जिस प्रकार कमजोर नींव पर ऊँचा

जिस प्रकार कमजोर नींव पर ऊँचा मकान खड़ा नहीं किया जा सकता ठीक इसी प्रकार यदि विचारों में उदासीनता, नैराश्य अथवा कमजोरी हो तो जीवन की गति कभी भी उच्चता की ओर नहीं हो सकती।

🌹 निराशा का अर्थ ही लड़ने से पहले हार स्वीकार कर लेना है और एक बात याद रख लेना निराश जीवन में कभी भी हास (प्रसन्नता) का प्रवेश नहीं हो सकता और जिस जीवन में हास ही नहीं उसका विकास कैसे संभव हो सकता है ?

🌹 जीवन रूपी महल में उदासीनता और नैराश्य ऐसी दो कच्ची ईटें हैं, जो कभी भी इसे ढहने अथवा तबाह करने के लिए पर्याप्त हैं। अतः आत्मबल रूपी ईट जितनी मजबूत होगी जीवन रूपी महल को भी उतनी ही भव्यता व उच्चता प्रदान की जा सकेगी।
         ✍🏽 आचार्य धर्मराजIntercast Marriage ,The Vivah Sanskar will be solemnised,16sanskaro ke liye smpark kre 9977987777

परमात्मा ने यह चित्र-विचित्र संसार किसके लिए बनाया है

ओ३म्
“परमात्मा ने यह चित्र-विचित्र संसार किसके लिए बनाया है?”
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हम मनुष्य हैं। परमात्मा ने हमें जन्म दिया है और हमें संसार का ज्ञान कराने के लिये पांच ज्ञान इन्द्रियां भी दी हैं जिनमें से एक नेत्र इन्द्रिय है। नेत्र से हम इस संसार को देखते हैं। यह संसार अनेक प्रकार के चित्र-विचित्रों से युक्त है। ऐसे ऐसे भव्य एवं सुन्दर चित्र संसार में हैं जिसे देखकर मनुष्य का मन मुग्ध हो जाता है और परमात्मा की सामथ्र्य को अनुभव कर उसके स्वरूप के चिन्तन में खो जाता है। यदि परमात्मा इस संसार को न बनाता तो हम व हमारे समान अनन्त संख्या में जीव ईश्वर की इस अद्भुद सामथ्र्य को न जान पाते। परमात्मा ने अपनी अनन्त सामर्थ्य एवं सर्वशक्तिमान होने के कारण इस इस विशाल सीमातीत ब्रह्माण्ड को बनाया है। इस ब्रह्माण्ड का न कोई ओर है न छोर। वैज्ञानिक भी इस संसार की रचना को देखकर विस्मिृत वा आश्चार्यान्वित होते हैं। भक्त हृदय के मनुष्य ईश्वर की इस महान सामथ्र्य को देखकर उसके प्रति भक्ति में भर जाते हैं और स्तुति तथा प्रार्थना वचनों से उसके यश एवं कीर्ति के गीत गाते हैं। परमात्मा की इस अद्भुत विचित्र रचना को देखकर सभी मुग्ध होकर कुछ इस प्रकार से अपने विचार व्यक्त करते हैं ‘तेरा पार किसी ने भी पाया नहीं, दृष्टि किसी की भी आया नहीं, तेरा पार किसी ने भी पाया नहीं।’ 

परमात्मा यदि इस सृष्टि की रचना न करता और जीवों को मनुष्य आदि भिन्न भिन्न योनियों में उनके पूर्वजन्मों के कर्मानुसार जन्म न देता तो जीवों को ईश्वर के सत्यस्वरूप व उसकी सामथ्र्य का ज्ञान ही न होता है। अपने स्वरूप का ज्ञान कराने के लिये परमात्मा ने चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान भी सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को दिया था। वेदों से ही ईश्वर व जीवात्मा के सत्यस्वरूप सहित इस सृष्टि व इसके अनादि उपादान कारण प्रकृति को जाना जाता है। हमारी यह सृष्टि प्रवाह से अनादि है अर्थात् यह हमेशा से है। कभी इसका आरम्भ नहीं हुआ। अनादि काल से सृष्टि के अनादि उपादान कारण प्रकृति से परमात्मा इस सृष्टि की रचना करते हैं और इसे रचना कर इसका पालन तथा प्रलय करते आ रहे हैं। यह क्रम अनादि काल से चला आ रहा है और अनन्त काल तक इसी प्रकार चलता रहेगा। इस रहस्य को जो मनुष्य जान लेता है वह ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना को अपना कर्तव्य जानकर अन्य कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए ईश्वर के ध्यान, चिन्तन व उपासना आदि में ही अपना जीवन व्यतीत कर दुःखों की निवृत्ति व आनन्दमय मोक्ष को प्राप्त करता है। प्राचीन काल से हमारे देश में वेदों के ज्ञानी, पवित्र बुद्धि के धनी, ईश्वर का साक्षात्कार करने वाले ऋषि, मुनि व योगी देश व जनता की नाना प्रकार से सेवा करते हुए ईश्वर के प्रति उसकी उपासना आदि के अपने कर्तव्यों का निरन्तर सेवन करते आ रहे हैं। ईश्वर के ज्ञान वेदों का अध्ययन कर ही मनुष्य अविद्या से मुक्त होता है अन्यथा वह अविद्या में फंसकर परमात्मा से प्राप्त अपने मानव जीवन को व्यर्थ कर देता है जिसका परिणाम उसे जन्म जन्मान्तरों में दुःख भोगकर चुकाना पड़ता है। 

परमात्मा ने यह संसार क्यों व किसके लिये बनाया है? यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से मनुष्य के मन में उत्पन्न हो सकता है? इसका उत्तर भी वेद एवं वैदिक साहित्य के प्रणेता ऋषि अपने ज्ञान व विवेक के आधार पर देते हैं। वह बताते हैं कि संसार में तीन सत्ताओं यथा ईश्वर, जीव व प्रकृति का अस्तित्व है। यह तीनों पदार्थ व सत्तायें अनादि व नित्य हैं। इनकी उत्पत्ति व रचना कभी किसी से नहीं हुई है। यह तीनों स्वयंभू सत्तायें हैं। इन सत्ताओं का रचयिता कोई नहीं है। यह तीनों अनादि होने के साथ अमर व अविनाशी भी है। इसी कारण हम जीवों का अनादि काल से अस्तित्व है और अनन्त काल तक रहेगा। जैसे इस जन्म में हमारी आत्मा को कर्म करने व उनके फल भोगने के लिये मानव शरीर मिला है उसी प्रकार से सभी अनन्त जीवों को उनके कर्मानुसार अन्य मानवेतर पशु व पक्षी आदि के देह परमात्मा से उनके प्रत्येक जन्म में मृत्यु होने के बाद मिलते हैं। मनुष्यों को परमात्मा ने दो हाथ कर्म करने के लिये दिये हैं। इसके साथ ही उसके पास ज्ञानार्जन में समर्थ बुद्धि भी सुलभ है। इससे सोच विचार कर सत्यासत्य की परीक्षा कर वह मनुष्य के करने योग्य कर्मों का निर्धारण कर उनको करके उनके फलों को प्राप्त होता है। मनुष्य की सहायता के लिये ही परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में चार वेदों का ज्ञान दिया था। आज भी यह ज्ञान प्रासंगिक एवं सार्थक है। वर्तमान में भी वेदों से हमें ईश्वर, जीव व प्रकृति के सत्यस्वरूप व गुण, कर्म व स्वभावों का ज्ञान प्राप्त होता है। मनुष्य के अपने तथा अन्यों के प्रति क्या कर्तव्य हैं, इसका ज्ञान भी वेद व वेदों के व्याख्याकार सरल शब्दों में कराते हैं। ऋषि दयानन्द ने मनुष्यों की इसी आवश्यकता को समझ कर अपने दयालु स्वभाव से मनुष्यों पर दया करके उन्हें वेदों की समस्त शिक्षाओं से परिचित कराने के लिये सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ की रचना की और वह समस्त ज्ञान हमें प्रदान कराया है जो उनके समय में जनसामान्य व विद्वानों को भी उपलब्ध नहीं होता था। सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर मनुष्य की प्रायः सभी शंकाओं का समाधान हो जाता है। यदि कोई शंका रहती भी है तो उसका ज्ञान मनुष्य सत्यार्थप्रकाश सहित उपनिषद, दर्शन, विशुद्ध मनुस्मृति आदि वैदिक साहित्य के विविध ग्रन्थों का अध्ययन व मनन कर प्राप्त कर सकता है। वैदिक ज्ञान मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पत्ति व पूंजी है। धन व सम्पत्ति से मनुष्य केवल शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है परन्तु ज्ञान से आत्मा की भूख की तृप्ति होकर आनन्द की प्राप्ति होती है। इस दृष्टि से मनुष्य के लिए धन सम्पत्ति की तुलना में ज्ञान का महत्व अधिक है। यही कारण था कि हमारे प्राचीन पूर्वज व ऋषि महर्षि त्याग व एषणाओं से मुक्त जीवन व्यतीत करते थे और अपना समय अपने कर्तव्यों के पालन, परोपकार के कार्यों सहित ईश्वर के अध्ययन, चर्चा, चिन्तन, मनन, उपासना व यज्ञ आदि कर्मों को करने में किया करते हैं। वैदिक जीवन ही मनुष्य के लिए सर्वाधिक श्रेयस्कर एवं आचरणीय है। 

परमात्मा का बनाया हुआ यह संसार नेत्र दृष्टि से देखने में आता है। यह सुन्दरता से युक्त एवं दैवीय गुणों से युक्त है। परमात्मा का बनाया सूर्य हमें प्रकाश, गर्मी देता है। सूर्य के प्रकाश के कारण ही हम इस संसार को देखने में समर्थ होते हैं। परमात्मा की बनाई वायु हमारे जीवन की श्वांस प्रणाली को संचालित कर रक्षा करती है। हम संसार में जो भोजन पकाते हैं उसमें भी अग्नि की आवश्यकता होती है। इसे भी परमात्मा ने सृष्टि के उपादान कारण प्रकृति से ही रचा है। यह अग्नि भी सभी मनुष्यों व प्राणियों के लिये अत्यन्त हितकर है। अग्नि में प्रकाश का दिव्य गुण होता है। किसान द्वारा उत्पन्न अन्न भी सूर्य के प्रकाश व ताप से ही पकते हैं। वेदों में ईश्वर के अन्य नामों में अग्नि को भी ईश्वर का नाम बताया है। इसका कारण यह है कि ईश्वर अग्नि के समान ही प्रकाशस्वरूप है। जिस प्रकार अग्नि सदैव ऊपर को जाती है उसी प्रकार ईश्वर भी हमें ऊध्र्वगामी बनाकर ऊपर की ओर ले जाता तथा उन्नति करने के अवसर देता ही रहता है। ऐसा हमारा परमात्मा अनादि काल से सब जीवों के प्रति कर रहा है। आज भी हमें अपने दुःखों की निवृत्ति के लिये अवसर सुलभ है जिन्होंने ईश्वर ने ही सुलभ कराया है। अतः प्रकाश व ज्ञानस्वरूप होने से ईश्वर अग्नि हैं। हमें ईश्वर के इस अग्निस्वरूप का ध्यान कर भी उसको प्राप्त होना चाहिये व उससे ज्ञान व प्रकाश की प्रार्थना करनी चाहिये। 

सृष्टि के सभी पदार्थ परमात्मा ने मनुष्यों व अन्य जीवधारियों के सुख व उपयोग के लिये ही बनाये हैं। यदि ईश्वर न होता तो सृष्टि और इसमें उपलब्ध जीवों को सुख देने वाले पदार्थों को कौन बनाता? अनेक मनुष्य तो ऐसे भी होते हैं जो कृपण मनुष्य को उसके द्वारा याचना करने पर भिक्षा तक नहीं देते। ईश्वर ही एकमात्र ऐसी सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान सत्ता है जो प्रत्येक जीव को माता, पिता तथा आचार्य आदि से भी अधिक प्रेम करती व स्नेह प्रदान करती है। ईश्वर की भक्ति व आज्ञा पालन न करने पर भी हमारा वह परमात्मा हमसे कुपित नहीं होता और उस स्थिति में भी हमें हमारे कर्मों का सुख व दुःख रूपी यथायोग्य उचित फल देकर हमारे सुधार करने में तत्पर रहता है। परमात्मा के समान जीवों का अन्य कोई सुहृद मित्र, बन्धु, सखा व हितैषी नहीं है। माता-पिता भी अपनी सन्तानांे से अनेक प्रकार की अपेक्षायें रखते हैं परन्तु परमात्मा तो हम से बिना किसी अपेक्षा के ही हमारे हितों की पूर्ति के लिये अनादि काल से अपने उपकारों की वर्षा हम पर किये जा रहा है। ईश्वर के उपकारों पर बहुत कहा जा सकता है। अनेक विद्वानों इस विषय पर अपने ग्रन्थों में बहुत लिखा है। वेदभाष्य पढ़ते हुए भी हमें ईश्वर की मनुष्यों व जीवों पर कृपा के अनेक प्रसंग व उदाहरण मिलते हैं। उन्हें पढ़कर हमारी ईश्वर के अध्ययन व उपासना में प्रवृत्ति सुदृढ़ होती है। 

परमात्मा ने यह विशाल एवं भव्य सृष्टि जीवात्माओं के सुख व कर्म करने के लिये बनाई है। जीवात्मा को मनुष्य का जन्म मिले या किसी अन्य प्राणी योनि में, सभी योनियों में जीवात्माओं को अनेक प्रकार के दुःख भोगने पड़ते हैं। मनुष्य योनि में सुख अधिक व दुःख कम होते हैं। इस योनि में भी जन्म लेने व मृत्यु के समय दुःख तो साधु व महात्माओं को भी होता ही है। जीवनकाल में भी मनुष्य को आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक दुःख होते ही रहते हैं। अतः परमात्मा ने कृपा करके जीवों को सृष्टि के द्वारा सुख प्राप्त करते हुए जन्म व मरण से मुक्त होने के लिये मोक्ष के आनन्द का सुख प्रदान करने की व्यवस्था भी की है। मोक्ष में जीवात्मा को किसी प्रकार का लेश मात्र भी दुःख नहीं होता। मोक्ष में जीवात्मा ईश्वर के आनन्दमय साहचर्य व सान्निध्य में रहता है। वह मुक्त-जीव लोक-लोकान्तरों में भ्रमण करता तथा मोक्ष में ईश्वर से प्राप्त सामथ्र्य से मुक्त जीवों से मिलता व उनसे बातचीत करता है। मुक्त जीव मोक्ष में आनन्द का भोग करता है तथा दुःखों से पृथक रहता है। इसी प्रकार सांसारिक माता-पिता भी अपनी सन्तानों को सुखी करने के अनेक प्रयत्न करते हैं। सांसारिक माता-पिता की सामथ्र्य सीमित होती है इसलिये वह जितना चाहते हैं वह सब कुछ नहीं कर पाते। परमात्मा ही हमारा वास्तविक माता व पिता है जो हमें मोक्ष सुख देना चाहता है। इसके लिये हमें भी वेदाध्ययन एवं ऋषियों के ग्रन्थों सहित सत्यार्थप्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ग्रन्थों का अध्ययन कर तथा मोक्ष प्राप्ति के साधनों व उपायों को करके मोक्ष को प्राप्त करने के लिये पुरुषार्थ करना चाहिये। मोक्ष की प्राप्ति होने तक जीवात्मा जन्म व मरण लेता हुआ भटकता रहता है। 

परमात्मा ने यह संसार अपनी अनादि प्रजा जीवों को सुख देने सहित मोक्ष प्रदान करने व पुरुषार्थ करने के लिये बनाया है। इसे जानकर व अपने जीवन को वैदिक साधनाओं से युक्त कर हम अपने अपने मनुष्य जीवन को सुखी व मोक्षगामी बना सकते हैं। यही हमारे जीवन का लक्ष्य है। हमें इस मार्ग पर हम सबको आगे बढ़ना चाहिये। ओ३म् शम्। 

-मनमोहन कुमार आर्य

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ईश्वर की उपासना से मनुष्य को क्या लाभ प्राप्त होता है

ओ३म्
‘ईश्वर की उपासना से मनुष्य को क्या लाभ प्राप्त होता है?’
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मनुष्य कोई भी काम करता है तो वह उसमें प्रायः अपनी हानि व लाभ को अवश्य देखता है। यदि किसी काम में उसे लाभ नहीं दिखता तो वह उसे करना उचित नहीं समझता। ईश्वर की उपासना भी इस कारण से ही नहीं की जाती कि लोगों को ईश्वर का सत्यस्वरूप व उपासना से होने वाले लाभों का ज्ञान नहीं है। यदि सब मनुष्यों को ईश्वर का सत्यस्वरूप एवं गुण, कर्म व स्वभावों का ज्ञान हो जाये तो निश्चय ही उनकी ईश्वर से मेल व मित्रता करने में प्रीति होगी जिसका परिणाम मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति के रूप में सामने आता है। ऋषि दयानन्द वेदों के विद्वान और परमात्मा को प्राप्त सिद्ध योगी व ऋषि थे। उन्होंने अपने ज्ञान व अनुभव के आधार पर नियम दिया है कि संसार का उपकार करना उनके द्वारा स्थापित आर्यसमाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात् सबकी शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति करना। जिस मनुष्य का शरीर पूर्ण स्वस्थ, निरोग व बलवान है, जो आत्म ज्ञान से युक्त है व तदवत् आचरण करता है तथा जो सामाजिक जीवन व्यतीत करते हुए समाज सुधार व उन्नति के कार्य करता है, वह मनुष्य सर्वांगीण उन्नति को प्राप्त मनुष्य कहा जा सकता है। ऐसा मनुष्य ही ईश्वर की उपासना करने सहित ईश्वर द्वारा सृष्टि के आदि में प्रदत्त चार वेदों का अध्ययन करने से बनता है। वेद प्रचार पर विचार करते हैं तो वह मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति में अमोघ साधन प्रतीत होता है। जिस मनुष्य ने वेदों का सत्य तात्पर्य जान लिया और उसके अनुसार आचरण व व्यवहार करता है, वह मनुष्य ज्ञान व बल से युक्त होकर अपना व समाज का कल्याण करता है। यह लाभ उपासना व वेदों के स्वाध्याय सहित ज्ञान के अनुरूप आचरण करने से प्राप्त होते हैं। 

ईश्वर की उपासना से मनुष्य की आत्मा का ज्ञान बढ़ता है। इसका कारण यह है कि ईश्वर ज्ञानवान वा सर्वज्ञ सत्ता है। वह सर्वव्यापक एवं सर्वान्तर्यामी भी है। हमारी सूक्ष्म आत्मा से भी अत्यन्त सूक्ष्म व आत्मा के भीतर भी अखण्ड व एकरस होकर परमात्मा विद्यमान है। वह आत्मा की भावनाओं को जानता है। हम जो विचार करते हैं वह भी हमारी आत्मा में विद्यमान परमात्मा अपने अन्तर्यामी स्वरूप से जानता है। ईश्वर सर्वशक्तिमान भी है। उसी ने उपादान कारण त्रिगुणात्मक प्रकृति से इस वृहद ब्रह्माण्ड को बनाया है व वही इसका संचालन व पालन कर रहा है। वह हमारी हमारे मन व आत्मा के विचारों को भी जानता है तथा उन्हें प्रेरणा करने की सामर्थ्य रखता है। इसी कारण से गायत्री महामन्त्र में ईश्वर से मनुष्य की बुद्धि को शुद्ध करने व उसे सन्मार्गगामी बनाने की प्रार्थना की जाती है। उपासना में मनुष्य ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना भी साथ-साथ करता है। स्तुति करने से परमात्मा के गुण, कर्म व स्वभाव का ज्ञान व परमात्मा में प्रीति होने से उससे मित्रता व मेल हो जाता है। प्रार्थना करने से मनुष्य निरभिमानी बनता है। ईश्वर की प्रार्थना से मनुष्य में अहंकार व अभिमान दूर हो जाता है। जिस प्रकार एक मित्र दूसरे मित्र का हित व रक्षा करता है, उपासना व ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना से परमात्मा से मित्रता हो जाने पर हमें ईश्वर से रक्षा व अपनी हित सिद्धि के सभी लाभ प्राप्त होते हैं। 

परमात्मा सर्वज्ञ एवं सब गुणों का अजस्र स्रोत है। मनुष्य की आत्मा एकदेशी व ससीम होती है। यह अल्पज्ञ होती है। उसे अपनी ज्ञान वृद्धि के लिए एक सर्वज्ञ सत्ता की आवश्यकता होती है। वह सत्ता संसार में एकमात्र ईश्वर ही है। अतः ईश्वर की उपासना से ईश्वर की संगति होती है। इस संगति से मनुष्य की आत्मा के दोष दूर होते हैं और उनका स्थान ईश्वर के सद्गुण लेते हैं। उपासना करने से आत्मा के दुर्गुण व दुव्र्यसन दूर होते जाते हैं और ईश्वर के श्रेष्ठ व उत्तम गुण आत्मा में प्रविष्ट होते जाते हैं। इससे मनुष्य श्रेष्ठ व उत्तम गुणों से युक्त ज्ञानवान व बलवान बनता है। यह लाभ कोई छोटा लाभ नहीं है। अतः सभी मनुष्यों को ईश्वर के सत्यस्वरूप व सत्य गुणों आदि को जानकर उसकी नित्य प्रति, दिन में दो बार, प्रातः व सायं समय में उपासना अवश्य करनी चाहिये। इससे हमारे सभी दुर्गुण व बुराईयां दूर हो जायेंगी और हम एक गुणवान, पुरुषार्थी तथा ईश्वर के सच्चे उपासक व सद्ज्ञान से युक्त मनुष्य बन सकेंगे।

मनुष्य जब ईश्वर की उपासना करता है तो उपासना के एक अंग स्वाध्याय पर भी ध्यान देता है। इससे मनुष्य को ईश्वर व आत्मा सहित संसार के सब सत्य रहस्यों का ज्ञान हो जाता है। इस ज्ञान का प्रभाव मनुष्य के आचरण पर पड़ता है। वह ईश्वर की उपासना सहित मनुष्य, समाज व देश के लिये हितकारी यज्ञीय कर्मों को करता है। इससे मनुष्य पुरुषार्थी बनकर देश व समाज का उपकार करता है। वेद मनुष्य को सदाचार की शिक्षा देते हैं। हमारे सभी ऋषियों व योगियों सहित वैदिक विद्वानों के जीवन सदाचार से युक्त आदर्श जीवन हुआ करते थे। सदाचार से युक्त जीवन के अनेक लाभ होते हैं। जितना सुख व शान्ति एक सदाचारी मनुष्य के जीवन में होती है, उतने सुख व सन्तोष से युक्त जीवन का अनुमान ईश्वर उपासना व ईश्वर के सत्य ज्ञान से रहित मनुष्य के जीवन में नहीं होता है। ईश्वर ज्ञान व उपासना से रहित जो मनुष्य भौतिक इन्द्रियों के सुख का जीवन व्यतीत करता है, वह जीवन परिणाम में दुःखदायी ही होता है। इन्द्रिय भोग से मनुष्य का शरीर निर्बल हो जाता है जिससे रोग होकर मनुष्य को दुःख होते हैं। अतः एक उपासक का जीवन ही ऐसा जीवन होता है जिसमें रोग नहीं होते अथवा अत्यन्त न्यून मात्रा में होते हैं। उपासक के जीवन में सुख व सन्तोष की असीम मात्रा होती है या उसे उत्पन्न किया जा सकता है जो अन्यथा नहीं होती।   

ईश्वर की उपासना व वेदों के स्वाध्याय से मनुष्य को सत्कर्मों को करने की प्रेरणा मिलती है। सत्कर्मों में परोपकार व दान आदि भी सम्मिलित होते हैं। जीवनयापन के लिये मनुष्य व्यवसाय तो करता ही है परन्तु उपासना से युक्त मनुष्य का व्यवसाय सदाचार व सदाचारण से युक्त होता है। वेदों में कहा गया है कि अविद्या व सद्कर्मों से ही मनुष्य मृत्यु से पार जाता है। वेदों में यह भी कहा गया है कि ईश्वर को जानकर मनुष्य मृत्यु से पार जाता है। यह दोनों बातें परस्पर समान है। इसका अर्थ है कि सद्ज्ञान व ज्ञानयुक्त आचरण व व्यवहार दोनों को साथ साथ करने से ही मनुष्य मृत्यु से पार जाता और मोक्ष को प्राप्त होता है। अतः उपासना और सद्कर्मों से मनुष्य को मृत्यु पर विजय प्राप्त होती है तथा अमृतमय मोक्ष की प्राप्ती भी होती है। उपासना से होने वाले इस लाभ का भी महत्व संसार में सबसे बढ़कर है। अतः सभी को उपासना करते हुए ईश्वर से प्राप्त प्रेरणा के अनुसार सत्कर्मों वा परोपकार एवं दान आदि यज्ञीय कार्यों को करते रहना चाहिये। 

उपासना व स्वाध्याय से ईश्वर, जीवात्मा तथा सृष्टि के ज्ञान सहित मनुष्य के कर्तव्यों का बोध होता है। इससे मनुष्य असत्य मार्ग का त्याग कर दुःखों से बचता है तथा सन्मार्ग पर चलकर मनुष्य जीवन के लक्ष्य मुक्ति के लक्ष्य की ओर बढ़ता व प्राप्त होता है। उपासना से मनुष्य को आनन्द की प्राप्ति होती है जो अन्य किसी उपाय व साधन से नहीं होती। ईश्वर आनन्दस्वरूप है। उपासना में मनुष्य का आत्मा परमात्मा से संयुक्त हो जाती है। इससे परमात्मा का आनन्द जीवात्मा को अनुभव होता है। यदि उपासना नहीं करेंगे तो परमात्मा के आनन्द को न तो जान पायेंगे और न अनुभव ही कर पायेंगे। परमात्मा से हमें पुरुषार्थी बनने की प्रेरणा भी मिलती है। परमात्मा कभी विश्राम नहीं करते। वह संसार के कल्याण के लिये प्रत्येक पल व क्षण कार्य करते हैं। उन्होंने सारे ब्रह्माण्ड को धारण कर रखा है। संसार में सभी नियमों का पालन होता हुआ देखने को मिलता है। सूर्य समय पर उदय व अस्त होता है। समय पर सभी ऋतुएं आती व जाती हैं। मनुष्य जन्म व मरण तथा जीवन के सुख दुःख भी ईश्वर की व्यवस्था के अनुसार मनुष्यों को प्राप्त हो रहे हैं। अतः ईश्वर के सतत क्रियाशील, गतिशील व पुरुषार्थ से युक्त जीवन को देखकर उपासक को भी सत्कर्मों व परोपकार की प्रेरणा मिलती है। 

ईश्वर की उपासना से मनुष्य पाप कर्मों को करने से बचता है। उपासक पाप नहीं करता। यदि करता है तो ईश्वर उसे पाप करने से बचाता है। यदि कोई मनुष्य उपासना करने के साथ पाप कर्मों का व्यवहार भी करता है तो उसकी उपासना में खोट व कमी होती है। संसार में ऐसे भी मत व सम्प्रदाय हैं जो पुण्य व पाप कर्मों में अन्तर ही नहीं कर पाते। वह मांसाहार रूपी पाप कर्म का विरोध नहीं करते।  वह दूसरे निर्दोष प्राणियों व मनुष्यों को भी अकारण कष्ट व दुःख देते हैं। ऐसे लोग धार्मिक व उपासक कदापि नहीं हो सकते। वैदिक आधार पर उपासना करने से मनुष्य पापों से सर्वथा मुक्त हो जाता है। पाप से मुक्त तथा धर्म कर्मों को करने से मनुष्य की प्रवृत्ति सुख प्राप्ति व मोक्ष प्राप्ति में हो जाती है। मनुष्य मोक्ष मार्ग पर भी आगे बढ़ता है। उपासना व धर्म करने से मनुष्य का परजन्म व पुनर्जन्म तो निश्चय ही सुधरता है। जो मनुष्य शुद्ध मन व हृदय से परमात्मा की उपासना करेगा वह निश्चय ही पुरुषार्थी होगा, सद्कर्मों को करेगा, पुण्य कर्मों का संचय करेगा जिससे उसका आगामी व भावी जन्म श्रेष्ठ व उत्तम मनुष्य योनि सहित धन धान्य व सुखों से युक्त वातारण में होगा।  इन सब कामों को करते हुए उपासक व साधक को आवश्यकतानुसार धन भी प्राप्त होता है जिसका त्यागपूर्वक भोग करते हुए उपासक उसको दूसरों को दान देकर उनकी सहायता व उन्नति में सहयोगी भी बनता है। 

ईश्वर की उपासना करने से मनुष्य को लाभ ही लाभ हैं। मनुष्य की सभी सद्इच्छायें व शुभ कामनायें ईश्वर की उपासना से पूर्ण होती है। मनुष्य को उपासना व साधना करने के साथ वेद एवं सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ सहित ऋषि दयानन्द के जीवन चरित का अध्ययन भी करना चाहिये। इससे उपासना में सफलता सहित मनुष्य को शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति के अनेक लाभ प्राप्त होंगे। ओ३म् शम्। 

-मनमोहन कुमार आर्य

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 महात्मागाँधी को अहिंसा वादी कहना बहुत बड़ी भूल है

 महात्मागाँधी को अहिंसा वादी कहना बहुत बड़ी भूल है ||

आज सम्पूर्ण देश-विदेश में 2 अक्तूबर को गाँधी जयंती के रूप में मना रहे है लोग, विशेष कर भारत के राजधानी दिल्ली के राज घाट में ना जाने सर्वधर्म सभा रखा गया होगाऔर प्रायः वर्षों की तरह इस वर्ष भी सभी मजहब के मानने वाले अपनी अपनी मजहबी ग्रंथों का पाठ करते हैं अब तक यही होता आया है |

इसपर मैं पहले भी लिख चूका हूँ वीडियो बनाकर भी आप लोगों को दे चूका हूँ आज कुछ नई बातों को आप लोगों के सामने रखने जा रहा हूँ इसे ध्यान से पढ़ें इसे पढ़कर सत्य और असत्य का निर्णय लें |

गाँधी जी तथा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में दो महान नेता माने जाते है | सुभाष ने आई.सी.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण करके अपने भावी जीवन की योजना के लिए भारत आते ही सीधे गाँधी जी से बम्बई के मणि भवन में 16 जुलाई 1921 को भेंट की | इस समय गाँधी जी की आयु 52 वर्ष थी और सुभाष की आयु 24 वर्ष के थे |

सुभाष ने गाँधी जी से तीन प्रश्न किए | पहला- गाँधी जी! आपका कहना है की असहयोग आन्दोलन का अंतिम कार्यक्रम यह है कि देश की जनता अंग्रेज सरकार को टैक्स न दे | तो आप यह बताएं की टैक्स न देने के बाद क्या होगा ?

दूसरा- आपने घोषणा की है कि एक वर्ष में स्वराज प्राप्त कर लेंगे | इस घोषणा का क्या आधार है ? हम कैसे माने की एक वर्ष में हमें राज्य देकर अंग्रेज चले जायेंगे ?

तीसरा – क्या टैक्स ना देने से अंग्रेज भारत से चले जायेंगे ?

सुभाष के इन प्रश्नों से गाँधी जी को बहुत जोर का धक्का लगा, मानो गाँधी का पसीना छुट गया |

एक भारी टकराव तब हुवा जब सुभाष चन्द्र बोस ने डोमिनियन स्टेट की जगह पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव रखा |

1928 के कांग्रेस अधिवेशन में सुभाष ने जब पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव रखा तो गाँधी जी अपने साथियों के साथ सुभाष चन्द्र बोस का विरोध किया | इसी समय गाँधी जी ने कांग्रेस छोड़ने की धमकी दी थी | पता नहीं कांग्रेसी गाँधी को क्या समझते थे, और आज के प्रधानमंत्री गाँधी जी को क्या समझते हैं ?

गाँधी और सुभाष का टकराव उसदिन हुवा जब 1931 कराची अधिवेशन में, भगत सिंह, राज गुरु, और सुखदेव की फांसी पर गाँधी जी ने सबसे अलग रूप अपनाया था, सभी लोग इन तीनों की वीरता की प्रशंसा कर रहे थे, किन्तु गाँधी ने कहा था की यदि हत्यारे लोगों की प्रशंसा की जायेगी तो हत्यारे का मनोबल बढेगा | इन बातों से यह साफ पता चला की गाँधी के नज़र में यह तीनों क्रांतिकारी नहीं किन्तु हत्यारे थे | भारत वासियों को यह पता होना चाहिए की जिन क्रांतिकारियों ने अपना स्वर्वस्य त्याग किया सिर्फ और सिर्फ भारत माता को अंग्रेजों से आज़ादी दिलाकर भारत को मुक्त कराना था जिस कारण उन्होने प्राणों की बाजी लगा दी गाँधी ने नज़र में वह लोग हत्यारे थे | इससे गाँधी की मानसिकता का पता लगा लेना चाहिए |

सुभाष ने दूसरी बार अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव दिया तो गाँधी व्यथित हो गए और अपने आप को संभल नही पाए, और निश्चय कर लिया कि किसी भी कीमत पर सुभाष को कांग्रेस का अध्यक्ष नही बनने दूंगा |

तो सुभाष ने आचार्यनरेंद्र जी के नाम का प्रस्ताव दिया परन्तु गाँधी ने नहीं माना, और अपना प्रतिनिधि पट्टाभि सीतारमैया को खड़ा किया, जो की बुरी तरह उनकी हार हुई | अब यह अहिंसा के पुजारी गाँधी बोखला गये और कहदिया सीता रमैया की हार मेरी हार है अतः सुभाष से त्याग पत्र लिया गया, इस पर और 13 सदस्यों ने भी त्याग पत्र दिया था |  गाँधी ने बल्लभ पंत को सुभाष से कहने को भेजा की आप कोई भी योजना बनाये तो गाँधी जी से अवश्य सलाह लें |

ठीक इसी प्रकार का टकराव मौलाना अबुल कलामआजाद से भी रहा, गाँधी का परिचय मौलाना अबुलकलाम से 1920 में हकीमअजमल खान के घर पर हुवा | यहाँ लोकमान्य तिलक और अली भाई बंधू भी बैठे थे | गाँधी जी की अहिसा के निति से वह असंतुष्ट रहते थे | गाँधी अंग्रेजों को बिना शर्त के सहायता देने के पक्ष में थे, जब की सुभाष की तरह मौलाना आजाद भी सुभाष के पक्ष में अंग्रेजों को सहायता के विरोध में थे |

मौलाना आजाद 1940 से 1946 तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, किन्तु मुस्लिम लीग के लोग उनकी विचारों में मेल नहीं रखते थे | और ना मुस्लिम लीग का कोई सहयोग अबुलकलाम को मिला, और ना तो जिन्ना से मौलाना कलाम सहमत थे |

यहाँ तक की गाँधी जी का जिन्ना से बार बार मिलना यह भी अबुलकलाम आजाद को पसंद नहीं था, जिसका नतीजा आज सामने है | गाँधी द्वारा मुहम्मद अली जिन्ना को कायदे आजम कहने पर मौलाना कलाम खफा भी हो गये थे | मौलाना आजाद भारत विभाजन के पक्ष में नहीं थे आज़ाद की लिखी पुस्तक इण्डिया विन्स फ्रीडम के पृष्ट 186 औए 187 को पढने पर पता लगता है |

इन सब बातों से पाठक समझ गये होंगे की गाँधी जी एक देशद्रोही मुस्लमान जिन्ना को कायदे आजम की पदवी दे रहे है उसके घर जाकर तलवे चाट रहे है | दूसरी तरफ एक देश भक्त युवक, वीर- त्यागी, तपस्वी और भारत माता की आजादी और अखंडता कायम रखने के लिए पूर्ण समर्पित सुभाष चन्द्र बोस को देखकर भी खुश नही थे |

ऐसा व्यक्ति महात्मा नहीं हो सकता, देश द्रोहियों का सम्मान करने वाला भी देश द्रोही ही होता है | गाँधी की मुस्लिम परस्ती से भी मुस्लिम खुश नहीं थे मौलाना शौकत अली ने कहा एक भटका से भटका हुवा मुसलमान गाँधी से अच्छा है क्यों की वह मुसलमान है और गाँधी काफ़िर है |

गाँधी ने अपना अहिंसावाद का परिचय दिया गाय का दूध ना पी कर, कहा गाय दूध अपने बछड़े के लिए देती है उसके हक़ मैं नहीं मारूंगा यह कह कर, दूध पिया बकरी का, अब गाँधी से कोई यह पूछे की गाय दूध अपने बछड़े के लिए देती है तो क्या बकरी दूध गाँधी के लिए देती है ?

मात्र इतना ही नहीं गाय एक बच्चा देती है और बकरी दो- तीन- चार भी, तो एक का हक़ तो नहीं मारा किन्तु चार का मार दिया, यह है गाँधी का अहिंसावाद |

टोपी का नाम भी गाँधी टोपी रखागया, इस टोपी को ना मुसलमानों ने पहनी और ना गाँधी ने खुद इसे पहना | देश विभाजन हुवा हिन्दू मुस्लिम के नाम, सरदार पटेलने कहा मुसलमान उधर जाएँ, उधर से हिन्दू इधर आजायें, गाँधी होने नहीं दिया जिसका नतीजा आज भारत के हिन्दू भोग रहे हैं |

मुसलमानों को, यहाँ रखागया जो आज बन्दे मातरम बोलना भारत माता जी जय बोलने का विरोध से ले कर भारत के सुप्रीम कोर्ट का भी विरोध कर रहे |

 यह सब गाँधी की ही महरवानी है, भारत वासियों आप लोगों ने सत्य को स्वीकारा ही नहीं | यह है सत्यता आज गाँधी जयंती ना मना कर अगर लालबहादुर शास्त्री जयंती मनाते तो भारत वासियों का जीवन सफल होता

Intercast Marriage ,The Vivah Sanskar will be solemnised,16sanskaro ke liye smpark kre 9977987777
 

क्या इस जन्म से पहले हमारा अस्तित्व था और मृत्यु के बाद भी रहेगा

ओ३म्
‘क्या इस जन्म से पहले हमारा अस्तित्व था और मृत्यु के बाद भी रहेगा?’https://youtu.be/-Tp2i6BX9jo

हम कौन हैं? इस प्रश्न पर जब हम विचार करते हैं तो इसका उत्तर हमें वेद एवं वैदिक साहित्य में ही मिलता है जो ज्ञान से पूर्ण, तर्क एवं युक्तिसंगत तथा सत्य है। उत्तर है कि हम मनुष्य शरीर में एक जीवात्मा के रूप में विद्यमान हैं। हमारा शरीर हमारी आत्मा का साधन है। जिस प्रकार किसी कार्य को करने के लिये उसके लिये उपयुक्त सामग्री व साधनों की आवश्यकता होती है उसी प्रकार हमारी आत्मा को अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये यह मनुष्य शरीर मिला है। शरीर केवल सुख व दुःख भोगने का ही आधार नहीं है अपितु यह साध्य ईश्वर की प्राप्ति के लिये है जिसे साधना के द्वारा प्राप्त व सिद्ध किया जाता है। हमारा साध्य ईश्वर को जानना, उसे प्राप्त करना, उसका साक्षात्कार करना तथा सद्कर्मों को करके जन्म व मरण के बन्धनों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करना है। मोक्ष दुःख रहित तथा आनन्द से पूर्ण अवस्था का नाम है। मोक्ष में जीवात्मा को लेशमात्र भी दुःख नहीं होता। वह आनन्द से युक्त रहता है। सुखपूर्वक समय व्यतीत करता है। उसे वृद्धावस्था प्राप्त होने, किसी प्रकार का रोग व दुर्घटना होने तथा मृत्यु व पुनर्जन्म का दुःख नहीं सताता। उसे नरक व नीच प्राणी योनियों में जन्म लेने की चिन्ता भी नहीं सताती। मोक्ष अवस्था में सभी जीव ज्ञान व बल से युक्त रहते हैं जिससे वह दुःखों से मुक्त तथा सुखों व आनन्द से युक्त रहते हैं। परमात्मा व मोक्ष ही जीवात्मा के लिये साध्य है जिन्हें जीवात्मा मनुष्य जन्म लेकर वेदाध्ययन व वेदज्ञान को प्राप्त कर तथा वेदानुकूल कर्मों को करके सिद्ध व प्राप्त करती है। शरीर न हो और यदि वेदज्ञान व ऋषियों के ग्रन्थ न हों, तो मनुष्य अपने जीवन के लक्ष्य को न तो जान सकता है और न ही प्राप्त कर सकता है। अतः जीवात्मा को मानव शरीर परमात्मा की अनुकम्पा व दया के कारण मिला है जो हमारे माता-पिता के समान व उनसे कहीं अधिक हमारे हितों का ध्यान रखते हैं व हमें सुख प्रदान कराते हैं। इस कारण से मनुष्यों के लिये केवल सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, अनादि, नित्य, दयालु एवं न्यायकारी परमात्मा ही उपासनीय, ध्यान, चिन्तन व जानने योग्य है। जो मनुष्य इसके लिये प्रयत्न नहीं करता उसका जीवन व्यर्थ एवं निरर्थक बन कर रह जाता है। 

हम शरीर नहीं अपितु एक चेतन जीवात्मा हैं, इसका अनुभव प्रत्येक मनुष्य करता है। भाषा के प्रयोग की दृष्टि से भी आत्मा व शरीर पृथक पृथक सत्तायें सिद्ध होती हैं। हम कहते हैं कि हमारा शरीर, मेरा हाथ, मेरा सिर, मेरी आंख आदि आदि। मैं व मेरा में अन्तर होता है। मैं मेरा नहीं होता। मेरा शरीर मुझ आत्मा का है। अतः आत्मा व शरीर पृथक हैं। इसलिये हम शरीर के लिये मैं व आत्मा का प्रयोग न कर मेरा शरीर का प्रयोग करते हैं। दूसरा प्रमाण यह है कि आत्मा एक चेतन सत्ता व पदार्थ है। हमारा शरीर व इसके सभी अंग जड़ वा निर्जीव हैं। शरीर की मृत्यु हो जाने पर शरीर क्रिया रहित व चेतना विहीन हो जाता है। शरीर को काटें या अग्नि में जलायें, उसको दुःख नहीं होता परन्तु जीवित अवस्था में एक कांटा भी चुभे तो पीड़ा होती व आंख में आंसु आते हैं। इससे आत्मा नाम की शरीर से पृथक सत्ता सिद्ध होती है जो शरीर में रहते हुए सुख व दुःख का अनुभव कराती है व जिसके शरीर से निकल जाने अर्थात् मृत्यु हो जाने पर सुख व दुःख की अनुभूति होनी बन्द हो जाती है। अतः आत्मा को जानना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। इसको जानकर ही हम अपने कर्तव्यों के महत्व को समझ सकेंगे और ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिसका परिणाम दुःख व सन्ताप हो। वैदिक साहित्य में दुःख के कारणों की चर्चा की गई है। इस जन्म में हमें जो दुःख मिलते हैं वह हमारे पूर्वजन्म के वह कर्म होते हैं जिनका फल हम पिछले जन्म में भोग नहीं सके। कारण था कि भोग से पूर्व ही वृद्धावस्था व मृत्यु आ गई थी। इस जन्म में दूसरे प्रकार के दुःख इस जन्म के क्रियमाण कर्मों के कारण भी होते हैं। एक व्यक्ति स्वार्थ व लोभवश चोरी करता है जिसका दण्ड उसे न्याय व्यवस्था से मिलता है। इससे उसे दुःख होता है। इसी प्रकार से जीवात्मा वा मनुष्य को आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक दुःख भी होते हैं जो हमारे कर्मों पर आधारित न होकर देश, काल व परिस्थितयों पर आधारित होते हैं। इन सब प्रकार के दुःखों से बचने के लिये हमें वेदज्ञान की प्राप्ति कर सद्कर्मों यथा ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र देवयज्ञ, इतर पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ एवं बलिवैश्वदेवयज्ञ करने के साथ परोपकार व दान आदि को करना होता है। ऐसा करके हम भविष्य में कर्मों के कारण होने वाले दुःखों से बच सकते हैं। हमारी आत्मा अनादि, नित्य, अविनाशी, अमर तथा सनातन सत्ता है। यह सदा से है और सदा रहेगी। इसलिये यह अनादिकाल से जन्म व मरण के बन्धनों में फंसती रहती है व मनुष्य जन्म प्राप्त कर साधना करके मुक्त होकर मोक्षावधि को प्राप्त होकर उसके बाद पुनः संसार में जन्म-मरण में आवागमन करती रहती है। इस कर्म-फल रहस्य को वेद, सत्यार्थप्रकाश, उपनिषद तथा दर्शन आदि ग्रन्थों को पढ़कर जाना जा सकता है। इन ग्रन्थों का अध्ययन करने से हम इस संसार सहित ईश्वर व जीवात्मा के सत्यस्वरूप से परिचित हो सकते हैं तथा दुःखों को दूर करने व भविष्य में अशुभ व पाप कर्मों के कारण होने वाले दुःखों से भी बच सकते हैं। 
 
हमारी आत्मा अनादि व नित्य है। इस कारण से इसका अस्तित्व सदा से है और सदा रहेगा। आत्मा नाशरहित है। विज्ञान का नियम है कि अभाव से भाव तथा भाव से अभाव उत्पन्न नहीं होता। भाव पदार्थों में संसार में केवल तीन ही पदार्थ हैं। यह पदार्थ हैं ईश्वर, जीव एवं प्रकृति। इन तीन पदार्थों की कभी उत्पत्ति नहीं हुई। यह सदा से हैं और सदा रहेंगे। परमात्मा व जीवात्मा अपने स्वरूप से अविकारी पदार्थ है। ईश्वर व जीवात्मा में विकार होकर कोई नया पदार्थ कभी नहीं बनता। प्रकृति त्रिगुणात्मक है जिसमें सत्व, रज व तम गुण होते हैं। इस प्रकृति व गुणों में विषम अवस्था उत्पन्न होकर ही यह दृश्यमान जड़ जगत जिसे संसार कहते हैं, बनता है। ईश्वर, जीव तथा प्रकृति की सत्ता स्वयंभू अर्थात् अपने अस्तित्व से स्वयं है। यह तीनों पदार्थ किसी प्राकृतिक पदार्थ से बने हुए नहीं है। इन तीनों पदार्थों का कोई अन्य पदार्थ उपादान कारण नहीं है। यह तीनों मौलिक पदार्थ है। यह अनादि काल से अस्तित्व में है। इसी कारण से ईश्वर व जीवात्मा आदि सभी तीनों पदार्थ अनादि काल से हैं। अतः हमारी आत्मा भी अनादि काल से संसार में है। यह चेतन, अल्पज्ञ, एकदेशी, ससीम, नित्य, अविनाशी, जन्म व मरण के बन्धनों में फंसी हुई, कर्म करने में स्वतन्त्र तथा फल भोगने में परतन्त्र सत्ता है। ईश्वर सर्वज्ञ व सब सत्य विद्यायों से युक्त सत्ता है। ईश्वर ही जीवों को सुख देने व उनके पूर्वजन्मों के कर्मों का फल भुगाने के लिये इस संसार की रचना व पालन करते हैं। अनादि काल से आरम्भ सृष्टि की रचना, पालन व प्रलय का क्रम निरन्तर चलता रहता है। इस रहस्य को जान कर ही वेदों के अध्येता, ऋषि व विद्वान आदि लोभ में नहीं फंसते और दुःखों की सर्वथा निवृत्ति के लिये ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र यज्ञ, परोपकार एवं दान आदि सहित सत्योपदेश व वेदप्रचार आदि का कार्य करते हुए दुःखों से मुक्त व मोक्ष प्राप्ति के उपाय करते हैं। हम सबको भी वेद में सुझाये पंच महायज्ञों का ही पालन करना है। इसी से हमारा त्राण व रक्षा होगी। इसकी उपेक्षा से हम मोह व लोभ को प्राप्त होंगे जिनका परिणाम दुःख व बार बार मृत्यु रूपी दुःखों को प्राप्त होना होता है। इन वैदिक सिद्धान्त व मान्यताओं को हमें जानना चाहिये। यदि नहीं जानेंगे तो हम कभी भी दुःखों से बच नहीं सकते। 

ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति अनादि, नित्य, अमर व अविनाशी सत्तायें हैं। इस कारण इन तीनों पदार्थों का अतीत में अस्तित्व रहा है तथा भविष्य में सदा सदा के लिये रहने वाला है। ईश्वर जीवों के लिये अतीत व वर्तमान में सृष्टि बनाकर कर जीवों को जन्म देकर सुख व कर्मों का फल देते आये हैं और आगे भविष्य में भी सदा ऐसा करते रहेंगे। आत्मा की आयु अनन्त काल की है। इस दृष्टि से हमारा यह मनुष्य जन्म जो मात्र एक सौ वर्षों में सिमटा हुआ है, इसका आयु काल प्रायः नगण्य ही है। इस आयु में भी मनुष्य का अधिकांश समय बाल अवस्था, सोने तथा अन्य अन्य कार्यों में लग जाता है। शेष समय धन कमाने व सुख की सामग्री को एकत्र करने व बनवाने में लग जाता है। बहुत से लोग इसी बीच रोगग्रस्त होकर अल्पायु में ही मृत्यु की गोद में समा जाते हैं। अतः इस तुच्छ अवधि के जीवन काल मे हमें अपने मोह व लोभ पर विजय पानी चाहिये। इसके साथ ही हमें सत्यार्थप्रकाश, वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन कर अपना ज्ञान बढ़ाना चाहिये और दुःख निवारण के उपाय ज्ञान प्राप्ति व सद्कर्मों को करके करने चाहिये। यही जीवन पद्धति श्रेष्ठ व उत्तम है। इससे इतर कोई भी जीवन शैली जो हमें सुखों की प्राप्ति के लिए केवल धनार्जन करने के लिये प्रेरित करती तथा ईश्वरोपासना आदि की उपेक्षा करती है, सर्वांश में उत्तम व लाभप्रद नहीं हो सकतीं। इन बातों व तथ्यों को हमें जानना व समझना चाहिये। इसी में हमारा हित है। इनकी उपेक्षा हमारा भविष्य दुःखद व निराशाजनक बना सकते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम, योगश्वर कृष्ण तथा वेदों वाले ऋषि दयानन्द के उदाहरण व उनके जीवन चरित्रों को हमें अपने ध्यान व विचारों में स्थापित करना चाहिये। उनके जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिये। ऐसा करके हमारा जीवन आत्मा के जन्म के उद्देश्य को पूरा करने में साधक व सार्थक होगा। यह सत्य एवं प्रामाणित है कि इस जन्म से पूर्व भी हमारा अस्तित्व था, यदि न होता तो हमारा जन्म क्योंकर होता? इस जन्म में मृत्यु होने पर भी हमारा अस्तित्व बना रहेगा। मृत्यु का होना आत्मा का अभाव व नाश नहीं है अपितु यह पुनर्जन्म का कारण व आधार है। अतः इनको ध्यान में रखकर ही हमें अपने जीवन को जीना चाहिये। ओ३म् शम्।  
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-मनमोहन कुमार आर्य