स्वाध्याय एवं ईश्वरोपासना जीवन में आवश्यक एवं लाभकारी हैं”

ओ३म्
“स्वाध्याय एवं ईश्वरोपासना जीवन में आवश्यक एवं लाभकारी हैं”
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मनुष्य आत्मा एवं शरीर से संयुक्त होकर बना हुआ एक प्राणी हैं। आत्मा अति सूक्ष्म तत्व व सत्ता है। इसे शरीर से संयुक्त करना सर्वातिसूक्ष्म, सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अनादि, नित्य व अविनाशी ईश्वर का काम है। आत्मा स्वयं माता के गर्भ में जाकर जन्म नहीं ले सकती। आत्मा को माता के शरीर में भेजना, वहां उसका पोषण करना, उसके शरीर व भिन्न अवयवों की रचना करना परमात्मा का काम है। परमात्मा न हो तो जीवात्मा का अस्तित्व होने पर उसका मनुष्य आदि किसी भी प्राणी योनि में जन्म नहीं हो सकता। अनादि काल से सृष्टि की रचना व प्रलय सहित जीवात्माओं के जन्म-मृत्यु-मोक्ष का क्रम चल रहा है। अनन्त काल तक यह चलता रहेगा। यह सिद्धान्त वेद तथा तर्क एवं युक्त्यिों से सिद्ध है। जो मनुष्य इस रहस्य को जान लेता है उसे कुछ समय के लिये तो वैराग्य ही हो जाता है। मनुष्य संसार में अपने सुख सुविधाओं के लिये जो उचित व अनुचित तरीकों से पाप-पुण्य करता है, उसे पापों से घृणा हो जाती है। उसे जब पता चलता है कि हमारा जन्म व सुख-दुःखों का कारण हमारे पूर्वजन्मों के पाप-पुण्य कर्म हैं, तो वह पापों के प्रति निरासक्त हो जाता है। उसकी प्रवृत्तियां ईश्वर की ओर मुड़ जाती हैं। उसे यह स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वर का सत्य ज्ञान, उसकी ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना एवं सद्कर्म ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य व लक्ष्य हैं। तपस्वी जीवन सुख-सुविधाओं से युक्त जीवन से कहीं अधिक श्रेष्ठ, आदर्श एवं आचरणीय है। इस स्थिति में पहुंच कर मनुष्य को सत्पुरुषों की संगति, उनसे उपदेश ग्रहण करना, सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना, दुर्बलों, अनाथों, पीड़ितों व असहायों की रक्षा व सेवा करना उसे अपने कर्तव्य प्रतीत होते हैं। इस प्रकार की अनुभूतियों से युक्त मनुष्य ही सच्चा मनुष्य व देव कोटि का साधु होता है। ऐसे मनुष्य को सज्जनों से आदर व सम्मान प्राप्त होता है तथा ऐसे मनुष्य को भी दुष्ट व विधर्मी पसन्द नहीं करते। उन्हें तो अपने मतों को येन केन प्रकारेण बढ़ाना ही अभीष्ट होता है। ऐसे मतान्ध लोग मनुष्य जीवन में सत्यासत्य, गुण-अवगुणों व सद्व्यवहार आदि के महत्व को जान ही नहीं सकते।

स्वाध्याय वेद के अध्ययन व उसकी शिक्षाओं को आत्मसात करने को कहते हैं। ऋषि दयानन्द व उनके प्रमुख अनुयायियों का जीवन वेद व सद्ग्रंथों के स्वाध्यय के अनुरूप जीवन रहा है। इसके लिये ऋषि दयानन्द योग की शरण को प्राप्त हुए थे और योग के अष्टांगों का उन्होंने सफलतापूर्वक अभ्यास किया था। योग में ध्यान व समाधि सातवें व आठवें अंग हैं। इनको सिद्ध कर लेने पर मनुष्य असाधारण मनुष्य बन जाता है। वह ईश्वर के यथार्थस्वरूप को न केवल जान लेता है अपितु उसे ईश्वर का साक्षात्कार भी हो जाता है। ईश्वर साक्षात्कार में मनुष्य का आत्मा ईश्वर के आनन्द का अनुभव व भोग करता है। ऐसा आनन्द संसार के किसी पदार्थ के भोग में नहीं है। जिस मनुष्य ने भी जीवन में समाधि अवस्था को प्राप्त किया है उसका जीवन लक्ष्य सिद्धि होने से सफल कहाता है। समाधि अवस्था को प्राप्त मनुष्य को विवेक प्राप्त होता है। इससे वह सभी दुष्कर्मों व अहितकारी कर्मों का त्याग कर जीवनमुक्त अवस्था में स्थित होकर परोपकार व ईश्वरोपासना रूप समाधि में ही अपना समय व्यतीत करता है। मनुष्यों को सदाचार व वेदमार्गाचरण का उपदेश करना भी उसके भावी जीवन में सम्मिलित रहता है। ऐसे मनुष्य की मृत्यु होने पर उसे पुनर्जन्म से अवकाश मिल जाता है। वह मोक्ष की अवस्था को प्राप्त होकर ईश्वर के सान्निध्य में रहता है और मुक्त जीवों से मिलकर निद्र्वन्द रहकर आनन्दपूर्वक 31 नील 10 खरब वर्षों से भी अधिक अवधि तक मोक्ष का आनन्द भोगता है।

वैदिक धर्म व संस्कृति की इन्हीं विशेषताओं के कारण प्राचीन वैदिक काल में हमारे देश में अधिकांश लोग वैराग्य वृत्ति को प्राप्त होकर ईश्वर की खोज व उपासना को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाया करते थे जिससे संसार में सर्वत्र सुख विद्यमान था। प्राचीन काल में संसार में एक वैदिक मत ही प्रचलित था, आजकल की तरह मत-मतान्तरों की भरमार नहीं थी। उन दिनों न हिंसा थी, न मांसाहार और न आतंकवाद जैसी दुष्प्रवृत्तियां। सर्वत्र सब मनुष्य स्वाधीन व सुखी थे। सबका धर्म व संस्कृति एक थी। देश गाय व लाभकारी पशुओं से भरा हुआ था। सभी को प्रचुर दुग्ध व दुग्ध पदार्थ प्राप्त होते थे। अन्न भी सबको सुलभ होता था। उन्हें वर्तमान समय की तरह सुख के विविध भौतिक साधनों की आवश्यकता नहीं थी। इसी कारण उस समय किसी प्रकार का वायु व जल प्रदुषण भी नहीं था। सभी लोग सुख व आनन्द का अनुभव करते हुए निर्भयता से जीवन व्यतीत करते थे। यहां यह भी बता दें कि आज के सभी मतों हिन्दू, ईसाई, मुस्लिम, बौद्ध, जैन, सिख आदि के पूर्वज वैदिक धर्मी आर्य ही थे। सब ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्” को मानते थे और इसके अनुरूप ही व्यवहार करते थे। अविद्या का कहीं नामोनिशां नहीं था। सबकी पूजा पद्धति एक थी। सभी सन्ध्या एवं अग्निहोत्र करते थे। एक दूसरे के सुख व दुःख में सहायक एवं एक दूसरे की उन्नति के पूरक व सहयोगी होते थे।

संसार में ईश्वर एवं सामाजिक कर्तव्यों विषयक साहित्य के अन्तर्गत मूल ग्रन्थ वेदों से इतर आर्याभिविनय, सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, उपनिषद, दर्शन एवं मनुस्मृति सहित बाल्मीकि रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थ हैं। इन्हें इसी क्रम से पढ़ने से मनुष्य की धर्म, ईश्वर, आत्मा, स्वकर्तव्य, जीवनशैली, उपासना, अग्निहोत्र आदि विषयक सभी भ्रान्तियां दूर हो जाती हैं। मनुष्य ईश्वर व आत्मा संबंधी सत्य ज्ञान को प्राप्त होता है। आत्मा व मन में कोई भ्रान्ति नहीं रहती। ईश्वर का सत्यस्वरूप स्पष्ट हो जाता है। स्वाध्याय की ऐसे प्रवृत्ति बनती है कि बिना स्वाध्याय जीवन अधूरा प्रतीत होता है। स्वाध्याय विषयक आर्यसमाज में अनेक विद्वानों ने प्रभूत साहित्य लिखा है। डा. रामनाथ वेदालंकार, स्वामी विद्यानन्द सरस्वती, पं. युधिष्ठिर मीमांसक, पं. गंगा प्रसाद उपाध्याय, पं. शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ, पं. विश्वनाथ विद्यालंकार, स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती, स्वामी श्रद्धानन्द ग्रन्थावली, महात्मा हंसराज ग्रन्थावली आदि ग्रन्थों का स्वाध्याय कर जीवन को अत्यन्त सुखी व सन्तोष से युक्त बनाया जा सकता है। जिस मनुष्य ने इस साहित्य एवं अन्य उपयोगी साहित्य को पढ़ लिया वह मनुष्य समाज के लिये एक अत्यन्त हितकर व कल्याणकारी मनुष्य बन जाता है। वह श्रद्धावान आस्तिक तो होता ही है। उसके सम्पर्क में आने वाले सभी मनुष्य भी उससे प्रभावित व लाभान्वित होते हैं। हमारा सौभाग्य है कि हमें उपयुक्त सभी ग्रन्थों सहित अनेक वैदिक विद्वानों के अनेक ग्रन्थों का अध्ययन करने का सौभाग्य मिला है। ऋषि दयानन्द के अनेक वृहद व लघु जीवन चरित प्रकाशित हुए हैं जो सभी प्राप्तव्य हैं। हमने इन सभी को पढ़ा है। स्वामी श्रद्धानन्द, महात्मा हंसराज, पं. युधिष्ठर मीमांसक, आचार्य भद्रसेन, स्वामी ब्रह्ममुनि, पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, लाला लाजपत राय, पं. रामप्रसाद बिस्मिल आदि देशभक्त विद्वान व वैदिक धर्मियों की आत्मकथायंर वा जीवन चरित्र भी स्वाध्याय के अंग बनाने चाहियें। इससे मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि व आत्मिक सन्तोष की प्राप्ति होती है। अतः उपर्युक्त सभी ग्रन्थों का स्वाध्याय कर इस संसार को यथार्थरूप में जानना चाहिये तथा देवत्व के गुणों को ग्रहण कर सन्मार्ग का पथिक बनना चाहिये।

ईश्वर की उपासना हमारा प्रथम व मुख्य कर्तव्य है। इसका कारण है कि हम पर ईश्वर के अनन्त उपकार हैं और वह निरन्तर हम पर उपकार करता ही चला जा रहा है। वह कभी हमसे अपने उपकारों के बदले में कोई अपेक्षा नहीं रखता। वह परमज्ञानी व सर्वशक्तिमान है। उपासना करने से मनुष्य के दुर्गुणों व दुःखों का नाश होता है। सुखों व कल्याण की प्राप्ति होती है। दुःखों को सहन करने की शक्ति व ईश्वर से सद्प्रेरणायें प्राप्त होती हैं। आत्मशक्ति व आत्मबल की प्राप्ति होती है। परोपकार करने व स्वार्थ से ऊपर उठने का संकल्प उत्पन्न होता है। मनुष्य के भीतर लोकैषणा, वित्तैषणा तथा पुत्रैषणा भी दूर हो जाती है। ईश्वर की उपासना ही मनुष्य का सबसे श्रेष्ठ कर्म व अनिवार्य कर्तव्य है। हमारे सभी महान पुरुष व ऋषि मुनि ईश्वर के उपासक व भक्त थे। उन्होंने ईश्वर की उपासना के बल पर ही संसार में महान कार्यों को किया। ऋषि दयानन्द को यह श्रेय प्राप्त है कि जब भारत सभी ओर से अज्ञान, अन्धविश्वासों, सामाजिक कुरीतियों तथा परतन्त्रता तथा विधर्मियों के आघातों से त्रस्त था, तब उन्होंने ने आकर हमें इन सब दुःखों से मुक्त कराने के उपाय बताये और हमें ईश्वर की उपासना तथा स्वाध्याय का महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि अविद्या का नाश तथा विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। इसी कार्य को विस्तृत करने के लिये उन्होंने सत्यार्थप्रकाश आदि अनेक ग्रन्थों सहित वेदभाष्य का प्रणयन किया। इसके साथ ही उन्होंने संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन कराने के लिये अनेक पाठशालायें खोली थीं। उनके प्रमुख शिष्य स्वामी श्रद्धानन्द जी ने गुरुकुल कागंड़ी सहित आठ गुरुकुल स्थापित व संचालित किये जिसमें कन्या गुरुकुल तथा स्कूल भी सम्मिलित हैं। डी.ए.वी. स्कूल व कालेज भी ऋषि दयानन्द के शिष्यों ने ही आरम्भ किये जो अब भी संचालित हो रहे हैं। भारत को आधुनिक बनाने सहित देश को आजादी दिलाने में आर्यसमाज का सबसे प्रमुख भूमिका है। यह सब सत्य ग्रन्थों के स्वाध्याय तथा ईश्वर की यथार्थ भक्ति व उपासना का ही परिणाम था। स्वाध्याय से मनुष्य अपनी आत्मा सहित ईश्वर एवं सृष्टि को यथार्थरूप में जानता है। उसे अपने कर्तव्यों एवं ईश्वरोपासना की विधि का ज्ञान होता है। उसे परोपकार करने की प्रेरणा व स्वदेश भक्ति का विचार मिलता है। वह स्वदेश व मातृभूमि को अपनी माता मानता है। उस पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिये तत्पर रहता है। वह राम के आदर्श वाक्य कि माता व मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है, इसको आत्मसात करता व कराता है। आजकल की मैकाले व विदेशी शासकों द्वारा जारी की गई शिक्षा हमें अपने धर्म व देशभक्ति के विचारों से दूर ले जा रही है तथा नई पीढ़ी को देश व धर्म का विरोधी बना रही है। आजकल की शिक्षा व कुछ शिक्षाविदों के षडयन्त्रों के कारण हमारे विद्यार्थी दूसरे देशों का गुणगान व अपने देश की निन्दा करते हुए भी देखे जाते हैं। यह सब दोष वैदिक साहित्य के स्वाध्याय तथा ईश्वरोपासना से दूर हो जाते हैं। अतः हम सबको वेद व ईश्वर की शरण में आकर स्वाध्याय व ईश्वरोपासना से स्वजीवन का कल्याण करना चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
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स्वाहा” शब्द का अर्थ •

• “स्वाहा” शब्द का अर्थ •

• Meaning of the word “Swaahaa” •
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– स्वामी दयानन्द सरस्वती

• [संस्कृत में अर्थ] :

(स्वाहा) – अत्र स्वाहा-शब्दार्थे प्रमाणं निरुक्तकारा आहुः –

स्वाहाकृतयः, स्वाहेत्येतत्सु आहेति वा स्वा वागाहेति वा स्वं प्राहेति वा स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा। तासामेषा भवति॥

– निरु॰ अ॰ 8। खं॰ 20॥

स्वाहाशब्दस्यायमर्थः

(सु आहेति वा) सु सुष्ठु कोमलं मधुरं कल्याणकरं प्रियं वचनं सर्वैर्मनुष्यैः सदा वक्तव्यम्।

(स्वा वागाहेति वा) या ज्ञानमध्ये स्वकीया वाग्वर्त्तते, सा यदाह तदेव वागिन्द्रियेण सर्वदा वाच्यम्।

(स्वं प्राहेति वा) स्वं स्वकीयपदार्थं प्रत्येव स्वत्वं वाच्यं, न परपदार्थं प्रति चेति

(स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा) सुष्ठु रीत्या संस्कृत्य संस्कृत्य हविः सदा होतव्यमिति स्वाहाशब्दपर्य्यायार्थाः।

• [आर्यभाषा = हिंदी में अर्थ] :

(स्वाहा॰) इस शब्द का अर्थ निरुक्तकार यास्कमुनि जी ने अनेक प्रकार से कहा है। सो लिखते हैं कि –

(सु आहेति वा) सब मनुष्यों को अच्छा, मीठा, कल्याण करने वाला और प्रिय वचन सदा बोलना चाहिए।

(स्वा वागाहेति वा) अर्थात् मनुष्यों को यह निश्चय करके जानना चाहिए, कि जैसी बात उनके ज्ञान के बीच में वर्त्तमान हो, जीभ से भी सदा वैसा ही बोलें, उस से विपरीत नहीं।

(स्वं प्राहेति वा) सब मनुष्य अपने ही पदार्थ को अपना कहें, दूसरे के पदार्थ को कभी नहीं अर्थात् जितना जितना धर्मयुक्त पुरुषार्थ से उन को पदार्थ प्राप्त हो, उतने ही में सदा सन्तोष करें।

(स्वाहुतं ह॰) अर्थात् सर्व दिन अच्छी प्रकार सुगन्धादि द्रव्यों का संस्कार करके सब जगत् के उपकार करने वाले होम को किया करें और ‘स्वाहा’ शब्द का यह भी अर्थ है कि सब दिन मिथ्यावाद को छोड़ के सत्य ही बोलना चाहिए।

[स्रोत : ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथेश्वरस्तुतिप्रार्थनायाचना-समर्पणोपासनाविद्याविषयः प्रकरण]

महर्षि जी ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में भी लिखा है –

“स्वाहा’ शब्द का अर्थ यह है कि जैसा ज्ञान आत्मा में हो वैसा ही जीभ से बोले, विपरीत नहीं।”

[प्रस्तुतकर्ता: भावेश मेरजा]
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आत्मा साकार है, या निराकार?

आत्मा साकार है, या निराकार?

लेखक – स्वामी विवेकानंद परिव्राजक, निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात।

काफी लंबे समय से कुछ लोगों द्वारा, इस बात का प्रचार किया जा रहा है कि आत्मा साकार है।
हम उन्हें अनेक वर्षों से समझा रहे हैं, कि आपका विचार ऋषियों के अनुकूल नहीं है। फिर भी वे इतने हठी लोग हैं, कि अपना हठ छोड़ने को तैयार नहीं हैं, और सत्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

मुझे अनेक विद्वानों तथा श्रद्धालु व्यक्तियों ने प्रेरित किया, कि आप इस विषय में ऋषियों का विचार प्रस्तुत करें। उनके सुझाव का सम्मान करते हुए, सर्वहित के लिए मैं कुछ निवेदन कर रहा हूं।

ऐसे लोगों का यह कहना है कि–
आत्मा साकार है। एकदेशी होने से । जो जो वस्तु एकदेशी होती है, वह वह साकार होती है। जैसे स्कूटर कार इत्यादि । आत्मा भी एकदेशी है। इसलिए आत्मा भी साकार है।

इन लोगों ने जो अपनी बात रखी है, इसमें इनका हेतु गलत है। हेतु का अर्थ है, अपनी बात को सिद्ध करने के लिए सही कारण बताना। इन्होंने जो कारण बताया, वह गलत है। न्यायदर्शन की भाषा में, गलत कारण को हेत्वाभास कहते हैं। इन्होंने जो कारण बताया है, यह सव्यभिचार नामक हेत्वाभास है। अर्थात् जो हेतु दोनों पक्षों में चला जाए, वह सव्यभिचार हेत्वाभास कहलाता है। (इसी को अनैकांतिक हेत्वाभास के नाम से भी कहते हैं।)
इनका हेतु यह था कि एकदेशी होने से, आत्मा साकार है। यह हेतु गलत इसलिये है, क्योंकि यह हेतु दोनों पक्षों में जाता है। अर्थात् एकदेशी वस्तुएं भी साकार हैं, और व्यापक वस्तुएं भी साकार हैं। ऐसी वस्तुएं भी हैं, जो पूरे ब्रह्मांड में व्यापक हैं, फिर भी वे साकार हैं। जैसे प्रकृति। सत्यार्थ प्रकाश के नौवें समुल्लास में महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने प्रकृति को विभु अर्थात व्यापक लिखा है।
महर्षि दयानंद जी के वचन ये हैं —
“तीसरा कारण (शरीर) जिस में सुषुप्ति अर्थात् गाढ़ निद्रा होती है, वह प्रकृति रूप होने से सर्वत्र विभु और सब जीवों के लिए एक है।”
तो एकदेशी होने से साकार नहीं हुआ, व्यापक होने पर भी वस्तुएँ साकार हैं। इसलिए इनका हेतु गलत है। हेतु गलत होने से इनका पक्ष सिद्ध नहीं होता, कि आत्मा साकार है।

दूसरी बात – इनको अपने पक्ष की सिद्धि में कोई शब्द प्रमाण देना चाहिए था। इन्होंने आत्मा को साकार सिद्ध करने के लिए एक भी शब्द प्रमाण नहीं दिया। न कोई वेदवचन दिया, न कोई ऋषिवचन दिया, जिससे सीधा या अर्थापत्ति से सिद्ध होता हो, कि आत्मा साकार है। इसलिए इनकी बात सिद्ध नहीं होती। अर्थात् आत्मा को साकार कहना उचित नहीं है।

तीसरी बात — एक वस्तु में अनेक गुण कर्म होते हैं । वे सभी गुण कर्म एक वस्तु में होते हुए भी, एक दूसरे को सिद्ध नहीं करते। क्योंकि उन सभी गुण कर्मों में, परस्पर साध्यसाधनभाव (कार्यकारणसंबंध) नहीं होता। यहां लोग गलती यह करते हैं, कि किसी भी गुण को लेकर किसी भी बात को वे सिद्ध करना चाहते हैं। जो कि साध्यसाधनभाव नियम के विरुद्ध है।
जैसे एक उदाहरण —
एक मनुष्य संगीत कला जानता है। वह पाक विद्या भी जानता है। वह भोजन भी बनाता है। वह सैर भी करता है। कार भी चलाता है। वह सो भी जाता है। तो उसमें इस प्रकार से अनेक गुण कर्म होते हैं।।
अब कोई यह कहे कि क्योंकि यह मनुष्य संगीत कला जानता है , इस कारण से यह बहुत अच्छा भोजन बनाता है।
तो अब आप सोचिए, यह अच्छा भोजन बनाने का जो कारण संगीत कला को बताया गया है, क्या यह ठीक है? क्या संगीत कला जानना, भोजन बनाने का कारण है?
इस सरल सी बात को छोटा बच्चा भी समझ लेगा, कि यह कारण गलत है। भले ही उस मनुष्य में भोजन बनाने की कला भी है, संगीत कला भी है, और वह अच्छा भोजन बनाता भी है। फिर भी भोजन बनाना जो कार्य है, उसका कारण संगीत कला नहीं है। उसका कारण पाकविद्या है।
ठीक इसी प्रकार से आत्मा में भी अनेक गुण कर्म हैं। वह एकदेशी भी है, निराकार भी है, चेतन भी है, यज्ञादि कर्म भी करता है, खाता पीता सोता भी है। परंतु इन सबका आपस में कारण कार्य संबंध नहीं है। क्योंकि जहां जहां आप कारणकार्यसंबंध बताएंगे, वहां वहां उनमें साध्यसाधनभाव होना चाहिए, जैसा ऊपर के उदाहरण में बताया गया है।
तो जैसे संगीत कला से भोजन नहीं बनता, वैसे ही एकदेशी होने से साकार भी नहीं होता। यदि एकदेशी होने से साकार होता, तो अर्थापत्ति प्रमाण से व्यापक होने से निराकार होना चाहिए। जबकि प्रकृति व्यापक है, तो भी साकार है। इसलिए एकदेशी होना और साकार होना, इन दोनों में कारणकार्यसंबंध या साध्यसाधनभाव नहीं है। इसलिए आत्मा को, एकदेशी होने से साकार मानना गलत है।

चौथी बात — हम यह कहते हैं कि चलिये, थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाए, कि आत्मा साकार है। तो ऐसा मानने से एक समस्या उत्पन्न होती है। और वह है, कि – साकार होने का, जड़ होने के साथ साध्यसाधनभावहै। इसलिए जितनी भी साकार वस्तुएं होती हैं, वे सब जड़ होती हैं। जैसे सूर्य पृथ्वी स्कूटर कार इत्यादि। और जितनी भी चेतन वस्तुएं होती हैं, वे सब निराकार होती हैं। जैसे ईश्वर।
यदि आत्मा को भी साकार माना जाए, तो क्या आप उसे स्कूटर कार आदि के समान जड़ वस्तु भी मानेंगे?
हमारे इस प्रश्न का उत्तर वे कुछ नहीं देते। जब वे कुछ उत्तर नहीं देते, तो इस स्थिति को न्यायदर्शन में निग्रहस्थान के नाम से कहा जाता है , अर्थात जब व्यक्ति, विपक्षी के प्रश्न का उत्तर नहीं देता, तो इसका अर्थ है उसका पक्ष झूठ है, और बात यहीं खत्म हो जाती है।

परंतु वे हठ पकड़ कर बैठे हैं, वे मानते नहीं।
और हमें कहते हैं, आप आत्मा को निराकार सिद्ध करें।

ठीक है, हम आत्मा को निराकार सिद्ध करते हैं। कि —-
आत्मा निराकार है। चेतन होने से। जो जो वस्तु चेतन होती है, वह निराकार होती है। जैसे ईश्वर। आत्मा भी ईश्वर के समान चेतन है। इसलिए चेतन होने से आत्मा निराकार है।
हमारी इस बात के उत्तर में वे लोग चालाकी से ऐसा कहते हैं। यदि आप आत्मा को निराकार मानेंगे, तो उसे सर्वव्यापक भी मानना पड़ेगा। क्योंकि जैसे चेतन ईश्वर सर्वव्यापक है, ऐसे चेतन आत्मा भी सर्वव्यापक होना चाहिए। अब आप आत्मा को सर्वव्यापक सिद्ध करें।

वास्तव में यह उनकी चालाकी है। इस चालाकी को समझने के लिए आपको थोड़ा न्याय दर्शन का अध्ययन करना होगा। क्योंकि बातचीत करने के नियम और बातचीत करने में 54 प्रकार की गलतियाँ भी विस्तार से न्याय दर्शन में ही लिखे हैं।

(न्यायदर्शन में बातचीत करने के चार प्रकार बताए हैं। वाद, जल्प, वितंडा और शंका समाधान।

बातचीत के प्रथम प्रकार – वाद में दोनों पक्ष वाले अपने अपने पक्ष की स्थापना करते हैं। प्रमाण एवं तर्क से अपने पक्ष की सिद्धि और दूसरे का खंडन करते हैं। अपने सिद्धांत के विरुद्ध नहीं बोलते। और आवश्यकता पड़ने पर पंचावयव का प्रयोग भी करते हैं।
वाद का उद्देश्य सत्य असत्य की खोज करना है। यह शुद्ध बातचीत होती है। इसमें कोई झूठ छल कपट चालाकी बेईमानी नहीं की जाती। ईमानदार लोगों के लिए इसी प्रकार से बातचीत करने का विधान है।

दूसरा प्रकार है – जल्प। इसमें ऊपर बताए वाद के सारे नियम लागू होते हैं , तथा इसके अतिरिक्त इसमें झूठ छल कपट चलाकी बेईमानी सब कुछ किया जाता है। और इसका उद्देश्य होता है – अपनी बात को जैसे-तैसे जिताना और दूसरे को हराना, चाहे कितना भी छल कपट बेईमानी चालाकी आदि करनी पड़े। बातचीत का यह प्रकार अच्छा नहीं है। न्याय दर्शन में सत्य की खोज करने वालों के लिए इसका निषेध है।

बातचीत का तीसरा प्रकार है – वितंडा। इसमें जल्प के सारे नियम लागू होते हैं । बस अंतर इतना है कि वितंडा करने वाला व्यक्ति अपने पक्ष की स्थापना स्पष्ट रूप से नहीं करता , कि वह क्या मानता है? केवल दूसरे पक्ष पर आक्रमण ही करता जाता है। यह भी अच्छी बातचीत नहीं है । इसका उद्देश्य भी वही है जो जल्प का है। न्याय दर्शन में सत्य की खोज करने वालों के लिए इसका भी निषेध है।
सत्य की खोज करने वाले सज्जन लोगों के लिए न्याय दर्शन में बताया है कि वे केवल वाद का ही प्रयोग करें । जल्प और वितंडा से बचें। क्योंकि वह शुद्ध बातचीत नहीं है।

बातचीत का चौथा प्रकार – शंका समाधान है। उसमें एक व्यक्ति नम्रता और जिज्ञासा भाव से प्रश्न पूछता जाता है, और दूसरा व्यक्ति भी सत्य को समझाने के उद्देश्य से उसका उत्तर देता जाता है। उसमें वादी प्रतिवादी बनकर बातचीत नहीं की जाती। केवल जिज्ञासा भाव से प्रश्नोत्तर किए जाते हैं। अस्तु।)

अब हम विवादित विषय के संबंध में पुनः विनम्र निवेदन करते हैं। जिन लोगों ने यह सिद्धांत चलाया है कि आत्मा साकार है, वे लोग न्याय दर्शन में कुशल नहीं हैं। न तो उन्होंने न्याय दर्शन का अध्ययन ठीक प्रकार से किया है। और न ही उन्हें वाद करना आता है।
वे वाद नहीं कर रहे। जिससे बातचीत करनी चाहिए। क्योंकि यह बातचीत का शुद्ध प्रकार है।
बल्कि वे लोग जल्प का प्रयोग कर रहे हैं। जिसका निषेध है। क्योंकि इसमें झूठ छल कपट चालाकी का प्रयोग होता है।

तो न्याय दर्शन में बताया है, कि जल्प और वितंडा में बोलने में व्यक्ति 54 प्रकार की गलतियां करता है।
उनमें से 24 प्रकार की जातियां (चालाकी) हैं.
22 प्रकार के निग्रहस्थान (बात का उत्तर गलत देना या चुप रहना) हैं.
3 प्रकार का छल (वक्ता के अभिप्राय को तोड़ मरोड़ कर उसका खंडन करना) है.
और 5 प्रकार के हेत्वाभास (गलत कारण बताना) हैं.
ये कुल मिलाकर 54 प्रकार की गलतियां होती हैं, जो न्याय दर्शन में बताई गई हैं। ( चालाक और बेईमान लोग जल्प और वितंडे में इस प्रकार की 54 में से कुछ गलतियां करते हैं। वाद में इनका प्रयोग नहीं किया जाता।)

इन लोगों ने इन गलतियों में से जो गलती की है, वह है जाति = चालाकी = धोखाधड़ी। जिस कारण से उन्होंने सब लोगों में यह भ्रांति फैला दी, कि आत्मा साकार है.

आप इसे पढ़ना चाहें तो न्याय दर्शन के पांचवें अध्याय में प्रथम आह्निक के सूत्र संख्या 4 में पढ़ सकते हैं। वहां पर एक जाति का नाम है, उत्कर्षसमा जाति।

इनके कथन में उत्कर्षसमा जाति का प्रयोग है।
ये लोग जो कह रहे हैं कि यदि आत्मा ईश्वर के समान निराकार है, तो वह ईश्वर के समान सर्वव्यापक भी होना चाहिए.

इसमें जाति मतलब चालाकी या धोखाधड़ी यह है, कि जो दृष्टांत ईश्वर का दिया गया है, उस दृष्टांत की एक विशेषता = व्यापकता को, साध्य अर्थात जीवात्मा में बढ़ा करके दिखलाना, यह उत्कर्षसमा जाति है।
उन्होंने यही आरोप लगाया है , कि
दृष्टांत = ईश्वर के तुल्य, साध्य =आत्मा भी सर्वव्यापक होना चाहिए.
यह उत्कर्षसमा जाति का प्रयोग है। चालाकी से सत्य का खंडन किया जा रहा है। जो कि ईमानदारी नहीं, बल्कि धोखाधड़ी है।

इसलिये इसे शुद्ध बातचीत नहीं कहा जा सकता।
यदि आपकी इच्छा हो, तो न्याय दर्शन में अध्याय 5, आह्निक 1, सूत्र 4 में देख लीजिए। बुद्धिमानों को समझ में आ जाएगा, कि वास्तव में यह चालाकी से सत्य का खंडन किया जा रहा है। यह ईमानदारी नहीं है।

अब आत्मा निराकार है। इस विषय में महर्षि दयानंद सरस्वती जी के प्रमाण प्रस्तुत किए जाते हैं।

प्रमाण — 1.
महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने पूना में कुछ प्रवचन किए थे । उन प्रवचनों की पुस्तक बनी, जिसे लोग “उपदेश मंजरी” के नाम से जानते हैं। उन प्रवचनों में उन्होंने प्रथम उपदेश में कहा कि जीवात्मा निराकार है। उनके शब्द इस प्रकार से हैं।
क्योंकि शरीर स्थित जो जीव है, वह भी आकार रहित है। यह सब कोई मानते हैं, अर्थात वैसा आकार न होते हुए भी हम परस्पर एक-दूसरे को पहचानते हैं।
इस वचन में महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने स्पष्ट ही जीवात्मा को आकार रहित अर्थात् निराकार स्वीकार किया है । फोटो संलग्न है।

प्रमाण — 2.
इसी प्रकार से उपदेश मंजरी के चतुर्थ उपदेश में भी कहा है। वहां उनके वचन इस प्रकार से हैं।
जीव का आकार नहीं, तो भी जीव का ध्यान होता है वा नहीं? ज्ञान सुख-दुख इच्छा द्वेष प्रयत्न ये नष्ट होते ही जीव निकल जाता है, यह किसान भी समझता है।
इस वचन में भी महर्षि दयानंद जी ने जीव को आकार रहित अर्थात् निराकार ही माना है। फोटो संलग्न है।

प्रमाण — 3.
महर्षि दयानंद सरस्वती जी का एक हस्तलिखित पत्र का फोटो भी मैं प्रस्तुत कर रहा हूं। उनके पत्रों की कोई पुस्तक छपी होगी । उसका फोटो भी मैं भेज रहा हूं । उस पत्र में भी उन्होंने स्वीकार किया है, कि आत्मा निराकार है।
यच्चेतनवत्त्वं तज्जीवत्त्वम्। जीवस्तु खलु चेतनस्वभावः। अस्येच्छादयो धर्मास्तु निराकारोsविनाश्यनादिश्च वर्तते।
अर्थात जो चैतन्य गुणवाला है, वह जीवात्मा है। जीवात्मा चेतन स्वभाव वाला है। इसके इच्छा आदि धर्म हैं। यह निराकार है, अविनाशी = नष्ट न होने वाला और अनादि है।
इस पत्र में भी महर्षि दयानंद जी ने आत्मा को निराकार माना है।

प्रमाण — 4.
महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने सत्यार्थ प्रकाश के सातवें समुल्लास में यह लिखा है। फोटो संलग्न है।
वहाँ प्रश्न है — ईश्वर साकार है वा निराकार?
इसके उत्तर में — उन्होंने लिखा है, निराकार। वह पूरा अनुच्छेद पढ़ें। वहाँ जिस वाक्य के नीचे लकीर लगी है, वह वाक्य यह है।
क्योंकि जो संयोग से उत्पन्न होता है उसको संयुक्त करने वाला निराकार चेतन अवश्य होना चाहिए।
इस वाक्य को विशेष ध्यान से पढ़ें।
यद्यपि वहां यह कथन ईश्वर के संबंध में है। परंतु यदि उसे ऊहा से जीवात्मा पर भी लागू करें, तो वह जीवात्मा पर भी लागू होता है।
इस वाक्य के अनुसार यदि ईश्वर चेतन होते हुए परमाणुओं का संयोग करके सृष्टि को बनाता है, और वह निराकार है।
तो इसी प्रकार से आत्मा भी चेतन होते हुए लोहा लकड़ी आदि वस्तुओं का संयोग करके स्कूटर कार रेल आदि वस्तुएँ बनाता है, तो वह भी निराकार सिद्ध होता है। जब चेतन ईश्वर वस्तुओं का निर्माता होने से निराकार है, तो चेतन आत्मा, ईश्वर के समान वस्तुओं का निर्माता होने से निराकार क्यों नहीं?
यहां स्पष्ट लिखा है निराकार चेतन है।
जब आत्मा चेतन है, तो सिद्ध हुआ कि वह निराकार है।

हमने आत्मा को निराकार सिद्ध करने के लिए महर्षि दयानंद सरस्वती जी के 4 प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। परंतु साकार मानने वालों ने 1 भी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया, जिसमें सीधा साकार लिखा हो, अथवा अर्थापत्ति आदि से भी साकार सिद्ध होता हो।
ये लोग आत्मा को एकदेशी ही सिद्ध करते रहे, जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। क्योंकि आत्मा को एकदेशी तो हम भी मानते हैं । इस विषय में तो कोई विवाद था ही नहीं । आत्मा को एकदेशी सिद्ध नहीं करना था, बल्कि साकार सिद्ध करना था, जो कि इन्होंने नहीं किया।
ये लोग एकदेशी होने से आत्मा को साकार कहते रहे। जो कि सिद्ध नहीं हो पाया।
क्योंकि यह अनैकांतिक हेत्वाभास है।

इन लोगों की भ्रांति का कारण —

इसके अतिरिक्त एक और बात कहना चाहता हूँ, जिसके कारण ये लोग भ्रांति में हैं।
इनको भ्रांति यह है, कि ये लोग आकार गुण तथा परिमाण गुण दोनों में अंतर नहीं समझ रहे हैं। ये परिमाण गुण को आकार गुण समझ रहे हैं। यह इनकी सबसे बड़ी भूल है, जिसके कारण इन्हें भ्रांति पैदा हुई।
जबकि वैशेषिक दर्शन में 24 गुणों में, परिमाण गुण को अलग बताया है और आकार (रूप) गुण को अलग बताया है।
आकार का अर्थ क्या है? श्री वामन शिवराम आप्टे, इस विद्वान का लिखा हुआ “संस्कृत हिंदी कोष”, शिक्षा जगत में एक प्रामाणिक कोष है। इस कोष में आकार शब्द का अर्थ देखिए। वे लिखते हैं…. आ+ कृ + घञ् = आकारः। इस शब्द में आ उपसर्ग , कृ धातु, और घञ् प्रत्यय है। इस प्रकार से आकार शब्द बनता है। और इसका अर्थ आप्टे कोष में लिखा है= रूप, शक्ल, आकृति।
इस प्रकार से आकार शब्द का अर्थ हुआ कोई रूप हो, शक्ल हो, आकृति हो, उसका नाम आकार है। फोटो संलग्न है।
ये लोग आत्मा को साकार बता रहे हैं। अब बुद्धिमान लोग विचार करें, क्या आत्मा का कोई रूप है, कोई शक्ल है, कोई आकृति है? यदि नहीं है, तो साकार कैसे हुआ?
इतनी मोटी बात भी ये लोग नहीं विचार कर सके। आप इसी बात से इनकी बुद्धि का अनुमान कर सकते हैं।
वैशेषिक दर्शन में रूप गुण को अलग बताया है, और परिमाण गुण को अलग बताया है। इस प्रकार से रूप का नाम जब आकार है, तो आकार और परिमाण दोनों अलग-अलग गुण हुए।
अब ऋषियों का यह सिद्धांत है कि जिस वस्तु में रूप है, अर्थात आकार है, वह साकार वस्तु है। जिस वस्तु में रूप नहीं, आकार नहीं, वह निराकार वस्तु है। परंतु परिमाण गुण दोनों में है, साकार में भी और निराकार में भी।
जैसे कि पृथ्वी सूर्य आदि पदार्थों में आकार गुण भी है और बड़ा आकार होने से महत्परिमाण भी है। तो यह हो गया साकार द्रव्यों में परिमाण गुण।
अब आत्मा और ईश्वर, ये दोनों निराकार द्रव्य हैं, इनमें किसी में भी रूप गुण या आकार गुण नहीं है, परंतु परिमाण गुण इन दोनों में भी है।
कठोपनिषद में लिखा है.. अणोरणीयान् महतोमहीयान्…।। अर्थात ईश्वर अणु से भी अणु है और महत् से भी महत् है। अर्थात छोटे से छोटा है और बड़े से बड़ा पदार्थ है। इस प्रकार से निराकार ईश्वर में परिमाण गुण स्वीकार किया है।
तथा निराकार आत्मा में भी परिमाण गुण है । मुंडक उपनिषद 3/1/9 में आत्मा को अणु कहा है। एषोsणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पंचधा संविवेश।। यह आत्मा अणु अर्थात् सूक्ष्म/छोटा है। यहाँ परिमाण बताया है, न कि आकार।
वैशेषिक दर्शन में भी ईश्वर एवं आत्मा को परिमाण गुण वाला स्वीकार किया है।
विभवान्महानाकाशः।। तथा चात्मा।। तदभावात् अणु मनः।। तथा चात्मा।।
अर्थात् व्यापक होने से आकाश महत्परिमाण वाला है।। और इसी हेतु से अर्थात व्यापक होने से ही ईश्वर भी महत्परिमाण वाला है।। व्यापक न होने से मन अणु अर्थात् एकदेशी है ।। और इसी हेतु से अर्थात व्यापक न होने से आत्मा भी अणु परिमाण अर्थात् एकदेशी है।।
इन सूत्रों में भी आत्मा तथा ईश्वर को परिमाण गुण वाला बताया है, साकार नहीं। यदि आप आत्मा को अणु का अर्थ एकदेशी, और एकदेशी होने से साकार कहेंगे, तो कठोपनिषद एवं वैशेषिक दर्शन के प्रमाणों के आधार पर आपको ईश्वर को भी साकार मानना पड़ेगा। क्योंकि परिमाण तो इन दोनों में बताया गया है।
तो सार यह हुआ कि ये लोग परिमाण और आकार गुण में अंतर नहीं समझ रहे। इसलिए इन्होंने परिमाण को भ्रांति से आकार मानकर जीवात्मा को साकार कहना आरंभ कर दिया। ईश्वर इन लोगों को सद्बुद्धि दे, ये लोग सत्य को समझ सकें। हमारी ओर से इनके लिए बहुत शुभकामनाएं।

इसलिए सब बुद्धिमानों को इस विषय में गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए, और यह निश्चय जानना चाहिए कि महर्षि दयानंद सरस्वती जी का सिद्धांत यही है कि आत्मा निराकार है।
विनम्रतापूर्वक धन्यवाद….।
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विचारशून्य हिन्दू अर्थात लाभदायक मूर्ख

विचारशून्य हिन्दू अर्थात लाभदायक मूर्ख

Useful Idiots (लाभदायक मूर्ख ) एक विश्व-विख्यात मुहावरा है। इसी नाम से बी.बी.सी. ने एक ज्ञानवर्द्धक डॉक्यूमेंटरी भी बनाई है। इस कवित्वमय मुहावरे के जन्मदाता रूसी कम्युनिज्म के संस्थापक लेनिन थे। वे बुद्धिजीवी जो अपनी किसी हल्की या भावुक समझ से कम्युनिस्टों की मदद करते थे उन्हे यूजफूल ईडियट कहा था।

आज विचारशून्य हिन्दू यही यूजफूल ईडियट बन गया है। अल्लाह मौला वाले कथावाचक और उनका समर्थन करने वाले अरबपति गुरुजी सब चाहते हैं कि हिन्दू विचार शून्य बना रहे। इसी कारण हिन्दू युवा नास्तिक हो रहा है। इन करोड़पति धर्म ध्वजी धंधेबाजों का क्या है? हालत बिगड़े तो राज्य बदल देंगे। ज्यादा बिगड़े तो महेश योगी की तरह अमेरिका चले जाएंगे।

यदि उपदेशक सीधी सरल बात करे तो भक्तों की संख्या बेहद कम होगी आम हो खास मनुष्य को तो चमत्कार चाहिए। नौकरी चाहिए, व्यापार चाहिए, किसी को संतान चाहिए तो किसी को बीमारी से छुटकारा, जो हाथ से गया उसके लिए बाबा और जो पास में हैं वह बचा रहे उसके लिए भी बाबाओं से मन्त्र चाहिए। अंधश्रद्धा की पराकाष्ठा देखिये! नौजवान बेटियों को अकेले इनके आयोजनों तक में भेजने से लोग नहीं हिचकते। सड़क पर हाथ की सफाई दिखाने वाला मदारी और स्टेज पर हाथ की सफाई दिखाने वाला मैजीशियन है। परंतु धर्म का चोला पहन कर हाथ की सफाई दिखाने वाला सत्य साई बाबा के नाम से पूजा जाता है और 1 लाख करोड़ से अधिक की सम्पत्ति इकठ्ठा करता है।

परिणाम क्या होता है?
1- पॉल दिनाकरण प्रार्थना की ताकत से भक्तों को शारीरिक तकलीफों व दूसरी समस्याओं से छुटकारा दिलाने का दावा करते हैं। पॉल बाबा अपने भक्तो को इश्योरेंस या प्रीपेड कार्ड की तरह प्रेयर पैकेज बेचते हैं। यानी, वे जिसके लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं, उससे मोटी रकम भी वसूलते हैं। मसलन 3000 रुपये में आप अपने बच्चों व परिवार के लिए प्रार्थना करवा सकते हैं। पॉल दिनाकरन जो कि एक इसाई प्रेरक हैं उनकी संपत्ति 5000 करोड़ से ज्यादा है,बिशप के.पी.योहन्नान की संपत्ति 7000 करोड़ है, ब्रदर थान्कू (कोट्टायम , करेला ) की संपत्ति 6000 हज़ार करोड़ से अधिक है.इनके पास जाने वाले अधिसंख्य हिन्दू ही हैं। हिन्दू ही इनकी दया की गाथा गाते हैं। ईसाई दयालुता केवल तभी तक है जब तक कोई व्यक्ति ईसाई नहीं बनता. यदि इन्हें लोगों की भूख, गरीबी और बिमारी की ही चिन्ता होती तो अफ्रीका महाद्वीप के उन देशों में जाते जहाँ 95% जनसंख्या ईसाई है।
2 – सेक्युलरिज़्म का कीड़ा हिन्दू को ही अधिक काटता है। एक शहर में कसाईं बाबा का नया मंदिर बना है जिसे कुछ मूर्ख लोग साईं बाबा नाम से जानते हैं,.मंदिर को देख कर लगता है कि इसकी लागत 10 करोड़ रूपए के आस पास होगी. इस कसाई बाबा के मन्दिर पर एक बोर्ड लगा है जिस पर ॐ, क्रॉस, चाँद तारा आदि कुछ चिह्न बने हैं। मुझे समझ नही आया जिस शहर में 98% हिन्दू हों और मन्दिर में दान देने वाले 100% हिन्दू हों वहां पर ये ॐ, क्रॉस, चाँद तारा आदि निशाँ वाले बोर्ड की क्या जरूरत है? इन मन्दिर वालों का ज्ञान विचित्र है. ये सर्वधर्म समभाव की बीमारी हिन्दू को ही क्यों है?

3- भगवा धारी/ सफेदपोश गुरुओं का हाल कितना खराब है। कुछ साल पुरानी बात है। मेरे परिचित पुलिसवाले ने बताया कि कल अम्बाला के पास कुमारस्वामी ( बीज मंत्र वाले) का कार्यक्रम था। इतनी भीड़ थी कि कई देर तक GT रोड पर जाम हो गया। यही कुमारस्वामी जी कभी क्रिसमस मनाते हैं तो कभी अपनी पत्नी से ही निकाह करवाते हैं। बीजमंत्र के नाम पर लोगो को उल्लू बनाते हैं। स्वघोषित जगतगुरु रामपाल हो या गुरुमीत राम रहीम सभी के सभी कितने महान हैं ये आज पता है। परंतु पकड़े जाने से पहले ये भी लाखों लोगों के गुरु जी थे और चमत्कार करते थे। अल्लाह मौला वाले मुरारी लाल की रामायण हो या डबल श्री की सुदर्शन क्रिया या निर्मल बाबा की कृपा सभी के खरीददार विचारशून्य हिन्दू ही हैं।

विचारशून्यता आपको कहाँ तक ले जाती है?

टीवी पर कुबेर यंत्र बेचने वाली एंकर बता रही थी कि यह कुबेर यंत्र पन्द्रह दिन में आपके घर धन की वर्षा करने लगता है और आप धन से मालामाल हो जाते है, टीवी वाली उस कन्या ने इस धन वर्षा करने वाले कुबेर यंत्र की कुछ हजार रूपये कीमत भी बताई|
ताऊ ने जब टीवी पर इसके बारे में सुना तो उसे यह बढ़िया धन्धा लगा कि बिना कुछ किये सिर्फ कुछ हजार में एक कुबेर यंत्र खरीदना है और मालामाल हो जाना है, ना कोई चोरी. डकैती, राजनीति, लूटमार व बेईमानी करनी जो अक्सर ताऊ को अब तक करनी पड़ती थी| सो ताऊ ने उस टीवी सुकन्या द्वारा बताये नंबर पर एस.एम.एस ठोक दिया|
ताऊ का एस.एम्.एस मिलना ही था कि उधर से कुबेर यंत्र बेचने वाली कम्पनी से एक सुकन्या का बड़ी मधुर आवाज में ताऊ के सेल फोन पर फोन आ गया| ताऊ ने शर्त रखी कि वह कुबेर यंत्र खरीदेगा पर पहले उसे उसके बारे में पूरी जानकारी चाहिये| यंत्र बेचने वाली कन्या ने ताऊ की शर्त मानते हुए जानकारी देना शुरू की कि – इस यंत्र को घर में हमारे द्वारा प्रदत दिशा निर्देशों के अनुसार स्थापित करने के पंद्रह दिन बाद आपके घर में धन वर्षा शुरू हो जायेगी आदि आदि कई जानकारियां उस सुकन्या ने ताऊ को बताई|

ताऊ – अब तक कितने लोगों के घर धन वर्षा हुई ?
सेल्स गर्ल – बहुत लोगों के घर, जिन्होंने यह यंत्र ख़रीदा !
ताऊ- क्या मुकेश अम्बानी ने भी तुम्हारा यन्त्र ख़रीदा?
क्या रत्न टाटा ने यह यन्त्र ख़रीदा?
ताऊ की इस बात का उस कन्या के पास कोई जबाब नहीं था.
ताऊ – कितने यंत्र है आपकी दूकान में ?
यंत्र बेचने वाली कन्या ने बताया – 1000 !
ताऊ – तब तो तुम्हारी दूकान की आमदनी अम्बानी और टाटा से भी ज्यादा होगी.
ये बात सुनते ही सेल्स गर्ल ने झुंझलाते हुए फोन पटक दिया|
ध्यान दें-
– हनुमान जी ने बिना किसी मूल्य के श्रीराम जी का कार्य किया. तो आज अचानक हनुमान जी को एजेंटों की जरूरत कैसे हो गई. ये हनुमान जी की अपमान है.
– यदि इन धातु और प्लास्टिक के टुकड़ों (श्री यन्त्र , नजर रक्षा कवच आदि) में कोई गुण होता तो धनी उद्योगपति व राजनेता इन्हें अपने पास ही रखते.
हम इनका विरोध नहीं करेंगे तो ये इसी तरह लोगों को ठगते रहेंगे.
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वेद और देव

वेद और देव

वेदों में देव विषय को लेकर अनेक भ्रांतियां हैं।

शंका 1- देव शब्द से क्या अभिप्राय समझते हैं ?

समाधान- निरुक्त 7/15 में यास्काचार्य के अनुसार देव शब्द दा, द्युत और दिवु इस धातु से बनता हैं। इसके अनुसार ज्ञान,प्रकाश, शांति, आनंद तथा सुख देने वाली सब वस्तुओं को देव कहा जा सकता हैं। यजुर्वेद[14/20] में अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र वसु, रूद्र, आदित्य, इंद्र इत्यादि को देव के नाम से पुकारा गया हैं। परन्तु वेदों [ऋग्वेद 6/55/16, ऋग्वेद 6/22/1, ऋग्वेद 8/1/1, अथर्ववेद 2/2/1] में तो पूजा के योग्य केवल एक सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, भगवान ही हैं।
देव शब्द का प्रयोग सत्यविद्या का प्रकाश करनेवाले सत्यनिष्ठ विद्वानों के लिए भी होता हैं क्यूंकि वे ज्ञान का दान करते हैं और वस्तुओं के यथार्थ स्वरुप को प्रकाशित करते हैं [शतपथ 3/7/3/10, शतपथ 2/2/2/6, शतपथ 4/3/44/4, शतपथ 2/1/3/4, गोपथ 1/6] । देव का प्रयोग जीतने की इच्छा रखनेवाले व्यक्तियों विशेषत: वीर, क्षत्रियों, परमेश्वर की स्तुति करनेवाले तथा पदार्थों का यथार्थ रूप से वर्णन करनेवाले विद्वानों, ज्ञान देकर मनुष्यों को आनंदित करनेवाले सच्चे ब्राह्मणों, प्रकाशक, सूर्य,चन्द्र, अग्नि, सत्य व्यवहार करने वाले वैश्यों के लिए भी होता हैं [शतपथ 6/3/1/15,शतपथ 7/5/1/21, शतपथ 7/2/4/26, गोपथ 2/10] ।

शंका 2- वेदों में 33 देवों होने से क्या अभिप्राय हैं?

समाधान- वेदों एवं ब्राह्मण आदि ग्रंथों में 33 देवों का वर्णन मिलता हैं। 33 देवों के आधार पर यह निष्कर्ष प्राय: निकाला जाता हैं की वेद अनेकेश्वरवादी अर्थात एक से अधिक ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखते हैं। वेदों में अनेक स्थानों पर 33 देवों का वर्णन मिलता हैं [अथर्ववेद 10/7/13,अथर्ववेद 10/7/27, ऋग्वेद 1/45/27, ऋग्वेद 8/28/1, यजुर्वेद 20/36] । ईश्वर और देव में अंतर स्पष्ट होने से एक ही उपासना करने योग्य ईश्वर एवं कल्याणकारी अनेक देवों में सम्बन्ध स्पष्ट होता हैं।
शतपथ ब्राह्मण [4/5/7/2] के अनुसार 33 देवता हैं 8 वसु, 11 रूद्र, 12 आदित्य, द्यावा और पृथ्वी और 34 वां प्रजापति परमेश्वर हैं। इसी बात को ताण्ड्य महाब्राह्मण[6/2/5] और ऐतरेय ब्राह्मण[2/18/37] में भी कहा गया है।
शतपथ के अनुसार 8 वसु हैं अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश, अंतरिक्ष, सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र क्यूंकि यह जगत को बसाने वाले हैं। 11 रुद्रों से तात्पर्य 10 प्राण एवं 11 वें आत्मा से है क्यूंकि ये शरीर से निकलते हुए प्राणियों को रुलाते है। 12 आदित्य से तात्पर्य वर्ष के 12 मासों से हैं क्यूंकि ये हमारी आयु को मानो प्रतिदिन ले जा रहे हैं। 32 वां इंद्र अथवा बिजली हैं एवं 33 वां प्रजापति अथवा यज्ञ है।

शंका 3- परमेश्वर और 33 देवों में क्या सम्बन्ध हैं?

परमेश्वर और 33 देवों के मध्य सम्बन्ध का वर्णन करते हुए कहा गया है कि ये 33 देव जिसके अंग में समाये हुए हैं उसे स्कम्भ (सर्वाधार परमेश्वर) कहो। वही सबसे अधिक सुखदाता है। ये 33 देव जिसकी निधि की रक्षा करते है, उस निधि को कौन जानता है? ये देव जिस विराट शरीर में अंग के समान बने हैं, उन 33 देवों को ब्रह्मज्ञानी ही ठीक ठीक जानते हैं, अन्य नहीं ,इत्यादि। इन सभी में पूजनीय तो वह एकमात्र देवों का अधिदेव और प्राणस्वरूप परमेश्वर ही है।

वेद में अनेक मन्त्रों के माध्यम से ईश्वर को देवों का पिता, मित्र, आत्मा, जनिता अर्थात उत्पादक, अंतर्यामी, अमरता को प्रदान करने वाला, कष्टों से बचानेवाला, जीवनाधार, देवों अर्थात सत्यनिष्ठ विद्वान का मित्र आदि के रूप में कहा गया हैं। जैसे
1. जो श्रद्धा से देवों के पिता वा पालक उस ज्ञान के स्वामी परमेश्वर की उपासना करता हैं उसका जन्म सफल हो जाता है [ऋग्वेद 2/26/3 ]।
2. परमेश्वर सत्यनिष्ठ विद्वानों (देव) का कल्याणकारी मित्र है[ऋग्वेद 1/31/1]।
3. परमेश्वर देवों का आत्मा है [ऋग्वेद 4/3/7।
4. परमेश्वर सब देवों का अंतर्यामी आत्मा है [ऋग्वेद 10/168/4]।
5. परमेश्वर सब देवों का अधिष्ठाता देव है [ ऋग्वेद 10/121/8]।
6. परमेश्वर सब देवों में बड़ा देव है [ऋग्वेद 1/50/9]।
7. वह परमेश्वर हमारा बंधु है [यजुर्वेद 32/10]।
8. जैसे वृक्ष के तने के आश्रित सब शाखाएं होती हैं, वैसे ही उस परम देव के आश्रय में अन्य सब देव रहते हैं [अथवर्वेद 10/7/38]।

शंका 4- स्वामी दयानंद के अनुसार देवता शब्द का क्या अभिप्राय हैं ?

स्वामी दयानंद देव शब्द पर विचार करते हुए ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेदविषयविचार अध्याय 4 में लिखते है कि दान देने से देव नाम पड़ता है और दान कहते है अपनी चीज दूसरे के अर्थ दे देना। दीपन कहते है प्रकाश करने को, द्योतन कहते है सत्योपदेश को, इनमें से दान का दाता मुख्य एक ईश्वर ही है, जिसने जगत को सब पदार्थ दे रखे है तथा विद्वान मनुष्य भी विद्यादि पदार्थों के देनेवाले होने से देव कहाते हैं। दीपन अर्थात सब मूर्तिमान द्रव्यों का प्रकाश करने से सूर्यादि लोकों का नाम भी देव हैं। तथा माता-पिता, आचार्य और अतिथि भी पालन, विद्या और सत्योपदेशादी के करने से देव कहाते हैं। वैसे ही सूर्यादि लोकों का भी जो प्रकाश करनेवाला हैं, सो ही ईश्वर सब मनुष्यों को उपासना करने के योग्य इष्टदेव हैं, अन्य कोई नहीं।

कठोपनिषद [5/15] का भी प्रमाण हैं की सूर्य, चन्द्रमा, तारे, बिजली और अग्नि ये सब परमेश्वर में प्रकाश नहीं कर सकते, किन्तु इस सबका प्रकाश करनेवाला एक वही है, क्यूंकि परमेश्वर के प्रकाश से ही सूर्य आदि सब जगत प्रकाशित हो रहा हैं। इसमें यह जानना चाहिये की ईश्वर से भिन्न कोई पदार्थ स्वतन्त्र प्रकाश करनेवाला नहीं हैं , इससे एक परमेश्वर ही मुख्य देव हैं।

शंका 5- वेदों में एकेश्वरवाद अर्थात ईश्वर के एक होने के क्या प्रमाण हैं?

समाधान- पश्चिमी विद्वान वेदों में बहुदेवतावाद या अनेकेश्वरवाद मानते हैं। जब उन्हें वेदों में उन्होंने यहाँ तक कह डाला की वेदों ने प्रारम्भिक से अनेकेश्वरवाद के क्रमबद्ध तत्वज्ञान का विकास प्राकृतिक, एकेश्वरवाद और अद्वैतवाद की मंजिलों से गुजरते हुए किया [1]। यह एक कल्पना मात्र हैं क्यूंकि निष्पक्ष रूप से पढ़ने ज्ञात होता हैं की वेदों में अनेक देवताओं का वर्णन मिलता हैं मगर पूजा का विधान केवल देवाधिदेव सभी देवों के अधिष्ठाता एक ईश्वर की ही बताई गई हैं। इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि, यम, मातरिश्वा, वायु, सूर्य, सविता आदि प्रधानतया उस एक परमेश्वर के ही भिन्न-भिन्न गुणों को सुचित करने वाले नाम हैं।

वेदमंत्रों में ईश्वर के एक होने के अनेक प्रमाण हैं। जैसे

ऋग्वेद

1. जो एक ही सब मनुष्यों का और वसुओ का ईश्वर है [ऋग्वेद 1/7/9]।
2. जो एक ही हैं और दानी मनुष्य को धन प्रदान करता है [ऋग्वेद 1/84/6] ।
3. जो एक ही हैं और मनुष्यों से पुकारने योग्य है [ ऋग्वेद 6/22/1] ।
4. हे परमेश्वर (इन्द्र), तू सब जनों का एक अद्वितीय स्वामी हैं, तू अकेला समस्त जगत का राजा है [ऋग्वेद 6/36/4] ।
5. हे मनुष्य, जो परमेश्वर एक ही हैं उसी की तू स्तुति कर, वह सब मनुष्यों का द्रष्टा है [ऋग्वेद 6/45/16] ।
6. तो एक ही अपने पराकर्म से सबका इश्वर बना हुआ है [ऋग्वेद 8/6/41]।
7. विश्व को रचने वाला एक ही देव हैं, जिसने आकाश और भूमि को जन्म दिया है [ऋग्वेद 10/81/3]।
8. हे दुस्तो को दंड देने वाले परमेश्वर, तुझ से अधिक उत्कृष्ट और तुझ से बड़ा संसार में कोई नहीं हैं, न ही तेरी बराबरी का अन्य कोई नहीं हैं [ऋग्वेद 4/30/1] ।
9. एक सतस्वरूप परमेश्वर को बुद्धिमान ज्ञानी लोग अनेक नामों से पुकारते हैं। उसी को वे अग्नि, यम, मातरिश्वा,इंद्र, मित्र, वरुण, दिव्य, सुपर्ण इत्यादि नामों से याद करते है [ऋग्वेद 1/164/46]।
10. जो ईश्वर एक ही है, हे मनुष्य! तू उसी की स्तुति कर[ऋग्वेद 5/51/16]।
11. ऋग्वेद के 10/121 के हिरण्यगर्भ सूक्त में प्रजापति के नाम से भगवान का स्मरण करते हुए परमेश्वर को चार बार “एक” शब्द का प्रयोग हुआ हैं। इस सूक्त में एकेश्वरवाद का इन स्पष्ट शब्दों में प्रतिपादन हैं की न चाहते हुए भी मैक्समूलर महोदय ने लिखते है “मैं एक और सूक्त ऋग्वेद 10/121 को जोड़ना चाहता हूँ, जिसमें एक ईश्वर का विचार इतनी प्रबलता और निश्चय के साथ प्रकट किया गया हैं की हमें आर्यों के नैसर्गिक एकेश्वरवादी होने से इंकार करते हुए बहुत अधिक संकोच करना पड़ेगा।[2]”
ईसाई मत के पूर्वाग्रह से ग्रसित होने के कारण मैक्समूलर महोदय ने एक नई तरकीब निकाली एकेश्वरवाद को सिद्ध करने वाले मन्त्रों को नवीन सिद्ध करने का प्रयास किया[3]।

यजुर्वेद
1. वह ईश्वर अचल है, एक है, मन से भी अधिक वेगवान है [यजुर्वेद 40/4]।

अथवर्वेद
1. पृथ्वी आदि लोकों का धारण करने वाला ईश्वर हमें सुख देवे,जो जगत का स्वामी है, एक ही है, नमस्कार करने योग्य है, बहुत सुख देने वाला है [अथवर्वेद 2/2/2]।
2. आओ, सब मिलकर स्तुति वचनों से इस परमात्मा की पूजा करो, जो आकाश का स्वामी है, एक है, व्यापक है और हम मनुष्यों का अतिथि है [अथवर्वेद 6/21/1]।
3. वह परमेश्वर एक है, एक है, एक ही है, उसके मुकाबले में कोई दूसरा , तीसरा, चौथा परमेश्वर नहीं है, पांचवां, छठा , सातवाँ नहीं है, आठवां, नौवां, दसवां नहीं है, वही एक परमेश्वर चेतन- अचेतन सबको देख रहा है [अथवर्वेद 16/4/16-20]।

इस प्रकार वेदों में दिए गए मंत्रो से यह सिद्ध होता है कि परमेश्वर एक है।

शंका 6- मैक्समूलर द्वारा प्रचारित (Henotheism) हीनोथीइज़्म में क्या कमी है?

समाधान- मैक्समूलर महोदय द्वारा प्रचारित हीनोथीइज़्म [4] के अनुसार प्रत्येक वैदिक कवि वा ऋषि जब जिस देवता की स्तुति करने लगता है, तब उसी को सर्वोत्कृष्ट बताने और उसके अंदर सर्वोत्कृष्टता के सब गुणों को समाविष्ट करने का प्रयत्न करता है। वेद के अनेक ऐसे सूक्तों को पाना बहुत सुगम है, जिनमें प्राय: प्रत्येक देवता को सबसे ऊँचा और पूर्ण बताया गया है। ऋग्वेद के द्वितीय मंडल के प्रथम सूक्त में अग्नि को सब मनुष्यों का बुद्धिमान राजा, संसार का स्वामी और शासक, मनुष्यों का पिता, भाई, पुत्र और मित्र कहा गया है और दूसरे देवों की सब शक्तियां और नाम स्पष्टया उसकी मानी गई है।

मैक्समूलर महोदय वेदों के अटल सिद्धांत को समझ नहीं पाये। वेद के ही अनुसार ईश्वर को इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा, ब्राह्मणस्पति, वरुण,मित्र, अर्यमा, रूद्र, पूषा, द्रविणोदा, सवितादेव और भग कहा गया हैं और ये सब नाम प्रधानतया उस एक अग्निपद्वाच्य सर्वज्ञ परमेश्वर के है और उन्हीं के गुणों को सूचित करते हैं [ऋग्वेद 2/1/3-7]। जैसे कि परिवार में एक ही व्यक्ति को अनेक संबंधों के कारण भिन्न भिन्न व्यक्ति पिता, चाचा, दादा, भाई,मामा आदि नामों से पुकारते है, वैसे ही एक परमात्मा के अनंत गुणों को सूचित करने के लिए अनेक नाम प्रयुक्त किये जाते है। जब ज्ञानस्वरूप के रूप में उसका स्मरण किया जाता है तो उसे अग्नि कहा जाता है, उसकी परमैश्वर्य सम्पन्नता दिखाने के लिए ब्रह्मा, ज्ञान का अधिपतितत्व दिखाने के लिए ब्राह्मणस्पति, सर्वोत्तमता और पापनिवारकता सूचित करने के लिए वरुण, सबके साथ प्रेम दर्शाने के लिए मित्र, न्यायकारिता के लिए अर्यमा, दुष्टों को रुलाने के लिए रूद्र, ज्ञानादि देने के लिए द्रविणोदा, प्रकाशस्वरूप होने के लिए सविता आदि कहते हैं। अर्थात यह सभी नाम एक ही ईश्वर के है जोकि उनके विभिन्न गुणों को दर्शाते हैं।

वेदों में एक ईश्वर के विभिन्न नाम होने की साक्षी भी दी गयी है जैसे-

1. परमेश्वर एक ही है, ज्ञानी लोग उसे विभिन्न नामो से पुकारते है, उसे इन्द्र कहते है, मित्र कहते है, वरुण कहते है, अग्नि कहते है, और वही दिव्या सुपर्ण और गरुत्मान भी है, उसे ही वे यम और मातरिश्वा भी कहते है [ऋग्वेद 1/164/46]।
2. एक होते हुए भी उस सुपर्ण परमेश्वर को ज्ञानी कविजन बहुत नामो से कल्पित कर लेते है[ ऋग्वेद 10/114/5]।
3. यही भाव ऋग्वेद 3/26/7, ऋग्वेद 10/82/3, यजुर्वेद 32/1, अथर्वेद 13/4 में भी कहाँ गया है।

उदहारण के लिए जिस प्रकार बाईबिल में ईश्वर को God, Almighty, Lord आदि अनेको नाम से पुकारा गया है, उसी प्रकार वेदों में ईश्वर को भी विभिन्न नाम से पुकारा गया है।

श्री अरविन्द घोष ने मैक्समूलर के हीनोथीइज़्म की कथित आलोचना अपने ग्रंथों में की है [5]।

मैक्समूलर की यह कल्पना वेदों में एकेश्वरवाद को असफल रूप से सिद्ध करने के प्रयासों की एक
कड़ी मात्र हैं। इस प्रकार से यह सिद्ध होता हैं की वैदिक ईश्वर एक हैं एवं वेद विशुद्ध एकेश्वरवाद का सन्देश देते है। वेदों में बहुदेवतावाद एक भ्रान्ति मात्र है और देव आदि शब्द कल्याणकारी शक्तियों से लेकर श्रेष्ठ मानव आदि के लिए प्रयोग हुआ है एवं उपासना के योग्य केवल एक ईश्वर है। ईश्वर के भी विभिन्न गुणों के कारण अनेक नाम हो सकते है एवं अनेक नाम देवों के भी हो सकते हैं।

[i]It has been generally held that the Rigvedic Religion is essentially poly-theistic one, taking on a pantheistic coloring only in a few of its latest hymns. Yet a deeply abstract philosophizing crops up unexpectedly in some hymns as a reminder of the long journey made from primitive polytheism to systematic philosophy, through the stages of Naturalistic poly-theism, monotheism and monism.p.37, Vedic Age
[2] I add only one more Hymn (Rig. 10-121) in which the idea of one God is expressed with such power and decision, that it will make us hesitate before we deny to the Aryans an instinctive Mono-theism. P.578, History on Ancient Sanskrit Literature by Maxmuller.
[3] This is one of the Hymns which have always been suspected as modern by European interpreters. P.3, Vedic hymns by Maxmuller
[4] Ancient Sanskrit Literature. p.353-35. Prof. Maxmuller
[5] Dayanand Bankim Tilak, P.17-18 by Shri Arvind

◆ सोने की चिड़िया क्यों लुटती थी?

◆ सोने की चिड़िया क्यों लुटती थी?
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महान इतिहासकार विल ड्यूराँ ने अपना पूरा जीवन लगाकर वृहत ग्यारह भारी-भरकम खंडों में “स्टोरी ऑफ सिविलाइजेशन” लिखी था। उसके प्रथम खंड में भारत संबंधी इतिहास के अंत में उन्होंने अत्यंत मार्मिक निष्कर्ष दिए थे। वह हरेक भारत-प्रेमी के पढ़ने योग्य है। हजार वर्ष पहले भारत विश्व का सबसे धनी और समृद्ध देश था। मगर उसे बाहर से आने वाले लुटेरे हर साल आकर भरपूर लूटते थे। यहाँ तक कि उनके सालाना आक्रमण का समय तक नियत था! मगर यह समृद्ध सभ्यता उनसे लड़ने, निपटने की कोई व्यवस्था नहीं कर पाती थी और प्रति वर्ष असहाय लुटती और रौंदी जाती थी। ड्यूराँ दुःख और आश्चर्य से लिखते हैं कि महमूद गजनवी से लेकर उसका बेटा मसूद गजनवी तक जब चाहे आकर भारत को लूटता-खसोटता रहा, और ज्ञान-गुण-धन संपन्न भारत कुछ नहीं कर पाता था। ड्यूराँ ने उस परिघटना पर दार्शनिक टिप्पणी की है कि सभ्यता बड़ी अनमोल चीज है। अहिंसा और शांति के मंत्र-जाप से वह नहीं बचती। उस की रक्षा के लिए सुदृढ़ व्यवस्था करनी होती है, नहीं तो मामूली बर्बर भी उसे तहस-नहस कर डालता है। क्या यह सीख आज भी हमारे लिए दुःखद रूप से सामयिक नहीं है?

दुर्भाग्य से भारत के आत्म-मुग्ध उच्च वर्ग ने इतिहास से कभी कुछ नहीं सीखने की कसम खा रखी है। हजार वर्ष पहले की छोड़ दें, पिछले सत्तर-अस्सी वर्ष का भी इतिहास यही दिखाता है कि भारतीय नेता अपनी ही मोहक बातों, परिकल्पनाओं पर फिदा होकर आश्वस्त बैठ जाते हैं। कि हम किसी का बुरा नहीं चाहते, तो हमारा कोई बुरा क्यों चाहेगा! अगर कभी ऐसा कुछ हो जाता है, तो जरूर कोई गलतफहमी है जिसे ‘बात-चीत’ से सुलझा लिया जाएगा। यही उनका पूरा राजनीतिक-दर्शन है, जो निरीहता और भोलेपन का दयनीय प्रदर्शन भर रह जाता है। इसीलिए, देसी या विदेशी, हर दुष्ट और कटिबद्ध शत्रु भारत का मान-मर्दन करता रहा है।

पिछले सत्तर साल से मुस्लिम लीग, जिन्ना, माओ, पाकिस्तान, जिहादी, नक्सली, आतंकवादी – सभी ने भारतीय जनता पर बेतरह जुल्म ढाए हैं। नेताओं समेत संपूर्ण उच्च वर्ग के पास उस का उत्तर क्या रहा है? मात्र लफ्फाजी, कभी थोड़ी देर छाती पीटना, दुनिया से शिकायत करना, और अपनी ओर से उसी रोजमर्रे के राजनीतिक-आर्थिक धंधे में लगे रहना। कहने के लिए हमारे पास संप्रभु राज्य-तंत्र, आधुनिक सेना, यहाँ तक कि अणु बम भी है। किन्तु वैसे ही जैसे मिट्टी के माधो के हाथ में तलवार! उस से कोई नहीं डरता। क्योंकि असलियत सबको मालूम है।

वही बरायनाम असलियत जिसे जानते हुए जिन्ना ने भरोसे से ‘डायरेक्ट एक्शन’ कर पाकिस्तान लिया था। जिसे जानते चीन जब चाहे हमें आँखें दिखाता है। जिसे समझकर हर तरह के संगठित अपराधी, आतंकवादी, अलगाववादी, नक्सली जहाँ चाहे हमला करते हैं। बंधक बनाते हैं, फिरौती वसूलते हैं। इन सबसे आँखें चुराते हुए भारत के अरबपति, राजनेता, विद्वान, संपादक – तमाम उच्च वर्ग – केवल अपने रुटीन धंधे-पानी में लगा रहता है। चाहे हर दिन भारत के किसी न किसी कोने पर कोई शत्रु बाहर, भीतर से हमला करता रहे, उसे पीड़ा नहीं होती। सारे बड़े, संपन्न लोग आराम से शेयर बाजार, सिनेमा, क्रिकेट, फैशन, घोटाले, गोष्ठी-सेमिनार आदि विवध काम में लगे रहते हैं। अगर किसी एक चीज की चिंता वे नहीं करते तो वह है देश के सम्मान तथा प्रजा की रक्षा। देशवासी आज भी भगवान भरोसे हैं। महमूद गजनवी के समय के धनी भारतीयों की तरह वे अन्न, धन, रेशम, जवाहरात, ज्ञान, तकनीक, आदि तो पैदा कर सकते हैं – अपनी रक्षा नहीं कर सकते।

उन्होंने इतिहास के सबक ही नहीं, रामायण, महाभारत समेत संपूर्ण भारतीय मनीषा की अनमोल शिक्षाओं की भी पूरी उपेक्षा की है। आखिर ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ या ‘टेढ़ जानि शंका सब काहू, वक्र चंद्रमा ग्रसहि न राहू’ आदि जैसी अनेक सूक्तियों का अर्थ क्या है? यही कि देश की रक्षा किसी भलमनसाहत, महात्मापन या वार्तालाप से नहीं होती। उसके लिए कटिबद्धता, सैन्य शक्ति और आवश्यकता होते ही उसका निर्मम प्रयोग अनिवार्य होता है। इस से किसी भी नाम पर बचने की कोशिश हो, तो निश्चय मानिए – आप हर तरह के आततायी को निमंत्रण दे रहे हैं।

“राजनीति में राक्षसी शक्तियाँ काम करती हैं, जो यह नहीं समझता वह राजनीति में दुधमुँहे शिशु के समान है।”- महान जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने बड़ी गंभीर बात कही थी। राक्षसी शक्तियों पर उपदेश या भलमनसाहत काम नहीं करती। किन्तु लोकमान्य तिलक, श्रीअरविन्द, सरदार पटेल जैसे कुछ अपवाद छोड़, भारतीय नेतृत्व, ऐसे शिशुओं समान ही रहा है। अन्यथा हर प्रकार के उत्पातियों के हाथों हमारी दुर्गति नहीं हो रही होती।

भारत-विभाजन पहली बड़ी दुर्गति थी, जब लाखों सुखी, संपन्न, सुशिक्षित लोग सत्य, अहिंसा की कथित राजनीति के भरोसे एकाएक मारे गए। अन्य लाखो-लाख बेघरबार हो गए। मुट्ठी भर लोगों ने दो-चार बार संगठित हिंसा कर, डरा कर भारतीय नेताओं को विभाजन के लिए तैयार कर लिया। जब विभाजन हो गया, तो भीषण पैमाने पर पूर्वी बंगाल और पश्चिमी पंजाब में कत्लेआम हुआ। दूसरी दुर्गति कश्मीर में हुई, जब संवैधानिक रूप से भारत का हिस्सा हो जाने के बाद भी उसका अकारण, अयाचित ‘अंतर्राष्ट्रीय’ समाधान कराने का भोलापन दिखाया गया। फिर, वैसे ही भोलेपन में तिब्बत जैसा मूल्यवान मध्यवर्ती (बफर) देश कम्युनिस्ट चीन को उपहार स्वरूप सौंप कर तीसरी दुर्गति की गई। मान लिया गया कि तिब्बत पाकर चीन भारत का परम मित्र हो रहेगा। जब उसी तिब्बत पर कब्जे के सहारे माओ ने भारत पर पहले छिप कर, फिर खुला हमला किया तो ‘पंचशील’ पर मोहित हमारे नेता हतप्रभ रह गए। प्रथम प्रधान मंत्री उसी सदमे से परलोक सिधारे।

राजनीतिक भोलेपन की ऐसी अंतहीन श्रृंखला केवल एक चीज दर्शाती है। कि भारतीय उच्च वर्ग के पास न राजनीति की पूरी समझ रही, न व्यवहारिक सूझ-बूझ, न साहस कि वह किसी प्रबल शत्रु का सामना कर सके। यहाँ तक कि वैचारिक सामना भी करने से वे झिझकते हैं। किसी तरह बहाने बना, दूसरों से मदद की अपेक्षा कर, अपना समय काट लेना ही हमारे नेताओं ने सीखा है। अंग्रेजों से उन्होंने सत्ता ले तो ली, किन्तु कभी तैयारी न की कि सत्ता की जिम्मेदारी भी उठाएं। सत्ता चलाने के नाम पर केवल सबसे निरापद काम, घोषणाएं, धन-वितरण, सामान्य प्रशासन आदि ही वह करते हैं। कठिन कामों से प्रायः सभी भागते हैं। यह भगोड़ापन आतंरिक और वैदेशिक, दोनों क्षेत्रों में बारं-बार दिखा है।

यह इतना नियमित है कि पूरी दुनिया हमारा राष्ट्रीय चरित्र जान गई है। माओ ने भारत को ‘मंदबुद्धि गाय’ और भारतीयों को ‘खोखले शब्दों का भंडार’ कहा था। गुलाम नबी फई के हाथों खेलने वाले हमारे बुद्धिजीवियों ने अभी क्या यही साबित नहीं किया? यह वस्तुतः हमारे राजनीतिक-बौद्धिक वर्ग की अक्षमता के ही अलग-अलग नाम हैं। नीति-निर्माण और शासन में भीरुता इसी का प्रतिबिम्ब है। जिहादियों, माओवादियों या बाहरी मिशनरियों की भारत-विरोधी गतिविधियों पर जनता क्रुद्ध होती है। किंतु शासकीय पदों पर बैठा उच्च वर्ग भोग-विलास में मगन रहता है। वह आतंकवादियों, अपराधियों, भ्रष्टाचारियों को जानते, पहचानते भी उन्हें सजा देने का साहस नहीं रखता।

लंबे समय से यह हमारी स्थाई विडंबना है। आसुरी शक्तियों, दुष्टता और अधर्म को आँख मिलाकर न देखना, उसके प्रतिकार का दृढ़ उपाय न करना, कठिन प्रश्नों पर निर्भय होकर विचार-विमर्श तक न करना – हिन्दू उच्च वर्ग की इस मूल दुर्बलता ने उन्हें संकटों का सामना करने योग्य नहीं बनने दिया है। हमारे शासक और नीति-निर्माता हमलावरों, हिंसकों की खुशामद कर के ही सदैव काम निकालना चाहते हैं।

अब तो मान लेना चाहिए कि गाँधीजी की ‘अहिंसा’ राजनीति ने हमारे उच्च वर्ग की कायरता को एक बेजोड़ ढाल देने का ही काम किया। स्वतंत्रता से पहले और बाद भी। इसीलिए वे इसका खूब ढिंढोरा पीटते हैं। इससे उन्हें अपनी चरित्र छिपाने का मुफीद उपाय दीखता है। इसी पर कवि गोपाल सिंह नेपाली ने नेताओं को फटकारते हुए लिखा था, “चरखा चलता है हाथों से, शासन चलता तलवार से।” कवि ने यह ‘ओ दिल्ली जाने वाले राही, कहना अपनी सरकार से’ के रूप में जरूरी संदेश जैसा कहा था। यह अनायास नहीं, कि ऐसे कवि, और इसके संदेश को भी सत्ताधारियों और लगभग संपूर्ण शिक्षित समाज ने भी भुला दिया है। चाहे यह उस कवि की जन्म-शती ही क्यों न हो।

पर नेपाली के शब्दों की गहरी, कड़वी सचाई बनावटी बातों से छिप नहीं सकती। जो लोग तलवार के समक्ष अहिंसा, प्रेम जैसी कोई चीज रखकर बात बदलते हैं, वे जाने-अनजाने पाखंड करते हैं। क्योंकि वे भी वस्तुतः किसी अहिंसा या प्रेम से अपना जीवन चलाने में विश्वास नहीं करते। यदि करते, तो अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस, कमांडो, प्राइवेट गार्ड आदि के नियमित प्रावधान नहीं करते। एक ओर, राजकीय एवं सैन्य तंत्र पर विराट् खर्च, दूसरी ओर बुनियादी मामलों में भी जरूरी निर्णय लेने से टाल-मटोल करते रहना – यह पाखंड के साथ-साथ भीरुता भी है। इस का प्रमाण कि जिन हाथों ने तलवार संभाल रखी है, उसके पास इसे चलाने का माद्दा नहीं है। हमारे देश की कई आंतरिक और बाह्य समस्याएं इसी कारण हैं। इसीलिए कसाब से लेकर कलमाडी, सच्चर तक बार-बार होते रहेंगे। और किस देश में ऐसे लज्जास्पद उदाहरण हैं?

राज्यकर्मियों को अतुलित सुख-सुविधाएं इसीलिए दी जाती हैं क्योंकि वह जिम्मेदारी और खतरे उठाने का काम है। जो केवल लफ्फाजी करते, अकर्मण्य बैठे, सुरक्षित रहते हैं – उन्हें कदापि राज्यकर्म में प्रवृत्त नहीं होना चाहिए। वह देश के साथ विश्वासघात है। यदि सत्ताधारी चोट खाने से डरेगा, तो गद्दी पर चाहे बना रहे, राज वह नहीं करेगा। राज दूसरे करेंगे। साहसी ही शासन कर सकते हैं। चाहे वे विदेशी हों या स्वदेशी।

आज भारत का राजनीतिक परिदृश्य इसका दुःखद प्रमाण है। पूरा राज्यकर्म मानो नगरपालिका जैसे कार्य और शेष बंदर-बाँट, झूठी बातें कहने, करने के धंधे में बदल दिया गया है। भ्रष्टाचार से लेकर आतंकवाद, सभी गड़बड़ियों में वृद्धि का यही मुख्य कारण है। चौतरफा ढिलाई, उत्तरदायित्वहीनता और भगोड़ापन बढ़ रहा है। इस घातक बीमारी को समय रहते पहचानें। याद रहेः उत्पादन और व्यापार में वृद्धि राष्ट्रीय सुरक्षा का पर्याय नहीं। अन्यथा सोने की चिड़िया क्यों लुटती?

लेखक : डॉ शंकर शरण
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• “स्वाहा” शब्द का अर्थ •

• Meaning of the word “Swaahaa” •
————————–

– स्वामी दयानन्द सरस्वती

• [संस्कृत में अर्थ] :

(स्वाहा) – अत्र स्वाहा-शब्दार्थे प्रमाणं निरुक्तकारा आहुः –

स्वाहाकृतयः, स्वाहेत्येतत्सु आहेति वा स्वा वागाहेति वा स्वं प्राहेति वा स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा। तासामेषा भवति॥

– निरु॰ अ॰ 8। खं॰ 20॥

स्वाहाशब्दस्यायमर्थः

(सु आहेति वा) सु सुष्ठु कोमलं मधुरं कल्याणकरं प्रियं वचनं सर्वैर्मनुष्यैः सदा वक्तव्यम्।

(स्वा वागाहेति वा) या ज्ञानमध्ये स्वकीया वाग्वर्त्तते, सा यदाह तदेव वागिन्द्रियेण सर्वदा वाच्यम्।

(स्वं प्राहेति वा) स्वं स्वकीयपदार्थं प्रत्येव स्वत्वं वाच्यं, न परपदार्थं प्रति चेति

(स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा) सुष्ठु रीत्या संस्कृत्य संस्कृत्य हविः सदा होतव्यमिति स्वाहाशब्दपर्य्यायार्थाः।

• [आर्यभाषा = हिंदी में अर्थ] :

(स्वाहा॰) इस शब्द का अर्थ निरुक्तकार यास्कमुनि जी ने अनेक प्रकार से कहा है। सो लिखते हैं कि –

(सु आहेति वा) सब मनुष्यों को अच्छा, मीठा, कल्याण करने वाला और प्रिय वचन सदा बोलना चाहिए।

(स्वा वागाहेति वा) अर्थात् मनुष्यों को यह निश्चय करके जानना चाहिए, कि जैसी बात उनके ज्ञान के बीच में वर्त्तमान हो, जीभ से भी सदा वैसा ही बोलें, उस से विपरीत नहीं।

(स्वं प्राहेति वा) सब मनुष्य अपने ही पदार्थ को अपना कहें, दूसरे के पदार्थ को कभी नहीं अर्थात् जितना जितना धर्मयुक्त पुरुषार्थ से उन को पदार्थ प्राप्त हो, उतने ही में सदा सन्तोष करें।

(स्वाहुतं ह॰) अर्थात् सर्व दिन अच्छी प्रकार सुगन्धादि द्रव्यों का संस्कार करके सब जगत् के उपकार करने वाले होम को किया करें और ‘स्वाहा’ शब्द का यह भी अर्थ है कि सब दिन मिथ्यावाद को छोड़ के सत्य ही बोलना चाहिए।

[स्रोत : ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथेश्वरस्तुतिप्रार्थनायाचना-समर्पणोपासनाविद्याविषयः प्रकरण]

महर्षि जी ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में भी लिखा है –

“स्वाहा’ शब्द का अर्थ यह है कि जैसा ज्ञान आत्मा में हो वैसा ही जीभ से बोले, विपरीत नहीं।”

[प्रस्तुतकर्ता: भावेश मेरजा]
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राजाराम मोहन राय ,सस्वर वेद पाठ और सती प्रथा

(राजाराम मोहन राय पर विशेष रूप से प्रचारित)

पूरे देश में सामान्यत: परन्तु बंगाल में विशेषत: सती दाह
प्रथा का ताण्डव भयंकर रूप में छाया हुआ था। यह 19 वीं
शती की घटना है।राजाराम मोहन राय ने तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक के समय में कोलकाता उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर
की।इसका पौराणिक पण्डितों ने तीव्र विरोध किया व सती दाह
प्रथा को वेदानुकूल घोषित करते हुए यह वेदमन्त्र प्रस्तुत किया-
—————–
इमा नारीरविधवा: सुपत्नीराञ्जनेन सर्पिषा सं विशंतु।
अनश्रवोऽनमीवा: सुरत्ना आरोहन्तु जनयो योनिमग्ग्रे।।
ऋग्वेद10/18/7
——–
अर्थात ये पति से युक्त स्त्रियाँ गृहकार्य में प्रवीण होकर घृतादि
पोषक भोज्य पदार्थ से शोभित हो स्वगृह में निवास करें। वे अश्रुरहित,
रोगरहित, सुन्दर रत्न युक्त एवं रम्य गुणों वाली बनाकर उत्तम सन्तानों को जन्म देने वाली स्त्रियां आदर सहित पहले गृह में प्रवेश करें (=घर में
आएं)।
——————-
बंगाल के दुष्ट व अन्धविश्वासी पण्डितों ने इस मन्त्र
को थोड़ा बदलकर न्यायालय में रखा। मन्त्र के ‘नारीरविधवा: शब्द का संधिविछेद बनता है-नारी: अविधवा:। इसे बदलकर ‘नारी विधवा कर दिया।
पदच्छेद के समय ‘र का ‘अ बना परन्तु उन्होंने ‘र को हटा ही दिया। आगे के अर्थ वही रखे-”पतिव्रता,घृतादि सुगन्धित पदार्थ से शोभित व अश्रुरहित होकर। मन्त्र के अन्त में आए शब्द ‘योनिमग्रे का अर्थ है आदरपूर्वक गृह में प्रवेश करे। इसे भी परिवर्तित करके उन्होंने इसे ‘योनिमग्ने कर दिया। जिसका अर्थ यह हो जाएगा-अग्नि में प्रवेश करे। राम मोहनराय स्वयं तो वेदों के विद्वान् न थे। अत: उन्होंने इधर-उधर सम्पर्क किया, तो पता चला कि दक्षिण भारत में कुछ पण्डित हैं, जो जटा-पाठ विधि से बोलकर इस मन्त्र का शुद्ध रूप प्रस्तुत कर सकते हैं। उन्हें बुलाया गया व उन्होंने इस मन्त्र को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा-‘नारीरविधवा: का पदच्छेद ‘नारी: अविधवा: ही बनेगा एवं ‘योनिमग्रे ही मन्त्र में है, ‘योनिमग्ने नहीं है। इस आधार पर याचिका स्वीकार की गई तथा सतीदाह कर्म पर प्रतिबन्ध लगाया गया। मिलावट पर विजय पाने की यह प्रेरक घटना है।

इस प्रकार से वेद के मन्त्रों के असत्य अर्थ निकाल कर सती प्रथा को वैदिक सिद्ध किया गया था। धन्य हैं आधुनिक भारत के विचारक राजा राममोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद जिनके प्रयासों से सती प्रथा का प्रचलन बंद हुआ।

इस मंत्र में वधु को अग्नि नहीं अपितु अग्रे अर्थात गृह में प्रवेश के समय आगे चलने को कहा गया हैं।

हमारे ऋषियों ने वेदों को कैसे सुरक्षित रखा?

(स्वामी विद्यानंद सरस्वती)

जब कोई आर्य बंधू हमारे भाइयों के ये बताने की कोशिश करता हैं की हमारे ज्यादातर ग्रंथों में मिलावट की गई है तो वो वेदों पर भी ऊँगली उठाते हैं की अगर सभी में मिलावट की गई है तो वेदों में भी किसी ने मिलावट की होगी…. मैं उन्हें बताना चाहता हूँ की हमारे ने किस तरह वेदों को सुरखित रखा… इस लेख को पूरा पढने के बाद आपको अपने भारतीय होने पे गर्व होगा की हमने ऐसे देश में और ऐसे धर्म (वैदिक ना की हिन्दू) में जन्म लिया है जो दुनिया में सबसे महान हैं…

वेदों को सुरक्षित रखने के लिए उनकी अनुपुर्वी, एक-एक शब्द और एक एक अक्षर को अपने मूल रूप में बनाये रखने के लिए जो उपाय किये गए उन्हें आज कल की गणित की भाषा में ‘Permutation and combination’ कहा जा सकता हैं.. वेद मन्त्र को स्मरण रखने और उनमे एक मात्रा का भी लोप या विपर्यास ना होने पाए इसके लिए उसे 13 प्रकार से याद किया जाता था…. याद करने के इस उपाय को दो भागों में बनता जा सकता हैं..

.. प्रकृति-पाठ और विकृति-पाठ…. प्रकृति पाठ का अर्थ हैं मन्त्र को जैसा वह है वैसा ही याद करना.
… विकृति- पाठ का अर्थ हैं उसे तोड़ तोड़ कर पदों को आगे पीछे दोहरा-दोहरा कर भिन्न-भिन्न प्रकार से याद करना..

.. याद करने के इन उपायों के 13 प्रकार निश्चित किये गए थे— संहिता-पाठ, पद-पाठ, कर्म-पाठ, जटा-पाठ, पुष्पमाला-पाठ, कर्ममाला-पाठ, शिखा-पाठ, रेखा-पाठ, दण्ड-पाठ, रथ-पाठ, ध्वज-पाठ, धन-पाठ और त्रिपद धन-पाठ…. पाठों के इन नियमों को विकृति वल्ली नमक ग्रन्थ में विस्तार से दिया गया हैं…. परिमाणत: श्रोतिय ब्राह्मणों (जिन्हें मैक्समूलर ने जीवित पुस्तकालय नाम से अभिहित किया हैं) के मुख से वेद आज भी उसी रूप में सुरक्षित हैं जिस रूप में कभी आदि ऋषिओं ने उनका उच्चारण किया होगा… विश्व के इस अदभुत आश्चर्य को देख कर एक पाश्चात्य विद्वान् ने आत्मविभोर होकर कहा था की यदि वेद की सभी मुद्रित प्रतियाँ नष्ट हो जाएँ तो भी इन ब्राह्मणों के मुख से वेद को पुनः प्राप्त किया जा सकता हैं….

मैक्समूलर ने ‘India-What can it teach us’ (प्रष्ठ 195) में लिखा हैं —- आज भी यदि वेद की रचना को कम से कम पाच हजार वर्ष (मैक्समूलर के अनुसार) हो गए हैं… भारत में ऐसे श्रोतिय मिल सकते हैं जिन्हें समूचा वैदिक साहित्य कंठस्थ हैं …. स्वयं अपने ही निवास पर मुझे ऐसे छात्रों से मिलने का सोभाग्य मिला हैं जो न केवल समूचे वेद को मौखिक पाठ कर सकते हैं वरन उनका पाठ सन्निहित सभी आरोहावरोह से पूर्ण होता हैं…. उन लोगो ने जब भी मेरे द्वारा सम्पादित संस्करणों को देखा और जहाँ कही भी उन्हें अशुद्धि मिली उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के उन अशुद्धियों की और मेरा ध्यान आकर्षित किया….

मुझे आश्चर्य होता है उनके इस आत्मविश्वास पर जिसके बल पर वे सहज ही उन अशुद्धियों को ध्यान में ला देते थे जो हमारे संस्करणों में जहाँ-तहाँ रह जाती थी…. वेदों की रक्षा के लिए किये गए इन प्रयत्नों की सराहना करते हुए मैक्समूलर ने अपने ग्रन्थ ‘Origin of Religion’ के प्रष्ठ 131 पर लिखा हैं — “The text of the Vedas has been handed down to us with such accuracy that there is hardly a various reading in the proper sense of the work or even an uncertain aspect in the whole of the Rigveda”. Regeda Vol. I part XXV में मैक्समूलर ने पुनः लिखा —- :As far as we are able to judge we can hardly speak of various readings in the Vedic hymns in the usual sense of the word. Various readings to be gathered from a collection manuscripts, now accessible to us there are none.”

वेदों को शुद्धरूप में सुरक्षा का इतना प्रबंध आरम्भ से ही कर लिया गया था की उनमे प्रक्षेप करना संभव नही था….
इन उपायों के उद्देश्य के सम्बंध में सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता डॉ.भंडारकर ने अपने ‘India Antiquary’ के सन् 1874 के अंक में लिखा था—“The object of there different arrangements is simply he most accurate preservation of the sacred text of the Vedas.
वेदों के पाठ को ज्यों का त्यों सुरक्षित रखने के लिए जो दूसरा उपाय किया गया था वह यह था की वेदों की छंद- संख्या, पद-संख्या, तथा मंत्रानुक्र्म से छंद, ऋषि, देवता को बताने के लिए उनके अनुक्रमणियां तैयार की गई जो अब भी शौनकानुक्रमणी, अनुवाकानुक्रमणी, सुक्तानुक्रमणी, आर्षानुक्रमणी, छंदोंनुक्रमणी, देवतानुक्रमणी, कात्यायनीयानुक्रमणी, सर्वानुक्रमणी, ऋग्विधान, ब्रहद्देवता, मंत्रार्षार्ध्याय, कात्यायनीय, सर्वानुक्रमणी, प्रातिशाख्यसूत्रादि, के नामों से पाई जाती हैं

….इन अनुक्रमणीयों पर विचार करते हुए मैक्समूलर ने `Ancient Sanskrit Literature’ के प्रष्ठ 117 पर लिखा है की ऋग्वेद की अनुक्रमणी से हम उनके सूक्तों और पदों की पड़ताल करके निर्भीकता से कह सकते हैं की अब भी ऋग्वेद के मन्त्रों शब्दों और पदों की वही संख्या हैं जो कभी कात्यायन के समय में थी….

इस विषय में प्रो. मैकडानल ने भी स्पष्ट लिखा हैं की आर्यों ने अति प्राचीन कल से वैदिक पाठ की शुद्धता रखने और उसे परिवर्तन अथवा नाश से बचाने के लिए असाधारण सावधानता का उपयोग किया हैं…. इसका परिणाम यह हुआ की इसे ऐसी शुद्धता के साथ रक्खा गया है जो साहित्य के इतिहास में अनुपम हैं.
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स्वामी श्रद्धानन्द और महात्मा गाँधी

स्वामी श्रद्धानन्द और महात्मा गाँधी

स्वामी श्रद्धानन्द और महात्मा गाँधी

जिन्होंने इतिहास के उन पन्नो को पलटा है, जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे थे, तब उन्होंने आर्थिक सहायता के लिये अभ्यर्थना भारत से की | उन दिनों गुरुकुल कांगड़ी में २-३ अंग्रेजी अख़बार आते थे | स्वामी श्रद्धानंद ने उन अखबारों के आधार पर गांधीजी की सहायता करने की सोची | गुरुकुल के छात्रों ने दिसम्बर की ठण्ड में गंगा किनारे कुछ श्रम कर कुछ रुपये इकठ्ठे करके ‘गुरुकुल सहायता’ के नाम से उनको भेजे |
स्वामी श्रद्धानंद आयु, ज्ञान, अनुभव तथा सेवा में गांधी से श्रेष्ठ और ज्येष्ठ तो थे ही | इस कारण गांधी उन्हें बड़े आदर से ‘बड़े भाई जी’ शब्द से सम्बोधित किया करते थे | स्वामी श्रद्धानंद कांग्रेस में देश सेवा हेतु शामिल हुए थे, परन्तु हिन्दू-मुस्लिम एकता के नाम पर मुसलमानों की चापलूसी, हिन्दू हितो की अपेक्षा, खिलाफत आन्दोलन को समर्थन, दंगो की निन्दा तक न करना, अछूतों (दलित) कहे जाने वाले ८ करोड़ हिन्दुओ के हित में कोई कदम न उठाना जैसे अनेक विषय थे जिनके कारण स्वामीजी को कांग्रेस से अलग होना पड़ा। आर्य समाज महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा गठित की गई वैदिक व समाजिक संस्था है, जो वेद के रहस्य को प्रचारित करती है। यह संस्था मुस्लिम समुदाय द्वारा देश में फैलाए जा रहे कुव्यवस्थाओं को उजागर करता रहा है। इसलिए मुसलमानों को आर्य समाज के गतिविधियाँ ख़ासकर भारत को मुस्लिम राष्ट्र घोषित करने के उनके लक्ष्य में बाधा लगता था। लिहाजा गाँधी ने मुसलमानों को खुश रखने के लिए आर्य समाज पर हमले कराने जैसे पतित कार्य को भी किया था।

यह खुलासा गोपाल गोडसे ने अपनी पुस्तक में की है। उन्होंने लिखा है कि मुस्लिम समुदाय नाराज न हो इसके लिए गाँधी किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे। आर्यसमाज ने बहुत ही सभ्य ढंग से जब गाँधी के इस घृणित कार्य का उत्तर दिया तब गाँधी ने राजनैतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके आर्य समाज को कमजोर करने के लिए षडयंत्र रचा। वास्तविकता तो यह है कि स्वामी दयानन्द सरस्वती का कोई भी अनुयायी गाँधी पथ पर नहीं चल सकता, क्योंकि दोनों की स्थितियाँ एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं, परन्तु कुछ लोग नेता बनने की इच्छा से दोहरी चाल चलते रहे। एक ओर, वे आर्यसमाजी रहे और दूसरी ओर, गाँधीवादी काँग्रेसी। इसका परिणाम यह हुआ कि जब सिन्ध में गाँधी के ईशारे पर ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर प्रतिबंध लगा तो आर्य समाज इस विषय में अधिक कुछ न कर सका।
इसलिए आर्य समाज का प्रभाव और भी कम होता गया। आर्य समाज के सदस्य पक्के देशभक्त होते हैं। लाला लाजपतराय और स्वामी श्रद्धानन्द, दो पक्के आर्य समाजी थे, परन्तु अंत तक कांग्रेस के नेता रहे। वे गाँधी के अनुयायी नहीं थे, प्रत्युत उनकी मुसलमानों का पक्ष लेने की नीति के विरोधी थे, परन्तु वे महापुरुष शांत हो चुके थे। बहुत से आर्य समाजी वैसे ही रहे जैसे कि वे थे, किन्तु प्रायः स्वार्थी लोग उनका मार्ग दर्शन करते रहे और गाँधी के कारण आर्य समाज की वह शक्ति न रही जो किसी समय थी।
अलबत्ता, गाँधी ने जिस मकसद से आर्य समाज की निन्दा की थी, उससे गाँधी मुसलमानों में उतने लोकप्रिय नहीं हुए। प्रत्युत उनके इस आचरण ने मुसलमानों को उकसा दिया और एक मुसलमान युवक ने आरोप लगाया कि यह संस्था बुरी भावना फैलाने वाली है। यह आरोप नितांत असत्य था। प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि आर्य समाज ने हिन्दू समाज में अनेक सुधार किये हैं।
आर्य समाज ने विधवा विवाह प्रारंभ किए। आर्य समाज ने जातपात को समाप्त करने के क्रांतिकारी प्रयत्न किए और हिन्दुओं की ही नहीं, प्रत्युत उनकी एकता का प्रचार किया जो आर्य समाज के सिद्धांतों को मानते हों। तत्कालीन समाचार माध्यमों, अख़बारों और गाँधी के संस्थाएँ इस बात पर पर्दा डालने में सफल रहे कि गाँधी ने आर्य समाज को कितनी हानि पहुँचाई है। देश के आम लोग भी गाँधी के महिमा मंडन में उनके राष्ट्रविरोधी कार्यों को भूल गए हैं।
१९१९ में हुए जलियांवाला कांड के कारण भयभीत जनता ने एक जुलूस निकला जिसका नेतृत्व स्वामी श्रद्धानंद कर रहे थे | जब जुलूस चांदनी चौक पहुंचा तो वहां मौजूद सेना की टुकड़ी में एक सिपाही ने बन्दूक स्वामीजी के सीने पर तान दी | स्वामीजी ने सिंहगर्जना करते हुए अपने छाती पर पड़ी चादर हटा दी और कहा “साहस है तो चलाओ गोली” लाखों की भीड़ का नेतृत्व करने वाले संन्यासी दुनिया को गरजते देख रही थी | कहते हैं इस घटना के पश्चात ३ दिनों तक पूरे दिल्ली प्रदेश में स्वामीजी का अघोषित राज कायम रहा | हिन्दू ही नही सैकड़ो मुस्लिम इस वीतराग संन्यासी के पास आते और अपनी समस्यायों का समाधान पाकर संतुष्ट होकर जाते | स्वामी श्रद्धानंद की अद्वितीय प्रभाव की खबर गांधी के कान तक पहुंचायी गयी| गांधी अपने प्रभाव की बागडोर फिसलते देखने लगे | उनमें ईर्ष्या की आग भड़क उठी | जिन्होंने गांधी के राजनैतिक क्रियाकलापों को नज़दीक से देखा है, उनका स्पष्ट कथन है कि गांधी अपने बराबर किसी अन्य नेता को उठते नही देख सकते थे | उन्होंने अपने मार्ग में आने वाले हर नेता को चाहे वो नरम दल का रहा हो या गरम दल का, उसे किसी भी प्रकार हटाकर अपना मार्ग प्रशस्त किया | और ये एक कटु सत्य है कि उनकी इस राजनीति का पहला शिकार स्वामी श्रद्धानंद ही बने थे |
दिल्ली की जामा मस्जिद के गुम्बद से स्वामीजी ने यह वेदमंत्र पढ़ा था-
“त्वं हि पिता वसो त्वं माता सखा त्वमेव । शतक्रतो बभूविथ । अधा ते सुम्नमी महे ।।”
संसार के इतिहास की ये एकलौती घटना है जब ‘एक काफ़िर’ मस्जिद के मिम्बर से वेदमंत्र का उच्चारण कर रहा था | इसके बाद मुसलमानों ने अन्य मस्जिदों में भी उनके व्याख्यान करवाये | मुसलमानों पर स्वामीजी के अमिट प्रभाव की खबर गांधी को लगी | अपनी लोकप्रियता के आड़े आते श्रद्धानंद उनको अपनी व्यक्तिगत पूजा में बाधा लगे | टर्की के बादशाह और अंग्रेजो का संघर्ष को लेकर ‘खिलाफत आन्दोलन’ जो की भारत के लिये निरर्थक था, गांधी ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिये अकारण ही ये आन्दोलन छेड़ जनशक्ति को भ्रमित किया| इससे कई नेता गांधी से असंतुष्ट होकर संघठन से अलग होने लगे | इनमे स्वामीजी भी थे | कोड़ोनाडा कांग्रेस सम्मलेन में देश के ८ करोड़ अछूतों के उद्धार की जो घृणित योजना बनी, उसके कारण भी काफी असंतोष फैला | योजना के मुताबिक अछूतों को हिन्दू और मुसलमानों में बराबर बांटने की बात कही गयी | यानि हिन्दू समाज के अभिन्न अंग करीब ४ करोड़ लोगों को सीधे सीधे इस्लाम की गोदी में सौंपने का षड़यंत्र था | ये बात स्वामीजी के लिये असहनीय थी क्यूंकि उन्होंने तो अपना जीवन ही अछूतों के उद्धार को समर्पित कर दिया था | वे कांग्रेस से सदा के लिये अलग हो गये | उनके पीछे पीछे सेठ बिड़ला और मदन मोहन मालवीयजी ने भी कांग्रेस छोड़ दी | इस घटना ने गांधी की ईर्ष्या की आग को और भड़का दिया | उन्होंने अपने पत्रों में आर्यसमाज और स्वामीजी के विरुद्ध विषवमन किया और उनके फैलाये सांप्रदायिक जाल ने आखिर अपना रंग दिखाया और २३ दिसम्बर १९२६ को स्वामी श्रद्धानंद की हत्या एक मुस्लिम के हांथो करा दी गयी | स्वामीजी की शहादत पर गांधी ने भी ऐसी वीरोचित मृत्यु की कामना की थी | वैसी मृत्यु तो खैर उनको नही मिली पर भारत के बंटवारे के कारण लाखों-करोड़ो हिन्दुओ की आँहों से भरी मृत्यु अवश्य मिली | भगवान सबकी इच्छा पूर्ण नही करता | पर स्वामीजी का बलिदान व्यर्थ नही गया | करोड़ो आर्यसमाजी सदा के लिये कांग्रेस से अलग हो गये और कांग्रेस मात्र एक सांप्रदायिक पार्टी बनकर रह गयी |samelan, marriage buero for all hindu cast, love marigge , intercast marriage , arranged marriage

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शुद्ध-पवित्र और यज्ञमय जीवन हमारा होना चाहिए।आज का वैदिक विचार,today thought,vaidik_rashtra