगा । भोगापवर्गार्थं दृश्यम् – हम अपने नैतिक जीवन निर्माण के कार्यों को ,परमात्म प्राप्ति के उपायों को ,ज्ञानादि मोक्ष के साधनों को कल पर छोड़ते हुये चले जाते हैं अभी तो समय नहीं है कल कर लेंगे जब कि शुभस्य शीघ्रं होना चाहिये । कौन जानता है कि वह कल आयेगा भी या नहीं ,कल तक रह भी पायेंगे या नहीं । इसका क्या प्रमाण है । अश्वत्थ को चलदल भी कहते हैं ,जिसका अर्थ है चंचल पत्तों वाला । पीपल के पत्ते प्रायः हिलते रहते हैं मानों वे घोषणा कर रहे हैं – पर्णे वो वसतिश्कृता – पत्ते पर तुम्हारा वास है – पता नहीं कब वायु का झोंका आये और वह नीचे गिर जाये जो स्वयं क्षण भंगुर है उसका आश्रय लेने वाला भीनिश्चित ही क्षण भंगुर है ।

निस्सन्देह यह सब दृश्यमान जगत् अस्थायी है परन्तु इसमें एक अमर तत्त्व भी विद्यमान है जिसे हम संसार के द्वारा ,क्षण भंगुर शरीरके द्वाराही प्राप्तकर सकते हैं । इसी में हमारी कुशलताहै किइस अचेतन तत्त्व से चेतन तत्त्व को प्राप्त करें ,अनित्य सेनित्य चेतन को प्राप्तकरें ।

महर्षि याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषद में मैत्रेयी से कहते हैं-य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोन्तरो -जो परमेश्वर – आत्मा अर्थात् जीव में स्थित हो कर भी जीव से भिन्न है , जिसको मूढ़ जीवात्मा नहीं जानता है कि वह परमात्मा मेरे अन्दर व्यापक है ,यदि जानता होता तो वह कभी कुकर्म नहीं करता , मानव बनता। दानव नहीं ,सदाचारी बनता दुराचारी नहीं ,रक्षक बनता भक्षक नहीं ,परमात्मा की वेदोपदिश्ट आज्ञाओं का पालन करके मोक्षाधिकारी बनता ,जन्मजन्मान्तर तक भटकता नहीं ।इस लिये कहा जैसे शरीर में जीव रहता है वैसे ही जीव में परमेश्वर व्यापक है ,उसको तू जान । अन्यत्र कहा – आत्मा वा अरे श्रोतव्यो ,मन्तव्यो ,निदिध्यासितव्य इति एषोपनिषत् ,एषा वेदोपनिषत् ।

क्षण भंगुर शरीर में रहने वाले जीवों की यही सार्थकता है कि हम उस परमेश्वर को ज्ञान के द्वारा ,योगांगों के द्वारा जानने का प्रयास करें ,जिसके लिये हमारे जन्म जन्मांतर व्यतीत हो जाते हैं ।उसी परमेश्वर के लिये आता है –
नित्यो sनित्यानां ,चेतनश्चेतनानाम् ,
एको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तमात्मस्थं येsनुपश्यन्ति धीरा: ,
तमाहुरग्र्यं पुरुषं प्रमाणम् ।।

उतो तदद्य विद्याम यतस्तत् परिषिच्यते । वेद ।
हम सब का कर्तव्य है उस सत्ता को जानें जिससे सबको जीवन मिलता है ।

आज का पंचांग

?? नमस्ते जी ??

?आपका दिन शुभ हो ?

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? 20 जुलाई 2019 ?
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दिन —– शनिवार
तिथि — तृतीया
नक्षत्र —- शतभिषा
पक्ष —— कृष्ण
माह– — श्रावण
ऋतु ——– वर्षा
सूर्य दक्षिणायणे,उत्तर गोले
विक्रम सम्वत –2076
दयानंदाब्द — 195
शक सम्बत — 1941
कलयुगाब्द — 5121
मन्वतर —-वैवस्वत (सप्तम)
सृष्टि सम्वत–1960853120
#शुक्र अस्त पूर्व

? पहला सुख निरोगी काया नीम की निंबोली गिरी 10 ग्राम और बड़ी हरड़ का बक्कल 20 ग्राम लेकर चूर्ण बना लें । 2 ग्राम से 5 ग्राम तक धारोष्ण गोदुग्ध में कुछ मिश्री या शक्कर डाल कर दो तीन बार दें, इससे बार-बार खूनी दस्त जाना और दर्द दूर होता है। यह दिव्य औषधि है

?आज का विचार
मर्यादाओं को तोड़ने से मानवता खतरे में पड़ जाती है!

?एक निवेदन: बिना हेल्मेट के बाइक,बिना सीट-बेल्ट के कार मत चलाइए ! वर्षा ऋतु है एक दो वृक्ष अवश्य लगाइए!

? आज का वैदिक भजन ?

कविता छोटी है,परंतु सारांश बड़ा है

वाह रे जिंदगी

    “”””””””””””””””””‘””””
    * दौलत की भूख ऐसी लगी की कमाने निकल गए *
    * ओर जब दौलत मिली तो हाथ से रिश्ते निकल गए *
    * बच्चो के साथ रहने की फुरसत ना मिल सकी *
    * ओर जब फुरसत मिली तो बच्चे कमाने निकल गए *
    वाह रे जिंदगी
    “”””””””””””””””””‘””””

    वाह रे जिंदगी
    “”””””””””””””””””‘””””
    * जिंदगी की आधी उम्र तक पैसा कमाया*
    *पैसा कमाने में इस शरीर को खराब किया *
    * बाकी आधी उम्र उसी पैसे को *
    * शरीर ठीक करने में लगाया *
    * ओर अंत मे क्या हुआ *
    * ना शरीर बचा ना ही पैसा *
    “”””‛””””””””””””””””””””””””””””'””””””””””
    वाह रे जिंदगी
    “”””””””””””””””””‘””””

    वाह रे जिंदगी
    “”””””””””””””””””‘””””
    * शमशान के बाहर लिखा था *
    * मंजिल तो तेरी ये ही थी *
    * बस जिंदगी बित गई आते आते *
    * क्या मिला तुझे इस दुनिया से *

    * अपनो ने ही जला दिया तुझे जाते जाते *
    वाह रे जिंदगी

    ? आज का वैदिक भजन ?
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम
    बन जाऊँ बन्दा मैं तेरा हे कृपानिधान

    ऐसी कृपा करो प्रभु मेरे
    मिटे मन की तृष्णा और बन जायें तेरे
    सबसे हो प्रीति और बन जाये जीवन महान्
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम

    प्रभु!मुझको पिला दो कोई अमृत का प्याला
    रँग दे इस दिल को हम, कर दो मतवाला
    मेरा है तन-मन सब कुछ तुझपे कुर्बान
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम

    सदा पकड़ो मेरी बाहें
    कहीं भटक न जायें
    विषयों में फंस कर हम बहक न जायें
    जिस दिन तू निकले बिसर जाये मेरी जान
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम
    स्वर :- पूज्य स्वामी रामदेव जी
    इस भजन की तुलना वेद मन्त्र से करें :-
    “सांसों की माला पे सिमरू मैं प्रभु का नाम”

    वायुमारोह धर्मणा (धर्मणा वायुम् आरोह) सामवेद 483
    कोई श्वास भक्तिरस से रिक्त न रहजाए।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अमूल्य उपदेश (भाग ३)

२१. जो दुष्ट कर्मचारी द्विज को श्रेष्ठ, कर्मकार शूद्र को नीच मानें तो इसके परे पक्षपात् अन्याय, अधर्म दूसरा अधिक क्या होगा।

२२. जो विद्यादि सद्गुणों में गुरुत्व नहीं है झूठमूठ कण्ठी, तिलक, वेद विरुद्ध मन्त्रोपदेश करने वाले हैं वे गुरु ही नहीं किन्तु गडरिये हैं। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२३. “जो धर्मयुक्त उत्तम काम करे, सदा परोपकार में प्रवृत्त हो, कोई दुर्गुण जिसमें न हो, विद्वान् सत्योपदेश से सब का उपकार करे, उसको साधु कहते हैं।” (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२४. जैसे गृहस्थ व्यवहार और स्वार्थ में परिश्रम करते हैं उनसे अधिक परिश्रम परोपकार करने में संन्यासी भी तत्पर रहें तभी सब आश्रम उन्नति पर रहें। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२५. संन्यासियों का मुख्य कर्म यही है कि सब गृहस्थादि आश्रमों को सब प्रकार के व्यवहारों का सत्य निश्चय करा अधर्म व्यवहारों से छुड़ा सब संशयों का छेदन कर सत्य धर्मयुक्त व्यवहारों में प्रवृत्त करें। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ५)

२६. उत्तम दाता उसको कहते हैं जो देश, काल को जान कर सत्य विद्या धर्म की उन्नति रूप परोपकारार्थ देवे। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२७. जिसके शरीर में सुरक्षित वीर्य रहता है तब उसको आरोग्य, बुद्धि, बल, पराक्रम बढ़ के बहुत सुख की प्राप्ति होती है। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास २)

२८. अनेक प्रकार के मद्य, गांजा, भांग, अफीम आदि- जो-जो बुद्धि का नाश करने वाले पदार्थ हैं उनका सेवन कभी न करें। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास १०)

२९. देखो जब आर्यों का राज्य था तब महोपकारक गाय आदि नहीं मारे जाते थे, तभी आर्यावर्त्त व अन्य भूगोल देशों में बड़े आनन्द में मनुष्यादि प्राणी वर्त्तते थे क्योंकि दूध, घी, बैल आदि पशुओं की बहुताई होने से अन्न रस पुष्कल होते थे। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास १०)

३०. इन पशुओं के मारने वालों को सब मनुष्यों की हत्या करने वाले जानियेगा। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास १०)

उषा पृथ्वी के पूर्व के आधे भाग को अपनी लालिमा से भर देती है।

उषा पृथ्वी के पूर्व के आधे भाग को अपनी लालिमा से भर देती है। उषा की किरणें सूर्य का आगाज़ करती है, और दिन निकलने की घोषणा कर देती है। उसी प्रकार देवत्व के योद्धा मानवता के कल्याण करने के लिए अपने अस्त्र-शस्त्रों को चमकाते हैं। (सामवेद -१७५५)

प्रत्येक जीवात्मा सुख पाना चाहती है निरन्तर सुख की ओर दौड़ रही है परंतु मंजिल प्राप्त नहीं कर पा रही है।
भोग योनियाँ तो बन्धन में हैं
न तृतीये तथा उप्लब्धे: वेदांतदर्शन३-१-१८,
अर्थात उनके लिए तो वैसे ही सुविधा नहीं वे तो निम्न योनि के प्राणी हैं मगर जो मानवयोनि पितृयान को प्राप्त कर देवयान अर्थात मोक्ष मार्ग का सुख लेना चाहती है उनके लिए सुंदर अवसर है।
ऐसा नहीं है कि उन्हें ज्ञान नहीं, ज्ञान भी प्राप्त कर ज्ञानी हो जाती है परंतु फिर भी मंजिल नहीं मिल पाती,
क्योंकि एक भूल उससे हो
रही है जो कि रोड़ा है पद, पैसा, प्रतिष्ठा, पुत्र पति पत्नी-परिवार से मोह,
परमात्मा को यह सब चाहिए नहीं,
क्योंकि उसके पास जाने वाला भी उसके परिवार का सदस्य है और नहीं जाने वाला भी।
वह तो आपका निष्काम भाव से किया कर्म और अपने प्रति श्रद्धा भक्ति देखता है।
अतः भूल से बचें, मूल को पकड़ें, विकृति की आयी धूल छंटने पर पूर्ण प्रकाश पूर्ण सुख
-दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या

प्रतिभाद वा सर्वम्।।
-महर्षि पतंजलि कृत योगदर्शन विभूतिपाद सूत्र-३३,
शब्दार्थ
प्रातिभाद-प्रातिभ नामक ज्ञान से,
वा -अथवा,
सर्वम्- सब कुछ जान लेता है।
सूत्रार्थ
-अथवा प्रातिभ ज्ञान से अनेक पदार्थों का ज्ञान होता है।
इससे पूर्व सूत्र में मूर्धा के सात्विक प्रकाश में संयम के फल सिद्ध दर्शन को जानने का प्रयास किया।
प्रस्तुत सूत्र में प्रातिभ ज्ञान से अनेक पदार्थों के ज्ञान होने का कथन है।
महर्षि व्यास भाष्य करते हुए कहते हैं– प्रातिभ तारक नामक ज्ञान होता है। वह विवेकज ज्ञान का पूर्व रूप है वह प्रातिभ ज्ञान ऐसा ही होता है जैसे सूर्योदय के पूर्व प्रभा होती है उस प्रातिभ ज्ञान की उत्पत्ति के होने पर योगी उसके द्वारा सबको जानता है।
सर्वप्रथम इस प्रातिभ ज्ञान को ही समझने का प्रयास करते हैं।
यह ज्ञान स्वयं के अंदर से ही उत्तम संस्कारों के कारण पूर्व ही उत्पन्न होता है।
कहने का भाव यह है कि विवेकज ज्ञान से पहले का रूप ही प्रातिभ ज्ञान है।
वास्तव में जो पूर्व ही ज्ञानमय लालिमा रूप में भासे वही तो प्रातिभ है।
जैसे सूर्योदय से पूर्व की लालिमा दिखाई देती है। सूर्य उदय बाद में होता है ठीक उसी तरह विवेकज ज्ञान से पहले की ज्ञानमय लालिमा प्रातिभ नाम से जानी जाती है। यह ज्ञान किसी बाहर के निमित्त से उत्पन्न नहीं होता बल्कि पूर्व जन्म व इस जन्म दोनों के उत्तम संस्कार सुदृढ़ योगाभ्यास वेद आदि सत्य शास्त्रों के अध्ययन अध्यापन सत्संग आदि धर्म के आचरण से भीतर से ही पूर्व उत्पन्न होता है।
किसी किसी व्यक्ति में छोटी आयु में ही यह प्रातिभ ज्ञान देखा गया है ध्रुव, प्रह्लाद, मूलशंकर इत्यादि प्रतिभावान ज्ञानी बालक प्रातिभ ज्ञान के ऐतिहासिक प्रमाण हैं।
ऐसे ही बालक फिर विवेकी हो ईश्वर को प्राप्त भी कर गए।
क्योंकि अनेक पदार्थों के ज्ञान विज्ञान की परत प्रातिभ पर ही टिकी है।
जैसे पूत के पैर पालने में दिख जाते हैं वैसे ही विवेकी ज्ञान से पूर्व का ज्ञान जिसे महर्षि पतंजलि प्रातिभ कहते हैं। वह प्रतिभाशाली लोगों में पूर्व से ही भासता है। वही ज्ञान आगे बढ़कर स्वयं व ईश्वर का बोध करा देता है।
अतः जो योगाभ्यासी साधक योगाभ्यास में बचपन से ही कुशल हो निरन्तर साधनारत रहते हैं वह भी उनके प्रातिभ ज्ञान की ही वजह है।
वे ही आगे चलकर अनेक पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करते हुए सब कुछ अर्थात जिससे सब कुछ होता है उस ईश्वर को प्राप्त करने विवेकज ज्ञान तक कोई कसर नहीं छोड़ते।
वास्तव में ऐसे अमृतपुत्र ही ईश्वर के सच्चे अच्छे पुत्र हैं।
काव्यमय भाव?
प्रातिभ ही विवेकज आधार,
ज्यों सूर्योदय लालिमा पसार।
योगी भरे विविध विज्ञान,
सुसंस्कारवित् पूर्व निशान।।–दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या

vaidik lekh


प्रत्येक जीवात्मा सुख पाना चाहती है निरन्तर सुख की ओर दौड़ रही है परंतु मंजिल प्राप्त नहीं कर पा रही है।
भोग योनियाँ तो बन्धन में हैं

न तृतीये तथा उप्लब्धे: वेदांतदर्शन३-१-१८,
अर्थात उनके लिए तो वैसे ही सुविधा नहीं वे तो निम्न योनि के प्राणी हैं मगर जो मानवयोनि पितृयान को प्राप्त कर देवयान अर्थात मोक्ष मार्ग का सुख लेना चाहती है उनके लिए सुंदर अवसर है।
ऐसा नहीं है कि उन्हें ज्ञान नहीं, ज्ञान भी प्राप्त कर ज्ञानी हो जाती है परंतु फिर भी मंजिल नहीं मिल पाती,
क्योंकि एक भूल उससे हो
रही है जो कि रोड़ा है पद, पैसा, प्रतिष्ठा, पुत्र पति पत्नी-परिवार से मोह,
परमात्मा को यह सब चाहिए नहीं,
क्योंकि उसके पास जाने वाला भी उसके परिवार का सदस्य है और नहीं जाने वाला भी।
वह तो आपका निष्काम भाव से किया कर्म और अपने प्रति श्रद्धा भक्ति देखता है।
अतः भूल से बचें, मूल को पकड़ें, विकृति की आयी धूल छंटने पर पूर्ण प्रकाश पूर्ण सुख
-दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या

स्वामी दयानन्द और गोरक्षा
* गावो विश्वस्य मातर: *

जब आत्मा शरीर को छोड़ देती है तो शरीर मर जाता है अर्थात निष्क्रिय, निष्प्राण, तेजहिन हो जाता है। गो भारत सरीखे कृषि प्रधान देश की आत्मा है और यदि गो इस देश को छोड़ कर चली गयी तो भारत देश आत्मा के बिना शरीर मात्र रह जाएगा। इस राष्ट्र का पतन निश्चित रूप से कोई नहीं बचा सकेगा यदि गो आदि पशुओं को कटने से नहीं बचाया जाता है।

प्राचीन काल में तो संपत्ति का मापदण्ड भी गोधन(godhan) को ही माना जाता था। भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में भारतमाता और गोमाता दोनों ही समानरूप से सेवा और रक्षा के पात्र रहे हैं। संस्कृत में तो गाय और पृथ्वी दोनों के लिए एक ही शब्द ‘गो’ का प्रयोग हुआ है। ऋषि दयानन्द(rishi dayanand) की आर्थिक राष्ट्रियता का वह मुख्य स्तम्भ है। इस कारण उन्होने इस विषय को लेकर ‘गोकरुणानिधि’(gokarunanidhi) के नाम से एक स्वतंत्र ग्रंथ की रचना करके गो-विषयक सभी प्रश्नों का विस्तार से विवेचन किया है। इसी पुस्तक से ब्रिटिश सरकार को राजद्रोह(treason) की गन्ध आने लगी थी।

गोकरुणानिधि का उद्देश्य
इस ग्रंथ की भूमिका में ऋषि दयानन्द जी लिखते है कि “यह ग्रंथ इसी अभिप्राय से लिखा गया है जिससे गौ आदि पशु जहाँ तक सामर्थ्य हो बचाये जावे और उनके बचाने से दूध, घी और खेती के बढ्ने से सब का सुख बढ़ता रहे।”

आर्यराज (स्वराज्य) और गौ
ऋषि वचनामृत1ऋषि वचनामृत

महर्षि जी लिखते है कि “जब आर्यों का राज्य था तब ये महोपकारक गाय आदि पशु नहीं मारे जाते थे। तभी आर्यावर्त व अन्य देशों में बड़े आनंद से मनुष्य आदि प्राणी रहते थे क्योंकि दूध, घी, बैल आदि पशुओं की बहुताई होने से अन्न रस पुष्कल होते थे। जब से विदेशी मांसाहारी इस देश में आकार गौ आदि पशुओं को मरने वाले राज्याधिकारी हुए है तब से क्रमश: आर्यों के दु:खों की बढ़ती होती जाती है क्योंकि “नष्टे मुले नैव फलं न पुष्पम।” (सत्यार्थ प्रकाश) परंतु शोक! महाशोक! विदेशियों से आजादी मिलने के बाद भी हमारे शासकों ने इस भारत रूपी वृक्ष की जड़ को सींचने की बजाय काटने का ही कार्य किया है।

गौ सब सुखों का मूलऋषि वचनामृत3
महर्षि जी ने गौ को सभी सुखों का मूल सिद्ध करते हुए लिखा है – “गवादि पशु और कृषि आदि कर्मों की रक्षा वृद्धि होकर सब प्रकार के उत्तम सुख मनुष्यादि प्राणियों को प्राप्त होते है। पक्षपात छोड़कर देखिये, गौ आदि पशु और कृषि आदि कर्मों से सब संसार को असंख्य सुख होते है वा नहीं।”

गौ की उपयोगिता
गौ का हमारे दैनिक जीवन पर कितना व्यापक प्रभाव है और खाद्य समस्या को हल करने आदि बातों पर महर्षि जी लिखते है – “इनकी रक्षा में अन्न भी महंगा नहीं होता। क्योंकि दूध आदि के अधिक होने से दरिद्री को भी खान-पान में दूध आदि मिलने पर न्यून ही अन्न खाया जाता है और अन्न के कम खाने से मल भी कम होता है। मल के न्यून होने से दुर्गन्ध भी न्यून होता है। दुर्गन्ध के स्वल्प होने से वायु और वृष्टिजल की शुद्धि भी विशेष होती है। उससे रोगों की न्यूनता होने से सबको सुख बढ़ता है।”

गौ की विशेषताऋषि वचनामृत2
सभी पशुओं की रक्षा का आदेश देते हुए ऋषि ने सबसे अधिक बल गौ पर ही दिया है। उन्होने लिखा है – “वर्तमान में परमोपकरक गौ की रक्षा में ही मुख्य तात्पर्य है।” एक ही गौ से होने वाले लाभ का सविस्तार ब्योरा लिखने के बाद ऋषि लिखते है कि “एक गाय कि एक पीढ़ी में चार लाख पचहत्तर हजार छ: सौ मनुष्यों का पालन होता है और पीढ़ी पर पीढ़ी बढ़ा कर लेखा करें तो असंख्य मनुष्यों का पालन होता है।” (स०प्र०) गुणों में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण ही आर्यों ने गाय को सब पशुओं को सर्वोत्तम माना है। आजकल तो सभी विद्वानों आदि ने स…

आहत भारत को समझने वाले नायपॉल

शंकर शरण

सर विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल के निधन पर मन में पहली बात यह आई कि पूर्वजों के भारत से दूर जा चुकने के बावजूद भारत और हंिदूू धर्म उनके जीवन में बना रहा। वह टैगोर के बाद साहित्य का नोबेल पाने वाले भी दूसरे हंिदूू मनीषी थे। त्रिनिदाद में जन्में वीएस नायपॉल न ईसाई बने और न ही उन्होंने अपना हंिदूू नाम बदला। नायपॉल ने भारत और भारतीयों के बारे में भी कई पुस्तकें लिखीं। उनका आरंभिक लेखन विवादास्पद भी रहा, परंतु बाद में उन्होंने भारत की विडंबना को अधिक गहराई से प्रस्तुत किया। वह बार-बार भारत आते रहे। वह यहीं रहना भी चाहते थे, लेकिन यहां के सत्ताधारियों ने रुचि नहीं दिखाई। नायपॉल ने लेखन के अलावा कभी कोई और काम नहीं किया। आरंभिक काल में भयंकर गरीबी ङोलने के बावजूद उन्होंने दो महीने छोड़कर पूरे जीवन कभी नौकरी नहीं की। सिर्फ इस कारण कि वह किसी के आदेश पालक नहीं रह सकते थे। चाटुकारिता का तो सवाल ही नहीं। इसीलिए वह बेलाग लिखने,बोलने के लिए प्रसिद्ध हुए और दुनिया ने उनका लोहा माना। विपुल कथा लेखन के अलावा उन्होंने अनूठी विधा में ‘इंडिया: ए वूंडेड सिविलाइजेशन’, ‘अमंग द बिलीवर्स’ और ‘बियोंड बिलीफ’ जैसी चर्चित पुस्तकें लिखी। दशकों के अनुभव से नायपॉल ने कहा था कि भारत में यह एक सचमुच गंभीर समस्या है कि बहुत कम हंिदूू यह जानते हैं कि इस्लाम क्या है? बहुत कम हंिदूुओं ने इसका अध्ययन किया है या इस पर कभी सोचा है। उनकी उपरोक्त तीनों पुस्तकें हमारे लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। 1अपने लेख ‘द राइटर एंड इंडिया’ में नायपॉल भारत में छह सौ साल चले इस्लामी शासनकाल के बारे में यहां छाई चुप्पी पर सवाल उठाते हैं। नायपॉल दिखाते हैं कि इस्लामी हमलावरों के सामने भी हमारे पूर्वज उतने ही असहाय थे जितने बाद में ब्रिटिश शासकों के समक्ष नजर आए, मगर इस पर कभी चर्चा नहीं होती। नायपॉल के अनुसार भारत के सिवा कोई सभ्यता ऐसी नहीं जिसने बाहरी दुनिया से निपटने के लिए आज भी इतनी कम तैयारी कर रखी हो। कोई अन्य देश इतनी आसानी से हमले और लूटपाट का शिकार नहीं हुआ। शायद ही कोई और देश होगा जिसने अपनी बर्बादियों से इतना कम सबक सीखा होगा। नि:संदेह नायपॉल कोई हंिदूूवादी लेखक नहीं थे। वह तो मुसलमानों एवं हंिदूुओं के प्रति समान रूप सहानुभूतिशील थे। उन्होंने केवल निर्मम तटस्थता से यथार्थ को हमारे समक्ष रखा था। इसमें इस्लाम और उसकी भूमिका वैसी ही रखी गई जैसी वह रही। भारत के सेक्युलरवादी बुद्धिजीवी इसी का बुरा मानते थे। जबकि बाहरी अवलोकनकर्ता के रूप में नायपॉल अनेक वैसी बातें सरलता से देख पाते थे जो भारतीय अपने राग-द्वेष पूर्वाग्रहों, मतवादों आदि के कारण नहीं देखते।1सच पूछें तो ‘इंडिया: ए वूंडेड सिविलाइजेशन’ में समकालीन हंिदूुओं, उनके नेताओं की बड़ी दयनीय छवि उभरती है। यह 1975-76 के बीच भारत की चतुर्दिक यात्र करके उसी दौरान लिखी गई थी। बंबई की चाल और अवैध बस्तियां, पूना-बंबई के बीच का देहात, इंजीनियर और शिव-सैनिक, बिहार की शस्य-श्यामला धरती पर पीड़ित बाल-मजदूर, विजयनगर के खंडहरों के बीच रहने वाले लोग, जयपुर के बाहर अकालग्रस्त आबादी, प्रशासन के प्रयास, महानगरों में उच्च-वर्गीय लोगों के वार्तालाप आदि असंख्य अनुभवों के बीच नायपॉल ने भारत की घायल सभ्यता को समझने का यत्न किया था। इस पुस्तक में नव-स्वतंत्र भारत का जन-जीवन ही नहीं, वरन कई विषयों पर गंभीर विश्लेषण भी है। गांधीजी का महात्मावाद, भारतीय बुद्धिजीवियों, प्रशासकों, आमजनों की रूढ़ियां, आदतें, टूटती परंपराएं, उभरता खालीपन, नैतिक संभ्रम, इंदिरा का आपातकाल, जेपी आंदोलन, नक्सलवाद, भारतीय प्र…

महर्षि दयानंद सरस्वती

काशी शास्त्रार्थ पर स्वयं महर्षि दयानन्द जी की टिप्पणी

● अब तक कोई भी वेद में मूर्तिपूजा का प्रमाण प्रमाण नहीं निकाल सका
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– भावेश मेरजा

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने 4 अगस्त 1875 को पूना में अपने जीवन वृत्तान्त के विषय में एक भाषण किया था। अन्य स्थानों की भांति पूना में भी कुछ लोगों को ऐसा संशय होने लगा था कि यदि यह स्वामी जी ब्राह्मण होते तो मूर्तिपूजा जैसी परम्परागत आस्थाओं के विरुद्ध ऐसा अभियान नहीं चलाते। इसलिए उनको अपने पूर्वाश्रम आदि के सम्बन्ध में कुछ बताना चाहिए और जो उनको पहले से जानते पहचानते हैं ऐसे कुछ लोगों के पत्रादि मंगाकर उपस्थित करने चाहिए। ऐसे हालात में स्वामी जी ने अपने बारे में कुछ बताने का उचित समझा और एक भाषण स्व-जीवन के विषय में दिया। इस भाषण में उन्होंने जन्म से लेकर तत्कालीन अवस्था पर्यन्त अपने जीवन तथा कार्यों का दिग्दर्शन प्रस्तुत किया। अपने इस भाषण में उन्होंने काशी के पण्डितों से 16 नवम्बर 1869 को हुए उस शास्त्रार्थ का भी उल्लेख किया, जिसने स्वामी जी को एक क्रान्तिकारी धर्मसंशोधक के रूप में देश-विदेश में विख्यात कर दिया था। इस शास्त्रार्थ के बारे में उन्होंने बताया –

“…प्रयाग से मैं रामनगर को गया। वहाँ के राजा की इच्छानुसार काशी के पण्डितों से शास्त्रार्थ हुआ। इस शास्त्रार्थ में यह विषय प्रविष्ट था कि वेदों में मूर्तिपूजा है या नहीं। मैंने यह सिद्ध करके दिखा दिया कि ‘प्रतिमा’ शब्द तो वेदों में मिलता है, परन्तु उसके अर्थ तौल नाप आदि के हैं। वह शास्त्रार्थ अलग छपकर प्रकाशित हुआ है, जिसको सज्जन पुरुष अवलोकन करेंगे। ‘इतिहास’ शब्द से ब्राह्मण ग्रन्थ ही समझने चाहिए, इस पर भी शास्त्रार्थ हुआ था। गत वर्ष के भाद्रपद मास में मैं काशी में था। आज तक चार बार काशी में जा चुका हूँ। जब-जब काशी में जाता हूँ तब-तब विज्ञापन देता हूँ कि यदि किसी को वेद में मूर्तिपूजा का प्रमाण मिला हो तो मेरे पास लेकर आवें, परन्तु अब तक कोई भी प्रमाण नहीं निकाल सका।”

[स्रोत : उपदेश मंजरी अथवा पूना प्रवचन, अन्तिम 15वां प्रवचन, प्रस्तुति : भावेश मेरजा]
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