सिख इतिहास के साथ धोखा—मियां मीर द्वारा श्री हरिमन्दिर की नींव रखने का झूठ

सिख इतिहास के साथ धोखा—मियां मीर द्वारा श्री हरिमन्दिर की नींव रखने का झूठ

       पंजाब के मुख्यमंत्री श्री अमरिंदर सिंह द्वारा हरमंदिर साहिब की स्थापना का श्रेय मियां मीर को देते हुए शुभकामना सन्देश प्रकाशित किया है।यह इतिहासिक जुठ है जो वर्षों से चला आ रहा है। इस लेख के माध्यम से सच को जानिए।

— स्वर्गीय राजिंदर सिंह

यह उल्लेखनीय है कि सिक्ख इतिहास के मूल स्रोतों में यही बताया गया है कि श्री हरिमन्दिर की नींव स्वयं श्रीगुरु अर्जुनदेव (१६१०-१६६३ वि•=१५५३-१६०६ ई•) ने अपने कर-कमलों से रक्खी थी। बहुत बाद में यह बात उड़ा दी गई कि यह नींव श्री पंचम गुरु जी ने नहीं बल्कि मुसलमान पीर-फ़क़ीर या दरवेश शेख़ मुहम्मद=मियां मीर (१६०४-१६९२ वि•=१५४७-१६३५ ई•) ने रक्खी थी। वस्तुतः इस उत्तरवर्ती उड़ाई बात में कोई सार नहीं है। यहां यह विचारणीय है कि मियां मीर द्वारा श्री हरिमन्दिर की नींव रखने की इस निराधार और झूठी बात को किसने पहले-पहल तूल देकर उड़ाया।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध में पंजाब के तत्कालीन गवर्नर हेनरी डेविस के अधीन कार्यरत लेखक कन्हैयालाल हिन्दी ने अपनी फ़ारसी रचना तारीख़े पंजाब (१९३२ विक्रमी=१८७५ ईसवी में श्रीगुरु अर्जुनदेव और उनसे सम्बन्धित सारे प्रसंग का उल्लेख करते हुए मियां मीर का नाम तक नहीं लिया। इससे यह भली-भांति स्पष्ट हो जाता है कि मियां मीर द्वारा हरिमन्दिर की नींव रखने या रखवाए जाने की लिखित-कल्पना १९३२ वि•=१८७५ ई• के बाद किसी समय प्रकाश में आई होगी।

ज्ञानी ज्ञान सिंह कृत श्री गुरु पन्थ प्रकाश के पहले पत्थरछापा संस्करण (दर मतबा मुर्तज़वी, दिल्ली, १९३६ विक्रमी=१८७९ ई•) में भी मियां मीर वाली कल्पना को कोई स्थान प्राप्त नहीं है। किन्तु इसी ग्रन्थ श्री गुरु पन्थ प्रकाश के दूसरे पत्थरछापा संस्करण (दीवान बूटा सिंह द्वारा मुद्रित, लाहौर, २० चैत्र १९४६ वि• = मार्च १८८९ ई•) पूर्वार्द्ध पृष्ठ २१२-२१३ पर पहली बार हरिमन्दिर की नींव रखने के सन्दर्भ में मियां मीर का उल्लेख मिलता है। उसके बाद उन्हीं की प्रसिद्ध रचना तवारीख़ गुरू ख़ालसा (भाग-१, गुरु गोविन्द सिंह प्रेस, सियालकोट, १९४८ विक्रमी=१८९१ ईसवी) के पृष्ठ १९७ पर इसी बात को दोहराया गया है।

इस पर भी ज्ञानी ज्ञान सिंह मियां मीर वाली बात को तूल देने वाले सबसे पहले व्यक्ति नहीं है। वस्तुतः इस बात को सबसे पहली बार तूल देने वाला एक अंग्रेज़ अधिकारी था।
ई• निकौल ने मियां मीर की बात उड़ाई
हरिमन्दिर की नींव रखने का श्रेय मियां मीर को देने की बात अमृतसर की म्यूनिसिपल कमेटी के सेक्रेटरी ई• निकौल (E. Nicholl) ने उड़ाई थी। दि पंजाब नोट्स एण्ड क्वैरीज़ (१८४९-१८८४), जिल्द-१, टाइप्ड कापी, एकाऊंट नं• १२१४ (सिक्ख रेफ़रेंस लाइब्रेरी, अमृतसर) के पृष्ठ १४१ पर ई• निकौल ने यह नोट दर्ज किया है :

“The foundation stone of the Hari-mandir was laid by Mian Mir •• between whom and Guru Ram Das there existed a strong frendship.”

[ हरिमन्दिर की नींव का पत्थर मियां मीर ने स्थापित किया था •• जिसमें और गुरु राम दास में बड़ी गहरी मित्रता थी ]।

बस ! इतना ही नोट लिखा मिलता है। ई• निकौल ने इसका स्रोत नहीं बताया है। इस प्रकार बिना आधार बताए इस अंग्रेज़ अधिकारी ने श्री हरिमन्दिर की नींव रखने का सारा श्रेय मियां मीर को दे डाला।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि क़ादिरी सूफ़ी सिलसिले के लाहौरवासी सूफ़ी पीर शेख़ मुहम्मद=मियां मीर (९३८-१०४५ हि•=१६०४-१६९२ वि•=१५४७-१६३५ ई•) और गुरु अर्जुनदेव (१६१०-१६६३ वि•=१५५३-
१६०६ ई•) दोनों समकालीन थे। इतना होने पर भी ई• निकौल के उपरोक्त निराधार और नितान्त काल्पनिक नोट से पहले के जितने भी सिक्ख स्रोत मिलते हैं, उनमें से किसी में भी श्रीगुरु रामदास या श्रीगुरु अर्जुन देव के साथ हरिमन्दिर की नींव रखने के सन्दर्भ में मियां मीर का उल्लेख नहीं मिलता।

अंग्रेज़ी प्रभाव से सिंघ-सभाओं का गठन

ई• निकौल की उपरोक्त निराधार टिप्पणी के काल से थोड़ा पहले ही पंजाब में अलगाववाद के अंग्रेज़ी बीज बोए गए थे। सन् १८७३ में उस बीज का अंकुर श्री गुरु सिंघ सभा, अमृतसर के रूप में फूट निकला था। इस अंकुरित सिंघ सभा से प्रेरणा लेकर २ नवम्बर १८७९ ई• को सिंघ सभा, लाहौर अस्तित्व में आई। विशुद्ध पृथक्ता-वादी विचारों की स्थापना करने वाली इस नवजात सभा के प्रधान बूटा सिंह थे।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि दीवान बूटा सिंह के मुद्रणालय=छापेख़ाने में ही ज्ञानी ज्ञान सिंह कृत श्री गुरु पन्थ प्रकाश का दूसरा पत्थरछापा संस्करण (लाहौर, २० चैत्र १९४६ विक्रमी=मार्च १८८९ ई•) तैयार हुआ था। दीवान बूटा सिंह और उनके द्वारा स्थापित सिंघ सभा, लाहौर की अंग्रेज़-भक्ति जगत् प्रसिद्ध है।

सिंघ साहिब ज्ञानी कृपाल सिंह (श्री अकाल तख़्त साहिब के भूतपूर्व जत्थेदार और श्री हरिमन्दिर के भूतपूर्व प्रमुख ग्रन्थी) द्वारा सम्पादित “श्री गुरु पन्थ प्रकाश” में लाहौर और अमृतसर दोनों के पत्थरछापा संस्करणों (क्रमशः २० चैत्र १९४६ वि• और ज्येष्ठ शुक्ला ४, १९४६ वि• को प्रकाशित) का उपयोग हुआ है। अजीत नगर, अमृतसर से २०३४ वि•=१९७७ ई• में प्रकाशित इस टाइप्ड-संस्करण की कुल २५० पृष्ठों में छपी प्रस्तावना के पृष्ठ ९०-९४ पर ज्ञानी कृपाल सिंह सप्रमाण बताते हैं कि दीवान बूटा सिंह द्वारा मुद्रित श्री गुरु पन्थ प्रकाश (पत्थरछापा संस्करण, लाहौर, २० चैत्र १९४६ वि•=मार्च १८८९ ई•) के अनेक स्थलों पर प्रक्षेप हुआ है।

ज्ञानी ज्ञान सिंह की लाहौर से प्रकाशित इस प्रक्षिप्त रचना श्री गुरु पन्थ प्रकाश में पहली बार मियां मीर का उल्लेख इस प्रकार किया गया है :

बिस्नदेव जहि कार कराई। हरि पौड़ी गुरु रची तहांई।
संमत सोलां सै इकताली। मैं, मंदर यहि रचा बिसाली।
मींआ मीर तै नीउ रखाई। कारीगरे पलटि कर लाई।
यहि पिख पुन गुर यों बच कहे। धरी तुरक की नीउ न रहे।
इक बार जर तै उड जैहै। पुन सिखन कर तै दिढ ह्वै ह्वै।
कह्यो जैस गुर भयो तैस है

[ विष्णुदेव ने जहां कारसेवा कराई थी, गुरु अर्जुनदेव ने वहीं हरि की पौड़ियां बनाई थीं। सम्वत् १६४१ विक्रमी में यह विशाल हरिमन्दिर रचा था। गुरु जी ने मियां मीर से इसकी नींव रखवाई थी, किन्तु कारीगर ने नींव की ईंट पलट कर लगा दी। यह देख कर गुरु जी ने पुनः यह वचन कहे : तुरक=मुसलमान द्वारा धरी गई नींव स्थिर न रहेगी, एक बार यह जड़ से उखड़ जाएगी, फिर यह सिक्खों द्वारा दृढ़ होगी। गुरु जी ने जैसा कहा था, आगे चलकर वैसा ही हुआ है ]।

इस प्रकार एक अंग्रेज़-भक्त दीवान के मुद्रणालय में छपी उक्त प्रक्षिप्त रचना में वस्तुतः मियां मीर सम्बन्धी प्रसंग की नींव रक्खी गई। यह सब अंग्रेज़ विचारकों की कल्पना का पिष्ठ-पेषण मात्र था जो आगे चलकर अपनी मुख्यधारा से धीरे-धीरे कटते जा रहे अलगाव-वादी सिक्ख इतिहासकारों के बार-बार झूठे प्रचार से एक ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रसिद्ध होता चला गया। सच तो यही है कि इसमें कोई सार नहीं।

वस्तुतः श्री गुरु पन्थ प्रकाश के उपरोक्त दूसरे पत्थर छापा संस्करण के इस प्रसंग की अविश्वसनीयता इस बात से और अधिक पुष्ट हो जाती है कि इसके तीसरे पत्थर-छापा संस्करण (भाई काका सिंह की आज्ञा से मतबा चश्मे नूर, श्री अमृतसर द्वारा लाला नृसिंहदास के ऐहतमाम में ज्येष्ठ शुक्ला ४, रविवार १९४६ विक्रमी को प्रकाशित) में मियां मीर द्वारा श्री हरिमन्दिर की नींव रखने का कोई उल्लेख नहीं किया गया है।

ज्ञानी ज्ञान सिंह पर सिंघ सभा का प्रभाव

ज्ञानी ज्ञान सिंह अपनी एक और रचना श्री रिपुदमन प्रकाश (भूपेन्द्र स्टेट, पटियाला, १९७६ वि•=१९१९ ई•) में बताते हैं :

उन्नी सौ बत्ती बिखै, बैठ सुधासर माहि।
तवारीख़ गुरू ख़ालसा, रची सहित उतसाहि।

इस काव्यांश से ज्ञात होता है कि ज्ञानी ज्ञान सिंह १९३२ विक्रमी=१८७५ ईसवी तक सुधासर=अमृतसर आ बसे थे जहां उन्होंने बड़े उत्साह से तवारीख़ गुरू ख़ालसा लिखना प्रारम्भ कर दिया था। इस समय तक यहां पर “सिंघ सभा” का गठन हो चुका था। तवारीख़ गुरू ख़ालसा के प्रकाशित हो चुके पहले तीन भागों के मुख पृष्ठों पर इनका प्रकाशन-वर्ष इस प्रकार दिया है :

१• गुरू ख़ालसा १९४८ वि• = १८९१ ई•
२• शमशेर ख़ालसा १९४९ वि• = १८९२ ई•
३• राज ख़ालसा १९४९ वि• = १८९३ ई•

इन पुस्तकों के प्रकाशित होने तक सिंघ सभाओं का प्रभाव बहुत बढ़ चुका था। लाहौर में अंग्रेज़-भक्त प्रो• गुरमुख सिंह और दीवान बूटा सिंह के प्रयत्नों से सिंघ सभा, लाहौर का गठन २ नवम्बर १८७९ ई• को हो गया था। इसे ११ अप्रैल १८८० ई• में सिंघ सभा, अमृतसर में मिला दिया गया और तब दोनों का संयुक्त नाम “श्री गुरू सिंघ सभा जनरल” रक्ख दिया गया।

फिर प्रो• गुरमुख सिंह के प्रयत्नों से स्थान-स्थान पर घूम-फिर कर अनेकानेक सिंघ सभाओं का बनाया जाना प्रारम्भ हुआ। इसी समय एक केन्द्रीय जत्थेबन्दी की आवश्यकता समझी गई। इसकी पूर्ति हेतु १८८३ ई• में “ख़ालसा दीवान” की स्थापना की गई जो बहुत-सी सिंघ सभाओं के गठजोड़ का परिणाम था।

इसके बाद तो सिंघ सभाओं की संख्या के साथ ही “ख़ालसा दीवान” का घेरा भी बढ़ता चला गया। वैशाखी और दीवाली जैसे त्यौहारों पर इस दीवान द्वारा ऐसे मेले आयोजित किए जाने लगे जिनमें हिन्दुओं जैसी सिक्ख रीतियों, ठाकुरों=देवमूर्तियों और विशेषकर श्री हरिमन्दिर के प्रमुख पूजास्थल और परिक्रमा मार्ग में प्रतिष्ठित देवमूर्तियों की पूजा इत्यादि विषयों की निषेधपरक आलोचना की जाती थी।

इस प्रकार की आलोचना द्वारा सिक्ख पन्थ को एक ऐसी दिशा की ओर ले जाने का प्रयास किया जा रहा था जो भारतवर्ष की मुख्य सांस्कृतिक धारा से किसी-न-किसी अंश से दूर ले जाने वाला था। वस्तुतः अंग्रेज़ विचारकों के सम्पर्क और प्रभाव में आए सिक्ख- विद्वानों के मानस से इसी समय से अलगाववाद की वह धारा फूट निकली जिसके फलस्वरूप सन् १९८० के दशक में इसने सारे पंजाब में बड़ा ही उग्र रूप धारण कर लिया था।

सन् १८७३-१८९० के जिस काल में अंग्रेजों की भारत को जातियों-उपजातियों में बांटकर रखने वाली राष्ट्र-घाती मानसिकता से प्रभावित प्रो• गुरमुख सिंह और दीवान बूटा सिंह जैसे सिक्ख-नेता और विचारक सिंघ सभाओं और ख़ालसा दीवान के माध्यम से सिक्ख-समाज को मनचाही दिशा प्रदान कर रहे थे, उसी अन्तराल में ज्ञानी ज्ञान सिंह अपनी रचना तवारीख़ गुरू ख़ालसा के लेखन-कार्य को अमृतसर में रहते हुए ही अन्तिम रूप दे रहे थे। उधर श्री गुरू सिंघ सभा जनरल और ख़ालसा दीवान का प्रमुख कार्यालय भी अमृतसर ही में था। अतः यह बात मानने योग्य नहीं हो सकती कि ज्ञानी ज्ञान सिंह इन दोनों संस्थाओं के कार्यकलापों और अंग्रेज़ी मानसिकता से परिचित न रहे हों और उन पर इनका कोई प्रभाव न पड़ा हो।

तवारीख़ गुरू ख़ालसा पर अंग्रेज़ी प्रभाव

तवारीख़ गुरू ख़ालसा के भाग-१ (गुरू ख़ालसा, १९४८ वि•=१८९१ ई•) का अवलोकन करने पर यह ज्ञात होता है कि ज्ञानी ज्ञान सिंह के लेखन-कार्य पर अमृतसर की म्युनिसिपल कमेटी के तत्कालीन सेक्रेटरी ई• निकौल द्वारा मियां मीर के हाथों हरिमन्दिर की नींव रक्खे जाने सम्बन्धी फैलाए गए शिगूफ़े का प्रभाव अवश्य पड़ गया था। इस शिगूफ़े से प्रभावित होकर वह अपनी इस रचना के पृष्ठ १९७ पर लिखते हैं :

“यद्यपि श्री अमृतसर तालाब (सरोवर) सम्वत् १६३३ वि• में गुरु रामदास ने भी पटवाया था परन्तु पांचवें गुरु ने अधिक खुदवाकर पक्का करवाया और पुल बंधवाया है। इस तीर्थ के बीच में १ माघ सम्वत् १६४५ वि• और साल ११९ गुरु (नानकशाही) में गुरु वार को हरिमन्दिर की नींव रक्खी थी।

उस वक़्त मियां मीर साहिब, मशहूर पीर जो गुरु साहिब के साथ बहुत प्रेम रखता था, अचानक आ गया। गुरु जी ने उसका मान रखने के वास्ते उसके हाथों पहली ईंट रखवाई परन्तु बिना जाने उसने उलटी रक्ख दी, राज (मिस्त्री) ने उठाकर फिर सीधी करके रक्खी। गुरु जी ने कहा : यह मन्दिर गिर कर फिर बनेगा। यही बात सच हुई।

सम्वत् १८१८ विक्रमी में अहमदशाह दुरानी बारूद के साथ इस मन्दिर को उखाड़ गया। फिर ११ वैशाख सम्वत् १८२१ में गुरुवार को बुड्ढा दल ख़ालसा ने सर-दार जस्सा सिंह आहलुवालिया के हाथों नींव रखवाई और यह टहल (सेवा) दीवान देसराज सिरसा वाले खत्री के सुपुर्द की गई।”

इस स्थल पर ज्ञानी ज्ञान सिंह ने मियां मीर के अचा-नक पहुंचने और हरिमन्दिर की नींव की पहली ईंट रक्खे जाने के सम्बन्ध में जो कुछ भी लिखा है उसके मूल स्रोत का कहीं कोई उल्लेख नहीं किया है। इससे यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि ज्ञानी ज्ञान सिंह सदृश विद्वान् भी उन दिनों अंग्रेज़ अधिकारी द्वारा छोड़े गए पूर्व चर्चित शिगूफ़े से प्रभावित हो गए थे। वस्तुतः इस शिगूफ़े और उस पर आधारित लेखन-कार्य में कोई सार नहीं।

प्राचीन परम्परा के पक्षधर विद्वान्

श्रीगुरु अर्जुनदेव के मामा और शिष्य भाई गुरदास (१६०२-१६९४ वि•) से लेकर १९३२ वि•=१८७९ ई• तक के जितने भी प्राचीन स्रोत हैं उन सब में श्री हरि-मन्दिर की नींव रखने के सन्दर्भ में मियां मीर का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। जैसा कि प्रमाण सहित सिद्ध किया जा चुका है कि प्राचीन सिक्ख परम्परा के अनु-सार श्री हरिमन्दिर जी की नींव स्वयं श्रीगुरु अर्जुनदेव ने ही रक्खी थी। इस प्रचीन परम्परा के पक्षधर विद्वानों में से कुछ एक के विचार इस प्रकार प्रस्तुत हैं :

१• मैक्स आर्थर मैकालिफ़ (१८३७-१९२३ ई•) से प्रेरित होकर अलगाववादी रचना “हम हिन्दू नहीं” (१८९८ ई•) लिखने वाले भाई काहन सिंह नाभा (१८६१-१९३८ ई•) अपनी एक अन्य रचना महान कोश में बताते हैं :
“श्रीगुरु अर्जुनदेव ने •• सम्वत् १६४३ में सरोवर को पक्का करना आरम्भ किया और नाम अमृतसर रक्खा (सरोवर की लम्बाई ५०० फ़ुट, चौड़ाई ४९० फ़ुट और गहराई १७ फ़ुट है), जिससे शनै-शनै नगर का नाम भी यही हो गया। १ माघ सम्वत् १६४५ को पांचवें सत्गुरु ने ताल के मध्य हरिमन्दिर की नींव रक्खी और उसकी इमारत पूरी करके सम्वत् १६६१ में श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी स्थापित किए” (महान कोश, भाषा विभाग पंजाब, पटियाला, छठा संस्करण, १९९९ ई•, पृष्ठ ७६)।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि अलगाववाद के मूल प्रेरकों में से एक होते हुए भी भाई काहन सिंह नाभा ने महान कोश में, जिसका पहला संस्करण सन् १९३० में प्रकाशित हुआ था, श्री हरिमन्दिर की नींव रखने का श्रेय श्रीगुरु
अर्जुनदेव को ही दिया है।

इसी महान कोश के पृष्ठ ९७२ पर भाई काहन सिंह नाभा ने मियां मीर का परिचय देते हुए कहीं पर भी उसके द्वारा श्री हरिमन्दिर की नींव रखने का कोई उल्लेख नहीं किया है।

२• इतिहासकार तेजासिंह-गण्डासिंह अपनी रचना सिक्ख इतिहास (पंजाबी यूनीवर्सिटी, पटियाला १९८५ ई•) के पृष्ठ ३२ पर स्पष्ट लिखते हैं :

“सन् १५८९ (१६४६ विक्रमी) में गुरु अर्जुन जी ने केन्द्रीय मन्दिर की, जिसको अब गोल्डन टेम्पल या हरिमन्दिर साहिब कहा जाता है, अमृतसर के सरोवर के मध्य में नींव रक्खी। इसके दरवाज़े सब ओर को खुलते थे जिसका भाव यह है कि सिक्ख पूजा स्थान सबके लिए एक समान खुला है।”
३• इसी प्रकार इतिहासकार डा• मनजीत कौर भी अपनी रचना दि गोल्डन टेम्पल : पास्ट एण्ड प्रैज़ेण्ट (गुरु नानकदेव यूनीवर्सिटी प्रेस, अमृतसर, १९८३ ई•) में प्राचीन परम्परा का समर्थन करते हुए यही बताती हैं कि श्री
हरिमन्दिर की नींव  श्रीगुरु अर्जुनदेव ने ही रक्खी थी।

मियां मीर और अंग्रेज़ों के पक्षधर विचारक

ई• निकौल की निराधार कल्पना से प्रभावित सिक्ख विचारकों ने कालान्तर में यह मिथ्या प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया कि श्री हरिमन्दिर की नींव मियां मीर ने रक्खी थी। उधार ली हुई बुद्धि वाले इन सिक्ख विचारकों ने सिक्ख समाज को वैष्णव भक्ति से तोड़ कर इस्लामी-ईसाई विचारधारा से जोड़ने में कोई क़सर नहीं छोड़ी।
ऐसे अंग्रेज़ी शिगूफ़े और दुष्प्रचार के समर्थक प्रो• साहिब सिंह डी लिट् अपनी पंजाबी कृति जीवन ब्रितान्त श्री गुरू अरजन देव जी (सिंह ब्रदर्ज़, अमृत-सर, तीसरा संस्करण, १९७५ ई•) के पृष्ठ १५ पर बिना प्रमाण दिए यह लिखते हैं :
“सिक्ख इतिहास लिखता है कि हरिमन्दिर साहिब की नींव सत्गुरु जी ने लाहौर के वली मियां मीर के हाथों रखवाई थी।”

यह बात ध्यान देने योग्य है कि ई• निकौल की पूर्व चर्चित मनगढ़न्त बात की पुष्टि न तो प्राचीन सिक्ख इतिहास से होती है और न ही मुस्लिम पीर-फ़क़ीर मियां मीर की समकालीन मुस्लिम जीवन-गाथाओं से।

यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि अमृतसर से सन् १९३० में प्रकाशित “Report Sri Darbar Sahib” में भी श्री हरिमन्दिर की नींव मियां मीर द्वारा रक्खे जाने का ही समर्थन किया गया है। यह भी उल्लेखनीय है कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी के अन्तर्गत कार्यरत रागी कीर्त्तन-कथा करते समय उपस्थित हिन्दू-सिक्ख-संगत को यही बताया करते हैं कि हरिमन्दिर की नींव मियां मीर ने रक्खी थी। इस प्रकार सच्ची गुरुवाणी के शबदों = पदों को गाते समय वे मियां मीर सम्बन्धी नितान्त झूठी बात का प्रचार करते हुए पाप को भी अर्जित कर रहे हैं। इस सारे कृत्य को अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है कि किस प्रकार झूठ को बार-बार परोसा जा रहा है !!!
उपरोक्त सारे प्रसंग का ध्यानपूर्वक अवलोकन करने से यही सिद्ध होता है कि वस्तुतः श्री हरिमन्दिर जी की नींव श्रीगुरु अर्जुनदेव ने ही रक्खी थी जैसा कि प्राचीन सिक्ख स्रोतों में लिखा है।

श्रीगुरु अर्जुनदेव की दृष्टि में श्री हरिमन्दिर की अपार महिमा

समय पाकर श्री हरिमन्दिर के निर्माण का कार्य निर्विघ्न सम्पूर्ण हुआ। कवि सोहन कृत गुर बिलास पातशाही छह (१७७५ विक्रमी, भाषा विभाग पंजाब, पटियाला, १९७२ ई•) ५/४-५ के अनुसार श्रीगुरु अर्जुनदेव जी ने श्री हरिमन्दिर की अपार

महिमा बताते हुए बाबा बुड्ढा जी से कहा था :
साहिब बुड्ढा जी सुनो, महिमां अपर अपार।
परतक्ख रूप रामदास को, सोभत स्री दरबार।४।
हरि मंदर हरि रूप है, लछमी चरन बसाइ।
जोऊ शरनि इह की पड़ै, दारद रहै न काइ।५।

[ बाबा बुड्ढा जी ! श्री हरिमन्दिर की अपार महिमा सुनें। श्रीगुरु रामदास जी के शुभ संकल्प का साकार रूप श्री हरिमन्दिर शोभायमान है। यह हरिमन्दिर उन श्रीहरि का रूप है जो अपने चरणों में लक्ष्मी जी को बसाए हुए हैं। जो श्री हरि रूप इस मन्दिर की शरण में आ जाता है उसे कोई दुःख-दारिद्र्य नहीं रहता ]

What is religion in the words of Swami Dayanand

What is religion in the words of Swami Dayanand

I believe in a religion based on universal and all embracing principles which have always been accepted as true by mankind, and will continue to command the allegiance of mankind in the ages to come. Hence it is that the religion in question is called the primeval eternal religion, which means that it is above the hostilities of all human creeds whatsoever. Whatever is believed in by those who are steeped in ignorance or have been led astray by the secretaries is not worthy of being accepted by the wise. That faith alone is really true and worthy of acceptance which is followed by the aptas, i.e. those who are truthful in word, deed and thought, promote public good and are impartial and learned; but all that is discarded by such men must be considered as unworthy of belief and false.

“My conception of god and all other objects in the universe is founded on the teachings of the Vedas and other true shastras, and is in conformity with the beliefs of all the sages, from Brahma down to Jamini…My sole aim is to believe in truth and help others to do the same. Had I been biased, I would have championed any one of the religions prevailing in India. But I have not done so. On the contrary, I do not approve of what is objectionable and false in the institutions of this or any other country, nor do I reject what is good and in harmony with the dictates of true religion, nor have I any desire to do so, since a contrary conduct is wholly unworthy of man.”

Swami Dayanand Saraswati
(Statement of my beliefs published in the end of 14th Chapter of Satyarth Prakash)

शाहीनबाग के शिकारी- एक बहाने के सहारे आसमान में ऊँची उड़ान भरते और घात लगाते

शाहीनबाग के शिकारी- एक बहाने के सहारे आसमान में ऊँची उड़ान भरते और घात लगाते

       जो दिखता है, वो बिकता है। दिखाऊ माल ही बिकाऊ माल है। शाहीनबाग दिख रहा है। शाहीनबाग बिक रहा है। एक महीना हो गया। शो हाऊसफुल है। एक समीक्षा में किसी परम ज्ञानी ने शाहीन का मतलब लिखा- “एक ऐसी चिड़िया जो बहुत ऊँचाई पर उड़ती है और अपने शिकार को उड़ते हुए खाती है।”

नोट कर लीजिए- शाहीनबाग किसी इलाके का नाम नहीं है, जो दिल्ली में है और अभी अचानक सबको दिखाई दे रहा है। शाहीनबाग शिकारियों के ठिकानों का नाम है। सिर्फ दिल्ली में नहीं है। सारे हिंदुस्तान में हैं। दुनिया में हर कहीं हैं। कहीं कम हैं। कहीं ज्यादा हैं। कहीं वे ही वे हैं। अपने शिकार को उड़ते हुए खाने वाले शातिर शिकारी। शिकार की फिक्र मत कीजिए, वह तो लजीज ही है। शिकारी की भूख की सोचिए।

वे सन् 47 में हिंदुस्तान नाम के शिकार को दो टुकड़ों में चट कर चुके हैं। एक टुकड़ा हज़म हो चुका है। वह पाकिस्तान है। हज़म होने के बाद आमाशय में उस टुकड़े के भी दो टुकड़े कर लिए। वह बांग्लादेश है। अब किस्मत से बाहर बच गया दूसरा बड़ा टुकड़ा बहुत जोर मार रहा है। यह कम्बख्त हिंदुस्तान है!

एक बहाना मिल गया है। शाहीनबाग के शिकारी आसमान में दिलकश उड़ानें भर रहे हैं। इस बाग के पंछियों के परों में हैरतअंगेज़ ताकत है। कमाल की नज़र है। वे बहुत ऊँचाई से शिकार पर पैनी नज़र रखने में माहिर हैं। हवा में घात लगाते हैं। उनके हमले अचूक होते हैं। वे उड़ते हुए ही अपना लजीज शिकार हज़म कर जाते हैं। परदे के पीछे काम करने वाले उनके हुनरमंद ट्रेनर को दाद देनी ही पड़ेगी। जैसे रिमोट से ड्रोन उड़ाए जा रहे हैं।

इन लाजवाब शिकारियों को बेहद कमज़ोर शिकार की तरह पेश करना बड़े हुनर का काम है। यह मुल्क हुनरमंदों से भरा हुआ है। वे बताएँगे कि ये शिकारी तो बिल्कुल ही नहीं हैं, ये तो खुद शिकार हैं। फिराकपरस्तों के शिकार। गरीबी के शिकार। अशिक्षा के शिकार। सेहत के शिकार। बेरोज़गारी के शिकार।

इनपर सबसे पहले रहम ज़रूरी है। इनकी सबसे ज्यादा मदद ज़रूरी है। ये कितने कमज़ोर हैं। ये कितने कम हैं। अल्प हैं। अल्प संख्या में हैं। अल्पसंख्यक हैं। 20 या 25 करोड़। हैं तो क्या हुआ जी। गरीबी और पिछड़ेपन के तो आजीवन पात्र हैं। जनाब, यकीन न हो तो सच्चर कमेटी की गवाहियाँ देख लीजिए। आँख से आँसू बह निकलेंगे।

कुछ खास किस्म के कैमरे शाहीनबाग के शातिर शिकारियों को एक ऐसे जख्मी शिकार की तरह फिल्माने की तकनीक से लैस हैं, जिन्हें बेवजह शिकार किया जा रहा है। जिन्हें उनके बाग से बेदखल करने की साजिशें हो रही हैं। वे बेचैन हैं। रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा हुआ है। वे तो पुश्तों से इस बाग में पंख फड़फड़ा रहे हैं। इनमें बहुत सारे नन्हें चूजे हैं, जिनके पंख भी नहीं आए हैं। कड़ाके की सर्दी में वे बिना पंखों के ही अपनी माँओं की गोद में नुमाया हैं। सबसे कम उम्र के शाहीन। इन्हाेंने किसका क्या बिगाड़ा है? बेचारे मासूम!

शाहीन का बाग छोटा होगा। लेकिन उनके पीछे काम कर रहे दिमाग बड़े हैं। वे बहुत खुराफातों से भरे दिमाग हैं। उन्हें पूरे हक से फैलने-पसरने का तजुर्बा 70 साल का है। वे शाही सेक्युलर गोद में पले हैं। उनकी खास खिदमतें हुई हैं।

आज़ादी के बाद से हुकूमत के लिए वे एक ऐसी पवित्र मजार थे, जिन पर सेक्युलरिज्म की चादरें सबने चढ़ाई हैं। अब यह उनकी आदत बन गई कि जो तख्त पर आए चादर चढ़ाए। सिक्के चढ़ाए। नजराने दे। हुकूमत में रहने की मन्नत मांगे। इधर कुछ बरस हुए बाग के आसपास की हवा बदल गई है। मगर बुरी आदतों का क्या, शाहीन बाग में बुरी आदतें जोर मार रही हैं। दिल्ली की सड़कों पर वही जोर नुमाया है। असलियत उजागर होने की खीज।

खबरदार, मुल्क के बाग को बचाने की सबकी जिम्मेदारियों की बात मत कीजिए। शाहीन सिर्फ हक की जबान जानते हैं। शिकार पर उनका हक जन्मजात है। मजाल है कि उनके बाग-बगीचों, घोंसलों और मांद में कोई संपत्ति कर लेने पहुँच जाए। बिजली, पानी, इलाज, नौकरी, जियारत, नकद सब मुफ्त चाहिए।

अपनी बदहाली ठीक से बयां कर सकें इसलिए लाउड स्पीकरों पर दिन-रात की चीख-पुकार बेरोकटोक चाहिए। चुनाव के वक्त थोक चाहिए। इन सारे हक-हकूक के लिए सारे दस्तावेज उनके पास तैयार हैं। बोलिए क्या चाहिए, बर्थ, वोटर, आधार, राशन, पैन, ड्राइविंग, इनकम? सब बनवाए हुए हैं।

शाहीनों को पता है कब बाग से बाहर आना है। कब पंख फड़फड़ाना है। कब चोंच को नुकीला करना है। कब पैनी नज़र से हमलावर होना है। कब तक खामोशी से बाग में ही बने रहना है, कब बाहर झाँकना है।

1990 में जब कश्मीर के पुराने मालिक खदेड़कर बाहर निकाले गए और उनके पीढ़ियों से बसे-बसाए बाग उजाड़े गए तब दिल्ली के इन शाहीनों का पवित्र नाम किसने सुना था? किसे पता था कि वे इंसानी हक के लिए लड़ने वाली इतनी बुलंद आवाज हैं? हकीकत यह है कि वे सिर्फ अपने शिकार की घात में हैं। उन्हें दूसरों के आघातों से क्या लेना-देना? वे चीख-चीखकर कहेंगे कि वे मुल्क के असली मालिक हैं!

याद रखिए, शाहीन सिर्फ दिल्ली के एक बाग में नहीं हैं। वे मुशायरों में शायरों का वेश धरे बैठे हैं। सिनेमा के संसार में भी उनकी पहुँच-पकड़ सेक्युलर लेखक-शायरों के मार्फत है। वे उन जमातों में भी जमे हैं, जो खिसियाकर अवार्ड लौटाती है। वामपंथ की लहरों में तो उनके झंडे के ही चांद से ज्वार-भाटे आते हैं। उनपर ओढ़ाई गई बदहाली पर स्यापा करने वाले मार्क्स और मैगसेसे मीडिया की हर शाख पर बैठे गर्दन घुमा रहे हैं।

परजीवी एनजीओ में उनके ही बीजों की बहार है। जेएनयू में 10 रुपये की भारी-भरकम फीस पर गांजे के गहरे कश में गम भुलाने वाले बदनाम अधेड़ों में उनकी ही रूह कैद है। शाहीन बाग में सब समाए हुए हैं। वे गरीब हैं। वे पिछड़े हैं। वे कई दिनों के भूखे हैं। वे गम में हैं। वे गुस्से में हैं।

दिल्ली के किले से बेदखल और बेनकाब हो चुके शातिर सियासी खानदानों की आखिरी उम्मीद इन्हीं शाहीनों पर टिकी है। आग को जितनी हवा दे पाएँ! लाल किले से शपथ की जल्दबाजी में एक दिन वे ही मुल्क के दो टुकड़े करके आए थे।

फिर जन्नत समझकर वे चैन से 60 साल तक सियासत के हरे-भरे बाग के फल चखते रहे। वे खुद को बाग का एकमात्र और असली मालिक मान बैठे। उनकी औलादों को शपथ की पांच साला रस्म पुश्तैनी हक में मिली। अब परेशान पब्लिक ने उनके बाग उजाड़ दिए हैं। कुर्सियों से खदेड़ दिए गए हैं। वे बेसहारा हैं। अब तो शाहीन बाग का ही आसरा है।

शाहीन बाग के जो परिंदे सामने हैं। वे या तो बेकसूर हैं या शातिर हैं। लेकिन उन्हें पता ही नहीं कि वे हैं किस दुनिया में। दुनिया जा कहाँ रही है। दुनिया में चल क्या रहा है। बाग के रखवालों ने उन्हें दुनिया की असलियत से काट कर रखा था ऐसे ही मौकों पर आगे करने के लिए। जब बाग के रखवालों का वजूद मुश्किल में पड़े तो शिकारी परिदों को उड़ान भरने के लिए निकालो। ठिठुरती ठंड में परिंदे अपने लिए नहीं अपने आकाओं के लिए पंख फड़फड़ा रहे हैं।

शाहीनबाग का तमाशा जारी है। मदारी और जमूरे सब अपने काम पर हैं। वे ढपली बजा रहे हैं। नुक्कड़ों पर ड्रामे कर रहे हैं। नारों का शोर है। कश्मीर की कर्कश धुन पर ये नारे आज़ादी के हैं। मीडिया की शाखों पर उल्लुओं को काम मिल गया है। शायर असरदार शेर रच रहे हैं। एएमयू और जेएनयू की जमात का एक्सटेंशन काउंटर खुल गया है।

सियासत और सिनेमा वाले टिवट्रर पर फड़फड़ा रहे हैं। उन्हें लोकतंत्र खतरे में नज़र आ रहा है। मखमली टोपियाँ और खूबसूरत शेरवानियाँ हिटलर की आहट से हिल रही हैं। परदे पर जितना दिख रहा है, परदे के पीछे उससे ज्यादा चल रहा है। सीएए नाम का ख्वाब ताज़ा है। ख्वाब में बच्चे डर रहे हैं। चिल्ला रहे हैं। कभी हंस रहे हैं। कभी गा रहे हैं।

तो देवियो-सज्जनों, शाहीनबाग का तमाशा ‘अवार्ड वापसी’ और ‘चौकीदार चोर’ के फ्लॉप शो की अगली कड़ी है। क्या पता हिट हो जाए। तो कहीं मत जाइए। प्राइम टाइम में हमारे साथ बने रहिए। ब्रेक के बाद हम सीधे चलेंगे शाहीनबाग…

हिन्दुओं और मुसलमानों में समानताएं –

हिन्दुओं और मुसलमानों में समानताएं –

1.मुस्लिम मक्का में काले पत्थर की पूजा करते हैं उसे चूमते हैं । मुहम्मद साहब को परमात्मा वा अल्लाह का पैगम्बर मानते हैं । हिन्दुू काले रंग के शिवलिंग की पूजा करते हैं, देवी देवताओं व पत्थर की मूर्तियों की पूजा करते हैं। भगवान जो निराकार है सर्वव्यापक है उसकी सैंकडों प्रकार की मूर्तियों बना कर उनका हार श्रंगार करते हैं भोग लगाते हैं प्राण प्रतिष्ठा का नाटक करते हैं हिन्दू राम, कृष्ण, राधा, ब्रह्मा, विष्णु, शिव , गणेश, महादेव, महाकाल, हनुमान, वैष्णो माता, संतोषी माता, शीतला माता, काली माता आदि को परमात्मा का अवतार मान कर पूजते हैं।

2. हिन्दू श्राद्ध करते हैं अर्थात मरे हुए पितरों को खाना खिलाते हैं, मुसलमान शवरात करते हैं उनका मानना है रात को मुर्दे खाना खाने के लिए उठते हैं।

3. मुस्लिम हज के लिए अपने तीर्थ स्थान मक्का मदीना जाते हैं।हिन्दू   काशी, मथुरा, बृन्दावन, हरिद्वार, केदारनाथ,पाशुपतिनाथ,अमरनाथ, रामेश्वरम् आदि में जाते हैं।

4. हिंदू मंदिरों को पवित्र मानते हैं और वहां जाकर अपने आराध्य देवों को भोग लगाते हैं, झूला झुलाते हैं,रंगबिरंगे कपडे पहनाते हैं ,दूध से नहलाते हैं। मुस्लिम मस्जिदों को पवित्र मानते हैं और वहाँ जाकर सातवें आसमान पर रहने वाले अल्लाह की इबादत करते हैं नमाज पढते हैं ।

5. हिन्दू मूर्तियों की पूजा से करोडों अरबों रुपया इकट्ठा करते हैं । मुसलमान मस्जिदों के नाम से करोडों अरबों रुपया इकट्ठा करते हैं । दोनों ही इस पैसे का दुरुपयोग करते हैं । उसे शिक्षा, चिकित्सा व समाज सेवा में नहीं लगाते । कुछ तो उससे मदिरापान करते हैं, वेश्यागमन करते हैं, कुछ करोडों अरबों की मूर्तियां बना कर उन्हें पानी में बहा देते हैं ।

6. हिंदुओं में भयंकर जन्मगत जातिवाद है- जैसे राजपूत ब्राह्मण, जाट,बनिया, ठाकुर,भंगी,चमार आदि। मुस्लिमों में भी भयंकर जातिवाद है जैसे शिया, सुन्नी , पठान ,शेख ,खान आदि ।

7. हिन्दू भगवान् के नाम पर वा देवी देवताओं के नाम पर जीव हत्या करते हैं- जैसे पाशुपति में हर साल करीब दो लाख भैंसों की बलि दे डालते हैं और उनका मांस तल भून कर खा जाते हैं। बिहार उतराखंड के सैंकड़ों मन्दिरों में प्रतिबंध के बाबजूद आज भी देवी देवताओं को बलि दी जाती है ।  मुसलमान भी बकरीद पर करोडों गाय,भैंसो, बकरों व ऊंटों की बलि देते हैं और उनका मांस तल भून कर खा जाते हैं ।

8. हिन्दू औरत का सम्मान नहीं करते -दहेज के नाम पर, विधवा के नाम पर, सती प्रथा के नम पर, बलात्कार के नाम पर हिन्दू औरतों की दुर्गति की घटनाएं हिन्दूओं में दिन प्रतिदिन बढती ही जा रही हैं । मुस्लिमों में कई कई औरतों से शादी करना, तलाक देना, हलाला करना, बुर्के में कैद करना, दहेज मांगना आदि । इस तरह इस्लाम में भी औरतों की बहुत ज्यादा दुर्गति है ।

9. हिन्दू आसाराम, निर्मल बाबा, रामपाल, चिन्मयानंद जैसे बलात्कारियों पाखंडियों और विवेकानंद जैसे मांसाहारियों को अपना गुरु मानते हैं । मुस्लिम भी मारकाट लूटपाट करने वाले सैंकडों मुगल शासकों व पीर पैगम्बरों की पूजा करते हैं ।

10. हिन्दू अठारह पुराणों को अपना धर्म ग्रन्थ मानते हैं, मुसलमान कुरान को अपना धर्म ग्रन्थ मानते हैं जबकि दोनों में काल्पनिक किस्से कहानियों व वेदविरुद्ध विज्ञान विरुद्ध बातों की भरमार है ।

11.अन्धविश्वास व पाखंड की पोल खोलने पर व झूठी आस्थाओं पर चोट करने पर हिन्दू मुसलमान दोनों ही आर्यों को गन्दी गन्दी गालियां निकालते हैं और मारने की धमकियां देते हैं । कट्टरपंथी हिन्दुओं ने शंकराचार्य व दयानंद जैसे त्यागी तपस्वी सन्यासियों को विष देकर मार डाला । कट्टरपंथी मुसलमानों ने स्वामी श्रद्धानंद व लेखराम जैसे महापुरुषों को मार डाला ।

हिन्दू ,मुस्लिम ,सिक्ख ,जैन बौद्ध , ईसाई नाम के बाडों से निकल कर परमपिता परमात्मा की अमरवाणी वेद की शरण में आने और एक वेदमत को अपनाने में ही सबका कल्याण है । महर्षि दयानंद कृत सत्यार्थप्रकाश के पठन मनन से ही धर्म अधर्म के सत्यस्वरूप को जाना जा सकता है, मनुष्य को मनुष्य बनाया जा सकता है, सब अन्धविश्वास पाखंड को दूर किया जा सकता है।
कृण्वन्तोविश्वार्यम !

VEDIC WISDOM

VEDIC WISDOM

God-Soul-Prakriti – a Vedic Trio: a refresher
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– Bhavesh Merja

Only God ( = Brahman) may be called the Universal soul. He is ‘sat’ means His existence is a reality, He has His own identity. He is neither a mere concept nor a term fabricated just to make people alert and afraid while committing something wrong or immoral.
Consciousness is a term used for awareness or inherent capacity to know. God and Soul(s) are conscious and non-physical entities. Both are ‘chetan’. God is all-knowing = Sarvajya, and Soul is limited-knowing = alpajya. This is the fundamental difference between the two. The soul has its own natural Consciousness or knowledge, but it is too little. With the help of this natural knowledge, the soul can gather more and more knowledge from the sources of knowledge. The knowledge thus gained is called – ‘Naimittik’ – the acquired knowledge. One’s progress depends on the stock and the use of this acquired knowledge. Parents, family and family members, neighbors, school, college, learned persons, books, media etc. are the sources of the acquired knowledge. The Vedas are regarded as a God-given source of the acquired knowledge.
Universe = creation = ‘jagat’ = ‘Srishti’ is created by God out of Prakriti = original eternal material cause. Prakriti is inert, eternal and unconscious, subtle, physical substance. It is ‘ajya’ = devoid of knowledge. It has no capacity to know or feel anything. However, it has a great capacity to get moulded into various forms if someone acts on it. God acts on it and creates universe and innumerable natural things. Same way, the souls also use the inert matter and transform it in to various forms.
God is Omni-present, means He pervades everything i.e. all Souls and entire cosmos. He is so subtle that He can pervade in to all that exists beside Him. His subtlety is marvelous. Due to His all-pervasiveness, He is present everywhere and He knows all the actions of the souls and each and every event of the world. He never possesses any wrong details. His knowledge is absolutely correct and flawless.
The term ‘Energy’ used these days by the modern physicists is neither God nor the Soul. It is used for the attribute of the material substance or the material itself when it is admitted that the Mass and energy are basically the same and convertible into each-other.
The Vedic trio of God-Soul-Matter can be best understood by a careful perusal of Maharshi Dayananda’s Satyarth-Prakash (Light of Truth), especially its 7th and the 8th chapters. These three are the fundamental entities, which eternally exist and will continue to exist for ever.

Presented by Avinash Mehta

स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती का आर्यसमाज के इतिहास में गौरवपूर्ण स्थान

“स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती का आर्यसमाज के इतिहास में गौरवपूर्ण स्थान”
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स्वामी दर्शनानन्द जी का आर्यसमाज के गौरवपूर्ण इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। आपका जन्म माघ मास की दशमी (19-1-2020) के दिन व्रिकमी संवत् 1918 को 158 वर्ष पूर्व पिता पं0 रामप्रताप जी के यहां हुआ था। दर्शनानन्द जी की माता का नाम हीरा देवी था। जन्म के समय स्वामी जी का नाम नेताराम रखा गया। आपके पितामह व प्रपितामह द्वारा बाद में आपका नाम बदल कृपाराम रख दिया गया। आपकी एक बड़ी बहिन कृष्णा जी थी तथा तीन अनुज पं0 कत्र्ताराम शर्मा, पं0 रामजी दास शर्मा तथा पं0 मुनिश्वर शर्मा थे। स्वामी जी की मिडल तक की शिक्षा फिरोजपुर में अपने मामा जी के यहां पर हुई। आपका विवाह पिता पं0 रामप्रताप जी ने कुल परम्परा के अनुसार 11 वर्ष की आयु में ही अमृतसर के एक कस्बे वीरवाल के निवासी पं0 सुन्दरदास जी की सुपुत्री पार्वती देवी के साथ सम्वत् 1929 में सम्पन्न करा दिया था। बचपन में स्वामी जी को पठन-पाठन सहित खेल-कूद, व्यायाम तथा पतंग उड़ाने का शौक था। स्वामी जी का एक पुत्र भी हुआ जिसका नाम नृसिंह रखा गया था।

स्वामी जी धर्म के विषय में चिन्तन मनन करते रहते थे। इन्हीं दिनों वह वेदान्ती बन गये। वेदान्त से प्रभावित पं0 कृपाराम जी विरक्त हो गये और गृहस्थ का त्याग कर एक वेदान्ती का वैराग्यपूर्ण जीवन बिताने लगे। पं0 कृपाराम जी ने हिमाचल प्रदेश की कुल्लु घाटी में प्रथम वार संन्यास लिया था। उन्होंने 18 जून सन् 1878 को अमृतसर में सरदार भगवान सिंह जी के गृह पर पौराणिक विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ के अवसर पर ऋषि दयानन्द के साक्षात दर्शन किये थे। इस शास्त्रार्थ में पौराणिकों के लाये गये बालक व युवकों ने स्वामी पर पत्थर व ईंटों का प्रहार किया था। एक ईंट का टुकड़ा पं0 कृपाराम जी के पैर में भी लगा था जिसके घाव का निशान जीवन भर बना रहा। पं0 कृपाराम जी यदा-कदा अपने मित्रों को यह निशान दिखाया करते थे। पं0 कृपाराम जी ने इन्हीं दिनों पंजाब के कुछ स्थानों पर ऋषि दयानन्द लगभग 37 व्याख्यान सुने। इसके प्रभाव से आप वेदान्त मत की विचारधारा का त्याग कर ऋषि दयानन्द व वेदानुयायी भक्त बने। पं0 कृपाराम जी आरम्भ में स्वामी दयानन्द जी से शास्त्रार्थ करने के इरादे से उनके पास गये थे परन्तु वहां स्वामी दयानन्द जी का व्याख्यान सुन कर उनको शास्त्रार्थ की आवश्यकता नहीं पड़ी थी और वह वैदिक धर्म के अनुयायी बन गयेे। पं0 कृपाराम जी की जीवनी पढ़कर यह भी विदित होता है कि उनके पं0 लेखराम आर्य-मुसाफिर से गहरे मैत्रीपूर्ण व आत्मीय सम्बन्ध थे। पं0 कृपाराम जी ने अपने परिवार के साथ जगरावां में रहते हुए ही घर पर एक संस्कृत की पाठशाला खोली थी। उनकी प्रेरणा से पिता पं0 रामप्रताप जी ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों को पढ़ कर वैदिक धर्मी बन गये थे। आपके चाचा जी आदि भी कुछ परिवारजन आर्यसमाजी बने थे।

दिनांक 30 अक्टूबर सन् 1883 को ऋषि दयानन्द का अजमेर में निधन हुआ था। पं0 कृपाराम जी ने महाप्रयाण की इस घटना के पश्चात कुछ लघु ग्रन्थों का प्रकाशन किया और ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों का वितरण किया। आपने स्थान-स्थान पर जाकर मौखिक प्रचार भी किया। पं0 कृपाराम जी जी का जन्म लुधियाना के जगरावां ग्राम में हुआ था। वहां वेद प्रचार के लिये आपने अपने व्यय से एक प्रचारक रखा था। काशी में रहते हुए पं0 कृपाराम जी के पितामह की मृत्यु हुई। आपने उनकी अन्त्येष्टि वैदिक रीति से कर एक इतिहास रचा। उन दिनों वैदिक रीति से अन्त्येष्टि करना समाज द्वारा बहिष्कार को आमंत्रण देना होता था। पं0 कृपाराम जी ने इसी अवसर पर ‘तिमिरनाशक’ साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन भी आरम्भ किया था। काशी में रहते हुए आपका भाद्रपद माह के शुक्लपक्ष की चतुर्थी, विक्रमी संवत् 1946 को देवता विषय पर काशी के लगभग एक सौ पण्डितों से शास्त्रार्थ हुआ। पण्डितों का नेतृत्व पं0 शिवकुमार शास्त्री जी ने किया था। इसमें काशी के पण्डितों की पराजय हुई। पं0 जी का तिमिरनाशक प्रैस काशी विश्वनाथ मन्दिर के समीप था। वहां आर्यसमाज और एक संस्कृत पाठशाला का संचालन भी पं0 कृपाराम जी द्वारा किया जाता था। पाठशाला में तीन अध्यापक रखे गये थे। आर्यसमाज में पं0 शिवशंकर शर्मा का नाम अमर है। आप पं0 कृपाराम जी की ही देन थे। पं0 शिवशंकर शर्मा जी पं0 कृपाराम जी के काशी के पंडितों के साथ शास्त्रार्थों में तर्क व युक्तियों से प्रभावित होकर आर्यसमाज के अनुयायी व ऋषिभक्त बने थे।

आचार्य नरदेव शास्त्री आर्यसमाज बच्छोवाली के सन् 1894 के उत्सव में पं0 कृपाराम जी के उपदेशों से प्रभावित होकर ऋषिभक्त आर्यसमाजी बने थे। एक प्रतिभाशाली युवक को आर्यसमाज का सहयोगी बनाना पं0 कृपाराम जी के प्रभावशाली व्यक्तित्व व कृतित्व का परिणाम था। पं0 नरदेव शास्त्री के आचार्यात्व में गुरुकुल महाविद्यालय ने अनेक उपलब्धियां प्राप्त कीं। पं0 कृपाराम जी पंजाब के आर्यसमाजों में अनेक अवसरों पर पं0 लेखराम जी के साथ उपस्थित हुए थे। दोनों विद्वानों में परस्पर गहरी आत्मीयता थी। पं0 कृपाराम जी ने अनेक पौराणिक विद्वानों से अनेक शास्त्रार्थ किये जिसमें सामान्य जन सम्मिलित होते थे। इसमें आर्यसमाज के पक्ष की विजय से प्रभावित होकर अनेक लोग आर्यसमाज की विचारधारा को ग्रहण कर आर्यसमाजी बनते थे।

मालेरकोटला पंजाब में लुधियाना के निकट है। यह मुस्लिम रियासत थी। यहां सन् 1895 के उत्सव में स्वामी श्रद्धानन्द, पं0 लेखराम जी तथा स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती जी पहुंचे थे। इस उत्सव में इन तीन विभूतियों के वहां के लोगों को एक साथ दर्शन होने से सुखद आश्चर्य हुआ था। इन विद्वानों के वहां व्याख्यान भी हुए। पं0 कृपाराम जी आर्यसमाज लुधियाना के प्रधान भी रहे। इस समाज में भी स्वामी श्रद्धानन्द और स्वामी दर्शनानन्द जी के एक ही दिन प्रवचन हुए थे। हम अनुमान लगा सकते हैं कि वह दृश्य स्वर्ग के समान सुखद रहा होगा। स्वामी दर्शनानन्द जी के प्रचार की सर्वत्र धूम थी। वह पंजाब के अनेक आर्यसमाजों में उत्सवों पर वेद प्रचार के लिये जाते थे। यह भी बता दें कि पंडित कृपाराम जी तेज गति से व्याख्यान से देते थे और उनके व्याख्यान में संस्कृत शब्दों की प्रचुरता होती थी। पंडित जी ने सन् 1898 में धामपुर में आर्यसमाज की स्थापना भी की थी। पं0 जी ने एक ट्रैक्ट ‘हम निर्बल क्यों?’ सन् 1900 में लिखा था। आपने आगरा में ‘धर्मसभा से प्रश्न’ शीर्षक से एक ट्रैक्ट भी लिखा था जिसमें पौराणिकों से 64 प्रश्न किये गये थे। आपके बारे में यह प्रसिद्ध है कि आप प्रतिदिन एक ट्रैक्ट लिखा करते थे। आपके ट्रैक्टों का एक संग्रह स्वामी जगरीश्वरानन्द सरस्वती, दिल्ली ने कुछ वर्ष पहले प्रकाशित किया था। स्वामी जी आर्यसमाज में आने से पहले वेदान्ती थे। तब आपने संन्यास लेकर साधु नित्यानन्द नाम धारण किया था। आर्यसमाजी बनने पर यह साधुत्व वा संन्यास अप्रभावी हो गया था। आपने सन् 1901 में पुनः संन्यास लेकर स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती नाम धारण किया। स्वामी जी हिन्दी व उर्दू के कवि भी थे। आप हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, अरबी व फारसी के विद्वान थे। हिन्दी व उर्दू में आपने अनेक कवितायें व गीत लिखे हैं। स्वामी जी पर दो बार न्यायालय में अभियोग भी चले।

स्वामी दर्शनानन्द जी ने अपने जीवन में अनेक गुरुकुलों की स्थापना की। सन् 1899 में उन्होंने गुरुकुल सिकन्दराबाद, जनपद बुलन्दशहर की स्थापना की थी। स्वामी जी ने एक गुरुकुल बदायूं के सूर्यकुण्ड क्षेत्र में तपोभूमि गुरुकुल के नाम से सन् 1903 में स्थापित किया था। इस गुरुकुल का अपना बड़ा भवन आरम्भ के दो तीन वर्षों में बनकर तैयार हो गया था। सन् 1906 में इस गुरुकुल में 60 ब्रह्मचारी अध्ययन करते थे। सन् 1905 में स्वामी जी ने गुरुकुल विरालसी की स्थापना की थी। इस गुरुकुल ने भी अपने आरम्भिक दिनों में प्रशंसनीय उन्नति की और आर्यसमाज को अच्छे विद्वान मिले। स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती जी द्वारा स्थापित सबसे प्रसिद्ध गुरुकुल ‘गुरुकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर’ है। सम्वत् 1964 में गंगा के तट पर इस गुरुकुल की स्थापना की गई थी। पं0 गंगादत्त जी, पं0 भीमसेन जी तथा आचार्य नरदेव शास्त्री जी ने आरम्भ में ही इस गुरुकुल के लिये अपनी सेवायें प्रदान की थी। पं0 प्रकाशवीर शास्त्री जी इस गुरुकुल के यशस्वी स्नातक रहे।

आप कई बार सांसद रहे। आपने कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं को अपने व्यक्तित्व एवं भाषण कला में निपुणता के आधार पर हराया। हमने कई बार पं0 प्रकाशवीर शास्त्री जी के दर्शन किये। उन पर विस्तृत लेख भी लिखे। उनके अनुज भ्राता डा0 सत्यवीर त्यागी से हमारे सम्पर्क में हैं। पं0 प्रकाशवीर शास्त्री जी आर्य प्रतिनिधि सभा, उत्तर प्रदेश के प्रधान रहे। उन्होंने सांसद रहते हुए अनेक स्मरणीय कार्य किये। हरिद्वार में गंगा तट पर उनके द्वारा बहुमंजिला एवं होटलनुमा आर्यसमाज बनाया गया था। वेदों के अंग्रेजी भाष्य कराने व उसके प्रकाशन में भी आपकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। सन् 1978 में रिवाड़ी के पास एक रेल दुर्घटना में उनकी मृत्यु हुई थी।

गुरुकुल ज्वालापुर से सन् 1909 में एक मासिक पत्र ‘भारतोदय’ का प्रकाशन आरम्भ किया गया था जिसके सम्पादक सुप्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार पं0 पद्मसिंह शर्मा थे। भारत के प्रथम राष्ट्रपति श्री राजेन्द्र प्रसाद जी बड़े गौरव से कहा करते थे उनका प्रथम लेख भारतोदय पत्रिका में ही प्रकाशित हुआ था। स्वामी दर्शनानन्द जी ने रावलपिंडी के निकट मुसलिम बहुल पर्वतीय स्थान में गुरुकुल चोहाभक्तां की स्थापना की थी। इस गुरुकुल की स्थापना 22 दिसम्बर, सन् 1908 को की गई थी। स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी इस गुरुकुल के आचार्य रहे। हम अनुमान भी नहीं कर सकते कि इन गुरुकुलों में 100 वर्ष पहले एक सौ से अधिक छात्र अध्ययन करते थे। इस गुरुकुल से स्वामी आत्मानन्द जी ने ‘वैदिक फिलासफी’ नामक एक उच्चस्तरीय मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी किया था। इस गुरुकुल चोहाभक्तां को ही गुरुकुल पोठोहार भी कहा जाता था। आर्यसमाज के गुरुकुल वैदिक धर्म की रक्षा व प्रचार के कार्य में शरीर में रीढ़ की हड्डी के समान रहे हैं। स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती ने आर्यसमाज को अनेक गुरुकुल स्थापित पर कई विद्वान दिये। वैदिक धर्म के प्रचार में स्वामी जी का योगदान अविस्मरणीय एवं अतुलनीय है।

स्वामी दर्शनानन्द जी का शरीर काम करते करते पेट के रोग से ग्रस्त हुआ। उनको आराम नहीं हो रहा था। वह दृण प्रारब्धवादी थे। ईश्वर पर विश्वास रखते थे तथा औषधियों का सेवन नहीं करते थे। वह आगरा होते हुए आर्यसमाज अजमेर के उत्सव में गये। वहां उनका स्वास्थ्य अधिक खराब हो गया। गुरुकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर से पं0 गंगादत्त जी, पं0 नरदेव शास्त्री तथा गुरुकुल सिकन्दराबाद से पं0 मुरारीलाल शर्मा, स्वामी जी के पुत्र श्री नृसिंह शर्मा आदि अनेक लोग अजमेर पहुंचे। वहां से उन्हें स्वास्थ्य लाभ हेतु गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर लाया गया। यहां वह कुछ दिन रहे। इसके बाद पं0 मुरारी लाल शर्मा जी आपको गुरुकुल सिकन्दराबाद उपचारार्थ ले गये। इसी बीच उनके प्रिय भक्त डा0 कृष्णप्रसाद जी हाथरस सिकन्दराबाद पहुंचे और उन्हें अपने साथ हाथरस ले गये। वहां आर्यसमाज का उत्सव चल रहा था। आर्यसमाज के शीर्ष विद्वान पं0 तुलसी राम स्वामी, पं0 घासीराम जी आदि वहां आये हुए थे। अपने भक्तों का ध्यान करते हुए स्वामी जी की आज्ञा पर उन्हें उत्सव के पण्डाल में शय्या पर ही ले जाया गया। शरीर छूटने में 6 घंटे थे। इस अवस्था में भी वह रुक रुक कर धीमे स्वर में बोले ‘जिस किसी को भी शास्त्रार्थ करना हो, कर ले। फिर न कहना।’ स्वामी जी का अन्तिम समय निकट आ गया था। अन्तिम समय में उन्होंने कहा ‘भद्र पुरुषों! हमारा अन्तिम नमस्ते स्वीकार कीजिए। ऋषि दयानन्द के 37 व्याख्यान हमने सुने थे। 37 वर्ष ही कार्य किया। ईश्वर आप लोगों को साहस दे कि आप अपने धर्म को समझें।’ यह कह कर उन्होंने शरीर छोड़ दिया। यह 11 मई सन् 1913 का दिन था। इस प्रकार आर्यसमाज का एक जाज्वल्यमान नक्षत्र अपनी आभा बिखेर पर ईश्वर की व्यवस्था से परमगति को प्राप्त हो गया। हमने इस लेख में पं0 राजेन्द्र जिज्ञासु जी लिखित स्वामी दर्शनानन्द जी की जीवनी से सहायता ली है। उनका धन्यवाद है। हम उनके जीवन की कुछ प्रेरक घटनायें और देना चाहते थे। लेख का आकार इसकी अनुमति नहीं दे रहा है। इसे फिर किसी अवसर पर प्रस्तुत करेंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

क्या ईश्वर की मर्जी के बिना पता भी नहीं हिलता ??

क्या ईश्वर की मर्जी के बिना पता भी नहीं हिलता ??

कल शाम को खेत में भ्रमण के लिऐ गया तो गांव के दो व्यक्ति शराब पी रहे थे और बात कर रहे थे ,ईश्वर की मर्जी के बिना तो पता भी नहीं हिलता ,जो करता है ईश्वर ही करता है ,,

तो मैंने उनसे प्रश्न किया कि जो बलत्कारी बल्तकार करता है ,तो उसे कानून सजा क्यों देता है क्योंकि वह बल्तकार भी बल्तकारी ने ईश्वर की मर्जी से किया है ।जब उसने ईश्वर की मर्जी से किया है तो दोषी भी ईश्वर होना चाहिऐ ,बल्तकारी को सजा क्योंं मिलती है ??

इसी प्रकार पिछले दिनों चिदंबरम भ्रष्टाचार के कारण जेल गये थे ,जब उसने सब ईश्वर की मर्जी से किया था तो चिदंबरम को जेल क्यों हुई ।

इसलिऐ कोई चोरी ,हिंसा हत्या ,बल्तकार सब काम भी ईश्वर की मर्जी से होते है तो दोषी भी ईश्वर होना चाहिऐ ,तो संविधान की क्या आवश्यकता है ??

लेकिन ये सिद्धांत गलत है और मूर्ख लालची धर्मगुरुओं ने अपना उल्लू सीधा करने के लिऐ प्रचारित किया है ।

परमात्मा ने जीवात्मा को स्वतंत्रता दी है ,कर्तुं न कर्तुं अन्यथा कर्तुं अर्थात् करे न करे अन्यथा करे …

सब जीवात्मा की इच्छा पर निर्भर करता है ।और आत्मा का लिंड्ग है –

इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुखज्ञानानि आत्मनिलिङ्गानि …

जैसे आपके पास खेत है और बीज भी हैं मूंग ,गेहूं ,बाजरा आदि का ..अब आपकी इच्छा है आप गेहूं बोयें ,मूंग बोएं या कुछ ओर ..

लेकिन उसका फल आपके हाथ नहीं है ,क्योंकि किया कर्म कभी निष्फल नहीं जाता ..इसलिऐ आम बोलचाल की भाषा में कहा जाता है जैसा करोगे वैसा बरोगे ।

गीता भी कहती है
कर्मन्यवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
कर्म का अधिकार आपके पास है ,फल का नहीं ।

परमात्मा तो एक राजा की भांति है जो जीवों को उनके अच्छे बूरे कर्मों के आधार पर फल देता है ।आत्मा एक नित्य वस्तु है उसे परमात्मा भी नहीं बनाता ।

इसलिऐ गीता कहती हैं …
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैंन दहति पावकः
न चैनं कलेद्यन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।

योग दर्शन का ऋषि पतंजली कर्म के फल के विषय में कहते हैं ।
सति मूले तद् विपाको जातिर्आयुभोग …

अर्थात् कर्मों का फल जाति आयु भोग के रुप में मिलता है ।
जैसे आपने मनुष्य बनने के कर्म किये हैं तो आपको मनुष्य जन्म ,उसके अनुसार आयु और उसके अनुसार ही भोग मिलता है ।कर्मों के अनुसार ही हमारा जन्म गरीब अमीर आदि भोग के रुप में होता है ।

परमात्मा तो न्यायधीश की तरह न्यायकर्ता है ।

आज की युवा पीढ़ी

आज की युवा पीढ़ी इन नचनियों गवनियों को अपना आदर्श मानते है।
जिनको खुद अपने राष्ट्र, धर्म,  परम्पराओं, मान्यताओं, संस्कृतियों  की तनिक भी जानकारी नहीं है।
इनसे बचने की आवश्यकता है।
आज देश के लिये कुछ करने की आवश्यकता है।
क्योंकि देश का राजा न्यायप्रिय है।
राष्ट्रभक्त है।
जिनको आज पेट्रोल,टमाटर, प्याज महंगा लगता है उनसे मेरा कहना है ये 60 सालों में हुई बुरी तरह की लूट का भी असर है
अब जिन्होंने देश को लूट डाला वही ढ़ोल पीट रहे है।

महर्षि दयानन्द के अनुयायी क्यों बनें?

महर्षि दयानन्द के अनुयायी क्यों बनें?

1. दयानन्द का सच्चा अनुयायी भूत-प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी आदि कल्पित पदार्थों से कभी भयभीत नहीं होता ।

2. आप फलित ज्योतिष, जन्म-पत्र, मुहूर्त, दिशा-शूल, शुभाशुभ ग्रहों के फल, झूठे वास्तु शास्त्र आदि धनापहरण के अनेक मिथ्या जाल से स्वयं को बचा लेंगें ।

3. कोई पाखण्डी साधु, पुजारी, गंगा पुत्र आपको बहका कर आपसे दान-पुण्य के बहाने अपनी जेब गरम नहीं कर सकेगा ।

4. शीतला, भैरव, काली, कराली, शनैश्चर आदि अप-देवता, जिनका वस्तुतः कोई अस्तित्व ही नहीं है, आपका कुछ भी अनिष्ट नहीं कर सकेंगे । जब वे हैं ही नहीं तो बेचारे करेंगे क्या ?

5. आप मदिरापान, धूम्रपान, विभिन्न प्रकार के मादक से बचे रह कर अपने स्वास्थ्य और धन की हानि से बच जायेंगे ।

6. बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह, नारी-प्रताडना, पर्दा-प्रथा, अस्पृश्यता आदि सामाजिक बुराइयों से दूर रहकर सामाजिक सुधार के उदाहरण बन सकेंगे।

7. जीवन का लक्ष्य सादगी को बनायेंगे और मित व्यवस्था के आदर्श को स्वीकार करने के कारण दहेज, मिलनी, विवाहों में अपव्यय आदि पर अंकुश लगाकर आदर्श उपस्थित करेंगे।

8. दयानन्द का अनुयायी होने के कारण अपने देश की भाषा, संस्कृति, स्वधर्म तथा स्वदेश के प्रति आपके हृदय में अनन्य प्रेम रहेगा।

9. आप पश्चिम के अन्धानुकरण से स्वयं को तथा अपनी सन्तान को बचायेंगे तथा फैशन परस्ती, फिजूलखर्ची, व्यर्थ के आडम्बर तथा तडक-भडक से दूर रहेंगे।

10. आप अपने बच्चों में अच्छे संस्कार डालेंगे ताकि आगे चलकर वे शिष्ट, अनुशासन प्रिय, आज्ञाकारी बनें तथा बडों का सम्मान करें।

11. आप अपने कार्य, व्यवसाय, नौकरी आदि में समय का पालन, ईमानदारी, कर्त्तव्यपरायणता को महत्त्व देंगे ताकि लोग आपको मिसाल के तौर पर पेश करें ।

12. वेदादि सद् ग्रन्थों के अध्ययन में आपकी रुचि बढेगी, फलतः आपका बौद्धिक क्षितिज विस्तृत होगा और विश्व-बन्धुता बढेगी ।

13. जीवन और जगत् के प्रति आपका सोच अधिकाधिक वैज्ञानिक होता चला जायेगा । इसे ही स्वामी दयानन्द ने ‘सृष्टिक्रम से अविरुद्ध होना’ कहा है । आप इसी बात को सत्य मानेंगे जो युक्ति, तर्क और विवेक की कसौटी पर खरी उतरती हो । मिथ्या चमत्कारों और ऐसे चमत्कार दिखाने वाले ढोंगी बाबाओं के चक्कर में दयानन्द के अनुयायी कभी नहीं आते ।

14. दयानन्द की शिक्षा आपको एक परिपूर्ण मानव बना देगी । आप जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति के भेदों से ऊपर उठकर मनुष्य मात्र की एकता के हामी बन जायेंगे ।

15. निन्दा-स्तुति, हानि-लाभ, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों को सहन करने की क्षमता आप में अनायास आ जायेगी ।

16. शैव, शाक्त, कापालिक, वैष्णव, ब्रह्माकुमारी आदि सम्प्रदायों के मिथ्या जाल से हटकर आप एक अद्वितीय सच्चिदानन्द परमात्मा के उपासक बन जायेंगे ।

17. आपकी गृहस्थी में पंच महायज्ञों का प्रवर्त्तन होगा जिससे आप परमात्मा, सूर्यादि देवगण, माता-पिता आदि पितृगण, अतिथि एवं सामान्य जीवों की सेवा का आदर्श प्रस्तुत करेंगे ।
क्या दयानन्द के अनुयायी बनने से मिलने वाले उपर्युक्त लाभ कोई कम महत्त्व के हैं ?
तो फिर देर क्यों ! ? ! ?? !! ??? !!!

आओ वेद की ओर लौटें…….