जीवन में गुरु का बडा महत्व है

जीवन में गुरु का बडा महत्व है परन्तु गुरु यदि आत्मा परमात्मा की सत्ता से इन्कार करे, यज्ञ योग व वेद की निन्दा करे, संयम सदाचार की शिक्षा न दे,कान में मंत्र फूके, किसी मनघडंत मंत्र की दीक्षा देकर उसको गुप्त रखने को कहे, अपने चरण धोकर उसे चरणामृत समझ कर पीने को कहे, जीव व प्रकृति को परमात्मा का अंश बताये, परमात्मा को साकार कहे व उसका अवतार माने, ओम् व गायत्री आदि वेद मंत्रो की महिमा न बताये ..तो समझ लेना वह सच्चा गुरु नही है। मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेद : ( शतपथ) अर्थात जब तीन वेदानुकूल उत्तम गुरु हों तब ही मनुष्य सही अर्थों में मनुष्य बनता है, सही अर्थों में ज्ञानवान, चरित्रवान, संकल्पपवान धार्मिक व ईश्वर भक्त बनता है । आज लाखों गुरुघंटाल लाखों चेले चेलियां मूंड कर अपने अपने मत सम्प्रदाय व आश्रम बना कर बैठे हैं । ये सब मायाजाल महाभारत युद्धोपरान्त गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के पतन का ही परिणाम है जो नित नये मत सम्प्रदाय व भगवान खडे हो रहे हैं । ऐसे भी मत हैं जो पांच मकार अर्थात मद्य मांस मीन मुद्रा मैथुन को अपनाने में मुक्ति मानते हैं, ऐसे भी मत हैं जो पांच ककार अर्थात केश कंघा कृपाण कच्छा और कडा धारण करने मेंं ही मुक्ति मानते हैं, ऐसे भी मत हैं जो देवी देवताओं को बलि देने व गंगा स्नान में मुक्ति मानते हैं, ऐसे भी मत हैं जो यीशू यहोवा, मुहम्मद, राम, कृष्ण, शिव, कबीर, नानक व अपने अपने गुरुओं को ही परमात्मा मान कर पूजने में मुक्ति मानते हैं, ऐसे भी मत हैं जो चुपचाप बैठे रहने को ही ध्यान समाधि व मुक्ति का मार्ग बताते हैं !! करोडों ऋषि मुनियों व वेद का तो एक ही उपदेश है- ईश्वर एक है, धर्म एक है, धर्म ग्रन्थ एक है, यज्ञ व योग ही सर्वोत्तम पूजा पद्धति है । जब तक विश्व में भिन्न भिन्न मत मतान्तरों का विरुद्धावाद समाप्त नहीं होगा मनुष्य का कल्याण नहीं होगा और न ही विश्व में एकता व शान्ति हो सकती है ।
– डा मुमुक्षु आर्य
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