यज्ञमय शाकाहार युक्त वैदिक जीवन ही सर्वोत्तम जीवन है

ओ३म्
“यज्ञमय शाकाहार युक्त वैदिक जीवन ही सर्वोत्तम जीवन है”
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वेद सृष्टि के प्राचीनतम ग्र्रन्थ हैं। वेदों के अध्ययन से ही मनुष्यों को धर्म व अधर्म का ज्ञान होता है जो आज भी प्रासंगिक एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वर्तमान में संसार में जो मत-मतान्तर प्रचलित हैं वह सब भी वेद की कुछ शिक्षाओं से युक्त हैं। उनमें जो अविद्यायुक्त कथन व मान्यतायें हैं वह उनकी अपनी हैं। वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है। यह ज्ञान ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को दिया था। ईश्वर एक सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अनादि, नित्य, अविनाशी तथा अमर सत्ता है। इस सृष्टि की रचना भी परमात्मा ने ही की है और इसका पालन भी सर्वव्यापक तथा सब जीवों व प्राणियों का पिता सर्वेश्वर ही कर रहा है। सर्वज्ञ व सर्वव्यापक होने से परमात्मा इस संसार, ब्रह्माण्ड वा विश्व के बारे में सब कुछ जानता है। मनुष्य कितना भी ज्ञान प्राप्त कर लें, यहां तक की उपासना आदि से ईश्वर का साक्षात्कार भी कर लंे, परन्तु वह परमात्मा के समान ज्ञानवान नहीं हो सकते। ईश्वर प्रदत्त वेदज्ञान का अध्ययन करने पर उसमें ईश्वर की सर्वज्ञता का बोध व दर्शन होते हैं।

वेदों का अध्ययन कर ही हमारे ऋषियों ने एक मत होकर, सृष्टि के विगत 1.96 अरब वर्षों के इतिहास में, सभी मनुष्यों के पांच प्रमुख कर्तव्य बताये हैं जिन्हें वह पंचमहायज्ञ कहा जाता है। इन पंचमहायज्ञों के नाम हैं ईश्वरोपासना वा सन्ध्या, देवयज्ञ अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा बलिवैश्वदेवयज्ञ। इन पंचमहायज्ञों से युक्त होने के कारण ही वैदिक धर्म व संस्कृति यज्ञमयी संस्कृति कही जाती है। हमें यज्ञ शब्द के अर्थ का ज्ञान भी होना चाहिये। यज्ञ श्रेष्ठतम व सत्यज्ञान से युक्त कर्मों को कहते हैं। परोपकार व सुपात्रों को दान देना भी यज्ञ में सम्मिलित है। यज्ञ का एक अर्थ विद्वान चेतन देवों की पूजा व सत्कार करना होता है। चेतन देवों माता, पिता व विद्वानों सहित पृथिवी, अग्नि, वायु, जल, आकाश आदि जड़ देवों की पूजा अर्थात् इनका सत्कार व इनसे लाभ प्राप्त करना, संगतिकरण तथा दान देना भी होता है। अग्निहोत्र यज्ञ में देवपूजा, संगतिकरण तथा दान का अच्छा समावेश रहता है। यज्ञ में विद्वानों को आमंत्रित किया जाता है और उनसे सदुपदेश प्राप्त किया जाता है। यज्ञ में हम जो घृत तथा साकल्य की आहुतियां देते हैं उनसे जड़ देवताओं का सत्कार होता है तथा प्रकृति व पर्यावरण का सन्तुलन बना रहता है। अग्निहोत्र यज्ञ से वायु व जल आदि की शुद्धि, रोगकारी किटाणुओं का नाश तथा मनुष्य आदि प्राणी रोगों से रहित तथा स्वस्थ रहते हैं। यज्ञ में वेदमंत्रों से ईश्वर की उपासना की जाती है जिससे वेदमंत्रों के अर्थों के अनुरूप परमात्मा हमारी प्रार्थनाओं को हमारी पात्रता के अनुसार पूरी करते हैं। यज्ञ से सब कामनाओं की पूर्ति एवं स्वर्ग की प्राप्ति होनी कही जाती है जो विचार करने पर सत्य एवं व्यवहारिक प्रतीत होती है। यज्ञ की इन सब व अन्य विशेषताओं के कारण ही परमात्मा ने वेदों में यज्ञ करने की प्रेरणा की है जिसे जानकर हमारे प्राचीन व अर्वाचीन ऋषियों व विद्वानों ने देश देशान्तर में यज्ञों का प्रचार किया था। आज भी वैदिक धर्म और ऋषि दयानन्द के अनुयायी आर्यसमाज संगठन से जुड़े बन्धु यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं तथा यज्ञ से होने वाले लाभों को प्राप्त करते हैं। यज्ञ करने से मनुष्य रोगरहित तथा स्वस्थ एवं अभावों से रहित हो जाते हंै। यज्ञकर्ता सुखी एवं ज्ञान विज्ञान सहित होकर सामाजिक जीवन में भी उन्नति को प्राप्त करते हैं।

परमात्मा ने यह सृष्टि अपनी सनातन व शाश्वत जीवात्मारूपी प्रजा के लिये ही बनाई है। हम संसार में सुखों का भोग करते हैं जिसका आधार परमात्मा व उसकी सृष्टि ही है। हमारा शरीर भी हमें परमात्मा से ही प्राप्त होता है। सभी प्रकार के अन्न व भोजन आदि भी हमें परमात्मा द्वारा बनाये चराचर जगत से ही प्राप्त होते हैं। अतः हमारा कर्तव्य होता है कि हम ईश्वर का ध्यान करें, उसे जानें, वेदाध्ययन करें, वेद में प्रस्तुत ईश्वर के सत्य स्वरूप को जानकर उसकी उपासना करें और सदा उसके कृतज्ञ बने रहे। ईश्वर का ध्यान करने से मनुष्य को अनेक लाभ होते हैं। उसकी आत्मा को ज्ञान प्राप्त होता है व उसमें उत्तरोत्र वृद्धि होती है, बल की प्राप्ति होती है, सद्प्रेरणायें मिलती हंै तथा ईश्वर उपासकों की रक्षा करता है। ईश्वर की उपासना से मनुष्य दुःखों से छूटकर सुखों को प्राप्त होते हैं। ऐसे अनेकानेक लाभ ईश्वर का सत्यज्ञान प्राप्त कर उसकी उपासना करने से होते हैं।

ईश्वर ने ही हमें यह श्रेष्ठ मानव शरीर दिया है। वही हमें परजन्मों में भी हमारे कर्मों के अनुसार जन्म, जीवन व आत्मा को सुख प्रदान करने वाले शरीर आदि देगा। यह क्रम अनन्त काल तक चलना है और हम अनादि व अमर होने के कारण ईश्वर से अनन्त काल तक वर्तमान जीवन के समान लाभान्वित होंगे। ईश्वर के जीवात्माओं पर इतने अधिक उपकार हैं कि कोई भी मनुष्य ईश्वर के उपकारों की गणना नहीं कर सकता। अतः ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होकर उसका ध्यान व उपासना करना तथा सभी प्रकार के अज्ञान, अन्धविश्वासों व पाखण्डों से दूर रहना हम सब मनुष्यों का कर्तव्य होता है। हमें सावधान रहकर अपने कर्तव्यों को जानकर उनका पालन करना चाहिये। ऐसा करने से ही हम ईश्वर की सत्य उपासना करते हैं और इससे हमें जीवन में ज्ञान, सुख, धन, सम्पत्ति, जीवनोन्नति तथा ईश्वर साक्षात्कार आदि ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है। यही सब ऐश्वर्य मनुष्य के लिये जीवन में प्राप्तव्य होते हैं। मनुष्य को ईश्वर उपासना सहित अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, अतिथि यज्ञ एवं बलिवैश्वदेव यज्ञ का भी नित्य प्रति सेवन करना चाहियें। इसके लिये हमें सत्यार्थप्रकाश, पवंचमहायज्ञविधि, संस्कारविधि आदि ग्रन्थों को पढ़ना चाहिये जिससे हमें पंचमहायज्ञों तथा यज्ञमय जीवन पद्धति का परिचय व ज्ञान हो सकेगा।

परमात्मा ने मनुष्य को दूसरे प्राणियों पर उपकार करने के लिये बनाया है। हमें ध्यान रखना होता है कि हमारे किसी कर्म से किसी भी प्राणी को अकारण पीड़ा न हो। अहिंसा का अर्थ भी वैर त्याग तथा दूसरे प्राणियों को अपने समान समझकर उरसे प्रेम व सत्कार का व्यवहार करने से पूरा व सिद्ध होता है। शाकाहार से किसी प्राणी को पीड़ा नहीं होती जबकि मांसाहार करने से जिन प्राणियों के मांस का भक्षण किया जाता है, उन्हें अकारण असहनीय पीड़ा होती है। वेदों में मांस भक्षण का विधान कहीं नहीं है। वेद विरुद्ध व्यवहार व कार्य सब मनुष्यों के लिए अकर्तव्य होते हैं। ज्ञान व विज्ञान के अनुरूप मनुष्य के स्वस्थ जीवन के लिए शाकाहार ही उत्तम भोजन होता है। शाकाहारी प्राणियों का जीवन मांसाहारी प्राणियों की तुलना में अधिक लम्बा होता है। हाथी व अश्व आदि बलशाली प्राणी शाकाहारी ही होते हैं। मांसाहार से अनेक रोगों की सम्भावना होती है। मांसाहार ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध अकर्तव्य एवं पापकर्म होता है जिसका फल मनुष्य को परमात्मा की न्याय व्यवस्था से जन्म जन्मान्तरों में भोगना पड़ता है।

हमारे महापुरुष श्री राम, श्री कृष्ण तथा ऋषि दयानन्द जी शाकाहारी थे तथा अपूर्व ज्ञान व बल से सम्पन्न थे। हनुमान तथा भीष्म पितामह भी अतुल बलशाली थे और भोजन की दृष्टि से शाकाहारी ही थे। अतः मनुष्यों को मांसाहार का त्यागकर शाकाहार को ही अपनाना चाहिये। यही जीवन सुख व उन्नति का आधार होता है। यदि हम अपने जीवन को यज्ञमय व शाकाहार से युक्त रखेंगे तो निश्चय ही हमारा कल्याण होगा। इसी कारण से हमें सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना चाहिये। अपने सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य का विचार करके करने चाहियें। ऐसा करेंगे तो निश्चय ही हमें मांसाहार का त्याग करना होगा और शाकाहार को अपनाना होगा। हमें सत्य मार्ग वेदपथ पर चल कर अपने जीवन को उन्नत व इसके प्रयोजन मोक्ष प्राप्ति को सिद्ध करने वाला बनाना चाहिये। इसी लिये परमात्मा ने इस सृष्टि को बनाकर आरम्भ में ही मनुष्यों को वेदज्ञान दिया था। वेद अध्ययन व अध्यापन करने के ग्रन्थ हंै। हम इनका जितना अध्ययन करेंगे उतना ही अधिक लाभ प्राप्त करेंगे और यदि अध्ययन नहीं करेंगे तो ईश्वर की आज्ञा भंग करने वाले होंगे। अतः हमें वेदाध्ययन व वेदों का स्वाध्याय करते हुए अपने जीवन को यज्ञमय बनाकर तथा शाकाहारी भोजन करते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिये। यही जीवन पद्धति श्रेष्ठ व सर्वोत्तम है। हमें सर्वोत्तम को ही अपनाना व आचरण में लाना चाहिये। वेदों का अध्ययन व वेदों के अनुसार ही आचरण करना सब मनुष्यों का ईश्वर प्रदत्त धर्म व कर्तव्य है। हमें इसे जानना चाहिये और इसी को अपनाना चाहिये जिससे हमें सुखों की प्राप्ति होने सहित जन्म जन्मान्तरों में हमारा कल्याण हों। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

आत्मा, अनादि, अविनाशी व जन्म-मरण धर्मा है तथा मोक्ष की कामना से युक्त है

ओ३म्
“आत्मा, अनादि, अविनाशी व जन्म-मरण धर्मा है तथा मोक्ष की कामना से युक्त है”
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संसार में तीन अनादि तथा नित्य पदार्थ हैं। यह पदार्थ हैं ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति। ईश्वर सत्य चित्त आनन्दस्वरूप एवं सर्वज्ञ है। आत्मा सत्य, चेतन एवं अल्पज्ञ है। प्रकृति सत्य एवं जड़ सत्ता है। अनादि पदार्थ वह होते हैं जिनका अस्तित्व सदा से है और सदा रहेगा। इन्हें किसी अन्य सत्ता ने उत्पन्न नहीं किया। इन तीन पदार्थों की सत्ता को स्वयंभू सत्ता कहा जाता है। ईश्वर सर्वशक्तिमान, अजन्मा, निराकार, सर्वव्यापक तथा सृष्टिकर्ता है। ईश्वर में इच्छा नहीं है जैसी कि मनुष्यों व प्राणियों में देखी जाती है। इच्छा न होने से उस इच्छा की पूर्ति के लिये परमात्मा कोई कर्म भी नहीं करता। इस कारण से वह कर्म के बन्धनों में नहीं फंसता और उसको मनुष्यों की भांति सत्यासत्य व पाप पुण्य कर्मों के समान कर्म बन्धनों व क्लेशों में नहीं फंसना पड़ता। जीव में इच्छा, द्वेष आदि प्रवृत्तियां होती है। इससे वह जो कर्म करता है उसके अनुसार उसे कर्म बन्धन में फंसना पड़ता है और न्यायाधीश के रूप में सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, न्यायकारी परमात्मा सब जीवों को उनके पाप व पुण्य सभी कर्मों के सुख व दुःख रूपी फल देता है। मनुष्य के कर्म ही भविष्य में मनुष्य की जन्म, पुनर्जन्म व मृत्यु का कारण बनते हैं। हमारा यह जन्म भी हमारे पूर्वजन्म के कर्मों का फल प्राप्त करने वा भोगने के लिये ही हुआ है। हमने जो पूर्वजन्म में कर्म किये हैं उनका फल तो हमें इस जन्म में मिलता है। जो कर्म बच जाते हैं उन्हें नया जन्म लेकर भोगना ही पड़ता है। यही परमात्मा की व्यवस्था इस सृष्टि में दृष्टिगोचर होती है जिसका विधान वेद तथा ऋषियों के सत्यज्ञान से युक्त ग्रन्थों में मिलता है। मनुष्य जब वेद आदि सत्शास्त्रों को पढ़ता है तो उसे यह स्पष्ट ज्ञान हो जाता है कि हमारी व अन्य सभी आत्माओं ने अनादि काल से अब तक असंख्य बार अपने अपने कर्मानुसार भिन्न भिन्न योनियांे में जन्म लिये हैं। जन्म के बाद आयु का भोग करने के बाद सबकी मृत्यु व पुनर्जन्म होता रहता है। जन्म व मरण का यह चक्र रुकने वाला नहीं है। यह सदा से चलता आ रहा है और सदा चलता रहेगा। हम अनन्त काल तक वर्तमान जन्म के समान संसार की अनेकानेक प्राणी योनियों में अपने कर्मानुसार जन्म लेते रहेंगे।

विज्ञान का नियम है कि संसार में न तो कोई नया पदार्थ बनाया जा सकता है और न ही उसे नष्ट किया जा सकता है। नष्ट होने का अर्थ उसका स्वरूप परिवर्तन होना होता है। पानी को गर्म करने पर वह भाप बनकर उड़ जाता है परन्तु उसका अस्तित्व बना रहता है। यदि ईधन को जलाते हैं तो वह भी सूक्ष्म अदृश्य पदार्थों व धुएं के रूप में परिविर्तत होकर वायुमण्डल में फैल जाता है परन्तु उसका अभाव नहीं होता। वह अन्य रूप में संसार व वातावरण में विद्यमान रहता है। इसी प्रकार से आत्मा की मृत्यु होने पर उसका अभाव रूपी नाश नहीं होता। उसका अस्तित्व बना रहता है। आत्मा शरीर से निकल कर वायुमण्डल व आकाश में जाती है। शरीर से आत्मा का निकास सर्वव्यापक तथा सर्वान्तर्यामी परमात्मा की प्रेरणा से होता है। आत्मा को पता नहीं होता कि यह प्रक्रिया किस प्रकार से सम्पन्न होती है। उसे यह आभास अवश्य होता है कि उसका शरीर निर्बल व निष्क्रिय हो रहा है। आत्मा व प्राण आदि से युक्त सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर से निकलते समय तक आत्मा को इसका कुछ ज्ञान व आभास रहता है। शास्त्र व विवेक से ज्ञात होता है कि यह आत्मा सूक्ष्म शरीर सहित अपने देह से निकलने पर परमात्मा की प्रेरणा से अपने कर्मानुसार भावी माता-पिता के शरीर में प्रविष्ट होता है जहां इसके जन्म की कालावधि व्यतीत होने पर जन्म होता है। जब तक मनुष्य अपने सभी कर्मों का भोग कर उनका क्षय नहीं कर लेगा, तब तक जन्म व मृत्यु का चक्र चलता ही रहेगा। जन्म व मृत्यु न हो इसके लिये हमें अपने इच्छा व द्वेष की प्रवृत्ति को जानकर उसको पूर्ण नियंत्रित करना होगा और वेदों का अध्ययन कर उससे प्राप्त ज्ञान के अनुसार जीवन बनाना होगा। मनुष्य वेदों के ज्ञान को प्राप्त होकर निष्काम कर्मों को करके ही उनके फलों से मुक्त होता है और ईश्वर की उपासना, अग्निहोत्र यज्ञ एवं अन्य सभी शुभ कर्मों के परिणाम तथा योगाभ्यास आदि से ईश्वर का साक्षात्कार करने से उसको दीर्घकालावधि के लिये जन्म व मृत्यु से अवकाश प्राप्त होता है जिसको मोक्ष कहते हैं। मोक्ष का तर्क एवं युक्तियों सहित वर्णन ऋषि दयानन्द ने वेदों के आधार पर अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के नवम समुल्लास में किया है। वहां इसका अध्ययन कर इसे समझा जा सकता है और मोक्ष प्राप्ति की प्रेरणा ग्रहण कर उसके लिये आवश्यक उपाय भी किये जा सकते हैं।

संसार में जन्म लेने वाले सभी प्राणियों की मृत्यु अवश्यम्भावी होती है। गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को बताया है कि जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु का होना निश्चित है तथा जिस प्राणी की मृत्यु होती है उसका जन्म अर्थात् पुनर्जन्म होना भी निश्चित है। गीता की यह बात वेद एवं ऋषि दयानन्द के मन्तव्यों के अनुरूप एवं सर्वथा सत्य है। जन्म किसी भी योनि में हो जीवन काल में सुख व दुःख सभी प्राणियों को हाते हैं। मनुष्य व प्राणी सुख की इच्छा करते हैं। कोई भी प्राणी दुःख की इच्छा कभी नहीं करता। सभी दुःखों से निवृत्ति तथा भविष्य में कभी किसी भी प्रकार का कोई दुःख न हो, इसकी कामना करते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये ही हमारे ऋषियों ने वेदों का अध्ययन कर व उसमें मोक्ष संबंधी विचारों का संग्रह कर उसे दर्शन, उपनिषद तथा सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों में प्रस्तुत किया है। परमात्मा जन्म व मरण से सर्वथा मुक्त एक सत्ता है। वह सर्वशक्तिमान एवं सृष्टि की नियन्ता शक्ति है। वह जीवों को सुख की इच्छा से किये जाने वाले कर्मों का फल देते हैं। यदि मनुष्य सुख की इच्छा न कर दुःखों की निवृत्ति की इच्छा करें और उसके साधनों व उपायों का विचार कर वेद एवं ऋषियों के ग्रन्थों का आश्रय लें, तो उन्हें विदित होता है कि वेदाध्ययन व वेदाचरण ही मनुष्य को सभी दुःखों से छुड़ाकर मोक्ष वा मुक्ति का आनन्द प्रदान कराते हैं। मोक्ष के विषय में ऋषि दयानन्द के वचन हैं कि जो मनुष्य विद्या और अविद्या के स्वरूप को साथ ही साथ जानता है वह अविद्या अर्थात कर्म व उपासना से मृत्यु को तर के विद्या अर्थात् यथार्थ ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त होता है। ऋषि दयानन्द यह भी बताते हैं कि मुक्ति उसे प्राप्त होती है जो बन्धनों में फंसा होता है। बद्ध वह होता है जो अधर्म व अज्ञान में फंसा हुआ होता है। अतः अधर्म व अज्ञान से छूटने पर मुक्ति का होना सम्भव होता है।

मनुष्य की आत्मा की मुक्ति व बन्धन किन-किन बातों से होता है इस पर भी ऋषि दयानन्द ने प्रकाश डाला है। वह बताते हैं कि परमेश्वर की आज्ञा पालने, अधर्म, अविद्या, कुसंग, कुसंस्कार, बुरे व्यसनों से अलग रहने और सत्यभाषण, परोपकार, विद्या, पक्षपातरहित न्याय, धर्म की वृद्धि करने, वेद विधि से परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना अर्थात् योगाभ्यास करने, विद्या पढ़ने, पढ़ाने और धर्म से पुरुषार्थ कर ज्ञान की उन्नति करने, सब से उत्तम साधनों को करने और जो कुछ करें वह सब पक्षपातरहित न्याय-धर्मानुसार ही करें। इन साधनों से मुक्ति और इन से विपरीत ईश्वराज्ञाभंग करने आदि काम से बन्ध व जन्म-मरण होता है। मुक्ति से जुड़े अन्य अनेक प्रश्नों व शंकाओं का भी ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में समाधान किया है। अतः सभी मनुष्यों को सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश को पढ़ने से मनुष्य को ईश्वर व जीवात्मा सहित सभी विषयों का आवश्यक ज्ञान हो जाता है जैसा ससंार में किसी अन्य ग्रन्थ में प्राप्त नहीं होता।

सभी मनुष्यों को ईश्वर व जीवात्मा के सत्यस्वरूप को जानना चाहिये। जीवात्मा व मनुष्य जीवन के उद्देश्य सहित जीवात्मा के लक्ष्य पर भी विचार करना चाहिये। ऐसा करके हम अपनी आत्मा व जीवन का अवश्य ही कल्याण कर सकेंगे। सत्यार्थप्रकाश सभी मनुष्यों का मित्र व सहयोगी के समान है। यदि हम सत्यार्थप्रकाश को अपना मित्र व मार्गदर्शक बनायेंगे और इससे परामर्श लेंगे तो हमारा, समाज व देश का अवश्य ही कल्याण होगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

 शिक्षा व्यवसाय से हिन्दू बाहर किए जा रहे

[13:19, 16/10/2020] +91 93106 79090: शिक्षा व्यवसाय से हिन्दू बाहर किए जा रहे (भाग 4)

राष्ट्रवादी कहलाने वालों की सत्ता में उन के वैचारिक समर्थकों, एक्टिविस्टों की विचित्र दुर्गति है। वे उसी तरह असहाय चीख-पुकार कर रहे हैं, जैसे कांग्रेसी या जातिवादियों के राज में करते थे। चाहे, वह मंदिरों पर राजकीय कब्जा हो, संविधान की विकृति हो, या शिक्षा-संस्कृति में हिन्दू विरोधी नीतियाँ हों। वे आज भी शिक्षा में हिन्दू विरोधी पक्षपात को दूर करने के लिए रो रहे हैं।

इस पक्षपात का उदाहरण ‘शिक्षा का अधिकार कानून, 2009’ (आर.टी.ई) भी है। जिस ने गरीब बच्चों को शिक्षा देने का भार केवल हिन्दुओं पर डाल दिया। अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों को इस से मुक्त रखा जिन की संख्या हजारों में है। उन्हें सरकारी अनुदान भी मिलता हो, तब भी उन पर आर.टी.ई लागू नहीं। जबकि हिन्दुओं द्वारा चलाए जा रहे स्कूल सरकारी अनुदान न भी लेते हों, तब भी उन्हें एक चौथाई सीटों पर निःशुल्क प्रवेश देना पड़ता है। यह फिर दोहरे जुल्म का उदाहरण है। हिन्दुओं द्वारा चलाए स्कूलों में चौथाई बच्चों का खर्च स्कूल को उठाना पड़ता है। गरीबों वाली सीटों पर भी प्रवेश तय करने का अधिकार स्कूल को नहीं, बल्कि राजकीय अधिकारियों को है। किसी कारण वे सीटें नहीं भरीं, तब भी उन्हें खाली रखना होगा।

इस के अलावा भी हिन्दुओं के स्कूलों पर सरकारी निर्देश, तरह-तरह के नियम बढ़ते गए हैं। उस में फीस संरचना, शिक्षकों के वेतन, छात्रों को प्रवेश की शर्तें, आदि तक तय करना शामिल है। यह खुला हिन्दू-विरोधी भेद-भाव है। क्योंकि यह सब स्कूल चलाने वाले का धर्म देख कर तय किया गया है। अरबपति क्रिश्चियन मिशनरी संस्थान भी उन नियमों से मुक्त हैं, जबकि साधारण हिन्दू स्कूल भी उन से बाध्य है। गोवा में आधे स्कूल मिशनरियों द्वारा संचालित हैं। केरल में उन की संख्या और अधिक है। उन के सामने हिन्दू स्कूलों का अस्तित्व ही खतरे में है।

आर.टी.ई के अन्य नियम भी हिन्दू स्कूलों पर चोट कर रहे हैं। जैसे, अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान किसी को भी प्रवेश दे सकते हैं। वे अपने समुदाय को संपूर्ण आरक्षण दे सकते हैं। कुछ मिशनरी स्कूलों में इसे हिन्दुओं का धर्मांतरण कराने के लिए भी इस्तेमाल हो रहा है! यह कह कर कि ‘सामान्य केटेगरी में सीट खाली नहीं, पर क्रिश्चियन वाली सीटें बची है। यदि क्रिश्चयिन बन जाओ तो एडमिशन मिल जाएगा।’ यह पुरानी तकनीक है, जिसे गाँधीजी ने मिशनरियों की सेवा, अस्पताल, स्कूल, आदि को ‘मछली फँसाने के लिए चारे’ का नाम दिया था।

अल्पसंख्यक संस्थान किसी को भी शिक्षक नियुक्त कर सकते हैं, उन पर न्यूनतम योग्यता शर्ते नहीं है। शिक्षकों को कुछ भी वेतन दे सकते हैं, उन पर पे-कमीशन लागू नहीं है। जो हिन्दुओं द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों पर है। यानी, हिन्दुओं को अधिकार नहीं रहा कि वे भी ‘ऊँचे’, ‘साधारण’ या ‘सस्ते’ स्कूल खोल सकें। जबकि अल्पसंख्यक संस्थानों को हरेक छूट है।

अभी दिल्ली में सरकार ने फीस बढ़ाने पर पाबंदी लगा दी है। गत महीनों में अनेक बच्चे कई महीने से फीस नहीं दे रहे। पर हिन्दुओं द्वारा चलाए जा रहे स्कूल उन का नाम नहीं काट सकते। सरकारी हुक्म है। एक हिन्दू संचालित स्कूल के व्यवस्थापक ने कहा, “इस महीने शिक्षकों-कर्मचारियों को वेतन देने के लाले पड़ गए हैं।” इस प्रकार, प्रवेश, नियुक्ति, आरक्षण, वेतन, फीस, आदि किसी चीज में अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों पर कोई सरकारी नियम बाध्यकारी नहीं। जबकि निम्नतम समुदाय के हिन्दू व्यक्ति/संस्था को भी छूट नहीं कि वह अपने समुदाय के लिए सीट सुरक्षित रखे। इस तरह, आर.टी.ई तरह-तरह से हिन्दुओं के विरुद्ध भेदभाव करता है। फलतः हिन्दुओं द्वारा चलाए जा रहे स्कूल बंद हो रहे हैं। अब तक लगभग चार हजार बंद हो चुके थे।

ध्यान रहे, अब शिक्षा लगभग पूरी तरह व्यवसाय में बदल चुका। ऐसी स्थिति में आर.टी.ई केवल हिन्दुओं पर लागू होना उन्हें इस व्यवसाय से बाहर करने का दबाव ही है। एक तरह का जजिया टैक्स, जो केवल हिन्दुओं पर है। क्या यह हिन्दुओं पर धर्मांतरित होने का दबाव या प्रलोभन नहीं, जैसा मुगल काल में था? क्योंकि जैसे ही कोई स्कूल या कॉलेज चलाने वाला हिन्दू धर्म बदल कर मुसलमान/ क्रिश्चियन हो जाए, वह अपने संस्थान में गरीबों के लिए 25 प्रतिशत निःशुल्क प्रवेश समेत सभी शर्तों, नियमों से मुक्त हो जाएगा! स्कूल की स्थिति के अनुसार यह राशि सालाना लाखों, करोड़ों में हो सकती है, जो किसी स्कूल या कॉलज को इसलिए देनी पड़ेगी, क्योंकि वह हिन्दू संचालित है!

इस पर सारे राजनीतिक दल, न्यायालय और मीडिया सभी चुप हैं। जबकि बीच-बीच में मानते हैं कि सेक्यूलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं के विरुद्ध अन्याय हो रहा है। गत दशकों में सारी गड़बड़ी संविधान के अनुच्छेद 26-30 की विकृति करके की गई। इस की संविधान निर्माताओं ने कल्पना तक नहीं की थी। संविधान में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का कई बार प्रयोग है, जबकि ‘बहुसंख्यक’ का नहीं। अर्थ यह न था कि वे बहुसंख्यक को वंचित रखना चाहते थे। वे मानकर चल रहे थे कि बहुसंख्यकों को तो अधिकार रहेंगे ही! उन्हें चिंता थी कि ‘अल्पसंख्यक’ को भी सब के बराबर अधिकार मिले रहें। इसलिए अनुच्छेद 30 लिख कर यह पक्का किया गया। उस के उपबन्ध-2 से स्पष्ट है कि संविधान की यही भावना थी।

किन्तु हिन्दू नेताओं, संगठनों की मूढ़ता और हिन्दू-विरोधियों की धूर्तता ने धीरे-धीरे उन अनुच्छेदों का यह अर्थ कर दिया कि अल्पसंख्यकों को ऐसे अधिकार हैं जो गैर-अल्पसंख्यकों यानी हिन्दुओं को नहीं हैं। किसी ने उस के विरुद्ध आवाज नहीं उठाई। वही आर.टी.ई कानून पर भी हुआ।दशकों से हिन्दू संगठन मानो अफीम खाकर पड़े हुए हैं। वरना अनुच्छेद 26-30 वाली विकृति जारी नही रह सकती थी। जिसे केवल प्रस्ताव पास कर सब के लिए समान घोषित करना है। मजे की बात यह कि ऐसा विधेयक मुस्लिम नेता सैयद शहाबुद्दीन ने दसवीं लोक सभा में अप्रैल 1995 में रखा था। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 30 के उपबन्धों में जहाँ-जहाँ ‘सभी अल्पसंख्यक’ लिखा हुआ था, उसे बदल कर ‘भारतीय नागरिकों का कोई भी वर्ग’ करने का प्रस्ताव दिया था।

उस विधेयक (नं 36/1995) के उद्देश्य में शहाबुद्दीन ने लिखा था कि अभी अनुच्छेद 30 केवल अल्पसंख्यकों पर लागू किया जाता है। जबकि, ‘‘एक विशाल और विविधता भरे समाज में लगभग सभी समूह चाहे जिन की पहचान धर्म, संप्रदाय, फिरका, भाषा और बोली किसी आधार पर होती हो, व्यवहारिक स्तर पर कहीं न कहीं अल्पसंख्यक ही है, चाहे किसी खास स्तर पर वह बहुसंख्यक क्यों न हो। आज विश्व में सांस्कृतिक पहचान के उभार के दौर में हर समूह अपनी पहचान के प्रति समान रूप से चिंतित है और अपनी पसंद की शैक्षिक संस्था बनाने की सुविधा चाहता है। इसलिए, यह उचित होगा कि संविधान के अनुच्छेद 30 के दायरे में देश के सभी समुदाय और हिस्से सम्मिलित किये जाएं।’’

शहाबुद्दीन ने उस में यह भी लिखा था कि जो बहुसंख्यकों को प्राप्त नहीं, वैसी सुविधा अल्पसंख्यकों को देने के लिए अनुच्छेद 30 की निन्दा होती रही है। अतः बहुसंख्यकों को भी अपनी शैक्षिक संस्थाएं बनाने, चलाने का समान अधिकार मिलना चाहिए। यह हिन्दू नेताओं की अचेतावस्था का प्रमाण है कि वह विधेयक यूँ ही पड़ा-पड़ा खत्म हो जाने दिया गया!

यह हमारे राजनीतिक दलों का दिवालियापन है कि नब्बे प्रतिशत हिन्दुओं से भरे दल व संसद 1975 ई. से ही लगातार नए, नए हिन्दू-विरोधी संशोधनों, कानूनों को पास करते रहे हैं। आर.टी.ई. का बेखटके पास होना उसी क्रम में था। किसी ने इस का मुगलिया, जजिया-नुमा भेद-भाव देखने की फिक्र नहीं की। वही हैरत आज भी कि कथित हिन्दूवादी सत्ताधारी भी इसे जारी रखे हुए हैं। हिन्दू समाज के विरुद्ध धार्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक भेद-भाव पर वे गाँधीजी के बंदरों जैसी मुद्रा में हैं। (समाप्त)

– डॉ. शंकर शरण (१३ अक्टूबर २०२०)