देश_को_आजादी_देे_गये

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#देश_को_आजादी_देे_गये, उन शहीदों को नमन , उन वीरों को नमन । कन्या गुरुकुल झारखंड की छात्राओं के द्वारा #देशभक्ति_भजन#गुरुकुल में बदेशभक्ति के तराने गाए जाते हैं ,#देशभक्ति सिखाई जाती है। #कन्या_गुरुकुल #हजारीबाग #झारखंड की ब्रह्मचारिणी द्वारा देशभक्ति गीत सुने और समझे , कैसे गुरुकुल में राष्ट्र निर्माण हो रहा है ? वेद और वेद से संबंधित जानकारियों के लिए #राष्ट्रभक्ति_देशभक्ति #ईश्वरभक्ति_भजन को सुनने के लिए #वैदिक_राष्ट्र यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें। धन्यवाद #Vaidik_rashtra #Vedic_rashtra #Aryasamaj_gurukul

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किस ने हमें वेदों का ज्ञान दिया?

किस ने हमें वेदों का ज्ञान दिया? कौन था जिसने वेद पढ़ने का अधिकार? सभी माताओं को, बहनों को वेद पढ़ने का अधिकार दिया वो केवल देव दयानंद था देव दयानंद। आप वेद वैदिक सिद्धांतों को जानने के लिए समझने के लिए #वैदिक_राष्ट्र #vaidik_rashtra यूट्यूब चैनल अवश्य देखें ,लाइक करें ,शेयर करें। धन्यवाद

महर्षि दयानन्द जी ने किया वर्तमान युग में त्रैतवाद का प्रतिपादन 

महर्षि दयानन्द जी ने किया वर्तमान युग में त्रैतवाद का प्रतिपादन 

      आत्मा और ईश्वर के दो तत्त्वों के अतिरिक्त ‘भौतिक द्रव्य’ एक तीसरा तत्त्व है, इसलिए वैज्ञानिक दृष्टि से यह विचार करना आवश्यक है कि सृष्टि उत्पत्ति में मूल तत्त्व कितने हैं। मूलभूत तत्त्वों के विषय में वैज्ञानिक दृष्टि से मुख्य तौर पर निम्न विचारधाराओं पर विचार किया जाता है।

      एकत्ववाद-एकत्वाद का सिद्धान्त कहता है कि या तो जड़ से ही सृष्टि का निर्माण हुआ है या चेतन से ही सृष्टि का निर्माण हुआ है। अगर जड़ से सृष्टि का निर्माण माने तो मानना पड़ता है कि भौतिक द्रव्य (प्रकृति) से ही जीवन की उत्पत्ति हुई है। ये लोग जड़ से जीवन की उत्पत्ति मानते है, किन्तु आत्मा-परमात्मा जैसे तत्त्व नहीं मानते। यह धारणा प्राचीन युग के चार्वाकों ने की है, वर्तमान युग के जड़वादियों भौतिक वादियों की है। अगर चेतन से सृष्टि का निर्माण माने तो मानना पड़ता है कि चेतन तत्त्व से ही भौतिक द्रव्य (प्रकृति) की उत्पत्ति हुई है। ये लोग भौतिक द्रव्य तथा जीवात्मा की पृथक्, स्वतन्त्र, अनादि सता नहीं मानते। यह धारणा भारतीय दार्शनिकों में मुख्य तौर पर शंकराचार्य (788-820) के वेदान्त सिद्धान्त के पाश्चात्य दार्शनिकों में मुख्य तौर स्पाइनोजा (1632-1677) तथा वर्कले (1685-1753) की और मतवादियों में यहूदी, ईसाई व मुसलमानों की है। यहूदी, ईसाई तथा मुसलमान मानते हैं कि ईश्वर एक है, उसी ने अभाव से नेस्ति से जगत् तथा जीव को उत्पन्न कर दिया। भारत में इस मत के प्रवर्तक आचार्य वृहस्पति माने जाते हैं। चार्वाक् का अर्थ है, ‘चारु वाक्’ मीठी वाणी बोलने वाला। उनका कहना है कि न कोई ईश्वर है न जीव है, यह देह ही सब कुछ है। देह नष्ट हुआ सव कुछ समाप्त हो गया। मानव देह पृथ्वी, अप, तेज, वायु तत्त्वों से देह तथा संसार बना है।

      प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जव ये चार तत्त्वों से जड़ परमाणुओं के मिश्रण से बने हैं, तव इन जड़ तत्त्वों के मिश्रण से चेतन तत्त्व जीव कैसे उत्पन्न हुआ।

     चार्वाक् का उत्तर-जिस प्रकार दही और गोबर मिला देने से कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं, इसी प्रकार भिन्न-भिन्न परमाणुओं के एक विशेष प्रकार विशेष मात्र से मिलने से आत्मा उत्पन्न हो जाता है। वतर्मान विज्ञान का उदाहरण लिया जाए तो जैसे हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन दोनों अदृश्य तत्त्व हैं। इन दोनों के एक विशेष मात्र में सम्मिश्रण से जल नामक तत्त्व उत्पन्न हो जाता है जो इन दोनों से भिन्न है, वैसे ही भिन्न भिन्न जड़ परमाणुओं के मिश्रण से उनसे भिन्न-भिन्न तत्त्व उत्पन्न हो जाता हैउत्तर है कि दही और गोवर को तथा हाईड्रोजन तथा ऑक्सीजन को तो मिलाने वाली दूसरी चेतन हस्ती होती है। कलेवर बढ़ने के कारण एकत्ववाद को यहीं विराम देते हैं।

    द्वैतवाद-द्वैतवाद का सिद्धान्त यह है कि मूलभूत सताएं दो हैं-जीव तथा प्रकृति। यह धारणा सांख्यदर्शन की कही जाती है। सांख्यदर्शन के रचयिता महर्षि कपिल थे। सांख्यदर्शन को निरीखर सांख्य कहा जाता है। ऋषि दयानन्द जी ने सांख्य को सेश्वरवादी ही माना है। सांख्य का मुख्य विषय प्रकृति तथा पुरुष जड़ तथा चेतन इन दो तत्त्वों पर विचार करना है।

     भारतीय दर्शन शास्त्र में एकत्ववाद के विरुद्ध सवसे पहले प्रबल आवाज सांख्यकार महर्षि कपिल ने उठाईउनका कहना है कि सृष्टि में अन्तिम सत्ता में एक तत्त्व मानने से काम नहीं चल सकता। जड़ तथा चेतन दो सत्ताओं को तो मानना ही पड़ेगा तभी सृष्टि उत्पत्ति की समस्या का समाधान हो सकता है। इस विचार को सांख्य दर्शन का प्रकृति पुरुष का सिद्धान्त कहा जाता है। वैदिक संस्कृति के भोक्ता-भोग्य, दृष्टा, दृश्य आदि सिद्धान्तों का प्रारम्भ इसी द्वैतवाद के सिद्धान्त से हुआ है। द्वैतवाद कं आचार्यों का मत है एक सता जड़ है दूसरी चेतन। उनका कहना है कि सृष्टि की समस्या को समझने के लिए इन दो को तो मानना ही पड़ेगा। चेतन भी एक की जगह दो है-एक आत्मा दूसरा परमात्मा।

      सांख्यमतानुसार जव सरकार्यवाद सिद्ध हो जाता है तव यह मत अपने आप ही गिर जाता है कि दृश्य सृष्टि की उत्पत्ति शून्य से हुई है अर्थात् जो कुछ है ही नहीं उससे जो अस्तित्व है वह उत्पन्न नहीं हो सकता। इस बात से साफ सिद्ध होता है कि सृष्टि किसी न किसी पदार्थ से उत्पन्न हुई है और इस समय सृष्टि में जो गुण हमें दीख पड़ते हैं वे ही इस मूल पदार्थ में होने चाहिएं। अब यदि हम सृष्टि की ओर देखें तो हम वृक्ष-पशु-मनुष्य, पत्थर-सोना-चांदी, हीरा, जल-वायु अनेक पदार्थ दीख पड़ते हैं, इन सबके रूप तथा गुण भिन्न-भिन्न हैंसांख्यवादियों का सिद्धान्त है कि यह भिन्नता तथा नानात्व आदि में अर्थात् मूल पदार्थ में तो नहीं दीखता किन्तु मूल में सबका द्रव्य एक ही है। अर्वाचीन रसायन शाख्याओं ने भी भिन्न-भिन्न द्रव्यों का पृथक्करण करके पहले 62 मूल तत्त्व फिर 92 और अब 105 ढूंढ निकाले थे। अब पश्चिमी विज्ञान बेताओं ने भी यह निश्चय कर लिया है कि ये मूल तत्त्व स्वतन्य वा स्वयं सिद्ध नहीं हैइन सबकी जड़ में कोई न कोई एक ही पदार्थ है, उस पदार्थ में जो मूल पृथ्वी तारागण की सृष्टि उत्पन्न हुई है। जगत् के सब पदार्थों में जो मूल द्रव्य है उसे ही सांख्य दर्शन में प्रकृति कहते हैं। सांख्यवादियों ने सब पदार्थों का निरीक्षण करके पदार्थों में तीन गुणों को पाया है सत्त्व, रज तथा तम इसलिए मूल द्रव्य में प्रकृति में भी इन तीन गुणों को मानते हैं जिसके कारण प्रकृति में नानात्व पाया जाता है, एक प्रकृति से इन तीन गुणों के कारण अनेक पदार्थ उत्पन्न हो जाते हैं। सांख्य का कथन है कि सांसारिक जड़ पदार्थों की मूल सता प्रकृति है। जिस प्रकार सांख्य जड़ प्रकृति की मूल सत्ता मानता है उसी प्रकार चेतन को भी मूल सत्ता मानता है। इसी चेतन को पुरुष, क्षेत्र तथा अक्षर कहा गया है।

       समीक्षा-हमने देखा भारतीय चिन्तकों में जहां एकत्ववादी थे, वहां द्वित्ववादी भी थे जिनका कहना है कि सृष्टि उत्पत्ति की समस्या सिर्फ एक मूल सता को मानने से हल नहीं होती। चाहे जड़ को मूल सता माने चाहे चेतन को जड़ से चेतन उत्पन्न नहीं हो सकता, न पतन से जड़ उत्पन्न हो सकता है, क्योंकि यह दोनों तत्त्व एक दूसरे से भिन्न है। इसलिए इन सब नाना रूपी जड़ रूपों को एक में समाविष्ट कर जड प्रकृति का नाम दे दिया गया। वैसे ही चेतन में अल्प चेतन और सर्वज्ञ चेतन ये मूल तत्त्व भी हो यह तीनों शब्द पिण्ड में आत्मा तथा ब्रमाण्ड में परमात्मा पर एक समान घटित हो जाते हैंविचार किया जाता है सांख्य, उपनिषद् आदि में ईश्वर जीव प्रकृति इन तीनों मूल सताओं को स्वीकार करते हैं।

     चैतवाद-त्रैतवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन करने वाले महर्शि दयानन्द सरस्वती जी चैतवाद का सिद्धान्त है कि किसी वस्तु के निर्माण में तीन प्रकार के कारणों का होना आवश्यक है। वे है उपादान कारण, निमित कारण तथा साधारण कारण। इन्हें क्रमशः समवायी कारण, निमित कारण तथा असमयावी (अकारिक कारण)उदाहरणार्थ हम घड़े का दृष्टान्त लेते हैं। उपादान या समवायी कारण वह है जिसके बिना घड़ा न बन सके, जो स्वयं रूप बदलकर घड़ा बन जाए। इस परिभाषा से मिट्टी घड़े का उपादान कारण या समवायी कारण हुआनिमित कारण वह है, जिसके बनाने से कुछ न बने, न बनाने से न बने, आप बने नहीं दूसरे को प्रकारान्तर से बना दे। इस परिभाषा में कुम्हार घड़े का निमित्त कारण हुआसाधारण कारण वह है जो किसी वस्तु के बनाने में साधन हो या साधारण निमित्त हो। इस परिभाषा में कुम्हार का गोल चाक आदि घड़े के निर्माण में साधारण कारण हुआ।

       वेतवाद का या बहुत्ववाद वह सिद्धान्त है जो कहता है मूल भूत सताएं तीन है। ये मूलभूत सताएं हैं ईश्वर जीव तथा प्रकृति। वेदों में इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन हैरामानुजाचार्य (जन्म 1017) मध्वाचार्य (जन्म 1119) भी ईश्वर तथा जीव की अलग अलग सताएं मानते थे। वर्तमान युग में त्रेतवाद का प्रतिपादन महर्षि दयानन्द (1824-1883) ने किया और अनेको पण्डितों ने सांख्यदर्शन के सूत्रों का भाष्य त्रेतवाद ही किया है। तीन मूल भूत सत्ताओं ईश्वर जीव प्रकृति के सिद्धान्त को हमने त्रेतवाद या बहुत्ववाद की श्रेणी में रखा है।

       सृष्टि का उपादन कारण प्रकृति है परमाणु है। यह उपादान कारण न हो तो सृष्टि बन नहीं सकती। सृष्टि का निमित्तकारण ब्रह्म या ईश्वर है। वैसे सृष्टि में प्रकृति ने नाना प्रकार ब्रह्माण्ड में सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, अप, तेज. वायु, आकाश आदि तथा पिंड में ज्ञानेन्द्रियां कर्मेन्द्रियां आदि साधारण कारण हैं। जैसे कुम्हार द्वारा निर्मित घड़े का उद्देश्य पानी भरना है, वैसे सृष्टि का उद्देश्य जीवात्मा को कर्मफल देना होता है। उसे विकास के मार्ग पर डाल देता है। प्रकृति परमेश्वर के साथ जीवात्मा न हां तो सृष्टि का संचालन खेल मात्र रह जाता है।

      इन सब कारणों से सृष्टि की रचना में न एकत्ववाद से काम चलता है न द्वित्ववाद से काम चलता है। त्रेतत्वाद से ही इस समस्या का समाधान हो सकता है। उपनिषदों गीता सांख्य में त्रेतवाद माना है।

वेदो में बेतवादः द्वा सुपर्णा सयुजा समानं वृक्षं परिशस्वजाते।

तयोरन्यः पिप्पलं स्वादु अति अनश्नन अन्यः अभि चाकशीति।। (ऋग्वेद)

बालात एकम अणीयस्कम उत एक नैव दृश्यते। 

ततः परिण्वजीयसी देवता सा मम प्रिया।। (अर्थववेद) 

      पिण्डरूपी वृक्ष तथा ब्रह्माण्डरूपी वृक्ष में वह जीव रूपी पक्षी पिण्ड में इन्द्रियों का तथा ब्रह्माण्ड में सांसारिक विषयों मीठा-मीठा लुभावना भोग ले रहा है, दूसरा परमेश्वररूपी पक्षी जीवात्मा द्वारा किये गये रूपी कर्मों का फल देने के लिए उसकी गति विधि को देखता रहता है।

 

महर्षि विरजानन्द जी के जीवनवृत्त की एक झलक

महर्षि विरजानन्द जी के जीवनवृत्त की एक झलक

      ब्राह्मण कुल के धार्मिक परिवार में जन्मे विरजानन्द का उपनयन संस्कार कराया गया था और इस बालक ने गायत्री मंत्र की दीक्षा पाई थी। पांच वर्ष की आयु में चेचक (माता) के रोग में इसकी आँखें चली गई थी। विरजानन्द बाल्यावस्था में घर के अत्याचारों से दुःखी होकर निकल पड़े थे और विद्वानों का संग पाकर व्याकरण और दूसरे शास्त्रों के मर्मज्ञ बन गए थे। विरजानन्द बुद्धिमान् था और उनकी स्मरणशक्ति बड़ी तीव्र और आश्चर्यमय थी। उन्होंने आर्षग्रन्थों की कसौटी को अपने हाथों में रखा।

      विरजानन्द जी रात को 2 बजे उठकर तीन घण्टे समाधि लगाते थे और नियत समय पर पहुँचकर पाठशाला में छात्रों को पढ़ाते थे। विरजानन्द जी ने बड़ी तपश्चर्यापूर्वक गंगा तीर पर रहकर तीन वर्ष तक गायत्री मंत्र का जप किया था। कण्ठ पर्यन्त जल में खड़ा होकर गायत्री मंत्र का जप करके इस अन्धे नवयुवक ने अपने तपोबल से अगाध विद्या और अलौकिक ब्रह्मतेज प्राप्त किया था। आँखें न होने के कारण विरजानन्द की चित्तवृत्ति अन्तर्मुखी सरलता से हो गई थी। विरजानन्द जी ने वेद की मर्यादाओं का पालन करते हुए कठोर पुरुषार्थ किया और बीस वर्ष की आयु में आचार्यों की तेजस्वी परम्परा में प्रविष्ट कर गये थे।

     जा इसके पश्चात् विरजानन्द जी ने कनखल में योगिराज दण्डी स्वामी सम्पूर्णानन्द जी के चरणों में बैठकर एक वर्ष तक वेदों की शिक्षा प्राप्त करके संन्यास धारण किया था। बालब्रह्मचारी दण्डी स्वामी विरजानन्द की प्रभु-भक्ति, ऋषि- भक्ति और मातृ-भूमि के प्रति बड़ी श्रद्धा थी। गुरुजी ने विरजानन्द को ‘ऋषियांवाला’ की पदवी से विभूषित किया था।

      23 वर्ष की आयु में महर्षि विरजानन्द जी का यश सर्वत्र फैल गयासंसार में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं है जब किसी के सदाचरण की सुगन्ध संसार में न फैली हो और लोग उससे अपरिचित रहे होंशास्त्रार्थ के युग में हरद्वार, काशी, मथुरा और वृन्दावन के बड़े-बड़े दिग्गज संस्कृत के विद्वान् एक स्वर से कह रहे थे कि मथुरा वाले दण्डी स्वामी विरजानन्द को पराजय करो और दिग्विजय को प्राप्त करोविरजानन्द जी शास्त्रार्थ के पुरोधा थे। काशी, मथुरा और वृन्दावन के प्रसिद्ध विद्वान् उनकी संस्कृत की शुद्ध वक्तृता इसलिए सुनने आते थे कि वह प्रणाली मन्त्र उच्चारण की सीख सकें जो ठीकठीक वैदिक है।

      स्वामी जी पाठशाला में छात्रों को पृथक्पृथक् पढ़ाते थे, क्लास बनाकर नहीं पढ़ाते थे। वे छात्रों से अन्वय बनवाते थे और मन्त्रों को निरुक्तरूपी यौगिक चाबी से खोलकर अष्टाध्यायी, महाभाष्य, निरुक्त, निघण्टु और शतपथादि ग्रन्थों का प्रमाण देकर मन्त्र में एक-एक शब्द का अर्थ सिखाते थे और छात्र विद्वान् बनकर घर लौटते थे। सृष्टि में वेदमन्त्रों के अर्थों को समाधिस्थ बुद्धि से दर्शन कराने वाले ही ऋषि कहलाते हैं। ऋषि का दूसरा नाम मन्त्रद्रष्टा है, मन्त्रद्रष्टा होने के कारण ही स्वामी विरजानन्द और स्वामी दयानन्द ऋषि और महर्षि कहलाये। न महर्षि विरजानन्द जी की योग्यता का परिचय इस बात से मिलता है कि दयानन्द जी स्वयं यह वर्णन करते हैं कि शिक्षा समाप्त करके दो वर्ष तक आगरा में शास्त्रों का गम्भीर पर्यालोचन करते रहे। जहाँ भी उन्हें बाधा आती थी, वे गुरुजी से सम्पर्क करके उसका समाधान कर लेते थे। आर्षग्रन्थों के प्रति दयानन्द की गहरी निष्ठा गुरु विरजानन्द की ही देन थी

       ऋषि विरजानन्द जी ने दयानन्द को वेदविद्या सिखाकर अपनी प्रचण्ड शक्ति किरणों द्वारा ऋषि श्रेणी का मनुष्य बनाया और संसार से अविद्या-अन्धकार मिटाने के लिए, वेदों के पुनरुद्धार के लिए और प्रचार के लिए उद्यत कियायही थी वैदिक काल की महिमा और प्राचीन ऋषियों की तेजस्वी परम्परा । पृथ्वी पर पुनः वैदिक समय लाने के लिए और संसार में वेदों की कीर्ति फैलाने के लिए अपना जीवन अर्पित करके महर्षि विरजानन्द जी अमर हो गए। उनका सारा हृदय वेदविद्या से परिपूर्ण था।