• “स्वाहा” शब्द का अर्थ •

• Meaning of the word “Swaahaa” •
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– स्वामी दयानन्द सरस्वती

• [संस्कृत में अर्थ] :

(स्वाहा) – अत्र स्वाहा-शब्दार्थे प्रमाणं निरुक्तकारा आहुः –

स्वाहाकृतयः, स्वाहेत्येतत्सु आहेति वा स्वा वागाहेति वा स्वं प्राहेति वा स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा। तासामेषा भवति॥

– निरु॰ अ॰ 8। खं॰ 20॥

स्वाहाशब्दस्यायमर्थः

(सु आहेति वा) सु सुष्ठु कोमलं मधुरं कल्याणकरं प्रियं वचनं सर्वैर्मनुष्यैः सदा वक्तव्यम्।

(स्वा वागाहेति वा) या ज्ञानमध्ये स्वकीया वाग्वर्त्तते, सा यदाह तदेव वागिन्द्रियेण सर्वदा वाच्यम्।

(स्वं प्राहेति वा) स्वं स्वकीयपदार्थं प्रत्येव स्वत्वं वाच्यं, न परपदार्थं प्रति चेति

(स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा) सुष्ठु रीत्या संस्कृत्य संस्कृत्य हविः सदा होतव्यमिति स्वाहाशब्दपर्य्यायार्थाः।

• [आर्यभाषा = हिंदी में अर्थ] :

(स्वाहा॰) इस शब्द का अर्थ निरुक्तकार यास्कमुनि जी ने अनेक प्रकार से कहा है। सो लिखते हैं कि –

(सु आहेति वा) सब मनुष्यों को अच्छा, मीठा, कल्याण करने वाला और प्रिय वचन सदा बोलना चाहिए।

(स्वा वागाहेति वा) अर्थात् मनुष्यों को यह निश्चय करके जानना चाहिए, कि जैसी बात उनके ज्ञान के बीच में वर्त्तमान हो, जीभ से भी सदा वैसा ही बोलें, उस से विपरीत नहीं।

(स्वं प्राहेति वा) सब मनुष्य अपने ही पदार्थ को अपना कहें, दूसरे के पदार्थ को कभी नहीं अर्थात् जितना जितना धर्मयुक्त पुरुषार्थ से उन को पदार्थ प्राप्त हो, उतने ही में सदा सन्तोष करें।

(स्वाहुतं ह॰) अर्थात् सर्व दिन अच्छी प्रकार सुगन्धादि द्रव्यों का संस्कार करके सब जगत् के उपकार करने वाले होम को किया करें और ‘स्वाहा’ शब्द का यह भी अर्थ है कि सब दिन मिथ्यावाद को छोड़ के सत्य ही बोलना चाहिए।

[स्रोत : ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथेश्वरस्तुतिप्रार्थनायाचना-समर्पणोपासनाविद्याविषयः प्रकरण]

महर्षि जी ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में भी लिखा है –

“स्वाहा’ शब्द का अर्थ यह है कि जैसा ज्ञान आत्मा में हो वैसा ही जीभ से बोले, विपरीत नहीं।”

[प्रस्तुतकर्ता: भावेश मेरजा]
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राजाराम मोहन राय ,सस्वर वेद पाठ और सती प्रथा

(राजाराम मोहन राय पर विशेष रूप से प्रचारित)

पूरे देश में सामान्यत: परन्तु बंगाल में विशेषत: सती दाह
प्रथा का ताण्डव भयंकर रूप में छाया हुआ था। यह 19 वीं
शती की घटना है।राजाराम मोहन राय ने तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक के समय में कोलकाता उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर
की।इसका पौराणिक पण्डितों ने तीव्र विरोध किया व सती दाह
प्रथा को वेदानुकूल घोषित करते हुए यह वेदमन्त्र प्रस्तुत किया-
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इमा नारीरविधवा: सुपत्नीराञ्जनेन सर्पिषा सं विशंतु।
अनश्रवोऽनमीवा: सुरत्ना आरोहन्तु जनयो योनिमग्ग्रे।।
ऋग्वेद10/18/7
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अर्थात ये पति से युक्त स्त्रियाँ गृहकार्य में प्रवीण होकर घृतादि
पोषक भोज्य पदार्थ से शोभित हो स्वगृह में निवास करें। वे अश्रुरहित,
रोगरहित, सुन्दर रत्न युक्त एवं रम्य गुणों वाली बनाकर उत्तम सन्तानों को जन्म देने वाली स्त्रियां आदर सहित पहले गृह में प्रवेश करें (=घर में
आएं)।
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बंगाल के दुष्ट व अन्धविश्वासी पण्डितों ने इस मन्त्र
को थोड़ा बदलकर न्यायालय में रखा। मन्त्र के ‘नारीरविधवा: शब्द का संधिविछेद बनता है-नारी: अविधवा:। इसे बदलकर ‘नारी विधवा कर दिया।
पदच्छेद के समय ‘र का ‘अ बना परन्तु उन्होंने ‘र को हटा ही दिया। आगे के अर्थ वही रखे-”पतिव्रता,घृतादि सुगन्धित पदार्थ से शोभित व अश्रुरहित होकर। मन्त्र के अन्त में आए शब्द ‘योनिमग्रे का अर्थ है आदरपूर्वक गृह में प्रवेश करे। इसे भी परिवर्तित करके उन्होंने इसे ‘योनिमग्ने कर दिया। जिसका अर्थ यह हो जाएगा-अग्नि में प्रवेश करे। राम मोहनराय स्वयं तो वेदों के विद्वान् न थे। अत: उन्होंने इधर-उधर सम्पर्क किया, तो पता चला कि दक्षिण भारत में कुछ पण्डित हैं, जो जटा-पाठ विधि से बोलकर इस मन्त्र का शुद्ध रूप प्रस्तुत कर सकते हैं। उन्हें बुलाया गया व उन्होंने इस मन्त्र को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा-‘नारीरविधवा: का पदच्छेद ‘नारी: अविधवा: ही बनेगा एवं ‘योनिमग्रे ही मन्त्र में है, ‘योनिमग्ने नहीं है। इस आधार पर याचिका स्वीकार की गई तथा सतीदाह कर्म पर प्रतिबन्ध लगाया गया। मिलावट पर विजय पाने की यह प्रेरक घटना है।

इस प्रकार से वेद के मन्त्रों के असत्य अर्थ निकाल कर सती प्रथा को वैदिक सिद्ध किया गया था। धन्य हैं आधुनिक भारत के विचारक राजा राममोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद जिनके प्रयासों से सती प्रथा का प्रचलन बंद हुआ।

इस मंत्र में वधु को अग्नि नहीं अपितु अग्रे अर्थात गृह में प्रवेश के समय आगे चलने को कहा गया हैं।

हमारे ऋषियों ने वेदों को कैसे सुरक्षित रखा?

(स्वामी विद्यानंद सरस्वती)

जब कोई आर्य बंधू हमारे भाइयों के ये बताने की कोशिश करता हैं की हमारे ज्यादातर ग्रंथों में मिलावट की गई है तो वो वेदों पर भी ऊँगली उठाते हैं की अगर सभी में मिलावट की गई है तो वेदों में भी किसी ने मिलावट की होगी…. मैं उन्हें बताना चाहता हूँ की हमारे ने किस तरह वेदों को सुरखित रखा… इस लेख को पूरा पढने के बाद आपको अपने भारतीय होने पे गर्व होगा की हमने ऐसे देश में और ऐसे धर्म (वैदिक ना की हिन्दू) में जन्म लिया है जो दुनिया में सबसे महान हैं…

वेदों को सुरक्षित रखने के लिए उनकी अनुपुर्वी, एक-एक शब्द और एक एक अक्षर को अपने मूल रूप में बनाये रखने के लिए जो उपाय किये गए उन्हें आज कल की गणित की भाषा में ‘Permutation and combination’ कहा जा सकता हैं.. वेद मन्त्र को स्मरण रखने और उनमे एक मात्रा का भी लोप या विपर्यास ना होने पाए इसके लिए उसे 13 प्रकार से याद किया जाता था…. याद करने के इस उपाय को दो भागों में बनता जा सकता हैं..

.. प्रकृति-पाठ और विकृति-पाठ…. प्रकृति पाठ का अर्थ हैं मन्त्र को जैसा वह है वैसा ही याद करना.
… विकृति- पाठ का अर्थ हैं उसे तोड़ तोड़ कर पदों को आगे पीछे दोहरा-दोहरा कर भिन्न-भिन्न प्रकार से याद करना..

.. याद करने के इन उपायों के 13 प्रकार निश्चित किये गए थे— संहिता-पाठ, पद-पाठ, कर्म-पाठ, जटा-पाठ, पुष्पमाला-पाठ, कर्ममाला-पाठ, शिखा-पाठ, रेखा-पाठ, दण्ड-पाठ, रथ-पाठ, ध्वज-पाठ, धन-पाठ और त्रिपद धन-पाठ…. पाठों के इन नियमों को विकृति वल्ली नमक ग्रन्थ में विस्तार से दिया गया हैं…. परिमाणत: श्रोतिय ब्राह्मणों (जिन्हें मैक्समूलर ने जीवित पुस्तकालय नाम से अभिहित किया हैं) के मुख से वेद आज भी उसी रूप में सुरक्षित हैं जिस रूप में कभी आदि ऋषिओं ने उनका उच्चारण किया होगा… विश्व के इस अदभुत आश्चर्य को देख कर एक पाश्चात्य विद्वान् ने आत्मविभोर होकर कहा था की यदि वेद की सभी मुद्रित प्रतियाँ नष्ट हो जाएँ तो भी इन ब्राह्मणों के मुख से वेद को पुनः प्राप्त किया जा सकता हैं….

मैक्समूलर ने ‘India-What can it teach us’ (प्रष्ठ 195) में लिखा हैं —- आज भी यदि वेद की रचना को कम से कम पाच हजार वर्ष (मैक्समूलर के अनुसार) हो गए हैं… भारत में ऐसे श्रोतिय मिल सकते हैं जिन्हें समूचा वैदिक साहित्य कंठस्थ हैं …. स्वयं अपने ही निवास पर मुझे ऐसे छात्रों से मिलने का सोभाग्य मिला हैं जो न केवल समूचे वेद को मौखिक पाठ कर सकते हैं वरन उनका पाठ सन्निहित सभी आरोहावरोह से पूर्ण होता हैं…. उन लोगो ने जब भी मेरे द्वारा सम्पादित संस्करणों को देखा और जहाँ कही भी उन्हें अशुद्धि मिली उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के उन अशुद्धियों की और मेरा ध्यान आकर्षित किया….

मुझे आश्चर्य होता है उनके इस आत्मविश्वास पर जिसके बल पर वे सहज ही उन अशुद्धियों को ध्यान में ला देते थे जो हमारे संस्करणों में जहाँ-तहाँ रह जाती थी…. वेदों की रक्षा के लिए किये गए इन प्रयत्नों की सराहना करते हुए मैक्समूलर ने अपने ग्रन्थ ‘Origin of Religion’ के प्रष्ठ 131 पर लिखा हैं — “The text of the Vedas has been handed down to us with such accuracy that there is hardly a various reading in the proper sense of the work or even an uncertain aspect in the whole of the Rigveda”. Regeda Vol. I part XXV में मैक्समूलर ने पुनः लिखा —- :As far as we are able to judge we can hardly speak of various readings in the Vedic hymns in the usual sense of the word. Various readings to be gathered from a collection manuscripts, now accessible to us there are none.”

वेदों को शुद्धरूप में सुरक्षा का इतना प्रबंध आरम्भ से ही कर लिया गया था की उनमे प्रक्षेप करना संभव नही था….
इन उपायों के उद्देश्य के सम्बंध में सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता डॉ.भंडारकर ने अपने ‘India Antiquary’ के सन् 1874 के अंक में लिखा था—“The object of there different arrangements is simply he most accurate preservation of the sacred text of the Vedas.
वेदों के पाठ को ज्यों का त्यों सुरक्षित रखने के लिए जो दूसरा उपाय किया गया था वह यह था की वेदों की छंद- संख्या, पद-संख्या, तथा मंत्रानुक्र्म से छंद, ऋषि, देवता को बताने के लिए उनके अनुक्रमणियां तैयार की गई जो अब भी शौनकानुक्रमणी, अनुवाकानुक्रमणी, सुक्तानुक्रमणी, आर्षानुक्रमणी, छंदोंनुक्रमणी, देवतानुक्रमणी, कात्यायनीयानुक्रमणी, सर्वानुक्रमणी, ऋग्विधान, ब्रहद्देवता, मंत्रार्षार्ध्याय, कात्यायनीय, सर्वानुक्रमणी, प्रातिशाख्यसूत्रादि, के नामों से पाई जाती हैं

….इन अनुक्रमणीयों पर विचार करते हुए मैक्समूलर ने `Ancient Sanskrit Literature’ के प्रष्ठ 117 पर लिखा है की ऋग्वेद की अनुक्रमणी से हम उनके सूक्तों और पदों की पड़ताल करके निर्भीकता से कह सकते हैं की अब भी ऋग्वेद के मन्त्रों शब्दों और पदों की वही संख्या हैं जो कभी कात्यायन के समय में थी….

इस विषय में प्रो. मैकडानल ने भी स्पष्ट लिखा हैं की आर्यों ने अति प्राचीन कल से वैदिक पाठ की शुद्धता रखने और उसे परिवर्तन अथवा नाश से बचाने के लिए असाधारण सावधानता का उपयोग किया हैं…. इसका परिणाम यह हुआ की इसे ऐसी शुद्धता के साथ रक्खा गया है जो साहित्य के इतिहास में अनुपम हैं.
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स्वामी श्रद्धानन्द और महात्मा गाँधी

स्वामी श्रद्धानन्द और महात्मा गाँधी

स्वामी श्रद्धानन्द और महात्मा गाँधी

जिन्होंने इतिहास के उन पन्नो को पलटा है, जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे थे, तब उन्होंने आर्थिक सहायता के लिये अभ्यर्थना भारत से की | उन दिनों गुरुकुल कांगड़ी में २-३ अंग्रेजी अख़बार आते थे | स्वामी श्रद्धानंद ने उन अखबारों के आधार पर गांधीजी की सहायता करने की सोची | गुरुकुल के छात्रों ने दिसम्बर की ठण्ड में गंगा किनारे कुछ श्रम कर कुछ रुपये इकठ्ठे करके ‘गुरुकुल सहायता’ के नाम से उनको भेजे |
स्वामी श्रद्धानंद आयु, ज्ञान, अनुभव तथा सेवा में गांधी से श्रेष्ठ और ज्येष्ठ तो थे ही | इस कारण गांधी उन्हें बड़े आदर से ‘बड़े भाई जी’ शब्द से सम्बोधित किया करते थे | स्वामी श्रद्धानंद कांग्रेस में देश सेवा हेतु शामिल हुए थे, परन्तु हिन्दू-मुस्लिम एकता के नाम पर मुसलमानों की चापलूसी, हिन्दू हितो की अपेक्षा, खिलाफत आन्दोलन को समर्थन, दंगो की निन्दा तक न करना, अछूतों (दलित) कहे जाने वाले ८ करोड़ हिन्दुओ के हित में कोई कदम न उठाना जैसे अनेक विषय थे जिनके कारण स्वामीजी को कांग्रेस से अलग होना पड़ा। आर्य समाज महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा गठित की गई वैदिक व समाजिक संस्था है, जो वेद के रहस्य को प्रचारित करती है। यह संस्था मुस्लिम समुदाय द्वारा देश में फैलाए जा रहे कुव्यवस्थाओं को उजागर करता रहा है। इसलिए मुसलमानों को आर्य समाज के गतिविधियाँ ख़ासकर भारत को मुस्लिम राष्ट्र घोषित करने के उनके लक्ष्य में बाधा लगता था। लिहाजा गाँधी ने मुसलमानों को खुश रखने के लिए आर्य समाज पर हमले कराने जैसे पतित कार्य को भी किया था।

यह खुलासा गोपाल गोडसे ने अपनी पुस्तक में की है। उन्होंने लिखा है कि मुस्लिम समुदाय नाराज न हो इसके लिए गाँधी किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे। आर्यसमाज ने बहुत ही सभ्य ढंग से जब गाँधी के इस घृणित कार्य का उत्तर दिया तब गाँधी ने राजनैतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके आर्य समाज को कमजोर करने के लिए षडयंत्र रचा। वास्तविकता तो यह है कि स्वामी दयानन्द सरस्वती का कोई भी अनुयायी गाँधी पथ पर नहीं चल सकता, क्योंकि दोनों की स्थितियाँ एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं, परन्तु कुछ लोग नेता बनने की इच्छा से दोहरी चाल चलते रहे। एक ओर, वे आर्यसमाजी रहे और दूसरी ओर, गाँधीवादी काँग्रेसी। इसका परिणाम यह हुआ कि जब सिन्ध में गाँधी के ईशारे पर ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर प्रतिबंध लगा तो आर्य समाज इस विषय में अधिक कुछ न कर सका।
इसलिए आर्य समाज का प्रभाव और भी कम होता गया। आर्य समाज के सदस्य पक्के देशभक्त होते हैं। लाला लाजपतराय और स्वामी श्रद्धानन्द, दो पक्के आर्य समाजी थे, परन्तु अंत तक कांग्रेस के नेता रहे। वे गाँधी के अनुयायी नहीं थे, प्रत्युत उनकी मुसलमानों का पक्ष लेने की नीति के विरोधी थे, परन्तु वे महापुरुष शांत हो चुके थे। बहुत से आर्य समाजी वैसे ही रहे जैसे कि वे थे, किन्तु प्रायः स्वार्थी लोग उनका मार्ग दर्शन करते रहे और गाँधी के कारण आर्य समाज की वह शक्ति न रही जो किसी समय थी।
अलबत्ता, गाँधी ने जिस मकसद से आर्य समाज की निन्दा की थी, उससे गाँधी मुसलमानों में उतने लोकप्रिय नहीं हुए। प्रत्युत उनके इस आचरण ने मुसलमानों को उकसा दिया और एक मुसलमान युवक ने आरोप लगाया कि यह संस्था बुरी भावना फैलाने वाली है। यह आरोप नितांत असत्य था। प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि आर्य समाज ने हिन्दू समाज में अनेक सुधार किये हैं।
आर्य समाज ने विधवा विवाह प्रारंभ किए। आर्य समाज ने जातपात को समाप्त करने के क्रांतिकारी प्रयत्न किए और हिन्दुओं की ही नहीं, प्रत्युत उनकी एकता का प्रचार किया जो आर्य समाज के सिद्धांतों को मानते हों। तत्कालीन समाचार माध्यमों, अख़बारों और गाँधी के संस्थाएँ इस बात पर पर्दा डालने में सफल रहे कि गाँधी ने आर्य समाज को कितनी हानि पहुँचाई है। देश के आम लोग भी गाँधी के महिमा मंडन में उनके राष्ट्रविरोधी कार्यों को भूल गए हैं।
१९१९ में हुए जलियांवाला कांड के कारण भयभीत जनता ने एक जुलूस निकला जिसका नेतृत्व स्वामी श्रद्धानंद कर रहे थे | जब जुलूस चांदनी चौक पहुंचा तो वहां मौजूद सेना की टुकड़ी में एक सिपाही ने बन्दूक स्वामीजी के सीने पर तान दी | स्वामीजी ने सिंहगर्जना करते हुए अपने छाती पर पड़ी चादर हटा दी और कहा “साहस है तो चलाओ गोली” लाखों की भीड़ का नेतृत्व करने वाले संन्यासी दुनिया को गरजते देख रही थी | कहते हैं इस घटना के पश्चात ३ दिनों तक पूरे दिल्ली प्रदेश में स्वामीजी का अघोषित राज कायम रहा | हिन्दू ही नही सैकड़ो मुस्लिम इस वीतराग संन्यासी के पास आते और अपनी समस्यायों का समाधान पाकर संतुष्ट होकर जाते | स्वामी श्रद्धानंद की अद्वितीय प्रभाव की खबर गांधी के कान तक पहुंचायी गयी| गांधी अपने प्रभाव की बागडोर फिसलते देखने लगे | उनमें ईर्ष्या की आग भड़क उठी | जिन्होंने गांधी के राजनैतिक क्रियाकलापों को नज़दीक से देखा है, उनका स्पष्ट कथन है कि गांधी अपने बराबर किसी अन्य नेता को उठते नही देख सकते थे | उन्होंने अपने मार्ग में आने वाले हर नेता को चाहे वो नरम दल का रहा हो या गरम दल का, उसे किसी भी प्रकार हटाकर अपना मार्ग प्रशस्त किया | और ये एक कटु सत्य है कि उनकी इस राजनीति का पहला शिकार स्वामी श्रद्धानंद ही बने थे |
दिल्ली की जामा मस्जिद के गुम्बद से स्वामीजी ने यह वेदमंत्र पढ़ा था-
“त्वं हि पिता वसो त्वं माता सखा त्वमेव । शतक्रतो बभूविथ । अधा ते सुम्नमी महे ।।”
संसार के इतिहास की ये एकलौती घटना है जब ‘एक काफ़िर’ मस्जिद के मिम्बर से वेदमंत्र का उच्चारण कर रहा था | इसके बाद मुसलमानों ने अन्य मस्जिदों में भी उनके व्याख्यान करवाये | मुसलमानों पर स्वामीजी के अमिट प्रभाव की खबर गांधी को लगी | अपनी लोकप्रियता के आड़े आते श्रद्धानंद उनको अपनी व्यक्तिगत पूजा में बाधा लगे | टर्की के बादशाह और अंग्रेजो का संघर्ष को लेकर ‘खिलाफत आन्दोलन’ जो की भारत के लिये निरर्थक था, गांधी ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिये अकारण ही ये आन्दोलन छेड़ जनशक्ति को भ्रमित किया| इससे कई नेता गांधी से असंतुष्ट होकर संघठन से अलग होने लगे | इनमे स्वामीजी भी थे | कोड़ोनाडा कांग्रेस सम्मलेन में देश के ८ करोड़ अछूतों के उद्धार की जो घृणित योजना बनी, उसके कारण भी काफी असंतोष फैला | योजना के मुताबिक अछूतों को हिन्दू और मुसलमानों में बराबर बांटने की बात कही गयी | यानि हिन्दू समाज के अभिन्न अंग करीब ४ करोड़ लोगों को सीधे सीधे इस्लाम की गोदी में सौंपने का षड़यंत्र था | ये बात स्वामीजी के लिये असहनीय थी क्यूंकि उन्होंने तो अपना जीवन ही अछूतों के उद्धार को समर्पित कर दिया था | वे कांग्रेस से सदा के लिये अलग हो गये | उनके पीछे पीछे सेठ बिड़ला और मदन मोहन मालवीयजी ने भी कांग्रेस छोड़ दी | इस घटना ने गांधी की ईर्ष्या की आग को और भड़का दिया | उन्होंने अपने पत्रों में आर्यसमाज और स्वामीजी के विरुद्ध विषवमन किया और उनके फैलाये सांप्रदायिक जाल ने आखिर अपना रंग दिखाया और २३ दिसम्बर १९२६ को स्वामी श्रद्धानंद की हत्या एक मुस्लिम के हांथो करा दी गयी | स्वामीजी की शहादत पर गांधी ने भी ऐसी वीरोचित मृत्यु की कामना की थी | वैसी मृत्यु तो खैर उनको नही मिली पर भारत के बंटवारे के कारण लाखों-करोड़ो हिन्दुओ की आँहों से भरी मृत्यु अवश्य मिली | भगवान सबकी इच्छा पूर्ण नही करता | पर स्वामीजी का बलिदान व्यर्थ नही गया | करोड़ो आर्यसमाजी सदा के लिये कांग्रेस से अलग हो गये और कांग्रेस मात्र एक सांप्रदायिक पार्टी बनकर रह गयी |samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

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शुद्ध-पवित्र और यज्ञमय जीवन हमारा होना चाहिए।आज का वैदिक विचार,today thought,vaidik_rashtra

ओ३म्
“ऋषि दयानन्द ने विश्व को सद्धर्म और उसके लाभों से परिचित कराया”
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महर्षि दयानन्द (1825-1883) ने देश में वैदिक धर्म के सत्यस्वरूप को प्रस्तुत कर उसका प्रचार किया था। उनके समय में धर्म का सत्यस्वरूप विस्मृत हो गया था। न कोई धर्म को जानता था न अधर्म को। धर्म पालन से लाभ तथा अधर्म से होने वाली हानियों का भी मनुष्यों को ज्ञान नहीं था। ईश्वर का सत्यस्वरूप भी देश देशान्तर के लोगों को पता नहीं था। आत्मा के सत्यस्वरूप से प्रायः सभी लोग अनभिज्ञ थे। यह सृष्टि किसने, कब व क्यों बनाई तथा हमारी आत्मा का स्वरूप क्या व कैसा है? हमारी आत्मा इस जन्म में कब, कैसे आयी अथवा शरीर से संयुक्त हुई और इसके जन्म का उद्देश्य क्या है? इन प्रश्नों से सभी लोग अनभिज्ञ थे। सभी मनुष्य प्रचलित मत-मतान्तरों की जीवन शैली व उपासना पद्धतियों को बिना विचार व सत्यासत्य की परीक्षा किये ही मानते चले आ रहे थे। मत-मतान्तरों को भी ईश्वर, जीवात्मा व सृष्टि विषयक अनेक शंकाओं व प्रश्नों का समाधान विदित नहीं था। सबका एक ही उद्देश्य था कि मत की पुस्तकों की शिक्षाओं का बिना विचार व शंका किये आस्थापूर्व रीति से सेवन करना है और जीवन में सुखों का भोग करना है। ऋषि दयानन्द दिव्य मनुष्य, महापुरुष व ऋषि थे। उन्होंने प्रत्येक बात को मानने से पूर्व उसके सत्यस्वरूप को जाना और उसे धर्म व कर्तव्य से जोड़कर उसकी प्रासंगिकता तथा आवश्यकता पर गहन विचार किया। यदि वह बात ईश्वरीय ज्ञान वे के सम्मत हुई और उससे किसी मनुष्य व मनुष्य समाज किंवा देश को हानि नहीं होती थी, तभी वह करणीय व मानने योग्य स्वीकार की। उनके इस सिद्धान्त व वेदों के प्रचार से मत-मतान्तरों की बहुत सी बातें मनुष्य, समाज व देश के लिये हितकर सिद्ध नहीं हुईं। अतः उन्हें छोड़ना आवश्यक था। ऋषि दयानन्द ने तर्क, युक्ति तथा विद्या के आधार पर कर्तव्य व अकर्तव्य सहित ईश्वर की वेदों में आज्ञा के अनुरूप धर्म का प्रचार किया। इससे मत-मतान्तरों की मिथ्या बातों की पोल खुल गई। सभी विधर्मी लोग सावधान हो गये। वह सत्य को स्वीकार करने के लिये तत्पर नहीं हुए।

ऋषि दयानन्द के समय में मत-मतान्तरों के अनुयायियों की स्थिति यह थी कि वह न तो धर्म सम्बन्धी सत्यासत्य विषयक ज्ञान रखते थे और न ही अपने मत के आचार्यों की इच्छाओं के विरुद्ध ऋषि दयानन्द की बातों में विद्यमान सत्य को अनुभव करते हुए भी उन्हें स्वीकार कर सकते थे। ऋषि दयानन्द ने अपनी सदाशयता का अनेक प्रकार से परिचय दिया परन्तु अविद्या व स्वार्थों के कारण अधिकांश लोगों ने उनकी मानव व प्राणीमात्र की हितकारी धर्म विषयक मान्यताओं को स्वीकार नहीं किया। इस कारण संसार सत्य के ज्ञान व आचरण से वंचित रहा और आज तक बना हुआ है। ऋषि दयानन्द और उनके अनुयायियों ने वेदों का जो प्रचार किया उसका समाज के एक वर्ग पर ही प्रभाव हुआ जो आज भी उन पर पूरी श्रद्धा व निष्ठा रखते हुए पालन करता है। वह दूसरे मतों को भी वेद व वेद मत के प्रमुख ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश की परीक्षा करने की चुनौती देता है और सत्य को स्वीकार करने तथा असत्य को छोड़ने की प्रेरणा करता है। इसके विपरीत आज का मानव समाज अंग्रेजी शिक्षा पद्धति सहित भौतिक सुख सुविधाओं को ही अधिक महत्व देता है जिससे वह वैदिक धर्म के शाश्वत व हितकारी सिद्धान्तों के पालन से होने वाले लाभों को ग्रहण व प्राप्त नहीं हो पा रहा है। इसका वेदमार्ग के विपरीत आचरण करने वाले लोगों को वर्तमान व भविष्य में जो मूल्य चुकाना होगा, उसका अनुमान लगाया जा सकता है। वेद मार्ग पर चलने से मनुष्य का परजन्म सुधरता व उन्नत होता है। मनुष्य का पुनर्जन्म इस जन्म के संचित कर्मों के आधार पर ही होना है। यदि उसने इस जन्म में वेदों का ज्ञान प्राप्त कर ईश्वर को जाना नहीं और वेदोक्त विधि से उपासना व यज्ञादि कर्म नहीं किये तो उसका पुनर्जन्म भी उन सुखों व लाभों से वंचित रहेगा जो कि एक वेदोक्त मार्ग पर चलने व आचरण करने वाले मनुष्यों को प्राप्त होते हैं।

ऋषि दयानन्द ने अथक व कठोर तप एवं पुरुषार्थपूर्वक योग एवं वेद विद्या को प्राप्त कर अपने गुरु प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी की प्रेरणा से संसार से अविद्या दूर करने हेतु ईश्वरीय ज्ञान वेदों का प्रचार आरम्भ किया था। उन्होंने देश व समाज के सामने ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति तथा मनुष्य के कर्तव्य व अकर्तव्य विषयक वेद की मान्यताओं को प्रस्तुत किया था। उन्होंने सब मनुष्यों को मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त बातों से भी उन्हें अवगत कराया। वेद की मान्तयाओं के आचरण तथा वेद विरुद्ध मतों की जीवनशैली के अनुसार जीवन व्यतीत करने से होने वाली हानियों से भी उन्होंने लोगों को परिचित कराया था। सभी मत-मतान्तर उनके विरुद्ध एकत्रित व लामबन्द हो गये थे। ऐसी स्थिति में ऋषि दयानन्द ने अपने कर्तव्य को महत्व दिया और देश के विभिन्न भागों में जाकर वेद मत का प्रचार करते रहे। बहुत से लोग उनके विचारों से प्रभावित हुए। उनके सत्य वेद धर्म के प्रचार से प्रभावित होने वाले लोगों में सभी मतों के लोग थे। उनके अनेक प्रश्नों का उत्तर वेदेतर मतों के पास नहीं था। ऋषि दयानन्द ने ऐसे सभी विषयों को वैदिक विचारधारा के आधार पर प्रस्तुत कर लोगों की जिज्ञासों को शान्त करने सहित उनकी भ्रान्तियों को दूर किया। अपने भक्तों की प्रेरणा से उन्होंने वेद विषयक मान्यताओं सहित मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त मान्यताओं का प्रकाश करने के लिये विश्व का एक अद्वितीय ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश लिखा और उसका प्रकाशन कराया।

सत्यार्थप्रकाश पढ़कर ईश्वर, जीव व प्रकृति के सत्यस्वरूप का ज्ञान होने के साथ ईश्वर, समाज, परिवार तथा अपने निजी कर्तव्यों का ज्ञान होता है। सत्यार्थप्रकाश से मनुष्य को अपने सभी कर्तव्यों एवं अकर्तव्यों का ज्ञान होने से उसे कर्तव्यों का आचरण तथा अकर्तव्यों वा असत्य का त्याग करने की प्रेरणा मिलती है। वह वेदेतर सभी मतों के अविद्या से युक्त यथार्थस्वरूप से भी परिचित हो जाता है। उसे यह भी विदित होता है कि संसार में सृष्टिकर्ता एक ही सत्ता है जिसके ईश्वर, परमेश्वर, सच्चिदानन्दस्वरूप सृष्टिकर्ता आदि अनेक नाम है। ईश्वर दो, तीन व अधिक नहीं अपितु वह एक ही सत्ता है। भिन्न-भिन्न मतों में ईश्वर के जो नाम आये हैं वह ईश्वर से पृथक सत्तायें नहीं हैं। सभी जीव ईश्वर की सन्तानें हैं। इस आधार पर ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ एवं ‘सभी मनुष्य व प्राणी एक ही ईश्वर की सन्तान’ का सिद्धान्त अस्तित्व में आया है। जिस प्रकार माता-पिता व समाज में विद्वान परिवार व समाज से अविद्या व अज्ञान को दूर करते हैं, उसी प्रकार से सभी विद्वानों का कर्तव्य है कि वह वृहद विश्व मानव समाज से ईश्वर व आत्मा विषयक अविद्या को दूर कर सभी को सत्योपदेश से उपकृत करें। यही काम ऋषि दयानन्द और उनके प्रमुख अनुयायियों ने किया और आज भी पद प्रतिष्ठिा व स्वार्थों से मुक्त आर्य समाज के विद्वान इस कार्य को करते हुए अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। यही काम मनुष्य जाति की उन्नति व समाज व विश्व में शान्ति स्थापित करने का एकमात्र आधार है। इस दृष्टि से ऋषि दयानन्द को देखें तो वह हमें विश्व में प्रथम विश्वशान्ति की योजना प्रस्तुत करने व क्रियान्वित करने वाले महापुरुष के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं।

ऋषि दयानन्द ने बताया कि धर्म जीवन में सद्गुणों व सत्कर्मों को धारण करने को कहते हैं। अग्नि ने ताप व प्रकाश सहित रूप को धारण किया हुआ है। यही उसका धर्म है। जल ने शीतलता को तथा वायु ने स्पर्श गुण व धर्म को धारण किया हुआ है। इसी प्रकार से मनुष्य को भी सत्य गुणों व सत्य कर्तव्यों को धारण करना चाहिये। मत-मतान्तर को मानना धर्म व कर्तव्य नहीं है। मत-मतान्तरों की परीक्षा कर सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना ही धर्म होता है। ईश्वर ने जीवों को सुख व कल्याण प्रदान करने के लिये सृष्टि की रचना की व इसका धारण व पोषण कर रहा है। उसी ने सभी जीवों को उनके पूर्वजन्मों के कर्मानुसार मनुष्यादि योनियों में जन्म दिया है। वह धर्माचार करने वाले मनुष्यों को सुख देता है और अधर्माचरण करने वालों को इस जन्म सहित परजन्म में भी पाप कर्मों का फल भुगाता व दुःख देता है। पाप कर्मों का फल दुःख है, इसी लिये धर्म व धर्म पालन की आवश्यकता मनुष्य के लिये है। महर्षि दयानन्द ने स्वयं अपने जीवन में धर्म को धारण कर उसका आदर्श रूप प्रस्तुत किया था। उनके अनुयायी उनके बतायें मार्ग का अनुसरण करते हुए वेदाध्ययन, सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन सहित ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र आदि कर्मों को करते वह देश व समाज के लिये हितकारी कार्य करते हैं। देश व धर्म दोनों पूरक हैं। धर्म और देश अपनी अपनी जगह दोनों ही बड़े हैं। इन दोनों में परस्पर कोई स्पर्धा है। देशभक्ति व देश की सेवा भी मनुष्य का धर्म है। अतः जो लोग देश को धर्म व मत की तुलना में गौण मानते हैं वह गलती करते हैं। संसार के सभी मनुष्यों को ईश्वर के बताये वेद मार्ग को अपनाना चाहिये व उस पर ही चलना चाहिये।

ऋषि दयानन्द ने अपने समय में संसार को वेदों का महत्व बताया। वेद सभी मनुष्यों के लिए सर्वोपरि धर्म ग्रन्थ हैं। वेदों के अनुसार आचरण करना ही सभी मनुष्यों का कर्तव्य है। वेदों को समझने के लिये सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेदभाष्य, आर्याभिविनय सहित उपनिषद एवं दर्शन ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिये। सबको वैदिक विधि से सन्ध्या एवं अग्निहोत्र यज्ञ करने चाहिये। अन्धविश्वासों व मिथ्या परम्पराओं का त्याग करना चाहिये। प्रत्येक कार्य सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिये। ऋषि दयानन्द ने बताया है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र, वेदज्ञान का दाता, जीवात्माओं के कर्मानुसार जन्म व सुख-दुख प्रदान करने वाला और सृष्टिकर्ता है। वही सब मनुष्यों के द्वारा स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना करने के योग्य है।

ऋषि दयानन्द के समय में विश्व ईश्वर तथा धर्माधर्म के सत्यस्वरूप से वंचित था। ऋषि दयानन्द ने वेदप्रचार तथा सतयार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का प्रणयन कर विश्व से अविद्या को दूर करने का महनीय कार्य किया। उनको सादर नमन हैं। जिन्हें ईश्वर की न्यायव्यवस्था का डर हो तथा जो अपना वर्तमान, भविष्य व परजन्म सुधारना चाहते हों, उनके लिये एकमात्र आश्रय स्थान ऋषि दयानन्द का साहित्य का अध्ययन, वैदिक धर्म का पालन और आर्यसमाज ही है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
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एक_दिन_माटी_में_मिल_जाना। भजन

एक_दिन_माटी_में_मिल_जाना।
भजन -स्वर ,यादवेंद्र_शास्त्री आर्यसमाज
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आज का वैदिक विचार

आज का वैदिक विचार

आज का वैदिक विचार
यज्ञ का संदेश – यह मेरा नहीं है ।
यज्ञ -अग्निहोत्र-हवन करते समय अनेकों मंत्र में स्वाहा के पश्चात कहा जाता है इदम् न मम। यह मेरा नहीं है क्योंकि जब हम यज्ञ में घी,हवन सामग्री आदि आहूत करके अग्नि में डालते हैं तो वह सुगंधी केवल यजमान के लिए या उसके परिवार के लिए नहीं होती अपितु संसार में जहां तक वह वायु पहुंचेगी सबके लिए वह समान रूप से यह यज्ञ की सुगंधित पहुंच जाती है । इस प्रकार से यह यज्ञ में डाला हुआ पदार्थ है, मेरा नहीं है उसी प्रकार से हमें अपने जीवन में भी यह मेरा नहीं है भाव रहना चाहिए। हमारे जीवन में अहंकार नहीं होना चाहिए।
विनम्रता होने चाहिए।
अहंकार शून्यता होनी चाहिए ,इस प्रकार का भाव, हमारा जीवन उज्जवल करता है।
कहा है-
पूजनीय प्रभु हमारे भाव उज्जवल कीजिए ।छल कपट को छोड़ देवें।
बंधुओं इस वीडियो में आप सुनेंगे कि हम महापुरुषों के बताए हुए मार्ग पर उनके जीवन से, प्रेरणा लेते हुए हम कैसे अहंकार से अंहकारशून्य – निरभिमानी होते है ।
आओ आज का विचार सुने, देखें ,समझें और अपने जीवन को स्वस्ति के मार्ग पर चलें । कल्याण के मार्ग पर ले चलें ।
धन्यवाद
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वैदिक का अवैदिक कृत्य

वैदिक का अवैदिक कृत्य

वैदिक का अवैदिक कृत्य

वैदिक का अवैदिक कृत्य। लेखक-डॉ सोमदेव शास्त्री-मुंबई श्री वैदिकजी वेदप्रताप वैदिक के अवैदिक कृत्य-अल्लाय नमः,मोहम्मदाय नमःआदि अवैदिक कृत्यों का समर्थन करते हुए दो दो सभाओं के मंत्री विट्ठलराव जी आर्य ने मुँह में दही क्यों जम गया-बात का बतंगड-कौन सा पहाड़ टूट गया आदि शब्दों का प्रयोग कर केअपनी और दोनों सभाओं की तथा इनके साथ कार्यरत सम्माननीय पदाधिकारियों की गरिमा का भी अवमूल्यन किया है? चाहिये तो यह था कि वैदिक जी के विचारों के प्रति अपनी असहमति व्यक्त करते या आगे भविष्य में ऐसी कोई वेद विरुद्ध गतिविधि न हो-सुझाव दिया जाता ,पर श्री आर्य जी यह भी भूल गए कि वे जिस संस्था या पद पर बैठे हैं उस स्थान पर स्वामी श्रद्धानंदजी -महात्मा नारायणस्वामी ,स्वामी अभेदानंद,स्वामी ध्रुवानंद, डॉ दु:खनराम ,पं.गंगाप्रसाद, घनश्याम सिंह गुप्त जैसे महानुभाव प्रतिष्ठित रहे हैं ।जिस सभा ने स्वामी स्वतंत्रानंद जी के नेतृत्व में हैदराबाद जैसी सशक्त रियासत को असत्य और अवैदिक कृत्यों को छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया था,आज उस सभा का अपमान करते हुए अल्लाय स्वाहा का समर्थन कर रहे हैं। क्या आप ऋषि दयानन्द के शब्दों को-मनुष्य का आत्मा सत्य को जानने वाला है किन्तु अपने हठ और दुराग्रहों व स्वार्थ और प्रयोजनवश दूसरे के सत्य को असत्य और अपने असत्य को सत्य सिद्ध करने में लगा रहता है-यह चरितार्थ कर रहे हैं। यज्ञ की विधि और प्रक्रिया है-यज्ञ में घी और सामग्री डालने से वातावरण शुद्ध होता है तो क्या पूरा डिब्बा घी तथा 100 किलो सामग्री एक साथ डालने से वातावरण अधिक शुद्ध हो जायेगा? शास्त्र की तो यही आज्ञा है कि दो आहुति (स्वाहा) देने के बीच में वेदमंत्र बोला जाए,जिससे पहले दी गई आहुति अग्नि का हिस्सा (भस्म)हो जाती है,तब दूसरी आहुति दी जाती है। मुसलमान, ईसाई आदि को यज्ञ कराने के स्थान पर प्रत्येक आर्य को अपने घर में यज्ञ करना चाहिए। यज्ञ किए बिना ही जो आर्य भोजन करता है, वह अन्न नहीं पाप खाता है (भुञ्जते ते त्वद्यं पापा:-व्यास) यह प्रेरणा वैदिक जी देते जो वैदिक के अनुरूप है। क्या कोई मुसलमान व ईसाई अपने घरों में वेद व गीता पढ़ने या यज्ञादि करने का साहस कर सकेगा? मुल्ला मौलवी ऐसा करने देंगे? आप या वैदिक जी इस विषय में आश्वस्त हैं तो उनके नामों का उल्लेख करने की कृपा करें। अन्यथा सस्ती लोकप्रियता को छोड़ कर प्रत्येक आर्य को पंचमहायज्ञ ,सोलह संस्कार, वर्णाश्रम-व्यवस्था का पालन करने तथा अंधविश्वास पाखंड को छोड़कर वैदिक मान्यताओं को अपनाने की प्रेरणा दीजिए। ध्यान रहे– महर्षि दयानन्द सरस्वती ने कभी असत्य को स्वीकार नहीं किया, सत्य को प्रकट करने के लिए विषपान भी किया और हमें आदेश दिया कि सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सदा तत्पर रहना चाहिए।

#डॉ_वेदप्रताप_वैदिक_के #अवैदिक_मार्ग के समर्थक प्रो•#विठ्ठलराव_आर्य को प्रत्युत्तर #डॉ_सोमदेव_शास्त्री#मुम्बई नमस्ते जी, #डॉ वेद_प्रताप_वैदिक के द्वारा अल्लाहाय नमः, मोहम्मदाय नमः माता मरियमाय नमः इत्यादि शब्दों के द्वारा हवन करने के लिए जो वीडियो वायरल हुआ था उसके प्रत्युत्तर में वैदिक विद्वान #डॉ_सोमदेव_शास्त्री मुंबई के द्वारा एक वैदिक समाधान युक्त प्रत्युत्तर दिया गया था । डा वेदप्रताप वैदिक के वीडियो को विरोध ना करते हुए उसके समर्थन में सभा मंत्री #प्रोफेसर_विठ्ठलराव_आर्य ने #डॉ_वेदप्रताप_वैदिक के अवैदिक मार्ग का समर्थन किया , डॉ सोमदेव शास्त्री मुंबई ने सीधे प्रोफेसर विठ्ठलराव आर्य को यह जो पत्र लिखा है ,वह इस वीडियो में सुन सकते हैं , देख सकते हैं। आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य देवें । जो व्यक्ति अवैदिक कार्य करता है ,सिद्धांत विरोधी,गलत कार्य करता है उसके समर्थक भी अवैदिक माने जाएंगे। जो भी व्यक्ति वेद प्रताप वैदिक जैसे अवैदिक का समर्थक है वह निश्चित रूप से वह भी अवैदिक मार्ग का अनुसरण करता है . । ऐसा हमने देखा है कि बहुत सारे लोग मौन रह जाते हैं विरोध नहीं करते हैं जो मौन रहते हैं वह भी कहीं ना कहीं गलत बातों का समर्थन कर रहे हैं । इसलिए आओ हम इस वीडियो को देखें _समझें और अपनी प्रतिक्रियाएं हमें अवश्य देवें । आप पहले क्राफ्ट यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करें। अपने विचारों को हमारे साथ साझा करें। धन्यवाद। आचार्य भानुप्रताप वेदालंकार इंदौर मध्य प्रदेश आर्य समाज इंदौर मध्य प्रदेश। 9977987777 9977957777

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है_ज्ञानवान्_भगवन्

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नमस्ते जी, सुंदर भजन सुन रहे है आप श्री #दिनेश_आर्य_पथिक जी के द्वारा ।

आप ऐसे मधुर-भजनों को सुनने के लिए श्री #दिनेश_पथिक जी को आमंत्रित कर सकते हैं ।

इनका संपर्क नंबर 9872955 841,. 9815260605 है ।

आप मधुर सुंदर भजनों को सुनने के लिए वैदिक राष्ट्र आप वैदिक राष्ट्र यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें। बेल 🔔 को अवश्य दबाएं जिससे कि आपको वैदिक राष्ट्र की सूचनाएं मिलती रहे 👉 🔔।

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हम अपने शरीर को कैसे सजाएं

हम अपने शरीर को कैसे सजाएं

हम अपने शरीर को कैसे सजाएं
शरीर को सजाने का तात्पर्य हम अपने आंतरिक गुणों का विकास कैसे करें| क्या शरीर की सुंदरता ब्यूटी पार्लर से होगी या हमारे गुणों के विकास से होगी।
एक बहुत सुंदर शरीरवालि किंतु अवगुण, दुर्गुणवाला मनुष्य है तो क्या वह सुंदरता का पर्याय होगा| नहीं होगा अर्थात बुद्धि के द्वारा व्यक्तित्व विकास करना, पर्सनैलिटी डेवलपमेंट करना वास्तव में शरीर को सजाना कहलाता है। व्यक्ति विकास हम कैसे करें ? जिससे कि हमारे हमारी शारीरिक सुंदरता बन जाये।
संसार ,पूरा समाज बाहरी सुंदरता की ओर दौड़ रहा है जबकि बहारी सुंदरता से अत्यधिक आंतरिक सुंदरता की आवश्यकता होती है और वह आंतरिक सुंदरता केवल मात्र सद्गुणों से आ सकती है । यही बात आज के वैदिक विचार में कहीं जा रही है कि जिस प्रकार से यज्ञ वेदी हवन की वेदी को हम सजाते हैं वैसे ही हम अपने शरीर को आंतरिक गुणों से सजाएं ।। हमारे व्यक्तित्व को विकसित करें – उन्नत करें। पर्सनालिटी डेवलपमेंट करना है तो हम आंतरिक गुणों का हि विशेष रूप से विकास करें ।
धन्यवाद sarvjatiy parichay samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

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