ऋषि दयानन्द ने सत्य के निर्णयार्थ सब धर्माचार्यों से शास्त्रार्थ किये थे

ओ३म्
ऋषि दयानन्द ने सत्य के निर्णयार्थ सब धर्माचार्यों से शास्त्रार्थ किये थे
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सभी मनुष्य बुद्धि रखते हैं जो ज्ञान प्राप्ति में सहायक होने के साथ सत्य व असत्य का निर्णय कराने में भी सहायक होती है। एक ही विषय में अनेक मनुष्यों व आचार्यों के विचार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। यह भी सत्य एवं प्रामणिक तथ्य है कि एक विषय में सत्य एक ही होता है। गणित में दो व दो चार होते हैं। कोई गणित का विद्वान व आचार्य इससे भिन्न मान्यता वाला नहीं होता है। इसी प्रकार से धर्म विषय में मुख्यतः ईश्वर के स्वरूप, गुण-कर्म-स्वभाव, आत्मा के स्वरूप व गुण-कर्म-स्वभाव तथा उपासना की विधि आदि विषयों की चर्चा करके एक सत्य सिद्धान्त स्थापित किया जा सकता है व करना भी चाहिये। वर्तमान में व महाभारत के बाद से इन विषयों में एक मत न होकर अनेक आचार्यों के भिन्न-भिन्न मत व विचार रहे हैं। महाभारत के बाद स्वामी आदि शंकराचार्य जी ऐसे आचार्य हुए हैं जिन्होंने जैन मत के आचार्यों से ईश्वर के अस्तित्व पर शास्त्रार्थ किया था और शास्त्रार्थ में जो निष्कर्ष व तथ्य सामने आये थे, वह स्वामी शंकराचार्य जी का अद्वैत मत था जिसे शास्त्रार्थ की शर्तों के अनुसार सभी आचार्यों व राजाओं आदि ने भी स्वीकार किया था। इसके बाद से यह परम्परा बन्द पड़ी थी। ऋषि दयानन्द (1825-1883) का काल आते-आते धर्म विषयक सन्देह व भ्रान्तियां अपनी चरम सीमा पर थी। इन्हें धार्मिक अन्धविश्वास भी कहते हैं। ऋषि दयानन्द अपनी बाल्यावस्था से ही जिज्ञासु थे। वह सत्य ज्ञान को प्राप्त करने के इच्छुक थे। उन्होंने शिवरात्रि, 1839 के दिन मूर्तिपूजा पर इसी कारण सन्देह किया था कि ईश्वर के जो गुण, कर्म व स्वभाव शास्त्रों में वर्णित हैं, वह मूर्ति में साक्षात दृष्टिगोचर नहीं होते थे। उन्होंने विद्वानों से शंकायें की थीं परन्तु कोई विद्वान उनका समाधान नहीं कर सकता था। इसी कारण सच्चे शिव व मृत्यु से रक्षा व विजय प्राप्त करने के लिये उन्होंने सत्य के अनुसंधान हेतु अपना पितृ-गृह छोड़कर देश भर में विद्वानों की खोज की व उन्हें प्राप्त होकर उनसे ज्ञान प्राप्ति सहित अपना शंका समाधान किया था। 

ऋषि दयानन्द ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिये अपूर्व तप किया और बाद में वह अपनी सभी शंकाओं के उत्तर प्राप्त करने में सफल हुए। उन्हें सच्चे शिव का सत्यस्वरूप भी विदित हुआ था तथा मृत्यु पर विजय प्राप्ति के साधनों का ज्ञान भी हुआ था जिसे उन्होंने अपने जीवन में धारण कर उसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया है। ऋषि दयानन्द को सत्य ज्ञान रूपी विद्या अपने विद्यागुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी से मथुरा में 1860 से 1863 के मध्य तीन वर्ष वेदांगों का अध्ययन कर प्राप्त हुई थी। इससे पूर्व वह समाधि सिद्ध योगी भी बन चुके थे। विद्या प्राप्त कर लेने, सभी शंकाओं व भ्रमों से निवृत्त होने सहित सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी तथा सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार कर लेने के बाद उन्होंने संसार से अज्ञान व अविद्या दूर करने के कार्य को अपना मिशन व उद्देश्य बनाया था। इसी कार्य को करते हुए ही उन्होंने अपने जीवन का उत्सर्ग किया और भारत सहित विश्व को अविद्या के कूप से निकाला। ऋषि दयानन्द ने महाभारत युद्ध से पूर्व प्रचलित ईश्वर प्रदत्त वेद ज्ञान के सत्यस्वरूप व वेदार्थों का प्रकाश किया। उन्होंने पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा रचित वैदिक आर्ष साहित्य के सत्य सिद्धान्तों को निश्चित कर उनकी सत्य व्याख्याओं का मार्ग भी प्रशस्त किया। उनकी ही देन है कि आज हमारे पास सभी वेदों के सत्य वेदार्थों से युक्त वेदभाष्य व सभी वैदिक ग्रन्थों व विषयों के अनेकानेक व्याख्या ग्रन्थ हिन्दी आदि भाषाओं में उपलब्ध हंै जिसको साधारण हिन्दी पठित व्यक्ति भी जान व समझ कर विद्वान एवं सत्य वैदिक धर्म का सच्चा अनुयायी बन सकता है तथा जीवन के लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को सिद्ध कर सकता है। 

विद्या प्राप्त कर मनुष्य का मुख्य कर्तव्य उस विद्या की रक्षार्थ उसका मौखिक व लेखन के द्वारा प्रचार करना होता है। यही कार्य ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में किया। विद्वान का एक प्रमुख कार्य व कर्तव्य अज्ञान व अविद्या को नष्ट करना तथा ज्ञान व विद्या की वृद्धि करना भी होता है। इस कार्य को करने के लिये ही ऋषि दयानन्द ने अज्ञान में पड़े हुए विश्व के लोगों को अज्ञान व अविद्या के दुःखमय जीवन से बाहर निकालने के लिये अपने विद्यामृतमयी व्याख्यानों व उपदेशों से देश भर में घूम कर वैदिक सत्य मान्यताओं का प्रचार किया। वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है जिसका पढ़ना-पढ़ाना व सुनना-सुनाना सब मनुष्यों का परम धर्म होता है। वस्तुतः मनुष्य को मनुष्य इसी लिये कहा जाता है कि यह मननशील प्राणी है। मनन का अर्थ सत्य व असत्य का विचार करना तथा असत्य का त्याग और सत्य को अपनाना व स्वीकार करना होता है। मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिये ही वस्तुतः ऋषि दयानन्द ने मिथ्या ग्रन्थों का खण्डन व सत्य ज्ञान से युक्त वेदों का प्रचार व प्रसार किया। सत्य के प्रचार के लिये असत्य का खण्डन करना आवश्यक होता। माता-पिता व आचार्य भी अपने शिष्यों व बालकों की अविद्या व असत्य बातों को दूर करने के लिये असत्य बातों के दोष बताकर अपने शिष्यों से सत्य सिद्धान्तों को ग्रहण कराते हैं। यही कार्य ऋषि दयानन्द ने भी परोपकार व परहितार्थ किया। वह अपने व्याख्यानें में सत्योपदेश करते थे। प्रसंगानुसार असत्य छुड़ाने के लिए असत्य मान्यताओं व परम्पराओं का खण्डन तथा सत्य मान्यताओं का मण्डन व समर्थन करते थे। वह सत्यासत्य पर चर्चा करने व सत्य का निर्णय करने के लिये सभी मतों के अनुयायियों व आचार्यों को निमंत्रण भी देते थे। बहुत से स्वधर्मी व परमतावलम्बी विद्वान उनके पास आकर अपनी अपनी शंकाओं का समाधान करते थे। सन् 1863 से अपनी मृत्यु 30 अक्टूबर 1883 तक उन्होंने इस कार्य को देश के अनेक स्थानों में जाकर जारी रखा और सभी लोगों को सत्य ज्ञान अमृत का पान कराकर संतृप्त किया था। 

प्राचीन काल में सत्य का निर्णय करने के लिये परस्पर संवाद, लेखन तथा शास्त्रार्थ की परम्परा थी। इन विधियों से ही सत्य का निर्णय होता है। ऋषि दयानन्द ने संवाद, लेखन व शास्त्रार्थ का भरपूर उपयेाग किया। सभी मतों के आचार्य व अनुयायी उनके पास आते व अपने सन्देह दूर करते थे। उन्होंने सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पंचमहायज्ञविधि, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, गोकरुणानिधि, व्यवहारभानु आदि अनेक ग्रन्थों का प्रणयन व प्रचार अविद्या को दूर करने के लिये किया। संसार में उनके समय में वेद तो अत्यन्त परिश्रम करने पर उपलब्ध हो सकते थे परन्तु वेदों के सत्य वेदार्थ उपलब्ध नहीं थे। इस अभाव को भी ऋषि दयानन्द व उनके बाद उनके अनुयायी विद्वानों ने पूरा किया। ऋषि दयानन्द ने वेदकालीन परिपाटी के अनुसार वेदों के सत्य अर्थों का अपने ऋग्वेद तथा यजुर्वेद भाष्य में प्रकाश किया है। ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज की स्थापना भी सत्य विद्या के ग्रन्थ वेदों के प्रचार व प्रसार के लिये ही की। उन्होंने आर्यसमाज का मुख्य उद्देश्य वेदों के प्रचार प्रसार सहित अविद्या के नाश तथा विद्या की वृद्धि को बनाया है। 

ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में अनेक शास्त्रार्थ किये। उनका काशी में 16 नवम्बर, 1869 को सनातनी पौराणिक मत के आचार्यों से मूर्तिपूजा की वेदमूलकता व तर्क एवं युक्तिसंगत होने पर हुआ शास्त्रार्थ प्रसिद्ध है। इस शास्त्रार्थ में सम्मिलित पौराणिक मत के 30 से अधिक शीर्ष विद्वान भी मूर्तिपूजा के समर्थन में वेदों का एक भी मन्त्र प्रस्तुत नहीं कर पाये थे। आज तक भी किसी पौराणिक विद्वान को वेदों में ईश्वर की मूर्तिपूजा करने का कोई संकेत उपलब्ध नहीं हुआ है। वेद ईश्वर व आत्मा के सत्यस्वरूप का प्रतिदिन करते हैं। वेदों के अनुसार ईश्वर का सत्यस्वरूप सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। ईश्वर सर्वज्ञ है, उसने जीवों के कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल-भोग कराने व मुक्ति प्रदान करने के लिये साधन रूप में इस सृष्टि को बनाया है। ईश्वर जीवों के कर्म फलों का विधाता व व्यवस्थापक है। वह वेदज्ञान का दाता है। जीव सत्य व चेतन स्वरूपवाली अल्पज्ञ, अनादि, अमर, अविनाशी, एकदेशी, ससीम, जन्म-मरण धर्मा, वेदाचारण से जन्म मरण से मुक्त होने वाली तथा मोक्षानन्द को प्राप्त होने वाली सत्ता है। ईश्वर सभी जीवों हिन्दू, ईसाई, जैन, बौद्ध, सिख आदि सबका साध्य है तथा यह प्रकृति व सृष्टि सब जीवों को मुक्ति प्राप्त करने-कराने का साधन है। ऋषि दयानन्द व उनके परवर्ती विद्वानों के साहित्य सहित वेद, उपनिषद, दर्शन व मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में भी इस पर प्रकाश पड़ता है। अतः सबको वेदों की शरण में आकर शुभकर्मों को करते हुए मुक्ति प्राप्त करने के साधनों को करना चाहिये। आर्यसमाज को जितना अपेक्षित था, वह प्रचार नहीं कर सका। जितना प्रचार किया उतनी अविद्या दूर हुई है परन्तु लक्ष्य की दृष्टि से यह उपलब्धि बहुत ही अल्प मात्रा में है। आज वैदिक धर्म व मानवता पर अनेक प्रकार के संकट मंडरा रहे हैं। इसकी ओर भी आर्यसमाज सहित सभी हिन्दु बन्धुओं को ध्यान देना चाहिये। यदि अब भी नहीं जागेंगे तो जाति का अस्तित्व समाप्त हो सकता है। अतः ईश्वर को मानने वाले सभी सच्चे आस्तिक जनों को एकजुट व संगठित होकर अपने हितों पर विचार कर सगठित होकर परस्पर सहयोग कर धर्म पर उत्पन्न सभी संकटों को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये। 

ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में सभी मतों के आचार्यों से सत्य के निर्णयार्थ शास्त्रार्थ व शास्त्रार्थ चर्चायें करके सबका समाधान किया था। उनके शताधिक शास्त्रों व शंका समाधानों से सम्बन्धित अनेक ग्रन्थ प्रकाशित हैं। आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली ने सन् 1981 में ‘दयानन्द शास्त्रार्थ-संग्रह तथा विशेष शंका समाधान’ नाम से एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ का प्रकाशन किया था। पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी ने भी ‘ऋषि दयानन्द के शास्त्रार्थ और प्रवचन’ नाम से एक अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं उपयोगी ग्रन्थ का प्रकाशन किया है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ से भी सभी विषयों में मनुष्यों का सन्देह निवारण होता है। अन्य विद्वानों ने इन विषयों पर अनेक ग्रन्थ थी लिखे हैं। इन ग्रन्थों का अध्ययन कर मनुष्य सभी धर्म विषयक मान्यताओं में निभ्र्रान्त हो सकते हैं। ऋषि दयानन्द ने अपने समय में शास्त्रार्थ की परम्परा का पुनद्धार किया था। उनका कार्य आज भी प्रासंगिक हैै। आर्यसमाज व सभी मतों को इसे अपनाना चाहिये। सत्यधर्म मतावलम्बियों का तो यह कर्तव्य है कि वह सत्य के प्रचारार्थ शास्त्रार्थ परम्परा को पुनर्जीवित करें। विज्ञान में भी सत्य का निर्णय संवाद, लेखन, चर्चा, गोष्ठियों व बहस करके ही होता है। विज्ञान में इसे अच्छा माना जाता है। सभी वैज्ञानिक सत्य का आदर करते हैं। इसी लिये विज्ञान आज बुलन्दियों पर पहुंचा है। मत-मतान्तर ज्ञान विषयक अपनी न्यूनताओं को जानते हैं। इसलिये वह शास्त्रार्थ करना तो दूर, शास्त्रार्थ के नाम की चर्चा करने से बचते हैं। उनके शास्त्रार्थ करने के विरुद्ध ही प्रायः है। बिना संवाद, लेख, चर्चा व शास्त्रार्थ के सत्य का निर्णय नहीं हो सकता। अतः सभी मतों के विद्वानों को मिलकर सत्य के अनुसंधान व उसके प्रचार के लिये धर्म चर्चा, संवाद व शास्त्रार्थ को अपनाना चाहिये। ऋषि दयानन्द को शास्त्रार्थ परम्परा का निर्वहन करने व सत्यार्थप्रकाश में तर्क व युक्ति से सत्य का निर्णय करने के लिये संसार द्वारा हमेशा स्मरण किया जायेगा। ऋषि दयानन्द को हमारा सादर नमन है। ओ३म् शम्। Intercast Marriage ,The Vivah Sanskar will be solemnised,16sanskaro ke liye smpark kre 9977987777

-मनमोहन कुमार आर्य

मनुष्य का आत्मा कर्म करने में स्वतन्त्र और फल भोगने में परतंत्र है”

ओ३म्
“मनुष्य का आत्मा कर्म करने में स्वतन्त्र और फल भोगने में परतंत्र है”
==========https://youtu.be/s_rCeN2lLqc
हमें ज्ञात है व ज्ञात होना चाहिये कि संसार में तीन अनादि व नित्य पदार्थों का अस्तित्व है। यह तीन पदार्थ ईश्वर, जीव व प्रकृति हैं। ईश्वर व जीव सत्य एवं चेतन पदार्थ हैं। ईश्वर स्वभाव से आनन्द से युक्त होने से आनन्दस्वरूप है तथा जीव आनन्द व सुख से युक्त न होने के कारण आनन्द व सुख प्राप्ति की चेष्टा करता है। ईश्वर जीव को सुख व आनन्द देने में सहायक होता है। जीवों को सुख आदि देने के लिये ही ईश्वर इस सृष्टि को रचा है व वही इसका पालन करता है जिससे सभी जीवों को उनके जन्म-जन्मान्तरों के सभी शुभ व अशुभ कर्मों का यथायोग्य सुख व दुःखी कर्मों फल प्राप्त हो सके। परमात्मा ने इस सृष्टि वा ब्रह्माण्ड को प्रकृति नामी अनादि पदार्थ से बनाया है। यदि यह तीन अनादि व नित्य पदार्थ न होते तो हम भी न होते, न ही ईश्वर होता और न ही यह संसार व ब्रह्माण्ड होता। इस ब्रह्माण्ड में ईश्वर एक मात्र सत्ता है। संसार में दूसरा व तीसरा कोई ईश्वर व इसके समान सत्ता नहीं है। जीवात्मायें सब एक समान हैं जो अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेकर अपने पूर्वकृत कर्मों का सुख व दुःख रूपी फलों का भोग कर रही हैं व परमात्मा इनको भोग प्रदान कर रहा है। संसार में जीव संख्या में अनन्त हैं। इनकी संख्या इतनी अधिक है कि उसको गणित की दृष्टि से नहीं जाना व बताया जा सकता परन्तु ईश्वर के ज्ञान में जीवों की यह अनन्त संख्या भी सीमित ही मानी जाती है। इस प्रकार ईश्वर से रचित यह संसार अस्तित्व में आकर जीवों के द्वारा कर्म भोग के लिये चलता जाता है। अनादि काल से यह चल रहा है और अनन्त काल तक इसी प्रकार से चलता रहेगा। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय परमात्मा के द्वारा होती रहती है। एक सृष्टि की आयु 4 अरब 32 करोड़ वर्ष होती है। इसे ईश्वर का एक दिन कहा जाता है। इतनी ही बड़ी रात्रि होती है। यह दोनों मिलकर 8 अरब 64 करोड़ वर्षों का एक दिन होता है। सृष्टि के इस कल्प के 1 अरब 96 करोड़ वर्षों का भोग हो चुका है। शेष काल का भोग अभी होना है। इससे ज्ञात होता है कि अभी यह सृष्टि अपनी 4 अरब 32 करोड़ वर्ष की आयु को प्राप्त कर प्रलय को प्राप्त होगी। 

ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानना प्रत्येक मनुष्य के लिये आवश्यक एवं अनिवार्य है अन्यथा मनुष्य का जीवन सार्थक नहीं होगा। ऋषि दयानन्द ने ईश्वर प्रदत्त वेद ज्ञान के आधार पर बताया है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। हमारा यह ईश्वर सर्वज्ञ है, उसी ने जीवों के कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल का भोग कराने व मुक्ति प्रदान करने के लिये साधन रूप में इस सृष्टि को बनाया है। ईश्वर जीवों के कर्म फलों का विधाता व व्यवस्थापक है। वह वेदज्ञान का दाता भी है। जीव सत्य व चेतन स्वरूपवाली अल्पज्ञ, अनादि, अमर, अविनाशी, एकदेशी, ससीम, जन्म-मरण धर्मा, वेदाचरण से जन्म मरण से मुक्त होने वाली तथा मोक्षानन्द को प्राप्त होने वाली सत्ता है। ईश्वर ने सृष्टि जीवात्माओं के भोग के लिये बनाई है। वेदों में ईश्वर की आज्ञा है कि जीव इस सृष्टि का भोग त्यागपूर्वक करे। वेद में यह भी बताया गया है कि मनुष्य को लोभ व लालच नहीं करनी चाहिये। मृत्यु होने पर यह सब धन व पदार्थ सभी यहीं रह जाते हैं, जीवात्मा के साथ परलोक में नहीं जाते। जीवात्मा के साथ उसके ज्ञान आदि कर्म व संस्कार ही रहते हैं व परजन्म में भी साथ जाते हैं। इसलिये विवेकशील मनुष्यों को भौतिक पदार्थों व सम्पत्ति का अधिक मात्रा में संचय न कर दैवीय गुणों का धारण व परोपकार के कार्यों को करके सद्कर्म-सम्पत्ति का संचय करना चाहिये। इसी से जीव का कल्याण होता है। ऐसा करके ही संसार के सभी जीव अपने लिये आवश्यकता की सुख की सामग्री को प्राप्त कर सकते हैं। अधिक संचय से दूसरे प्राणियों के भोग में बाधा पहुंचती हैं, इसलिये आवश्यकता से अधिक संचय का विचार व मान्यता अनुचित होने से जीवों के हित में नहीं होती। ऐसा ही वेद से भी अनुमोदित होता है। 

परमात्मा की व्यवस्था में सभी जीव कर्म करने में स्वतन्त्र हैं। कर्म का फल जीवों को अनेक जन्म लेकर भी भोगना पड़ता है। कोई भी कर्म उसका बिना भोग किये छूटता व निष्फल नहीं होता है। कर्म के फलों की प्राप्ति में सभी जीव ईश्वर के अधीन होते हैं। कोई आचार्य व धर्माचार्य भी कर्म फल भोग से अपने आप को बचा नहीं सकता। ईश्वर का कर्म फल सिद्धान्त अटल है। वह पक्षपात रहित होकर सभी जीवों, विद्वानों, आचार्यों व मत-पन्थ सम्प्रदायों के प्रवर्तकों को भी उनके कर्मों के अनुसार न्यायकर करते हुए कर्मों का फल प्रदान करता है। संसार में कुछ मतों ने यह मिथ्या सिद्धान्त प्रवृत्त है कि किसी मत विशेष को मानने से मनुष्य के पाप रूपी फल क्षमा कर दिये जाते हैं। यह सिद्धान्त मिथ्या है। इस सिद्धान्त को तर्क की कसौटी पर सत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। यदि इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया जाये तो इसका अर्थ है कि सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक तथा सर्वज्ञ परमेश्वर की न्यायव्यवस्था का भंग होना। पाप क्षमा करने की मान्यता मत-मतान्तरों की मिथ्या कल्पना है। इसका तर्क व उचित हेतु नहीं है। सभी जीवों वा मनुष्यों को अपने-अपने कर्मों के फल भोगने ही पड़ते हैं। 

सर्वव्यापक और सर्वान्तर्यामी ईश्वर की दृष्टि से किसी जीव का कोई कर्म छुपता नही है। कोई भी जीव रात्रि के गहन अन्धकार में भी जो शुभ व अशुभ विचार करते हैं वह सर्वान्तर्यामी ईश्वर को विदित होता है। अतः ईश्वर को जीवों को उनके सभी कर्मों का फल देने में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होती। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में तर्क व युक्तियों से कर्म फल भोग व ईश्वर द्वारा पाप क्षमा न करने के सिद्धान्त को पुष्ट किया है। सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर कर्म फल भोग के इस सिद्धान्त को समझा जा सकता है कि सभी जीव अपने अपने कर्मों का फल भोगने में ईश्वर की व्यवस्था में परतन्त्र हैं। उन्हें कोई भी सत्ता व साधन कर्मों का फल भोगने से बचा नहीं सकते। शुभ व पुण्य कर्मों का फल सुख तथा अशुभ व पाप कर्मों का फल दुःख सभी जीवों को भोगना ही पड़ता है। अतः सभी मनुष्यों को वेद व सत्यार्थप्रकाश आदि वैदिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिये और भविष्य तथा जन्म-जन्मान्तर में उन्हें किसी प्रकार के दुःख न हों, इसके लिये वेदविहित शुभ कर्मों का आश्रय लेने के साथ वेद निषिद्ध अशुभ कर्मों का सर्वथा त्याग कर देना चाहिये। ऐसा करके ही जीव की उन्नति होकर उसे सुख व आनन्द की प्राप्ति होती व हो सकती है। संसार में हम मनुष्य व इतर योनियों में जीवों को जो दुःख भोगते हुए देखते हैं उनमें से उनके अनेक दुःखों का कारण पूर्वजन्म के कर्म हुआ करते हैं। पूर्वजन्म के कर्मों के कारण ही मनुष्य को नाना प्राणी योनियों में से एक योनि जिसे जाति कहा जाता है, परमात्मा से प्राप्त होती है। आयु सहित सुख व दुःख भी पूर्वजन्मों के अभुक्त कर्मों के आधार पर ही परमात्मा द्वारा प्रदान किये जाते हैं। मनुष्य स्वयं विचार कर अथवा शास्त्रों का अध्ययन कर स्वयं इन सिद्धान्तों को समझ सकते हैं। 

हमारे इस संसार का अस्तित्व परमात्मा के कारण है। परमात्मा ने ही इस जगत को बनाया है। यह संसार ईश्वर की कृति है और उसके अस्तित्व के होने का साक्षात प्रमाण है। संसार में यह सिद्धान्त भी प्रवृत्त है कि रचना को देखकर रचयिता का ज्ञान होता है। हम मनुष्य निर्मित कोई भी रचना देखते हैं तो हमें विदित होता है कि यह किसी मनुष्य ने बनाई अथवा मनुष्यों द्वारा किसी उद्योग में बनाई गई है। यदि मनुष्य न होते तो मनुष्यकृत रचनायें भी न होती। इसी प्रकार से इस सृष्टि व इसके भिन्न-भिन्न सूर्य, चन्द्र, गृह, उपग्रह, पृथिवी, अग्नि, जल, वायु, आकाश, अन्न, ओषधि, प्राणी आदि सभी को ईश्वर ने ही बनाया है। ईश्वर है इसी लिये यह बनें हैं। यदि वह न होता तो न बनते। यह सृष्टि व पदार्थ किसी अन्य सत्ता द्वारा बनायें नहीं जा सकते थे। इसलिये ईश्वर का अस्तित्व यथार्थ एवं सिद्ध है। मनुष्य योनि हो व अन्य प्राणी योनियां, सर्वत्र हम सब प्राणियों को सुख व दुःख से युक्त देखते हैं। इससे भी ईश्वर व उसकी व्यवस्था का ज्ञान होता है। यजुर्वेद में कहा गया है कि मनुष्य को वेदविहित शुभ कर्मों को करते हुए ही एक सौ व कुछ अधिक वर्ष जीनें की इच्छा करनी चाहिये। कर्मफल सिद्धान्त पर एक संस्कृत श्लोक से अच्छा प्रकाश पड़ता है। इस श्लोक के कुछ शब्द हैं ‘अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।’ अर्थात् मनुष्य को अपने किये हुए शुभ व अशुभ कर्मों के फल अवश्य ही भोगने होते हैं। यह सिद्धान्त विचार व चिन्तन करने पर सत्य सिद्ध होता है। सत्यार्थप्रकाश में ऋषि दयानन्द ने इस विषयक जो चिन्तन प्रस्तुत किया है उससे भी इस सिद्धान्त की पुष्टि होती है। 

हम जीव हैं, अनादि व नित्य सत्ता हैं, हम जन्म व मरण धर्मा हैं। हमारा अर्थात् हमारी आत्मा का जन्म व मरण होता है। मरण के बाद पुनर्जन्म होता है तथा जन्म से पूर्व मरण हुआ होता है। इन सब व्यवस्थाओं को ईश्वर भली प्रकार से क्रियान्वित करते हैं। जीव कर्म करने में स्वतन्त्र हैं। ईश्वर किसी जीव को किसी कर्म करने से रोकते नहीं हैं। हां, वह आत्मा मं। अशुभ कर्मों को न करने तथा शुभ कर्मों की प्रेरणा अवश्य करते हैं। हम जो कर्म करते हैं उसका फल हमें अवश्य ही भोगना पड़ता है। इससे हम व कोई अन्य जीव बच नहीं सकता। हम इस सिद्धान्त को समझेंगे तो हमें इससे इस जन्म व परजन्मों में भी लाभ होगा। इसी लिये हमने इस सिद्धान्त को इस लेख में प्रस्तुत किया है। सब मनुष्यों की अपनी उन्नति के लिये वैदिक धर्म की शरण में आना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन करना चाहिये। इससे वैदिक धर्म के पालन का मार्ग प्रशस्त होगा। इति ओ३म् शम्। 

-मनमोहन कुमार आर्य

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स्वामी दयानंद के सत्य व अहिंसा के प्रयोग 

ओउम् 
    स्वामी दयानंद के सत्य व अहिंसा के प्रयोग 
                                    डा. अशोक आर्य  https://youtu.be/lfI1oA6TmAo
           
           भारतीय तथा पाश्चात्य महापुरुषों में एक मूलभूत अंतर रहा है| भारतीय महापुरुषों ने अपने जीवन की उन महत्वपूर्ण घटनाओं को सदा ही छुपाने का यत्न किया है| यहाँ तक कि अपनी जन्म तिथि तक इतिहास को नहीं बताई ताकि उनके जन्मदिन के नाम से कहीं भारतीय जन मानस उनका स्तुतिगान आरम्भ न कर दे| दूसरी और जब हम पश्चिमी महापुरुषों के जीवनों पर दृष्टि डालते हैं, तो हम पाते हैं कि उन्होंने अपने जीवन की छोटी छोटी घटनाओं (जिनसे किसी को कुछ भी प्रेरणा मिलती हो) को संजो कर रखा है| वह चाहते थे कि उनका जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जावे, जबकि भारतीयों ने सदा वेद,उपनिषद्, दर्शन तथा ब्राहमण ग्रन्थों को ही प्रेरणा का स्रोत माना| इस कारण अपने जीवनों को तथा इस की छोटी बड़ी घटनाओं को तुच्छ मानते हुए इसे छुपाये रखा, इसे कुछ भी महत्त्व नहीं दिया| विदेश के कुछ लोगों ने तो अपने जीवन की छोटी सी घटना को भी अत्यधिक बढ़ा चढ़ा कर प्रकाशित किया है| वह इस में ही अपना गौरव मानते थे|
    इस सब के विपरीत जब हम स्वामी दयानंद सरस्वती जी के जीवन पर एक विहंगम दृष्टि डालते हैं तो हम पाते हैं कि स्वामी जी ने अठारह अठारह घंटे की समाधि लगाकर, अभ्यास करके  भी अपने लिए कभी कुछ भी पाने की इच्छा नहीं की| इस समाधि के माध्यम से भी जो कुछ भी पाने की कामना की, वह सब समाज की भलाई के लिए, समाज के हित के लिए तथा राज्य के सर्वोपरी हित के लिए किया, इनकी त्रुटियों को दूर करने के लिए किया| 
    जब स्वामी जी इस प्रकार के परोपकार के कार्य कर रहे थे तो उन्हें अनेक पेटपंथियों, थोथेश्वर पूजकों तथा विधर्मियों के कोप का भाजन भी बनना पड़ा, इन विरोधियों ने उन पर  अनेक बार प्राण घातक आक्रमण किये| इन आक्रमणों में से कुछ आक्रमण तो अत्याधिक घातक थे| स्वामी दयानंद सरस्वती सच्चे अर्थों में संन्यासी थे| इतना ही नहीं वह पूर्ण सत्यवादी थे और अहिंसा को अपना परम धर्म भी मनाते थे| इसलिए स्वामी जी ने न तो कभी किसी भी आक्रमण कारी को दंड ही दिया और न ही उसे कभी पुलिस को ही सौंपा| अनेक बार आक्रमणकारी पकडे भी गए तो स्वामी जी ने यह कहते हुए उन्हें छुड़ा दिया कि “ मैं संसार को कैद करने नहीं, कैद से छुड़ाने आया हूँ|” यह तो स्वामी जी की एक बहुत बड़ी महानता की झलक मात्र ही थी| आओ हम इन पंक्तियों में स्वामी जी पर हुए कुछ इस प्रकार के ही प्राण घातक आक्रमणों में से कुछेक को जानें|
                मैं मनुष्य को छुडाने आया हूँ
    स्वामी दयानंद सरस्वती अनूपशहर में वेद सन्देश देने के लिए निकले हुए थे| स्वामी जी के इस प्रचार से त्रस्त होकर किसी व्यक्ति ने स्वामी जी को एक पान खाने के लिये भेंट किया| इस पान में विष डाला हुआ था| पान स्वामी जी ने लिया और उसकी श्रद्धा को देखते हुए तत्काल मुख में डाल लिया| पान को मुख में रखते ही स्वामी जी को कुटिलता का पता चल गया| उन्होंने पान देने वाले को कुछ नहीं कहा, उसे वहीँ पर ही छोड़ कर गंगा की और चल दिए| वहां जाकर स्वामी जी ने न्योली क्रिया की और पान के सब विष को वमन करके बाहर निकाल दिया| इस बात का वहां के तहसीलदार को पता चला| तहसीलदार ने पान देने वाले उस दुष्ट को पकड लिया और उसे पकड़ कर स्वामी जी के सामने प्रस्तुत किया किन्तु स्वामी जी ने यह कहते हुए उसे छुड़वा दिया कि “मैं तो मनुष्यों को बंधवाने नहीं छुड़वाने आया हूँ|”
      इस प्रकार की ही एक घटना काशी की मिलती है| यहाँ पर भी एक व्यक्ति स्वामी जी के प्रति अत्यधिक श्रद्धा दर्शाते हुए उनके भक्त का रूप धारण करके आया| उसने भी स्वामी जी को पान भेंट किया| ज्यों ही स्वामी जी ने पान उसके हाथ से पकड़ा और इसे खोलकर देखने लगे तो कपटी दुष्ट पकडे जाने के भय से भाग खडा हुआ क्योंकि इस पान में भी तीव्र विष डाला गया था|
                                बाबा डूब गया
   स्वामी जी जहाँ भी जाते वहां सदा ही वैदिक धर्म का प्रचार कर इसे अपनाने के लिए जन जन को प्रेरित करते और अन्य मतावलम्बियों की कमियों को प्रकाशित करते हुए कहा करते थे यदि यह मतावलंबी अपने मत की इन कमियों को दूर कर लें तो वह शेष्ठ बन जावेंगे| इस प्रकार की ही एक घटना काशी की मिलती है| स्वामी जी अन्य मतावंबियों की कमियों की चर्चा करते समय इस्लाम की चर्चा कर रहे थे| इस चर्चा को कुछ मुसलमान भी सुन रहे थे| स्वामी जी इस चर्चा को समाप्त कर जब गंगा की और गए तथा गंगा किनारे समाधी अवस्था में बैठ गए| इस समय दो हट्टे कटे मुसलमान आये| उन्होंने स्वामी जी को मजबूती से पकड़ा और गंगा में फैंकने लगे किन्तु स्वामी जी ने अपने हाथों को बड़ी मजबूती से भींच लिया और गंगा में छलांग लगा दी| उन दोनों विधर्मियों को गंगा में कुछ गोते खिलाये और फिर बाहर लाकर छोड़ दिया और स्वयं एक बार फिर से गंगा में कूद गए| इतना होने पर भी वह दोनों दुष्ट बाहर आकर पत्थर उठा स्वामी जी के बाहर आने की प्रतीक्षा करने लगे ताकि वह स्वामी जी को पत्थरों से मार सकें| स्वामी जी उन दोनों की भावना को पहले से ही जानते थे| अत: स्वामी जी गंगा के अन्दर ही समाधि लगाकर बैठ गए| बहुत समय बीतने के बाद भी स्वामी जी जब गंगा से बाहर न आये तो यह दोनों विधर्मी गुंडे यह कहते हुए लौट गए कि “बाबा तो डूब गया है|”
      यहाँ की ही एक अन्य घटना है| इस घटना के अनुसार एक लठैत स्वामी जी का पीछा कर रहा था| अकस्मात् स्वामी जी ने उसकी और देखते हुए हुंकार की| स्वामी जी की हुंकार मात्र से ही भयभीत वह लठैत भाग खडा हुआ| 
     इस प्रकार की ही एक अन्य घटना सोरो की भी मिलती है| यहाँ पर हुए शास्त्रार्थ में स्वामी जी से पराजित एक चाक्रांकित क्रोध से कांपते हुए स्वामी जी को मारने के लिए आया| वह सोते हुए व्यक्ति को पहचान न पाया और एक अन्य साधु को सोते हुए खाट सहित उठा कर गंगा में फैंक दिया|
                          ईश्वर सत्य मार्ग दिखावे 
      सोरों की ही एक अन्य घटना है| इसके अनुसार स्वामी जी की चल रही सभा में अकस्मात् एक लठैत आकर जोर से बोला तुम ठाकुर का खंडन करते हो, इसलिए बताओ तुम्हें यह लट्ठ कहाँ पर मारूं| स्वामी जी ने उसे घूरते हुए प्रत्युत्तर दिया, खंडन करने का दोष तो मेरे सिर का है, इसी को ही मारो| इस उत्तर को सुनकर श्रोता लोग अवाक् से रह गए| इसके साथ ही यह उत्तर सुनकर दुष्ट के अन्दर की दुष्टता धुल गई तथा वह रोने लगा स्वामी जी ने उसे क्षमा करते हए कहा “ भगवान तुम्हें सत्य मार्ग पर लाये|”
                       संन्यासी मारपीट नहीं करते 
   विगत अनुभवों के अनुसार ही जब स्वामी जी मिर्जापुर में सभा कर रहे थे तो दो लठैत सभा स्थल पर आ धमके और गड़बड़ करने लगे| इस पर स्वामी जी ने एक जोरदार हुंकार की| इस हुंकार को सुनते ही दोनों लठैत गुंडे बेहोश होकर गिर गए| दोनों का मल भी निकल गया| स्वामी जी  नेप्रथम उपचार  कर उन्हें होश में लाये और उन्हें होश आने पर स्वामी जी ने कहा कि “संन्यासी लोग कभी किसी को मारा पीटा नहीं करते|” इसलिए डरो नहीं| उठो कपडे संभाल कर निर्भयता से चले जाओ| 
     इस स्थान की ही एक अन्य घटना भी सामने आती है| एक सेठ के सहयोग से स्वामी जी को समाप्त करने का पुनश्चरण आरम्भ किया गया| ज्योंही कार्य बढ़ता गया सेठ जी के शरीर पर एक फोड़ा निकल आया और यह तेजी से बढ़ने लगा| अंत में सेठ जी ने पुनश्चरण को बंद करवाने के लिए कहा| वह समझते थे कि जब तक दयानंद का सिर कटेगा, उससे पहले तो मैं ही इस फोड़े के कारण कट जाउंगा| 
     यहीं पर ही एक अन्य घटना भी सामने आती है| अक भयानक प्रकृति का व्यक्ति एक सौ गुंडों के साथ स्वामी जी की सभा के स्थल पर आया और गड़बड़ करने लगा| स्वामी जी ने बड़ी दृढ़ता से कहा कि इस हाल के सब दरवाजे बंद करा दो, मैं अकेला ही इन सब से निपट लूंगा| यह सुनते ही भयभीत होकर वह व्यक्ति सीधा होकर बैठ गया|
                          जयपुर में भीडो जाकर 
     कर्णवास में स्वामी जी एक सभा में बोला रहे थे| अकस्मात् बरौली के राव कर्णवास आकर स्वामी जी को गालियाँ देने लगे| गालियाँ देने के साथ ही साथ, वह तलवार भी घुमाने लगे| उसकी इस अवस्था को देखकर स्वामी जी ने उसे कहा की अगर शास्त्रार्थ करना है तो अपने गुरु रंगाचारी को बुला लो,यदि शस्त्रार्थ करना है तो जयपुर जोधपुर(के राजाओं)से जाकर भिडो किन्तु वह नहीं माना तो स्वामी जी ने उसके हाथ से तलवार छीन कर दो टुकडे कर दिए|
       यहाँ जिस पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर स्वामी जी प्रचार कर रहे थे, उसे जड़ सहित निकाल कर यहाँ भूगर्भ में एक कमरा बनाया गया है और इस मैदान में स्वामी जी की स्मृति में एक ओषधालय चल रहा है| मैं जब १९९२ में अलीगढ युनिवर्सिटी में रेफ्रेशर कोर्स करने गया था तो इस स्थान को भी देखने के लिए दो बार गया था|
                               हम तो सत्य ही कहेंगे 
   बरेली में भी स्वामी जी ने एक सभा में ईसाई मत की कमियाँ सब के सामने रखीं| ईसाईयों की इस आलोचना को सुनकर वहाँ का कलेक्टर कुपित हो उठा| उन्होंने स्वामी जी के व्याख्यान बंद करवाने की धमकी तत्काल दे डाली| इसके उत्तर में स्वामी जी ने कहा, “लोग कहते हैं सत्य का प्रकाश न कीजिए क्योंकि कलेक्टर कुपित हो जावेगा….चाहे चक्रवर्ती राजा भी क्यों न अप्रसन्न हो जावे, हम तो सत्य ही कहेंगे…..|” इस दिन रविवार होने के कारण स्काट साहिब गिरजा गए थे, इस पर स्वामी जी भी गिरजा चले गए| स्वामी जी को देखकर स्काट इन्हें मंच पर ले गए, जहाँ स्वामी जी ने एक घंटा तक व्याख्यान दिया|
                          मेरे रक्षक  परमात्मा हैं 
     फर्रुखाबाद में कुछ गुंडे स्वामी जी को हानि पहुंचाने स्वामी जी की सभा में आये किन्तु मात्र स्वामी जी के चेहरे पर अदभुत तेज देखते ही वहां से भाग खड़े हुए| जब सुरक्षा की दृष्टि से स्वामी जी को अन्दर रहने को कहा गया तो स्वामी जी से उत्तर मिला “ मेरी रक्षा तो सर्वत्र परमात्मा ही करते हैं|”
      इसी स्थान की ही एक अन्य घटना है| स्वामी जी एक सभा में अपना व्याख्यान दे रहे थे| अकस्मात् सभा में आये एक शराबी ने स्वामी जी पर जूता फैंक दिया| इस पर उपस्थित लोग उस शराबी को पकड़ने लगे किन्तु स्वामी जी ने यह कहते हुए उसे छुड़वा दिया कि जूता तो हमें  लगा ही नहीं, फिर यह भी नशे के कारण होश में नहीं है, इसलिए इसे छोड़ देना ही उत्तम रहेगा|
     यहाँ की ही एक अन्य घटना भी सामने आती है| स्वामी जी की सभा चल रही थी| इस सभा में एक लठैत ने आकर स्वामी जी से पूछा तुम ईश्वर को नहीं मानते हो? इस पर स्वामी जी ने उससे ईश्वर का स्वरूप पूछा तो उसने ईश्वर को निराकार ही बताया| तो स्वमी जी ने कहा कि तो इसमें मूर्ति पूजा कहाँ से आ गई? स्वामी जी के इतने से उत्तर से वह भी सत्य का पुजारी बनते हुए स्वामी जी का अनुगामी बन गया| 
     यहाँ की ही एक अन्य घटना भी मिलती है| स्वामी जी भ्रमण कर रहे थे कि एक व्यक्ति ने आकर स्वामी जी को गालियाँ देना आरम्भ कर दिया| इतना ही नहीं वह व्यक्ति स्वामी जी को परेशान करने के लिए उनके निवास पर भी आ धमाका| इस पर स्वामी जी ने हंसते हुए उस दुष्ट व्यक्ति का स्वागत् किया| स्वामी जी के इस वयवहार से उस व्यक्ति की दुष्टता भाग गई तथा अपनी भूल के लिए पश्चाताप करने लगा| 
                             मैं तुम्हें लड्डू देता हूँ 
      स्वामी जी अमृतसर में व्याख्यान दे रहे थे कि एक अध्यापक के आदेश से उसके नन्हे छात्र स्वामी जी पर कंकर फैंकने लगे| जब वह पकडे गए तो उन बच्चों ने रोते हुए कहा कि उन्हें ऐसा करने के लिए अध्यापक ने कहा था| अध्यापक ने कहा था कि यदि तुम इस साधू को पत्थर मारोगे तो मैं तुम्हें लड्डू दूंगा| स्वामी जी ने उन बच्चों को लड्डू देते हुए कहा की “अध्यापाक तो संभव है न दे सके, लो मैं तुम्हें दिए देता हूँ|”
                       हमारा काम वैद्य का है|
     अमृतसर में ही स्वामी जी का एक शाश्त्रार्थ निर्धारित हुआ किन्तु इसके लिए विरोधी बहुत देर से आये तथा आते ही शास्त्रार्थ करने के स्थान पर ईंटें बरसाने लगे| पुलिस तो भयभीत होकर वहां से भाग खडी हुई किन्तु ऋषि भक्तों का क्रोध शांत न हुआ| इसे देखते हुए स्वामी जी ने कहा कि “हमारा काम ईंटें खाने का है….यही लोग कभी आप पर पुष्प वर्षा करेंगे|”
     यहाँ की ही एक अन्य घटना है| कुछ लोग दुष्टों से स्वामी जी को बचाने के लिए उनके रक्षक बनकर स्वामी जी के पास ही सोने लगे| जब स्वामी जी को इस बात का पता चला कि निहंगों से उनकी रक्षार्थ यह सब लोग उनके पास सो रहे हैं तो स्वामी जी ने उन्हें रोकते हुए कहा कि  हम अकेले ही रहेंगे| जिस की आज्ञा का मैं पालन कर रहा हूँ वही परमेश्वर मेरा रक्षक है|
                             उपद्रवी भाग गए 
      वजीराबाद के शास्त्रार्थ में झगड़े को तैयार होकर आये कुछ लोगों ने आते ही स्वामी जी पर इंटों की वर्षा आरम्भ कर दी| इस पर स्वामी जी कमरे के अन्दर चले गए और दरवाजा अन्दर से बंद कर दिया तथा हंसने लगे| इस सब व्यवस्था के समय स्वामी जी का एक सेवक बाहर रह गया| जब स्वामी जी को पता चला कि सेवक बाहर पिट रहा है तो स्वामी जी ने दरवाजा खोलकर जोर से हुंकार की| इस हुंकार से दुष्ट इतने भयभीत हो गए कि तत्काल भाग गए|
                                 मैं मारा नहीं जाउंगा 
     मुम्बई में कुछ लोग स्वामी जी की ह्त्या करना चाहते थे| इसके लिए लालच देकर उन्होंने स्वामी जी के सेवक को अपने साथ कर लिया| स्वामी जी इस दुष्कार्य को भांप गए| इस पर स्वामी जी ने उस सेवक से पूछताछ की तो सेवक ने सब कुछ उगल दिया| इस पर स्वामी जी ने उसे कहा, “जिसे परमेश्वर न मारे उसे मारने के लिए कोई समर्थ नहीं हो सकता| बनारस में मुझे हलाहल विष  दिया गया, राव कर्ण सिंह ने पान में विष दिलवाया, अन्य भी अनेक स्थानों पर विष के विषम प्रयोग किये गए, परन्तु मेरा प्राणांत नहीं हुआ| स्मरण रखो, अब भी मैं मारा नहीं जाउंगा|”
                      तुम मेरा हनन करना चाहते हो?
      मुंबई के कुछ पन्थाइयों के आग्रह पर स्वामी जी के वध के लिए प्रात: भ्रमण का समय चुना गया तथा इसके लिए प्रात:काल चार गुंडे स्वामी जी का पीछा करने लगे| स्वामी जी यह सब भांप गए और मुडकर उनसे कहा, “तुम मेरा हनन करना चाहते हो?” स्वामी जी के इतना कहते ही गुंडे भयभीत हो गए तथा उन्होंने स्वामी जी का पीछा करना बंद कर दिया|
                               ईंटें मेरे लिए पुष्प हैं 
      सूरत में स्वामी जी के व्याख्यान में एक व्यक्ति ने स्वामी जी से कुछ प्रश्न किये किन्तु वह स्वामी जी के उत्तर सुनने पर ऐसा लगा कि वह स्वामी जी के सामने टिक नहीं पा रहा था| इस पर उस प्रश्नकर्ता व्यक्ति के साथी स्वामी जी पर पत्थर फैंकने लगे| इस पर स्वामी जी के भक्तों ने कुछ समय के लिए स्वामी जी से व्याख्यान रोकने का आग्रह किया| स्वामी जी बोले, “ अपने भाइयों द्वारा फैंके पत्थर मेरे लिए पुष्पों की वर्षा है ये तो हमारे भाई हैं|”
      भडौंच में स्वामी जी के व्याख्यान चल रहे थे कि एक दक्षिणी पंडित वहां आकर स्वामी जी को इंगित करते हुए अपशब्द बोलने लगा| इस पर उपस्थित श्रोता भड़क उठे| इस सब को देखकर स्वामी जी ने कहा, “ ये तो हमारे भाई हैं,इन्हीं की कल्याण कामना करते हुए दिन बीतते हैं|”
                       आग को आग शांत नहीं करती
     यहीं की ही एक अन्य घटना है| यहाँ पार्सी से ईसाई हुए एक व्यक्ति ने स्वामी जी की उपस्थिति में स्वामी जी के लिए अपशब्द बोलने आरम्भ कर दिए| उसकी इस हरकत से उपस्थित लोग भड़क उठे| इस पर स्वामी जी ने कहा, “आग में आग डालने से आग शांत नहीं होती, वैसे ही द्वेष बुद्धि उसके साथ द्वेष करने से दूर नहीं हो सकती |”  
                             जन्म से सब नीच हैं 
     पूना प्रवाचन के समापन पर स्वामी जी की हाथी पर शोभा यात्रा निकल रही थी| उपद्रवकारियों ने यह अवसर भी हाथ से न जाने दिया और उन्होंने एक व्यक्ति का मुंह काला करके उसे दयानंद कहते हुए गधे पर बैठाकर, उसका जुलूस निकालते हुए, उसे गालियाँ देते तथा उस पर पत्थर आदि फैंक रहे थे| ऋषि भक्त इसे सहन न कर सके और उन्होंने यह सब कुछ स्वामी जी को बताया| इस पर स्वामी जी ने कहा, “अच्छा है गालियों से पेट खाली हो लेगा, सच्चे दयानन्द को तो कालिमा नहीं लगी| हाँ, बनावटी का मुख काला होना ही चाहिए, कल पत्थर पूजते थे आज पत्थर फैंकते हैं| सो मेरी बात मान ली, मैं भी तो यही कहता हूँ कि जन्म से सब नीच हैं| जिसने पढ़ा पढ़ाया, वह ब्राहमण हो गया, जो धर्म के लिए युद्ध में लड़ा वह क्षत्रिय हो गया, जिसने व्यापार पशुपालन या कृषि की वह वैश्य हुआ नहीं तो शुद्र| मैंने ब्राहमण के यहाँ जन्म लिया था| ब्राह्मण के पुत्र को नीच माना तो मेरे ही सिद्धांत पर आये, मुझे तो यह बात सुनकर अत्यंत प्रसन्ता हुई|
     एक बार स्वामी जी  बंगाल के किसी स्थान पर व्याख्यान दे रहे थे कि इस मध्य किसी ने स्वामी जी पर सांप फैंक दिया| स्वामी जी ने इस विषधर को पैर से कुचल दिया| 
     शाहजहाँ पुर के चांदापुर में शाक्त लोगों ने स्वामी जी की बलि देवी को देने का प्रयास किया किन्तु स्वामी जी ने पुजारी से तलवार छीन ली और मंदिर से बाहर आ गए| एक बार कुछ साधुओं ने रात्रि के समय स्वामी जी की कुटिया को आग लगा दी| किन्तु स्वामी जी इस आग में से भी जीवित बाहर निकल आये| 
     जब जयपुर राज्य ने स्वामी जी को हानि पहुंचाने की सोची तो एक कर्मचारी के आग्रह पर स्वामी जी ने उसे कहा, “आप लोग मेरी चिंता मत करो आप राज कर्मचारी हैं अत: मेरे पास न आया करो ताकि आपकी हानि न हो|”
      जोधपुर राज दरबार में जब स्वामी जी गए तो वहां दरबार में वैश्या उपस्थित थी| स्वामी जी ने इस पर राजा को अच्छी लताड़ लगाईं तथा वापिस लौट कर उसे एक पत्र भी लिखा| इस वैश्या की दरबार में अच्छी साख थी, वह अपमान का बदला लेना चाहती थी| अब उस वैश्या के साथ अनेक दुष्ट भी मिल गए| उन्होंने रसोइये घूड मिश्र को (यहाँ जान लें कि स्वामी जी को विष देने वाले रसोइये का जो प्रचलित नाम जगन्नाथ चला आ रहा है, वह गलत है|) भी पटा लिया और उसके माध्यम से दूध में विष(राजस्थान में विष को कांच कहते हैं) मिलवा कर स्वामी जी को दिलवा दिया| यही विष ही अंत में स्वामी जी के बलिदान का कारण बना|
      स्वामी जी को इस विष देने की घटना को आर्य समाज के कुछ विद्वान् नकारने लगे हैं| इस सन्दर्भ में कुछ लोग तो अपने आप को इस क्षेत्र से सम्बंधित होने का राग अलापते हुए कहने लगे कि उन्होंने सरकारी रिकार्ड देखा है| वास्तव में उनका यह दावा सत्य से कोसों दूर है| उनमें से किसी ने भी यह उस समय का सरकारी रिकार्ड नहीं देखा| मैं डी ऐ वी कालेज अबोहर में कार्यरत था| उन दिनों प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु जी भी अबोहर में ही कार्यरत थे| उनके पत्र भारी संख्या में आते रहते थे| जब वह कहीं बाहर गये होते थे तो उनके पत्रों को देखकर मैं कुछ साधारण पत्रों के उत्तर दे दिया करता था| 
     इन्हीं दिनों जोधपुर से भैरव सिंह जी ( आर्य समाज गुलाब सागर जोधपुर) के अनेक पत्र जिज्ञासु जी के नाम से आये| इन सब पत्रों का उत्तर मैंने उनको दिया| इस कारण भैरव सिंह जी मुझे जिज्ञासु जी का पुत्र समझने लगे| उन्हीं के आग्रह पर मैं आर्य युवक समाज अबोहर का साहित्य लेकर इसके विक्रयार्थ मेरठ आर्य महासम्मलेन मेरठ में गया| यह सम्मलेन सन् १९७२ के लगभग हुआ था| भैरव सिंह जी यहाँ जोधपुर राज्य का वह सब रिकार्ड( उसकी नकलें) जो स्वामी जी से सम्बंधित था, साथ लाये थे| वह सारा रियासती रिकार्ड मुझे दिखाया और बताया तथा इसे महीनता से समझाते हुए कहा कि इसे (आपके पिता जी के अतिरिक्त कोई नहीं समझ सकता|) मैंने यहाँ पर उन्हें बताया कि जिज्ञासु जी मेरे पिता नहीं साथी हैं| यहाँ पर उन्होंने मुझे स्वामी जी को विष देने के दस्तावेज भी दिखाए| इस सब के आधार पर मैं दावे के साथ कहता हूँ कि स्वामी जी को जोधपुर में भयंकर विष दिया गया था| यह विष दिलवाने वाली वही वैश्या ही थी जो राज दरबार में स्वामी जी ने देखी थी| उस वैश्या का नाम नन्हीं ही था| अत; यह कहने का कुछ भी तात्पर्य नहीं रह जाता कि वह वैश्या नहीं थी या उसका नाम नन्हीं नहीं था या फिर उस वैश्या ने विष दिलवाया ही नहीं|      यदि ऐसा कहते हैं तो इसका यह प्रयास तत्कालीन जोधपुर राज्य के वर्तामान उत्तराधिकारियों को, उनके परिवार के वर्त्तमान के लोगों को जोधपुर पर लगे कलंक को मिटाने का एक प्रयास मात्र ही कहा जा सकता है, जिसके लिए यह परिवार उन्हें कुछ धन देता है, ऐसा हो सकता है| इसके अतिरिक्त अन्य कोई प्रयोजन नहीं| 
     यहाँ एक बात और लिखना चाहूँगा कि भैरव सिंह जी ने भरसक प्रयत्न किये कि वह इस सन्दर्भ में हमारे जिज्ञासु जी से एक बार मिल लें और सम्बंधित सब रिकार्ड उन्हें सौंप दें किन्तु पहले चाहे वह उन्हें कितनी बार भी मिले हों तो भी इस सन्दर्भ में अपनी यह अभिलाषा मन में ही संजोये इस जगत् से विदा हो गए और जिज्ञासु जी को नहीं मिल पाए| हां! जाने से पहले यह सब कुछ मुझे दिखाकर आर्य जगत् को यह विश्वास अवश्य दे गए कि कोई भी इस कपट पूर्ण व्याख्यान का विरोध कर सत्य को जन जन तक ला सकें| मैं आपने आप को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि स्वामी जी से सम्बंधित जोधपुर रियासत का रिकार्ड देखने वाला इस समय कोई जीवित है तो वह एकमात्र मैं ही हूँ| 
     सो आज मैंने उनकी यह अंतिम अभिलाषा इस लेख की अंतिम पंक्तियों में पूर्ण करने का प्रयास करते हुए एक बार फिर यह बात कहता हूँ कि स्वामी जी को जो जीवन में अनेक बार  मारने की असफल चेष्टाएँ की गईं किन्तु अंत में जोधपुर में नन्ही वैश्या ने स्वामी जी के रसोइये को(यह रसोइया शाहपुर नरेश ने स्वामी जी के जोधपुर जाते समय साथ में दिया था) अपने साथ मिलाकर जो विष दिलाया, वही विष ही स्वामी जी के बलिदान का कारण बना| विष दिलवाने वाली दरबारी वैश्या थी, उसका नाम नन्ही था तथा उसी ने रसोइये घूड मिश्र (जिसे इतिहास में आज जगन्नाथ कहा जाता है) से विष दिलवाया| विष देने वाले रसोइये का नाम घूड मिश्र ही था| आर्य समाज तथा जोधापुर के इतिहास की यह एक सत्य घटना है| लाख प्रयास करने पर भी इसे झुठलाया नहीं जा सकता| जो इसे झुठलाने का प्रयास करते हैं, वह कलुषित मानसिकता वाले स्वार्थी लोग ही हो सकते हैं|
डा. अशोक आर्य 
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