अमर बलिदानी राजा देवीसिंह गोदर

अमर बलिदानी राजा देवीसिंह गोदर
(जिनका बलिदान प्रथम 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में हुआ)
डा. अशोक आर्य

राजा देवीसिंह जी का जन्म मथुरा के राया तहसील के गांव अचरु में गोदर गौत्र (जिसे आज गोदारा के नाम से जाना जाता है) के हिंदू जाट परिवार में हुआ। धर्म के प्रति आप का अत्यधिक विश्वास था| इसके साथ ही साथ आप एक अच्छे पहलवान् भी थे। पहलवान् होने से तो आपका झुकाव क्षत्रियत्व की और होना चाहिए था किन्तु आपमें धार्मिक भावना अधिक बलवती थी, इस कारण आपने राज्य सत्ता के सुखों को त्याग कर संन्यास ले लिया और साधू बनकर घूमने तथा सदुपदेश देने लगे|
एक युवक के ताना देने क परिणाम:-
भारत जब अंग्रेजी दासता में जकड़ा हुआ था तथा देश पर अंग्रेज़ी अत्याचारों से भारतीय जूझ रहे थे| इन्हीं दिनों की बात है, जब आप एक गाँव में पहलवानी कर रहे थे तो आपके समकक्ष कोई अन्य पहलवान् न होने से कोई पहलवान् टिक नहीं पा रहा था| अत: आपकी विजय हुई| विजेता पहलवान् देवीसिह जी ने विजय की प्रसन्नता में जब झूमना आरम्भ किया तो एक युवक ने उन पर ताना कसते हुए कहा कि यहां एक छोटी सी जीत पर इतनी ख़ुशी मना रहे हो यदि दम है तो अंग्रेजों के सामने खड़े होकर देश की आजादी के लिए लड़ो| आप जानते हैं कि आपके पूर्वजो ने सदा से इस क्षेत्र की रक्षा अपने प्राणों की आहुति देकर की है। क्षत्रियों का धर्म भी यही उपदेश करता है|
राजा साहब तो बाल्यकाल से ही देशभक्त और धर्म परायण थे| अत: उस युवक की कही गई साधारण सी यह बात सीधे उनके दिल में जा कर चुभ गई| पहलवान् राजा साहिब ने प्रत्युत्तर में कहा कि बात तो तुम्हारी शतप्रतिशात सही है| यहां ताकत दिखाने का कोई लाभ नहीं, यह तो शक्ति का नाश करना ही तो है| मुझे अंग्रेज से लड़कर देश को आजाद कवाना चाहिए किन्तु अंग्रेजों जैसे शक्तिशाली शत्रु से लड़ने के लिए एक उत्तम सेना भी तो चाहिये, मैं वह सेना कहां से लाऊं। वहां पर उपस्थित उनके एक साथी ने तत्काल सुझाव दिया कि आप अपनी स्वयं की एक अच्छी सेना खड़ी करें। इस पर राजा साहब सहमत हो गए। पूरे क्षेत्र में राजा देवीसिंह जी का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता था|लोग राजा साहिब के प्रति अत्यधिक श्रद्धा रखते थे तथा उनका बहुत आदर करते थे।
क्रान्ति की ज्वाला
इस घटना के अनंतर राजा देवीसिंह जी के जीवन का जीवन ही परिवर्तित हो गया, एक उद्देश्य निर्धारित हो गया और उन्होंने सेना के एकत्रीकरण के लिए संलग्न गांवों के भ्रमण आरम्भ कर दिए| इस भ्रमण के मध्य जहाँ वह देश की स्वाधीनता के लिए योद्धाओं का साथ पाने के लिए आह्वान् कर रहे थे वहां जन जन में भी स्वाधीनता के महत्व को समझाते हुए उन्हें अपने आन्दोलन के साथ जोड़ रहे थे| स्वराज्य का भीष्ण शंखनाद करते ही उन्होंने क्षेत्र के गावों यथा राया, हाथरस, मुरसान, सादाबाद आदि समेत सम्पूर्ण कन्हैया की नगरी मथुरा, बृज क्षेत्र में क्रांति की अलख जगा दी। उस तेजस्वी नेता ने तेजपूर्ण भाषणों का ऐसा तांता बांधा कि युवाओं के खून में उबाल आने लगा और उनके साथ जुड़कर देश के लिए मर मिटने की शपथ लेकर पंक्तिबद्ध होने लगे। अत: उन्हें एक देशभक्त तथा धार्मिक सेना खड़ी करने में कुछ भी परेशानी नहीं आई। इस देशभक्त सेना ने राजा साहिब के नेत्रत्व में किसान की आजादी, अपना राज, तथा भारत को दासता से मुक्त कराने का दृढ संकल्प लिया।
कोई भी कार्य करना हो तो सब से पूर्व उसमें व्यय होने वाले धन की आवश्यकता होती है| इस आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए उन्होंने कुछ तो चंदा एकत्र किया तथा कुछ अंग्रेजों के धन को लूटकर तलवारों और बंदूकों की व्यवस्था की| अब जब धन भी आ गया और शस्त्र भी मिल गए तो इन्हें चलाने के लिए भी प्रशिक्षण की आवश्यकता थी| इन्हें शीघ्र ही शास्त्रों क प्रशिक्षण देने के लिए एक ऐसा प्रशिक्षक मिला गया, जो एक पदमुक्त सैनिक अधिकारी था| इस अधिकारी ने अपनी सेवाओं के माध्यम से सब वीरों को शस्त्र चलाने के लिए प्रशिक्षण देना आरम्भ किया और कुछ ही दिनों में युवकों को शास्त्रात्रों में निपुण भी कर दिया| बस फिर क्या था, देशभक्त प्रतीक्षा तो किया नहीं करते| देश को अपनी सेवायें देने के लिए उन्हें अवसर भी मिला गया| 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम अभी आरम्भ ही हुआ था, राजा साहिब अपनी इस नवनिर्मित सेना के साथ इस क्रान्ति के सहभागी बन अंग्रेज के विरोध में आ खड़े हुए|जब इस सबकी सूचना अंग्रेजों को मिली तो वह बौखला गए। राजा साहिब को क्रान्ति से अलग करने के लिए उन्होंने राजा साहब को लालच देते हुए ब्रिटिश सेना में आने का निमंत्रण दिया किन्तु राजा देवीसिंह ने बड़ी वीरता से अंग्रेज को यह उत्तर दिया कि अपने देश के दुश्मनों के साथ मिलकर अपने ही देशवासियों के विरोध में वह कभी भी खड़े नहीं हो सकते|
तत्पशचात् हरियाणा के नगर फरीदाबाद के निकटवर्ती सथित नगर बल्लभगढ के राजा नाहर सिंह ने उनकी भरपुर सहायता करते हुए, उन्होंने दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह जफर के पास जाकर राजा देवीसिंह जी की अनुशंसा करके उनके राज को मान्यता देने के लिए अनुरोध किया|बहादुरशाह जफर को उस समय क्रान्तिकारियो की आवस्यकता तो थी ही इसके साथ ही उनके सहायक के रूप में एक नाहरसिंह ही तो थे, जिनके कारण वह दिल्ली को अब तक अंग्रेजों से बचाये हुए थे। इसलिए उन्होंने इस अनुशंसा को तत्काल स्वीकार करते हुए राजा देवीसिंह जी के राज्य को अपनी और से मान्यता दे दी। इस प्रकार राजा देवीसिंह जी का राज तिलक हुआ और वह एक मान्यता प्राप्त श्रेणी के विधिवत् राजा बने|
राजा के रूप में देवीसिह जी ने अब अंग्रेज की सब व्यवस्थाओं को तहस नहस करने के लिए अंग्रेज संस्थाओं पर आक्रमण करना तथा उन्हें लूटना आरम्भ कर दिया| इस प्रकार ही मार्च सन् 1857 ईस्वी में एक बार फिर राजा देवीसिंह जी ने राया थाने पर आक्रमण कर दिया तथा वहां का सब कुछ नष्ट भ्रष्ट कर दिया। सात दिन तक थाने को घेरे रखा। जेल पर आक्रमण करके सब सरकारी दफ्तरों, बिल्डिंगों,पुलिस चौकियों आदि को जला कर राख कर दिया गया। परिणाम स्वरूप उस क्षेत्र के अंग्रेज कलेक्टर थोर्नबिल वहां का सब कुछ नष्ट होता वहीँ छोड़ वेष बदलकर वहां से भाग खड़ा हुआ। उसके भागने में उसके वफादार दिलावरख़ान और सेठ जमना प्रसाद ने उसकी सहायता की। इसके प्रतिफल स्वरूप दोनों को ही अंग्रेजी सरकार से बड़ा भूभाग तथा अन्य पुरस्कार मिला।
इस प्रकार राजा देवीसिह जी के प्रयास से राया अंग्रेज के चंगुल से निकल कर स्वाधीन हो गया| जिन बही खातों व अन्य माध्यमों से अंग्रेज लोग भारतीयों को लूट रहे थे, वह सब राजा साहिब ने अपने कब्जे में लेने के अनंतर जला दिए| यह सब व्यवस्था करने के अनंतर उन्होंने नगर के उन व्यापारियों को धमकाया, जो अंगेज का समर्थन किया करते थे| उन्हें कहा गया कि या तो देश सेवा के कार्यों में उनका साथ दें अन्यथा दंड के लिए तैयार रहें। जो व्यापारी नहीं माने उनकी दुकान से सामान लूट लिया गया तथा उनके बही खाते जला दिए गए क्योंकि वे अंग्रेजों के साथ रहकर गरीबों से हद से ज्यादा सूदखोरी करते थे। पूरे मथुरा में राजा देवीसिंह की जय के नारे गूंजने लगे, उन्हें गरीबों का राजा कहते हुए सदैव अजेय राजा के रूप में जनता ने उन्हें प्रस्तुत किया|
राजा साहिब को अपना थाना चलाने के इए स्थान की आवश्यकता थी| उन्होंने एक सरकारी स्कूल के भवन को इस हेतू लिया और थाना आरम्भ कर दिया तथा अपनी सरकार पूर्णतः आधुनिक पद्धति से बनाई। उन्होंने कमिशनर, अदालत, पुलिस सुप्रिटेंडेन्ट आदि पद बना कर ईमानदार तथा देशभक्त व्यक्तियों को इन पदों पर नियुक्त किया| राजा साहिब प्रतिदिन यहाँ आकर जनता की समस्याओं को सुनते और उनका निराकरण करते| अब उन्होंने राया के किले पर भी अधिकार कर लिया। उनका यह नियम था कि प्रतिदिन जनता के बीच रहते हुए उनकी समस्याओं को अपनी आँखों से देखते और उनका समाधान भी करते थे।
राजा साहिब सब में देशभक्ति की भावानाएं जगाते रहते थे| इस हेतु वे देशभक्ति को जगाते हुए पूरे क्षेत्र में घूमते थे। उनके क्षेत्र में अंग्रेजों के प्रवेश पर रोक थी। राजा साहिब ने अनेक बार क्रांतिकारियों की सहायता करते हुए उनके साथ मिलकर अनेक अंग्रेजों को लूटा व आम लोगो की सहायता की।
बलिदान
राजा साहब ने निरंतर एक वर्ष तक अंग्रेज के नाक में दम किये रखा| किसी भी क्षण अंग्रेज को सुख चैन से बैठने का अवसर तक न दिया| अवस्था यहाँ तक आ गई कि अंग्रेज सरकार की चूलें तक हिलने लगीं|अंग्रेज अधिकारी तो राजा साहिब का नाम तक ही सुनकर थर थर कांपने लगते थे। एक अकेला वीर इतनी विशाल अंग्रेज सेना का कब तक सामना कर सकता था, हुआ भी कुछ ऐसा ही| अंग्रेजों ने कोटा से अपनी सेना को बुलाया| सेनाधिकारी मि. बिल ने अंग्रेज सेना के अधिकारी डेनिश के नेत्रत्व में सेना की एक बड़ी टुकड़ी की सहायता से आक्रमण किया, बड़ी सेना होते हुए भी धोखा देने में चतुर अंग्रेज ने यहाँ भी धोखे से ही काम लिया और धोखे से राजा साहिब को बंदी बना लिया। दिनांक 15 जून सन् 1858 को राया में ही उन्हें, उनके साथी श्री राम गोदारा तथा उनके अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ फांसी दे दी गई| अंग्रेजों ने फांसी देने से पूर्व उन्हें झुकने के लिए बोला किन्तु राजा साहिब ने कड़कते स्वर में निर्भय होकर कहा कि मैं मृत्यु के भय से अपने देश के शत्रुओं के आगे नहीं झुकूंगा।
इस प्रकार भारत माता का एक सच्चे सपूत, देशभक्त साधु ने देश पर संकट आने पर, संन्यास धर्म से ऊपर उठते हुए, अपनी तलवार पुनः उठाकर क्षत्रिय धर्म का पालन किया तथा देश सेवा करते हुए हंसते हंसते फांसी पर झूलकर देश के लिए बलिदान हो गया ।

डा. अशोक आर्य
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सर्वोत्तम धर्मग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश’

सर्वोत्तम धर्मग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश’
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🌷परमात्मा ने इस सृष्टि और मनुष्य आदि प्राणियों को बनाया है। परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति का अखिल विश्व में स्वतन्त्र अस्तित्व है। यह तीनों सत्तायें मौलिक, अनादि, नित्य, अनुत्पन्न, अविनाशी गुणों वाली हैं। परमात्मा ने यह सृष्टि जीवों के कर्मों के सुख व दुःख रूपी फल प्रदान करने के लिये बनाई है। मनुष्य योनि वह योनि है जिसमें वह जीवात्मा उत्पन्न किये गये हैं जिन्होंने पूर्व जन्मों में आधे से अधिक शुभ व पुण्य कर्म किये हों। जिसके शुभ, पुण्य या अच्छे कर्मों का प्रतिशत 50 से जितना अधिक होता है, उन्हें इस मनुष्य जीवन में उतने ही अधिक सुख, ज्ञान व साधन आदि प्राप्त होते हैं। अन्य जीवात्माओं, जिनके अशुभ कर्मों का अनुपात शुभ कर्मों से अधिक होता हैं, उन्हें मनुष्येतर नीच योनियां प्राप्त होती हैं जहां वह दुःखों से मुक्ति के लिये मनुष्यों की तरह सन्ध्योपासना, यज्ञ, परोपकार, दान आदि शुभ नहीं कर सकते। मनुष्य का जीवन मिल जाने पर इसे समाजोपयोगी व देशोपयोगी बनाने के लिये ज्ञान प्राप्ति तथा ज्ञानानुरूप पुरुषार्थमय जीवन व्यतीत करने की आवश्यकता होती है। ज्ञान की प्राप्ति मनुष्यों को अपने माता-पिता, आचार्यों, पुस्तकों का अध्ययन, वेद एवं ऋषियों के ग्रन्थों के स्वाध्याय के द्वारा होती है।

वर्तमान में देश देशान्तर में सत्य विद्याओं के ग्रन्थों की उपलब्धि न होने और भोले भाले मनुष्यों के अविद्यायुक्त मिथ्या मतों व उनके ग्रन्थों सत्यासत्य मिश्रित बातों में फंसे होने से सत्य ग्रन्थों के अध्ययन की अतीव आवश्यकता है। सत्य ग्रन्थों की परीक्षा करने के बाद पूर्ण प्रमाणिक ग्रन्थ ईश्वर से प्राप्त वेद ज्ञान की चार संहितायें सिद्ध होती हैं। चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं। वेद ज्ञान की इन संहिताओं समस्त ईश्वर प्रदत्त ज्ञान सम्मिलित है। सृष्टि की आदि में परमात्मा ने चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा के माध्यम से अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न सभी मनुष्यों को यही वेद ज्ञान प्रदान किया था। इससे वेदाध्ययन की परम्परा आरम्भ होकर ऋषि जैमिनी, ऋषि दयानन्द और उनके अनुयायियों तक चली आई है। वेदों को समझाने व इनका सरलीकरण करने के लिये समय-समय पर अनेक ऋषियों ने व्याकरण ग्रन्थों सहित अनेक विषयों के शास्त्र ग्रन्थों का प्रणयन किया। वर्तमान में दर्शन, उपनिषदादि ग्रन्थ परा विद्या के प्रमुख ग्रन्थों में आते हैं। इसके अतिरिक्त व्याकरण सहित आयुर्वेद, ज्योतिष, कल्प व शिल्प आदि अपरा विद्याओं के ग्रन्थों का अध्ययन कर मनुष्य अपने जीवन को दुःखों से मुक्त कर मरणोपरान्त जन्म मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त कर ईश्वर के सान्निध्य से उसके परमानन्द को भोग सकते हैं।

जन्म मरण से मुक्ति सहित ईश्वर के परमानन्द की प्राप्ति के लिये मनुष्यों को सत्य व धर्म का आचरण करना होता है। इसके ज्ञान के लिये वेदों के बाद सबसे अधिक ज्ञानयुक्त ग्रन्थ ‘‘सत्यार्थ-प्रकाश” है। मनुष्य जीवन के लिये उपयोगी सभी विषयों व उनके सत्य अर्थों का विधान इस ग्रन्थ से प्राप्त होता है। इस ग्रन्थ के समान महत्चवपूर्ण व उपयोगी अन्य कोई ग्रन्थ संसार में नहीं है। इस ग्रन्थ से मनुष्यों के कर्तव्यों के ज्ञान सहित उनके आचरण की प्रेरणा प्राप्त होती है। अकर्तव्यों व अशुभ कर्मों से होने वाली हानियों के ज्ञान के साथ उनसे दूर रहने की प्रेरणा भी यह ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश करता है।

यदि यह ग्रन्थ देश के सभी मनुष्यों तक पहुंच जाये और स्कूलों आदि के द्वारा इसका अध्ययन कराया जाये तो मनुष्य अविद्याओं व मिथ्याचरणों में विचरण करने और अपनी आध्यात्मिक एवं शारीरिक हानि होने से बच सकता है। इसके प्रचार से मिथ्या मत-मतान्तरों का हानिकारक प्रभाव भी दूर हो सकता है और समस्त विश्व के सभी मनुष्य सत्य ज्ञान के अनुसरण कर अपना व दूसरों का उपकार कर श्रेय मार्ग के पथिक बन कर ईश्वर की कृपा के पात्र बन सकते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति सहित संसार से अविद्या का नाश और विद्या का प्रसार करने के लिये सच्चे ईश्वर भक्त ऋषि दयानन्द ने इस ग्रन्थ का प्रणयन किया है। यह ग्रन्थ ज्ञान का सूर्य है जबकि इसके सम्मुख सभी मत-मतान्तरों की पुस्तकें अज्ञान के तिमिर से युक्त हैं। यहीं कारण हैं कि अनेक प्रमुख मतों के विद्वानों ने इसका अध्ययन करने व इसको समझने के बाद सत्य वैदिक मत का अनुयायी बन कर इसके प्रचार व प्रसार को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया।
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वृत्ति सारुप्यता योग मार्ग और भोग मार्ग

वृत्ति सारुप्यता
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वैदिक विद्वान श्री अवधेश प्रसाद पांडेय जीने on line Vebinar में कल योग विषयक चर्चा करते हुए कहा था कि –

मनुष्यमात्र का सर्वांगी उत्कर्ष योग रूपी प्रबल साधन से प्राप्त होता है । समस्त दुखों से छूटकर नित्य सुख की प्राप्ति करनी हो तो योगशास्त्र का आश्रय लेना पड़ेगा और तदनुसार अपना आंतर – बाह्य आचरण करना पड़ेगा ।

योग शास्त्र के रचयिता पातंजल ऋषि ने युज समाधौ योग शब्द का अर्थ समाधि कहा है अर्थात् दूसरे सूत्र अनुसार
योग: चित्त वृत्ति निरोध: चित्त की वृत्तियों को रोकना योग है । योग को समाधि है अर्थात् अपनी वृत्तियों को रोककर हृदय स्थित परमात्मा में निवेशित करना योग है । चित्त की उत्कृष्ट भूमि में समाधि प्राप्त होती है । इसको निरुद्ध अवस्था कहते है । इस अवस्था में असंप्रज्ञात समाधि लगती है और ईश्वर साक्षात्कार होता है ।

तीसरे सूत्र में योग का फल दर्शाया गया है –

तदा द्रष्टु: स्वरूपे अवस्थानम् = योगी की उच्च स्तरीय निरुद्ध अवस्था में वह आत्मस्थित परमात्मा का प्रकाशन कर लेता है । चित्त की इस परिपक्व अवस्था में परमात्मा खुद योगी पर विशेष कृपा बरसाते हुए अपना ज्ञान चक्षु प्रदान करके अपना प्रत्यक्ष स्वरूप प्रगट कर देता है । इस अवस्था में योगी के कलेशो की नितान्त परिसमाप्ति हो जाती है । *जैसी स्थिति कैवल्य की होती है वैसी स्थिति इस निरुद्ध अवस्था में योगी प्राप्त कर लेता है । अब वह स्पष्ट रूप से जान लेता है कि मैंने आवागमन के सारे बंधन तोड़ दिए है, सारे अविद्या के संस्कार दग्धबिज कर डाले है, अतः मेरा जन्म निश्चित रूप से आगे नहीं होगा और शरीर छुटने के बाद मै मोक्ष प्राप्त करूंगा ।

चौथा सूत्र – वृत्तिसारुप्यमितरत्र की विस्तार से व्याख्या करते हुए श्रीमान पांडेय जीने कहा था कि –

यदि योगी = साधक मन की एकाग्र अथवा निरुद्ध अवस्था प्राप्त नहीं करता तो वह व्युत्थान दशा में होता है । इसको पतित अवस्था = सांसारिक अवस्था भी कहते है । इस अवस्था में क्लेश, बंधन, दुःख, पीड़ा, परतंत्रता, जन्म मरण आदि बने रहेंगे । इस व्युत्थान दशा को “योग” नहीं कह सकते । क्षिप्त, विक्षिप्त अथवा मूढ़ अवस्था में रहनेवाले मनुष्य को साधन करना ही पड़ेगा । उसे क्रम से संघर्ष करते हुए निरंतर आगे बढ़ना होगा । इतर अवस्था में साधक विषय – वस्तु – घटना का ठीक विवेक नहीं कर पाता । अपने मन की वृत्ति को वह अपने आत्मा में आरोपित कर देता है । जब मनुष्य सांसारिक विषय वासनोआे तथा संबंधों में चिपकता है, तब उसे खाना – पीना – घूमना – सोना – मोज मस्ती करना अच्छा लगता है । परिणामत: वह निश्चित पतन की गर्ता में जायेगा ही, ऐसा कह सकते है ।
दर्शित विषयो को अपना स्वरूप मान लेना बहुत बड़ी अविद्या है । मन के स्क्रीन पर आते हुए दृश्य को अपना स्वरूप मान लेना अविवेक है, बेईमानी है, जूठा दर्शन है ।

हम जीवात्मा तात्विक रूप से स्वतंत्र है, अणु स्वरूप है, चेतन है, अनंता है, अपरिणामी है, निर्लेप है, शुद्ध है, बुद्ध है = जाननेवाले दृष्टा है, कर्ता है, सुख दुःख के भोक्ता है ।

मन एक परमात्मा प्रदत्त दिव्य अत्यंत शक्तिशाली साधन है । वह पंच भूतो से सृजित है । सत्व प्रधान आंतर – बाह्य द्विमुखी साधन है । मन का व्यापार है, वृत्तिओ का निरंतर उठाते रहना । हम आत्मा मन से पृथक चेतन सत्ता है । वृत्ति को उठानेवाले हम है, रोकनेवाले भी हम है । मन में वृत्तियों को संयमित करना हमारे हाथ में है । मन में उठाई गई वृत्ति को अथवा तो संसार में घटित घटना को अपना मान लेना महा मूर्खता है । महा अविवेक है ।

उदाहरण देखे –
घर जल गया, तो मै मर गया, मै लूट गया ऐसा मानना इतर अवस्था है, पतन अवस्था है, व्युत्थान अवस्था है । वृत्ति सारुप्यता रखना खतरनाक है । हमारे पास बहुत सारे उदाहरण है कि – एक परिवार में पति की मौत हुई, तो पत्नी ने मान लिया कि हाय.. हाय… मै मर गई । मै लूट गई, मेरा क्या होगा ? आधे घंटे में उसकी भी “हार्ट अटैक” से मौत हो गई । यह क्या है, वृत्तिसारुप्यता । अन्य में हुई घटना को अपने में आरोपित कर देना मूर्खता है । परमात्मा ने हमे अपना शरीर सुरक्षा के लिए, स्वस्थ रखने के लिए तथा महत्तम सुख – आनंद – ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए दिया है । अपनी नादानी से, मूर्खता से इस मूल्यवान शरीर को ऐसे कैसे फेंक सकते है ?

स्व. ज्ञानेश्वरजी आर्य को स्मरण करते हुए वैदिक विद्वान श्री अवधेश प्रसाद जीने कहा था कि
किसीकी मृत्यु हुई हो, उस काल में वे वानप्रस्थ साधक आश्रम, रोजड़ में हमे बताते थे ऐसी मृत्यु की घटना में किसीको भी बिल्कुल रोना नहीं है, दुःखी भी नहीं होना है । बाह्य घटना को अपने में आरोपित नहीं करना है । शांत, गंभीर, धर्यवान और संतुलित बने रहना है । इस घटना को दृष्टा भाव से देखना है ।

रोते वे है जो उस व्यक्ति या वस्तु के प्रति राग रखते है, मोह रखते है । रोना – पीटना अर्थात् अपनी मन की स्थिति को बिगाड़ना है, विचलित करना है । अपने प्रियतम के प्रति छोटी छोटी बातों में रूठ जाना, आंसू बहाना बिल्कुल गलत बात है । ऐसा तो संसारी भोगवादी व्यक्ति ही करते है । हमे तो प्रेम करना है, वह भी नि:स्वार्थ । हमे हर हालत में स्थिर बुद्धि से अपने कर्तव्य का निर्वहन करना है । रोग द्वेष मोह से ऊपर उठना है । संकट समय में साधक कभी रोते नहीं, गभराते नहि, वे धीर, गंभीर तथा दृष्टा बने रहते है, सम्यक बने रहते है । उस संकट का सामना करते है, स्थिर मन से, शांत मन से, जागृत मन से समस्या का समाधान निकालने का पूरी ईमानदारी से प्रयास करते है ।
योगी एवम् साधक गण एसी दुखद घटना कभी भी, कीसीके भी साथ हो सकती है, ऐसी मानसिक पूर्व तैयारी बनाएं रखते है । कभी भी मेरी मृत्यु हो सकती है.. अपने शरीर को वे अग्नि में भस्म होता हुआ सदा देखते है *भस्मान्तं शरीरम् । इस प्रकार वे स्थितप्रज्ञ, अविचल, एकसमान शांत बने रहते है । वे शरीर, संसार, मन, जीवात्मा तथा परमात्मा को पृथक पृथक देखते है । अतः शोक – मोह से ऊपर उठ जाते है । तत्वज्ञानी – यथार्थ दृष्टा वे बने रहते है ।

चाहे कितना भी बड़ा संकट या अत्यन्त विपरित स्थिति क्यों आ न जाए, हमे अपनी मन की स्थिति विचलित नहीं करनी है । दुनिया की कोई ताक़त हमे दुःखी नहीं कर सकती । हमे वे पीड़ा दे सकती है – कष्ट दे सकती है, किन्तु दुःखी नहीं कर सकती, जब तक हम न चाहे की “मै दुःखी हो जाऊं” ।

प्रवचन के अंतिम चरण में श्री अवधेश प्रसाद जीने जीवन के दो मार्ग है – योग मार्ग और भोग मार्ग इस पर विवेचना करते हुए कहा कि –
जीवन में हर पल हमे निर्णय लेना होता है कि हम किस मार्ग पर चले ? एक मार्ग है जो कल्याण का मार्ग है, जिसे उपनिषद ने “श्रेय मार्ग” भी कहा है वह “प्रभु का मार्ग” है । प्रारंभ में वह तपस्या करवाता है, संघर्ष करवाता है, किन्तु वह हमारे लिए उपकारक साबित होता है, वह मार्ग “पुण्यवाह” है, “अमृत का मार्ग” है । उसी पर हमे चलना है । भोग मार्ग संसार का मार्ग है । वहां पीड़ा, बंधन, दुःख और धोखा ही धोखा मिलेगा । हमे योग मार्ग पर प्रभु के मार्ग पर चलना है । अतः हम सभी परस्पर प्रेम करते हुए, विवेक बुद्धि बनाते हुए कर्तव्य परायण होकर ईश्वर आज्ञानुसार जीवन यापन करे और सबका मंगल हो, कल्याण हो ।

। इति ओम् शम् ।
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माता पिता की सेवा

माता पिता की सेवा

यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा पृथ्वी से भारी क्या है आकाश से भी ऊंचा कौन है युधिष्ठिर जी बोले माता पृथ्वी से भी भारी है और पिता आकाश से भी ऊंचा है
यह है माता-पिता का गौरव और महत्व माता सर्व तीर्थ मई है और पिता संपूर्ण देवताओं का स्वरूप है इतना ही नहीं मैं तो कहा करता हूं माता पिता को ईश्वर के जीवित जागृत प्रतिनिधि समझता हूं हमें जन्म देने वाले हमारा लालन-पालन और पोषण करने वाले माता पिता कि हमें हर प्रकार से सेवा करनी चाहिए।
आप चिंतन करके देखें तो अवश्य प्राचीन काल के समय में उमर लंबी होती थी क्योंकि उस समय लोग अपने माता-पिता को प्रतिदिन प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया करते थे आज का युवक तो माता-पिता को नमस्ते करने में भी लज्जा करते हैं संसार में अपना मान और सम्मान चाहते हैं यदि आपको यश और बल की इच्छा है तो अपने माता-पिता और वृद्धों की सेवा करो क्योंकि मनु महाराज ने कहां है कि जो व्यक्ति माता-पिता और वृद्धों को नमस्ते करते हैं उनकी सेवा करते हैं उनकी आयु विद्या यश और बल चार प्रकार की समृद्धि माता पिता की सेवा करने से होती है इसलिए बंधुओं हम सदा अपने माता पिता की सेवा करें श्रवण कुमार अपने माता पिता के सेवा करने से इतिहास में अमर हो गए
एक बार रामकृष्ण परमहंस के पास एक युवक आया और कहने लगा आप मुझे संन्यास की दीक्षा दे दे तो परमहंस जी ने पूछा आप घर में अकेले हैं तो कहने लगा नहीं मेरे पास एक बूढ़ी मां है तो परमहंस ने कहा बूढ़ी मां को अकेला असहाय छोड़कर आप सन्यास क्यों लेना चाहते हैं युवक ने कहा मोक्ष को प्राप्त करने के लिए परमहंस ने कहा मां को छोड़कर सन्यास लेने से आपको मोक्ष मिलने वाला नहीं है आप जाएं और अपनी मां की सेवा करें उसी से आपको मोक्ष मिलेगा सुख मिलेगा जीवन में उत्साह मिलेगा इसलिए जीवन में हमें सदा अपने माता पिता को समय देना चाहिए|

गोपाल पाण्डेय
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चंद्रशेखर आज़ाद

सन 1931 में चंद्रशेखर आज़ाद नाम का 26 वर्षीय *क्रांतिकारी इलाहाबाद के अल्फ़्रेड पार्क में चारो और से अंग्रेजी पुलिस से घिरा हुआ गोलियों की बौछार झेल रहा था और अपनी बंदूक से अकेला अंग्रेजी पुलिसवालों की लाशें गिरा रहा था।

अपनी बंदूक में खोल कर देखता है तो आखिरी गोली बचती है और आज़ाद जी की आंखों से अश्रु आ जाते हैं कुछ सोचकर ।

फिर अपने हाथ की मुठ्ठी में इस देश की पवित्र माटी को भरकर माथे से लगाकर आजाद जी, अश्रु भावना को शब्दों में पिरोकर क्या अंतिम वाक्य आता है उनके मुख से :

हे माँ, मेरी मातृभूमि, मुझे क्षमा करना जो इस जन्म में तेरी इतनी ही सेवा कर पाया।

और इस अंतिम वाक्य के साथ अंतिम गोली से अपने प्राण दे देते हैं क्योंकि प्रण लिया था आज़ाद जिये हैं, आज़ाद ही मरेंगे।

😭😭😭😭😭

जब इतना बड़ा क्रांतिकारी इस मातृभूमि के लिए प्राण देते हुए भी मातृभूमि से क्षमा मांग रहा है कि मैं तेरी बहुत कम सेवा कर पाया तो बाकी किसी को अहंकार किस बात का है।

यहां तो दिन के चार व्हाटसअप मैसेज इधर उधर करने पर ही अपने इस मातृभूमि के प्रति कर्तव्य को पूर्ण मान लेते हैं ।

सोचो, विचारों और शर्म करके प्रण लो , आजाद जी व उनके जैसे अन्य क्रन्तिकारियो के बलिदान से।

सहस्त्रो जन्म बलिदान करके भी मातृभूमि का ऋण नही उतरता और तुम निर्लज्ज भाव से सेवा का संतोष अनुभव करते हो।

उठो, जागो और जगाओ।
प्राप्त करो स्वराज।
ये भूमि ईश्वर ने आर्यों को दी है और हमें स्वराज लेना ही होगा।
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जीवन में गुरु का बडा महत्व है

जीवन में गुरु का बडा महत्व है परन्तु गुरु यदि आत्मा परमात्मा की सत्ता से इन्कार करे, यज्ञ योग व वेद की निन्दा करे, संयम सदाचार की शिक्षा न दे,कान में मंत्र फूके, किसी मनघडंत मंत्र की दीक्षा देकर उसको गुप्त रखने को कहे, अपने चरण धोकर उसे चरणामृत समझ कर पीने को कहे, जीव व प्रकृति को परमात्मा का अंश बताये, परमात्मा को साकार कहे व उसका अवतार माने, ओम् व गायत्री आदि वेद मंत्रो की महिमा न बताये ..तो समझ लेना वह सच्चा गुरु नही है। मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेद : ( शतपथ) अर्थात जब तीन वेदानुकूल उत्तम गुरु हों तब ही मनुष्य सही अर्थों में मनुष्य बनता है, सही अर्थों में ज्ञानवान, चरित्रवान, संकल्पपवान धार्मिक व ईश्वर भक्त बनता है । आज लाखों गुरुघंटाल लाखों चेले चेलियां मूंड कर अपने अपने मत सम्प्रदाय व आश्रम बना कर बैठे हैं । ये सब मायाजाल महाभारत युद्धोपरान्त गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के पतन का ही परिणाम है जो नित नये मत सम्प्रदाय व भगवान खडे हो रहे हैं । ऐसे भी मत हैं जो पांच मकार अर्थात मद्य मांस मीन मुद्रा मैथुन को अपनाने में मुक्ति मानते हैं, ऐसे भी मत हैं जो पांच ककार अर्थात केश कंघा कृपाण कच्छा और कडा धारण करने मेंं ही मुक्ति मानते हैं, ऐसे भी मत हैं जो देवी देवताओं को बलि देने व गंगा स्नान में मुक्ति मानते हैं, ऐसे भी मत हैं जो यीशू यहोवा, मुहम्मद, राम, कृष्ण, शिव, कबीर, नानक व अपने अपने गुरुओं को ही परमात्मा मान कर पूजने में मुक्ति मानते हैं, ऐसे भी मत हैं जो चुपचाप बैठे रहने को ही ध्यान समाधि व मुक्ति का मार्ग बताते हैं !! करोडों ऋषि मुनियों व वेद का तो एक ही उपदेश है- ईश्वर एक है, धर्म एक है, धर्म ग्रन्थ एक है, यज्ञ व योग ही सर्वोत्तम पूजा पद्धति है । जब तक विश्व में भिन्न भिन्न मत मतान्तरों का विरुद्धावाद समाप्त नहीं होगा मनुष्य का कल्याण नहीं होगा और न ही विश्व में एकता व शान्ति हो सकती है ।
– डा मुमुक्षु आर्य
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सन्तान के जीवन में माता-पिता का विशिष्ट एवं गौरवपूर्ण स्थान”

ओ३म्
“सन्तान के जीवन में माता-पिता का विशिष्ट एवं गौरवपूर्ण स्थान”
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मनुष्य के जीवन में पिता का महत्व निर्विवाद है। माता व पिता ही सब मनुष्यों के जन्मदाता होते हैं। पूर्वजन्म में मृतक आत्मा को मनुष्य योनि में जन्म युवा माता-पिताओं के द्वारा ही मिलता है। यह नियम परमात्मा ने बनाया है। यदि यह नियम न हो तो सृष्टिक्रम चल नहीं सकता। मनुष्य एक शिशु के रूप में जन्म लेता है, माता-पिता मिलकर उसका पालन-पोषण करते हैं व उसे उत्तम संस्कार देते हैं। उसका विवाह आदि भी सम्पन्न कराते हैं। वृद्धावस्था को प्राप्त होकर माता-पिता की मृत्यु हो जाती है। सभी माता-पिता अपनी-अपनी सन्तान के प्रति एक विशेष मोह पितृत्व व मातृत्व के बन्धन से बंधे हुए होते हैं। उनकी सन्तान कुरुप हो या स्वरूप, स्वस्थ हो या रोगी, आज्ञाकारी हो अथवा अवज्ञाकारी, कैसी भी क्यों न हो, माता-पिता का आशीर्वाद एवं शुभकामनायें अपनी सभी सन्तान पर सदैव समान रूप से होती हैं। यहां तक की माता-पिता जीवन भर अपनी जो पूंजी संचित करते हैं, उसका भी वह अकेले उपभोग नहीं करते अपितु अधिकांश उपभोग उनकी सन्तानें ही करती हैं। महाराज दशरथ का ऐतिहासिक प्रसंग सबने सुन रखा है। उनके पुत्र को 14 वर्ष के लिए वन जाना पड़ा था। इस क्लेश से व्यथित होकर उन्होंने कुछ ही दिनों में अपने प्राण त्याग दिये थे। आज ऐसे कुछ उदाहरण मिल जाते हैं जहां एक माता अपनी सन्तान की रक्षा के लिये अपने प्राण दे देती है। पिता एक ऐसा व्यक्ति होता है जो अपने पुत्र की शिक्षा में उन्नति, उसके द्वारा धन प्राप्ति तथा यश प्राप्ति आदि के कार्यों में सर्वाधिक प्रसन्न होता है। पिता के इन्हीं गुणों के कारण पिता को देवता कहा जाता है। देवता वह होता है जो देता है, लेता नहीं है। वायु हमें प्राण वायु देती है इसलिये देवता कहलाती है। जल हमारी पिपासा शान्त करने सहित अनेक प्रकार से उपयोगी होता है, इसलिये जल भी देवता होता है। इसी प्रकार पृथिवी, अग्नि, आकाश, माता, पिता, आचार्य, राजा, विद्वान अतिथि आदि भी हमें कुछ न कुछ देने से देवता कहे जाते हैं। हमें इन सबके प्रति कृतज्ञता व सम्मान का सद्भाव रखना चाहिये। ऐसा करने से हमारे जीवन में निरभिमानता का गुण उत्पन्न होता है। पाश्चात्य व कुछ अन्य जीवन पद्धतियों में यह भावना कुछ कम देखी जाती है। पाश्चात्य संस्कृति को भोगवादी और भारतीय वैदिक संस्कृति को त्याग व श्रेय प्रदान करने वाली संस्कृति कहा जाता है और वस्तुतः कई दृष्टि से यह उचित प्रतीत होता है।

पिता को पिता अपनी सन्तानों की रक्षा करने के कारण कहा जाता है। महर्षि यास्क के अनुसार सन्तानों का पालक, पोषक तथा रक्षक होने से जन्म देने वाले देवता को पिता कहा जाता है। महर्षि मनु ने कहा है कि दस उपाध्यायों से बढ़कर आचार्य, सौ आचार्यों से बढ़कर पिता और एक हजार पिताओं से बढ़कर माता गौरव में अधिक है अर्थात् बड़ी है। मनुस्मृति में कहा गया है ‘‘पिता मूर्तिः प्रजापते” अर्थात् पिता पालन करने से प्रजापति का मूर्तिरूप है। प्रजापति परमात्मा को कहते हैं। इस प्रकार महाराज मनु पिता को प्रजापति कह कर बहुत ऊंचा स्थान देते हैं। महाभारत के वनपर्व में यक्ष व युधिष्ठिर संवाद में यक्ष युधिष्ठिर से पूछते हैं ‘पृथिवी से भारी क्या है? आकाश से ऊंचा क्या है? वायु से भी तीव्र चलने वाला क्या है? और तृणों से भी असंख्य अर्थात असीम व विस्तृत एवं अनन्त क्या है? इसका उत्तर देते हुए युधिष्ठिर कहते हैं ‘माता गुरुतरा भूमेः पिता चोच्चतरं च खात्। मनः शीघ्रतरं वातच्चिन्ता बहुतरी तृणात्।।’ इसका अर्थ है कि माता पृथिवी से भारी है। पिता आकाश से भी ऊंचा है। मन वायु से भी अधिक तीव्रगामी है। चिन्ता तिनकों से भी अधिक विस्तृत एवं अनन्त है। यहां पिता को आकाश से भी ऊंचा बता कर पिता का गौरव गान किया गया है।

पिता के विषय में महाभारतकार कहते हैं कि पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है और पिता ही सबसे श्रेष्ठ तपस्या हैं। पिता के प्रसन्न हो जाने पर सारे देवता प्रसन्न हो जाते हैं। पद्मपुराण में माता व पिता दोनों के गौरव का उल्लेख कर कहा गया है कि माता सर्वतीर्थमयी (सारे तीर्थ माता में हैं) है और पिता सम्पूर्ण देवताओं का स्वरूप है (पिता में सारे देवता विद्यमान हैं)। अतएव प्रयत्नपूर्वक सब प्रकार से माता-पिता का आदर-सत्कार करना चाहिए। जो माता-पिता की प्रदशिणा करता है, उसके द्वारा सात द्वीपों से युक्त सम्पूर्ण पृथिवी की परिक्रमा हो जाती है। माता-पिता को प्रणाम करते समय जिसके हाथ, घुटने और मस्तक पृथिवी पर टिकते हैं, वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त होता है।

अथर्ववेद में बताया गया है कि जो जन्म देता है, जो भय से बचाता है और जो जीविका देता है- ये तीनों पितर वा पिता कहलाते हैं। चाणक्य नीति में भी पिता की महिमा का गान सुनने को मिलता है। वहां कहा गया है कि जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत आदि संस्कार करानेवाला, विद्या देनेवाला, अन्न देनेवाला तथा भय से बचाने वाला ये पांच पिता व पिता समान माने जाते हैं। पंचातयन पूजा में पिता को सत्कर्तव्य देव कहा गया है और उसकी माता के समान ही सेवा करने का उपदेश किया गया है। शतपथ ब्राह्मण का वचन है कि जब तीन उत्तम शिक्षक एक माता, दूसरा पिता तथा तीसरा आचार्य होते हैं तभी मनुष्य ज्ञानवान् होता है। ऋषि दयानन्द ने कहा है कि वह सन्तान बड़ा भाग्यवान् होता है जिसके माता और पिता धार्मिक विद्वान् हों।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन का एक उदाहरण पिता की भक्ति का ऐसा उदाहरण है जो विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता। इसे सुनकर ही मनुष्य का रोम-रोम पुलकित हो जाता है। जब राम चन्द्र जी का राज्याभिषेक का निर्णय हुआ तो रानी कैकेयी ने महाराज दशरथ के इस निर्णय का विरोध किया। वह महाराज दशरथ से रूठ गई और उनसे पूर्वकाल के देवासुर-संग्राम में राजा दशरथ द्वारा उन्हें दिये दो वर मांग लिये। उसने पहला वर्ष भरत को अयोध्या का राजा बनाने तथा दूसरा राम को चैदह वर्ष का वनवास देने का मांगा। इस पृष्ठभूमि में राम जब कैकेयी के कक्ष में महाराज दशरथ के दर्शन करने पहुंचे तो उनकी दयनीय दशा देख कर उनसे इसका कारण पूछा। जब राजा दशरथ कुछ बोल नहीं पा रहे थे तो राम ने माता कैकेयी को पिता की इच्छा बताने को कहते हुए कहा था कि मुझे लानत है कि आप मुझ पर सन्देह कर रही हैं कि मैं अपने पिता की इच्छा व वचनों को पूरा नहीं करूंगा। राम ने कहा था ‘मैं तो अपने पिता श्री दशरथ की आज्ञा से अग्नि में भी कूद सकता हूं। तीक्ष्ण हलाहल जहर खा सकता हूं और समुद्र में भी कूद सकता हूं। वे तो मेरे गुरु, पिता, राजा और शुभ हितैषी हैं।’ पिता को उन्होंने कहा था कि आपकी जो आज्ञा हो मुझे शीघ्र बतायें। मैं राम प्रतीज्ञा करता हूं कि उसे अवश्यमेव पूरा करूंगा। राम एक बात कहकर फिर उसके विपरीत दूसरी बात नहीं कहता अर्थात् वह अपने वचनों पर अटल रहता है। राम का यह कहना कि मैं पिता के संकेत मात्र करने पर जलती चिता वा अग्नि में कूद सकता हूं, हलाहल विष पी सकता हूं और समुद्र में भी कूद सकता हूं, यह सुन कर रोम रोम पुलकित हो जाता है। ऐसा वाक्य कहने से राम ने एक ऐसा आदर्श स्थापित किया है जिसकी आजकल विश्व में किसी पुत्र से अपेक्षा नहीं की जा सकती।

वैदिक धर्म एवं संस्कृति में पिता का गौरव पूर्ण स्थान है। माता का पिता से भी अधिक गौरव है। अतः देश व विश्व के सभी लोगों को अपने माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों को समझना चाहिये। इसके अनुरूप ही देश में कानून बनने चाहिये। जिस समाज में पुत्र व पुत्रियां माता-पिता को पृथिवी से भारी और आकाश से भी ऊंचा मानते हैं, वह संस्कृति, वह देश व वह धर्म महान व महानतम होता है और वह सन्तान वस्तुतः महान एवं पूजनीय होती है। हमें वैदिक धर्म एवं संस्कृति सहित वैदिक इतिहास ग्रन्थों रामायण एवं महाभारत का भी अध्ययन करना चाहिये। इससे हम एक अच्छे पुत्र व मानव बन सकेंगे। हम आशा करते हैं कि पाठक लेख को पसन्द करेंगे। इस लेख को तैयार करने में हमने आचार्य ब्र. नन्दकिशोर जी की पुस्तक ‘पितृ-गौरव’ से सहायता ली है। उनका हृदय से धन्यवाद करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
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लेखक अपरिचित है, लेख बहुत अच्छा है

लेखक अपरिचित है, लेख बहुत अच्छा है

कभी कभी सोचता हूँ कि यदि मैं आर्य समाज के सम्पर्क में नहीं आया होता l तब मैं भी एक पौराणिक हिन्दू ही होता l तब जीवन कितना आरामदायक होता l सब धर्म मुझे अच्छे लगते l मैं भी मोहम्मद साहब को शांति का देवता समझता, हर क़ब्र पर , हर मज़ार पर माथा टेकता , उन पर चादर चढ़ाता l गुरुवार को साईं बाबा के मंदिर में प्रसाद चढ़ाता।

सोमवार को भोले बाबा के मंदिर में जाकर शिवलिंग का दूध से अभिषेक करता , मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर उन्हें सिंदूर का चोला चढ़ाता l आठों उँगलियों में तरह तरह की अँगूठियाँ पहनता, शनिवार को शनि महाराज को तेल चढ़ाता , मूर्तियों को ही नहीं, हर बाबा को , गेरुए वस्त्रधारी को गुरु घण्टाल को भी भगवान मान कर पूजता l सब संप्रदायों की तारीफ़ करता , सब संप्रदाय अच्छे हैं, किसी की भी बुराई नहीं करनी चाहिये इस बात को दिन में दस बार दोहराता l तब सब लोग मेरी तारीफ़ करते l मुझे एक नेक और समझदार इंसान बताते हुए मेरे गुण गाते l

ईद से पहले मैं पूरे उत्साह से रोज़ा ए इफ़्तार का आयोजन करता, श्राद्ध के दिनो में ब्राह्मण और क़व्वों को दावत खिलाता, होली और शिवरात्रि पर भांग पीता तथा दिवाली पर जुआ खेलताl ज़िंदगी कितनी शुकून भरी होतीl शराबबंदी होने पर शिवरात्रि में कावड़ की मटकियों में शराब भरकर लाता और अपनी यात्रा की थकान उतारता। नवरात्रि में माता की भेंटे गाता, साईं संध्या का आयोजन करवाता l जहाँ भी भागवत की कथा या रास लीला होती वहीं भाग कर जाता और भजनों पर झूम झूम कर नाचता l

अजमेर में ख्वाजा की दरगाह पर चादर चढ़ाता और वैष्णो देवी पर छत्रl हर तरह के टोने टोटक़े , भूत पिशाच , ऊपरी हवा में विश्वास करता और मेहंदीपुर बालाजी और खाटु श्यामू जी के मंदिर में हाजरी लगाता l जगन्नाथ जी की रथ यात्रा में उनका रथ खींचता और इस्कोन के मंदिर में हरे रामा हरे कृष्णा की धुनों पर कूद- कूद कर नाचता, कितना मजा रहता l

इन बातों से जीवन कितना खुशी से भरा होता पर अफ़सोस! ऋषि दयानंद ने मुझसे यह सब कुछ छीन लिया l आज तो मैं अपने ही हिन्दू भाइयों की नज़र में एक झगड़ालू इंसान बन कर रह गया हूँ l

हे प्रभु मैंने आर्यसमाजी बनकर तेरे वेदों की रक्षा की है, तेरे वेदों के आधार पर बनाए ऋषियों के शास्त्रों की रक्षा की है। मैंने तेरे सच्चे सनातन धर्म की रक्षा की लो जगाए रखी है। प्रभु जी! तुमने वेद में बताया की हे मनुष्य! तेरा राष्ट्र ही तेरा इष्टदेव है। इसलिए मैंने भारत की आजादी में बड़े-बड़े बलिदान दिये, कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। मैं राष्ट्र का सजग प्रहरी बना रहा हूं। मैंने तुम्हारे बताए अनुसार धर्म और राष्ट्र की रक्षा की है। मैंने श्री राम और श्री कृष्ण के सच्चे शानदार जीवन का, उनके शौर्य और पराक्रम का गौरवमयी रूप में प्रचार किया है।

राष्ट्र पर जब जब भी बाढ़, भूकंप से इंसान पीड़ित हुआ, तो मैं सहायता सामग्री लेकर उनके पास दौड़ा-दौड़ा गया। अधिक से अधिक दुःखी लोगों के आंसुओं को पोंछा।
हे प्रभु! ऋषि दयानंद के माध्यम से बताए हुए तेरे ज्ञान को मैंने अपने जीवन में अति उत्तम पाया है, मैं देख पाया कि धर्म के नाम पर हिंदू कितना लापरवाह आडंबर युक्त और केवल भाग्य के भरोसे रह रह कर कितनी नीची दशा को जा रहा है। मैंने सनातन वैदिक धर्मी होकर जीवन जिया है इसलिए प्रभु तुम्हारे विधान अनुसार मेरा अगला जन्म मनुष्य रूप में तो अवश्य ही होना है, परंतु आपसे इतनी हार्दिक प्रार्थना जरूर है कि हे प्रभु! मुझे अगले जन्म में अपने सनातन वेद धर्मी आर्य समाजी परिवार में ही जन्म देना ताकि तब मैं बचपन से ही तेरे सच्चे धर्म और अपने राष्ट्र की सेवा कर सकूं।

आर्य शब्द के प्रमाण*

आर्य शब्द के प्रमाण*

सृष्टि की समकालीन पुस्तक ऋग्वेद में:-

*(१) *कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । ~ ऋ. ९/६३/५

अर्थ- सारे संसार को ‘आर्य’ बनाओ।

मनुस्मृति में:-

(२) मद्य मांसा पराधेषु गाम्या पौराः न लिप्तकाः।
आर्या ते च निमद्यन्ते सदार्यावर्त्त वासिनः।।

अर्थ- वे ग्राम व नगरवासी जो मद्य, मांस और अपराधों में लिप्त न हों तथा सदा से आर्यावर्त्त के निवासी हैं वे ‘आर्य’ कहे जाते हैं।

वाल्मीकि रामायण में-

(३) सर्वदा मिगतः सदिशः समुद्र इव सिन्धुभिः ।
आर्य सर्व समश्चैव व सदैवः प्रिय दर्शनः ।।-(बालकाण्ड)

अर्थ- जिस तरह नदियाँ समुद्र के पास जाती हैं उसी तरह जो सज्जनों के लिए सुलभ हैं वे ‘आर्य’ हैं जो सब पर समदृष्टि रखते हैं हमेशा प्रसन्नचित्त रहते हैं।

(५) महाभारत में:-

न वैर मुद्दीपयति प्रशान्त,न दर्पयासे हति नास्तिमेति।
न दुगेतोपीति करोव्य कार्य,तमार्य शीलं परमाहुरार्या।।(उद्योग पर्व)

अर्थ:- जो अकारण किसी से वैर नहीं करते तथा गरीब होने पर भी कुकर्म नहीं करते उन शील पुरुषों को ‘आर्य’ कहते हैं।

(६) वशिष्ठ स्मृति में-
कर्त्तव्यमाचरन काम कर्त्तव्यमाचरन ।
तिष्ठति प्रकृताचारे यः स आर्य स्मृतः ।।

अर्थ:- जो रंग, रुप, स्वभाव, शिष्ठता, धर्म, कर्म, ज्ञान और आचार-विचार तथा शील-स्वभाव में श्रेष्ठ हो उसे ‘आर्य’ कहते हैं।

(७) निरुक्त में यास्काचार्य जी लिखते हैं-
आर्य ईश्वर पुत्रः।

अर्थ―’आर्य’ ईश्वर के पुत्र हैं।

(८) विदुर नीति में-
आर्य कर्मणि रज्यन्ते भूति कर्माणि कुर्वते ।
हितं च नामा सूचन्ति पण्डिता भरतर्षभ ।।-(अध्याय १ श्लोक ३०)

अर्थ:- भरत कुल भूषण! पण्डित जन्य जो श्रेष्ठ कर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति के कार्य करते हैं तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते हैं वही ‘आर्य’ हैं।

(९) गीता में-
अनार्य जुष्टम स्वर्गम् कीर्ति करमर्जुन।
–(अध्याय २ श्लोक २)

अर्थ:- हे अर्जुन तुझे इस असमय में यह अनार्यों का सा मोह किस हेतु प्राप्त हुआ क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है और न स्वर्ग को देने वाला है तथा न कीर्ति की और ही ले जाने वाला है (यहां पर अर्जुन के अनार्यता के लक्षण दर्शाये हैं)।

(१०) चाणक्य नीति में-

अभ्यासाद धार्यते विद्या कुले शीलेन धार्यते।
गुणेन जायते त्वार्य,कोपो नेत्रेण गम्यते।।-(अध्याय ५ श्लोक ८)

अर्थ:- सतत् अभ्यास से विद्या प्राप्त की जाती है, कुल-उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव से स्थिर होता है,आर्य-श्रेष्ठ मनुष्य गुणों के द्वारा जाना जाता है।

(११) नीतिकार के शब्दों में-

प्रायः कन्दुकपातेनोत्पतत्यार्यः पतन्नपि।
तथा त्वनार्ष पतति मृत्पिण्ड पतनं यथा।।

अर्थ:- आर्य पाप से च्युत होने पर भी गेन्द के गिरने के समान शीघ्र ऊपर उठ जाता है अर्थात् पतन से अपने आपको बचा लेता है,अनार्य पतित होता है तो मिट्टी के ढेले के गिरने के समान फिर कभी नहीं उठता।

(१२) अमरकोष में:-

महाकुलीनार्य सभ्य सज्जन साधवः।-(अध्याय२ श्लोक६ भाग३)

अर्थ:- जो आकृति,प्रकृति,स
भ्यता,शिष्टता,धर्म,कर्म,विज्ञा
न,आचार,विचार तथा स्वभाव में सर्वश्रेष्ठ हो उसे ‘आर्य’ कहते हैं।

(१३) कौटिल्य अर्थशास्त्र में-

व्यवस्थितार्य मर्यादः कृतवर्णाश्रम स्थितिः।

अर्थ:- आर्य मर्यादाओं को जो व्यवस्थित कर सके और वर्णाश्रम धर्म का स्थापन कर सके वही ‘आर्य’ राज्याधिकारी है।

(१४) पंचतन्त्र में-

अहार्यत्वादनर्धत्वाद क्षयत्वाच्च सर्वदा।

अर्थ:- सब पदार्थों में उत्तम पदार्थ विद्या को ही कहते हैं।

(१५) धम्म पद में:-

अरियत्पेवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो।

अर्थ:- पण्डित जन सदा आर्यों के बतलाये धर्म में ही रमण करता है।

(१६) पाणिनि सूत्र में:-

आर्यो ब्राह्मण कुमारयोः।

अर्थ:- ब्राह्मणों में ‘आर्य’ ही श्रेष्ठ है।

(१७) काशी विश्वनाथ मन्दिर के मुख्य द्वार पर-

आर्य धर्मेतराणो प्रवेशो निषिद्धः।

अर्थ:- आर्य धर्म से इतर लोगों का प्रवेश वर्जित है।

(१८) आर्यों के सम्वत् में:-

जम्बू दीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते अमुक देशान्तर्गते।

ऐसा वाक्य बोलकर पौराणिक भाई भी संकल्प पढ़ते हैं अर्थात् यह आर्यों का देश ‘आर्यावर्त्त’ है।

(१९) आचार्य चतुरसेन और आर्य शब्द:-

उठो आर्य पुत्रो नहि सोओ।
समय नहीं पशुओं सम खोओ।
भंवर बीच में होकर नायक।
बनो कहाओ लायक-लायक।।

अर्थ:- तुम्हारा जीवन पशुओं के समान निद्रा के वशीभूत होने के लिए निर्माण नहीं हुआ है।यह समय तुम्हें पुरुषार्थ करने का है,यदि जीवन में तुम पुरुषार्थ करोगे तो किसी कहानी के नायक बनकर समाज के आगे उपस्थित होवोगे।

(२०) पं. प्रकाशचन्द कविरत्न के शब्दों में:-

आर्य-बाहर से आये नहीं,
देश है इनका भारतवर्ष।
विदेशों में भी बसे सगर्व,
किया था परम प्राप्त उत्कर्ष।।
आर्य और द्रविड जाति हैं,
भिन्नचलें यह विदेशियों की चाल।
खेद है कुछ भारतीय भी,
व्यर्थ बजाते विदेशियों सम गाल।।

(२१) पं. राधेश्याम कथावाचक बरेली वाले और आर्य शब्द:–

जब पंचवटी में शूर्पणखा राम के पास मोहित होकर अपना विवाह करने की बात राम से कहती है,तब राम उत्तर देते हैं―
हम आर्य क्षत्रीय हैं,
रघुवंशी वैदिक धर्मी हैं।
जो करें एक से अधिक विवाह,
कहते वेद उन्हें दुष्कर्मी हैं।
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मनुस्मृति संसार का प्राचीन श्रेष्ठ ज्ञान है जिसका सबको अध्ययन करना चाहिये”

ओ३म्
“मनुस्मृति संसार का प्राचीन श्रेष्ठ ज्ञान है जिसका सबको अध्ययन करना चाहिये”
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सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा से चार वेदों का आविर्भाव हुआ था। वेद ज्ञान व सत्य विद्याओं को कहते हैं। चार वेदों में ज्ञान, कर्म और उपासना सहित विज्ञान विषयों का वर्णन है। वेदों के प्रमुख विद्वान 6 दर्शनकार, 11 व अधिक उपनिषदकार, महर्षि पाणिनी, महर्षि यास्क एवं ऋषि दयानन्द जी हुए हैं। महर्षि बाल्मीकि एवं महर्षि वेद व्यास भी वैदिक विद्वानों व ऋषियों में सम्मिलित हैं। उन्होंने शास्त्रीय ग्रन्थ तो नहीं परन्तु राम एवं महाभारत का इतिहास लिखा है। यह सभी ऋषि व विद्वान वेदों को ईश्वरीय ज्ञान मानते थे। यह परम्परा सृष्टि के आरम्भ से आज तक चली आई है। महर्षि दयानन्द ने नियम दिया है कि वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है। वेद का पढ़ाना व पढ़ाना तथा सुनना व सुनाना सभी आर्यों अर्थात् अच्छा आचरण करने वाले सभी सज्जन मनुष्यों का परम धर्म है। आज भी वेदों की शिक्षा का पालन ही मनुष्य का धर्म है। मत-मतान्तरों व धर्म में अन्तर होता है। मत-मतान्तर धर्म कदापि नहीं हो सकते। धर्म की परिभाषा है कि जिन श्रेष्ठ गुणों को मनुष्य धारण कर सकता है व मनुष्य को जिन गुणों को धारण करना चाहिये, उन गुण, कर्म व स्वभावों को मनुष्य का धर्म कहा जाता है। मनुष्य जिन गुण, कर्म व स्वभावों आदि को धारण कर सकता है, उन सबका उल्लेख सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने वेदों में कर दिया था। मत-मतान्तरों में जो सत्य पाया जाता है वह वेदों से ही लिया गया है अथवा वेद से ही उन ग्रन्थों में पहुंचा है। सृष्टि के आरम्भ में जब कुछ राज्य स्थापित करने व राज्य की ओर से धर्म व्यवस्था व आचरण के विधान बनाने की आवश्यकता हुई तब सृष्टि के आरम्भ में प्रथम महर्षि मनु ने वेदों की शिक्षाओं व सिद्धान्तों के आधार पर वेदानुकूल नियमो का संग्रह किया जिसे ‘मनुस्मृति’ नाम दिया गया। मनुस्मृति वेद सम्मत मानव जीवन के लिए आवश्यक सभी कर्तव्यों व अकर्तव्यों के दण्डों की शिक्षाओं व विधानों से युक्त थी व अब भी है। इसमें ऐसा कोई विधान व सिद्धान्त नहीं था जो अतार्किक व भेदभावपूर्ण हो। सृष्टि को आरम्भ हुए 1.96 अरब वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। तब से मनुस्मृति ही वेद के बाद सभी विद्वानों व मनुष्यों के लिये स्वाध्याय एवं अध्ययन का प्रमुख ग्रन्थ रहा है। महाभारत काल तक मनुस्मृति सबको मान्य थी। इसका कभी किसी ने विरोध किया हो, इसका रामायण या महाभारत आदि किसी ग्रन्थ में उल्लेख नहीं मिलता।

महाभारत से पहले ही किन्हीं कारणों से सामाजिक परम्पराओं में कुछ विकृतियां उत्पन्न होनी आरम्भ हो गयी थीं। अग्निहोत्र यज्ञ जो पूर्ण अहिंसक कृत्य होता है, उसमें भी वाममार्गी धार्मिक लोगों ने पशु हिंसा के विधान जोड़ दिये थे। इसके लिये उन्होंने वेद मन्त्रों के अर्थ के अनर्थ किये जिसका प्रकाशन महर्षि दयानन्द व उनके अनुयायियों ने अनेक ग्रन्थ लिखकर किया। महाभारत के बाद वैदिक धर्म की एक शाखा के रूप में वाममार्ग की उत्पत्ति हुई। इन लोगों ने रामायण, महाभारत, मनुस्मृति सहित अनेक ग्रन्थों में अपनी-अपनी मान्यताओं के वेदविरुद्ध व पक्षपातपूर्ण प्रक्षेप किये। कुछ पुराण आदि ग्रन्थ लिखे गये जिनमें उन ग्रन्थों के लेखकों के वास्तविक नाम न देकर प्रसिद्ध ऋषि वेदव्यास जी के नाम से प्रचारित किया गया। इसका उल्लेख महर्षि दयानन्द जी ने अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में राजा भोज के समय के इतिहास विषयक ‘संजीवनी’ नामक ग्रन्थ से प्रमाण प्रस्तुत कर किया है। इसके अनुसार महर्षि वेदव्यास जी ने 4500 श्लोकों का भारत ग्रन्थ बनाया था। व्यास जी के शिष्यों ने इसे दस सहस्र श्लोकों तक विस्तृत किया। यही ग्रन्थ राजा भोज के पिता के समय प्रक्षेपों की वृद्धि से बीस हजार श्लोकों का दोगुना हो गया और राजा भोज के समय में निरन्तर प्रक्षेप होने के कारण पच्चीस हजार श्लोकों का हो गया था। राजा भोज ने अपने समय में प्रक्षेप करने वाले लोगों के हस्त आदि इन्द्रिय कटवा दिये थे और आज्ञा प्रसारित की थी जिसको कोई ग्रन्थ बनाना है वह अपने नाम से बनायें, पूर्व ग्रन्थों में प्रक्षेप न करें। जिन ग्रन्थों में वेद विरोधियों ने प्रक्षेप किये हैं उन्हीं के कारण समाज में अनेक विकृतियां व भेदभाव उत्पन्न हुए हैं। अधिकारी विद्वान यह भी बताते हैं कि प्रक्षेप एक ही व्यक्ति ने एक ही समय में नहीं किये अपितु यह क्रम अनेक वर्षों तक अनेक लोगों द्वारा किया जाता रहा।

मध्यकाल में वेदों के सत्यार्थ सुलभ न होने के कारण मनुस्मृति आदि ग्रन्थों की विकृतियां समाज को प्रभावित करने लगीं। इन विकृतियों के कारण स्त्रियों व जन्मना शूद्रों को वेदाध्ययन ही नहीं अपितु वेदों के श्रवण तक से वंचित कर दिया गया। इसके लिये तत्कालीन लोगों ने वेदों के नाम से मनघड़न्त वाक्य घड़ लिये जिसमें से एक था ‘स्त्री शूद्रो नाधीयताम्’ अर्थात् स्त्री और शूद्रों को वेदों का अध्ययन करने का अधिकार नहीं है। स्वामी शंकराचार्य जी तक इन विचारों से प्रभावित रहे और उन्होंने नारी तक के लिये असम्मानजनक शब्द कहे हैं।

मध्यकाल व उसके बाद जितने भी विद्वान हुए उनमें से किसी ने यह प्रयास नहीं किया कि वह वेदों से वेद विरुद्ध मान्यताओं की पुष्टि करने का प्रयत्न करते और इन वेदविरुद्ध मान्यताओं के समर्थकों को शास्त्रार्थ की चुनौती देते। महर्षि दयानन्द (1825-1883) के समय में यह विकृतियां अपने शीर्ष व चरम पर थी। प्राचीन काल में वैदिक वर्ण व्यवस्था मनुष्य के गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित थी परन्तु मध्यकाल में इसे जन्मना जातिवाद का रूप दे दिया गया और चार वर्णों के स्थान पर मनुष्यों की सहस्रों उपजातियां बना दी गईं जिससे सभी जातियों में परस्पर अनेक प्रकार के भेदभाव उत्पन्न हुए। कुछ जातियों को साक्षर होने का अधिकार भी नहीं था। धीरे धीरे पूरे देश से गुरुकुलीय शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो गई। इसमें मुस्लिम व अंग्रेजों का कुशासन मुख्य था। अतः उस काल में देशवासियों के सम्मुख अध्ययन अध्यापन एवं परस्पर समानता के व्यवहार करने में अनेक प्रकार की कठिनाईयां थी। मुस्लिम व अंग्रेजों के राज में हिन्दू समाज में अनेक प्रकार की सामाजिक विकृतियां उत्पन्न हुईं जिनमें जन्मना-जातिवाद, बाल-विवाह, विधवा विवाह का निषेध, घूंघट या पर्दा प्रथा, दलित बन्धुओं द्वारा मैला ढोने की प्रथा, बलपूर्वक धर्मान्तरण, आपस में भेदभाव व छुआछूत आदि विकृतियां प्रमुख थी। डा. भीमराव अम्बेडकर जी एक प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। उनके अध्ययन में अनेक प्रकार के अवरोध उपस्थित हुए। ऐसी विकट स्थिति में भी उन्होंने अपने प्रारब्ध, दृढ़ इच्छा व संकल्प शक्ति तथा संघर्षमय जीवन से उच्च शिक्षित होकर देश व समाज की प्रशंसनीय सेवा की। डा. अम्बेडकर जी का विषय धर्मशास्त्र का अध्ययन करना व कराना नहीं था। अतः इस विषय में उनकी राय का सीमित महत्व है परन्तु अधिकारिक राय तो निष्पक्ष धर्म-मर्मज्ञों की ही मान्य होती है।

धर्म पर कोई प्रतिक्रिया या व्यवस्था देने का अधिकार वेद एवं वैदिक साहित्य के शीर्ष विद्वानों को ही होता है। मध्यकाल में यह स्थिति वैदिक काल के समान न थी अपितु इस व्यवस्था में अनेक विकृतियां उत्पन्न हों गई थी। अतः देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कुछ प्रतिष्ठित लोगों ने धार्मिक एवं सामाजिक विकृतियों के कारणों का समुचित अध्ययन किये बिना ही अपने अल्प एवं विपरीत ज्ञान से पूरी मनुस्मृति और महाराज मनु का विरोध कर डाला। कुछ ने तो मनुस्मृति को जलाया भी जिसे उनका अज्ञानता रूपी अपराध कहा जा सकता है। ऐसा किया जाना अविवेकपूर्ण कार्य था। होना यह चाहिये था कि मनुस्मृति का गहन अध्ययन किया जाता और निश्चित किया जाता कि मनुस्मृति में जो अनुचित व अमानवीय बातें हैं, क्या वह महाराज मनु द्वारा कही व लिखी गई हैं अथवा मध्यकाल में कुछ अल्पज्ञानी व स्वार्थी लोगों ने अपने हितों के कारण ऐसा किया है। महर्षि दयानन्द ने अपने अध्ययन में सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करने का नियम बनाया जिसका उन्होंने व आर्यसमाज के विद्वानों ने पालन किया है। उन्होंने न केवल मनुस्मृति सहित सभी शास्त्रीय ग्रन्थों की परीक्षा की और वेदविरुद्ध बातों को अस्वीकार करते हुए उनका व्यवहार करना त्याग किया। मनुस्मृति का अनुसंधान कर शुद्ध मनुस्मृति नाम से एक शोधपूर्ण संस्करण भी प्रकाशित किया गया जो आज सर्वसुलभ है। इसे हमारे सभी दलित जाति के बन्धुओं को पूर्वाग्रह से मुक्त होकर निष्पक्ष भाव से पढ़ना चाहिये और लाभ उठाना चाहिये।

ऋषि दयानन्द ने सभी सनातनी पौराणिक व इतर विद्वानों को भी वेदों की सत्य मान्यताओं पर विचार कर सत्यासत्य का निर्णय करने के लिये शास्त्रार्थ की चुनौती दी। उनके समय में पौराणिक जगत में उनके समकक्ष कोई विद्वान नहीं था। ऋषि दयानन्द ने पाषाण मूर्तिपूजा, अवतारवाद, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष, सभी ढ़ोग, पाखण्ड तथा अन्धविश्वासों को चुनौती दी थी। कोई उनके सम्मुख आकर अपने पक्ष में वेदों का प्रमाण व युक्तियां नहीं दे सका। स्वामी दयानन्द ने एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य यह भी किया कि यजुर्वेद से समाज के सभी मनुष्यों को वेदों के अध्ययन का अधिकार देने वाला वेदमन्त्र प्रस्तुत किया। इससे सदियों से चली आ रही स्त्री व शूद्रों को वेद का अध्ययन करने का अधिकार नहीं है, इस मान्यता का खण्डन एवं प्रतिवाद हुआ। इसके बाद यह विवाद सदा सदा के लिए समाप्त हो गया। आज तक इस प्रमाण की काट किसी सनातनी पौराणिक विद्वान ने प्रस्तुत नहीं की। इस प्रकार हम देखते हैं कि किस प्रकार सदियों तक हमारे देश के कुछ वेदविमुख पाखण्डी लोगों ने देश की जनता के साथ अन्याय किया। यदि ऋषि दयानन्द जी न आते तो आज हमारे समाज की कितनी दुर्दशा होती, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

वेद पढ़ने का अधिकार सब मनुष्यों को समान रूप से है, इससे सम्बन्धित प्रमाण यजुर्वेद के 26 वें अध्याय का 2सरा मन्त्र है। मन्त्र निम्न हैः

‘यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः।
ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय।।’

इस मन्त्र में परमेश्वर ने कहा है कि (यथा) जैसे मैं (जनेभ्यः) सब मनुष्यों के लिये (इमाम्) इस (कल्याणीम्) कल्याण करने वाली अर्थात् संसारिक सुख और मुक्ति के सुख देनेहारी (वाचम्) ऋग्वेदादि चारों वेदों का वाणी का (आ वदानि) उपदेश करता हूं वैसे तुम मनुष्य भी करो।

महर्षि दयानन्द ने इस वेदमंत्र व इसके अर्थ पर होने वाली शंकाओं का निराकार भी सत्यार्थप्रकाश के तृतीय समुल्लास में किया है। वह लिखते हैं कि यहां कोई ऐसा प्रश्न करे कि ‘जन’ शब्द से द्विजों का ग्रहण करना चाहिये क्योंकि स्मृत्यादि ग्रन्थों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही के वेदों के पढ़ने का अधिकार लिखा है, स्त्री और शूद्रादि वर्णों का अधिकार नहीं है। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए ऋषि दयानन्द लिखते हैं कि देखो (ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय) परमेश्वर स्वयं कहता है कि हम ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, (अय्र्याय) वैश्य, (शूद्राय) शूद्र, और (स्वाय) अपने भृत्य वा स्त्रियों आदि (अरणाय) और अतिशूद्रादि के लिये भी वेदों का प्रकाश किया है अर्थात् सब मनुष्य वेदों को पढ़ पढ़ा और सुन सुनाकर विज्ञान को बढ़ा के अच्छी बातों का ग्रहण और बुरी बातों का त्याग करके दुःखों से छूट कर आनन्द को प्राप्त हों। कहिये, अब तुम्हारी बात मानें वा परमेश्वर की? परमेश्वर की बात अवश्य माननीय है। इतने पर भी जो कोई इस को न मानेगा वह नास्तिक कहावेगा क्योंकि ‘नास्तिको वेदनिन्दकः’ वेदों का निन्दक और न मानने वाला नास्तिक कहाता है। क्या परमेश्वर शूद्रों का भला करना नहीं चाहता? क्या ईश्वर पक्षपाती है कि वेदों के पढ़ने सुनने का शूद्रों के लिये निषेध और द्विजों के लिये विधान करे? जो परमेश्वर का अभिप्राय शूद्रादि के पढ़ाने सुनाने का न होता तो इनके शरीर मे वाक् और श्रोत्र इन्द्रिय क्यों रचता? जैसे परमात्मा ने पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, चन्द्र, सूर्य और अन्नादि पदार्थ सब के लिये बनाये हैं वैसे ही वेद भी सबके लिये प्रकाशित किये हैं। और जहां-जहां निषेध किया है उस का यह अभिप्राय यह है कि जिन बालक व मनुष्य को पढ़ने पढ़ाने से कुछ भी न आवे वह निर्बुद्धि और मूर्ख होने से शूद्र कहाता है। उस का पढ़ना पढ़ाना व्यर्थ है। और जो स्त्रियों के पढ़ने का निषेध करते हो वह तुम्हारी मूर्खता, स्वार्थता और निर्बुद्धिता का प्रभाव है। इसके बाद ऋषि दयानन्द अथर्ववेद के वचन ‘ब्रह्मचय्र्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्’ का उल्लेख कर सभी सनातनी पौराणिकों की बोलती बन्द कर दी। इस वेद वचन में स्त्रियों के वेदाध्ययन का प्रत्यक्ष विधान है। यह भी बता दें कि ऋषि दयानन्द ने उपर्युक्त प्रतिवाद प्रचलित पौराणिक वेदाध्ययन में अनधिकार विषयक मान्यताओं का किया है। इसके बाद स्त्री व शूद्रों सहित समाज के सभी व्यक्तियों को वेदाध्ययन का अधिकार प्राप्त हो गया। अब कोई मनुष्य वा स्त्री पुरुष वेदाध्ययन के अधिकार से वंचित नहीं है। जिस किसी को भी वेद पढ़ना व पढ़ाना हो, दलित समाज सहित कोई भी व्यक्ति आर्यसमाज से जुड़कर इसके गुरुकुलों में रहकर वेदाध्ययन कर वेदों का प्रचार व वेदोपदेश कर सकता है। ऋषि दयानन्द के इन्हीं विचारों से सदियों व वंचित स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन करने का अधिकार प्राप्त हुआ व वेदाध्ययन के बन्द दरवाजे सबके लिए सदा के लिये खुल गये। इसके लिए ऋषि दयानन्द को हमारा नमन है।

मनुस्मृति का अध्ययन करने पर ग्रन्थ में मनुप्रोक्त ऐसा कोई वचन प्राप्त नहीं होता जहां जन्मना जातिवाद व जन्म से कोई ब्राह्मण है और कोई शूद्र है, इसका वर्णन हो। इसके विपरीत जन्म से ब्राह्मण आदि वर्णों के सभी बच्चों को शूद्र अर्थात् विद्याहीन बताया गया है। अतः समाज में महाभारतकाल के बाद व मध्यकाल में जो पतन हुआ उसका कारण महाराज मनु व मनुस्मृति नहीं अपितु मध्यकालीन आचार्यों द्वारा मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में किये गये प्रक्षेप थे। इसके लिये महाराज मनु को कदापि उत्तरदायी नहीं कहा जा सकता। जो ऐसा सोचते हैं वह उनके साथ अन्याय करते हैं। उन्हें यह पता नहीं होता कि ऐसा करने से वह अपने जन्म-जन्मान्तरों में मनुस्मृति की वेदानुकुल शिक्षाओं के अध्ययन से वंचित होकर अपने सुखों व आत्मिक उन्नति की हानि कर रहे हैं। अतः उन सभी लोगों को जो मनुस्मृति का विरोध करते हैं, स्वार्थ को एक तरफ रखकर शीतल मस्तिष्क से मनुस्मृति को पूरा पढ़ना चाहिये और उसके ग्राह्य व अग्राह्य वचनों का संग्रह करना चाहिये। ग्राहय से लाभ उठाना चाहिये और अग्राह्य का त्याग करना चाहिये। वर्तमान समय में आर्यजगत् के प्रसिद्ध ऋषिभक्त रहे विद्वान लाला दीपचन्द आर्य जी ने स्वस्थापित एवं संचालित ‘आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली’ के द्वारा ‘‘विशुद्ध-मनुस्मृति” ग्रन्थ का सम्पादन कराकर सन् 1982 में उसका प्रकाशन किया था। इस विशुद्ध मनुस्मृति को पढ़कर हमारे सभी दलित व अन्य बन्धु जन्मना जातिवाद के पक्षधरों को यथोचित उत्तर दे सकते हैं।

पाठकों की जानकारी के लिए यह बताना भी आवश्यक है कि विशुद्ध-मनुस्मृति में बारह अध्याय हैं। इन अध्यायों में मुख्य रूप से निम्न विषयों पर विधान सम्मिलित किये गये हैं।

प्रथम अध्याय- सृष्टि-उत्पत्ति तथा धर्मोत्पत्ति विषय
द्वितीय अध्याय- संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम विषय
तृतीय अध्याय- समावर्तन, विवाह, पंचमहायज्ञ विधान विषय
चतुर्थ अध्याय- गृहस्थान्तर्गत आजीविकायें और व्रतों का विधान
पंचम अध्यय- भक्ष्याभक्ष्य, प्रेतशुद्धि, द्रव्यशुद्धि, स्त्रीधर्म आदि विषय
षष्ठ अध्याय- वानप्रस्थ-संन्यास धर्म विषय
सप्तम अध्याय- राजधर्म विषय
अष्टम अध्याय- राजधर्मान्तर्गत व्यवहारों (मुकदमों) का निर्णय
नवम अध्याय- राजधर्मान्तर्गत व्यवहारों का निर्णय
दशम अध्याय- चातुर्वर्ण्य धर्मान्तर्गत वैश्य, शूद्र के धर्म तथा चातुर्वर्ण्य-धर्म का उपसंहार
एकादश अध्याय- प्रायश्चित विषय
द्वादश अध्याय- कर्म-फल विधान तथा निःश्रेयस कर्मों का वर्णन

यह विषय सूची अति संक्षिप्त है। विस्तार-भय के कारण मनुस्मृति में वर्णित पूरी विषय सूची को हम यहां प्रस्तुत कर पा रहे हैं। इस संक्षिप्त सूची से पाठक मनुस्मृति की महत्ता एवं उपयोगिता का कुछ अनुभव कर सकते हैं।

हम यह भी कहना चाहते हैं कि हम सब मनुष्यों का वर्तमान जन्म प्रथम व अन्तिम नहीं है। इससे पूर्व हमारे अनन्त बार जन्म हो चुके हैं। आगे भी अनन्त बार जन्म व मरण होंगे। कई बार मुक्ति और मुक्ति से पुनरावृत्ति भी हो सकती है। आत्मा अविनाशी व अमर है। यह सदा रहेगी। हमारी यह सृष्टि भी उत्पत्ति व प्रलय के मध्य स्थित है। उत्पत्ति के बाद यह 4.32 अरब वर्ष तक स्थित रहती है। उसके बाद इसकी प्रलय हो जाती है। प्रलय अवस्था भी 4.32 अरब वर्षों की होती है। इस प्रकार रात व दिन की तरह सृष्टि की भी उत्पत्ति व प्रलय होती रहती है। मनुष्य का आत्मा अनादि, नित्य व अमर है। इसका सृष्टि काल में अपने कर्मों के अनुसार जन्म व मरण होता रहता है। अतः हमारी आत्मा सदा से है और सदा रहने वाली है। इस रहस्य को जानकर हमें अपने दीर्घकालीन लाभों के लिये वेद, मनुस्मृति एवं सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के अध्ययन व उनसे प्राप्त ज्ञान का आचरण व पालन करने की आवश्यकता है। ऋषियों व विद्वानों का कर्तव्य मनुष्यों का मार्गदर्शन करना होता है। हम उसे मानेंगे तो हमें लाभ होगा अन्यथा हमारी ही हानि होगी। यह हानि ऐसी होती है जिसकी पूर्ति सम्भव नहीं होती। अन्तिम समय में जब मनुष्य को कुछ ज्ञान होता है तो आत्मा को पछतावा होता है परन्तु कर्म फल व्यवस्था का समाधान किसी के पास नहीं होता। जिन लोगों ने मनुस्मृति व वेदों का विरोध किया उनकी अनश्वर आत्मायें आज कहां हैं? उनका कोई अनुयायी नहीं बता सकता। वैदिक कर्म-फल सिद्धान्त से ही इसका अनुमान लगाया जा सकता है। अतः हमें व मनुस्मृति के विरोधियों को समय रहते संभल जाना चाहिये। इसी में सबका हित है। मनुस्मृति वा शुद्ध-मनुस्मृति एक महत्वपूर्ण एवं लाभप्रद ग्रन्थ है तथा मानव जाति के लिए एक वरदान है। हमें सत्य का ग्रहण करना चाहिये तथा असत्य को छोड़ देना चाहिये। इसी में हम सबका हित है।

सभी मनुष्य सभी विषयों के विद्वान नही हो सकते। जो व्यक्ति जिस विषय का विद्वान हो उसको उसी विषय पर साधिकार टीका-टिप्पणी करनी चाहिये। अतीत में देश के कुछ चर्चित व प्रसिद्ध लोगों ने ऐसे विषयों में टिप्पणियां की हैं जिसके वह अधिकारी विद्वान नहीं थे। ऐसी टिप्पणियों का कोई महत्व नहीं होता। ऐसे लोग अनजानें में निष्पक्ष विद्वानों व इतिहास पुरुषों पर अपनी अविद्या व अज्ञान के कारण मिथ्या व अनुचित टिप्पणी कर अपराध कर बैठते हैं। इससे, क्या विद्वान और क्या अविद्वान, सभी को बचना चाहिये। किसी व्यक्ति व समूह का अपने स्वार्थ के विषय में सोचना और दूसरों के हितों की उपेक्षा करना मनुष्यता नहीं है। जो ऐसा करता है वह विवेकवान एवं साधु पुरुष नहीं होता। आदर्श नियम है कि मनुष्य को अपनी ही उन्नति में ही सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिये अपितु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये। ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में इसका पूणतः पालन किया था। इसी का वर्तमान समय में भी सबको पालन करना चाहिये।

विश्व का समस्त मनुष्य समाज एक परमात्मा का परिवार है। वेदों की देन ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का महान सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार संसार के सब मनुष्यों को इनके स्वामी एक ईश्वर ने ही उत्पन्न किया है और सब मनुष्य व आत्मायें ईश्वर के प्रति उत्तरदायी हैं। सबको ईश्वर के विधानों को मानना हैं। यदि मानेंगे तो सुखी होंगे अन्यथा जन्म-जन्मान्तर में दुःख भोगेंगे। मनुस्मृति के विधान मनुष्य की इस आवश्यकता, हित व कल्याण को ध्यान में ही रखकर ही बनाये गये हैं। किसी मनुष्य को धर्म पालन अथवा अपने कर्तव्यों के निर्वाह में किसी प्रकार की बाधा न आये इस दृष्टि से राजव्यवस्था एवं विधान बनाये गये हैं। मनुस्मृति की तुलना में किसी मत-मतान्तर का ग्रन्थ कहीं नहीं आता। अतः सबको मनुस्मृति का अध्ययन करने के साथ उसके हितकर विधानों को जानना एवं उन्हें आचरण में लाना चाहिये। इसी में सबका हित व कल्याण हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
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