ऋषि दयानन्द का आदर क्यों

“ऋषि दयानन्द के चरित्र में अनेक सद्गुणों का विकास इस प्रकार हुआ है कि वह मुझे बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है। कुछ लोग महर्षि के जिस गुण को एवं उसके विकास को दोष समझते हैं, उसे ही मैं एक महत्वपूर्ण और आवश्यक गुण समझता हूँ। बालक मूलशंकर की शिवरात्रि संबंधी घटना से लेकर ऋषि दयानन्द की पुराण, कुरान, बाइबल आदि की स्वतंत्र आलोचना तक, लोग उस पर विचार स्वातंत्र्य और अन्य धर्मों की ओर घृणात्मक दृष्टि का लांछन लगाते हैं। परंतु उसने कब और कहाँ अन्य धर्मों पर घृणात्मक दृष्टि की है, मुझे तो इसका पता नहीं चलता। उसने यह तो कहीं नहीं कहा कि अमुक धर्म बूरा व घृणा योग्य है, अतः उस धर्म के अनुयायी उसे मानना छोड़ दें। उसने ‘सत्यार्थप्रकाश’ में अन्य धर्म संबंधी जिन ग्रंथों की आलोचना की है, वह उसके विचार स्वातंत्र्य का सुंदर उदाहरण है। स्मरण रखना चाहिए कि विचार स्वातंत्र्य कोई भयंकर वस्तु नहीं है। उसी से युगान्तर उपस्थित हो सकता है। वही संसार को उत्थान के मंच पर ले जाता है। विचार स्वातंत्र्य से घबराना कोरी कायरता है। यदि ऋषि ने ‘सत्यार्थप्रकाश’ में अन्य धर्मों की स्वतंत्र आलोचना की है तो पुण्यकर्म ही किया है। अन्य धर्म वालों को उससे न तो घबराना चाहिए, न ही चिढ़ना ही चाहिए। उनका कर्तव्य है कि वे स्थिर चित्त से उस पर विचार करें और उन्हें यदि ऋषि के बतलाये हुए दोष ठीक जचें तो प्रसन्नतापूर्वक अपने धर्म का संस्कार करें। इससे तो उन्नति ही होगी। अतः ऋषि की विचार स्वतंत्रता पुण्य वस्तु है। संसार उससे लाभ उठा सकता है। क्या ऋषि का यह गुण सम्मान योग्य नहीं है?”

वेदों का क्रम

शंका- पश्चिमी लेखों का मानना है कि चार वेदों में कोई क्रम नहीं हैं? चार वेदों विभिन्न विभिन्न काल में प्रकाशित हुए।

समाधान- यह वेदों पर आक्षेप करने वाले की  बुद्धिहीनता और स्वाध्याय की कमी को दर्शाता हैं। वेद चार हैं। उनके प्रधान विषय और सन्देश को समझने से सरलता से यह समझा जा सकता है कि चरों वेद क्रम के अनुसार हैं।

ऋग्वेद में विज्ञान की प्रधानता है। ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त पदार्थों का उसमें निरूपण है। ऋग्वेद अग्नि से आरम्भ होकर नाना विज्ञानों का बोध कराते हुए संज्ञानसूक्त पर समाप्त होता है। अर्थात यथार्थ ज्ञान का फल मनुष्यों के विचार, उच्चार तथा व्यवहार की एकता होनी चाहिए। सभी की एक मति एक उक्ति एवं एक गति होनी चाहिए।

यजुर्वेद कर्मवेद है। ज्ञान के पश्चात कर्म मनुष्य का प्रयोजन है। यजुर्वेद के पहले मंत्र में देवो व: सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे अर्थात ऐसा यत्न करो जिस से भगवान् तुम मनुष्यों को श्रेष्ठतम कर्म में प्रवृत रखे की प्रेरणा है। अंत के अध्याय में कुर्वन्नेवेह कर्माणि मंत्र में सन्देश दिया गया है कि मनुष्य इस संसार में समस्त आयु कर्म करता हुआ ही जीने की आशा करे। इसी अध्याय के 15वे मंत्र में पुन: कहा कि कृतं स्मर। किल्बे स्मर अर्थात हे मनुष्य अपने किये कर्मों को स्मरण कर। इस प्रकार से यजुर्वेद कर्म प्रधान वेद हैं।

सामवेद में साम का अर्थ है सांत्वना। कर्म से श्रान्त उद्भ्रांत मनुष्य को शांति चाहिए। उसके लिए सामवेद है। सामवेद के प्रथम मंत्र में भगवान् काआह्वान है। उपासना की विभीन भूमिकाओं का वर्णन करते हुए अंत में सामवेद युद्धसक्त पर समाप्त होता है। अंत में युद्धसक्त एक विशेष सन्देश दे रहा है। योगी लोग योग की चरम सीमा तक पहुंचने के लिए संसार में प्रसृत सभी आंतरिक एवं बाहर के पापों से युद्ध करता हैं। धर्म पथ के पथिक को अधर्म से युद्ध करना अनिवार्य है। यही युद्ध सूक्त का सन्देश हैं।

अथर्ववेद में शांति प्राप्त करने के पश्चात सूक्षम विषयों की ओर प्रवृति होती है। ताकि मनुष्य के संशयों का निवारण हो जाये। अथर्ववेद के प्रथम वर्ग में भगवान् से प्रार्थना है कि हमारा श्रुत हमारे पास बना रहे- मय्येवास्तु मयि श्रुतं। विस्मरण, अपस्मरण के कारण वह नष्ट न होने पावे। अथर्ववेद का अंतिम मंत्र पनाय्यं तदश्विना कृतं वां वृषभो दिवो रजसः पृथिव्याः का सन्देश है कि हे अश्विनों! तुम्हारी यह रचना प्रशंसनीय है किन्तु द्यौ, अंतरिक्ष , पृथ्वी पर सब प्रकार की सुख वृष्टि करने वाला परमेश्वर भी प्रशंसनीय है। असंख्य प्रशंसाए हैं और जो वाग्यज्ञ, ज्ञानयज्ञ में जो ज्ञान है, उन सब का पान करने के लिए तुम सब उन्हें प्राप्त करो। इस प्रकार से संक्षेप में अथर्ववेद का पहला मन्त्र ज्ञान के बने रहने का सन्देश देता है ताकि उसके अनुसार व्यवहार मनुष्य करें। अंतिम मंत्र यह कह रहा है कि यह सृष्टि अश्विनों अर्थात जड़ चेतन की क्रिया हैं। जिसका करता सबका सुखविधाता है। ज्ञान की जिसकी चर्चाएं हैं। उनका पान करो अर्थात अपने जीवन का अंग बनाओ। यही ज्ञान का पान है।

इस प्रकार से यह सिद्ध होता है कि चारों वेदों में वैज्ञानिक रूप से क्रम सम्बन्ध हैं।

-डॉ विवेक आर्य

“क्या इस धरती पर हिन्दू होना पाप है?”

“क्या इस धरती पर हिन्दू होना पाप है?”

 

सुरेश पंडिता रात के दो बजे एकाएक नींद से उठकर बैठ गया। उसको सपने में श्रीनगर के समीप गांव में अपना घर, खलियान, सेब के बाग, डल झील में शिकारे की सवारी, बर्फ से ढके पहाड़ और सोहाना मौसम दिख रहा था। उसने देखा कि तभी एक गोली चली जो उसके पिताजी का सीना चीरते हुए उन्हें सदा के लिए शांत कर गई। उसकी माँ जो घर के आंगन में सफाई कर रही थी एकाएक उसे बचाने घर के अंदर भागी तो एक सीधी गोली उसकी पीठ में  आकर धस गई। बालक सुरेश कुछ समझ पाता इससे पहले उनकी दुकान पर काम करने वाले एक बूढ़े चाचा उसे पिछले दरवाजे से लेकर खेतों में जा छुपे। उनके घर पर आतंकवादी हमला हुआ था। उनके घर में आग लगा दी गई। जैसे ही आग  लपटे आसमान छूने लगी। सुरेश की आँख खुल गई। पूरा बदन पसीने से तरबतर। यह सपना सुरेश पिछले दशक में न जाने कितनी बार देख चूका था। पर रह-रहकर वह फिर याद आ जाता। उसने अपने अतीत को याद किया जब 1989 में आतंकवादियों ने उन्हें कश्मीर से भाग जाने की धमकी दी थी। स्थानीय मस्जिद के लाउडस्पीकर से अजान के बदले धमकी दी गई कि कश्मीरी हिन्दुओं यहाँ से भाग जाओ और अपने स्त्रियों को हमारे लिए छोड़ जाओ। उसके पिता घर के मंदिर में गीता और क़ुरान शरीफ एक साथ रखते थे। वो किसी रोजे या ईद पर मुसलमानों के घर जाकर मेलमिलाप करना कभी नहीं भूलते थे। उनका कहना था कि हम यहाँ सदियों से एक साथ भाई भाई बनकर रहते आये हैं। उन्हें हिन्दू-मुस्लिम एकता पर पूरा विश्वास था। उन्होंने उस धमकी को नजरअंदाज किया था। परिणाम सुरेश का घर, माता-पिता, श्रीनगर सब सदा के लिए बिछुड़ गए। सुरेश का बचपन पहले जम्मू के टेंट फिर दिल्ली की कश्मीरी कॉलोनी में बदतर हालात में निकला। वहां रहने वाले हर कश्मीरी पंडित की जुबान पर लगभग यही कहानी थी। सुरेश जैसे तैसे बड़ा होकर सेना में शामिल हो गया। अपनी ड्यूटी वो बखूबी निभाता था।

सन 2002 में सुरेश की ड्यूटी बंगलादेश बॉर्डर पर लगी थी। उसे सख्त हिदायत दी गई कि किसी को बॉर्डर के पार न जाने दे। एक दिन रात में उसने झाड़ियों में कुछ हलचल देखी।  हवाई फायर कर उसने सचेत किया। उस दिशा में गोलीयां भी चलाई मगर एक छोटी नहर के साथ की सुखी जमीन का फायदा उठाकर कुछ लोग भारत की सरहद में शामिल हो गए। सुरेश उनके पीछे दौड़ा मगर अँधेरे का फायदा उठाकर वे भाग गए। तलाशी के दौरान सुरेश को चार सोने के कंगन एक पोटली में बंधे मिले। उन्हीं घुसपैठियों के थे जो गिर गए थे। सुरेश ने उठाकर वह अपनी जेब में रख लिए। सोचा कल कोई इसे लेने आएगा तो उसे पकड़ लूंगा। मगर कोई न आया। वह कंगन सुरेश कई बार निकालकर देखता। सोचना की किसके होंगे। उसके मन में अनेक ख्याल आते। मगर यह कोई निर्णय नहीं ले पाया।

2006 में सुरेश की ड्यूटी बनारस में संकट मोचन मंदिर के समीप लग गई। बनारस के माहौल में सुरेश अपने आपको धार्मिक प्रवृति के अनुकूल बनाने में लगाने लगा। नित्य सुबह शाम मंदिर जाना उसकी दिनचर्या का भाग बन गया। सात मार्च को सुरेश संकट मोचन मंदिर आया था। तभी मंदिर के समीप एक जोर का बम धमाका हुआ। सैकड़ों हताहत हुए। अनेकों की लाशों के इतने टुकड़े हो गए कि पहचान में भी न आये। सुरेश हवा में उछल कर दूर जा गिरा और बेहोश हो गया। एक महीने के बाद उसकी आंख एक हस्पताल में खुली। उसे पता चला कि एक नर्स सीमा द्वारा लगातार उसकी एक महीने तक सेवा हुई जिससे उसके प्राण बच पाए। उसने सीमा को धन्यवाद दिया। मन ही मन आभार प्रकट किया। सहसा उसे लगा कि सीमा के प्रति उसके मन में अलग विचार आ रहे थे। पर वह चुप रहा। अस्पताल से छुट्टी के दिन उससे रहा नहीं गया। वह जीवन में अकेला था। उसे एक जीवन साथी की आवश्यकता थी। सीमा उसे जीवन संगनी बनने के लिए सही लगी। उसने सीमा के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा और उसके सामने सोने के चार कंगन रख दिए। यह वही कंगन थे जो उसे बॉर्डर पर मिले थे। वर्षों से उसके पास सुरक्षित थे। वह कंगन देखते ही सीमा फुट फुट कर रोने लगी। सुरेश ने उससे इतनी जोर से रोने का कारण पूछा।

सीमा ने पूछा आपको ये कंगन कहाँ मिले। सुरेश ने सब कुछ बता दिया कि उसे कैसे यह बंगलादेश सीमा पर मिले। सीमा ने रोते रोते बताया कि ये कंगन उसकी माँ ने उसके और उसकी बड़ी बहन के लिए बनवाये थे। उनका परिवार बंगलादेश का रहने वाला था। 2002 के गुजरात दंगों की आंच भारत देश की सीमा लाँघ कर उनके यहाँ पहुंच गई। स्थानीय चुनावों में मुस्लिम गुंडों ने हिन्दुओं के घरों पर हमला कर दिया ताकी वो वोट करने न जाये। अनेक हिन्दू लड़कियों की घरों से उठा लिया गया। उसकी बड़ी बहन ललिता भी उनमें एक थी। जिसकी लाश दो दिन बाद खेत में निवस्त्र मिली थी। ललिता के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था। उनका परिवार इतना डर गया कि उन्होंने तुरंत भारत आने का मन बना लिया। पिताजी ने एक दलाल को खोज निकाला जिसने घर की सभी जमापूंजी सीमा पार ले जाने के बदले मांग ली। मरते क्या न करते। जैसे तैसे रात को जीप में बैठकर सीमा से कुछ किलोमीटर पहले पहुंचे। फिर पैदल रात को पार करने लगे। तभी भारतीय सेना को उनकी आहत मिल गई। गोलियों की बौछार से जैसे तैसे बचते हुए भारतीय सीमा उन्होंने पार कर ली। उसी दौरान उसके हाथ से कंगनों की पोटली गिर गई। वहां से कोलकाता और उधर से बनारस अपने दूर के रिश्तेदारों के यहाँ पहुंचे थे। पिछले कुछ समय से सीमा ने गुजारे के लिए उस हस्पताल में नौकरी कर ली थी।

यह आपबीती सुनकर सुरेश को रोना आ गया। उसकी और सीमा की आपबीती में कोई अंतर नहीं था। दोनों अपनी पूर्वजों की धरती से बेदखल हुए थे। दोनों को अपने परिवारों के सदस्यों, अपनी धन-संपत्ति, अपने मान को खोना पड़ा था। दोनों का एक ही शांतिप्रिय सम्प्रदाय ने शोषण किया था। दोनों एक ही बात सोच रहे थे कि

“क्या इस धरती पर हिन्दू होना पाप है?”

जेएनयू में बार-बार तांडव का कारण

खबर कौनसी बड़ी होनी चाहिए और कौनसी छोटी यह बात राजनेता और मीडिया मिलकर तय करते है। पिछले दिनों पुरानी दिल्ली में हुई आग की घटना में 43 लोगों की मौत के मामले में भी मीडिया चुप्पी साधे रहा क्योंकि दिल्ली सरकार के करोड़ों के विज्ञापनों का दम था कि इस अग्निकांड के लिए कहीं भी दिल्ली सरकार पर उंगली न उठे। दुर्घटना के बाद मुख्यमंत्री दिल्ली में ही चुनावी रैलियां करते रहे, लेकिन किसी चैनल ने इस बारे में कोई सवाल नहीं पूछा गया। इसके बाद राजस्थान के कोटा में 100 सौ अधिक नवजात बच्चें मौत के मुंह में समा गये लेकिन छुट पुट बयानबाजी के अलावा कोई ठोस कदम धरातल पर उतरता दिखाई नहीं दिया।

किन्तु जैसे ही अब जवाहर लाल नेहरू में छात्रों का आपसी विवाद गहराया इस विवाद के बाद राजनीति गरमाती जा रही है। बड़े-बड़े नेताओं के बयान सामने आते जा रहे हैं। राहुल गांधी से लेकर प्रियंका गांधी जहां पहले ही घटना की निंदा कर चुके हैं वहीं गृहमंत्री अमित शाह ने हमले की जांच के आदेश भी दे दिए। अचानक बवाल के खिलाफ जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, जाधवपुर यूनिवर्सिटी समेत देश भर में फिर अचानक हर बार की तरह एक चिन्हित वर्ग विरोध प्रदर्शन करने पर उतारू हो गया। विरोध का आलम ये बना कि मुंबई में हाथ में पोस्टर लेकर और हिंसा के खिलाफ नारे लगाते हुए गेटवे ऑफ इंडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने आंदोलन किया। यहाँ तक फ्री कश्मीर के पोस्टर भी इसमें लहराए गये।

साफ़ कहा जाये तो कुछ वर्ष पहले आतंकी मकबूल भट्ट की बरसी मनाने से चला जेएनयु विवाद अब फ्री कश्मीर जैसे नारे तक पहुँच गया। हर एक राजनितिक मुद्दे पर सड़कों पर निकलकर शोर मचाने वाले छात्र सोचते है कि वह रोजगार समाजवाद भय भूख के खिलाफ कोई युद्ध कर रहे है। जबकि अगर ध्यानपूर्वक देखा जाये तो इसकी आड़ में ये छात्र एक कलुषित मानसिकता के शिकार बन रहे है। हर वक्त इस विश्वविद्यालय में आइसा (आल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) और एसएफआई (स्टूडेन्ट फेडरेशन आफ इंडिया) को व्यवस्था से लड़ते हुए दिखना ही पड़ेगा। उन्हें वजह बेवजह सरकार से लड़ते हुए दिखना है, उन्हें खुद को पीड़ित की तरह पेश करना है। छात्रों के पक्ष में यदि सरकार अपने फैसले पर पुनर्विचार करे तो उसे अपनी जीत के तौर पर पेश करना है। किसी भी द्रष्टिकौण से देखा जाये तो आज ये घायल छात्र इस अपने भविष्य के बजाय चंद राजनितिक परिवारों और पार्टियों के लिए ज्यादा लड़ रहे है। एक ऐसी विचारधारा के पोषण के लिए जिसमें नक्सल और भारत विरोध का वायरस लगा हुआ है।

आइसा की स्थापना 1990 में हुई थी। अब यह सवाल हो सकता है कि इतने नए संगठन को एक हिंसक आंदोलन से जोड़ना क्या उचित होगा? यहां महत्वपूर्ण है कि आइसा की राजनीति जिन दीपांकर भट्टाचार्य और कविता कृष्णन ने प्रेरणा पाती है, उनकी सहानुभूति किस तरफ है, यह किसी से छुपा है?  क्योंकि नाम बदल लेने से राजनीति कब बदल जाती है? कविता कृष्णन खुले तौर पर कश्मीर में चरमपंथ को प्रोत्साहित करती है। भारतीय सेना की आलोचना इनका पेशा है। कुछ समय पहले धारा 370 हटाने के 30 दिन होने के बाद कविता ने बंधक में कश्मीर एक तस्वीर को अपना प्रोफाइल पिक्चर पर लगाया था। इस प्रोफाइल पिक्चर में कश्मीर के हिस्से को रक्त रंजित बताया गया और साथ ही अंधकार के 30 दिन, कश्मीर को धोखा और कश्मीर के साथ खड़े रहने जैसे संदेश वाले हैशटैग दिए गए थे।

दूसरा भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य भी समय समय पर अपने बयानों से नक्सलवाद को समर्थन करते रहते है। किन्तु जब मीडिया में जेएनयू को लेकर चल रही बहसों को देखते है तो विचार आता है कि यह वामपंथ का विचार प्रभावी होने के बावजूद सिमटता क्यों जा रहा है? कभी इस आन्दोलन में किसान था, मजदूर था दक्षिण अफ्रीका की गरीबी से लेकर इथोपिया के कुपोषण तक की चिन्ता थी लेकिन आज ईरान, इराक, सीरिया में चल रही गतिविधियों पर इनकी पैनी नजर है। अमेरिका इजराइल विरोध है, हिन्दू संस्कृति का विरोध हो या कश्मीर में कट्टरपंथ का बढ़ावा देने की इन तमाम चिन्ताओं के साथ महंगी शराब और अच्छी सिगरेट के लिए दुनिया भर के फेलोशिप जुटाने में लगे हैं। इन सबके बीच उन्हें देश की गरीबी का ध्यान अचानक उस वक्त आता है, जब छात्रावास की फीस 30 रुपए से बढ़ाकर 300 रुपए कर दी जाती है। यदि वास्तव में उनकी लड़ाई गरीबी के खिलाफ और अच्छी शिक्षा के लिए है फिर यह सारी सुविधाएं महज दो-चार विश्वविद्यालयों तक सिमट कर क्यों रह जानी चाहिए? क्योंकि इन मुट्ठी भर विश्वविद्यालयों में उन छात्रों का बहुमत है, जिन्हें ये अपने लोग कहते हैं।

जरा सी बात का होव्वा खड़ा करना हो या भारत की छवि को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नीचा दिखाना वामपंथी संगठनों के पास अपनी बात कहने के लिए सक्षम कैडर है और उसे ठीक तरीके से देश भर में फैलाने के लिए एक मजबूत तंत्र भी। ताजा मामले को ही देखें तो किस तरह रातों-रात बैनर पोस्टर छप गये और सुबह दिल्ली से लेकर मुम्बई समेत देश भर में नाटक किया गया। इसमें इनके पत्रकार, अभिनेता- अभिनेत्रियाँ समेत प्राध्यापक, एनजीओकर्मियों का एक विशाल नेटवर्क शामिल है। इसके माध्यम से कोई भी बात वे बार-बार कहकर समाज के मन में इस तरह बिठा देते हैं कि हम इस बात का कोई दूसरा पक्ष हो सकता है, इस पर विचार ही नहीं कर पाते। पिछले कुछ दिनों से जेएनयू में पढ़े छात्रों की गरीबी और उस गरीबी से निकल कर सफल हुए लोगों के ऐसे ही किस्से पढ़ने को मिल रहे हैं। यह सब पढ़कर ऐसा लग रहा है कि गरीबी सिर्फ जेएनयू के वामपंथी छात्रों के हिस्से है बाकि सारा देश समृद्ध है। यही कारण है कि जेएनयु आइसा, एसएफआई का गढ़ है, इसलिए बार-बार वह खुद को अपने नाखूनों से नोचकर नाटकीय रूप से वह हमले का शिकार हो रहा है।

ईरान अमेरिका युद्ध हुआ तो क्या होगा..

ईरान और अमेरिका की जंग को लेकर कई कयास लगाये जा रहे है कि अगर ये युद्ध हुआ तो किसकी हार होगी, किसकी जीत. किसके दम पर ईरान एक सुपर पावर को आँख दिखा रहा है। आज यह सवाल दुनिया भर में सोशल मीडिया से लेकर सभी जगह छाए हुए है. लेकिन अगर इस मामले को थोडा पीछे जाकर देखें तो 16 मई 2019 को लेबनान की राजधानी बेरुत में कट्टरपंथी संगठन हिज्बुल्लाह के नेता नसरल्लाह ने ईरान की इस्लामिक क्रांति के 40 वर्ष पूरे होने पर एक बड़ी रैली में मजबूती से संदेश दिया था कि अगर अमेरिका ईरान से युद्ध छेड़ता है तो इस लड़ाई में ईरान अकेला नहीं होगा, क्योंकि हमारे इलाके का भविष्य इस्लामिक रिपब्लिक से जुड़ा है। शायद इन पिछले लगभग सात  महीनो में अमेरिका और ईरान की जबानी जंग के बीच ईरान ने लेबनान से लेकर सीरिया, इराक, यमन और गजा पट्टी तक में हिजबुल्लाह जैसे हथियारबंद गुटों में हजारों शिया लड़ाके इक्कठे किये जो ईरान के प्रति निष्ठा जताते हैं।

जिसका नतीजा अब देखने को मिल रहा है 3 जनवरी को इराक में बगदाद हवाई अड्डे पर अमेरिकी हवाई हमले में ईरानी कमांडर कासिम सुलेमानी की हत्या होने बाद ईरान ने बदला बताते हुए अमेरिका के कई सैन्य ठिकानों पर हमला किया गया इससे साफ हो जाता है कि हिज्बुल्लाह जैसे हथियारबंद गुटों ने अपना काम करना शुरू कर दिया है। इस बात की पूरी आशंका है कि अमेरिका के साथ चल रहा तनाव अगर युद्ध की परिणति तक पहुंचता है तो वह इन लड़ाकों को एकजुट कर इनका बड़ा इस्तेमाल करेगा। ईरान द्वारा किये हमलों से संदेश दिया कि ईरान अब अमेरिकी द्वारा मध्य पूर्व में खिंची रेखाओं का उल्लंघन करेगा और न जाकर पीछे से युद्ध में शामिल होगा। क्योंकि ईरान द्वारा किये हमलें में देखा जाये तो कोई भी मिसाइल ऐसी जगह ऐसे समय नहीं दागी गयी जिससे अमेरिका को भारी नुकसान हो। ईरान ने जानबूझकर ऐसा किया है ताकि जो युद्ध का संकट मंडरा रहा है वो कहीं नियंत्रण से बाहर ना हो जाए।

ईरान सिर्फ अपने लोगों की तस्सली भर के लिए ऐसे जोखिम उठा रहा है। ताकि ईरान और सऊदी के मध्य चली आ रही इस्लामी वर्चस्व की इस जंग में कहीं ईरान से जुड़े शिया बाहुल देश और कट्टरपंथी संगठन उसे कमजोर न समझ ले। क्योंकि पिछले कई महीनों में ईरानियों ने होर्मुज की खाड़ी पर अमेरिकी निगरानी ड्रोन को मार गिराया था, एक ब्रिटिश तेल टैंकर को जब्त कर लिया था और सऊदी अरब के तेल के बुनियादी ढांचे आरमको पर बमबारी की थी। इसके बाद 27 दिसंबर हिजबुल्लाह ने अमेरिकी ठेकेदार की हत्या कर दी और इराक के किरकुक प्रांत में अमेरिकी ठिकाने के पास रॉकेट हमले में कई अमेरिकी और इराकी सैन्य व्यक्तियों को घायल कर दिया था।

देखा जाये तो इस लड़ाई में ईरान के पास जो ताकत है वह है उसके सशस्त्र बल ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड द्वारा तैयार किये संगठित संगठन है जो यमन ईराक फिलिस्तीन समेत कई देशों में फैले है। हिज्ब्बुलाह की बात करें तो इस संगठन नीव लेबनान के गृहयुद्ध के दौरान 1980 के दशक में रखी थी। आज यह इलाके का सबसे प्रभावशाली हथियारबंद गुट है जो ईरान के प्रभाव को इजराइल के दरवाजे तक ले जा सकता है। इस गुट के पास रॉकेट और मिसाइलों के अलावा कई हजार अनुशासित लड़ाके हैं जिनके पास जंग लड़ने का खूब अनुभव है। पिछले छह साल से सीरिया में लड़ रहा हिजबुल्लाह जंग के मैदान में अपनी काबिलियत को दिखा कर रहा है।

इसके अलावा पिछले कुछ वर्षों से सऊदी अरब और अमेरिका के लिए सिर बने यमन के शिया विद्रोही जिन्हें हूथी के नाम से जाना जाता है वह भी ईरान के साथ कन्धा मिलाकर खड़ा है। ईरान द्वारा उन्हें हथियार दिए हैं, इनमें लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों की भी बात कही जाती है जिन्होंने सऊदी अरब की राजधानी रियाद पर भी पिछले के सालों में हमले किए हैं। अगर अमेरिका और ईरान युद्ध के मुहाने पर पहुंचते है तो फलस्तीनी संगठन गजा का हमास और दूसरे छोटे शिया इस्लामिक जिहादी गुट भी ईरान की ओर से इजराइल पर हमले से लेकर अनेकों विरुद्ध गतिविधियों को अंजाम देने से पीछे नहीं हटेगा। हालाँकि माना जाता है कि ईरान इन गुटों को सैन्य मदद तो दे रहा है लेकिन इस गुट को आर्थिक ज्यादा मदद कतर से मिल रही है। ऐसे में उम्मीद कम है कि यह क्षेत्रीय युद्ध की स्थिति में ईरान के साथ जाएगा। लेकिन मजहब के नाम पर सुन्नी चरमपंथियों का यह गुट इस्लामिक जिहाद के लिहाज से ईरान के ज्यादा करीब है।

इसके अलावा इराक में शिया मिलिशिया गुट पीएमएफ भी ईरान के साथ इस लड़ाई में शामिल हो सकता है। एक दशक से यह गुट इस्लामिक स्टेट से लड़ता आया है। खास बात ये है कि इस गुट में असैब अहल अल हक, कातेब हिज्बुल्लाह और बद्र संगठन शामिल हैं। इन तीनों का नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथ में है जिनके जनरल कासेम सुलेमानी से करीबी संबंध थे। सुलेमानी की मौत का बदला लेने को ये गुट ईरान के साथ शामिल हो सकता है। कुल मिला कर इनमें करीब 1 लाख 40 हजार लड़ाके हैं। भले ही यह संगठन औपचारिक रूप से इराकी प्रधानमंत्री के प्रशासन में है लेकिन राजनीतिक रूप से पीएमएफ के लोग ईरान के साथ जुड़े हैं। हालाँकि एक समय अमेरिकी सेना और पीएमएफ इस्लामिक स्टेट से जंग में मिल कर लड़े थे लेकिन अब यह दोस्ती लगभग टूट चुकी है। इसी का लाभ ईरान को मिल रहा है। पिछले कुछ वर्षों में ईरान ने सऊदी से लगते देशों में अपनी मजबूत पैठ तैयार की है इन्ही के बल पर ईरान अमेरिका को आँख दिखा रहा है। देखना यही होगा कि 7 जनवरी को आई ईरानी मिसाइल हमलों को देखते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कैसे जवाब देंगे? और नाटो के सदस्य देश अमेरिकी राष्ट्रपति के मध्य पूर्व के इस युद्ध में शामिल होने के उनके अनुरोध का जवाब कैसे देंगे?

इस्लाम का चमत्कार (अंधविश्वास)

चमत्कार

      ईमान के दो साधन हैं—एक बुद्धि, दूसरा सीधा विश्वास, प्रकृति की पुस्तक दोनों के लिए खुली है।

     प्रातःकाल सूर्योदय, सायंकाल सूर्यास्त, दिन व रात्रि का क्रम ऊषा की रंगीनी, बादलों का उड़ना, किसी बदली में से किरणों का छनना, इन्द्रधनुष बन जाना, पर्वतों की गगन चुम्बी चोटियाँ, सागर की असीम गहराई, वहाँ बर्फ के तोदे व दुर्ग, उछलती कूदती लहरों का शोर, बुद्धि देख-देखकर आश्चर्यचकित है। भूमि पर तो चेतन प्राणी हैं ही, वायु व जल में भी एक और ही विराट् संसार बसा हुआ है।

     विज्ञान के पण्डित नित नए अनुसंधान करके नित नए नियमों का पता लगा रहे हैं और इन नियमों के कारण प्रकृति के ऊपर अधिकार प्राप्त करते जाते हैं। जो घटनाएँ पहले अत्यन्त आश्चर्यजनक लगतीं थीं। वह इन नियमों के प्रकाश में साधारण-सी घटनाएँ बनकर रह जाती हैं। मनुष्य यह देखकर दंग है कि पानी आकाश से कैसे बरसता है? वैज्ञानिक एक हण्डिया में पानी डालकर उसे आँच देता है। पानी सूखता है, उड़ता है। वैज्ञानिक उस उड़ते पानी को ठण्डी नली में से गुज़ारता है और उड़ती हुई भाप को फिर पानी बना देता है। यह पानी कण-कण होकर फिर गिर पड़ता है। वैज्ञानिक कहता है यही वर्षा होने का रहस्य है। हमने चमत्कार समझा था, परमात्मा की कुदरत का विशेष रहस्य माना था। वैज्ञानिक ने वही चमत्कार छोटे स्तर पर स्वयं करके दिखा दिया। हमारा आश्चर्य समाप्त हो गया। हम इन्द्रधनुष पर लट्टू थे। वैज्ञानिक ने त्रिकोण के एक शीशे में ही एक छोटा-सा इन्द्रधनुष उत्पन्न कर दिया। हम इसे साधारण बात समझ बैठे। वैज्ञानिक बुद्धिमान् था हमारी सरलता पर हँसा और कहा मेरी शक्ति प्रथम तो सीमा में छोटी है। साधारण है। भला इस इन्द्रधनुष की उस आकाश में फैले हुए इन्द्रधनुष से तुलना ही क्या? जो आकाश के एक भाग में छा जाता है? मेरे कण भर जल से कोई खेत हरियाले हो सकते हैं या झीलें भर सकती हैं? वे भण्डार प्रभु के ही

हैं जिनका संसार प्रार्थी है, याचक है। फिर मेरी खोजें और आविष्कार

तो परमात्मा की रचनाओं की नकल मात्र हैं, वह उसी भण्डार

की एक बानगी है जो वस्तु वर्तमान संसार में पहले से ही विद्यमान

है। मैं उसे देखता हूँ उसकी दशा का चित्र अपनी बुद्धि में उतारता हूँ

और अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस भण्डार से एक छोटी-सी बानगी

प्राप्त करता हूँ और उस पर परमात्मा के ही नियमों का प्रयोग करके

कहीं इन्द्रधनुष का खिलौना कहीं पानी व भाप की गुड़िया बना लेता

हूँ। यह प्रकृति के नियमों का छोटा-सा भाग जो मेरी छोटी-सी

बुद्धि में आता है परमात्मा को सर्वशक्तिमान् व पूर्ण ज्ञान का

स्वामी सिद्ध करता है। यदि उसके सामर्थ्य का प्रकटीकरण बिना

किसी नियम के होता तो मनुष्य को अपने प्रयास की सफलता का

विश्वास करना कठिन हो जाता। उस खेती में जिससे हम सबका पेट

पालन होता है, क्या कुछ कम चमत्कार है। एक दाने के लाखों व

करोड़ों दाने हो जाते हैं। परमात्मा ही तो इन्हें बढ़ाता है। हम

उससे लाभ उठा लेते हैं। इसमें यदि नियम व व्यवस्था न हो तो

कोई किस भरोसे पर बीज बोए। उसे पानी दे और फ़सल काटे?

यह है बुद्धि के द्वारा ईश्वर पर विश्वास, अज्ञानी व्यक्ति बुद्धि से कोरा

है उसे प्रतिदिन की खेती में परमात्मा का हाथ दिखाई देना कठिन है।

सूरज व चाँद के तमाशे उसकी दृष्टि में परमात्मा की शक्ति के खेल

नहीं? परमात्मा और उसके साथ उसके प्यारों की शक्ति का

प्रदर्शन किसी प्रकृति नियम के विपरीत चमत्कार के द्वारा होना चाहिए।

1[1. मुस्लिम विचारक डॉ॰ गुलाम जैलानी बर्क ने प्रचलित इस्लाम से हटकर यह लिखा है, “अल्लाह का सबसे बड़ा चमत्कार यह सृष्टि—यह रचना है।” देखिये ‘दो कुरान’ पृष्ठ 622। पं॰ गंगाप्रसाद उपाध्याय जी ने लिखा है, “The occurence of an unnatural phenomenon is a contradiction of terms. If it occurs, it is natural, if it is natural it must occur. Then is it anti natural? No who can defy nature successfully.” Superstition अर्थात् चमत्कार यदि स्वाभाविक है तो चमत्कार नहीं यदि सृष्टि नियम विरुद्ध हैं तो हो नहीं सकते।  —‘जिज्ञासु’]

        इस लड़कपन के विचार ने अज्ञानी लोगों के दिलों में चमत्कारों की सृष्टि की है। वह उन्हीं लोगों को प्रभु तक पहुँचा हुआ ।मानते हैं जिनसे कोई करामात चमत्कार या प्रकृति के नियम विरुद्ध काम सम्बन्धित हो। कुछ सम्प्रदायों की आधारशिला ही इन्हीं चमत्कारी कहानियों पर है। स्वयं चमत्कार करना कठिन है, क्योंकि उसके मार्ग में प्रकृति के नियम बाधक हैं इसलिए इन मतों की पुस्तकों में चमत्कारों की असम्भवता को कुछ स्वीकार किया गया है, जैसे कि इञ्जील में वर्णन है—

     “उस ईसा ने ठण्डा सांस लिया और कहा यह पीढ़ी चमत्कार चाहती है? मैं तुम्हें सच कहता हूँ इस पीढ़ी को चमत्कार नहीं दिखाया जाएगा”1। —(मरकस आयत 8-12)

[1. डॉ॰ जेलानी ने भी अपनी पुस्तकों में चमत्कारों की चर्चा करते हुए यही प्रमाण दिये हैं।   —‘जिज्ञासु’]

       और कुरान में भी आया है—

      व कालू लौला उन्ज़िला इलैहे आयातुन मिन रब्बिही कुल 1 इन्नमल आपातो इन्दल्लाहे व इन्नमा इन्ना नजीरुन मुबीन॰ लो लमयक फिहिम अन्ना अंजलना अलैकल किताबो, तुतला अलैहिम इन्ना फ़ीजालिका लरहमता व ज़िकरालि कौमिय्योमिनून।

      और कहते हैं क्यों नहीं उतरीं उस पर उसके रब की ओर से निशानियाँ। पास अल्लाह के हैं और निश्चत ही मैं डराने वाला हूँ, प्रकट और क्या उनके लिये यह पर्याप्त नहीं कि हमने तुम पर पुस्तक उतारी है जो पढ़ी जाती है उन पर और उसमें कृपा है और वर्णन है मौमिनों के लिए।

      परन्तु पूर्ववर्तियों के सम्बन्ध में चमत्कारों की कहानियाँ सुनाने में कोई कानून बाधक नहीं। इसलिए ऐसी पुस्तकों के अपने काल के चमत्कारों का लाख इन्कार हो, पूर्वकालीन कालों के पैग़म्बरों के साथ चमत्कार जोड़ दिए गए हैं। काल बीतने पर श्रद्धालुओं ने वैसे ही और उनसे बढ़-चढ़कर विचित्र चमत्कारों के सम्बन्ध अपने पथ-प्रदर्शकों के साथ जोड़ दिए हैं। चमत्कार वास्तव में प्रभु की सत्ता की स्वीकृति नहीं इन्कार हैं।

      परमात्मा नित्य है, अनादि है तो उसकी शक्ति का प्रदर्शन भी नित्य है, शाश्वत है, क्षण-क्षण में होता है। परमात्मा का ज्ञान पूर्ण है। उसका ज्ञान जैसे प्रकृति के नियम हैं। जहाँ यह नियम टूटे समझो परमात्मा का ज्ञान भंग हुआ। परमात्मा के नियम व कार्य में परिवर्तन होना असम्भव है। उसके ज्ञान व कार्य का प्रदर्शन नित्य प्रति के कार्यों में हो रहा है। उनका साँचा पलटने की सद्बुद्धि को आवश्यकता नहीं। हाँ जिन लोगों की मान्यता ही यह है कि वह कानून से भी ऊपर हों जिस पर तर्क ननुनच न कर सके, वह परमात्मा को भी एक बड़ा, सारे संसार को घेरे हुए, मनमौजी राजा कल्पना कर सकते हैं। जिसकी इच्छा का भरोसा नहीं।

      अपनी या अपने प्यारों के लिए किसी समय कुछ कर गुज़रे। किसी पर दिल आ गया उसे रिझाने के लिए कुछ भी कर देना उससे दूर नहीं। आजकल राजाओं का युग नहीं रहा। सो परमात्मा की भी कल्पना परिवर्तित हो रही है।

    वेद की दृष्टि में परमात्मा के नियम परमात्मा की पवित्र आज्ञाएँ हैं। उनका उल्लंघन (नऊज़ो बिल्लाह—परमात्मा की शरणागति) करके परमात्मा अपना निषेध उल्लंघन करेगा यह असम्भव है। परमात्मा के प्यारे वे हैं जिनका जीवन विज्ञान के नियमों व आध्यात्मिकता के साँचे में ढल जाता है।

1[ 1. नियम नियन्ता के होने का एक बहुत बड़ा प्रमाण होता है। अनियमितता कहीं भी हो यही सिद्ध करती है कि यहाँ कोई नियन्ता नहीं। यह सृष्टि नियमों में बंधी है जो अटल Eternal हैं। ऋत व सत्य को वेद भूमि का आधार मानता है। इन नियमों के टूटने का कोई प्रश्न ही नहीं है। —‘जिज्ञासु’]

        जिनका सदाचार ही उनकी महानता है। वे नियमों का उल्लंघन नहीं करते उसके ज्ञान का प्रचार करते हैं। उनकी भक्ति बुद्धि के साथ वाणी का रूप धारण करके उसका प्रकाश करती है जिसका पवित्र नाम वेद है।

         इसके विपरीत कुरान शरीफ़ में स्थान-स्थान पर चमत्कारों का वर्णन आया है। हम नीचे कुछ पैग़म्बरों के सम्बन्ध में कुरान शरीफ़ की साक्षी प्रस्तुत करेंगे जिससे प्रकट हो कि उनकी महानता की आधारशिला कुरान की दृष्टि में उनके चरित्र पर नहीं चमत्कारों पर है। कुरान शरीफ़ के कुछ पैग़म्बरों के चरित्र पर एक संक्षिप्त आलोचना पिछले अध्याय में हो चुकी है।

      आचार व आध्यात्मिकता की परिपूर्णता विद्यमान होने की दशा में किसी व्यक्ति का जीवन  चमत्कारों की अपेक्षा नहीं रखता। मनुष्यों के लिए लाभदायक व सृष्टि के नियमों के या ऐसा कहो कि परमात्मा की इच्छा के रंग में रंगी हुई कार्य प्रणाली सर्वश्रेष्ठ चमत्कार है। जो ऋषि दयानन्द व उनके पूर्ववर्ती वेद के ऋषियों के भाग में आया है। अन्य महापुरुष भी इस श्रेष्ठता से रिक्त नहीं होंगे, परन्तु हमें यहाँ उन महापुरुषों के वर्णन से तात्पर्य है कि जो उनके अनुयायियों के कथानकों के द्वारा हम तक पहुँचे हैं।

      इस अध्याय में हमें देखना यह होगा कि इन महापुरुषों के चमत्कार कल्पना के कितने निकट हैं? यदि कल्पना करो कि उनकी सत्यता को क्षणभर के लिए स्वीकार भी कर लिया जाए तो इससे वर्तमान काल का मानव समाज क्या लाभ उठा सकता है? माननीय पैग़म्बरों के आचार के परिपालन का द्वार इस्लाम के भाग्य लेखों के नियमों के हाथों बन्द है। क्योंकि हम वैसे ही कर्म करने पर विवश हैं जैसे प्रारम्भ से हमारे भाग्य लेखक ने लिख दिए हैं फिर आश्चर्यप्रद चमत्कार तो—

र्इं सआदत बज़ोरे बाज़ू नेस्त,

ता न बख्शद ख़ुदाए बिख्शन्दा 1 ।

       [1. अर्थात् यह पुण्य अथवा सामर्थ्य भुजा बल से प्राप्त नहीं होता। जब तक विधाता की कृपा न हो—इसकी प्राप्ति असम्भव है।   —‘जिज्ञासु’]

       यह चमत्कार हमारे किस काम के? अभी तो हमें इन करामातों, चमत्कारों के तथाकथित वर्णनों पर दृष्टिपात करना चाहिए। सम्भव है, इसमें हमारे सदुपयोग की भी कोई बात निकल आवे—

         हम दृष्टान्त के रूप में इन पैग़म्बरों के कुछ चमत्कारों की संक्षिप्त जाँच पड़ताल किए लेते हैं—

     (1) हज़रत मूसा, (2) हज़रत ईसा, (3) हज़रत इब्राहिम, (4) हज़रत सालिह, (5) हज़रत नूह, (6) हज़रत मुहम्मद।

          हज़रत मूसा

      हज़रत मूसा की कहानी कुरान शरीफ़ में बार-बार दोहराई गई है। हम कुछ ऐसे प्रमाणों पर सन्तोष करेंगे जिनसे इन हज़रत के किए हुए कार्यों या उनकी कहानी में वर्णित प्रकृति नियम विरुद्ध कारनामों पर प्रकाश पड़ सके।

मनुष्य बन्दर बन गए

     सूरते बकर में फ़रमाया है— वलकद अनिमतुमल्लज़ीना अइतिदू मिनकुम फ़िस्सबते फ़कुलनालहुम कूनू किरदतन ख़ासिईन। फ़जअलनाहा नकालन लिमा बेनायर्देहा वमा ख़लफ़हा।

        इसकी व्याख्या तफ़सीरे जलालैन में इस प्रकार की गई है—

      सचमुच सौगन्ध है कि तुम जानते हो उनको जिन्होंने (प्रतिबन्ध लगाने पर भी) शनिवार के दिन (मछली का शिकार करके) सीमा का उल्लंघन किया (वह लोग ईला के रहने वाले थे) सो हमने उनसे कहा कि तुम बन्दर बन जाओ रहमत (प्रभु कृपा) से दूर (सो वह) हो गए और तीन दिन बाद मर गए। फिर हमने (इस दण्ड को) उनके काल के पश्चात् और बाद में आने वाले लोगों के लिए मार्गदर्शन का साधन कर दिया। —जलालैन

        शरीरों का अविलम्ब परिवर्तन प्रकृति के किस नियम के अनुसार हुआ? हज़रत डारविन को कठिनाई थी कि बन्दर की पूँछ मनुष्य शरीर में आकर लुप्त कैसे हो गई? पाठक वृन्द! कुरान की कठिनाई यह है कि दुम (पूँछ) कैसे उत्पन्न हो गई? मज़हब में तर्क का प्रवेश नहीं।

मृत शरीर बोल उठा

       व इज़ा कतलतुम नफ़सन फ़द्दर अतुम फ़ोहा बल्लाहो मुख़- रिजुन मा कुन्तुम तकतिमूना, फ़कुलना अज़रिबहो विबाज़िहा। कज़ालिका यहयल्लाहो अलमूता व युरीकुम आयतिही लअल्लकुम तअकिलून। —(सूरते बकर आयत 73)

      जबकि तुमने एक आदमी को मारा फिर उसमें झगड़ा किया और अल्लाह प्रकट करने वाला है। इस बात को जिसको तुम छुपाते थे। फिर हमने कहा कि इस (वध किए गए) से इस (गाय) की (शाब्दिक अर्थ हैं इस गाय) का एक टुकड़ा जीभ या दुम की हड्डी मारो उन्होंने मारा और वह जीवित हो गया और अपने चाचा के बेटों के बारे में कहा कि उन्होंने मुझे मारा है यह कहकर मर गया।  अल्लाह ताला इसी प्रकार मृत शरीरों को जीवित करेगा वह तुमको अपनी शक्ति की निशानियाँ दिखाता है कि तुम विचार कर समझो। —जलालैन

       गाय का एक टुकड़ा लगने से मुर्दा जी उठा न जाने मरा क्या लगने से? पर मरते तो लोग नित्यप्रति हैं। चमत्कार जीने में था। बंकिमचन्द्र बंगाल के प्रसिद्ध उपन्यासकार मजिस्ट्रेट थे। एक मुकदमें में वास्तविक परिस्थिति का पता नहीं लग रहा था। आपने मुर्दे का स्वांग भरा। लाश बनकर पड़े रहे और उस पर कपड़ा डाल दिया गया। अपराधी भी वहीं थे। बातों-बातों में निःसंकोच सारी घटना सच-सच कह गए। मुर्दा जलाने से पूर्व ही जी उठा और न्यायालय में घटना की साक्षी दे गया। कुछ ऐसी ही दशा इन आयतों में लिखी हुई तो नहीं? यह अन्तर अवश्य है कि बंकिम फिर जीवित ही रहे तीन दिन पश्चात् मरे नहीं।

डण्डे का चमत्कार

        व इजस्तस्का मूसालिकौमिही, फकूलनाजरिव बिअसाक- लहजरा फन्फजरत मिनहा इसनता अशरा ऐनन।

      जब कि (उस जंगल में) मूसा ने अपनी जाति के लिए पानी माँगा सो हमने कहा कि अपनी लाठी पत्थर पर मार (यह वही पत्थर था जो मूसा के कपड़े ले भागा था) नरम (चौकोन जैसा आदमी का सिर) सो उसने मारा बस 12 जल के स्रोत (चश्मे) (जितने वह गिरोह थे) उसमें से निकलकर बहने लगे। —जलालैन

डण्डा अजगर बन गया

        फ़लका असाहो, फ़इज़ाहिया सअबानुन मुवीनुन, वनज़ आयदुहू फ़इज़ाहिया बैज़ा अनलिन्नाज़िरीन।

       बस मूसा ने अपनी लाठी डाली सो अचानक वह बड़ा अजगर साँप बन गई और (मूसा ने) अपना हाथ (कपड़ों में से) निकाला और वह चमकता हुआ प्रकाशमान प्रकट हुआ देखने वालों की दृष्टि में (यद्यपि उस हाथ की यह रंगत न थी। गेहुआ रंग था)।—जलालैन

पतला साँप

         व अलके असाका फ़लम्मा राअहा तहतज़्जुन कअन्नहा जानुन ववलामु दब्बिरन वलम यअकिब या मूसा ला तख़िफ़।

       और अपनी लाठी डाल (सो मूसा ने) अपनी लाठी डाली (उसने) जब उस लाठी को देखा कि दौड़ती है जैसे पतला साँप। मूसा पीठ फेरकर भागा और पीछे को न लौटा (अल्ला ताला ने फ़रमाया) ए मूसा तू इससे भयभीत न हो।—जलालैन

       वेदान्त में भ्रमवश रस्सी को साँप समझने का वर्णन तो प्रायः होता है, यहाँ न जाने भ्रम था या वास्तविक दशा थी?

टिड्डियों जुंओं व मैढकों का मेंह

       लोग हज़रत मूसा के भक्त न बने बस फिर क्या था?

       नहनोलका बिमोमिनीना फ़अरसलना अलैहुम त्तूफ़ानावल जरादा वलकमला वज़्ज़फ़ादिए वद्दम्मा आयतिन मुफ़स्सिलातिन।

       हम कभी तेरा विश्वास न करेंगे और ईमान न लाएँगे (सो मूसा ने उनको शाप दिया) फिर हमने उन पर पानी का तूफ़ान भेजा (कि सात दिन तक पानी उनके घर में पानी भरा रहा। जो बैठे हुए आदमी के हलक तक पहुँचता था) और भेजा टिड्डियों को (सात दिन की उनकी खेती व फल खा गए और (भेजा) जुओं को (या वह कीड़ा जो अनाज में पैदा हो जाता है) या चिचड़ी को जो उसने टिड्डियों का बचा हुआ खाया और कुछ शेष न छोड़ा और भेजा उन पर मैंढक (कि वह उनके घरों व खानों में भर गए) और रक्त को (उनके पानी में) और यह निशानियाँ प्रकट (भेजी)।

        किसी की समझ में यह चमत्कार न आए तो इसका इलाज वही है जो इस आयत के अनुसार ईमान न लाने वालों का हुआ। अर्थात् पानी का तूफ़ान, टिड्डियों, जूएँ, रक्त व मैंढक, इस भय के होते कौन हैं जो ईमान न लाए?

नदी दो टुकड़े

         आगे फ़रमाया है—

         फ़ग़रकनाहुम फ़िलयम्मा बिइन्नहुम कज़्ज़बू बूआया तिनाव  कानू अनहा ग़ाफ़िलीन।

        फिर डुबा दिया (उनको शोर नदी में) इस कारण से कि वह निश्चय ही हमारे आदेश को झुठलाते थे और (हमारी निशानियों से) अज्ञान रखते थे कुछ सोच विचार नहीं करते थे। —जलालैन

         व जावज़ना विनब्यिय इसराईल लवहरा।

         —(सूरते आराफ आयत 138)

और हमने बनी इसराईल को नदी से पार कर दिया।

इस घटना का विवरण इससे पूर्व निम्न आयत में वर्णन हो चुका है।

व इज़ा फ़रकना बिकुलमुल बहरा फ़अन्जयतकुम व अग़रकना आले फ़िरओन व अन्तुम तंज़रुना।

—(बकर आयत 50)

          जबकि हमने तुम्हारे (बनी इसराईल के) कारण दरिया को चीरा (ताकि तुम शत्रुता से भागकर इसमें दाखिल हो जाओ) सो हमने तुमको डूबने न दिया और फिरऔन की जाति को डुबो दिया (फ़िरऔन सहित) और तुम देखते थे (उनके ऊपर दरिया के मिल जाने पर)।

—जलालैन

        आजकल की पनडुब्बी नौकायें इससे भी कहीं अधिक चमत्कार1 दिखा रही हैं। [1. डॉ॰ ग़ुलाम जैलानी बर्क ने अपनी पुस्तक दो कुरान पृष्ठ 322 पर नील नदी का फटना, लाठी का सर्प बनना आदि चमत्कारों को झुठला दिया है। —‘जिज्ञासु’]

  1. हज़रत मसीह

       हज़रत ईसा मसीह को मुसलमान वह महत्ता नहीं देते जो ईसाई लोग देते हैं, परन्तु हज़रत मसीह से भी कुछ चमत्कार कुरान में ही जोडे़ गये हैं। जैसा कि सूरते बकर आयत 87 में वर्णन है।

       व आतैना ईसा इब्ने मरयमल बय्यनाते व अय्यदनाही बिरुहिलकुदस।

       और मरियम के पुत्र ईसा को कई चमत्कार दिए (जीवित करना मृतकों का और अन्धें व जन्मजात कोढी को निरोग करना) और उनको सामर्थ्य दी जिबरईल से (जहाँ ईसा चलते, जिबरईल उनके साथ होते थे)।

—जलालैन

बिना पिता के सन्तानोत्पत्ति

        व इज़ा कालतिलमलाइकतो या मरयमो इन्नल्लाहा इस्तफ़ाका व तहरका वस्तफ़ाका अलानिसाइल आलमीन।

—(आले इमरान 39)

      जब फ़रिश्ते बोले ए मरियम! अल्लाह ने तुझे पसन्द किया व शुद्ध बनाया (टिप्पणी में है—पुरुष के निकट होने से पवित्र किया) और पसन्द किया तुझको सब संसार की स्त्रियों से।

—जलालैन

      व जकरा फ़िल कितावे मरियमा इज़म्बतजतामिन अहलिहा मकानन शरकिय्यन। फ़त्तरवजत मिन दूनिहिम हिजाबन फ़अर सलना इलैहा रुहना फ़तमस्सला लहवशरन सविय्यन। कालत इन्नो अऊजो बिर्रहमाने मिन्काइन कुन्ता नकिय्य्न। काला इन्नमा अनारसूलो रब्बिकालिअहल लका ग़ुलामन ज़किय्यन॰ कालत अन्नी यकूनोली ग़ुलामुन वलम यमसइनि बशरुन वलम अकोवगिय्यन काला कज़ालिका काला रब्बुका हुवा अलय्या हय्यनुन व लि नजअहु आयतुन लिन्नासे………फ़हमलतहू फ़न्तब्जत बिहीमकानन कसिय्यन।

—(मरयम 16-20)

       याद करो कुरान में कथा मरियम की जबकि वह पृथक् हुई अपने घर वालों से एक मकान के कोने में जो पूर्व दिशा में था (वहाँ जाकर) घर के लोगों के सामने परदा छोड़ दिया (ताकि कोई न देखे यह परदा इसलिए छोड़ा था कि अपने सिर या कपड़ों से जूं निकालती थी या मासिक धर्म के पश्चात् स्नान करती थी पवित्र होकर) सो भेजा हमने उनकी ओर अपनी रूह (आत्मा, जिबरईल) को। सो वह हो गया आदमी पूरे हाथ पैर वाला सुन्दर (जबकि मरियम अपने कपड़े पहन चुकी थी) मरियम बोली, निःसन्देह मैं तुझसे ख़ुदा की शरण माँगती हूँ यदि तू कोई पवित्र हृदय पुरुष है (तू मेरे शरण माँगने से पृथक् रह) जिबरईल ने कहा—बात यह है कि मैं तेरे परमात्मा का भेजा हुआ हूँ कि तुमको एक पवित्र बेटा प्रदान करूँ (जो पैग़म्बर होगा) मरियम ने कहा—मेरे पुत्र कैसे होगा।

       यद्यपि किसी पुरुष ने विवाह करके हाथ नहीं लगाया और न मैं व्यभिचारिणी हूँ…….. जिबरईल ने कहा—(यह बात अवश्य होने वाली है, अर्थात् बिना पिता के पुत्र अवश्य उत्पन्न होगा) तेरा परमात्मा कहता है कि यह काम मेरे लिए सरल है (इस प्रकार कि जिबरईल मेरे आदेश से तेरे अन्दर फूँक मारे तू उससे गर्भवती हो जाए)……..और हम उसको अवश्य पैदा करेंगे ताकि बनाएँ उसको अपने सामर्थ की निशानी…..फिर मरियम गर्भवती हुई और चली गई (गर्भवती होने के कारण अपने घर वालों से) दूर।

—जलालैन

       फ़रिश्ते आजकल बात भी नहीं करते। प्राचीनकाल में करते थे। परमात्मा के सन्देश लाते और उसके आदेशों का पालन करने में भाँति-भाँति के पुरस्कार प्रदान कर जाते थे। हज़रत मरियम को बिना पति के सन्तान दी। हज़रत यहया को बिना शक्ति के पुत्र दिया। इस विज्ञान के युग में अल्लाह मियाँ व उसके फ़रिश्ते सब वैज्ञानिक हो गए हैं। मजाल है कोई बात प्रकृति के नियमों के विरुद्ध कर जावें।

       वल्लती अहसनत फ़रजहा फ़नफ़रवना फ़ीहा मिनरुहिनावजअलनांहां व अबनाहा आयतुन लिल आलमीन।

—(सूरते अम्बिया 88)

      और स्मरण करो मरियम को जिसने अपनी योनि को (बुरे काम से) सुरक्षित रखा सो हमने अपनी रूह (आत्मा) फूँकी (अर्थात् जिबरईल ने उसके कुर्ते के गिरेबान में फूँक मारी जिससे उसको ईसा का गर्भ रह गया) और हमने मरियम को और उसके पुत्र को मनुष्यों, जिन्नों (भूतों) व फ़रिश्तों (देवताओं) के लिए एक निशानी बनाया। (क्योंकि मरियम ने ईसा को बिना पति के जन्म दिया)। —जलालैन

      हज़रत इब्राहिम

कटे पशु जीवित किए

       हज़रत इब्राहीम एक पुराने ईश्वरीय दूत हैं। हज़रत मुहम्मद का दावा है कि इस्लाम हज़रत इब्राहिम का ही धर्म है। उनके प्रकृति के नियमों के विरुद्ध चमत्कारों का वर्णन सूरते बकर में इस प्रकार है—

        व इज़ा काला इब्राहीमो रब्बे अरनी कैफ़ा यहयुलमौता काला अवलय तौमिनो। काला बला वलाकिन लियमय्यिनाकलबी। काला फ़ख़ुज़ अरबअतन मिनत्तैरे फ़सर हुन्ना इलैका, सुम्मा अजअल अलाकुल्ले जबलिन मिनहुन्ना जुजअन सुम्मा अदउहुन्ना यातीन का सइयन व अलमी इन्नाल्लाहो अज़ीज़न हकीम। —(सूरते बकर आयत 260)

       इब्राहिम ने कहा—ए मेरे प्रभु मुझको दिखला कि तू मुर्दों को कैसे जीवित कर देगा (अल्लाह ने उनसे फ़रमाया) क्या तुझको इस पर विश्वास नहीं? (कि मेरे अन्दर सामर्थ है कि मुर्दों को जीवित कर दूँ)……..(इब्राहीम ने) कहा कि मैंने निसन्देह विश्वास किया तेरी शक्ति पर……..यह मैंने तुझसे इसलिए पूछा कि आँख से देखकर पूरे हृदय को सन्तोष प्राप्त कर लूँ और विरोधियों से तर्क कर सकूँ (अल्लाह ने) फ़रमाया, अब तू चार पंछी पकड़…….और उनको अपने पास इकट्ठा कर और उनको काटकर उनके पंख गोश्त मिलाकर फिर अपनी ज़मीन के पहाड़ों में से प्रत्येक पहाड़ पर एक-एक टुकड़ा उनका रख दे फिर उनको अपनी ओर बुला वे दौड़कर आएँगे और जान ले कि अल्लाह शासक है (किसी बात से कमज़ोर नहीं उसका काम सुदृढ़ व पक्का है) सो इब्राहिम ने मोर, करगस, कौवा और मुर्ग पकड़ा और उनका मांस व पर काटकर मिला दिए और उनके सिर अपने पास रख लिए और उनको बुलाया सो तमाम टुकड़े उड़कर जिसका जो टुकड़ा था उसमें जा मिला। यहाँ तक कि पूरे होकर अपने-अपने सिरों से मिल गए।

—जलालैन

हज़रत सालिह

अल्लाह मियाँ की ऊँटनी

        कौम समूद के पैग़म्बर सालिह के सम्बन्ध में सूरते हूद में आया है कि उन्होंने फ़रमाया—

       वया कौमे हाजिही नाक तुल्लाहे लकुम आयतुन फजरुहा ताकुल फिलअरजे ल्लाहेवला तमस्सूहा बिसूइन फयारवुजकुम अजाबुन करीबुन फअकरुहा, फकाला तमत्तऊफी दारिकुम सलासता अय्यामिन जालिका व अदुन गैरो मकजूबिन।

—(सूरते हूद आयत 63)

        और ए मेरी कौम यह अल्लाह की ऊँटनी है तुम्हारे लिए निशानी अतः इसे छोड़ दो फिर से अल्लाह की भूमि पर और इसके साथ किसी प्रकार का बुरा व्यवहार मत करो नहीं तो तुम पर बहुत बड़ा दण्ड आएगा। सो उन्होंने उसके पैर काटे (अर्थात् एक कज़ाज़ नामक व्यक्ति ने उस कौम के कहने पर ऊँटनी के पैर काट डाले)  (सालिह ने) फ़रमाया ज़िन्दा रहो तुम अपने घरों में तीन दिन फिर तुम वध कर दिए जाओगे।

—जलालैन

सूरते बनी इसराईल में कहा है—

व आतैना समूदुन्नाकतामब्सिरतुन फ़ज़लमू बिहा।

—(बनी इसराईल 58)

हमने समूद की ओर ऊँटनी को भेजा वह प्रकट निशानी थी सो उन्होंने उसका इन्कार किया। (अतः वे नष्ट हो गए)

तफ़सीरे हुसैनी में इस आयत की व्याख्या में कहा है—

समूद अज़ सालिह मोजिज़ा तलब करदन्द व ख़ुदाए बराए एशां अज़ संग नाका बेरूं आवुरद।

समूद ने सालिह से चमत्कार माँगा और ख़ुदा ने उनके लिए पत्थर से ऊँटनी उत्पन्न कर दी।

सूरते शुअरा में फ़रमाया है—

           काला हाज़िही नाकतुन लहा शिरबुन वलकुम शिरबो योमिन मालूम।

—(सूरते शुअरा)

           कहा यह ऊँटनी है उसके लिए पानी का एक भाग निश्चित है और तुम्हारे लिए एक निश्चित दिन का भाग।

—जलालैन

           मूज़िहुल कुरान में इसी स्थान पर फ़रमाया है—

         वह छूटी फिरती….जिस सरोवर पर पानी को जाती सब पशु वहाँ से भागते तब यह निश्चित कर दिया गया कि एक दिन पानी पर वह जाए एक दिन औरों के पशु जाएँ।

          सूरते शमस में यह वार्ता इस प्रकार वर्णन की गई है—

       फ़कालालहुम रसूलुल्लाहे नाकतुल्लाहे व सकयाहा फ़कज़िबूहा फ़अकरुहा फ़दमदमा अलै हुम रब्बुहुम बिज़नबिहिम फसब्वाहा।

—(सूरते शमस आयत 13-14)

        फिर कहा उनको अल्लाह के रसूल ने सावधान हो अल्लाह की ऊँटनी से और उसके पानी पीने की बारी से फिर उसको उन्होंने झुठला दिया फिर वह काट मारी और फिर उल्टा मारा, उन पर उनके रब ने उनके पाप से फिर बराबर कर दिया।

—जलालैन

       भला यह ऊँटनी क्या हुई! पत्थर से निकली और उसका अधिकार यह कि जिस दिन वह पानी पीए और पशु न पीवें आखिर अल्ला मियाँ की जो हुई। यह भी अच्छा हुआ कि पत्थर से कोई मनुष्य नहीं निकला नहीं तो मनुष्यों के लिये पानी का अकाल हो जाता। कोई पूछे कि इस चमत्कार से मनुष्य का क्या बना? और दयालु परमात्मा का क्या?

हज़रत नूह

लगभग हज़ार बरस जिए

       सूरते अनकबूत में हज़रत नूह का वर्णन हुआ है। फ़रमाया है—

      वलकद अरसलना नूह न इला कौमिहि फ़लबिसा फ़ीहिम अलफ़ा सनतिन इल्ला ख़मसीना आमन।

—(अनकबूत आयत 14)

         और हमने भेजा नूह को उनकी कौम के पास। फिर रहे वे उनमें 50 कम 1 हज़ार बरस तक।

         तफ़सीरे हुसैनी में इस आयत पर कहा है—

        नूह चहल साल मबऊसशुद व नह सदपंजाह साल ख़लक रा बख़ुदा दावत करद। बाद अज़ तूफ़ान शस्त साल ज़ीस्त दर अहकाफ़ अज़ दहब नकल कुनन्द कि उम्रे नूह हज़ार व चहार सद साल बूद, साहब ऐनुलमआनी फ़रमूद कि सी सद व हफ़्ताद साल मबऊस शुद व नो सद व पंजाह साल दावत करद, बाद अज़ तूफ़ान सी सद व पंजाह साल ज़ीस्त।

        नूह अलैहस्सलाम चालीस साल की आयु में पैग़म्बर हुए और नौ सौ पचास वर्ष तक लोगों को ख़ुदा का सन्देश देते रहे। तूफ़ान के पश्चात् साठ वर्ष जीवित रहे। अहकाफ़ में वह बसे रिवायत (वर्णनवार्ता) है कि नूह अलैहस्सलाम की आयु एक हज़ार चार सौ वर्ष थी। लेखक ऐनुलमआनी फ़रमाते हैं कि तीन सौ सत्तर साल की आयु में पैग़म्बर हुए नौ सौ पचास साल प्रचार किया और तूफ़ान के पश्चात् 3 सौ पचास साल जीवित रहे।

        हज़रत नूह की आयु कुछ भी हो उनकी प्रचार की अवधि का प्रारम्भ पचास वर्ष स्वयं कुरान में वर्णित है। इस प्रचार का प्रभाव यह कि थोड़े गिने-चुने लोगों के उनके साथियों के अतिरिक्त कोई भी सन्मार्ग पर नहीं आया और सब को तूफ़ान की बलि होना पड़ा।   सारी सृष्टि अल्लाह की बनाई और बनाई भी वैसी जैसी अल्लाह को स्वीकार था। अल्लाह ने कुछ को जन्नत के लिए कुछ को दोज़ख़ के लिए पहले से ही चुन लिया था फिर हज़रत नूह को कष्ट देने की क्या आवश्यकता थी? यदि दिया ही था तो कुछ परिणाम निकलना चाहिए था।

हज़रत मुहम्मद

चाँद तोड़ दिया

        हज़रत मुहम्मद ने चमत्कार दिखाने से इन्कार तो किया था, परन्तु अनुयायियों के आग्रह से विवश हो गए हैं। सूरते कमर में आया है—

        बक्तरबत स्साअता वन्शक्कलकमरो।

        निकट आ गया प्रलय दिन और फट गया चाँद (चाँद के दो टुकड़े होना)। हज़रत का चमत्कार हुआ जिसकी माँग काफ़िरों के द्वारा की गई थी। आपने उसकी ओर संकेत किया। और वह दो टुकड़े हो गया।

        चाँद अरब का था क्या?—कोई प्रश्न कर सकता है कि वह चाँद अरब का था या इस चमत्कार को देखने वालों का कोई विशेष चाँद था? या यही चाँद था जो संसार की सभी जातियों के लिए सामान्य है? यदि सामान्य था तो क्या कारण है कि अरब के बाहर के लोग इस चमत्कार के साक्षी न हुए। वास्तव में यह चमत्कार ज्योतिष विद्या के इतिहास में कुछ कम महत्त्व का नहीं था कि हज़रत मुहम्मद की घटना उनके लेखकों के अतिरिक्त किसी और का ध्यान न खींचती। अपना-अपना भाग्य है इस गौरव से और लाभान्वित न हुए!

       सूरते बनी इसराईल में कहा है—

      सुबहानल्लज़ी असराबि अब्दिही लैलन मिनल मस्जिदल अकसा अल्लजी बरकना हौलहू लिनरीहू मिन आतेना।

—(सूरते बनी इसराईल आयत 71)

      पवित्र है वह सत्ता कि अपने बन्दे को (मुहम्मद साहब को) रात में मस्जिदे हराम (अर्थात् मक्का) से मस्जिदे आकसा (बैतुल मुकद्दस-पवित्र घर) की ओर ले गया……जिसकी हर ओर से हमने बरकत दी……..कि उसको विचित्रताएँ व चिह्न दिखलाए…. आपकी भेंटें पैग़म्बरों से हुई व आपको आसमानों की ओर चढ़ाया………वास्तव में हज़रत सलअम ने फ़रमाया कि मेरे पास बुराक लाया गया कि वह एक सफ़ेद जानवर है गधे से बड़ा व खच्चर से छोटा उसके पैर वहाँ तक पड़ते हैं जहाँ तक उसकी दृष्टि पड़े सो मैं उस पर सवार हुआ। वह मुझको ले गया। यहाँ तक कि मैं बैतुल मुकद्दस पहुँचा। वहाँ मैंने अपनी सवारी को उस हलके (घर) में बाँधा जिसमें और पैग़म्बर अपनी सवारियाँ बाँधते थे।

—जलालैन

       इसके पश्चात् आसमानों पर जाने का वर्णन है, द्वार खटखटाया जाता है, प्रश्न होता है कौन? हज़रत जिबरईल फरमाते हैं हज़रत मुहम्मद? पूछा जाता है। क्या वह पैग़म्बर हो गए? स्वीकारात्मक उत्तर मिलने पर द्वार खोल दिया जाता है। इस प्रकार विभिन्न आसमानों पर विभिन्न सम्मानीय पैग़म्बरों की भेंट के पश्चात्—

       फिर मैं पहुँचा सदर तुलमुन्तहा (सर्वोच्च गन्तव्य स्थल) तक। उसके पत्ते ऐसे जैसे हाथी के कान और उसके फल ऐसे जैसे मटका। जब उस बेरी के वृक्ष को घेर लिया, अल्लाह के आदेश से उस वस्तु ने जिसने घेर लिया वह आश्चर्यचकित हो गया।…..आपने फ़रमाया मेरी ओर जो ईश्वरीय सन्देश मिला है वह प्रकट करने योग्य नहीं…….।

—जलालैन

        हज़रत की उम्मत (समुदाय) पर पचास नमाजें  फर्ज़ हुर्इं। हज़रत वापिस लौटे, परन्तु सम्मानीय पैग़म्बरों ने समझाया1[1. नोट—यहाँ मूसा का वर्णन ।] बोझ तुम्हारे अनुयाइयों से सहन न हो सकेगा। हज़रत बार-बार ख़ुदा की सेवा में गए और वहाँ से लौटे अन्त में नमाज़ों की संख्या पाँच करा ली। हज़रत मूसा ने इसमें भी कमी कराने का परामर्श दिया तो फ़रमाया—

        “मैं अनेक बार अपने रब के पास जा चुका हूँ अब मुझको लज्जा आती है। इस हदीस को बुख़ारी व मुस्लिम ने उद्धृत किया है और यह शब्द मुस्लिम के हैं।”

—जलालैन

      इसमें सन्देह नहीं कि इस चमत्कारी यात्रा के विवरण कुरान के भाष्यों में लिखे हुए हैं। स्वयं कुरान में मस्जिद हराम से मस्जिदे अकसा तक एक रात में जाना वर्णन किया है। वह उस समय   कि यह  चमत्कार था, परन्तु आज गुब्बारों व विमानों का युग है। इस समय इसे कौन चमत्कार मान सकता है?

        चमत्कार और भी बहुत से हैं, परन्तु यहाँ जैसे बहुतों में से कुछ नमूने के रूप में दिए हैं केवल कुछ चुने गए हैं। पाठक के लिए विचारणीय बात यह है कि क्या इन चमत्कारों से परमात्मा की किसी विशेष शक्ति का आभास होता है जो सृष्टि की कल को सामान्यतया चलाने से अधिक कठिन है? क्या इन चमत्कारों से परमात्मा के प्यारों की किसी विशेष महानता का आभास होता है जिससे उनकी पदवी बुद्धिमानों की दृष्टि में ऊँची हो? कहीं इन प्रकृति नियम के विरुद्ध कर्मों से यह तो प्रकट नहीं होता कि प्रकृति का नियम बेदाद नगरी अन्यायी नगरी का सा कानून है जो तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है।

        यहाँ कर्मों की इतनी परवाह नहीं जितनी अपने प्यारों की प्रतिष्ठ व अपमान की है। लोगों ने एक मार्गदर्शक का कहना नहीं माना। बिना यह विचारे कि वह उपदेशक कैसे चरित्र का है। लोगों के लिए खून की वर्षा, नूह का तूफ़ान और न जाने क्या-क्या तैयार है। लोगों को अपना श्रद्धालु बनाने के लिए उपाय क्या-क्या प्रयोग किए जा सकते हैं। जादूगरी, डण्डे को साँप बना दिया। क्या इसी को धर्म व सत्य का प्रचार कहते हैं? इन खेलों से कहीं महान् गौरवशाली सच्चे कार्य सृष्टि-रचना में दिन-रात हो रहे हैं।

      क्या बिना बाप के सन्तान उत्पन्न होने में परमात्मा की महानता का अनुमान होता है और माता- पिता दोनों के होते सन्तानोत्पत्ति होने में परमात्मा का कोई हाथ नहीं? बूढ़े के बच्चा हो जाना परमात्मा का चमत्कार है और युवक के पुत्र होना परमात्मा की कारीगरी का खण्डन है? ऊँटनी ने हज़रत सालिह के व्यक्तित्व में किस बड़प्पन की वृद्धि की? सच्चाई यह है कि परमात्मा पर विश्वास की निर्भरता यदि नित्य प्रति के साधारण कार्यों व घटनाओं पर रखो तो आज भी स्थिर रहेगा कल भी और जो किसी बीते काल के चमत्कारी कथानकों पर निर्भरता ठहरी तो जिस समय के लोग कहानियों से ऊपर उठकर वर्तमान परिस्थितियों के अभिलाषी हुए जैसे आज कल हैं उस काल में नास्तिकता ही नास्तिकता का सिक्का बैठ जाएगा। मनुष्य चरित्र से पूजा जा सकता है तथा परमात्मा अपने नियमों की सुदृढ़ता व अटलता से। जिसे न उसके (मत के अनुयायी) अपने तोड़ सकें न पराये ही।

पूजा पद्धति

पूजा पद्धति

साप्ताहिक धार्मिक सत्संग प्रत्येक रविवार को प्रात: होता है, क्योंकि सरकारी कर्मचारी इस दिन छुट्टी पर होते हैं। यह सत्संग तीन या चार घण्टे का होता है। भाषण करने वाले के ठीक सामने पूजास्थान में वैदिक अग्निकुण्ड रहता है। धार्मिक पूजा हवन के साथ प्रारम्भ होती है। साथ ही वैदिक मन्त्रों का पाठ होता है। पश्चात् प्रार्थना होती है। फिर दयानन्द-साहित्य का प्रवचन होता है, जिसका अन्त समाज गान से होता है। इसमें स्थायी पुरोहित या आचार्य नहीं होता। योग्य सदस्य अपने क्रम से प्रधान-वक्ता या पूजा-संचालक का स्थान ग्रहण करते हैं।

भाषा और साहित्य

भारतीय नवोत्थान के प्रथम चरण में आर्य समाज-आन्दोलन द्वारा प्रेरित संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन के फलस्वरूप हिन्दी संस्कृत शब्दावली के प्रयोग की ओर अधिकाधिक झुकती गयी। स्वामी दयानन्द ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया था और देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक उन्होंने इसी भाषा का प्रयोग किया, जहाँ पहले उर्दू का बोल-बाला था। उन्होंने स्वयं सत्यार्थ-प्रकाश (1874 ई.), व्यवहारभानु, गोकरणनिधि आदि ग्रन्थों की रचना हिन्दी में की। उनकी भाषा संस्कृतगर्भित है। अन्य आर्यसमाजी लेखकों ने भी संस्कृत शब्दावली के प्रयोग की ओर अधिक ध्यान दिया, फलत: भाषा का जो आदर्श भारतेन्दु ने स्थापित किया, वह अन्य अनेक कारणों के अतिरिक्त आर्य समाज के प्रबल प्रभाव के कारण बहुत दिनों के लिए लुप्त हो गया। हिन्दी के ‘संस्कृतीकरण’ या ‘तत्समीकारण’ का आर्य समाज एक प्रधान कारण था। हिन्दी के ‘संस्कृतीकरण’ और राष्ट्रभाषा-पद पर स्वीकार करने के अतिरिक्त आर्य समाज ने हिन्दी गद्य को एक नयी शैली प्रदान की, जो शास्त्रार्थ और खण्डन-मण्डन के उपयुक्त थी। भाषा में आलोचना और वाद-विवाद करने की शक्ति आयी। भाव-व्यंजना में भी इससे सहायता मिली और तर्कशैली के साथ-साथ व्यंग्य तथा कटाक्ष करने की शक्ति का आविर्भाव हुआ। हिन्दी भाषा तथा गद्य शैली का यह विकास अभूतपर्व था और क्योंकि आर्य समाज का कार्यक्षेत्र बहुत व्यापक था, इसलिए उसने साहित्यिकों को तरह-तरह के विषय सुझाये।

आर्य समाज महासम्मेलन, मथुरा

यद्यपि भारतेन्दु हरिश्चन्द्रराधाकृष्णदास, श्रीनिवासदास, प्रतापनारायण मिश्र जैसे कविउपन्यासकार और नाटककार आर्य समाजी नहीं थे, तो भी उनके द्वारा गृहीत अनेक विषय वे ही हैं, जो आर्यसमाज-आन्दोलन अपनाये हुए थे। ऐसे अनेक तत्कालीन नाटक, प्रहसन और उपन्यास उपलब्ध होते हैं, जिन पर तर्कप्रणाली, विषय, शैली आदि की दृष्टि से आर्यसमाज का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। किन्तु कुछ हद तक आर्यसमाज नाटयकला के लिए घातक भी सिद्ध हुआ। उसने अनेक विषय सुझाकर सामग्री प्रस्तुत करने में कोई कसर बाक़ी न रखी, यह ठीक है, लेकिन शास्त्रार्थ वाली शैली ने कृतियों की कलात्मकता को आघात पहुँचाया। ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं लेखक विविध पात्रों के रूप में आर्यसमाज के प्लेटफार्म से बोल रहा है। आर्यसमाज का जितना प्रभाव नाटक और काव्य पर पड़ा उतना साहित्य के किसी और अंग पर नहीं पड़ा। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में और बीसवीं शताब्दी में आर्यसमाजी उच्च कोटि के प्रसिद्ध नाटककार, कवि या अन्य लेखक और कलाकार बहुत कम हुए। उन्नीसवीं शताब्दीं में आर्यसमाजी लेखक या कवि नहीं हुआ। बीसवीं शताब्दी में भी पद्मसिंह शर्मा, नाथूराम शंकर शर्मा आदि जैसे कुछ ही प्रसिद्ध लेखक और कवि हुए हैं। प्रचारात्मक आन्दोलन होने की वजह से उच्च कोटि का साहित्य प्रचुर मात्रा में न दे सका। कला का अभाव आर्यसमाज में ही नहीं, संसार के सभी सुधारवादी (Puritonical) आन्दोलनों में पाया जाता हैं। भाषा, विषय, चयन, लेखकों और कवियों के दृष्टिकोण तथा उनकी विचार-पद्धति पर आर्यसमाज का काफ़ी प्रभाव पड़ा, यह निस्सन्देह कहा जा सकता है।

हिन्दू धर्म

हिन्दू धर्म (अंग्रेज़ीHinduismभारत का सर्वप्रमुख धर्म है, जिसे इसकी प्राचीनता एवं विशालता के कारण ‘सनातन धर्म’ भी कहा जाता है। ईसाईइस्लामबौद्धजैन आदि धर्मों के समान हिन्दू धर्म किसी पैगम्बर या व्यक्ति विशेष द्वारा स्थापित धर्म नहीं है, बल्कि यह प्राचीन काल से चले आ रहे विभिन्न धर्मों, मतमतांतरों, आस्थाओं एवं विश्वासों का समुच्चय है। एक विकासशील धर्म होने के कारण विभिन्न कालों में इसमें नये-नये आयाम जुड़ते गये। वास्तव में हिन्दू धर्म इतने विशाल परिदृश्य वाला धर्म है कि उसमें आदिम ग्राम देवताओं, भूत-पिशाची, स्थानीय देवी-देवताओं, झाड़-फूँक, तंत्र-मत्र से लेकर त्रिदेव एवं अन्य देवताओं तथा निराकार ब्रह्म और अत्यंत गूढ़ दर्शन तक- सभी बिना किसी अन्तर्विरोध के समाहित हैं और स्थान एवं व्यक्ति विशेष के अनुसार सभी की आराधना होती है। वास्तव में हिन्दू धर्म लघु एवं महान् परम्पराओं का उत्तम समन्वय दर्शाता है। एक ओर इसमें वैदिक तथा पुराणकालीन देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना होती है, तो दूसरी ओर कापलिक और अवधूतों द्वारा भी अत्यंत भयावह कर्मकांडीय आराधना की जाती है। एक ओर भक्ति रस से सराबोर भक्त हैं, तो दूसरी ओर अनीश्वर-अनात्मवादी और यहाँ तक कि नास्तिक भी दिखाई पड़ जाते हैं। देखा जाय, तो हिन्दू धर्म सर्वथा विरोधी सिद्धान्तों का भी उत्तम एवं सहज समन्वय है। यह हिन्दू धर्मावलम्बियों की उदारता, सर्वधर्मसमभाव, समन्वयशीलता तथा धार्मिक सहिष्णुता की श्रेष्ठ भावना का ही परिणाम और परिचायक है।
हिन्दू धर्म के स्रोत
हिन्दू धर्म की परम्पराओं का अध्ययन करने हेतु हज़ारों वर्ष पीछे वैदिक काल पर दृष्टिपात करना होगा। हिन्दू धर्म की परम्पराओं का मूल वेद ही हैं। वैदिक धर्म प्रकृति-पूजक, बहुदेववादी तथा अनुष्ठानपरक धर्म था। यद्यपि उस काल में प्रत्येक भौतिक तत्त्व का अपना विशेष अधिष्ठातृ देवता या देवी की मान्यता प्रचलित थी, परन्तु देवताओं में वरुण, पूषा, मित्र, सविता, सूर्य, अश्विन, उषा, इन्द्ररुद्र, पर्जन्य, अग्नि, वृहस्पति, सोम आदि प्रमुख थे। इन देवताओं की आराधना यज्ञ तथा मंत्रोच्चारण के माध्यम से की जाती थी। मंदिर तथा मूर्ति पूजा का अभाव था। उपनिषद काल में हिन्दू धर्म के दार्शनिक पक्ष का विकास हुआ। साथ ही एकेश्वरवाद की अवधारणा बलवती हुई। ईश्वर को अजर-अमर, अनादि, सर्वत्रव्यापी कहा गया। इसी समय योग, सांख्य, वेदांत आदि षड दर्शनों का विकास हुआ। निर्गुण तथा सगुण की भी अवधारणाएं उत्पन्न हुई। नौंवीं से चौदहवीं शताब्दी के मध्य विभिन्न पुराणों की रचना हुई। पुराणों में पाँच विषयों (पंच लक्षण) का वर्णन है-
  1. सर्ग (जगत की सृष्टि),
  2. प्रतिसर्ग (सृष्टि का विस्तार, लोप एवं पुन: सृष्टि),
  3. वंश (राजाओं की वंशावली),
  4. मन्वंतर (भिन्न-भिन्न मनुओं के काल की प्रमुख घटनाएँ) तथा
  5. वंशानुचरित (अन्य गौरवपूर्ण राजवंशों का विस्तृत विवरण)।

इस प्रकार पुराणों में मध्य युगीन धर्म, ज्ञान-विज्ञान तथा इतिहास का वर्णन मिलता है। पुराणों ने ही हिन्दू धर्म में अवतारवाद की अवधारणा का सूत्रपात किया। इसके अलावा मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा, व्रत आदि इसी काल के देन हैं। पुराणों के पश्चात् भक्तिकाल का आगमन होता है, जिसमें विभिन्न संतों एवं भक्तों ने साकार ईश्वर की आराधना पर ज़ोर दिया तथा जनसेवा, परोपकार और प्राणी मात्र की समानता एवं सेवा को ईश्वर आराधना का ही रूप बताया। फलस्वरूप प्राचीन दुरूह कर्मकांडों के बंधन कुछ ढीले पड़ गये। दक्षिण भारत के अलवार संतों, गुजरात में नरसी मेहतामहाराष्ट्र में तुकारामपश्चिम बंगाल में चैतन्य महाप्रभुउत्तर भारत में तुलसीकबीरसूर और गुरु नानक के भक्ति भाव से ओत-प्रोत भजनों ने जनमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।

हिन्दू धर्म की अवधारणाएँ एवं परम्पराएँ

हिन्दू धर्म की प्रमुख अवधारणाएं निम्नलिखित हैं-

  • ब्रह्म– ब्रह्म को सर्वव्यापी, एकमात्र सत्ता, निर्गुण तथा सर्वशक्तिमान माना गया है। वास्तव में यह एकेश्वरवाद के ‘एकोऽहं, द्वितीयो नास्ति’ (अर्थात् एक ही है, दूसरा कोई नहीं) के ‘परब्रह्म’ हैं, जो अजर, अमर, अनन्त और इस जगत का जन्मदाता, पालनहारा व कल्याणकर्ता है।
  • आत्मा– ब्रह्म को सर्वव्यापी माना गया है अत: जीवों में भी उसका अंश विद्यमान है। जीवों में विद्यमान ब्रह्म का यह अशं ही आत्मा कहलाती है, जो जीव की मृत्यु के बावजूद समाप्त नहीं होती और किसी नवीन देह को धारण कर लेती है। अंतत: मोक्ष प्राप्ति के पश्चात् वह ब्रह्म में लीन हो जाती है।
  • पुनर्जन्म– आत्मा के अमरत्व की अवधारणा से ही पुनर्जन्म की भी अवधारणा पुष्ट होती है। एक जीव की मृत्यु के पश्चात् उसकी आत्मा नयी देह धारण करती है अर्थात् उसका पुनर्जन्म होता है। इस प्रकार देह आत्मा का माध्यम मात्र है।
  • योनि– आत्मा के प्रत्येक जन्म द्वारा प्राप्त जीव रूप को योनि कहते हैं। ऐसी 84 करोड़ योनियों की कल्पना की गई है, जिसमें कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, वृक्ष और मानव आदि सभी शामिल हैं। योनि को आधुनिक वैज्ञानिक भाषा में जैव प्रजातियाँ कह सकते हैं।
  • कर्मफल– प्रत्येक जन्म के दौरान जीवन भर किये गये कृत्यों का फल आत्मा को अगले जन्म में भुगतना पड़ता है। अच्छे कर्मों के फलस्वरूप अच्छी योनि में जन्म होता है। इस दृष्टि से मनुष्य सर्वश्रेष्ठ योनि है। परन्तु कर्मफल का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति अर्थात् आत्मा का ब्रह्मलीन हो जाना ही है।
  • स्वर्ग-नरक– ये कर्मफल से सम्बंधित दो लोक हैं। स्वर्ग में देवी-देवता अत्यंत ऐशो-आराम की ज़िन्दगी व्यतीत करते हैं, जबकि नरक अत्यंत कष्टदायक, अंधकारमय और निकृष्ट है। अच्छे कर्म करने वाला प्राणी मृत्युपरांत स्वर्ग में और बुरे कर्म करने वाला नरक में स्थान पाता है।
  • मोक्ष– मोक्ष का तात्पर्य है- आत्मा का जीवन-मरण के दुष्चक्र से मुक्त हो जाना अर्थात् परमब्रह्म में लीन हो जाना। इसके लिए निर्विकार भाव से सत्कर्म करना और ईश्वर की आराधना आवश्यक है।
  • चार युग– हिन्दू धर्म में काल (समय) को चक्रीय माना गया है। इस प्रकार एक कालचक्र में चार युग-कृत (सत्य), सत त्रेताद्वापर तथा कलि-माने गये हैं। इन चारों युगों में कृत सर्वश्रेष्ठ और कलि निकृष्टतम माना गया है। इन चारों युगों में मनुष्य की शारीरिक और नैतिक शक्ति क्रमश: क्षीण होती जाती है। चारों युगों को मिलाकर एक महायुग बनता है, जिसकी अवधि 43,20,000 वर्ष होती है, जिसके अंत में पृथ्वी पर महाप्रलय होता है। तत्पश्चात् सृष्टि की नवीन रचना शुरू होती है।
  • चार वर्ण– हिन्दू समाज चार वर्णों में विभाजित है- ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य तथा शूद्र। ये चार वर्ण प्रारम्भ में कर्म के आधार पर विभाजित थे। ब्राह्मण का कर्तव्य विद्यार्जन, शिक्षण, पूजन, कर्मकांड सम्पादन आदि है, क्षत्रिय का धर्मानुसार शासन करना तथा देश व धर्म की रक्षा हेतु युद्ध करना, वैश्यों का कृषि एवं व्यापार द्वारा समाज की आर्थिक आवश्यकताएँ पूर्ण करना तथा शूद्रों का अन्य तीन वर्णों की सेवा करना एवं अन्य ज़रूरतें पूरी करना। कालांतर में वर्ण व्यवस्था जटिल होती गई और यह वंशानुगत तथा शोषणपरक हो गई। शूद्रों को अछूत माना जाने लगा। बाद में विभिन्न वर्णों के बीच दैहिक सम्बन्धों से अन्य मध्यवर्ती जातियों का जन्म हुआ। वर्तमान में जाति व्यवस्था अत्यंत विकृत रूप में दृष्टिगोचर होती है।
  • चार आश्रम– प्राचीन हिन्दू संहिताएँ मानव जीवन को 100 वर्ष की आयु वाला मानते हुए उसे चार चरणों अर्थात् आश्रमों में विभाजित करती हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्न्यास। प्रत्येक की संभावित अवधि 25 वर्ष मानी गई। ब्रह्मचर्य आश्रम में व्यक्ति गुरु आश्रम में जाकर विद्याध्ययन करता है, गृहस्थ आश्रम में विवाह, संतानोत्पत्ति, अर्थोपार्जन, दान तथा अन्य भोग विलास करता है, वानप्रस्थ में व्यक्ति धीरे-धीरे संसारिक उत्तरदायित्व अपने पुत्रों को सौंप कर उनसे विरक्त होता जाता है और अन्तत: सन्न्यास आश्रम में गृह त्यागकर निर्विकार होकर ईश्वर की उपासना में लीन हो जाता है।
  • चार पुरुषार्थ– धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- ये चार पुरुषार्थ ही जीवन के वांछित उद्देश्य हैं उपयुक्त आचार-व्यवहार और कर्तव्य परायणता ही धर्म है, अपनी बौद्धिक एवं शरीरिक क्षमतानुसार परिश्रम द्वारा धन कमाना और उनका उचित तरीके से उपभोग करना अर्थ है, शारीरिक आनन्द भोग ही काम है तथा धर्मानुसार आचरण करके जीवन-मरण से मुक्ति प्राप्त कर लेना ही मोक्ष है। धर्म व्यक्ति का जीवन भर मार्गदर्शक होता है, जबकि अर्थ और काम गृहस्थाश्रम के दो मुख्य कार्य हैं और मोक्ष सम्पूर्ण जीवन का अंति लक्ष्य।
  • चार योग– ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग तथा राजयोग- ये चार योग हैं, जो आत्मा को ब्रह्म से जोड़ने के मार्ग हैं। जहाँ ज्ञान योग दार्शनिक एवं तार्किक विधि का अनुसरण करता है, वहीं भक्तियोग आत्मसमर्पण और सेवा भाव का, कर्मयोग समाज के दीन दुखियों की सेवा का तथा राजयोग शारीरिक एवं मानसिक साधना का अनुसरण करता है। ये चारों परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि सहायक और पूरक हैं।
  • चार धाम– उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम- चारों दिशाओं में स्थित चार हिन्दू धाम क्रमश: बद्रीनाथ, रामेश्वरम्, जगन्नाथपुरी और द्वारका हैं, जहाँ की यात्रा प्रत्येक हिन्दू का पुनीत कर्तव्य है।
  • प्रमुख धर्मग्रन्थ– हिन्दू धर्म के प्रमुख ग्रंथ हैं- चार वेद (ॠग्वेदसामवेदयजुर्वेद और अथर्ववेद) तेरह उपनिषद, अठारह पुराणरामायणमहाभारतगीतारामचरितमानस आदि। इसके अलावा अनेक कथाएँ, अनुष्ठान ग्रंथ आदि भी हैं।

सोलह संस्कार

मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक सोलह अथवा सत्रह पवित्र संस्कार सम्पन्न किये जाते हैं-

  1. गर्भाधान
  2. पुंसवन (गर्भ के तीसरे माह तेजस्वी पुत्र प्राप्ति हेतु किया गया संस्कार),
  3. सीमोन्तोन्नयन (गर्भ के चौथे महीने गर्भिणी स्त्री के सुख और सांत्वना हेतु),
  4. जातकर्म (जन्म के समय)
  5. नामकरण
  6. निष्क्रमण (बच्चे का सर्वप्रथम घर से बाहर लाना),
  7. अन्नप्राशन (पांच महीने की आयु में सर्वप्रथम अन्न ग्रहण करवाना),
  8. चूड़ाकरण (मुंडन)
  9. कर्णछेदन
  10. उपनयन (यज्ञोपवीत धारण एवं गुरु आश्रम को प्रस्थान)
  11. केशान्त अथवा गौदान (दाढ़ी को सर्वप्रथम काटना)
  12. समावर्तन (शिक्षा समाप्त कर गृह को वापसी)
  13. विवाह
  14. वानप्रस्थ
  15. सन्न्यास
  16. अन्त्येष्टि

इस प्रकार हिन्दू धर्म की विविधता, जटिलता एवं बहु आयामी प्रवृत्ति स्पष्ट है। इसमें अनेक दार्शनिकों ने अलग-अलग प्रकार से ईश्वर एवं सत्य को समझने का प्रयास किया, फलस्वरूप अनेक दार्शनिक मतों का प्रादुर्भाव हुआ

बौद्ध धर्म  

बौद्ध धर्म

बौद्ध धर्म
विवरण बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है।
संस्थापक गौतम बुद्ध
सम्प्रदाय थेरवादमहायान और वज्रयान
ऐतिहासिक उल्लेख पाँचवी शताब्दी ई. में फ़ाह्यान भारत आया तो उसने भिक्षुओं से भरे हुए अनेक विहार देखे। सातवीं शताब्दी में हुएन-सांग ने भी यहाँ अनेक विहारों को देखा। इन दोनों चीनी यात्रियों ने अपनी यात्रा में यहाँ का वर्णन किया है।
प्रमुख अनुयायी ह्वेन त्सांगमिलिंद (मिनांडर)सम्राट अशोकफ़ाह्यानकनिष्क
अन्य जानकारी बौद्ध धर्म को पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं और यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है।

 

 

बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है। इसके संस्थापक भगवान बुद्ध, शाक्यमुनि (गौतम बुद्ध) थे। बुद्ध राजा शुद्धोदन के पुत्र थे और इनका जन्म लुंबिनी नामक ग्राम (नेपाल) में हुआ था। वे छठवीं से पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जीवित थे। उनके गुज़रने के बाद अगली पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला, और अगले दो हज़ार सालों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फ़ैल गया। आज, बौद्ध धर्म में तीन मुख्य सम्प्रदाय हैं: थेरवादमहायान और वज्रयान। बौद्ध धर्म को पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं और यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है।

मुख्य सम्प्रदाय

बौद्ध धर्म में दो मुख्य सम्प्रदाय हैं:

थेरवाद

थेरवाद या हीनयान बुद्ध के मौलिक उपदेश ही मानता है।

महायान

महायान बुद्ध की पूजा करता है। ये थेरावादियों को “हीनयान” (छोटी गाड़ी) कहते हैं। बौद्ध धर्म की एक प्रमुख शाखा है जिसका आरंभ पहली शताब्दी के आस-पास माना जाता है। ईसा पूर्व पहली शताब्दी में वैशाली में बौद्ध-संगीति हुई जिसमें पश्चिमी और पूर्वी बौद्ध पृथक् हो गए। पूर्वी शाखा का ही आगे चलकर महायान नाम पड़ा। देश के दक्षिणी भाग में इस मत का प्रसार देखकर कुछ विद्वानों की मान्यता है कि इस विचारधारा का आरंभ उसी अंचल से हुआ। महायान भक्ति प्रधान मत है। इसी मत के प्रभाव से बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण आंरभ हुआ। इसी ने बौद्ध धर्म में बोधिसत्व की भावना का समावेश किया। यह भावना सदाचार, परोपकार, उदारता आदि से सम्पन्न थी। इस मत के अनुसार बुद्धत्व की प्राप्ति सर्वोपरि लक्ष्य है। महायान संप्रदाय ने गृहस्थों के लिए भी सामाजिक उन्नति का मार्ग निर्दिष्ट किया। भक्ति और पूजा की भावना के कारण इसकी ओर लोग सरलता से आकृष्ट हुए। महायान मत के प्रमुख विचारकों में अश्वघोषनागार्जुन और असंग के नाम प्रमुख हैं।

ब्रज (मथुरा) में बौद्ध धर्म

मथुरा और बौद्ध धर्म का घनिष्ठ संबंध था। जो बुद्ध के जीवन-काल से कुषाण-काल तक अक्षु्ण रहा। ‘अंगुत्तरनिकाय‘ के अनुसार भगवान बुद्ध एक बार मथुरा आये थे और यहाँ उपदेश भी दिया था।[1] ‘वेरंजक-ब्राह्मण-सुत्त’ में भगवान् बुद्ध के द्वारा मथुरा से वेरंजा तक यात्रा किए जाने का वर्णन मिलता है।[2] पालि विवरण से यह ज्ञात होता है कि बुद्धत्व प्राप्ति के बारहवें वर्ष में ही बुद्ध ने मथुरा नगर की यात्रा की थी। [3] मथुरा से लौटकर बुद्ध वेरंजा आये फिर उन्होंने श्रावस्ती की यात्रा की। [4] भगवान बुद्ध के शिष्य महाकाच्यायन मथुरा में बौद्ध धर्म का प्रचार करने आए थे। इस नगर में अशोक के गुरु उपगुप्त[5]ध्रुव (स्कंद पुराण, काशी खंड, अध्याय 20), एवं प्रख्यात गणिका वासवदत्ता[6] भी निवास करती थी। मथुरा राज्य का देश के दूसरे भागों से व्यापारिक संबंध था। मथुरा उत्तरापथ और दक्षिणापथ दोनों भागों से जुड़ा हुआ था।[7] राजगृह से तक्षशिला जाने वाले उस समय के व्यापारिक मार्ग में यह नगर स्थित था।[8]

बौद्ध मूर्तियाँ

मथुरा के कुषाण शासक जिनमें से अधिकांश ने बौद्ध धर्म को प्रोत्साहित किया मूर्ति निर्माण के पक्षपाती थे। यद्यपि कुषाणों के पूर्व भी मथुरा में बौद्ध धर्म एवं अन्य धर्म से सम्बन्धित प्रतिमाओं का निर्माण किया गया था। विदित हुआ है कि कुषाण काल में मथुरा उत्तर भारत में सबसे बड़ा मूर्ति निर्माण का केन्द्र था और यहाँ विभिन्न धर्मों सम्बन्धित मूर्तियों का अच्छा भण्डार था। इस काल के पहले बुद्ध की स्वतंत्र मूर्ति नहीं मिलती है। बुद्ध का पूजन इस काल से पूर्व विविध प्रतीक चिह्नों के रूप में मिलता है। परन्तु कुषाण काल के प्रारम्भ से महायान भक्ति, पंथ भक्ति उत्पत्ति के साथ नागरिकों में बुद्ध की सैकड़ों मूर्तियों का निर्माण होने लगा। बुद्ध के पूर्व जन्म की जातक कथायें भी पत्थरों पर उत्कीर्ण होने लगी। मथुरा से बौद्ध धर्म सम्बन्धी जो अवशेष मिले हैं, उनमें प्राचीन धार्मिक एवं लौकिक जीवन के अध्ययन की अपार सामग्री है। मथुरा कला के विकास के साथ–साथ बुद्ध एवं बौधित्सव की सुन्दर मूर्तियों का निर्माण हुआ। गुप्तकालीन बुद्ध प्रतिमाओं में अंग प्रत्यंग के कला पूर्ण विन्यास के साथ एक दिव्य सौन्दर्य एवं आध्यात्मिक गांभीर्य का समन्वय मिलता है।

ऐतिहासिक उल्लेख

पाँचवी शताब्दी ई. में फ़ाह्यान भारत आया तो उसने भिक्षुओं से भरे हुए अनेक विहार देखे। सातवीं शताब्दी में हुएन-सांग ने भी यहाँ अनेक विहारों को देखा। इन दोनों चीनी यात्रियों ने अपनी यात्रा में यहाँ का वर्णन किया है। “पीतू” देश से होता हुआ चीनी यात्री फ़ाह्यान 80 योजन चलकर मताउला [9]मथुरा) जनपद पहुँचा था। इस समय यहाँ बौद्ध धर्म अपने विकास की चरम सीमा पर था। उसने लिखा है कि यहाँ 20 से भी अधिक संघाराम थे, जिनमें लगभग तीन सहस्र से अधिक भिक्षु रहा करते थे।[10] यहाँ के निवासी अत्यंत श्रद्धालु और साधुओं का आदर करने वाले थे। राजा भिक्षा (भेंट) देते समय अपने मुकुट उतार लिया करते थे और अपने परिजन तथा अमात्यों के साथ अपने हाथों से दान करते (देते) थे। यहाँ अपने-आपसी झगड़ों को स्वयं तय किया जाता था; किसी न्यायाधीश या क़ानून की शरण नहीं लेनी पड़ती थीं। नागरिक राजा की भूमि को जोतते थे तथा उपज का कुछ भाग राजकोष में देते थे। मथुरा की जलवायु शीतोष्ण थी। नागरिक सुखी थे। राजा प्राणदंड नहीं देता था, शारीरिक दंड भी नहीं दिया जाता था। अपराधी को अवस्थानुसार उत्तर या मध्यम अर्थदंड दिया जाता था (जेम्स लेग्गे, दि टे्रवेल्स ऑफ फ़ाह्यान, पृ 43)। अपराधों की पुनरावृत्ति होने पर दाहिना हाथ काट दिया जाता था। फ़ाह्यान लिखता हैं कि पूरे राज्य में चांडालों को छोड़कर कोई निवासी जीव-हिंसा नहीं करता था। मद्यपान नहीं किया जाता था और न ही लहसुन-प्याज का सेवन किया जाता था। चांडाल (दस्यु) नगर के बाहर निवास करते थे। क्रय-विक्रय में सिक्कों एवं कौड़ियों का प्रचलन था (जेम्स लेग्गे, दि टे्रवेल्स ऑफ फ़ाह्यान, पृ 43)। बौद्ध ग्रंथों में शूरसेन के शासक अवंति पुत्र की चर्चा है, जो उज्जयिनी के राजवंश से संबंधित था। इस शासक ने बुद्ध के एक शिष्य महाकाच्यायन से ब्राह्मण धर्म पर वाद-विवाद भी किया था।[11] भगवान् बुद्ध शूरसेन जनपद में एक बार मथुरा गए थे, जहाँ आनंद ने उन्हें उरुमुंड पर्वत पर स्थित गहरे नीले रंग का एक हरा-भरा वन दिखलाया था।[12] मिलिन्दपन्ह[13] में इसका वर्णन भारत के प्रसिद्ध स्थानों में हुआ है। इसी ग्रंथ में प्रसिद्ध नगरों एवम् उनके निवासियों के नाम के एक प्रसंग में माधुर का (मथुरा के निवासी का भी उल्लेख मिलता है[14] जिससे ज्ञात होता है कि राजा मिलिंद (मिनांडर) के समय (150 ई. पू.) मथुरा नगर पालि परंपरा में एक प्रतिष्ठित नगर के रूप में विख्यात हो चुका था।

बौद्ध धर्म के अनुयायी

ह्वेन त्सांग

भारत में ह्वेन त्सांग ने बुद्ध के जीवन से जुड़े सभी पवित्र स्थलों का भ्रमण किया और उपमहाद्वीप के पूर्व एवं पश्चिम से लगे इलाक़ो की भी यात्रा की। उन्होंने अपना अधिकांश समय नालंदा मठ में बिताया, जो बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केंद्र था, जहाँ उन्होंने संस्कृतबौद्ध दर्शन एवं भारतीय चिंतन में दक्षता हासिल की। इसके बाद ह्वेन त्सांग ने अपना जीवन बौद्ध धर्मग्रंथों के अनुवाद में लगा दिया जो 657 ग्रंथ थे और 520 पेटियों में भारत से लाए गए थे। इस विशाल खंड के केवल छोटे से हिस्से (1330 अध्यायों में क़रीब 73 ग्रंथ) के ही अनुवाद में महायान के कुछ अत्यधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ शामिल हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  अंगुत्तनिकाय, भाग 2, पृ 57; तत्रैव, भाग 3,पृ 257
  2.  भरत सिंह उपापध्याय, बुद्धकालीन भारतीय भूगोल, पृ 109
  3.  दिव्यावदान, पृ 348 में उल्लिखित है कि भगवान बुद्ध ने अपने परिनिर्वाण काल से कुछ पहले ही मथुरा की यात्रा की थी। भगवान्……परिनिर्वाणकालसमये……….मथुरामनुप्राप्त:। पालि परंपरा से इसका मेल बैठाना कठिन है।
  4.  उल्लेखनीय है कि वेरंजा उत्तरापथ मार्ग पर पड़ने वाला बुद्धकाल में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव था, जो मथुरा और सोरेय्य के मध्य स्थित था।
  5.  वी ए स्मिथ, अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया (चतुर्थ संस्करण), पृ 199
  6.  मथुरायां वासवदत्ता नाम गणिकां।’ दिव्यावदान (कावेल एवं नीलवाला संस्करण), पृ 352
  7.  आर सी शर्मा, बुद्धिस्ट् आर्ट आफ मथुरा, पृ 5
  8.  भरत सिंह उपाध्याय, बुद्धिकालीन भारतीय भूगोल, पृ 440
  9.  `मूचा’ (मोर का शहर) का विस्तार 27° 30′ उत्तरी आक्षांश से 77° 43′ पूर्वी देशांतर तक था। यह कृष्ण की जन्मस्थली थी जिसका राजचिह्न मोर था।
  10.  जेम्स लेग्गे, दि टे्रवेल्स ऑफ फ़ाह्यान , पृ 42
  11.  मज्झिमनिकाय, भाग दो, पृ 83 और आगे; मललसेकर, डिक्शनरी आँफ्‌ पालि प्रापर नेम्स, भाग 2, पृ 438
  12.  दिव्यावदान, पृ 348-349
  13.  मिलिन्दपन्ह (ट्रेंकनर संस्करण), पृ 331
  14.  मिलिंदपन्हों (ट्रेंकनर संस्करण), पृ 324