‘मैं और मेरा आचार्य दयानन्द’

‘मैं और मेरा आचार्य दयानन्द’

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         देश व संसार में अनेक मत-मतान्तर हैं फिर हमें उनमें से ही किसी एक मत को चुन कर उसका अनुयायी बन जाना चाहिये था। यह वाक्य कहने व सुनने में तो अच्छा लगता है परन्तु यह एक प्रकार से सार्थक न होकर निरर्थक है। हमें व प्रत्येक मनुष्य को यह ज्ञान मिलना आवश्यक है कि वह कौन है, कहां से आया है, मरने पर कहां जाता है, किन कारणों से उसे अपने माता-पिता से जन्म मिला, किसी धनिक के यहां जन्म क्यों नहीं हुआ, धनिक का निर्धन के यहां क्यों नहीं हुआ, किसने इस संसार को बनाया है और कौन इसका धारण, पोषण व संचालन करता है? संसार को बनाने वाली वह सत्ता कहां है, दिखाई क्यों नहीं देती, उसका नाम क्या है? क्या किसी ने कभी उसको देखा है? हम स्वयं अपनी मर्जी से पैदा नहीं हुए हैं, जिसने हमें उत्पन्न किया है, उसका हमें जन्म देने का उद्देश्य क्या था व है? ऐसे अनेकानेक प्रश्नों के सही  समाधानकारण उत्तर जहां से प्राप्त हों  जिनसे जीवन का उद्देश्य जानकर उसकी प्राप्ति के सरल  समुचित साधनों का ज्ञान मिलता हैमनुष्य को उसी धर्म का धारण  पालन करना चाहिये। ऐसा न करके मनुष्य अपने जीवन का सदुपयोग नहीं करता और हो सकता है व होता है, वह सुदीर्घ काल, सैकड़ों, हजारों व लाखों वर्ष तक नाना प्रकार के दुःखों व निम्न से निम्न योनियों में जन्म लेकर दुःखों से आक्रान्त रहे।

        हमने अपने मित्रों की प्रेरणा से पौराणिक परिवार में जन्म लेने पर भी आर्यसमाज के सत्संगों में भाग लेना आरम्भ किया और उसके साहित्य मुख्यतः सत्यार्थ प्रकाश, पंच-महायज्ञविधि आदि का अध्ययन किया। वैदिक विद्वानों व सच्चे महात्माओं के प्रवचनों को सुनकर व साहित्य को पढ़कर हमारे उपर्युक्त सभी प्रश्नों वच भ्रमों का समाधान हो गया जो अन्यथा नहीं हो सकता था। अतः हमारा कर्तव्य बनता था कि हमें जो सत्य ज्ञान मिला है, उससे हम अपने मित्रों व अन्यों को भी लाभान्वित करें। अतः इस कर्तव्य भावना से अधिकारी विद्वान न होने पर भी हमने अपना स्वाध्याय जारी रखा और लेखन के द्वारा अनेकानेक विभिन्न विषयों पर, जो जो हमें सत्य प्रतीत हुआ, उसे लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया। आज हम अपने बारे में यह कह सकते हैं कि हम स्वयं से परिचित हैं। मैं कौन हूं, क्या हूं, कहां से आया हूं, कहां-कहां जा सकता हूं, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, उसकी प्राप्ति के साधन क्या हैं, यह संसार किससे बना और कौन इसे चला रहा है? ऐसे सभी प्रश्नों का उत्तर मिला जिसका पूर्ण श्रेय मेरे आचार्य महर्षि दयानन्द सरस्वती को है। संक्षेप में हम इन सभी प्रश्नों के उत्तर इस संक्षिप्त लेख में देने का प्रयास करते हैं।

        मैं जीवात्मा हूं जो कि एक चेतन तत्व है। चेतन होने के कारण ही मुझे सुख व दुःख की अनुभूति होती है। मैं एकदेशी हूं अर्थात् व्यापक नहीं हूं। शास्त्रों ने जीवात्मा का परिमाण बताया है। यह अत्यन्त सूक्ष्म है। एक शास्त्रकार ने कहा है कि हमारे सिर के बाल का अग्रभाग लें, फिर उसके 100 टूकड़े करें, फिर इन सौ में से एक टुकडें के भी सौ टुकड़े करें, इसका एक टुकड़ा अर्थात् सिर के बाल के अग्रभाग का दस सहस्रवां टुकड़ा जीवात्मा के लगभग बराबर व उससे भी सूक्ष्म होगा। यह बात विचार, चिन्तन व गवेषणा से सत्य सिद्ध होती है। मैं अर्थात् जीवात्मा अनादिनित्यअजरअमरअविनाशी  सत्यासत्य का जानने वाला होता है परन्तु अविद्यादि कुछ दोषों से सत्य को छोड़ असत्य में झुक जाता है। ज्ञान  कर्म जीवात्मा के दो लक्षण कहे जा सकते हैं। सृष्टिकाल में सभी जीवात्माओं को उनके पूर्व कर्मानुसार जन्म  भोग प्राप्त होते हैं। इस जन्म में हमें जो माता-पिता, संबंधीं व अन्य परिस्थितियां, सुख-दुःख आदि मिले हैं वह अधिकांशतः पूर्व जन्मों के कर्मों के फलों जिसे प्रारब्ध कहते हैं व इस जन्म के क्रियमाण कर्मों के कारण प्राप्त हुए  हैं। हमें जन्म, सुख-दुःख रूपी भोगों को देने वाली, वस्तुतः एक सत्ता ईश्वर है। ईश्वर ही सृष्टि को बनाने व धारण-पोषण अर्थात् संचालित करने वाली सत्ता है। ईश्वर परम धार्मिक है। वह सत्य, दया व करूणा से सराबोर है। उसके गुण, कर्म, स्वभाव सर्वदा समान रहते हैं, उनमें विपरीतता कभी नहीं आती। संसार में ईश्वर से इतर अत्यन्त सूक्ष्म मूल प्रकृति है, यह चेतन न होकर जड़ है।  यह प्रकृति ईश्वर व जीव की ही तरह अनादि, नित्य, अविनाशी है तथा अत्यन्त सूक्ष्म, सत्व-रज-तम गुणों वाली है। यइ ईश्वर के अधीन होती है। इसे सृष्टि का उपादान कारण कहते हैं। ईश्वर इस सृष्टि का निमित्त कारण है। इस प्रकृति को ही ईश्वर परिवर्तित कर वर्तमान सृष्टि अर्थात् नाना सूर्य, चन्द्र, ग्रह, उपग्रह, पृथिवी आदि का निर्माण सृष्टि काल के आरम्भ में करता है। इसी प्रकार के निर्माण वह इससे पूर्व के कल्पों में करता रहा है तथा इस कल्प के बाद के कल्पों में भी करेगा। यह सृष्टि 4 अरब 32 करोड़ वर्षों तक इसी प्रकार से विद्यमान रहती है। इस गणना का आरम्भ ईश्वर द्वारा सृष्टि का निर्माण करने के दिन से होता है। इसके बाद पुरानी हो जाने के कारण इसकी प्रलय अवस्था आती है जब यह छिन्न भिन्न होकर अपनी मूल अवस्था, जो सत्व, रज व तम गुणों वाली अत्यन्त सूक्ष्म होती है, में परिवर्तित हो जाती है। यह प्रलयावस्था भी 4 अरब 32 करोड़ वर्षों तक रहती है, जो कि ईश्वर की रात्रि कहलाती है तथा जिसके पूरा होने पर ईश्वर पुनः सृष्टि बनाता है और प्रलय से पूर्व की जीवात्माओं को उनके कर्मानुसार वा प्रारब्ध के अनुसार मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के रूप में जन्म देता है।

         ईश्वर के बारे में यह जानना भी उचित होगा कि ईश्वर सत्य, चित्त व आनन्द स्वरूप है। वह निराकार व सर्वव्यापक है। वह किसी एक स्थान, आसमान, समुद्र आदि में नहीं रहता अपितु सर्वव्यापक है। वह सर्वज्ञ अर्थात् सभी विषयों का पूर्ण ज्ञान रखता है और सर्वशक्तिमान है। वह न्यायकारी व दयालु भी है। वह सनातन, नित्य, अनादि, अनुत्पन्न, अजर, अमर, अभय, नित्य व पवित्र है। वह सर्वव्यापक व अतिसूक्ष्म होने के कारण सब जीवात्माओं के भीतर भी विद्यमान व प्रविष्ट है। अतः जीवात्मा का कर्तव्य है कि वह स्वयं व ईश्वर के सत्य स्वरूप को जाने। यह सत्य स्वरूप हमने सत्यार्थ प्रकाश आदि ग्रन्थों से ही जाना है। अन्य सभी ग्रन्थों व मत-मतान्तरों की पुस्तकों को पढ़ने से अनेक सन्देह उत्पन्न होते हैं जिनका वहां निवारण नहीं होता। सत्यार्थ प्रकाश में सभी बातें, मान्यतायें व सिद्धान्त महर्षि दयानन्द जी ने वेदों व वैदिक ग्रन्थों से लेकर मानवमात्र के हित व सुख के लिए सरल आर्यभाषा हिन्दी में वेद प्रमाण, युक्ति व प्रमाणों आदि सहित प्रस्तुत की हैं। यदि वह यह ग्रन्थ संस्कृत में लिखते तो फिर हम संस्कृत  जानने के कारण उससे लाभान्वित  हो पाते और तब हम अज्ञानी ही रहते और मतमतान्तरों का अपना कारोबार यथापूर्व चलता रहता। हमारा कर्तव्य है कि हम ईश्वर को जानकर उसकी उपासना करें। यद्यपि ईश्वर हमारी आत्मा में व्यापक है, अतः उपासना अर्थात् वह हमारे निकट तो सदा से है परन्तु उपासना में ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना भी सम्मिलित है। यह स्तुति, प्रार्थना व उपासना ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन ही है जैसे कि किसी से उपकृत होने पर हम धन्यवाद कहते हैं। उपासना करने से हमारे गुण-कर्म-स्वभाव सुधर कर ईश्वर के गुणों के अनुरूप यथासम्भव हो जाते हैं। ईश्वर ने हमारे लिये यह विशाल संसार बनाया, इसे चला रहा है, इसमें हमारे सुख के लिए नाना प्रकार की भोग सामग्री बनाई है और हमें मानव जन्म व माता-पिता-बन्धु-बान्धव-इष्टमित्र-आचार्य-ऋषि आदि प्रदान किये हैं। अतः कृतज्ञता ज्ञापन करना हमारा कर्तव्य है अन्यथा हम कृतघ्न होंगे। यदि हम किसी की कोई सहायता करते हैं तो हम भी चाहते हैं कि वह हमारे प्रति कृतज्ञता का भाव रखे। इस भावना की अभिव्यक्ति का नाम ही उपासना है जिसमें स्तुति व प्रार्थना भी सम्मिलित है। नियमित  यथार्थ विधि से उपासना करने से ही ईश्वर का जीवात्मा में साक्षात्कार भी होता है। यह अतिरिक्त फल उपासना का होता है। ईश्वर साक्षात्कार की अवस्था के बाद जीवन मुक्ति का काल होता है जिसमें मनुष्य उपकार के कार्यों को करता हुआ कर्मों के बन्धन में नहीं फंसता और मृत्यु आने पर जन्म मरण से मुक्त होकर ब्रह्मलोक अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति करके ईश्वर के सान्निध्य से आनन्द का भोग करता है। यही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है जो सच्चे ईश्वर को जानकर उपासना करने से प्राप्त होता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ही हमारा जन्म हुआ है। सृष्टि के आरम्भ से सभी ऋषिमुनि  विद्वान इस पथ पर चले हैं और हमें भी उनका अनुकरण  अनुसरण करना है। इस पथ पर चलने के लिए महर्षि दयानन्द की शिक्षा है कि हमारे सभी कार्य व व्यवहार सत्य पर आधारित होने चाहिये। वह सत्याचार को ही मनुष्यों का यथार्थ व अनिवार्य धर्म बताते हैं। इसके विपरीत असत्य व दुष्टाचार ही अधर्म है।

        ईश्वर, जीव व प्रकृति विषयक यह समस्त ज्ञान सृष्टि क्रम के अनुकूल व साध्य कोटि का है और वेदों व ऋषि मुनियों के जीवन व उनके सत्य उपदेशों से प्रमाणित है। इसके विपरीत ज्ञान व क्रियायें अज्ञान व मिथ्याचार हैं। यह ज्ञान मुझे मेरे आचार्य महर्षि दयानन्द सरस्वती से प्राप्त हुआ है। महर्षि दयानन्द का जन्म गुजराज के राजकेाट जिले के एक कस्बे टंकारा में पिता श्री कर्षनजी तिवारी के यहां 12 फरवरी, सन् 1825 को हुआ था। 14 वर्ष की आयु में शिवरात्रि के दिन उन्होंने पिता के कहने से कुल परम्परा के अनुसार शिवरात्रि का व्रत किया था। देर रात्रि शिवलिंग पर चूहों को उछलते-कूदते देखकर उन्हें मूर्तिपूजा की असारता व मिथ्या होने का ज्ञान हुआ था। कुछ काल बाद उनकी एक बहिन व चाचा की मृत्यु होने पर उन्हें वैराग्य हो गया था। 21 वर्ष तक उन्होंने माता-पिता के पास रहते हुए संस्कृत, यजुर्वेद व अन्य ग्रन्थों का अध्ययन किया था। 22 वर्ष की अवस्था में वह सच्चे ईश्वर व मुक्ति के उपायों की खोज व उनके पालन के लिये गृहत्याग कर देशभर में विद्वानों, साधु-सन्यासियों, योगियों के सम्पर्क में आये। मथुरा में प्रज्ञाचक्षु गुरू विरजानन्द से उन्होंने आर्ष संस्कृत व्याकरण अष्टाध्यायी-महाभाष्य-निरुक्त प़द्धति से अध्ययन कर सन् 1863 में गुरू की आज्ञा से संसार से धार्मिक व सामाजिक क्रान्ति सहित समग्र अज्ञान व अन्धकार दूर करने के लिये कार्य क्षेत्र में प्रविष्ट हुए। उन्होंने मौखिक प्रवचन, उपदेश, व्याख्यान, शास्त्रार्थ, शंका समाधान, ग्रन्था लेखन द्वारा देश भर में घूम घूम कर प्रचार किया। प्रचार के निमित्त ही उन्होंने सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, ऋग्वेद-यजुर्वेद भाष्य संस्कृत व हिन्दी में, पंचमहायज्ञविधि, व्यवहारभानु, गोकरूणानिधि आदि अनेक ग्रन्थों का प्रकाशन किया। नवम्बर, 1869 में उन्होंने काशी के 30 से अधिक शीर्षस्थ सनातनी विद्वानों से मूर्तिपूजा पर शास्त्रार्थ कर उन्हें पराजित किया था। मूर्तिपूजा वेद सम्मत सिद्ध नहीं हो सकी थी न ही आज तक हो पायी है। उनके अनेक विरोधियों ने उन्हें जीवन में अनेक बार विष दिया। ऐसी ही विष देने की एक घटना जोधपुर में घटी। स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती के अनुसार इस षडयन्त्र में अंग्रेज सरकार भी सम्मिलित रही हो सकती है। इसके परिणाम स्वरूप 30 अक्तूबर, 1883 को दीपावली के दिन अजमेर में उनका देहावसान हो गया। उन्होंने जिस प्रकार से अपने प्राण त्यागे उससे लगता है कि यह कार्य उन्होंने शरीर के जीर्ण होने पर ईश्वर की प्रेरणा से स्वतः किया। स्वामी जी ने अज्ञान, अंधविश्वासों का खण्डन किया, सामाजिक विषमता को दूर किया, स्त्री व शूत्रों को वेदाध्ययन का अधिकार दिया, विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार तथा समाज से सामाजिक विषमता और अस्पर्शयता को समाप्त किया। लोगों को ईश्वर व जीवात्मा का ज्ञान कराकर सच्ची ईश्वर भक्ति सिखाई और जीवन मुक्ति के लिए मृत्यु व मोक्ष के सत्य स्वरूप का प्रचार किया। देश की आजादी भी उनके प्रेरणाप्रद विचारों व आर्यसमाज के सदस्यों वा अनुयायियों के पुरूषार्थ की देन है।

 मेरे आचार्य दयानन्द मेरे ही नहीं अपितु सम्पूर्ण संसार के आचार्य हैं। उन्होंने अज्ञानान्धकार में डूबे विश्व को सत्य ज्ञान रूपी अमृत ओषधि का पान कराया और उसे मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा की। मैं अपने आचार्य का कोटि कोटि ऋणी हूं। संसार के सभी लोग भी उनके ऋणी हैं परन्तु अपनी अविद्याअपने प्रयोजन की सिद्धिहठ  दुराग्रह आदि कारणों से उससे लाभ नहीं ले पा रहे हैं। संसार के प्रत्येक मनुष्य को महर्षि दयानन्द रचित साहित्य का अध्ययन करमतमतान्तरों  अज्ञानी धर्मगुरूओं के चक्र में  फंस करअपने जीवन को सफल करना चाहिये। ईश्वर सबको सदबुद्धि प्रदान करें। महर्षि दयानन्द को कोटिशः नमन।

मनमोहन कुमार आर्य

स्वराज्य वा स्वतन्त्रता के प्रथम मन्त्र-दाता महर्षि दयानन्द

स्वराज्य वा स्वतन्त्रता के प्रथम मन्त्र-दाता महर्षि दयानन्द

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        महाभारत काल के बाद देश में अज्ञानता के कारण अन्धविश्वास व कुरीतियां उत्पन्न होने के कारण देश निर्बल हुआ जिस कारण वह आंशिक रूप से पराधीन हो गया। पराधीनता का शिंकजा दिन प्रतिदिन अपनी जकड़ बढ़ाता गया। देश अशिक्षा, अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड व सामाजिक विषमताओं से ग्रस्त होने के कारण पराधीनता का प्रतिकार करने में असमर्थ था। सौभाग्य से सन् 1825 में गुजरात में महर्षि दयानन्द का जन्म होता है। लगभग 22 वर्ष तक अपने माता-पिता की छत्र-छाया में उन्होंने संस्कृत भाषा व शास्त्रीय विषयों का ज्ञान प्राप्त किया। इससे उनकी तृप्ति नहीं हुई। ईश्वर के सच्चे स्वरूप का ज्ञान और मृत्यु पर विजय कैसे प्राप्त की जा सकती है, इसके उपाय ढूंढने के लिये वह घर से निकल गये और लगभग 13 वर्षों तक धार्मिक विद्वानों व योगियों आदि की संगति तथा धर्म ग्रन्थों का अनुसंधान करते रहे। इसी बीच सन् 1857 ईस्वी का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम भी हुआ जिसे अंग्रेजों ने कुचल दिया। इसमें महर्षि दयानन्द की सक्रिय भूमिका होने का अनुमान है परन्तु इससे सम्बन्धित जानकारियां उन्होंने विदेशी राज्य होने के कारण न तो बताई और न ही उनका किसी ने अनुसंधान किया। इसके बाद सन् 1860 में मथुरा में दण्डी गुरू स्वामी विरजानन्द के वह अन्तेवासी शिष्य बने और उनसे आर्ष संस्कृत व्याकरण और वेदादि शास्त्रों का अध्ययन किया। गुरु व शिष्य धार्मिक अन्धविश्वासों, देश के स्वर्णिम इतिहास व पराधीनता आदि विषयों पर परस्पर चर्चा किये करते थे। अध्ययन पूरा करने पर गुरु ने स्वामी दयानन्द को देश से अज्ञान, अन्धविश्वास, सामाजिक असमानता व विषमता दूर करने का आग्रह किया। स्वामी दयानन्द जी ने गुरु को इस कार्य को प्राणपण से करने का वचन किया और सन् 1863 में इस कार्य को आरम्भ कर दिया।

        स्वामी जी सन् 1874 में काशी में यथार्थ वेदोक्त धर्म का प्रचार, समाज सुधार के कार्य व अन्धविश्वासों का खण्डन कर रहे थे। उनके एक भक्त राजा जयकृष्ण दास ने उन्हें अपने समस्त विचारों, वैदिक मान्यताओं व सिद्धान्तों का एक ग्रन्थ लिखने का आग्रह किया। अल्प काल में ही महर्षि दयानन्द ने यह ग्रन्थ लिख कर पूरा कर दिया जिसको सत्यार्थ प्रकाश नाम दिया गया। लेखक ने इस ग्रन्थ का पुनः एक नया संशोधित संस्करण तैयार किया जो अक्तूबर, सन् 1883 में पूर्ण हो कर छपना आरम्भ हो गया था और सन् 1884 में प्रकाशित हुआ। इससे पूर्व यह जानना आवश्यक है कि महर्षि दयानन्द वेद एवं समस्त वैदिक वांग्मय के पारदर्शी व अपूर्व विद्वान थे। उन्होंने अपने दिव्य ज्ञान चक्षुओं से जान लिया था कि ईश्वर, जीव व प्रकृति के समस्त सत्य रहस्य वेद और वैदिक साहित्य में निहित हैं। अन्य जितने में भी मत-मतान्तर उनके समय में प्रचलित थे वह सभी अज्ञान व असत्य मान्यताओं से युक्त थे व आज भी हैं। सभी मतों के धर्म ग्रन्थों में असत्य व अन्धविश्वासयुक्त मान्यताओं की भरमार थी जिसका दिग्दर्शन उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में किया है। देश की पराधीनता और इस कारण देश व देशवासियों के शोषण व उन पर होने वाले अत्याचारों से भी वह परिचित थे। वह जान गये थे कि पराधीनता का भी मुख्य कारण एक सत्य वेदोक्त मत का पराभव व नाना वेद विरुद्ध मतों का आविर्भाव, उनका प्रचलन व सामाजिक विषमता आदि थे। अतः सत्यार्थ प्रकाश के आठवें समुल्लास में सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय पर विचार करते हुए उन्होंने पराधीनता पर अपना ध्यान केन्द्रित कर व अपनी जान जोखिम में डालकर देश की स्वतन्त्रता का मूल मन्त्र देशवासियों को दिया। इस घटना के प्रकाश के कुछ समय बाद ही एक षडयन्त्र के अन्तर्गत उनका विषपान कराये जाने व समय पर समुचित चिकित्सा न होने के कारण देहावसान हो गया।

         सन् 1883 में जिन दिनों महर्षि दयानन्द ने देश की आजादी विषयक यह पंक्तियां लिखी जिनकी चर्चा हम आगे करेंगे, उस समय देश में सजग धार्मिक संस्था के रूप में हम ब्रह्म समाज को पाते हैं जिसके संस्थापक राजा राममोहन राय रहे हैं। यह मत व सम्प्रदाय तथा इसके संस्थापक अंग्रेजों के राज्य को भारत पर वरदान के रूप में देखता था। इससे आजादी विषयक विचार मिलने की सम्भावना नहीं थी। हमारे सनातन धर्म के विद्वानों की क्या स्थिति थी, इसका वर्णन वीर सावरकर जी ने किया है जो कि आर्य जगत प्रख्यात विद्वान प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी के शब्दों में प्रस्तुत करते हैं। वह अपनी पुस्तक इतिहास प्रदूषण में लिखते हैं कि वीर सावरकर जी ने अपनी आत्मकथा में ऋषि दयानन्द तथा आर्य समाज से प्राप्त ऊर्जा व प्रेरणा की खुलकर चर्चा की है। यदि ये बन्धु (श्री आर्यमुनि, मेरठ और उनका वेदपथ पत्रिका में प्रकाशित एक लेख) लार्ड रिपन के सेवा निवृत्त होने पर काशी के ब्राह्मणों द्वारा उनकी शोभा यात्रा में बैलों का जुआ उतार कर उसे अपने कन्धों पर धर कर उनकी गाड़ी को खींचने वाला प्रेरक प्रसंग उद्धृत कर देते तो पाठकों को पता चल जाता कि इस विश्व प्रसिद्ध क्रान्तिकारी को देश के लिए जीने मरने के संस्कार व विचार देने वालों में ऋषि दयानन्द अग्रणी रहे। अतः सनातन धर्म के विद्वानों से भी अंग्रेजों के भारत से वापिस जाने और देश को स्वतन्त्र करने की मांग की आशा नहीं की जा सकती थी। यह महर्षि दयानन्द ही थे जिन्होंने अपने गुरू विरजानन्द प्रदत्त वैदिक संस्कारों के आधार पर परतन्त्रता का विरोध किया और सत्यार्थ प्रकाश में लिखा कि ”कोई कितना ही करे परन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है वह सवार्वेपरि उत्तम होता है। अथवा मत-मतान्तर के आग्रहरहित, अपने और पराये का पक्षपातशून्य, प्रजा पर पिता माता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है। परन्तु भिन्न-भिन्न भाषा, पृथक्-पृथक् शिक्षा, अलग व्यवहार का विरोध छूटना अति दुष्कर है। बिना इसके छूटे परस्पर का पूरा उपकार और अभिप्राय (देश में स्वराज्य, अज्ञान व अन्धविश्वास रहित वैदिक धर्म का पालन) सिद्ध होना कठिन है।” इससे पूर्व महर्षि दयानन्द ने भारत में विदेशी शासन का कारण बताते हुए लिखा है कि अब अभाग्योदय सेऔर आर्यों के आलस्यप्रमादपरस्पर के विरोध से अन्य देशों के राज्य करने की तो कथा ही क्या कहनीकिन्तु आर्यावत्र्त में आर्यों का अखण्डस्वतन्त्रस्वाधीननिर्भय राज्य इस समय नहीं है। जो कुछ हैसो भी विदेशियों के पादाक्रान्त हो रहा है। कुछ थोड़े राजा स्वतन्त्र है। दुर्दिन जब आता हैतब देशवासियों को अनेक प्रकार का दुःख भोगना पड़ता है।

        महर्षि दयानन्द लिखित यह स्वर्णिम शब्द ही देश की आजादी के आधार वाक्य बने। इस समय तक देश में किसी राजनीतिक दल का कोई नेता नहीं था। कांगे्रस की स्थापना सन् 1885 में महर्षि दयानन्द के इन वाक्यों के कई वर्ष बाद हुई। अतः आज देश भर में जो स्वतन्त्रता दिवस की अड़सठवीं वर्षगांठ बनाई जा रही है उसकी प्राप्ति के लिए सन् 1883 में मन्त्र व विचार प्रस्तुत करने का श्रेय महर्षि दयानन्द को है। दुःख है कि सारा देश महर्षि दयानन्द के इस योगदान पर मौन है। 21 वीं शताब्दी में इससे बड़ा आश्चर्य क्या हो सकता है? स्वामी दयानन्द के स्वदेशीय राज्य को सर्वोत्तम बताने पर टिप्पणी करते हुए आर्यजगत के विख्यात विद्वान स्वामी विद्यानन्द सरस्वती ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि भारत में अंग्रेज व्यापारी बन कर आये। व्यापार के लिए उन्होंने ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की। धीरे-धीरे यही कम्पनी भारत में अंग्रेजी राज्य का आधार बन गई। उसकी अपनी सेना थी। इस सेना और भारतीय रियासतों के परस्पर संघर्ष के फलस्वरूप किसी भी एक पक्ष के सैनिक बल की सहायता से वह देश पर अधिकार करती गई। 1849 में पंजाब की विजय के साथ उसका यह अभियान पूरा हो गया और समूचे देश में यूनियन जैक फहराने लगा, परन्तु विज्ञान का नियम है–’To every action there is an equal and opposite reaction’ अर्थात प्रत्येक क्रिया की उतनी ही जोरदार और विरोधी प्रतिक्रिया होती है। भारतीयों के भीतर विद्रोह की आग सुलगने लगी, और 10 मई 1857 को ज्वाला बनकर भड़क उठी और देश के कोने-कोने में फैल गई। परन्तु कुछ ही दिनों में यह आग ठण्डी पड़ गई और भारतीय लोग खून का घूंट पीकर रह गये। इस क्रिया की प्रतिक्रिया भी अवश्यंभावी थी। ब्रिटिश सरकार ने कूटनीति का सहारा लिया। महारानी विक्टोरिया ने एक घोषणापत्र (Proclamation) जारी किया। उसकी भाषा बड़ी लुभावनी थी, पर एक व्यक्ति इस कूटनीतिक चाल को भांप गया। उसने अपने ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में एक घोषणा की जिसे उपर्युक्त पंक्तियों प्रस्तुत किया गया है।

         सुराज्य भी स्वराज्य का विकल्प नहीं होता–’Good government is no substitute for self-government.’ इसके उद्घोषक ग्रन्थकार दयानन्द ने अपनी प्रार्थना पुस्तक (Prayer book) आर्याभिविनय के माध्यम से अपने अनुयायियों को आदेश दिया कि वे प्रतिदिन प्रार्थना किया करें कि अन्य देशवासी राजा हमारे देश में  हों तथा हम पराधीन कभी  रहें। भारत के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि यह पूरी तरह वही घोषणा थी जिसके द्वारा 8 अगस्त 1929 को महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो और 31 दिसम्बर 1929 को लाहौर में उसके लिए संघर्ष करने की घोषणा की थी। इससे पूर्व 1906 में दादाभाई नौरोजी ने इसका उच्चारण किया था। किन्तु स्वामी दयानन्द ने 1875 में जब स्वराज्य का विचार भी किसी के मस्तिष्क में भी नहीं उपजा या पूर्ण स्वराज्य ही नहीं, चक्रवर्त्ती साम्राज्य की घोषणा की थी। आज जबकि अंग्रेज भारत छोड़ कर जा चुके हैं और हम स्वाधीनता का रसास्वादन कर रहे हैं तो कितने लोग है जो यह जानते हैं कि एक बार एक अंग्रेज कलक्टर ने स्वामी दयानन्द जी का भाषण सुनने के बाद कहा था कि यदि आपके भाषण पर लोग चलने लग जाएं तो इसका परिणाम यह होगा कि हमें अपना बोरिया बिस्तर बांधना पड़ेगा। स्वामी दयानन्द के ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के वचनों तथा भावनाओं का गम्भीर अध्ययन करनेवाले 1911 की जनसंख्या के अध्यक्ष मिस्टर ब्लण्ट ने लिखा था-“Dayanand was not merely a religious reformer, he was also a great patriot.  It would be fair to say that with him religious reform was a mere means to national reform.” (Census Report of 1911, Vol. XV, Part I, Chap. IV, P. 135) अर्थात् दयानन्द केवल धार्मिक सुधारक नहीं थे, वे एक महान् देशभक्त भी थे। यह कहना ठीक ही होगा कि उन्होंने धार्मिक सुधार को राष्ट्रीय सुधार के साधनरूप में ही अपनाया था।

         इस लेख के माध्यम से हम यह बताना चाहते हैं कि महर्षि दयानन्द ही देश की आजादी के प्रथम मन्त्रदाता वा स्वराज्य और स्वतन्त्रता का विचार देने वाले महापुरूष थे। स्वामी दयानंद ने अपने ग्रन्थों व प्रवचनों में व अन्यत्र भी देशभक्ति के नाना विचार प्रस्तुत किये। देश की स्वतन्त्रता में उनका व उनके अनुयायी आर्यसमाजियों का प्रमुख योगदान है। अतः आज स्वतन्त्रता दिवस के दिन महर्षि दयानन्द और आर्य समाज के योगदान की भी चर्चा करना आवश्यक है। यह बताना भी उचित होगा कि क्रान्तिकारी के आद्य गुरू पं. श्यामजी कृष्ण वम्र्मा, श्री गोपाल कृष्ण गोखले के राजनीतिक गुरू महादेव गोविन्द रानाडे, समाज सुधारक व आजादी के प्रमुख नेता स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द, पं. राम प्रसाद बिस्मिल आदि भी महर्षि दयानन्द की शिष्य मण्डली के ही व्यक्ति थे। देश की आजादी के आन्दोलन में देश के सभी आर्यसमाजियों ने किसी न किसी रूप में भाग लिया था जिस कारण देश आजाद हुआ। महर्षि दयानन्द ने देश की आजादी, धार्मिक व समाज सुधार में जो योगदान किया उसके लिये देशवासियों ने उनका सही मूल्यांकन कर उनके साथ न्याय नहीं किया। देखें, कि कब तक देश उनकी उपेक्षा करता है? आज स्वतन्त्रता दिवस पर भी हमें उनकी उपेक्षा स्पष्ट दिखाई दे रही है। यदि यही शब्द किसी अन्य व्यक्ति ने कहे होते व उनके व आर्यसमाज जैसा योगदान किसी अन्य संस्था ने किया होता तो आज उसकी देश भर में जयजयकार हो रही होती। इसी के साथ हम इस लेख को विराम देते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

वेदो का विज्ञानं मानवमात्र के लिए

वेदो का विज्ञानं मानवमात्र के लिए

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।। ओ३म ।।

अयं त इध्म आत्मा जातवेदः।

“हे अग्ने ! तेरे लिए सबसे पहला ईंधन “अयं आत्मा” – अर्थात यह यजमान – स्वयं है।”

      वेदो का विज्ञानं मानवमात्र के लिए :

क्षयरोग (TB – Tuberculosis) से बचाव और उपचार करता है यज्ञ।

सूर्य का प्रकाश मनुष्य के लिए वैसे भी लाभदायक है। इससे शरीर में विटामिन डी बनता है, जिससे हड्डियां पुष्ट होती हैं। उदय और अस्त होने वाले सूर्य की किरणे तो और भी अधिक गुणकारी होती हैं।

उद्यन्नादित्यः क्रिमिहन्तु निम्रोचन्हन्तु रश्मिभिः।
ये अन्तः क्रिमयो गवि।।

(अथर्ववेद २।३२।१)

         “उदय होता हुआ और अस्त होने वाला सूर्य अपनी किरणों से भूमि और शरीर में रहने वाले रोगजनक कीटो का नाश करता है।”

सूर्य का प्रकाश कृमिनाशक है। रोबर्ट काउच ने सन १८९० में अनेको प्रयोगो द्वारा यह सिद्ध किया की क्षयरोग (फेफड़ो के क्षयरोग को छोड़कर) के कीटाणु इस प्रकाश में दस मिनट से अधिक समय तक जीवित जीवित नहीं रह सकते। इसलिए क्षयरोग से ग्रस्त व्यक्ति को धुप सेकनी चाहिए।

संभवतः जनसाधारण में इसको यह कहकर मान्यता प्रदान की जाती है की अँधेरे में क्षयरोग फूलता फलता है तथा प्रकाश में यह दम दबाकर भाग जाता है।

अतः यज्ञ के लिए सूर्योदय के पश्चात तथा सूर्यास्त से पूर्व का समय ही ठीक है।

आधुनिक विज्ञानं के अनुसार सूर्य की धुप क्षयरोग के लिए बचाव और उपचार दोनों है

अब इस समय पर यज्ञ करना लाभदायक ही होगा क्योंकि यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली सामग्री में मुख्य रूप से गौघृत, खांड अथवा शक्कर, मुनक्का, किशमिश आदि सूखे फल जिनमे शक्कर अधिक होती है, चावल, केसर और कपूर आदि के संतुलित मिश्रण से बनी होती है।

अब इस विषय पर कुछ वैज्ञानिको के विचार :

१. फ्रांस के विज्ञानवेत्ता ट्रिलवर्ट कहते हैं : जलती हुई शक्कर में वायु – शुद्ध करने की बहुत बड़ी शक्ति होती है। इससे क्षय, चेचक, हैजा आदि रोग तुरंत नष्ट हो जाते हैं।

२. डॉक्टर एम टैल्ट्र ने मुनक्का, किशमिश आदि सूखे फलो को जलाकर देखा है। वे इस निर्णय पर पहुंचे हैं की इनके धुंए में टायफाइड ज्वर के रोगकीट केवल तीस मिनट तथा दूसरी व्याधियों के रोगाणु घंटे – दो घंटे में मर जाते हैं।

३. प्लेग के दिनों में अब भी गंधक जलाई जाती है, क्योंकि इसमें रोगकीट नष्ट होते हैं। अंग्रेजी शासनकाल में डाकटर करनल किंग, आई एम एस, मद्रास के सेनेटरी कमिश्नर थे। उनके समय में वहां प्लेग फ़ैल गया। तब १५ मार्च १८९८ को मद्रास विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के समक्ष भाषण देते हुए उन्होंने कहा था – “घी और चावल में केसर मिलकर अग्नि में जलाने से प्लेग से बचा जा सकता है।” इस भाषण का सार श्री हैफकिन ने “ब्यूबॉनिक प्लेग” नामक पुस्तक मे देते हुए लिखा है, “हवन करना लाभदायक और बुद्धिमत्ता की बात है।”

महर्षि दयानंद ने अपने ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है :

“जब तक इस होम करने का प्रचार रहा ये तब तक ये आर्यवर्त देश रोगो से रहित और सुखो से पूरित था अब भी प्रचार हो तो वैसा ही हो जाए।”

(स. प्र. तृतीय समुल्लास)

यहाँ ऋषि इसी विज्ञानं को समझाने की कोशिश कर रहे हैं जो आज का आधुनिक विज्ञानं मानता है।

Why every nun should only be unmarried

Why every nun should only be unmarried

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        Be there be any religion, caste or creed, if there is any flaw then it is always fatal to civil society. Actually, this was the February month of the year 2014 and the Supreme Court of India giving instructions to the Chief Secretary of Karnataka Government that all necessary steps should be taken to prevent the women from becoming ‘Devadasi’ forcibly in a temple in Devnagar district of the state.

        Not only this, in the petition filed in the Supreme Court Devdasi tradition was said to be a subject of national shame. At that time, many intellectuals appeared on the ground and questioned the religion as if they are digging the paper with their pen and then put the miscreants in the Hindu religion in front of all.

        Possibly, people living in northern India may not know about this devadasi system but to the people living in southern India, the devadasi concept is not new. In fact, in the 6th century, In South Indian temples, this tradition was started to marry the virgin girls to the Gods of the temple. After this, she had to dedicate her whole life to that God. Although it was not a part of a Sanatan Vedic religion, neither did we found mention of this practice in the Vedas and or in Upanishads.

       For this reason, in the Renaissance period of the 19th century, Hindus society itself questioned this tradition which was later brought to the category of crime by law. If this practice is still alive somewhere in the corners of the country then its main reason is the self-acceptance of women engaged in this work themselves.

       Indeed, this was the result of the effect of the awakened consciousness of the Hindu society that in the name of religion or in the name of antiquity, we cannot carry forward these misleading practices.

       But in another form, this practice continues to exist in Christian society so far. In Christian society, women also devote their whole life in the name of religion and remain unmarried throughout their lives. Such women are called “nun”.

      During the oath ceremony of the making of nun they have to wear a wedding dress at a formal ceremony, and they have to marry to- “Jesus Christ”. But against this practice, no social organization so far has raised the courage to file a petition, and no direction has been issued by the High Court.

       Perhaps because the matter is connected to the Vatican and no one can dare to speak against the authoritarianism of Vatican bishops Church. While many nuns are annoyed with the system of churches, they are questioning why a married Christian woman can not become a nun?

      Actually friends, speaking on her suffocation, the autobiography of a nun whose name is- Sister Jasmine, came to the market. The name of this book was “Amin- A Nun’s Autobiography”, the story of his own life experiences. This is a frightening experience. In real, reading this ‘so’ horrifying experience will make you feel furious with the priests. Fully devoted to his fictional husband, Jesus, when a seventeen-year-old sister Jasmine, who had entered the convent at the age of seventeen, and saw the evils of his church with open eyes, she would have to take the audacious decision of breaking out of the convent.

      She came in front of the media and spoke openly about the flaws of the church, and presented the examples of the lust of the priests who are considered to be sacred to be dressed in white clothes. Then she wrote openly about the homosexual conduct of Nunes. This decision of her decision was not the result of sudden impulse but while remaining in this for a long time and kept bearing on this exploitation, which she later brought on paper.

     Not only Jasmine, who was not only exposed to the untimely bitter truth behind these strong steel curtains of the religious and fairness of the Christian society but also- Mary Chandy, a former Kerala nun, by autobiography, described the sexual autonomy of priests in Catholic churches and exposed the truth. In his autobiography ‘Nunma Niranjewe Swasti’, Sister Mary Chandy wrote that due to her opposition to a rape attempt by clergy, she had to leave the church 12 years ago. In her autobiography, Sister Mary, who tried to highlight ‘darkness’ in the church and its educational centers, also wrote that the life within the church was full of lust, rather than spirituality.

      I eloped at 13 years of age to become ‘nun’ and in return, I got only- exploitation and loneliness. She further wrote, ‘I thought that both the priest and the nun have been engaged in the fulfillment of their physical needs by deviating from their resolve to serve humanity. Upset with these experiences, I left the church and the convent”.

      Once Jasmine and Mary Chandi were immersed in full faith in Jesus, accepting him as her husband on becoming nuns as lifelong unmarried, but she did not even dream that she would be exploited and will have to divorce her god one day.

     These nuns remained the victim of homosexual exploitation for a long time. They were sexually exploited by the corrupt priests. After which these Nuns thought of whistleblowing to expose the inside story running in name of purity, and religion.

     It is said that the struggle of faith is old in this institution. Jasmine’s struggle is similar. Even after the disclosure of one nun after the other, such mischievous practices are being still carried out in the name of purity.

     Now the biggest question is- Why a nun cannot be married? When will these Christian organization, who always shouts at the world’s welfare and the well-being of the humanity would agree that a woman is also a human being and her marriage should be done only to the human beings rather than a statue or an idol. Everyone believes that religion is not a bad thing in its basic sense but the opposition starts there where one starts exploiting the other by doing the misinterpretation of religion. In the end, the question is that  why the writers who wrote against the religious hypocrisy, the evils of religion, and the ostensibly are always silent on such matters.

अनवर जमाल साहब की पुस्तक “दयानंद जी ने क्या खोया क्या पाया” के प्रतिउत्तर में 

अनवर जमाल साहब की पुस्तक “दयानंद जी ने क्या खोया क्या पाया” के प्रतिउत्तर में 

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          जनाब अनवर जमाल साहब ऋषि के ज्ञान और वेद के विज्ञानं पर शंका उत्पन्न करते हुए लिखते हैं :
     
          यदि दयानन्द जी की अविद्या रूपी गांठ ही नहीं कट पायी थी और वह परमेश्वर के सामीप्य से वंचित ही रहकर चल बसे थे तो वह परमेश्वर की वाणी `वेद´ को भी सही ढंग से न समझ पाये होंगे? उदाहरणार्थ, दयानन्दजी एक वेदमन्त्र का अर्थ समझाते हुए कहते हैं-
           `इसीलिए ईश्वर ने नक्षत्रलोकों के समीप चन्द्रमा को स्थापित किया।´ (ऋग्वेदादि0, पृष्‍ठ 107)
(17) परमेश्वर ने चन्द्रमा को पृथ्वी के पास और नक्षत्रलोकों से बहुत दूर स्थापित किया है, यह बात परमेश्वर भी जानता है और आधुनिक मनुष्‍य भी। फिर परमेश्वर वेद में ऐसी सत्यविरूद्ध बात क्यों कहेगा?
            इससे यह सिद्ध होता है कि या तो वेद ईश्वरीय वचन नहीं है या फिर इस वेदमन्त्र का अर्थ कुछ और रहा होगा और स्वामीजी ने अपनी कल्पना के अनुसार इसका यह अर्थ निकाल लिया । इसकी पुष्टि एक दूसरे प्रमाण से भी होती है, जहाँ दयानन्दजी ने यह तक कल्पना कर डाली कि सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रादि सब पर मनुष्‍यदि गुज़र बसर कर रहे हैं और वहाँ भी वेदों का पठन-पाठन और यज्ञ हवन, सब कुछ किया जा रहा है और अपनी कल्पना की पुष्टि में ऋग्वेद (मं0 10, सू0 190) का प्रमाण भी दिया है-
`जब पृथिवी के समान सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र वसु हैं पश्चात उनमें इसी प्रकार प्रजा के होने में क्या सन्देह? और जैसे परमेश्वर का यह छोटा सा लोक मनुश्यादि सृष्टि से भरा हुआ है तो क्या ये सब लोक शून्‍य होंगे? (सत्यार्थ., अश्टम. पृ. 156)
(18) क्या यह मानना सही है कि ईश्वरोक्त वेद व सब विद्याओं को यथावत जानने वाले ऋषि द्वारा रचित साहित्य के अनुसार सूर्य व चन्द्रमा आदि पर मनुष्‍य आबाद हैं और वो घर-दुकान और खेत खलिहान में अपने-अपने काम धंधे अंजाम दे रहे हैं?        समीक्षा : अब हमारे जनाब अनवर जमाल साहब कुरान के इल्म से बाहर निकले तो कुछ ज्ञान विज्ञानं को समझे पर क्या करे अल्लाह मिया ने क़ुरान में ऐसा ज्ञान नाज़िल किया की जमाल साहब उसे पढ़कर ही खुद आलिम हो गए। देखिये जमाल साहब ऋषि ने क्या कहा और उसका अर्थ क्या निकलता है :

        ऋषि ने लिखा :

       `इसीलिए ईश्वर ने नक्षत्रलोकों के समीप चन्द्रमा को स्थापित किया।´ (ऋग्वेदादि0, पृष्‍ठ 107)

       अब इसका फलसफा और विज्ञानं देखो – ऋषि को वेदो से जो ज्ञान और विज्ञानं मिला वो इन जमाल साहब को नजर नहीं आएगा –

        आकाश में तारा-समूह को नक्षत्र कहते हैं। साधारणतः यह चन्द्रमा के पथ से जुडे हैं, पर वास्तव में किसी भी तारा-समूह को नक्षत्र कहना उचित है।

       ऋषि का अर्थ है क्योंकि चन्द्रमा नक्षत्रो के पथ से जुड़ा है इसलिए अलंकार रूप में वहां लिखा है की नक्षत्रलोको के समीप चन्द्रमा को स्थापित किया –

        अब इसका वैज्ञानिक प्रभाव देखो :

        तारे हमारे सौर जगत् के भीतर नहीं है। ये सूर्य से बहुत दूर हैं और सूर्य की परिक्रमा न करने के कारण स्थिर जान पड़ते हैं—अर्थात् एक तारा दूसरे तारे से जिस ओर और जितनी दूर आज देखा जायगा उसी ओर और उतनी ही दूर पर सदा देखा जायगा। इस प्रकार ऐसे दो चार पास-पास रहनेवाले तारों की परस्पर स्थिति का ध्यान एक बार कर लेने से हम उन सबको दूसरी बार देखने से पहचान सकते हैं। पहचान के लिये यदि हम उन सब तारों के मिलने से जो आकार बने उसे निर्दिष्ट करके समूचे तारकपुंज का कोई नाम रख लें तो और भी सुभीता होगा। नक्षत्रों का विभाग इसीलिये और इसी प्रकार किया गया है।

       चंद्रमा २७-२८ दिनों में पृथ्वी के चारों ओर घूम आता है। खगोल में यह भ्रमणपथ इन्हीं तारों के बीच से होकर गया हुआ जान पड़ता है। इसी पथ में पड़नेवाले तारों के अलग अलग दल बाँधकर एक एक तारकपुंज का नाम नक्षत्र रखा गया है। इस रीति से सारा पथ इन २७ नक्षत्रों में विभक्त होकर ‘नक्षत्र चक्र’ कहलाता है। नीचे तारों की संख्या और आकृति सहित २७ नक्षत्रों के नाम दिए जाते हैं।

        इन्हीं नक्षत्रों के नाम पर महीनों के नाम रखे गए हैं। महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा जिस नक्षत्र पर रहेगा उस महीने का नाम उसी नक्षत्र के अनुसार होगा, जैसे कार्तिक की पूर्णिमा को चंद्रमा कृत्तिका वा रोहिणी नक्षत्र पर रहेगा, अग्रहायण की पूर्णिमा को मृगशिरा वा आर्दा पर; इसी प्रकार और समझिए।

         ये ज्ञान और विज्ञानं वेदो में ही दिखता है क़ुरान में नहीं जमाल साहब।

          क़ुरान का विज्ञानं हम दिखाते हैं जरा गौर से देखिये :

     1. अल्लाह मियां तो क़ुरान में चाँद को टेढ़ी टहनी ही बनाना जानता है :

       और रहा चन्द्रमा, तो उसकी नियति हमने मंज़िलों के क्रम में रखी, यहाँ तक कि वह फिर खजूर की पूरानी टेढ़ी टहनी के सदृश  हो जाता है
(क़ुरआन सूरह या-सीन ३६ आयत ३९)

        क्या चाँद कभी अपने गोलाकार स्वरुप को छोड़ता है ? क्या अल्लाह मियां नहीं जानते की ये केवल परिक्रमा के कारण होता है ?

     2. सूरज चाँद के मुकाबले तारे अधिक नजदीक हैं :

        और (चाँद सूरज तारे के) तुलूउ व (गुरूब) के मक़ामात का भी मालिक है हम ही ने नीचे वाले आसमान को तारों की आरइश (जगमगाहट) से आरास्ता किया।
(सूरह अस्साफ़्फ़ात ३७ आयत ६)

         क्या अल्लाह मिया भूल गए की सूरज से लाखो करोडो प्रकाश वर्ष की दूरी पर तारे स्थित हैं ?

      3. क़ुरान के मुताबिक सात ग्रह :

          ख़ुदा ही तो है जिसने सात आसमान पैदा किए और उन्हीं के बराबर ज़मीन को भी उनमें ख़ुदा का हुक्म नाज़िल होता रहता है – ताकि तुम लोग जान लो कि ख़ुदा हर चीज़ पर कादिर है और बेशक ख़ुदा अपने इल्म से हर चीज़ पर हावी है।

     (सूरह अत तलाक़ ६५ आयत १२)

          क्या सात आसमान और उन्ही के बराबर सात ही ग्रह हैं ? क्या खुदा को अस्ट्रोनॉमर जितना ज्ञान भी नहीं की आठ ग्रह और पांच ड्वार्फ प्लेनेट होते हैं।

         4. शैतान को मारने के लिए तारो को शूटिंग मिसाइल बनाना भी अल्लाह मिया की ही करामात है।

          और हमने नीचे वाले (पहले) आसमान को (तारों के) चिराग़ों से ज़ीनत दी है और हमने उनको शैतानों के मारने का आला बनाया और हमने उनके लिए दहकती हुई आग का अज़ाब तैयार कर रखा है।

          (सूरह अल-मुल्क ६७ आयत ५)

        मगर जो (शैतान शाज़ व नादिर फरिश्तों की) कोई बात उचक ले भागता है तो आग का दहकता हुआ तीर उसका पीछा करता है

         (सूरह सूरह अस्साफ़्फ़ात ३७ आयत १०)

        क्या अल्लाह को तारो और उल्का पिंडो में अंतर नहीं पता जो तारो को शूटिंग मिसाइल बना दिया ताकि शैतान मारे जावे ? और उल्का पिंड जो है वो धरती के वायुमंडल में घुसने वाली कोई भी वस्तु को घर्षण से ध्वस्त कर देती है जो जल्दी हुई गिरती है ये सामान्य व्यक्ति भी जानते हैं इसको शैतान को मारने वाले मिसाइल बनाने का विज्ञानं खुद अल्लाह मियां तक ही सीमित रहा गया।

         रही बात सूर्यादि ग्रह पर प्रजा की बात तो आज विज्ञानं स्वयं सिद्ध करता है की सूर्य पर भी फायर बेस्ड लाइफ मौजूद है। ज्यादा जानकारी के लिए लिंक देखिये :

        अब किसको ज्ञान ज्यादा रहा जमाल साहब ?

       आपके क़ुरान नाज़िल करने वाले अल्लाह मिया को ?

        या वेद को पढ़कर पूर्ण ज्ञानी ऋषि की उपाधि प्राप्त करने वाले महर्षि दयानंद को।

       लिखने को तो और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है मगर आपकी इस शंका पर इतने से ही पाठकगण समझ जाएंगे इसलिए अपनी लेखनी को विराम देता हु – बाकी और भी जो आक्षेप आपकी पुस्तक में ऋषि और सत्यार्थ प्रकाश पर उठाये हैं यथासंभव जवाब देने की कोशिश रहेगी

कन्हैया कुमार वामपंथ की अंतिम उम्मीद है

कन्हैया कुमार वामपंथ की अंतिम उम्मीद है

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        जावेद अख्तर ने भाजपा के उम्मीदवार गिरिराज सिंह हो हराने के लिए मुसलमानों से कन्हैया कुमार के एकजुट होकर वोट करने को कहा हैं। देखा जाये तो एक समय हिंदी भाषी राज्यों में अपनी मजबूत पकड़ और संसदीय उपलब्धियां रखने वाले वामपंथी दल और उनकी विचारधारा आज सिमट कर सिर्फ बिहार की बेगुसराय सीट तक सीमित हो चुकी है। अगर बेगूसराय से कन्हैया कुमार किसी कारण जीत जाते है तो वामपंथ की राजनीति को कुछ समय के लिए जीवन मिल सकता है, हालाँकि संभावना कम है। इसी कारण कई पत्रकारों से लेकर तमाम छोटे बड़े वामपंथी नेता और सेकुलरवाद की आड़ में इस्लामवाद परोसने वाले कई अभिनेता आज इस चुनाव में अपने युवा सितारे के कंधे पर सवार होकर अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ते हुए बेगूसराय की गलियों में वोट मांगते दिख जायेंगे।

      पिछले दिनों जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने देशद्रोह के केस में जेल से जमानत पर रिहा होने के बाद कहा था कि मुझे जेल में दो कटोरे मिले। एक का रंग नीला था और दूसरे का रंग लाल था। मैं उस कटोरे को देखकर बार-बार ये सोच रहा था कि इस देश में कुछ अच्छा होने वाला है कि एक साथ लाल और नीला कटोरा है वो नीला कटोरा मुझे आंबेडकर मूवमेंट लग रहा था और वो लाल कटोरा मुझे वामपंथी मूवमेंट लग रहा था। लेकिन कन्हैया कुमार इसमें वह एक तीसरे कटोरे का जिक्र करना भूल गये जो हरा कटोरा बेगुसराय सीट से चुनाव लड़ रहे वामपंथी दलों के साझा उम्मीदवार कन्हैया कुमार के पक्ष में प्रचार करने पहुंचे जावेद अख्तर के जाने के बाद दिखा।

      ये सच है कन्हैया कुमार की बेगुसराय सीट से हार माओवाद, लेनिन और मार्क्सवाद की भारत में अंतिम कब्रगाह साबित होगी। क्योंकि पिछले अनेकों वर्षों से धर्म को अफीम बता-बताकर मार्क्सवाद का धतूरा गरीब जनता को खिलाकर जिस तरह देश माओवादी, नक्सली खड़े कर देश में अनेकों नरसंहार किये है यह हार उनकी इस विचारधारा के ताबूत की अंतिम कील साबित होगी।

      देश के कई राज्यों में अनेकों वर्षों तक नक्सलवाद के नाम पर हिंसा मार्क्सवाद के नाम पर सत्ता सुख भोगने वाले वामपंथी नेताओं को आज अपनी विचारधारा के लिए राष्ट्रीय राजनीति ने कोई जगह दिखाई नहीं दे रही है शायद यही वजह रही होगी कि कन्हैया कुमार ने जेल से निकलने के बाद बिहार तक पहुंचते हुए अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षा का इजहार कर दिया था। कन्हैया कुमार ने आजादी, जय भीम और प्रसिद्ध लाल सलाम’ के नारे के साथ वामपंथी राजनीति को नए दौर में नए सिरे से गढ़ने की कोशिश की थी।

      जो लोग आज इसे सिर्फ राजनितिक नारा समझ रहे है उन्हें यह सब नारे से आगे समझना होगा कि आज आजादी किसका नारा है और लाल सलाम किसका? क्योंकि जिस तरह दलितों को हिन्दू समाज में बाँटने का काम हो रहा है और जावेद अख्तर सरीखे चेहरे बेगुसराय पहुँचकर कन्हैया कुमार के मुस्लिमों के वोट मांग रहे है कहीं ये देश पर शुरूआती वैचारिक आक्रमण तो नहीं है?

      आज लोगों को एक बार वामपंथ का इतिहास भी देख लेना चाहिए इसके बाद उनका निष्कर्ष उन्हें जरुर एक क्रूर सच की तरफ ले जायेगा। बताया जाता है वामपंथ की विचाधारा को लेकर आधुनिक चीन की नींव रखने वाले माओ त्से तुंग यानि माओ की सनक ने 4.5 करोड़ अपने लोगों का रक्त बहाया था। रूस में स्टालिन के 31 साल के शासन में लगभग 2 करोड़ से अधिक लोग मारे गए। यही नहीं बताया जाता है कि इथियोपिया के कम्युनिस्ट वामपंथी तानाशाह से अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ लाल सलाम अभियान छेड़ा। 1977 से 1978 के बीच ही उसने करीब 5,00,000 लाख लोगों की हत्या करवाई। एक किस्म से देखा जाये तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्टालिन से लेकर माओ या फिर अभी तक मार्क्सवाद के नाम पर अपराध और लूट हत्या हिंसा की इन लोगों द्वारा ऐसी भीषण परियोजनाएं चलाई कि जिनका जिक्र किसी आम इन्सान को शर्मिदा कर सकता हैं।

       आज वामपंथियों को समझना होगा कि विश्व के लगभग सभी देशों से मार्क्सवाद की विचारधारा का अंत हो चुका है?  कहा जाता है सोवियत रूस का पहला वाला अस्तित्व आज नहीं बचा जहाँ मार्क्सवाद का पहला प्रयोग किया था इसी विचारधारा के कारण वह ढह चूका है। पूर्वी यूरोप के कई देश धूल में मिल गए कुछ तो गायब हो गए जहां वामपंथी शासन व्यवस्था थी. पूर्वी जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया जैसे देश नक्शे में नहीं मिलते हंगरी-पोलैंड से भी यह विचारधारा आई गई हो चुकी है। एशिया में चीन का मार्क्सवाद अब बाजारवाद से गले मिलता दिख रहा है भारत में मार्क्सवाद बंगाल और त्रिपुरा नकार चुके है और केरल में वामपंथी आज संघर्ष सिमटता दिखाई दे रहा है।

      छतीसगढ़ झारखण्ड और बंगाल को तीसरे दिन दहलाने वाले नक्सलवादी एक-एक कर आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा के जीवन की ओर लौट रहे है। अब जो यह ताजा बिहार का बेगूसराय चुनावी मैदान है यह वामपंथियों की अवसरवादी राजनीति की सवारी है किसी तरह संसद में छलांग लगा कर विचारधारा को जीवित करने की चेष्ठा है इसमें मनुवाद को गाली देते हुए मेकअप में सजे कथित बुद्धिजीवियों की कतार है. सेकुलरवाद का ढोंग है। आंबेडकर जी के नाम पर दलितों को सुनहरा सपना बेचने का प्रयास है। जो लोग इसे समाजवाद से जोड़कर देख रहे है या भय भूख की आजादी नाम पर भविष्य के सपने संजोये है, उन्हें बाद में वही मिलेगा जो 35 साल बंगाल में सत्ता में रहने पर बंगाल के लोगों को मिला है।

सोम का वास्तविक अर्थ और सोमरस का पाखंड

सोम का वास्तविक अर्थ और सोमरस का पाखंड

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अ हं दां गृणते पूर्व्यं वस्वहं ब्रह्म कृणवं मह्यं वर्धनम् ।

अ हं भुवं यजमानस्य चोदिताऽयज्वनः साक्षि विश्वस्मिन्भरे ।।

– ऋ० मं० १०। सू० ४९। मं० १।।

         हे मनुष्यो! मैं सत्यभाषणरूप स्तुति करनेवाले मनुष्य को सनातन ज्ञानादि धन को देता हूं। मैं ब्रह्म अर्थात् वेद का प्रकाश करनेहारा और मुझ को वह वेद यथावत् कहता उस से सब के ज्ञान को मैं बढ़ाता; मैं सत्पुरुष का प्रेरक यज्ञ करनेहारे को फलप्रदाता और इस विश्व में जो कुछ है उस सब कार्य्य का बनाने और धारण करनेवाला हूं। इसलिये तुम लोग मुझ को छोड़ किसी दूसरे को मेरे स्थान में मत पूजो, मत मानो और मत जानो।

         जैसा की आप सभी जानते हों हमारे देश में अनेको विद्वान और गुरुजन होते चले आये हैं और होते भी रहेंगे क्योंकि ये देश ही विद्वान उत्पन्न करने वाला है, इसीलिए इस देश आर्यावर्त को विश्वगुरु कहा जाता है, मगर ये भी एक कटु सत्य है की इसी देश में अनेको ऐसे भी तथाकथित और स्वघोषित विद्वान होते आये हैं जिनका उद्देश्य ही धर्म अर्थात वेद और वेदज्ञान का उपहास करना रहा है, ऐसे ही एक तथाकथित विद्वान हुए थे जिनका नाम था नारायण भवानराव पावगी इन्होने कुछ पुस्तके लिखी थी जिनमे कुछ हैं

   1. आर्यावर्तच आर्यांची जन्मभूमि व उत्तर ध्रुवाकडील त्यांच्या वसाहती (इ.स. १९२०)

    2. ॠग्वेदातील सप्तसिंधुंचा प्रांत अथवा आर्यावर्तातील आर्यांची जन्मभूमि आणि उत्तर ध्रुवाकडील त्यांच्या वसाहती (इ.स. १९२१)

    3. सोमरस-सुरा नव्हे (इ.स. १९२२)

        इन पुस्तको में लेखक ने वेदो, वैदिक ज्ञान और ऋषियों पर अनेक लांछन लगाये जिनमे प्रमुखता से ये सिद्ध करने की कोशिश की गयी की वैदिक काल में ऋषि और सामान्य मानव भी होम के दौरान सोमरस का पान देवताओ को करवाते थे और अपनी इच्छित मनोकामनाओ की पूर्ति हेतु यज्ञ में पशु वध, नरमेध भी करते थे। अब इन आधारहीन तथ्यों के आधार पर अनेको विधर्मी और महामानव आदि अपनी वेबसाइट और लेखो के माध्यम से हिन्दुओ के मन में वेदज्ञान के प्रति जहर भरने का कार्य करते हैं, उनमे मुख्यत जो आरोप लगाया जाता है वो है :

      वेदो और वैदिक ज्ञान के अनुसार ऋषि आदि अपनी मनोकामनाए पूरी करने हेतु अनेको देवताओ को सोमरस (शराब) की भेंट करते थे।

        सोमरस बनाने की विधि वेद में वर्णित है ऐसा भी इनका खोखला दावा है।

        आइये एक एक आक्षेप को देखकर उसका समुचित जवाब देने की कोशिश करते हैं।

        आक्षेप 1. वेदों में वर्णित सोमरस का पौधा जिसे सोम कहते हैं अफ़ग़ानिस्तान की पहाड़ियों पर ही पाया जाता है। यह बिना पत्तियों का गहरे बादामी रंग का पौधा है। जिसे यदि उबाल कर इसका पानी पीया जाय तो इससे थोड़ा नशा भी होता है। कहते हैं यह पौरुष वर्धक औषधि के रूप में भी प्रयोग होता है।
सोम वसुवर्ग के देवताओं में हैं ।
मत्स्य पुराण (5-21) में आठ वसुओं में सोम की गणना इस प्रकार है-

आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोज्नल: ।
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोज्ष्टौ प्रकीर्तिता: ॥

          समाधान : सोमलता की उत्पत्ति जो बिना पत्ती का पौधा है ऐसा इनका विचार है जो अफगानिस्तान की पहाड़ियों में पैदा होता है ऐसा इनका दावा है उसके लिए ये ऋग्वेद 10.34.1 का मन्त्र “सोमस्येव मौजवतस्य भक्षः” उद्धृत करते हैं। मौजवत पर्वत को आजके हिन्दुकुश अर्थात अफगानिस्तान से निरर्थक ही जोड़ने का प्रयास करते हैं जबकि सच्चाई इसके विपरीत है।

          निरुक्त में “मूजवान पर्वतः” पाठ है मगर वेद का मौजवत और निरुक्त का मूजवान एक ही है, इसमें संदेह होता है, क्योंकि सुश्रुत में “मुञ्जवान” सोम का पर्याय लिखा है अतः मौजवत, मूजवान और मुञ्जवान पृथक पृथक हैं ज्ञात होता है। वेद में एक पदार्थ का वर्णन जो सोम नाम से आता है वह पृथ्वी के वृक्षों की जान है। पृथ्वी की वनस्पति का पोषक है, वनस्पति में सौम्यभाव लाने वाला औषिधिराज है और वनस्पतिमात्र का स्वामी है। वह जिस स्थान में रहता है उसको मौजवत कहते हैं। मेरी पिछली पोस्ट में गौओ के निवास को व्रज कहते हैं ये सिद्ध किया था उसी प्रकार सोम के स्थान को मौजवत कहा गया है। यह स्थान पृथ्वी पर नहीं किन्तु आकाश में है। क्योंकि वनस्पति की जीवनशक्ति चन्द्रमा के आधीन है इसलिए उसका नाम सोम है वह औषधि राज है। अलंकारूप से वह लतारूप है क्योंकि जो भी व्यक्ति शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष को समझते हैं जानते हैं उन्हें पता है की चन्द्रमा पंद्रह दिन तक बढ़ता और पंद्रह दिन तक घटता है, इसे न समझकर व्यर्थ की कोरी कल्पना कर ली गयी की शुक्लपक्ष में इस सोमलता के पत्ते होते हैं और कृष्णपक्ष में गिर जाते हैं।

       सोम वसुवर्ग के देवताओ में हैं ये भी मिथ्या कल्पना इनके घर की है क्योंकि जो वसु का अर्थ भली प्रकार जानते तो ऐसे दोष और मिथ्या बाते प्रचारित ही न करते, आठ वसु में सोम भी शामिल है उसके लिए उपर्लिखित पुराण का श्लोक उद्धृत करते हैं

        मत्स्य पुराण (5-21) में आठ वसुओं में सोम की गणना इस प्रकार है-

आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोज्नल: ।

प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोज्ष्टौ प्रकीर्तिता: ॥

        भागवत पुराण के अनुसार- द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, वसु और विभावसु। महाभारत में आप (अप्) के स्थान में ‘अह:’ और शिवपुराण में ‘अयज’ नाम दिया है।

       अब यदि इनसे पूछा जाए की – आठ वसुओं में सोम हैं मत्स्य पुराण के अनुसार जिसका अर्थ है मादक दृव्य यानी शराब – तो भगवत पुराण में आठ वसुओं में सोम क्यों नहीं लिखा ?

      देखिये ऋषि दयानंद अपने ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में वसु का अर्थ किस प्रकार करते हैं :

       पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य्य और नक्षत्र सब सृष्टि के निवास स्थान होने से आठ वसु। (स. प्र. सप्तम समुल्लास)

      ऋषि ने बहुत ही सरल शब्दों में वसु का अर्थ कर दिया। अब अन्य आर्ष ग्रन्थ से आठ वसुओं का प्रमाण देते हैं :

       शाकल्य-‘आठ वसु कौन से है?’
      याज्ञ.-‘अग्नि, पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चन्द्र और नक्षत्र। जगत के सम्पूर्ण पदार्थ इनमें समाये हुए हैं। अत: ये वसुगण हैं।

       (बृहदारण्यकोपनिषद, अध्याय तीन)

      इन प्रमाणों से सिद्ध है की आठ वसुओं में सोम नामक कोई नाम नहीं। हाँ यदि सोम का अर्थ चन्द्र से करते हो जैसा की इस लेख से सिद्ध भी होता है तो आपकी सोमलता और सोमरस का सिद्धांत ही खंडित हो जाता है।

       आक्षेप 2. सोम की उत्पत्ति के दो स्थान है- (1) स्वर्ग और (2) पार्थिव पर्वत । अग्नि की भाँति सोम भी स्वर्ग से पृथ्वी पर आया । ऋग्वेद ऋग्वेद 1.93.6 में कथन है : ‘मातरिश्वा ने तुम में से एक को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा; गरुत्मान ने दूसरे को मेघशिलाओं से।’ इसी प्रकार ऋग्वेद 9.61.10 में कहा गया है: हे सोम, तुम्हारा जन्म उच्च स्थानीय है; तुम स्वर्ग में रहते हो, यद्यपि पृथ्वी तुम्हारा स्वागत करती है । सोम की उत्पत्ति का पार्थिव स्थान मूजवन्त पर्वत (गान्धार-कम्बोज प्रदेश) है’। ऋग्वेद 10.34.1

       समाधान : यहाँ भी “आँख के अंधे और गाँठ के पुरे” वाली कहावत चरितार्थ होती है देखिये :

अप्सु में सोमो अब्रवीदंतविर्श्वानी भेषजा।
अग्निं च विश्वशम्भुवमापश्च विश्वभेषजीः।। (ऋग्वेद 1.23.20)

      यहाँ सोम समस्त औषधियों के अंदर व्याप्त बतलाया गया है। इस सोम को ऐतरेयब्राह्मण 7.2.10 में स्पष्ट कह दिया है की “एतद्वै देव सोमं यच्चन्द्रमाः” अर्थात यही देवताओ का सोम है जो चन्द्रमा है। इस सोम को गरुड़ और श्येन स्वर्ग से लाते हैं। गरुड़ और श्येन भी सूर्य की किरणे ही हैं। सोम का सौम्य गुण औषधियों पर पड़ता है, यदि स्वर्ग से गरुड़ और श्येन द्वारा उसका लाना है।

       ऐसे वैदिक रीति से किये अर्थो को ना जानकार व्यर्थ ही वेद और सत्य ज्ञान पर आक्षेप लगाना जो सम्पूर्ण विज्ञानं सम्मत है निरर्थक कार्य है, क्योंकि आज विज्ञानं भी प्रमाणित करता है की चन्द्रमा की रौशनी अपनी खुद की नहीं सूर्य की रौशनी ही है यही बात इस मन्त्र में यथार्थ रूप से प्रकट होती है और दूसरा सबसे बड़ा विज्ञानं ये है की चन्द्रमा जो रात को प्रकाश देता है उससे औषधियों का बल बढ़ता है।

“वेद एवं आर्यसमाज के सभी सिद्धान्त सत्य एवं सार्वभौमिक हैं”

“वेद एवं आर्यसमाज के सभी सिद्धान्त सत्य एवं सार्वभौमिक हैं”

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       सारा संसार जानता है कि वेद संसार की आदिकालीन वा सर्वप्राचीन पुस्तकें हैं जिसमें अध्यात्म, सामाजिक व्यवस्था एवं धर्म विषयक सत्य ज्ञान निहित है। यह भी सत्य सिद्धान्त है कि संसार के सभी मत-मतान्तरों व  नास्तिक मतों के आचार्यों व उनके सभी अनुयायियों के पूर्वज भारत निवासी एवं वेदों के मानने वाले थे। महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में लिखा है कि सृष्टि के आरम्भ से महाभारत युद्ध पर्यन्त आर्यों का ही सारे विश्व पर चक्रवर्ती राज्य था।

      अन्य देशों में माण्डलिक राजा रहते थे और भारत के चक्रवर्ती राजाओं को कर दिया करते थे। हमारे देश के राजा भी पूरे विश्व में शिक्षा आदि सभी प्रकार की व्यवस्थाओं की पूर्ति करते थे। महाभारत के बात भारत का सम्बन्ध धीरे धीरे पूरे विश्व से समाप्त होता गया। कालान्तर में भारत सहित सम्पूर्ण भूमण्डल में अविद्या फैल गई। ऐसे समय में भारत सहित पूरे विश्व में विद्या व अविद्या से युक्त अनेक मत-मतान्तरों का प्रादुर्भाव हुआ। ऋषि दयानन्द (1825-1883) ने अपने समय में प्रचलित मत-मतान्तरों का उल्लेख कर अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में उनकी समीक्षा की है।

      इसके साथ ही उन्होंने वैदिक मान्यताओं का भी अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में उल्लेख किया है जो कि विद्या, तर्क एवं युक्तियों पर आधारित होने के सहित सबके लिये कल्याणकारी एवं विश्व समाज में धर्म की दृष्टि से एकरूपता व समानता स्थापित करने में महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। यदि सारा संसार वेद की मान्यताओं व सिद्धान्तों को धर्म के रूप में अपना लें तो संसार में धर्म व मत-मतान्तर के नाम पर होने वाले सभी विवाद एवं संघर्ष समाप्त हो सकते हैं। इसके लिये सबको अपना अपना स्वार्थ त्याग करना होगा व वैदिक मत को समझना होगा जिसके लिये कोई सहमत एवं प्रवृत्त होने को तत्पर नहीं है।

       यह स्थिति कब तक रहेगी, निश्चय से नहीं कहा जा सकता। एक समय ऐसा अवश्य आ सकता है कि जब उस समय की नई पीढ़ी ईश्वर व जीवात्मा आदि विषयक वेद के सत्य सिद्धान्तों को स्वीकार कर ले और मत-मतान्तरों की सच्चाई को भी जान कर स्वयं उससे मुक्त होने के लिए कटिबद्ध हो। यह संसार ईश्वर का बनाया हुआ व उसी से संचालित एवं नियंत्रित हैं। हम सभी मनुष्य तो उसकी आज्ञा का पालन अपने अपने प्रकार से कर रहे हैं। ऋषि दयानन्द व उससे पूर्व भी अनेक ऋषियों व महर्षियों ने वही कार्य किया था जो कि ऋषि दयानन्द जी ने अपने समय में किया है। सभी विद्वान सज्जन पुरुषों का कर्तव्य है कि वह सभी मतों का अध्ययन कर धर्म के सत्य सिद्धान्तों का निश्चय करें और उनका वैश्विक स्तर पर प्रचार करें जिससे पूरे विश्व में एक सत्य मत, जो अविद्या व अज्ञान से पूर्णतया मुक्त हो, स्थापित करने में सफलता मिल सके।

        वेद और आर्यसमाज की संसार को प्रमुख देन त्रैतवाद एवं कर्म-फल व्यवस्था का सिद्धान्त है। त्रैतवाद का अर्थ है कि संसार में तीन अनादि व नित्य सत्तायें हैं। यह सत्तायें हैं ‘ईश्वर, जीव और प्रकृति’। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य पवित्र और सृष्टिकर्ता है।

       ईश्वर अनादि सत्ता है। इसका आदि अर्थात् आरम्भ नहीं है। यह नाशरहित है। इसका कभी नाश नहीं हो सकता। इसके मूल स्वरूप में कभी किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता। इस ईश्वर से ही यह विश्व ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आया है। परमात्मा इस सृष्टि का निमित्तकारण हैं। अनादि, असंख्य एवं अनन्त, एकदेशी, सूक्ष्म, आंखों से अदृश्य जीवों वा जीचवात्माओं के पूर्व जन्मों के कर्मों के सुख व दुःख रूपी फल देने के लिये ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की है। ईश्वर की सत्ता, स्वरूप व गुण-कर्म-स्वभाव को विस्तार से जानने के लिये ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों सहित वेद, दर्शन एवं उपनिषदों का स्वाध्याय व अध्ययन करना चाहिये।

     जीवात्मा का ईश्वर एवं प्रकृति से पृथक अस्तित्व है। जीवात्मा भी एक चेतन तत्व है जो अनादि, अनुत्पन्न, नित्य, सूक्ष्म, एकदेशी, ससीम, जन्म-मरण में बंधा हुआ, शुभ व अशुभ कर्मों को करने वाला तथा ईश्वर की व्यवस्था से उन कर्मों का फल भोगने वाला, मनुष्य आदि अगणित योनियों में कर्मानुसार जन्म लेने वाला एवं मनुष्य योनि में वेद का अध्ययन कर तथा उसके अनुरुप कर्म कर बन्धनों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होने वाला है।

      मनुष्य जन्म के समय केवल पूर्व जन्मों के कर्मों के संस्कार लेकर आता है और शुभ व अशुभ संस्कार लेकर ही संसार से जाता है। वह न तो कोई धन या भौतिक पदार्थ लेकर आता है और न मृत्यु के समय किसी प्रकार की सम्पत्ति या पदार्थ लेकर जाता है। यहां तक की उसका शरीर भी यहीं छूट जाता है जिसे समाज के लिये हानिकारक होने के कारण विज्ञ लोग अन्त्येष्टि कर्म करके अग्नि के समर्पित कर देते हैं। अग्नि में इस लिये समर्पित करते हैं जिससे शरीर के पांचों भूत अपने कारण तत्वों में विलीन हो जायें और मृतक शरीर के रोगकारक किटाणु नष्ट हो जायें। भूमि में गाड़ने से यह लाभ नहीं होता तथा यह क्रिया वेद विरुद्ध होने से त्याज्य है। अतः मनुष्य को अपरिग्रही, त्यागी व ज्ञान प्राप्ति में रुचि रखने सहित ईश्वरोपासना एवं परोपकार के कार्यों को करते रहना चाहिये।

       वेदों का अध्ययन कर उसके अनुरुप आचरण एवं साधना करनी चाहिये जिससे मनुष्य वा जीवात्मा का यह जन्म व परजन्म दोनों में कल्याण हो। वैदिक दर्शन की नींव ईश्वरीय ज्ञान वेद, ऋषियों के ग्रन्थों, सत्य, युक्ति व तर्क पर आधारित है। अन्य मतों में ऐसा नहीं है। बुद्धि तर्क व वितर्क कर सत्य का निर्णय करती है। हम जिस मत को भी माने, हमें सत्य व तर्क से सिद्ध मान्यताओं व सिद्धान्तों को ही मानना चाहिये।

       असत्य व तर्कहीन बातों का त्याग करने सहित अन्य मनुष्यों व प्राणियों को किसी प्रकार की पीड़ा व कष्ट नहीं देना चाहिये। इस दृष्टि से मांसाहार घोर पाप सिद्ध होता है। मनुष्यों को अहिंसा व पुरुषार्थ से अर्जित सात्विक भोजन का ही भक्षण व सेवन करना चाहिये। ऐसा करने से ही ईश्वर हमें जन्म जन्मान्तरों में सुख देगा अन्यथा हमें अपने अशुभ कर्मों के दुःख रूपी फल अवश्य भोगने होंगे यह निश्चित होता है। यह भी जान लें कि ईश्वर केवल एक है जबकि जीवात्माओं की संख्या अनन्त हैं। हम जीवात्माओं की संख्या न तो गणना कर सकते हैं न उनकी संख्या को अन्य किसी प्रकार से नहीं ही जान सकते। ईश्वर के ज्ञान में जीवात्माओं की संख्या की पूरी पूरी जानकारी होती है।

       सृष्टि में तीसरा अनादि व नित्य पदार्थ प्रकृति है। यह प्रकृति सूक्ष्म है परन्तु ईश्वर सबसे सूक्ष्म तथा सूक्ष्मता की दृष्टि से जीवात्माओं का स्थान ईश्वर व प्रकृति के मध्य में है। प्रकृति त्रिगुणात्मक है। त्रिगुण सत्व, रज व तम कहलाते हैं। प्रलय के बाद प्रलय की अवधि पूर्ण होने पर परमात्मा ईक्षण व प्रेरणा द्वारा प्रकृति में हलचल उत्पन्न करते हैं जिससे सृष्टि रचना की प्रक्रिया आरम्भ होती है। प्रकृति का पहला विकार महत्तत्व बुद्धि कहलाता है।

      इसके बाद दूसरा विकार अहंकार होता है। अहंकार से पांच तन्मात्रायें अस्तित्व में आती हैं। फिर सूक्ष्म भूत और दश इन्द्रियां एवं ग्यारहवां मन, पांच तन्मात्राओ ंसे पृथिव्यादि पांच भूत बनते हैं। इन सबके अस्तित्व में आने व सृष्टि का निर्माण पूर्ण हो जाने पर मनुष्य की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार से प्रकृति से सृष्टि वा ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आता है। यह समस्त सृष्टि निमित्त कारण परमात्मा एवं उपादान कारण प्रकृति से आविर्भूत है। यही ज्ञान व विज्ञान है। जो लोग ईश्वर को नहीं मानते वह कहीं न कहीं भूल करते हैं जिसका कारण अविद्या ही माना जा सकता है। ऐसे लोगों को यह भी नहीं पता होता कि मनुष्य में एक अविनाशी चेतन सत्ता आत्मा है जो अपने अतीत के कर्मों का फल भोगने के लिये जन्म लेती है और इस जन्म में जो नये कर्म करती है उसके अनुसार ही उसके आगे के जन्म होते हैं। ऋषि दयानन्द प्रदत्त वैदिक त्रैतवाद का सिद्धान्त पूर्णतया तर्क एवं युक्तिसंगत होने से मान्य एवं स्वीकार्य है।

     महर्षि दयानन्द वेदज्ञ थे। उन्हें वेदों का तलस्पर्शी, सत्य, यथार्थ एवं गहन ज्ञान था। उन्होंने आर्यसमाज के दस नियमों की रचना की है। यह नियम भी सार्वभौमिक एवं सत्य नियम हैं। सबको इनका अध्ययन कर परीक्षा करनी चाहिये और इन्हें अपनाना चाहिये।

      हम समझते हैं कि विज्ञान के सिद्धान्तों के समान ही आर्यसमाज के नियम व सिद्धान्त भी पूर्णतया सत्य हैं। इसमें शंका व भ्रम की किंचित भी सम्भावना नहीं हैं। पहला नियम अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं जो विज्ञान से सम्बन्ध रखता है। नियम है कि सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उनका आदि मूल परमेश्वर है। विज्ञान ईश्वर को स्वीकार नहीं करता परन्तु उसके पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं है कि ज्ञान व विज्ञान से पूर्ण सृष्टि की रचना कब व किसने किस प्रयोजन से की है। इसका सही उत्तर वही है जो इस नियम में कहा गया है।

      परमेश्वर ही सब सत्य विद्याओं और जो पदार्थ विद्या से संयुक्त होकर बने हैं, उनका आदि व मूल है। दूसरा नियम ईश्वर विषयक है जिसका उल्लेख हम उपर्युक्त पंक्तियों में कर चुके हैं। तीसरा नियम अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। इस नियम में कहा गया है कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना सब आर्यों (वा मनुष्यों) का परम धर्म है। विचार करने पर यह नियम भी पूर्ण सत्य सिद्ध होता है।

      सृष्टि के आरम्भ में यदि परमात्मा ने अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न किये गये बिना माता-पिता व आचार्यों वाली सन्तान व शिष्यों को चार ऋषियों के द्वारा वेदों का ज्ञान न दिया होता तो मनुष्य कभी भी ज्ञानवान नहीं हो सकते थे। इन्हीं वेदों को ईश्वर से प्राप्त कर व इनके अर्थ जानकर हमारे आदि पूर्वज विद्वान बने थे।

     वेद की प्रत्येक बात सत्य है तथा इसका प्रत्येक शब्द व उसके अर्थ अलौकिक अर्थात् ईश्वर से प्राप्त हुए हैं। आर्यसमाज का चौथा नियम है कि सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। सारा संसार इस नियम को मानता है परन्तु इस पर आचरण बहुत कम लोग करते हैं। इसी कारण से संसार में दुःख व मनुष्यों के जीवन स्तर, शिक्षा व बल आदि में अन्तर है। पांचवा नियम है कि सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहियें। यह नियम भी अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं और इसके लिये सभी मनुष्यों को वेद, ऋषियों के ग्रन्थों तथा विद्वान आचार्यों की शरण लेनी चाहिये।

      अन्य पांच नियम भी अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं एवं मानवमात्र के लिये कल्याणकारी हैं। हम पाठकों से आग्रह करेंगे कि वह सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका सहित ऋषि दयानन्द के सभी ग्रन्थों और वेद, दर्शन, उपनिषद, विशुद्ध मनुस्मृति आदि का अध्ययन करें। वह पायेंगे कि वेद की जो मान्यतायें हैं वही आर्यसमाज की भी हैं। यही वैदिक मान्यतायें सत्यधर्म की पर्याय हैं।

       वेदों एवं ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों में निहित सभी मान्यतायें सत्य एवं सार्वभौमिक हैं। इन ग्रन्थों व इनकी मान्यताओं के पालन से ही विश्व में शान्ति एवं संसार के सब मनुष्यों सहित सभी प्राणियों का कल्याण हो सकता है। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

–मनमोहन कुमार आर्य

“रामनवमी संसार के एक प्राचीन आदर्श राजा राम से जुड़ा पावन पर्व है”

“रामनवमी संसार के एक प्राचीन आदर्श राजा राम से जुड़ा पावन पर्व है”

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       भारत का सौभाग्य है कि इस देश की धरती पर सृष्टि के आरम्भ में सर्वव्यापक ईश्वर से चार ऋषियों को चार वेदों का ज्ञान प्राप्त हुआ था। इन चार वेदों के विषय ज्ञान, कर्म, उपासना एवं विशिष्ट ज्ञान है। वेद ईश्वर से ही उत्पन्न हुए हैं। यह पौरूषेय रचना नहीं अपितु अपौरूषेय रचना है। वेदों के अतिरिक्त संसार के सभी ग्रन्थ मनुष्यों द्वारा रचित पौरूषेय रचनायें हैं। मनुष्य एकदेशी अनादि सूक्ष्म चेतन तत्व होने से अल्पज्ञ है।

      अल्पज्ञ का अर्थ है मनुष्य का ज्ञान अत्यन्त अल्प होता है। ईश्वर अनादि, अनन्त, सब विकारों से रहित, सुख व दुःख से भी रहित, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान एवं सर्वान्तरर्यामी होने से सर्वज्ञ है। वह सुष्टि के आदिकालीन इतिहास से अब तक की सब वस्तुओं को जानता है तथा उसे इस सृष्टि की रचना, पालन, प्रलय, जीवों के कर्म, उनके फल का विधान आदि सभी प्रकार का सत्य, पूर्ण, यर्थात एवं दोषरहित ज्ञान है। ईश्वर निष्पक्ष एवं न्यायकारी अनादि एवं अविनाशी सत्ता है। उसके न्याय के सम्मुख संसार के सभी न्याय तुच्छ है। मनुष्य अच्छे व बुरे कर्म करके सांसारिक न्याय व दण्ड व्यवस्था से तो बच सकता है परन्तु ईश्वर का विधान है कि उसे अपने प्रत्येक शुभ व अशुभ कर्म का फल ईश्वर की व्यवस्था से मिलता है। संसार में इसका भलीभान्ति पालन होता भी दिखाई दे रहा है। हमारे व सभी प्राणियों के अस्तित्व का कारण हमारे पूर्व जन्म-जन्मान्तरों के वह कर्म हैं जिनका जन्म लेने से पूर्व भोग नहीं हुआ था। इसका कारण है कि सरकारी व शासकीय व्यवस्था किसी मनुष्य के सभी कर्मों का फल व भोग प्रदान नहीं करा सकती।

      मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम त्रेता युग में न्यूनतम 8.70 लाख वर्षों से भी पूर्व इस संसार में ऐसे ही महापुरुष थे जैसे कि आज संसार में कुछ इन गिने श्रेष्ठ महापुरुष हो सकते हैं। उन सबसे अधिक गुणवान, बल, शक्ति, श्रेष्ठ वेदों का आचरण करने में वह अग्रणीय थे। राम विश्व इतिहास के आदर्श राजा हैं। उनके राज्य में सबसे न्याय होता था। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के राज्यकाल में सब को वेद पढ़ने और अपने जीवन में श्रेष्ठ गुणों को धारण करने का अधिकार था। लोग ऋषि मुनियों के आश्रम में जाकर निःशुल्क वेद वेदांगों का अध्ययन करते थे। जन्मना जातिवाद, दलित, अगड़े-पिछड़ों व अस्पर्शयता आदि की कोई समस्या नहीं थी। सब धनवान थे और सुखी व वैदिक मान्यताओं के अनुरूप जीवन जीते थे। राम के न्याय से डर कर किसी व्यक्ति में अपराध करने का विचार तक भी नहीं आता था।

      यदि कोई करता था तो उसे राज्य व्यवस्था से तत्काल व शीघ्रतम दण्ड मिलता था। रामचन्द्र जी में किसी मनुष्य में धारण करने योग्य सभी गुण अपनी पराकाष्ठा में थे। इसी से प्रेरित होकर उस युग के महान महाकवि ऋषि बाल्मीकि जी ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को अपने इतिहास लेखन का चरित नायक बनाया था। ऋषि वह होता है जो किसी के गुणों की मिथ्या प्रशंसा या चापलूसी नहीं करता जैसा कि आजकल देश की राजनीति में प्रतिदिन देखने को मिलता है। ऋषि यदि किसी के गुण का उल्लेख करता है तो वह उसमें अवश्य होता है। वह अधिक को बहुत अधिक न प्रकट कर सन्तुलित या सम्यक रूप में ही प्रस्तुत करता है। हम अनुमान करते हैं कि बाल्मीकि रामायण में श्री रामचन्द्र जी के जिन गुणों का वर्णन है, उनमें वह गुण कहीं अधिक विद्यमान थे।

       बाल्मीकि रामायण को लिखे लाखों वर्ष हो गये। मध्यकाल में कुछ दुष्ट आत्माओं ने भारत के ऋषियो ंके ग्रन्थों में अपनी मिथ्या व स्वार्थपूर्ण मान्यताओं का प्रक्षेप कर इन्हें दूषित करने का प्रयास किया। मनुस्मृति सहित रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों में वेद विरुद्ध अनेक प्रक्षेप किये गये। देश व संसार ऋषि दयानन्द के ऋणी हैं जिनकी मेधा बुद्धि ने मध्यकाल में स्वार्थी लोगों द्वारा किये गये प्रक्षेपों को जाना, पहचाना व उन्हें पहचानने करने की कसौटी बताई। उन्होंने कहा है कि वेद-विरुद्ध प्रक्षेप विष-सम्पृक्त अन्न के समान होता है। ऋषियों के ग्रन्थों में कोई भी वेद विरुद्ध या प्रसंग विरुद्ध बात आती है तो वह प्रक्षिप्त होती है। इसी आधार पर आर्य विद्वानों ने मनुस्मृति का संशोधन एवं सुधार किया है। ऋषि दयानन्द-भक्त स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती जी ने भी इस सिद्धान्त व नीति के आधार पर रामायण एवं महाभारत का परीक्षण कर उनके शुद्ध संस्करण प्रस्तुत किये हैं जिससे मानव जाति का अत्यन्त उपकार हुआ है। अनेक उपनिषदें भी ऐसी हैं जिनमें वेदविरुद्ध अंश पाया जाता है। ऐसे ग्रन्थ या तो वेदों के सत्य ज्ञान से अनभिज्ञ विद्वानों के लिखे ग्रन्थ होते हैं या फिर वह प्रक्षिप्त होते हैं। इसी कारण आर्यसमाज उपनिषदों में केवल 11 उपनिषदों को प्रामाणिक मानता है।

       श्री रामचन्द्र जी के जीवन की जो घटना मनुष्यों को सबसे अधिक प्रभावित करती है वह उनका माता-पिता का आज्ञाकारी होना है। उन्होंने दिखा दिया कि पिता की आज्ञा के सम्मुख चक्रवर्ती राज्य भी महत्व नहीं रखता। पिता की आज्ञा दिये बिना केवल परिस्थितियों को जानकर राजा रामचन्द्र जी ने 14 वर्ष के लिये वन जाकर रहने का अपूर्व निर्णय किया था और वहां वह वनवासी लोगों के सम्पर्क में आये थे। उनका सहयोग करते व लेते हुए उन्होंने वहां की राज्य व्यवस्था को भी ठीक किया था। वनवास की अवधि में ही उन्होंने सुग्रीव के महाबली भाई बाली का वध किया था। बाली से उनका किसी प्रकार का वैरभाव नहीं था परन्तु बाली ने सुग्रीव के साथ जो अधर्मयुक्त व्यवहार किया था   उसका दण्ड देने के लिये उन्होंने एक राजा होने के कारण दण्डित कर उसे प्राणदण्ड दिया था।

        यह एक प्रकार के उस समय के दुष्ट राजाओं को एक उदहारण था कि यदि कोई राजा अधर्मयुक्त आचरण करेगा तो वह राम से दण्डित हो सकता है। जिन दिनों रामचन्द्र जी वन में थे, वहां ऋषि, मुनि, साधु, संन्यासी व साधक ईश्वर का साक्षात्कार करने की साधना करते थे। उनका समय ईश्वर विषयक ग्रन्थों के स्वाध्याय, साधना, ईश्वरोपासना एवं अग्निहोत्र यज्ञ आदि सहित गोपालन व कृषि कार्यों में व्यतीत होता था। लंका के राजा रावण के राक्षस सैनिक उन्हें परेशान करते व मार देते थे। राम चन्द्र जी के वन में आने से उन्होंने ऋषियों की रक्षा का व्रत लिया और वनों को प्रायः सभी राक्षसों से रहित कर दिया था। इससे सभी ऋषि मुनियों की सुरक्षित जीवन सुखमय उपलब्ध हुआ था और सबने रामचन्द्र जी को अपना आशीर्वाद दिया था जिससे आगे चलकर राम-रावण युद्ध में वह सफल हुए थे।

       वनवास में रहते हुए राम चन्द्र जी की धर्मपत्नी माता सीता जी का रावण ने अपहरण कर लिया था। राम ने सुग्रीव के सहयोग से सेना तैयार की और समुद्र पर पुल बांधने का अद्वितीय व आज भी असम्भव कार्य किया था। उनके सभी सैनिक लंका पहुंचे थे और उस समय के सबसे शक्तिशाली राजा रावण से युद्ध कर उसके सभी सेनापतियों व योद्धओं को मार डाला था। रावण स्वयं युद्ध में मारा गया। यह राम-रावण युद्ध धर्म-अधर्म के मध्य युद्ध था जिसमें धर्म की विजय हुई थी। राम वैदिक आर्य राजनीति के मर्मज्ञ थे। उन्होंने लंका को अपना उपनिवेश न बनाकर रावण के धार्मिक प्रवृत्ति के भाई विभीषण को वहां का राजा बना कर एक प्रशंसनीय उदाहरण प्रस्तुत किया था। रावण की ही तरह पड़ोसी देश पाकिस्तान का भी विगत 72 वर्षों से भारत के साथ व्यवहार है। वह आतंकवाद के माध्यम से भारत से छद्म युद्ध कर रहा है। हमारे हजारों सैनिक इस कारण अपने प्राणों से हाथ धो बैठे हैं। यदि विगत समय में राम जैसा कोई राजा भारत में होता तो उसकी वही दशा होती जो राम ने रावण की थी। 

       इस दृष्टि से प्रधानमंत्री मोदी जी कुछ अच्छे राजा अर्थात् प्रधानमंत्री सिद्ध हुए हैं। रामायण में राम व सीता जी को हम हर परिस्थिति में धर्म का पालन व धर्म की रक्षा करते हुए देखते हैं। वह विपरीत से विपरीत परिस्थिति में धैर्य रखते थे। धैर्य ही धर्म का प्रथम लक्षण है। इसका हमें भी ध्यान रखना चाहिये। राम चन्द्र जी को एक बलवान, ब्रह्मचारी, वीर, साहसी, देशभक्त, वेदभक्त, ईश्वरभक्त, स्वामीभक्त शिष्य व भक्त हनुमान मिले थे। राम को अपने वनवासी जीवन में उनसे अनेक प्रकार की सहायता प्राप्त हुई। राम व हनुमान का स्वामी-सेवक सम्बद्ध आदर्श सम्बन्ध रहा है। इसे पढ़कर हम ऐसा अनुभव करते हैं कि हमें अपना आदर्श किसी सामान्य व्यक्ति को नहीं अपितु श्री राम जैसे व्यक्ति को बनाना चाहिये जिसमें गुणों की पराकाष्ठा हो।

       वर्तमान समय में इसकी पूर्ति मर्यादा पुरुषोत्तम राम, योगेश्वर श्रीकृष्ण व महर्षि दयानन्द के जीवन को अपनाकर की जा सकती है। यदि हम ऐसा करेंगे तभी देश सुरक्षित रहेगा अन्यथा नहीं, ऐसा हम अनुभव करते हैं। रामनवमी के अवसर पर हमें बाल्मीकी रामायण के प्रेरक प्रसंगों को पढ़कर उनसे प्रेरणा लेकर अपने जीवन का कल्याण करना है। इस अवसर पर पौराणिक कथाओं व पूजा के स्थान पर श्री राम चन्द्र के चरित्र पर विद्वानों के प्रवचन होने चाहिये जो उनके गुणों को प्रस्तुत कर लोगों को उन जैसा बनने की प्रेरणा करें। तभी रामनवमी का पर्व मनाना सार्थक हो सकता है।

       रामचन्द्र जी की एक बात जो हमें बहुत प्रभावित करती है उसे भी यहां लिख देते हैं। राम ने वनगमन से पूर्व जब पिता को अर्धमूर्च्छित अवस्था में देखा तो उन्होंने उसका कारण बताने को कहा था। दशरथ जी के मौन रहने पर उन्होंने प्रतिज्ञापूर्वक कहा था कि आप मुझे निःसंकोच अपने मन की बात कहें। यदि आपकी आज्ञा पालन करने के लिये मुझे चिता की अग्नि में कूदना भी पड़े तो भी मैं उस पर बिना विचार किए कूद जाऊंगा। इतिहास में किसी पुत्र ने अपने पिता को ऐसी बात कही हो इसका कोई उदाहरण नहीं मिलता। राम ने अपने जीवन में जो कार्य किये वैसे कार्य भी किसी अन्य ने किये हों, विश्व इतिहास में इसका भी कोई उदाहरण नहीं मिलता। हम तो विगत अनेक शताब्दियों से लोगों को सत्ता प्राप्ति के लिये पागल सा हुआ देख रहे हैं।

       इतिहास में सत्ता के लिए भाई ने भाई को मारा है परन्तु वैदिक धर्म व इतिहास इसके विपरीत है। रामचन्द्र जी के इतिहास को अपनाकर ही देश की समस्याओं का समाधान का हो सकता है। रामनवमी के दिन आर्यों व हिन्दुओं को अपनी घटती जनसंख्या व उसके अनुपात पर भी ध्यान देना चाहिये। इसमें यदि असावधानी हुई तो वेद, वैदिक धर्म व सनातन धर्म इतिहास की वस्तु बन कर रह जायेंगी। रामनवमी पर्व के दिन हमें जन्मना जातिवाद दूर करने की भी शपथ व संकल्प लेना चाहिये। इसी से आर्य हिन्दू जाति सुरक्षित हो सकती है। हमें शुद्ध मन से मूर्तिपूजा, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष की अविश्वसनीयता व हानियों सहित अवतारवाद आदि की मान्यताओं पर वेद, दर्शन, उपनिषद एवं गुणदोष के आधार पर विचार एवं निर्णय करना चाहिये।

       इसी में जाति का हित छिपा हुआ है। चैत्र शुक्ल अष्टमी को जो बाल-नारी पूजन की प्रथायें प्रचलित हैं उस पर भी आधुनिक परिस्थितयों के अनुरूप चिन्तन कर उसे सार्थक रूप देने का प्रयास करना चाहिये। विद्वानों का काम पुरानी वस्तुओं की न्यूनताओं को दूर कर उसे आधुनिक समय के अनुकूल व अनुरूप बनाना होता है तभी वह अधिक लाभप्रद व उपयोगी बनती हैं। लकीर को पीटने से समय एवं भविष्य में हितों की हानि होती है व होती आ रही है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

बदसूरत होते पारिवारिक रिश्ते

बदसूरत होते पारिवारिक रिश्ते

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      बिलकुल नया जमाना है लोग पत्र-पत्रिकाओं और किताबों की दुनिया से निकलकर इंटरनेट की रहस्यमयी दुनिया में प्रवेश कर चुके है। ऐसे में एक से ज्यादा साथी रखने का रुझान अब सीमित दायरे में नहीं रहा है। बल्कि लोग आज ऐसे रिश्तों को आजमा कर देख रहे हैं जिनको अब तक सामाजिक रूप से गलत समझा जाता था। देखा जाये तो इंटरनेट की अत्याधुनिक दुनिया में आजकल कई लोगों के साथ शारीरिक संबंध बनाने वाले लोगों को भी आधुनिकता से जोड़ा जा रहा हैं, किन्तु इन आधुनिक रिश्तों के जो परिणाम सामने आ रहे है वो वाकई में सोचने वाले है कि आखिर हमारा समाज जा कहाँ रहा है!

      अभी कई रोज पहले महाराष्ट्र के बल्लारपुर में कॉलेज में पढ़ाने वाले ऋषिकांत नाम के एक शख्स ने अपनी दो नाबालिग बेटियों को फांसी पर लटकाकर जान से मार डाला। इसकी तस्वीर अपनी पत्नी प्रगति को व्हाट्सएप करने के बाद उसने खुद भी आत्महत्या कर ली। पुलिस के अनुसार ऋषिकांत अपनी पत्नी प्रगति की बेवफाई से परेशान था। दूसरा मामला बिहार के कंकड़बाग थाना क्षेत्र का है यहाँ एक बाप अपनी मासूम बच्ची को इसलिए शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना देता था, क्योंकि उसकी पत्नी उसे छोड़कर किसी दूसरे के साथ चली गई थी।

     एक और मामला महाराष्ट्र के ठाणे जिले का कुछ समय पहले का है। यहाँ एक शख्स ने अपनी पत्नी को चाकू से बेरहमी से मार डाला था। घटना के वक्त उसकी पत्नी अपने ऑफिस में काम कर रही थी, पति चाकू लेकर उसके ऑफिस में पहुंचा और पत्नी पर एक बाद एक 26 वार कर डाले। कारण यह शख्स अपनी पत्नी पर शक करता था। पिछले साल मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में एक खोफनाक घटना ने तब सबके रौंगटे खड़े कर दिए थे जब एक पति ने  अपनी पत्नी के चरित्र पर शक के चलते पत्नी की गर्दन काट कर थाने ले गया था।

     सभी जगह सिर्फ महिलाएं ही इन अवैध सम्बन्धों या शक का शिकार है नहीं हैं। पिछले वर्ष फरवरी माह में ओडिशा के नबरंगपुर जिले में अवैध संबंध के शक में एक महिला ने अपने पति का प्राइवेट पार्ट काट दिया था। यहाँ महिला को अपने पति पर शक था कि उसके किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंध हैं। यहीं नहीं पिछले एक साल में इस तरह की दर्जनों शिकायतें महिला थानों पहुंची है। जिनमें कहा गया है कि मेरे पति मेरी जासूसी कराते हैं। घर में मेरा मोबाइल चेक होता हैं। मैं फेसबुक और व्हाट्स एप पर किससे क्या चैटिंग कर रही हूं। इसकी पूरी डिटेल पति रखते हैं, साथ ही घर आने के बाद ऑफिस से आने वाले फोन पर मेरे पति शक की नजर से देखते हैं।

    असल में एक से ज्यादा साथी की चाह और फेसबुक, व्हाट्सएप्प पर चैटिंग का शौक आए दिन पति-पत्‍‌नी के रिश्तों में दरार डाल रहा है। चैटिंग के चलते आए दिन पति और पत्‍‌नी के बीच शक गहरा रहा है। शक के बाद कई जगह रिश्ते टूट रहे है तो कई जगह हत्या हिंसा तक भी पहुँच रहे है। यानि अभी तक पति और पत्नी के बीच भावनाओं और विश्वास का जो मजबूत सेतु हुआ करता था आज अविश्वास और बेपरवाह होते रिश्तों ने उस सेतु को कमजोर कर दिया है।

     कुछ सालों पहले तक ऐसी घटनाएँ पश्चिमी देशों में देखने को मिलती थी। एक से ज्यादा साथी रखने का प्रचलन उनकी सामाजिक दुनिया हिस्सा था। जबकि हमारे यहाँ पति-पत्नी को एक दूसरे के भरोसे प्रेम और एक दूसरे की आपसी स्वीकार्यता को बढ़ावा देने वाला रहा हैं। किन्तु जैसे-जैसे टेक्नोलोजी का विस्तार हो रहा है ऐसे-ऐसे हमारे यहाँ भी सात फेरे और सात वचन से बंधे पवित्र रिश्तों में आज बिखराव, पतन, अपराध, हत्या, आत्महत्या आदि बड़ी तेजी से पांव पसार रही हैं। या कहो कि सामाजिक सीमाएं और मर्यादाएं खोखली होकर बिखरती नजर आ रही हैं। देखा जाये आपसी संवाद स्थापित करने का साधन स्मार्टफोन भी पति-पत्‍‌नी के रिश्ते में दूरियां लाने में कम जिम्मेदार नहीं हैं। आज परिवारों में दिन की शुरुआत फेसबुक या व्हाट्सएप्प से होती है और देर रात तक आने वाले नोटिफिकेशन जगाए रखते हैं और इस लत की कीमत रिश्तों को चुकानी पड़ रही है।

     शादी के बाद अक्सर भावनाओं को न समझने के बहाने से लेकर जब दोनों अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए किसी तीसरे की तरफ आकर्षित होने लगते हैं। यानि तीसरा इन्सान उनके बीच में आता है तब वैवाहिक रिश्ते का अंत शक से शुरू हो होता है और एकल परिवार में उन्हें समझाने वालों की कमी के चलते भी हालात मारपीट, हमले और हत्या तक पहुंच जाते हैं।

      शादी के बाद जहां वैवाहिक रिश्ते को बनाए रखने में पति और पत्नी दोनों की जिम्मेदारी होती है वहीं  इसके खत्म करने में भी दोनों का हाथ होता है। एक दूसरे के प्रति विश्वास, समर्पण और आत्मीयता का भाव रिश्तों को मजबूत बनाता है। अगर आप आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते है तब आप उस तकनीक का सदुपयोग आपसी रिश्तों में नजदीकी लाने में करें न कि उसे रिश्तों में दूरियां बनाने का कारण बनायें। साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा बाहरी सम्बन्ध दोनों के बीच शक का आधार बनते हैं और ऐसे सम्बन्धों को न हमारा समाज स्वीकार करता न धर्म और न ही हमारा संविधान। ऐसे में पति पत्नी दोनों को एक दूसरे पर विश्वास रखना होगा और सामने वाले को उस विश्वास को मजबूत करना होगा और यह आप पर निर्भर करता है कि आपको एक हँसता खेलता खुबसूरत रिश्तों परिवार चाहिए या दुःख क्लेश और हिंसा के अंधकार में जाता एक बदसूरत रिश्तों का परिवार। यह सब सिर्फ आपको ही सोचना है क्योंकि परिवार आपका है।