चंद्रशेखर आज़ाद

सन 1931 में चंद्रशेखर आज़ाद नाम का 26 वर्षीय *क्रांतिकारी इलाहाबाद के अल्फ़्रेड पार्क में चारो और से अंग्रेजी पुलिस से घिरा हुआ गोलियों की बौछार झेल रहा था और अपनी बंदूक से अकेला अंग्रेजी पुलिसवालों की लाशें गिरा रहा था।

अपनी बंदूक में खोल कर देखता है तो आखिरी गोली बचती है और आज़ाद जी की आंखों से अश्रु आ जाते हैं कुछ सोचकर ।

फिर अपने हाथ की मुठ्ठी में इस देश की पवित्र माटी को भरकर माथे से लगाकर आजाद जी, अश्रु भावना को शब्दों में पिरोकर क्या अंतिम वाक्य आता है उनके मुख से :

हे माँ, मेरी मातृभूमि, मुझे क्षमा करना जो इस जन्म में तेरी इतनी ही सेवा कर पाया।

और इस अंतिम वाक्य के साथ अंतिम गोली से अपने प्राण दे देते हैं क्योंकि प्रण लिया था आज़ाद जिये हैं, आज़ाद ही मरेंगे।

😭😭😭😭😭

जब इतना बड़ा क्रांतिकारी इस मातृभूमि के लिए प्राण देते हुए भी मातृभूमि से क्षमा मांग रहा है कि मैं तेरी बहुत कम सेवा कर पाया तो बाकी किसी को अहंकार किस बात का है।

यहां तो दिन के चार व्हाटसअप मैसेज इधर उधर करने पर ही अपने इस मातृभूमि के प्रति कर्तव्य को पूर्ण मान लेते हैं ।

सोचो, विचारों और शर्म करके प्रण लो , आजाद जी व उनके जैसे अन्य क्रन्तिकारियो के बलिदान से।

सहस्त्रो जन्म बलिदान करके भी मातृभूमि का ऋण नही उतरता और तुम निर्लज्ज भाव से सेवा का संतोष अनुभव करते हो।

उठो, जागो और जगाओ।
प्राप्त करो स्वराज।
ये भूमि ईश्वर ने आर्यों को दी है और हमें स्वराज लेना ही होगा।
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