वृत्ति सारुप्यता योग मार्ग और भोग मार्ग

वृत्ति सारुप्यता
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वैदिक विद्वान श्री अवधेश प्रसाद पांडेय जीने on line Vebinar में कल योग विषयक चर्चा करते हुए कहा था कि –

मनुष्यमात्र का सर्वांगी उत्कर्ष योग रूपी प्रबल साधन से प्राप्त होता है । समस्त दुखों से छूटकर नित्य सुख की प्राप्ति करनी हो तो योगशास्त्र का आश्रय लेना पड़ेगा और तदनुसार अपना आंतर – बाह्य आचरण करना पड़ेगा ।

योग शास्त्र के रचयिता पातंजल ऋषि ने युज समाधौ योग शब्द का अर्थ समाधि कहा है अर्थात् दूसरे सूत्र अनुसार
योग: चित्त वृत्ति निरोध: चित्त की वृत्तियों को रोकना योग है । योग को समाधि है अर्थात् अपनी वृत्तियों को रोककर हृदय स्थित परमात्मा में निवेशित करना योग है । चित्त की उत्कृष्ट भूमि में समाधि प्राप्त होती है । इसको निरुद्ध अवस्था कहते है । इस अवस्था में असंप्रज्ञात समाधि लगती है और ईश्वर साक्षात्कार होता है ।

तीसरे सूत्र में योग का फल दर्शाया गया है –

तदा द्रष्टु: स्वरूपे अवस्थानम् = योगी की उच्च स्तरीय निरुद्ध अवस्था में वह आत्मस्थित परमात्मा का प्रकाशन कर लेता है । चित्त की इस परिपक्व अवस्था में परमात्मा खुद योगी पर विशेष कृपा बरसाते हुए अपना ज्ञान चक्षु प्रदान करके अपना प्रत्यक्ष स्वरूप प्रगट कर देता है । इस अवस्था में योगी के कलेशो की नितान्त परिसमाप्ति हो जाती है । *जैसी स्थिति कैवल्य की होती है वैसी स्थिति इस निरुद्ध अवस्था में योगी प्राप्त कर लेता है । अब वह स्पष्ट रूप से जान लेता है कि मैंने आवागमन के सारे बंधन तोड़ दिए है, सारे अविद्या के संस्कार दग्धबिज कर डाले है, अतः मेरा जन्म निश्चित रूप से आगे नहीं होगा और शरीर छुटने के बाद मै मोक्ष प्राप्त करूंगा ।

चौथा सूत्र – वृत्तिसारुप्यमितरत्र की विस्तार से व्याख्या करते हुए श्रीमान पांडेय जीने कहा था कि –

यदि योगी = साधक मन की एकाग्र अथवा निरुद्ध अवस्था प्राप्त नहीं करता तो वह व्युत्थान दशा में होता है । इसको पतित अवस्था = सांसारिक अवस्था भी कहते है । इस अवस्था में क्लेश, बंधन, दुःख, पीड़ा, परतंत्रता, जन्म मरण आदि बने रहेंगे । इस व्युत्थान दशा को “योग” नहीं कह सकते । क्षिप्त, विक्षिप्त अथवा मूढ़ अवस्था में रहनेवाले मनुष्य को साधन करना ही पड़ेगा । उसे क्रम से संघर्ष करते हुए निरंतर आगे बढ़ना होगा । इतर अवस्था में साधक विषय – वस्तु – घटना का ठीक विवेक नहीं कर पाता । अपने मन की वृत्ति को वह अपने आत्मा में आरोपित कर देता है । जब मनुष्य सांसारिक विषय वासनोआे तथा संबंधों में चिपकता है, तब उसे खाना – पीना – घूमना – सोना – मोज मस्ती करना अच्छा लगता है । परिणामत: वह निश्चित पतन की गर्ता में जायेगा ही, ऐसा कह सकते है ।
दर्शित विषयो को अपना स्वरूप मान लेना बहुत बड़ी अविद्या है । मन के स्क्रीन पर आते हुए दृश्य को अपना स्वरूप मान लेना अविवेक है, बेईमानी है, जूठा दर्शन है ।

हम जीवात्मा तात्विक रूप से स्वतंत्र है, अणु स्वरूप है, चेतन है, अनंता है, अपरिणामी है, निर्लेप है, शुद्ध है, बुद्ध है = जाननेवाले दृष्टा है, कर्ता है, सुख दुःख के भोक्ता है ।

मन एक परमात्मा प्रदत्त दिव्य अत्यंत शक्तिशाली साधन है । वह पंच भूतो से सृजित है । सत्व प्रधान आंतर – बाह्य द्विमुखी साधन है । मन का व्यापार है, वृत्तिओ का निरंतर उठाते रहना । हम आत्मा मन से पृथक चेतन सत्ता है । वृत्ति को उठानेवाले हम है, रोकनेवाले भी हम है । मन में वृत्तियों को संयमित करना हमारे हाथ में है । मन में उठाई गई वृत्ति को अथवा तो संसार में घटित घटना को अपना मान लेना महा मूर्खता है । महा अविवेक है ।

उदाहरण देखे –
घर जल गया, तो मै मर गया, मै लूट गया ऐसा मानना इतर अवस्था है, पतन अवस्था है, व्युत्थान अवस्था है । वृत्ति सारुप्यता रखना खतरनाक है । हमारे पास बहुत सारे उदाहरण है कि – एक परिवार में पति की मौत हुई, तो पत्नी ने मान लिया कि हाय.. हाय… मै मर गई । मै लूट गई, मेरा क्या होगा ? आधे घंटे में उसकी भी “हार्ट अटैक” से मौत हो गई । यह क्या है, वृत्तिसारुप्यता । अन्य में हुई घटना को अपने में आरोपित कर देना मूर्खता है । परमात्मा ने हमे अपना शरीर सुरक्षा के लिए, स्वस्थ रखने के लिए तथा महत्तम सुख – आनंद – ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए दिया है । अपनी नादानी से, मूर्खता से इस मूल्यवान शरीर को ऐसे कैसे फेंक सकते है ?

स्व. ज्ञानेश्वरजी आर्य को स्मरण करते हुए वैदिक विद्वान श्री अवधेश प्रसाद जीने कहा था कि
किसीकी मृत्यु हुई हो, उस काल में वे वानप्रस्थ साधक आश्रम, रोजड़ में हमे बताते थे ऐसी मृत्यु की घटना में किसीको भी बिल्कुल रोना नहीं है, दुःखी भी नहीं होना है । बाह्य घटना को अपने में आरोपित नहीं करना है । शांत, गंभीर, धर्यवान और संतुलित बने रहना है । इस घटना को दृष्टा भाव से देखना है ।

रोते वे है जो उस व्यक्ति या वस्तु के प्रति राग रखते है, मोह रखते है । रोना – पीटना अर्थात् अपनी मन की स्थिति को बिगाड़ना है, विचलित करना है । अपने प्रियतम के प्रति छोटी छोटी बातों में रूठ जाना, आंसू बहाना बिल्कुल गलत बात है । ऐसा तो संसारी भोगवादी व्यक्ति ही करते है । हमे तो प्रेम करना है, वह भी नि:स्वार्थ । हमे हर हालत में स्थिर बुद्धि से अपने कर्तव्य का निर्वहन करना है । रोग द्वेष मोह से ऊपर उठना है । संकट समय में साधक कभी रोते नहीं, गभराते नहि, वे धीर, गंभीर तथा दृष्टा बने रहते है, सम्यक बने रहते है । उस संकट का सामना करते है, स्थिर मन से, शांत मन से, जागृत मन से समस्या का समाधान निकालने का पूरी ईमानदारी से प्रयास करते है ।
योगी एवम् साधक गण एसी दुखद घटना कभी भी, कीसीके भी साथ हो सकती है, ऐसी मानसिक पूर्व तैयारी बनाएं रखते है । कभी भी मेरी मृत्यु हो सकती है.. अपने शरीर को वे अग्नि में भस्म होता हुआ सदा देखते है *भस्मान्तं शरीरम् । इस प्रकार वे स्थितप्रज्ञ, अविचल, एकसमान शांत बने रहते है । वे शरीर, संसार, मन, जीवात्मा तथा परमात्मा को पृथक पृथक देखते है । अतः शोक – मोह से ऊपर उठ जाते है । तत्वज्ञानी – यथार्थ दृष्टा वे बने रहते है ।

चाहे कितना भी बड़ा संकट या अत्यन्त विपरित स्थिति क्यों आ न जाए, हमे अपनी मन की स्थिति विचलित नहीं करनी है । दुनिया की कोई ताक़त हमे दुःखी नहीं कर सकती । हमे वे पीड़ा दे सकती है – कष्ट दे सकती है, किन्तु दुःखी नहीं कर सकती, जब तक हम न चाहे की “मै दुःखी हो जाऊं” ।

प्रवचन के अंतिम चरण में श्री अवधेश प्रसाद जीने जीवन के दो मार्ग है – योग मार्ग और भोग मार्ग इस पर विवेचना करते हुए कहा कि –
जीवन में हर पल हमे निर्णय लेना होता है कि हम किस मार्ग पर चले ? एक मार्ग है जो कल्याण का मार्ग है, जिसे उपनिषद ने “श्रेय मार्ग” भी कहा है वह “प्रभु का मार्ग” है । प्रारंभ में वह तपस्या करवाता है, संघर्ष करवाता है, किन्तु वह हमारे लिए उपकारक साबित होता है, वह मार्ग “पुण्यवाह” है, “अमृत का मार्ग” है । उसी पर हमे चलना है । भोग मार्ग संसार का मार्ग है । वहां पीड़ा, बंधन, दुःख और धोखा ही धोखा मिलेगा । हमे योग मार्ग पर प्रभु के मार्ग पर चलना है । अतः हम सभी परस्पर प्रेम करते हुए, विवेक बुद्धि बनाते हुए कर्तव्य परायण होकर ईश्वर आज्ञानुसार जीवन यापन करे और सबका मंगल हो, कल्याण हो ।

। इति ओम् शम् ।
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