आत्मविश्वास

आत्मविश्वास

इस सकल सृष्टि में करोड़ों योनियों का विवरण मिलता है । जिसमें सर्वश्रेष्ठ मानव योनि कही गई है । परमपिता परमात्मा ने मनुष्य शरीर देकर हमारे ऊपर जो उपकार किया है इसकी तुलना नहीं की जा सकती है। मानव जीवन पाकर के यदि मनुष्य के अंदर आत्मविश्वास न हो तो यह जीवन व्यर्थ ही समझना चाहिए। क्योंकि मानव जीवन तभी सार्थक माना जा सकता है जब जीवन के प्रत्येक क्षण को आत्मविश्वास के साथ निश्चिंतता, निर्द्वंदता एवं निर्भीकता के साथ व्यतीत किया जाय। जहां पर मनुष्य डरते हुए आशंकाओं से ग्रस्त रहते हुए जीवन व्यतीत करता है उसे दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।

ऐसे दुर्लभ मानव जीवन को पा करके यदि मात्र चिंता करते हुए या आशंकित रहते हुए यह जीवन व्यतीत किया जाए तो यह दुर्लभ मानव जीवन नहीं बल्कि एक शाप ही कहा जा सकता है। यह मानव जीवन सौभाग्य में तभी परिवर्तित हो सकता है जब मनुष्य के अंदर आत्मविश्वास हो। आत्मविश्वास उसी को हो सकता है जिसको ईश्वर के ऊपर पूरा विश्वास है। जिस प्रकार कोई अधिकारी अपनी सुरक्षा में लगे हुई जवानों के सुरक्षाचक्र में स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है, उसी प्रकार उस परमसत्ता के सुरक्षाचक्र में स्वयं को सुरक्षित महसूस करने वाला मनुष्य ही आत्मविश्वासी हो सकता है।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मनुष्य ना तो ईश्वर के ऊपर विश्वास कर पा रहा है और ना ही उसे स्वयं के ऊपर ही विश्वास रह गया है। यह अकाट्य सत्य है कि स्वयं के ऊपर विश्वास तभी हो सकता है जब मनुष्य यह मान ले उसके सुरक्षा का भार ईश्वरीय सत्ता स्वयं संभाल रही है। आज किसी भी क्षेत्र में, किसी भी कार्य में यदि मनुष्य असफल हो जाता है तो वह दोषारोपण करने लगता है, कभी समाज पर , तो कभी ईश्वर पर। जबकि उसके असफल होने का एक ही कारण होता है उसके स्वयं की आत्मविश्वास की कमी होना।

जिस मनुष्य के अंदर आत्मविश्वास की पूर्णता है वह कभी भी किसी भी कार्य में असफल नहीं हो सकता। यदि वह एकाध बार असफल भी हो जाता है तो पुन: उस कार्य को पूरा करने के लिए प्रयासरत हो जाता है, क्योंकि उसे ईश्वर के ऊपर पूर्ण विश्वास होता है। ऐसा करके वह अपने परिश्रम एवं ईश्वर की कृपा से अपने कार्य में सफल हो जाता है और उसका आत्मविश्वास उसे बिजयी बनाता है। प्राय: मनुष्य अपनी क्षमता को पहचान नहीं पाता क्योंकि अपनी क्षमता को पहचान करके अपने ऊपर पूर्ण विश्वास करने की क्षमता उसमें ही हो सकती है जो उस अदृश्य शक्ति परमात्मा के ऊपर विश्वास करना जानता हो। क्योंकि यह सत्य है जिसका स्वयं अपने ऊपर विश्वास नहीं है वह दूसरों का भी विश्वास पात्र नहीं बन पाता। परमात्मा भी उसी की सहायता करता है जो स्वयं अपनी सहायता करना जानता है। मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका आत्मविश्वास है बिना आत्मविश्वास के किसी भी कार्य में सफल होना दिवास्वप्न के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

प्रत्येक मनुष्य में आत्मविश्वास का होना बहुत आवश्यक है, क्योंकि बिना आत्मविश्वास के कोई भी मनुष्य सफलता नहीं प्राप्त कर सकता है और न ही वह अपना भविष्य स्वर्णिम कर सकता है।

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यदि परोपकार करने की आपकी इच्छा हो

23.9.2020

यदि परोपकार करने की आपकी इच्छा हो, तो परोपकार करने से पहले स्वयं अपनी योग्यता बनाएं, और फिर स्वयं परोपकार करें। दूसरे योग्य व्यक्तियों को परोपकार करने का आदेश/उपदेश न देवें। यह असभ्यता है।
बहुत से लोगों में पूर्व जन्मों के अच्छे संस्कार होते हैं। उन संस्कारों के कारण, उनमें सेवा परोपकार की भावना उत्पन्न होती है। यह अच्छी बात है। परंतु उन भावनाओं पर वे भावुक लोग नियंत्रण नहीं रख पाते। और यह चाहते हैं, कि जल्दी से जल्दी इस संसार का सुधार हो जाए। फटाफट लोग सुधर जाएं। अंधविश्वास पाखंड अन्याय शोषण चोरी डकैती लूट मार अत्याचार स्मगलिंग आदि सब बुरे काम जल्दी से बंद हो जाएं।
परंतु केवल ऐसी भावनाएं रखने से या ऐसी इच्छाएँ रखने से ये सब बुरे काम बंद नहीं होते। इसके लिए व्यक्ति को बहुत पुरुषार्थ करना पड़ता है। बहुत सी कलाएं सीखनी पड़ती हैं। बहुत से शास्त्रों का अध्ययन करना पड़ता है। बहुत सी विद्वता प्राप्त करनी पड़ती है। बहुत सा तर्क वितर्क भी सीखना पड़ता है। ऊंचे पद और अधिकार प्राप्त करने पड़ते हैं। तब जाकर कुछ परिणाम आता है। इतना सब करने में बहुत समय और परिश्रम की आवश्यकता होती है।
अब वे भोले भावुक लोग जो सेवा परोपकार की भावना रखते हैं, उन्हें इन बातों का अनुभव नहीं होता, कि यह संसार कैसे सुधरेगा? वे इधर उधर बहुत से हाथ पैर मारते हैं, परंतु कोई परिणाम दिखता नहीं। धीरे-धीरे उन्हें अनुभव हो जाता है, कि देश दुनियां को सुधारने के लिए बहुत लंबी तपस्या करनी पड़ेगी, तब कुछ परिणाम आएगा।
अब वे भावुक लोग इतनी सारी तपस्या करना नहीं चाहते। बस इतना ही चाहते हैं कि, रातों रात सुधार हो जाए। परंतु आप सब जानते हैं कि, केवल इच्छा करने से, और आलसी बनकर बैठे रहने से तो कार्य सिद्ध होता नहीं।
जब वे देखते हैं कि हम देश दुनियाँ का सुधार चाहते हैं, और इसके लिए बहुत लंबी तपस्या, धैर्य, संयम, योग्यता, शास्त्रों का अध्ययन, उच्च पद की प्राप्ति, सत्ता, अधिकार आदि सब चाहिए। हम यह सब प्राप्त कर नहीं पा रहे, या इसमें बहुत परिश्रम और समय लगेगा, इतना परिश्रम और समय हम खर्च करना नहीं चाहते। क्योंकि यह सब करने में बहुत कष्ट होता है। और हम यह कष्ट उठाना नहीं चाहते।
तब वे भोले भावुक लोग ऐसा सोचते हैं, कि जो लोग इन ऊंचे पदों पर बैठे हैं, जिनके पास सत्ता है, अधिकार है, संपत्ति है, पुलिस है, सेना है, शक्ति है, विद्या है, जो उत्तम विद्वान हैं, शास्त्रों के पंडित हैं, उच्च पदों पर आसीन अधिकारी हैं, क्यों न हम उनसे यह काम करवा लेवें!
ऐसा सोच कर वे भावुक अज्ञानी लोग इन बड़े योग्य अधिकारी विद्वानों को कहते हैं, कि आप इस प्रकार के काम को करें।
ऐसे भोले भंडारी अज्ञानी भावुक लोग इतना भी नहीं सोचते, कि जिन विद्वानों और अधिकारियों ने लंबी तपस्या पुरुषार्थ करके इन उच्च पदों योग्यताओं और कलाओं को प्राप्त किया है, क्या उन्होंने आपके आदेश का पालन करने के लिए यह सारी लंबी तपस्या की थी?
ऐसे अज्ञानी भावुक लोगों को यह सोचना चाहिए, कि यदि हमारी भावनाएं हैं, देश दुनियाँ की उन्नति हो, तो क्या इनकी भावनाएं नहीं हैं जो उच्च पदों पर बैठे हैं, ऊंचे विद्वान हैं? इन्होंने क्या सोचकर इतनी लंबी तपस्या की है? जब इनके मन में भी परोपकार की भावना है, और इन्होंने लंबी तपस्या की है, तो हमें क्या अधिकार है इनको इस प्रकार का उपदेश/आदेश देने का, कि आप इस प्रकार के कार्य को करें ?
परंतु भोले भावुक अज्ञानी लोग इस प्रकार की गलती/मूर्खता/असभ्यता करते ही रहते हैं। मेरा आप सब से निवेदन है, कि यदि आप भी ऐसी भावना रखते हों, तो सावधान! किसी दूसरे को आदेश मत दीजिए, उपदेश मत दीजिए, कि आप इस काम को करें। यदि आप में परोपकार करने की इतनी ही भावना और तीव्र इच्छा है, तो आप स्वयं पुरुषार्थ क्यों नहीं करते? स्वयं तपस्या क्यों नहीं करते? , योग्य विद्वान क्यों नहीं बनते? ऊंची सत्ता एवं अधिकार को प्राप्त क्यों नहीं करते? पहले आप अपनी योग्यता बनाएँ, और फिर उस काम को स्वयं करें। दूसरे पुरुषार्थी लोगों ने, आप के आदेश का पालन करने के लिए इतनी योग्यता नहीं बनाई थी। उनको आदेश/उपदेश देकर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन न करें।
स्वयं कुछ करना नहीं, दूसरे को आदेश/ उपदेश देना, यह असभ्यता है। असभ्यता का व्यवहार करने से बचें।
कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो पूरी योग्यता बनाते नहीं और कच्ची/अधूरी योग्यता में ही समाज सेवा के काम शुरु कर देते हैं। ऐसे लोग भी बहुत हानिकारक होते हैं। एक पुरानी कहावत आपने सुनी होगी, नीम हकीम, ख़तरा ए जान, अर्थात् जो अभी अधूरा वैद्य है, उसे पूरी चिकित्सा करनी आती नहीं, और वह रोगियों की चिकित्सा करने लगे, तो निश्चित रूप से वह रोगियों को मारेगा। लाभ के स्थान पर, उल्टा समाज की हानि करेगा।
इसलिए अधूरी योग्यता में भी समाज सेवा परोपकार के काम नहीं करने चाहिएँ। पहले धैर्यपूर्वक पूरी तपस्या करें, पूरी योग्यता बनाएं, फिर अधिकार पूर्वक कार्य करें। जैसे एक चिकित्सक पूरी लंबी मेहनत करके, योग्यता बनाकर, प्रामाणिक डिग्री प्राप्त करके, उसके बाद चिकित्सा आरंभ करता है।
– स्वामी विवेकानंद परिव्राजक

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धैर्य का फल मीठा होता है।

पुरानी कहावत है, “धैर्य का फल मीठा होता है।” आज भी इस कहावत की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी पहले थी।

आपने देखा होगा कुछ लोग बड़े धैर्यशाली होते हैं। और कुछ लोग बड़े उतावले या जल्दबाज होते हैं। वे हर काम में जल्दी करते हैं। और अनेक बार ऐसा भी देखा जाता है कि वे जितनी अधिक जल्दी करते हैं, उतनी ही उनसे गलतियां अधिक होती हैं। गलतियां अधिक होने से उनके काम उतनी ही देर से होते हैं और बिगड़ते जाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें क्रोध आता है। क्योंकि वे गलतियां उन्होंने स्वयं की हैं, अपनी जल्दबाजी के कारण ही उनका काम विलंब से हुआ, इसलिए वे स्वयं पर झल्लाने लगते हैं। स्वयं पर ही गुस्सा करते हैं। ऐसा करना उचित नहीं है।
इन सारी गलतियों से और झल्लाहट से यदि व्यक्ति चाहे तो बच सकता है। थोड़ा धैर्य को धारण करना होगा। जल्दबाजी को कम करना होगा। सुबह उठते ही सबसे पहला संकल्प यही करें, कि “मैं सब काम धैर्यपूर्वक करूंगा, किसी भी काम में जल्दबाजी नहीं करूंगा.” प्रतिदिन इस प्रकार से संकल्प करने से आपके मन पर धैर्य से काम करने का संस्कार पड़ेगा। धीरे-धीरे यह संस्कार बलवान होता जाएगा और आप दिनभर की क्रियाओं को धैर्य से करेंगे। जल्दबाजी नहीं करेंगे। इसका परिणाम यह होगा कि – आप की गलतियां कम होती जाएंगी। जैसे-जैसे गलतियां कम होती जाएंगी, वैसे-वैसे झल्लाहट और क्रोध भी कम होता जाएगा। आपको शांति मिलेगी। आपके सारे कार्य अच्छी प्रकार से संपन्न होंगे। बुद्धि भी ठीक रहेगी। बुद्धि के ठीक रहने से आप दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार भी करेंगे।
एक बात और है। जब हम कहते हैं कि धैर्य का पालन करें। सब काम शांति से सोच समझ कर करें। तो बहुत से लोग कहते हैं, कि साहब यह हमसे हो नहीं पाता। धैर्य रखना बहुत कठिन है।
ठीक है, हम मान लेते हैं, कि धैर्य रखना कुछ कठिन है, परंतु असंभव नहीं है। इसमें थोड़ा कष्ट तो होता है। परंतु यह भी तो सत्य है, कि बिना कष्ट उठाए कोई सुख भी तो नहीं मिलता।
ऋषि लोग कहते हैं, भले ही धैर्य रखना कष्टकारक है, धैर्य का बीज और वृक्ष भले ही कड़वा है, परंतु जब इस वृक्ष पर फल आते हैं, तो बहुत मीठे होते हैं। आप सोचेंगे, कड़वे बीज और वृक्ष पर मीठे फल कैसे आएंगे? तो स्वयं परिक्षण कर लीजिए। आम का बीज खाकर देखिए, वृक्ष को थोड़ा तोड़कर खा कर देखिये, कड़वा लगेगा। लेकिन उस वृक्ष पर आम के फल बहुत मीठे आते हैं।
बीज एवं वृक्ष तो प्रायः कड़वे ही होते हैं। परंतु जब वृक्ष बड़ा हो जाता है और फल पूरा पक जाता है, तब उसमें ईश्वर की व्यवस्था से मिठास उत्पन्न हो जाती है। इसलिए मीठे फल खाने के लिए धैर्य का थोड़ा कड़वा बीज और वृक्ष भी अपने अंदर धारण करना पड़ेगा। कुछ समय बाद बहुत अच्छे मीठे फल खाने को मिलेंगे, अर्थात् परिणाम बहुत सुखदायक होंगे।
कुल मिलाकर सार यह हुआ, कि धैर्य को धारण करने से, आप स्वयं भी सुखी रहेंगे और दूसरों को भी सुख देंगे। न आपके काम बिगड़ेंगे, और न दूसरों के। इसलिए थोड़ी सावधानी रखने की आवश्यकता है। धैर्य से सब काम करें, जल्दबाजी न करें।
– स्वामी विवेकानंद परिव्राजक

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सितंबर माह में बलिदानी हुए आर्य समाज के योध्दा

सितंबर माह में बलिदानी हुए आर्य समाज के योध्दा
भारत गौरव
सितंबर 23, 2020
डॉ. अशोक आर्य
आर्य समाज एक मत पंथ नहीं अपितु वैदिक धर्म का अनुगामी एक वेद प्रचारक और समाज सुधारक संगठन है| इस संगठन ने जो अल्प समय में कार्य कर दिखाया है, वह विश्व के किसी अन्य समुदाय ने नहीं किया| यह कार्य करते हुए इसके वीरों ने अपने बलिदान भी दिए, संकट भी सहे, परिवारों की दुर्गति भी हुई किन्तु इसके सदस्यों ने अपने जीवन, अपने परिवार का मूल्य इससे अधिक कभी नहीं होने दिया| आओ इस की बलिदानी परम्परा में सितम्बर महीने से सम्बंधित कुछ वीरों को याद करें|

महाप्रस्थान गुरु विरजानंद जी डण्डी
गुरु विरजानंद जी क जन्म पंजाब के जालंधर के पास करतारपुर क्षेत्र में हुआ| छोटी आयु में ही चेचक के कारण आखें चली गईं किन्तु तो भी आपने अपने परिश्रम से उच्चकोटि की शिक्षा प्राप्त की| आपको अपने समय का व्याकरण का सूर्य कहा जाता है| अनेक व्यक्तियों को आपने शिक्षा दी| आप केवल आर्ष ग्रन्थों को ही पढ़ाते थे| स्वामी दयानंद सरस्वती जी की लग्न, उत्साह, तथा अनुरक्ति की भावना से आप अत्यधिक प्रसन्न थे| इसका ही परिणाम था कि स्वामी दयानंद जी भी आपसे शिक्षा प्राप्त कर अभूतपूर्व विद्वान् बन गए| गुरुदक्षिणा स्वरूप आपके वेद प्रचार तथा संसार से अज्ञान, आन्याय और अभाव को मिटाने के आदेश को जीवन में धारण किया तथा इस निमित्त ही अपना पूरे का पूरा जीवन आहूत कर दिया| आर्य समाज आज जिस प्रौढ़ रूप में दिखाई दे रहा है, यह गुरु जी के इस आदेश का ही परिणाम है| भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के आप सूत्राधार थे| आपका देहांत अश्विन वदी त्रयोदशी संवत् ११९२५ विक्रमी को हुआ|

बलिदानी ताराचंद जी
संवत् १९७३ की श्रावण वदी ११ को मेरठ के गाँव लुम्बा में जन्मे ताराचंद जी भी आर्य समाज के अत्यधिक अनुरागी थे| हैदराबाद सत्याग्रह में अपने चचेरे भाई सहित पंडित जगदेव सिंह सिद्धान्ती जी के जत्थे के साथ जेल गए| जेल की यातनाओं ने उन्हें इतना कमजोर कर दिया कि निजाम हैदराबाद को जेल में भी आपका बोझ सहन नहीं हो रहा था| अत: आपको जेल से बाहर फैंक दिया गया| आप किसी प्रकार घर के लिए लौट रहे थे कि मार्ग में आपकी दयनीय अवस्था को देख कर डा. परांजपे जी ने आपको नागपुर में उतार लिया और आपका उपचार आरम्भ किया किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ और २ सितम्बर १९३९ ईस्वी को आपका देहांत हो गया|

जन्म पंडित गंगापसाद उपाध्याय
पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय आर्य समाज के उच्चकोटि के विचारक, दार्शनिक तथा लेखक थे| आपने आर्यसमाज को उच्चकोटि का साहित्य दिया| आपने अपनी पत्नी का जीवन भी लिखा| यह जीवन चरित विश्व साहित्य के किसी महान् व्यक्ति के हाथों लिखा अपनी पत्नी का प्रथम प्रकाशित जीवन चरित है| आपने अपनी पत्नी के नाम से कलाप्रैस की स्थापना की| इस प्रैस से उच्चकोटि का वैदिक साहित्य प्रकाशित होता रहा| विश्व के महान् वैज्ञानिक तथा संन्यासी स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती जी आप ही के सुपुत्र थे| आपका देहांत २९ अगस्त १९६८ ईस्वी को हुआ|

जन्म स्वामी नित्यानंद जी
झज्जर के गाँव कलोई निवासी चौधरी झुण्डाराम धनखड तथा माता सरतीदेवी के यहाँ विक्रमी संवत् १९४८ को जन्मे सुपुत्र न्योंनंद सिंह ही आगे चलकर स्वामी नित्यानंद जी के नाम से जाने गए| आप पांच भाई बहिन थे| पिताजी ने कुछ हिंदी का ज्ञान दिया| संवत् १८६३ में गाँव में आर्य समाज की स्थापना के साथ ही आपकी भी आर्य समाज के साथ रूचि बनी| भजन गायन में आपको अत्यधिक रूचि थी| जब धर्मांध ब्राहमणों ने आपका यज्ञोपवीत उतरवा दिया तो आपने आर्य समाज में जाकर नया यज्ञोपवीत पहिना| १९३९ में हैदराबाद सत्याग्रह में साढ़े तीन महीने जेल में रहे| लौहारु क्षेत्र में आर्य समाज के प्रचार का श्रेय आपको ही जाता है| यहाँ आप पर खूब प्रहार हुए| सन् १९४२ में आपकी पत्नी दाखादेवी गुरुकुल खानपुर में सेवा करने लगी, यहीं पर ही सन् १९८२ में उनका निधन हो गया| जब आप निदाना गाँव में आर्य समाज का प्रचार कर रहे थे तभी किसी ने सांग आरम्भ कर दिया| आपके कहने पर एक आर्यवीर ने उस सांगी को गोली मार दी| आपने हिंदी रक्षा आन्दोलन तथा गोरक्षा आंदोलन में भी भाग लिया| प्रचार में जो कुछ भी धन आपको मिलता वह सब गुरुकुल को दानकर देते थे|

बलिदान रामनाथ जी
मोती भाई रणछोड़ तथा माता मणि भैण कस्बा असारवा जिला अहमदाबाद निवासी के यहाँ ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी संवत् १९७३ विक्रमी तदनुसार १६ जून १९१७ ईस्वी को जन्मा बालक ब्रह्मचारी रामनाथ के नाम से सुप्रसिद्ध हुआ पिताजी की इच्छा के अनुरूप आपमें बाल्यकाल से ही समरसता के विचार तथा आर्य समाज के प्रचार की भावना भरी थी| सेवा के समय आप अपने आवश्यक कार्य भी छोड़ देते थे| हरिजनों को समान अधिकार दिलाने तथा जाती को मुस्लिम आधिपत्य से छुडाने के लिए आप सदा ही जूझते रहे| सेवा के प्रति इतनी श्रद्धा थी कि गर्मियों में ठण्डे पानी की छबील लगा कर लोगों के लिए जल सेवा का कार्य किया करते थे| सविनय अवज्ञा आन्दोलन में नोऊ महीने तक जेल के कष्ट सहन किये| हैदराबाद सत्याग्रह में भगा लेकर अनानुषिक कष्टों का सामना किया| जेल कि यातनाओं के कारण भयंकर रोग लग गया, निजाम को जब विश्वास हो गया कि अब आपका जीवनांत होने वाला है तो जेल से रिहा कर दिया गया| इस रिहाई के मात्र दो सप्ताह बाद ही दिनांक ८ सितम्बर १९३९ ईस्वी को ख़ुशी ख़ुशी बलिदान हो गए|

बलिदानी नाथूराम
हैदराबाद, सिंध के संभ्रांत ब्राह्मण पंडित कीमतराय जी के इकलौते सुपुत्र नाथूराम जी बालपन से ही मनमौजी तथा गंभीर स्वभाव के धनी थे| जब १९२७ ईस्वी में आर्य समाज में प्रवेश किया तो परिवार आपसे रुष्ट हो गया किन्तु इसकी चिंता तक नहीं की तथा हैदराबाद में आर्य युवक समाज की स्थापना होने पर इसके सदस्य बने| आप पौराणिकों को निरुत्तर कर देते थे| जब मुसलमानों के अहमदी फिरके की नवगठित अंजुमन ने हिन्दू देवताओं पर छींटाकशी की तो इसका उत्तर देते हुए आपने उर्दू पुस्तक “ तारीखे इस्लाम” का सिन्धी भाषा में अनुवाद कर मुसलमान मौलवियों से अनेक प्रश्न पूछे| उत्तर देने के स्थान पर आप पर मुसलमानों ने मुकद्दमा दायर कर दिया| दिया| केस की सुनवाई के समय न्यायालय हाल में ही धर्मांध मुसलमान ने आपको छुरा मारकर दिनांक २० सितम्बर १९३४ ईस्वी को बलिदान कर दिया|

बलिदान नारूमल जी
कराची के मुनियारी के व्यापारी आसुमल जी के यहाँ सन् १९१० ईस्वी में नारूमल जी का जन्म हुआ| आपके परिवार में देशभक्ति की सरिता निरंतर बहा करती थी| आपके सब भाई और बहिन आर्य समाज के कार्य करते रहते थे| आपको लाठी चलाने और व्यायाम करने में अत्यधिक रूचि थी| आप कांग्रेस से भी प्रेम करते थे तथा खादीधारी भी थे| पिता तो स्वर्ग सिधार चुके थे| माता तथा भाई अनेक आन्दोलनों में भाग लेने के कारण जेल जाते और छूटते रहते थे| १९३०-१९३१ के आन्दोलन में आपको भी काफी चोटें आईं| इन दिनों मुसलमान हिन्दुओं के प्रति घृणा फैला रहे थे| आप मुसलमानों की इसी घृणा का ही शिकार हो गए| आपकी दुकान पर खोजा जाति के एक ग्राहक ने कहा कि तुम आर्य समाजी हो, काफिर हो तथा यह कहते हुए छुरे से आपके पेट तथा हाथों पर कई वार किये और भाग गया| आपकी सेवा भावना के कारण हिन्दु और मुसलमान दोनों समुदायों के लोगों ने हड़ताल कर दी| अंत में कातिल पकड़ा गया| आप अस्पताल में घावों को न सहते हुए बलिदान हो गए जबकि कातिल को फांसी हुई|

महाप्रस्थान पंडित नरेंद्र जी
पंडित नरेंद्र जी आर्य समाज में ही नहीं हैदराबाद निजाम की नजरों में भी लौहपुरुष के रूप में जाने जाते थे| हैदराबाद में निजाम के अत्याचारों का विरोध न केवल लेखनी से अपितु संगठन के माध्यम से भी करते रहे| उनकी संगठन कला भी बेमिसाल थी| अनेक बार जेल गए| भयानक कैदियों के साथ जो व्यवहार किया जाता है, वही व्यवहार पंडित जी के साथ निजाम की जेल में हुआ| जब निजाम हैदराबाद ने इन्हें देखा तो पूछने पर उन्हें बताया गया कि हुजुर यह वही डेढ़ बलिष्ठ का नरेंद्र है, जिसने पूरी हैदराबाद रियासत के नाक में दम कर रखा है| जेल में पीट पीट कर उनकी तथा सभा के के कर्मचारी हीरालाल की हड्डियां तोड़ दीं| जब इन दोनों को उपचार के लिए अस्पताल भेजा गया तो आपने कहा कि पहले हीरानंद का उपचार करो फिर मेरा करना| प्रबंध पटु पंडित नरेंद्र जी ने मथुरा अर्धशताब्दी का ऐसा सुन्दर प्रबंध किया कि लोग देखते ही रह गए| २४ सितम्बर को आपने इस दुनियां से महाप्रस्थान किया|

महाशय राजपाल जी
महाशय राजपाल लाहौर में आर्य समाज के एक निर्भीक पुस्तक प्रकाशक थे| आर्य समाज की पुस्तकों के प्रकाशन के समय वह बड़े से बड़ा खतरा मोल लेने से भी कभी भयभीत नहीं होते थे| ऐसी ही पंडित चमूपति जी की एक पुस्तक प्रकाशित करने पर मुसलमान कुपित हो उठे तथा हाथ धोकर महाशय जी के पीछे पड गए| एक दिन अवसर पाकर एक धर्मांध मुसलमन ने छुरे के वार से उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया| कातिल तो पकड़ा गया किन्तु महाशय राजपाल जी को नहीं बचाया जा सका| वह धर्म की बलिवेदी पर अपनी बलि चढ़ा गए| दिल्ली के कश्मीरी गेट में राजपाल एंड संस नामक पुस्तक प्रकाशक का कार्य उनकी ही स्मृति में चल रहा है| आपका जन्म २७ सितम्बर को हुआ था|

पंडित क्षितिश कुमार वेदालंकार
आपका जन्म १६ सिताम्बर १९१५ ईस्वी को दिल्ली में उस दिन हुआ, जिस दिन भरत मिलाप हुआ था| आप उच्चकोटि के लेखक, पत्रकार तथा देशभक्त थे| पत्रकार तथा यात्री के रूप में भी आपकी ख्याति सर्वाधिक थी| जब हैदराबाद में सत्याग्रह का शंखनाद हुआ तो गुरुकुल कांगड़ी में पन्द्रह ब्रह्मचारियों का जत्था आप ही के नेतृत्व में सत्याग्रह के लिए हैदराबाद को रवाना हुआ| साप्ताहिक आर्य जगत् का जो स्वरूप आज दिखाई देता है, उसका श्रेय भी आपको ही जाता है| आपने २४ सितम्बर १९९२ को इस नश्वर शरीर का त्याग किया|

पंडित प्रकाश चन्द कविरत्न
पंडित प्रकाशचंद कविरत्न जी आर्य समाज के उच्चकोटि के भजनोपदेशक कवि तथा संगीतकार थे| आर्य जगत् में आज भी इनके समकक्ष कवियों तथा संगीतकारों का अभाव है| आज भी इनके संगीत की धुनों पर आर्यगण दीवाने हो जाते हैं| आपने अपने काव्य को फिल्मी धुनों से सदा दूर रखा| आप कहा करते थे कि आर्य समाज के पुरोहितों को एम ए अथवा शास्त्री नहीं करनी चाहिए, ऐसा करने से लालच में आकर यह अध्यापक बनने लगेंगे| इससे आर्य समाज के कार्य की गति रुक जावेगी| आप गठिया का दुर्दांत रोग होने पर भी जीवन पर्यंत इसके कारण हुई अपंगता को आर्य समाज के कार्य में बाधक नहीं बनने दिया तथा आप अपनी सेवाओं के माध्यम से अंत तक आर्य समाज की सेवा करते रहे| मेरा आपसे निकट का सम्बन्ध था| ५ सितम्बर अध्यापक दिवस को आपका देहांत हो गया|

हासानंद जादूगर
आपने आर्य समाज के प्रचार के लिए एक अनूठा ढंग निकाला| यह ढंग था जादू| संसार में जादू नाम की कोई कला नहीं है, केवल चालाकी ही जादू है| इस तथ्य को वह अपनी जादुई कला दिखाते हुए सिद्ध किया करते थे| मूलत: सिन्धी होने के कारण पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को भी अपनी करामात दिखा कर आये थे| इनकी पुण्य तिथि २८ सितम्बर को है|

बलिदानी पुरुषोत्तम जी मगनलाल शाह
जिस गोधरा रेल अग्नि काण्ड की चर्चा आज भी होती है, जिसमे अनेकों हिन्दुओं को ज़िंदा जलाकर मारने का कार्य मुसलामानों ने किया था, उस गोधरा का इतिहास आरम्भ से ही हिन्दू विरोधी रहा है| बहुत समय पहले से ही यहाँ हिन्दुओं पर अत्याचार तथा आर्यों के बलिदान होते रहे हैं| इसका कारण यह है कि यहाँ मुसलमानों की संख्या हिन्दुओं से प्राय:दोगुना से भी अधिक है| दो समुदायों में बंटे मुसलमान आपस में लड़ते हैं किन्तु हिन्दुओं के विरोध में वह एक हो जाते हैं| वास्तव में यह विरोधी अवस्था वहां उत्तर भारतीय प्भाव की देन है| इधर के मुसलमानों के भड़काऊ भाषण, लेख तथा विचार इसका कारण हैं| यही कारण है कि यहां के मुसलमान विशेष रूप से खांची मुसलमान यहाँ हिन्दुओं की हानि करने का कोई भी अवसर खोने नहीं देते| इसी क्षेत्र में जन्मे आर्यवीर पुरुषोत्तम जी शाह हिन्दुओं को संगठित करने तथा उनकी रक्षा के लिए दिन रात एक किये रहते थे| हिन्दुओं की रक्षा के लिए वह प्रशासन की सहायता भी लेते थे| वहाँ के हिन्दू उनके दीवाने हो रहे थे| पुरुषोत्तम जी का आर्य समाजी होना भी उन्हें चैन नहीं लेने देता था| सितम्बर १९२८ के तीसरे सप्ताह जैनियों के पर्युषण पर्व पर पुरुषोत्तम जी भी जैनियों की रक्षार्थ डटे हुए थे कि मुसलमानों ने अकारण ही अकस्मात् आक्रमण कर दिया| इस आक्रमण में जो बीस आर्यवीर घायल हुए, उनमें आप भी एक थे| इन भयंकर घावों के कारण अगले ही दिन आपका बलिदान हो गया| इस समय आपकी आयु मात्र चालीस वर्ष की थी|

बलिदानी भगतसिंह
अमर बलिदानी भगतसिंह के नाम से देश का ही नहीं विश्व का बच्चा बच्चा परीचित है| आपके दादा का यज्ञोपवित संस्कार स्वयं स्वामी दयायंद जी ने अपने हाथों से किया था| इस प्रकार यह परिवार आर्य समाजी परम्पराओं को अपने में संजोये हुए था| आपका जन्म २७ सितम्बर १९०७ ईस्वी को उस दिन हुआ था, जिस दिन आपके चाचा तथा लाला लाजपत राय जी मांडले जेल से छूट कर लौटे थे| आपने देश की स्वाधीनता के लिए क्रान्ति मार्ग को अपनाया|संसद में बम फैंकने के आरोप में पकडे गए तथा पुरस्कार स्वरूप आपको फांसी का आदेश सुनाया गया| विश्व भर में नैतिकता का ढिंढोरा पीटने वाले अंग्रेज ने नैतिकता तथा कानून को तोड़कर आपसे डरे हुए आपको प्रात:काल को फांसी देकर तथा शरीर के टुकडे टुकडे करके सतलुज नदी में बहा दिया| फिरोजपुर के पास हुसैनीवाला में आपका शरीर देश के
वीरों ने नदी से निकालकर वहीँ पर ही आपका अंतिम संस्कार कर आपकी वहां पर समाधि बनाई|

मेरा भी इस परिवारसे संबंध रहा है| अब तो यह भी कहा जाता है कि आपको फांसी दी ही नहीं गई, आपको गोली से शहीद किया गया,
किन्तु यह अभी गहन खोज का विषय है|

इस प्रकार आर्यों ने अनेक बलिदानी वीर पैदा किये| इन की याद, इनका स्मरण आने वाली पीढ़ी में नए रक्त का संचार करता है| अत: बलिदानियों की याद को ताजा बनाए रखना आवश्यक हो जाता है|

इस दृष्टि को सामने रखते हुए बलिदानी वीरों तथा आर्य समाज के एकनिष्ठ महापुरुषों को स्मरण करते हुए प्रतिमाह इस प्रकार का लेख दिया जाता है| यह इस माला का एक मोती मात्र है| अत: आओ हम सब मिलकर अपने परम वैभव को याद करते हुए आर्य समाज कोआगे ले जाने में लगें और एक बार फिर से भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए अग्रसर हों|

डॉ.अशोक आर्य
पाकेट १/६१ राम्प्रस्थ्ग्रीन सेक्टर ७ वैशाली
२०१०१२ गाजियाबाद उ.प्र.भारत
चलभाष ९३५४८४५४२६ व्ह्ट्स एप्प ९३५४८४५४२६
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चतुर्दश्विधि: प्रधान होम, दैनिक अग्निहोत्र

चतुर्दश्विधि: प्रधान होम, दैनिक अग्निहोत्र
धर्म-दर्शन
सितंबर 22, 2020
डॉ. अशोक आर्य
अब तक हमने वैदिक अग्नि होत्र के अंतर्गत ब्रह्म यज्ञ, आचमन मन्त्र,ईश्वर स्तुति प्रार्थना उपासना मन्त्र, (स्वस्तिवाचन तथा शंतिकरानम् को छोड़कर)पुन: आचमन, अंग स्पर्श के मन्त्रों, अग्न्याधान, समिदाधान, अग्नि प्रज्वालन, जल प्रक्षेपण तथा आघारावाज्याभाग आहुतिओं के माध्यम से तेरह क्रियाओं को संपन्न किया है| इन के पश्चात हम अग्निहोत्र के प्रधान होम को आरम्भ करने की स्थिति में आ गए हैं| प्रधान होम का आरम्भ हम दैनिक यज्ञ से करते हैं और दैनिक यज्ञ में भी हम प्रथम रूप में प्रात:काल के मन्त्रों के द्वारा यज्ञ को आगे चलाते हैं| अग्निहोत्र की इस क्रिया को आरम्भ करने के साथ ही घी के साथ सामग्री की आहुतियाँ भी आरम्भ की जाती हैं| अब तक जितनी भी आहुतियाँ दी गईं थीं, वह सब केवल घी की ही दी गईं थीं, अब मुख्य यज्ञमान तो पूर्ववत् घी की ही आहुतियाँ देता रहेगा, जबकि अन्य तीनों और बैठे हुए उसके सहयोगी लोग सामग्री की आहुतियाँ स्वाहा के साथ देने लगेंगे| यहं एक बात पुन: समझ लें कि ऋषि की व्यवस्था के अनुसार यज्ञकुंड की चारों दिशाओं में एक एक ही साधक स्थान लेंगे, कुल चार लोग होंगे, इससे अधिक नहीं| प्रात:काल के मन्त्र यजुर्वेद से लिए गए हैं,

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जो इस प्रकार हैं:-
ओं सूर्यो ज्योतिर्ज्योति: सूर्य: स्वाहा||१||
ओं सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्च: स्वाहा||२||
ओं ज्योति सूर्य: सूर्यो ज्योति: स्वाहा||३|| यजुर्वेद ३-९
ओं सजुर्देवेन सवित्रा सजूरुषसेन्द्र्वत्या जुशाण: सूर्यो वेतु स्वाहा||४|| यजुर्वेद ३.१० अर्थ- सूर्य: हे सब को प्रेरणा देने वाले सर्व प्रेरक जगदीश्वर ज्योति: प्रकाशमान् है और ज्योति: सकल प्रकाश सूर्य: सूर्यादि प्रकाशकों का ही बाह्य संकेत है स्वाहा उस प्रभु के चरणों में आत्म समर्पण करते हैं|

सूर्य: सर्वोत्पादक वर्च: दीप्तिमय है और ज्योति: जितनी ज्योति जगत् में दिखाई देती है वर्च: वह उसी का प्रकाश है स्वाहा उसी के निमित्त हम अच्छे प्रकार से आहुति देते हैं|

ज्योति: जितना प्रकाश है, वह सूर्य: सूर्य ही है सूर्य: सूर्यों का सूर्य ज्योति: प्रकाशरूप है अर्थात् परमपिता परमात्मा को श्रेष्ठ प्रकाशयुक्त समझते हुए, , सब सूर्य आदि में उसी की ज्योति का दर्शन करते हुए स्वाहा इसमें स्व अपनी अहा रक्षा करो | इस रक्षा के लिए सच्ची भक्ति और श्रद्धा ही साधन है|

देवेन प्रकाशमान् सवित्रा प्रेरक ( अस्तमय के आदित्य) के साथ सजू: समान प्रीति से युक्त तथा इन्द्र्वत्या एश्वर्यप्रद विभूति से युक्त उषसा प्रात:कालकी लाली के साथ सजू: समान प्रीतियुक्त सूर्य: सूर्य जुषाण: सेवन होता हुआ वेतु प्राप्त हो स्वाहा यह वाणी सत्य हो|
व्याख्यान
इस दैनिक यज्ञ के अंतर्गत प्रात:कालीन यज्ञ का आरम्भ हम करने जा रहे हैं| यह यज्ञ आरम्भ करने से पूर्व प्रात: से पुर्व की पृष्ठभूमि का भी कुछ अवलोकन करते हैं| रात्रि को चन्द्रमा की शीतल छाया में हम स्नान कर रहे थे, तारागण अपनी आभा दिखा रहे थे और प्रत्येक परिवार में, प्रत्येक घर में दीपक जल रहे थे| यह दीपक इसलिए जल रहे थे ताकि रात्री के अन्धकार में भी हम दीपक के प्रकाश में अपना मार्ग देख सकें| इस कार्य में चन्द्र और तारागण भी सहयोग दे रहे थे|

अब जब प्रात:काल हो गया है| सूर्य ने अपना प्रकाश सब और फैला दिया है| इस सूर्य के प्रकाश के अन्दर अन्य सब प्रकार के प्रकाश के साधनों का प्रकाश सूर्य के प्रकाश के अन्दर ही समा गया है| अब उन सब के प्रकाश की आवश्यकता ही नहीं रह गई है| इसके अतिरिक्त जब हम सूर्य की अवस्था को देखते हैं तो हम पाते हैं कि सूर्य दो रूपों में हमारे सामने आता है| प्रथम रूप सूर्य के उदय के रूप में आता है तो द्वितीय रूप के अंतर्गत सूर्य का अस्त होने का स्वरूप हमारे सामने होता है| इन दोनों समयों में आकाश लालिमा से भर जाता है| इन दोनों समय के सूर्य की ज्योति में इससे मिलने वाली लालिमा की एश्वर्य को बढाने वाली तथा इससे मिलने वाली प्रेरणा को मिलाकर एक सर्वांगपूर्ण प्रकाश को मिलाकर एक प्रकाशमयी विभूति बनती है| प्रकाशमयी इस विभूति को देखकर इस प्रकाशमयी विभूति के मूल कारण परमपिता परमेश्वर, सर्वप्रकाशक अर्थात् सब प्रकार के प्रकाशों को देने वाले जगदीश्वर का ध्यान करते हुए इस प्रात:कालीन यज्ञ में हम अपनी आहुतियाँ देते हैं|

प्रात:काल में बोलकर आहुति देने के मन्त्र
प्रात:काल कि मुख्य आहुतियाकं देने के पश्चात हम निम्नाकित आठ आहुतियाँ देते हैं, यह आठों आहुतियाँ सायंकाल के यज्ञ में भी दी जातीं हैं|
ओं भूरग्नये स्वाहा| इदमग्नये प्राणाय, इदन्न मा||१||
ओं भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा|इदं वायवेऽपाने, इदन्न मम||२||
ओं स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा| इद्मादित्याय व्यानाय, इदन्न मम||३||
ओं भूर्भुव: स्वरग्नि वाय्वादित्येभ्य: प्राणापानव्यानेभ्य: स्वाहा| इदमग्निवायावादित्येभ्य: इदन्न मम||४||
शब्दार्थ:- भू: सर्वाधार अग्नये प्रकाश स्वरूप प्राणाय जीवनप्रद भगवान् के लिए||१|| भुव: आलस्य दूर करने वाले वायवे गतिमान् अपानाय दु:ख नाशक के लिए (शेष पूर्ववत्)||२|| स्व: प्रकाश स्वरूप आदित्याय अखंड रूप व्यानाय सर्वव्यापक प्रभु के लिए (शेष पूर्ववत्) ||३|| भू: सर्वाधार भुव: आलस्य निवारक स्व:प्रकाश स्वरूप अग्नि-वायु आदित्येभ्य: अग्नि वायु और आदित्यरुपि विभूतियों के आधार प्राण अपान व्यानेभ्य: जीवन, दु:खनाश तथा व्यापकता के भावों से युक्त प्रभु के प्रति यश श्रद्धा पूर्वक स्वाहा आहुति देता हूँ| यह अग्न्यादि सर्वोपकारक देवताओं तथा प्राणादि सर्वप्रिय गुणों के विस्तार के लिए आहुति देता हूँ| इदन्न मम इस पर मेरा कोई अधिकार नहीं है| प्रभो, स्वीकार करो, स्वीकार करो और मेरे आत्मा को पूर्णतया विकसित बनाओ|

ओं आपो ज्योति रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुव: स्वरों स्वाहा||५||
शब्दार्थ:- आप: सर्वव्यापक ज्योति: प्रकाशरूप रस: रसरूप अमृतं अमृत ब्रह्म सबसे बड़ा भू: सर्वाधार भुव: गतिमान् स्व: सुखप्रद ओं सर्वगुण प्रभु के चरणों में यह हवि स्वाहा समर्पित करता हूँ|
भाव
इसका भाव यह है कि: हे परमपिता परमात्मा! आप सर्वव्यापक होने के कारण इस सृष्टि के कण कण में रमे हुए हो| आप प्रकाश स्वरूप होने के कारण इस जगत् में जितने भी प्रकाश के साधन हैं, वह सब आपसे ही से प्रकाश पाते हैं| आप रसरूप होने के कारण इस विश्व के सब प्रकार के रसों का केंद्र बिंदु भी आप ही हो| आप ही अमृतरूप हो, सब प्रकार के अमृतों की उत्पत्ति का स्थान अप ही हो| आप सब के आधार हो, आप सब गतियों के भी दाता हो, सब प्रकार के सुखों का आदि स्रोत भी आप ही हो, इस जगत् में जितने प्रकार के भी गुण हैं, वह सब आप में विद्यमान हैं| इस प्रकार के प्रभु के चरणों में इस यज्ञ के माध्यम से मैं अपनी यह आहुति समर्पित करता हूँ| इस आहुति पर मेरा कुछ भी अधिकार नहीं है|

ओं यां मेधां देवगणा: पितरश्चोपासते| तया मामद्य मेधयाऽग्ने
मेधाविनं कुरु स्वाहा||६|| यजुर्वेद ३२.१४
शब्दार्थ:- यां जिस मेधां धारणावती बुद्धि की देवगणा: विद्वानों के समुदाय पितर: पूज्य, रक्षक अथवा सज्जन लोग उप-आसते उपासना करते हैं अग्ने प्रकाश रूप प्रभो! तया उसी मेधया बुद्धि से अद्य अब मां मुझे मेधाविनं बुद्धि से युक्त कुरु बनाइये स्वाहा ताकि मैं सत्य का मनन, वचन तथा आचरण करता रहूँ|
भाव
हे परम पावन प्रभो! जिस उत्तम बुद्धि को पाने के लिए उत्तम बुद्धियों वाले विद्वान् लोग, जिन्हें हम पूज्य मानते हैं, अपना रक्षक मानते है और जिनकी सज्जनता से भरपूर मार्ग का हम अनुगमन करते हैं यह सज्जन लोग आपके निकट अपना आसन लगा कर आपकी उपासना करते हुए आपसे प्राथना करते हैं| हे सब प्रकार के प्रकाशों के केंद्र प्रकाश रूप प्रभो! उस प्रकार की ही तीव्र मेधा से भरपूर बुद्धि अब मुझे भी देकर, मुझे भी उत्तम बुद्धि वाला होने का अधिकारी बनावें| ताकि मैं सदा सत्य मार्ग का विचार पूर्वक अनुगमन करते हुए सदा सत्य वचन ही बोलूं और सदा सत्य पर ही आचरण करूँ| यह आहुति आपके लिए है, इसमें मेरा कुछ भी नहीं है|
ओं विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव| यद्भद्रन्तन्न आसुव स्वाहा||७||यजुर्वेद ३०.३
भाव
हे सकल जगत् के उत्पत्तिकर्ता, समग्र एश्वर्ययुक्त ,शुद्धस्वरूप ,सब सुखों के दाता परमेश्वर ! आप कृपा करके हमारे सम्पूर्ण दुर्गुण , दुर्व्यसन और दु:खों को दूर कर दीजिये | जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव और पदार्थ हैं वह सब हमको प्राप्त कीजिये |

ओं अग्ने ने सुपथा राये अस्मान्| विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्| युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भुयिष्ठान्ते नम उक्तिं विधेम स्वाहा ||८|| यजुर्वेद ४०.१६ `
भाव
हे स्वप्रकाशक , ज्ञानरूप , सब जगत् के प्रकाश करनेहारे सकल सुखदाता परमेश्वर ! आप जिससे सम्पूर्ण विद्यायुक्त हैं , कृपा करके हम लोगों को विज्ञान व राज्यादि एश्वर्य की प्राप्ति के लिए अच्छे , धर्मयुक्त आप्त लोगों के मार्ग से सम्पूर्ण प्रज्ञान और उत्तम कर्म प्राप्त कराइये और हम से कुटिलतायुक्त पापरूप कर्म को दूर कीजिये | इस कारण हम लोग आपकी बहुत प्रकार की स्तुतिरूप नम्रतापूर्वक प्रशंसा सदा किया करें और सर्वदा आनंद में रहें |
इसके साथ ही जो लोग प्रतिदिन केवल प्रात:काल यज्ञ करते हैं, उनके लिए यह यज्ञ यहाँ पर समाप्त हो जाता है| इस मन्त्र के पश्चात् सर्वं वै पूर्वं को तीन बार बोलकर आहुतियाँ देते हुए इस समय के यज्ञ को शान्ति पाठ के साथ समाप्त कर देते हैं|
सायं कालीन यज्ञ के मन्त्र
ओम् अग्निर्ज्योज्योतिरग्नी: स्वाहा||१||
ओम अग्निर्वर्चो ज्योतिर्वर्च: स्वाहा||2||
ओम् अग्निर्ज्योज्योतिरग्नी: स्वाहा||३|| यजुर्वेद ३.९
ओं सजुर्देवेन सवित्रा सजूरात्र्येन्द्र्वत्या जुशाण: अग्निर्वेतु स्वाहा||४|| यजुर्वेद ३.१०
इन चार मन्त्रों से यज्ञकुंड में एक एक कर घी और सामग्री से चार आहुतियाँ देवें| मन्त्रों के अर्थ इस प्रकार हैं:-
अर्थ:- अग्नि: अग्नि ज्योति: ज्योति है,प्रकाश है ज्योति: जितना प्रकाश है अग्नि: (वह अग्नि की भी जो)अग्नि है( उसी की विभूति है||१||अग्नि: अग्नि वर्च: दीप्ति है ज्योति: ज्योति: स्वरूप परमात्मा(ही की वह) वर्च: दीप्ति है||२|| तीसरे और प्रथम मन्त्र का अर्थ एक ही है| वहां से ही समझ लें| तीसरे मन्त्र की मौन आहुति होती है अर्थात् यह मन्त्र मन के अन्दर बिना आवाज किये ही बोलना होता है| मन्त्र का मन में उच्चारण करना ध्यान में सहायता का कारण होता है| प्राय: यज्ञ कर्म करते करते इतना अभ्यास तो हो ही जाता है कि मन कहीं और होता है और हाथ आहुति डाल रहा होता है| इस मौन की विधि का यह तात्पर्य है कि साधक स्वयं ही फिर विचारसहित कर्म करना आरम्भ कर दे| अध्यात्मिक संकेत जो यज्ञ की क्रियाओं में आते हैं, उनका ध्यान से पूर्ण लाभ होता है|
अब हम चौथे मन्त्र को लेते हैं| इस मन्त्र के शब्दार्थ इस प्रकार हैं:-
अर्थ:- देवेन प्रकाशमान सवित्रा सर्व-प्रेरक-प्रभु की सायं काल के आदित्य के रूप में वर्तमान विभूति के साथ तथा इंद्रवत्या ऐश्वर्ययुक्त रात्र्या रात्रि के साथ सजू: समान प्रति से युक्त जुषान: सेवन की जाती हुई अग्नि: आग(आग में प्रकाशमान प्रभु) वेतु प्राप्त हो स्वाहा यह कर्म सफल हो|
व्याख्यान
सविता से भाव है कि अस्त होता हुआ सूर्य भी प्रात;काल उदय होते सूर्य के सामान ही अग्नि का रूप धारण किये होता है| रात्रिकाल में यह अग्नि ही उसका प्रतिनिधित्व करती है| रात्री विश्राममयी होती है क्योंकि रात्रिकाल में विश्राम करने का ईश्वरीय नियम है| इस प्रकार यह विश्राममयी रात्रि एक प्रकार से पुन: सूर्य को पुन: चमकने के योग्य बना देती है| अत: यह रात्रि ऐश्वर्य को देने वाली होती है| इस प्रकार रात्रि द्वारा तथा सवितृयुक्त अग्नि द्वारा प्रकाशमान विभूति से भरपूर परमपिता परमात्मा का ध्यान करते हुए हम आहुति डालें|
यहाँ पर प्रात: और सायंकाल के अलग अलग मन्त्रों की आहुतियों की समाप्ति होती है| इसके पश्चात् वह आठ मन्त्र आते हैं, जो प्रात:काल और सायंकाल दोनों काल बोले जाते हैं|
सायंकाल में बोलकर आहुति देने के मन्त्र
आगे जिन आठ मन्त्रों से हम आहुति देने जा रहे हैं, यह आठ मन्त्र प्रात:कालीन यज्ञ में भी बोले जाते हैं और इनके साथ आहुतियाँ दी जाती हैं|
ओं भूरग्नये स्वाहा| इदमग्नये प्राणाय, इदन्न मा||१||
ओं भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा|इदं वायवेऽपाने, इदन्न मम||२||
ओं स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा| इद्मादित्याय व्यानाय, इदन्न मम||३||
ओं भूर्भुव: स्वरग्नि वाय्वादित्येभ्य: प्राणापानव्यानेभ्य: स्वाहा| इदमग्निवायावादित्येभ्य: इदन्न मम||४||
शब्दार्थ :- भू: सर्वाधार अग्नये प्रकाश स्वरूप प्राणाय जीवनप्रद भगवान् के लिए||१|| भुव: आलस्य दूर करने वाले वायवे गतिमान् अपानाय दु:ख नाशक के लिए (शेष पूर्ववत्)||२|| स्व: प्रकाश स्वरूप आदित्याय अखंड रूप व्यानाय सर्वव्यापक प्रभु के लिए (शेष पूर्ववत्) ||३|| भू: सर्वाधार भुव: आलस्य निवारक स्व:प्रकाश स्वरूप अग्नि-वायु आदित्येभ्य: अग्नि वायु और आदित्यरुपि विभूतियों के आधार प्राण अपान व्यानेभ्य: जीवन, दु:खनाश तथा व्यापकता के भावों से युक्त प्रभु के प्रति यश श्रद्धा पूर्वक स्वाहा आहुति देता हूँ| यह अग्न्यादि सर्वोपकारक देवताओं तथा प्राणादि सर्वप्रिय गुणों के विस्तार के लिए आहुति देता हूँ| इदन्न मम इस पर मेरा कोई अधिकार नहीं है| प्रभो, स्वीकार करो, स्वीकार करो और मेरे आत्मा को पूर्णतया विकसित बनाओ|
ओं आपो ज्योति रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुव: स्वरों स्वाहा||५||
शब्दार्थ:- आप: सर्वव्यापक ज्योति: प्रकाशरूप रस: रसरूप अमृतं अमृत ब्रह्म सबसे बड़ा भू: सर्वाधार भुव: गतिमान् स्व: सुखप्रद ओं सर्वगुण प्रभु के चरणों में यह हवि स्वाहा समर्पित करता हूँ|
भाव
इसका भाव यह है कि: हे परमपिता परमात्मा! आप सर्वव्यापक होने के कारण इस सृष्टि के कण कण में रमे हुए हो| आप प्रकाश स्वरूप होने के कारण इस जगत् में जितने भी प्रकाश के साधन हैं, वह सब आपसे ही से प्रकाश पाते हैं| आप रसरूप होने के कारण इस विश्व के सब प्रकार के रसों का केंद्र बिंदु भी आप ही हो| आप ही अमृतरूप हो, सब प्रकार के अमृतों की उत्पत्ति का स्थान अप ही हो| आप सब के आधार हो, आप सब गतियों के भी दाता हो, सब प्रकार के सुखों का आदि स्रोत भी आप ही हो, इस जगत् में जितने प्रकार के भी गुण हैं, वह सब आप में विद्यमान हैं| इस प्रकार के प्रभु के चरणों में इस यज्ञ के माध्यम से मैं अपनी यह आहुति समर्पित करता हूँ| इस आहुति पर मेरा कुछ भी अधिकार नहीं है|
ओं यां मेधां देवगणा: पितरश्चोपासते| तया मामद्य मेधयाऽग्ने
मेधाविनं कुरु स्वाहा||६|| यजुर्वेद ३२.१४
शब्दार्थ:- यां जिस मेधां धारणावती बुद्धि की देवगणा: विद्वानों के समुदाय पितर: पूज्य, रक्षक अथवा सज्जन लोग उप-आसते उपासना करते हैं अग्ने प्रकाश रूप प्रभो! तया उसी मेधया बुद्धि से अद्य अब मां मुझे मेधाविनं बुद्धि से युक्त कुरु बनाइये स्वाहा ताकि मैं सत्य का मनन, वचन तथा आचरण करता रहूँ|
भाव
हे परम पावन प्रभो! जिस उत्तम बुद्धि को पाने के लिए उत्तम बुद्धियों वाले विद्वान् लोग, जिन्हें हम पूज्य मानते हैं, अपना रक्षक मानते है और जिनकी सज्जनता से भरपूर मार्ग का हम अनुगमन करते हैं यह सज्जन लोग आपके निकट अपना आसन लगा कर आपकी उपासना करते हुए आपसे प्राथना करते हैं| हे सब प्रकार के प्रकाशों के केंद्र प्रकाश रूप प्रभो! उस प्रकार की ही तीव्र मेधा से भरपूर बुद्धि अब मुझे भी देकर, मुझे भी उत्तम बुद्धि वाला होने का अधिकारी बनावें| ताकि मैं सदा सत्य मार्ग का विचार पूर्वक अनुगमन करते हुए सदा सत्य वचन ही बोलूं और सदा सत्य पर ही आचरण करूँ| यह आहुति आपके लिए है, इसमें मेरा कुछ भी नहीं है|
ओं विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव| यद्भद्रन्तन्न आसुव स्वाहा||७||यजुर्वेद ३०.३
भाव
हे सकल जगत् के उत्पत्तिकर्ता, समग्र एश्वर्ययुक्त ,शुद्धस्वरूप ,सब सुखों के दाता परमेश्वर ! आप कृपा करके हमारे सम्पूर्ण दुर्गुण , दुर्व्यसन और दु:खों को दूर कर दीजिये | जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव और पदार्थ हैं वह सब हमको प्राप्त कीजिये |

ओं अग्ने ने सुपथा राये अस्मान्| विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्| युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भुयिष्ठान्ते नम उक्तिं विधेम स्वाहा ||८|| यजुर्वेद ४०.१६ `
भाव
हे स्वप्रकाशक , ज्ञानरूप , सब जगत् के प्रकाश करनेहारे सकल सुखदाता परमेश्वर ! आप जिससे सम्पूर्ण विद्यायुक्त हैं , कृपा करके हम लोगों को विज्ञान व राज्यादि एश्वर्य की प्राप्ति के लिए अच्छे , धर्मयुक्त आप्त लोगों के मार्ग से सम्पूर्ण प्रज्ञान और उत्तम कर्म प्राप्त कराइये और हम से कुटिलतायुक्त पापरूप कर्म को दूर कीजिये | इस कारण हम लोग आपकी बहुत प्रकार की स्तुतिरूप नम्रतापूर्वक प्रशंसा सदा किया करें और सर्वदा आनंद में रहें |
इस मन्त्र के साथ सायंकालीन यज्ञ पूर्ण होता है बस अब हम सर्वं वै पूर्णं को तीन बार बोलकर इसके साथ एक एक आहुति देते हुए इस सायंकालीन यज्ञ को भी शान्तिपाठ के साथ समाप्त करते हैं|
यहाँ इस बात को ध्यान रखना है कि प्रात:काल का यज्ञ प्रात:काल ही करें और सायंकाल का यज्ञ सायंकाल ही करें| जो लोग दोनों समय यज्ञ नहीं करते, वह भी केवल उस समय की आहुतियाँ ही डालें, जिस समय यज्ञ करा रहे होते हैं| दोनों समय की आहुतियाँ एक साथ डालना ठीक नहीं है| इसके साथ ही दैनिक यज्ञ की क्रिया समाप्त होती है| जो लोग केवल दैनिक यज्ञ करते हैं, उनके लिए यह यज्ञ आज के लिए समाप्त हो गया है| जो लोग विस्ततार से यज्ञ करते हैं अथवा आर्य समाजों में अथवा किन्हीं विशेष पर्वों में जो लोग वृहद् यग्य करना चाहें वह वृहद् यज्ञ के लिए अगली क्रिया से यज्ञ को आगे बढ़ा सकते हैं| दैनिक यज्ञ की क्रिया यहाँ समाप्त होती है|

डॉ.अशोक आर्य पाकेट १/६१ रामप्रस्थ ग्रीन से.७ वैशाली
२०१०१२ गाजियाबाद उ.प्र. भारत
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आघारावाज्यभागाहुतय:घी को पिघलाना धर्म-दर्शन

आघारावाज्यभागाहुतय:घी को पिघलाना
धर्म-दर्शन
सितंबर 21, 2020
डा. अशोक आर्य
अब तक हम ने अग्नि को प्रचंड करने कि क्रियाएं कि हैं, जिन में घी को पिघलाकर इसकी आहुतियाँ देनी होती हैं| ताकि पिघले हुए कलकते हुए गर्म घी की आहुतियों के माध्यम से हम यज्ञ की अग्नि को और भी तीव्र करें| इसके लिए यजुर्वेद के ही चार मन्त्र दिए गए हैं, जो इस प्रकार हैं:-

ओं अग्नये स्वाहा| इदमग्नये, इदन्न मम ||१|| यजु.२२-२७
ओं सोमाय स्वाहा| इदं सोमाय, इदन्न मम ||२|| यजु.२२-२७
ओं प्रजापतये स्वाहा स्वाहा| इदं प्रजापतये, इदन्न मम ||३|| यजु.१८-२७
ओं इन्द्राय स्वाहा| इदं इन्द्राय, इदन्न मा||४|| यजु.२२-२७

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वैदकी अग्निहोत्र क्रिया १२ःजलसिञ्चनम्=यज्ञ कुण्ड के चारों दिशाओं में जल सिंञ्चन

यह आघारावाज्यभागाहुतय: के चार मन्त्र हैं | यह चारों मन्त्र ही यजुर्वेद से लिए गए हैं| यहाँ इस बात को समझ लेना चाहिए कि आघार और आज्या यह दो शब्द विशेष रूप से इस क्रिया के लिए प्रयोग किये गए हैं| जब तक हम इन दोनों शब्दों को समझ नहीं लेते, तब तक हम इस मन्त्र की क्रियाओं को ठीक से कर नहीं पावेंगे| अत: इन दो शब्दों का ठीक से अभिप्राय: समझना आवश्यक हो जाता है क्योंकि प्रथम दो मन्त्रों का नाम आघारावाज्यभागाहुति कहा गया है और शेष रहे दो मन्त्रों को आज्याभागाहुति के नाम से बताया गया है| भाव यह है कि दोनों नामों का पूर्व भाग ही अलग अलग है और उत्तर भाग एक जैसा ही है| इसलिए दोनों के पूर्व भाग आघार और आज्या के अर्थ को यहाँ समझना होगा| संस्कृत में आघार का अर्थ पिघलाना होता है तो आज्या का अर्थ घी होता है| अत: जिन मन्त्रों की सहायता से यज्ञ में प्रयोग होने वाले घी को पिघलाया जावे आघारावाज्यभागाहुतय: कहते हैं| इस से स्पष्ट है कि यह क्रिया यज्ञ के लिए घी को पिघलाने कि विधि है और घी को पिघलाते हुए भी चार आहुतियाँ देने का विधान किया गया है ताकि अग्नि की प्रचंडता में कुछ कमी न हो पावे| प्रथम मन्त्र से यज्ञ कुण्ड के उत्तर वाले भाग में घी की आहुति दी जाती है क्योंकि यज्ञाग्नि प्रचंड करते समय कुण्ड के अन्दर पड़ी समिधाओं के यह वह खंड हैं, जो अब तक अग्नि की चपेट में नहीं आये थे,यह भाग किनारे पर होने के कारण बचे रहे, जबकि यज्ञ अग्नि प्रचंड और सब और होनी चाहिए| इसलिए प्रथम आहुति हम कुण्ड के उत्तर भाग में देते हैं| दूसरी आहुति हम कुण्ड के दक्षिण भाग में देते हैं| इससे यज्ञाग्नि कुण्ड के सब और फ़ैल जाती है| इसलिए तीसरे और चोथे मन्त्र से हम कुण्ड के मध्य भाग में घी की आहुतियाँ देते हैं ताकि यदि मध्य भाग में कुछ तीव्रता में कमीं रह गई हो तो उसे भी दूर करते हुए अग्नि मध्य भाग में भी प्रचंड हो जावे|

अब हम इस स्थिति में आ गए हैं कि इन चार मंत्रों के आशय से, भाव से अवगत हो सकें|
प्रथम मन्त्र है ओं अग्नये स्वाहा|अर्थात् हे अग्नि स्वरूप प्रकाशमान भगवान्! अर्थात् परमात्मा अग्नि स्वरूप है, जिस प्रकार अग्नि प्रकाश देती है, परमात्मा भी ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करता है, इसलिए परमपिता परमात्मा को यहाँ अग्नि स्वरूप कह कर पुकारा गया है| इस परमात्मा को पाने तथा प्रसन्नता का ध्येय मानते हुए हम अपनी इस आहुति को आहूत करते हुए स्वाहा करते हैं अर्थात् आहुति देते हैं| आगे के मन्त्र में सोमाय शब्द का प्रयोग हुआ है| सोम का भाव है सोमस्वरूप, समग्र जगत् में रस, मिठास और शान्ति भरते हुए इस सब का विस्तार करने वाले परमपिता के हेतू मैं यज्ञ कुण्ड में यह आहुति दे रहा हूँ| इस में मेरा अपना कुछ भी स्वार्थ नहीं है|
तृतीय मन्त्र की आहुति प्रजापतये के नाम से दी जाती है| प्रजा का पति अर्थात् सब प्रजा को पालने वाले प्रभु के लिए हमारी यह आहुति है| इसे मैं बड़ी श्रद्धा के साथ यज्ञ कुण्ड में देता हूँ| यज्ञ की इस क्रिया की अंतिम आहुति, जिसे हम चतुर्थ आहुति के रूप में जानते हैं,वह है इन्द्राय स्वाहा| इंद्र रूप में परम पिता सब प्रकार के ऐश्वर्यों और सब प्रकार की विभूतियों के अधिष्ठाता उस प्रभु के लिए है, सब प्रकार की ममता को त्याग कर मैं यह आहुति सच्चे ह्रदय के साथ यज्ञ कुण्ड के माध्यम से उस परमपिता को समर्पित करता हूँ|

इस सब का भाव यह है कि हमने यह चारों आहूतियां अग्नि, सोम, प्रजापति और इंद्र के नाम से उस प्रभु को दी हैं| परमपिता के यह चारों नाम हम सब के आत्मिक विकास के मुख्य रूप से चार सूत्रों का, चार श्रेणियों का अथवा यूँ कहें कि चार दर्जों का संकेत किया जा रहा है, ऐसा जानो| सब से पूर्व हमने ज्ञान के प्रकाश की याचना की है| यह हितेच्छु-भाव, प्रेरणा और पुरुषार्थ का भाव होना चाहिए| इन दोनों के गुणों को हम यज्ञ के माध्यम से की जा रही पूजा के पालन के लिए ही हो| यह सब करने पर भी कभी यह अवस्था आ सकती है कि तो भी आत्मा इंद्र न बने?

विश्व में वह राजा ही ऐश्वर्यशाली अर्थात् सब प्रकार के धनों का स्वामी होगा, जो इस क्रम के अनुसार ही बुद्धिपूर्वक अर्थात् बुद्धि का प्रयोग करते हुए, प्रेमभाव से भरकर, पुरुषार्थ अर्थात् मेहनत की भावना से पूर्णतया युक्त होकर,अपनी प्रजा का सदा पालन करता रहता है तथा उस प्रजा की शिक्षा की सब प्रकार से उनके ज्ञान का विस्तार करने में लगा रहता है| वह जानता है कि किस प्रकार अपनी प्रजा को मनुष्य बनाया जावे क्योंकि मनुष्य ही किसी राजा की भुजा हुआ करती है| यह कार्य करना वह भली प्रकार से जानता हो| राजा का बल, राजा की शक्ति उसकी प्रजा की शक्ति से ही बनती है| तब ही तो कहा है कि यथा राजा तथा प्रजा| यदि राजा स्वयं ज्ञान का भंडार होगा तो वह अपनी प्रजा को भी ज्ञानी बनावेगा, स्वयं शक्ति का भंडारी होगा तो इस शक्ति को प्रजा में भी बांटेगा और संकट के समय प्रजा की यह शक्ति ही उसके राज्य की रक्षक बन सकेगी अन्यथा राज्य नष्ट हो जावेगा|

परमपिता परमात्मा में यह सब उत्तम गुण है, वह इन सब गुणों का स्वामी है, इस कारण ही उसमें समग्र संसार का शासन करने की क्षमता है और वह इस संसार का शासक है| हमने अग्नि, सोम आदि जो नाम वर्णन किये हैं, इन नामों से प्रभु को संबोधन किया है, यह सब तो उसके बाह्य रूप मात्र ही हैं| जो यज्ञ कर्ता, प्रभु सेवक साधक अध्यात्मिक क्षेत्र में आकर परमपिता की समीपता चाहता है, वह इन सब गुणों, भाव यह कि प्रकाश, मिठास के साथ ही साथ लोकहित के कार्यों को अपनावेगा तो निश्चय ही एक दिन वह परम सिद्धि को पाने में सफल होगा| इन सब भावों को अपने अन्दर स्थापित कर यज्ञमान आगामी क्रिया के अंतर्गत नित्य यज्ञ करते हुए प्रात: तथा सायं की आहुतिया यज्ञ कुण्ड में डाले| यह चोदहवीं क्रिया में आवेंगी|

डा. अशोक आर्य
पाकेट १/६१ रामप्रस्थ ग्रीन सी.७ वैशाली
२०१०१२ गाजियाबाद उ.प्र.भारत
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मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानंद) का दिल बदलने वाली शिवदेवी

मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानंद) का दिल बदलने वाली शिवदेवी
भारत गौरव
सितंबर 21, 2020
डा. अशोक आर्य
महात्मा मुन्शीराम, जिन्हें हम स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती के नाम से भी जानते हैं , का विवाह शिवराज देवी से हुआ। शिवराज देवी एक अत्यन्त ही धर्म परायणा व पतिभक्त महिला थी। वह प्रत्येक कदम पर पति को सुखी रखना चाहती थी तथा पति के सुख में ही अपना सुख समझती थी। यह उसका एक नियम था कि पति ने जब तक भोजन नहीं किया, तब तक वह भोजन न करती थी। यदि कोई अवसर ऐसा आया, जब किसी कारण मुन्शीराम जी भोजन न कर पाते तो वह भोजन ही न करती थी। एसी ही एक घटना एक बार घटी, जिसने मुन्शीराम का जीवन ही बदल दिया ।

पत्नी की ही भान्ति महात्मा मुन्शी राम जी(स्वामी श्रद्धानन्द जी) भी पत्नी से अति स्नेह रखते थे किन्तु रात्रि के भोजन में उन्हें देर हो ही जाती थी। कारण कोतवाल की बिगडैल सन्तान होना ही था। ऐसी सन्तान जिस का अपना तो कोई अस्तित्व था नहीं , कोतवाल की जी हजूरी करने वाले, जिसे घेरे रहते तथा जिसे गल्त मार्ग पर(जिस मार्ग को उस काल में उत्तम समझा जाता था) ले जाने का यत्न करते रहते। ऐसी ही एक घटना का स्वामी जी अपनी आत्म -कथा “ कल्याण मार्ग का पथिक ” में उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि इस घटना ने उनके जीवन में भारी परिवर्तन कर दिय़ा । घटना इस प्रकार है : –
स्वामी जी कल्याण मार्ग का पथिक में लिखते हैं कि —–“ बरेली आने पर मेरी धर्म -पत्नि का यह नियम हुआ कि दिन का भोजन तो मेरे पीछे करती थी, परन्तु रात जब कभी मुझे देर हो जाती ओर पिताजी भोजन कर चुकते तो मेरा ओर अपना भॊजन ऊपर(घर के उपर के कमरे में)मंगा लेती ओर जब मैं लौटता उसी समय अंगीठी पर गर्म करके मुझे भोजन करा पीछे स्वयं खाती।

एक रात मैं रात के आठ बजे मकान लौट रहा था। गाडी दर्जी चौक दरवाजे पर छोडी। दरवाजे पर ही बरेली के बुजुर्ग रईस मुन्शी जीवन सहाय का मकान था। उनके बडे पुत्र मुन्शी त्रिवेणी सहाय ने मुझे रोक लिया। गजक सामने रखी ओर जाम भर दिया। मैंने इन्कार किया। बोले-” तुम्हारे लिए ही तो दो-आतशा खिंचवाई हैं। यह जौहर है।” त्रिवेणी सहाय जी से छोटे सब मेरे मित्र थे, उनको मैं बडे भाई के तुल्य समझता था। न तो आतशा का मतलब समझा न जौहर का, एक गिलास पी गया। फ़िर गप्प बाजी शुरु हो गई ओर उनके मना करते-करते मैं चार गिलास चढ़ा गया।

असल में वह बड़ी नशीली शराब थी, उठते ही असर मालूम हुआ। दो मित्र साथ हुए। एक ने कहा चलो, मुजरा करायें। उस समय तक न तो कभी वेश्या के मकान पर गया था ओर न कभी किसी वेश्या को अपने यहां बुलाकर बातचीत की थी, केवल महफ़िलों में नाच देखकर चला आता था। शराब ने इतना जोर किया कि पांव जमीन पर नहीं पडता था। एक खूंड मेरे हाथ में था। एक वेश्या के घर जा घुसे। कोतवाल साहब के पुत्र को देखकर सब सलाम करके खडी हो गईं। घर की बडी नायिका को हुकम दिया कि मुजरा सजाया जाये। उसकी नौची के पास कोयी रुपए देने वाला बैठा था। उसके आने में देर हुई। न जाने मेरे मुंह से क्या निकला, सारा घर कांपने लगा। नौची घबराई हुई आई ओर सलाम किया तब मुझे किसी अन्य विचार ने आ घेरा। उसने क्षमा मांगने के लिए हाथ बढाया ओर मैं नापाक नापाक कहते हुये नीचे उतर आया। यह सब साथियों ने बतलाया।

नीचे उतरते ही घर की ओर लौटा, बैठक में तकिए पर जा गिरा ओर बूट आगे कर दिये जो नोकर ने उतारे। उठकर ऊपर जाना चाहा परन्तु खडा नहीं हो सकता था। पुराने भ्रत्य बूटे पहाडी पाचक ने सहारा देकर ऊपर चढाया। छत पर पहुंचते ही पुराने अभ्यास के अनुसार किवाड बन्द कर लिये ओर बरामदे के पास पहुंचा ही था कि उल्टी आने लगी। उसी समय एक नाजुक छोटी उंगलियों वाला हाथ सिर पर पहुंच गया ओर मैंने उल्टी खुल के की।

मैं अब शिवदेवी के हाथों में बालकवत् था, कुल्ला करा, मेरा मुंह पोंछ ऊपर का अंगरखा जो खराब हो गया था, बैठे-बैठे ही फ़ैंक दिया ओर मुझे आश्रय देकर अन्दर ले गई। वहां पलंग पर लेटा कर मुझ पर चादर डाल दी ओर साथ बैठकर माथा ओर सिर दबाने लगी। मुझे उस समय का करुणा ओर शुद्ध प्रेम से भरा मुख कभी नहीं भूलेगा। मैंने अनुभव किया मानो मातृ-शक्ति की छत्रछाया के नीचे निश्चिन्त लेट गया हूँ। पथराई हुई आंखें बन्द हो गईं ओर मैं गहरी नींद सो गया। रात के शायद एक बजा था जब मेरी आंख खुली। वह चौदह वर्ष की बालिका पैर दबा रही थी । मैंने पानी मांगा। आश्रय देकर उठाने लगी, परन्तु मैं स्वयं ही उठ खडा हुआ। गरम दूध अंगीठी पर से उतार ओर मिश्री डालकर मेरे मुंह को लगा दिया। दूध पीने पर होश आया।

उस समय अंग्रेजी उपन्यास मगज में से निकल गये ओर गुसाईं जी (गो स्वामी तुलसीदास जी ) के खींचे दृश्य सामने आ खडे हुये। मैंने उठकर ओर पास बैठाकर कहा-” देवी! तुम बराबर जागती रही ओर भोजन तक नहीं किया। अब भोजन करो”। उतर ने मुझे व्याकुल कर दिया परन्तु उस व्याकुलता मे भी आशा की झलक थी। शिवदेवी ने कहा-” आपके भोजन किये बिना मैं कैसे खाती, अब भोजन करने में क्या रुचि है?”

उस समय की दशा का वर्णन लेखिनी द्वारा नहीं हो सकता। मैंने अपनी गिरावट की दोनों कहानियां सुना कर देवी से क्षमा करने की प्रार्थना की परन्तु वहां उनकी माता का उपदेश काम कर रहा था -” आप मेरे स्वामी हो , यह सब कुछ सुनाकर मुझ पर क्यों पाप चढाते हो? मुझे तो यह शिक्षा मिली है कि मैं आपकी नित्य सेवा करूं।” उस रात बिना भोजन किये दोनों सो गये ओर दूसरे दिन से मेरे लिए जीवन ही बदल गया |”

स्वामी श्रद्धा नन्द सरस्वती जी ने अपने जीवन के कटु सत्यों को अपनी आत्मकथा में अंंकित किया है। इस आत्म कथा”कल्याण मार्ग का पथिक” में अपने जीवन की कमियों को भी छुपाने का यत्न नहीं किया, सब सत्यों को खोल कर सामने रख दिया है। इस कारण उनकी आत्मकथा तत्वों के आधार पर एक उत्तम आत्मकथा की श्रेणॊ में आती है। इस आत्मकथा के ही कुछ पन्ने उनकी पत्नि से सम्बन्धित यहाँ दिये गये हैं। यह पन्ने स्वयं साक्षी दे रहे हैं कि स्वामी जी ने कभी भी अपनी कमियों को छुपाने का यत्न नहीं किया बल्कि इन कमियों को लोगों के सामने रखते हुए प्रसन्नता अनुभव करते हैं। इससे स्वामी जी के आरम्भिक जीवन पर खूब प्रकाश पडता है तथा जन-जन को पता चलता है कि आत्मबल सुदृढ होने पर मानव अपने जीवन की बडी-बडी कमियों पर भी विजयी हो सकता है।

डॉ. अशोक आर्य
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सिख समाज के गुरु परिवार के रक्षक चौधरी तख्तमल जी

सिख समाज के गुरु परिवार के रक्षक चौधरी तख्तमल जी
भारत गौरव
सितंबर 18, 2020
डा. अशोक आर्य
चौधरी तख्तमल जी पंजाब के जिला मुक्तसर क्षेत्र के निवासी थे| इनके गाँव का नाम मत्ते की सराय था| आज कल यह गाँव को सराय नागा के नाम से जाना जाता है| चौ. तख्तमल जी उस समय सत्तर गाँवों के स्वाधीन जिमींदार थे| उनके जन्म की निश्चित तिथि का तो ज्ञान नहीं किन्तु समझा जाता है कि उनका जन्म चार मार्च सन् १४६५ ईस्वी के लगभग हुआ| शक्ति और धन की दृष्टि से चौ. तख्तमल जी खूब धनाढ्य थे| भरपूर शक्ति के कारण वह अत्यंत वीर थे तो धन का आकूत भंडारों ने उन्हें धनवान् भी बना दिया था| इस प्रकार धन के साथ ही साथ वह एक अद्वितीय वीर पुरुष और योद्धा होने का गौरव भी रखते थे|

सिक्खों के दूसरे गुरु अंगद देव जी के पिता जी का नाम श्री फेरुमल खत्री था| उनकी आर्थिक अवस्था कोई बहुत अच्छी न थी और एक समय तो ऐसा भी आया कि वह धनाभाव से बुरी प्रकार से जीवन के साथ जूझ रहे थे| इस अवस्था में वह इस गाँव में आये थे| जब वह इस गांव में आए तो उन्हें खाने के भी लाले थे, इस अवस्था में आपने उन्हें अपने पास मुनीम के रूप में रख लिया| इस प्रकार मुनीम लाला फेरुमान जी अनेक वर्ष तक उनके पास मुनीम स्वरूप कार्य करते हुए अपने जीवन को चलाते रहे| लाला फेरुमल जी के पास रहने को कोई स्थान न होने के कारण उनका निवास भी आपके यहाँ ही था| यहाँ रहते हुए तथा मुनीम की नौकरी करते हुए उनके यहाँ एक पुत्र ने जन्म लिया| यह पुत्र ही आगे चल कर पहले अंगद देव बना और सिक्खों के दूसरे गुरु श्री गुरु अंगद देव जी के रूप में सुप्रसिद्ध हुआ| गुरु अंगद देव जी का बाल्य काल इस गांव में ही बीता और वह इस गाँव की मिट्टी में ही खेलते खाते पल कर बड़े हुए|

चौधरी तख्तमल जी का भी अपना एक भरा पूरा परिवार था| इस परिवार में उनके सात सुपुत्र और एक सुपुत्री थी| उनकी सुपुत्री का नाम माई भराई था, जिसे माई विराई के नाम से भी जाना जता था| इस कन्या को मुनीम लाला फेरुमान जी ने अपनी धर्म बहिन के रूप में स्वीकार किया हुआ था| इस कारण गुरु अंगद देव जी इन्हें बुआ के रूप में संबोधित किया करते थे|

जमींदार चौधरी तख्तमल जी एक धार्मिक व्यक्ति थे तथा वह माता दुर्गा में अत्यधिक आस्था रखते थे, इस कारण वह माता दुर्गा के एक बड़े भक्त के रूप में जाने जाते थे| माता के इस भक्त ने अपने यहाँ माता का एक बहुत विशाल मंदिर बनवाया| इस मंदिर में माता के अतिरिक्त अनेक देवी देवाताओं की अत्यंत भव्य मूर्तियाँ स्थापित की गईं| इतना ही नहीं तख्तमल जी ने इन देवी देवताओं की मूर्तियों के लिए बहुत से स्वर्णिम आभूषण तथा अत्यधिक कीमती वस्तुएं दान में दीं|

चर्चा यह भी है कि मुनीम लाला फेरुमल जी का यह सुपुत्र अंगद देव विरक्त हो गया तथा सन्त बनकर विचरण करने लगा| इसी विचरण के मध्य घूमते हुए गुरु अंगद देव जी एक बार इस गाँव में आये| गाँव में आये इस सन्त के लिए चौधरी तख्तमल जी ने अत्यंत श्रद्धाभाव दिखाया और वह तो आरम्भ से ही धर्म में अत्यधिक आस्था रखते थे, इस कारण सन्त को पूज्य मानते थे और जिस अंगद देव का लाड प्यार से उन्होंने कभी अपनी गोद में लेकर मोड़ मनाया था, वह सन्त रूप में अब सामने खडा था| सन्त सदा ही पूज्य होता है| सन्त का कोई आयु, धर्म, मत, पंथ आदि नहीं रह जाता, इस कारण वह पूजनीय होता है, ऐसा मानते हुए चौ. तख़्तमल जी ने उनकी चरण वन्दना करने का प्रयास किया किन्तु सन्त अंगददेव जी ने तत्काल उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया| इसका कारण भी उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा कि उनके परिवार ने आपके यहाँ सेवा की है| इतना ही नहीं आयु में भी आप मुझ से बड़े हैं, इस कारण वह तो स्वयं आपसे चरण वन्दना करते हुए आशीर्वाद लेना चाहते हैं किन्तु चौधरी तख़्तमल जी ने यह कहते हुए उन्हें मना कर दिया कि आप सन्त हैं| मैं एक सन्त से अपने चरणवंदन नहीं करवा सकता| इतनी चर्चा होने के पश्चात् गुरु अंगददेव जी, जो उस समय सन्त थे, चौधरी तख्तमल जी को गले मिलते हैं|

चौधरी तख्तमल जी की सुपुत्री भराई का विवाह महिमासिंह खैरा नामक जाट के यहाँ हुआ| वह खंडूर गाँव के चोधरी थे| इस बुआ भराई ने अपने भतीजे अंगददेव, जो आगे चलकर गुरु अंगददेव बने, का विवाह भी अपने ससुराल की ही एक युवती से सन् १५२० ईस्वी में करवा दिया था| किन्तु वह भी आगे चलकर विरक्त हुई और सन्तनी बन गईं|

जब दुराचारी विदेशी आक्रमणकारी मुग़ल बादशाह बाबर ने भारत पर आक्रमण किया तो वह दुष्ट उस क्षेत्र से होकर ही निकल रहा था, जहाँ चौधरी तख्तमल की जागीर आती थी| बाबर ने सुन रखा था कि चौधरी तख्तमल के पास आकूत धन सम्पत्ति है| उसने चौधरी तख्तमल की हवेली और उनके पूरे के पूरे गाँव को लूटने की योजना बनाई| इसलिए उसने अपनी भारी सेना के साथ अकस्मात् इस गाँव पर आक्रमण कर दिया| चौधरी तख्तमल जी ने अपने सहयोगियों की सहायता से बाबर का बड़ी वीरता से प्रतिरोध किया| उनकी तलवार ने म्लेच्छों के रक्त से खूब स्नान किया| इतना ही नहीं गुरु अंगददेव जी के परिवार की रक्षा के लिए भी उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी और इसके लिए अपनी जान की भी प्रवाह नहीं की| इस कार्य में सफलता प्राप्त करते हुए वह गुरु जी के पूरे परिवार को सकुशल गाँव से बाहर निकाल लाये| इतना ही नहीं गुरु जी के इस परिवार को उन्होंने सुरक्षित करने के लिए कुछ जुझारू प्रवृति के लोगों को उनके साथ भेजकर उन्हें गांव हरिके के मार्ग से अपनी बेटी माई भराई के यहां भेज कर सुरक्षित किया| इस युद्ध में अत्यंत वीरता दिखाते हुए अनेक मुगलों की हत्या करते हुए चौधरी तख़्तमल जी भी अत्यधिक गंभीर रूप से घायल हो गए और इन घावों के कारण वह अपने शरीर को त्याग कर चले गए अर्थात् वीरगति को प्राप्त हो गए|

अब गुरु अंगददेव जी के पिता मुनीम लाला फेरुमल जी अपनी धर्म बहिन माई भराई जी के यहाँ ही रहने लगे और यहीं रहते हुए ही सन् १५२६ ईस्वी में उनका देहांत हो गया|

माई भराई सन्त तो हो ही गई थी, अब उन्होंने गुरु नानक देव जी के पंथ को अपना लिया तथा उनकी शिष्या हो गई| जब गुरु नानकदेव जी वृद्ध हो गए थे , तब माई भराई जी को गुरु नानकदेव जी के दर्शनों का सौभाग्य मिला| गुरु अंगददेव जी भी अधिक समय तक अपनी बुआ माई भाराई जी के यहाँ नहीं रुके किन्तु यह सत्य है कि जब उनकी इस बुआ का देहांत हुआ तो वह उनके पास ही थे| वह अपनी बुआ के अंतिम संस्कार में भी सम्मिलित हुए थे| तत्पश्चात् सन्त माई भराई की स्मृति में उनके नाम पर एक गुरुद्वारा भी स्थापित किया गया|

यह बड़े दु:ख और शर्म की बात है कि, जिस चौधरी तख़्तमल जी ने गुरु अंगद देव जी के पिता को शरण दी, उनके परिवार का पालन किया और यहाँ तक कि इस परिवार की रक्षा करते हुए बाबर से जो लोहा उन्होंने लिया, इस कारण वह बुरी तरह से घायल हुए तथा इस कारण ही इस संसार से विदा हुए, उन चौधरी तख़्तमल जी के नाम की चर्चा मैंने कभी मुक्तसर के निकटवर्ती नगर गिद्डबाहा में रहते हुए नहीं सुनी|

मेरा कर्मक्षेत्र गिदडबाहा ही था और मेरा जन्म स्थान, जहां मैंने अपने जीवन के अमूल्य ३६ वर्ष बिताए, यह पंजाब का नगर अबोहर ही था, जो पजाब और हरियाणा की लड़ाई का केंद्र बना रहा| यह भी मुक्तसर के निकट ही है किन्तु यहाँ रहते हुए भी कभी इस चर्चा को नहीं सुना| लोगों ने चौधरी तख्तमल जी के बलिदान को भुला दिया| आज आवश्यकता है चौधरी तख्तमल जी को अत्यन्त सम्मान देते हुए उनके जीवन से प्रेरणा लेने की| जिनके गाँव ने सरदार हरचरण सिंह बराड के नाम से पंजाब को एक मुख्यमंत्री भी दिया, उस गांव के वीर योद्धा चौधरी तख्तमल जी का नाम तो दूर दूर तक चला जाना चाहिए था किन्तु इस नाम की चर्चा तो आज उनके अपने ही जिले में नहीं हो रही| यह हमारे देश, जाति ,पंथ और धर्म के लिए और क्या हानि होगी| हाँ! गुरु अंगददेव जी के जीवन वृत्त में यह चर्चा अवश्य मिलती है, जो हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उपलब्ध है, किन्तु इस नाम की चर्चा और उनकी वीरता की गाथाएँ तो आज घर घर में होनी चाहिए।

डॉ. अशोक आर्य
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वैदकी अग्निहोत्र क्रिया १२ःजलसिञ्चनम्=यज्ञ कुण्ड के चारों दिशाओं में जल सिंञ्चन

वैदकी अग्निहोत्र क्रिया १२ःजलसिञ्चनम्=यज्ञ कुण्ड के चारों दिशाओं में जल सिंञ्चन

धर्म-दर्शन
सितंबर 17, 2020
डा. अशोक आर्य
विगत एकादश क्रिया में हमने अग्नि को तीव्र करने के लिए घृत कि पांच आहुतियाँ एक ही मन्त्र का पांच बार उच्चारण करते हुए दीं थीं| यह इसलिए किया गया ताकि यज्ञ की अग्नि तीव्र हो जावे और इस में डाली जाने वाली आहुति यज्ञकुण्ड में नीचे तक न जा कर ऊपर ही ज्वलनशील होकर हल्की हो जावे और वायु मंडल में सब और फ़ैल जावे| अब हमारे इस यज्ञ की अग्नि ने तीव्रता पकड़ ली है| पास बैठे यज्ञमान समूह को भी अग्नि का सेंक पहुंचने लगा है| अब हम जल से कुछ इस प्रकार की क्रियाएँ करते हैं, जिससे अग्नि तो तीव्र ही रहे किन्तु इस का प्रकोप पास में ही बैठे यज्ञकर्ता को कम हो जावे और जल की शीतलता से इस अग्नि का तेज भी जल की शीतलता को ग्रहण करते हुए कुछ रासायनिक क्रिया करते हुए सब के लिए लाभदायक हो सके| इस क्रिया का नाम है “जलसिञ्चनम्|” इस विधि को संपन्न करने के लिए चार मन्त्रों के साथ यज्ञवेदी के चारों दिशाओं में जल के छींटे दिए जाते हैं| मन्त्र इस प्रकार हैं:-

ओम अदितेऽनुमन्यस्व ||१||

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यह जल प्रसेचन का प्रथम मन्त्र है| इस मन्त्र को बोलकर यज्ञकुंड की पूर्व दिशा में जल के छींटे देते हैं| इस का भाव यह है कि अदिते हे अखंड व्रतों के स्वामी आदिते देव! अनु-मन्यस्व आप हमें अनुमति दें |

इस मन्त्र के माध्यम से परमपिता परमात्मा, जिसे हम यहाँ अदिती के नाम से सम्बोधन कर रहे हैं, इस यज्ञ के सम्बन्ध में कुछ अनुमति मांग रहे हैं| क्या अनुमति मांग रहे हैं, इस सम्बन्ध में आगे कहा गया है- ओम अनुमतेऽनुमन्यस्व||२||
इस मन्त्र का उच्चारण कर हम यज्ञकुण्ड की पश्चिम दिशा में जल छोड़ते हैं| इस का भाव यह होता है कि:-

अनुमते सब को अपनी आज्ञा में चलाने वाले हे परमेश्वर! अनु-मन्यस्व आप हमें आज्ञा दें| हम आपके आदेश के अनुसार इस कर्म में प्रवृत हों|

ओम सरस्वत्यनुमन्यस्व||३||
इस मन्त्र के उच्चारण के साथ हम यज्ञकुण्ड की उत्तर दिशा में जल प्रसेचन का कार्य करते हैं| इसका भाव यह है कि :-सरस्वती हे ज्ञानस्वरूप परमेश्वर! अनु-मन्यस्व आप हमें हमारे अनुकूल मति (बुद्धि) प्रदान करें|

इन तीन मन्त्रों का भाव यह है कि किसी भी कर्म की सफलता के लिए तीन स्तर होते हैं| इन तीन मन्त्रों के माध्यम से हम उन तीनों स्तरों का ही संकेत समझाने का प्रयास कर रहे हैं|

हमारा यह व्रत अखंड हो, हम इस व्रत में कभी बाधा न आने दें| हम नियमित रूप से प्रतिदिन यह यज्ञ का कर्म करते रहें| हम प्रतिदिन यज्ञ करते हुए हे प्रभु| आपकी आज्ञा का पालन करते रहें|
हम ज्ञान के द्वारा परमपिता परमात्मा के उस आदेश और उस व्रत को समझ लें| त्याग धर्म के लिए प्रेरणा केवल परमात्मा ही दे सकता है, अन्य कोई नहीं| जब हमारे पास परम्पिता का सहारा होता है तो हम स्वयमेव ही अत्यंत ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं और फिर इस प्राप्त किये गए ऐश्वर्य को हम त्यागने के लिए भी प्रभु प्रेरणा से ही बाधित भी हो जाते हैं| हम यह जो अग्निहोत्र करते हैं इस हवन का अर्थ ही त्याग होता है| जब हम इन तीन मन्त्रों से जल प्रसेचन की क्रियाएं करते हैं तो यह इसलिए करते हैं कि यह सब बातें इन मन्त्रों के माध्यम से हमारे हृदय पटल पर अंकित हो जावे|

अब तक हमने तीन मन्त्रों के उच्चारण के साथ यज्ञकुण्ड की एक एक दिशा में जल प्रसेचन का कार्य किया था| अब अगले मन्त्र से हम यज्ञ कुण्ड की चारों दिशाओं में जल प्रसेचन का कार्य करेंगे| पूर्व मन्त्रों से एक एक दिशा में किया था और अब इस मन्त्र के साथ हम पहले वाली दिशाओं सहित जल प्रसेचन का कार्य करेंगे| इस का आरम्भ पश्चिम उत्तर दिशा के उस कोने से करेंगे, जहां हमने अग्नि प्रज्वलित करने के पश्चात् दीपक रखा था| जल प्रसेचन दीपक से आरम्भ कर पूर्व को चलेंगे और घुमाते हुए दीपक के पास आकर ही हम इसे समाप्त करेंगे|

ओम देव सवितु: प्रसव यज्ञं प्रसुव यज्ञपतिं भागे| दिव्यों गन्धर्व:
केतपू: केतव: पुनातु वाचस्पतिर्वाचं न: स्वदतु||४|| यजुर्वेद ३०.१

सवित: हे सर्वोत्पादक, सर्वप्रेरक सविता देव! देव प्रकाश रूप प्रभु! यज्ञं इस यज्ञ को प्र-सुव हमारे इस यज्ञ की सब क्रियाओं को अच्छे प्रकार से सम्पादन कराइए| यज्ञ-पतिं हमारे इस यज्ञ को करने वाले यज्ञमान को भगाय अपार ऐश्वर्य के लिए प्र-सुव प्रेरित कीजिये दिव्य: गन्धर्व: तेजस्वी वाणी को धारण करने वाले केत-पू:ज्ञान को पवित्र करने वाले स्वामिन् न: हम सबकी केतं बुद्धि को पुनातु पवित्र करो| वाचस्पति: आप ही विद्या के रक्षक हो न: वाचं हमारी वाणी को स्वदतु ऐसा मीठा बनाओ कि लोग इसे पसंद करें|

यजुर्वेद से लिए गए इस मन्त्र का भाव यह है कि हम प्रभु प्रेरणा से पवित्र तथा बलवती बुद्धि वाले होकर, परमपिता परमात्मा ने जो विश्व व्यापी यज्ञ आरम्भ कर रखा है, उसका ध्यान करते हुए, अत्यंत श्रद्धा से यथाशक्ति अथवा अपने सामर्थ्य के अनुसार हम नित्यप्रति अग्निहोत्र के कर्म में लगे रहें| जब भी कभी हम धर्म का कार्य करें तो इस प्रकार न करें कि एसा लगे जैसे पत्थर फैंका गया हो अपितु हम इतनी मिठास से युक्त वाणी से मन्त्रों का गायन करें कि , इसे सुनकर श्रोता अथवा जन सामान्य पर तो अच्छा प्रभाव पड़े ही, इसके साथ ही साथ परमपिता परमात्मा को भी प्रसन्न कर पाने में हम सफल हो सकें|

१ अग्निहोत्र की एकादश क्रिया पर्यंत यज्ञ वेदी को पृथ्वी के रूप में माना गया था, क्योंकि पृथ्वी अपने चारों और से समुद्रों से घिरी हुई है| जिस प्रकार हमारी पृथ्वी चारों और से जल से घिरी हुई है, उस प्रकार ही हमारी यह यज्ञ वेदी भी इन मन्त्रों के द्वारा जल से चारों और से घेरी जाती है| यज्ञ करने वाले हमारे यज्ञमान लोग इस यज्ञ में जो भी आहुति स्वरूप दान का कर्म करते हैं, उस दान को विशाल यज्ञ वेदी अर्थात् यह सब कुछ पृथ्वी पर भी चरितार्थ करना होता है| अपने इस छोटे से जीवन में जितने भी प्राणियों का उपकार कर सको, दीन दु:खियों की सहायता कर सको, पशु, पक्षियों, कीट, पतंगों की जीतनी सेवा सुश्रुषा कर सको, अवश्य करो|

२ यहाँ हम दूसरे संकेत के रूप में एक दुर्ग को ही लेते हैं| हम देखते हैं की लगभग सब दुर्ग अपने चारों और एक खाई से घिरे रहते हैं और इस खाई में सदा जल भरा रहता है| इस जल से भरी खाई के कारण शत्रु लोग दुर्ग के निकट नहीं आ पाते और दुर्ग के अन्दर के लोग पूरी तरह से सुरक्षित रह पाते हैं| जब हम यज्ञ कुण्ड के चारों दिशाओं में जल फैला देते हैं तो हमारा यज्ञ निरामिष हो जाता है| जो अफवाह फैलाई गई थी कभी कि यज्ञ में बली दी जाती थी, इस बात को हमारी यह क्रिया दूर करती है| हम यज्ञ कुण्ड के चारों और जो जल प्रसेचन करते हैं, इसके कारण किसी प्रकार के कृमि, कीट आदि जंतु यज्ञ के समय यज्ञ कुण्ड में प्रवेश कर जलने से बच जाते हैं| यदि यह जल न डाला जावे तो यह अनेक प्रकार के कीट यज्ञ कुण्ड के निकट आ कर ताप से जल जाते हैं| जो कीट पहले से ही यज्ञ कुण्ड में किसी प्रकार आ गए होते हैं, वह अग्नि के आरम्भ होते ही ताप को सहन न कर पाने के कारण भाग कर बाहर हो जाते हैं और यह जल नए कीट निकट नहीं आने देता| इस प्रकार हम तो कीट तक की ह्त्या यज्ञ में नहीं होने देते फिर बलि का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता?

३ जब हम यज्ञकुंड के चारों और जल छोड़ देते हैं तो यह जल यज्ञकुण्ड में से निकल रही अग्नि के ताप को कुछ सीमा तक ठंडा कर निकट ही बैठे यज्ञमान आदि को सहनीय बना देता है, अन्यथा यज्ञमान आदि के लिए यज्ञकुण्ड के पास बैठना संभव न हो पावेगा| इससे यज्ञमान होता लोगों को सुख की अनुभूति होती है| हमारे वायु मंडल में कुछ इस प्रकार की वायु भी होती है जो हमारी हानि का कारण होती है| अब वह वायु हमारे पास नहीं आ पाती| भोपाल में कुछ वर्ष एक गैस काण्ड हुआ था, जिससे हुई हानि अब भी वहां के लोग सहन कर रहे हैं , जबकि बहुत से लोग इस अनिष्ट गैस के कारण मर गए थे किन्तु उन लोगों को उस समय कुछ भी कुछ नहीं हुआ, जो उस समय यज्ञ कर रहे थे| इस से स्पष्ट हो जाता है कि यज्ञ के पास गंदी वायु नहीं आ पाती|

४ इस यज्ञ का एक और सर्वोत्तम लाभ यह है कि जब भी कभी हम परमपिता परमात्मा के निकट जाने के यत्न करते हैं तो सांसारिक मोहमाया हमें एसा करने में बाधक बन जाते हैं किन्तु जब हम अग्निहोत्र करते हैं तो इस समय यज्ञ कर रहे हमरे यज्ञमान लोग सांसारिक मोहमाया से अलग हो जाते हैं और केवल परमपिता परमात्मा में ही विचरण करने लगते हैं| हम देखते हैं कि अनेक स्थानों पर जहाँ दो देशों की सीमा होती है, वहां कोई नदी बह रही होती है, यह नदी ही इन दो देशों को अलग कर देती है और यह नदी ही उन देशों की सीमा बन जाती है| इस प्रकार ही यज्ञ कुण्ड के चारों और का यह जल संसार और परमार्थ के मध्य की विभाजक रेखा बन जाता है| यह ममता और अहंकार आदि सांसारिक वृत्तियों को दूर करता है, आसुरी वृत्तियों को दबा देता है, हमारे कर्तव्यों का स्मरण कराते हुए कर्तव्य बुद्धि को सक्रीय करता है | इस प्रकार परमपिता परमात्मा के चरणों में जाने के लिए प्रेरित हो कर हम यज्ञ करते हैं| यह ही हमारे जल प्रसेचन का आध्यात्मिक ही नहीं सर्वोत्कर्ष फल भी हो सकता है| (इस जल प्रसेचन क्रिया की पंडित बुद्ध देव विद्यालंकार जी ने एक बहुत ही मार्मिक और सुन्दर व्याख्या की है, वह मैं कभी फिर दूंगा|) अब तो बस इतना ही समझ लेना चाहिए कि किटाणुओं की रक्षा करते हुए यह जल हमें परम प्रभु के निकत ले जाने वाला हो|

डॉ.अशोक आर्य
पाकेत १/६१ रामप्रस्थ ग्रीन से.७ वैशाली
२०१०१२ गाजियाबाद उ.प्र.भारत
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अविस्मरणीय आर्य शहीद नाथूराम जीभारत गौरव

अविस्मरणीय आर्य शहीद नाथूराम जीभारत गौरव
सितंबर 16, 2020
डा. अशोक आर्य
आर्य समाज की एक न समाप्त होने वाली बलिदानी परम्परा की एक बहुत लम्बी श्रृंखला है| इस श्रृंखला का प्रथम मोती तो आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने अपना बलिदान देकर इसकी माला में पिरोया| स्वामी जी को जीवन में सत्रह बार विषपान करना पडा और अंत में इस विष ने ही स्वामी जी के जीवन की आहुति ले ली| यह अंतिम विषपान जो हुआ वह उनके अपने ही रसोइये के द्वारा(जिसे शाहपुर नरेश ने स्वामी जी के लिए खाना बनाने के लिए उनके साथ किया था ताकि कहीं जोधपुर नरेश की कुटिलता से स्वामी जी की कुछ हानि न हो) दूध में विष देकर किया| यह घुडमिश्र नाम का रसोइया (इस रसोइये का नाम साधारणतया जगन्नाथ लिया जाता है, जो कि गलत है|) भी जोधपुर नरेश की कुटिल चाल का एक भाग बन गया था| इस के पश्चात् तो मानो आर्य समाजियों के बलिदानियों की बाढ़ सी ही आ गई| जिस प्रकार कहा जाता है कि अग्नि को अग्नि आगे बढाती है| ठीक इस प्रकार ही बलिदानियों को देख और अधिक बलिदानी वीर तैयार होते चले गए| कहने वालों ने तो यहाँ तक कह दिया है कि स्वामी दयानंद सरस्वती जी की धरोहर स्वरूप प्राप्त यह बलिदानी परम्परा एक इस प्रकार की अग्नि है, जिसे बुझाने का जितना प्रयास किया गया, यह उतनी ही तीव्र होकर धधकी| वेद धर्म के दीवानों ने इसे प्रचंड रखने के लिए अपने आप को इस यज्ञाग्नि की समिधा बना अपने आप को इस बलिदानी यज्ञ कुण्ड में झोंक दिया| आर्य वीरों की इसी बलिदानी परम्परा रूपी माला का एक मोती सिंध प्रांत के नाथू राम जी(जो इस समय हैदराबाद में रहते थे|) के रूप में उभरे| इस मोती का बलिदानियों की इस माला में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है जो रोकने पर, मिटाने पर भी नहीं समाप्त होगा|

सिंध प्रांत के एक संभ्रांत ब्राहमण परिवार के पंडित कीमत राय जी इन दिनों हैदराबाद में निवास करते थे| इनके ही यहाँ दिनांक १ अप्रैल १९०४ ईस्वी को एक बालक ने जन्म लिया| उनके इस इकलौते पुत्र का नाम नाथूराम रखा गया| इनका पालन पौषण बड़े लाड प्यार से किया गया| नाथूराम जी बाल्यकाल से ही अत्यंत गंभीर प्रकृति के थे| जब गुरुकुल कांगड़ी के संस्थापक स्वामी श्रद्धानंद जी सरस्वती जी का बलिदान हुआ तो इस समाचार को सुनकर नाथूराम जी अत्यंत प्रभावित हुए| स्वामी जी के बलिदान का ही यह प्रभाव था कि नाथूराम जी को उठती जवानी के दिनों में अयंत आकर्षण अनुभव होने लगा और इस का परिणाम यह हुआ कि सन १९२७ ईस्वी में जब वह मात्र २३ वर्ष की आयु में ही पहुंचे थे, आपने अपने सगे सम्बन्धियों की चिंता को छोड़ते हुए आर्य समाज में प्रवेश ले लिया| इस प्रकार आप आर्य समाज के सक्रिय सदस्य बन गए|

नाथूराम जी ने आर्य समाज में मात्र प्रवेश ही नहीं लिया, मात्र आर्य समाज के सदस्य ही नहीं बने अपितु पूर्ण तन्मयता से,पूरी श्रद्धा और लगन के साथ आप आर्य समाज के प्रचार तथा प्रसार के कार्यों में जुट गए| जब आपके गृह नगर हैदराबाद में सन् १९२९ ईस्वी में आर्य युवक समाज की स्थापना हुई तो आपने आर्य युवक समाज की सदस्यता भी ले ली| आपने स्वयं को वाद विवाद अथवा शास्त्रार्थ के लिए तैयार किया और अनेक प्रकार के लोगों से सैद्धांतिक वाद विवाद आरम्भ कर दिया| आप को पौराणिक भाइयों से वाद वविवाद करने में अत्यधिक आनंद का अनुभव होता था|

सन १९३३ ईस्वी में मिर्जाई मुसलामानों द्वारा हिन्दू देवी देवताओं का अभद्र स्वरूप प्रस्तुत किया जाने लगा| मिर्जाई मुसलमानों के इस कृत्य से नाथूराम जी कुपित हो उठे| अत: इस अवस्था में आप मिर्जाइयों को उत्तर देने के लिए आगे आये| इन दिनों एक पुस्तक मिलती थी, जिसका नाम था, “तारीखे इस्लाम|” आप ने इस पुस्तक का सिन्धी भाषा में अनुवाद करके इस पुस्तक को सिन्धी में प्रकाशित भी करवा दिया| यह पुस्तक मूल रूप में किसी ईसाई की लिखी हुई थी| इस सन्दर्भ को लेते हुए आप ने मुसलमान मौलवियों से कुछ प्रश्न भी पूछे| जब मिर्जाई मौलवियों से नाथूराम जी के प्रश्नों का कोई उत्तर न बन सका तो उन्होंने मुसलमानों को नाथूराम जी के विरोध में उकसाना आरम्भ कर दिया| इस प्रकार मौलवियों ने एक घृणा भरा वातावरण तैयार कर दिया|

मौलवियों के कुटिलता पूर्ण व्यवहार से प्रेरित उस समय के वहां के मुसलमान खूब उत्तेजित हो गए तो इन मौलवी लोगों ने सन् १९३३ ईस्वी में नाथूराम जी के विरोध में न्यायालय में एक अभियोग दर्ज करवा दिया| इस अभियोग की पेशी के पश्चात् यह सिद्ध हो गया कि यह पुस्तक मूल रूप में नाथूराम जी की नहीं लिखी है अपितु यह तो केवल अनुवाद मात्र ही था| यह सब होने के पश्चात् भी नाथूराम जी को सैशन के सुपुर्द कर दिया गया| इस अन्याय से भरे निर्णय को सुनते ही सिंध के प्रत्येक परिवार में शोक की लहर सी दौड़ गई|यह सब सिद्ध होने के पश्चात् भी कि मूल पुस्तक नाथूराम जी की नहीं किसी ईसाई की लिखी है, मुसलमान लोगों ने मूल ईसाई लेखक के विरोध में एक शब्द तक भी बोल पाने की हिम्मत नहीं जूटा पाई|

सैशन के इस अन्याय के विरोध में चीफ कोर्ट में अपील दायर की गई| इस कोर्ट में सुनवाई हुई और लगता था कि इस बार निर्णय नाथूराम जी के पक्ष में ही होगा| अंत में निर्णय की घड़ी आई| २० दिसंबर १९३४ ईस्वी को न्यायाधीशों की बैंच ने इस केस पर अपना निर्णय सुनाना था| इस दिन न्यायालय का हाल खचा खच भरा हुआ था| आर्य और मुसलमान दोनों प्रकार के लोग हाल में उपस्थित थे| अभी न्यायाधीषों ने अपना निर्णय सुनाना ही था कि अकस्मात् न्यायालय के इस हाल में एक भयंकार चीत्कार सुनाई दिया| यहाँ उपस्थित अब्दुल कयूम नाम के एक मतान्ध पठान ने अवसर मिलते ही नाथूराम जी के पेट में इस प्रकार छुरा भोंक दिया, जिस प्रकार आर्य बलिदानी पंडित लेखराम जी आर्य मुसाफिर जी के पेट में एक धर्मांध मुसलमान ने छुरा घौम्पा था| अत: जिस प्रकार पंडित जी की अंतड़ियां बाहर आ गईं थीं, उस प्रकार ही नाथूराम जी के पेट से भी उनकी अंतड़ियां बाहर आ गईं| इस कारण न्यायालय परिसर में ही आर्यवीर नाथूराम जी ने अपना बलिदान दे दिया|

न्यायालय परिसर से हत्यारा भाग पाने में सफल हो पाता, इससे पूर्व ही इस धर्मांध हत्यारे को आर्यों ने पकड़ लिया तथा उसे पुलिस को सौंप दिया गया| न्यायिक प्रक्रिया के पश्चात् इस हत्यारे को फांसी का दंड दिया गया| जहाँ तक नाथूराम जी का सम्बन्ध है, वह न्यायालय परिसर में ही बलि के पथ पर आगे बढ़ गए, उनके पार्थिव शरीर के दर्शन के लिए हैदराबाद की भारी भीड़ उमड़ आई| यह भारी भीड़ बलिदानी वीर को अंतिम विदाई देने के लिए बलिदानी नाथूराम जी की नगरयात्रा में भी पूरा साथ देते हुए अंतिम स्थल तक पहुंची| यहाँ पहुँचने पर बलिदानी वीर के पार्थिव शरीर का पूर्ण वैदिक रीति से अंतिम संस्कार किया गया| उनके बलिदान से आर्यों में ही नहीं पूरे हिन्दू समुदाय में भी एक नया जोश आया और नई उमंगों को संजोये अनेक नौजवान बली के इस मार्ग पर आगे बढ़ गए|

डॉ. अशोक आर्य
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