उपासना- उपासना का अर्थ

उपासना- उपासना का अर्थ
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परमात्मा के समीप बैठना। कई व्यक्ति शंका किया करते हैं कि जो परमात्मा सर्वव्यापक है। कण-कण में विद्यमान है। वह हमसे दूर कैसे है? समीप बैठने का अर्थ है कि पहले हम उससे दूर थे और उपासना के द्वारा समीप आएंगे। यदि ऐसा ही है तो इससे तो परमात्मा की सर्वव्यापकता में दोष आ जाएगा।

सुनने में शंका बड़ी युक्तियुक्त लगती है परन्तु ऐसा है नहीं। हम जब उपासना की बात कहते हैं तो दूरी तो स्पष्ट सिद्ध होती नजर आती है। वास्तव में दूरी तीन प्रकार की होती है।
पहली दूरी होती है स्थान की। अमृतसर से दिल्ली 500 किलोमीटर दूर है। ईश्वर और हमारे मध्य ऐसी कोई दूरी नहीं। ईश्वर सर्वव्यापक है अतः हमसे दूर नहीं।

दूसरी दूरी होती है समय की। जैसे महाभारत का काल आज से लगभग 5000 वर्ष पहले था। परन्तु ईश्वर और जीव के मध्य ऐसी दूरी भी नहीं। दोनों सदा से हैं और सदा बने रहेंगे। कोई ऐसा समय न था या होगा जब ईश्वर तो होगा और जीव न होगा या जीव तो होगा परन्तु ईश्वर न होगा।

तीसरी दूरी आती है अज्ञान की। जब तक ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान न हो ईश्वर का यथार्थ ज्ञान नहीं होगा और यह दूरी बनी रहती है। जूँ हि यह ज्ञान हो जाता है दूरी समाप्त हो जाती है। वास्तव में उपासना का अर्थ इसी दूरी को दूर करना है।
प्रभात मुनि, (आत्मदर्शन)” पुस्तक के सौजन्य से।
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