संसार में सुख दुख तो आते रहते हैं। इसका नाम ही तो संसार है।

संसार में सुख दुख तो आते रहते हैं। इसका नाम ही तो संसार है। सुख में सुखी न हों, दुख में दुखी न हों। इसी में जीवन की सफलता है।
महर्षि कपिल जी ने सांख्यदर्शन में बताया है कि संसार उसे कहते हैं जहां हर समय राग द्वेष का व्यवहार चलता ही रहता है। कहीं शरीर में, कहीं वाणी में, और कहीं मन में। यदि वाणी और शरीर से राग द्वेष का व्यवहार रुक भी जाए, तो भी मन में तो चलता ही रहता है।
जिस व्यक्ति ने संसार में जन्म लिया है, वह अनेक सुख भी भोगता और दुखों से भी पीड़ित होता है। और जब जीवन में सुख दुख आते हैं, तो राग द्वेष होना स्वाभाविक है। उस राग द्वेष से फिर आगे अच्छे बुरे कर्म होते हैं। और उन कर्मों से फिर अगला जन्म तथा फिर से सुख-दुख मिलता है। इस प्रकार से यह चक्र लगातार चलता ही रहता है। सुख-दुख, राग द्वेष, शुभ कर्म अशुभ कर्म, इन छह चीजों का चक्र हमेशा से चल रहा है, और आगे भी अनंत काल तक चलता रहेगा। इसी चक्र का नाम संसार चक्र है।
क्या इस चक्र से छूटने का कोई उपाय है? जी हां। मोक्ष प्राप्ति एक उपाय है। कोई व्यक्ति यदि मोक्ष प्राप्त कर लेवे, तो इन 6 वस्तुओं के चक्र से बाहर निकल जाएगा। जन्म मरण चक्र से भी छूट जाएगा। इन दोनों चक्रों से जब छूट जाएगा, इसी का नाम मोक्ष है। मोक्ष में आत्मा सब प्रकार के दुखों से रहित हो जाता है, और ईश्वर के आनंद को बहुत लंबे समय तक भोगता है।
जब तक मोक्ष नहीं होता, तब तक संसार में रहना होगा। और संसार में रहते हुए जब जब ये सुख दुख, राग द्वेष की परिस्थितियां आएंगी, इनसे युद्ध करना होगा। जो व्यक्ति इनसे युद्ध करके जीत जाएगा, वही इस चक्र से पार हो पाएगा, छूट पाएगा।
प्रश्न — तो इनसे कैसे युद्ध किया जाए? उत्तर — जब सुख आए तो बहुत उछलना नहीं, कूदना नहीं, नाचना नहीं, बहुत खुशी नहीं मनाना। उसे सामान्य रूप से निभा लेना। इसी प्रकार से जब दुख आए, तब दुखी परेशान चिंतित नहीं होना।
ऐसी स्थितियों में यह सोचना चाहिए, कि यह तो संसार है, सुख आता है, चला जाता है। दुख भी आया है, यह भी चला जाएगा। न तो सुख सदा हमारे साथ रहता है, न ही यह दुख सदा हमारे साथ रहेगा। इस प्रकार का चिंतन करके सुख-दुख को समान भाव से स्वीकार करना चाहिए। इस प्रकार से इन सुख दुख, राग द्वेष आदि शत्रुओं से युद्ध करना चाहिए।
यह कठिन कार्य है। यदि व्यक्ति ईमानदारी से पुरुषार्थ करे, तो धीरे-धीरे चिंतन करते-करते वह लंबे समय में, ऊपर बताई विधि के अनुसार, ऐसा युद्ध करने में समर्थ हो जाएगा, और वह इस युद्ध में जीत भी जाएगा।
तो सार यह हुआ कि, इस प्रकार से जीवन में किसी भी घटना के होने पर, अधिक प्रसन्न भी न होवें, और दुखी परेशान चिंतित भी न होवें। अपने मन की स्थिति को नियंत्रित रखें। ईश्वर की उपासना करें, विशेष रूप से दुःख की घटनाओं में। ईश्वर से आपको बहुत शक्ति मिलेगी, और आप इस कार्य में सफल हो जाएंगे।
– स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक
Intercast Marriage ,The Vivah Sanskar will be solemnised,16sanskaro ke liye smpark kre 9977987777

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