पण्डित ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु की पुण्यस्मृति का अभिनन्दन – लेखक पद्मविभूषण पूज्य डॉ बलदेव उपाध्याय जी, वाराणसी . जन्म दिवस – 14 अक्टूबर – विशेष स्मरण

पण्डित ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु की पुण्यस्मृति का अभिनन्दन
– लेखक पद्मविभूषण पूज्य डॉ बलदेव उपाध्याय जी, वाराणसी
.
जन्म दिवस – 14 अक्टूबर – विशेष स्मरण
.
पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु के अध्ययन काल के गुरुजनों का नाम्ना निर्देश तथा उनकी शिक्षा दीक्षा का संक्षेप में उल्लेख उनके स्वलिखित जीवन परिचय में बहुत से अज्ञात तथ्यों का विधिवत् वर्णन किया है – उन गुरुजनों में से अनेक व्यक्तियों से मेरा परिचय रहा है |
[पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु के] गुरुवर स्वामी पूर्णानन्द जी के अध्यापक पण्डित काशीनाथ शास्त्रीजी को बड़े निकट से जानता हूँ क्योंकि उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया मण्डल में जिस ग्राम में हुआ था, वह मेरे ग्राम से बहुत दूर नहीं था | हम दोनों ही व्यक्तियों का जन्म-स्थान बलिया जनपद ही है | पण्डित काशीनाथ शास्त्री जी, स्वामी श्रद्धानन्द जी के विशेष आग्रह पर हरिद्वार के गुरुकुल में अध्यापक बन कर गये थे और वहाँ उनके द्वारा शिक्षित विद्वानों ने बड़ी कीर्ति अर्जित की | काशी में आकर जिज्ञासु जी ने महाभाष्य, न्यायशास्त्र, मीमांसा तथा वेद का चिन्तन तथा मनन जिन विद्वानों के सान्निध्य में किया था, उनमें से अनेक पण्डितों के पास उन्हें झोले में ग्रन्थों को रखकर आते-जाते मैं बहुश: देखता था | वैदिक रामभट्ट रटाटे जी तो पञ्चगङ्गा घाट पर मेरे आवास के पास ही रहते थे – उनके पास जिज्ञासु जी को मैंने बहुश: आते – जाते देखा था | इस प्रकार उनके विद्याध्ययन में विशेष आग्रह तथा अदम्य उत्साह देखकर मुझे चकती होना पड़ता था | काशी के दयालु पण्डितों की प्रदत्त विद्या के लिए उन्होंने कभी नहीं भुलाया | इन पण्डितों की दिव्य स्मृति उनके जीवन परिचय में सर्वात्मना सुरक्षित है |
.
पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी पद-वाक्य-प्रमाणज्ञ थे | वे पदशास्त्र (व्याकरण), वाक्यशास्त्र (मीमांसा) तथा प्रमाणशास्त्र (न्याय) के प्रौढ़ विद्वान् थे, परन्तु उनका विशेष आग्रह पदशास्त्र पर था | आर्ष-पाठविधि के विशेष मर्मज्ञ तथा प्रचारक थे | संस्कृत भाषा का ज्ञान सरलता सुगम रीति से बालकों को कराया जाय – इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उनका समग्र जीवन ही समर्पित था | इस लक्ष्य की सिद्धि के लिए प्रथमतः “संस्कृत पठन-पाठन की अनुभूत सरलतम विधि” नामक ग्रन्थ की रचना की तथा विपुल प्रचार की दृष्टि से उन्होंने इसका अँग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित किया The tested Easiest Method of Learning and Teaching Sanskrit नाम से | इसका प्रचुर प्रचार संस्कृत के शिक्षार्थियों में हुआ और आज भी यह अँग्रेजी भाषा के माध्यम से पाणिनीय व्याकरण में प्रवेश करने वालों के लिए आधिकारिक पुस्तक है | जिज्ञासु जी ने प्रथम खण्ड ही लिखा था, परन्तु जिज्ञासु जी के प्रौढ़ विद्वान् शिष्य पण्डित युधिष्ठिर मीमांसक जी ने इसका दूसरा खण्ड भी प्रकाशित कर इसका प्रचार कार्य को और भी आगे बढ़ाया है |
.
आर्षपाठविधि का मुख्य लक्ष्य पाणिनी की अष्टाध्यायी को सरल और सुबोध बनाना तथा देववाणी का विशुद्ध प्रचार-प्रसार है और इस लक्ष्य की सिद्धि के लिए जिज्ञासु जी ने अपना दीर्घ जीवन ही समर्पित कर दिया है |
भट्टोजिदीक्षित द्वारा सङ्कलित ‘सिद्धान्तकौमुदी’ के द्वारा आजकल व्याकरण का अध्ययन-अध्यापन चल रहा है, परन्तु अनेक त्रुटियों का पता इस पद्धति के अनुसरण से लग चुका है | इसी लिए आर्षपाठविधि का उद्गम हुआ | जिज्ञासु जी के पाण्डित्य का यह वैशिष्ट्य है कि उन्होंने इसी पद्धति के द्वारा अष्टाध्यायी अध्ययन अपने गुरुवर्य पूर्णानन्द जी से प्रथमतः किया | अधीति (अध्ययन), बोध (मनन) आचरण (ग्रन्थ लेखन) तथा प्रचारण (अध्यापन) के द्वारा किसी विद्या के ज्ञान-विज्ञान की उत्कट कोटि में पहुँचाया जा सकता है और जिज्ञासु जी ने इस तथ्य को अपने जीवन में विधिवत् सम्पन्न किया | स्वयं पढ़ा, मनन किया, ग्रन्थ लिखा तथा शिष्यों को पढ़ाया | इन चार कार्यों का साधन उनके जीवन का परम लक्ष्य था |
.
पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी का एतद्विषयक अद्भुत विपुलकाय ग्रन्थ है – अष्टाध्यायी (भाष्य) प्रथमावृत्ति, जिसके तीन भाग हैं, जो दो हजार से भी अधिक पृष्ठों में प्रकाशित हुई हैं | इनमें से प्रथम द्वितीय भाग तो जिज्ञासु जी की लेखनी के चमत्कार प्रस्तुत करते हैं और अन्तिम भाग उन्हीं की विदुषी शिष्या प्रज्ञा देवी की रचना है जो गुरु की रचना से प्रामाणिकता सरलता तथा विषयविन्यास के विषय में किसी प्रकार न्यून नहीं है |
.
जिज्ञासु जी महाराज ने बहुत आरम्भ से ही अनुभव किया था कि अष्टाध्यायी-क्रम के अध्ययन से ही व्याकरण का ज्ञान, अतीव सरलता से किया जा सकता है और अष्टाध्यायी-क्रम का वैशिष्ट्य उन्होंने बतलाया तथा व्याकरणाध्ययन के इस अतीव सरल उपाय का विवेचन उन्होंने अपने पूर्वोक्त ग्रन्थ में किया है | सूत्र पाठ के क्रम के ज्ञान के बिना ‘पूर्व’ ‘पर’ ‘त्रिपादी’ ‘सपादसप्ताध्यायी’ तथा बाध्यबाधकभाव इत्यादि का ज्ञान, पढ़ने वाले एवं पढ़ानेवाले को भी कभी सम्भव नहीं है | इसीलिए जिज्ञासु जी ने अष्टाध्यायी के अध्ययन-अध्यापन, मनन-निदिध्यासन में अपनी समग्र शक्ति का उपयोग किया और इस विषय का पूरा परिचय उनके अष्टाध्यायी-भाष्य प्रथमावृत्ति के अवलोकन से प्रत्येक आलोचक को ही जाता है | इसमें अनुवृत्ति के निर्देश के साथ सूत्रों का विधिवत् अर्थप्रदर्शन किया है | इसमें व्याख्या संस्कृत तथा हिन्दी दोनों भाषाओं में की गयी है | इसका अध्ययन महाभाष्य में प्रवेश के अभिलाषी छात्रों का विशेषरुपेण सहायक है |
.
वेद के अध्यापन-मनन की ओर आपकी अभिरुचि कम नहीं थी | इसीलिए पण्डित ब्रह्मदत्त जी ने दयानन्द स्वामी रचित यजुर्वेद भाष्य पर अपना विवरण प्रणीत किया, जो मूल तथा भाष्य के ज्ञान के लिए नितान्त उपयोगी साधन है | इस पद्धति तथा मननशैली से अपने अनेक शिष्यों तथा शिष्याओं को तैयार किया है | जिनमें पण्डित युधिष्ठिर मीमांसक जी तथा प्रज्ञा कुमारी जी के नाम अग्रगण्य हैं | मनीषीजन जिज्ञासु जी के कार्य को पूर्ण करने में सर्वथा संलग्न हैं | फलतः ये भी हमारी श्रद्धा के पात्र हैं |
.
पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु के कार्यकलाप के वर्णनपरक ग्रन्थ में मेरा यह लेख श्रद्धाञ्जलि के रूप में सादर समर्पित है |
.
(साभार स्मारिका, पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु जन्म शताब्दी 14 अक्तूबर 1892-1992, परिचितों व शिष्यों द्वारा लिखित संस्मरण व श्रद्धाञ्जलि, पद्मविभूषण पूज्य डॉ बलदेव उपाध्याय जी, वाराणसी द्वारा लिखित लेख पृष्ठ 213-214-215 में से, प्रकाशक- रामलाल कपूर ट्रस्ट)
.
सश्रद्ध-प्रस्तोता :- विश्वप्रिय वेदानुरागी
मुझे गर्व है, मैं पूज्य गुरुवर्य पण्डित ब्रह्मदत्त जी की परम्परा परिवार का सदस्य हूँ | परमात्मा से प्रार्थना है कि, भविष्य में भी इस मेरे परिवार को विद्वानों का आश्रय मिलता रहे, उनके संस्कारों से सिंचित होते रहें |
धन्यवाद
नमस्तेजी
सादर
विदुषामनुचर
विश्वप्रिय वेदानुरागी

मनुस्मृति में नारियों की स्थिति

सभी को सादर नमस्ते जी
💥मनुर्भव💥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
🌿🌹🌼🌹🌻🌺🌼🌺🌻🌿

💥🌹मनुस्मृति में नारियों की स्थिति🌹💥
👇👇
मनुस्मृति के अन्तःसाक्ष्य कहते हैं कि मनु की जो स्त्री-विरोधी छवि प्रस्तुत की जा रही है,वह निराधार एवं तथ्यों के विपरित है।मनु ने मनुस्मृति में स्त्रियों से सम्बन्धित जो व्यवस्थाएं दी हैं वे उनके सम्मान,सुरक्षा,समानता,सद्भाव और न्याय की भावना से प्रेरित हैं।कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं:-
👇
💥(1) नारियों को सर्वोच्च महत्व:-👇
महर्षि मनु संसार के वह प्रथम महापुरुष हैं,जिन्होंने नारी के विषय में सर्वप्रथम ऐसा सर्वोच्च आदर्श उद्घोष किया है,जो नारी की गरिमा,महिमा और सम्मान को असाधारण ऊंचाई प्रदान करता है-👇

💥#यत्रनार्यस्तुपूज्यन्तेरमन्तेतत्र_देवताः ।
#यत्रैताःतुनपूज्यन्तेसर्वास्तत्राफलाः_क्रियाः ।।-(३/५९)👇

इसका सही अर्थ है-‘जिस परिवार में नारियों का आदर-सम्मान होता है,वहाँ देवता=दिव्य गुण,कर्म,स्वभाव,दिव्य लाभ आदि प्राप्त होते हैं और जहां इनका आदर-सम्मान नहीं होता,वहां उनकी सब क्रियाएं निष्फल हो जाती हैं।’💥

💥स्त्रियों के प्रति प्रयुक्त सम्मानजनक एवं सुन्दर विशेषणों से बढ़कर,नारियों के प्रति मनु की भावना का बोध कराने वाले प्रमाण और कोई नहीं हो सकते।वे कहते हैं कि नारियों का घर भाग्योदय करने वाली,आदर के योग्य,घर की 💥ज्योति,गृहशोभा,गृहलक्ष्मी,गृहसंचालिका एवं गृहस्वामिनी,घर का स्वर्ग,संसारयात्रा का आधार हैं (९.११,२६,२८;५.१५०)।💥💥💥
कल्याण चाहने वाले परिवारजनों को स्त्रियों का आदर-सत्कार करना चाहिए,अनादर से शोकग्रस्त रहने वाली स्त्रियों के कारण घर और कुल नष्ट हो जाते हैं।स्त्री की प्रसन्नता में ही कुल की वास्तविक प्रसन्नता है (३.५५-६२)।💥💥💥💥💥💥
इसलिए वे गृहस्थों को उपदेश देते हैं कि परस्पर संतुष्ट रहें एक दूसरे के विपरीत आचरण न करें और ऐसा कार्य न करें जिससे एक-दूसरे से वियुक्त होने की स्थिति आ जाये(९.१०१-१०२)।
💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥
मनु कीभावनाओं को व्यक्त करने के लिए एक श्लोक ही पर्याप्त है–
🔥#प्रजनार्थंमहाभागाःपूजार्हाः_गृहदीप्तयः ।
#स्त्रियःश्रीयश्चगेहेषुनविशेषोऽस्ति_कश्चन। 🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥-(मनु० १/२६)

💥अर्थात्-💥सन्तान उत्पत्ति के लिए घर का भाग्योदय करने वाली,आदर-सम्मान के योग्य,गृहज्योति होती हैं स्त्रियां।शोभा-लक्ष्मी और स्त्री में कोई अन्तर नहीं है,वे घर की प्रत्यक्ष शोभा हैं।

💥(2) पुत्र-पुत्री एक समान:-💥
मनुमत से अनभिज्ञ पाठकों को यह जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि मनु ही सबसे पहले वह संविधान निर्माता हैं जिन्होंने पुत्र-पुत्री की समानता को घोषित करके उसे वैधानिक रुप दिया है-

“#पुत्रेणदुहितासमा”(मनु० ९/१३०)*
💥अर्थात्-💥’पुत्री पुत्र के समान होती है।वह आत्मारुप है,अतः वह पैतृकसम्पत्ति की अधिकारिणी है।’

💥(3) पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार:-💥
मनु ने पेतृक सम्पत्ति में पुत्र-पुत्री को समान अधिकारी माना है।उनका यह मत मनुस्मृति के ९.१३०,१९२ में वर्णित है।इसे निरुक्त में इस प्रकार उद्घृत किया है-

#अविशेषेणपुत्राणांदायोभवतिधर्मतः ।
#मिथुनानांविसर्गादौमनुः_स्वायम्भुवोऽब्रवीत् 💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥।।-(३.१.४)

💥अर्थात्-💥सृष्टि के प्रारम्भ में स्वायम्भुव मनु ने यह विधान किया है कि दायभाग=पैतृक सम्पत्ति में पुत्र-पुत्री का समान अधिकार होता है।मातृधन में केवल कन्याओं का अधिकार विहित करके मनु ने परिवार में कन्याओं के महत्त्व में अभिवृद्धि की है(९.१३१)।

💥(4) स्त्रियों के धन की सुरक्षा के विशेष निर्देश:-👇
स्त्रियों को अबला समझकर कोई भी,चाहे वह बन्धु-बान्धव ही क्यों न हो,यदि स्त्रियों के धन पर कब्जा कर लें,तो उन्हें चोर सदृश दण्ड से दण्डित करने का आदेश मनु ने दिया है(९.२१२;३.५२;८.२;८-२९)।

💥(5) नारियों के प्रति किये अपराधों में कठोर दण्ड:-👇

स्त्रियों की सुरक्षा के दृष्टिगत नारियों की हत्या और उनका अपहरण करने वालों के लिए मृत्युदण्ड का विधान करके तथा बलात्कारियों के लिए यातनापूर्ण दण्ड देने के बाद देश निकाला का आदेश देकर मनु ने नारियों की सुरक्षा को सुनिश्चित बनाने का यत्न किया है 💥💥💥💥(८/३२३;९/२३२;८/३५२)।
नारियों के जीवन में आने वाली प्रत्येक छोटी-बड़ी कठिनाई का ध्यान रखते हुए मनु ने उनके निराकरण हेतु स्पष्ट निर्देश दिये हैं।👇👇

पुरुषों को निर्देश हैं कि वे माता,पत्नि और पुत्री के साथ झगड़ा न करें (४/१८०),इन पर मिथ्या दोषारोपण करने वालों,इनको निर्दोष होते हुए त्यागने वालों,पत्नि के प्रति वैवाहिक दायित्व न निभाने वालों के लिए दण्ड का विधान है 💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥(८/२७५,३८९;९/४)।

💥(6) वैवाहिक स्वतन्त्रता एवं अधिकार:-👇
विवाह के विषय में मनु के आदर्श विचार हैं।मनु ने कन्याओं को योग्य पति का स्वयं वरण करने का निर्देश देकर स्वयम्वर विवाह का अधिकार एवं उसकी स्वतन्त्रता दी है 💥💥💥💥(९/९०-९१)।
विधवा को पुनर्विवाह का भी अधिकार दिया है,साथ ही सन्तानप्राप्ति के लिए नियोग की भी छूट है💥💥💥(९/१७६,९/५६-६३)।
उन्होंने विवाह को कन्याओं के आदर-स्नेह का प्रतीक बताया है,अतः विवाह में किसी भी प्रकार के लेन-देन को अनुचित बताते हुए बल देकर उसका निषेध किया है💥💥💥💥💥💥 (३/५१-५४)।
स्त्रियों के सुखी-जीवन की कामना से उनका सुझाव है कि जीवनपर्यन्त अविवाहित रहना श्रेयस्कर है,किन्तु गुणहीन,दुष्ट पुरुष से विवाह नहीं करना चाहिए 💥💥💥💥💥💥💥💥💥(९/८९)।

लेख प्रस्तुति👇👇
#शशिआर्या_वैदिकभजनोपदेशिका

भारत में आज भी जिन विदेशियों पर गर्व किया जाता है

(13 अक्तूबर/ पुण्य-तिथि)
भारत में आज भी जिन विदेशियों पर गर्व किया जाता है, उनमें भगिनी निवेदिता का नाम सबसे पहले आता है.
भगिनी नेवेदिता का बचपन का नाम मार्गरेट एलिज़ाबेथ नोबेल था। मार्गरेट का जन्म 28 अक्टूम्बर, 1867 को काउंटी टाईरोन, आयरलैंड में हुआ था। मार्गरेट के पिता का नाम श्री सैमुएल रिचमंड नोबेल और माता का नाम मैरी इसाबेल था।
मार्गरेट ने अपनी शिक्षा हेलिफेक्स कॉलेज से पूर्ण की जिसमे उन्होंने कई विषयों के साथ-साथ संगीत और प्राकृतिक विज्ञान में दक्षता प्राप्त की। मार्गरेट ने 17 वर्ष की आयु में शिक्षा पूर्ण करने के बाद अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया। उनके मन में धर्म के बारे में जानने की बहुत जिज्ञासा थी।
मार्गरेट को एक बार पता चला की स्वामी विवेकानन्द अमेरिका में ओजस्वी भाषण देने के बाद इंग्लैड पधारे है तो मार्गरेट ने उनसे मिलने का निश्चय किया और वो लेडी मार्गसन के आवास पर स्वामी से मिलने गई। स्वामी जी के तेजस्वी व्यक्तित्व से वो बहुत प्रभावित हुई। मार्गरेट नोबेल स्वामी जी के वेदांत दर्शन से इतनी अधिक प्रभावित हुई की उनका हृदय आध्यात्मिक दर्शन की ओर प्रवृष्ट हो गया।
भगिनी निवेदिता का वास्तविक नाम मार्गरेट नोबेल था। वे आयरिश मूल की रहने वाली थी।
उनके के पिता एक चर्च में उपदेशक थे।
वो सर्वप्रथम 1896 में भारत आई। 25 March 1898 को उन्होंने ब्रह्मचार्य के व्रत को अंगीकार किया। उन्होंने ग्रामीण बल विधवाओं को कलकत्ता में लाकर शिक्षित किया।
उन्होंने बालिका शिक्षा के लिए कलकत्ता में एक school भी खोला।
उनकी मृत्यु 13 अक्टूम्बर, 1911 को दार्जलिंग में हुई और उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति रिवाज से किया गया।
स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण में कहा “मुझे सभी से आशा नहीं है, मुझे कुछ चुने हुए 20 लोग चाहिए जो अपना सम्पूर्ण जीवन संसार सेवा में न्योछावर कर सकें”
अगले ही दिन सुबह ही एक चेहरा उनके सामने था स्वामी जी ने कहा बताये आपकी क्या सेवा करूँ.
उसने कहा – ” स्वामी जी आपने कल 20 लोगो के बारे में बात की थी 19 लोगो का तो पता नहीं, पर 1 मै हूँ ”
“और वह थी भगनी निवेदिता”
स्वामी विवेकानन्द का मानना था की भारत की मुक्ति महिलाओं के हाथ में है इसलिए उन्हें शिक्षा द्वारा जागृत करना बहुत जरुरी है। स्वामी जी एक ऐसे व्यक्ति की खोज में थे जो भारतीय महिलाओं को जागृत करके उनमे राष्ट्रीय चेतना की भावना विकसित कर सके।
स्वामी जी को मार्गरेट में इन गुणों का समावेश दिखाई दिया जिनकी उनको तलाश थी और इसलिए उन्होंने मार्गरेट से आग्रह किया कि –
वो भारत आकर उनकी मदद करे और जो उनकी महिलाओं के लिए योजनाएँ है या जैसा वो सोचते हैं उसे यथार्थ में करने में मदद करें।
मार्गरेट नोबेल ऐसा अवसर को कैसे चूक सकती थीं उन्होंने तुरंत ही हाँ बोल दिया। वे 1896 में भारत आईं और यहाँ की गतिविधियों में भागीदारी करने लगी। 25 मार्च 1898 को स्वामी जी ने मार्गेट नोबेल को ब्रह्मचर्य की शपथ दिलाते हुए दीक्षा प्रदान की और उनका नाम निवेदिता रख दिया। इस अवसर पर स्वामी जी ने कहा-
जाओ और उसका अनुसरण करो, वो जिसने बुद्ध की दृष्टि प्राप्त करने से पहले 500 बार जन्म लिया और अपना जीवन न्योछावर कर दिया
आगे चल कर मार्गरेट नोबेल भगिनी निवेदिता ( Sister Nivedita) नाम से विख्यात हुईं।
भगिनी निवेदिता ने महिला शिक्षा के माध्यम से भारत की महानता को पुन: स्थापित करने का प्रयास किया और उन्हें इसमें सफलता भी मिली। मार्गरेट ‘बसु पद्धति’ से काफी प्रभावित थीं। उस समय ग्रामीण बंगाल में विधवाओं पर कठोर अनुशासन थोपे जाते थे जो की एक उदार व्यक्ति के हृदय को व्यथित करने के लिए काफी था। इसलिए मार्गरेट विधवा महिलाओं को कलकत्ता लाकर उन्हें बसु पद्धति से शिक्षा देतीं और उन्हें प्रशिक्षित करके गाँवो में वापस भेज देतीं ताकि वे और लोगो को शिक्षित कर सकें।
भगिनी निवेदिता ने स्वामी विवेकानंद के साथ कई स्थानों पर भ्रमण किया और स्वामी जी के दिखाए मार्ग पर चलते हुए बालिका शिक्षा के लिए कलकत्ता में एक स्कूल खोला। बालिका शिक्षा में जब भी सिस्टर निवेदिता को धन की जरूरत हुई तो उसके लिए श्रीमती बुल ने उनकी आर्थिक मदद की।
जब भारत में प्लेग और कालरा रोग फैल गया था तब अंग्रेजों ने कोई कार्य नहीं किया लेकिन भगिनी निवेदिता ने विषम हालात में भी रोग पीड़ितों की हर सम्भव मदद की थी। स्वामी विवेकानन्द के देह त्यागने के बाद उनके मिशन को संचालित करने का दायित्व भगिनी निवेदिता ने सम्भाला और उसे अच्छी तरह निभाया।
वो एक अच्छी लेखिका भी थी और उन्होंने- “द मास्टर एज आई सॉ हिम”, “ट्रेवल टेल्स”, “क्रेडल टेल्स ऑफ़ हिंदूइजम” आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ है।
भगिनी निवेदिता ने 13 अक्टूबर, 1911 को अपना देह त्याग दिया। उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से किया गया। ऐसी अद्भुत नारी, जिसने विदेशी होते हुए भी अपना पूर्ण जीवन भारत की सेवा में बिताया, हम सभी को हेमशा-हेमशा के लिए याद रहेगी। हम उन्हें शत-शत नमन करते हैं।
चण्डीगढ़