स्वामी दयानंद सरस्वती जी तथा उनकी उत्तराधिकारिणी सभा

स्वामी दयानंद सरस्वती जी तथा उनकी उत्तराधिकारिणी सभा

आर्य समाज ने अपने अल्पकाल में ही हिंदी क्षेत्र में आधिकारिक स्थान बना लिया| इनके हिन्दी साहित्य पर पड़े प्रभाव से तो यूँ कहां जाने लगा कि बिना आर्य समाज के उल्लेख के हिंदी साहित्य तो अधूरा ही रह जाता है| इतने मात्र से ही ज्ञात होता है कि स्वामी दयानंद सरस्वती आर्य समाज तथा आर्य समाजियों का हिंदी साहित्य को अतुलनीय योगदान है अन्यथा इनके उल्लेख के बिना हिंदी साहित्य को अधूरा रखने की चल रही चर्चा का जन्म ही न होता| इसकी सहायता के परीक्षण करने के लिए आओ स्वामी दयानंद सरस्वती, आर्य समाज तथा आर्य समाजियों के हिंदी साहित्य के लिए किये गए योगदान पर विचार करें|

स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने गुजराती होते हुए भी देश को एक सूत्र में बांधने के लिए अपनी प्रचार की भाषा संस्कृत के स्थान पर जनसामान्य की भाषा हिंदी को अपनी लेखनी तथा प्रचार के लिए अपनाना एक क्रान्तिकारी कदम था| यह सत्य विशेष रूप में उस समय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जबकि हिंदी साहित्य के आदि काल के उन्नायक स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने हिंदी के पूर्व साहित्यिक काल “रीतिकाल” काल” के सन्धि समय में ही हुए थे तथा श्रृन्गारिकता के दुष्परिणाम स्वरूप जो देश को पराधीनता का मुंह देखना पडा था, उससे जन मानस को बचाने के लिए न केवल जनभाषा हिंदी की खड़ी बोली में प्रचार आरम्भ किया अपितु साहित्य का मुख, स्वाधीनता, स्वावलंबन, देशभक्ति, पूर्व वैभव का स्मरण तथा अंधविश्वासों के खंडन की और मोड़ दिया| जिस कारण तत्कालीन युगाचार्य भारतेंदु हरिश्चंद्र, जो श्रृंगार काव्य द्वारा ही अपना लेखन कार्य आरम्भ कर चुके थे, को भी इस उलटी गंगा के बहाव में बहाने को बाध्य होना पडा| स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने तथा उनकी उत्तराधिकारिणी आर्य समाज ने हिंदी के प्रचार प्रसार में कोई कसर न उठा रखी| उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि “यदि आप हमारे साहित्य को पढ़ना चाहते हो तो हिंदी सीखो|” विदेशियों को भी ऐसी ही शिक्षा दी| आओ हम हिंदी के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती जी तथा उनके द्वारा सथापित आर्य समाज द्वारा हिंदी के लिए किये गए कार्यों का मूल्यांकन करें|

स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने आर्य समाज की स्थापना के साथ ही सर सैय्यद अहमद खां, फ्रांसिसी विद्वान् गार्सा-ड-तासी, संयुक्त प्रांत शिक्षा विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष मि. हैवल, राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द आदि लोग हिंदी को गंवारों की भाषा कहते हुए इसका विरोध कर रहे थे तथा इस में फारसी के शब्द मिलाने में लगे हुए थे| स्वामी जी ने उनके झूठ का भांडा चौराहे पर फोड़ कर जन सामान्य को हिंदी विरोधी होने से बचाते हुए उन्हें बताया कि हिंदी एक सशक्त भाषा है| इसे देश के प्रत्येक कोने में समझने वाले लोग हैं| इस में सब प्रकार के विचारों की अभिव्यक्ति हो सकती है| उनकी इस बात को राजनारायण बोस, भूदेव मुखर्जी तथा कालीचरण काव्य विशारद जैसे उस युग के नेताओं की प्रेरणा कह सकते हैं, जो हिंदी को स्वाधीनता का मार्ग मानते थे| अत: स्वामी जी द्वारा संस्थापित आर्य समाज इस प्रकार का प्रथाम आन्दोलन था जिसके द्वारा हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का सर्वप्रथम प्रयास हुआ| मिश्र बंधू विनोद तथा आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने साहित्य ग्रन्थों में इस तथ्य को भलीभांति स्वीकार किया|

हिंदी अपनाने के पश्चात् स्वामी दयानंद सरस्वती जी केवल आठ वर्ष ही जीवित रहे, इन आठ वर्षों में वेद प्रचार के अतिरिक्त १५००० पृष्ठों के लेखन द्वारा साठ ग्रन्थ हमें धरोहर में दे गए, जिनमें उनकी आत्मकथा भी एक है, जिसे हिंदी समुदाय हिंदी गद्य साहित्य की प्रथम “प्रकाशित” आत्मकथा स्वीकार कर चुका है| स्वामी जी के ग्रंथों में सत्यार्थ प्रकाश एक ऐसा ग्रन्थ है, जिसे विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद कर लाखों ही नहीं करोड़ों की संख्या में छापा, छपवाया गया तथा अरबों की संख्या में इसे लोगों ने पढ़ा है और पढ़ रहे हैं| संभवतया सत्यार्थ प्रकाश एक ऐसा ग्रन्थ है, जिसका विश्व की इतनी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और हो रहा है, जितनी भाषाओं में कोई अन्य पुस्तक आज उपलब्ध नहीं है|

हिंदी साहित्य को स्वामी दयानंद जी ने एक नई दिशा दी| उन्होंने वीरोचित मार्ग अपनाते हुए जहाँ इसे शांत, वीर तथा उत्साह प्रदान करने का मार्ग अपनाया, वहां साहित्य में उपहासात्मक तथ उत्साहात्मक शैली की वृति का भी उदय किया| यथा अन्धविश्वासी ब्राह्मण को पॉप, अभिमानी को गर्वगंड सरीखे शब्द देकर हिंदी के लिए अनेक नए शब्दों का सृजन भी किया| पुनरपि, पुनश्च, नैरौग्य आदि तथा सर्वतंत्र, भुशुंडी, विडालाक्ष आदि संस्कृत के शब्दों का भी प्रयोग किया, जो स्वामी जी के संस्कृतज्ञ होने का तथा उनके गाम्भीर्य को दर्शाता है| स्वामी जी पुजारी शब्द को पूजा का अरि अर्थात् शत्रु मानते हुए इसे पुजारि लिखने के लिए प्रेरित किया करते थे| आप संस्कृत के अनुसार हिंदी लिंगों का प्रयोग करते थे| तत्पश्चात् भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा प्रताप नारायण मिश्र ने भी स्वामी जी वाली शैली को ही अपनाया|

स्वामी जी अपनी भाषा को सशक्त दर्शाने के लिए मुहावरों तथा लोकोक्तियों का अत्यधिक प्रयोग करते थे| “आँख का अंधा गाँठ का पूरा” “उल्टा चोर कोतवाल को डांडे” आदि जैसे मुहावरे तथा लोकोक्तियों का स्वामी जी ने भरपूर प्रयोग किया है| स्वामी जी ने गद्य के गुणों तथा ओज, सरलता, प्रवाह तथा रोचकता को अपने साहित्य में विशेष स्थान दिया है| स्वदेश, स्वधर्म, स्वजाति, तथा देशाभिमान की भावना भरने के निमित्त ओज से युक्त शब्दों का स्वामी जी खूब प्रयोग करते थे| देवनागरी के महत्त्व को समझते हुए तो यहाँ तक कह जाते हैं कि विश्व भाषाओं की कोई भी लिपि इस की प्रतिस्पर्धी नहीं हो सकती, तब ही तो रामधारी सिंह दिनकर ने उन्हें “रणारूढ हिंदुत्व का निर्भीक नेता” कहा है| प्रतिमा पूजन पर लिखते हैं “ तोपों के मारे मंदिर और उनकी मूर्तियों को अंग्रेजों ने उड़ा दिया, तब मूर्ति कहाँ गई थी?”

स्वामी जी भाषा की सुबोधता तथा स्पष्टता के भी पक्षधर थे| यही कारण है कि उनकी भाषा में प्रवाह गुण प्रधान है| स्वामी जी में श्रोताओं व पाठकों को अपने प्रवाह गुण में बहाने की भी क्षमता थी| अत: स्वामी जी प्रवाह गुण का भी समिचीन प्रयोग करते थे| वह अपने उद्धरणों को शास्त्रोक्त प्रमाणों से पुष्ट भी करते थे| जिससे सुधि श्रोताओं का शास्त्रों से सम्बन्ध जुड़ता था| स्वामी जी की इस प्रवृति का हिंदी साहित्य पर दूरगामी प्रभाव पड़ा| यहीं से हिंदी साहित्य में प्रमाण-ग्रंथों के आधार पर विवेचन की प्रथा चल पड़ी है|

स्वामी जी की शैली गाम्भीर्य तथा तर्कपूर्ण रही है| जिसका पाठकों पर गहरा प्रभाव पडा| हजारों व्यक्ति इन्हें पढ़कर अंधविश्वासों से मुक्त हुए और आज भी हो रहे हैं। स्वामी जी ने अपने लेखन तथा व्याख्यानों में कुरीतियों का खंडन करते हुए रोषपूर्ण शब्दों में क्षोभ प्रकट किया| सोमनाथ मंदिर प्रसंग में उनका यह आक्रोश अद्वितीय अवस्था में दिखाई देता है|

स्वामी जी तथा आर्य समाज की जिस शैली को उस काल के तथा अनुगामी साहित्यकारों ने बड़े जोश के साथ अपनाया, वह है उनकी व्यंगयात्मक शैली| यथा जन्म-पत्र के लिए शोक-पत्र, मन्त्र-शक्ति पर कहना “ अगर तुम्हारे मन्त्र में शक्ति है तो कुबेर क्यों नहीं बन जाते?” तपोवन को भिक्षुक-वन, पोप लीला के गपोडे आदि का प्रयोग करते हुए अपनी विनोद वृति का अच्छा प्रदर्शन किया है| स्वामी जी व्यंग्य में “हर की पौड़ी को हाड की पौड़ी” कहा करते थे|

स्वामी जी ने अपने गूढ़ विषयों को पाठकों के लिए सरल ढंग से रखने के लिए दृष्टांत शैली का अवलंबन किया| एतदर्थ शेखचिल्ली कथा, लाल बुझक्कड़ कथा आदि अनेक कहानियों का भी उन्होंने प्रयोग किया है|

स्वामी जी ने एक नई साहित्यिक शैली आरम्भ की, जिसे अनुगामी साहित्यकारों ने बड़ी ख़ुशी से अपनाया| वह शैली है “प्रश्न शैली|” इसमें स्वामी जी श्रोताओं के सामने स्वयं एक प्रश्न रखते थे और फिर स्वयं ही उस प्रश्न का उत्तर बड़े विस्तार से समझाया करते थे| स्वामी जी न केवल व्याख्यानों में ही अपितु शास्त्रार्थों में भी इस शैली का प्रयोग बड़ी विपुलाता से करते थे| स्वामी जी से पूर्व इस प्रश्नात्मक शैली का कभी किसी ने प्रयोग नहीं किया था|

स्वामी दयानंद जी के प्रभाव से हिन्दी गद्य को एक नई दिशा मिली तथा अब तक अछूते रहे विषय पर भी साहित्यिक कलमें उठने लगीं| कथा कहानियों में दार्शनिकता भी पैदा हुई| समाज सुधार, शास्त्रीय तथा वैज्ञानिक विषयों की विवेचना के साथ ही साथ राजनीतिक प्रश्नों को भी हिन्दी साहित्य ने अपनाना आरम्भ कर दिया| सत्यार्थ प्रकाश में जो दार्शनिक, अध्यात्मिक, नैतिक, सामाजिक तथा राजनीतिक प्रश्नों की विवेचना की गई है, उनके सम्बन्ध में आचार्य चतुरसेन जी कहते हैं, “ तुलसी कृत रामायण के पश्चात् सत्यार्थ प्रकाश ही इस युग का इतना लोकप्रिय ग्रन्थ हुआ है|” हजारों व्यक्तियों ने सत्यार्थ प्रकाश के माध्यम से हिंदी को सीखा है| बाबू श्याम सुन्दर दास के अनुसार “सत्यार्थ प्रकाश” और आर्य समाज के प्रभाव से पंजाब में हिंदी का वह असर हुआ, जिसकी कदापि आशा नहीं थी|” इससे हिन्दी में गंभीर विवेचना की पद्धति आई तथा रोचक एवं विनोदात्मक शैलियों का विकास हुआ|

रामधारी सिंह दिनकर के अनुसार स्वामी जी के ब्रह्मचर्य, नैतिक शुद्धता और पवित्रता पर बल देना हिंदी साहित्य के इतिहास में एक महान् उल्लेखनीय तथ्य है| रीतिकाल के ठीक बाद वाले काल में हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी जो उल्लेखनीय घटना घटी, वह स्वामी दयानंद जी का पवित्रतावादी प्रचार था|”

द्विवेदी युग पर स्वामी जी की विचारधारा का प्रभाव भारतेंदु युग से भी अधिक पडा| परिणाम स्वरूप नायिका भेद संम्बन्धी सहितय को ही समझा जाने लगा| यही कारण है कि कवि नाथूराम शंकर ने अपना श्रृगारिक काव्य ग्रन्थ “ कलित कलेवर“ को स्वयं अपने ही हाथों से नष्ट कर दिया| कहानी कार सुदर्शन जी को भी अपनी कहानियों का प्रवाह बदलना पडा| अवस्था यहाँ तक आ पहुंची कि इस युग के कवि श्रृंगार रस की कविता लिखने से डरने लगे थे| यही कारण है कि मैथिलिशरण गुप्त, नाथूराम शंकर तथा इस युग के अन्य कवियों के काव्यों में राष्ट्र-प्रेम, राष्ट्रोद्धार, समाज सुधार आदि की भावनाएं विपुलता से पाई जाती हैं|

स्वामी दयानंद सरस्वती जी तथा आर्य समाज ने सुधारवादी मार्ग अपनाते हुए बाल विवाह, विधवा विवाह, अनमेल विवाह, छुआछूत आदि अनेक कुप्रथाओं के विरोध में आवाज उठाई| इसको इन के अनुगामी साहित्यकारों ने भी अपनाया| मिश्र बंधुओं ने लिखा है कि “ अनेक भूलों और पाखण्डों में फंसे हुए लोगों को सीधा मार्ग दिखाकर जो अपने समय में महात्मा बुद्ध, गुरु नानक देव, वल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु तथा राममोहन राय ठौर ठौर कह गए, हम आर्य समाजी नहीं हैं तो भी हमारी समझ में ऐसा आता है कि हम लोगों का वास्तविक हित इस दृष्टि के प्रयत्नों द्वारा हुआ है और होना संभव है, उतना हित उपर्युक्त महात्माओं में से बहुतों ने नहीं कर पाया|” वैष्णव व भक्त मैथिलीशरण गुप्त की भारत भारती में स्वामी जी के प्राय: सब सुधारों का वर्णन है| दिनकर ने कहा है कि “ साकेत के राम तो स्वामी दयानंद जी के ‘कृण्वन्तो विश्वार्यम् ’ का नारा लगाते हैं|”

हिंदी को आरम्भ से ही राष्ट्र्भाषा के स्थान पर प्रतिष्ठित करने का प्रयास उन्होंने किया| आप विदेशियों को भी हिंदी में पत्र लिखने का अनुरोध करते थे| स्वामी जी ने मदाम ब्लैवेट्स्की को लिखा था कि जिस पत्र का हम से उत्तर चाहते हो, वह हिंदी में लिखा करें| कर्नल अल्काट को भी स्वामी जी ने हिंदी सीखने के लिए प्रेरित किया था| श्याम जी कृष्ण वर्मा को भी लिखा था कि “ अब भी वेदपाठी के लिफ़ाफ़े के ऊपर देवनागरी नहीं लिखा गया|”

आप ने हिंदी की एक नई शैली का परिष्कार भी किया| पूर्व में दो शैलियाँ प्रचलित थीं| (!) राजा लक्षमण सिंह की शैली,जिसमें तत्सम शब्दों पर बल था| (२) राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द की शैली, जिसमें उर्दू शब्दों पर बल था| स्वामी जी ने भारत की जनता तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए अपनी भाषा में स्पष्टता, ओज, विशदता तथा पाठकों को प्रभावित करने के गुणों का खूब प्रदर्शन किया| कुछ लोग कहते हैं कि विरोधियों को चुप कराने हेतू आप लक्कड़ तोड़ भाषा का प्रयोग करते थे किन्तु तात्कालिक सामाजिक बुराइयों के नाश के लिए स्वामी जी ने ऐसी कठोर भाषा का प्रयोग करने के साथ ही साथ साधारण क्षणों में सरल, सरस ,सुबोध तथा प्रांजल भाषा का प्रयोग किया| तत्सम और तद्भव दोनों प्रकार के शब्दों का प्रयोग करते हुए अनेक प्राचीन शब्दों को पुन: हिंदी को लौटाया| स्वामी जी ने हिंदी को केवल बौझिल तथा विद्वदगण की भाषा नहीं बनाने दिया| स्वामी जी की भाषा में न तो”गवाह” शब्द निर्वासित हुआ और न ही “कलक्टर” शब्द को धक्का लगा|

डॉ. लक्ष्मी सागर वार्षणेय के अनुसार “ आर्य समाजियों की भाषा से हिंदी भाषा में एक नई शैली का प्रतिपादन हुआ, इससे भाषा में गहन से गहन विषय पर भी वाद-विवाद करने की शक्ति आ गई| आर्य समाज के कारण व्याख्यानों की धूम मची, इससे हिंदी भाषा का समस्त उत्तर भारत में प्रचार हुआ| इस प्रकार हिंदी गद्य शैली का विकास हुआ, यह निर्विवाद है|”

संस्कृत के वैदिक तथा शास्त्रीय साहित्य को भी अनुवाद द्वारा हिंदी में सुलभ किया गया| यहाँ तक कि चार वेद का भी भाष्य कर हिंदी में उपलब्ध किये गए|

आर्य समाज से सम्बंधित साहित्यकारों का विवरण
आर्य कहानीकार
पंडित गौरी दत्त, मुंशी प्रेमचंद, सुदर्शन, धनीराम, द्विजेन्द्रनाथ मिश्र, निर्गुण, सूर्यदेव परिव्राजक, बलराज साहनी, भीष्म साहनी, यशपाल, श्रीमती स्त्यावती मलिक, श्रीमती चन्द्रकिरण सोमरिक्षा, डा. अशोक आर्य आदि|
आर्य समाज के निबंध लेखक
काली चरण, पंडित मोहनलाल विष्णु लाल पंड्या, पंडित रुद्रदत्त शर्मा, डा.हरिशंकर शर्मा, वैदिक, कृष्ण प्रसाद गौड़ बेढब, डा.वासुदेव शरण अग्रवाल, डा. नागेन्द्र, डा. सत्येन्द्र, डा. विजयेन्द्र स्नातक, डा.मुंशीराम शर्मा सोम, डा. धर्मवीर भारती, श्री क्षेमचंद्र सुमन आदि|

आर्य समाजी गद्यकार
आचार्य चतुरसेन, आचार्य अभयदेव विद्यालंकार, देवदत्त विद्यार्थी आदि|

आर्य समाज के सैद्धांतिक समीक्षक
पंडित शालिग्रमा शास्त्री, पंडित उदयवीर शास्त्री, डा. हरिदत्त शास्त्री, आ. विश्वेश्वर सिद्धांतशिरोमणि, डा. सूर्यकांत शास्त्री, पंडित क्षेमचंद्र सुमन, डा. नगेन्द्र ( व्यवहारिक समीक्षा), तुलनात्मक समीक्षा पद्धति के जन्मदाता पद्मसिंह शर्मा, डा. मुंशी राम शर्मा, डा. विजयेन्द्र स्नातक, डा. सरयू प्रसाद अग्रवाल, डा. सुरेश कुमार विद्यालंकार, डा. हरदेव बाहरी आदि|

आर्य समाजी टीकाकार
पंडित पद्मसिंह शर्मा, डा. बाबूलाल सक्सेना, डा. वासुदेव सहारण अग्रवाल आदि |
आर्य समाजी इतिहासकार
डा. सूर्यकांत शास्त्री, डा. चर्तुरसेन शास्त्री, डा. विजयेन्द्र स्नातक, आ. क्षेमचन्द्र सुमन, डा. हरिवंश कोछड़, डा. धर्मवीर भारती, डा. नागेन्द्र, प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु आदि|
आर्य समाज के तुलनात्मक साहित्य लेखक
डा. भर्ग सिंह, डा. विजयवीर विद्यालंकार, चंद्रभाणु सोणवाणे, डा. सुरेश कुमार विद्यालंकार, प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु, डा. भवानी लाल भारती आदि|
आर्य समाज के हिंदी कवि
मुंशी केवल कृष्ण चारण,उमरदान, कविकुमार शेरसिंह वर्मा, पंडित बलभद्र मिश्रा, पंडित बाबूलाल शर्मा, सेठ मांगीलाल गुप्त, कविकिंकर नाथू राम शंकर, बद्रीदत्त शर्मा जोशी, नारायण प्रसाद बेताब, ठाकुर गदाधर सिंह, पंडित लोकनाथ तर्कवाचस्पति, स्वामी आत्मानंद, श्री कर्ण कवि, स. जसवंतसिंह टोहानवी, भूरा लाल व्यास, हरिशंकर शर्मा, विद्याभूषण विभु, पंडित चमूपति, पंडित बुद्धदेव विद्यालंकार, पंडित दुलेराम देवाकरणी, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, पंडित विश्वंभर सहाय प्रेमी, राजकुमार रणवीर सिंह, पंडित अनूप शर्मा, पंडित सिद्धगोपाल कविरत्न, पंडित भद्रजीत चन्द्र, श्री हरिशरण श्रीवास्तव मराल, पंडित धर्मदत्त विद्यालंकार, राजा रणन्जय सिंह, डा. सूर्यदेव शर्मा, गायत्री देवी, डा. मुंशीराम शर्मा सोम, पंडित प्रकाश चन्द ‘कविरत्न’, पंडित सत्यकाम विद्यालंकार, स्वामी सत्यप्रकाश जी, पंडित अखिलेश शर्मा, पंडित लक्ष्मी नारायण शास्त्री( नारायणमुनि चतुर्वेदी), पंडित विद्यानीधि शास्त्री, रामनिवास विद्यार्थी, डा. सुशीला गुप्ता, कृष्णलाल कुसुमाकर, पंडित रमेशचंद्र शास्त्री, रामनारायण माथुर,(स्वामी ओम प्रेमी), प्रो.उत्तमचंद शरर, पंडित ओंकार मिश्र प्रणव, डा. ,मदन मोहन जावलिया, प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु, कुँवर सुखलाल आर्य मुसाफिर, कुँ. जोरावर सिंह, प्रभादेवी, राधेश्याम आर्य, पंडित सत्यपाल पथिक आदि|
आर्य समाजी हिंदी आत्मकथा लेखक
स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती, भवानी दयाल संन्यासी, पंडित नरेंद्र जी, स्वामी विद्यानंद सरस्वती, स्वामी वेदानंद सरस्वती, भाई परमानंद, सत्यव्रत परिव्राजक, देवेन्द्र सत्यार्थी, पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय, गंगाप्रसाद जज, आचार्य नरदेव, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, महात्मा नारायण स्वामी, पंडित इंद्र विद्यावाचस्पति, संतराम बी ए , पृथ्वी सिंह आजाद, आचार्य रामदेव, सत्यव्रत सिधान्तालंकार , पंडित रुचिराम जी, डा.भवानी लाल भारतीय, पंडित युधिष्ठिर मीमांसक, लाला लाजपत राय, प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु, डा, अशोक आर्य, पंडित कमलेश कुमार आर्य अग्निहोत्री आदि|

हिंदी गद्य में जीवनी लेखक आर्य समाजी
गोपालराव हरि देशमुख, चिम्मनलाल वैश्य, सत्यव्रत शर्मा द्विवेदी, दयाराम मुन्शी, रामविलास शारदा, चौ रायसिंह, स्वामी सत्यानन्द, दीपचंद्र, जगदीश विद्यार्थी ( स्वामी जगादीश्वरानंद), त्रिलोक चन्द आर्य, म. आनंद स्वामी, पंडित मुनीश्वर देव, भूदेव शास्त्री, वैद्य गुरुदत्त, डा. भवानी लाल भारतीय, प्रा. राजेन्द्र जिग्यासु, डा. अशोक आर्य, श्रीमती राकेश रानी, विश्वंभर प्रसाद शर्मा, हरिश्चंद्र विद्यालंकार, इंद्र विद्यावाचस्पति, भारतेन्द्र नाथ, वेदानंद तीर्थ, श्रीराम शर्मा, स्वामी वेदानंद सरस्वती (दयानंद तीर्थ), सत्यप्रिय शास्त्री, डा. रामप्रकाश, आ. विष्णुमित्र, अलगुराय शास्त्री, प्रा. रामविचार, भक्त राम, डा. देशराज, सत्यव्रत, अवनींद्र, कृष्ण दत्त, स्वामी श्रद्धानंद, पंडित शंकर शर्मा, वीरेंद्र सिद्धू, ईश्वर प्रसाद वर्मा, धर्मवीर, उषा ज्योतिष्मती, स्वामी स्वतान्त्रानंद, देवी लाल पालीवाल, डा. बृजमोहन जावलिया, फतहसिंह मानव, दीनानाथ शर्मा, परमेश शर्मा, रघुवीर सिंह शास्त्री, पृथ्वीसिंह आजाद, ओमप्रकाश आर्य, महावीर अधिकारी, परमेश शर्मा, भाई परमानंद, जगदीश्वर प्रसाद, पंडित लेखराम जी आदि|

हिंदी के संस्मरण, यात्रा वृत्तांत,शिकार कथा, नाटक- एकाकी लेखकों की भी आर्य समाज में भरमार है|

वास्तव में हिंदी साहित्य की सेवा के क्षेत्र में आर्य समाजियों के नामों की पूर्ण गणना कर पाना संभव नहीं है| इतना कहा जा सकता है कि हिंदी लेखन क्षेत्र में आर्य समाजियों की असीमित संख्या के अतिरिक्त ऐसे भी सैंकड़ों नाम मिलेंगे , जो सीधे रूप में आर्य समाजी न होते हुए भी आर्य समाज से प्रभावित हैं|

डॉ.अशोक आर्य
पाकेट १/६१ रामप्रस्थ ग्रीन से. ७ वैशाली
२०१०१२ गाजियाबाद उ. प्र. भारत
चलभाष ९३५४८४५४२६ व्ह्ट्स एप्प ९७१८५२८०६८
E Mail ashokarya1944@rediffmail.com

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स्वामी जी की प्राथमिक शिक्षा उनके जन्म स्थान जोहान्सबर्ग

स्वामी जी की प्राथमिक शिक्षा उनके जन्म स्थान जोहान्सबर्ग
में ही हुई तथा प्रथम बार १९०४ ईस्वी में बारह वर्ष की आयु में भारत में अपने मूल पैतृक गांव बहुआरा आये थे। बहुआरा गांव बिहार के रोहतास जिले में है. उन दिनों भारत में बंग भंग आन्दोलन का जोर था । इस आन्दोलन का आप के ह्रदय में प्रभाव होना आवश्यक ही था । आप ने भारत आ कर अपने गांव में एक राष्ट्रीय विद्यालय आरम्भ किया तथा इस विद्यालय के द्वारा गांव के बच्चों को शिक्षित करने की सेवा आरम्भ की । एक बार गांव आये तो फिर उनका आना-जाना लगा रहा. किशोरावस्था में ही संन्यासी ने अपने गांव के गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए एक राष्ट्रीय पाठशाला की नींव रख दी थी. बाद में उन्होंने एक वैदिक पाठशाला भी खोली. फिर गांव में ही उन्होंने खरदूषण नाम की एक और पाठशाला भी शुरू की. यहां बच्चों को पढ़ाने के साथ संगीत की शिक्षा दी जाती थी और किसानों को खेती संबंधी नई जानकारियां भी. बताते हैं कि जब उन्होंने खरदूषण पाठशाला की नींव रखी तो उसका उद्घाटन करने डॉ राजेंद्र प्रसाद और सरोजनी नायडू जैसे दिग्गज उनके गांव बैलगाड़ी से यात्रा कर पहुंचे थे. इस पाठशाला के साथ ही संन्यासी ने अपने गांव में 1926 में ‘प्रवासी भवन’ का भी निर्माण करवाया.

उनकी पत्नी जगरानी देवी अनपढ़ थीं, लेकिन संन्यासी ने उन्हें घर में ही पढ़ाकर इस अनुरूप तैयार किया कि वे हिन्दी की अनन्य सेवी तो बनी हीं, दक्षिण अफ्रीका में प्रमुख महिला सत्याग्रही भी बनीं। उनके नाम पर ही नेटाल में जगरानी प्रेस की स्थापना हुई। संन्यासी के हिन्दी के प्रति समर्पण और उनकी राजनीतिक समझ का ही परिणाम था कि दक्षिण अफ्रीका में वे महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गए पत्र ‘इंडियन ओपिनियन’ के हिंदी संपादक बनाये गये।

सन् १९०९ ईस्वी में आप का सम्पर्क आर्य समाज से हुआ । आर्य समाज से सम्पर्क होने के पश्चात आप ने वैदिक शिक्षा की उपयोगिता को समझते हुए अपने गांव में वैदिक पाट्शाला आरम्भ की। इस प्रकार आप की रूचि आर्य समाज की ओर निरन्तर बटती ही चली गयी इस कारण १९११ ईस्वी में आपको आर्य प्रतिनिधि सभा बिहार का उपदेशक नियुक्त किया गया किन्तु यह कार्य आप ने अवैतनिक किया । इस काल में आप को सभा के मुख पत्र आर्यावर्त का सम्पादक का कार्य भार भी वहन करना पडा । आप ने यह दोनों कार्य सफलता पूर्वक सम्पन्न किये ।

जब आप ने गाँव में राष्ट्रीय विद्यालय खोला , इसके अनन्तर ही सन १९०८ ईस्वी में आपका विवाह हो गया । चार वर्ष तक आप ने आर्य प्रतिनिधि सभा के माध्यम से प्रचार कार्य किया तथा १९१२ में अफ़्रीका लौट गये । इसी दक्षिण अफ़्रीका में ही आपको महात्मा गाँधी जी के सम्पर्क में आने का अवसर मिला । अब आप ने अफ़्रीका में हिन्दी प्रचार का कार्य आरम्भ कर दिया । इस कार्य को सफ़ल करने के लिए आप ने वहां पर अनेक हिन्दी पाठशालाएँ व हिन्दी सभाएं स्थापित कीं । इतना ही नहीं इस कार्य को गति देने के लिए धर्मवीर तथा हिन्दी नाम से आपने दो पत्र भी आरम्भ किये । इन पत्रों के माध्यम से आपने आर्य समाज तथा हिन्दीऒ प्रचार का खूब कार्य किया ।

आर्य समाज का कार्य करते हुए आप को आश्रम व्यवस्था का पूर्ण ध्यान था । इस कारण आपने अपना आश्रम बदलने का निर्णय लेते हुए सन् १९२७ ईस्वी को रामनवमी के दिन संन्यास की दीक्षा ली तथा आज से आप का नाम भवानी दयाल संन्यासी हो गया ।

वे 1939 में दक्षिण अफ्रीका के प्रवासी भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने के लिए इकलौते प्रतिनिधि के तौर पर भारत आये. भारत में उनकी गतिविधियां बढ़ीं तो तो उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया. वे हजारीबाग जेल में रहे. वहां उन्होंने ‘कारागार’ नाम से पत्रिका निकालनी शुरू की जिसके तीन अंक जेल से हस्तलिखित निकले. उसी में एक सत्याग्रह अंक भी था जिसे अंग्रेजी सरकार ने गायब करवा दिया था.

इतना ही नहीं, भारत आकर उन्होंने जिन कार्यों की बुनियाद रखी वह भी चकित करनेवाला है। भवानी दयाल पहली बार 13 साल की उम्र में ही अपने पिता के साथ भारत में पैतृक गांव बहुआरा आये थे। यह गांव बिहार के रोहतास जिले में है। एक बार गांव आये तो फिर उनका आना-जाना लगा रहा। किशोरावस्था में ही संन्यासी ने अपने गांव के गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए एक राष्ट्रीय पाठशाला की नींव रख दी थी। बाद में उन्होंने एक वैदिक पाठशाला भी खोली। फिर गांव में ही उन्होंने खरदूषण नाम की एक और पाठशाला भी शुरू की। यहां बच्चों को पढ़ाने के साथ संगीत की शिक्षा दी जाती थी और किसानों को खेती संबंधी नई जानकारियां भी। जब उन्होंने खरदूषण पाठशाला की नींव रखी तो उसका उद्घाटन करने डॉ राजेंद्र प्रसाद और सरोजनी नायडू जैसे दिग्गज उनके गांव बैलगाड़ी से यात्रा कर पहुंचे थे। इस पाठशाला के साथ ही संन्यासी ने अपने गांव में 1926 में ‘प्रवासी भवन’ का भी निर्माण करवाया।

वे 1939 में दक्षिण अफ्रीका के प्रवासी भारतीयों के प्रतिनिधि के रूप में भारत आये। भारत में उनकी गतिविधियां बढ़ीं तो अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। वे हजारीबाग जेल में रहे। वहां उन्होंने ‘कारागार’ नाम से पत्रिका निकालनी शुरू की जिसके तीन अंक जेल से हस्तलिखित निकले। उसी में एक सत्याग्रह अंक भी था जिसे अंग्रेजी सरकार ने गायब करवा दिया था।

इंडियन कॉलोनियल एसोसिएशन से जुड़े प्रेम नारायण अग्रवाल ने 1939 में ‘भवानी दयाल संन्यासी- ए पब्लिक वर्कर ऑफ साउथ अफ्रीका’ नाम से एक किताब लिखी थी। इसे अंग्रेजी सरकार ने जब्त कर लिया था।

संन्यासी स्वयं एक रचनाधर्मी थे और उन्होने कई अहम पुस्तकों की रचना की। उनकी चर्चित पुस्तकों में 1920 में लिखी गयी ‘दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहास’, 1945 में लिखी गयी ‘प्रवासी की आत्मकथा’, ‘दक्षिण अफ्रीका के मेरे अनुभव’, ‘हमारी कारावास की कहानी’, ‘वैदिक प्रार्थना’ आदि है। ‘प्रवासी की आत्मकथा’ की भूमिका डॉ राजेंद्र प्रसाद ने लिखी है तो ‘वैदिक प्रार्थना’ की भूमिका शिवपूजन सहाय ने। सहाय ने तो यहां तक लिखा है कि उन्होंने देश के कई लोगों की लाइब्रेरियां देखी हैं, लेकिन संन्यासी की तरह किसी की निजी लाइब्रेरी नहीं थी।

भवानी दयाल संन्यासी के नाम पर अब भी दक्षिण अफ्रीका में कई महत्वपूर्ण संस्थान चलते हैं। डरबन में उनके नाम पर भवानी भवन है। नेटाल और जोहांसबर्ग के अलावा दूसरे कई देशों में भी संन्यासी अब भी एक नायक के तौर पर महत्वपूर्ण बने हुए हैं।

आप ने विदेश में रहते हुए आर्य समाज के अनेक सफ़ल आयोजन भी किये । इस संदर्भ में १९२५ ईस्वी में आप ने दक्षिण अफ़्रीका में रहते हुए वहीं पर ही स्वामी दयानन्द सरस्वती जी का जन्म शताब्दी समारोह बडी धूमधाम, से आयोजित किया । तत्पशचात आपने नेटाल में आर्य समाज की गतिविधियों को बताने के लिए वहाम पर आर्य प्रतिनिधि सभा की स्थापना की ।

नेटाल में सभा की स्थापना करने के पश्चात आप सन १९२९ में पुन: भारत आये । भारत आ कर भी आपने अपने को आर्य समाज तथा देश के लिए सक्रीय बनाए रखा तथा इस कारण ही १९३० के आन्दोलन में सत्याग्रह किया तथा तत्पश्चात आप निरन्तर राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेते ही रहे । आप के हिन्दी प्रेम को नागरी प्रचारिणी सभा काशी ने भी स्वीकार करते हुए १९४४ में अपने स्वर्ण ज्यन्ती समारोह की अध्यक्शता भी आप ही के कन्धों पर डाल दी, जिस का आप ने सफ़लता पूर्वक निर्वहन किया । इस के तदन्तर आप अजमेर चले गये । अजमेर के आदर्श नगर मुहल्ले में आपने प्रवासी भवन के नाम से एक भवन का निर्माण करवाया तथा इस भवन को ही अपना निवास बनाया तथा यहीं रहने लगे । इस भवन में ही ९ मई १९५० ईस्वी को आप का देहान्त हो गया ।

डॉ.अशोक आर्य
१०४ शिप्रा अपार्टमेन्ट ,कौशाम्बी २०१०१०
गाजियाबाद , भारत

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पञ्चाहुत्या=शुद्ध घृत की पांच आहुतियाँ

ओउम्

वैदिक अग्निहोत्र क्रिया ११
पञ्चाहुत्या=शुद्ध घृत की पांच आहुतियाँ
डा. अशोक आर्य
विगत मन्त्रों के माध्यम से हमने चार मन्त्रों के द्वारा घी से सनी हुई तीन समिधाएं यज्ञ कुण्ड में उस स्थान के ऊपर रखीं, जहाँ अग्नि जल रही थी, ताकि यह घी से सनी हुई समिधाएँ शीघ्र ही अग्नि को पकड़ लें| अब हम यज्ञ की अगली ग्यारहवीं क्रिया के साथ आगे बढ़ते हुए एक ही मन्त्र को पांच बार बोलते हुए प्रत्येक मन्त्र के अंत में स्वाहा बोलने के साथ ही एक एक आहुति गर्म घी की डालते जावेंगे| मन्त्र इस प्रकार है:-दशम विधि के अंतर्गत हमने तीन समिधाओं को चार मन्त्रों का उच्चारण करते हुए स्वाहा के साथ यज्ञ की अग्नि को भेंट किया था|
ओम् अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्धवर्धय
चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय, स्वाहा| इदमग्नये
जातवेदसे, इदन्न मम||१|| आश्वलायन गृह्य. १.१०.१२

आश्वलायन गृह्यसूत्र में से लिया गया यह मन्त्र वैदिक अग्निहोत्र की दशम क्रिया समिधानम् के अंतर्गत प्रथम मन्त्र तथा प्रथम समिधा डालने के रूप में भी आया है किन्तु जब हम इस मन्त्र को ग्यारहवीं क्रिया के रूप में प्रयोग करते हैं तो इस मन्त्र को इस क्रिया के अंतर्गत पांच बार बोलना होता है और पांच बार ही इस मन्त्र के स्वाहा के साथ एक एक करते हुए उबलते हुए देशी गाय के देशी घी की आहुतियाँ दी जानी होती हैं|
वैदिक अग्निहोत्र की दशम विधि के अंतर्गत हमने चार मन्त्रों के गायन के साथ स्वाहा आने पर गर्म घी से डुबोई गई समिधा डालते हुए तीन समिधायें यज्ञ कुण्ड में डालीं थीं| यहाँ गयाराह्वीं क्रिया के अंतर्गत हमने देखा कि समिधायें तो हमने रख दीं किन्तु यह धीरे धीरे अग्नि को पकड़ती जा रही हैं| कहावत है एक तो आग ऊपर से घी इस कहावत से भाव होता है कि जलाई आग में घी डालने से आग और तीव्र जलती है| यज्ञ की अग्नि भी तीव्र से तीव्रतर जलनी चाहिए, इसलिए इस गयाराह्वीं क्रिया के अंतर्गत हम यज्ञ में केवल घी की ही आहुतियाँ देते हैं ताकि इस घी की सहायता से अग्नि अपना तीव्र वेग दिखाने लगे| तीव्र वेग में दी गई आहुतियाँ एक दम से हल्की हो कर वायुमंडल में दूर दूर तक फ़ैल जाती हैं| इस प्रकार दूर दूर तक जहाँ तक यह जा पाती है, वहां तक के सब प्रकार के दुर्गंधों को यह दूर करती हुई वातावरण को सुगन्धित करती है| घी की पौष्टिकता से वातावरण भी पौष्टिक हो जाता है| इस पौष्टिक वातावरण में जब हम श्वास लेते हैं तो हमारा शरीर इस पुष्टि वर्धक वायु का सेवन करते हुए पुष्टि को प्राप्त होता है| यज्ञ की यह वायु एक और काम करती है| यह वायु वातावरण में जहाँ जहाँ भी जाती है, वहां वहां से यह रोग के कीटाणुओं का नाश करती है| इस प्रकार रोगरहित वायु का सेवन करते हुए हम शुद्ध रोग रहित वायु को प्राप्त करते हैं और इस वायु के सेवन से हमारे अन्दर के रोगाणु भी नष्ट हो जाते हैं| इस प्रकार हम रोग रहित हो जाते हैं|
इस मन्त्र का विशद् अर्थ हम दशम विधि के अंतर्गत दे आये हैं, यहाँ उसे ही एक बार फिर से दोहरा देते हैं ताकि आप सब इसे आत्मसात् कर सकें| इस मन्त्र में श्ब्दानुसार अर्थ इस प्रकार है:-
जातवेद: अयं इध्म: ते आत्मा
हे सब ऐश्वर्यों के स्वामी प्रभो! यह काष्ठ तेरा आत्मा है| यहाँ काष्ठ से अभिप्राय: लकड़ी की समिधा से है| यहाँ हम यज्ञ की अग्नि को तीव्र करने के लिए कार्य कर रहे हैं और यह तीव्रता घी से सनी हुई लकड़ी ही दे सकती है| इस कारण यह लकड़ी इस यज्ञ स्वरूप प्रभु की आत्मा कही गई है| यह काष्ठ ही तेरा(यज्ञ का) जीवन भी है| अग्नि का अस्तित्व लकड़ी के बिना संभव ही नहीं होता इसलिए यहाँ इस यज्ञ में डाली जाने वाली समिधा को अग्नि स्वरूप प्रभू का जीवन कहा गया है|
तेन इध्यस्व च वर्धस्व
इस प्रकार अग्नि स्वरूप परमात्मा को यहाँ सम्बोधित करते हुए कहा गया है कि यह जो( लकड़ी की समिधा) घी से पूरी तरह से लिपटी हुई है, आप इस समिधा के द्वारा प्रकाशित हों अर्थात् यह समिधा यज्ञ की इस अग्नी को तीव्रता दे|
इत्-ह अस्मान् च वर्धय
अग्नि का काम है, इस के अन्दर जो भी डाला जावे, उसके गुणों को बढ़ा कर लौटा देवे अर्थात् इन गुणों को वायुमंडल में, परयावरण में फैला देवे ताकि इनका लाभ जन सामान्य अथवा प्राणी मात्र को बिना कसी प्रकार का भेदभाव किये मिल सके| इस कारण यहाँ कहा गया है कि हे अग्नि देव! यज्ञ में डाली इस समिधा अथवा गर्म उबलते हुए घी की आहुतियों के द्वारा न केवल आप ही प्रचंड होकर बढ़ें अपितु हमें भी आगे बढ़ने के लिए अपने साथ ले चलें अथवा हमें मार्ग दिखावें|
प्रजया पशुभि: ब्रह्मवर्चसेन अन्नाद्येन सम-एधय
इस के साथ ही हम अग्निदेव से एक याचना इस आहुति के माध्यम से और भी करते हैं, वह यह कि प्रजा अर्थात् इस जगत् में तेरी प्रजा स्वरूप जितनी भी जीवात्माएं हैं| इन जीवात्माओं में चाहे कोई मनुष्य है, पशु है या अन्य किसी प्रकार का कोई भी प्राणी है, इन सब के अन्दर ज्ञान का तेज भर दो| भाव यह है कि इस यज्ञ को करने से सब प्राणियों की बुद्धि तीव्र हो| केवल बुद्धि ही तीव्र न हो अपितु हे अग्निदेव! इन सब प्राणियों का हाजमा भी अच्छा हो| यदि हाजमा अच्छा रहेगा तो ही यह जो कुछ भी उपभोग करेंगे, चाहे वह क्षुधा को शांत करने के लिए हो अथवा बौद्धिक हो, को पचा पाने में और समझ पाने में सक्ष्म हो सकेंगे| इस प्रकार प्रकांड पंडित बनकर तथा प्राप्त किये हुए को पचा पाने में अथवा सम्भाल पाने में सक्ष्म हो सकें|
स्वाहा इदं जातिवेदसे अग्नये मम न
हे अग्नी देव! हम अपने मन, वचन और कर्म से यह ठीक ही कह रहे हैं कि यह जो काष्ठ रूप समिधा अथवा देशी गाय के शुद्ध देशी घी को आप के समर्पण कर रहे हैं, यह वास्तव में ही सब प्रकार के धनों के स्वामी अग्निदेव के लिए ही समर्पित है| इस पर मेरा कुछ भी, किसी प्रकार का भी अधिकार नहीं है|
इस सब से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि अग्नि वास्तव में सब प्रकार के ऐश्वर्यों का मुख होता है| देवता लोग अग्नि रूपी मुख से ही सब कुछ खा पाते हैं किन्तु हमारा यह यज्ञ करने वाला साधक तो परम अग्नि को प्राप्त करने की चाहना रखता हुआ वह परमात्मा का ध्यान करते हुए आत्म चिन्तन कर रहा है| उसके इस आत्म चिन्तन का आधार इस काष्ठ तथा घी से प्रचंड रूप से जलने वाली यह आग ही तो है| इस के उल्ट वह परमात्मा रूप अग्नि, जिसे हम परम अग्नि के नाम से जानते है, वह अग्नि तो इस संसार के कण कण में, अनु अनु में, पत्ते पत्ते में व्याप्त है| इन सबका आधार वह अग्नि बनी हुई है| शुद्ध जीवन जिसे आर्य जीवन के नाम से जाना गया है, यह तो केवल सांसारिक ही नहीं पारलौकिक ऐश्वर्यों को पाने की ही सदा कामना करता रहता है| साधक ने समय समय पर जितनी साधना की होती है उसके अनुसार उसकी रुचियों में भी परिवर्तन होता रहता है| जिस प्रकार स्कूल में पढ़ने वाले बालक की योग्यता के अनुसार कक्षाएं बदलती रहती हैं तो इनके साथ ही उसकी सोच भी बदलती है, यह अवस्था ही साधक और उसकी की जा रही साधना की भी होती है, तो भी साधारण अवस्था में प्रत्येक मनुष्य की सदा यह इच्छा तो कम से कम होनी ही चाहिए कि उसका शरीर स्वस्थ तथा उन्नत हो, उसका ज्ञान निरंतर बढ़ता रहे, उसको सब ओर से यश की प्राप्ति हो तथा सदा ही सब का उपकार करता रहे| यह भावनाएं आहुति देते समय आत्मसमर्पण के भाव से की जाती है| यह आहुतियाँ स्वर्ग प्राप्ति का साधन स्वरूप समझते हुए देनी चाहियें|
व्याख्यान
यह जगत् परमपिता परमात्मा की रचना है| उसकी रची हुई इस रचना में जितने भी छोटे अथवा बड़े प्राणी हैं, सब कुछ न कुछ देने वाले होने के कारण देवता स्वरूप ही माने जाते हैं और इस धारणा के अनुसार सब देवता अपने अपने ढंग से यह अग्निहोत्र तथा यज्ञ कर रहे हैं| जब विश्व के सब प्राणी यज्ञ की आहुतियाँ डाल रहे हैं तो क्या कारण है कि मैं यह आहुतियाँ देते हुए इसे अपना मानते हुए तुच्छ क्यों बनूँ? इस तुच्छता की भावना से ऊपर उठ कर क्यों न इन देवताओं के यज्ञ करने वाली इस मंडली के ही साथ मिल जाऊं? इस अग्निहोत्र को अपनी तुच्छ आहुति भेंट करते हुए मेरी यह अवस्था हो कि मैं एक हाथ से जो भी आहुति डालूं, उसका मेरे दूसरे हाथ तक को भी पता न चल पावे| हे पिता! मेरे अन्दर त्याग का यह भाव पैदा करो|
डा.अशोक आर्य
पाकेट १/६१ रामप्रस्थ ग्रीन से.७ वैशाली
२०१०१२ गाजियाबाद उ.प्र.भारत
चलभाष ९३५४८४५४२६ व्हट्स एप्प ९७१८५२८०६८

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देश के कर्णधार हमारे शिक्षक व शिष्य कैसे हों

ओ३म्

“देश के कर्णधार हमारे शिक्षक व शिष्य कैसे हों?”

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शिक्षा देने व विद्यार्थियों को शिक्षित करने से अध्यापक को शिक्षक तथा शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को शिष्य कहा जाता है। आजकल हमारे शिक्षक बच्चों को अक्षर व संख्याओं का ज्ञान कराकर उन्हें मुख्यतः भाषा व लिपि से परिचित कराने के साथ गणना करना सिखाते हैं। आयु वृद्धि के साथ साथ बच्चा भाषा, कविता, गणित सहित विज्ञान व कला आदि विषयों को भी अपने शिक्षकों से पढ़ता है और आगे चल कर वह पुस्तकें पढ़कर व शिक्षकों के मार्गदर्शन से चिकित्सक, इंजीनियर, कम्प्यूटर प्रयोग कर्मी, अध्यापक, व्यापारी व उद्योगपति आदि बन जाता है। हमारी वर्तमान जो शिक्षा प्रणाली है, उसमें बहुत कम लोग ही सत्य व चारित्रिक नियमों का पालन करने वाले बनते हैं। आजकल देखा जाता है कि बात-बात पर झूठ बोलना एक आम बात हो गई है। यदि यह कार्य अशिक्षित करते होते तो समझ में आता, परन्तु बड़ी बड़ी उपाधि के धारणकर्ता व उच्च पदों पर प्रतिष्ठित लोग प्रायः असत्य बोलते हैं व अपने अपने कार्यों में मिथ्याचार व भ्रष्टाचार आदि में लिप्त पाये जाते हैं। इस असत्य व्यवहार व मिथ्याचार का कारण हमें एक ओर शिक्षा प्रणाली व दूसरी ओर शिक्षकों का निजी आचारण, जीवन व चरित्र अनुभव होता है। जैसा शिक्षक होगा, माता-पिता व परिवार के लोग हांेगे, वैसे ही कुछ व अधिक प्रायः शिष्य व सन्तानें बनती हैं।

हमारा देश ज्ञान की दृष्टि से अन्य देशों से अधिक भाग्यशाली रहा है। प्राचीन काल में हमारे देश के लोगों के जीवन व चरित्र आदर्श व महान होते थे जिसका प्रमुख कारण वेदों का ज्ञान, विद्यार्थियों द्वारा उसका अध्ययन व आचार्यों के उच्च जीवन एवं चरित्र होते थे। आज 135 करोड़ से अधिक जनसंख्या हो जाने पर भी किसी के बारे में यह कहना कठिन है कि अमुक व्यक्ति सत्य का ही व्यवहार करता है एवं असत्य का किंचित व्यवहार नहीं करता तथा इसका चरित्र आदर्श व बेदाग है। इसका कारण हमें शिक्षा में वैदिक मूल्यों की उपेक्षा व पाश्चात्य मूल्यों की बहुलता सहित हमारे शिक्षकों का ज्ञान व अज्ञानवश पाश्चात्य मूल्यों के प्रति प्रेम अनुभव होता है। इसके अविद्या आदि अनेक कारण और भी हैं। आईये, वैदिक काल में अध्यापक और अध्यापिकायें कैसे होते थे व होने चाहिये, यह वेदों के मर्मज्ञ, आदर्श जीवन व चरित्र के धनी महर्षि दयानन्द के शब्दों में जानते हैं।

महाभारतान्तर्गत उद्योगपर्व विदुरप्रजागर के अध्याय 33 के 6 श्लोकों को प्रस्तुत कर वह सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में लिखते हैं कि जिस को आत्मज्ञान सम्यक् हो अर्थात् जो निकम्मा आलसी कभी न रहे, सुख दुःख, हानि लाभ, मान-अपमान, निन्दा स्तुति में हर्ष शोक कभी न करे, धर्म ही में नित्य निश्चित रहे, जिस के मन को उत्तम-उत्तम पदार्थ अर्थात् विषय सम्बन्धी वस्तुयें आकर्षित न कर सकें, वही पण्डित वा शिक्षक कहाता है। सदा धर्मयुक्त कर्मों का सेवन, अधर्मयुक्त कामों का त्याग, ईश्वर, वेद, सत्याचार की निन्दा न करनेहारा, ईश्वर आदि में अत्यन्त श्रद्धालु हो, वही पण्डित वा अध्यापक-अध्यापिका का कर्तव्य-अकर्तव्य अथवा कर्म है। जो कठिन विषय को भी शीघ्र जान सके, बहुत कालपर्यन्त शास्त्रों को पढ़े सुने और विचारे, जो कुछ जाने उस को परोपकार में प्रयुक्त करे, अपने स्वार्थ के लिये कोई काम न करे, बिना पूछे वा विना योग्य समय जाने दूसरे के अर्थ में सम्मति न दे, ऐसा व्यक्ति ही प्रथम प्रज्ञान पण्डित, शिक्षक, अध्यापक व अध्यापिका को होना चाहिये। अध्यापक व अध्यापिका ऐसे हों कि जो प्राप्ति के अयोग्य की इच्छा कभी न करे, नष्ट हुए पदार्थ पर शोक न करे, आपत्काल में मोह को न प्राप्त हों अर्थात् व्याकुल न हों। यह गुण बुद्धिमान पण्डित के हैं और ऐसे ही अध्यापक व अध्यापिकायें होंवे। जिसकी वाणी सब विद्याओं और प्रश्नोत्तरों के करने में अतिनिपुण व विचित्र, शास्त्रों के प्रकरणों का वक्ता, यथायोग्य तर्क और स्मृतिमान्, ग्रन्थों के यथार्थ अर्थ का शीघ्र वक्ता हो वही पण्डित वा अध्यापक कहलाता है। जिस व्यक्ति की प्रज्ञा सुने हुए सत्य अर्थ के अनुकूल और जिस का श्रवण बुद्धि के अनुसार हो, जो कभी आर्य अर्थात् श्रेष्ठ धार्मिक पुरुषों की मर्यादा का छेदन न कर,े वही पण्डित वा अध्यापक आदि संज्ञा को प्राप्त होवे। प्रकरण की समाप्ति पर महर्षि दयानन्द लिखते हैं कि जहां ऐसे-ऐसे स्त्री पुरुष पढ़ाने वाले होते हैं वहां विद्या धर्म और उत्तमाचार (सत्य भाषण एवं मिथ्याचार-भ्रष्टाचार रहित व्यवहार आदि) की वृद्धि होकर प्रतिदिन आनन्द ही बढ़ता रहता है। हमारे शिक्षक और बुद्धिमान लोग स्वयं जान सकते हैं कि शिक्षक व अध्यापक-अध्यापिकाओं के इन गुणों में से कितने गुण आजकल के शिक्षकों में पाये जाते हैं? क्या शिक्षकों के महर्षि दयानन्द वर्णित यह गुण आज अप्रासंगिक हो गये हैं? ऐसा नहीं है। इसका प्रथम कारण तो हमारे शिक्षाविदों की इनसे अनभिज्ञता व दूसरा पाश्चात्य मूल्यों के प्रति गहन प्रेम है और इसके अतिरिक्त शिक्षण व्यवसाय से जो सुख सुविधायें उन्हें मिल रही है, उनका राग भी एक प्रमुख कारण है। हम महर्षि दयानन्द के प्रति इन वैदिक, सनातन व भारतीय मूल्यों को महाभारत से निकाल कर हिन्दी में अर्थ सहित जनसाधारण में प्रस्तुत करने के लिए सभी देशवासियों पर उनका उपकार मानते हैं। महर्षि द्वारा प्रस्तुत विचारों पर ध्यान देने पर हमें उनके गुरू प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती और स्वयं स्वामी दयानन्द ही सच्चे अध्यापक, शिक्षक, गुरु व आचार्य और इन सभी गुणों से सम्पन्न दिखाई देते हैं।

अध्यापकों के गुणों का वर्णन करने के बाद वह पढ़ाने में अयोग्य मूर्ख शिक्षकों का वर्णन भी करते हैं जिसका आधार भी उन्होंने महाभारत के उद्योगपर्व के अध्याय 33 के दो श्लोकों संख्या 30 व 36 को बनाया है। वह लिखते हैं कि जिसने कोई शास्त्र न पढ़ा न सुना, अतीव घमण्डी, दरिद्र होकर बड़े-बड़े मनोरथ करनेहारा, विना कर्म से परार्थों की प्राप्ति की इच्छा करने वाला हो, उसी को बुद्धिमान लोग मूढ़ कहते है। ऐसे लोग पढ़ाने योग्य नहीं होते। आजकल समाज में ऐसे बहुत से अध्यापक हमें देखने को मिल जाते हैं। दूसरे श्लोक का अर्थ करते हुए वह लिखते हैं कि जो विना बुलाये सभा वा किसी के घर में प्रविष्ट हो, उच्च आसन पर बैठना चाहे, विना पूछे सभा में बहुत सा बोले, विश्वास के अयोग्य वस्तु वा मनुष्य में विश्वास करे, वही मूढ़ और सब मुनष्यों में नीच मनुष्य कहाता है। इन 2 श्लोकों के अर्थांे पर टिप्पणी कर दयानन्द जी कहते हैं कि जहां ऐसे पुरुष अध्यापक, उपदेशक, गुरु और माननीय होते हैं वहां अविद्या, अधर्म, असभ्यता, कलह, विरोध और फूट बढ़ कर दुःख ही बढ़ता जाता है। शिक्षक दिवस अभी 3 दिन पूर्व ही व्यतीत हुआ है। हम समझते हैं कि प्रत्येक शिक्षक दिवस पर शिक्षक के इन गुणों व अवगुणों पर विचार कर अवगुणों के त्याग व गुणों के ग्रहण की सभी शिक्षकों को प्रतिज्ञा लेनी चाहिये।

विद्यार्थियों के लक्षण भी महर्षि दयानन्द ने महाभारत के आधार पर लिखे हैं। वह हैं कि शरीर और बुद्धि में जड़़ता, नशा, मोह, किसी वस्तु में फंसावट, चपलता और इधर-उधर की व्यर्थ कथा करना सुनना, पढ़ते पढ़ाते रुक जाना, अभिमानी, अत्यागी होना ये सात दोष विद्यार्थियों में होते हैं। जो ऐसे दोषों से युक्त विद्यार्थी होते हैं, उनको विद्या कभी नहीं आती। सुख भोगने की इच्छा करने वाले को विद्या कहां? और विद्या पढ़ने वाले को सुख कहां? क्योंकि विषय-सुखार्थी विद्या को और विद्यार्थी विषयसुख को छोड़ दें। ऐसा किये विना विद्या कभी नहीं आ सकती। कैसे विद्यार्थियों को विद्या आती है, इसका उत्तर है कि जो सदा सत्याचार में प्रवृत्त, जितेन्द्रिय और जिन का ब्रह्मचर्य सच्चा व अखण्डित हो, वे ही विद्वान होते हैं। इसलिये शुभ लक्षणयुक्त अध्यापक और विद्यार्थियों को होना चाहिये। महर्षि दयानन्द अपने विचार व मान्यतायें बताते हुए लिखते हैं कि अध्यापक लोग ऐसा यत्न किया करें कि जिससे विद्यार्थी लोग सत्यवादी, सत्यमानी, सत्यकारी सभ्यता, जितेन्द्रिय, सुशीलतादि शुभगुणयुक्त शरीर और आत्मा का पूर्ण बल बढ़ा के समग्र वेदादि शास्त्रों में विद्वान् हों। सदा उन की कुचेष्टा छुड़ाने में और विद्या पढ़ाने में चेष्टा किया करें और विद्यार्थी लोग सदा जितेन्द्रिय, शान्त, पढ़ानेहारों में प्रेम, विचारशील, परिश्रमी होकर ऐसा पुरुषार्थ करें जिससे पूर्ण विद्या, पूर्ण आयु, परिपूर्ण धर्म और पुरुषार्थ करना आ जाय। यह कार्य व इनको करके अध्यापक ब्राह्मण वर्ण के कहलाते है।

हम समझते हैं कि महर्षि दयानन्द के उपर्युक्त विचारों व मान्यताओं में आदर्श गुंरु व शिष्य का चित्र उपस्थित हुआ है। हमारे शिक्षाविदों को इस पर विचार कर इसका शिक्षा प्रणाली में समावेश करना चाहिये। कम आयु के बच्चों में सदाचार व सदग्रन्थों वेद, दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति एवं सत्यार्थप्रकाश आदि की शिक्षा आवश्यक है। इनको पूर्ण वा आंशिक ही पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाना चाहिये तभी हमें अच्छे शिक्षक व शिष्य प्राप्त होंगे। समूचे देश में संस्कृत अनिवार्य विषय के रूप से पढ़ाई जाये, इससे शिक्षा की बहुत सेवा होगी। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं।

-मनमोहन कुमार आर्य

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यम व नियमों के पालन से ही आत्मा की उन्नति सम्भव है

ओ३म्

“यम व नियमों के पालन से ही आत्मा की उन्नति सम्भव है”
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मनुष्य शरीर में आत्मा का सर्वोपरि महत्व है। शरीर को आत्मा का रथ कहा जाता है और यह है भी सत्य। जिस प्रकार हम रथ व वाहनों से अपने गन्तव्य स्थान पर पहुंचते हैं उसी प्रकार से मनुष्य शरीर मनुष्य की आत्मा को उसके लक्ष्य ईश्वर-प्राप्ति कराता है। ईश्वर सर्वव्यापक होने से आत्मा को हर समय व हर स्थान पर प्राप्त रहता है। उसे ईश्वर को पुकारना होता है और इसके साथ ही अपने को ईश्वर से भेंट व साक्षात्कार करने का पात्र बनाना पड़ता है। यदि हममें पात्रता न हो तो हम संसारिक सामान्य लोगों से भी नहीं मिल सकते। हम जिनसे मिलना चाहते हैं व जिनसे भेंट करने का निवेदन करते हैं वह भी हमारी पात्रता को देखकर ही हमें मिलने का समय देते हैं। अतः संसार का स्वामी, रचयिता व पालक, भी हमें तभी साक्षात्कार कराता है जबकि हम उसके लिये पात्र होते हैं। ईश्वर के साक्षात्कार व उससे भेंट के लिये हमें ईश्वर की उपासना करनी होती है। उपासना की सफलता पर ही हमें ईश्वर का साक्षात्कार वा प्रत्यक्ष होता है। ईश्वर का साक्षात्कार क्यों आवश्यक है? इस प्रश्न पर विचार करते हैं तो हमें आत्मा के अज्ञान की भूख की तृप्ति ईश्वर के साक्षात्कार को प्राप्त करने पर ही समाप्त होती प्रतीत होती है। जिस मनुष्य ने ईश्वर को प्राप्त नहीं किया है उसका जीवन अधूरा व अनुपयोगी ही कहा जा सकता है। हम जो पुरुषार्थ करते हैं उसका उद्देश्य यदि आत्मा की उन्नति व दुर्गुणों तथा दुव्र्यसनों का नाश वा सुधार नहीं है तो हमारा पुरुषार्थ करना व्यर्थ सिद्ध होता है।

हमारा शरीर हमसे भोजन व वस्त्रों की अपेक्षा रखता है। इसे निवास व विश्रामकी भी आवश्यकता होती है। इससे अधिक यदि हम धनोपार्जन करते हैं अथवा अपना सारा जीवन ही धनोपार्जन वा भौतिक सम्पत्ति के अर्जन व संचय में लगाते हैं, तो यह सर्वथा उचित नहीं है। हमें आत्मा की उन्नति पर भी ध्यान देना चाहिये। आत्मा की शुद्धि विद्या व तप से होती है। इससे सम्बन्धित शास्त्रीय सिद्धान्त है कि मनुष्य का शरीर जल से तथा मन सत्य से शुद्ध होता है। विद्या व तप से आत्मा शुद्ध होती है तथा बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है। मनुष्य के शरीर में आत्मा से इतर मन, बुद्धि सहित मानव शरीर भौतिक तत्वों से बना होता है। अतः हमारा शरीर जड़ अर्थता चेतना से विहीन होता है। मन व बुद्धि को सत्य व ज्ञान से शुद्ध करने का अर्थ आत्मा की उन्नति ही होता है। सत्य व ज्ञान की अपेक्षा बुद्धि को अपने लिये नहीं होती अपितु शरीरस्थ आत्मा को होती है। आत्मा की उन्नति के लिये ही परमात्मा ने मनुष्य को शरीर व उसमें मन व बुद्धि आदि ज्ञान प्राप्ति में सहायक इन्द्रियां व अन्तःकरण आदि दिये हैं। अतः हमें मन व बुद्धि सहित शरीर का उपयोग करते हुए आत्मा को ज्ञान व तप से युक्त कर अपनी आत्माओं की उन्नति करनी चाहिये। ऐसा करने से ही मनुष्य का जीवन सफल होगा और जीवन के उत्तर काल में आत्मा की उन्नति होकर मनुष्य ईश्वर का साक्षात्कार कर सकता है अथवा वह साक्षात्कार होने के निकट पहुंच सकता है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये ही परमात्मा ने हमें मनुष्य शरीर दिया है। इसे जानकर हमें अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा करने में लग जाना चाहिये। धनोपार्जन व धनसंचय से जीवन का लक्ष्य सिद्ध नहीं होता। इसके विपरीत आत्मा की तप, सत्य व ज्ञान से उन्नति करते हुए ईश्वर का साक्षात्कार करना ही जीवन का उद्देश्य व लक्ष्य सिद्ध होता है।

आत्मा की उन्नति में वैदिक शिक्षा सहित भौतिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति का सर्वाधिक महत्व होता है। ज्ञान प्राप्ति करने के साथ ज्ञान के अनुरूप आचरण का महत्व ज्ञान प्राप्ति जितना ही होता है। यदि हमने ज्ञान प्राप्त कर भी लिया और उसके अनुरूप आचरण नहीं किया तो ज्ञान प्राप्ति का लक्ष्य पूरा नहीं होता। इसलिये हमें अपने कर्मों व आचरणों पर विशेष ध्यान देना चाहिये। इसकी परीक्षा ही हम प्रातः व सायं सन्ध्या करते हुए करते हैं। सन्ध्या में जहां हम अपने शरीर को स्वस्थ रखने पर विचार करते हैं और शरीर व इन्द्रियों को बलवान रखने में ईश्वर की सहायता की याचना करते हैं वही पाप कर्मों से बचने के लिये अघमर्षण मन्त्रों का पाठ भी करते हैं। हम यह विचार करते हैं कि इस संसार का रचयिता, पालक व स्वामी ईश्वर है, वह सभी दिशाओं में विद्यमान है, हमें देख रहा है और हमारी रक्षा कर रहा है। हमें उसकी अनुमति से ही संसार का सीमित मात्रा में आवश्यकता के अनुरूप ही उपभोग करना है। अधिक उपभोग करना हानिकारक होता है। हम जितना अधिक उपभोग करेंगे उतना ही अधिक संसार में फंसेंगे जिसका परिणाम आवागमन वा जन्म-मरण तथा सुख व दुःखों की प्राप्ति होता है। सभी दुःखों की सर्वथा निवृत्ति के लिये ही आत्मा का कर्तव्यों का पालन करना उद्देश्य होता है जो कि हमें विचार व चिन्तन सहित वेद व ऋषि-मुनियों के ग्रन्थों का स्वाध्याय व विचार करने पर ज्ञात होता है। हमारे मार्गदर्शन के लिये ही परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान हमारे पूर्वज चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को दिया था। यह ज्ञान आज भी प्रासंगिक एवं सार्थक है। यह ज्ञान स्वयं में पूर्ण होने के कारण इसमें किसी प्रकार की वृद्धि व सुधार की आवश्यकता नहीं है। इस ज्ञान को प्राप्त होकर इसके अनुसार ही अपना जीवन बनाकर अर्थात् आचरण कर हम आत्मा को दुःखों से मुक्त तथा मोक्ष के निकट ले जा सकते हैं। मनुष्य जीवन का उद्देश्य भोग व अपवर्ग ही है। ‘भोग’ आत्मा द्वारा पूर्वजन्म व वर्तमान जन्म के क्रियमाण कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल का भोग होता है और अपवर्ग वेद ज्ञान के अनुरूप साधना से अर्जित जन्म व मरण के बन्धनों से मुक्त होकर केवल आत्मा के परमात्मा में निवास व विचरण करने को कहते हैं जहां दुःख का लेश मात्र भी नहीं होता तथा जीवात्मा को अखण्ड व दीर्घ काल तक स्थाई सुख, आनन्द व कल्याण की प्राप्ति होती है।

मनुष्य की आत्मा की उन्नति के अनेक उपयों व साधनों में पांच यम व पांच नियमों का महत्वपूर्ण योगदान है। आत्मा की उन्नति असत्य के त्याग तथा सत्य के ग्रहण से होती है। यजुर्वेद का मन्त्र 30.3 ‘ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद् भद्रन्तन्न आसुव।।’ है। इसका अर्थ है- ‘हे सकल जगत् के उत्पत्तिकर्ता, समग्र ऐश्वर्ययुक्त शुद्धस्वरूप, सब सुखों के दाता परमेश्वर! आप कृपा करके हमारे समस्त दुर्गुण, दुव्र्यसन और दुःखों को दूर कर दीजिए ओर जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव और पदार्थ हैं, वह सब हमकों प्राप्त कीजिए।’ इस वेदमन्त्र से असत्य व दुरितों का त्याग तथा सत्य, सद्कर्मों व सद्गुणों का ग्रहण व धारण ही मनुष्य का कर्तव्य विदित होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये ही महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन में पांच यमों व पांच नियमों का समाधि की प्राप्ति के साधक ‘योग’ को सफल करने के लिये आधार बताया है। यह पांच यम हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह। पांच नियम हैं शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान। यदि हम अपने जीवन को इन 10 साधनों को सफल करने में लगायें तो हम मनुष्य जीवन को उसके लक्ष्य मोक्ष के निकट तक ले जा सकते हैं। हम इसके जितना निकट होते हैं उतना ही हमारा जीवन सफल होता है और जितना दूर जाते हैं उतना ही हम असद्कर्मों व दुःखों में फंसते हैं।

अहिंसा का अर्थ होता है कि हम सभी प्राणियों के प्रति वैर का त्याग का कर दें और सबको अपनी आत्मा के समान समझें। हम असत्य का त्याग व सत्य का ग्रहण करें। सत्य वह है जिसका प्रकाश वेदों में किया गया है। वेदाज्ञा का पालन ही कर्तव्य व सत्य का पालन है तथा उसका पालन न करना ही असद्कर्मों में फंसना है। अस्तेय का अर्थ है कि हम छिप कर कोई कार्य व व्यवहार न करें। हम किसी अन्य के अधिकार की वस्तु को अपने अधिकार में लेने के लिये किसी अनुचित साधन का प्रयोग न करें। अस्तेय का अर्थ चोरी न करना व इस प्रवृत्ति का त्याग करना होता है। ब्रह्मचर्य का अर्थ इन्द्रियों का पूर्ण संयम व उन पर अधिकार करना होता है। ईश्वर का ध्यान व चिन्तन करते हुए अपने जीवनको सद्कर्मों में व्यस्त रखना व स्वाध्याय व तप में लगे रहना ही ब्रह्मचर्य है। अपरिग्रह का अर्थ अधिक मात्रा में धन संचय न कर अपनी आवश्यकता को सीमित करना और अल्प साधनों में जीवनयापन करते हुए पूर्ण सन्तुष्ट रहना होता है।

शौच आन्तरिक व बाह्य स्वच्छता को कहते हैं। हमारी आत्मा में कभी मलिन विचार नहीं आने चाहियें और न ही हमें कभी कोई निषिद्ध व निन्दित कार्यों को करना चाहिये। मनुष्य को हानि व लाभ तथा सुख व दुःख में सदा सन्तुष्ट रहना चाहिये। मनुष्य का जीवन तप अर्थात् वेद विहित कार्यों यथा पंचमहायज्ञों आदि में लगा रहना चाहिये। मनुष्य को वेद व ऋषियों के उपनिषद, दर्शन तथा विशुद्ध मनुस्मृति आदि ग्रन्थों का स्वाध्याय करना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थ भी स्वाध्याय के लिये अत्युत्तम ग्रन्थ हैं। इनके अध्ययन से मनुष्य की सभी शंकायें व भ्रम दूर हो जाते हैं। इनका अध्ययन भी प्रतिदिन नियत समय पर करना चाहिये। पांचवा नियम है ईश्वर प्रणिधान। ईश्वर में व उसकी व्यवस्था में मनुष्य को पूर्ण विश्वास रखना चाहिये। पहाड़ के समान दुःख प्राप्त होने पर भी विचलित व दुःखी नहीं होना चाहिये अपितु उसे अपने किसी पूर्व कर्म का फल मानकर उसे सन्तोष के साथ भोगना चाहिये। ऐसा जीवन ही आध्यात्मिक जीवन का आधार होता है। इसका लाभ वर्तमान में भी होता है और इसके साथ भविष्य व परजन्मों में भी इससे अनेक प्रकार से लाभ मिलता है। यही मनुष्यों के लिये करणीय कर्तव्य हैं। ऐसा करते हुए ही हमारी आत्मिक उन्नति होती है। हम ईश्वर का साक्षात्कार करने के लिये पात्र बनते हैं। मनुष्य के सभी दुःख दूर होते जाते हैं और मृत्यु से पूर्व ईश्वर का प्रत्यक्ष व साक्षात्कार होकर जन्म-मरण वा आवागमन से हमारा आत्मा छूट जाता है। यदि हम सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन करेंगे तो हम इन बातों को भली प्रकार जान सकते हैं। अतः सत्य का ग्रहण, असत्य के त्याग सहित यम व नियमों का पालन अवश्य करना चाहिये क्योंकि यही जीवन में सुख व उन्नति का आधार हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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सब विद्या पढ व धर्मात्मा होकर सद्धर्म का उपदेश करें: महाराज मनु

सब विद्या पढ व धर्मात्मा होकर सद्धर्म का उपदेश करें: महाराज मनु”

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मनुस्मृति एक प्रसिद्ध एवं चर्चित ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ की शिक्षायें मनुष्य जीवन का कल्याण करने वाली है। यह सत्य है कि मनुस्मृति अति प्राचीन ग्रन्थ है। मध्यकाल में कुछ वाममार्गी लोगों ने मनुस्मृति में महाराज मनु के आशय के विपरीत स्वार्थपूर्ति एवं अज्ञानता के कारण इस ग्रन्थ में अनेक स्थानों पर प्रक्षेप किये जिससे इसका शुद्ध स्वरूप विकृति को प्राप्त हुआ। यह अच्छा रहा कि प्रक्षेपकर्ताओं द्वारा मनुस्मृति के शुद्ध व लोकोपकारी श्लोकों को नहीं छेड़ा व हटाया। वह लाभकारी श्लोक मनुस्मृति में विद्यमान रहे व आज भी हमें उपलब्ध हैं। आर्यसमाज ने वेदों को ईश्वर का ज्ञान न केवल स्वीकार ही किया अपितु इसके पक्ष में अनेक तर्क एवं युक्तियां देकर इसे प्रमाणित भी किया है। आर्यसमाज के विद्वान पं. राजवीर शास्त्री जी ने श्री डा. सुरेन्द्र कुमार जी के सहयोग से तथा ऋषिभक्त महात्मा दीपचन्द आर्य जी की प्रेरणा से विशुद्ध मनुस्मृति का सम्पादन किया जिसमें प्रक्षिप्त श्लोको की समीक्षा करके उन्हें हटा दिया। इस प्रकार जो विशुद्ध मनुस्मृति उपलब्ध है वह संसार के सभी मनुष्यों, न केवल ब्राह्मणों अपितु दलितों, के लिये भी सर्वप्रकार से लाभकारी है। सबको इसका अध्ययन करने के साथ इसकी प्राणी मात्र की हितकारी शिक्षाओं से लाभ उठाना चाहिये। ऐसा तभी हो सकता है कि जब लोग इस ग्रन्थ का निष्पक्ष होकर अध्ययन करें। आश्चर्य है कि जो लोग मनुस्मृति की आलोचना करते हैं उनमें से किसी ने इसको निष्पक्ष होकर पढ़ा नहीं होता। हमने विशुद्ध मनुस्मृति को पढ़ा है और हम सभी बन्धुओं विशेषकर दलित बन्धुओं को इस ग्रन्थ को पढ़ने की प्रेरणा करते हैं। इस विशुद्ध-मनुस्मृति से मध्यकाल व उसके बाद अद्यावधि प्रक्षेपकर्ताओं व उनके अनुयायियों द्वारा फैलाये गये सभी भ्रम व विसंगतियां दूर हो जाती हैं। यह विशुद्ध मनुस्मृति ग्रन्थ अत्यन्त लाभकारी है। ऐसा इसको पढ़कर अनुभव होता है। संसार का कोई भी निष्पक्ष मनुष्य इसे पढ़ेगा तो इसकी प्रशंसा किये बिना नहीं रहेगा। लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व अति प्राचीन काल में इतना महत्वपूर्ण ग्रन्थ भारत भूमि पर विद्यमान था, यह देखकर इस देश के पूर्वजों के ज्ञान व कार्यों के प्रति हमारा मन आदर व गौरव से भर जाता है।

प्रस्तुत लेख में हम मनुस्मृति के दूसरे अध्याय के एक श्लोक की चर्चा कर रहे हैं जिसमें कहा गया है कि सब मनुष्य विद्या पढ़कर, विद्वान व धर्मात्मा होकर, निर्वैरता से सब प्राणियों के कल्याण का उपदेश करें। वह उपदेशक अपने उपदेश में मधुर और कोमल वाणी बोलें। सत्योपदेश से धर्म की वृद्धि और अधर्म का नाश जो पुरुष करते हैं वह धन्य होते हैं। मनुस्मृति का यह श्लोक है ‘अहिंसयैव भूतानां कार्यं श्रेयोऽनुशासनम्। वाक् चैव मधुरा श्लक्ष्णा प्रयोज्याधर्ममिच्छता।।’ इस श्लोक में अतीव उत्तम उपदेश किया गया है। इसको व्यवहार में लाने पर हम एक आदर्श समाज का निर्माण कर सकते हैं। आदर्श समाज वह होता जिस समाज में सब मनुष्य सत्य का ग्रहण व धारण करने वाले होते हैं। सत्य व असत्य का यथार्थस्वरूप हमें वेद व ऋषियों के ग्रन्थों उपनिषद, दर्शन तथा मनुस्मृति सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि से प्राप्त होता है। मध्यकाल में इन ग्रन्थों का अध्ययन-अध्यापन तथा आचरण न होने के कारण ही समाज में विकृतियां आई थी। इसी कारण देश व विश्व में अविद्यायुक्त मत-मतान्तर उत्पनन हुए थे। यदि वेदों की सत्य शिक्षाओं का समाज में प्रचार व उपदेश होता रहता तो जो अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड, वेदविरुद्ध कृत्य तथा सामाजिक कुरीतियां वा परम्परायें समाज में उत्पन्न हुईं, वह कदापि न होती। महाभारत युद्ध के बाद मध्यकाल में हमारे देश में पूर्णज्ञानी वेद प्रचारक विद्वान नहीं थे। अकेले ऋषि दयानन्द (1825-1883) ने देश में वेद-प्रचार करके संसार से अविद्या दूर करने में अनेक प्रकार से सफलता पाई। आज हमें ईश्वर व आत्मा सहित प्रकृति का यथार्थ स्वरूप विदित है। मनुष्य जीवन का उद्देश्य व लक्ष्य का ज्ञान भी है तथा लक्ष्य की प्राप्ति के लिये आवश्यक साधनों का ज्ञान भी है जिनका हम आश्रय लेते हैं। यदि महाभारत युद्ध के बाद देश में एक सत्यार्थप्रकाश व इस जैसा किसी विद्वान का लिखा कोई विद्या का ग्रन्थ होता और उसका प्रचार रहा होता तो देश को दुर्दशा के जो दिन देखने पड़े, वह देखने न पड़ते।

मनुस्मृति के उपुर्यक्त श्लोक में प्रथम बात यह कही गई है कि सब मनुष्यों को विद्या पढ़नी चाहिये और सबको धर्मात्मा होना चाहिये। विद्या वेदों के ज्ञान को कहते हैं। इसके साथ ही जो भी सत्य पर आधारित ज्ञान व विज्ञान है वह भी ज्ञान व विद्या के अन्तर्गत आता है। वेद ज्ञान पूर्ण ज्ञान है और बीज रूप में उपलब्ध है तथा इतर सांसारिक ज्ञान व विज्ञान अधूरा है। सांसारिक ज्ञान से मुनष्य को ईश्वर व आत्मा का यथार्थ ज्ञान नहीं होता और न ही ईश्वर व आत्मा सहित समाज व देश के प्रति अपने कर्तव्यों की प्रेरणा मिलती है। आधुनिक शिक्षा को पढ़कर मनुष्य चरित्रवान व सभ्य मनुष्यों के गुणों से युक्त नहीं होते। आधुनिक शिक्षा को पढ़कर मनुष्य में भोग व सम्पत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है जिससे समाज में असन्तुलन उत्पन्न होता है। आधुनिक मनुष्य को यह ज्ञात नहीं होता कि जिन उचित व अनुचित साधनों से वह धन का अर्जन कर रहा है उसमें होने वाले पाप व पुण्य का फल उसे परमात्मा की व्यवस्था से भोगना पड़ता है। वेद व वैदिक साहित्य में इन सभी प्रश्नों का यथार्थ समाधान मिलता है। इसलिये वेदों की सर्वाधिक महत्ता है। मत-मतान्तर के ग्रन्थों से भी मनुष्यों की पाप की प्रवृत्तियों पर अंकुश नहीं लगता है। अनेक मतों के कारण समाज अनेक अनेक सम्प्रदायों व पन्थों में बंट गया है। मत-मतान्तर लोगों को आपस में पृथक कर मत, सम्प्रदाय व पन्थ की संकीर्ण दीवारों में बांटते हैं जबकि वेद व वैदिक साहित्य सबको एक ईश्वर की सन्तान बता कर सबके हित व कल्याण का मार्ग बताते हैं। इसी कारण से वेदों का सर्वाेपरि महत्व है। वेद व मनुस्मृति दोनों की ही शिक्षा है कि मनुष्यों को वेद व विद्या का अध्ययन करना चाहिये और ऐसा करके उसे धर्मात्मा बनना चाहिये। धर्मात्मा सत्य ज्ञान के अनुरूप कर्म करने वाले ईश्वरोपासक तथा दूसरों का हित करने वाले मनुष्यों को कहते हैं। ऐसा मनुष्य अपना भी कल्याण करता है और देश, समाज व विश्व का भी कल्याण करता है। हमारे सभी ऋषि मुनियों, राम व कृष्ण सहित ऋषि दयानन्द और उनके अनुयायी विद्वानों ने भी विश्व समुदाय के कल्याण का काम किया था जिस कारण उनका यश आज भी सर्वत्र विद्यमान है। अतः सभी मनुष्यों को वेद व वैदिक साहित्य का अध्ययन कर अपनी अविद्या व अज्ञान को दूर कर विद्वान बनना चाहिये और इसके साथ उन सबको धर्मात्मा भी होने चाहियें। पाठक स्वयं विचार करें कि आज संसार में पढ़े लिखे ज्ञानी लोग बहुत बड़ी संख्या में हैं परन्तु क्या वह सब धर्मात्मा हैं? यदि वह धर्मात्मा होते तो निश्चय ही यह सृष्टि सुख का धाम होती। अतः आज भी वेदों को पढ़कर मनुष्य का विद्वान व धर्मात्मा बनना आवश्यक है। वेदों का अध्येता परजन्म में मिलने वाले दुःखों का विचार कर कभी कोई गलत काम नहीं करता है।

मनुस्मृति के उपर्युक्त उद्धृत श्लोक में सब मनुष्यों को विद्वान व धर्मात्मा बनने सहित सबको सबके प्रति वैर त्याग की प्रेरणा भी की गई है। यह भी कहा गया है कि ऐसे मनुष्य देश व समाज में सब प्राणियों के कल्याण का उपदेश करें। मनुष्य का निर्वैर होना भी अत्यन्त आवश्यक होता है। जो मनुष्य दूसरों लोगों व मत-मतान्तरों से वैर रखते हैं वह देश व समाज की अत्यन्त हानि करते हैं। समाज में समय समय पर ऐसे उदाहरण मिलते रहते हैं। यदि देश में वेदों के आधार पर एक सत्यधर्म का प्रचार व पालन होता तो देश में होने वाली साम्प्रदायिक हिंसा व आतंकवाद जैसी समस्यायें न होती। कुछ लोग देश को साम्प्रदायिक आधार पर अपने मत का शासन स्थापित करने के लिये प्रयत्नशील न होते। इन सब समस्याओं से बचने के लिये सब मनुष्यों को एक दूसरे के प्रति पूर्णतः निर्वैर होकर सबको सब प्राणियों का कल्याण करने की प्रेरणा की जानी चाहिये। यह काम मनुस्मृति सृष्टि के आरम्भ से करती आ रही है। जो ऐसा न करें वह अपराधी माने जाने चाहिये। यह काम मनुस्मृति सृष्टि के आरम्भ से करती आ रही है। किसी मत व सम्प्रदाय को किसी से घृणा व अनावश्यक विरोध करने की अनुमति भी नहीं होनी चाहिये। मतान्तरण जैसी प्रवृत्तियों पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगना चाहिये। यदि देश में अज्ञानी व भोले भाले लोगों, मुख्यतः आर्य हिनदुओं का मतान्तरण होता रहा तो इससे सत्य धर्म व संस्कृति की बहुत हानि होगी। देश के सद्ज्ञानी मनुष्यों को इन समस्याओं पर विचार करना चाहिये।

जब हम निर्वैर होकर सब प्राणियों के कल्याण का उपदेश करते हैं तो इससे हमारा समाज व देश बलवान बनता है। अतः मनुस्मृति की यह शिक्षा सबके लिये स्वीकार्य एवं हितकारी है। उपर्युक्त श्लोक में एक महत्वपूर्ण शिक्षा यह भी दी गई है कि उपदेश करने वाले लोग अपनी वाणी को मधुर व कोमल रखे। मनुस्मृति का यह अत्यन्त महत्वपूर्ण उपेदश है। लाखों वर्ष पहले जब किसी मत-सम्प्रदाय का अस्तित्व भी नहीं था, तब मनुस्मृति वा वेदों के द्वारा इतने उत्तम विचार प्रचारित थे। यदि पांच हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध के बाद भी मनुस्मृति के शुद्धस्वरूप्स का प्रचार होता तो किसी मत सम्प्रदाय की आवश्यकता ही नहीं थी। शुद्ध मनुस्मृति की विस्मृति के कारण ही देश देशान्तर में मत व सम्प्रदाय बढ़े हैं। मनुस्मृति की शिक्षा है कि सभी व्यक्तियों व उपदेशकों को अपनी वाणी को मधुर व कोमल रखना चाहिये। यह मनुस्मृति का अत्यन्त उपयेागी उपदेश है। मनुस्मृति ने एक महत्वपूर्ण बात यह कही है कि जो मनुष्य व विद्वान सत्य का उपदेश कर धर्म की वृद्धि और अधर्म का नाश करते हैं वह पुरुष धन्य होते हैं। यह सन्देश भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है और स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। ऐसे ही उत्मोत्तम उपदेशों के कारण मनुस्मृति का महत्व है। हम सबको पक्षपात रहित होकर मनुस्मति के विशुद्ध संस्करण का अध्ययन करना चाहिये और इससे लाभ उठाना चाहिये। इससे पूरी मानवता को लाभ होगा। ऐसा करने से हमारी धर्म कर्म में रुचि बढ़ेगी और हम अपने कर्तव्यों का बोध प्राप्त कर उनको करते हुए अपने जीवन को सफल बना सकते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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जब तक लोग आपको सम्मान दे रहे हैं

जब तक लोग आपको सम्मान दे रहे हैं, तब तक समझ लीजिए, उनको आप की आवश्यकता है।

इस संसार में प्रत्येक आत्मा स्वार्थी है। कोई कम स्वार्थी है, तो कोई अधिक। कोई न्याय पूर्वक अपना स्वार्थ सिद्ध करता है, तो कोई स्वार्थ सिद्धि करते-करते सीमा को पार कर जाता है, और अन्याय पूर्वक भी दूसरों का शोषण अत्याचार आदि करके अपने स्वार्थ की सिद्धि करता है। किसी का लौकिक स्वार्थ होता है, और किसी का आध्यात्मिक।
लौकिक स्वार्थ भी यदि न्यायपूर्वक पूरा किया जाए, तो ठीक है, चलेगा। यदि अन्याय पूर्वक आप दूसरों का शोषण करके उन पर अत्याचार करके उन्हें परेशान करके उन्हें दुख देकर यदि अपना स्वार्थ पूरा करते हैं, तो यह अत्यंत अनुचित है। यह पाप अथवा अपराध की कोटि में आता है। इसलिए आप अपना स्वार्थ भले ही सिद्ध करें, परंतु न्याय की सीमा में रहकर। दूसरों पर अन्याय कभी न करें। न्यायपूर्वक स्वार्थ पूरा करने से, ईश्वर आप से प्रसन्न रहेगा और आपको भविष्य में सुख भी देगा।
जो लोग अन्याय करके अपने स्वार्थ पूरे करते हैं, उनसे ईश्वर अप्रसन्न होगा। क्योंकि अन्याय करना ईश्वर के संविधान के विरुद्ध है। तब ईश्वर, उनके अपराध की मात्रा के अनुसार उन्हें कम या अधिक दंड भी अवश्य देगा।
परंतु कुछ लोग, दूसरे लोगों से लौकिक स्वार्थ बहुत कम रखते हैं। उन्हें जीवन रक्षा के लिए दो रोटी, दो कपड़े, ठहरने के लिए थोड़ी जगह, आदि आवश्यक वस्तुएं मिल जाएँ, बस इतना ही चाहते हैं। ऐसे लोग ईश्वर से अपना आध्यात्मिक स्वार्थ अधिक रखते हैं। वह आध्यात्मिक स्वार्थ है, मोक्ष प्राप्ति का। उनका यह स्वार्थ केवल ईश्वर ही पूरा कर सकता है। इसलिए मोक्ष प्राप्त करने के लिए, ऐसे आध्यात्मिक लोग, ईश्वर की आज्ञा का पालन करते हुए, संसार वालों को प्रायः दुख नहीं देते, बल्कि सुख ही अधिक देते हैं। यही लोग संसार में महात्मा, देवता, महापुरुष या परोपकारी नाम से प्रसिद्ध हो जाते हैं।
बिना स्वार्थ के तो कोई जीवात्मा है नहीं। क्योंकि स्वार्थ तो जीवात्मा का स्वभाव ही है। अब लोक व्यवहार में अनेक बार ऐसा देखा जाता है, कि कुछ लोग, किसी व्यक्ति से बहुत लंबे समय तक अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहे। फिर एक दिन उन लोगों ने, जिससे स्वार्थ सिद्ध करते रहे थे, उसका मजाक बनाना शुरु कर दिया, अर्थात् उस की खिल्ली उड़ानी शुरू कर दी। उसकी उपेक्षा आरंभ कर दी। शायद ऐसा आपने भी अनेक बार देखा होगा। ऐसे लोग अतिस्वार्थी कहलाते हैं और ईश्वर की न्याय व्यवस्था से भयंकर दंड भोगते हैं।
तो ऐसी घटनाओं से क्या समझना चाहिए? यह समझना चाहिए, कि खिल्ली उड़ाने वाले लोग, आपसे जितना स्वार्थ सिद्ध कर सकते थे, उन्होंने पूरा सिद्ध कर लिया।
अब उनको आगे आपसे कोई स्वार्थ पूरा होने की आशा नहीं है। इसलिए उन्होंने सीमा का अतिक्रमण करके आपका मजाक उड़ाना शुरु कर दिया। या उपेक्षा करनी आरंभ कर दी।*
ऐसी स्थिति में आप को भी समझ लेना चाहिए, कि अब इन लोगों को, मुझसे कोई और स्वार्थ पूरा होता नहीं दिख रहा। ये लोग अतिस्वार्थी एवं दुष्ट हैं। अब इन्हें मेरी कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए बुद्धिमत्ता इसी में है, कि मैं चुपचाप यहां से खिसक लूँ। और आपको वहाँ से खिसक ही लेना चाहिए।
अन्यथा बार-बार उनके सामने आपको अपमानित और दुखी होना पड़ेगा। जिससे आप की डिप्रेशन तनाव चिंता आदि अनेक नई समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
तो ऐसी घटनाओं के होने पर, घबराएँ नहीं। उन अतिस्वार्थी और दुष्ट लोगों से अलग हो जाएँ। ऐसी समस्याओं का यही उचित समाधान है।
– स्वामी विवेकानंद परिव्राजक

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निजीकरण क्यो

निजीकरण क्यो

देश के सबसे बड़े अस्पताल का नाम मेदांता नहीं एम्स है जो सरकारी है,सबसे अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज का नाम IIT है जो सरकारी हैं, सबसे अच्छे मैनेजमेंट कॉलेज का नाम IIM है जो सरकारी हैं, देश के सबसे अच्छे विद्यालय केन्द्रीय विद्यालय हैं जो सरकारी हैं ,बीमा उद्योग में विश्व की सबसे बड़ी और सबसे अच्छी कम्पनी भारतीय जीवन बीमा निगम है जो सरकारी है,देश के एक करोड़ लोग अभी या किसी भी वक़्त अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए सरकारी रेल में बैठते हैं…, नासा को टक्कर देने वाला ISRO अम्बानी नहीं सरकार के लोग चलाते हैं..

सरकारी संस्थाएँ फ़ालतू में बदनाम हैं,अगर इन सारी चीज़ों को प्राइवेट हाथों में सौंप दिया जाए तो ये सिर्फ़ लूट-खसोट का अड्डा बन जाएँगी। निजीकरण एक व्यवस्था नहीं बल्कि नव-रियासतीकरण है।

अगर हर काम में लाभ की ही सियासत होगी तो आम जनता का क्या होगा?? कुछ दिन बाद नव-रियासतीकरण वाले लोग कहेगें कि देश के सरकारी स्कूलों, कालेजों और अस्पतालों से कोई लाभ नहीं है।अत: इनको भी निजी हाथों में दे दिया जाय तो आम जनता का क्या होगा??

अगर देश की आम जनता प्राइवेट स्कूलों और हास्पिटलों के लूटतंत्र से संतुष्ट हैं तो रेलवे, बैंकों एवं अन्य सरकारी संस्थाओं को भी निजी हाथों में जाने का स्वागत करें!!!

हमने बेहतर व्यवस्था बनाने के लिए सरकार बनायी है न कि सरकारी संपत्ति मुनाफाखोरों को बेचने के लिए,अगर प्रबंधन सही नहीं,तो सही करें। भागने से तो काम नही चलेगा।

एक साजिश है कि पहले सरकारी संस्थानों को ठीक से काम न करने दो, फिर बदनाम करो, जिससे निजीकरण करने पर कोई बोले नहीं, फिर धीरे से अपने आकाओं को बेच दो। जिन्होंने चुनाव के भारी भरकम खर्च की फंडिंग की है।

याद रखिये पार्टी फण्ड में गरीब मज़दूर, किसान पैसा नही देता बल्कि पूंजीपति देता है और पूंजीपति दान नहीं देता,निवेश करता है और चुनाव बाद मुनाफे की फसल काटता है।

आइए विरोध करें निजीकरण का!!! सरकार को अहसास कराएं कि अपनी जिम्मेदारियों से भागे नहीं। सरकारी संपत्तियों को बेचे नहीं। अगर कहीं घाटा है तो प्रबंधन ठीक से करें।

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वेद मंत्र

वेद मंत्र

तं नो दात मरुतो वाजिनं रथ आपानं ब्रह्म चितयद्दिवेदिवे।
इषं स्तोतृभ्यो वृजनेषु कारवे सनिं मेधामरिष्टं दुष्टरं सहः॥ ऋग्वेद २-३४-७॥

हे मारुतों (विद्वानों) ! हमारे देश के रथ को शक्ति और गति प्रदान करो। सत्य ज्ञान से हम सभी दिन-प्रतिदिन प्रबुद्ध हो। जो सकल विद्याओं के प्रयोजनवेता अन्य मनुष्यों के कल्याण के कार्य में लगे हुए हैं, उन्हें अन्न और समृद्धि की कमी नहीं होती।🙏🌹

O Marut (scholars) ! Provide strength and speed to the chariot of our country. May we all be enlightened day by day with true knowledge. Experts who are engaged in the work of welfare of human beings in various fields, do not lack food and prosperity.

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सत्संग स्वर्ग और कुसंग नरक है

ओ३म्
“सत्संग स्वर्ग और कुसंग नरक है”
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किसी भी विषय के प्रायः दो पहलु होते हैं, एक सत्य व दूसरा असत्य। सत्य व असत्य का प्रयोग ईश्वर व जीवात्मा से लेकर सृष्टि के सभी पदार्थों व व्यवहारों में सर्वत्र किया जाता है। ईश्वर निराकार है, यह सत्य है और निराकार नहीं है अथवा साकार है, यह असत्य है। निराकार अर्थात् आकार रहित होने से उसका चित्र व मूर्ति नहीं बन सकती। जिस प्रकार आकाश व वायु की मूर्ति व चित्र नहीं बनाये जाते उसी प्रकार निराकार होने से ईश्वर का चित्र व मूर्ति भी नहीं बन सकती अर्थात् ऐसा होना असम्भव है। यदि कोई मूर्तिकार व तथाकथित विद्वान किसी मूर्ति को बनाकर कहे कि यह ईश्वर की मूर्ति है तो वह असत्य होगा। बुद्धिमान व ज्ञानी लोग इस बात को समझते हैं परन्तु अज्ञानी व भोले लोग इसको न समझकर अन्धपरम्पराओं जो विगत दो या ढाई हजार पहले आरम्भ हुईं, उसी को परम्परा मानकर उसका अनुगमन करते हैं। सत्य को जानना व उसे जीवन में धारण करना ही सत्संग है। असत्य के लिए अधिक पुरुषार्थ व तप करने की आवश्यकता नहीं होती। असत्य अज्ञान की वह अवस्था होती है जिसके लिए मनुष्य को कुछ करना ही नहीं होता। सत्य के लिए अवश्य ही अध्ययन, विद्वानों के उपदेश, सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय, विचार व चिन्तन करना होता है। किसी को गुरु बनाते समय यह देखना होता है कि वह वस्तुतः सच्चा ज्ञानी, निर्लोभी व सदाचारी है वा नहीं। आजकल अज्ञानी और छल व कपट से युक्त स्वार्थी व्यक्ति भी स्वयं को गुरु बनाये हुए हैं और अपने छल व कपट से अपने अनुयायियों के जीवन का शोषण कर खिलवाड़ करते हैं। अतः किसी एक व्यक्ति को गुरु कभी नहीं बनाना चाहिये परन्तु गुरु बदलते रहें और जहां जिससे जितना ज्ञान मिले उसे प्राप्त करते रहना चाहिये, यही उचित प्रतीत होता है। संसार में गुरू स्थानीय सत्ता के रूप में परमात्मा सर्वोपरि है और उसके बाद स्वाध्याय के लिए परम प्रमाणित वेद सहित महर्षि दयानन्द व आर्यविद्वानों द्वारा रचे वेदभाष्य व सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थ हैं। इनके द्वारा कोई भी साधारण अक्षरज्ञानी व भाषाज्ञानी व्यक्ति ईश्वर, जीवात्मा व संसार के विषय में सत्य ज्ञान से परिचित हो सकता है।

आर्य समाज में आचार्य भद्रसेन जी के नाम से एक सच्चे ब्राह्मण, पण्डित व विद्वान हुए हैं। आपने अपने जीवन में स्वामी सर्वदानन्द जी की सहायता व पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी के आचार्यत्व में संस्कृत व वैदिक साहित्य का गहन अध्ययन किया। आप योग के भी आचार्य थे और इसके साथ आर्ष विधि से पुरोहित के रूप में गृहस्थियों के सोलह संस्कार भी कराते थे। आपके एक योग्यतम पुत्र कैप्टेन देवरत्न आर्य हुए हैं जो आर्यजगत् में अत्यन्त यशस्वी व सम्मानित रहे हैं। कैप्टेन देवरत्न आर्य जी ने अपने जीवन में आर्यसमाज के प्रचार प्रसार में उल्लेखनीय योगदान किया। वह सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधी सभा के प्रधान भी रहे। आचार्य भद्रसेन जी ने स्वाध्याय के लिए एक प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘प्रभु भक्त दयानन्द तथा उनके आध्यात्मिक उपदेश” लिखी। इसका एक अध्याय सत्संग-कुसंग पर है। इसी के आधार पर हम सत्संग व कुसंग विषयक कुछ प्रसंग व उपदेश पाठकों के लाभार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘योग एवं स्वास्थ्य’ नाम से योग पर भी आचार्य भद्रसेन जी का एक बहुत महत्वपूर्ण ग्रन्थ है तथा अन्य कुछ ग्रन्थ भी उन्हें रचे व प्रकाशित कराये हैं।

आचार्य भद्रसेन जी लिखते हैं कि गृहस्थियों को चाहिये कि वह सत्कारपूर्वक दूरस्थ उत्तम विद्वान अतिथि महानुभावों को सुविधाजनक वाहनों, रथ आदि सवारियों पर बैठा कर उपदेश के लिए अपने निवासों पर लावें और अन्नादि वा स्वादिष्ट भोजन आदि से उनका स्वागत सत्कार करें। (आधार ऋग्वेद भाष्य 5/1/1)

बादल स्वयं छिन्न-भिन्न होकर भी दूसरों का सदा उपकार ही करते हैं। उसी प्रकार से सच्चे विद्वान् दूसरों के अपकार करने से छिन्न-भिन्न होकर भी उनका सदा उपकार ही करते हैं।

जो लोग उस परमात्मा और आप्त विद्वानजनों को छोड़कर दुष्ट मनुष्यों का संग करते हैं, वे हमेशा दुःखी ही रहते हैं। (आधार ऋग्वेद भाष्य 6/29/8)

जो जन अपवित्र आहार-विहार करनेवाले, विषय-लम्पट, दूसरों की चुगली करनेवाले और असत्पुरुषों का संग करनेवाले हैं, उनको कभी भी विद्या प्राप्त नहीं होती और जो पवित्र आहार-विहार वाले, जितेन्द्रिय, यथार्थ-वक्ता, सत्पुरुषों का संग करनेवाले और पुरुषार्थ-परायण हैं, उनको सब प्रकार की विद्या प्राप्त होती है। ऐसा अवश्य निश्चय जानों। (आधार ऋग्वेद भाष्य 6/28/41)

कभी नास्तिक, लम्पट, विश्वासघाती, मिथ्यावादी, स्वार्थी कपटी, छली आदि दुष्ट मनुष्यों का संग न करंे और जो सत्यवादी, परोपकार-प्रिय आप्त जन हैं, उनका सदा संग करें। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास 10)

परमेश्वर और परमेश्वर के तुल्य धार्मिक विद्वानों के बिना संसार में कोई सब पदार्थों और सब प्रकार के सुखों का देनेवाला और कोई नहीं है। (आधार ऋग्वेद भाष्य 5/20/2)

गृहस्थ स्त्री-पुरुष कार्यकत्र्ता सद्धर्मी, लोकप्रिय, परोपकारी सज्जन, विद्वान् व त्यागी पक्षपातरहित संन्यासी जो सदा विद्या की वृद्धि और सब के कल्याणार्थ वर्तनेवाले हों, उनका नमस्कार, आसन, अन्न, जल, वस्त्र, पात्र, धन आदि के दान से उत्तम प्रकार से यथासामथ्र्य अवश्य सत्कार करें। (सत्यार्थ प्रकाश)

विद्वानों के संग और सेवा से क्या-क्या प्राप्त होता है इसका उल्लेख महर्षि दयानन्द जी ने ऋग्वेद भाष्य के 6/2/2 मन्त्र में किया है। वह लिखते हैं कि जो मनुष्य विद्वानों की सेवा से शुभ गुण, कर्म, स्वभावों को प्रापत करते हैं, वे वृद्धजनों को (अपनी सेवा द्वारा) सुख पहुंचानेवाले दीघार्यु और सुन्दर गृहस्थवाले बनकर शरीर और आत्मा से सदा बलवान् और पुष्ट हो जाते हैं। (ये मनुष्या विद्वत्सेवया शुभ, गुण, कर्म, स्वभावान् प्राप्नुवन्ति ते वृद्धरक्षा चिरंजीविनः सुन्दर गृहाश्च भूत्वा शरीरात्मभ्यां पुष्टा जायन्ते।)।

ऋग्वेद मंत्र 7/15/2 के भाष्य में कहा गया है कि संन्यासी महात्मा हमेशा सर्वत्र भ्रमण करता रहे और गृहस्थ इन्हें (अपने गृह पर बुलाकर) इनका सदैव सत्कार करे तथा इनके सदुपदेशों को ग्रहण करें।

सत्यप्रिय मनुष्यों को सदैव (वेद के) विद्वानों का सत्कार करना चाहिये। जो सत्य, विद्या और धर्म के प्रकाश करनेवाले, सकल वेदों के ज्ञाता, विद्वान, अध्यापक और उपदेशक जगत् में मनुष्यादिकों को अपने सदुपदेशों द्वारा सब प्रकार से उन्नत करते हैं, वे ही सब प्रकार से सब के द्वारा सत्कार करने योग्य हैं। यजुर्वेद मन्त्र 3/42 में विद्वानों से प्रीति तथा उनका संग करने की शिक्षा देते हुए कहा गया है कि गृहस्थों को सब धार्मिक अतिथि लोगों के वा अतिथि लोगों को गृहस्थों के साथ अत्यन्त प्रीति रखनी चाहिए, किन्तु दुष्टों के साथ नहीं। अतिथि विद्वानों के संग से परस्पर वार्तालाप कर विद्या की उन्नति करनी चाहिए। जो परोपकार करनेवाले विद्वान, अतिथि लोग हैं, उनकी सेवा गृहस्थों को निरन्तर करनी चाहिए।

इन पंक्तियों को लिखते हुए हमें एक प्रेरणादायक घटना स्मरण हो आयी है। आर्यसमाज के एक प्रसिद्ध संन्यासी, महात्मा व अनेक गुरुकुलों के संचालक पिछले दिनों देहरादून आये हुए थे। उन्हें पता चला कि एक आर्यविद्वान की धर्मपत्नी किसी अस्पताल में उपचारार्थ भर्ती हैं। उनके शिष्य अस्पताल पहुंचें और रोग की स्थिति आदि का पता किया और कहा कि धन की चिन्ता न करें। कुछ सहस्र रूपये भी हमारी उपस्थिति में उन्होंने प्रदान किये। कुछ कारणों से अस्पताल में उचित चिकित्सा न होने के कारण एक अन्य प्राइवेट नर्सिंग होम में ले जाकर उनका आपरेशन कराया गया। वहां अगले दिन स्वामीजी पहुंचे और उनका हाल पूछकर उन्हें चिकित्सा सहायतार्थ बिना मांगे ही कुछ सहस्र रूपये देवीजी के हाथ में अपने आशीर्वाद सहित प्रदान किये। इससे लगभग 15 वर्ष पूर्व भी एक बार उन्होंने कैन्सर से पीड़ित हमारे एक आर्य विद्वान मित्र के परिवार को दिल्ली के पंत चिकित्सालय में पहुंचकर एक लाख रूपयों की धनराशि प्रदान करते हुए उनकी धर्मपत्नी को उनकी चिकित्सा किसी अच्छे चिकित्सक वा चिकित्सालय में कराने को कहा था और आश्वासन दिया था कि उनसे जो हो सकेगा, वह और सहायता करेंगे। हमने इन आर्य विद्वान संन्यासी में वेद वर्णित सभी गुण प्रत्यक्ष देखें और अनुभव किये हैं। वस्तुतः ऐसे विद्वान महात्मा और संन्यासी ही सत्संग, सेवा व सत्कार के पात्र होते हैं। हमारा सौभाग्य है कि हमें इन स्वामीजी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

यह भी निवेदन है कि आजकल देशभर में कुछ कथावाचक बड़ी बड़ी जनसभायें करते हैं। इनमें सत्य के साथ बड़ी मात्रा में असत्य भी परोसा जाता है जिससे समाज में अन्धविश्वास बढ़ रहे हैं। हम इन्हें सत्संग नहीं मानते और वस्तुतः यह सत्संग हैं भी नहीं। जो विचार वेदों से प्रमाणित हैं, वही सत्संग की कोटि में आते हैं अन्यथा वह कुसंग ही होते हैं। इन जनसभाओं के विपरीत आर्यसमाज व इसकी संस्थाओं गुरुकुल आदि के अधिवेशनों व समारोहों में होने वाले यज्ञ एवं धार्मिक प्रवचनों को सत्संग कहा जा सकता है क्योंकि यहां सभी बातें वेदों पर आधारित वा वेदों से पुष्ट कही जाती है। हम आशा करते हैं कि सत्संग विषय में जो संक्षिप्त विचार व कथन लेख में प्रस्तुत किये हैं, उनसे पाठकों को लाभ मिलेगा।

-मनमोहन कुमार आर्य
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