संसार में वेदों की अप्रवृत्ति होने से अविद्यायुक्त मत उत्पन्न हुए

ओ३म्
‘संसार में वेदों की अप्रवृत्ति होने से अविद्यायुक्त मत उत्पन्न हुए’
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संसार में वर्तमान समय में सहस्राधिक अवैदिक मत प्रचलित हैं जिनकी प्रवृत्ति व प्रचलन पांच हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध के बाद हुआ है। सभी मतों का आधार चार प्रमुख मत हैं जो पुराण, जैन मत के ग्रन्थों, बाईबल तथा कुरान आदि ग्रन्थों के आधार पर प्रचलित हुए हैं। महाभारत युद्ध से पूर्व व महाभारत के दो हजार से अधिक वर्ष पश्चात तक वेद मत कुछ परिवर्तित अविद्यायुक्त मान्यताओं सहित प्रचलित था। महर्षि दयानन्द (1825-1883) धर्म के सत्यस्वरूप तथा धार्मिक इतिहास के मर्मज्ञ विद्वान थे। उन्होंने सृष्टि के आरम्भ से महाभारत महायुद्ध तक देश देशान्तर में प्रचलित रहीं वैदिक सत्य मान्यताओं का प्रकाश अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में किया है। इस ग्रन्थ में उन्होंने वेदों के पराभव तथा मत-मतान्तरों की उत्पत्ति के कारणों पर भी प्रकाश डाला है। सत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास की अनुभूमिका में वह इस विषय में बताते हैं कि यह सिद्ध बात है कि पांच सहस्र वर्षों के पूर्व वेदमत से भिन्न दूसरा कोई भी मत न था क्योंकि वेदोक्त सब बातें विद्या से अविरुद्ध हैं। वेदों की अप्रवृत्ति होने का कारण महाभारत युद्ध हुआ। वेदों की अप्रवृत्ति से अविद्यान्धकार के भूलोक में विस्तृत होने से मनुष्यों की बुद्धि भ्रमयुक्त होकर जिस के मन में जैसा आया वैसा मत चलाया। उन सब मतों में चार मत अर्थात् जो वेद-विरुद्ध पुराणी, जैनी, किरानी और कुरानी सब मतों के मूल हैं, वे क्रम से एक के पीछे दूसरा तीसरा चौथा चला है। अब इन चारों मतों की शाखायें एक सहस्र से कम नहीं हैं। इसी क्रम में ऋषि दयानन्द ने यह भी कहा है कि सब मतवादियों, इन के चेलों और अन्य सब को परस्पर सत्य और असत्य के विचार करने में अधिक परिश्रम न करना पड़े, इसलिये उन्होंने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ बनाया है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ सभी मत-वादियों व उनके अनुयायियों सहित सभी धर्म जिज्ञासुओं को अविद्या से मुक्त सत्य मत के निर्णय करने में सहायता करता है। अतः सभी मनुष्यों का परम कर्तव्य है कि सत्यमत को प्राप्त होने के लिये वह सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अवश्य ही अध्ययन करें।

ऋषि दयानन्द ने अपने उपुर्यक्त शब्दों में जो कहा है उस पर उन्होंने सत्यार्थप्रकाश के पूर्व के दस सम्मुलासों में प्रकरणानुसार संक्षेप में प्रकाश डाला है। हमारा यह संसार ईश्वर का बनाया हुआ है। ईश्वर का सत्यस्वरूप वेदों से प्राप्त होता है। इसको यदि संक्षेप में जानना हो तो वह ऋषि दयानन्द के बनाये आर्यसमाज के दूसरे नियम को पढ़कर जाना जा सकता है। इस नियम में ऋषि ने बताया है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी परमात्मा की सबको उपासना करनी योग्य है। ईश्वर सर्वज्ञ है अर्थात् सर्वज्ञानमय है। वह सब जीवों को उनके जन्म जन्मान्तरों के अभुक्त कर्मों का भोग कराने वा कर्मों के अनुसार सुख व दुःख प्रदान करने के लिये इस सृष्टि की रचना व पालन करते हैं। जीव संख्या में अगणित व अनन्त हैं जो स्वभावतः जन्म-मरण धर्मा हैं। मोक्ष के उपायों को करने पर जीवात्मा की निश्चित अवधि के लिये मुक्ति हो जाती है जिसके बाद सभी जीवन पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं। ईश्वर की उपासना से जीवन ईश्वर के आनन्द को प्राप्त कर दुःखों से सर्वथा रहित हो जाता है। मोक्ष में जीवात्मायें ईश्वर के सान्निध्य में आनन्द का भोग करती हैं। यही आनन्द समाधि अवस्था में भी योगीजनों को प्राप्त हुआ करता है। इसी के लिये जिज्ञासु व विद्वान यौगिक जीवन को महत्व देते रहे हैं व भोगों से युक्त सांसारिक जीवन को गौण समझते हैं। जैसा इस कल्प में वैसा ही सृष्टिक्रम अनादि काल से यह सृष्टि की उत्पत्ति, पालन तथा प्रलय का चला आ रहा है और भविष्य में अनन्त काल तक परमात्मा के द्वारा चलाया जाता रहेगा। इसमें किंचित भी परिवर्तन व अवरोध नहीं होगा। 

महाभारत युद्ध से पूर्व के आर्यावर्त का वर्णन करते हुए ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि यह आर्यावर्त देश ऐसा देश है कि जिसके सदृश भूगोल में दूसरा कोई देश नहीं है। इसीलिये इस भूमि का नाम सुवर्णभूमि है क्योंकि यही सुवर्णादिरत्नों को उत्पन्न करती है। इसीलिये सृष्टि की आदि में आर्य लोग इसी देश में आकर बसे। ऋषि बताते हैं कि आर्य नाम उत्तम पुरुषों का है और आर्यों से भिन्न मुनष्यों का नाम दस्यु हैं। जितने भूगोल में देश हैं वे सब इसी देश की प्रशंसा करते और आशा रखते हैं कि पारसमणि पत्थर सुना जाता है वह बात तो झूठी है परन्तु आर्यावर्त देश ही सच्चा पारसमणि है कि जिसको लोहेरूप दरिद्र विदेशी छूते के साथ ही सुवर्ण अर्था् धनाढ्य हो जाते हैं। आज भी हमारा देश सुवर्णभूमि है। ऋषि दयानन्द ने अपने समय में वेदों का प्रचार कर तथा वेदप्रचारार्थ सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय तथा वेदों का भाष्य करके व वेदभाष्य के सत्यार्थ की पद्धति बता कर एवं आर्य विद्वानों द्वारा उपनिषदों, दर्शनों तथा मनुस्मृति, बाल्मीकि रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों का सम्पादन कर भारत भूमि को पुनः सुवर्ण भूमि बना दिया है। आज हमारे देश में मनुष्य की आत्मा को योगी बनाने, समाधि अवस्था में ईश्वर का साक्षात्कार करने तथा मोक्ष प्राप्ति के सभी साधन करने का ज्ञान व विधि उपलब्ध है। हमारा अनुमान है कि ऋषि दयानन्द समाधि सिद्ध व ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए योगी थे जिनको मोक्ष प्राप्त हुआ है। 

प्राचीन वैदिक युग की विशेषता बताते हुए ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में लिखा है कि सृष्टि से ले के पांच सहस्र वर्षों से पूर्व समय पर्यन्त आर्यों का सार्वभौम चक्रवर्ती अर्थात् भूगोल में सर्वोपरि एकमात्र राज्य था। अन्य देशों में माण्डलिक अर्थात् छोटे-छोटे राजा रहते थे क्योंकि कौरव पाण्डव पर्यन्त यहां के राज्य और राज शासन में सब भूगोल के सब राजा और प्रजा चले थे क्योंकि यह मनुस्मृति जो सृष्टि की आदि में हुई है उस का प्रमाण है। इसी आर्यावर्त देश में उत्पन्न हुए ब्राह्मण अर्थात् विद्वानों से भूगोल के मनुष्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, दस्यु, म्लेच्छ आदि सब अपने-अपने योग्य विद्या चरित्रों की शिक्षा और विद्याभ्यास करें। और महाराज युधिष्ठिर जी के राजसूय यज्ञ और महाभारत युद्धपर्यन्त यहां के राज्याधीन सब राज्य थे। ऋषि लिखते हैं….. सुनों! चीन का भगदत्त, अमेरिका का बब्रुवाहन, यूरोप देश का विडालाक्ष अर्थात् मार्जार के सदृश आंख वाले, यवन जिस को यूनान कह आये और ईरान का शल्य आदि सब राजा राजसूय यज्ञ और महाभारतयुद्ध में सब आज्ञानुसार आये थे। जब रघुगण राजा थे तब रावण भी यहां के आधीन था। जब रामचन्द्र के समय में विरुद्ध हो गया तो उस को रामचन्द्र ने दण्ड देकर राज्य से नष्ट कर उस के भाई विभीषण को राज्य दिया था। 

ऋषि दयानन्द ने आर्यावर्त व भारत देश की कुछ हजार वर्ष पूर्व के काल में महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि स्वायम्भुव राजा से लेकर पाण्डवपर्यन्त आर्यों का चक्रवर्ती राज्य रहा। तत्पश्चात् आपस के विरोध से लड़ कर नष्ट हो गये क्योंकि इस परमात्मा की सृष्टि में अभिमानी, अन्यायकारी, अविद्वान् लोगों का राज्य बहुत दिन तक नहीं चलता। और यह संसार की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि जब बहुत सा धन असंख्य प्रयोजन से अधिक होता है तब आलस्य, पुरुषार्थरहितता, ईष्र्या, द्वेष, विषयासक्ति और प्रमाद बढ़ता है। इस से देश में विद्या सुशिक्षा नष्ट होकर दुर्गुण और दुष्ट व्यसन बढ़ जाते हैं। जैसे कि मद्य-मांससेवन, बाल्यवस्था में विवाह और स्वेच्छाचारादि दोष बढ़ जाते हैं। और जब युद्ध विद्या कौशल और सेना इतने बढ़े कि जिस का सामना करने वाला भूगोल में दूसरा न हो तब उन लोगों में पक्षपात अभिमान बढ़ कर अन्याय बढ़ जाता है। जब ये दोष हो जाते हैं तब आपस में विरोध होकर अथवा उन से अधिक दूसरे छोटे कुलों में से कोई ऐसा समर्थ पुरुष खड़ा होता है कि उन का पराजय करने में समर्थ होवे। जैसे मुसलमानों की बादशाही के सामने शिवाजी, गोविन्दसिंह जी (व महाराणा प्रताप आदि) ने खड़े होकर मुसलामनों के राज्य को छिन्न-भिन्न कर दिया। 

ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास में मैत्रयुपनिषद के प्रमाण के आधार पर देश के कुछ चक्रवर्ती राजाओं के नाम भी लिखें हैं। उन्ीके यहां प्रस्तुत करने का लोभ भी हम छोड़ नहीं पा रहे हैं। वह लिखते हैं कि सृष्टि से लेकर महाभारत पर्यन्त चक्रवर्ती सार्वभौम राजा आर्यकुल में ही हुए थे। अब इनके सन्तानों का अभाग्योदय होने से राजभ्रष्ट होकर विदेशियों के पादाक्रान्त हो रहे हैं। जैसे यहां सुद्युम्न, भूरिद्युम्न, इन्द्रद्युम्न, कुवलयाश्व, यौवनाश्व, वद्ध्रयश्व, अश्वपति, शशविन्दु, हरिश्चन्द्र, अम्बरीश, ननवतु, शर्याति, ययाति, अनरण्य, अक्षसेन, मरुत और भरत सार्वभौम सब भूमि में प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजाओं के नाम लिखे हैं वैसे स्वायम्भुवादि चक्रवर्ती राजाओं के नाम स्पष्टरूप में मनुस्मृति, महाभारत ग्रन्थों में लिखे हैं। इन को मिथ्या करना अज्ञानियों व पक्षपातियों का काम है। भारत के अतीत का यह कैसा स्वर्णिम चित्रण है जिसे हमारे देश के राजनेताओं व एक विशेष मानसिकता व विचारधारा से प्रभावित लोगों ने पक्षपात के कारण सामने नहीं आने दिया। 

सृष्टि के आरम्भ से वेदों द्वारा प्रवर्तित वेद मत वैदिक धर्म ही समस्त भूगोल व विश्व में प्रचलित रहा है। वेद मत सब सत्य विद्याओं पर आधारित सत्य धर्म था तथा इससे मानव मात्र तथा विश्व का कल्याण होता था, अब भी होता है। वेद मत के मानने से देश के अन्दर व बाहर व संसार में उपद्रव या तो होते नहीं थे अथवा नाम मात्र के होते थे। महाभारत काल व उसके बाद वेदों की अप्रवृति होने से ही सब अविद्यायुक्त वेदविरुद्ध मत अस्तित्व में आयें हैं जिनसे मानवता को लाभ के स्थान पर अनेक प्रकार की हानियां ही हुई हैं। इन सब मतों का पुनः सत्य वैदिक मत में प्रवेश करने व कराने के लिये ही ऋषि दयानन्द ने मानव जाति के हित की दृष्टि से वेद प्रचार कर सबको अविद्या छोड़ने और सत्य विद्याओं से युक्त वेद मत को स्वीकार करने के लिये वेद प्रचार किया था तथा अपने अनेकानेक ग्रन्थों का प्रणयन किया थां। आज भी उनका लिखित व प्रचारित साहित्य हमें वेदों की महत्ता सहित सत्य धर्म, इसके लाभों व महत्ता को बताता है। बिना वेद मत का प्रचार किये व उसे विश्व भर में अपनाये मानव जाति का हित नहीं हो सकता और न ही विश्व में शान्ति लाई जा सकती है। सभी मतों के विद्वानों का कर्तव्य है कि वह सत्यार्थप्रकाश सहित ऋषि दयानन्द के वेद भाष्य आदि ग्रन्थों को पढ़े और अपनी विवेक बुद्धि व हिताहित को देखकर निष्पक्ष होकर सत्य धर्म का ग्रहण व इसे अपनाने का निर्णय करें। ओ३म् शम्।  
 
-मनमोहन कुमार आर्य

प्रभु उपासना से हम पवित्र बनें

प्रभु उपासना से हम पवित्र बनें
                            डा.अशोक आर्य                          
          मानव विनाशक वृतियों का दास बन जाता है किन्तु मन्त्र इन वृतियों से बचने की प्रार्थना का उपदेश करते हुए परमपिता से प्रर्थना करता है कि हम एसी प्रवृतियों का नाश कर स्वयं को सुरक्षित करें। हमारे हृदय में दैवीय वृतियां आवें तथा हे प्रभु! आप के समीप निवास कर हम पवित्र बनें। इस बात को ही यह मन्त्र उपदेश कर रहा है:-        
   धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योऽस्मान् धूर्वति तं धूर्व यं वयं धूर्वाम:।
देवानामसि वह्नितमं सस्नितमं पप्रितमं जुष्टतमं देवहूतमम्॥8॥

        इस मन्त्र में पांच प्रकार का उपदेश किया गया है। जो इस प्रकार है:- 
१. हमारी आदान वृति का नाश हो :-
       हे परमपूज्य प्रभो! आप हमारे अन्दर की राक्षसी प्रवृतियों को, जो हमारा नाश करने वाली आदतें हैं, इन सब प्रकार की दुष्ट वृतियों का आप ही नाश करने वाले हैं। इन बुरी आदतों से आप ही हमें बचाने वाले हैं। आप के सहयोग के परिणाम स्वरूप हम इन बुराईयों से बच पाते हैं। इसलिए आप हमें इन राक्षसी प्रवृतियों से इन अदान की वृतियों से, दूसरों का सहयोग करने से रहित हमारी आदतों का सुधार कर इन बुराईयों से हमें बचाते हुए इन्हें हम से दूर कर दीजिए, इन का नाश कर दीजिए, इनका संहार कर दीजिए। 
      जब हमारे अन्दर अदान की वृतियां आती हैं तो हम विभिन्न प्रकार के भोगों में आसक्त हो जाते हैं, इस कारण हम अनेक बार हिंसक भी हो जाते हैं।  आप हम पर कृपा करें तथा इन अदान की वृतियों को हम से दूर कीजिए, हमें दानशील बना दीजिए। जिस अदान व राक्षसी वृति से हम हिंसक हो जाते हैं, प्रभु!  आप उस पर हिंसा कीजिए अर्थात् इन बुरी वृतियों का नाश कर हमारी रक्षा कीजिए। ये सब बुरी वृतियां हमारा नाश करने को कटिबद्ध हैं, हर हालत में, हर अवस्था में हमारा नाश करना चाहती हैं। आप की जब हमारे पर कृपा होगी, दया होगी, तब ही हम इन का विनाश करने में सक्षम हो पावेंगे। आप की दया होगी तब ही हम इन बुरी वृतियों को नष्ट कर स्वयं को रक्षित कर सकेंगे, अपनी रक्षा कर सकेंगे। हम दिव्य जीवन का आरम्भ करना चाहते हैं किन्तु यह भोगवाद हमें दिव्य जीवन की ओर जाने ही नहीं देते| आप कृपा कर हमें इस भोगवाद से बचावें तथा हमें दिव्य जीवन आरम्भ करने का मार्ग बतावें , हमारे लिए दिव्य जीवन पाने का मार्ग प्रशस्त करें। 
२. प्रभु कृपा से दिव्यगुण मिलते हैं :-
     जीव को दिव्यगुण देने वाले वह परमपिता परमात्मा ही हैं। वह प्रभु ही हमें अत्यधिक व भारी संख्या में दिव्य गुण देने वाले हैं। यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि हमें जिन दिव्य गुणों की आवश्यकता है, यथा हमने स्वयं को सुबुद्धि-युक्त करना है। यह सुबुद्धि तब ही आती है, जब हम उग्र हो जाते हैं, अत्याचारों का मुकाबला करने की, प्रतिरोध करने की शक्ति के स्वामी हो जाते हैं। हम दिव्य तब बनते हैं जब हमारे में उदात्त भावनाएं आ जाती हैं। हम स्वयं को उत्तम बना कर दूसरों को भी उत्तम बनाने का यत्न करते हैं, प्रयास करते हैं। जब हम ज्ञानी बन कर अतुल ज्ञान का भण्डार अपने अन्दर संकलित कर लेते हैं तथा दूसरों में यह ज्ञान बांट कर उन्हें भी ज्ञानी बनाने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार हम सब प्रकार के तत्वों के स्वामी बन कर तत्वद्रष्टा हो कर ऋषि के आसन पर आसीन हो जाते हैं, सब प्रकार की सद्बुद्धियों के स्वामी हो जाते हैं ।
३. प्रभु चरणों में सब मलिनताएं मर जाती हैं :-
         हे प्रभो! एक आप ही हैं, जो हमारे जीवनों को शुद्ध व पवित्र बनाते हो  । हमारे जीवनों में जितनी भी शुद्धता व पवित्रता है, वह आप के ही आशीर्वाद के कारण है, आप की ही दया के कारण है, आप की ही कृपा के कारण है। आप ही हमें अधिकाधिक शुद्ध व पवित्र बनाते हो। जब हम आपके चरणों में आते हैं तो हमारी सब मलिनताएं दग्ध हो जाती हैं, नष्ट हो जाती हैं, जल कर दूर हो जाती हैं । जब हम आप की उपासना करते हैं, आप के समीप आसन लगाकर बैठते हैं, आप की निकटता को पाने में सफ़ल होते हैं तो हमारा जीवन आप की निकटता रुपि जल से एक प्रकार से धुल जाता है तथा हम शुद्ध ओर पवित्र हो जाते हैं ।
४. आप हमें देवीय शस्य से भर देते हो :-
         प्रभो! जब आप हमारे जीवन को शुद्ध कर देते हो, हमारे जीवन को पवित्र कर देते हो, तो बुराइयाँ निकलने से हमारे अन्दर बहुत सा स्थान रिक्त हो जाता है। आप जानते हो कि रिक्त स्थान तो कहीं रह ही नहीं सकता, जहां भी कुछ रिक्तता आती है तो आप कुछ न कुछ उस स्थान पर रख कर उसे भरने का कार्य भी करते हो। जब आप ने हमारे जीवन की सब बुराईयों को निकाल बाहर कर दिया तो इस रिक्तता को पूरित करने के लिए आप उस शुद्ध हुए शरीर में, दिव्य गुणों के बीज डाल देते हो। दिव्य गुणों की खेती कर देते हो। इन बीजों से हमारे अन्दर दिव्य गुणों के अंकुर फ़ूटते हैं, नन्हें-नन्हें पौधे निकलते हैं। यह अंकुर दैवीय सम्पदा की ओर इंगित करने वाले होते हैं, हमें इंगित करते हैं कि हम किसी दैवीय सम्पदा के भण्डारी बनने वाले हैं। इस प्रकार हम सद्गुण रूपी देवीय सम्पदा के स्वामी बन इस सम्पदा से परिपूर्ण हो जाते हैं।  
५. प्रभु ज्ञान का दीपक पा कर देव बनते हैं :-
        हे पिता! इस जगत् में जितने भी समझदार व सूझवान लोग हैं, आप उन से प्रीति-पूर्वक सेवन किये जाते हो। एसे लोग प्रतिक्षण आप की ही प्रार्थना करते हैं, आप की ही सेवा करते हैं। इस प्रकार के ज्ञान से भरपूर लोग ही देवता कहलाते हैं| अत: आप इन देवाताओं के द्वारा बार-बार पुकारे जाते हो, इन देवताओं के द्वारा बार-बार याद किये जाते हो, यह लोग बार-बार आप के समीप आते है और आप की समीपता से देव बन जाते हैं।
       देव कैसे बनते हैं? मानव को देव की श्रेणी प्राप्त करने का साधन है आप की निकटता। आपकी समीपता पाए बिना कोई देव नहीं बन सकता। अत: आप का उपसन, आप के निकट आसन लगा कर हम देव बन जाते हैं। जब हम आप के समीप आसन लगा कर बैठ जाते हैं तो हमारे अन्दर के काम आदि दुष्ट विचारों का दहन हो जाता है, हनन हो जाता है, नाश हो जाता है, यह सब बुराईयां जल कर नष्ट हो जाती हैं, राख बन जाती हैं। यह काम रूप व्रत्र अर्थात् यह हमारी आंखों पर पर्दा डालने वाले जितने भी दोष हैं, इन सब का आप विनाश कर देते हो तथा इस दोषों के विनाश के पश्चात् हम उपासकों का ह्रदय ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो जाता है, जगमगाने लगता है, आलोकित हो जाता है। इस ज्ञान के प्रकाश को पा कर ही हम देव तुल्य बन जाते हैं। 
                                                                                       
डा.अशोक आर्य 
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 वीरांगणा रानी दुर्गावती

ओउम् 
     वीरांगणा रानी दुर्गावती – ले.डा.अशोक आर्य 
   भारत देश वीर वीरांगणाओं का देश है| इस देश पर जब भी कभी संकट आया हो, यहाँ की नारियों ने पुरुष के कंधे से कंधा मिला कर देश की रक्षा का कार्य किया| विश्व जानता  है की जब अयोध्या के राजा दशरथ को युद्ध में जाना पडा तो उसकी दूसरी पत्नी कैकेयी भी उनके साथ गई थी| इस प्रकार की परम्परा ही रही है की जब जब देश को संकट ने घेरा यहाँ की वीर नारियों ने पुरुषों के साथ ही नहीं, पुरुषों से आगे बढ़ कर देस्श की रक्षा के लिए तलवार उठाई| इस प्रकार की नारियों में वीरानणा दुर्गावती भी एक थी| 
     मैं जब छोटा था तो उन दिनों एक गीत गुनगुनाया करता था:-
        जब दुर्गावती रण में निकली 
              हाथों में थी तलवारे दो |
                   धरती कांपी आकाश हिला 
                          जब चलने लगी तलवारें दो ||
               गुस्से से चेहरा ला हुआ 
                   आँखों से अन्गास्र बरसते थे|
                         उन गोर गोर हाथों में जब 
                                 चमक उठी तलवारें दो|| जब दुर्गावती …….
 
    रानी दुर्गावती का जन्म ५ अक्टूबर १५२४ ईस्वी में महोबा के राज परिवार में हुआ| बड़े लाड प्यार में इस बालिका का पालन हुआ तथा जवान होने पर इसका विवाह गढ़मंडल के राजा दलपति शाह से हुआ| यह सोलहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत का एक छोटा सा राज्य था| छोटा तो था किन्तु इस राज्य के पास अपार धन संपदा होने के कारण इसकी प्रसिद्धि दूर दूर तक फैली हुई थी| 
     इस प्रकार की रानी दुर्गावती का विवाह हुए मात्र एक वर्ष ही हुआ था कि उसके पिता का देहांत हो गया| वह महोबा के शासक थे| उस समय देश पर विदेशी मुगलों का राज्य था और इस समय मुगल बादशाह अकबर राज्य पर आसीन था| महोबा नरेश का देहांत होते ही अकबर की लालची निगाहें महोबा पर आ टिकीं क्योंकि अकबर को धन की आवश्यकता थी ताकि देश के विशाल क्षेत्र को युद्ध करके अपने क्षेत्र में मिलाया जा सके| उसने सुना रखा था कि रानी दुर्गावती के पास आकूत धन है और वह एक साधारण सी महिला ही तो है, उस पर विजय पाना क्या कठिन है?  शीघ्र ही उसने आक्र्रमण करके महोबा के एक भाग कालिंजर पर कब्जा कर लिया जबकि वहां के पूर्व राजा की बेटी दुर्गावती अब तक पिता की मृत्यु के कारण संभल नहीं पाई थी| इस मध्य ही विवाह के मात्र चार वर्ष पश्चात् ही उसके पति राजा दलपति शाह जी का भी देहांत हो गया| अब राज्य के साथ ही साथ अपने तीन वर्षीय शिशु के लालन पालन का कार्य भी दुर्गावती के जिम्मे आ गया| वह सब और से प्राकृतिक विपत्तियों से घिरी हुई थी तो शासन की व्यवस्था की दृष्टि से अकबर की बुरी नजर उसके राज्य को अपने राज्य में मिलाने के लिए लालायित थी| 
    रानी दुर्गावती इन सब विपत्तियों से घीरी थी किन्तु उसने साहस को कभी हाथ से न जाने दिया तथा सब प्रकार की विपत्तियों का सामना करने के लिए सदा ही तत्पर रहती थी| उस ने राज्य की सब व्यवस्थाएं अपने हाथ में ले लीं और अपने इस राज्य का बड़ी कुशलता से संचालन किया| प्रबंध पटु रानी  दुर्गावती के राज्य में सब व्यवस्थाएं इतनी व्यवस्थित तथा सुन्दर थीं कि देखते ही रह जाओ| इस प्रकार सब प्रकार की व्यवस्था करते हुए मात्र दस वर्ष में जबलपुर, जिसे उस समय गोंडवाना कहा जाता था, को सब रूप में संपन्न और दृढ कर दिया| 
     इस मध्य मुग़ल बादशाह अकबर ने आवश्यकता से अधिक अनुमान लगाते हुए भारत की महिला की वीरता का अनुमान न लगा पाया और उसके राज्य को हडपने की योजना बना डाली| इस योजना को क्रियान्वित करते हुए उसने अपने एक सेनापति, जिसका नाम आसिफखान था, को गोंडवाना पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया| अकबर का विचार था दुर्गावती महिला होने के कारण उसका मुकाबला नहीं कर पाएगी और पूरा गोंडवाना उसके आधीन हो जावेगा किन्तु उसका यह अनुमान उस समय गलत सिद्ध हुआ जब रानी दुर्गावती पुरुषों के सैनिक वेश से सुसज्जित रणक्षेत्र में आ खडी हुई| उसे सामने देखकर आसिफखान की आँखें चुंधिया गई और वह लड़ने के स्थान पर कुच्छ समय के लिए वह एकटक दुर्गावती को देखता ही रह गया| 
    रानी ने दोनों हाथों में तलवारें ले रखी थीं और युद्ध आरम्भ होते ही दोनों तलवारे चपला सी चमकने लगीं| जिधर भी रानी आगे बढती उधर ही लाशॉन का ढेर लग जाता| रानी को देखते ही मुग़ल सैनिक भागने का प्रयास करते किन्तु तीव्रगामी रानी उन्हें भागने का अवसर भी नहीं दे रही थी| रानी के हाथों पूरी की पूरी मुग़ल सेना गाजर मुली की तरह कट कर रणक्षेत्र में पड़ी थी और उसका सेनापति किसी प्रकार अपनी जाना बचाकर भाग पाने में सफल रहा और मुंह लटकाए अकबर के पास जा पहुंचा| रानी के वीरता भरे चर्चे सुनकर तो अकबर भी घबरा गया|
     रानी दुर्गावती से अकबर ने पराजय का स्वाद चखे अभी मात्र डेढ़ वर्ष ही बिता था कि भारत पर राज्य करने की उसकी इच्छा एक बार फिर बलवती हुई और इस इच्छा की पूर्ति से पूर्व उसने एक बार फिर उसे महिला मात्र मानते हुए रानी की वीरता के आंकलन में भूल की और एक बार फिर से अपने उस पराजित सेनापति  आसिफखान को ही फिर से रानी पर आक्रमण करने के लिए रवाना कर दिया| आसिफखान ने जाते ही तत्काल गोंडवाना राज्य पर पुन:हमला बोला दिया| इस बार मुग़ल सेना पहले से भी अधिक तैयारी करके आई तथा पूरा तोपखाना साथ लेकर आये थे| एक और से तोपें चल रहीं थीं तो दूसरी और दोनों हाथों से रानी की तलवारें चल रहीं थी| रानी की तलवारों के सामने तोपों की गति भी धीरे धीरे मंद पड़ती जा रही थीं और राणांगण पूरी तरह से मुगलों के मुंडों से भरने लगा था| सब और खून की धाराएं बह रहीं थीं| यहाँ तक कि रानी ने तोप चलाने वाले तोपचियों के सर भी काट दिए| इस बार भी आसिफखान रणभूमि से किसी प्रकार भाग कर अपना काला पराजित चेहरा लेकर अपने बादशाह अकबर के दरबार में जा खडा हुआ| 
    एक महिला से पराजिर्ट होने के कारण आसिफखान अपने आप को बड़ा अपमानित अनुभव कर रहा था| वह विरोध की अग्नि में जकल रहा था किन्तु रानी के सामने सीधे रूप से खड़े होने का वह अब साहस नहीं कर पा रहा था| मुग़ल तो होते ही कुटिल है| अत: अब उसने घोर कुटिलता का मार्ग अपनाते हुए लालच देकर रानी के कुछ प्रमुख सिपहसालारों को गुप्त रूप से अपने साथ मिला लिया|
    इस बार की विजय के कारण गोंडवाना की सेना खुलकर खुशी मनाना चाहती थी, जिसे रानी ने स्वीकार करते हुए स्वयं भी इस खुशियों के अवसर पर अपने सैनिकों के साथ खुशियाँ मनाने में व्यस्त हो गई| वह अपनी प्रजा को भी प्रसन्न करना चाहती थी, इस कारण प्रजा को भी इन खुशियों का भाग बनाया गया था| खुशियों के इस अवसर पर ही अवसर पाकर दुर्गावती के एक गद्दार सेनापति ने इसकी सूचना आसिफखान को देते हुए कहा कि यह रानी को हराने का उत्तम अवसर है और उस पर तत्काल आक्रमण करने की आवश्यकता है| अत: उसी सेनापति आसिफखान के नेतृत्व में अकवर की सेना ने अब तीसरी बार दुर्गावती के गोंडवाना पर आक्रमण कर दिया| 
     खुशियाँ मना रही रानी को इस आक्रमण ने संभलने और युद्ध की व्यवस्था करने का अवसर न दिया| जिस अवस्था में, जो सैनिक जहाँ था, वहीँ से ही इस आक्रमण का प्रतिरोध आरम्भ किया गया| राणीने अपने सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा की “ देश पर मर मिटने वाले वीरो! तैयार हो जाओ| आज तुम्हारी जन्म भूमि विपत्ति की सूचना पाकर क्रंदन कर रही है| उसकी स्वाधीनता की रक्षा करना तुम्हारा धर्म है| तुम दुशमन को दिखला दो कि जब तक एक भी राजपूत जीता रहेगा, तब तक गढ़मंडल पर मुगलों का शासन नहीं हो सकता| मैं जीते- जी गढ़मंडल में शत्रुओं को पैर नहीं रखने दूंगी| वीरो! चलो मेरे साथ गढ़मंडल की कीर्ति अमर करने! शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो अथवा रण यज्ञ में प्राणों की आहुति देकर अक्षय यश और दुर्लभ स्वर्ग सुख प्राप्त करो|”
     रानी का यह  उद्घोष सुनते ही राजपूत विरोंकी छातियाँ फड़क उठीं, आखोंसे चिन्गारियान्निकलाने लगीं| राणीने एक बार फिर कहा,” माना कि यवनों की शक्ति बर्बरता की सीमा पार कर चुकी है; आतत्तायीपन का नंगा नाच आरम्भ हो गया है| बाबर के वंशज ने विधवा रियासत पर हमला बोल दिया है| परन्तु जिस समय तुम लोग रण में कूद पड़ोगे, एक एक हिन्दू वीर सैंकड़ों यवानों को मार भगाएगा| यदि तुम सच्चे वीर हो और नि:संदेह तुम सच्चे वीर हो ही, तो तुम अपनी इस वीर माता की सहायता करो|” रानी ने इस बार सावधानी बरतते हुए सेना की दो टुकड़ियां बनाईं| एक का नेतृत्व उसका मात्र अठारह वर्षीय  पुत्र वीर नारायण कर रहा था और दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व रानी स्वयं कर रही थी| दोनों टुकडियां अलग अलग दिशाओं से शत्रु का बड़ी वीरता से प्रतिरोध करने लगीं| इस युद्ध में रानी का पुत्र नारायण बुरी तरह से घायल हो गया| 
     नारायण के घायल होने की सूचना रानी को दी गई और उन्हें बताया गया कि उनके पुत्र के अवस्था अत्यंत शोचनीय है और वह किसी समय भी देह त्याग कर सकता है| रानी को चाहिए कि वह तत्काल जाकर अपने सुपुत्र के अंतिम दर्शनकर ले| वह इस समय एक सुरक्षित स्थान पर लाया गया था| रानी कोई साधारण महिला नहीं थी| वीरता उसके रग रग में थी| वह स्वयं एक साध्वी के समान थी| उसने पुत्र वियोग से देश रक्षा को अधिक महत्व देते हए कहा कि एक राजा के लिए उसकी अपनी संतान ही नहीं पूरी प्रजा ही उसकी संतान होती है|  इस समय म,अं अपनी मातृभूमि का ऋण चुकाने में व्यस्त हूँ| मेरी प्रजा संकट में है, उसे बचाना है, जिस प्रकार नारायण मेरी संतान है, उस प्रकार ही इस युद्ध में लड़ रहे यह सब सैनिक भी मेरी ही संतान है, इन को रणभूमि में अकेला छोड़ कर मैं नारायण को देखने कैसे जा सकती हूँ?” इतना कुछ बोलते बोलते रानी ने तेजी से घोड़े की लगाम को खींचा और एक बार फिर घोडा सरपट भागने लगा और रानी के हाथों की तलवारे एक बार फिर से मुग़ल सेना को गाजर मूली की भाँति काटने लगी|
     इस प्रकार रानी ने चंडी का रूप धारणकर लिया और जिस ओर भी आगे बढती, उस और से ही मुग़ल सैनिकों में हाहाकार मच जाती| शत्रु मैदान छोड़ कर भागने लगते किन्तु विधाता को इस बार कुछ और ही मंजूर था| इस कारण ईश्वर की व्यवस्था को उलाहना तो नहीं दे सकते किन्तु शीघ्र ही गोंडवाना का दुर्भाग्य सामने आ गया क्योंकि युद्ध भूमि में किसी एक सैनिक का तीर आकर रानी की आँख में जा लगा| अभी वह तीर के इस प्रहार से संभल भी नहीं पाई थी और आँख में घसे इस तीर को निकालने का प्रयास कर रही थी कि  एक और तीर उसकी गर्दन में आ लगा| 
     अब रानी दुर्गावाती को अपना अंतिम समय दिखाई देने लगा और वह यह भी जानती थी कि मुग़ल सेना और उसके शासक जब किसी महिला को जीवित पकड़ लेते हैं तो उसके साथ वह कितना घिनौना व्यवहार करते हैं| इस प्रकार का विचार आते ही रानी ने अपने कमर से एक छुरा खींचा और बिना कुछ भी समय गँवाए यह छुरा अपनी छाती में घोंप लिया| यह देख कर मुगलों ने दांतों तले  अंगुलियाँ दबा लीं| वह चकित थे कि इस देश की महिलाएं कितनी वीर और आत्म सम्मान रखने वाली होती हैं| 
     रानी दुर्गावती के पास कितना पराक्रम था, कितना आत्म बल था, कितना सतीत्व था, इस का सही आंकलन तो हमारे इतिहासकार भी नहीं कर सके| इस प्रकार रानी ने अवगाहन करके स्वयं को पवित्र किया| वह पराजित होकर भी विजयी हुई| चाहे अकबर ने गढ़मंडल पर धोखे से अपना अधिपत्य जमा लिया किन्तु उसकी जो हानि हुई उसे वह धन से नहीं भर सकता था| हाँ! गढ़मंडल की आकुत धन संपदा से उसका खजाना अवश्य भर गया किन्तु वह दुर्गावती जैसे रत्न को पाने में असमर्थ रहा|
डा. अशोक आर्य 
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