🙏 आज का वैदिक भजन 🙏

कविता छोटी है,परंतु सारांश बड़ा है

वाह रे जिंदगी

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    * दौलत की भूख ऐसी लगी की कमाने निकल गए *
    * ओर जब दौलत मिली तो हाथ से रिश्ते निकल गए *
    * बच्चो के साथ रहने की फुरसत ना मिल सकी *
    * ओर जब फुरसत मिली तो बच्चे कमाने निकल गए *
    वाह रे जिंदगी
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    वाह रे जिंदगी
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    * जिंदगी की आधी उम्र तक पैसा कमाया*
    *पैसा कमाने में इस शरीर को खराब किया *
    * बाकी आधी उम्र उसी पैसे को *
    * शरीर ठीक करने में लगाया *
    * ओर अंत मे क्या हुआ *
    * ना शरीर बचा ना ही पैसा *
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    वाह रे जिंदगी
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    वाह रे जिंदगी
    “”””””””””””””””””‘””””
    * शमशान के बाहर लिखा था *
    * मंजिल तो तेरी ये ही थी *
    * बस जिंदगी बित गई आते आते *
    * क्या मिला तुझे इस दुनिया से *

    * अपनो ने ही जला दिया तुझे जाते जाते *
    वाह रे जिंदगी

    🙏 आज का वैदिक भजन 🙏
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम
    बन जाऊँ बन्दा मैं तेरा हे कृपानिधान

    ऐसी कृपा करो प्रभु मेरे
    मिटे मन की तृष्णा और बन जायें तेरे
    सबसे हो प्रीति और बन जाये जीवन महान्
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम

    प्रभु!मुझको पिला दो कोई अमृत का प्याला
    रँग दे इस दिल को हम, कर दो मतवाला
    मेरा है तन-मन सब कुछ तुझपे कुर्बान
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम

    सदा पकड़ो मेरी बाहें
    कहीं भटक न जायें
    विषयों में फंस कर हम बहक न जायें
    जिस दिन तू निकले बिसर जाये मेरी जान
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम
    स्वर :- पूज्य स्वामी रामदेव जी
    इस भजन की तुलना वेद मन्त्र से करें :-
    “सांसों की माला पे सिमरू मैं प्रभु का नाम”

    वायुमारोह धर्मणा (धर्मणा वायुम् आरोह) सामवेद 483
    कोई श्वास भक्तिरस से रिक्त न रहजाए।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अमूल्य उपदेश (भाग ३)

२१. जो दुष्ट कर्मचारी द्विज को श्रेष्ठ, कर्मकार शूद्र को नीच मानें तो इसके परे पक्षपात् अन्याय, अधर्म दूसरा अधिक क्या होगा।

२२. जो विद्यादि सद्गुणों में गुरुत्व नहीं है झूठमूठ कण्ठी, तिलक, वेद विरुद्ध मन्त्रोपदेश करने वाले हैं वे गुरु ही नहीं किन्तु गडरिये हैं। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२३. “जो धर्मयुक्त उत्तम काम करे, सदा परोपकार में प्रवृत्त हो, कोई दुर्गुण जिसमें न हो, विद्वान् सत्योपदेश से सब का उपकार करे, उसको साधु कहते हैं।” (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२४. जैसे गृहस्थ व्यवहार और स्वार्थ में परिश्रम करते हैं उनसे अधिक परिश्रम परोपकार करने में संन्यासी भी तत्पर रहें तभी सब आश्रम उन्नति पर रहें। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२५. संन्यासियों का मुख्य कर्म यही है कि सब गृहस्थादि आश्रमों को सब प्रकार के व्यवहारों का सत्य निश्चय करा अधर्म व्यवहारों से छुड़ा सब संशयों का छेदन कर सत्य धर्मयुक्त व्यवहारों में प्रवृत्त करें। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ५)

२६. उत्तम दाता उसको कहते हैं जो देश, काल को जान कर सत्य विद्या धर्म की उन्नति रूप परोपकारार्थ देवे। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२७. जिसके शरीर में सुरक्षित वीर्य रहता है तब उसको आरोग्य, बुद्धि, बल, पराक्रम बढ़ के बहुत सुख की प्राप्ति होती है। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास २)

२८. अनेक प्रकार के मद्य, गांजा, भांग, अफीम आदि- जो-जो बुद्धि का नाश करने वाले पदार्थ हैं उनका सेवन कभी न करें। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास १०)

२९. देखो जब आर्यों का राज्य था तब महोपकारक गाय आदि नहीं मारे जाते थे, तभी आर्यावर्त्त व अन्य भूगोल देशों में बड़े आनन्द में मनुष्यादि प्राणी वर्त्तते थे क्योंकि दूध, घी, बैल आदि पशुओं की बहुताई होने से अन्न रस पुष्कल होते थे। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास १०)

३०. इन पशुओं के मारने वालों को सब मनुष्यों की हत्या करने वाले जानियेगा। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास १०)

उषा पृथ्वी के पूर्व के आधे भाग को अपनी लालिमा से भर देती है।

उषा पृथ्वी के पूर्व के आधे भाग को अपनी लालिमा से भर देती है। उषा की किरणें सूर्य का आगाज़ करती है, और दिन निकलने की घोषणा कर देती है। उसी प्रकार देवत्व के योद्धा मानवता के कल्याण करने के लिए अपने अस्त्र-शस्त्रों को चमकाते हैं। (सामवेद -१७५५)

प्रत्येक जीवात्मा सुख पाना चाहती है निरन्तर सुख की ओर दौड़ रही है परंतु मंजिल प्राप्त नहीं कर पा रही है।
भोग योनियाँ तो बन्धन में हैं
न तृतीये तथा उप्लब्धे: वेदांतदर्शन३-१-१८,
अर्थात उनके लिए तो वैसे ही सुविधा नहीं वे तो निम्न योनि के प्राणी हैं मगर जो मानवयोनि पितृयान को प्राप्त कर देवयान अर्थात मोक्ष मार्ग का सुख लेना चाहती है उनके लिए सुंदर अवसर है।
ऐसा नहीं है कि उन्हें ज्ञान नहीं, ज्ञान भी प्राप्त कर ज्ञानी हो जाती है परंतु फिर भी मंजिल नहीं मिल पाती,
क्योंकि एक भूल उससे हो
रही है जो कि रोड़ा है पद, पैसा, प्रतिष्ठा, पुत्र पति पत्नी-परिवार से मोह,
परमात्मा को यह सब चाहिए नहीं,
क्योंकि उसके पास जाने वाला भी उसके परिवार का सदस्य है और नहीं जाने वाला भी।
वह तो आपका निष्काम भाव से किया कर्म और अपने प्रति श्रद्धा भक्ति देखता है।
अतः भूल से बचें, मूल को पकड़ें, विकृति की आयी धूल छंटने पर पूर्ण प्रकाश पूर्ण सुख
-दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या

प्रतिभाद वा सर्वम्।।
-महर्षि पतंजलि कृत योगदर्शन विभूतिपाद सूत्र-३३,
शब्दार्थ
प्रातिभाद-प्रातिभ नामक ज्ञान से,
वा -अथवा,
सर्वम्- सब कुछ जान लेता है।
सूत्रार्थ
-अथवा प्रातिभ ज्ञान से अनेक पदार्थों का ज्ञान होता है।
इससे पूर्व सूत्र में मूर्धा के सात्विक प्रकाश में संयम के फल सिद्ध दर्शन को जानने का प्रयास किया।
प्रस्तुत सूत्र में प्रातिभ ज्ञान से अनेक पदार्थों के ज्ञान होने का कथन है।
महर्षि व्यास भाष्य करते हुए कहते हैं– प्रातिभ तारक नामक ज्ञान होता है। वह विवेकज ज्ञान का पूर्व रूप है वह प्रातिभ ज्ञान ऐसा ही होता है जैसे सूर्योदय के पूर्व प्रभा होती है उस प्रातिभ ज्ञान की उत्पत्ति के होने पर योगी उसके द्वारा सबको जानता है।
सर्वप्रथम इस प्रातिभ ज्ञान को ही समझने का प्रयास करते हैं।
यह ज्ञान स्वयं के अंदर से ही उत्तम संस्कारों के कारण पूर्व ही उत्पन्न होता है।
कहने का भाव यह है कि विवेकज ज्ञान से पहले का रूप ही प्रातिभ ज्ञान है।
वास्तव में जो पूर्व ही ज्ञानमय लालिमा रूप में भासे वही तो प्रातिभ है।
जैसे सूर्योदय से पूर्व की लालिमा दिखाई देती है। सूर्य उदय बाद में होता है ठीक उसी तरह विवेकज ज्ञान से पहले की ज्ञानमय लालिमा प्रातिभ नाम से जानी जाती है। यह ज्ञान किसी बाहर के निमित्त से उत्पन्न नहीं होता बल्कि पूर्व जन्म व इस जन्म दोनों के उत्तम संस्कार सुदृढ़ योगाभ्यास वेद आदि सत्य शास्त्रों के अध्ययन अध्यापन सत्संग आदि धर्म के आचरण से भीतर से ही पूर्व उत्पन्न होता है।
किसी किसी व्यक्ति में छोटी आयु में ही यह प्रातिभ ज्ञान देखा गया है ध्रुव, प्रह्लाद, मूलशंकर इत्यादि प्रतिभावान ज्ञानी बालक प्रातिभ ज्ञान के ऐतिहासिक प्रमाण हैं।
ऐसे ही बालक फिर विवेकी हो ईश्वर को प्राप्त भी कर गए।
क्योंकि अनेक पदार्थों के ज्ञान विज्ञान की परत प्रातिभ पर ही टिकी है।
जैसे पूत के पैर पालने में दिख जाते हैं वैसे ही विवेकी ज्ञान से पूर्व का ज्ञान जिसे महर्षि पतंजलि प्रातिभ कहते हैं। वह प्रतिभाशाली लोगों में पूर्व से ही भासता है। वही ज्ञान आगे बढ़कर स्वयं व ईश्वर का बोध करा देता है।
अतः जो योगाभ्यासी साधक योगाभ्यास में बचपन से ही कुशल हो निरन्तर साधनारत रहते हैं वह भी उनके प्रातिभ ज्ञान की ही वजह है।
वे ही आगे चलकर अनेक पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करते हुए सब कुछ अर्थात जिससे सब कुछ होता है उस ईश्वर को प्राप्त करने विवेकज ज्ञान तक कोई कसर नहीं छोड़ते।
वास्तव में ऐसे अमृतपुत्र ही ईश्वर के सच्चे अच्छे पुत्र हैं।
काव्यमय भाव🎤
प्रातिभ ही विवेकज आधार,
ज्यों सूर्योदय लालिमा पसार।
योगी भरे विविध विज्ञान,
सुसंस्कारवित् पूर्व निशान।।–दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या

vaidik lekh


प्रत्येक जीवात्मा सुख पाना चाहती है निरन्तर सुख की ओर दौड़ रही है परंतु मंजिल प्राप्त नहीं कर पा रही है।
भोग योनियाँ तो बन्धन में हैं

न तृतीये तथा उप्लब्धे: वेदांतदर्शन३-१-१८,
अर्थात उनके लिए तो वैसे ही सुविधा नहीं वे तो निम्न योनि के प्राणी हैं मगर जो मानवयोनि पितृयान को प्राप्त कर देवयान अर्थात मोक्ष मार्ग का सुख लेना चाहती है उनके लिए सुंदर अवसर है।
ऐसा नहीं है कि उन्हें ज्ञान नहीं, ज्ञान भी प्राप्त कर ज्ञानी हो जाती है परंतु फिर भी मंजिल नहीं मिल पाती,
क्योंकि एक भूल उससे हो
रही है जो कि रोड़ा है पद, पैसा, प्रतिष्ठा, पुत्र पति पत्नी-परिवार से मोह,
परमात्मा को यह सब चाहिए नहीं,
क्योंकि उसके पास जाने वाला भी उसके परिवार का सदस्य है और नहीं जाने वाला भी।
वह तो आपका निष्काम भाव से किया कर्म और अपने प्रति श्रद्धा भक्ति देखता है।
अतः भूल से बचें, मूल को पकड़ें, विकृति की आयी धूल छंटने पर पूर्ण प्रकाश पूर्ण सुख
-दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या

स्वामी दयानन्द और गोरक्षा
* गावो विश्वस्य मातर: *

जब आत्मा शरीर को छोड़ देती है तो शरीर मर जाता है अर्थात निष्क्रिय, निष्प्राण, तेजहिन हो जाता है। गो भारत सरीखे कृषि प्रधान देश की आत्मा है और यदि गो इस देश को छोड़ कर चली गयी तो भारत देश आत्मा के बिना शरीर मात्र रह जाएगा। इस राष्ट्र का पतन निश्चित रूप से कोई नहीं बचा सकेगा यदि गो आदि पशुओं को कटने से नहीं बचाया जाता है।

प्राचीन काल में तो संपत्ति का मापदण्ड भी गोधन(godhan) को ही माना जाता था। भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में भारतमाता और गोमाता दोनों ही समानरूप से सेवा और रक्षा के पात्र रहे हैं। संस्कृत में तो गाय और पृथ्वी दोनों के लिए एक ही शब्द ‘गो’ का प्रयोग हुआ है। ऋषि दयानन्द(rishi dayanand) की आर्थिक राष्ट्रियता का वह मुख्य स्तम्भ है। इस कारण उन्होने इस विषय को लेकर ‘गोकरुणानिधि’(gokarunanidhi) के नाम से एक स्वतंत्र ग्रंथ की रचना करके गो-विषयक सभी प्रश्नों का विस्तार से विवेचन किया है। इसी पुस्तक से ब्रिटिश सरकार को राजद्रोह(treason) की गन्ध आने लगी थी।

गोकरुणानिधि का उद्देश्य
इस ग्रंथ की भूमिका में ऋषि दयानन्द जी लिखते है कि “यह ग्रंथ इसी अभिप्राय से लिखा गया है जिससे गौ आदि पशु जहाँ तक सामर्थ्य हो बचाये जावे और उनके बचाने से दूध, घी और खेती के बढ्ने से सब का सुख बढ़ता रहे।”

आर्यराज (स्वराज्य) और गौ
ऋषि वचनामृत1ऋषि वचनामृत

महर्षि जी लिखते है कि “जब आर्यों का राज्य था तब ये महोपकारक गाय आदि पशु नहीं मारे जाते थे। तभी आर्यावर्त व अन्य देशों में बड़े आनंद से मनुष्य आदि प्राणी रहते थे क्योंकि दूध, घी, बैल आदि पशुओं की बहुताई होने से अन्न रस पुष्कल होते थे। जब से विदेशी मांसाहारी इस देश में आकार गौ आदि पशुओं को मरने वाले राज्याधिकारी हुए है तब से क्रमश: आर्यों के दु:खों की बढ़ती होती जाती है क्योंकि “नष्टे मुले नैव फलं न पुष्पम।” (सत्यार्थ प्रकाश) परंतु शोक! महाशोक! विदेशियों से आजादी मिलने के बाद भी हमारे शासकों ने इस भारत रूपी वृक्ष की जड़ को सींचने की बजाय काटने का ही कार्य किया है।

गौ सब सुखों का मूलऋषि वचनामृत3
महर्षि जी ने गौ को सभी सुखों का मूल सिद्ध करते हुए लिखा है – “गवादि पशु और कृषि आदि कर्मों की रक्षा वृद्धि होकर सब प्रकार के उत्तम सुख मनुष्यादि प्राणियों को प्राप्त होते है। पक्षपात छोड़कर देखिये, गौ आदि पशु और कृषि आदि कर्मों से सब संसार को असंख्य सुख होते है वा नहीं।”

गौ की उपयोगिता
गौ का हमारे दैनिक जीवन पर कितना व्यापक प्रभाव है और खाद्य समस्या को हल करने आदि बातों पर महर्षि जी लिखते है – “इनकी रक्षा में अन्न भी महंगा नहीं होता। क्योंकि दूध आदि के अधिक होने से दरिद्री को भी खान-पान में दूध आदि मिलने पर न्यून ही अन्न खाया जाता है और अन्न के कम खाने से मल भी कम होता है। मल के न्यून होने से दुर्गन्ध भी न्यून होता है। दुर्गन्ध के स्वल्प होने से वायु और वृष्टिजल की शुद्धि भी विशेष होती है। उससे रोगों की न्यूनता होने से सबको सुख बढ़ता है।”

गौ की विशेषताऋषि वचनामृत2
सभी पशुओं की रक्षा का आदेश देते हुए ऋषि ने सबसे अधिक बल गौ पर ही दिया है। उन्होने लिखा है – “वर्तमान में परमोपकरक गौ की रक्षा में ही मुख्य तात्पर्य है।” एक ही गौ से होने वाले लाभ का सविस्तार ब्योरा लिखने के बाद ऋषि लिखते है कि “एक गाय कि एक पीढ़ी में चार लाख पचहत्तर हजार छ: सौ मनुष्यों का पालन होता है और पीढ़ी पर पीढ़ी बढ़ा कर लेखा करें तो असंख्य मनुष्यों का पालन होता है।” (स०प्र०) गुणों में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण ही आर्यों ने गाय को सब पशुओं को सर्वोत्तम माना है। आजकल तो सभी विद्वानों आदि ने स…

आहत भारत को समझने वाले नायपॉल

शंकर शरण

सर विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल के निधन पर मन में पहली बात यह आई कि पूर्वजों के भारत से दूर जा चुकने के बावजूद भारत और हंिदूू धर्म उनके जीवन में बना रहा। वह टैगोर के बाद साहित्य का नोबेल पाने वाले भी दूसरे हंिदूू मनीषी थे। त्रिनिदाद में जन्में वीएस नायपॉल न ईसाई बने और न ही उन्होंने अपना हंिदूू नाम बदला। नायपॉल ने भारत और भारतीयों के बारे में भी कई पुस्तकें लिखीं। उनका आरंभिक लेखन विवादास्पद भी रहा, परंतु बाद में उन्होंने भारत की विडंबना को अधिक गहराई से प्रस्तुत किया। वह बार-बार भारत आते रहे। वह यहीं रहना भी चाहते थे, लेकिन यहां के सत्ताधारियों ने रुचि नहीं दिखाई। नायपॉल ने लेखन के अलावा कभी कोई और काम नहीं किया। आरंभिक काल में भयंकर गरीबी ङोलने के बावजूद उन्होंने दो महीने छोड़कर पूरे जीवन कभी नौकरी नहीं की। सिर्फ इस कारण कि वह किसी के आदेश पालक नहीं रह सकते थे। चाटुकारिता का तो सवाल ही नहीं। इसीलिए वह बेलाग लिखने,बोलने के लिए प्रसिद्ध हुए और दुनिया ने उनका लोहा माना। विपुल कथा लेखन के अलावा उन्होंने अनूठी विधा में ‘इंडिया: ए वूंडेड सिविलाइजेशन’, ‘अमंग द बिलीवर्स’ और ‘बियोंड बिलीफ’ जैसी चर्चित पुस्तकें लिखी। दशकों के अनुभव से नायपॉल ने कहा था कि भारत में यह एक सचमुच गंभीर समस्या है कि बहुत कम हंिदूू यह जानते हैं कि इस्लाम क्या है? बहुत कम हंिदूुओं ने इसका अध्ययन किया है या इस पर कभी सोचा है। उनकी उपरोक्त तीनों पुस्तकें हमारे लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। 1अपने लेख ‘द राइटर एंड इंडिया’ में नायपॉल भारत में छह सौ साल चले इस्लामी शासनकाल के बारे में यहां छाई चुप्पी पर सवाल उठाते हैं। नायपॉल दिखाते हैं कि इस्लामी हमलावरों के सामने भी हमारे पूर्वज उतने ही असहाय थे जितने बाद में ब्रिटिश शासकों के समक्ष नजर आए, मगर इस पर कभी चर्चा नहीं होती। नायपॉल के अनुसार भारत के सिवा कोई सभ्यता ऐसी नहीं जिसने बाहरी दुनिया से निपटने के लिए आज भी इतनी कम तैयारी कर रखी हो। कोई अन्य देश इतनी आसानी से हमले और लूटपाट का शिकार नहीं हुआ। शायद ही कोई और देश होगा जिसने अपनी बर्बादियों से इतना कम सबक सीखा होगा। नि:संदेह नायपॉल कोई हंिदूूवादी लेखक नहीं थे। वह तो मुसलमानों एवं हंिदूुओं के प्रति समान रूप सहानुभूतिशील थे। उन्होंने केवल निर्मम तटस्थता से यथार्थ को हमारे समक्ष रखा था। इसमें इस्लाम और उसकी भूमिका वैसी ही रखी गई जैसी वह रही। भारत के सेक्युलरवादी बुद्धिजीवी इसी का बुरा मानते थे। जबकि बाहरी अवलोकनकर्ता के रूप में नायपॉल अनेक वैसी बातें सरलता से देख पाते थे जो भारतीय अपने राग-द्वेष पूर्वाग्रहों, मतवादों आदि के कारण नहीं देखते।1सच पूछें तो ‘इंडिया: ए वूंडेड सिविलाइजेशन’ में समकालीन हंिदूुओं, उनके नेताओं की बड़ी दयनीय छवि उभरती है। यह 1975-76 के बीच भारत की चतुर्दिक यात्र करके उसी दौरान लिखी गई थी। बंबई की चाल और अवैध बस्तियां, पूना-बंबई के बीच का देहात, इंजीनियर और शिव-सैनिक, बिहार की शस्य-श्यामला धरती पर पीड़ित बाल-मजदूर, विजयनगर के खंडहरों के बीच रहने वाले लोग, जयपुर के बाहर अकालग्रस्त आबादी, प्रशासन के प्रयास, महानगरों में उच्च-वर्गीय लोगों के वार्तालाप आदि असंख्य अनुभवों के बीच नायपॉल ने भारत की घायल सभ्यता को समझने का यत्न किया था। इस पुस्तक में नव-स्वतंत्र भारत का जन-जीवन ही नहीं, वरन कई विषयों पर गंभीर विश्लेषण भी है। गांधीजी का महात्मावाद, भारतीय बुद्धिजीवियों, प्रशासकों, आमजनों की रूढ़ियां, आदतें, टूटती परंपराएं, उभरता खालीपन, नैतिक संभ्रम, इंदिरा का आपातकाल, जेपी आंदोलन, नक्सलवाद, भारतीय प्र…

महर्षि दयानंद सरस्वती

काशी शास्त्रार्थ पर स्वयं महर्षि दयानन्द जी की टिप्पणी

● अब तक कोई भी वेद में मूर्तिपूजा का प्रमाण प्रमाण नहीं निकाल सका
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– भावेश मेरजा

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने 4 अगस्त 1875 को पूना में अपने जीवन वृत्तान्त के विषय में एक भाषण किया था। अन्य स्थानों की भांति पूना में भी कुछ लोगों को ऐसा संशय होने लगा था कि यदि यह स्वामी जी ब्राह्मण होते तो मूर्तिपूजा जैसी परम्परागत आस्थाओं के विरुद्ध ऐसा अभियान नहीं चलाते। इसलिए उनको अपने पूर्वाश्रम आदि के सम्बन्ध में कुछ बताना चाहिए और जो उनको पहले से जानते पहचानते हैं ऐसे कुछ लोगों के पत्रादि मंगाकर उपस्थित करने चाहिए। ऐसे हालात में स्वामी जी ने अपने बारे में कुछ बताने का उचित समझा और एक भाषण स्व-जीवन के विषय में दिया। इस भाषण में उन्होंने जन्म से लेकर तत्कालीन अवस्था पर्यन्त अपने जीवन तथा कार्यों का दिग्दर्शन प्रस्तुत किया। अपने इस भाषण में उन्होंने काशी के पण्डितों से 16 नवम्बर 1869 को हुए उस शास्त्रार्थ का भी उल्लेख किया, जिसने स्वामी जी को एक क्रान्तिकारी धर्मसंशोधक के रूप में देश-विदेश में विख्यात कर दिया था। इस शास्त्रार्थ के बारे में उन्होंने बताया –

“…प्रयाग से मैं रामनगर को गया। वहाँ के राजा की इच्छानुसार काशी के पण्डितों से शास्त्रार्थ हुआ। इस शास्त्रार्थ में यह विषय प्रविष्ट था कि वेदों में मूर्तिपूजा है या नहीं। मैंने यह सिद्ध करके दिखा दिया कि ‘प्रतिमा’ शब्द तो वेदों में मिलता है, परन्तु उसके अर्थ तौल नाप आदि के हैं। वह शास्त्रार्थ अलग छपकर प्रकाशित हुआ है, जिसको सज्जन पुरुष अवलोकन करेंगे। ‘इतिहास’ शब्द से ब्राह्मण ग्रन्थ ही समझने चाहिए, इस पर भी शास्त्रार्थ हुआ था। गत वर्ष के भाद्रपद मास में मैं काशी में था। आज तक चार बार काशी में जा चुका हूँ। जब-जब काशी में जाता हूँ तब-तब विज्ञापन देता हूँ कि यदि किसी को वेद में मूर्तिपूजा का प्रमाण मिला हो तो मेरे पास लेकर आवें, परन्तु अब तक कोई भी प्रमाण नहीं निकाल सका।”

[स्रोत : उपदेश मंजरी अथवा पूना प्रवचन, अन्तिम 15वां प्रवचन, प्रस्तुति : भावेश मेरजा]
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आर्यसमाज का राष्ट्र को योगदान

आर्यसमाज का राष्ट्र को योगदान arya14
|| ओ३म् ||
संसार में आर्य समाज एकमात्र ऐसा संगठन है जिसके द्वारा धर्म, समाज, और राष्ट्र तीनों के लिए अभूतपूर्व कार्य किए गए हैं, इनमे से कुछ इस प्रकार है –
वेदों से परिचय – वेदों के संबंध में यह कहा जाता था कि वेद तो लुत्प हो गए, पाताल में चले गए। किन्तु महर्षि दयानन्द के प्रयास से पुनः वेदों का परिचय समाज को हुआ और आर्य समाज ने उसे देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी पहुँचाने का कार्य किया। आज अनेक देशों में वेदो ऋचाएँ गूंज रही हैं, हजारों विद्वान आर्य समाज के माध्यम से विदेश गए और वे प्रचार कार्य कर रहे हैं। आर्य समाज कि यह समाज को अपने आप में एक बहुत बड़ी दें है।
सबको पढ़ने का अधिकार – वेद के संबंध में एक और प्रतिबंध था। वेद स्त्री और शूद्र को पढ़ने, सुनने का अधिकार नहीं था। किन्तु आज आर्य समाज के प्रयास से हजारों महिलाओं ने वेद पढ़कर ज्ञान प्रपट किया और वे वेद कि विद्वान हैं। इसी प्रकार आज बिना किसी जाति भेद के कोई भी वेद पढ़ और सुन सकता है। यह आर्य समाज का ही देंन है।
जातिवाद का अन्त – आर्य समाज जन्म से जाति को नहीं मानता। समस्त मानव एक ही जाति के हैं। गुण कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था को आर्य समाज मानता है। इसीलिए निम्न परिवारों में जन्म लेने वाले अनेक व्यक्ति भी आज गुरुकुलों में अध्यन कर रहे हैं। अनेक व्यक्ति शिक्षा के पश्चात आचार्य शास्त्री, पण्डित बनकर प्रचार कर रहे हैं।
स्त्री शिक्षा – स्त्री को शिक्षा का अधिकार नहीं है, ऐसी मान्यता प्रचलित थी। महर्षि दयानन्द ने इसका खण्डन किया और सबसे पहला कन्या विद्यालय आर्य समाज की ओर से प्रारम्भ किया गया। आज अनेक कन्या गुरुकुल आर्य समाज के द्वारा संचालित किए जा रहे हैं।
विधवा विवाह – महर्षि दयानन्द के पूर्व विधवा समाज के लिए एक अपशगून समझी जाति थी। सतीप्रथा इसी का एक कारण था। आर्य समाज ने इस कुरीति का विरोध किया तथा विधवा विवाह को मान्यता दिलवाने का प्रयास किया।
छुआछूत का विरोध – आर्य समाज ने सबसे पहले जातिगत ऊँचनीच के भेदभाव को तोड़ने की पहल की। इस आधार पर बाद में कानून बनाया गया। अछूतोद्धार के सम्बन्ध में आर्य सन्यासी स्वामी श्रद्धानन्द ने अमृतसर काँग्रेस अधिवेशन में सबसे पहले यह प्रस्ताव रखा था जो पारित हुआ था।
देश की स्वतन्त्रता में योगदान – परतंत्र भारत को आजाद कराने में महर्षि दयानन्द को प्रथम पुरोधा कहा गया। सन् 1857 के समय से ही महर्षि ने अंग्रेज़ शासन के विरुद्ध जनजागरण प्रारम्भ कर दिया था। सन् 1870 में लाहौर में विदेशी कपड़ो की होली जलाई। स्टाम्प ड्यूटी व नमक के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ा परिणाम स्वरूप आर्यसमाज के अनेक कार्यकर्ता व नेता स्वतन्त्रता संग्राम में देश को आजाद करवाने के लिए कूद पड़े।
स्वतन्त्रता आंदोलनकारियों के सर्वेक्षण के अनुसार स्वतन्त्रता के लिए 80 प्रतिशत व्यक्ति आर्यसमाज के माध्यम से आए थे। इसी बात को काँग्रेस के इतिहासकार डॉ॰ पट्टाभि सीतारमैया ने भी लिखी है। लाला लाजपतराय, पं॰ रामप्रसाद बिस्मिल, शहीदे आजम भगत सिंह, श्यामजी कृष्ण वर्मा, मदनलाल ढींगरा, वीर सावरकर, महात्मा गांधी के राजनैतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले आदि बहुत से नाम हैं।
गुरुकुल – सनातन धर्म की शिक्षा व संस्कृति के ज्ञान केंद्र गुरुकुल थे, प्रायः गुरुकुल परम्परा लुप्त हो चुकी थी। आर्य समाज ने पुनः उसे प्रारम्भ किया। आज सैकड़ों गुरुकुल देश व विदेश में हैं।
गौरक्षा अभियान – ब्रिटिश सरकार के समय में ही महर्षि दयानन्द ने गाय को राष्ट्रिय पशु घोषित करने व गोवध पर पाबन्दी लगाने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया था। गौ करुणा निधि नामक पुस्तक लिखकर गौवंश के महत्व को बताया और गाय के अनेक लाभों को दर्शाया। महर्षि दयानन्द गौरक्षा को एक अत्यंत उपयोगी और राष्ट्र के लिए लाभदायक पशु मानकर उसकी रक्षा का सन्देश दिया। ब्रिटिश राज के उच्च अधिकारियों से चर्चा की, 3 करोड़ व्यक्तियों के हस्ताक्षर गौवध के विरोध में करवाने का का कार्य प्रारम्भ किया,। गौ हत्या के विरोध में कई आन्दोलन आर्य समाज ने किए। आज गौ रक्षा हेतु लाखो गायों का पालन आर्य समाज द्वारा संचालित गौशालाओं में हो रहा है।
हिन्दी को प्रोत्साहन – महर्षि दयानन्द सरस्वती ने राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने के लिए एक भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिलाने के लिए सर्वप्रथम प्रयास किया। उसका प्रत्यक्ष उदाहरण है अहिन्दी भाषी प्रदेशों या विदेशों में जहाँ-जहाँ आर्य समाज हैं वहाँ हिन्दी का प्रचार है।
यज्ञ – सनातन धर्म में यज्ञ को बहुत महत्व दिया है। जीतने शुभ कर्म होते हैं उनमे यज्ञ अवश्य किया जाता है। यज्ञ शुद्ध पवित्र सामाग्री व वेद के मन्त्र बोलकर करने का विधान है। किन्तु यज्ञ का स्वरूप बिगाड़ दिया गया था। यज्ञ में हिंसा हो रही थी। बलि दी जाने लगी थी।
वेद मंत्रो के स्थान पर दोहे और श्लोकों से यज्ञ किया जाता था। यज्ञ का महत्व भूल चुके थे। ऐसी स्थिति में यज्ञ के सनातन स्वरूप को पुनः आर्य समाज ने स्थापित किया, जन-जन तक उसका प्रचार किया और लाखों व्यक्ति नित्य हवन करने लगे। प्रत्येक आर्य समाज में जिनकी हजारों में संख्या है, सभी में यज्ञ करना आवश्यक है। इस प्रकार यज्ञ के स्वरूप और उसकी सही विधि व लाभों से आर्य समाज ने ही सबको अवगत करवाया।
शुद्धि संस्कार व सनातन धर्म रक्षा – सनातन धर्म से दूर हो गए अनेक हिंदुओं को पुनः शुद्धि कर सनातन धर्म में प्रवेश देने का कार्य आर्य समाज ने ही प्रारम्भ किया। इसी प्रकार अनेक भाई-बहन जो किसी अन्य संप्रदाय में जन्में यदि वे सनातन धर्म में आना चाहते थे, तो कोई व्यवस्था नहीं थी, किन्तु आर्य समाज ने उन्हे शुद्ध कर सनातन धर्म में दीक्षा दी, यह मार्ग आर्य समाज ने ही दिखाया। इससे करोड़ों व्यक्ति आज विधर्मी होने से बचे हैं। सनातन धर्म का प्रहरी आर्य समाज है। जब-जब सनातन धर्म पर कोई आक्षेप लगाए, महापुरुषों पर किसी ने कीचड़ उछाला तो ऐसे लोगों को आर्य समाज ने ही जवाब देकर चुप किया। हैदराबाद निजाम ने सांप्रदायिक कट्टरता के कारण हिन्दू मान्यताओं पर 16 प्रतिबंध लगाए थे जिनमें – धार्मिक, पारिवारिक, सामाजिक रीतिरिवाज सम्मिलित थे। सन् 1937 में पंद्रह हजार से अधिक आर्य व उसके सहयोगी जेल गए तीव्र आंदोलन किया, कई शहीद हो गए।
निजाम ने घबराकर सारी पाबन्दियाँ उठा ली, जिन व्यक्तियों ने आर्य समाज के द्वारा चलाये आंदोलन में भाग लिया, कारागार गए उन्हे भारत शासन द्वारा स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों की भांति सम्मान देकर पेंशन दी जा रही है।
सन् 1983 में दक्षिण भारत मीनाक्षीपुरम में पूरे गाँव को मुस्लिम बना दिया गया था। शिव मंदिर को मस्जिद बना दिया गया था। सम्पूर्ण भारत से आर्यसमाज के द्वारा आंदोलन किया गया और वहाँ जाकर हजारों आर्य समाजियों ने शुद्धि हेतु प्रयास किया और पुनः सनातन धर्म में सभी को दीक्षित किया, मंदिर की पुनः स्थापना की।
कश्मीर में जब हिंदुओं के मंदिर तोड़ना प्रारम्भ हुआ तो उनकी ओर से आर्य समाज ने प्रयास किया और शासन से 10 करोड़ का मुआवजा दिलवाया।
ऐसे अनेक कार्य हैं, जिनमें आर्य समाज सनातन धर्म की रक्षा के लिए आगे आया और संघर्ष किया बलिदान भी दिया।
इस प्रकार आर्य समाज मानव मात्र की उन्नति करने वाला संगठन है, जिसका उद्देश्य शारीरिक, आत्मिक व सामाजिक उन्नति करना है। वह अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहकर सबकी उन्नति में अपनी उन्नति मानता है।
इसलिए आर्य समाज को जो मानव मात्र की उन्नति के लिए, सनातन संस्कृति के लिए प्र्यत्नरत है उसके सहयोगी बनें। परंतु आर्य समाज के प्रति भ्रम होने से कुछ ऐसा है –
जिन्हें फिक्र है ज़ख्म की, उन्हे कातिल समझते हैं।
फिर तो, यो ज़ख्म कभी ठीक हो नहीं सकता हैं aryasamaj indore m.p.9977987777,9977957777,