दोहरेपन में फँसे राष्ट्रवादी

◆ दोहरेपन में फँसे राष्ट्रवादी
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हाल में एक बड़े हिन्दू राष्ट्रवादी नेता का बयान छपा कि “कुछ तबलीगियों के काम को पूरे समुदाय का प्रतिबिंब नहीं मानना चाहिए।” जब अनुयायियों से पूछा गया कि आशय पूरी तबलीगी जमात से है या पूरा मुस्लिम समुदाय? तो चुप्पी रही। किसी ने कहा कि अखबार ने बयान विकृत करके छापा है। लेकिन जमात पर उनका आधिकारिक मूल्यांकन क्या है – इस का जवाब नहीं मिला।

यही स्थिति इस्लाम, गाँधीवाद, समाजवाद, देवबंदी आंदोलन, आदि अनेक विषयों पर है। ये सब गंभीर मुद्दे हैं जिन से भारत लंबे समय से अत्यंत प्रभावित हो रहा है। मुख्यतः हानिकारक प्रभाव। लेकिन राष्ट्रवादी सोचने की परवाह नहीं करते। तबलीगी जमात पर आज तक उन का कोई प्रस्ताव या किसी बड़े नेता का कोई लेख खोजना कठिन है, जबकि जमात सौ साल से सक्रिय है, जिस ने भारतीय मुसलमानों को घोर अलगाववाद और हिन्दू-विरोध की सीख दी है। जो दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है, जिस के कारनामे दर्जनों देशों में कुख्यात हैं, जिसे सऊदी अरब समेत कई देशों ने ‘मुस्लिम ब्रदरहुड से भी अधिक खतरनाक’ कहकर प्रतिबंधित कर रखा है, और जिस का मुख्यालय भारत में है – उस पर हिन्दू नेताओं का कोई विचार ही नहीं है!

इस से भी दु:खद उनके द्वारा दोहरी नैतिकता अपना लेना है। किसी घटना, संस्था या मतवाद पर वे कभी एक, कभी दूसरी, गोल-मोल टिप्पणी करते हैं। फलतः अधिकांश नेताओं, कार्यकर्ताओं में नासमझी या खालीपन रहता है। यह नेतृत्व के नाम पर नेतृत्वहीनता है जिस से किसी कठिन क्षण में हिन्दू समाज मारा जा सकता है। पश्चिमी पंजाब, सिंध, पूर्वी बंगाल और कश्मीर में यही हुआ था।

हमारे दोस्त-दुश्मन इन संगठनों को ‘हिन्दू’ संगठन मानते हैं, जबकि ये अपने को ‘राष्ट्रीय’ कहते हैं। उसी “सेक्यूलरिज्म” की दुहाई देते हैं जिसे नेहरूवाद, वामपंथ, इस्लामियों ने मिलकर गढ़ा है। इसलिए भी वे हिन्दू धर्म-समाज की रक्षा में खुल कर आने में हिचकते हैं। कोई विकट स्थिति उभरने पर उस का प्रतिकार करना संबंधित क्षेत्रीय आम हिन्दुओं का कर्तव्य मानते हैं। भाव कुछ यह लगता है कि हिन्दू-विरोधियों को रोकना, समझाना-बुझाना सरकार या स्थानीय हिन्दुओं का सिरदर्द है। यह हिन्दू समुदाय का नेतृत्वहीन, असहाय होना ही हुआ!

इसीलिए ऐसे संगठनों द्वारा प्राकृतिक विपदाओं में राहत कार्य करना और स्वयं प्रसन्न होना विचित्र है। क्या वे इसीलिए बने थे? उनका मूल लक्ष्य व स्वरूप राजनीतिक है। फिर उस राहत हेतु सरकार, कारपोरेट, व्यापारी, मठ-मंदिर, रेड-क्रॉस, आदि अनेक संस्थाएं पहले से हैं। वे इन राष्ट्रवादियों से सैकड़ों गुनी अधिक मात्रा में सहायता करती हैं। अकेले हजारों गुरुद्वारे सालो भर लोगों को निःशुल्क भोजन कराते हैं। पर कभी इस की फोटो दिखाते हुए आत्म-मुग्ध नहीं होते। अतः ‘मानवतावादी’ कार्य से “राष्ट्रवादी” संगठन अपना खालीपन ही छिपाते लगते हैं।

यह भी दोहरापन है कि संगठन के सत्ताधारी कोई नीति बनाकर लागू करते हैं, तो उसी समय सत्ता से बाहर दूसरे नेता उस की आलोचना में बोलते हैं। परन्तु संगठन कोई आधिकारिक स्टैंड नहीं लेता। जैसे, क्या राजा पृथ्वीराज चौहान की हत्या कराने वाले सूफी की कब्र पर चादर चढ़ाना हिन्दू संगठनों की नीति है? क्या ‘प्रोफेट मुहम्मद के रास्ते पर चलने’ की सीख, एवं ‘एक हाथ में कुरान और दूसरे में कंप्यूटर’ देना उनकी नीति है? क्या हिन्दू-निंदकों को शक्ति-सम्मान देना, तथा दुर्लभ हिन्दू मनीषियों, योद्धाओं को भी उपेक्षित बल्कि निंदित तक करना राष्ट्रवादी नीति है? शिक्षा-संस्कृति में ज्ञान का लोप और राजनीतिक दुष्प्रचार को बढ़-चढ़ सहयोग देना उनकी नीति है? नए-नए मुस्लिम संस्थान बनाना, बनवाना, परन्तु कोई हिन्दू संस्थान न बनाना, क्या उनकी नीति है? ऐसे प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं मिलता। विभिन्न राष्ट्रवादी इस पर ‘व्यक्तिगत’ विचार देते रहते हैं, जिस पर सिर मारना बेमतलब है!

हरेक कार्यकर्ता किसी विषय को जानने-समझने, सोचने-विचारने के बदले मुख्यतः अपने संगठन का बचाव करते हैं। इस के लिए अंतर्विरोधी, अनुमानित बातें बोलते हैं, किन्तु ऐसे दोहरेपन और गलत नीतियों से धर्म, समाज, देश की क्या हानि हुई? इस पर ध्यान नहीं देते। यदि संगठन से बाहर कोई दे, तो उस से भी अपेक्षा मात्र यह रहती है कि राष्ट्रवादी संगठनों, नेताओं की बड़ाई करे। यानी वही दोहरापन अपना ले। जीती मक्खी निगल ले, चाहे समाज-देश चोट खाता रहे! इस से देश का मार्गदर्शन होगा, या वह बिन पतवार नाव की तरह हिचकोले खाता रहेगा?

अधिकांश राष्ट्रवादी अपने संगठन की प्रशंसा/निंदा के सिवा दूसरों की किसी बात से स्पंदित नहीं होते। लोगों द्वारा हिन्दू धर्म, समाज, महापुरुषों पर चोट करने, या कोई मूल्यवान कार्य करने पर भी निर्विकार रहते हैं। मानो उस के प्रतिकार या प्रसार के लिए उन्हें कुछ करने की आवश्यकता नहीं! किन्तु जैसे ही किसी ने उन के संगठन की प्रशंसा/निंदा की, सभी उठ कर खड़े हो जाते हैं। यह तो केवल अपना नेतृत्व करना हुआ! अपने संगठन का, संगठन के द्वारा, संगठन के लिए। इति। बाकी समाज अपनी परवाह खुद करे। स्पष्टतः यह समाज और संगठन का बुनियादी विलगाव है! चाहे संगठन कितना भी फैलता जाए। सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की तरह।

यहाँ राष्ट्रवादियों ने मान रखा है कि केवल संगठन फैलाते जाना अपने-आप में संपूर्ण काम है। देश-समाज के लिए सोच-विचार, किसी स्थिति, समस्या का अध्ययन विश्लेषण कर सुविचारित नीति बनाना, उसे प्रकाशित कर समाज को जाग्रत करना, समाज की रक्षा हेतु सन्नद्ध रहना, संकट में आगे खड़े होना, आदि उन का काम नहीं है।

ऐसी प्रवृत्ति इस्लामी चुनौती के सामने और घातक है। क्योंकि दोहरी नैतिकता पर इस्लाम का कॉपी-राइट है। यह उसका मूल सिद्धांत है! काफिरों के लिए एक, मोमिनों के लिए दूसरी नीति। कहीं मिथ्याचार, कहीं तलवार। कभी एक बात, कभी दूसरी। इस तरह, काफिरों को गफलत में रख, उन से छूट और सहायता ले-लेकर अंततः उनका विनाश कर देना। ऐसा दोहरापन हिन्दू नहीं अपना सकता। हिन्दू धर्म-दर्शन की मूल शक्ति सत्यनिष्ठा है। अपने धर्म-स्वभाव पर टिक कर ही हिन्दू इस्लाम को हरा सकते हैं। पारंपरिक हिन्दू समाज इस्लाम का मर्म जानता है। उस में कहावत है: ‘मुसलमान बढ़े कुनेम से’। यह तो गत सौ साल से हिन्दू नेता हैं जिन्होंने गाँधीजी से मिथ्याचार, दोहरापन सीख कर हिन्दुओं को भ्रमित करने की जी-तोड़ कोशिशें कर रहे हैं। इसी से इस्लामी तबलीग को फैलने में आसानी हुई।

जबकि हिन्दू अपने नियम, सत्यनिष्ठा पर दृढ़ होकर, आम मुसलमानों को उनके मतवाद के दोहरेपन से दूर कर मानवीय नैतिकता में बनाए रख सकते थे। किन्तु उलटे हिन्दू नेताओं, बौद्धिकों ने दोहरापन अपना लिया। फलतः इस खेल में हिन्दू बुरी तरह पिट रहे हैं। क्योंकि उन के नेताओं ने स्वधर्म छोड़ कर परधर्म ओढ़ लिया। सत्यनिष्ठा के बदले दोहरापन। यह राष्ट्रवादी संगठनों की मुस्लिम नीति में साफ दिखता है। इन के बनाए “सर्वपंथ समादर मंच” और “राष्ट्रीय मुस्लिम मंच” केवल इस्लाम की चापलूसी करने वाले बन कर रह गए। इस्लामी नेताओं ने अपनी दोमुँही बातों से सहज ही उन्हें इस्लाम का आदर-प्रचार करने को विवश किया! जबकि अपना काफिर-विरोधी अभियान चालू रखा। इसीलिए “राष्ट्रीय मुस्लिम मंच” प्रोफेट मुहम्मद का जयंती-समारोह मनाता है, किन्तु श्रीनगर, मालदा या शाहीनबाग जाकर मुसलमानों को ‘ला इलाहा इलल्लाह…’ की कट्टरता और हिन्दू-विरोध से दूर करने को एक तिनका नहीं उठाता। भारत में कहीं भी हिन्दू जब अपने मुस्लिम पड़ोसियों के कारण संकट में फँसते हैं, तो “राष्ट्रीय मुस्लिम” महानुभाव वहाँ नजर नहीं आते।

राष्ट्रवादी हिन्दू संगठन अपनी ही बनाई कैद में बंदी लगते हैं। इस कैद का विस्तार कितना भी हो जाए, वह हिन्दू समाज से अलग ही रहेगा, क्योंकि दोहरापन और एकात्मता दो विपरीत स्थितियाँ हैं।

– डॉ. शंकर शरण (२८ अप्रैल २०२०)

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आदिगुरु शंकराचार्य

आदिगुरु शंकराचार्य

आदिगुरु शंकराचार्य

आदि शंकराचार्य का जन्म केरल में हुआ था. 650 ईसवी के बाद यह वो दौर था, जिसमें भारत में विशाल और स्थिर साम्राज्यों का युग समाप्त हो चला था. साम्राज्य की इच्छा रखने वाले राज्यों में निरन्तर संघर्ष और उत्थान-पतन की लीला ने भारत की राजनीतिक एकता और स्थिरता को हिलाकर रख दिया. कश्मीर, कन्नौज और गौंड के संघर्ष ने और फिर पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट नरेशों की खींचातानी ने उत्तरापथ को आंदोलित कर डाला था. ठीक वैसे ही दक्षिण में चालुक्य, पल्लव और पाण्डय शासकों की लड़ाइयों ने भारत को विचलित कर रखा था. पश्चिम से अरब सेनाओं और व्यापारियों के प्रवेश ने इस परिस्थिति में नया आयाम जोड़ दिया.

बढ़ती अराजकता और असुरक्षा के वातावरण में स्थानीय अधिकारियों और शासकों का प्रभाव बढ़ने लगा. साम्राज्य की जगह सामंती व्यवस्था आकार लेने लगी. किसानों और ग्राम पंचायतों के अधिकार अभी बरकरार थे पर यह सही है कि इस समय राजसत्ता बिखर चुकी थी. आदि शंकराचार्य के समय तक भारत में प्राचीन स्मृतियों और पुराणों का युग बीत चुका था और अनेक अप्रमाणिक ग्रंथ भी रचे जाने लगे थे. उदारवादी और कट्टर प्रवृत्तियों में टकराहट की आहटें भी सुनायी पड़ने लगी थीं. धर्म के क्षेत्र में तंत्र- मंत्र और प्रतिमा पूजन की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही थी. पुराने वैदिक देवताओं को नया रूप दिया जा रहा था और साथ ही बौद्धों के अनेक संप्रदाय भी प्रचलन में आ गए थे.

आदि शंकराचार्य के समय की धार्मिक परिस्थिति को वेद के प्रमाण को मानने वाली आस्तिक और उसे न मानने वाली नास्तिक धाराओं के संगम और संघर्ष का युग भी कहा जाता है. शंकराचार्य इसी संक्रांति काल में भारत में अवतरित हुए. उन्होंने अपने प्रखर ज्ञान और साधना के बल से तत्कालीन भारतीय समाज में धर्म के ह्रास को रोकने के लिए अनेक नास्तिक संप्रदायों का सामना कर वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा में अपना जीवन समर्पित किया.

आदि शंकराचार्य – महर्षि दयानन्द की दृष्टि में

आर्य समाज के प्रवर्त्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने 1875 ई० में पूना में दिए गए अपने प्रवचन में स्वामी शंकराचार्य को स्मरण करते हुए कहा था –

“पंचशिख और शंकराचार्य – इनका इतिहास देखना चाहिए कि उन्होंने सदा सत्य और सदुपदेश ही किए, उसी प्रकार संन्यासी मात्र को सदुपदेश करना चाहिए ।”

(‘उपदेश-मंजरी’ अथवा ‘पूना-प्रवचन’, तीसरा प्रवचन)

पूना में ही दिए गए अपने एक अन्य प्रवचन में महर्षि ने कहा –

“इनके पश्चात् श्रीयुत गौड़पादाचार्य के प्रसिद्ध शिष्य स्वामी शंकराचार्य जी प्रादुर्भूत हुए । शंकर स्वामी वेद-मार्ग और वर्णाश्रम धर्म के मानने वाले थे । उनकी योग्यता कैसी उच्च कक्षा की थी, यह उनके बनाये शारीरक भाष्य से विदित होता है । शंकर स्वामी के समय में जो अनेक पाखण्ड मत चले थे और जिनका कि उन्होंने खण्डन किया है, वह ‘शंकर-दिग्विजय’ के निम्नलिखित श्लोक से प्रकट होते हैं –

🌹श्लोक🌹

‘शाक्तैः पशुपतैरपि क्षपणकैः कापालिकैर्वैष्णवै-
रन्यैरप्यखिलेः खलु खलैर्दुर्वादिभिर्वैदिकम् ॥’

इससे अनुमान किया जा सकता है कि श्रीमान् स्वामी शंकराचार्य ने वेद-विरुद्ध मतों के खण्डन में कितना उद्योग किया है ।”

(‘उपदेश-मंजरी’ अथवा ‘पूना-प्रवचन’, बारहवां प्रवचन)

‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ ग्रन्थ के ‘वेदनित्यत्वविचारः’ प्रकरण में महर्षि दयानन्द ने वेदान्त दर्शन का ‘शास्त्र्योनित्वात्’ (1.1.3) सूत्र प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है ।

वहां महर्षि ने इस सूत्र का संस्कृत में ‘अस्यायमर्थ…’ और हिन्दी में ‘इस सूत्र के अर्थ में शंकराचार्य ने भी वेदों को नित्य मान के व्याख्यान किया है कि …’ – ऐसा लिखकर जो अर्थ प्रस्तुत किया है वह स्वामी शंकराचार्य जी के वेदान्त दर्शन के भाष्य से ही लिया गया है ।

महर्षि दयानन्द ने ‘सत्यार्थप्रकाश’ के ग्यारहवें समुल्लास में स्वामी शंकराचार्य के सम्बन्ध में निम्न बातें लिखी हैं –

(1) शंकराचार्य बाईस सौ (आज से लगभग तेईस सौ) वर्ष पूर्व हुए ।

(2) वे द्रविड़ देशोत्पन्न ब्राह्मण थे ।

(3) उन्होंने ब्रह्मचर्य से व्याकरणादि सब शास्त्रों को पढ़ा था ।

(4) वे सोचते थे कि सत्य आस्तिक वेद मत का छूटना और जैन नास्तिक मत का चलना बड़ी हानि की बात हुई है । वे जैन – नास्तिक मत को हटाना चाहते थे ।

(5) शंकराचार्य शास्त्र तो पढ़े ही थे, परन्तु उन्होंने जैन मत के ग्रन्थ भी पढ़े थे ।

(6) शंकराचार्य की युक्ति भी बहुत प्रबल थी ।

(7) उन्होंने जैन पण्डितों से शास्त्रार्थ किया । जिसमें उनका पक्ष वेद मत का स्थापन और जैनियों के मत का खण्डन था ।

(8) जैन पण्डितों के विरुद्ध शंकराचार्य का मत था कि – ‘अनादि सिद्ध परमात्मा ही जगत् का कर्ता है । यह जगत् और जीव झूठा है, क्योंकि उस परमेश्वर ने अपनी माया से जगत् बनाया है, वही धारण और प्रलय कर्ता है । और यह जीव और प्रपंच (जगत्) स्वप्नवत् है । परमेश्वर आप ही सब रूप होकर लीला कर रहा है ।’ शास्त्रार्थ में शंकराचार्य का मत अखण्डित रहा । जैन मत का पराजय हुआ ।

(9) शंकराचार्य ने दस वर्ष के भीतर आर्यावर्त में सर्वत्र घूमकर जैनियों का खण्डन और वेदों का मण्डन किया ।… उसी समय से सब के यज्ञोपवीत होने लगे और वेदों का पठन-पाठन भी चला ।

(10) शंकराचार्य के पूर्व शैवमत भी थोड़ा-सा प्रचलित था, उसका भी उन्होंने खण्डन किया । उन्होंने वाममार्ग का भी खण्डन किया ।

(11) जब वेद मत का स्थापन हो चुका और विद्या-प्रचार करने का विचार करते ही थे, उतने में शंकराचार्य का शरीर छूट गया । शंकराचार्य जिन दो व्यक्तियों पर अति प्रसन्न थे ऐसे दो कपटमुनिओं ने उन्हें ऐसी विषयुक्त वस्तु खिलाई कि छः महीने के भीतर उनका शरीर छूट गया ।

(12) शंकराचार्य के देहावसान से सब लोग निरुत्साही हो गये और जो विद्या का प्रचार होने वाला था, वह भी न हो पाया ।

(13) शंकराचार्य ने जो-जो शारीरक भाष्यादि बनाये थे उनके शिष्य उनका प्रचार करने लगे अर्थात् शंकराचार्य ने जो जैनियों के खण्डन के लिए ‘ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या’ और ‘जीव-ब्रह्म की एकता’ कथन की थी, उसका उपदेश उनके शिष्य लोग करने लगे ।

(14) इसमें विचारना चाहिए कि जो ‘जीव-ब्रह्म की एकता’ और ‘जगत् मिथ्या’ – यह शंकराचार्य का निज मत था तो वह अच्छा मत नहीं; और जो जैनियों के खण्डन के लिए शंकराचार्य ने उस मत का स्वीकार किया हो तो कुछ अच्छा है ।

(15) अनुमान है कि शंकराचार्य आदि ने तो जैनियों के मत के खण्डन करने ही के लिए यह मत (‘जीव-ब्रह्म की एकता’ और ‘जगत् मिथ्या’) स्वीकार किया हो; क्योंकि देश-काल के अनुकूल अपने पक्ष को सिद्ध करने के लिए बहुत-से स्वार्थी विद्वान् अपने आत्मा के ज्ञान से विरुद्ध भी कर लेते हैं । और जो शंकराचार्य इन बातों को अर्थात् ‘जीव-ब्रह्म की एकता’ और ‘जगत् मिथ्या’ – आदि व्यवहार सच्चा ही मानते थे तो उनकी बात सच्ची नहीं हो सकती ।

अन्य ध्यातव्य तथ्य :

(1) महर्षि ने सत्यार्थ प्रकाश में ‘नवीन-वेदान्त’ (अर्थात् ‘जीव-ब्रह्म की एकता’ और ‘जगत् मिथ्या’ आदि मानने वालों की विचारधारा ) का सर्वाधिक खण्डन किया है – मूर्तिपूजा के खण्डन से भी अधिक ! उन्होंने 7वें, 8वें, 9वें और 11वें – इन चार समुल्लासों में नवीन वेदान्त (अथवा मायावाद, शांकर मत आदि) का खण्डन किया है ।

(2) महर्षि ने नवीन वेदान्त के खण्डन में ‘वेदान्ति-ध्वान्त-निवारण’ नामका एक स्वतन्त्र लघु ग्रन्थ लिखा है । इस ग्रन्थ में शांकर मत का खण्डन किया गया है, परन्तु उसमें उन्होंने शंकराचार्य के नाम का कहीं पर भी उल्लेख नहीं किया है ।

(3) वेदान्त दर्शन के मान्य – प्रामाणिक भाष्य के रूप में अथवा पठन-पाठन के लिए मान्य ग्रन्थों की सूची में महर्षि ने शंकराचार्य कृत किसी भी ग्रन्थ या भाष्य का समावेश नहीं किया है ।

(4) महर्षि ने अपने किसी भी ग्रन्थ में शंकराचार्य के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में कहीं पर भी नकारात्मक टीका-टिप्पणी नहीं की है ।

(5) महर्षि के जीवन-चरित्र और उनके ग्रन्थों एवं शास्त्रार्थों के अनुशीलन करने से तथा उनके धर्मान्दोलन के स्वरूप और शैली पर विचार करने से हमें उन पर कहीं-न-कहीं शंकराचार्य का प्रभाव अवश्य दृष्टिगत होता है ।

(6) आर्य समाज के प्रसिद्ध विद्वान् स्वामी श्री विद्यानन्द जी सरस्वती रचित ‘आदि शंकराचार्य वेदान्ती नहीं थे’ ग्रन्थ पठनीय है ।

ऐसे दिव्य महापुरुष,वेदों के उच्च विद्वान, महान सन्यासी, भारत में पुनः वैदिक धर्म को स्थापित करने वाले महान आदिगुरु शंकराचार्य जी को नमन !!

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मातृभूमि प्रेम

मातृभूमि प्रेम

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जापान का एक चित्रकार भगवान बुद्ध के जीवन के अनूठे प्रसंगों को

अपनी तूलिका से चित्रित करने के उद्देश्य सारनाथ आया हुआ था।

वह बुद्ध के प्रसंगों को दीवारों पर अंकित करने के कार्य में दिन भर

मनोयोग से जुटा रहता रात के समय बटलोई में

कुछ चावल, दाल और आलू डालकर अपने लिए खिचड़ी बना लेता

एक दिन एक बौद्ध ने उसे एक डिब्बे में से चावल के कुछ दाने निकालकर

चावलों में मिलाते हुए देखा ।

उसने पूछा, ‘क्या चावल इन दानों में कोई विशेषता है, जो तुमने डिब्बे में निकालकर मिलाए

चित्रकार ने उत्तर दिया, ‘बंधु चावल के ये दाने मेरे देश जापान में उपजे हैं।

मैं इन्हें मातृभूमि का पवित्र प्रसाद मानकर प्रतिदिन अपने भोजन में मिला लेता हूं

इस माध्यम से मैं अपनी मातृभूमि से जुड़ा महसूस करता हूं।

बौद्ध भिक्षु जापानी चित्रकार का मातृभूमि प्रेम देखकर हतप्रभ रह गया

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यम-नियम

यम-नियम

यम-नियम

साभार -धर्म शिक्षा

लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

यम-नियम – परमात्मा की प्राप्ति का साधन है

महर्षि पतञ्जलि ने योगदर्शन में अष्टाङ्गयोग (योग के आत अडों) का वर्णन किया है। उनमें प्रारम्भ के दो अङ्ग यम और नियम हैं।

ये दोनों अङ्ग दिव्य मानव जीवन आवश्यक हैं, अतः उनका वर्णन यहाँ दिया जा रहा हे

यम पाँच हैं

१. अहिंसा-मन, वचन, कर्म से किसी प्राणी के प्रति वैर की भावना न रखना

२. सत्य-मन, वचन, कर्म से सत्य का पालन करना।

३. अस्तेय-चोरी न करना। बिना स्वामी आज्ञा के किसी पदार्थ को न उठाना।

४. ब्रह्मचर्य-ईश्वर में विचरण करना, वेदअध्ययन करना, ज्ञानोपार्जन और वीर्य की रक्षा करना

५. अपरिग्रह-अभिमानी न होना और पदार्थों का आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना।

नियम भी पाँच हैं

१. शौच-बाहर और भीतर की पवित्रता रखना।

२. सन्तोष-अपनी शक्ति के अनुसार प्रबल पुरुषार्थ करना और उस पुरुषार्थ से जो फल मिले उसमें सन्तुष्ट रहना।

३. तपः-गर्मी-सर्दी, भूख-प्यास, हानि-लाभ, मान-अपमान, निन्दा-स्तुति में सम रहना, शोक और हर्ष से ऊपर उठना। . वेदादि

. ४. स्वाध्याय-जीवन को ऊँचा उठाने वाले वेदादि शास्त्रों का अध्ययन करनाओम् का जप करना और ‘मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, कहाँ जाना -इन तत्त्वों पर विचार करना

५. ईश्वरप्रणिधान-अपने-आपको ईश्वर के अर्पित कर देना।

प्रभु की आज्ञा में चलना, उसकी आज्ञा के विरुद्ध कोई भी कार्य न करना। वैयक्तिक और सामाजिक उन्नति के लिए यमनियमों का पालन आवश्यक है। ये सार्वभौम महाव्रत हे |

साभार -धर्म शिक्षा

लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

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क्या सीता की अग्नि परीक्षा हुई थी।

आओ इस रहस्य को भी जाने रामायण के प्रमाणों के साथ

क्या सीता की अग्नि परीक्षा हुई थी।

अग्निपरीक्षा के प्रसंग में पौराणिक पंडितों ने काफी मिलावट की है मगर बारीकी से अवलोकन करने से यह विदित होता है कि श्री राम ने समस्त विश्व के आंगन में मां सीता के पवित्र चरित्र को सिद्ध करने के लिए ऐसा किया था इस वर्णन में संक्षेप में है कि जब विभीषण ने मां सीता को अलंकृत करके श्रीराम की सेवा में भेजा तब श्री राम ने उनको कहा कि तुम बहुत समय तक राक्षस के घर में रह कर आई हो अतः मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर सकता तुम चाहो तो सुग्रीव लक्ष्मण या विभीषण के यहां रहो या जहां इच्छा हो वहां जाओ परंतु मैं तुम्हें ग्रहण नहीं करूंगा ऐसा आप स्वयं का अपमान होते देख मां सीता ने ओजस्वी वाणी में श्रीराम को उत्तर दिया उसके बाद उन्होंने अपने पति द्वारा त्यागे जाने पर चिता में भस्म होने का निश्चय किया उनके आदेश पर लक्ष्मण ने चिता सजा दी जब मां सीता सीता की अग्नि की परिक्रमा करते हुए जैसे ही उसने प्रवेश करने वाली थी श्री रामचंद्र ने उनको रोक लिया पता तथा सबके सामने उनके पवित्र होने की साक्षी दी यदि वह ऐसा नहीं करते तो लोगापवाद हो जाता कि रघुकुल नंदन राम अत्यंत कामी व्यक्ति है जिसने दूसरे के यहां आ रही अपनी स्त्री को ऐसे ही स्वीकार कर लिया। अतः यह आवश्यक था।
अग्नि का गुण है कि चाहे जो भी हो,वह उसे जला देती है।फिर चाहे मां सीता हो या अन्य कोई स्त्री उसका अग्नि में जलना अवश्यंभावी है। जिस स्त्री को अग्नि ना जला पाए वह पतिव्रता है -यह कदापि संभव नहीं है , तथा हास्यास्पद,बुद्धिविरुद्ध बात है।यह अग्नि का धर्म है कि उसमें प्रवेश करने वाला हर व्यक्ति जलता है ।पुराणों में तो होलि का नाम की राक्षसी का उल्लेख है ।उसे भी अग्नि में ना जलने का वरदान था ।तो क्या इसे वह प्रति पतिव्रता हो जाएगी?? दरअसल अपने पति द्वारा त्यागी जाने पर मां सीता ने अपने प्राणों को तिनके की तरह त्यागने का निश्चय किया।उनके अग्निसमाधि लेने के निश्चय से सिद्ध हो गया कि श्री राम के सिवा उनके मन में सपने में भी किसी अन्य पुरुष की प्रति (पति समान)प्रेम भाव नहीं था। अतः मां सीता को चिता के पास जाने से रोक कर श्रीराम ने समस्त विश्व के सामने उनकी पवित्रता को प्रमाणित कर दिया जो स्त्री अपने पति द्वारा त्यागे जाने पर एक क्षण भी जीना पसंद नहीं करती तथा अपने शरीर को अग्नि में झुककर मरना चाहती है उसका चरित्र अवश्य ही असंदिग्ध एवं परम पवित्र है इस तथ्य से मां सीता का चरित्र पावनतम था। ✍🏻 कार्तिक अय्यर

(अधिक जानकारी के लिये आर्यसमाज के विद्वान आर्यमुनिजी व स्वामी जगदीश्वरानंदकृत रामायण की टीका को पढ़ें)

[ स्वामी जगदीश्वरानंदकृत वाल्मीकि रामायण की टीका ]
🔥 तां तु पार्श्वैस्थितां प्रह्मां रामः सम्रक्ष्ये मैथिलीम् । हृदयान्तर्गतक्रोधो व्याहतुमुपचक्रमे ॥
लज्जा के कारण सिर झुकाए सीता को अपने निकट खड़ी देख श्रीराम ने अपने हृदयान्तर्गत क्रोध को प्रकट करना प्रारम्भ किया।

🔥 एषाऽसि निर्जिता भद्र शत्रु जित्वा मया रणे।
पौरुषाद्यदनुष्ठेयं तदेतदुपादितम् ।।
वे कहने लगे — हे भद्र ! मैंने युद्ध में शत्रु को परास्त कर तुम्हें पुन : प्राप्त कर लिया । पुरुषार्थ से जो कुछ किया जा सकता था वह मैंने कर दिखाया ।

🔥 गतोऽस्म्यन्तममर्षस्य धर्षणा सम्प्रमार्जिता ।
अवमानश्च शत्रुश्च मया युगपदुद्धृतौ ।।
अब मेरे क्रोध का अन्त हो गया है । रावण ने तुम्हारा अपहरण कर मुझे जो नीचा दिखाया था उसका बदला भी मैंने ले लिया है । मैंने तिरस्कार और तिरस्कार करनेवाला शत्रु दोनों को एक साथ उखाड़ फेंका है ।

🔥 अद्यि मे पौरुषं दृष्टमद्य मे सफल: श्रम: ।
अद्य तीर्णप्रतिज्ञत्वात् प्रभवामीह चात्मन: ॥
आज लोगों ने मेरा पराक्रम देख लिया । आज मेरा सारा परिश्रम सफल हो गया । आज मैं रावण का वध करके तुम्हें पाने की प्रतिज्ञा से पार हो गया और आज मैं स्वतन्त्र हो गया ।

🔥 यां त्वं विरहिता नीता चलचित्तेन राक्षसा ।
दैवसम्पादितो दोषी मानुषेण मया जितः ॥
मेरी अनुपस्थिति में चश्चल चित्त रावण तुम्हारा अपहरण कर तुम्हें पश्चवटी से यहाँ ले आया था । उस देवकृत अपमान को मैंने अपने प्रयत्न से दूर कर दिया ।

🔥 यत्कर्तव्यं मनुष्येण धर्षणां परिमार्जता ।
तत्कृतं सकलं सीते मयेदं मानकाङ्क्षिणा ॥
हे सीते ! देखो , अपना अपमान दूर करने के लिए मनुष्य को जो कुछ करना उचित है वह सब मैंने रावण को मारकर कर दिखाया।

🔥 विदितश्चास्तु ते भद्रे योऽयं रणपरिश्रम: ।
स तीर्ण: सुहृदां वीर्यान्न त्वदर्थ मया कृतः ॥
परन्तु हे भद्र ! तुम्हें यह भी जान लेना चाहिए कि मैंने इष्ट – मित्रों के बल – पराक्रम से युद्ध में जो विजय प्राप्त की है , यह परिश्रम तुम्हारे लिए नहीं किया है ।

🔥 रक्षता तु मया वृत्तमपवादं च सर्वश: ।
प्रख्यातस्यात्मवंशस्य न्यङ्ग च परिक्षता ।।
रावण को मारकर मैंने अपने चरित्र की रक्षा की है और अपनी बदनामी को बचाया है तथा अपने विख्यात वंश के अपयश को धो डाला है ।

🔥 प्राप्तचारित्रसन्देहा मम प्रतिमुखे स्थिता ।
दीपो नेत्रातुरस्येव प्रतिकूलासि मे दृढा ॥
हे सीते ! मुझे तुम्हारे चरित्र में सन्देह उत्पन्न हो गया है , अत : तुम मेरे समक्ष खड़ी हुई मेरे लिए उसी प्रकार असह्य हो रही हो जिस प्रकार नेत्ररोग से पीड़ित मनुष्य को सामने रखा हुआ दीपक असह्य जान पड़ता है

🔥 तद्गच्छ ह्यभ्यनुज्ञाता यथेष्टं जनकात्मजे।
एता दश दिशो भद्रे कार्यमस्ति न मे त्वया ॥
हे जनकदुलारी ! ये दसों दिशाएँ तुम्हारे लिए खुली पड़ी हैं । मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि जिधर तुम्हारी इच्छा हो तुम उधर चली जाओ । मुझे तुमसे अब कोई प्रयोजन नहीं है ।

🔥 कः पुमान् हि कुले जातः स्त्रियं परगृहोषिताम् ।
तेजस्वी पुरादद्यात् सुहृल्लेखेन चेतसा ॥
हे सीते ! ऐसा कौन तेजस्वी पुरुष होगा जो उच्चकुल में उत्पन्न होकर दूसरे के घर में रही हुई स्त्री को सुहृद समझकर ( अपनी समझकर ) फिर स्वीकार कर लेगा ?

🔥 रावणङ्कपरिभ्रष्टां दृष्टां दूष्टेन चक्षुषा ।
कथ त्वां पुनरादद्यां कुल व्यपदिशन् महत् ॥
रावण की गोद में बैठने के कारण भ्रष्ट और उसकी कुदृष्टि से देखी हुई तुमको — इतने बड़े कुल में उत्पन्न होकर , मैं भला किस प्रकार ग्रहण कर सकता हूँ ?

🔥 यदर्थं निर्जिता मे त्वं यश : प्रत्याह्रतं मया ।
नास्ति मे त्वय्यभिष्वङ्गो यथेष्टं गम्यतामितः ।।
जिस कीर्ति के लिए मैंने तुम्हारा उद्धार किया था वह मुझे प्राप्त हो गई । अब मुझे तुमसे कोई प्रयोजन नहीं है । अब तुम जहाँ चाहो वहाँ जा सकती हो ।

🔥 इति प्रव्याहृतं भद्र मयैतत् कृतबुद्धिना ।
लक्ष्मणे भरते वा त्वं कुरु बुद्धिं यथा सुखम् ।।
🔥 सुग्रीवे वानरेन्द्रे वा राक्षसेन्द्रे विभीषणे ।
निवेशय मनः सीते यथा वा सुखमात्मना ॥
हे भद्रे ! मैंने यह बात सोच – विचार कर ही तुमसे कही है । लक्षमण , भरत , वानरेन्द्र सुग्रीव अथवा राक्षसेन्द्र विभीषण में से जिसके यहाँ रहना तुम पसन्द करो अथवा जहाँ तुम्हें सुख मिलने की आशा हो तुम वहाँ रह सकती हो ।

🔥 एवमुक्ता तु वैदेही परूषं रोमहर्षणम् ।
राघवेण सरोषेण भृशं प्रव्यथिताऽभवत् ॥
जब श्रीराम ने कुद्ध होकर इस प्रकार के कठोर और रोमांचकारी वचन कहे तब सीताजी अत्यन्त व्यथित हुई ।

🔥 ततो बाष्पपरिक्लिष्टिं प्रमार्जन्ती स्वमाननम् ।
शनैर्गद्गदया वाचा भतरिमिदमब्रवीत् ॥
तब आसुंओं से भरे अपने मुख को पोंछती हुई सीता गद्गद वाणी से धीरे – धीरे अपने पति से यह बोली

🔥 किं मामसदृशं वाक्यमीदृशं श्रोत्रदारुणम् ।
रूक्षं श्रावयसे वीर प्राकृत: प्राकृतामिव ॥
हे वीर ! तुम ऐसी अनुचित , कर्णकटु और रूखी बातें मुझसे उसी प्रकार क्यों कह रहे हो जैसे गंवार मनुष्य अपनी गंवार स्त्री से कहा करते हैं ?

🔥 न तथाऽस्मि महाबाहो यथा त्वमवगच्छसि ।
प्रत्ययं गच्छ मे स्वेन चारित्रेणैव ते शपे ॥
हे महाबाहो ! आपने मुझे जैसा समझ रखा है मैं वैसी नहीं हूँ । मैं अपने पतिव्रत धर्म की शपथ खाकर कहती हूँ , मेरे ऊपर विश्वास करो

🔥 पृथक्स्त्रीणां प्रचारेण जातिं त्वं परिशङ्कसे ।
परित्यजेमां शङ्कां तु यदि तेऽहं परीक्षिता ॥
गाँवार स्त्रियों के चरित्र से सारी – की – सारी स्त्री जाति के ऊपर सन्देह करना उचित नहीं है । यदि आप मेरे स्वभाव से परिचित हैं तो मेरे चरित्र के सम्बन्ध में अपने मन को संदेह को दूर कर दो ।

🔥 यद्यहं गात्रसंस्पर्श गतास्मि विवशा प्रभो ।
कामकारो न मे तत्र दैवं तत्रापराध्यति ॥
हे स्वामिन् ! जिस समय रावण ने मुझे पकड़ा था उस समय उसने मेरा शरीर अवश्य स्पर्श किया था , परन्तु तब मैं विवश थी , मेरी इच्छा से उसने मेरा शरीर नहीं छुआ था । इसमें मेरा कोई दोष नहीं । यह तो भाग्यवश ही हुआ ।

🔥 मदधीनं तु यत्तन्मे हृदयं त्वयि वर्तते ।
पराधीनेषु गात्रेषु किं करिष्याम्यनीश्वरी ॥
मेरे आपमें ही अधीन तो मेरा अपना मन है , वह लगा रहता है ( उसे कोई छू नहीं सकता ) । मेरा शरीर पराधीन था । उस अवस्था में परवशा मैं क्या कर सकती थी ?

🔥 सह संवृद्धभावाच्य संसर्गेण च मानद ।
यद्यहं ते न विज्ञाता हता तेनास्मि शाश्वतम् ॥ ८ ॥
हे मानप्रद ! इतने दिनों साथ रहने पर भी , साथ ही साथ पालन और पोषण होने पर भी यदि आप मेरे भावों को नहीं जान पाये तो मैं सदा के लिए ही मार डाली गई ।

🔥 त्वया तु नरशार्दूल क्रोधमेवानुवर्तता
लघुनेव मनुष्येणा स्त्रीत्वमेव पुरस्कृतम् ॥
हे नरशार्दूल ! तुमने ओछे मनुष्यों की भाँति क्रोध के वशीभूत होकर मुझे भी साधारण स्त्रियों के समान समझ लिया ।

🔥 न प्रमाणीकृत : पाणिर्बाल्ये बालेन पीडितः ।
मम भक्तिश्व शील च सर्व ते पृष्ठतः कृतम् ॥
विवाह के समय तुमने मेरा जो हाथ पकड़ा था उसका भी कोई प्रमाण नहीं माना और आपके प्रति मेरी भक्ति और मेरे शील की ओर से भी आपने अपना मुँह फेर लिया ।

🔥 एवं ब्रुवाणा रुदती बाष्यगदगदभाषिणी ।
अब्रवीलक्ष्मण सीता दीनं ध्यानपरं स्थितम् ॥
ऐसा कहकर रोती और आँसू बहाती हुई सीता गद्गद होकर लक्ष्मणजी से , जो उस समय उदास हो , एकाग्र मन से कुछ सोच रहे थे बोली —

🔥 चितां मे कुरु सौमित्रे व्यसनस्यास्य भेषजम् ।
मिथ्योपघातोपहता नाहं जीवितुमुत्सहे ॥
हे लक्ष्मण ! इस मिथ्यापवाद से पीड़ित हो मैं अब जीना नहीं चाहती , अत : तुम मेरे लिए चिता तैयार करो , क्योंकि ऐसे रोग की एकमात्र यही औषध है ।

🔥 अप्रीतस्य गुणैर्भर्तुस्यताया जलसंसदि ।
या क्षमा मे गतिर्गन्तुं प्रवेक्ष्ये हव्यवाहनम् ॥
मेरे गुणों से अप्रसन्न होकर सब लोगों के समक्ष मेरे पति ने मेरा परित्याग कर दिया है , अत : अब मेरे लिए यही उचित है कि मैं अग्रि में भस्म हो जाऊ

🔥 एवमुक्तस्तु वैदेह्मा लक्ष्मण: परवीरहा ।
अमर्षवशमापन्नो राघवाननमैक्षत ॥
जब सीताजी ने शत्रुसंहारक लक्ष्मणजी से ऐसा कहा तब लक्ष्मणजी ने क्रोध में भरकर श्रीरामचन्द्रजी के मुख की ओर ( उनका अभिप्राय जानने के लिए ) देखा ।

🔥 स विज्ञाय मनश्छन्दं रामस्याकारसूचितम् ।
चितां चकार सौमित्रिर्मते रामस्य वीर्यवान् ॥
श्रीराम की मुखाकृति से लक्ष्मण ने जान लिया कि उनका भी यही अभिप्राय है , अत: महापराक्रमी श्रीराम के आदेशानुसार उन्होंने चिता बनाकर तैयार कर दी ।

🔥 अधोमुखं तदा रामं शनैः कृत्वा प्रदक्षिणम् ।
उपासर्पत वैदेही दीप्यमानं हुताशनम्॥
चिता तैयार होने पर सीताजी ने नीचे की ओर मुख किये हुए धीरे – धीरे श्रीराम की प्रदक्षिणा की । तत्पश्चात् वे धधकती हुई अग्रि के निकट आई ।

🔥 प्रणम्य दैवतेभ्यश्च ब्राह्मणोभ्यश्च मैथिली ।
बद्धाङ्जलिपुटा चेदमुवाचाग्निसमीपत: ॥
सीताजी ने विद्वानों और ब्राह्मणों को प्रणाम कर अग्रि के पास खड़े होकर तथा हाथ जोड़कर यह कहा

🔥 यथा मे हृदयं नित्यं नापसर्पति राघवात् ।
तथा लोकस्य साक्षी मां सर्वतः पातु पावक : ॥
जिस प्रकार मेरा तन श्रीराम की ओर से कभी चलायमान नहीं हुआ उसी प्रकार सब लोगों के साक्षी अग्रिदेव सब प्रकार से मेरी रक्षा करें ।

🔥 कर्मणा मनसा वाचा यथा नातिचराम्यहम् ।
राघवं सर्वधर्मज्ञं तथा मां पातु पावक : ॥
मन , वचन और कर्म से यदि मैं सर्वधर्मज्ञ श्रीराम को छोड़ अन्य किसी को पतिरूप में न जानती होऊँ तो अग्रिदेव मेरी रक्षा करें ।

🔥 एवमुक्त्वा तु वैदेही परिक्रम्य हुताशनम् ।
उद्यतोऽभूत् प्रवेष्टु तं निस्सङे्गनान्तरात्मना ॥
ऐसा कहकर चिता की परिक्रमा कर तथा अपने अग्रि में शरीर की तनिक भी परवाह न कर सीता कूदने के लिए उद्यत हुई ।

🔥 जन: स सुमहांस्त्रसतो बालवृद्धसमाकुल : ।
ददर्श मैथिलीं तत्र प्रविशन्तीं हुताशनम् ॥
उधर जब वहाँ उपस्थित बालक और बूढ़ों ने सीताजी को अग्रि में प्रविष्ट होते ( प्रविष्ट होने के लिए उद्यत देखा ) देखा तब वे सब भयभीत हो गये ।

🔥 तदा प्रीतमना रामो प्रविशन्तीं हुताशनम् ।
वारयित्वा तु वैदेहीमुवाच हरिराक्षसान् ll
सीताजी को अग्रि में कूदने के लिए तैयार देख श्रीराम ने प्रसन्न होकर ( उनकी शुद्धता के कारण ) उन्हें ऐसा करने से रोका और फिर वे वहाँ उपस्थित वानर और राक्षसों से कहने लगे

🔥 अवश्यं त्रिषु लोकेषु न सीता पापमर्हति ।
दीर्घकालोषिता हीयं रावणान्तःपुरे शुभा ॥
निश्चय ही सीताजी तीनों लोकों में शुद्ध एवं पवित्र हैं , परन्तु यह सौभाग्यवती बहुत दिनों तक रावण की अशोकवाटिका में रही हैं।

🔥 बालिश: खलु कामात्मा रामो दशरथात्मज: ।
इति वक्ष्यन्ति मां सन्तो जानकीमविशोध्य हि ॥
यदि मैं सीताजी की शुद्धता की परीक्षा न कराता तो सब लोग यही कहते कि महाराज दशरथ के पुत्र राम बड़े कामी और मूर्ख हैं ।

🔥 अनन्यहृदयां भक्तां मच्चित्तपरिवर्तिनीम् ।
अहमप्यवगच्छामि मैथिलीं जनकात्मजाम् ॥
मैं जानता हूँ कि सीता मुझमें अनन्य अनुराग रखती है , सीताजी मुझे छोड़कर अपने मन में अन्य किसी को स्थान नहीं दे सकतीं ।

🔥 अनन्या हि मया सीता भास्करेण प्रभा यथा ।
न हि हातुमियं शक्या कीर्तिरात्मवता यथा ॥
सीता मुझमें ही अनन्यरूप से अनुरागवती है – मुझसे अभिन्न है जैसे प्रभा सूर्य से । मैं भी इन्हें वैसे ही नहीं त्याग सकता जैसे यशस्वी पुरुष अपनी कीर्ति को नहीं त्याग सकता ।

📚 जय आर्य जय आर्यावर्त
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उपदेश_शिक्षा किसे देवें

उपदेश_शिक्षा किसे देवें ,चाणक्य नीति

साभार -चाणक्य नीति दर्पण

भाष्यकार -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

उपदेश_शिक्षा किसे
देवें।,
चाणक्य_नीति

तदहं सम्प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया।

येन विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते ॥३॥

शब्दार्थ-अहम मैं लोकानाम् मानवमात्र की हितकाम्यया कल्याण की कामना से, लोगों के भले के लिए तत उस ‘राजनीतिसमुच्चयः’ का सम्प्रवक्ष्यामि सम्मक, ठीक-ठोक प्रवचन करूंगा, येन जिसके ,विज्ञानमात्रण ज्ञानमात्र से मनुष्य सर्वज्ञत्वम् सर्वज्ञता को रखते प्राप्त हो जाता है।

भावार्थ -मैं लोगों के मङ्गल की इच्छा से उन राजनीतिसमुच्चर का वर्णन करूंगा, जिसको जानकर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है

विमर्श-सर्वज्ञ का अर्थ भूत, वर्तमान और भविष्यत् को जाता हो जाना अथवा सारे लोक-लोकान्तरों का ज्ञान प्राप्त हो जाना या सब-कुछ जानने में समर्थ हो जाना अभिप्रेत नहीं है सर्वज्ञ का अर्थ केवल इतना है कि उत्ते धर्म, अर्थ और काम का ज्ञान हो जाता है

मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रोभरणन ३।

‘दुःखितः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यसोदति ॥४

शब्दार्थ-मूर्खशिष्य-उपदेशेन मूर्ख बुद्धिहीन शिष्य को पहले से अथवा धर्मसम्बधी उपदेश करने से व और दुष्टात्रोभरणेत, – भिचारिणी, कट, कर्कश सौर कबोर बोलनेवाली स्त्रोका पालन-पोषण करने सेदुःखितः नाना प्रकार के रोगों से पीड़ित, प्रियजनों के वियोग अथवा धननाश आदि के कारण दुःखित लोगों के साथ जखयोगेण व्यवहार करने से पण्डितः पण्डित, बुद्धिमान् मनुष्य अपि भो सरसोदति दुःखी होता है. कष्ट उठाता है

भावार्थ-मुर्खशिष्य को पढ़ाने से, दुष्टस्त्रो का भरण-पोषण करने से और दुःखीजनों के साथ व्यवहार करने से बुद्धिमान मनुष्य भी दुःख उठाता है।

उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये ।

पयः पानं भुजंगानों केवलं विषवर्धनम् ।। – पञ्चतन्त्र १३२०

उपदेश से मूर्ख कुपित्त ही होते हैं, शान्त नहीं होते । सो को दुश पिलाने से उनका विष ही बढ़ता है।

सीख वाको दोजिए जाको सोख सुहाय

सीख न दीजै बांदरा घर बया को जाय॥

किसी ने मूर्ख के पांच चिह्नों में दूसरे की बात को न मानने’ का भी उल्लेख किया है

मूर्खस्य पञ्च चिह्नानि गर्यो दुर्वचनं तथा

हठश्चैव विषादश्च परोक्तं नैव मन्यते

मूर्ख मनुष्य के पाँच चिह्न होते हैं यथा-(१) अभिमानी होना(२) कटु-कठोर बोलना, गाली प्रदान करना, (३) हठी, अड़ियल होना(४) दुःखी होना और (५) दूसरे की कही हुई बात को न मानना

दुष्टस्त्री-व्यभिचारिणी नारी का भरण-पोषण भी ठीक नहीं

माता यस्य गृहे नास्ति भार्या चाप्रियवादिनी।

अरण्यं तेन गन्तव्यं यथारण्यं तथा गृहम् ॥ -पञ्चतन्त्र ४१५३

-पञ्चतन्त्र ४१५३ जिसके घर में माता न हो और स्त्री अप्रियवादिनी दुराचारिणी , उसे वन में चले जाना चाहिए, क्योंकि उसके लिए घर और वन समान ही हैं।

दुःखितों, रोगियों, पीड़ितों, शोक-सन्तप्तों के साथ व्यवहार हा से भी कष्ट तो होगा ही। वैद्य ‘परदुःखेन दुःख्यते’ दूसरे के दुःख दु:खी होता है, अत: दु:खियों के साथ व्यवहार रखने स दुःखी होगाय व्यवहार रखने से पण्डित भी दुःखी होगा

साभार -चाणक्य नीति दर्पण

भाष्यकार -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

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सदाचार

सदाचार
https://youtu.be/3XBgUmYgY7M

साभार -धर्म शिक्षा

लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

सदाचार_क्या है VAIDIK RASHTRA वैदिक राष्ट्र you tube channel link-

सदाचार

सत्परुषों का आचार सदाचार कहलाता है। जीवन में सदाचार का पालन करते हैं, वे शिष्ट और सभ्य कहलाते हैं, जो सदाचार का पालन नहीं करते अशिष्ट और असभ्य कहलाते हैं।

यहाँ पालन करने योग्य सदाचार के कुछ नियम लिखे जा रहे हैं

१. प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठना चाहिए व्यक्ति सूर्योदय से पूर्व उठते हैं, वे स्वस्थ, मेधावी धन-सम्पन्न बनते हैं

२. उठते ही प्रभु का गुणगान करना चाहिए प्रभु से जीवन में सब प्रकार की समृद्धि, उत्थान कल्याण की प्रार्थना करनी चाहिए।

३. प्रात: अथवा जब भी प्रथम मिलें तभी मातापिता आदि वृद्धजनों का अभिवादन करना चाहिएचरण-स्पर्श पूर्वक उन्हें नमन करना चाहिए। ऐसा करने से आयु, विद्या, यश और बल की प्राप्ति होती हे

४. नित्यप्रति व्यायाम करना स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त आवश्यक है। व्यायाम से शरीर नीरोग, स्वस्थ एवं हृष्ट-पुष्ट बनता है। आसन, प्राणायाम, भ्रमणदण्ड-बैठक-किसी-न-किसी प्रकार का व्यायाम अवश्य करें।

५. प्रतिदिन स्नान अवश्य करें। यथासम्भव ठण्डे जल से स्नान करें।

६. भोजन शुद्ध और सात्त्विक होना चाहिए अण्डे, मांस, मछली, शराब, बीड़ी-सिगरेट, पानचाय, काफी, सोडा, बोतल में बन्द कोई भी कोला आदि नहीं लेना चाहिए। सदा स्मरण रक्खें-‘सादा खाना, पानी पीना और सौ वर्ष जीना’- यह स्वस्थ रहने और दीर्घायु प्राप्त करने का स्वर्णिम सिद्धान्त है

७. बड़ों का आदर करें। शिक्षकों का मानसम्मान करें।

८. महापुरुषों का सत्सङ्ग करें। गन्दे गानों, नाचथियेटर, सिनेमा और टी०वी० के चरित्र-हार से बचें__

_९. खड़े होकर पेशाब न करें। हृदय-गति बन्द होने का यह भी एक कारण है।

१०. सदा मीठा बोलें। सत्य और प्रिय बोलें। किसी को गाली न दें।

साभार -धर्म शिक्षा

लेखक -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

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क्या हनुमान बंदर थे

क्या हनुमान बंदर थे

नमस्ते जी,वेदज्ञ महावीर हनुमानजी वानर थे ? विश्लेषणात्मक विचार अवश्य सुनिए, आपके विचार यूट्यूब के कमेंट में भेजिए,।
वैदिक राष्ट्र युट्यूब चैनल अवश्य सब्क्राइब किजिए, शेयर किजिए, बेल घंटी का बटन अवश्य दबाईये।
आचार्य भानुप्रताप वेदालंकार
आर्यसमाज संचार नगर इन्दौर मध्यप्रदेश
9977987777
9977957777
धन्यवाद

साभार -शुद्ध हनुमच्चरित

लेखक -आचार्य प्रेम भिक्षुः

वीर-व्रती हनुमान्, बाली, सुग्रीव और अंगद आदि मनुष्य थे, बन्दर इस विषय में प्रथम वाल्मीकि रामायण के प्रमाण देखें

(१) हनुमान की बातचीत सुन राम, लक्ष्मण को कहते हैं कि यह ऋग्वेद, यजुर्वेद और साम को अच्छी तरह जानता है तथा इसने अनेक बार व्याकरण पढ़ा है-किष्कि० सर्ग ३।२८

(२) राम-सुग्रीव की मैत्री के समय हनुमान् ने याज्ञिक ब्राह्मणों अरणियों से अग्नि को निकाल कर हवन कुण्ड में स्थापन किया-किष्किन्धा १४

(३) हनुमान् माता अञ्जना और पिता केसरी बन्दर न थे धार्मिक पुरुष थे, और मनुष्य की संतान पशु, पक्षी कभी नहीं हो सकतीदेखो वा० रा० कि० सर्ग ६६८

(४) वर्षा काल बीतने पर राज्य पर बैठे सुग्रीव को सीता की तलाश करने के लिए महामन्त्री के नाते जो उपदेश हनुमान ने दिया क्या उसे काइ वेदवित् विद्वान् के बिना कर सकता है ? देखो कि० २८/८-२७

(५) सीता की सुध के लिए जब हनुमान लंका की अशोक वाटिका । पहिले सीता ने उसे रावण समझ कर बातचीत में संकोच किया पर पीछे जब हनुमान ने विश्वास दिलाया कि मैं राम का संदेश लेकर जा हूँ, तथा राक्षसों के डर से रात को लंका में दाखिल हुआ हूँ, तब र प्रसन्नता प्रगट की। देखो सु० कां सर्ग ३५।

हनुमान बन्दर न का भ्रम न होता। दूसरे हनुमान लंका, पशु-पक्षियों की भाँति सरे हनमान लंका में रात को न आते बल्कि दिन को अन्य पशु-पक्षियों की भाँति आते। फिर राज्य के गुप्तचर भी विदेशी पुरुषों की देख किया करते हैं, न कि पशु-पक्षियों की

(६ ) हनुमान सीता को संस्कृत भाषा में राम का यशोगान सुनाते हैं, क्या यह बन्दर द्वारा सम्भव है ?

(७) श्रीराम हनुमान् के प्रति कृतज्ञता प्रकट करके उन्हें (युद्ध ११७) में पुरुषोत्तम’ कहते हैं। क्या बन्दर के लिये यह प्रयोग सम्भव है?

(८) बाली की राम से बातचीत, सुग्रीव को सन्देश, अंगद को उपदेश तथा मानुषी धर्म शास्त्रानुसार छोटे भाई की स्त्री से बलात् अकाल में सम्बन्ध करने के अपराध में वध रूप दण्ड, श्री राम के हाथ से मिलने और अन्त को द्विजों की भाँति वे-रीति अनुसार संस्कार करने वा कराने से प्रतीत होता है कि वह बन्दर न था।

(९ ) उत्तर काण्ड में भी लिखा है कि जब रावण युद्ध के लिए आया ता बाली समुद्रतट पर सन्ध्या कर रहा था। देखो (उत्तर काँ० सर्ग ३४) स्पष्ट है कि वह न केवल साधारण पुरुष था किन्तु वैदिक धर्मी उच्च वर्ण का राजा था हमारे विचार में तो वह सूर्य वंश की किसी बिछुड़ी हुई शाखा था, क्योंकि उसके पिता का नाम अंशुमान और वृद्धों का नाम सूर्य वंशी लिखा है देखो वा० रा० कि० कां० सर्ग ४।१६

(१०) सुग्रीव को जो बाली का भाई था ‘भास्करात्मज’ सूर्यपुत्रो महावीर्यः के विशेषण से स्मरण किया है।

(११) बाली के मरने पर उसकी स्त्री ने उसे ‘आर्य’ कह कर विला किया है*-देखो कि० २०१३

(१२) जो लोग सुग्रीव को बन्दर मानते हैं वे तनिक विचार कर वाल्मीकीय रामायण पढ़कर बतादें कि-क्या कभी बन्दरों के भी कभी वेदवेत्ता ब्राह्मण मन्त्री होते हैं ? -कि० ३।२६-३५

(१३) क्या बन्दरों की शरण में भी कभी रामचन्द्र जैसे विद्वान वा योद्धा जाया करते हैं ? कि० ४/१८-१६

(१४) क्या कभी बन्दर भी अग्निहोत्र कर वेद मन्त्रों से मैत्री दृढ़ किया करते हैं ? कि० ५।१४–१६

(१५) क्या कभी बन्दरों में भी शास्त्र विहित पाप-पुण्य की मर्यादा देखी है ? कि० सर्ग १८।४।४१।।

(१६) क्या कभी बन्दरों का राजतिलक, रत्न, धूप, दीप वा औषधों के जल से स्नान और हवन यज्ञ से होता है वा उनमें राज्याधिकार की पद्धति ऐसी ही होती है जैसी कि सुग्रीव के वंश में थी ? कि० २६ ।२४

(१७) क्या किसी बन्दर को ‘आर्य’ भी कहा जाता है ? कि० ५५७

(१८) क्या बन्दरों में कभी तारा * रूमा, अञ्जना जैसी पतिव्रता और शास्त्र जानने वाली स्त्रियाँ देखी हैं ? देखो कि० कि० सर्ग ३५।३५

* समीक्ष्य व्यथिता भूमौ सभ्रान्ता नियपातह।

सुप्त्येव पुनरुत्थाय आर्य पुत्रेति शोचती।।

सुषेण दुहिता चेद मर्थ सूक्ष्म विनिर्णये।’

औत्पाति के च विविध सर्वतः परिनिष्ठिता।। कि० २२१३

कि क्या बन्दरों की पत्नी बन्दरी की जगह नारियाँ हो सकती हैं

(२०) क्या कभी किसी बन्दर को विद्वानों वा राजाओं की सभामें बलाया गया था ? उत्तर कां० सर्ग ४०।

_ (२१) इसी प्रकर अंगद द्वारा अपने पिता महाराज बाली के अन्त्येष्टि संस्कार के पश्चात् नवीन यज्ञोपवीत धारण ‘ततोऽविन् विधिवत्वा सोऽप सव्यं चकारह’ (कि० २५१५०) पढ़कर और महावीर हनुमान् के लिए ‘काँधे पूँज जनेऊ छाजै’ (हनुमान चालीसा) की रट लगाकर भी आप इस आर्य-रत्न को बन्दर कहने का दुस्साहस करेंगे

साभार -शुद्ध हनुमच्चरित

लेखक -आचार्य प्रेम भिक्षुः

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“ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया”

“ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया”

ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की प्रेरणा से देश से अविद्या दूर करने का कार्य किया

ऋषि दयानन्द एक सत्यान्वेषी सत्पुरुष थे। वह सच्चे ईश्वर को प्राप्त करने तथा मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिये अपनी आयु के बाईसवें वर्ष में अपने घर से निकले थे। उन्होंने देश के अनेक भागों में जाकर धार्मिक पुरुषों के दर्शन करने सहित उनसे उपदेश ग्रहण किये थे। इसके साथ ही उन्होंने यात्रा में मिले ग्रन्थों का अध्ययन किया था तथा अनेक गुरुओं से योग की शिक्षा भी प्राप्त की थी। उनके योग के दो गुरु श्री ज्वालानन्द पुरी तथा श्री शिवानन्द गिरी थे। इन गुरुओं से उन्हें योग विद्या का ज्ञान हुआ तथा योग के अभ्यास द्वारा समाधि की सिद्धि हुई। स्वामी जी के योगी बन जाने और ईश्वर साक्षात्कार कर लेने पर भी उनकी विद्या प्राप्ति की पिपासा शान्त नहीं हुई थी। उन्हें अपने संन्यास गुरु स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती से अपने एक शिष्य प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती का पता मिला था जो मथुरा में रहकर एक पाठशाला में अपने शिष्यों को वेद व्याकरण का अध्ययन कराते थे और शिष्यों के धर्म व विद्या विषयक शंकाओं के समाधान करते थे। स्वामी दयानन्द सन् 1860 में उनके पास पहुंचे थे और उनका शिष्यत्व ग्रहण किया था। स्वामी दयानन्द जी की विद्या लगभग 3 वर्ष में पूरी हुई थी। विद्या पूरी होने पर गुरु दक्षिणा के अवसर पर गुरु विरजानन्द जी ने ऋषि दयानन्द को अपनी हृदय की इच्छा को दयानन्द जी के सम्मुख प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा था कि महाभारत यद्ध के बाद से वेद विद्या का ह्रास होते होते वेद ज्ञान विलुप्ति के कागार पर है। तुम वेद विद्या वा ज्ञान से सम्पन्न हो। देश के लोग अविद्या के कारण नाना प्रकार के दुःख व कष्ट भोग रहे हैं। इन सबका कारण अविद्या व अविद्यायुक्त मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध जैसी परम्परायें व क्रियायें हैं। ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की भावनाओं को यथावत् समझ लिया था। वह जान गये थे गुरुजी मुझसे अविद्या व अन्धविश्वासों का खण्डन तथा वेदज्ञान व मान्यताओं का मण्डन कराना चाहते हैं। गुरु जी चाहते थे कि दयानन्द जी संसार से मत-मतान्तरों की अविद्या को दूर कर वेद विद्या के आधार पर एक ज्ञान व विज्ञान से युक्त देश व समाज का निर्माण करें। ऋषि दयानन्द ने कुछ क्षणों में ही गुरु जी के प्रस्ताव पर विचार किया और उन्हें अपनी स्वीकृति दी थी। उन्होंने कहा था कि आप आने वाले दिनों में देखेंगे कि आपका यह शिष्य आपको दिये गये अपने वचनों का प्राणपण से पालन कर रहा है।

गुरु को वचन देने के बाद स्वामी दयानंद मथुरा से आगरा आकर कई महीनों तक रहे और वहां कथा तथा प्रवचन करते रहे। इसके साथ ही वह अपने प्रचार की भावी योजना भी तैयार करते रहे थे। यहां रहकर स्वामी दयानन्द जी ने मूल वेदों को प्राप्त करने का प्रयास किया था। न मिलने पर वह इसकी खोज में आगरा से ग्वालियर, धौलपुर, जयपुर, करौली आदि स्थानों पर गये थे। इनमें से किसी एक स्थान से आपको चार वेदों की मन्त्र संहितायें प्राप्त हुई थी, ऐसा हमारा अनुमान है। इसके बाद आपने करौली में कई महीने रहकर वेदों की परीक्षा कर अपने सिद्धान्तों को अन्तिम रूप दिया था। इसी क्रम में हम देखते हैं कि स्वामी जी पुष्कर के मेले में जाते हैं और वहां प्रचार और सुधार के काम करने आरम्भ करते हैं। आपका ईसाईयों से संवाद भी होता है। पुष्कर से स्वामी अजमेर आये थे और यहां उन्होंने पादरी राबिन्सन, ग्रे और शुल्बे्रड के साथ जीव, ईश्वर, सृष्टिक्रम तथा वेद विषय पर तीन दिन तक संवाद किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वामी जी ने इससे पूर्व मत-मतान्तरों के प्रमुख ग्रन्थों का अध्ययन भी कर लिया था जिससे उन्हें सत्यासत्य के निर्णयार्थ खण्डन-मण्डन करने सहित मत-मतान्तरों के लोगों को सत्य का ग्रहण कराने और असत्य को छुड़वाने में सफलता प्राप्त हो सके।

लगभग इन्हीं दिनों हरिद्वार में कुम्भ का मेला आरम्भ होने वाला था। यहां देश भर से पौराणिक धर्म भावना व आस्था रखने वाले बन्धु आते हैं। यहां प्रचार का अवसर देखकर स्वामी जी हरिद्वार पहुंचे थे और यहां आपने पाखण्ड खण्डिनी पताका भी लगाई थी। यहां रहकर आपने जो प्रचार किया उसका लोगों पर वह प्रभाव नहीं हो रहा था जो होना चाहिये था। इससे स्वामी जी को कुछ निराशा रही होगी। इसी कारण उन्होंने मौन व्रत भी रख लिया था। तभी उन्हें अहसास हुआ कि मौन रहने से तो उद्देश्य सिद्ध नहीं होगा। उसके लिये तो वेद प्रचार व खण्डन-मण्डन आवश्यक है, अतः आपने अपना मौन व्रत भी तोड़ दिया था। यहां स्वामी जी ने जो चिन्तन किया उसका लाभ उनके भावी जीवन के कार्यक्रमों में दृष्टिगोचर होता है। हरिद्वार के बाद स्वामी जी का मुख्य पड़ाव हम काशी में देखते हैं जहां उन्होंने काशी के दिग्गज विद्वानों से मूर्तिपूजा को वेदों का प्रमाण देकर सिद्ध करने की चुनौती दी थी। अनेक बार स्वामी जी की चुनौती की उपेक्षा करने पर काशी नरेश ईश्वरी नारायण सिंह की आज्ञा देने पर काशी के पण्डित स्वामी जी से शास्त्रार्थ करने के लिये तैयार हुए। इसके लिये 16 नवम्बर, सन् 1869 की तिथि निर्धारित की गई थी।

निर्धारित तिथि को शास्त्रार्थ हुआ। स्वामी दयानन्द अकेले थे और दूसरी ओर लगभग 30 विद्वान थे जिनसे स्वामीजी ने शास्त्रार्थ किया। मूर्तिपूजा पर काशी के पण्डितों को वेदों से प्रमाण वा वेद वचन प्रस्तुत करने थे परन्तु वह ऐसा नहीं कर सके। वहां जो प्रश्नोत्तर व बातें हुई वह काशी शास्त्रार्थ में वर्णित हैं। काशी के लगभग शीर्ष 30 पण्डितों में से कोई एक भी मूर्तिपूजा के पक्ष में वेदों का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका। अतः मूर्तिपूजा का आधार वेद न होकर वेद विरुद्ध कल्पना व मान्यता ही स्वीकार किया जा सकता है। इस शास्त्रार्थ में पौराणिकों ने अनेक प्रकार के विघ्न डाले। काशी नरेश पौराणिक पक्ष की ओर झुके थे। वह न्याय का पालन नहीं कर सके और उन्होंने भी स्वामी दयानन्द के विरुद्ध अपना मत दिया जबकि वास्तविकता यह थी कि काशी के पण्डित शास्त्रार्थ अधूरा छोड़कर चले गये थे। इसके बाद सत्य को स्वीकार न करने, पण्डितों के मूर्तिपूजा व पौराणिक कर्मकाण्डों यथा तीर्थ महत्व व उनमें स्नान आदि से स्वार्थ जुड़े होने के कारण स्थिति यथापूर्व रही। स्वामी जी का मूर्तिपूजा आदि अन्धविश्वासों को छुड़वाने का प्रयत्न सफल न हो सका। इस कारण स्वामी जी ने अपने उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिये नये उपायों पर विचार किया और इसके बाद हम देखते हैं कि वह कोलकत्ता सहित बंगाल के अनेक स्थानों, महाराष्ट्र के पूना तथा मुम्बई आदि अनेक स्थानों सहित राजस्थान की कुछ रिसायतों में जाकर वहां के प्रमुख व्यक्तियों व रजवाड़ों आदि से मिलकर वेद प्रचार करते हैं। स्वामी जी ने अपनी पूरी सामथ्र्य लगाकर लोगों को वैदिक मत को स्वीकार कराने का प्रयत्न किया। स्वामी जी ने कालान्तर में पंजाब का भी दौरा किया। उन दिनों पूरा पाकिस्तान पंजाब का भाग था। स्वामी जी ने पंजाब के अनेक स्थानों में आर्यसमाजें स्थापित की। वहां उन्हें अन्य स्थानों से अधिक सफलता मिली। पंजाब में ही उन्हें स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, पं. लेखराम, महात्मा हंसराज, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द आदि अनेक सहयोगी मिले जिन्होंने आर्यसमाज के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्वामी दयानन्द जी ने अपने गुरु को दिये वचन को पूरा करने के लिये मुम्बई में उनके कुछ शिष्यों के अनुरोध पर वेद धर्म के प्रचार के लिए आर्यसमाज संगठन व संस्था की स्थापना चैत्र शुक्ल पंचमी तदनुसार 10 अप्रैल, सन् 1875 को की थी। इसका मुख्य उद्देश्य वेद को सब सत्य विद्याओं का पुस्तक बताकर वेदों को पढ़ने व पढ़ाने तथा वेदों के सुनने व सुनाने को परम धर्म निश्चित किया गया था। आर्यसमाज की स्थापना के अनन्तर ऋषि ने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया जिसमें सर्वप्रमुख सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, पंचमहायज्ञविधि, गोकरुणाविधि आदि हैं। स्वामी जी ने यजुर्वेद भाष्य से वेदभाष्य लेखन का कार्य आरम्भ किया था और यजुर्वेद तथा ऋग्वेद का साथ-साथ भाष्य किया। यह भाष्य वह संस्कृत व हिन्दी दोनों भाषाओं में कर रहे थे। यजुर्वेद की मन्त्र संख्या कम होने से वह पहले समाप्त हो गया। ऋग्वेद का भाष्य का कार्य चल रहा था। उसके बाद सामवेद तथा अथर्ववेद का भाष्य भी आरम्भ किया जाना था। ऋग्वेद के सातवें मण्डल का भाष्य चल रहा था तभी स्वामी जी को जोधपुर में एक षडयन्त्र के अन्तर्गत उनके पाचक के द्वारा विषपान कराया गया। इसके कुछ दिनों बाद 30 अक्टूबर सन् 1883 को अजमेर में दिवाली के दिन ऋषि दयानन्द का देहावसान हो गया जिससे वेदभाष्य का कार्य पूरा न हो सका। इस कार्य को उनके बाद उनके अनेक शिष्यों ने पूरा किया। वर्तमान में अनेक वेदभाष्यकारों के वेदानुकूल प्रामाणिक भाष्य उपलब्ध हैं। अपनी मृत्यु से पूर्व तक ऋषि ने देश के अनेक भागों में जाकर वेद प्रचार किया था। अनेक स्थानों पर आर्यसमाजें स्थापित हुई थीं जहां नियमित रूप से सत्संग होने लगे थे। सत्यार्थप्रकाश तथा अन्य ग्रन्थों का पाठ भी होता था। प्रवचन व भजन आदि भी किये जाते थे।

ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में अपने गुरु स्वामी विरजानन्द जी को दिये वचन का प्राणपण से पालन किया। इसका पूरा ज्ञान ऋषि दयानन्द के पं. लेखराम, पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, स्वामी सत्यानन्द, श्री हर विलास शारदा, राम विलास शारदा, मास्टर लक्ष्मण आर्य तथा डा. भवानी लाल भारतीय आदि के जीवन चरितों को पढ़कर प्राप्त किया जा सकता है। स्वामी श्रद्धानन्द और पं. लेखराम जी द्वारा आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब की ओर से ऋषि दयानन्द के विस्तृत जन्म चरित की खोज कराकर व उसका सम्पादन व प्रकाशन कराकर एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। यदि यह दो व्यक्ति न होते तो आज हम ऋषि दयानन्द जी के जीवन से जिस व्यापकता से परिचित होते हैं, वह न हो पाते। इन महापुरुषों को हम नमन करते हैं। इस लेख में हम यह बताना चाहते हैं कि मथुरा में गुरु विरजानन्द जी को अविद्या दूर करने तथा वेदों के प्रचार का ऋषि दयानन्द ने जो वचन दिया था उसे उन्होंने एक अद्वितीय सच्चे शिष्य के रूप में पूरा करने का भरसक प्रयास किया। उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया। वह जीवन में अनेक विपत्तियों के होते हुए भी कभी निराश नहीं हुए। ईश्वर के भरोसे वह आगे बढ़ते रहे। वेद प्रचार के लिये ही उन्होंने विषपान करके अपनी भौतिक देह को वैदिक धर्म की वेदी पर समर्पित किया। हमें संसार में ऋषि दयानन्द के समान दूसरा कोई महापुरुष व वेदों वाला ऋषि दृष्टिगोचर नहीं होता। आज का आर्यसमाज उनके उद्देश्यों व स्वप्नों को पूरा करने में शिथिल दीखता है। आर्यों को अपनी महत्वाकांक्षायें छोड़कर संगठन को मजबूत करना होगा। गुण, कर्म व स्वभाव को महत्व देना होगा। समाज के सिद्धान्तों को समर्पित होकर पालन करने के साथ दिग्दिगन्त वेद प्रचार करना होगा तभी वैदिक धर्म व संस्कृति बच सकेगी। आज हमारा उद्देश्य कृण्वन्तो विश्वमार्यम् बहुत पीछे रह गया है। आज की चुनौती वैदिक धर्म की रक्षा करने की है। कल क्या होगा कोई नहीं जानता। हमें अपने आन्तरिक शत्रुओं को भी पहचानना होगा और उन्हें बाहर करना होगा। इति ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अनुसार विश्व कल्याण का आधार वेद।

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आज संसार में अनेक भाषायें और अनेक मत-मतान्तर प्रचलित हैं। मत-मतान्तरों को ही लोग धर्म मानने लगे हैं जबकि इन दोनों में अन्तर है। मत-मतान्तर इतिहास के किसी काल विशेष में किसी मनुष्य विशेष द्वारा वा उसके बाद उसके अनुयायियों द्वारा उसके नाम पर उनकी मान्यताओं के आधार पर चलाया जाता है जबकि धर्म का आरम्भ सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर से होता है। मत-मतान्तर अपनी त्रुटियों व न्यूनताओं को छुपाने व उसे ईश्वर प्रदत्त बताने के लिए अपने अपने मत को धर्म कह देते हैं। धर्म शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है। संस्कृत से ही हिन्दी व विश्व की अन्य भाषायें बनी हैं। हिन्दी में संस्कृत के अधिकांश शब्द बिना किसी प्रकार के परिवर्तन के स्वीकार कर लिये गये हैं जबकि अन्य भाषायें में संस्कृत शब्दों के स्वरूप कहीं न्यून तो कहीं अधिक बदल गये हैं व कुछ उनके अपने निजी भी शब्द भी हैं। अंग्रेजी व संस्कृत एवं हिन्दी से इतर किसी भाषा में धर्म शब्द का पर्यायवाची शब्द नहीं है। धर्म का अर्थ होता है मनुष्यों के द्वारा श्रेष्ठ मनुष्योचित गुण, कर्म व स्वभाव का धारण वा आचरण। इसमें सृष्टिकर्ता व जगतपति ईश्वर का यथार्थ ज्ञान व उसके गुणों को जानकर उसकी उपासना करना भी सम्मिलित है। ईश्वर की यथार्थ उपासना का संसार में प्रमुख ग्रन्थ योग दर्शन है। योग आत्मा को परमात्मा से जोड़ने को कहते हैं। मनुष्य अपनी आत्मा को जब ईश्वर के गुण कर्म व स्वभाव का विचार कर परमात्मा में अपने ध्यान व चिन्तन को स्थिर करता है तो उसे ईश्वरोपासना कहते हैं। उपासना में ईश्वर के मनुष्य जाति पर उपकारों को भी उपासक द्वारा स्मरण किया जाता है। परमात्मा व आत्मा का सम्बन्ध वैसा ही है जैसा कि माता-पिता के साथ पुत्र का होता है। जिस प्रकार माता-पिता की सत्य आज्ञाओं का पालन सन्तान के लिए धर्म होता है उसी प्रकार ईश्वर की वेदाज्ञाओं का पालन भी सभी मनुष्यों के धर्म होता है। यह भी ध्यातव्य है कि मनुष्य ने न तो ब्रह्माण्ड बनाया न पृथिवी, समुद्र, नदी, पर्वत, वन और अन्नादि पदार्थ। यह सब ईश्वर ने मनुष्यों के लिए बनाये हैं। मनुष्यों को भी ईश्वर ने ही बनाया है। मनुष्यों के लिए जिस जिस चीज की आवश्यकता थी सब ईश्वर ने मनुष्यों को इस सृष्टि के द्वारा दी हैं। देखने के लिए आंखें चाहिये तो आंखे दी। सुनने के लिए कान चाहियें तो श्रवण इन्द्रिय दी। इसी प्रकार से मनुष्यों को अपने कर्तव्यों का ज्ञान चाहिये। यह भी ईश्वर ने मनुष्यों को सृष्टि के आरम्भ में वेद ज्ञान देकर कराया है। वेद में ईश्वर ने तृण से लेकर प्रकृति, आत्मा व ईश्वर सभी का यथार्थ सत्य ज्ञान दिया है।
मनुष्यों को स्वस्थ शरीर व उसमें स्वस्थ ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रियों की अत्यावश्यकता है। मनुष्यों कानों से सुनता और मुंह वा वाक् इन्द्रिय से बोलता है। सुनकर ही वह ज्ञान प्राप्त करता है। माता, पिता व आचार्य उसको ज्ञान कराने वाले मुख्य लोग होते हैं। माता-पिता व आचार्य भी अपने अपने माता-पिता व आचार्य से ज्ञान प्राप्त करते हैं। सृष्टि की आदि में परमात्मा अमैथुनी सृष्टि करते हैं। तब आरम्भ में युवा-स्त्री व पुरुष उत्पन्न होते हैं। उनके माता-पिता व आचार्य नहीं होते। परमात्मा ही उस अमैथुनी सृष्टि के सबसे योग्य चार ऋषियों को चार वेदों का ज्ञान देता है। वही चार ऋषि एक अन्य सबसे योग्य पुरुष ब्रह्मा जी चारों वेदों का ज्ञान कराते हैं। यह ऋषि ही अन्य सभी मनुष्यों के माता-पिता व आचार्य कहलाते हैं। इन्हीं से सभी मनुष्यों को भाषा का ज्ञान सहित वेदों की शिक्षाओं व कर्तव्यों का ज्ञान कराया जाता है। आदि गुरु परमात्मा होता है। वह चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को ज्ञान देता है जिसमें भाषा व उसका ज्ञान भी मुख्य है। ज्ञान भाषा में ही निहित होता है। ज्ञान व भाषा को पृथक नहीं किया जा सकता। ज्ञान होगा तो भाषा अवश्य होगी। संस्कृत हर प्रकार से पूर्ण भाषा है जो ऋषियों को ईश्वर से प्राप्त हुई। लौकिक संस्कृत भाषा वैदिक भाषा का किंचित सरलीकरण है, यह बाद के ऋषियों व विद्वानों द्वारा किया गया है। अतः मूल भाषा भी वेदज्ञान के साथ ही प्राप्त हुई थी व वही किंचित विकारों के साथ व शुद्ध रूप में भी चली आ रही है। देश-काल, भौगोलिक कारणों व मनुष्यों के उच्चारण दोष आदि कारणों से इसमें किंचित परिवर्तन व विकार होना भी सम्भव होता है। अतः इसी प्रकार होते होते सृष्टि की उत्पत्ति के 1.96 अरब वर्ष हो जाने पर संसार में आज सहस्रों भाषायें अस्तित्व में आ गई हैं। सभी भाषाओं की उत्पत्ति प्रायः इसी प्रकार या ऐसे अनेक कारणों से होना सम्भव प्रतीत होती है।
वेदों सहित वेदों पर ऋषियों के उपलब्ध ग्रन्थों का अध्ययन कर धर्म का सर्वांग शुद्ध रूप प्राप्त होता है। यह महाभारत काल व उसके कुछ बाद के वर्षों तक अस्तित्व व व्यवहार में रहा है। इसी को वैदिक धर्म कहते हैं। इसमें किसी अन्य मान्यता व सिद्धान्त को जोड़ने व मिलाने का कहीं अवकाश ही नहीं था। अतः किसी नये धर्म के प्रचलन का प्रश्न उत्पन्न नहीं होता। यह सत्य है कि महाभारत युद्ध के बाद वेद के सत्य अर्थों का यत्र तत्र लोप हो गया था। मूल वेद सुरक्षित रहे और उनकी मध्यकालीन व्याख्यायें भी विद्यमान रहीं। इनमें कुछ भ्रान्तियां थीं। ईसा की अट्ठारहवीं शती में ऋषि दयानन्द सरस्वती (1825-1883) का प्रादुर्भाव रहता है। वह अपने अपूर्व पुरुषार्थ, तप व विद्याबल से वेद व वेदज्ञान को प्राप्त करते हैं और वेदभाष्य सहित अनेक महत्वपूर्ण वैदिक ग्रन्थों की रचना करते हैं। ऋषि दयानन्द जी ने कोई नई बात नहीं कही है। उन्होंने जो कहा व लिखा है वह वही है जो सृष्टि काल के आरम्भ से देश देशान्तर में विद्यमान रहा था परन्तु उनके समय में वह सर्वत्र उपलब्ध नहीं था। उन्होंने उस अलभ्य वैदिक ज्ञान को स्वपुरुषार्थ से प्राप्त किया, अपने विवेक से उसकी परीक्षा व सत्यासत्य का निर्णय किया और उसे देशवासियों के सम्मुख सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने सबल युक्तियों से सिद्ध किया कि मनुष्यों का एक ही धर्म है और वह वेद प्रतिपादित कर्तव्य कर्म व आचरण ही हैं। संसार में जितने भी मत-मतान्तर चल रहे हैं वह अविद्या के काल में चलें जिनकी अब आवश्यकता नहीं है। मत-मतान्तरों में अनेक न्यूनतायें और इनकी अनेक बातें स्त्री व पुरुषों में भेदभाव भी करती हैं। ईश्वरोपासना और वायु-जल-पर्यावरण की शुद्धि हेतु यज्ञ का विधान व विज्ञान की आवश्यक बातों का ज्ञान भी इन मत-मतान्तरों की पुस्तकों में नहीं है। इनसे इन मत के वर्तमान आचार्यों और अनुयायियों की इस रूप में हानि हो रही है कि वह उचित रीति से ईश्वरोपासना एवं अन्य वैदिक कर्मों व अनुष्ठानों को न करने से उससे प्राप्त होने वाले लौकिक व पारलौकिक लाभों से वंचित हो रहे हैं। अतः सभी को वैदिक धर्म की ही शरण लेकर उसी को अपनाना व धारण करना चाहिये। वेदों के आधार पर एक ऐसे समाज, देश व विश्व का निर्माण किया जा सकता है जहां किसी से भेदभाव न होता हो, सब शिक्षित हों, सब अपने अपने कर्तव्यों का पालन करें, सबको उन्नति के समान अवसर मिले, जहां जन्मना जाति व वर्गवाद आदि न हो, लोग मनुष्यों को ही नहीं प्राणीमात्र को ईश्वर की सन्तान व अपना मित्र जानें आदि आदि। वेदों को अपनाकर व उनकी शिक्षाओं के द्वारा विश्व में सुख व शान्ति को स्थापित किया जा सकता है। सृष्टि के आरम्भ से महाभारतकाल पर्यन्त तक के 1.960848 अरब वर्षों तक भारत वा आर्यावर्त्त के आर्यों का ही विश्व में एकमात्र निरन्तर वैदिक धर्म पर आधारित चक्रवर्ती राज्य रहा है जहां सब मनुष्य आध्यात्मिक व भौतिक दृष्टि से सुखी थे। तब न कोई मत-मतान्तर था न उसकी आवश्यकता थी। आज भी नहीं है। आवश्यकता केवल विचार, सोच व चिन्तन बदल कर उचित चिन्तन व सत्य निर्णय करने की है।
देश व विश्व में सुख व शान्ति की स्थापना को लक्ष्य में करके वेद का मंथन किया जाना चाहिये और इससे जो रत्न प्राप्त हों उसे देश व विश्व में विस्तार व वितरण कर एक सत्य मत धर्म की स्थापना करनी चाहिये। ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश एक ऐसा ही प्रयास था। ऐसे मंथन पहले भी हुए व हुए होंगे। आज इसकी सर्वाधिक आवश्यकता है। ऋषि दयानन्द ने यह कार्य आरम्भ किया था। यह कार्य अधूरा पड़ा है। यह कार्य केवल ऋषि दयानन्द के अनुयायियों का ही कार्य नहीं है अपितु यह संसार के सभी मनुष्यों का अपना कार्य है। इसी से विश्व का कल्याण होने के साथ आध्यात्मिक व भौतिक उन्नति हो सकती है और उससे संसार के सभी लोग लाभान्वित हो सकते हैं।
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