“शुद्धि” – ऋषि दयानंद की दृष्टि में •

“शुद्धि” – ऋषि दयानंद की दृष्टि में •

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– डॉ. रामप्रकाश

ऋषि दयानंद से पूर्व हिंदू मतावलंबी ईसाई या मुसलमान हो सकता था पर ईसाई या मुसलमान को वैदिक धर्म ग्रहण करने की अनुमति नहीं थी। यह प्रश्न केवल मज़हब परिवर्तन का नहीं है अपितु वैचारिक स्वतन्त्रता का है। विचारशील व्यक्ति को बिना किसी भय और प्रलोभन के अपनी पूजा-पद्धति निश्चित करने का अधिकार क्यों न हो? उसे अपना आराध्यदेव, धार्मिक ग्रन्थ, रीति रिवाज तय करने के मानवीय अधिकार से वंचित क्यों रखा जाए? ऋषि दयानन्द व्यक्ति के इस अधिकार को स्वीकार करते हैं। किसी अन्य मत से वैदिक धर्म में प्रवेश की प्रक्रिया के सन्दर्भ में शुद्धि शब्द का प्रयोग किया जाता है। परन्तु यह मानना कि हिन्दू कहलाने वाला व्यक्ति चाहे कितना भी पतित हो, वह शुद्ध और अन्य मतावलम्बी चाहे कितना ही सज्जन हो, अशुद्ध है; ऋषि दयानन्द की धारणा के विपरीत है। दयानन्द विचार, कर्म, आचार तथा खानपान की शुद्धि पर बल देते हैं।

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