कन्या को दुहिता क्यो कहा जाता है?

🔥| आर्ष दृष्टि |🔥

🌷 कन्या को दुहिता क्यो कहा जाता है?

“निरूक्त में लिखा है कि कन्या का ‘दुहिता’ नाम इस कारण से है कि इसका विवाह दूर देश (स्थान) में होने से हितकारी होता है, निकट करने में नहीं |”

~~ स्वामी दयानन्द सरस्वती ( सत्यार्थ प्रकाश चतुर्थ समुल्लास )

वधू का अर्थ क्या होता है ?

वधू का अर्थ वर्धन करनेवाली किया जा सकता है।
वर्धन अर्थात बढ़ाना। स्त्री पुत्र पुत्रियों
को जन्म देकर वंश वृद्धि करती है।
इसलिए उसे वधू कहा जाता है।

वधू के घर में आते ही परिवार में हर्ष
की वृद्धि हो जाती है। पति को सुख मिलता है। सास ससुर को सुख मिलता है। मित्र रिश्तेदारों को सुख मिलता है। सबके सुखों में वृद्धि हो जाती है।

इसलिए पत्नी को वधू या बहू कहा जाता है।

पति का अर्थ क्या होता है?

पति रक्षति इति पतिः
जो पत्नी की हर तरह से रक्षा करता है
वह पति होता है।

पत्नी का अर्थ क्या होता है?

पत्नी का अर्थ है
पतनात् त्रायते इति पत्नी ।
अर्थात पति को जो पतन से बचाती है, उसे पत्नी कहा जाता है।

काम, क्रोध , मद , लोभ , मोह , ईर्ष्या , द्वेष आदि सप्त विकार ही मनुष्य के पतन का कारण बनते हैं।

स्त्री इन सब दोषों से पुरुष को बचाती है , इसलिए उसे पत्नी कहा जाता है।

स्त्री का क्या अर्थ है?

” स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ ” ( ऋग्वेद ८\३३\१९ ) स्त्री स्वयं विदुषी होते हुए अपनी सन्तान को सुशिक्षित बनाती है। ब्रह्म ज्ञान का अधिष्ठाता हैं। ब्रह्मा ही यज्ञों का संचालन करता है। वह ज्ञान- विज्ञान मे श्रेष्ठ होता है, अतः उसे यज्ञ में सर्वोच्च स्थान दिया जाता है, उसी प्रकार नारी को ज्ञान-विज्ञान में निपुण होने के कारण ब्रह्म बताया गया है ।

वेदों में नारी का गौरवमय स्थान इससे भी ज्ञात होता है कि नारी को ही घर कहाँ गया है-

जायेदस्तं मधवन्त्सेदु योनि स्तदित्वा युक्ता हरयो वहन्ति ।( ऋग्वेद ३\५३\४ )

अर्थात घर, घर नहीं है अपितु गृहिणी ही गृह है। गृहिणी के द्वारा ही घर का अस्तित्व है।यही भाव एक संस्कृत सुभाषित में कहाँ गया है कि गृहिणी ही घर है ” न गृहं गृहमित्याहु:, गृहिणी गृहमुच्यते “।

यही नहीं स्त्री को सरस्वती का रूप मानते हुए कहा गया —

प्रति तिष्ठ विराडसि, विष्णुरिवेह सरस्वती ।सिनीवालि प्र जायतां भगस्य सुमतावसत्।।( अथर्ववेद १४\२\१५)

हे नारी ! तुम यहाँ प्रतिष्ठित हो।तुम तेजस्विनी हो । हे सरस्वती! तुम यहाँ विष्णु के तुल्य प्रतिष्ठित हो।हे सौभाग्यवती नारी! तुम संतान को जन्म देना और सौभाग्य देवता की कृपा दृष्टि में रहना ।

मनु महाराज का कहना है —

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रा फला: क्रिया:।।

अर्थात – जहाँ नारियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं।जहाँ इनका सम्मान नही होता, वहाँ प्रगति, उन्नति की सारी क्रियाएं निष्फल हो जाती है ।
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