वीरता की अवतार महारानी लक्ष्मी बाई

वीरता की अवतार महारानी लक्ष्मी बाई
डा.अशोक आर्य
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में देश की वीरांगनाओं ने यह सिद्ध कर दिखाया कि नारी केवल अबला, कोमलांगी, रमणी ही नहीं वरण समय आने पर वह सबला, वज्रांगी तथा रणचंडी का रूप धारण करने की शक्ति भी रखती है| इतना ही नहीं वह अपने नाम के अर्थ का विपर्यय करने में भी पूर्णतया सक्ष्म है| यह सब उसके बाल्यकाल से ही आरम्भ हो जाता है| जब महारानी लक्ष्मी बाई अभी मनुबाई के रूप में छोटी ही थी, तभी उसने बाल सुलभ क्रीडाओं में दुर्ग घेरना, चक्रव्यूह तोड़ना, बरछी चलाना आदि के रूप में बच्चों के साथ खेलें खेलीं| इसी से ही इस छोटी-नन्हीं बालिका का भावी जीवन प्रतिध्वनित हो गया था| विवाह के पश्चात् जब पति की मृत्यु होने पर अंग्रेज की कंपनी सरकार ने उसकी एक न सुनी तथा झांसी की बागडोर अपने हाथ में लेने की घोषणा कर दी तो लक्ष्मीबाई ने चंडी का रूप धारण करते हुए पुरुष वेश में समरांगण में जा डटी|
रानी में मोर्चाबंदी करने की अद्भुत कला थी| इस कारण ही तो वह अंग्रेजों पर निरंतर विजय पा रही थी तथा गोरे एक साधारण सी महिला से पराजित होकर मुंह छिपाते फिरते थे| १८ जून १८५८ को लक्ष्मीबाई ने बड़ी सरलता से ग्वालियर पर अपना अधिकार जमा लिया| यहाँ वह चारों और से घिरी हुई थी फिर भी प्रात: उठकर स्नान ध्यान करना न भूलती थी| यहाँ आकर भी प्रात: उसने यह सब नित्यकर्म किया तत्पश्चात् वीरांगना स्वरूप अपना श्रृंगार किया| केसरिया बाना पहिन, शस्त्र उठाकर तथा शत्रुओं के संहार के लिए अपने सखा व साथियों और सैनिकों सहित मैदान में आ डटी| जब उसने अपने एकमात्र पुत्र दामोदर राव को रामचंद्र राव की पीठ पर बांधा तो सब लोग समझ गए कि रानी आज अपना रणचंडी का रूप धारण करने वाली है| कुछ ही क्षणों में तोपखाने ने आग उगलना आरम्भ कर दिया| इस के अचूक निशाने से जहाँ अंग्रेजी सेनाओं के चिथड़े उड़ने लगे, वहाँ उनका तोपखाना भी तहस-नहस होने लगा| जिस ग्वालियर की सहायता के लिए रानी ने जूही के माध्यम से कुमुक भेजी, उसी ग्वालियर की सेना ने ही विश्वासघात किया किन्तु रानी लक्ष्मीबाई ने साहस न छोड़ा और बड़े धैर्य से शत्रु सेना को गाजर-मूली कि भाँति काटते हुए आगे बढ़ने लगी| रानी के भयंकर प्रहारों से भयभीत अंग्रेजी सेना रण छोड़कर भागने वाली ही थी कि अकस्मात् उनकी सहायता के लिए पीछे से सेना की एक और टुकड़ी आ पहुंची| इस मध्य रानी की पैदल सेना ने भी गोरों से भिड़कर महा प्रलय का दृश्य बना दिया| इस भयंकर मारकाट में एक क्षण वह भी आया जब रानी एक स्थान पर अकेली ही रह गई तथा उसकी सहेली मुंदरा भी बुरी तरह से घायल हो गई| रानी दोनों हाथों से बिजली की गति से तलवार चलाते हुए मारकाट मचा रही थी| इस मारकाट के संघर्ष में वह स्वयं भी बुरी तरह से घायल हो गई थी, तो भी रानी तथा उसकी सेना काल बनकर शत्रु सेना के साथ जूझ रहे थे|
गुलमुहम्म्द ने देखा कि रानी की अवस्था अत्यंत गंभीर है | इस अवस्था को देख गुलमुहम्म्द ने तत्काल उन्हें बाबा गंगादास की कुटिया तक पहुंचाया| यहाँ पहुँचाने तक रानी की अवस्था बहुत बिगड़ चुकी थी|, मुंदरा तो इससे पहले ही ईश चरणों में जा चुकी थी| महारानी ने भी अंतिम बार अपनी आँखें खोलीं और फिर सदा सदा के लिए प्रभु चरणों में लीन हो गई| इस प्रकार जो ज्योति २१ अक्टूबर सन् १८३५ में प्रज्वलित हुई थी, वह मात्र २३ वर्ष की आयु में ही अत्यधिक आभा बिखेर कर १८ जून १८५७ को सदा के लिए लीन हो गई| किन्तु इतिहास में उनके शौर्य के चर्चे सदा होते रहेंगे|
रानी के देहांत पर बाबा गंगादास जी ने अपनी झोंपड़ी की घास तथा लकडियाँ उधेड़ कर दोनों सखियों का दाह संस्कार किया| जब दोनों चिताएं धू-धू कर जल रहीं थीं तो गुलमुहम्म्द ने अपनी सैनिक पौशाक (केसरिया बाना) को भी चिता की भेंट कर दिया| उधर बालक दामोदर राव को लेकर रामचंद्र राव देशमुख भी दक्षिण को चला गया तथा रघुनाथ घात लगाए गौरों की प्रतीक्षा में बैठ गया| जब चिता ठंडी हो गई तो गुलमुहम्मद ने रानी की चिता के स्थान पर स्मारक स्वरूप एक चबूतरा बना दिया| यह बनाया गया चबूतरा ही बाद में रानी लक्ष्मीबाई की भव्य समाधि के रूप में बदल गया| आज प्रतिदिन हजारों सैलानी इस स्मारक के दर्शन कर अपने आप को धन्य मानते हैं|
आर्य समाज की महान् सेविका तथा हिंदी साहित्य की अन्यतम कव्यित्री सुभुद्रा कुमारी चौहान ने बड़े सुन्दर काव्य में रानी को इस प्रकार स्मरण किया है :-
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी ,
सन् सतावन में चमक उठी वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी ,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी||

डा. अशोक आर्य
samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

rajistertion call-9977987777, 9977957777, 9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

तीन बार अंग्रेज की फांसी पर झुलाने वाले नगर सेठ अमरचंद

तीन बार अंग्रेज की फांसी पर झुलाने वाले नगर सेठ अमरचंद
डा. अशोक आर्य
बीकानेर आरम्भ से ही वीर प्रस्विनी भूमि राजस्थान का मुख्य भाग रहा है| यहाँ के ही निवासी सेठ अमरचंद बाँठिया के यहाँ जो संतान हुई, उसका नाम अबीरचंद बाँठिया रखा गया|
अभी वह छोटे ही थे कि उनके पिता व्यापार के लिए ग्वालियर जा बसे| पुत्र का साथ जाना आवश्यक था| अत: अबीरचंद जी भी पिता के साथ ही ग्वालियर में जाकर रहने लगे| अबीरचन्द जी के पिता जैन मत के अनुगामी थे, इस कारण उन्होंने अपने व्यापार में इतना परिश्रम किया, इसमें इमानदारी को कभी हाथ से जाने न दिया| अपनी सज्जनता का भी पूरा परिचय दिया| इन सब कारणों से अबिरचंद जी तथा उनके परिवार को इतनी प्रतिष्ठा मिली कि इस प्रतिष्ठा के कारण ग्वालियर राजघराने ने उन्हें नगर सेठ की उपाधि प्रदान करते हुए राजघराने के ही समान अपने पैरों में सोने के कड़े पहनने का अधिकार भी दे दिया| ग्वालियरका राजा इतना सम्मान देकर ही संतुष्ट न हुआ अपितु कुछ काल पश्चात् उन्हें अपने राज्य के राजकोष का प्रभारी भी नियुक्त कर दिया|
अमरचन्द जी स्वभाव से ही बड़े धर्मप्रेमी व्यक्ति थे। अपने इस धार्मिक स्वभाव के कारण वह धार्मिक सत्संगों में जाते हही रहते थे| सन् 1855 ईस्वी में उन्होंने चातुर्मास के दिनों में ग्वालियर पधारे जैन सन्त बुद्धि विजय जी के प्रवचन सुने। इन्हीं सन्त महाराज के प्रवचन वह इससे पूर्व सन् 1854 ईस्वी में अजमेर में भी सुन चुके थे। इन प्रवचनों को सुनने का यह परिणाम हुआ कि वे विदेशी और विधर्मी राज्य के विरुद्ध डटकर खड़े हो गये। सन् 1857 ईस्वी के प्रथम स्वाधीनता आन्दोलन में उन्होंने बढ़चढ़ कर भाग लिया तथा जब अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय सेना और क्रान्तिकारी ग्वालियर में सक्रिय हुए, तो सेठ जी ने स्वयं को भामाशाह के प्रतिरूप में प्रस्तुत किया तथा न केवल राजकोष के समस्त धन को ही अपितु इसके साथ ही साथ अपनी पैतृक सम्पत्ति को भी देश कि स्वाधीनता के लिए उन्हें सौंप दिया।
अमरचंद जी कहा करते थे कि राजकोष का सब धन संग्रह सदा जनता से ही होता है, इसलिए जनता के हित के लिए इस धन को जनहित में देश को अथवा देश को स्वाधीन करवाने का प्रयास कर रहे स्वाधीनता सेनानियों को देना अपराध नहीं है| जहाँ तक निजी सम्पत्ति का प्रश्न था, वह उनकी अपनी मेहनत से कमाई गई थी, उसके प्रयोग का अधिकार भी उनका निज का ही था | अत: अपनी निजी सम्पत्ति होने के कारण, वे चाहे जिसे दें, इस पर किसी की कोई रोकटोक या आपत्ति का अधिआकर नहीं है| अत: यह संपत्ति भी उन्होंने देश के लिए न्योछावर कर दी| उनका यह दान अंग्रेज को कहाँ सहन हो सकता था? अत: अंग्रेजों ने इन्हें राजद्रोही घोषित कर उनके विरुद्ध वारण्ट जारी कर दिया। ग्वालियर राजघराना भी उस समय अंग्रेजों का ही साथ दे रहा था।
अपने विरुद्ध वारंट जारी होने का समाचार सुनते ही अमरचन्द जी भूमिगत होकर क्रान्तिकारियों का सहयोग करते रहे| इस मध्य ही एक दिन दुर्भाग्य से वे शासन के हत्थे चढ़ गये| उन्हें हिरासत में ले लिया गया| अब उन पर मुकदमा चलाकर उन्हें जेल में ठूँस दिया गया। अनेक प्रकार की सुख-सुविधाओं में पले सेठ अमर चंद जी को वहाँ दारुण यातनाएँ दी गयीं। यथा उन्हें मुर्गा बनाना, पेड़ से उल्टा लटका कर चाबुकों से मारना, हाथ पैर बाँधकर चारों ओर से खींचना, लोहे के जूतों से मारना, मूत्र पिलाना आदि अमानवीय यातनाएं प्रमुख थीं| अंग्रेज चाहते थे कि वे क्षमा माँग लें; किन्तु देश के लिए मर मिटने के लिए सब सुखों को त्याग चुके सेठ अमरचंद जी क्षमा के लिए तैयार कैसे हो सकते थे? अत: उन्होंने क्षमा माँगने के स्थान पर स्वयं को भारत माता की भेट चढ़ाना उत्तम समझा| उनके इस निर्णय से कुपित अंग्रेजों ने उनके आठ वर्षीय निरपराध पुत्र को भी पकड़ लिया।
पिता के लिए पुत्र एक कमजोर कड़ी माना जाता है| इस कमजोर कड़ी का ही प्रयोग करते हुए अंग्रेजों ने धमकी दी कि यदि तुमने क्षमा नहीं माँगी, तो तुम्हारे पुत्र की हत्या कर दी जाएगी। अमर चंद जी के लिए यह बहुत कठिन घड़ी थी; परन्तु सेठ जी इस धमकी से भी उस प्रकार ही विचलित न हुए जिसप्रकार बन्दा वीर वैरागी अपने बच्चे के बलिदान पर विचलित न उए थे| अपनी क्रूरता के लिए प्रसिद्ध अंग्रेज ने निरपराध बालक(अमरचंद के पुत्र) को तोप के मुँह पर बाँधकर गोला दाग दिया। बच्चे का शरीर चिथड़े-चिथड़े होक्रर हवा में फ़ैल गया। फिर भी जब नगर सेठ अमरचंद जी विचलित न हुए तथा अपने हठ को न छोड़ा तो सेठ जी के लिए फांसी कि तिथि निश्चित कर दी गई| अत: 22 जून, 1858 ईस्वी को उन्हें भी फाँसी पर लटकाने की घोषणा कर दी गई| अंग्रेज इस फांसी के कृत्य को करते हुए नगर तथा ग्रामीण लोगों को भी भयभीत करना चाहता था| इसलिए नगर तथा संलग्न देहातों के ग्रामीण लोगों के सामने सर्राफा बाजार में ही उन्हें फांसी देने की सार्वजनिक घोषणा की गई|
कुछ ही दिनों में फांसी के लिए निर्धारित 22 जून भी आ गया। सेठ जी तो दिल के भी सेठ ही थे, इस कारण उन्हें अपने शरीर का कोई मोह नहीं रह गया था। फांसी के फंदे पर जाते समय जब उनसे अन्तिम इच्छा के लिए पूछा गया तो उन्होंने अपने धर्म के अनुसार नवकार मन्त्र जपने की इच्छा व्यक्त की। उन्हें इसकी अनुमति दे दी गयी; जो उन्होंने बड़ी श्रद्धा भावना से पूर्ण की| देश भक्तों की सहायता करने वाले के लिए परमात्मा सदा ही साथ आ जाता है| इनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ| इनको परमात्मा की व्यवस्था के कारण एक बार नहीं तीन बार फांसी पर लताकायागआया| प्रथम बार जब इनको फांसी पर लटकाया जाने लगा तो अकस्मात् वह रस्सी टूट गई, जिससे उन्हें फांसी डी जा रही थी| अत: नई रस्सी तैयार कर उन्हें दूसरी बार फांसी पर लटकाया गया तो इस बार पेड़ की वह शाखा ही टूट गई, जिस पर उन्हें लटकाने का यत्न किया गया था| अब तीसरी बार उन्हें फांसी पर लटकाया जाना था| तीसरी बार उन्हें एक मजबूत नीम के पेड़ पर लटकाया गया| इस तीसरी बार अंग्रेज बड़ी कठिनाई से उन्हें फांसी देने में सफल हो पाया| अब अंग्रेज ने पुन: जन सामान्य को भयभीत करने के लिए शव को नीम के पेड़ से उतारने के स्थान पर इसे वहीँ लटकने दिया और यह शव तीन दिन तक उस पेड़ पर ही लटकता रहा| इस शव को देख लोग मन ही मन अंग्रेज की बर्बरता पर आंसू बहाते रहे|
सर्राफा बाजार में स्थित जिस नीम के पेड़ पर सेठ अमरचन्द बाँठिया जी को फाँसी दी गयी थी, उसके निकट ही आज सेठ जी की प्रतिमा स्थापित की गई है। प्रति वर्ष 22 जून को वहाँ बड़ी संख्या में आकर लोग देश की स्वतन्त्रता के लिए अपने तथा अपनी एकमात्र संतान के प्राण देने वाले उस अमर हुतात्मा को श्रद्धाँजलि अर्पित करते हैं।

डा. अशोक आर्य
samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

rajistertion call-9977987777, 9977957777, 9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

अमर बलिदानी राजा देवीसिंह गोदर

अमर बलिदानी राजा देवीसिंह गोदर
(जिनका बलिदान प्रथम 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में हुआ)
डा. अशोक आर्य

राजा देवीसिंह जी का जन्म मथुरा के राया तहसील के गांव अचरु में गोदर गौत्र (जिसे आज गोदारा के नाम से जाना जाता है) के हिंदू जाट परिवार में हुआ। धर्म के प्रति आप का अत्यधिक विश्वास था| इसके साथ ही साथ आप एक अच्छे पहलवान् भी थे। पहलवान् होने से तो आपका झुकाव क्षत्रियत्व की और होना चाहिए था किन्तु आपमें धार्मिक भावना अधिक बलवती थी, इस कारण आपने राज्य सत्ता के सुखों को त्याग कर संन्यास ले लिया और साधू बनकर घूमने तथा सदुपदेश देने लगे|
एक युवक के ताना देने क परिणाम:-
भारत जब अंग्रेजी दासता में जकड़ा हुआ था तथा देश पर अंग्रेज़ी अत्याचारों से भारतीय जूझ रहे थे| इन्हीं दिनों की बात है, जब आप एक गाँव में पहलवानी कर रहे थे तो आपके समकक्ष कोई अन्य पहलवान् न होने से कोई पहलवान् टिक नहीं पा रहा था| अत: आपकी विजय हुई| विजेता पहलवान् देवीसिह जी ने विजय की प्रसन्नता में जब झूमना आरम्भ किया तो एक युवक ने उन पर ताना कसते हुए कहा कि यहां एक छोटी सी जीत पर इतनी ख़ुशी मना रहे हो यदि दम है तो अंग्रेजों के सामने खड़े होकर देश की आजादी के लिए लड़ो| आप जानते हैं कि आपके पूर्वजो ने सदा से इस क्षेत्र की रक्षा अपने प्राणों की आहुति देकर की है। क्षत्रियों का धर्म भी यही उपदेश करता है|
राजा साहब तो बाल्यकाल से ही देशभक्त और धर्म परायण थे| अत: उस युवक की कही गई साधारण सी यह बात सीधे उनके दिल में जा कर चुभ गई| पहलवान् राजा साहिब ने प्रत्युत्तर में कहा कि बात तो तुम्हारी शतप्रतिशात सही है| यहां ताकत दिखाने का कोई लाभ नहीं, यह तो शक्ति का नाश करना ही तो है| मुझे अंग्रेज से लड़कर देश को आजाद कवाना चाहिए किन्तु अंग्रेजों जैसे शक्तिशाली शत्रु से लड़ने के लिए एक उत्तम सेना भी तो चाहिये, मैं वह सेना कहां से लाऊं। वहां पर उपस्थित उनके एक साथी ने तत्काल सुझाव दिया कि आप अपनी स्वयं की एक अच्छी सेना खड़ी करें। इस पर राजा साहब सहमत हो गए। पूरे क्षेत्र में राजा देवीसिंह जी का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता था|लोग राजा साहिब के प्रति अत्यधिक श्रद्धा रखते थे तथा उनका बहुत आदर करते थे।
क्रान्ति की ज्वाला
इस घटना के अनंतर राजा देवीसिंह जी के जीवन का जीवन ही परिवर्तित हो गया, एक उद्देश्य निर्धारित हो गया और उन्होंने सेना के एकत्रीकरण के लिए संलग्न गांवों के भ्रमण आरम्भ कर दिए| इस भ्रमण के मध्य जहाँ वह देश की स्वाधीनता के लिए योद्धाओं का साथ पाने के लिए आह्वान् कर रहे थे वहां जन जन में भी स्वाधीनता के महत्व को समझाते हुए उन्हें अपने आन्दोलन के साथ जोड़ रहे थे| स्वराज्य का भीष्ण शंखनाद करते ही उन्होंने क्षेत्र के गावों यथा राया, हाथरस, मुरसान, सादाबाद आदि समेत सम्पूर्ण कन्हैया की नगरी मथुरा, बृज क्षेत्र में क्रांति की अलख जगा दी। उस तेजस्वी नेता ने तेजपूर्ण भाषणों का ऐसा तांता बांधा कि युवाओं के खून में उबाल आने लगा और उनके साथ जुड़कर देश के लिए मर मिटने की शपथ लेकर पंक्तिबद्ध होने लगे। अत: उन्हें एक देशभक्त तथा धार्मिक सेना खड़ी करने में कुछ भी परेशानी नहीं आई। इस देशभक्त सेना ने राजा साहिब के नेत्रत्व में किसान की आजादी, अपना राज, तथा भारत को दासता से मुक्त कराने का दृढ संकल्प लिया।
कोई भी कार्य करना हो तो सब से पूर्व उसमें व्यय होने वाले धन की आवश्यकता होती है| इस आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए उन्होंने कुछ तो चंदा एकत्र किया तथा कुछ अंग्रेजों के धन को लूटकर तलवारों और बंदूकों की व्यवस्था की| अब जब धन भी आ गया और शस्त्र भी मिल गए तो इन्हें चलाने के लिए भी प्रशिक्षण की आवश्यकता थी| इन्हें शीघ्र ही शास्त्रों क प्रशिक्षण देने के लिए एक ऐसा प्रशिक्षक मिला गया, जो एक पदमुक्त सैनिक अधिकारी था| इस अधिकारी ने अपनी सेवाओं के माध्यम से सब वीरों को शस्त्र चलाने के लिए प्रशिक्षण देना आरम्भ किया और कुछ ही दिनों में युवकों को शास्त्रात्रों में निपुण भी कर दिया| बस फिर क्या था, देशभक्त प्रतीक्षा तो किया नहीं करते| देश को अपनी सेवायें देने के लिए उन्हें अवसर भी मिला गया| 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम अभी आरम्भ ही हुआ था, राजा साहिब अपनी इस नवनिर्मित सेना के साथ इस क्रान्ति के सहभागी बन अंग्रेज के विरोध में आ खड़े हुए|जब इस सबकी सूचना अंग्रेजों को मिली तो वह बौखला गए। राजा साहिब को क्रान्ति से अलग करने के लिए उन्होंने राजा साहब को लालच देते हुए ब्रिटिश सेना में आने का निमंत्रण दिया किन्तु राजा देवीसिंह ने बड़ी वीरता से अंग्रेज को यह उत्तर दिया कि अपने देश के दुश्मनों के साथ मिलकर अपने ही देशवासियों के विरोध में वह कभी भी खड़े नहीं हो सकते|
तत्पशचात् हरियाणा के नगर फरीदाबाद के निकटवर्ती सथित नगर बल्लभगढ के राजा नाहर सिंह ने उनकी भरपुर सहायता करते हुए, उन्होंने दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह जफर के पास जाकर राजा देवीसिंह जी की अनुशंसा करके उनके राज को मान्यता देने के लिए अनुरोध किया|बहादुरशाह जफर को उस समय क्रान्तिकारियो की आवस्यकता तो थी ही इसके साथ ही उनके सहायक के रूप में एक नाहरसिंह ही तो थे, जिनके कारण वह दिल्ली को अब तक अंग्रेजों से बचाये हुए थे। इसलिए उन्होंने इस अनुशंसा को तत्काल स्वीकार करते हुए राजा देवीसिंह जी के राज्य को अपनी और से मान्यता दे दी। इस प्रकार राजा देवीसिंह जी का राज तिलक हुआ और वह एक मान्यता प्राप्त श्रेणी के विधिवत् राजा बने|
राजा के रूप में देवीसिह जी ने अब अंग्रेज की सब व्यवस्थाओं को तहस नहस करने के लिए अंग्रेज संस्थाओं पर आक्रमण करना तथा उन्हें लूटना आरम्भ कर दिया| इस प्रकार ही मार्च सन् 1857 ईस्वी में एक बार फिर राजा देवीसिंह जी ने राया थाने पर आक्रमण कर दिया तथा वहां का सब कुछ नष्ट भ्रष्ट कर दिया। सात दिन तक थाने को घेरे रखा। जेल पर आक्रमण करके सब सरकारी दफ्तरों, बिल्डिंगों,पुलिस चौकियों आदि को जला कर राख कर दिया गया। परिणाम स्वरूप उस क्षेत्र के अंग्रेज कलेक्टर थोर्नबिल वहां का सब कुछ नष्ट होता वहीँ छोड़ वेष बदलकर वहां से भाग खड़ा हुआ। उसके भागने में उसके वफादार दिलावरख़ान और सेठ जमना प्रसाद ने उसकी सहायता की। इसके प्रतिफल स्वरूप दोनों को ही अंग्रेजी सरकार से बड़ा भूभाग तथा अन्य पुरस्कार मिला।
इस प्रकार राजा देवीसिह जी के प्रयास से राया अंग्रेज के चंगुल से निकल कर स्वाधीन हो गया| जिन बही खातों व अन्य माध्यमों से अंग्रेज लोग भारतीयों को लूट रहे थे, वह सब राजा साहिब ने अपने कब्जे में लेने के अनंतर जला दिए| यह सब व्यवस्था करने के अनंतर उन्होंने नगर के उन व्यापारियों को धमकाया, जो अंगेज का समर्थन किया करते थे| उन्हें कहा गया कि या तो देश सेवा के कार्यों में उनका साथ दें अन्यथा दंड के लिए तैयार रहें। जो व्यापारी नहीं माने उनकी दुकान से सामान लूट लिया गया तथा उनके बही खाते जला दिए गए क्योंकि वे अंग्रेजों के साथ रहकर गरीबों से हद से ज्यादा सूदखोरी करते थे। पूरे मथुरा में राजा देवीसिंह की जय के नारे गूंजने लगे, उन्हें गरीबों का राजा कहते हुए सदैव अजेय राजा के रूप में जनता ने उन्हें प्रस्तुत किया|
राजा साहिब को अपना थाना चलाने के इए स्थान की आवश्यकता थी| उन्होंने एक सरकारी स्कूल के भवन को इस हेतू लिया और थाना आरम्भ कर दिया तथा अपनी सरकार पूर्णतः आधुनिक पद्धति से बनाई। उन्होंने कमिशनर, अदालत, पुलिस सुप्रिटेंडेन्ट आदि पद बना कर ईमानदार तथा देशभक्त व्यक्तियों को इन पदों पर नियुक्त किया| राजा साहिब प्रतिदिन यहाँ आकर जनता की समस्याओं को सुनते और उनका निराकरण करते| अब उन्होंने राया के किले पर भी अधिकार कर लिया। उनका यह नियम था कि प्रतिदिन जनता के बीच रहते हुए उनकी समस्याओं को अपनी आँखों से देखते और उनका समाधान भी करते थे।
राजा साहिब सब में देशभक्ति की भावानाएं जगाते रहते थे| इस हेतु वे देशभक्ति को जगाते हुए पूरे क्षेत्र में घूमते थे। उनके क्षेत्र में अंग्रेजों के प्रवेश पर रोक थी। राजा साहिब ने अनेक बार क्रांतिकारियों की सहायता करते हुए उनके साथ मिलकर अनेक अंग्रेजों को लूटा व आम लोगो की सहायता की।
बलिदान
राजा साहब ने निरंतर एक वर्ष तक अंग्रेज के नाक में दम किये रखा| किसी भी क्षण अंग्रेज को सुख चैन से बैठने का अवसर तक न दिया| अवस्था यहाँ तक आ गई कि अंग्रेज सरकार की चूलें तक हिलने लगीं|अंग्रेज अधिकारी तो राजा साहिब का नाम तक ही सुनकर थर थर कांपने लगते थे। एक अकेला वीर इतनी विशाल अंग्रेज सेना का कब तक सामना कर सकता था, हुआ भी कुछ ऐसा ही| अंग्रेजों ने कोटा से अपनी सेना को बुलाया| सेनाधिकारी मि. बिल ने अंग्रेज सेना के अधिकारी डेनिश के नेत्रत्व में सेना की एक बड़ी टुकड़ी की सहायता से आक्रमण किया, बड़ी सेना होते हुए भी धोखा देने में चतुर अंग्रेज ने यहाँ भी धोखे से ही काम लिया और धोखे से राजा साहिब को बंदी बना लिया। दिनांक 15 जून सन् 1858 को राया में ही उन्हें, उनके साथी श्री राम गोदारा तथा उनके अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ फांसी दे दी गई| अंग्रेजों ने फांसी देने से पूर्व उन्हें झुकने के लिए बोला किन्तु राजा साहिब ने कड़कते स्वर में निर्भय होकर कहा कि मैं मृत्यु के भय से अपने देश के शत्रुओं के आगे नहीं झुकूंगा।
इस प्रकार भारत माता का एक सच्चे सपूत, देशभक्त साधु ने देश पर संकट आने पर, संन्यास धर्म से ऊपर उठते हुए, अपनी तलवार पुनः उठाकर क्षत्रिय धर्म का पालन किया तथा देश सेवा करते हुए हंसते हंसते फांसी पर झूलकर देश के लिए बलिदान हो गया ।

डा. अशोक आर्य
samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

rajistertion call-9977987777, 9977957777, 9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

सर्वोत्तम धर्मग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश’

सर्वोत्तम धर्मग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश’
————————————————–

🌷परमात्मा ने इस सृष्टि और मनुष्य आदि प्राणियों को बनाया है। परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति का अखिल विश्व में स्वतन्त्र अस्तित्व है। यह तीनों सत्तायें मौलिक, अनादि, नित्य, अनुत्पन्न, अविनाशी गुणों वाली हैं। परमात्मा ने यह सृष्टि जीवों के कर्मों के सुख व दुःख रूपी फल प्रदान करने के लिये बनाई है। मनुष्य योनि वह योनि है जिसमें वह जीवात्मा उत्पन्न किये गये हैं जिन्होंने पूर्व जन्मों में आधे से अधिक शुभ व पुण्य कर्म किये हों। जिसके शुभ, पुण्य या अच्छे कर्मों का प्रतिशत 50 से जितना अधिक होता है, उन्हें इस मनुष्य जीवन में उतने ही अधिक सुख, ज्ञान व साधन आदि प्राप्त होते हैं। अन्य जीवात्माओं, जिनके अशुभ कर्मों का अनुपात शुभ कर्मों से अधिक होता हैं, उन्हें मनुष्येतर नीच योनियां प्राप्त होती हैं जहां वह दुःखों से मुक्ति के लिये मनुष्यों की तरह सन्ध्योपासना, यज्ञ, परोपकार, दान आदि शुभ नहीं कर सकते। मनुष्य का जीवन मिल जाने पर इसे समाजोपयोगी व देशोपयोगी बनाने के लिये ज्ञान प्राप्ति तथा ज्ञानानुरूप पुरुषार्थमय जीवन व्यतीत करने की आवश्यकता होती है। ज्ञान की प्राप्ति मनुष्यों को अपने माता-पिता, आचार्यों, पुस्तकों का अध्ययन, वेद एवं ऋषियों के ग्रन्थों के स्वाध्याय के द्वारा होती है।

वर्तमान में देश देशान्तर में सत्य विद्याओं के ग्रन्थों की उपलब्धि न होने और भोले भाले मनुष्यों के अविद्यायुक्त मिथ्या मतों व उनके ग्रन्थों सत्यासत्य मिश्रित बातों में फंसे होने से सत्य ग्रन्थों के अध्ययन की अतीव आवश्यकता है। सत्य ग्रन्थों की परीक्षा करने के बाद पूर्ण प्रमाणिक ग्रन्थ ईश्वर से प्राप्त वेद ज्ञान की चार संहितायें सिद्ध होती हैं। चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं। वेद ज्ञान की इन संहिताओं समस्त ईश्वर प्रदत्त ज्ञान सम्मिलित है। सृष्टि की आदि में परमात्मा ने चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा के माध्यम से अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न सभी मनुष्यों को यही वेद ज्ञान प्रदान किया था। इससे वेदाध्ययन की परम्परा आरम्भ होकर ऋषि जैमिनी, ऋषि दयानन्द और उनके अनुयायियों तक चली आई है। वेदों को समझाने व इनका सरलीकरण करने के लिये समय-समय पर अनेक ऋषियों ने व्याकरण ग्रन्थों सहित अनेक विषयों के शास्त्र ग्रन्थों का प्रणयन किया। वर्तमान में दर्शन, उपनिषदादि ग्रन्थ परा विद्या के प्रमुख ग्रन्थों में आते हैं। इसके अतिरिक्त व्याकरण सहित आयुर्वेद, ज्योतिष, कल्प व शिल्प आदि अपरा विद्याओं के ग्रन्थों का अध्ययन कर मनुष्य अपने जीवन को दुःखों से मुक्त कर मरणोपरान्त जन्म मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त कर ईश्वर के सान्निध्य से उसके परमानन्द को भोग सकते हैं।

जन्म मरण से मुक्ति सहित ईश्वर के परमानन्द की प्राप्ति के लिये मनुष्यों को सत्य व धर्म का आचरण करना होता है। इसके ज्ञान के लिये वेदों के बाद सबसे अधिक ज्ञानयुक्त ग्रन्थ ‘‘सत्यार्थ-प्रकाश” है। मनुष्य जीवन के लिये उपयोगी सभी विषयों व उनके सत्य अर्थों का विधान इस ग्रन्थ से प्राप्त होता है। इस ग्रन्थ के समान महत्चवपूर्ण व उपयोगी अन्य कोई ग्रन्थ संसार में नहीं है। इस ग्रन्थ से मनुष्यों के कर्तव्यों के ज्ञान सहित उनके आचरण की प्रेरणा प्राप्त होती है। अकर्तव्यों व अशुभ कर्मों से होने वाली हानियों के ज्ञान के साथ उनसे दूर रहने की प्रेरणा भी यह ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश करता है।

यदि यह ग्रन्थ देश के सभी मनुष्यों तक पहुंच जाये और स्कूलों आदि के द्वारा इसका अध्ययन कराया जाये तो मनुष्य अविद्याओं व मिथ्याचरणों में विचरण करने और अपनी आध्यात्मिक एवं शारीरिक हानि होने से बच सकता है। इसके प्रचार से मिथ्या मत-मतान्तरों का हानिकारक प्रभाव भी दूर हो सकता है और समस्त विश्व के सभी मनुष्य सत्य ज्ञान के अनुसरण कर अपना व दूसरों का उपकार कर श्रेय मार्ग के पथिक बन कर ईश्वर की कृपा के पात्र बन सकते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति सहित संसार से अविद्या का नाश और विद्या का प्रसार करने के लिये सच्चे ईश्वर भक्त ऋषि दयानन्द ने इस ग्रन्थ का प्रणयन किया है। यह ग्रन्थ ज्ञान का सूर्य है जबकि इसके सम्मुख सभी मत-मतान्तरों की पुस्तकें अज्ञान के तिमिर से युक्त हैं। यहीं कारण हैं कि अनेक प्रमुख मतों के विद्वानों ने इसका अध्ययन करने व इसको समझने के बाद सत्य वैदिक मत का अनुयायी बन कर इसके प्रचार व प्रसार को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया।
samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

rajistertion call-9977987777, 9977957777, 9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

वृत्ति सारुप्यता योग मार्ग और भोग मार्ग

वृत्ति सारुप्यता
———————–
वैदिक विद्वान श्री अवधेश प्रसाद पांडेय जीने on line Vebinar में कल योग विषयक चर्चा करते हुए कहा था कि –

मनुष्यमात्र का सर्वांगी उत्कर्ष योग रूपी प्रबल साधन से प्राप्त होता है । समस्त दुखों से छूटकर नित्य सुख की प्राप्ति करनी हो तो योगशास्त्र का आश्रय लेना पड़ेगा और तदनुसार अपना आंतर – बाह्य आचरण करना पड़ेगा ।

योग शास्त्र के रचयिता पातंजल ऋषि ने युज समाधौ योग शब्द का अर्थ समाधि कहा है अर्थात् दूसरे सूत्र अनुसार
योग: चित्त वृत्ति निरोध: चित्त की वृत्तियों को रोकना योग है । योग को समाधि है अर्थात् अपनी वृत्तियों को रोककर हृदय स्थित परमात्मा में निवेशित करना योग है । चित्त की उत्कृष्ट भूमि में समाधि प्राप्त होती है । इसको निरुद्ध अवस्था कहते है । इस अवस्था में असंप्रज्ञात समाधि लगती है और ईश्वर साक्षात्कार होता है ।

तीसरे सूत्र में योग का फल दर्शाया गया है –

तदा द्रष्टु: स्वरूपे अवस्थानम् = योगी की उच्च स्तरीय निरुद्ध अवस्था में वह आत्मस्थित परमात्मा का प्रकाशन कर लेता है । चित्त की इस परिपक्व अवस्था में परमात्मा खुद योगी पर विशेष कृपा बरसाते हुए अपना ज्ञान चक्षु प्रदान करके अपना प्रत्यक्ष स्वरूप प्रगट कर देता है । इस अवस्था में योगी के कलेशो की नितान्त परिसमाप्ति हो जाती है । *जैसी स्थिति कैवल्य की होती है वैसी स्थिति इस निरुद्ध अवस्था में योगी प्राप्त कर लेता है । अब वह स्पष्ट रूप से जान लेता है कि मैंने आवागमन के सारे बंधन तोड़ दिए है, सारे अविद्या के संस्कार दग्धबिज कर डाले है, अतः मेरा जन्म निश्चित रूप से आगे नहीं होगा और शरीर छुटने के बाद मै मोक्ष प्राप्त करूंगा ।

चौथा सूत्र – वृत्तिसारुप्यमितरत्र की विस्तार से व्याख्या करते हुए श्रीमान पांडेय जीने कहा था कि –

यदि योगी = साधक मन की एकाग्र अथवा निरुद्ध अवस्था प्राप्त नहीं करता तो वह व्युत्थान दशा में होता है । इसको पतित अवस्था = सांसारिक अवस्था भी कहते है । इस अवस्था में क्लेश, बंधन, दुःख, पीड़ा, परतंत्रता, जन्म मरण आदि बने रहेंगे । इस व्युत्थान दशा को “योग” नहीं कह सकते । क्षिप्त, विक्षिप्त अथवा मूढ़ अवस्था में रहनेवाले मनुष्य को साधन करना ही पड़ेगा । उसे क्रम से संघर्ष करते हुए निरंतर आगे बढ़ना होगा । इतर अवस्था में साधक विषय – वस्तु – घटना का ठीक विवेक नहीं कर पाता । अपने मन की वृत्ति को वह अपने आत्मा में आरोपित कर देता है । जब मनुष्य सांसारिक विषय वासनोआे तथा संबंधों में चिपकता है, तब उसे खाना – पीना – घूमना – सोना – मोज मस्ती करना अच्छा लगता है । परिणामत: वह निश्चित पतन की गर्ता में जायेगा ही, ऐसा कह सकते है ।
दर्शित विषयो को अपना स्वरूप मान लेना बहुत बड़ी अविद्या है । मन के स्क्रीन पर आते हुए दृश्य को अपना स्वरूप मान लेना अविवेक है, बेईमानी है, जूठा दर्शन है ।

हम जीवात्मा तात्विक रूप से स्वतंत्र है, अणु स्वरूप है, चेतन है, अनंता है, अपरिणामी है, निर्लेप है, शुद्ध है, बुद्ध है = जाननेवाले दृष्टा है, कर्ता है, सुख दुःख के भोक्ता है ।

मन एक परमात्मा प्रदत्त दिव्य अत्यंत शक्तिशाली साधन है । वह पंच भूतो से सृजित है । सत्व प्रधान आंतर – बाह्य द्विमुखी साधन है । मन का व्यापार है, वृत्तिओ का निरंतर उठाते रहना । हम आत्मा मन से पृथक चेतन सत्ता है । वृत्ति को उठानेवाले हम है, रोकनेवाले भी हम है । मन में वृत्तियों को संयमित करना हमारे हाथ में है । मन में उठाई गई वृत्ति को अथवा तो संसार में घटित घटना को अपना मान लेना महा मूर्खता है । महा अविवेक है ।

उदाहरण देखे –
घर जल गया, तो मै मर गया, मै लूट गया ऐसा मानना इतर अवस्था है, पतन अवस्था है, व्युत्थान अवस्था है । वृत्ति सारुप्यता रखना खतरनाक है । हमारे पास बहुत सारे उदाहरण है कि – एक परिवार में पति की मौत हुई, तो पत्नी ने मान लिया कि हाय.. हाय… मै मर गई । मै लूट गई, मेरा क्या होगा ? आधे घंटे में उसकी भी “हार्ट अटैक” से मौत हो गई । यह क्या है, वृत्तिसारुप्यता । अन्य में हुई घटना को अपने में आरोपित कर देना मूर्खता है । परमात्मा ने हमे अपना शरीर सुरक्षा के लिए, स्वस्थ रखने के लिए तथा महत्तम सुख – आनंद – ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए दिया है । अपनी नादानी से, मूर्खता से इस मूल्यवान शरीर को ऐसे कैसे फेंक सकते है ?

स्व. ज्ञानेश्वरजी आर्य को स्मरण करते हुए वैदिक विद्वान श्री अवधेश प्रसाद जीने कहा था कि
किसीकी मृत्यु हुई हो, उस काल में वे वानप्रस्थ साधक आश्रम, रोजड़ में हमे बताते थे ऐसी मृत्यु की घटना में किसीको भी बिल्कुल रोना नहीं है, दुःखी भी नहीं होना है । बाह्य घटना को अपने में आरोपित नहीं करना है । शांत, गंभीर, धर्यवान और संतुलित बने रहना है । इस घटना को दृष्टा भाव से देखना है ।

रोते वे है जो उस व्यक्ति या वस्तु के प्रति राग रखते है, मोह रखते है । रोना – पीटना अर्थात् अपनी मन की स्थिति को बिगाड़ना है, विचलित करना है । अपने प्रियतम के प्रति छोटी छोटी बातों में रूठ जाना, आंसू बहाना बिल्कुल गलत बात है । ऐसा तो संसारी भोगवादी व्यक्ति ही करते है । हमे तो प्रेम करना है, वह भी नि:स्वार्थ । हमे हर हालत में स्थिर बुद्धि से अपने कर्तव्य का निर्वहन करना है । रोग द्वेष मोह से ऊपर उठना है । संकट समय में साधक कभी रोते नहीं, गभराते नहि, वे धीर, गंभीर तथा दृष्टा बने रहते है, सम्यक बने रहते है । उस संकट का सामना करते है, स्थिर मन से, शांत मन से, जागृत मन से समस्या का समाधान निकालने का पूरी ईमानदारी से प्रयास करते है ।
योगी एवम् साधक गण एसी दुखद घटना कभी भी, कीसीके भी साथ हो सकती है, ऐसी मानसिक पूर्व तैयारी बनाएं रखते है । कभी भी मेरी मृत्यु हो सकती है.. अपने शरीर को वे अग्नि में भस्म होता हुआ सदा देखते है *भस्मान्तं शरीरम् । इस प्रकार वे स्थितप्रज्ञ, अविचल, एकसमान शांत बने रहते है । वे शरीर, संसार, मन, जीवात्मा तथा परमात्मा को पृथक पृथक देखते है । अतः शोक – मोह से ऊपर उठ जाते है । तत्वज्ञानी – यथार्थ दृष्टा वे बने रहते है ।

चाहे कितना भी बड़ा संकट या अत्यन्त विपरित स्थिति क्यों आ न जाए, हमे अपनी मन की स्थिति विचलित नहीं करनी है । दुनिया की कोई ताक़त हमे दुःखी नहीं कर सकती । हमे वे पीड़ा दे सकती है – कष्ट दे सकती है, किन्तु दुःखी नहीं कर सकती, जब तक हम न चाहे की “मै दुःखी हो जाऊं” ।

प्रवचन के अंतिम चरण में श्री अवधेश प्रसाद जीने जीवन के दो मार्ग है – योग मार्ग और भोग मार्ग इस पर विवेचना करते हुए कहा कि –
जीवन में हर पल हमे निर्णय लेना होता है कि हम किस मार्ग पर चले ? एक मार्ग है जो कल्याण का मार्ग है, जिसे उपनिषद ने “श्रेय मार्ग” भी कहा है वह “प्रभु का मार्ग” है । प्रारंभ में वह तपस्या करवाता है, संघर्ष करवाता है, किन्तु वह हमारे लिए उपकारक साबित होता है, वह मार्ग “पुण्यवाह” है, “अमृत का मार्ग” है । उसी पर हमे चलना है । भोग मार्ग संसार का मार्ग है । वहां पीड़ा, बंधन, दुःख और धोखा ही धोखा मिलेगा । हमे योग मार्ग पर प्रभु के मार्ग पर चलना है । अतः हम सभी परस्पर प्रेम करते हुए, विवेक बुद्धि बनाते हुए कर्तव्य परायण होकर ईश्वर आज्ञानुसार जीवन यापन करे और सबका मंगल हो, कल्याण हो ।

। इति ओम् शम् ।
samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

rajistertion call-9977987777, 9977957777, 9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

माता पिता की सेवा

माता पिता की सेवा

यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा पृथ्वी से भारी क्या है आकाश से भी ऊंचा कौन है युधिष्ठिर जी बोले माता पृथ्वी से भी भारी है और पिता आकाश से भी ऊंचा है
यह है माता-पिता का गौरव और महत्व माता सर्व तीर्थ मई है और पिता संपूर्ण देवताओं का स्वरूप है इतना ही नहीं मैं तो कहा करता हूं माता पिता को ईश्वर के जीवित जागृत प्रतिनिधि समझता हूं हमें जन्म देने वाले हमारा लालन-पालन और पोषण करने वाले माता पिता कि हमें हर प्रकार से सेवा करनी चाहिए।
आप चिंतन करके देखें तो अवश्य प्राचीन काल के समय में उमर लंबी होती थी क्योंकि उस समय लोग अपने माता-पिता को प्रतिदिन प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया करते थे आज का युवक तो माता-पिता को नमस्ते करने में भी लज्जा करते हैं संसार में अपना मान और सम्मान चाहते हैं यदि आपको यश और बल की इच्छा है तो अपने माता-पिता और वृद्धों की सेवा करो क्योंकि मनु महाराज ने कहां है कि जो व्यक्ति माता-पिता और वृद्धों को नमस्ते करते हैं उनकी सेवा करते हैं उनकी आयु विद्या यश और बल चार प्रकार की समृद्धि माता पिता की सेवा करने से होती है इसलिए बंधुओं हम सदा अपने माता पिता की सेवा करें श्रवण कुमार अपने माता पिता के सेवा करने से इतिहास में अमर हो गए
एक बार रामकृष्ण परमहंस के पास एक युवक आया और कहने लगा आप मुझे संन्यास की दीक्षा दे दे तो परमहंस जी ने पूछा आप घर में अकेले हैं तो कहने लगा नहीं मेरे पास एक बूढ़ी मां है तो परमहंस ने कहा बूढ़ी मां को अकेला असहाय छोड़कर आप सन्यास क्यों लेना चाहते हैं युवक ने कहा मोक्ष को प्राप्त करने के लिए परमहंस ने कहा मां को छोड़कर सन्यास लेने से आपको मोक्ष मिलने वाला नहीं है आप जाएं और अपनी मां की सेवा करें उसी से आपको मोक्ष मिलेगा सुख मिलेगा जीवन में उत्साह मिलेगा इसलिए जीवन में हमें सदा अपने माता पिता को समय देना चाहिए|

गोपाल पाण्डेय
samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

rajistertion call-9977987777, 9977957777, 9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

चंद्रशेखर आज़ाद

सन 1931 में चंद्रशेखर आज़ाद नाम का 26 वर्षीय *क्रांतिकारी इलाहाबाद के अल्फ़्रेड पार्क में चारो और से अंग्रेजी पुलिस से घिरा हुआ गोलियों की बौछार झेल रहा था और अपनी बंदूक से अकेला अंग्रेजी पुलिसवालों की लाशें गिरा रहा था।

अपनी बंदूक में खोल कर देखता है तो आखिरी गोली बचती है और आज़ाद जी की आंखों से अश्रु आ जाते हैं कुछ सोचकर ।

फिर अपने हाथ की मुठ्ठी में इस देश की पवित्र माटी को भरकर माथे से लगाकर आजाद जी, अश्रु भावना को शब्दों में पिरोकर क्या अंतिम वाक्य आता है उनके मुख से :

हे माँ, मेरी मातृभूमि, मुझे क्षमा करना जो इस जन्म में तेरी इतनी ही सेवा कर पाया।

और इस अंतिम वाक्य के साथ अंतिम गोली से अपने प्राण दे देते हैं क्योंकि प्रण लिया था आज़ाद जिये हैं, आज़ाद ही मरेंगे।

😭😭😭😭😭

जब इतना बड़ा क्रांतिकारी इस मातृभूमि के लिए प्राण देते हुए भी मातृभूमि से क्षमा मांग रहा है कि मैं तेरी बहुत कम सेवा कर पाया तो बाकी किसी को अहंकार किस बात का है।

यहां तो दिन के चार व्हाटसअप मैसेज इधर उधर करने पर ही अपने इस मातृभूमि के प्रति कर्तव्य को पूर्ण मान लेते हैं ।

सोचो, विचारों और शर्म करके प्रण लो , आजाद जी व उनके जैसे अन्य क्रन्तिकारियो के बलिदान से।

सहस्त्रो जन्म बलिदान करके भी मातृभूमि का ऋण नही उतरता और तुम निर्लज्ज भाव से सेवा का संतोष अनुभव करते हो।

उठो, जागो और जगाओ।
प्राप्त करो स्वराज।
ये भूमि ईश्वर ने आर्यों को दी है और हमें स्वराज लेना ही होगा।
samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

rajistertion call-9977987777, 9977957777, 9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

जीवन में गुरु का बडा महत्व है

जीवन में गुरु का बडा महत्व है परन्तु गुरु यदि आत्मा परमात्मा की सत्ता से इन्कार करे, यज्ञ योग व वेद की निन्दा करे, संयम सदाचार की शिक्षा न दे,कान में मंत्र फूके, किसी मनघडंत मंत्र की दीक्षा देकर उसको गुप्त रखने को कहे, अपने चरण धोकर उसे चरणामृत समझ कर पीने को कहे, जीव व प्रकृति को परमात्मा का अंश बताये, परमात्मा को साकार कहे व उसका अवतार माने, ओम् व गायत्री आदि वेद मंत्रो की महिमा न बताये ..तो समझ लेना वह सच्चा गुरु नही है। मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेद : ( शतपथ) अर्थात जब तीन वेदानुकूल उत्तम गुरु हों तब ही मनुष्य सही अर्थों में मनुष्य बनता है, सही अर्थों में ज्ञानवान, चरित्रवान, संकल्पपवान धार्मिक व ईश्वर भक्त बनता है । आज लाखों गुरुघंटाल लाखों चेले चेलियां मूंड कर अपने अपने मत सम्प्रदाय व आश्रम बना कर बैठे हैं । ये सब मायाजाल महाभारत युद्धोपरान्त गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के पतन का ही परिणाम है जो नित नये मत सम्प्रदाय व भगवान खडे हो रहे हैं । ऐसे भी मत हैं जो पांच मकार अर्थात मद्य मांस मीन मुद्रा मैथुन को अपनाने में मुक्ति मानते हैं, ऐसे भी मत हैं जो पांच ककार अर्थात केश कंघा कृपाण कच्छा और कडा धारण करने मेंं ही मुक्ति मानते हैं, ऐसे भी मत हैं जो देवी देवताओं को बलि देने व गंगा स्नान में मुक्ति मानते हैं, ऐसे भी मत हैं जो यीशू यहोवा, मुहम्मद, राम, कृष्ण, शिव, कबीर, नानक व अपने अपने गुरुओं को ही परमात्मा मान कर पूजने में मुक्ति मानते हैं, ऐसे भी मत हैं जो चुपचाप बैठे रहने को ही ध्यान समाधि व मुक्ति का मार्ग बताते हैं !! करोडों ऋषि मुनियों व वेद का तो एक ही उपदेश है- ईश्वर एक है, धर्म एक है, धर्म ग्रन्थ एक है, यज्ञ व योग ही सर्वोत्तम पूजा पद्धति है । जब तक विश्व में भिन्न भिन्न मत मतान्तरों का विरुद्धावाद समाप्त नहीं होगा मनुष्य का कल्याण नहीं होगा और न ही विश्व में एकता व शान्ति हो सकती है ।
– डा मुमुक्षु आर्य
samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

rajistertion call-9977987777, 9977957777, 9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

सन्तान के जीवन में माता-पिता का विशिष्ट एवं गौरवपूर्ण स्थान”

ओ३म्
“सन्तान के जीवन में माता-पिता का विशिष्ट एवं गौरवपूर्ण स्थान”
=============
मनुष्य के जीवन में पिता का महत्व निर्विवाद है। माता व पिता ही सब मनुष्यों के जन्मदाता होते हैं। पूर्वजन्म में मृतक आत्मा को मनुष्य योनि में जन्म युवा माता-पिताओं के द्वारा ही मिलता है। यह नियम परमात्मा ने बनाया है। यदि यह नियम न हो तो सृष्टिक्रम चल नहीं सकता। मनुष्य एक शिशु के रूप में जन्म लेता है, माता-पिता मिलकर उसका पालन-पोषण करते हैं व उसे उत्तम संस्कार देते हैं। उसका विवाह आदि भी सम्पन्न कराते हैं। वृद्धावस्था को प्राप्त होकर माता-पिता की मृत्यु हो जाती है। सभी माता-पिता अपनी-अपनी सन्तान के प्रति एक विशेष मोह पितृत्व व मातृत्व के बन्धन से बंधे हुए होते हैं। उनकी सन्तान कुरुप हो या स्वरूप, स्वस्थ हो या रोगी, आज्ञाकारी हो अथवा अवज्ञाकारी, कैसी भी क्यों न हो, माता-पिता का आशीर्वाद एवं शुभकामनायें अपनी सभी सन्तान पर सदैव समान रूप से होती हैं। यहां तक की माता-पिता जीवन भर अपनी जो पूंजी संचित करते हैं, उसका भी वह अकेले उपभोग नहीं करते अपितु अधिकांश उपभोग उनकी सन्तानें ही करती हैं। महाराज दशरथ का ऐतिहासिक प्रसंग सबने सुन रखा है। उनके पुत्र को 14 वर्ष के लिए वन जाना पड़ा था। इस क्लेश से व्यथित होकर उन्होंने कुछ ही दिनों में अपने प्राण त्याग दिये थे। आज ऐसे कुछ उदाहरण मिल जाते हैं जहां एक माता अपनी सन्तान की रक्षा के लिये अपने प्राण दे देती है। पिता एक ऐसा व्यक्ति होता है जो अपने पुत्र की शिक्षा में उन्नति, उसके द्वारा धन प्राप्ति तथा यश प्राप्ति आदि के कार्यों में सर्वाधिक प्रसन्न होता है। पिता के इन्हीं गुणों के कारण पिता को देवता कहा जाता है। देवता वह होता है जो देता है, लेता नहीं है। वायु हमें प्राण वायु देती है इसलिये देवता कहलाती है। जल हमारी पिपासा शान्त करने सहित अनेक प्रकार से उपयोगी होता है, इसलिये जल भी देवता होता है। इसी प्रकार पृथिवी, अग्नि, आकाश, माता, पिता, आचार्य, राजा, विद्वान अतिथि आदि भी हमें कुछ न कुछ देने से देवता कहे जाते हैं। हमें इन सबके प्रति कृतज्ञता व सम्मान का सद्भाव रखना चाहिये। ऐसा करने से हमारे जीवन में निरभिमानता का गुण उत्पन्न होता है। पाश्चात्य व कुछ अन्य जीवन पद्धतियों में यह भावना कुछ कम देखी जाती है। पाश्चात्य संस्कृति को भोगवादी और भारतीय वैदिक संस्कृति को त्याग व श्रेय प्रदान करने वाली संस्कृति कहा जाता है और वस्तुतः कई दृष्टि से यह उचित प्रतीत होता है।

पिता को पिता अपनी सन्तानों की रक्षा करने के कारण कहा जाता है। महर्षि यास्क के अनुसार सन्तानों का पालक, पोषक तथा रक्षक होने से जन्म देने वाले देवता को पिता कहा जाता है। महर्षि मनु ने कहा है कि दस उपाध्यायों से बढ़कर आचार्य, सौ आचार्यों से बढ़कर पिता और एक हजार पिताओं से बढ़कर माता गौरव में अधिक है अर्थात् बड़ी है। मनुस्मृति में कहा गया है ‘‘पिता मूर्तिः प्रजापते” अर्थात् पिता पालन करने से प्रजापति का मूर्तिरूप है। प्रजापति परमात्मा को कहते हैं। इस प्रकार महाराज मनु पिता को प्रजापति कह कर बहुत ऊंचा स्थान देते हैं। महाभारत के वनपर्व में यक्ष व युधिष्ठिर संवाद में यक्ष युधिष्ठिर से पूछते हैं ‘पृथिवी से भारी क्या है? आकाश से ऊंचा क्या है? वायु से भी तीव्र चलने वाला क्या है? और तृणों से भी असंख्य अर्थात असीम व विस्तृत एवं अनन्त क्या है? इसका उत्तर देते हुए युधिष्ठिर कहते हैं ‘माता गुरुतरा भूमेः पिता चोच्चतरं च खात्। मनः शीघ्रतरं वातच्चिन्ता बहुतरी तृणात्।।’ इसका अर्थ है कि माता पृथिवी से भारी है। पिता आकाश से भी ऊंचा है। मन वायु से भी अधिक तीव्रगामी है। चिन्ता तिनकों से भी अधिक विस्तृत एवं अनन्त है। यहां पिता को आकाश से भी ऊंचा बता कर पिता का गौरव गान किया गया है।

पिता के विषय में महाभारतकार कहते हैं कि पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है और पिता ही सबसे श्रेष्ठ तपस्या हैं। पिता के प्रसन्न हो जाने पर सारे देवता प्रसन्न हो जाते हैं। पद्मपुराण में माता व पिता दोनों के गौरव का उल्लेख कर कहा गया है कि माता सर्वतीर्थमयी (सारे तीर्थ माता में हैं) है और पिता सम्पूर्ण देवताओं का स्वरूप है (पिता में सारे देवता विद्यमान हैं)। अतएव प्रयत्नपूर्वक सब प्रकार से माता-पिता का आदर-सत्कार करना चाहिए। जो माता-पिता की प्रदशिणा करता है, उसके द्वारा सात द्वीपों से युक्त सम्पूर्ण पृथिवी की परिक्रमा हो जाती है। माता-पिता को प्रणाम करते समय जिसके हाथ, घुटने और मस्तक पृथिवी पर टिकते हैं, वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त होता है।

अथर्ववेद में बताया गया है कि जो जन्म देता है, जो भय से बचाता है और जो जीविका देता है- ये तीनों पितर वा पिता कहलाते हैं। चाणक्य नीति में भी पिता की महिमा का गान सुनने को मिलता है। वहां कहा गया है कि जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत आदि संस्कार करानेवाला, विद्या देनेवाला, अन्न देनेवाला तथा भय से बचाने वाला ये पांच पिता व पिता समान माने जाते हैं। पंचातयन पूजा में पिता को सत्कर्तव्य देव कहा गया है और उसकी माता के समान ही सेवा करने का उपदेश किया गया है। शतपथ ब्राह्मण का वचन है कि जब तीन उत्तम शिक्षक एक माता, दूसरा पिता तथा तीसरा आचार्य होते हैं तभी मनुष्य ज्ञानवान् होता है। ऋषि दयानन्द ने कहा है कि वह सन्तान बड़ा भाग्यवान् होता है जिसके माता और पिता धार्मिक विद्वान् हों।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन का एक उदाहरण पिता की भक्ति का ऐसा उदाहरण है जो विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता। इसे सुनकर ही मनुष्य का रोम-रोम पुलकित हो जाता है। जब राम चन्द्र जी का राज्याभिषेक का निर्णय हुआ तो रानी कैकेयी ने महाराज दशरथ के इस निर्णय का विरोध किया। वह महाराज दशरथ से रूठ गई और उनसे पूर्वकाल के देवासुर-संग्राम में राजा दशरथ द्वारा उन्हें दिये दो वर मांग लिये। उसने पहला वर्ष भरत को अयोध्या का राजा बनाने तथा दूसरा राम को चैदह वर्ष का वनवास देने का मांगा। इस पृष्ठभूमि में राम जब कैकेयी के कक्ष में महाराज दशरथ के दर्शन करने पहुंचे तो उनकी दयनीय दशा देख कर उनसे इसका कारण पूछा। जब राजा दशरथ कुछ बोल नहीं पा रहे थे तो राम ने माता कैकेयी को पिता की इच्छा बताने को कहते हुए कहा था कि मुझे लानत है कि आप मुझ पर सन्देह कर रही हैं कि मैं अपने पिता की इच्छा व वचनों को पूरा नहीं करूंगा। राम ने कहा था ‘मैं तो अपने पिता श्री दशरथ की आज्ञा से अग्नि में भी कूद सकता हूं। तीक्ष्ण हलाहल जहर खा सकता हूं और समुद्र में भी कूद सकता हूं। वे तो मेरे गुरु, पिता, राजा और शुभ हितैषी हैं।’ पिता को उन्होंने कहा था कि आपकी जो आज्ञा हो मुझे शीघ्र बतायें। मैं राम प्रतीज्ञा करता हूं कि उसे अवश्यमेव पूरा करूंगा। राम एक बात कहकर फिर उसके विपरीत दूसरी बात नहीं कहता अर्थात् वह अपने वचनों पर अटल रहता है। राम का यह कहना कि मैं पिता के संकेत मात्र करने पर जलती चिता वा अग्नि में कूद सकता हूं, हलाहल विष पी सकता हूं और समुद्र में भी कूद सकता हूं, यह सुन कर रोम रोम पुलकित हो जाता है। ऐसा वाक्य कहने से राम ने एक ऐसा आदर्श स्थापित किया है जिसकी आजकल विश्व में किसी पुत्र से अपेक्षा नहीं की जा सकती।

वैदिक धर्म एवं संस्कृति में पिता का गौरव पूर्ण स्थान है। माता का पिता से भी अधिक गौरव है। अतः देश व विश्व के सभी लोगों को अपने माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों को समझना चाहिये। इसके अनुरूप ही देश में कानून बनने चाहिये। जिस समाज में पुत्र व पुत्रियां माता-पिता को पृथिवी से भारी और आकाश से भी ऊंचा मानते हैं, वह संस्कृति, वह देश व वह धर्म महान व महानतम होता है और वह सन्तान वस्तुतः महान एवं पूजनीय होती है। हमें वैदिक धर्म एवं संस्कृति सहित वैदिक इतिहास ग्रन्थों रामायण एवं महाभारत का भी अध्ययन करना चाहिये। इससे हम एक अच्छे पुत्र व मानव बन सकेंगे। हम आशा करते हैं कि पाठक लेख को पसन्द करेंगे। इस लेख को तैयार करने में हमने आचार्य ब्र. नन्दकिशोर जी की पुस्तक ‘पितृ-गौरव’ से सहायता ली है। उनका हृदय से धन्यवाद करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

rajistertion call-9977987777, 9977957777, 9977967777or rajisterd free aryavivha.com/aryavivha app

लेखक अपरिचित है, लेख बहुत अच्छा है

लेखक अपरिचित है, लेख बहुत अच्छा है

कभी कभी सोचता हूँ कि यदि मैं आर्य समाज के सम्पर्क में नहीं आया होता l तब मैं भी एक पौराणिक हिन्दू ही होता l तब जीवन कितना आरामदायक होता l सब धर्म मुझे अच्छे लगते l मैं भी मोहम्मद साहब को शांति का देवता समझता, हर क़ब्र पर , हर मज़ार पर माथा टेकता , उन पर चादर चढ़ाता l गुरुवार को साईं बाबा के मंदिर में प्रसाद चढ़ाता।

सोमवार को भोले बाबा के मंदिर में जाकर शिवलिंग का दूध से अभिषेक करता , मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर उन्हें सिंदूर का चोला चढ़ाता l आठों उँगलियों में तरह तरह की अँगूठियाँ पहनता, शनिवार को शनि महाराज को तेल चढ़ाता , मूर्तियों को ही नहीं, हर बाबा को , गेरुए वस्त्रधारी को गुरु घण्टाल को भी भगवान मान कर पूजता l सब संप्रदायों की तारीफ़ करता , सब संप्रदाय अच्छे हैं, किसी की भी बुराई नहीं करनी चाहिये इस बात को दिन में दस बार दोहराता l तब सब लोग मेरी तारीफ़ करते l मुझे एक नेक और समझदार इंसान बताते हुए मेरे गुण गाते l

ईद से पहले मैं पूरे उत्साह से रोज़ा ए इफ़्तार का आयोजन करता, श्राद्ध के दिनो में ब्राह्मण और क़व्वों को दावत खिलाता, होली और शिवरात्रि पर भांग पीता तथा दिवाली पर जुआ खेलताl ज़िंदगी कितनी शुकून भरी होतीl शराबबंदी होने पर शिवरात्रि में कावड़ की मटकियों में शराब भरकर लाता और अपनी यात्रा की थकान उतारता। नवरात्रि में माता की भेंटे गाता, साईं संध्या का आयोजन करवाता l जहाँ भी भागवत की कथा या रास लीला होती वहीं भाग कर जाता और भजनों पर झूम झूम कर नाचता l

अजमेर में ख्वाजा की दरगाह पर चादर चढ़ाता और वैष्णो देवी पर छत्रl हर तरह के टोने टोटक़े , भूत पिशाच , ऊपरी हवा में विश्वास करता और मेहंदीपुर बालाजी और खाटु श्यामू जी के मंदिर में हाजरी लगाता l जगन्नाथ जी की रथ यात्रा में उनका रथ खींचता और इस्कोन के मंदिर में हरे रामा हरे कृष्णा की धुनों पर कूद- कूद कर नाचता, कितना मजा रहता l

इन बातों से जीवन कितना खुशी से भरा होता पर अफ़सोस! ऋषि दयानंद ने मुझसे यह सब कुछ छीन लिया l आज तो मैं अपने ही हिन्दू भाइयों की नज़र में एक झगड़ालू इंसान बन कर रह गया हूँ l

हे प्रभु मैंने आर्यसमाजी बनकर तेरे वेदों की रक्षा की है, तेरे वेदों के आधार पर बनाए ऋषियों के शास्त्रों की रक्षा की है। मैंने तेरे सच्चे सनातन धर्म की रक्षा की लो जगाए रखी है। प्रभु जी! तुमने वेद में बताया की हे मनुष्य! तेरा राष्ट्र ही तेरा इष्टदेव है। इसलिए मैंने भारत की आजादी में बड़े-बड़े बलिदान दिये, कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। मैं राष्ट्र का सजग प्रहरी बना रहा हूं। मैंने तुम्हारे बताए अनुसार धर्म और राष्ट्र की रक्षा की है। मैंने श्री राम और श्री कृष्ण के सच्चे शानदार जीवन का, उनके शौर्य और पराक्रम का गौरवमयी रूप में प्रचार किया है।

राष्ट्र पर जब जब भी बाढ़, भूकंप से इंसान पीड़ित हुआ, तो मैं सहायता सामग्री लेकर उनके पास दौड़ा-दौड़ा गया। अधिक से अधिक दुःखी लोगों के आंसुओं को पोंछा।
हे प्रभु! ऋषि दयानंद के माध्यम से बताए हुए तेरे ज्ञान को मैंने अपने जीवन में अति उत्तम पाया है, मैं देख पाया कि धर्म के नाम पर हिंदू कितना लापरवाह आडंबर युक्त और केवल भाग्य के भरोसे रह रह कर कितनी नीची दशा को जा रहा है। मैंने सनातन वैदिक धर्मी होकर जीवन जिया है इसलिए प्रभु तुम्हारे विधान अनुसार मेरा अगला जन्म मनुष्य रूप में तो अवश्य ही होना है, परंतु आपसे इतनी हार्दिक प्रार्थना जरूर है कि हे प्रभु! मुझे अगले जन्म में अपने सनातन वेद धर्मी आर्य समाजी परिवार में ही जन्म देना ताकि तब मैं बचपन से ही तेरे सच्चे धर्म और अपने राष्ट्र की सेवा कर सकूं।