पण्डित ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु की पुण्यस्मृति का अभिनन्दन – लेखक पद्मविभूषण पूज्य डॉ बलदेव उपाध्याय जी, वाराणसी . जन्म दिवस – 14 अक्टूबर – विशेष स्मरण

पण्डित ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु की पुण्यस्मृति का अभिनन्दन
– लेखक पद्मविभूषण पूज्य डॉ बलदेव उपाध्याय जी, वाराणसी
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जन्म दिवस – 14 अक्टूबर – विशेष स्मरण
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पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु के अध्ययन काल के गुरुजनों का नाम्ना निर्देश तथा उनकी शिक्षा दीक्षा का संक्षेप में उल्लेख उनके स्वलिखित जीवन परिचय में बहुत से अज्ञात तथ्यों का विधिवत् वर्णन किया है – उन गुरुजनों में से अनेक व्यक्तियों से मेरा परिचय रहा है |
[पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु के] गुरुवर स्वामी पूर्णानन्द जी के अध्यापक पण्डित काशीनाथ शास्त्रीजी को बड़े निकट से जानता हूँ क्योंकि उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया मण्डल में जिस ग्राम में हुआ था, वह मेरे ग्राम से बहुत दूर नहीं था | हम दोनों ही व्यक्तियों का जन्म-स्थान बलिया जनपद ही है | पण्डित काशीनाथ शास्त्री जी, स्वामी श्रद्धानन्द जी के विशेष आग्रह पर हरिद्वार के गुरुकुल में अध्यापक बन कर गये थे और वहाँ उनके द्वारा शिक्षित विद्वानों ने बड़ी कीर्ति अर्जित की | काशी में आकर जिज्ञासु जी ने महाभाष्य, न्यायशास्त्र, मीमांसा तथा वेद का चिन्तन तथा मनन जिन विद्वानों के सान्निध्य में किया था, उनमें से अनेक पण्डितों के पास उन्हें झोले में ग्रन्थों को रखकर आते-जाते मैं बहुश: देखता था | वैदिक रामभट्ट रटाटे जी तो पञ्चगङ्गा घाट पर मेरे आवास के पास ही रहते थे – उनके पास जिज्ञासु जी को मैंने बहुश: आते – जाते देखा था | इस प्रकार उनके विद्याध्ययन में विशेष आग्रह तथा अदम्य उत्साह देखकर मुझे चकती होना पड़ता था | काशी के दयालु पण्डितों की प्रदत्त विद्या के लिए उन्होंने कभी नहीं भुलाया | इन पण्डितों की दिव्य स्मृति उनके जीवन परिचय में सर्वात्मना सुरक्षित है |
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पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी पद-वाक्य-प्रमाणज्ञ थे | वे पदशास्त्र (व्याकरण), वाक्यशास्त्र (मीमांसा) तथा प्रमाणशास्त्र (न्याय) के प्रौढ़ विद्वान् थे, परन्तु उनका विशेष आग्रह पदशास्त्र पर था | आर्ष-पाठविधि के विशेष मर्मज्ञ तथा प्रचारक थे | संस्कृत भाषा का ज्ञान सरलता सुगम रीति से बालकों को कराया जाय – इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उनका समग्र जीवन ही समर्पित था | इस लक्ष्य की सिद्धि के लिए प्रथमतः “संस्कृत पठन-पाठन की अनुभूत सरलतम विधि” नामक ग्रन्थ की रचना की तथा विपुल प्रचार की दृष्टि से उन्होंने इसका अँग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित किया The tested Easiest Method of Learning and Teaching Sanskrit नाम से | इसका प्रचुर प्रचार संस्कृत के शिक्षार्थियों में हुआ और आज भी यह अँग्रेजी भाषा के माध्यम से पाणिनीय व्याकरण में प्रवेश करने वालों के लिए आधिकारिक पुस्तक है | जिज्ञासु जी ने प्रथम खण्ड ही लिखा था, परन्तु जिज्ञासु जी के प्रौढ़ विद्वान् शिष्य पण्डित युधिष्ठिर मीमांसक जी ने इसका दूसरा खण्ड भी प्रकाशित कर इसका प्रचार कार्य को और भी आगे बढ़ाया है |
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आर्षपाठविधि का मुख्य लक्ष्य पाणिनी की अष्टाध्यायी को सरल और सुबोध बनाना तथा देववाणी का विशुद्ध प्रचार-प्रसार है और इस लक्ष्य की सिद्धि के लिए जिज्ञासु जी ने अपना दीर्घ जीवन ही समर्पित कर दिया है |
भट्टोजिदीक्षित द्वारा सङ्कलित ‘सिद्धान्तकौमुदी’ के द्वारा आजकल व्याकरण का अध्ययन-अध्यापन चल रहा है, परन्तु अनेक त्रुटियों का पता इस पद्धति के अनुसरण से लग चुका है | इसी लिए आर्षपाठविधि का उद्गम हुआ | जिज्ञासु जी के पाण्डित्य का यह वैशिष्ट्य है कि उन्होंने इसी पद्धति के द्वारा अष्टाध्यायी अध्ययन अपने गुरुवर्य पूर्णानन्द जी से प्रथमतः किया | अधीति (अध्ययन), बोध (मनन) आचरण (ग्रन्थ लेखन) तथा प्रचारण (अध्यापन) के द्वारा किसी विद्या के ज्ञान-विज्ञान की उत्कट कोटि में पहुँचाया जा सकता है और जिज्ञासु जी ने इस तथ्य को अपने जीवन में विधिवत् सम्पन्न किया | स्वयं पढ़ा, मनन किया, ग्रन्थ लिखा तथा शिष्यों को पढ़ाया | इन चार कार्यों का साधन उनके जीवन का परम लक्ष्य था |
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पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी का एतद्विषयक अद्भुत विपुलकाय ग्रन्थ है – अष्टाध्यायी (भाष्य) प्रथमावृत्ति, जिसके तीन भाग हैं, जो दो हजार से भी अधिक पृष्ठों में प्रकाशित हुई हैं | इनमें से प्रथम द्वितीय भाग तो जिज्ञासु जी की लेखनी के चमत्कार प्रस्तुत करते हैं और अन्तिम भाग उन्हीं की विदुषी शिष्या प्रज्ञा देवी की रचना है जो गुरु की रचना से प्रामाणिकता सरलता तथा विषयविन्यास के विषय में किसी प्रकार न्यून नहीं है |
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जिज्ञासु जी महाराज ने बहुत आरम्भ से ही अनुभव किया था कि अष्टाध्यायी-क्रम के अध्ययन से ही व्याकरण का ज्ञान, अतीव सरलता से किया जा सकता है और अष्टाध्यायी-क्रम का वैशिष्ट्य उन्होंने बतलाया तथा व्याकरणाध्ययन के इस अतीव सरल उपाय का विवेचन उन्होंने अपने पूर्वोक्त ग्रन्थ में किया है | सूत्र पाठ के क्रम के ज्ञान के बिना ‘पूर्व’ ‘पर’ ‘त्रिपादी’ ‘सपादसप्ताध्यायी’ तथा बाध्यबाधकभाव इत्यादि का ज्ञान, पढ़ने वाले एवं पढ़ानेवाले को भी कभी सम्भव नहीं है | इसीलिए जिज्ञासु जी ने अष्टाध्यायी के अध्ययन-अध्यापन, मनन-निदिध्यासन में अपनी समग्र शक्ति का उपयोग किया और इस विषय का पूरा परिचय उनके अष्टाध्यायी-भाष्य प्रथमावृत्ति के अवलोकन से प्रत्येक आलोचक को ही जाता है | इसमें अनुवृत्ति के निर्देश के साथ सूत्रों का विधिवत् अर्थप्रदर्शन किया है | इसमें व्याख्या संस्कृत तथा हिन्दी दोनों भाषाओं में की गयी है | इसका अध्ययन महाभाष्य में प्रवेश के अभिलाषी छात्रों का विशेषरुपेण सहायक है |
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वेद के अध्यापन-मनन की ओर आपकी अभिरुचि कम नहीं थी | इसीलिए पण्डित ब्रह्मदत्त जी ने दयानन्द स्वामी रचित यजुर्वेद भाष्य पर अपना विवरण प्रणीत किया, जो मूल तथा भाष्य के ज्ञान के लिए नितान्त उपयोगी साधन है | इस पद्धति तथा मननशैली से अपने अनेक शिष्यों तथा शिष्याओं को तैयार किया है | जिनमें पण्डित युधिष्ठिर मीमांसक जी तथा प्रज्ञा कुमारी जी के नाम अग्रगण्य हैं | मनीषीजन जिज्ञासु जी के कार्य को पूर्ण करने में सर्वथा संलग्न हैं | फलतः ये भी हमारी श्रद्धा के पात्र हैं |
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पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु के कार्यकलाप के वर्णनपरक ग्रन्थ में मेरा यह लेख श्रद्धाञ्जलि के रूप में सादर समर्पित है |
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(साभार स्मारिका, पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु जन्म शताब्दी 14 अक्तूबर 1892-1992, परिचितों व शिष्यों द्वारा लिखित संस्मरण व श्रद्धाञ्जलि, पद्मविभूषण पूज्य डॉ बलदेव उपाध्याय जी, वाराणसी द्वारा लिखित लेख पृष्ठ 213-214-215 में से, प्रकाशक- रामलाल कपूर ट्रस्ट)
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सश्रद्ध-प्रस्तोता :- विश्वप्रिय वेदानुरागी
मुझे गर्व है, मैं पूज्य गुरुवर्य पण्डित ब्रह्मदत्त जी की परम्परा परिवार का सदस्य हूँ | परमात्मा से प्रार्थना है कि, भविष्य में भी इस मेरे परिवार को विद्वानों का आश्रय मिलता रहे, उनके संस्कारों से सिंचित होते रहें |
धन्यवाद
नमस्तेजी
सादर
विदुषामनुचर
विश्वप्रिय वेदानुरागी

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