वीरता की अवतार महारानी लक्ष्मी बाई

वीरता की अवतार महारानी लक्ष्मी बाई
डा.अशोक आर्य
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में देश की वीरांगनाओं ने यह सिद्ध कर दिखाया कि नारी केवल अबला, कोमलांगी, रमणी ही नहीं वरण समय आने पर वह सबला, वज्रांगी तथा रणचंडी का रूप धारण करने की शक्ति भी रखती है| इतना ही नहीं वह अपने नाम के अर्थ का विपर्यय करने में भी पूर्णतया सक्ष्म है| यह सब उसके बाल्यकाल से ही आरम्भ हो जाता है| जब महारानी लक्ष्मी बाई अभी मनुबाई के रूप में छोटी ही थी, तभी उसने बाल सुलभ क्रीडाओं में दुर्ग घेरना, चक्रव्यूह तोड़ना, बरछी चलाना आदि के रूप में बच्चों के साथ खेलें खेलीं| इसी से ही इस छोटी-नन्हीं बालिका का भावी जीवन प्रतिध्वनित हो गया था| विवाह के पश्चात् जब पति की मृत्यु होने पर अंग्रेज की कंपनी सरकार ने उसकी एक न सुनी तथा झांसी की बागडोर अपने हाथ में लेने की घोषणा कर दी तो लक्ष्मीबाई ने चंडी का रूप धारण करते हुए पुरुष वेश में समरांगण में जा डटी|
रानी में मोर्चाबंदी करने की अद्भुत कला थी| इस कारण ही तो वह अंग्रेजों पर निरंतर विजय पा रही थी तथा गोरे एक साधारण सी महिला से पराजित होकर मुंह छिपाते फिरते थे| १८ जून १८५८ को लक्ष्मीबाई ने बड़ी सरलता से ग्वालियर पर अपना अधिकार जमा लिया| यहाँ वह चारों और से घिरी हुई थी फिर भी प्रात: उठकर स्नान ध्यान करना न भूलती थी| यहाँ आकर भी प्रात: उसने यह सब नित्यकर्म किया तत्पश्चात् वीरांगना स्वरूप अपना श्रृंगार किया| केसरिया बाना पहिन, शस्त्र उठाकर तथा शत्रुओं के संहार के लिए अपने सखा व साथियों और सैनिकों सहित मैदान में आ डटी| जब उसने अपने एकमात्र पुत्र दामोदर राव को रामचंद्र राव की पीठ पर बांधा तो सब लोग समझ गए कि रानी आज अपना रणचंडी का रूप धारण करने वाली है| कुछ ही क्षणों में तोपखाने ने आग उगलना आरम्भ कर दिया| इस के अचूक निशाने से जहाँ अंग्रेजी सेनाओं के चिथड़े उड़ने लगे, वहाँ उनका तोपखाना भी तहस-नहस होने लगा| जिस ग्वालियर की सहायता के लिए रानी ने जूही के माध्यम से कुमुक भेजी, उसी ग्वालियर की सेना ने ही विश्वासघात किया किन्तु रानी लक्ष्मीबाई ने साहस न छोड़ा और बड़े धैर्य से शत्रु सेना को गाजर-मूली कि भाँति काटते हुए आगे बढ़ने लगी| रानी के भयंकर प्रहारों से भयभीत अंग्रेजी सेना रण छोड़कर भागने वाली ही थी कि अकस्मात् उनकी सहायता के लिए पीछे से सेना की एक और टुकड़ी आ पहुंची| इस मध्य रानी की पैदल सेना ने भी गोरों से भिड़कर महा प्रलय का दृश्य बना दिया| इस भयंकर मारकाट में एक क्षण वह भी आया जब रानी एक स्थान पर अकेली ही रह गई तथा उसकी सहेली मुंदरा भी बुरी तरह से घायल हो गई| रानी दोनों हाथों से बिजली की गति से तलवार चलाते हुए मारकाट मचा रही थी| इस मारकाट के संघर्ष में वह स्वयं भी बुरी तरह से घायल हो गई थी, तो भी रानी तथा उसकी सेना काल बनकर शत्रु सेना के साथ जूझ रहे थे|
गुलमुहम्म्द ने देखा कि रानी की अवस्था अत्यंत गंभीर है | इस अवस्था को देख गुलमुहम्म्द ने तत्काल उन्हें बाबा गंगादास की कुटिया तक पहुंचाया| यहाँ पहुँचाने तक रानी की अवस्था बहुत बिगड़ चुकी थी|, मुंदरा तो इससे पहले ही ईश चरणों में जा चुकी थी| महारानी ने भी अंतिम बार अपनी आँखें खोलीं और फिर सदा सदा के लिए प्रभु चरणों में लीन हो गई| इस प्रकार जो ज्योति २१ अक्टूबर सन् १८३५ में प्रज्वलित हुई थी, वह मात्र २३ वर्ष की आयु में ही अत्यधिक आभा बिखेर कर १८ जून १८५७ को सदा के लिए लीन हो गई| किन्तु इतिहास में उनके शौर्य के चर्चे सदा होते रहेंगे|
रानी के देहांत पर बाबा गंगादास जी ने अपनी झोंपड़ी की घास तथा लकडियाँ उधेड़ कर दोनों सखियों का दाह संस्कार किया| जब दोनों चिताएं धू-धू कर जल रहीं थीं तो गुलमुहम्म्द ने अपनी सैनिक पौशाक (केसरिया बाना) को भी चिता की भेंट कर दिया| उधर बालक दामोदर राव को लेकर रामचंद्र राव देशमुख भी दक्षिण को चला गया तथा रघुनाथ घात लगाए गौरों की प्रतीक्षा में बैठ गया| जब चिता ठंडी हो गई तो गुलमुहम्मद ने रानी की चिता के स्थान पर स्मारक स्वरूप एक चबूतरा बना दिया| यह बनाया गया चबूतरा ही बाद में रानी लक्ष्मीबाई की भव्य समाधि के रूप में बदल गया| आज प्रतिदिन हजारों सैलानी इस स्मारक के दर्शन कर अपने आप को धन्य मानते हैं|
आर्य समाज की महान् सेविका तथा हिंदी साहित्य की अन्यतम कव्यित्री सुभुद्रा कुमारी चौहान ने बड़े सुन्दर काव्य में रानी को इस प्रकार स्मरण किया है :-
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी ,
सन् सतावन में चमक उठी वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी ,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी||

डा. अशोक आर्य
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