माता पिता की सेवा

माता पिता की सेवा

यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा पृथ्वी से भारी क्या है आकाश से भी ऊंचा कौन है युधिष्ठिर जी बोले माता पृथ्वी से भी भारी है और पिता आकाश से भी ऊंचा है
यह है माता-पिता का गौरव और महत्व माता सर्व तीर्थ मई है और पिता संपूर्ण देवताओं का स्वरूप है इतना ही नहीं मैं तो कहा करता हूं माता पिता को ईश्वर के जीवित जागृत प्रतिनिधि समझता हूं हमें जन्म देने वाले हमारा लालन-पालन और पोषण करने वाले माता पिता कि हमें हर प्रकार से सेवा करनी चाहिए।
आप चिंतन करके देखें तो अवश्य प्राचीन काल के समय में उमर लंबी होती थी क्योंकि उस समय लोग अपने माता-पिता को प्रतिदिन प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया करते थे आज का युवक तो माता-पिता को नमस्ते करने में भी लज्जा करते हैं संसार में अपना मान और सम्मान चाहते हैं यदि आपको यश और बल की इच्छा है तो अपने माता-पिता और वृद्धों की सेवा करो क्योंकि मनु महाराज ने कहां है कि जो व्यक्ति माता-पिता और वृद्धों को नमस्ते करते हैं उनकी सेवा करते हैं उनकी आयु विद्या यश और बल चार प्रकार की समृद्धि माता पिता की सेवा करने से होती है इसलिए बंधुओं हम सदा अपने माता पिता की सेवा करें श्रवण कुमार अपने माता पिता के सेवा करने से इतिहास में अमर हो गए
एक बार रामकृष्ण परमहंस के पास एक युवक आया और कहने लगा आप मुझे संन्यास की दीक्षा दे दे तो परमहंस जी ने पूछा आप घर में अकेले हैं तो कहने लगा नहीं मेरे पास एक बूढ़ी मां है तो परमहंस ने कहा बूढ़ी मां को अकेला असहाय छोड़कर आप सन्यास क्यों लेना चाहते हैं युवक ने कहा मोक्ष को प्राप्त करने के लिए परमहंस ने कहा मां को छोड़कर सन्यास लेने से आपको मोक्ष मिलने वाला नहीं है आप जाएं और अपनी मां की सेवा करें उसी से आपको मोक्ष मिलेगा सुख मिलेगा जीवन में उत्साह मिलेगा इसलिए जीवन में हमें सदा अपने माता पिता को समय देना चाहिए|

गोपाल पाण्डेय
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चंद्रशेखर आज़ाद

सन 1931 में चंद्रशेखर आज़ाद नाम का 26 वर्षीय *क्रांतिकारी इलाहाबाद के अल्फ़्रेड पार्क में चारो और से अंग्रेजी पुलिस से घिरा हुआ गोलियों की बौछार झेल रहा था और अपनी बंदूक से अकेला अंग्रेजी पुलिसवालों की लाशें गिरा रहा था।

अपनी बंदूक में खोल कर देखता है तो आखिरी गोली बचती है और आज़ाद जी की आंखों से अश्रु आ जाते हैं कुछ सोचकर ।

फिर अपने हाथ की मुठ्ठी में इस देश की पवित्र माटी को भरकर माथे से लगाकर आजाद जी, अश्रु भावना को शब्दों में पिरोकर क्या अंतिम वाक्य आता है उनके मुख से :

हे माँ, मेरी मातृभूमि, मुझे क्षमा करना जो इस जन्म में तेरी इतनी ही सेवा कर पाया।

और इस अंतिम वाक्य के साथ अंतिम गोली से अपने प्राण दे देते हैं क्योंकि प्रण लिया था आज़ाद जिये हैं, आज़ाद ही मरेंगे।

😭😭😭😭😭

जब इतना बड़ा क्रांतिकारी इस मातृभूमि के लिए प्राण देते हुए भी मातृभूमि से क्षमा मांग रहा है कि मैं तेरी बहुत कम सेवा कर पाया तो बाकी किसी को अहंकार किस बात का है।

यहां तो दिन के चार व्हाटसअप मैसेज इधर उधर करने पर ही अपने इस मातृभूमि के प्रति कर्तव्य को पूर्ण मान लेते हैं ।

सोचो, विचारों और शर्म करके प्रण लो , आजाद जी व उनके जैसे अन्य क्रन्तिकारियो के बलिदान से।

सहस्त्रो जन्म बलिदान करके भी मातृभूमि का ऋण नही उतरता और तुम निर्लज्ज भाव से सेवा का संतोष अनुभव करते हो।

उठो, जागो और जगाओ।
प्राप्त करो स्वराज।
ये भूमि ईश्वर ने आर्यों को दी है और हमें स्वराज लेना ही होगा।
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