वृक्षादि में जीवात्मा भाग एक-

वृक्षादि में जीवात्मा भाग एक-
– डा मुमुक्षु आर्य

प्रकृति में कुछ सजीव कुछ निर्जीव चीजें हैं। जिनमे जीव है वह सजीव जिनमे जीव नही है वह निर्जीव। अक्सर जिनमे जीवन है वह सजीव हैं उन में जीवात्मा भी है। लेकिन सभी में ऐसा हो ये जरूरी नहीं। तो प्रश्न उठते हैं-  क्या बिना जीवात्मा के जीवन संभव है ? क्या वृृृृक्षों में आत्मा है ? क्या अमीबा जैसे एक कोशिकीय जीवों में आत्मा है ?क्यों कि अमीबा काटने पर भी कई हिस्सों में जीवित रहता है ? क्या सिर धड पूंछ वाले शुक्राणुओं में आत्मा है ?

1) बिना आत्मा के जीवन संभव है या नहीं?  तो उत्तर है – हाँ संभव है। जैसे जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो आत्मा तो तुरंत शरीर से अलग हो जाती है परंतु व्यक्ति के कुछ अंग जैसे आँखे, ह्रदय, किडनी आदि फिर भी कुछ समय के लिए जीवित रहते हैं। तभी तो आँखों को दान करके दूसरे व्यक्तियो में लगाया जा सकता है। तो यहाँ स्पष्ट होता है कि जीवन अलग है , आत्मा अलग। बिना आत्मा के भी जीवन संभव है ।परंतु मनुष्य आदि प्राणियों में  यह कुछ ही समय के लिए होता है। यदि आत्मा का संयोग हो तो जीवन काल भी बढ़ जाता है।  दूसरा उदाहरण यह कि मनुष्य जब मर जाता है तब भी उसके बाल व् नख बढ़ते रहते हैं।यह भी जीवन का लक्षण है ,आत्मा का नहीं। एक और उदाहरण देखते हैं गर्भाधान के समय नर का एक जीवाणु मादा के एक अंडाणु से संयोग करता है। दोनों गति करके आपस में संयोग करते हैं।गति शीलता जीवन का प्रमाण है और गति आत्मा का भी लक्षण है ( वैशेषिक ३/२/४) । परंतु वीर्य में गति होने से आत्मा का होना नही मान सकते।यदि आत्मा का होना मानते हैं तो रज में भी आत्मा का होना मानना पड़ेगा। रज और वीर्य के संयोग से शरीर तो एक ही बनता है और एक शरीर में दो आत्मा स्वीकार्य हो ही नही सकती। गर्भ स्थापन के साथ ही शरीर निर्माण शुरू हो जाता है जीवन के कारण । न कि आत्मा के। अर्थात बिना आत्मा भी जीवन संभव है। गर्भ में जीवात्मा का प्रवेश वीर्य और रज के संयोग के पश्चात  होता है। एक बार के वीर्य स्राव में करोड़ों जीवाणु निकलते हैं परन्तु कोई एक ही जीवाणु रज से संयोग करता है बाकी सभी जीवाणु कुछ समय बाद मर जाते हैं। यदि सभी जीवाणुओं में आत्मा मान लें तो मनुष्य एक बार के स्राव में करोडो आत्माओं का हत्यारा माना जायेगा ।इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि जीवन अलग है आत्मा अलग है।

2)पेड़ों में आत्मा नहीं होती। पेड़ों में जीवन होता है। ऋषि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश के १३ वे समुल्लास में ८१ वी समीक्षा में लिखा है- ‘वृक्ष जो जड पदार्थ है उसका क्या अपराध था कि उसको शाप दिया और वह सूख गया ।’जहां स्पष्ट रुप से स्वामी दयानंद जी ने वृक्ष को एक जड पदार्थ कहा है । ऋषि दयानंद ने स्ववमन्तव्मयाप्रकाश में भी कहीं नहीं लिखा कि पेड पौधों में जीवात्मा होती है ।

3.) अब तीसरे प्रश्न पर विचार करते हैं कि जैसे अमीबा आदि में आत्मा होती है या नही।  तो उत्तर है कि नहीं। क्यों कि अमीबा एक कोशिकीय जंतु है। पूर्णतः विकसित भी नही है इसमें भी जीवन है आत्मा नहीं। क्यों कि उसमें आत्मा के छ: लक्षण हैं: इच्छा,  द्वेष, प्रयत्न,  ज्ञान, सुख, दुःख  की अनुभूति नहीं होती । (न्याायदर्शन १/१/९०) प्रयत्न वा गति  जीवन का भी लक्षण है और आत्मा का भी । अतः अमीबा में जीवन है आत्मा नहीं। कई खंड में किये जाने पर भी अमीबे का जीवित रहना परमेश्वर की उपस्थिति का प्रमाण है। जब अमीबा में आत्मा है ही नहीं तो उसके कटने बटने का सवाल ही नही उत्पन्न होता। 

4.) अमीबा को खंडित होने पर भी जीवित रहना क्या आत्मा का खंडित होना सिद्ध नहीं करता। हमारे रक्त में लाल कण, सफेद कण जीवंत दिखाई देते हैं, वे आक्सीजन लेते व हमें अनेक प्रकार के रोगों से बचाते हैं । क्या उनमें भी आत्मा मानोगे ? यदि रस रक्त में आत्माएँ सुषुप्त अवस्था में होती हैं तो इसका अर्थ तो यह हुआ कि चारों तरफ आत्माएँ ही आत्माएँ घूम रही हैं और जन्म की प्रतीक्षा कर रही हैं। फिर तो यह मानना भी गलत हो जाएगा कि एक शरीर को छोड़ने पर आत्मा को तुरंत नया शरीर मिल जाता है। वह भटकता नहीं। यहाँ तो आत्माएँ भटक रही हैं। अमीबा एक ऐसा प्राणी है जो बहुत सूक्ष्म होता है। वह एक ही प्राणी है। इसलिए उसमें आत्मा भी एक ही होगी। उसकी विशेषता यह है कि यदि उसके एक हज़ार टुकड़े कर दिए जाएँ तो एक हज़ार शरीर पैदा हो जाते हैं और हर शरीर एक जीवन बनकर जीता है। प्रश्न यह है कि अमीबा के शरीर में ये हज़ारों आत्माएँ कहाँ से आईं ?.क्या आत्मा के टुकड़े हुए ? यदि नहीं तो एक शरीर के हज़ारों टुकड़े नया जीवन कैसे पा सकते हैं ? केचुएं को यदि बीच से काट दिया जाए तो दोनों भाग अलग अलग दिशाओं में चले जाते हैं। प्रश्न यह है कि क्या एक शरीर में दो आत्माएँ रह सकती हैं? केचुए में कैसे रह रही हैं ? यदि वृक्षों में जीव है तो कितने जीव हैं  ? आलू ,गन्ना ,सहजन आदि से  दूसरे पौधों की उत्पत्ति होती है। खेतों में करोड़ों बीज बोए जाते हैं।हर पौधा यदि आत्मा है तो करोड़ों आत्माओं से करोड़ों बीज यानी फिर करोड़ों आत्माएँ पैदा होती हैं। सूखा पड़ गया। पूरी फसल सूख गई तो ये आत्माएँ कहाँ गईं  ? यदि यह कर्म फल है तो किस प्रकार के कर्म का फल है ? 

5.)एक मीलीलीटर वीर्य में सिर धड पूंछ व गति करने वाले करोड़ो जीवाणु (शुक्राणु) होते हैं, वे वृक्षों से भी कहीं अधिक जीवंत दिखाई पडते हैं । वृक्षों में आत्मा है तो उनमें भी आत्मा माननी पडेगी । करोडों शुक्राणुओंं में से कोई एक ही माता के डिम्ब से संयोग करता है, अन्य शुक्राणुओं की हत्या हो जाती है? क्या अरबों खरबों की संख्या में आत्मायें शुक्राणुओं में आती रहती हैं ,जाती रहती हैं ? घास का एक एक तिनका अपने आप में पूरा पौधा है , क्या उन सबमें आत्मायें बंधी पडी हैं !? ये सब कितना अटपटा व हास्यास्पद लगता है ।

अत: पेड पौधों, घास भूस, रक्त कणों, शुक्राणुओं, आदि में जो भी क्रिया दिखाई देती है वह विश्वगत चेतन सत्ता परमात्मा के कारण है न कि जीवात्मा के कारण । ऋषि दयानंद जी को मानने वाले व वेदादि शास्त्रों के कुछ विद्वान भी इस मत को स्वीकारते हैं जिनमें पंडित सत्यव्रत सिद्धांन्तालंकार व पंडित गंगा प्रसाद उपाध्याय प्रमुख हैं । मनुस्मृति के कुछ प्रक्षिप्त श्लोकों में सात्विक राजसिक तामसिक गुणों के आधार पर जो योनियों की गणना की गई है वह इतनी उंटपटांग है कि कोई बुद्धिमान इसे स्वीकार नहीं कर सकता । ज्ञान के तीन लक्षण होते हैं- कर्तुं,अकर्तु व अन्यथा कर्तुं । किसी काम को करना , न करना और उल्टा करना । हम में यह तीनों बातें पाई जाती हैं वृक्षों में नहीं।

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