उत्तरपथसेग्रांटट्रंकरोड

—————– #झूठे_इतिहासकार ——————

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इतिहास विजेता की कलम लिखती है और वही लिखती है जो वो चाहता है , लेकिन ये प्रश्न हमेसा रहेगा कि स्वतंत्र भारत का इतिहास जब लिखा जा रहा था तो झूठे प्रतिमान क्यों गढ़े गए ??

रोमिला थापर ;एक वामपंथी इतिहासकार हैं तथा उनके अध्ययन का मुख्य विषय “प्राचीन भारत का इतिहास” रहा है। पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज से ए.एल. बाशम के मार्गदर्शन में 1958 में डॉक्टरेट(वाचस्पति) की उपाधि प्राप्त की। वह 1983 में भारतीय इतिहास कांग्रेस की जनरल प्रेसिडेंट और 1999 में ब्रिटिश अकादमी की कॉरेस्पोंडिंग फेलो चुनी गई थीं। क्लूज पुरस्कार (द अमेरिकन नोबेल) पाने के साथ उन्हें दो बार पद्म विभूषण पुरस्कार की पेशकश की गई, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार करने से मना कर दिया।

यह उन्हीं कथित बुद्धिजीवियों में से एक हैं ,जिन्होंने इतिहास को अपने राजनीतिक पूर्वाग्रहों व औपनिवेशिक विचारधाराओं के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। पुराने घटनाक्रमों का वही विश्लेषण स्वीकार किया गया जो साम्यवादी और वामपंथी इतिहासकारों को पसंद थे। उनकी मूल स्थापनाएं ही विकृत तथ्यों से भरी थी और इन्होंने प्राचीन भारत के ऐतिहासिक घटनाक्रमों को व्यवस्थित रूप से कभी पेश नहीं किया। रोमिला थापर हों या इरफान हबीब या रामशरण शर्मा या उनके जैसे अनेक वामपंथी विचारक प्राचीन इतिहास के श्रोता की विश्वसनीयता का मखौल उड़ाने से कभी नहीं चूकते थे।

रोमिला थापर उन इतिहासकारों में से एक है ,जिन्होंने इस देश की अगली पीढ़ी के लिए एक ऐसा इतिहास लिखा और अपने साथी इतिहासकारों से भी लिखवाया कि आज के युवा अपने देश की कम और आक्रांताओं का इतिहास ज्यादा जानते है। इन सभी ने एक ऐसे इतिहास को लिखा ,जिसे पढ़ने के बाद अगली पीढ़ी हीन भावना से ग्रसित हो और उसे रामायण और महाभारत एक कहानी लगे।

झूठे प्रतिमानों का पुलिंदा आज से तथ्यों और तर्कों की रोशनी में खोला और खंगाला जाएगा …….

ग्रांड ट्रंक रोड और शेर शाह शूरी –

ग्रैंड ट्रंक रोड, दक्षिण एशिया के सबसे पुराने एवं सबसे लम्बे मार्गों में से एक है। दो सदियों से अधिक काल के लिए इस मार्ग ने भारतीय उपमहाद्वीप के पूर्वी एवं पश्चिमी भागों को जोड़ा है। यह हावड़ा के पश्चिम में स्थित बांगलादेश के चटगाँव से प्रारंभ होता है और लाहौर (पाकिस्तान) से होते हुए; अफ़ग़ानिस्तान में काबुल तक जाता है। पुराने समय में इसे, उत्तरपथ ,शाह राह-ए-आजम,सड़क-ए-आजम और बादशाही सड़क के नामों से भी जाना जाता था। और आप ने भी यही पढा होगा कि इस सड़क का निर्माण शेर शाह शूरी ने करवाया था ।

लेकिन क्या ये सच है???? आइये तथ्यों और तर्कों की रोशनी में देखते हैं ।

प्राचीन भारत के दो प्रमुख मार्ग थे, उत्तरपथ और दक्षिणपथ था।प्रथम था उत्तरमार्ग ,पुराणों में कैकेय वासियों को गंधर्व, यवन, शक, परद, बाह्लीक, कंबोज, दरदास, बर्बर, चीनी, तुषार, पहलव आदि की गिनती में जोड़ा गया है। इन्हें #उदीच्य के लोग कहा गया है। उदीच्य यानि उत्तरपथ की उत्तरी मंडल । केकैय ने वर्तमान झेलम, शाहपुर और गुजरात (पाकिस्तान) के क्षेत्रों में निवास किया था। मार्ग वही जो आज की ग्रांड ट्रंक रोड है, इसका उल्लेख महाभारत से ही मिलता है । मौर्य साम्राज्य के शिलालेख , अभिलेखों में भी इस पथ का स्पष्ट उल्लेख है । दूसरा मार्ग दक्षिणापथ था, जो तमिलनाडु तक जाता था। दोनों मार्गों का उपयोग व्यापार, धर्म और लोगों के लिए किया जाता था। ये दोनों ही मार्ग का केंद्र इलाहाबाद और वाराणसी के बीच था ,जहाँ ये दोनों मार्ग जुड़ते थे।

उत्तरापथ ,सिर्फ एक भूमि मार्ग नहीं था; क्योंकि इस मार्ग का जुड़ाव नदियों से जुड़े क्षेत्रों से था। ये मार्ग गंगा नदी के किनारे की बगल से होते हुए, गंगा के मैदान के पार, पंजाब के रास्ते से तक्षशिला को जाता था। इस रास्ते का पूर्वी छोर तमलुक में था ,जो गंगा नदी के मुहाने पर स्थित एक शहर है। भारत के पूर्वी तट पर समुद्री बंदरगाहों के साथ समुद्री संपर्कों में वृद्धि की वजह से मौर्य साम्राज्य के काल में इस मार्ग का महत्व बढा और इसका व्यापार के लिए उपयोग होने लगा। बाद में, उत्तरापथ शब्द का प्रयोग पूरे उत्तर मार्ग के प्रदेश को दर्शाने के लिए किया जाने लगा।

कई राजवंश आये और गये और हर नए राज में इस मार्ग में बदलाव किये गये ,लेकिन इस मार्ग का महत्व किसी भी शासन के लिए कम नहीं हुआ क्योंकि किसी भी शासक के पास ग्रैंड ट्रंक रोड के अलावा और कोई बेहतर विकल्प नहीं दिखा। उत्तरपथ और दक्षिणापथ का उल्लेख प्राचीन संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों में किया गया है क्योंकि इस मार्ग का धार्मिक महत्व भी था। गौतम बुद्ध ने अपने पहले उपदेश के लिए सारनाथ स्थान को चुना था ,कारण; ये दोनों ही मार्गों का केंद्र बिंदु था। समृद्ध व्यापारियों, नौकरशाहों और शाही सदस्य अक्सर इस जगह पर जाते थे, इसलिए समाज के प्रभावशाली सदस्यों के बीच नए विचारों को लोकप्रिय बनाने के लिए ये सबसे अच्छी जगह थी। उत्तरापथ उत्तर-पश्चिम भारत में चला गया, भारत-गंगा मैदानों को पार कर बंगाल की खाड़ी में ताम्रलिप्ति बंदरगाह से जुड़ गया। यक्ष उत्तरापथ के व्यापारियों के लिए देवता था और इस मार्ग पर उनकी बड़ी मूर्तियां प्राप्त हुई हैं।

#विशेष – आज ग्रैंड ट्रंक रोड 2,500 किलोमीटर (लगभग 1,600मील) से अधिक की दूरी तक है। इसका प्रारम्भ दक्षिण बंगाल के चटगांव से है। मध्य बंगाल के सोनारगाँव से होते हुए यह भारत में प्रवेश करती है और कोलकाता, बर्धमान, दुर्गापुर, आसनसोल, धनबाद, औरंगाबाद, देहरी, सासाराम, मोहानिया, मुग़लसराय, वाराणसी, इलाहाबाद, कानपुर, एटा, आगरा, मथुरा, दिल्ली, करनाल, अम्बाला, लुधियाना, जालंधर, अमृतसर होते हुए जाती है। इसका मुख्य व्यस्त भाग दिल्ली और कोलकाता के बीच है। यहाँ पर यह NH-2 (राष्ट्रीय राजमार्ग-2) के नाम से जानी जाती है और दिल्ली – वाघा बार्डर के बीच यह NH-1(राष्ट्रीय राजमार्ग 1) के नाम से जाना जाता है।

पाकिस्तान सीमा से ग्रैंड ट्रंक रोड N-5 लाहौर, गुजराँवाला, गुजरात, झेलम, रावलपिंडी अटोक ज़िले से होते हुए पेशावर तक जाती है। इसके बाद यह अफ़ग़ानिस्तान में प्रवेश करती है और पश्चिम में जलालाबाद से होकर क़ाबुल में खत्म हो जाती है। वर्तमान में ग्रैंड ट्रंक रोड का यह भाग अफ़ग़ानिस्तान में जलालाबाद- काबुल रोड के नाम से जाना जाता है ।

जो पहले से ही अस्तित्व में है ,उसका निर्माण नहीं हो सकता है। पुनर्निर्माण या उद्धारीकरण जरूर हो सकता है , लेकिन जब आप ये बोलेंगे की शेर शाह शूरी ने ग्रांट ट्रंक रोड का पुनर्निर्माण करवाया तो आपको ये भी बताना पड़ेगा ;कि ये महाभारत काल से अस्तित्व में है। आपको फिर महाभारत के बारे में बताना पड़ेगा फिर भारत के गौरवशाली इतिहास के बारे में भी जिसका परिणाम होगा कि जो हीन भावना हमारे भीतर खुद के इतिहास को लेकर है वो खत्म हो जाएगी , तो न रहेगा बांस न बजेगी बाँसुरी ।
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