उपनिषद् ज्ञान गङ्गा

उपनिषद् ज्ञान गङ्गा
[भाग 2]

• जीवन क्या है?

उक्थम् (बढ़ना)- जीवन बढ़ने का नाम है। जीवन के कारण ही सब कुछ बढ़ता है। जो व्यक्ति ऐसा जानता है, उसकी सन्तान बढ़ने वाली और बलवान होती है। जो व्यक्ति ऐसा जानता है, वह उक्थ (बढ़ने) के स्वभाव और उसके स्थान को प्राप्त कर लेता है (उक्थ-रूप बन जाता है)।

यजु: (सङ्गठन)- जीवन सङ्गठन का नाम है। जहां जीवन है, वहां सङ्गठन है। जो ऐसा जानता है, उसकी बड़ाई के लिए सारे प्राणी उससे मिल जाते हैं। जो ऐसा जानता है वह यजु (सङ्गठन) के स्वभाव और उसके स्थान को प्राप्त कर लेता है (सङ्गठन-रूप ही बन जाता है)।

साम (अपने समान बना लेना, अपने आप में लय कर लेना)- जीवन अपने आप में विलीन कर लेने का नाम है। जहां जीवन है, वहां भिन्न-भिन्न पदार्थ एक ही बन जाते हैं। जो व्यक्ति ऐसा जानता है, उसकी बड़ाई के लिए सारे प्राणी एक रूप ही हो जाते हैं। जो व्यक्ति ऐसा जानता है, वह साम के स्वभाव और स्थान को प्राप्त कर लेता है (साम-रूप ही हो जाता है)।

क्षत्र (अपनी रक्षा करना)- जीवन अपनी रक्षा करने का नाम है। जहां जीवन है, वहां बाहरी आक्रमणों से अपनी रक्षा की ही जाती है। जो ऐसा जानता है, वह अपनी रक्षा आप करता है। कोई दूसरा उसके लिए नहीं कर सकता। वह क्षत्र के स्वभाव और स्थान को प्राप्त कर लेता है (क्षत्र-रूप ही बन जाता है)। [बृहदारण्यक० ५/१३]

[जीवन के चार चिह्नों का यहां वर्णन किया गया है। हर एक जीवित पदार्थ बढ़ता है। वह सम्पूर्णतः एक पदार्थ की भांति काम करता है। वह जीवित रहने के लिए अपने आस-पास से भोजन लेता और उसे अपना अङ्ग बना लेता है। वह अपनी रक्षा के लिए जितना यत्न कर सकता है, करता है।
इसे समझने के लिए मनुष्य शरीर को देखें। मनुष्य जीवन का आरम्भ एक घटक (सेल ‘cell’) से होता है। इसका एक भाग पिता के शरीर से आता है, दूसरा माता के शरीर से। यह घटक बहुत छोटा होता है। यह एक से दो होता है, दो से चार और चार से आठ। इसी प्रकार ये घटक बढ़ते जाते हैं। माता के गर्भ से जिस समय बच्चा बाहर आता है, उस समय उसका वजन साढ़े चार सेर के लगभग होता है। इस काल में उस एक घटक ने अपने आपको अनेक घटकों में परिवर्तित कर लिया है। बीस वर्ष का युवक होने तक वह तीन-साढ़े तीन सेर प्रति वर्ष के हिसाब से बढ़ता है। यह सब भी घटकों के विभाजन से होता है। युवक पुरूष के शरीर में ६० लाख करोड़ घटक होते हैं। अगर उन्हें आर्य्यावर्त्त के छोटे-बड़े पुरुषों और स्त्रियों में बांटें, तो प्रत्येक के हिस्से में डेढ़ लाख घटक आयेंगे। प्रारम्भ के एक घटक ने ही बढ़ते-बढ़ते यह रूप धारण कर लिया है।
शरीर के विभिन्न अङ्ग अपना-अपना काम करते हैं। परन्तु इन सब कार्य्यों का एकमात्र लक्ष्य शरीर का जीवन स्थिर रखना और बढ़ाना होता है। और यथार्थ तो यह है कि मेरी आँखें नहीं देखती, मैं आँखों से देखता हूं; मेरा आमाशय भोजन नहीं पचाता, मैं भोजन पचाता हूं। मनुष्य का शरीर सङ्गठन का एक बहुत अच्छा उदाहरण है।
जीवन के सम्बन्ध में यह बात बड़ी आश्चर्यजनक है कि जीवित पदार्थ दूसरी वस्तुओं को अपने में लय कर लेता है और अपना अङ्ग बना लेता है। मैं फल और चावल खाता हूं; कुछ घण्टों के उपरान्त न चावलों का पता मेरे शरीर में लगता है न फल का। वे मेरे मांस, मेरे रुधिर और मेरी हड्डियों के रूप में बदल जाते हैं। बच्चा पीता दूध है परन्तु उससे अपना मांस और रुधिर बनाता है। नीम का वृक्ष खेती की खाद और मिट्टी को नीम बना लेता है और आम का वृक्ष आम बना लेता है।

जहां जीवन है, वहां आत्मरक्षा भी उपस्थित है। बाहर की गर्मी ६० अंश हो या ११५ अंश, परन्तु मेरा शरीर अपना तापमान ९८.४ अंश स्थिर बनाये रखता है। छोटी से छोटी जीवित वस्तु अपने जीवन को स्थिर बनाये रखने के लिए यत्न करती है।
जीवन के ये चिह्न जातियों की अवस्था में भी देखे जाते हैं। इनके आधार पर हम बलवान और निर्बल जातियों में भेद कर सकते हैं।]

[सन्दर्भ ग्रन्थ- जीवन ज्योति; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

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दलित समाज और ईसाई मिशनरी

दलित समाज और ईसाई मिशनरी

भाग 2

डॉ विवेक आर्य

7. इतिहास के साथ खिलवाड़

इस चरण में बुद्ध मत का नाम लेकर ईसाई मिशनरियों द्वारा दलितों को बरगलाया गया। भारतीय इतिहास में बुद्ध मत के अस्त काल में तीन व्यक्तियों का नाम बेहद प्रसिद्द रहा है। आदि शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट और पुष्यमित्र शुंग। इन तीनों का कार्य उस काल में देश, धर्म और जाति की परिस्थिति के अनुसार महान तप वाला था। जहाँ एक ओर आदि शंकराचार्य ने पाखंड,अन्धविश्वास, तंत्र-मंत्र, व्यभिचार की दीमक से जर्जर हुए बुद्ध मत को प्राचीन शास्त्रार्थ शैली में परास्त कर वैदिक धर्म की स्थापना करी गई वहीँ दूसरी ओर कुमारिल भट्ट द्वारा माध्यम काल के घनघोर अँधेरे में वैदिक धर्म के पुनरुद्धार का संकल्प लिया गया। यह कार्य एक समाज सुधार के समान था। बुद्ध मत सदाचार, संयम, तप और संघ के सन्देश को छोड़कर मांसाहार, व्यभिचार, अन्धविश्वास का प्रायः बन चूका था। ये दोनों प्रयास शास्त्रीय थे तो तीसरा प्रयास राजनीतिक था। पुष्यमित्र शुंग मगध राज्य का सेनापति था। वह महान राष्ट्रभक्त और दूरदृष्टि वाला सेनानी था। उस काल में सम्राट अशोक का नालायक वंशज बृहदरथ राजगद्दी पर बैठा था। पुष्यमित्र ने उसे अनेक बार आगाह किया था कि देश की सीमा पर बसे बुद्ध विहारों में विदेशी ग्रीक सैनिक बुद्ध भिक्षु बनकर जासूसी कर देश को तोड़ने की योजना बना रहे है। उस पर तुरंत कार्यवाही करे। मगर ऐशो आराम में मस्त बृहदरथ ने पुष्यमित्र की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। विवश होकर पुष्यमित्र ने सेना के निरीक्षण के समय बृहदरथ को मौत के घाट उतार दिया। इसके पश्चात पुष्यमित्र ने बुद्ध विहारों में छिपे उग्रवादियों को पकड़ने के लिए हमला बोल दिया। ईसाई मिशनरी पुष्यमित्र को एक खलनायक, एक हत्यारे के रूप में चित्रित करते हैं। जबकि वह महान देशभक्त था। अगर पुष्यमित्र बुद्धों से द्वेष करता तो उस काल का सबसे बड़ा बुद्ध स्तूप न बनवाता। ईसाई मिशनरियों द्वारा आदि शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट और पुष्यमित्र को निशाना बनाने के कारण उनकी ब्राह्मणों के विरोध में दलितों को भड़काने की नीति थी। ईसाई मिशनरियों ने तीनों को ऐसा दर्शाया जैसे वे तीनों ब्राह्मण थे और बुद्धों को विरोधी थे। इसलिए दलितों को बुद्ध होने के नाते तीनों ब्राह्मणों का बहिष्कार करना चाहिए। इस प्रकार से इतिहास के साथ खेलते हुए सत्य तथ्यों को छुपाकर ईसाईयों ने कैसा पीछे से घात किया। पाठक स्वयं निर्णय कर सकते है।

8. हिन्दू त्योहारों और देवी -देवताओं के नाम पर भ्रामक प्रचार

ईसाई मिशनरी ने हिन्दू समाज से सम्बंधित त्योहारों को भी नकारात्मक प्रकार से प्रचारित करने का एक नया प्रपंच किया। इस खेल के पीछे का इतिहास भी जानिए। जो दलित ईसाई बन जाते थे। वे अपने रीति-रिवाज, अपने त्योहार बनाना नहीं छोड़ते थे। उनके मन में प्राचीन धर्म के विषय में आस्था और श्रद्धा धर्म परिवर्तन करने के बाद भी जीवित रहती थी। अब उनको कट्टर बनाने के लिए उनको भड़काना आवश्यक था। इसलिए ईसाई मिशनरियों ने विश्वविद्यालयों में हिन्दू त्योहारों और उनसे सम्बंधित देवी देवतों के विषय में अनर्गल प्रलाप आरम्भ किया। इस पषड़यंत्र का एक उदहारण लीजिये। महिषुर दिवस का आयोजन दलितों के माध्यम से कुछ विश्विद्यालयों में ईसाईयों ने आरम्भ करवाया। इसमें शौध के नाम पर यह प्रसिद्द किया गया कि काली देवी द्वारा अपने से अधिक शक्तिशाली मूलनिवासी राजा के साथ नौ दिन तक पहले शयन किया गया। अंतिम दिन मदिरा के नशे में देवी ने शुद्र राजा महिषासुर का सर काट दिया। ऐसी बेहूदी, बचकाना बातों को शौध का नाम देने वाले ईसाईयों का उद्देश्य दशहरा, दीवाली, होली, ओणम, श्रावणी आदि पर्वों को पाखंड और ईस्टर, गुड फ्राइडे आदि को पवित्र और पावन सिद्ध करना था। दलित समाज के कुछ युवा भी ईसाईयों के बहकावें में आकर मूर्खता पूर्ण हरकते कर अपने आपको उनका मानसिक गुलाम सिद्ध कर देते है। पाठक अभी तक यह समझ गए होंगे की ईसाई मिशनरी कैसे भेड़ की खाल में भेड़िया जैसा बर्ताव करती है।

9. हिंदुत्व से अलग करने का प्रयास

ईसाई समाज की तेज खोपड़ी ने एक बड़ा सुनियोजित धीमा जहर खोला। उन्होंने इतिहास में जितने भी कार्य हिन्दू समाज द्वारा जातिवाद को मिटाने के लिए किये गए । उन सभी को छिपा दिया। जैसे भक्ति आंदोलन के सभी संत कबीर, गुरु नानक, नामदेव, दादूदयाल, बसवा लिंगायत, रविदास आदि ने उस काल में प्रचलित धार्मिक अंधविश्वासों पर निष्पक्ष होकर अपने विचार कहे थे। समग्र रूप से पढ़े तो हर समाज सुधारक का उद्देश्य समाज सुधार करना था। जहाँ कबीर हिन्दू पंडितों के पाखंडों पर जमकर प्रहार करते है वहीं मुसलमानों के रोजे, नमाज़ और क़ुरबानी पर भी भारी भरकम प्रतिक्रिया करते है। गुरु नानक जहाँ हिन्दू में प्रचलित अंधविश्वासों की समीक्षा करते है वहीँ इस्लामिक आक्रांता बाबर को साक्षात शैतान की उपमा देते है। इतना ही नहीं सभी समाज सुधारक वेद, हिन्दू देवी-देवता, तीर्थ, ईश्वर आराधना, आस्तिकता, गोरक्षा सभी में अपना विश्वास और समर्थन प्रदर्शित करते हैं। ईसाई मिशनरियों ने भक्ति आंदोलन पर शोध के नाम पर सुनियोजित षड़यंत्र किया। एक ओर उन्होंने समाज सुधारकों द्वारा हिन्दू समाज में प्रचलित अंधविश्वासों को तो बढ़ा चढ़ा कर प्रचारित किया वहीँ दूसरी ओर इस्लाम आदि पर उनके द्वारा कहे गए विचारों को छुपा दिया। इससे दलितों को यह दिखाया गया कि जैसे भक्ति काल में संत समाज ब्राह्मणों का विरोध करता था और दलितों के हित की बात करता था वैसे ही आज ईसाई मिशनरी भी ब्राह्मणों के पाखंड का विरोध करती है और दलितों के हक की बात करती है। कुल मिलकर यह सारी कवायद छवि निर्माण की है। स्वयं को अच्छा एवं अन्य को बुरा दिखाने के पीछे ईसा मसीह के लिए भेड़ों को एकत्र करना एकमात्र उद्देश्य है। ईसाई मिशनरी के इन प्रयासों में भक्ति काल में संतों के प्रयासों में एक बहुत महत्वपूर्ण अंतर है। भक्ति काल के सभी हिन्दू समाज के महत्वपूर्ण अंग बनकर समाज में आई हुई बुराइयों को ठीक करने के लिए श्रम करते थे। उनका हिंदुत्व की मुख्य विचारधारा से अलग होने का कोई उद्देश्य नहीं था। जबकि वर्तमान में दलितों के लिए कल्याण कि बात करने वाली ईसाई मिशनरी उनके भड़का कर हिन्दू समाज से अलग करने के लिए सारा श्रम कर रही है। उनका उद्देश्य जोड़ना नहीं तोड़ना है। पाठक आसानी से इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते है।

10. सवर्ण हिन्दू समाज द्वारा दलित उत्थान का कार्य

पिछले 100 वर्षों से हिन्दू समाज ने दलितों के उत्थान के लिए अनेक प्रयास किये। सर्वप्रथम प्रयास आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद द्वारा किया गया। आधुनिक भारत में दलितों को गायत्री मंत्र की दीक्षा देने वाले, सवर्ण होते हुए उनके हाथ से भोजन-जल ग्रहण करने वाले, उन्हें वेद मंत्र पढ़ने, सुनने और सुनाने का प्रावधान करने वाले, उन्हें बिना भेदभाव के आध्यात्मिक शिक्षा ग्रहण करने का विधान देने वाले, उन्हें वापिस से शुद्ध होकर वैदिक धर्मी बनने का विधान देने वाले अगर कोई है तो स्वामी दयानंद है। स्वामी दयानंद के चिंतन का अनुसरण करते हुए आर्यसमाज ने अनेक गुरुकुल और विद्यालय खोले जिनमें बिना जाति भेदभाव के समान रूप से सभी को शिक्षा दी गई। अनेक सामूहिक भोज कार्यक्रम हुए जिससे सामाजिक दूरियां दूर हुए। अनेक मंदिरों में दलितों को न केवल प्रवेश मिला अपितु जनेऊ धारण करने और अग्निहोत्र करने का भी अधिकार मिला। इस महान कार्य के लिए आर्यसमाज के अनेकों कार्यकर्ताओं ने जैसे स्वामी श्रद्धानंद, लाला लाजपत राय, भाई परमानन्द आदि ने अपना जीवन लगा दिया। यह अपने आप में बड़ा इतिहास है।

इसी प्रकार से वीर सावरकर द्वारा रत्नागिरी में पतितपावन मंदिर की स्थापना करने से लेकर दलितों के मंदिरों में प्रवेश और छुआछूत उनर्मुलन के लिए भारी प्रयास किये गए। इसके अतिरिक्त वनवासी कल्याण आश्रम, रामकृष्ण मिशन आदि द्वारा वनवासी क्षेत्रों में भी अनेक कार्य किये जा रहे हैं। ईसाई मिशनरी अपने मीडिया में प्रभावों से इन सभी कार्यों को कभी उजागर नहीं होने देती। वह यह दिखाती है कि केवल वही कार्य कर रहे है। बाकि कोई दलितों के उत्थान का कार्य नहीं कर रहा है। यह भी एक प्रकार का वैचारिक आतंकवाद है। इससे दलित समाज में यह भ्रम फैलता है कि केवल ईसाई ही दलितों के शुभचिंतक है। हिन्दू सवर्ण समाज तो स्वार्थी और उनसे द्वेष करने वाला है।

11. मीडिया का प्रयोग

ईसाई मिशनरी ने अपने अथाह साधनों के दम पर सम्पूर्ण विश्व के सभी प्रकार के मीडिया में अपने आपको शक्तिशाली रूप में स्थापित कर लिया है। उन्हें मालूम है कि लोग वह सोचते हैं, जो मीडिया सोचने को प्रेरित करता है। इसलिए किसी भी राष्ट्र में कभी भी आपको ईसाई मिशनरी द्वारा धर्म परिवर्तन के लिए चलाये जा रहे गोरखधंधों पर कभी कोई समाचार नहीं मिलेगा। जबकि भारत जैसे देश में दलितों के साथ हुई कोई साधारण घटना को भी इतना विस्तृत रूप दे दिया जायेगा। मानों सारा हिन्दू समाज दलितों का सबसे बड़ा शत्रु है। हम दो उदहारणों के माध्यम से इस खेल को समझेंगे। पूर्वोत्तर राज्यों में ईसाई चर्च का बोलबाला है। रियांग आदिवासी त्रिपुरा राज्य में पीढ़ियों से रहते आये है। वे हिन्दू वैष्णव मान्यता को मानने वाले है। ईसाईयों ने भरपूर जोर लगाया परंतु उन्होंने ईसाई बनने से इनकार कर दिया। चर्च ने अपना असली चेहरा दिखाते हुए रियांग आदिवासियों की बस्तियों पर अपने ईसाई गुंडों से हमला करना आरम्भ कर दिया। वे उनके घर जला देते, उनकी लड़कियों से बलात्कार करते, उनकी फसल बर्बाद कर देते। अंत में कई रियांग ईसाई बन गए, कई त्रिपुरा छोड़कर आसाम में निर्वासित जीवन जीने लग गए। पाठकों ने कभी चर्च के इस अत्याचार के विषय में नहीं सुना होगा। क्योंकि सभी मानवाधिकार संगठन, NGOs, प्रिंट मीडिया, अंतराष्ट्रीय संस्थाएं ईसाईयों के द्वारा प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से संचालित हैं। इसके ठीक उल्ट गुजरात के ऊना में कुछ दलितों को गोहत्या के आरोप में हुई पिटाई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे उठाया गया जैसे इससे बड़ा अत्याचार तो दलितों के साथ कभी हुआ ही नहीं है। रियांग आदिवासी भी दलित हैं। उनके ऊपर जो अत्याचार हुआ उसका शब्दों में बखान करना असंभव है। मगर गुजरात की घटना का राजनीतीकरण कर उसे उछाला गया। जिससे दलितों के मन में हिन्दू समाज के लिए द्वेष भरे। इस प्रकार से चर्च अपने सभी काले कारनामों पर सदा पर्दा डालता है और अन्यों की छोटी छोटी घटनाओं को सुनियोजित तरीके से मीडिया के द्वारा प्रयोग कर अपना ईसाईकरण का कार्यक्रम चलाता है। इसके लिए विदेशों से चर्च को अरबों रूपया हर वर्ष मिलता है।

12. डॉ अम्बेडकर और दलित समाज

ईसाई मिशनरी ने अगर किसी के चिंतन का सबसे अधिक दुरूपयोग किया तो वह संभवत डॉ अम्बेडकर ही थे। जब तक डॉ डॉ अम्बेडकर जीवित थे, ईसाई मिशनरी उन्हें बड़े से बड़ा प्रलोभन देती रही कि किसी प्रकार से ईसाई मत ग्रहण कर ले क्योंकि डॉ अम्बेडकर के ईसाई बनते ही करोड़ों दलितों के ईसाई बनने का रास्ता सदा के लिए खुल जाता। उनका प्रलोभन तो क्या ही स्वीकार करना था। डॉ अम्बेडकर ने खुले शब्दों के ईसाइयों द्वारा साम,दाम, दंड और भेद की नीति से धर्मान्तरण करने को अनुचित कहा। डॉ अम्बेडकर ने ईसाई धर्मान्तरण को राष्ट्र के लिए घातक बताया था। उन्हें ज्ञात था कि इसे धर्मान्तरण करने के बाद भी दलितों के साथ भेदभाव होगा। उन्हें ज्ञात था कि ईसाई समाज में भी अंग्रेज ईसाई, गैर अंग्रेज ईसाई, सवर्ण ईसाई,दलित ईसाई जैसे भेदभाव हैं। यहाँ तक कि इन सभी गुटों में आपस में विवाह आदि के सम्बन्ध नहीं होते है। यहाँ तक इनके गिरिजाघर, पादरी से लेकर कब्रिस्तान भी अलग होते हैं। अगर स्थानीय स्तर पर (विशेष रूप से दक्षिण भारत) दलित ईसाईयों के साथ दूसरे ईसाई भेदभाव करते है। तो विश्व स्तर पर गोरे ईसाई (यूरोप) काले ईसाईयों (अफ्रीका) के साथ भेदभाव करते हैं। इसलिए केवल नाम से ईसाई बनने से डॉ अम्बेडकर ने स्पष्ट इंकार कर दिया। जबकि उनके ऊपर अंग्रेजों का भारी दबाव भी था। डॉ अम्बेडकर के अनुसार ईसाई बनते ही हर भारतीय भारतीय नहीं रहता। वह विदेशियों का आर्थिक, मानसिक और धार्मिक रूप से गुलाम बन जाता है। इतने स्पष्ट रूप से निर्देश देने के बाद भी भारत में दलितों के उत्थान के लिए चलने वाली सभी संस्थाएं ईसाईयों के हाथों में है। उनका संचालन चर्च द्वारा होता है और उन्हें दिशा निर्देश विदेशों से मिलते है।

इस लेख के माध्यम से हमने यह सिद्ध किया है कि कैसे ईसाई मिशनरी दलितों को हिंदुओं के अलग करने के लिए पुरजोर प्रयास कर रही हैं। इनका प्रयास इतना सुनियोजित है कि साधारण भारतीयों को इनके षड़यंत्र का आभास तक नहीं होता। अपने आपको ईसाई समाज मधुर भाषी, गरीबों के लिए दया एवं सेवा की भावना रखने वाला, विद्यालय, अनाथालय, चिकित्सालय आदि के माध्यम से गरीबों की सहायता करने वाला दिखाता है। मगर सत्य यह है कि ईसाई यह सब कार्य मानवता कि सेवा के लिए नहीं अपितु इसे बनाने के लिए करता है। विश्व इतिहास से लेकर वर्तमान में देख लीजिये पूरे विश्व में कोई भी ईसाई मिशन मानव सेवा के लिए केवल धर्मान्तरण के लिए कार्य कर रहा हैं। यही खेल उन्होंने दलितों के साथ खेला है। दलितों को ईसाईयों की कठपुतली बनने के स्थान पर उन हिंदुओं का साथ देना चाहिए जो जातिवाद का समर्थन नहीं करते है। डॉ अम्बेडकर ईसाईयों के कारनामों से भली भांति परिचित थे। इसीलिए उन्होंने ईसाई बनना स्वीकार नहीं किया था। भारत के दलितों का कल्याण हिन्दू समाज के साथ मिलकर रहने में ही है। इसके लिए हिन्दू समाज को जातिवाद रूपी सांप का फन कुचलकर अपने ही भाइयों को बिना भेद भाव के स्वीकार करना होगा।

(इस लेख को पढ़कर हर हिन्दू जातिवाद का नाश करने का संकल्प अवश्य ले)

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यज्ञों से मैं लोकहित के मार्ग पर चलूं   

यज्ञों से मैं लोकहित के मार्ग पर चलूं   
                          
       यजुर्वेद के प्रथम अध्याय़ के दूसरे मंत्र मे यज्ञ की पवित्रता पर बल देते हुए कहा है कि इससे पवित्रता आती है ,  ज्योतिर्मय अर्थात् सब ओर प्रकाश फैलाने वाले, अनेक प्रकार की शक्तियों से संपन्न,  प्राणशक्ति से भरपूर हो लोकहित करने वाले बनते हैं |  इस प्रकार अपने को शक्ति से दृढ़ बना कर कभी भी कुटिलता को अपना कर अपने लिए दंड का कारण नहीं बनते |  मंत्र इस प्रकार है : –
वसो: पवित्रमसि द्यौरसि पृथिव्यसि मातरिश्वनो घर्मोऽसि विश्वधाऽअसि।
परमेण धाम्ना दृंहस्व मा ह्वार्मा ते यज्ञपतिर्ह्वार्षीत् || याजुर्वेद 1.2 ||
     इस मंत्र मे परमपिता परमात्मा ने जीव का ध्यान आठ बातों की ओर दिलाया है ,  जो इस प्रकार है :-
1. यज्ञ से हम पवित्र बनते हैं :-
       इस मंत्र को आरंभ करते हुए परम पिता ने जो शब्द दिए हैं, वह हैं वसो: पवित्रम्सि अर्थात् हे जीव !  तू प्रतिदिन यज्य करने वाला होने के कारण पवित्र बन गया है क्योंकि यज्ञ ही पवित्रता का सर्वोतम साधन है |  प्रभु कहते हैं कि यज्ञ के जितने गुण जीवन में आते हैं,  उतने अंश तक ही हमारा जीवन उतम बनता जाता है , पवित्र बनता जाता है |  यज्ञज्य का भाव प्रार्थना से होता है ,  परोपकार से होता है |  यज्ञ पुण्य का प्रमुख साधन है |  यह एक एसा दान है जिस के संबंध में हम जानते ही नहीं कि हमारे इस दान का उपभोग ,  इस दान का लाभ किस – किस ने लिया है |
       इस के उलट यदि हम कुछ करते हैं यथा अयज्ञ के कार्य करते हैं तो इस में हमारा स्वार्थ स्पष्ट दिखाई देता है | इस में परोपकार न हो कर पराकार निहित होता 
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है ,  इस में दूसरे को पीड़ा देने की भावना रहती है तथा यह सब पाप का कारण बनता है |
2. यज्ञ से ही जीवन प्रकाशमय बनता है  :-
          प्रभु कहते हैं धौ: असि अर्थात् यज्ञ से मानव का जीवन प्रकाशमय बन जाता है |  यज्ञ की अग्नि से सब ओर प्रकाश फैलता है ।   इस के करने से गुप्त रूप से दूसरों की सहायता करने की भावना बलवती होती है |  जिस प्रकार इससे न जाने कितने लोगों का उपकार होता है ,  उस प्रकार ही हम भी चाहते हैं कि हम भी एसा परोपकार करने,  एसे धन से दूसरों की साहयता करें कि हमें पता ही न चले कि हमने किस – किस की सहायता की है |  किसी पर कभी एहसान जता ही न सकें ,  दिखा ही न सकें |  इस प्रकार के कार्यों के कारण हमारा मस्तिष्क रूपी सूर्य द्युलोक में ज्ञान के सूर्य के समान सब ओर प्रकाश फ़ैलता है ,  सब को ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करता है |  इस में प्रथम स्थान पर देवपूजा को दिया गया है |  जब हम देवपूजा अर्थात् हवन करते हैं तो यह देवपूजा हमारे मस्तिष्क को अधिक ही नहीं ओर भी अधिक प्रकाशित करती चली जाती है | 
3. यह हमारी शक्तियों को ब़ढाता है  :- 
         यज्ञ से मानवीय शक्तियाँ बढ़ती हैं |  इस लिए इस मंत्र के शब्द पृथ्वी असी  के माध्यम से बताया है कि हे मानव !  यज्ञ से तेरी शक्तियां बढ़ती हैं |  इस लिए तूं एसा उपाय कर कि जिन के कारण तेरी शक्तियां बढ़ें |  इस के उल्ट कार्य करने से फल भी उल्ट ही होता है |  मानव जीवन मे कभी एसे कार्य न किए जावें कि जिनके कारण से शक्तियों का ह्रास हो,  सदा एसे ही काम करें ,  एसे ही उपाय करें कि जिन से हमारी शक्तियों की वृद्धि हो सके |  स्पष्ट है कि यह यज्ञ हमारी शक्तियों को बढ़ाने वाला है | 
4. प्राणशक्ति बढ़ती है  :- 
        य़ज्ञ से मानव की प्राणशक्ति बढ़ती है तथा यह प्राण शक्ति ही है ,  जिससे मानव का जीवन संभव होता है |  यदि शरीर से प्राण शक्ति एक क्षण के लिए भी चली जाती है तो यह शरीर बेकार हो जाता है ,  लोग कहते हैं कि इस की मृत्यु हो गयी है |  इस लिए हम अपनी प्राण शक्ति को बढ़ाने के लिए यह उपाय ,  यह क्रिया 
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अवश्य करें तथा अपनी जीवणीय शक्ति को बढ़ावें | 
5. शक्ति से सबको धारण करने वाला बन  :- 
        हे मानव ! जो तेरी प्राण शक्ति बढ़ी है , उसका उपयोग तू दूसरों को धारण करने में लगा |  इसके लिए मंत्र में कहा है कि विश्वधा: असी अर्थात् तूं सब को धारण करने वाला बन |  यह जो शक्ति तुझे मिली है यह किसी प्रकार के स्वार्थ में न लगे ,  अपने ही हित को बढ़ाने के लिए इस का प्रयोग न कर बल्कि तू इस शक्ति का उपयोग दूसरों की सहायता में,  दूसरों के सहयोग में,  दूसरों के हित साधन में लगा, दूसरों को उठाने मे लगा | इस प्रकार दूसरों की रक्षा का कारण बन | 
6. उत्कृष्ट तेज पा कर तू अपने को दृढ़ बना  :- 
       हे मानव ! ,  हे जीव !  तू इस बात को जान कि शक्तियाँ तीन प्रकार की होती हैं : 
क) उत्कृष्ट शक्ति : 
        तेरी वह शक्ति ,  जो दूसरों के हित के लिए प्रयोग की जावे ,  उसे उत्कृष्ट शक्ति के रूप मे जाना जाता है | 
ख) निकृष्ट शक्ति :- 
        जब तूं ओरों की हानि करता है तथा उनके नाश की कामना करता है तो तेरी यह शक्ति निकृष्ट शक्ति बन जाती है | 
ग) मध्यम शक्ति : – 
        जब तू स्वावलंबी हो जाता है , स्वार्थी हो जाता है तथा अपनी वृद्धि में , अपनी उन्नति में ही सीमित हो जाता है तो इस प्रकार की शक्तियों को मध्यम शक्ति कहते हैं | 
       इन शक्तियों में उतकृष्ट तेज अथवा उतकृष्ट शक्ति ही स्रवॉतम मानी गई है |  मंत्र में भी कहा है कि परमेण धामना अर्थात् उतकृष्ट तेज से तू द्र्णहसव अर्थात् अपने को दृढ बना ओर अपने को दृढ़ बना कर सबको धारण करते हुए तूं विश्वधा बन |  इस प्रकार प्रभु का आदेश है कि हे मानव !  तूं सब शक्तियों को प्राप्त करके सब को धारण करने वाला बन अर्थात् परोपकार की भावना में रम जा ,  इसे हाथ से मत 
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जाने दे तथा सदा सब का सहयोगी बन,  मार्ग दर्शक बन |  यही यश का मार्ग है , यही कीर्ति का मार्ग है | 
7. सदा सरल मार्ग पर चल  :-
        प्रभु आगे उपदेश देते हैं कि हे जीव !  तूं कभी भी कुटिलता से भरे मार्ग पर न चल |  कुटिल मार्ग पर चलने वाले का सदा अपयश ही होता है |  यश पाने के लिए यह मार्ग श्रेय नहीं है |  दूसरों की सहायता करना ही श्रेय मार्ग है |  इस लिए तूं सदा सरल व सुपथ पर ही चल |  यज्ञ भी तो यह ही उपदेश देता है |  अत: य़ज्ञीयता व कुटिलता कभी एक साथ नहीं चल सकते |  इस लिए तूं कुटिलता , धोखा , विश्वासघात से सदा दूर रह |
8. तेरे लिए पिता कभी कठोर न हो :-
        अंत में मन्त्र कहता है कि हे जीव !  जहाँ तक तेरा संबंध है ,  तेरे लिए वह प्रभु कभी कठोर न हो |   जो आदेश उस पिता ने तुझे कहा है , आदेश दिया है ,  उसे तूंने यथावत् स्वीकार कर लिया ,  यथावत् उस पर आचरण किया तो प्रभु तेरे लिए कठोर कैसे बन सकता है ?  प्रभु के इस शांत उपदेश को तूं सदा सुनता रह तथा उस के अनुसार कर्म कर |  यदि तूं एसा करेगा तो प्रभु को तेरे लिए दान , भेद ओर दण्ड के प्रयोग की आवश्यकता ही न पड़ेगी |  प्रभु सरलता को पसंद करता है |  यह ही उस पिता को पाने का उतम साधन है |  इस सरल मार्ग पर चलने से ही हे जीव !  तू परमेष्ठी  अर्थात् परम स्थान को पा सकेगा |  इस प्रकार यज्ञ की भावना को अपनाने के कारण प्रजापति बन जावेगा |                              
डा. अशोक आर्य https://youtu.be/o0lkluyjlmM
पाकेट १/६१ रामप्रस्थ ग्रीन से ७ वैशाली  
२०१०१२ गाजियाबाद उ.प 
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कविरत्न प्रकाश जी के काव्य में ऋषि दयानंद

कविरत्न प्रकाश जी के काव्य में ऋषि दयानंद 
                       डा. अशोक आर्य 
     कविरत्न प्रकाश जी के नाम से आर्य समाज का जन जन परिचित है| आर्य समाज के कवियों और भजनोपदेशकों में आपका विशेष स्थान है| आज आपके देहांत को लगभग पचास वर्ष होने जा रहे हैं किन्तु आर्य समाज में आज भी प्रकाश जी के समकक्ष का कोई कवि अथवा भाजोपदेशक नहीं मिलता| वह शास्त्रीय संगीत के भी धनी थे| प्रकाश जी के सम्बन्ध में इस प्रकार कहा जा सकता है कि आप अपने आप में ही एक पूर्ण कवि तथा पूर्ण भजनोपदेशक थे| १९२५ को मथुरा में संपन्न आर्य समाज के अर्धशताब्दी के अवसर पर आपने एक गीत लिखा “वेदों का डंका आलम में बजवा दिया ऋषि दयानंद ने हर जगह ओउम् का झंडा फिर फहरा दिया ऋषि दयानंद ने” इस गीत का गायन आपने अर्धशाताव्ब्दी समारोह में किया तो वहां उपस्थित जन समुदाय में आपके नाम की धूम मच गई| इस गीत का प्रणयन हुए आज ९५ वर्ष बीत चुके हैं किन्तु आज भी इस गीत की शक्ति ज्यों की त्यों बनी हुई है| आर्य समाज के प्राय: प्रत्येक कार्य क्रम में इस गीत को गाया जाता है और आर्य वीर दल का तो यह गीत मुख्य गीत बन गया है| 
      आपका मुझ से विशेष स्नेह था और आपका आशीर्वाद मुझे मिलता ही रहता था| आपके पत्र मुझे मिलते ही रहते थे| मेरे विवाह पर जो सेहरा और काव्यमयी उपदेशात्मक आशीर्वाद प्रकाशित हुआ था, वह भी आप ही ने लिखा था| इन दोनों का गायन भी आर्य समाज के उच्चकोटि के भजनोपदेशक पंडित पन्नालाल पीयूष जी ने मेरे विवाह के अवसर पर भंडारा(महाराष्ट्र)में किया था| पंडित जी मुझे जो पत्र लिखते थे, वह आप स्वयं अपने हाथों से लिखते थे जबकि गठिया के कारण आपकी अंगुलियाँ मुड चुकीं थीं किन्तु फिर भी किसी प्रकार पत्र लिखने के लिए कलम को पकड़ ही लेते थे| इस प्रकार के उच्चकोटि के कवि के काव्य में महर्षि दयानंद जी के प्रति कैसी आस्था थी, उसे हम आगामी पंक्तियों  में उनके ही काव्यांश से स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे|
    प्रकाश जी को स्वामी जी के आगमन से पूर्व की अवस्था का वर्नान करते हुए बहुत भारी कष्ट का अनुभव हो रहा है| वह अंधविश्वासों से भरी इस जाति का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि इस जाति में बढ़ रहे इस अँधेरे को स्वामी दयानंद जी ने ही दूर किया| यथा:-
                        अज्ञान  अविद्या की  हर सूं  घन  घोर  घटाएं  छ्यीं थीं,
                      कर नष्ट उन्हें जग में प्रकाश फैला दिया ऋषि दयानंद ने ||
    इन पक्तियों के माध्यम से प्रकाश जी जन जन को यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि स्वामी जी के आगमन से पूर्व यह देश अविद्या, अज्ञान के अंधकार में डूब रहा था| अन्धविश्वास , रूढिया और कुरीतियाँ इस देश का नाश कर रहीं थीं| स्वामी जी ने आकर वेद और सत्यार्थ प्रकाश के प्रचार के माध्यम से इन्हें नष्ट कर दिया और सब और वेद का प्रकाश फैला दिया| 
      इस गीत की ही आगामी पंक्तियों  में कवि ने विदेशियों के आक्रमण और यहाँ पर अपनी सत्ता स्थापित कर यहाँ के लोगों को लुटना, मारना, तथा इनको धर्मभ्रष्ट कर इनके धर्म को परिवर्तन करने का काम आरम्भ कर रखा था| इस सम्बन्ध में कवि के उद्गार देखते ही बनते हैं| यथा:-
                                  घुस गए  लुटेरे  घर में थे, सब माल  लूट  कर  ले जाते,
                      सद शुक्र हाथ सोतों का पकड़ बिठला दिया ऋषि दयानंद ने||
     इन पंक्तियों ने स्पष्ट कर दिया है कि विदेशी लुटेरे इस देश के शासक बन गए थे और यहाँ का धन, सम्पती आदि लूट लूट कर अपने देश में लेकर जा रहे थे| स्वामी दयानंद जी ने जब यह सब देखा तो उन्होंने इस प्रकार से जन जन का आह्वान् किया कि यह सोई हुई जाति न केवल उठ कर बैठ गई बल्कि उसने शस्त्र उठा कर इस देश की स्वाधीनता के प्रयास भी आरम्भ कर दिए|
     विदेशियों के प्रभाव में आकर उस समय के भारतीय लगातार अपने धर्म कर्म को छोड़ कर दूसरों के धर्म को अपना रहे थे| कोई कब्रों पर सर झुकाने लगा था तो कोई गिरजा को ही अपने धर्म का केंद्र मानने लगा था| देश में अनेक मत मतान्तर फ़ैल रहे थे, जिससे कवि को भारी आघात लगता है| इसी टीस को ही कवि यहाँ प्रकट करते हुए कह रहे हैं कि:-
                        कब्रों में सर को  पटकते थे कोई  दैरो  हरम में भटकते  थे|
                      दे ज्ञान उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखला दिया ऋषि दयानंद ने||
     कवि कहना चाहते हैं कि इस जाति का इतना पतन हो गया था कि यहाँ के अधिकाँश लोग कब्रों में ही ईश्वर को ढूंडने लगे थे और अनेक लोग गैरों के धार्मिक स्थलों पर भटकते हुए स्वयं को ही भूल चुके थे| इस समय ही स्वामी दयानंद जी ने आकर उन्हें वेद का ज्ञान दिया और मुक्ति के सच्चे मार्ग को बताया|
     यह वह समय था जब लोग इस बात को भूल गए थे कि कभी वह विश्व गुरु थे अत: इस समय स्वामी जी पूरे विश्व को वेद का मार्ग बताया करते थे| इस कारण कवि को वेदना का होना स्वाभाविक भी था| अपनी इस पीड़ा का वर्णन किये बिना वह कैसे रह सकते थे? इस का वर्णन वह आगामी पंक्तियों में करते हुए कहते हैं कि:-
                        सब छोड़ चुके थे धर्म कर्म गौरव गुमान ऋषि मुनियों का| 
                      फिर संध्या हवन यज्ञ करना सिखला दिया ऋषि दयानंद ने ||
      भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली इतनी उन्नत थी कि विदेशियों को भी अच्छी तथा उत्तम शिक्षा पाने के लिए इस देश में ही आना होता था| इस बात पर कवि को क्षोभ भी है कि उस शिक्षा व्यवस्था को विदेशियों ने ध्वस्त कर दिया| उनके पीछे लगकर हमने उस शिक्षा व्यवस्था को त्याग दिया| इस तथ्य पर कवि खुशी भी प्रकट कर रहे हैं कि उसी पुरातन शिक्षा प्रणाली को(जिसे पाने के लिए अनेक विदेशी भारत आया करते थे) स्वामी दयानंद जी ने आकर पुनर्जीवित कर दिया| स्वामी जी ने इस प्राचीन शिक्षा प्रणाली को न केवल पुनर्जीवित ही किया अपितु इस का खूब प्रचार प्रसार भी किया और अपने द्वारा सथापित आर्य समाज को भी इस कार्य का अधिभार दिया, जिसने अनेक स्थानों पर प्राचीन शिक्षा केंद्र स्थापित भी किये और आज भी कर रहा है| इस बात को भी कवि की नजरें कैसे देखने से रह सकती थीं? अत: इस सम्बन्ध में कवि लिखते हैं:-
                        विद्यालय गुरुकुल खुलवाये कायम हर जगह समाज किये|
                      आदर्श  पुरातन  शिक्षा का बतला दिया ऋषि  दयानंद ने||
     इस बात पर कवि को गर्व है कि स्वामी जी ने इस देश में आकर स्थान स्थान पर विद्यालय और गुरुकुल आरम्भ करवा दिए| इस कार्य को तीव्र गति मिल सके, इसलिए स्थान स्थान पर आर्य समाजों की स्थापना भी कर दी| इस प्रकार स्वामी जी ने देश की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था को एक बार फिर से स्थापित कर दिया| 
     कवि इस तथ्य को आगे बढाते हुए महर्षि के कार्यों की चर्चा करते हुए आगे कह रहे हैं कि जिस जाति के लिए स्वामी जी ने इतना कार्य किया, वह जाति स्वामी जी को समझ ही नहीं पाई| इस कारण उन्हें अपना शत्रु समझ कर उन्हें विष दे कर उनका बलिदान कर दिया किन्तु इतना कुछ होने पर भी स्वामी जी ने कुछ भी कष्ट का अनुभव नहीं किया और विष देने वाले को भी अच्छी शिक्षा देते हुए क्षमा कर दिया तथा हंसते हंसते अपने जीवन को इस उत्तम कार्य के लिए बलिवेदी की भेंट कर दिया| इस सम्बन्ध में कवि कहते हैं कि:-
                        बलिदान किया बलिवेदी पर जीवन “प्रकाश” हंसते हंसते |
                      सच्चे रहबर  बनकर  फिर चेता दिया ऋषि दयानंद ने ||
     इस प्रकार सन् १९२५ ईस्वी में रचे गए इस गीत से कवि ने जाति को झिन्झोडते हुए उसकी कमजोरियों पर न केवल प्रकाश ही डाला है अपितु उन्हें चेताया भी है और कहा है कि यदि आप कल्याण चाहते हो तो निश्चय ही आपको स्वामी जी के बताये वेद मार्ग को पकड़ना होगा| अन्य कोई ऐसा मार्ग नहीं है, जो आपको सुख दे सके| स्वामी जी ने वेद धर्म को अपनाने के लिए जन जन को प्रेरित किया है| इसलिए वेद का नित्य स्वाध्याय करो और कल्याण का मार्ग पकड़ो|                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     
               कवि के शब्दों में स्वामी दयानंद सरस्वती जी भारत ही नहीं विश्व भर के लोगों को आह्वान् कर रहे हैं कि हे विश्व के लोगो! वेदों की अत्यंत मीठी तान को सुनो, सुनो ही नहीं लगातार इस तान को गाते रहो, बजाते रहो| यह ऐसी मधुर ध्वनि है जिसे गहरी निद्रा में सो रहे महा आलसी लोग भी जाग जाते हैं| इसलिए विश्व के हे प्राणी! वेद रूपि इस वीणा को निरंतर गाते बजाते रहो| इसके लिए कवि ने किस सुन्दरता के साथ इस पद का विन्यास किया है, अवलोकनीय है| :-
                     मधुर वेद  वीणा बजाते  चला जा जो सोते हैं उनको  जागाये  चला जा|
                कुकर्मों के  कीचड़ में जो फंस रहे थे  अविद्या  अँधेरे में जो धंस रहे थे||
                उन्हें सत्य पथ तु बताये चला जा………
       कवि स्वामी जी के उपदेशों को संदेशों को समझाते हुए कहते हैं कि उस प्रभु का कोई आकार नहीं होता| इस कारण ईश्वर संसार के कण कण में व्यापक होने के कारण हम सब में समान रूप में बसा हुआ है| इस नाते से हम सब भाई बहिन हैं| यह ही कारण है कि हम में से पराया कोई नहीं है| जब सब में ही हमें अपना चित्र दिखाई देने लगेगा तो फिर हम किसे शत्रु कहेंगे| फूट का कोई कारण ही नहीं रहेगा| इस बात को बड़े गर्व से कवि ने इस प्रकार व्यक्त किया है:-
                 निराकार प्रभु है जगत् में समाया सभी फिर हैं अपने न कोई पराया|
                घृणा फूट मन से भागाये चला जा…………
       इस गीत के माध्यम से कवि ने सत्य पर आचर्ण करने का अत्यंत ही सुन्दर उपदेश दिया है| कवि का कहना है कि हे मानव! कभी किसी प्रकार के लालच में आकर किसी की भी चोरी मत करना| इतने मात्र से ही कवि को संतोष नहीं हुआ, वह आगे आह्वान् करते हुए कहते हैं कि कभी कोई इस प्रकार का काम भी तुम मत करना, जिस से किसी के दिल को ठेस लगे या किसी का दिल दुखे अथवा किसी को कष्ट अनुभव हो| इसलिए हे मानव! तु ऋषि का यह सन्देश प्रत्येक नगर, गाँव तथा प्रत्येक व्यक्ति के निवास तक पहुंचा दे| इस बात को प्रकाश जी ने इन शब्दों के साथ व्यक्त किया है:-
                 चुराना नहीं लोभ वश धन किसी का दुखाना नहीं तुम कभी मन किसी का 
                यह सन्देश घर घर पहुंचाए चला जा………
       हे मानव! विश्व भर में अनेक भेदभावों के कारण जो अन्याय की अवस्था बन गई है, इस कारण इस संसार की अवस्था एक विश्व संग्राम जैसी ही बन चुकी है, जिसकी भीषण ज्वाला में जलकर यह सब कुछ नष्ट हो रहा है| इसलिए हे मानव! उठ ऋषि के सन्देश को स्वयं भी ग्रहण कर तथा पूरे विश्व को भी मानवता का यह सन्देश पढ़ा कि आर्य समाज के बताये वेद मार्ग पर चलने से ही सब का कल्याण संभव है| इस मार्ग पर चलने से ही यह संसार विनाश लीला से बच सकता है| अन्य कोई मार्ग नहीं| इस बात को कवि ने इस प्रकार व्यक्त किया है:-
   
                     जगत् युद्ध की आग मे जल रहा है प्रबल चक्र अन्याय का चल रहा है
                मनुजता जगत् को सिखाये चला जा……..
      कवि कितना सुंदर सन्देश दे रहा है कि इस समय इस संसार में युद्ध की सी अवस्था बन रही है| सब लोग स्वार्थ में इस प्रकार से डूब रहे हैं कि सब और अन्याय ही अन्याय का राज्य है| इसलिए हे मनुष्य तु ऋषि की बात को मानते हुए वेद की शिक्षाओं पर आचरण करते हुए पूरे संसार को मनुष्यता का सन्देश दे|
      इस के साथ ही कवि यह भी कामना करता है कि स्वामी दयानंद सरस्वती के ऋण से मुक्त होने के लिए पूरे संसार को कृण्वन्तो विश्वार्यम् की उत्तमोत्तम भावना को बढाऑ| पूरे जगत् में जब आर्यों क सन्देश प्रचारित होगा तथा उस सन्देश का आचरण विश्व के लोग करने लगेंगे तो इस में ही आप सब के कर्तव्यों की इतिश्री होगी तथा इस प्रकार ऋषि के बताये ध्येय को पाकर, उनके कर्ज को चुका कर ही यहाँ से हमने जाना है| इस भावना को कवि इस प्रकार प्रकट कर रहे हैं:-
                 अखिल विश्व में भावना भव्य भरकर स्वकर्तव्य  उद्देश्य को पूर्ण करके 
                तु ऋषि ऋण का ऋण चुकाए चका जा……..
      अंत में कवि प्रकाश जी जन जन को यह आह्वान् करते हए कह रहे हैं कि हे मानव! स्वामी दयानंद सरस्वती का यह शुभ सन्देश इस जगत् के प्रत्येक ग्राम, नगर, प्रांत, देश तथा पूरे के पूरे विश्व के लोगों को देते हुए, सब स्थानों पर उस ऋषि की जय जय कार कर:-
                     “प्रकाशार्य” ग्रामों गली हाट घर में नगर देश देशान्तरों विश्व भर में 
                दयानंद की जय मनाये चला जा………..
      कवि छंद और अलंकारों से अपने काव्य को सुन्दर, सुमधुर, सुपाठ्य बनाकर पाठकों को आकर्षित करने की अत्यधिक क्षमता रखते हैं| उन्हें छंद अलंकारों का अत्यन्त ही उत्तम ज्ञान है| इसलिए छंद अलंकारों का प्रयोग करते हुए सोने पर सुहागे का कार्य किया है| इतना ही नहीं वह कहावतों और लोकोक्तियों के महत्त्व और प्रयोग की आवश्यकताओं को समझते हुए कहावतों और लोकोक्तियों के प्रयोग में भी कहीं कोई कमीं नहीं रहने देते| इस कारण जो तथ्य वह अपने पाठकों को समझाना चाहते थे, उसमें वह पूरी प्रकार से सफल हुए हैं|
डा. अशोक आर्य  https://youtu.be/Dbi3x00NHgk
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२०१०१२ गाजियाबाद उ.प्र.भारत 
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ईश्वर पापों को क्षमा नहीं करता

ईश्वर पापों को क्षमा नहीं करता
वेद में कहा है कि–(ऋक.2/12/10)
       भावार्थ– यदि परमेश्वर दुष्ट आचरण वालों को ताड़ना न दे, धार्मिकों का सत्कार न करें और डाकुओं को नष्ट न करें तो न्याय व्यवस्था नष्ट हो जाय।
 यदि परमेश्वर पापों को क्षमा करने लगे तो वह लौकिक शासक या न्यायाधीश के समान हो जायेगा। जो उसकी स्तुति आदि करेंगे, उनके प्रति उसका व्यवहार दया और सहानुभूतिपूर्ण होगा। इसके विपरीत जो उसकी स्तुति आदि नहीं करेंगे, उनके प्रति उसका व्यवहार उपेक्षापूर्ण होगा। यह परोक्षरूप से अपनों का उपकार करना ही है, इसी में स्वार्थ निहित है। तब परमेश्वर सब प्राणियों के लिए एक जैसा नहीं रहेगा। परमेश्वर के इस व्यवहार से वह खुशामदियों से घिरे शासक के समान होगा, जिसमें राग, द्वेष, घृणा, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि सब दोष होंगे। इस प्रकार के जगनियन्ता से न्याय की आशा कैसे की जा सकती है?
       वेद वर्णित परमेश्वर कृतज्ञता पाने के लिए अपराधी को क्षमा नहीं करता, न बदले की भावना से किसी को दण्डित करता है। उसकी न्याय व्यवस्था इतनी पूर्ण है कि उसमें यथायोग्य व्यवहार होने से न निर्दोष दण्डित हो सकता है और न अपराधी छूट सकता है। ‘ना भुक्तं क्षीयते कर्म’– कृतकर्म का फल भोगे बिना उससे छुटकारा नहीं मिल सकता।

 ‘अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्’
        किए हुए कर्म का फल कर्ता को अवश्य ही भोगना पड़ता है।
वस्तुतः परमेश्वर के व्यवहार में दया और न्याय का विलक्षण समन्वय है परमेश्वर द्वारा दिया गया दण्ड दुष्कर्मी पर भी दया है, क्योंकि दण्ड का फल पाकर वह दुष्कर्मो के फल से मुक्त हो जाता है। वहीं वह यह भी जान लेता है कि अगर वेद विरुद्ध आचरण करेगा अर्थात दुष्कर्म या अशुभ कर्म करेगा तो उसका फल उसे अवश्य ही मिलेगा। परिणामस्वरूप भविष्य में वह दुष्कर्मों से विरत हो जाता है और इनसे मिलने वाले दुःख, कष्ट और पीड़ा से बच जाता है।                       दुष्कर्मों को त्याग कर सतत शुभ कर्मों का सम्पादन करते रहने से उसे जन्म- जन्मान्तरों में सुख आनन्द की प्राप्ति होती रहती है।
प्रायश्चित्त  या पश्चाताप भविष्य में पापकर्मों से निवृत्त करने में सहायक हो तो सकते हैं लेकिन कृतकर्मों का फल अवश्य मिलता है। वस्तुतः परमेश्वर तटस्थ भाव से सब जीवो के कर्मों का साक्षी रहते हुए ही न्यायपरायण हो सकता है और है। वेद का आदेश है–  (ऋक.1/23/22)
       भावार्थ– मनुष्य के द्वारा जैसा पाप और पुण्य किया जाता है, वैसा ही ईश्वर की न्याय व्यवस्था से उन्हें (फल) प्राप्त होता है, यह निश्चय है।
 प्रभात मुनि, आर्य वानप्रस्थ आश्रम, 
ज्वालापुर, हरिद्वार।
“तमसो मा ज्योतिर्गमय” पुस्तक के सौजन्य से।
(forwarded as received)

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