आर्य शब्द के प्रमाण*

आर्य शब्द के प्रमाण*

सृष्टि की समकालीन पुस्तक ऋग्वेद में:-

*(१) *कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । ~ ऋ. ९/६३/५

अर्थ- सारे संसार को ‘आर्य’ बनाओ।

मनुस्मृति में:-

(२) मद्य मांसा पराधेषु गाम्या पौराः न लिप्तकाः।
आर्या ते च निमद्यन्ते सदार्यावर्त्त वासिनः।।

अर्थ- वे ग्राम व नगरवासी जो मद्य, मांस और अपराधों में लिप्त न हों तथा सदा से आर्यावर्त्त के निवासी हैं वे ‘आर्य’ कहे जाते हैं।

वाल्मीकि रामायण में-

(३) सर्वदा मिगतः सदिशः समुद्र इव सिन्धुभिः ।
आर्य सर्व समश्चैव व सदैवः प्रिय दर्शनः ।।-(बालकाण्ड)

अर्थ- जिस तरह नदियाँ समुद्र के पास जाती हैं उसी तरह जो सज्जनों के लिए सुलभ हैं वे ‘आर्य’ हैं जो सब पर समदृष्टि रखते हैं हमेशा प्रसन्नचित्त रहते हैं।

(५) महाभारत में:-

न वैर मुद्दीपयति प्रशान्त,न दर्पयासे हति नास्तिमेति।
न दुगेतोपीति करोव्य कार्य,तमार्य शीलं परमाहुरार्या।।(उद्योग पर्व)

अर्थ:- जो अकारण किसी से वैर नहीं करते तथा गरीब होने पर भी कुकर्म नहीं करते उन शील पुरुषों को ‘आर्य’ कहते हैं।

(६) वशिष्ठ स्मृति में-
कर्त्तव्यमाचरन काम कर्त्तव्यमाचरन ।
तिष्ठति प्रकृताचारे यः स आर्य स्मृतः ।।

अर्थ:- जो रंग, रुप, स्वभाव, शिष्ठता, धर्म, कर्म, ज्ञान और आचार-विचार तथा शील-स्वभाव में श्रेष्ठ हो उसे ‘आर्य’ कहते हैं।

(७) निरुक्त में यास्काचार्य जी लिखते हैं-
आर्य ईश्वर पुत्रः।

अर्थ―’आर्य’ ईश्वर के पुत्र हैं।

(८) विदुर नीति में-
आर्य कर्मणि रज्यन्ते भूति कर्माणि कुर्वते ।
हितं च नामा सूचन्ति पण्डिता भरतर्षभ ।।-(अध्याय १ श्लोक ३०)

अर्थ:- भरत कुल भूषण! पण्डित जन्य जो श्रेष्ठ कर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति के कार्य करते हैं तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते हैं वही ‘आर्य’ हैं।

(९) गीता में-
अनार्य जुष्टम स्वर्गम् कीर्ति करमर्जुन।
–(अध्याय २ श्लोक २)

अर्थ:- हे अर्जुन तुझे इस असमय में यह अनार्यों का सा मोह किस हेतु प्राप्त हुआ क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है और न स्वर्ग को देने वाला है तथा न कीर्ति की और ही ले जाने वाला है (यहां पर अर्जुन के अनार्यता के लक्षण दर्शाये हैं)।

(१०) चाणक्य नीति में-

अभ्यासाद धार्यते विद्या कुले शीलेन धार्यते।
गुणेन जायते त्वार्य,कोपो नेत्रेण गम्यते।।-(अध्याय ५ श्लोक ८)

अर्थ:- सतत् अभ्यास से विद्या प्राप्त की जाती है, कुल-उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव से स्थिर होता है,आर्य-श्रेष्ठ मनुष्य गुणों के द्वारा जाना जाता है।

(११) नीतिकार के शब्दों में-

प्रायः कन्दुकपातेनोत्पतत्यार्यः पतन्नपि।
तथा त्वनार्ष पतति मृत्पिण्ड पतनं यथा।।

अर्थ:- आर्य पाप से च्युत होने पर भी गेन्द के गिरने के समान शीघ्र ऊपर उठ जाता है अर्थात् पतन से अपने आपको बचा लेता है,अनार्य पतित होता है तो मिट्टी के ढेले के गिरने के समान फिर कभी नहीं उठता।

(१२) अमरकोष में:-

महाकुलीनार्य सभ्य सज्जन साधवः।-(अध्याय२ श्लोक६ भाग३)

अर्थ:- जो आकृति,प्रकृति,स
भ्यता,शिष्टता,धर्म,कर्म,विज्ञा
न,आचार,विचार तथा स्वभाव में सर्वश्रेष्ठ हो उसे ‘आर्य’ कहते हैं।

(१३) कौटिल्य अर्थशास्त्र में-

व्यवस्थितार्य मर्यादः कृतवर्णाश्रम स्थितिः।

अर्थ:- आर्य मर्यादाओं को जो व्यवस्थित कर सके और वर्णाश्रम धर्म का स्थापन कर सके वही ‘आर्य’ राज्याधिकारी है।

(१४) पंचतन्त्र में-

अहार्यत्वादनर्धत्वाद क्षयत्वाच्च सर्वदा।

अर्थ:- सब पदार्थों में उत्तम पदार्थ विद्या को ही कहते हैं।

(१५) धम्म पद में:-

अरियत्पेवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो।

अर्थ:- पण्डित जन सदा आर्यों के बतलाये धर्म में ही रमण करता है।

(१६) पाणिनि सूत्र में:-

आर्यो ब्राह्मण कुमारयोः।

अर्थ:- ब्राह्मणों में ‘आर्य’ ही श्रेष्ठ है।

(१७) काशी विश्वनाथ मन्दिर के मुख्य द्वार पर-

आर्य धर्मेतराणो प्रवेशो निषिद्धः।

अर्थ:- आर्य धर्म से इतर लोगों का प्रवेश वर्जित है।

(१८) आर्यों के सम्वत् में:-

जम्बू दीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते अमुक देशान्तर्गते।

ऐसा वाक्य बोलकर पौराणिक भाई भी संकल्प पढ़ते हैं अर्थात् यह आर्यों का देश ‘आर्यावर्त्त’ है।

(१९) आचार्य चतुरसेन और आर्य शब्द:-

उठो आर्य पुत्रो नहि सोओ।
समय नहीं पशुओं सम खोओ।
भंवर बीच में होकर नायक।
बनो कहाओ लायक-लायक।।

अर्थ:- तुम्हारा जीवन पशुओं के समान निद्रा के वशीभूत होने के लिए निर्माण नहीं हुआ है।यह समय तुम्हें पुरुषार्थ करने का है,यदि जीवन में तुम पुरुषार्थ करोगे तो किसी कहानी के नायक बनकर समाज के आगे उपस्थित होवोगे।

(२०) पं. प्रकाशचन्द कविरत्न के शब्दों में:-

आर्य-बाहर से आये नहीं,
देश है इनका भारतवर्ष।
विदेशों में भी बसे सगर्व,
किया था परम प्राप्त उत्कर्ष।।
आर्य और द्रविड जाति हैं,
भिन्नचलें यह विदेशियों की चाल।
खेद है कुछ भारतीय भी,
व्यर्थ बजाते विदेशियों सम गाल।।

(२१) पं. राधेश्याम कथावाचक बरेली वाले और आर्य शब्द:–

जब पंचवटी में शूर्पणखा राम के पास मोहित होकर अपना विवाह करने की बात राम से कहती है,तब राम उत्तर देते हैं―
हम आर्य क्षत्रीय हैं,
रघुवंशी वैदिक धर्मी हैं।
जो करें एक से अधिक विवाह,
कहते वेद उन्हें दुष्कर्मी हैं।
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मनुस्मृति संसार का प्राचीन श्रेष्ठ ज्ञान है जिसका सबको अध्ययन करना चाहिये”

ओ३म्
“मनुस्मृति संसार का प्राचीन श्रेष्ठ ज्ञान है जिसका सबको अध्ययन करना चाहिये”
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सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा से चार वेदों का आविर्भाव हुआ था। वेद ज्ञान व सत्य विद्याओं को कहते हैं। चार वेदों में ज्ञान, कर्म और उपासना सहित विज्ञान विषयों का वर्णन है। वेदों के प्रमुख विद्वान 6 दर्शनकार, 11 व अधिक उपनिषदकार, महर्षि पाणिनी, महर्षि यास्क एवं ऋषि दयानन्द जी हुए हैं। महर्षि बाल्मीकि एवं महर्षि वेद व्यास भी वैदिक विद्वानों व ऋषियों में सम्मिलित हैं। उन्होंने शास्त्रीय ग्रन्थ तो नहीं परन्तु राम एवं महाभारत का इतिहास लिखा है। यह सभी ऋषि व विद्वान वेदों को ईश्वरीय ज्ञान मानते थे। यह परम्परा सृष्टि के आरम्भ से आज तक चली आई है। महर्षि दयानन्द ने नियम दिया है कि वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है। वेद का पढ़ाना व पढ़ाना तथा सुनना व सुनाना सभी आर्यों अर्थात् अच्छा आचरण करने वाले सभी सज्जन मनुष्यों का परम धर्म है। आज भी वेदों की शिक्षा का पालन ही मनुष्य का धर्म है। मत-मतान्तरों व धर्म में अन्तर होता है। मत-मतान्तर धर्म कदापि नहीं हो सकते। धर्म की परिभाषा है कि जिन श्रेष्ठ गुणों को मनुष्य धारण कर सकता है व मनुष्य को जिन गुणों को धारण करना चाहिये, उन गुण, कर्म व स्वभावों को मनुष्य का धर्म कहा जाता है। मनुष्य जिन गुण, कर्म व स्वभावों आदि को धारण कर सकता है, उन सबका उल्लेख सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने वेदों में कर दिया था। मत-मतान्तरों में जो सत्य पाया जाता है वह वेदों से ही लिया गया है अथवा वेद से ही उन ग्रन्थों में पहुंचा है। सृष्टि के आरम्भ में जब कुछ राज्य स्थापित करने व राज्य की ओर से धर्म व्यवस्था व आचरण के विधान बनाने की आवश्यकता हुई तब सृष्टि के आरम्भ में प्रथम महर्षि मनु ने वेदों की शिक्षाओं व सिद्धान्तों के आधार पर वेदानुकूल नियमो का संग्रह किया जिसे ‘मनुस्मृति’ नाम दिया गया। मनुस्मृति वेद सम्मत मानव जीवन के लिए आवश्यक सभी कर्तव्यों व अकर्तव्यों के दण्डों की शिक्षाओं व विधानों से युक्त थी व अब भी है। इसमें ऐसा कोई विधान व सिद्धान्त नहीं था जो अतार्किक व भेदभावपूर्ण हो। सृष्टि को आरम्भ हुए 1.96 अरब वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। तब से मनुस्मृति ही वेद के बाद सभी विद्वानों व मनुष्यों के लिये स्वाध्याय एवं अध्ययन का प्रमुख ग्रन्थ रहा है। महाभारत काल तक मनुस्मृति सबको मान्य थी। इसका कभी किसी ने विरोध किया हो, इसका रामायण या महाभारत आदि किसी ग्रन्थ में उल्लेख नहीं मिलता।

महाभारत से पहले ही किन्हीं कारणों से सामाजिक परम्पराओं में कुछ विकृतियां उत्पन्न होनी आरम्भ हो गयी थीं। अग्निहोत्र यज्ञ जो पूर्ण अहिंसक कृत्य होता है, उसमें भी वाममार्गी धार्मिक लोगों ने पशु हिंसा के विधान जोड़ दिये थे। इसके लिये उन्होंने वेद मन्त्रों के अर्थ के अनर्थ किये जिसका प्रकाशन महर्षि दयानन्द व उनके अनुयायियों ने अनेक ग्रन्थ लिखकर किया। महाभारत के बाद वैदिक धर्म की एक शाखा के रूप में वाममार्ग की उत्पत्ति हुई। इन लोगों ने रामायण, महाभारत, मनुस्मृति सहित अनेक ग्रन्थों में अपनी-अपनी मान्यताओं के वेदविरुद्ध व पक्षपातपूर्ण प्रक्षेप किये। कुछ पुराण आदि ग्रन्थ लिखे गये जिनमें उन ग्रन्थों के लेखकों के वास्तविक नाम न देकर प्रसिद्ध ऋषि वेदव्यास जी के नाम से प्रचारित किया गया। इसका उल्लेख महर्षि दयानन्द जी ने अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में राजा भोज के समय के इतिहास विषयक ‘संजीवनी’ नामक ग्रन्थ से प्रमाण प्रस्तुत कर किया है। इसके अनुसार महर्षि वेदव्यास जी ने 4500 श्लोकों का भारत ग्रन्थ बनाया था। व्यास जी के शिष्यों ने इसे दस सहस्र श्लोकों तक विस्तृत किया। यही ग्रन्थ राजा भोज के पिता के समय प्रक्षेपों की वृद्धि से बीस हजार श्लोकों का दोगुना हो गया और राजा भोज के समय में निरन्तर प्रक्षेप होने के कारण पच्चीस हजार श्लोकों का हो गया था। राजा भोज ने अपने समय में प्रक्षेप करने वाले लोगों के हस्त आदि इन्द्रिय कटवा दिये थे और आज्ञा प्रसारित की थी जिसको कोई ग्रन्थ बनाना है वह अपने नाम से बनायें, पूर्व ग्रन्थों में प्रक्षेप न करें। जिन ग्रन्थों में वेद विरोधियों ने प्रक्षेप किये हैं उन्हीं के कारण समाज में अनेक विकृतियां व भेदभाव उत्पन्न हुए हैं। अधिकारी विद्वान यह भी बताते हैं कि प्रक्षेप एक ही व्यक्ति ने एक ही समय में नहीं किये अपितु यह क्रम अनेक वर्षों तक अनेक लोगों द्वारा किया जाता रहा।

मध्यकाल में वेदों के सत्यार्थ सुलभ न होने के कारण मनुस्मृति आदि ग्रन्थों की विकृतियां समाज को प्रभावित करने लगीं। इन विकृतियों के कारण स्त्रियों व जन्मना शूद्रों को वेदाध्ययन ही नहीं अपितु वेदों के श्रवण तक से वंचित कर दिया गया। इसके लिये तत्कालीन लोगों ने वेदों के नाम से मनघड़न्त वाक्य घड़ लिये जिसमें से एक था ‘स्त्री शूद्रो नाधीयताम्’ अर्थात् स्त्री और शूद्रों को वेदों का अध्ययन करने का अधिकार नहीं है। स्वामी शंकराचार्य जी तक इन विचारों से प्रभावित रहे और उन्होंने नारी तक के लिये असम्मानजनक शब्द कहे हैं।

मध्यकाल व उसके बाद जितने भी विद्वान हुए उनमें से किसी ने यह प्रयास नहीं किया कि वह वेदों से वेद विरुद्ध मान्यताओं की पुष्टि करने का प्रयत्न करते और इन वेदविरुद्ध मान्यताओं के समर्थकों को शास्त्रार्थ की चुनौती देते। महर्षि दयानन्द (1825-1883) के समय में यह विकृतियां अपने शीर्ष व चरम पर थी। प्राचीन काल में वैदिक वर्ण व्यवस्था मनुष्य के गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित थी परन्तु मध्यकाल में इसे जन्मना जातिवाद का रूप दे दिया गया और चार वर्णों के स्थान पर मनुष्यों की सहस्रों उपजातियां बना दी गईं जिससे सभी जातियों में परस्पर अनेक प्रकार के भेदभाव उत्पन्न हुए। कुछ जातियों को साक्षर होने का अधिकार भी नहीं था। धीरे धीरे पूरे देश से गुरुकुलीय शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो गई। इसमें मुस्लिम व अंग्रेजों का कुशासन मुख्य था। अतः उस काल में देशवासियों के सम्मुख अध्ययन अध्यापन एवं परस्पर समानता के व्यवहार करने में अनेक प्रकार की कठिनाईयां थी। मुस्लिम व अंग्रेजों के राज में हिन्दू समाज में अनेक प्रकार की सामाजिक विकृतियां उत्पन्न हुईं जिनमें जन्मना-जातिवाद, बाल-विवाह, विधवा विवाह का निषेध, घूंघट या पर्दा प्रथा, दलित बन्धुओं द्वारा मैला ढोने की प्रथा, बलपूर्वक धर्मान्तरण, आपस में भेदभाव व छुआछूत आदि विकृतियां प्रमुख थी। डा. भीमराव अम्बेडकर जी एक प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। उनके अध्ययन में अनेक प्रकार के अवरोध उपस्थित हुए। ऐसी विकट स्थिति में भी उन्होंने अपने प्रारब्ध, दृढ़ इच्छा व संकल्प शक्ति तथा संघर्षमय जीवन से उच्च शिक्षित होकर देश व समाज की प्रशंसनीय सेवा की। डा. अम्बेडकर जी का विषय धर्मशास्त्र का अध्ययन करना व कराना नहीं था। अतः इस विषय में उनकी राय का सीमित महत्व है परन्तु अधिकारिक राय तो निष्पक्ष धर्म-मर्मज्ञों की ही मान्य होती है।

धर्म पर कोई प्रतिक्रिया या व्यवस्था देने का अधिकार वेद एवं वैदिक साहित्य के शीर्ष विद्वानों को ही होता है। मध्यकाल में यह स्थिति वैदिक काल के समान न थी अपितु इस व्यवस्था में अनेक विकृतियां उत्पन्न हों गई थी। अतः देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कुछ प्रतिष्ठित लोगों ने धार्मिक एवं सामाजिक विकृतियों के कारणों का समुचित अध्ययन किये बिना ही अपने अल्प एवं विपरीत ज्ञान से पूरी मनुस्मृति और महाराज मनु का विरोध कर डाला। कुछ ने तो मनुस्मृति को जलाया भी जिसे उनका अज्ञानता रूपी अपराध कहा जा सकता है। ऐसा किया जाना अविवेकपूर्ण कार्य था। होना यह चाहिये था कि मनुस्मृति का गहन अध्ययन किया जाता और निश्चित किया जाता कि मनुस्मृति में जो अनुचित व अमानवीय बातें हैं, क्या वह महाराज मनु द्वारा कही व लिखी गई हैं अथवा मध्यकाल में कुछ अल्पज्ञानी व स्वार्थी लोगों ने अपने हितों के कारण ऐसा किया है। महर्षि दयानन्द ने अपने अध्ययन में सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करने का नियम बनाया जिसका उन्होंने व आर्यसमाज के विद्वानों ने पालन किया है। उन्होंने न केवल मनुस्मृति सहित सभी शास्त्रीय ग्रन्थों की परीक्षा की और वेदविरुद्ध बातों को अस्वीकार करते हुए उनका व्यवहार करना त्याग किया। मनुस्मृति का अनुसंधान कर शुद्ध मनुस्मृति नाम से एक शोधपूर्ण संस्करण भी प्रकाशित किया गया जो आज सर्वसुलभ है। इसे हमारे सभी दलित जाति के बन्धुओं को पूर्वाग्रह से मुक्त होकर निष्पक्ष भाव से पढ़ना चाहिये और लाभ उठाना चाहिये।

ऋषि दयानन्द ने सभी सनातनी पौराणिक व इतर विद्वानों को भी वेदों की सत्य मान्यताओं पर विचार कर सत्यासत्य का निर्णय करने के लिये शास्त्रार्थ की चुनौती दी। उनके समय में पौराणिक जगत में उनके समकक्ष कोई विद्वान नहीं था। ऋषि दयानन्द ने पाषाण मूर्तिपूजा, अवतारवाद, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष, सभी ढ़ोग, पाखण्ड तथा अन्धविश्वासों को चुनौती दी थी। कोई उनके सम्मुख आकर अपने पक्ष में वेदों का प्रमाण व युक्तियां नहीं दे सका। स्वामी दयानन्द ने एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य यह भी किया कि यजुर्वेद से समाज के सभी मनुष्यों को वेदों के अध्ययन का अधिकार देने वाला वेदमन्त्र प्रस्तुत किया। इससे सदियों से चली आ रही स्त्री व शूद्रों को वेद का अध्ययन करने का अधिकार नहीं है, इस मान्यता का खण्डन एवं प्रतिवाद हुआ। इसके बाद यह विवाद सदा सदा के लिए समाप्त हो गया। आज तक इस प्रमाण की काट किसी सनातनी पौराणिक विद्वान ने प्रस्तुत नहीं की। इस प्रकार हम देखते हैं कि किस प्रकार सदियों तक हमारे देश के कुछ वेदविमुख पाखण्डी लोगों ने देश की जनता के साथ अन्याय किया। यदि ऋषि दयानन्द जी न आते तो आज हमारे समाज की कितनी दुर्दशा होती, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

वेद पढ़ने का अधिकार सब मनुष्यों को समान रूप से है, इससे सम्बन्धित प्रमाण यजुर्वेद के 26 वें अध्याय का 2सरा मन्त्र है। मन्त्र निम्न हैः

‘यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः।
ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय।।’

इस मन्त्र में परमेश्वर ने कहा है कि (यथा) जैसे मैं (जनेभ्यः) सब मनुष्यों के लिये (इमाम्) इस (कल्याणीम्) कल्याण करने वाली अर्थात् संसारिक सुख और मुक्ति के सुख देनेहारी (वाचम्) ऋग्वेदादि चारों वेदों का वाणी का (आ वदानि) उपदेश करता हूं वैसे तुम मनुष्य भी करो।

महर्षि दयानन्द ने इस वेदमंत्र व इसके अर्थ पर होने वाली शंकाओं का निराकार भी सत्यार्थप्रकाश के तृतीय समुल्लास में किया है। वह लिखते हैं कि यहां कोई ऐसा प्रश्न करे कि ‘जन’ शब्द से द्विजों का ग्रहण करना चाहिये क्योंकि स्मृत्यादि ग्रन्थों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही के वेदों के पढ़ने का अधिकार लिखा है, स्त्री और शूद्रादि वर्णों का अधिकार नहीं है। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए ऋषि दयानन्द लिखते हैं कि देखो (ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय) परमेश्वर स्वयं कहता है कि हम ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, (अय्र्याय) वैश्य, (शूद्राय) शूद्र, और (स्वाय) अपने भृत्य वा स्त्रियों आदि (अरणाय) और अतिशूद्रादि के लिये भी वेदों का प्रकाश किया है अर्थात् सब मनुष्य वेदों को पढ़ पढ़ा और सुन सुनाकर विज्ञान को बढ़ा के अच्छी बातों का ग्रहण और बुरी बातों का त्याग करके दुःखों से छूट कर आनन्द को प्राप्त हों। कहिये, अब तुम्हारी बात मानें वा परमेश्वर की? परमेश्वर की बात अवश्य माननीय है। इतने पर भी जो कोई इस को न मानेगा वह नास्तिक कहावेगा क्योंकि ‘नास्तिको वेदनिन्दकः’ वेदों का निन्दक और न मानने वाला नास्तिक कहाता है। क्या परमेश्वर शूद्रों का भला करना नहीं चाहता? क्या ईश्वर पक्षपाती है कि वेदों के पढ़ने सुनने का शूद्रों के लिये निषेध और द्विजों के लिये विधान करे? जो परमेश्वर का अभिप्राय शूद्रादि के पढ़ाने सुनाने का न होता तो इनके शरीर मे वाक् और श्रोत्र इन्द्रिय क्यों रचता? जैसे परमात्मा ने पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, चन्द्र, सूर्य और अन्नादि पदार्थ सब के लिये बनाये हैं वैसे ही वेद भी सबके लिये प्रकाशित किये हैं। और जहां-जहां निषेध किया है उस का यह अभिप्राय यह है कि जिन बालक व मनुष्य को पढ़ने पढ़ाने से कुछ भी न आवे वह निर्बुद्धि और मूर्ख होने से शूद्र कहाता है। उस का पढ़ना पढ़ाना व्यर्थ है। और जो स्त्रियों के पढ़ने का निषेध करते हो वह तुम्हारी मूर्खता, स्वार्थता और निर्बुद्धिता का प्रभाव है। इसके बाद ऋषि दयानन्द अथर्ववेद के वचन ‘ब्रह्मचय्र्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्’ का उल्लेख कर सभी सनातनी पौराणिकों की बोलती बन्द कर दी। इस वेद वचन में स्त्रियों के वेदाध्ययन का प्रत्यक्ष विधान है। यह भी बता दें कि ऋषि दयानन्द ने उपर्युक्त प्रतिवाद प्रचलित पौराणिक वेदाध्ययन में अनधिकार विषयक मान्यताओं का किया है। इसके बाद स्त्री व शूद्रों सहित समाज के सभी व्यक्तियों को वेदाध्ययन का अधिकार प्राप्त हो गया। अब कोई मनुष्य वा स्त्री पुरुष वेदाध्ययन के अधिकार से वंचित नहीं है। जिस किसी को भी वेद पढ़ना व पढ़ाना हो, दलित समाज सहित कोई भी व्यक्ति आर्यसमाज से जुड़कर इसके गुरुकुलों में रहकर वेदाध्ययन कर वेदों का प्रचार व वेदोपदेश कर सकता है। ऋषि दयानन्द के इन्हीं विचारों से सदियों व वंचित स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन करने का अधिकार प्राप्त हुआ व वेदाध्ययन के बन्द दरवाजे सबके लिए सदा के लिये खुल गये। इसके लिए ऋषि दयानन्द को हमारा नमन है।

मनुस्मृति का अध्ययन करने पर ग्रन्थ में मनुप्रोक्त ऐसा कोई वचन प्राप्त नहीं होता जहां जन्मना जातिवाद व जन्म से कोई ब्राह्मण है और कोई शूद्र है, इसका वर्णन हो। इसके विपरीत जन्म से ब्राह्मण आदि वर्णों के सभी बच्चों को शूद्र अर्थात् विद्याहीन बताया गया है। अतः समाज में महाभारतकाल के बाद व मध्यकाल में जो पतन हुआ उसका कारण महाराज मनु व मनुस्मृति नहीं अपितु मध्यकालीन आचार्यों द्वारा मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में किये गये प्रक्षेप थे। इसके लिये महाराज मनु को कदापि उत्तरदायी नहीं कहा जा सकता। जो ऐसा सोचते हैं वह उनके साथ अन्याय करते हैं। उन्हें यह पता नहीं होता कि ऐसा करने से वह अपने जन्म-जन्मान्तरों में मनुस्मृति की वेदानुकुल शिक्षाओं के अध्ययन से वंचित होकर अपने सुखों व आत्मिक उन्नति की हानि कर रहे हैं। अतः उन सभी लोगों को जो मनुस्मृति का विरोध करते हैं, स्वार्थ को एक तरफ रखकर शीतल मस्तिष्क से मनुस्मृति को पूरा पढ़ना चाहिये और उसके ग्राह्य व अग्राह्य वचनों का संग्रह करना चाहिये। ग्राहय से लाभ उठाना चाहिये और अग्राह्य का त्याग करना चाहिये। वर्तमान समय में आर्यजगत् के प्रसिद्ध ऋषिभक्त रहे विद्वान लाला दीपचन्द आर्य जी ने स्वस्थापित एवं संचालित ‘आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली’ के द्वारा ‘‘विशुद्ध-मनुस्मृति” ग्रन्थ का सम्पादन कराकर सन् 1982 में उसका प्रकाशन किया था। इस विशुद्ध मनुस्मृति को पढ़कर हमारे सभी दलित व अन्य बन्धु जन्मना जातिवाद के पक्षधरों को यथोचित उत्तर दे सकते हैं।

पाठकों की जानकारी के लिए यह बताना भी आवश्यक है कि विशुद्ध-मनुस्मृति में बारह अध्याय हैं। इन अध्यायों में मुख्य रूप से निम्न विषयों पर विधान सम्मिलित किये गये हैं।

प्रथम अध्याय- सृष्टि-उत्पत्ति तथा धर्मोत्पत्ति विषय
द्वितीय अध्याय- संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम विषय
तृतीय अध्याय- समावर्तन, विवाह, पंचमहायज्ञ विधान विषय
चतुर्थ अध्याय- गृहस्थान्तर्गत आजीविकायें और व्रतों का विधान
पंचम अध्यय- भक्ष्याभक्ष्य, प्रेतशुद्धि, द्रव्यशुद्धि, स्त्रीधर्म आदि विषय
षष्ठ अध्याय- वानप्रस्थ-संन्यास धर्म विषय
सप्तम अध्याय- राजधर्म विषय
अष्टम अध्याय- राजधर्मान्तर्गत व्यवहारों (मुकदमों) का निर्णय
नवम अध्याय- राजधर्मान्तर्गत व्यवहारों का निर्णय
दशम अध्याय- चातुर्वर्ण्य धर्मान्तर्गत वैश्य, शूद्र के धर्म तथा चातुर्वर्ण्य-धर्म का उपसंहार
एकादश अध्याय- प्रायश्चित विषय
द्वादश अध्याय- कर्म-फल विधान तथा निःश्रेयस कर्मों का वर्णन

यह विषय सूची अति संक्षिप्त है। विस्तार-भय के कारण मनुस्मृति में वर्णित पूरी विषय सूची को हम यहां प्रस्तुत कर पा रहे हैं। इस संक्षिप्त सूची से पाठक मनुस्मृति की महत्ता एवं उपयोगिता का कुछ अनुभव कर सकते हैं।

हम यह भी कहना चाहते हैं कि हम सब मनुष्यों का वर्तमान जन्म प्रथम व अन्तिम नहीं है। इससे पूर्व हमारे अनन्त बार जन्म हो चुके हैं। आगे भी अनन्त बार जन्म व मरण होंगे। कई बार मुक्ति और मुक्ति से पुनरावृत्ति भी हो सकती है। आत्मा अविनाशी व अमर है। यह सदा रहेगी। हमारी यह सृष्टि भी उत्पत्ति व प्रलय के मध्य स्थित है। उत्पत्ति के बाद यह 4.32 अरब वर्ष तक स्थित रहती है। उसके बाद इसकी प्रलय हो जाती है। प्रलय अवस्था भी 4.32 अरब वर्षों की होती है। इस प्रकार रात व दिन की तरह सृष्टि की भी उत्पत्ति व प्रलय होती रहती है। मनुष्य का आत्मा अनादि, नित्य व अमर है। इसका सृष्टि काल में अपने कर्मों के अनुसार जन्म व मरण होता रहता है। अतः हमारी आत्मा सदा से है और सदा रहने वाली है। इस रहस्य को जानकर हमें अपने दीर्घकालीन लाभों के लिये वेद, मनुस्मृति एवं सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के अध्ययन व उनसे प्राप्त ज्ञान का आचरण व पालन करने की आवश्यकता है। ऋषियों व विद्वानों का कर्तव्य मनुष्यों का मार्गदर्शन करना होता है। हम उसे मानेंगे तो हमें लाभ होगा अन्यथा हमारी ही हानि होगी। यह हानि ऐसी होती है जिसकी पूर्ति सम्भव नहीं होती। अन्तिम समय में जब मनुष्य को कुछ ज्ञान होता है तो आत्मा को पछतावा होता है परन्तु कर्म फल व्यवस्था का समाधान किसी के पास नहीं होता। जिन लोगों ने मनुस्मृति व वेदों का विरोध किया उनकी अनश्वर आत्मायें आज कहां हैं? उनका कोई अनुयायी नहीं बता सकता। वैदिक कर्म-फल सिद्धान्त से ही इसका अनुमान लगाया जा सकता है। अतः हमें व मनुस्मृति के विरोधियों को समय रहते संभल जाना चाहिये। इसी में सबका हित है। मनुस्मृति वा शुद्ध-मनुस्मृति एक महत्वपूर्ण एवं लाभप्रद ग्रन्थ है तथा मानव जाति के लिए एक वरदान है। हमें सत्य का ग्रहण करना चाहिये तथा असत्य को छोड़ देना चाहिये। इसी में हम सबका हित है।

सभी मनुष्य सभी विषयों के विद्वान नही हो सकते। जो व्यक्ति जिस विषय का विद्वान हो उसको उसी विषय पर साधिकार टीका-टिप्पणी करनी चाहिये। अतीत में देश के कुछ चर्चित व प्रसिद्ध लोगों ने ऐसे विषयों में टिप्पणियां की हैं जिसके वह अधिकारी विद्वान नहीं थे। ऐसी टिप्पणियों का कोई महत्व नहीं होता। ऐसे लोग अनजानें में निष्पक्ष विद्वानों व इतिहास पुरुषों पर अपनी अविद्या व अज्ञान के कारण मिथ्या व अनुचित टिप्पणी कर अपराध कर बैठते हैं। इससे, क्या विद्वान और क्या अविद्वान, सभी को बचना चाहिये। किसी व्यक्ति व समूह का अपने स्वार्थ के विषय में सोचना और दूसरों के हितों की उपेक्षा करना मनुष्यता नहीं है। जो ऐसा करता है वह विवेकवान एवं साधु पुरुष नहीं होता। आदर्श नियम है कि मनुष्य को अपनी ही उन्नति में ही सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिये अपितु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये। ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में इसका पूणतः पालन किया था। इसी का वर्तमान समय में भी सबको पालन करना चाहिये।

विश्व का समस्त मनुष्य समाज एक परमात्मा का परिवार है। वेदों की देन ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का महान सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार संसार के सब मनुष्यों को इनके स्वामी एक ईश्वर ने ही उत्पन्न किया है और सब मनुष्य व आत्मायें ईश्वर के प्रति उत्तरदायी हैं। सबको ईश्वर के विधानों को मानना हैं। यदि मानेंगे तो सुखी होंगे अन्यथा जन्म-जन्मान्तर में दुःख भोगेंगे। मनुस्मृति के विधान मनुष्य की इस आवश्यकता, हित व कल्याण को ध्यान में ही रखकर ही बनाये गये हैं। किसी मनुष्य को धर्म पालन अथवा अपने कर्तव्यों के निर्वाह में किसी प्रकार की बाधा न आये इस दृष्टि से राजव्यवस्था एवं विधान बनाये गये हैं। मनुस्मृति की तुलना में किसी मत-मतान्तर का ग्रन्थ कहीं नहीं आता। अतः सबको मनुस्मृति का अध्ययन करने के साथ उसके हितकर विधानों को जानना एवं उन्हें आचरण में लाना चाहिये। इसी में सबका हित व कल्याण हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
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वेद की आज्ञा—

वेद की आज्ञा—

🔥यदि संसार में उन्नति करना चाहते हो तो विनम्र बनो ||

🌷बहुत से व्यक्ति तनिक सी विद्या पाकर अभिमान में भर जाते हैं | विद्या प्राप्त करके ऐंठो और अकड़ो मत अपितु शिष्ट और विनम्र बनो |

वेद का आदेश है…

“पर्णाल्लघीयसी भव ||”

हें मानव !
तू पर्ण अर्थात् पत्ते से भी हल्का अर्थात् नम्र बन |

जो नम्र है उसे न किसी से भय होता है और न पतन की चिन्ता | जो नम्र है उसका सर्वत्र आदर होता है |

बन्धुओं जब आपके हृदय में कभी अभिमान की भावनाएँ आने लगे तो वेदों के प्रकाण्ड पं० महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की अग्रलिखित घटना का स्मरण कर लेना |

एक बार महर्षि दयानन्द दानापुर में विराजमान थे | एक दिन एक व्यक्ति ने महाराज से कहा…

“स्वामी जी ! आप तो ऋषि हैं ” |

विनम्र दयानन्द ने उत्तर दिया…

“ऋषियों के आभाव में आप मुझे चाहे जो कह लें | परन्तु यदि मैं गौतम, कपिल, कणादादि के समय में हुआ होता तो मेरी गणणा साधारण विद्वानों में भी कठिनता से होती |”

स्वयं वेदों के प्रकाण्ड पंण्डित की देखो ! कैसे महान विनम्रता है |

देखो !
समुद्र में अनन्त नदियाँ आकर मिलती है परन्तु समुद्र शान्त रहता है, उसमें बाढ़ नहीं आती | आप भी गम्भीर और नम्र बनो |

वेद कहता है…

“उत्तानहस्ता नमसोप सद्य” |

यदि संसार में उन्नति चाहते हो, मान और सम्मान चाहते हो तो विनम्र बनो |

वेदों की राह पर चलो | विद्या, धन, वैभव, उच्च पदवी, मान और सम्मान पाकर फूल मत जाओ, अपनी मर्यादा से बाहर मत हो जाओ |

अतः किसी को छोटा न समझें | सभी के प्रति विनम्र रहे | जब दूसरों से मिलें तो दोनों हाथ उठाकर नमस्ते करे, आदर करे, यथायोग्य सत्कार करें |

वेदों की ओर लोटो ||
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सुंदरता एवं शिक्षा किस आधार पर माननी चाहिए?

सुंदरता एवं शिक्षा किस आधार पर माननी चाहिए? और सम्मान किस आधार पर देना चाहिए?*
प्रायः लोग किसी व्यक्ति की गोरी चमड़ी को देखकर, उसको सुंदर मानते हैं। यदि किसी व्यक्ति की चमड़ी भले ही गोरी हो, परंतु भावनाएँ अच्छी न हों, संकुचित भावनाएं हों, उस की भावनाओं में पक्षपात हो, अन्याय हो, क्रूरता हो, तो क्या वह व्यक्ति सुंदर माना जाए? नहीं। उसे सुंदर नहीं मानना चाहिए। इसलिए व्यक्ति की वास्तविक सुंदरता गोरे रंग की चमड़ी से नहीं होती, बल्कि उसकी उत्तम एवं शुद्ध भावनाओं से होती है। तो जिसकी भावनाएं शुद्ध हों, पक्षपात रहित हों, ऐसे व्यक्ति को ही वास्तविक रूप से सुंदर मानना चाहिए।
कोई व्यक्ति शिक्षित है या नहीं है, इस बात का निर्णय प्रायः लोग उसके परीक्षा में प्राप्त अंकों से करते हैं। अर्थात जिसके 98 / 99 प्रतिशत अंक होते हैं, उसे बड़ा शिक्षित मानते हैं। उसके व्यवहार में भले ही बुद्धिमत्ता और उत्तमता हो या न हो। तो इस प्रकार से किसी को प्राप्त अंकों के आधार पर शिक्षित मानना, यह कोई शिक्षा की उचित कसौटी नहीं है। असली शिक्षित व्यक्ति तो वही है, जिसमें बुद्धिमत्ता हो, दूरदर्शिता हो, जिसका व्यवहार उत्तम हो। झूठ छल कपट धोखा बेईमानी आदि दुष्टाचरणों से रहित हो। जो न्याय पूर्वक सबके साथ प्रेमपूर्वक सुमधुर व्यवहार करता हो। किसी का मजाक न उड़ाए, खिल्ली न उड़ाए, ऐसे आचार विचार का हो, वही वास्तव में शिक्षित है।
इसी प्रकार से आजकल समाज में एक दूसरे को जो सम्मान दिया जाता है, उसका आधार प्रायः धन संपत्ति को माना जाता है। जिसके पास धन संपत्ति बहुत अधिक है, उसी को बहुत अधिक सम्मान दिया जाता है। चाहे उसमें अच्छे गुण हों या न हों।
यह कसौटी भी ठीक नहीं है। *वास्तव में सम्मान किस आधार पर देना चाहिए?
जिस व्यक्ति में सेवा परोपकार दान दया निष्कामता, सत्यवादिता नम्रता इत्यादि गुण हों। इन गुणों को धारण करने वाले व्यक्ति को सम्मान देना चाहिए।*
इस प्रकार से यदि समाज के लोग इन कसौटियों पर कस कर के किसी को सुंदर एवं शिक्षित मानें, और उत्तम गुणों के आधार पर उसे सम्मानित करें, तो यह संसार स्वर्ग बन सकता है।
– स्वामी विवेकानंद परिव्राजक
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धर्म और उसकी आवश्यकता

धर्म और उसकी आवश्यकता

धर्म की परिभाषा क्या है?

१. धर्म संस्कृत भाषा का शब्द है जोकि धारण करने वाली धृ धातु से बना है। “धार्यते इति धर्म:” अर्थात् जो धारण किया जाये वह धर्म है। अथवा लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु सार्वजानिक पवित्र गुणों और कर्मों का धारण व सेवन करना धर्म है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि मनुष्य जीवन को उच्च व पवित्र बनाने वाली ज्ञानानुकुल जो शुद्ध सार्वजानिक मर्यादा पद्यति है, वह धर्म है।

६. वैशेषिक दर्शन के कर्ता महामुनि कणाद ने धर्म का लक्षण यह किया है-

यतोअभयुद्य निश्रेयस सिद्धि: स धर्म:

अर्थात् जिससे अभ्युदय(लोकोन्नति) और निश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि होती है, वह धर्म है।

३. वैदिक साहित्य में धर्म वस्तु के स्वाभाविक गुण तथा कर्तव्यों के अर्थों में भी आया है। जैसे जलाना और प्रकाश करना अग्नि का धर्म है और प्रजा का पालन और रक्षण राजा का धर्म है।

४. मनु स्मृति में धर्म की परिभाषा

धृति: क्षमा दमोअस्तेयं शोचं इन्द्रिय निग्रह:

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं ६/९

अर्थात् धैर्य,क्षमा, मन को प्राकृतिक प्रलोभनों में फँसने से रोकना, चोरी त्याग, शौच, इन्द्रिय निग्रह, बुद्धि अथवा ज्ञान, विद्या, सत्य और अक्रोध धर्म के दस लक्षण हैं।

दूसरे स्थान पर कहा है आचार:परमो धर्म १/१०८

अर्थात सदाचार परम धर्म है।

५. महाभारत में भी लिखा है-

धारणाद धर्ममित्याहु:,धर्मो धार्यते प्रजा:

अर्थात् जो धारण किया जाये और जिससे प्रजाएँ धारण की हुई हैं वह धर्म है।

६. स्वामी दयानंद के अनुसार धर्म की परिभाषा

जो पक्षपात रहित न्याय सत्य का ग्रहण, असत्य का सर्वथा परित्याग रूप आचार है उसी का नाम धर्म और उससे विपरीत का अधर्म है। -सत्यार्थ प्रकाश ३ सम्मुलास

पक्षपात रहित न्याय आचरण सत्य भाषण आदि युक्त जो ईश्वर आज्ञा वेदों से अविरुद्ध है, उसको धर्म मानता हूँ – सत्यार्थ प्रकाश मंतव्य

इस काम में चाहे कितना भी दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी चले ही जावें, परन्तु इस मनुष्य धर्म से पृथक कभी भी न होवें।- सत्यार्थ प्रकाश

धर्म मनुष्य की उन्नति के लिए आवश्यक है अथवा बाधक है इसको जानने के लिए हमें सबसे पहले धर्म और मजहब में अंतर को समझना पड़ेगा। कार्ल मार्क्स ने जिसे धर्म के नाम पर अफीम कहकर निष्कासित कर दिया था वह धर्म नहीं अपितु मज़हब था। कार्ल मार्क्स ने धर्म ने नाम पर किये जाने वाले रक्तपात, अन्धविश्वास, बुद्धि के विपरीत किये जाने वाले पाखंडों आदि को धर्म की संज्ञा दी थी। जबकि यह धर्म नहीं अपितु मज़हब का स्वरुप था।

धर्म और मजहब में अंतर क्या है?

प्राय: अपने आपको प्रगतिशील कहने वाले लोग धर्म और मज़हब को एक ही समझते हैं।

मज़हब अथवा मत-मतान्तर अथवा पंथ के अनेक अर्थ हैं जैसे वह रास्ता ही स्वर्ग और ईश्वर प्राप्ति का है और जो कि मज़हब के प्रवर्तक ने बताया है। अनेक जगहों पर ईमान अर्थात विश्वास के अर्थों में भी आता है।

१. धर्म और मज़हब के समान अर्थ नहीं हैं और न ही धर्म ईमान या विश्वास का प्राय: है।

२. धर्म क्रियात्मक वस्तु है, मज़हब विश्वासात्मक वस्तु है।

३. धर्म मनुष्य के स्वाभाव के अनुकूल अथवा मानवी प्रकृति का होने के कारण स्वाभाविक है और उसका आधार ईश्वरीय अथवा सृष्टि नियम है। परन्तु मज़हब मनुष्य कृत होने से अप्राकृतिक अथवा अस्वाभाविक है। मज़हबों का अनेक व भिन्न भिन्न होना तथा परस्पर विरोधी होना उनके मनुष्य कृत अथवा बनावटी होने का प्रमाण है।

४. धर्म के जो लक्षण मनु महाराज ने बतलाये हैं वह सभी मानव जाति के लिए एक समान है और कोई भी सभ्य मनुष्य उसका विरोधी नहीं हो सकता। मज़हब अनेक हैं और केवल उसी मज़हब को मानने वालों द्वारा ही स्वीकार होते हैं। इसलिए वह सार्वजानिक और सार्वभौमिक नहीं हैं। कुछ बातें सभी मजहबों में धर्म के अंश के रूप में हैं इसलिए उन मजहबों का कुछ मान बना हुआ है।

५. धर्म सदाचार रूप है अत: धर्मात्मा होने के लिये सदाचारी होना अनिवार्य है। परन्तु मज़हबी अथवा पंथी होने के लिए सदाचारी होना अनिवार्य नहीं है। अर्थात् जिस तरह धर्म के साथ सदाचार का नित्य सम्बन्ध है उस तरह मजहब के साथ सदाचार का कोई सम्बन्ध नहीं है। क्यूंकि किसी भी मज़हब का अनुनायी न होने पर भी कोई भी व्यक्ति धर्मात्मा (सदाचारी) बन सकता है।

परन्तु आचार सम्पन्न होने पर भी कोई भी मनुष्य उस वक्त तक मज़हबी अथवा पन्थाई नहीं बन सकता जब तक उस मज़हब के मंतव्यों पर ईमान अथवा विश्वास नहीं लाता। जैसे कि कोई कितना ही सच्चा ईश्वर उपासक और उच्च कोटि का सदाचारी क्यूँ न हो वह जब तक हज़रात ईसा और बाइबिल अथवा हजरत मोहम्मद और कुरान शरीफ पर ईमान नहीं लाता तब तक ईसाई अथवा मुस्लमान नहीं बन सकता।

६. धर्म ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है अथवा धर्म अर्थात् धार्मिक गुणों और कर्मों के धारण करने से ही मनुष्य मनुष्यत्व को प्राप्त करके मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता है। दूसरे शब्दों में धर्म और मनुष्यत्व पर्याय है। क्यूंकि धर्म को धारण करना ही मनुष्यत्व है। कहा भी गया है-

खाना,पीना,सोना,संतान उत्पन्न करना जैसे कर्म मनुष्यों और पशुओं के एक समान हैं। केवल धर्म ही मनुष्यों में विशेष है जोकि मनुष्य को मनुष्य बनाता है। धर्म से हीन मनुष्य पशु के समान है। परन्तु मज़हब मनुष्य को केवल पन्थाई या मज़हबी और अन्धविश्वासी बनाता है। दूसरे शब्दों में मज़हब अथवा पंथ पर ईमान लेन से मनुष्य उस मज़हब का अनुनायी अथवा ईसाई अथवा मुसलमान बनता है नाकि सदाचारी या धर्मात्मा बनता है।

७. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़ता है और मोक्ष प्राप्ति निमित धर्मात्मा अथवा सदाचारी बनना अनिवार्य बतलाता है परन्तु मज़हब मुक्ति के लिए व्यक्ति को पन्थाई अथवा मज़हबी बनना अनिवार्य बतलाता है। और मुक्ति के लिए सदाचार से ज्यादा आवश्यक उस मज़हब की मान्यताओं का पालन बतलाता है।

जैसे अल्लाह और मुहम्मद साहिब को उनके अंतिम पैगम्बर मानने वाले जन्नत जायेगे चाहे वे कितने भी व्यभिचारी अथवा पापी हो जबकि गैर मुसलमान चाहे कितना भी धर्मात्मा अथवा सदाचारी क्यूँ न हो वह दोज़ख अर्थात नर्क की आग में अवश्य जलेगा क्यूंकि वह कुरान के ईश्वर अल्लाह और रसूल पर अपना विश्वास नहीं लाया है।

८. धर्म में बाहर के चिन्हों का कोई स्थान नहीं है क्यूंकि धर्म लिंगात्मक नहीं है- न लिंगम धर्मकारणं

अर्थात् लिंग (बाहरी चिन्ह) धर्म का कारण नहीं है।

परन्तु मज़हब के लिए बाहरी चिन्हों का रखना अनिवार्य है जैसे एक मुस्लमान के लिए जालीदार टोपी और दाड़ी रखना अनिवार्य है।

९. धर्म मनुष्य को पुरुषार्थी बनाता है क्यूंकि वह ज्ञानपूर्वक सत्य आचरण से ही अभ्युदय और मोक्ष प्राप्ति की शिक्षा देता है परन्तु मज़हब मनुष्य को आलस्य का पाठ सिखाता है क्यूंकि मज़हब के मंतव्यों मात्र को मानने भर से ही मुक्ति का होना उसमें सिखाया जाता है।

१०. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़कर मनुष्य को स्वतंत्र और आत्म स्वावलंबी बनाता है क्यूंकि वह ईश्वर और मनुष्य के बीच में किसी भी मध्यस्थ या एजेंट की आवश्यकता नहीं बताता। परन्तु मज़हब मनुष्य को परतंत्र और दूसरों पर आश्रित बनाता है क्यूंकि वह मज़हब के प्रवर्तक की सिफारिश के बिना मुक्ति का मिलना नहीं मानता।

११. धर्म दूसरों के हितों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति तक देना सिखाता है जबकि मज़हब अपने हित के लिए अन्य मनुष्यों और पशुयों की प्राण हरने के लिए हिंसा रुपी क़ुरबानी का सन्देश देता है।

१२. धर्म मनुष्य को सभी प्राणी मात्र से प्रेम करना सिखाता है जबकि मज़हब मनुष्य को प्राणियों का माँसाहार और दूसरे मज़हब वालों से द्वेष सिखाता है।

१३. धर्म मनुष्य जाति को मनुष्यत्व के नाते से एक प्रकार के सार्वजानिक आचारों और विचारों द्वारा एक केंद्र पर केन्द्रित करके भेदभाव और विरोध को मिटाता है तथा एकता का पाठ पढ़ाता है। परन्तु मज़हब अपने भिन्न भिन्न मंतव्यों और कर्तव्यों के कारण अपने पृथक-पृथक जत्थे बनाकर भेदभाव और विरोध को बढ़ाते और एकता को मिटाते है।

१४. धर्म एक मात्र ईश्वर की पूजा बतलाता है जबकि मज़हब ईश्वर से भिन्न मत प्रवर्तक/गुरु/मनुष्य आदि की पूजा बतलाकर अन्धविश्वास फैलाते हैं।

धर्म और मज़हब के अंतर को ठीक प्रकार से समझ लेने पर मनुष्य अपने चिंतन मनन से आसानी से यह स्वीकार करके के श्रेष्ठ कल्याणकारी कार्यों को करने में पुरुषार्थ करना धर्म कहलाता है, इसलिए उसके पालन में सभी का कल्याण है।

डॉ विवेक आर्य
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