हिन्दू हाथ में इस्लाम की तलवार

हिन्दू हाथ में इस्लाम की तलवार


हिन्दू हाथ में इस्लाम की तलवार
(लेखक: शंकर शरण)
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बादशाह अकबर के समय मुहावरा शुरू हुआ: ‘हिन्दू हाथों में इस्लाम की तलवार’। तब जब अकबर ने राजपूतों से समझौता कर अपने साम्राज्य के बड़े पदों पर रखना शुरू किया। जिन राजपूतों ने चाहे-अनचाहे पद लिए, उन्हें अकबर की ओर से हिन्दू राजाओं के विरुद्ध भी लड़ने जाना ही होता था। सो, जिस इस्लामी साम्राज्यवाद के विरुद्ध हिन्दू पिछली आठ सदियों से लड़ते रहे थे, उस में पहली बार विडंबना तब जुड़ी जब इस्लाम की ओर से लड़ने का काम कुछ हिन्दुओं ने भी उठा लिया।

वह परंपरा अभी तक चल रही है, बल्कि मजबूत भी हुई है। आम गाँधी-नेहरूवादी, सेक्यूलर, वामपंथी हिन्दू वही करते हैं। इतनी सफलता से कि आज इस मुहावरे का प्रयोग भी वर्जित-सा है! मीडिया व बौद्धिक जगत तीन चौथाई हिन्दुओं से भरा होकर भी हिन्दू धर्म-समाज को मनमाने लांछित, अपमानित करता है। किन्तु इस्लामी मतवाद या समाज के विरुद्ध एक शब्द बोलने की अनुमति नहीं देता। इस रूप में, हिन्दू धर्म के प्रति जो बौद्धिक-राजनीतिक रुख पाकिस्तान, बंगलादेश में है, वही भारत में!

ऐसे ही योद्धा विद्वान लेखक तथा कांग्रेस नेता शशि थरूर हैं। भाजपा के 2019 चुनाव जीतने की स्थिति में उन्होंने यहाँ ‘हिन्दू पाकिस्तान’ बनने का डर जताया। फिर कहा कि भारत में चार सालों में सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी, कि यहाँ आज ‘‘एक मुसलमान की अपेक्षा एक गाय अधिक सुरक्षित है।’’
थरूर ने वर्ष 2016 में 869 सांप्रदायिक दंगे होने का उल्लेख किया। पर मृतकों में मात्र तीन नाम लिए: जुनैद, अब्बास, अखलाक। जो कुछ पत्रकारों, बुद्धिजीवियों की चुनी हुई कृपा से देश-विदेश में सैकड़ों बार दुहराए जा चुके हैं। यानी दंगों में हिन्दू नहीं मरे। न इसी दौरान यहाँ किसी मुस्लिम ने किसी हिन्दू की हत्या की!

सांप्रदायिक दंगों पर ऐसा कथन ‘सच छिपाने, झूठ फैलाने’ का ही उदाहरण है। भारत में दंगों का सौ साल से अनवरत इतिहास है। इस पर कौन सा शोध हुआ? न्यायिक आयोगों की रिपोर्टें, आँकड़े क्या कहते हैं? गंभीरता से इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढने पर उलटा नजारा दिखेगा।
दंगे किस ने शुरू किए, तथा कितने हिन्दू व कितने मुस्लिम मरे – इन दो बातों को छोड़ कर सारा प्रचार होता है। एक बार कांग्रेस शासन में ही, संसद में गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया था कि वर्ष 1968 से 1970 के बीच हुए 24 दंगों में 23 दंगे मुस्लिमों द्वारा शुरू किए गए।

वह कोई अपवाद काल नहीं था। आज भारत में कोई जिला भी नहीं जहाँ से मुसलमानों को मार भगाया गया। जबकि पूरे कश्मीर प्रदेश के अलावा, असम और केरल में भी कई जिले हिन्दुओं से लगभग खाली हो चुके। अब जम्मू, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार में भी कैराना जैसे क्षेत्र बन और बढ़ रहे हैं।
इसलिए, दंगे इस्लामी राजनीति की प्रमुख तकनीक हैं। स्वयं जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि मुस्लिम लीग का मुख्य काम सड़कों पर हिन्दू-विरोधी दंगे करना है। स्वतंत्र भारत में भी यह नहीं बदला। हाल का सब से बड़ा कांड भी इस का प्रमाण है। पहले मुस्लिमों ने गोधरा में 59 हिन्दू तीर्थयात्रियों को जिन्दा जला दिया! तब गुजरात दंगा हुआ। ऐसे तथ्य छिपाकर थरूर इस्लामी आक्रामकता को ही बढ़ाते हैं।

कई दलों ने यहाँ राजनीतिक उद्देश्यों से हिन्दू-विरोधी प्रचार किया है। मुस्लिम ‘सुरक्षा’ के नाम पर उन्हें विशेषाधिकार, विशेष आयोग, संस्थान, अनुदान, आदि दे-देकर उन के वोट लिए हैं। सात वर्ष पहले कांग्रेस सरकार द्वारा ‘सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा निरोध विधेयक’ (2011) उसी की भयंकर परिणति थी। उस में मान लिया गया था कि हर सांप्रदायिक हिंसा के दोषी सदैव हिन्दू और पीड़ित मुस्लिम होंगे! उसी आधार पर ऐसी निरोधक और दंड-व्यवस्था प्रस्तावित हुई थी कि व्यवहारतः यहाँ तानाशाही मुगल-शासन बन जाता।
यहाँ हिन्दू-मुसलमानों के संबंध में उत्पीड़ित-उत्पीड़क का पूरा मामला ऐसा ऑर्वेलियन है कि इस के पाखंड और अन्याय को सामान्य भाषा में रखना कठिन है! जबकि यह कोई दूर देश या सदियों पुरानी बातें नहीं। सामने होने वाली दैनं-दिन घटनाएं झुठलायी, विकृत की जाती हैं।

जैसे, 6 साल पहले सहारनपुर में कांग्रेस के लोक सभा प्रत्याशी इमरान मसूद ने खुली सभा में कहा कि वह नरेंद्र मोदी को टुकड़े-टुकड़े कर डालेगा। उपस्थित भीड़ ने ताली बजाई। उस से पहले अकबरुद्दीन ओवैसी ने कहीं और बड़ी सभा में घंटे भर उस से भी अधिक हिंसक भाषण अनवरत तालियों के बीच दिया था। यह सब पीड़ित का नहीं, बल्कि हमलावर का अंदाज है। जिस में हिन्दुओं को भेड़-बकरी मानकर चला जाता है।
इसीलिए, किसी घटना को अलग, अधूरा परोस कर थरूर जैसे लेखक और पार्टियाँ भारत और हिन्दुओं की भारी हानि करते रहे हैं। यहाँ हिन्दू मरते, अपमानित, विस्थापित होते, इंच-इंच अपनी भूमि मुस्लिमों के हाथों खोते हुए भी उलटे आक्रामक शैतान जैसे चित्रित किए जाते हैं।

यह संयोग नहीं, कि सांप्रदायिक दंगे गंभीरतम विषय होते हुए भी यहाँ इस पर शोध, तथ्यवार विवरण, आदि नहीं मिलते! इस के पीछे सचाई छिपाने की सुविचारित मंशा है। खोजने पर एक विदेशी विद्वान डॉ. कोएनराड एल्स्ट की पुस्तक ‘कम्युनल वायोलेंस एंड प्रोपेगंडा’’ (वॉयस ऑफ इंडिया, 2014) मिलती है, जिस में यहाँ सांप्रदायिक दंगों का एक सरसरी हिसाब है। यह पुस्तक भारत में गत छः-सात दशक के दंगों की समीक्षा है। कायदे से ऐसी पुस्तक सेक्यूलर-वामपंथी प्रोफेसरों, पत्रकारों को लिखनी चाहिए थी जो सांप्रदायिकता का रोना रोते रहे हैं! पर उन्होंने जान-बूझ कर नहीं लिखा।
यदि कोएनराड की पुस्तक को डॉ. अंबेदकर की ‘पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया’ (1940) के साथ मिला कर पढ़ें, तो दंगों की असलियत दिखेगी। दंगों के हिसाब में पाकिस्तान और बंगलादेश वाली भारत-भूमि के आँकड़े भी जोड़ने जरूरी हैं। उन दोनों देशों में इधर सैकड़ों मंदिरों के विध्वंस का ‘मूल कारण’ यहाँ बाबरी-मस्जिद गिराने को बताया गया था। अर्थात्, तीन देश हो जाने के बाद भी हिन्दू-मुस्लिम खून में आपसी संबंध है। अतः तमाम हिन्दू हानियाँ जोड़नी होगी। बाबरी-मस्जिद गिरने से पहले, केवल 1989 ई. में, बंगला देश में बेहिसाब मंदिर तोड़े गए थे। उस से भी पहले वहाँ लाखों हिन्दू निरीह कत्ल हुए थे।
सच यह है कि 1947 से 1989 ई. तक भारत में जितने मुसलमान मरे, उतने हिन्दू पूर्वी पाकिस्तान (बंगलादेश) में केवल 1950 ई. के कुछ महीनों में ही मारे जा चुके थे। आगे भी सिर्फ 1970-71 ई. के दो वर्ष में वहाँ कम से कम दस लाख हिन्दुओं का संहार हुआ। विश्व-प्रसिद्ध पत्रकार ओरियाना फलासी ने अपनी पुस्तकों ‘रेज एंड प्राइड’ (पृ. 101-02) तथा ‘फोर्स ऑफ रीजन’ (पृ. 129-30) में ढाका में हिन्दुओं के सामूहिक संहार का एक लोमहर्षक प्रत्यक्षदर्शी विवरण दिया है। पूर्वी पाकिस्तान में हुआ नरसंहार गत आधी सदी में दुनिया का सब से बड़ा था! उस के मुख्य शिकार हिन्दू थे, यह पश्चिमी प्रेस में तो आया, पर भारत में छिपाया गया।
पूरा हिसाब करें, तो केवल 1947 ई. के बाद हुई सांप्रदायिक हिंसा में अब तक मुसलमानों की तुलना में नौ गुना हिन्दू मारे गए हैं ! पर यहाँ इस्लाम की तलवार थामे बौद्धिक ही प्रभावशाली हैं

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उपासना- उपासना का अर्थ

उपासना- उपासना का अर्थ

उपासना- उपासना का अर्थ
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परमात्मा के समीप बैठना। कई व्यक्ति शंका किया करते हैं कि जो परमात्मा सर्वव्यापक है। कण-कण में विद्यमान है। वह हमसे दूर कैसे है? समीप बैठने का अर्थ है कि पहले हम उससे दूर थे और उपासना के द्वारा समीप आएंगे। यदि ऐसा ही है तो इससे तो परमात्मा की सर्वव्यापकता में दोष आ जाएगा।

सुनने में शंका बड़ी युक्तियुक्त लगती है परन्तु ऐसा है नहीं। हम जब उपासना की बात कहते हैं तो दूरी तो स्पष्ट सिद्ध होती नजर आती है। वास्तव में दूरी तीन प्रकार की होती है।
पहली दूरी होती है स्थान की। अमृतसर से दिल्ली 500 किलोमीटर दूर है। ईश्वर और हमारे मध्य ऐसी कोई दूरी नहीं। ईश्वर सर्वव्यापक है अतः हमसे दूर नहीं।

दूसरी दूरी होती है समय की। जैसे महाभारत का काल आज से लगभग 5000 वर्ष पहले था। परन्तु ईश्वर और जीव के मध्य ऐसी दूरी भी नहीं। दोनों सदा से हैं और सदा बने रहेंगे। कोई ऐसा समय न था या होगा जब ईश्वर तो होगा और जीव न होगा या जीव तो होगा परन्तु ईश्वर न होगा।

तीसरी दूरी आती है अज्ञान की। जब तक ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान न हो ईश्वर का यथार्थ ज्ञान नहीं होगा और यह दूरी बनी रहती है। जूँ हि यह ज्ञान हो जाता है दूरी समाप्त हो जाती है। वास्तव में उपासना का अर्थ इसी दूरी को दूर करना है।
प्रभात मुनि, (आत्मदर्शन)” पुस्तक के सौजन्य से।
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“शुद्धि” – ऋषि दयानंद की दृष्टि में •

“शुद्धि” – ऋषि दयानंद की दृष्टि में •

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– डॉ. रामप्रकाश

ऋषि दयानंद से पूर्व हिंदू मतावलंबी ईसाई या मुसलमान हो सकता था पर ईसाई या मुसलमान को वैदिक धर्म ग्रहण करने की अनुमति नहीं थी। यह प्रश्न केवल मज़हब परिवर्तन का नहीं है अपितु वैचारिक स्वतन्त्रता का है। विचारशील व्यक्ति को बिना किसी भय और प्रलोभन के अपनी पूजा-पद्धति निश्चित करने का अधिकार क्यों न हो? उसे अपना आराध्यदेव, धार्मिक ग्रन्थ, रीति रिवाज तय करने के मानवीय अधिकार से वंचित क्यों रखा जाए? ऋषि दयानन्द व्यक्ति के इस अधिकार को स्वीकार करते हैं। किसी अन्य मत से वैदिक धर्म में प्रवेश की प्रक्रिया के सन्दर्भ में शुद्धि शब्द का प्रयोग किया जाता है। परन्तु यह मानना कि हिन्दू कहलाने वाला व्यक्ति चाहे कितना भी पतित हो, वह शुद्ध और अन्य मतावलम्बी चाहे कितना ही सज्जन हो, अशुद्ध है; ऋषि दयानन्द की धारणा के विपरीत है। दयानन्द विचार, कर्म, आचार तथा खानपान की शुद्धि पर बल देते हैं।

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आज का वेदमंत्र

आज का वेदमंत्र, अनुवाद महात्मा ज्ञानेन्द्र अवाना जी द्वारा, प्रचारित आर्य जितेन्द्र भाटिया द्वारा, ऑडियो रिकॉर्डिंग सुकांत आर्य द्वारा🙏🌸

अस्य मे द्यावापृथिवी ऋतायतो भूतमवित्री वचसः सिषासतः।

ययोरायुः प्रतरं ते इदं पुर उपस्तुते वसूयुर्वां महो दधे॥ ऋग्वेद २-३२-१॥🙏🌸

मैं द्यावापृथ्वी को श्रेष्ठ मानता हूं। मैं उनसे प्रार्थना करता हूं कि मेरी धर्म युक्त वाणी को संरक्षण प्रदान करें। मेरे शरीर,मन और आत्मा को उत्तम भोजन दें। मुझे सत्य धन प्रदान करें।🙏🌸

I praise the earth and heaven. l adore and pray them both to protect my truthful voice. Give noble food to my body, mind and soul.  Grant me true wealth. 

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सृष्टि, प्राणी-जगत, भाषा एवं ज्ञान की उत्पत्ति किससे हुई

सृष्टि, प्राणी-जगत, भाषा एवं ज्ञान की उत्पत्ति किससे हुई?”

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हम संसार में रहते हैं और सृष्टि वा संसार को अपनी आंखों से निहारते हैं। सृष्टि का अस्तित्व प्रत्यक्ष एवं प्रामणिक है। हमारी यह सृष्टि कोई अनुत्पन्न, अनादि व नित्य रचना नहीं है। इसका अतीत में आविर्भाव व उत्पत्ति हुई है। इसके अनेक प्रमाण है। यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है कि सृष्टि सहस्रों व करोड़ों वर्ष पूर्व उत्पन्न हुई थी। सृष्टि में हम वनस्पति, अन्न एवं प्राणि जगत को भी देखते हैं। इनका भी आरम्भ सृष्टि उत्पन्न होने के बाद हुआ। सृष्टि में मनुष्य भी एक प्रमुख प्राणी है। यह पृथिवी में अनेक स्थानों पर रहते हैं और ज्ञान तथा भाषा से युक्त हैं। सृष्टि के उत्पन्न होने के बाद ही जल, वायु, अग्नि आदि पदार्थों की उत्पत्ति हुई और इसके बाद अन्न, वनस्पतियां तथा प्राणी जगत की उत्पत्ति हुई। सृष्टि में मनुष्यों के उत्पन्न होने पर उनके जीवन निर्वाह हेतु भाषा एवं ज्ञान की आवश्यकता आरम्भ से ही थी। यह भाषा व ज्ञान भी मनुष्य अपने साथ लेकर उत्पन्न नहीं हुए थे अपितु यह उनकी उत्पत्ति के बाद ही उत्पन्न हुआ। यह सब पदार्थ किससे उत्पन्न हुए, यह जानना आवश्यक एवं स्वाभाविक है। यदि इस विषय में हम साधारण व विशेष ज्ञानी मनुष्यों से प्रश्न करें तो इसका समुचित उत्तर नहीं मिलता। इस विषय में लोग नाना प्रकार की कल्पनायें कर उत्तर दिया करते हैं। इन प्रश्नों के सही उत्तर वैदिक धर्म एवं संस्कृति से इतर किसी भी परम्परा, मत व संस्कृति यहां तक की आधुनिक विज्ञान के पास भी उपलब्ध नहीं हैं। वैदिक धर्म व परम्पराओं में ही इनके यथार्थ उत्तर मिलते हैं। यह उत्तर महाभारत युद्ध के पश्चात के वर्षों में विस्मृत हो गये थे जिन्हें ऋषि दयानन्द ने अपने अदम्य साहस एवं पुरुषार्थ से खोज निकाला और उनका प्रचार कर उसे जन-जन तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त की। हमारा सौभाग्य है कि हम इन सभी प्रश्नों के यथार्थ उत्तर जानते हैं। 

ऋषि दयानन्द ने ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानने सहित मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिये अपने पितृ गृह का सन् 1846 में त्याग किया था और देश में घूम घूम कर उन दिनों के ज्ञानी पुरुषों, विद्वानों, धर्माचार्यों, योगियों आदि की संगति कर तथा उन दिनों उपलब्ध समस्त साहित्य का अवलोकन कर अपनी शंकाओं व प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने के प्रयत्न किये थे। लगभग 16 वर्ष के उनके प्रयत्नों का परिणाम यह हुआ था कि उन्हें अपने सभी प्रश्नों व शंकाओं के यथार्थ समाधान मिल गये थे। इसके अतिरिक्त वह योग विद्या सीख कर उसमें प्रवीण होकर ईश्वर का साक्षात्कार करने में भी सफल हुए थे। ईश्वर सिद्धि एवं ईश्वर का साक्षात्कार जीवन में प्राप्त की जाने वाली सबसे बड़ी सफलतायें होती है। इस अवस्था को प्राप्त होकर मनुष्य संसार के विषय में जो भी जानना चाहता है, वह उपलब्ध ज्ञान के चिन्तन-मनन व अपनी ऊहा, ध्यान व विवेक से जान लेता है। ऋषि दयानन्द ने योग के सभी आठ अंगों को सफलता पूर्वक जाना व प्रायोगिक दृष्टि से भी सिद्ध किया था और इसके साथ ही ज्ञान के प्रमुख ग्रन्थ ईश्वरीय ज्ञान वेद को वेदांगों वा व्याकरण सहित जाना था। इससे वह अज्ञान व अन्धविश्वासों से सर्वथा मुक्त तथा सभी विद्याओं को बीज रूप में जानने में सफल हुये थे। इस स्थिति को प्राप्त होकर उन्होंने वेदों सहित ईश्वर व आत्मा संबंधी रहस्यों का प्रचार करते हुए इन सभी प्रश्नों के उत्तर अपने व्याख्यानों तथा बाद में वेद प्रचार एवं मत-मतान्तरों की समीक्षा का अपूर्व ग्रन्थ ‘सत्यार्थप्रकाश’ लिखकर प्रस्तुत किये थे। उनके दिये उत्तर ज्ञान व तर्क की कसौटी पर सत्य व खरे हैं। इसको जानने के लिये सभी मनुष्यों को ऋषि दयानन्द जी के सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, ऋग्वेद-यजुर्वेद भाष्य, ऋषि जीवन चरित्र सहित वैदिक विद्वानों के वेदभाष्यों का अध्ययन करना चाहिये। ऐसा करने से मनुष्य की सभी शंकायें व भ्रम दूर हो जाते हैं और वह ईश्वर व आत्मा के ज्ञान सहित सांसारिक ज्ञान से भी युक्त हो जाता है। यही मनुष्य जीवन का प्रमुख उद्देश्य भी है। अतः संसार के सभी लोगों को वेद व सत्यार्थप्रकाश की शरण में आना चाहिये। इससे उन्हें वह लाभ होगा जो अन्यत्र कहीं से नहीं हो सकता और हानि किसी प्रकार की नहीं होगी। यही नहीं, यदि इन ग्रन्थों का अध्ययन कर योग साधना नहीं की तो जन्म व परजन्मों में सर्वत्र हानि ही हानि होना निश्चित है। 

सब मनुष्य यह जानना चाहते हैं कि यह संसार किससे उत्पन्न हुआ? इसका उत्तर वैदिक साहित्य से यह मिलता है कि यह संसार सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा ने बनाया है। वह इस जगत् का सर्वज्ञान व सर्वशक्तियों से युक्त निमित्त कारण है। अनादि त्रिगुणात्मक सत्व, रज व तम गुणों से युक्त सूक्ष्म प्रकृति इस जगत का उपादान कारण है जो कि एक जड़ पदार्थ है। इस प्रकृति का उपयोग ही परमात्मा इस सृष्टि को बनाने के लिये करते हैं। यदि प्रकृति न होती तो यह संसार बन नहीं सकता था। यदि इस प्रकृति में सत्व, रज व तम गुण न होते तो भी यह सृष्टि अस्तित्व में नहीं आ सकती थी। यह प्रकृति अनादि, नित्य, अविनाशी, ईश्वर व जीव से पृथक सत्ता होने सहित ईश्वर के पूर्ण नियंत्रण में रहती है। यह प्रकृति अपने आप संयोग व वियोग करने तथा नये पदार्थों को उत्पन्न करने में सर्वथा असमर्थ है। अतः जो वैज्ञानिक प्रकृति से स्वतः सृष्टि का निर्माण स्वीकार करते हैं, परमात्मा को सृष्टिकर्ता न मानने के कारण, प्रकृति से स्वयं सृष्टि रचना होने का उनका सिद्धान्त खण्डित हो जाता है। सृष्टि रचना का वर्णन वेद, दर्शन, उपनिषद आदि ग्रन्थों के आधार पर सत्यार्थप्रकाश में भी पढ़ने को मिलता है। सत्यार्थप्रकाश के आठवें समुल्लास में इन सभी ग्रन्थों के आधार पर अत्यन्त संक्षिप्त वर्णन ऋषि दयानन्द ने किया है। उस वर्णन को सभी मनुष्यों को पढ़कर हृदयंगम कर लेना चाहिये और निभ्र्रान्त हो जाना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश में सृष्टि उत्पत्ति के प्रकरण में ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि प्रकृति, जीव और परमात्मा, यह तीनों अज अर्थात् अजन्मा व अनुत्पन्न हैं अर्थात् जनका का जन्म कभी नहीं होता और न कभी जन्म लेते हैं अर्थात् ये तीन सब जगत् के कारण वा आधार हैं। इन का उत्पत्तिकर्ता, कारण व आधार कोई नहीं है। इस अनादि प्रकृति का भोग अनादि जीव करता हुआ इसमें फंसता है अर्थात् बन्धन में पड़ता है और इस प्रकृति में परमात्मा न फंसता और न उस का भोग करता है। प्रकृति के लक्षण व रचना पर प्रकाश डालते हुए ऋषि दयानन्द कहते हैं कि सत्व, रजः तथा तम अर्थात् जड़ता यह तीन वस्तु मिलकर जो एक संघात है उसका नाम प्रकृति है। उससे महतत्व बुद्धि, उससे अहंकार, उससे पांच तन्मात्रा सूक्ष्म भूत और दश इन्द्रियां तथा ग्यारहवां मन उत्पन्न होता है। पांच तन्मात्राओं से पृथिव्यादि पांच भूत ये चैबीस और पच्चीसवां पुरुष अर्थात् जीव और परमेश्वर हैं। इन में से प्रकृति अविकारिणी और महतत्व अहंकार तथा पांच सूक्ष्म भूत प्रकृति का कार्य और इन्द्रियों, मन तथा स्थूलभूतों का कारण हैं। पुरुष अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा न किसी की प्रकृति अर्थात् उपादान कारण हैं और न किसी पदार्थ के कार्य हैं। इस प्रकार परमात्मा ने प्रकृति से जीवों के लिये इस सृष्टि की रचना की है तथा वही इस समस्त सृष्टि को धारण कर संसार व सभी प्राणियों का पालन कर रहा है। 

 संसार में हमें जो प्राणी जगत दिखाई देता है वह भी परमात्मा ने ही उत्पन्न किया वा रचा है। परमात्मा का सत्यस्वरूप भी सबके जानने योग्य है। परमात्मा का स्वरूप सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है तथा सभी मनुष्यों के उपासना करने योग्य है। ईश्वर की उपासना में ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानना, उसके उपकारों पर विचार व ध्यान करना तथा उसी में मग्न होकर उसका धन्यवाद करते हुए उससे एकाकार होने का प्रयत्न करना होता है। ऐसा करते हुए ही दीर्घकाल की साधना के बाद मनुष्य को ईश्वर का प्रत्यक्ष व साक्षात्कार होता है। यही मनुष्य के जीवन का परम व चरम लक्ष्य होता है। ईश्वर के विषय में यह भी जानना चाहिये कि वह सभी जीवों के कर्मों का साक्षी होता है तथा जीवों को उनके कर्मों का फल प्रदाता होता है। वह जीवों को उनके सभी कर्मों का फल भुगाता है। मनुष्य अपने किसी एक कर्म का भोग किये छूटता नहीं है। अतः मनुष्य को सावधानी पूर्वक ही अपने प्रत्यक कर्म को करना चाहिये। इसका कारण यह है कि उसे कालान्तर में अपने सभी शुभ व अशुभ कर्मों का फल सुख व दुःख के रूप में अवश्य ही भोगना पड़ेगा। तब उसे अपने अशुभ कर्मों के कारण मिलने वाले दुःख से पश्चाताप होता है। इस प्रकार हमें सृष्टि की रचना तथा प्राणी जगत की उत्पत्ति परमात्मा से ही होने का समाधान वैदिक साहित्य से प्राप्त होता है जिसे हमारी आत्मा सत्य स्वीकार करती है। यही भ्रान्ति रहित सत्य ज्ञान है। इसे सब मनुष्यों को स्वीकार करना चाहिये और इसका प्रचार भी करना चाहिये। 

संसार में आदि भाषा संस्कृत, जैसी की वेदों में है, तथा समस्त सत्य ज्ञान भी परमात्मा से ही प्राप्त हुआ है। वेद परमात्मा प्रदत्त वह ज्ञान है जो उसने सृष्टि की आदि में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को प्रदान किया था। यही ज्ञान इन ऋषियों से ब्रह्मा जी को प्राप्त होकर परम्परा से अद्यावधि 1.96 अरब वर्ष बाद भी उपलब्ध है और मनुष्य की सभी शंकाओं व भ्रमों को दूर करता है। परमात्मा यदि भाषा व वेद में निहित सभी सत्य विद्याओं का ज्ञान न देता तो मनुष्य आज तक अज्ञानी ही रहते। मनुष्यों में यह सामथ्र्य नहीं है कि वह स्वयं आदि व प्रथम भाषा, जो कि संस्कृत है तथा जो परमात्मा ने वेदों के द्वारा दी है, उसका निर्माण कर सके। मनुष्य आदि भाषा सहित ज्ञान की उत्पत्ति करने में असमर्थ हैं। मनुष्यों की स्थिति तो यह है कि आज भी वह वेदों की विशिष्ट मान्यताओं को जानकर उससे लाभ नहीं उठा पा रहे हैं तथा भ्रमों व अन्धकार में जी रहे हैं। अतः मनुष्य आदि काल व कालान्तर में भाषा व वेद ज्ञान के समान किसी ज्ञान की उत्पत्ति कर सकते थे, ऐसा करना असम्भव है। भाषा व ज्ञान भी सृष्टि की आदि में वेदों के रूप में परमात्मा से ही मिला है। यही सत्य एवं यथार्थ तथ्य है। 

हमने ऋषि दयानन्द द्वारा उद्धाारित वैदिक साहित्य से मनुष्य जीवन की मौलिक शंकाओं के समाधान संक्षेप में अपनी मति से दिये हैं। पाठक महानुभाव वेद व सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का अध्ययन कर इन विषयों में विस्तृत ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

https://youtu.be/pclS38L2Ano

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स्वाभिमानी बनें, अभिमानी नहीं

स्वाभिमानी बनें, अभिमानी नहीं।  स्वाभिमानी व्यक्ति आनन्दित रहता है, और  अभिमानी तो सदा शोक सागर में ही डूबा रहता है।
       क्या अंतर है, स्वाभिमान और अभिमान में? स्वाभिमान का अर्थ है – ईश्वर ने आपको जितनी विद्या बल बुद्धि शक्ति सामर्थ्य आदि दिया है, अपने पास उतना ही मान कर चलें। उसी के आधार पर लोगों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करें, और अपनी वास्तविक योग्यता के आधार पर, समाज के लोगों से, उचित धन सम्मान प्राप्ति की इच्छा करें। इसका नाम है स्वाभिमान. 
     और ईश्वर की दी हुई आपके पास  जितनी विद्या बुद्धि बल धन योग्यता आदि वस्तुएं वास्तव में हैं, अपने पास उससे कई गुना अधिक मानना, अनेक क्षेत्रों में अनधिकार चेष्टाएँ करना, योग्यता से अधिक धन सम्मान की इच्छा करना, और अपनी योग्यता अधिक मानकर लोगों पर अनुचित दबाव डालना, उनके साथ लड़ाई झगड़े करना, झूठ छल कपट का प्रयोग करके न्याय के विरुद्ध आचरण करना, सब जगह अपनी मनमानी करना, दूसरों का शोषण करना आदि, ये सब अभिमान के लक्षण हैं। 
       ईश्वर स्वाभिमानी व्यक्ति पर, बहुत आनंद उत्साह बल प्रेरणा ज्ञान परोपकार की भावना नम्रता आदि गुणों की वर्षा करके उसे निहाल कर देता है। और अभिमानी व्यक्ति के मन में भय शंका लज्जा चिंता तनाव इत्यादि उत्पन्न करके, इस दंड के माध्यम से उसे सदा दुखी करता रहता है। यह सब ईश्वर इसलिए करता है, क्योंकि वह स्वभाव से न्यायकारी है। वह सब आत्माओं के लिए वेदो में उपदेश करता है, कि हे आत्माओ! यदि तुम मेरी बात मानोगे, तो मैं तुम्हें सुख दूँगा। यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगे, तो मैं तुम्हें दुख दूँगा। 
        तो वेदों में ईश्वर का यह संदेश है, कि सब लोग अपने अपने कर्मों का फल भोगते हुए, जिसको मैंने जितने साधन संपत्तियाँ दी हैं, उसी के आधार पर वह आगे भी दूसरों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करे। पूरे स्वाभिमान के साथ जीए। अभिमानी न बने।
       जो लोग ईश्वर के इस संदेश का पालन करते हैं, ईश्वर उन्हें आनंदित कर देता है। उन्हें स्वाभिमान की मोटरबोट में बिठाकर बहुत तेज गति से लक्ष्य पर पहुंचा देता है। और जो इस संदेश का पालन नहीं करते, ईश्वर उन्हें उक्त प्रकार से दंड देता है। इस दंड को भोगते हुए, ऐसे अभिमानी लोग सारा जीवन शोक सागर में डूबे रहते हैं।
      अब दोनों मार्ग आपके सामने हैं, जो आपको अच्छा लगे, उस पर चलें।
स्वामी विवेकानंद परिव्राजक.

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आज का वेद मंत्र

आज का वेद मंत्र

ओ३म् स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न पूषा विश्ववेदा: । स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽअरिष्नेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ( यजुर्वेद २५|१९)

अर्थ :- बहुत सुनने वाला वा बहुत कीर्ति वाला परमैश्वर्यवान् प्रभु हमें कल्याण प्रदान करें । पुष्टिकर्त्ता- सर्वज्ञाता ईश्वर हमारे लिए कल्याण की वर्षा करें ।तेजस्वी दुःखहर्त्ता परमेश्वर हमें आनन्द देवें ।बड़े बड़े महान् पदार्थों का पति परमेश्वर हमारे लिए कल्याणकारी हो।

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