प्राणायाम से रोगों को दूर करना

प्राणायाम से रोगों को दूर करना

🌻प्राण चिकित्सा का महत्व-
जिस तरह प्राकृतिक चिकित्सा ´विजातीय तत्व´ को ही रोगों का मुख्य कारण मानती है उसी तरह आयुर्वेद चिकित्सा में ´आम रस अर्थात आहार से बनने वाले कच्चे रस को रोगों का मूल कारण मानते हैं। ऐलोपैथी में सभी रोगों का मुख्य कारण ´जीवाणुओं को माना जाता है, उसी तरह प्राणायाम चिकित्सा में शारीरिक व मानसिक सभी रोगों का मुख्य कारण ´सबल प्राण´ को माना गया हैं। प्राण चिकित्सकों का मानना है कि जब शरीर के अन्दर ´सबल प्राण´ अर्थात शुद्ध वायु की मात्रा कम हो जाती है, तब शरीर के अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ जाते हैं जिससे शरीर के अंग अपने कार्यों को सही रूप से नहीं कर पाते। यकृत, आंते, गुर्दे, हृदय, मस्तिष्क और नलिका विहीन ग्रन्थियों में ´सबल प्राण´ की कमी से शरीर में ढीलापन आ जाता है, जिससे भोजन ठीक से नहीं पच पाता, पाचनतंत्र कमजोर पड़ने लगता है। पाचनतंत्र के द्वारा भोजन सही रूप से न पच पाने के कारण आम रस (कच्चा आहार रस) अधिक मात्रा में बनने लगता है। वही कच्चा रस जब रक्त में मिलकर रक्त को दूषित कर देता है, तब अंगों में शिथिलता और खून के बहाव की गति कम होने लगते हैं जिससे अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ जाते हैं, मृत (मरे हुए) कोष शरीर से बाहर नहीं निकल पाते हैं। शरीर में दूषित रक्त कण अधिक हो जाते हैं और अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होने लगते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि शरीर में उत्पन्न होने वाले रोगों का मुख्य कारण ´सबल प्राण´ अर्थात शुद्ध वायु की कमी है। ऐलोपैथी चिकित्सा भी इन बातों को मानती हैं कि जीवाणु द्वारा वही लोग रोगग्रस्त होते हैं, जिनकी प्राणशक्ति (जीवनी शक्ति) कमजोर होती है और उनके अन्दर जीवाणुओं से लड़ने की क्षमता खत्म हो जाती है। जिससे मनुष्य रोगों का शिकार हो जाता है। यदि प्राणशक्ति (जीवनी शक्ति) शक्तिशाली होती है तो रोगी स्वस्थ रहता है और रोग को बढ़ाने वाले जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। इस तरह ऐलोपैथी चिकित्सक भी प्राणशक्ति (जीवनी शक्ति) को ही आधि-व्याधि का मुख्य कारण मानते हैं।
🍂सभी चिकित्सकों के अनुसार प्राणशक्ति (जीवनीशक्ति) की कमी ही सभी प्रकार के रोगों का कारण है और उसकी कमी के कारण ही शरीर में कमजोरी व रोग उत्पन्न होते हैं। यदि ऐसे कहें कि प्राण शक्ति (जीवनी शक्ति) को बढ़ाकर रोगों को खत्म किया जा सकता है तो यह गलत नहीं होगा। क्या प्राणशक्ति को किसी औषधियों के द्वारा शक्तिशाली नहीं बनाया जा सकता है? रासायनिक दृष्टि से प्राणशक्ति (जीवनी शक्ति) का गुणगान करने वाले लोग यदि औषधि को प्राणशक्ति बढ़ाने वाला मानते हैं, तो गलत नहीं है। उनकी दृष्टि स्थूल है। ऐसे चिकित्सक प्राणशक्ति को पारमाण्विक संरचना (कम्पाउण्ड ऑफ एटम्स) मानते हैं। हम जानते हैं कि ´प्राण´ परमाणु का ही मूल है। परमाणु उसका स्थूल रूप है। अपितु अव्यक्त रूप में ´चिन्मय´ विद्युत है। वह भावात्मक विद्युत है। ´प्राण´ वह चिद्स्पन्दन है, जिससे परमाणु का उदभव और संश्लेषण-विश्लेषण होता है। इसलिए रसायन या औषधि चिकित्सा तो स्थूल चिकित्सा मात्र है।
🍁औषधि चिकित्सा के द्वारा प्राणशक्ति (जीवनी शक्ति) को नहीं बढ़ाया जा सकता है। प्राकृतिक चिकित्सा, प्राणायाम और योग चिकित्सा के द्वारा ही प्राणशक्ति (जीवनी शक्ति) को बढ़ाया जा सकता है। प्राण का विपुल संग्रह करके जीवन को तेजस्वर, ओजस्वी और यशस्वी बनाया जा सकता है। औषधि तो केवल बाहरी शारीरिक स्वास्थ्य के लिए होती है। परन्तु प्राणायाम आंतरिक योग है, जिससे प्राणशक्ति को शक्तिशाली बनाया जा सकता है। यह एक मौलिक उपचार है। प्राणायाम और प्राण में गहरा सम्बन्ध है। इसलिए भावनाओं के साथ किया गया प्राणायाम ही सजातीय कर्षण नियम के अनुसार प्राणशक्ति को बढ़ाने का सरल, निशुल्क और प्राकृतिक उपाय है।
प्राणशक्ति कोई काल्पनिक बात नहीं है और न ही किसी प्रकार का स्वप्न ही है। प्राणशक्ति मनुष्य के अन्दर की वास्तविक शक्ति है। जिन लोगों ने योगाभ्यास किया है और उसमें सफलता प्राप्त की है, वे सभी अपने अन्दर नाड़ी जाल में बहती हुई प्राणशक्ति को अंतर मन से देख सकते हैं। इस प्राणशक्ति को प्राणायाम के अभ्यासों के द्वारा कोई भी व्यक्ति महसूस कर सकता है। प्राणशक्ति (जीवनी शक्ति) हल्के गुलाबी रंग की प्रकाशमय विद्युत चिंगारियों या किरणों के रूप में शरीर के अन्दर और शरीर के आस-पास कुछ दूर तक गोल घेरे के रूप में स्पष्ट दिखाई देती है। साधारण मनुष्य भी यदि ध्यान दें तो उन्हें भी प्राण में हल्की हवा, भाव या कांपती हुई ध्वनि तरंग की तरह अनुभव होगा। इस प्राणशक्ति को नाभि के पास स्थित सूर्यचक्र रूपी सूक्ष्म डिब्बी के अन्दर एकत्रित किया जा सकता है और अन्तर अवयवों को इस प्रकार सुरक्षित रखा जा सकता है कि वे अन्तरिक्ष में मौजूद महाप्राण के दिव्य शक्तियों से अपनी आवश्यकतानुसार प्राण का स्वाभाविक रूप से लेन-देन करते रहें, जिससे प्राणशक्ति हमेशा साफ, कोमल, ठंडी और कार्यशाली बनी रहे।
प्राणशक्ति के दिव्य आकर्षण को बनाए रखने के लिए प्राणायाम का अभ्यास करना आवश्यक है। प्राणायाम के अभ्यास से प्राण का आदान-प्रदान करने वाले आंतरिक अंग स्वस्थ रहते हैं और वह हमेशा अपना काम सही रूप से करते रहते हैं। इसलिए प्राणायाम स्वास्थ्य और शक्ति को बढ़ाने की योगिक साधना तो है ही, साथ ही रोगों को दूर करने का सबसे अच्छा उपचार भी है। प्राणायाम दवाईयों की तरह रोग या रोगों के कारण को दबाता नहीं है। बल्कि प्राणायाम का प्रभाव रोगों पर इस तरह पड़ता है कि रोग जड़ से समाप्त हो जाते हैं।
´💐जाबालदर्शनोपनिषद्´ में ऋषियों द्वारा इस बात की पुष्टि की गई है कि प्राणायाम के द्वारा सभी रोग जड़ से नष्ट हो जाते हैं और भगन्दर जैसे भयंकर रोग भी खत्म हो जाते हैं।
´💐योगकुडल्योपनिषद्´ के अनुसार प्राणायाम से गुल्म, जलोदर, प्लीहा तथा पेट सम्बन्धी सभी रोग पूर्ण रूप से खत्म हो जाते हैं। प्राणायाम द्वारा चार प्रकार के वात दोष और कृमि दोष को भी नष्ट किया जा सकता है। इससे मस्तिष्क गर्मी, गले के कफ सम्बन्धी रोग, पित्तज्वर, प्यास का अधिक लगना आदि रोग दूर होते हैं।
💐प्राणायाम द्वारा रोग निवारण उपचार-
यदि शरीर के किसी अंग में दर्द हो, सूजन हो, हाथ-पांव ठंड के कारण सुन्न हो गए हों, सिर में तेज दर्द हो अथवा नाक, कान आदि अंगों का कोई विशेष रोग हो तो ऐसे रोगों को दूर करने के लिए शुद्ध वायु (प्राण) से खून को शुद्ध करके रोग ग्रस्त अंगों की ओर उस शुद्ध रक्त को प्रवाहित कराने से रोग में लाभ मिलता है। इस तरह प्राणायाम के द्वारा शुद्ध वायु को शरीर में पहुंचाने से शरीर में रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ जाती है और रोग धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं। कभी-कभी इस क्रिया का 1 से 2 बार अभ्यास करने से ही रोग ठीक हो जाते हैं।
🌾रोगग्रस्त अंगों की ओर रक्त (खून) को प्रवाहित करने की 🍂विधि-
रोग वाले अंग की ओर खून को प्रवाहित करने के लिए और प्राण का अभ्यास करने के लिए पहले सीधे बैठ जायें। यदि रोग में बैठना सम्भव न हो तो पीठ के बल सीधा लेट कर भी इस क्रिया को कर सकते हैं। अब बैठने या लेटने की स्थिति बनने के बाद सामान्य रूप से 5 से 10 बार सांस ले व छोड़ें। ध्यान रखें कि सांस (वायु) अन्दर खींचते हुए 10 बार ´ॐ´ का जाप करें। फिर सांस को अन्दर रोककर 5 बार ´ॐ´ का जाप करें और अंत में सांस (वायु) को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए 10 बार ´ॐ´ का जाप करें। 10 बार ´ॐ´ का जाप करते हुए जब सांस (वायु) को बाहर निकाल दें, तो कुछ क्षण रुककर पुन: सांस (वायु) को अन्दर खींचते हुए पहले वाली क्रिया को करें। इस तरह यह क्रिया जब 5 से 10 बार हो जाए, तो अंत में गहरी सांस लेते हुए मन में कल्पना करें-´´रक्त संचार के साथ ही मेरा सूर्यचक्र स्थिर प्राण प्रवाह रोगग्रस्त अंग की ओर दौड़ रहा है।´´ फिर सांस को अन्दर रोककर मन ही मन कल्पना करें-´´मेरे अन्दर प्राणशक्ति कार्यशाली है और उसके द्वारा रोगग्रस्त अंगों को शक्ति मिल रही है। शरीर के अन्दर शुद्ध वायु के प्रवाह से रोगग्रस्त अंग शुद्ध हो रहे हैं तथा उनमें नई प्राणशक्ति का संचार हो रहा है। मेरे अन्दर विजातीय तत्व अर्थात दूषित तत्व व रोग पर शुद्ध प्राणशक्ति का अधिकार हो गया है। ´´इसके बाद सांस (वायु) को बाहर छोड़ते हुए भी मन में कल्पना करें-´´वायु को बाहर छोड़ने के साथ ही मेरे अन्दर के सभी दोष, विकार और सूजन, दर्द या अन्य कोई भी रोग जो मेरे शरीर में है, वह हवा की तरह ऊपर आसमान में उड़े जा रहा है। ´´जब सांस को बाहर निकाले दें, तो सांस को बाहर ही रोककर पुन: मन ही मन कहें-´´प्राणशक्ति का प्रवाह रोगग्रस्त अंगों पर होने से वह अंग शुद्ध हो गया है।
🌹इस क्रिया को 15 मिनट से आधे घंटे तक करना चाहिए। प्राणायाम के द्वारा की जाने वाली इस क्रिया से आपको अनुभव होने लगेगा कि अंगों में उत्पन्न दर्द तेजी से कम हो रहा है। इस क्रिया को 6-6 घंटे के अन्तर पर दिन में 3 बार कर सकते हैं। यदि हल्का कष्ट या दर्द हो तो दिन में 2 बार ही इस क्रिया को करें। परन्तु बड़े रोग जैसे जीर्ण रोग को खत्म करने के लिए इस क्रिया को लगातार कुछ दिनों या कुछ सप्ताहों तक करने की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए धैर्यपूर्वक बिना घबराये मन से गलत भावनाओं को समाप्त कर पूर्ण हृदय से इस प्राणायाम को करने से अवश्य ही रोगों में लाभ मिलता है।
🌻दर्द को खत्म करने वाले इस उपचार के समय अपने रोगग्रस्त अंग को अपने ही हाथों का मृदु स्पर्श (हल्के हाथ से दर्द वाले अंगों पर सहलाना) देकर प्राण विद्युत के प्रवाह को तेज करने में बड़ी मदद मिलती है। ऐसा करने पर इच्छाशक्ति बढ़ती है, क्योंकि स्पर्श से रक्त और प्राण (जीवनी) उस ओर दौड़ते हुए देखे जाते हैं।
🌻सावधानी-
सिर के ऊपरी भाग में दर्द हो, तो प्राण संचार को ऊपर से नीचे की ओर ही करना चाहिए क्योंकि उर्ध्वांगों (शरीर के ऊपरी अंग) में खून का दबाव बढ़ने से ही अक्सर दर्द उत्पन्न होता है। ऐसी दशा में मस्तिष्क की ओर ध्यान करने से मस्तिष्क की ओर खून का दबाव बढ़ जाता है, जिसके फल स्वरूप लाभ होने के स्थान पर हानि होने की संभावना रहती है।
🌾रोगग्रस्त अंगों पर अंगुलियों को मोड़कर मन ही मन बोलें ´निकल जाओ´ ´निकल जाओ´ ´विकार भाग´ ऐसा कहते हुए मार्जन (सहलाना) भी किया जा सकता है। इस क्रिया को वैसे ही करना चाहिए जैसे कोई भूत-प्रेत को झाड़ते समय करता है। अंगुलियों को रोगग्रस्त अंग पर मार्जन (सहलाना) करने से अंगुलियों से लगातार निकलने वाली चुम्बकीय किरणें (प्राणशक्ति) रोग वाले स्थान में प्रवाहित होने लगती है और रोगग्रस्त अंगों में रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है। इस तथ्य को ´डॉ. किलनर´ के ओरों स्कोप नामक यंत्र के द्वारा सिद्व करके दिखाया गया है। अत: मार्जन (अंगुलियों से सहलाना) के द्वारा विद्युत प्रवाह विकृत अंग पर डालने से प्राकृतिक रोग को खत्म करने के लिए अंगों को शक्ति मिलती है, जिससे रोग को खत्म करने में सहायता मिलती है।
🥀प्राणायाम के द्वारा अनेक रोगों को दूर करना-
प्राणायाम के द्वारा अनेकों रोगों को समाप्त किया जा सकता है। रोगों को समाप्त करने के लिए बताए गए सभी प्राणायामों का अभ्यास स्वच्छ-शांत व स्वच्छ हवा के बहाव वाले स्थान पर करें। ध्यान रखें कि प्राणायाम वाले स्थान पर हवा का बहाव तेज न हों। इससे सांस लेने में कठिनाई हो सकती है।
🌺कब्ज को खत्म करने के लिए-
कब्ज को दूर करने के लिए प्लाविनी कुम्भक का अभ्यास करना चाहिए। यह पुराने से पुराने कब्ज में भी अत्यधिक लाभकारी होता है।
🥀कुम्भक प्राणायाम की विधि-
अभ्यास के लिए पहले स्थिरासन में बैठ जाएं। फिर नाक के दोनों छिद्रों से वायु को धीरे-धीरे अन्दर खींचें और पेट को फुलाते जाएं। पेट में पूर्ण रूप से वायु भर जाने पर सांस को जितनी देर तक अन्दर रोकना सम्भव हो रोककर रखें। इसके बाद नाक के दोनों छिद्रों से वायु को धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। इसके बाद पुन: इस क्रिया को करें। इस क्रिया को सुविधा के अनुसार जितनी बार कर सकते हैं, करें।
🌻कब्ज को दूर करने के लिए दक्षिण रेचक प्राणायाम का भी अभ्यास कर सकते हैं।
🌷पेट के रोगों को दूर करने के लिए-
पेट के रोगों को दूर करने के लिए मध्य रेचक प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। यह प्राणायाम पेट के सभी रोगों व दोषों को खत्म करने में लाभकारी माना गया है।
🥀मध्य रेचन प्राणायाम की विधि-
मध्य रेचक प्राणायाम के लिए स्वास्तिक या उत्कटासन में बैठें। अब अन्दर की वायु को बाहर निकालकर सांसों को रोककर रखें। इसके बाद उड्डियान बन्ध लगाकर आंतों को इस तरह से ऊपर उठायें कि वह बेलन की तरह पेट में उभर आए। दोनों हाथों को दोनों घुटनों पर रखें और पेट के दोनों बगलों में दबाव देते हुए बाहरी कुम्भक करें (अन्दर की वायु को बाहर निकाल कर सांसों को रोककर रखें)। इस स्थिति में सांसों को रोककर जितनी देर तक रहना सम्भव हो रोककर रखें। फिर बन्ध को हटाकर व हाथों का दबाव बगल से हटाते हुए धीरे-धीरे सांस अन्दर खींचें। इस क्रिया में सांस को रोककर रखने के समय को धीरे-धीरे बढ़ाते जाएं। ध्यान रखें कि इस क्रिया का अभ्यास सावधानी से करें और हो सके तो किसी अनुभवी योग साधक की देख-रेख में अभ्यास करें।
इस प्राणायाम से आंतों के विकार दूर हो जाते हैं और आंते शक्तिशाली बनती हैं। यह कब्ज को दूर करता है तथा पेट के सभी रोगों को खत्म करता है। यह तिल्ली व जिगर के दोषों को भी खत्म करता है।
🌺खट्टी डकारों के लिए-
खट्टी डकारों को दूर करने के लिए चन्द्र भेदन प्राणायाम का अभ्यास करें। नाक के बाएं छिद्र को चन्द्र नाड़ी तथा बाएं छिद्र को सूर्य नाड़ी कहते हैं। इस प्राणायाम में वायु को नाक के बाएं छिद्र से अन्दर खींचा जाता है (पूरक किया जाता है) इसलिए इसे चन्द्र भेदन प्राणायाम कहते हैं।
🌾चन्द्र भेदन प्राणायाम की विधि-
चन्द्र भेदन प्राणायाम के अभ्यास के लिए पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं और बाएं हाथ को बाएं घुटने पर रखें। इसके बाद दाएं हाथ के अंगूठे से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करें और नाक के बाएं छिद्र से आवाज के साथ वायु को अन्दर खींचें। अब सांस को अन्दर जितनी देर तक रोककर रखना सम्भव हो रोककर रखें और फिर नाक के बाएं छिद्र को बन्द करके दाएं छिद्र से वायु को धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। इस क्रिया का अभ्यास कई बार करें। इस क्रिया का अभ्यास अपनी सुविधा के अनुसार करना चाहिए।
🌼पेट की चर्बी कम करने व शरीर को पतला करने के लिए-
भस्त्रिका प्राणायाम के अभ्यास से पेट की अधिक चर्बी कम होती है और शरीर पतला व सुडौल बनता है। इसका अभ्यास सावधानी से करें।
🌺भस्त्रिका प्राणायाम की विधि-
इस प्राणायाम के अभ्यास के लिए पहले सुखासन या पद्मासन में बैठ जाएं और बाएं हाथ को बाएं घुटने पर रखें। अब दाएं हाथ को ऊपर उठाते हुए कोहनी को कंधे की सीध में रखें और अंगुलियों से नाक के बाएं छिद्र को बन्द करें। अब नाक के दाएं छिद्र से तेज गति के साथ वायु को बाहर निकालें और फिर अन्दर खींचें। इस क्रिया से सांस को बिना रोकें कम से कम 8 से 10 बार सांस लें और छोड़ें। अंत में सांस अन्दर खींचकर सांस को रोककर रखें। सांस को जितनी देर तक आसानी से रोककर रखना सम्भव हो रोककर रखें। इसके बाद दाएं हाथ के अंगूठे से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करें और नाक के बाएं छिद्र से वायु को बाहर निकाल दें। फिर नाक के बाएं छिद्र से ही तेज गति के साथ लगातर 8 से 10 बार सांस ले व छोड़ें। अंत में वायु को अन्दर खींच कर उसे अन्दर ही अपनी क्षमता के अनुसार रोककर रखें और फिर नाक के बाएं छिद्र को बन्द करके दाएं छिद्र से वायु को बाहर निकाल दें। यह प्राणायाम का 1 चक्र है और इस तरह इस क्रिया का 3 बार अभ्यास करें। इसका अभ्यास प्रतिदिन करना चाहिए तथा धीरे-धीरे इसकी संख्या को भी बढ़ाते रहना चाहिए।स्नेहा समूह
इसके अतिरिक्त अग्नि प्रसारण प्राणायाम, वामरेचक प्राणायाम और कमनीय कुम्भक प्राणायाम से भी शरीर की अधिक चर्बी को कम किया जा सकता है।
🌼सावधानियां-
इस प्राणायाम का अभ्यास सावधानी से करना आवश्यक है अन्यथा इससे हानि हो सकती है। इसके अभ्यास में सावधानी न रखने पर थूक के साथ खून आदि आने की संभावना रहती है। इससे दमा व खांसी की भी शिकायत हो सकती है। इसलिए इस प्राणायाम का अभ्यास प्राणायाम के अनुभवी गुरू की देख-रेख में करना चाहिए। इसके अभ्यास के क्रम में दूध व घी का सेवन करना चाहिए। कमजोर व्यक्ति को इसका अभ्यास तेजी से नहीं करना चाहिए, अन्यथा सिर में चक्कर आने की संभावना रहती है।
🥀रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर या ब्लडप्रेशर) को सामान्य रखने के लिए-
रक्तचाप की गति को सामान्य रखने के लिए शीतली कुम्भक प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। यह एक अच्छा प्राणायाम है और इससे मिलने वाले अनेकों लाभों के बारे में ´घेरण्ड संहिता´ में बताया गया है, जिनमें पित्त विकार, कफ विकार व अजीर्ण (पुराना कब्ज) रोग को विशेष रूप से खत्म करने के लिए बताया गया है।
🌻शीतली प्राणायाम की विधि-
इस प्राणायाम के अभ्यास के लिए सुखासन में बैठ जाएं और दोनों हाथों को घुटनों पर रखें। जीभ को दोनों किनारों से मोड़कर एक नली की तरह बनाएं और मुंह से हल्का बाहर निकाल कर होठों को बन्द कर लें। अब जीभ से बनी नली के द्वारा धीरे-धीरे वायु (सांस) को अन्दर खींचें। जब पूर्ण रूप से वायु अन्दर भर जाएं, तो उसे अपनी क्षमता के अनुसार अन्दर रोककर रखें। वायु को अन्दर रोकने की स्थिति मेंघबराहट हो तो दोनों नासिका से वायु को बाहर निकाल दें। इस क्रिया को पुन: करें। इसका अभ्यास करते समय वायु को अन्दर खींचने के समय व अन्दर रोकने के समय को धीरे-धीरे बढ़ाते रहें।
सावधानी-
🥀इस प्राणायाम का अभ्यास कफ प्रकृति वाले व्यक्तियों को नहीं करना चाहिए। इस प्राणायाम का अभ्यास गर्मी के मौसम में करना चाहिए तथा सर्दी के मौसम में इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए। अभ्यास के समय घबराहट होने पर वायु को नासिका द्वारा बाहर निकाल दें।
🥀हृदय की धड़कन के लिए-
हृदय की बढ़ी हुई धड़कन के लिए वक्षस्थल रेचक प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। इससे धड़कन की गति सामान्य होती है।
🍂वक्षस्थल रेचन प्राणायाम की विधि-
इसके अभ्यास के लिए स्वच्छ वातावरण में सुखासन में बैठ जाएं। इसके बाद नाक के दोनों छिद्रों से सांस (वायु) अन्दर खींचें और फिर धीरे-धीरे सांस (वायु) को बाहर निकाल दें। जब सांस (वायु) पूर्ण रूप से बाहर निकल जाए, तो सांस को रोक लें (बाहरी कुम्भक करें)। अब कोहनियों को ऊपर उठाते हुए दोनों हाथों को कंधे पर रखें। इसके बाद छाती को हल्का ढीला करते हुए कंधे हल्के से सिकोड़ें (संकुचित करें) और फिर कंधे को आगे की ओर करें। आसन की इस स्थिति में जितनी देर तक सांस को रोककर रखना सम्भव हो रोककर रखें। फिर धीरे-धीरे सांस बाहर छोड़ें। यह वक्षस्थल रेचन प्राणायाम का एक चक्र है। इस तरह इसका अभ्यास कई बार करें और धीरे-धीरे इसके अभ्यास का चक्र बढ़ाने की कोशिश करें l
🌹कफ दोषों को दूर करने के लिए-
फेफड़ों को शुद्ध (साफ) करने के लिए और कफ को खत्म करने के लिए कपाल भांति प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। ´घेरण्ड संहिता´ और ´हठयोग प्रदीपिका´ दोनों में इस प्राणायाम के अभ्यास की अलग-अलग विधियां बताई गई हैं। इन दोनों विधियों से प्राणायाम का अभ्यास करने पर इसके लाभ समान प्राप्त होते हैं।
कपाल भांति प्राणायाम के अभ्यास की विधि-
´🌹घेरण्ड संहिता´ विधि-
कपालभाति प्राणायाम का अभ्यास पद्मासन में बैठकर या खड़े होकर कर सकते हैं। इसके अभ्यास के लिए आसन की स्थिति में बैठ जाएं और दाएं हाथ के अंगूठे से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करके नाक के बाएं छिद्र से धीरे-धीरे सांस (वायु) अन्दर खींचें। फिर नाक के बाएं छिद्र को बाकी अंगुलियों से बन्द करके दाएं छिद्र से सांस (वायु) को बाहर छोड़ें। पुन: नाक के दाएं छिद्र से ही सांस (वायु) अन्दर खींचें और दाएं छिद्र को बन्द करके बाएं से सांस (वायु) को बाहर निकाल दें। इस तरह बाएं से सांस लेकर दाएं से निकालना और फिर दाएं से ही सांस लेकर बाएं से निकालना। इस तरह इस क्रिया का कई बार अभ्यास करें।
´🥀हठयोग प्रदीपिका´ विधि-
इस क्रिया के लिए पहले पद्मासन की स्थिति में बैठ जाएं। अपने शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़े। अब जल्दी-जल्दी सांस लें और छोड़ें। सांस लेते व छोड़ते समय ध्यान रखें कि सांस लेने में जितना समय लगे उसका एक तिहाई समय ही सांस छोड़ने में लगाएं। इस तरह सांस लेने व छोड़ने की क्रिया को बढ़ाते रहें, जिससे सांस लेने व छोड़ने की गति 1 मिनट में 120 बार तक पहुंच जाए। ध्यान रखें कि सांस लेते व छोड़ते समय केवल पेट की पेशियां ही हरकत करें तथा छाती व अन्य अंग स्थिर रहें। इस क्रिया को शुरू करने के बाद क्रिया पूर्ण होने से पहले न रुकें। इस क्रिया में पहले 1 सेकेण्ड में 1 बार सांस लें और छोड़ें और बाद में उसे बढ़ाकर 1 सेकेंड में 3 बार सांस लें और छोड़ें। इस क्रिया को सुबह-शाम 11-11 बार करें और इसके चक्र को हर सप्ताह बढ़ाते रहें। इस क्रिया में 1 चक्र पूरा होने पर श्वासन क्रिया सामान्य कर लें और आराम के बाद पुन: इस क्रिया को दोहराते हुए 11 बार करें।
🥀जुकाम का नाश व सुरक्षा के लिए-
जुकाम को खत्म करने व सुरक्षा के लिए अनुलोम-विलोम प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।
🌹अनुलोम-विलोम प्राणायाम की विधि-
इस प्राणायाम के अभ्यास के लिए पद्मासन में बैठ जाएं। इसके बाद दाएं हाथ से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करके बाएं छिद्र से तीव्र गति से अन्दर की सांस (वायु) को बाहर निकालें (रेचक करें)। फिर जिस गति से सांस (वायु) को बाहर निकाला गया है, उसी गति से सांस (वायु) को अन्दर खींचें। इसके बाद नाक के बाएं छिद्र को बन्द करके दाएं छिद्र से तीव्र गति से सांस (वायु) को बाहर निकाल दें और फिर नाक के बाएं छिद्र से ही सांस (वायु) को अन्दर खींचें। फिर दाएं से बाहर निकाल दें। इस तरह इस क्रिया को दोनों नासिका से बदल-बदल कर कम से कम 20-20 बार अभ्यास करें। प्राणायाम के इस अभ्यास को धीरे-धीरे बढ़ाएं।
🍂कंठ रोगों को दूर करने के लिए-
कंठ की नाड़ियों को शक्तिशाली बनाने व कंठ और गले के रोगों को खत्म करने के लिए ´चतुर्मुखी प्राणायाम´ का अभ्यास करना चाहिए। चतुर्मुखी प्राणायाम का अर्थ बिना कुम्भक किये पूरक व रेचक करते हुए मुंह को चारों ओर बाएं, दाएं, नीचे और ऊपर की ओर करना होता है। इस क्रिया को 15 बार रोजाना करना चाहिए और धीरे-धीरे इसके अभ्यास को बढ़ाना चाहिए।
🌹चतुर्मुखी प्राणायाम की विधि-
इसके अभ्यास के लिए पद्मासन में बैठ जाएं। अब मुंह को बाएं कंधे की ओर घुमाएं। इसके बाद नाक से आवाज करते हुए तीव्र गति से सांस (वायु) को अन्दर खींचें। फिर दाएं हाथ से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करके बाएं छिद्र से सांस (वायु) को अन्दर से बाहर निकालें। इसके बाद मुंह को दाएं कंधे की ओर घुमाएं और नाक के बाएं छिद्र से सांस (वायु) अन्दर खींचकर नाक के दाएं छिद्र से सांस (वायु) को बाहर निकाल दें। इसके बाद मुंह को ऊपर व नीचे की ओर करके भी इस क्रिया का अभ्यास करें। इस तरह मुंह को चारों ओर घुमाकर करने से अभ्यास का 1 चक्र पूरा होता है। इस तरह इसके चक्र को अपनी क्षमता के अनुसार अभ्यास करना चाहिए।
🌺ध्यान रखें-
इसके अभ्यास में पहले सांस छोड़ते व लेते समय नासिका को बन्द करने के लिए हाथ का प्रयोग करें और अभ्यास होने पर बिना हाथ की सहायता के ही सांस लेने व छोड़ने की क्रिया का अभ्यास करें। सांस लेते व छोड़ते (पूरक व रेचक करते समय) समय नाक से आवाज आनी चाहिए।

अगर आप अपनी दिनचर्या में ये 10 चीजें शामिल कर लें तो..

       अगर आप अपनी दिनचर्या में ये 10 चीजें शामिल कर लें तो दुनिया का कोई भी रोग आपको छू भी नहीं पायेगा।हृदय रोग, शुगर (मधुमेह), जोड़ों के दर्द, कैंसर, किडनी, लीवर आदि के रोग आपसे कोसों दूर रहेंगे! ऐसे ग़ज़ब हैं ये,आइये जानते हैं इनके बारे में-

1. आंवला
किसी भी रूप में थोड़ा सा आंवला हर रोज़ खाते रहे, जीवन भर उच्च रक्तचाप और हार्ट फेल नहीं होगा, इसके साथ चेहरा तेजोमय बाल स्वस्थ और सौ बरस तक भी जवान महसूस करेंगे।

2. मेथी
मेथीदाना पीसकर रख ले। एक चम्मच एक गिलास पानी में उबाल कर नित्य पिए। मीठा, नमक कुछ भी नहीं डाले इस पानी में। इस से आंव नहीं बनेगी, शुगर कंट्रोल रहेगी जोड़ो के दर्द नहीं होंगे और पेट ठीक रहेगा।

3. छाछ
तेज और ओज बढ़ने के लिए छाछ का निरंतर सेवन बहुत हितकर हैं। सुबह और दोपहर के भोजन में नित्य छाछ का सेवन करे। भोजन में पानी के स्थान पर छाछ का उपयोग बहुत हितकर हैं।

4. हरड़
हर रोज़ एक छोटी हरड़ भोजन के बाद दाँतो तले रखे और इसका रस धीरे धीरे पेट में जाने दे। जब काफी देर बाद ये हरड़ बिलकुल नरम पड़ जाए तो चबा चबा कर निगल ले। इस से आपके बाल कभी सफ़ेद नहीं होंगे, दांत 100 वर्ष तक निरोगी रहेंगे और पेट के रोग नहीं होंगे, कहते हैं एक सभी रोग पेट से ही जन्म लेते हैं तो पेट पूर्ण स्वस्थ रहेगा।

5. दालचीनी और शहद
सर्दियों में चुटकी भर दालचीनी की फंकी चाहे अकेले ही चाहे शहद के साथ दिन में दो बार लेने से अनेक रोगों से बचाव होता है।

6. नाक में तेल
रात को सोते समय नित्य सरसों का तेल नाक में लगाये। और 5 – 5 बूंदे बादाम रोगन की या सरसों के तेल की या गाय के देसी घी की हर रोज़ डालें.

7. कानो में तेल
सर्दियों में हल्का गर्म और गर्मियों में ठंडा सरसों का तेल तीन बूँद दोनों कान में कभी कभी डालते रहे। इस से कान स्वस्थ रहेंगे।

8. लहसुन की कली
दो कली लहसुन रात को भोजन के साथ लेने से यूरिक एसिड, हृदय रोग, जोड़ों के दर्द, कैंसर आदि भयंकर रोग दूर रहते हैं।

9. तुलसी और काली मिर्च
प्रात: दस तुलसी के पत्ते और पांच काली मिर्च नित्य चबाये। सर्दी, बुखार, श्वांस रोग, अस्थमा नहीं होगा। नाक स्वस्थ रहेगी।

10. सौंठ
सामान्य बुखार, फ्लू, जुकाम और कफ से बचने के लिए पीसी हुयी आधा चम्मच सौंठ और ज़रा सा गुड एक गिलास पानी में इतना उबाले के आधा पानी रह जाए। रात क सोने से पहले यह पिए। बदलते मौसम, सर्दी व् वर्षा के आरम्भ में यह पीना रोगो से बचाता हैं। सौंठ नहीं हो तो अदरक का इस्तेमाल कीजिये।

पीलिया दूर भगाए, 10 रामबाण उपाय…

पीलिया दूर भगाए, 10 रामबाण उपाय…

       रोगाणुओं के फैलने से कई तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है। इन्हीं में से एक बीमारी है, जॉन्डिस, जिसे हम पीलिया के नाम से जानते हैं। इस बीमारी में व्यक्ति की त्वचा से लेकर आंखें, नाखून, पेशाब का रंग पीला हो जाता है, साथ ही लीवर कमजोर होकर ठीक से काम करना बंद कर देता है। इ तना ही नहीं रोगी की भूख धीरे-धीरे कम हो जाती है और जी मचलाने की शि‍कायत होती है।

अगर आपको लगता है , कि आप पीलिया की चपेट में हैं, तो जरूर पढ़ि‍ए इस बीमारी से निपटने के उपाय –

1 एक गिलास पानी में एक चम्मच त्रिफला भिगोकर रख दें। रातभर भि‍गोने के बाद सुबह इस पानी को छान कर पि‍एं। लगभग दो सप्ताह तक इस प्रयोग को करने ने बीमारी में काफी राहत मिलती है।

2  एक गिलास पानी में खड़ी धनिया या धनिया के बीच रातभर भिगोकर रख दें। सुबह इस पानी को पी लें। प्रतिदिन ऐसा करने से पीलिया ठीक होने में मदद मिलती है।
3 एक गिलास टमाटर के जूस में चुटकी भर काली मिर्च और नमक मिलाकर सुबह के समय पीने से पीलिया में काफी लाभ होता है। टमाटर में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो रोगों से लड़ने में सहायक है।

4 गोभी और गाजर का रस निकालकर, दोनों को समान मात्रा में मिलाकर पीने से भी पीलिया में बहुत लाभ होता है। इस रस का प्रतिदिन सेवन करने से जल्द ही बीमारी से छुटकारा मिल जाता है।
5 नीम के पत्तों को धोकर इनका रस निकालकर रोगी को पिलाने से भी पीलिया में लाभ होता है। इसके लिए प्रतिदिन 1 चम्मच नीम के पत्तों का रस बेहद लाभदायक होता है।

6 पीलिया में नींबू, संतरा और विटामिन सी से भरपूर फलों का रस पीने से बहुत फायदा होता है। प्रतिदिन नींबू पानी पीने से भी आप इस बीमारी से छुटकारा पा सकते हैं।

7 इस बीमारी में हल्का और सुपाच्य भोजन ही लें तो बेहतर होगा। पतली खि‍चड़ी, दलिया, उबला आलू, शकरकंद ही चीजें खाना आपके लिए फायदेमंद हो सकती हैं। इसके अलावा गुड़, चीनी, मूली और छाछ का सेवन भी कर सकते हैं।
8 गन्ने का रस पीना पीलिया के मरीजों के लिए रामबाण इलाज है। प्रतिदिन गन्ने का रस पीने से यह बीमारी जड़ से समाप्त हो सकती है। जितना हो सके इस अपनी डाइट में शामिल करें।
9 कच्चा और पका पपीता, मूली का रस, जौ, आमला, तुलसी, अनानास, दही आदि का प्रयोग पीलिया में आपको ठीक करने में मदद करेगा। इसके अलावा ग्लूकोज का सेवन करना न भूलें।

10 इस रोग में शरीर में पानी की कमी न हो, इसलिए भरपूर पानी पिएं, ताकि शरीर से हानिकारक पदार्थ उत्सर्जित हो सके। पानी को उबालकर पिएं, और बाहर का पानी पीने से बचें।

इन 50 घरेलु नुस्खों को जीवन में याद रखेगें तो कभी डॉक्टर के पास नहीं जाना पड़ेगा:-

इन 50 घरेलु नुस्खों को जीवन में याद रखेगें तो कभी डॉक्टर के पास नहीं जाना पड़ेगा:-

साधारण छोटे-छोटे प्रयोग जिनको आप अवश्य अपनाए कुछ प्रयोग नीचे दिए गए है जो आपके घर में ही उपलब्ध है अजमाए और लाभ ले:-

(1) अजवायन का साप्ताहिक प्रयोग:-

सुबह खाली पेट सप्ताह में एक बार एक चाय का चम्मच अजवायन मुँह में रखें और पानी से निगल लें। चबाएँ नहीं। यह सर्दी,खाँसी,जुकाम, बदनदर्द,कमर-दर्द, पेट दर्द, कब्जियत और घुटनों के दर्द से दूर रखेगा। 10 साल से नीचे के बच्चों को आधा चम्मच 2 ग्राम और 10 से ऊपर सभी को एक चम्मच यानी 5 ग्राम लेना चाहिए !

(2) मौसमी खाँसी के लिये सेंधा नमक :-

सेंधा नमक की लगभग 5 ग्राम डली को चिमटे से पकड़कर आग पर, गैस पर या तवे पर अच्छी तरह गर्म कर लें। जब लाल होने लगे तब गर्म डली को तुरंत आधा कप पानी में डुबो कर निकाल लें और नमकीन गर्म पानी को एक ही बार में पी जाएँ। ऐसा नमकीन पानी सोते समय लगातार दो-तीन दिन पीने से खाँसी, विशेषकर बलगमी खाँसी से आराम मिलता है। नमक की डली को सुखाकर रख लें एक ही डली का बार बार प्रयोग किया जा सकता है।

(3) बैठे हुए गले के लिये मुलेठी का चूर्ण:-

मुलेठी के चूर्ण को पान के पत्ते में रखकर खाने से बैठा हुआ गला ठीक हो जाता है या सोते समय एक ग्राम मुलेठी के चूर्ण को मुख में रख कर कुछ देर चबाते रहे। फिर वैसे ही मुँह में रख कर जाएँ। प्रातः काल तक गला साफ हो जायेगा। गले के दर्द और सूजन में भी आराम आ जाता है।

(4) मुँह और गले के कष्टों के लिये सौंफ और मिश्री:-

भोजन के बाद दोनों समय आधा चम्मच सौंफ चबाने से मुख की अनेक बीमारियाँ और सूखी खाँसी दूर होती है, बैठी हुई आवाज़ खुल जाती है,गले की खुश्की ठीक होती है और आवाज मधुर हो जाती है।

(5) खराश या सूखी खाँसी के लिये अदरक और गुड़:-

गले में खराश या सूखी खाँसी होने पर पिसी हुई अदरक में गुड़ और घी मिलाकर खाएँ। गुड़ और घी के स्थान पर शहद का प्रयोग भी किया जा सकता है। आराम मिलेगा।

(6) पेट में कीड़ों के लिये अजवायन और नमक:-

आधा ग्राम अजवायन चूर्ण में स्वादानुसार काला नमक मिलाकर रात्रि के समय रोजाना गर्म जल से देने से बच्चों के पेट के कीडे नष्ट होते हैं। बडों के लिये- चार भाग अजवायन के चूर्ण में एक भाग काला नमक मिलाना चाहिये और दो ग्राम की मात्रा में सोने से पहले गर्म पानी के साथ लेना चाहिये।

(7) अरुचि के लिये मुनक्का हरड़ और चीनी:-

भूख न लगती हो तो बराबर मात्रा में मुनक्का (बीज निकाल दें), हरड़ और चीनी को पीसकर चटनी बना लें। इसे पाँच छह ग्राम की मात्रा में (एक छोटा चम्मच), थोड़ा शहद मिला कर खाने से पहले दिन में दो बार चाटें।

(8) बदन के दर्द में कपूर और सरसों का तेल:-

10 ग्राम कपूर, 200 ग्राम सरसों का तेल- दोनों को शीशी में भरकर मजबूत ठक्कन लगा दें तथा शीशी धूप में रख दें। जब दोनों वस्तुएँ मिलकर एक रस होकर घुल जाए तब इस तेल की मालिश से नसों का दर्द, पीठ और कमर का दर्द और, माँसपेशियों के दर्द शीघ्र ही ठीक हो जाते हैं।

(9) जोड़ों के दर्द के लिये बथुए का रस:-

बथुआ के ताजा पत्तों का रस पन्द्रह ग्राम प्रतिदिन पीने से गठिया दूर होता है। इस रस में नमक-चीनी आदि कुछ न मिलाएँ। नित्य प्रातः खाली पेट लें या फिर शाम चार बजे। इसके लेने के आगे पीछे दो-दो घंटे कुछ न लें। दो तीन माह तक लें।

(10) पेट में वायु-गैस के लिये मट्ठा और अजवायन:-

पेट में वायु बनने की अवस्था में भोजन के बाद 125 ग्राम दही के मट्ठे में दो ग्राम अजवायन और आधा ग्राम काला नमक मिलाकर खाने से वायु-गैस मिटती है। एक से दो सप्ताह तक आवश्यकतानुसार दिन के भोजन के पश्चात लें।

(11) फटे हाथ पैरों के लिये सरसों या जैतून का तेल:-

नाभि में प्रतिदिन सरसों का तेल लगाने से होंठ नहीं फटते और फटे हुए होंठ मुलायम और सुन्दर हो जाते है। साथ ही नेत्रों की खुजली और खुश्की दूर हो जाती है।

(12) सर्दी बुखार और साँस के पुराने रोगों के लिये तुलसी:-

तुलसी की 21 पत्तियाँ स्वच्छ खरल या सिल बट्टे (जिस पर मसाला न पीसा गया हो) पर चटनी की भाँति पीस लें और 10 से 30 ग्राम मीठे दही में मिलाकर नित्य प्रातः खाली पेट तीन मास तक खाएँ। दही खट्टा न हो। यदि दही माफिक न आये तो एक-दो चम्मच शहद मिलाकर लें। छोटे बच्चों को आधा ग्राम तुलसी की चटनी शहद में मिलाकर दें। दूध के साथ भूलकर भी न दें। औषधि प्रातः खाली पेट लें। आधा एक घंटे पश्चात नाश्ता ले सकते हैं।

(13) अधिक क्रोध के लिये आँवले का मुरब्बा और गुलकंद:-

बहुत क्रोध आता हो तो सुबह आँवले का मुरब्बा एक नग प्रतिदिन खाएँ और शाम को गुलकंद एक चम्मच खाकर ऊपर से दूध पी लें। क्रोध आना शांत हो जाएगा।

(14) घुटनों में दर्द के लिये अखरोट:-

सवेरे खाली पेट तीन या चार अखरोट की गिरियाँ खाने से घुटनों का दर्द मैं आराम हो जाता है।

(15) काले धब्बों के लिये नीबू और नारियल का तेल:-

चेहरे व कोहनी पर काले धब्बे दूर करने के लिये आधा चम्मच नारियल के तेल में आधे नीबू का रस निचोड़ें और त्वचा पर रगड़ें, फिर गुनगुने पानी से धो लें।

(16) कोलेस्ट्राल पर नियंत्रण सुपारी से:-

भोजन के बाद कच्ची सुपारी 20 से 40 मिनट तक चबाएँ फिर मुँह साफ़ कर लें। सुपारी का रस लार के साथ मिलकर रक्त को पतला करने जैसा काम करता है। जिससे कोलेस्ट्राल में गिरावट आती है और रक्तचाप भी कम हो जाता है।

(17) मसूढ़ों की सूजन के लिये अजवायन:-

मसूढ़ों में सूजन होने पर अजवाइन के तेल की कुछ बूँदें पानी में मिला कर कुल्ला करने से सूजन में आराम आ जाता है।

(18) हृदय रोग में आँवले का मुरब्बा:-

आँवले का मुरब्बा दिन में तीन बार सेवन करने से यह दिल की कम जोरी, धड़कन का असामान्य होना तथा दिल के रोग में अत्यंत लाभ होता है, साथ ही पित्त,ज्वर,उल्टी, जलन आदि में भी आराम मिलता है।

(19) शारीरिक दुर्बलता के लिये दूध और दालचीनी:-

दो ग्राम दालचीनी का चूर्ण सुबह शाम दूध के साथ लेने से शारीरिक दुर्बलता दूर होती है और शरीर स्वस्थ हो जाता है। दो ग्राम दाल चीनी के स्थान पर एक ग्राम जायफल का चूर्ण भी लिया जा सकता है।

(20) हकलाना या तुतलाना दूर करने के लिये दूध और काली मिर्च:-

हकलाना या तुतलाना दूर करने के लिये 10 ग्राम दूध में 250 ग्राम काली-मिर्च का चूर्ण मिला कर रख लें। 2-2 ग्राम चूर्ण दिन में दो बार मक्खन के साथ मिला कर खाएँ।

(21) श्वास रोगों के लिये दूध और पीपल :-

एक पाव दूध में 5 पीपल डालकर गर्म करें, इसमें चीनी डाल कर सुबह और ‘शाम पीने से साँस की नली के रोग जैसे खाँसी, जुकाम, दमा, फेफड़े की कमजोरी तथा वीर्य की कमी आदि रोग दूर होते हैं।

(22) अच्छी नींद के लिये मलाई और गुड़:-

रात में नींद न आती हो तो मलाई में गुड़ मिला कर खाएँ और पानी पी लें। थोड़ी देर में नींद आ जाएगी।

(23) कमजोरी को दूर करने का सरल उपाय:-

एक-एक चम्मच अदरक व आंवले के रस को दो कप पानी में उबाल कर छान लें। इसे दिन में तीन बार पियें। स्वाद के लिये काला नमक या शहद मिलाएँ।

(24) घमौरियों के लिये मुल्तानी मिट्टी:-

घमौरियों पर मुल्तानी मिट्टी में पानी मिलाकर लगाने से रात भर में आराम आ जाता है।

(25) पेट के रोग दूर करने के लिये मट्ठा:-

मट्ठे में काला नमक और भुना जीरा मिलाएँ और हींग का तड़का लगा दें। ऐसा मट्ठा पीने से हर प्रकार के पेट के रोग में लाभ मिलता है। यह बासी या खट्टा नहीं होना चाहिये।

(26) खुजली की घरेलू दवा:-

फटकरी के पानी से खुजली की जगह धोकर साफ करें, उस पर कपूर को नारियल के तेल मिलाकर लगाएँ लाभ होगा।

(27) मुहाँसों के लिये संतरे के छिलके:-

संतरे के छिलके को पीसकर मुहाँसों पर लगाने से वे जल्दी ठीक हो जाते हैं। नियमित रूप से ५ मिनट तक रोज संतरों के छिलके का पिसा हुआ मिश्रण चेहरे पर लगाने से मुहाँसों के धब्बे दूर होकर रंग में निखार आ जाता है।

(28) बंद नाक खोलने के लिये अजवायन की भाप:-

एक चम्मच अजवायन पीस कर गरम पानी के साथ उबालें और उसकी भाप में साँस लें। कुछ ही मिनटों में आराम मालूम होगा।

(29) चर्मरोग के लिये टेसू और नीबू :-

टेसू के फूल को सुखा कर चूर्ण बना लें। इसे नीबू के रस में मिलाकर लगाने से हर प्रकार के चर्मरोग में लाभ होता है।

(30) माइग्रेन के लिये काली मिर्च, हल्दी और दूध:-

एक बड़ा चम्मच काली मिर्च का चूर्ण एक चुटकी हल्दी के साथ एक प्याले दूध में उबालें। दो तीन दिन तक लगातार रहें। माइग्रेन के दर्द में आराम मिलेगा।

(31) गले में खराश के लिये जीरा:-

एक गिलास उबलते पानी में एक चम्मच जीरा और एक टुकड़ा अदरक डालें ५ मिनट तक उबलने दें। इसे ठंडा होने दें। हल्का गुनगुना दिन में दो बार पियें। गले की खराश और सर्दी दोनों में लाभ होगा।

(32) सर्दी जुकाम के लिये दालचीनी और शहद:-

एक ग्राम पिसी दाल चीनी में एक चाय का चम्मच शहद मिलाकर खाने से सर्दी जुकाम में आराम मिलता है।

(33) टांसिल्स के लिये हल्दी और दूध:-

एक प्याला (200 मिली ली।) दूध में आधा छोटा चम्मच (2 ग्राम) पिसी हल्दी मिलाकर उबालें। छानकर चीनी मिलाकर पीने को दें। विशेषरूप से सोते समय पीने पर तीन चार दिन में आराम मिल जाता है। रात में इसे पीने के बात मुँह साफ करना चाहिये लेकिन कुछ खाना पीना नहीं चाहिये।

(34) ल्यूकोरिया से मुक्ति:-

ल्यूकोरिया नामक रोग कमजोरी,चिडचिडापन, के साथ चेहरे की चमक उड़ा ले जाता हैं। इससे बचने का एक आसान सा उपाय- एक-एक पका केला सुबह और शाम को पूरे एक छोटे चम्मच देशी घी के साथ खा जाएँ 11-12 दिनों में आराम दिखाई देगा। इस प्रयोग को 21 दिनों तक जारी रखना चाहिए।

(35) मधुमेह के लिये आँवला और करेला:-

एक प्याला करेले के रस में एक बड़ा चम्मच आँवले का रस मिला कर रोज पीने से दो महीने में मधुमेह के कष्टों से आराम मिल जाता है।

(36) मधुमेह के लिये काली चाय:-

मधुमेह में सुबह खाली पेट एक प्याला काली चाय स्वास्थ्यवर्धक होती है। चाय में चीनी दूध या नीबू नहीं मिलाना चाहिये। यह गुर्दे की कार्यप्रणाली को लाभ पहुँचाती है जिससे मधुमेह में भी लाभ पहुँचता है।

(37) उच्च रक्तचाप के लिये मेथी:-

सुबह उठकर खाली पेट आठ-दस मेथी के दाने निगल लेने से उच्चरक्त चाप को नियंत्रित करने में सफलता मिलती है।

(38) माइग्रेन और सिरदर्द के लिये सेब:-

सिरदर्द और माइग्रेन से परेशान हों तो सुबह खाली पेट एक सेब नमक लगाकर खाएँ इससे आराम आ जाएगा।

(39) अपच के लिये चटनी:-

खट्टी डकारें, गैस बनना, पेट फूलना, भूक न लगना इनमें से किसी चीज से परेशान हैं तो सिरके में प्याज और अदरक पीस कर चटनी बनाएँ इस चटनी में काला नमक डालें। एक सप्ताह तक प्रतिदिन भोजन के साथ लें, आराम आ जाएगा।

(40) मुहाँसों से मुक्ति:-

जायफल, काली मिर्च और लाल चन्दन तीनो का पावडर बराबर मात्रा में मिलाकर रख लें। रोज सोने से पहले 2-3 चुटकी भर के पावडर हथेली पर लेकर उसमें इतना पानी मिलाए कि उबटन जैसा बन जाए खूब मिलाएँ और फिर उसे चेहरे पर लगा लें और सो जाएँ, सुबह उठकर सादे पानी से चेहरा धो लें। 15 दिन तक यह काम करें। इसी के साथ प्रतिदिन 250 ग्राम मूली खाएँ ताकि रक्त शुद्ध हो जाए और अन्दर से त्वचा को स्वस्थ पोषण मिले। 15-20 दिन में मुहाँसों से मुक्त होकर त्वचा निखर जाएगी।

(41) जलन की चिकित्सा चावल से:-

कच्चे चावल के 8-10 दाने सुबह खाली पेट पानी से निगल लें। 21 दिन तक नियमित ऐसा करने से पेट और सीन की जलन में आराम आएगा। तीन माह में यह पूरी तरह ठीक हो जाएगी।

(42) दाँतों के कष्ट में तिल का उपयोग:-

तिल को पानी में 4 घंटे भिगो दें फिर छान कर उसी पानी से मुँह को भरें और 10 मिनट बाद उगल दें। चार पाँच बार इसी तरह कुल्ला करे, मुँह के घाव, दाँत में सड़न के कारण होने वाले संक्रमण और पायरिया से मुक्ति मिलती है।

(43) विष से मुक्ति:-

10-10 ग्राम हल्दी, सेंधा नमक और शहद तथा 5 ग्राम देसी घी अच्छी तरह मिला लें। इसे खाने से कुत्ते, साँप, बिच्छु, मेढक, गिरगिट, आदि जहरीले जानवरों का विष उतर जाता है।

(44) खाँसी में प्याज:-

अगर बच्चों या बुजुर्गों को खांसी के साथ कफ ज्यादा गिर रहा हो तो एक चम्मच प्याज के रस को चीनी या गुड मिलाकर चटा दें, दिन में तीन चार बार ऐसा करने पर खाँसी से तुरंत आराम मिलता है।

(45) स्वस्थ त्वचा का घरेलू नुस्खा:-

नमक, हल्दी और मेथी तीनों को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें, नहाने से पाँच मिनट पहले पानी मिलाकर इनका उबटन बना लें। इसे साबुन की तरह पूरे शरीर में लगाएँ और 5 मिनट बाद नहा लें। सप्ताह में एक बार प्रयोग करने से घमौरियों, फुंसियों तथा त्वचा की सभी बीमारियों से मुक्ति मिलती है। साथ ही त्वचा मुलायम और चमकदार भी हो जाती है।

(46) पेट साफ रखे अमरूद:-

कब्ज से परेशान हों तो शाम को चार बजे कम से कम 200 ग्राम अमरुद नमक लगाकर खा जाएँ, फायदा अगली सुबह से ही नज़र आने लगेगा। 10 दिन लगातार खाने से पुराने कब्ज में लाभ होगा। बाद में जब आवश्यकता महसूस हो तब खाएँ।

(47) पपीते के बीज के स्वास्थ्य हमारा:-

पके पपीते के बीजों को खूब चबा-चबा कर खाने से आँखों की रोशनी बढ़ती है। इन बीजों को सुखा कर पावडर बना कर भी रखा जा सकता है। सप्ताह में एक बार एक चम्मच पावडर पानी से फाँक लेन पर अनेक प्रकार के रोगाणुओं से रक्षा होती है।

(48) मुलेठी पेप्टिक अलसर के लिये:-

मुलेठी के बारे में तो सभी जानते हैं। यह आसानी से बाजार में भी मिल जाती है। पेप्टिक अल्सर में मुलेठी का चूर्ण अमृत की तरह काम करता है। बस सुबह शाम आधा चाय का चम्मच पानी से निगल जाएँ। यह मुलेठी का चूर्ण आँखों की शक्ति भी बढ़ाता है। आँखों के लिये इसे सुबह आधे चम्मच से थोड़ा सा अधिक पानी के साथ लेना चाहिये।

(49) सरसों का तेल केवल पाँच दिन:-

रात में सोते समय दोनों नाक में दो दो बूँद सरसों का तेल पाँच दिनों तक लगातार डालें तो खाँसी -सर्दी और साँस की बीमारियाँ दूर हो जाएँगी। सर्दियों में नाक बंद हो जाने के दुख से मुक्ति मिलेगी और शरीर में हल्कापन मालूम होगा।

(50) भोजन से पहले अदरक:-

भोजन करने से दस मिनट पहले अदरक के छोटे से टुकडे को सेंधा नमक में लपेट कर [थोड़ा ज्यादा मात्रा में ] अच्छी तरह से चबा लें। दिन में दो बार इसे अपने भोजन का आवश्यक अंग बना लें, इससे हृदय मजबूत और स्वस्थ बना रहेगा, दिल से सम्बंधित कोई बीमारी नहीं होगी और निराशा व अवसाद से भी मुक्ति मिल जाएगी

कोई भी काम करें, बहुत सोच समझ कर करें

       कोई भी काम करें, बहुत सोच समझ कर करें। अपने से बड़े अनुभवी लोगों से सीख कर करें । उनके निर्देश में रहकर काम करें , तो आपको सफलता अवश्य मिलेगी।
कभी-कभी कोई व्यक्ति नया आविष्कार करता है, वह भी अपने बड़े बुजुर्गों की सलाह सम्मति लेकर, उनसे सीखकर ही कुछ नया प्रयास करता है। उसमें वह कभी सफल हो जाता है, और कभी कभी असफल भी होता है।
तो जो लोग नए नए प्रयोग करते हैं, वे भी केवल अपनी मनमानी न करें। अनुभवी लोगों के सहयोग और निर्देश का लाभ अवश्य लें। फिर किसी नए प्रयोग में यदि सफलता मिली तो बहुत उत्तम  ; और यदि कहीं कुछ असफलता रही भी, तो भी उस प्रयोग से काफी कुछ नया सीखने को अवश्य मिलता है। तो जो विशेष लोग हैं, वे नए प्रयोग करें, सब लोग नहीं।
शेष सामान्य व्यक्ति तो बड़े अनुभवी लोगों के निर्देश में ही बुद्धिमत्ता ईमानदारी और मेहनत से काम करें , तो वे अधिक सुख प्राप्त कर पाएंगे। यदि अपनी मनमानी करेंगे, तो बहुत दुख और हानियां उठानी पड़ेंगी। फिर लौटकर आखिर तो वहीं आना होगा, जो बड़े अनुभवी लोगों ने कहा था। उन्हीं की बात फिर से माननी ही होगी, तभी कल्याण होगा, अन्यथा नहीं

– स्वामी विवेकानंद परिव्राजक

परमात्मा की भक्ति

स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।
यत्र देवा अमृतमानशाना स्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ॥  यजुर्वेद॥
मंत्रार्थ – हे बंधुओं! वह परमात्मा अपने लोगों का भ्राता के समान सुखदायक, सकल जगत का उत्पादक, वह सब कामों का पूर्ण करनेहारा, संपूर्ण लोकमात्र और नाम, स्थान, जन्मों को जानता है, और जिस सांसारिक सुख दु:ख से रहित नित्यानंदयुक्त मोक्षस्वरूप धारण करनेहारे परमात्मा में मोक्ष को प्राप्त होकर विद्वान् लोग स्वेच्छा पूर्वक विचरते हैं, वही परमात्मा अपना गुरु, आचार्य, राजा और न्यायाधीश है अपने लोग मिलकर सदा उसकी भक्ति किया करें ।

मेरा भारत एसा महान बने

मेरा भारत एसा महान बने

जहाँ विद्वानों का मान बढ़े ज्ञान और विज्ञान परवान चढ़े जहाँ शासक प्रजा का दास रहे हर जन का उस पर विश्वास रहे मेरा भारत ऐसा महान बने! जहाँ न्यायाधीश निष्पक्ष रहें और विवेकशील बन न्याय करें जहाँ सेनाएँ हर दम तैयार रहें और किसानों के गोदाम भरें मेरा भारत ऐसा महान बने! जहाँ सन्ताने आज्ञाकारी बनें बलवान हों और तेजधारी बनें जहाँ नारियों की सब वन्दना करें और पितरों की सब अर्चना करें मेरा भारत ऐसा महान बने! जहाँ शुभ आचार-विचार बनें आपस में सब कोई प्यार करें सब पूजा-यज्ञ-हवन करें जहाँ देव सदा प्रसन्न रहें मेरा भारत ऐसा महान बने!

भारत में गुरुकुल परम्परा

सायं प्रातश्चरेद् भैक्षं गुरवे तन्निवेदयेत्।

भुञ्जीत यद्यनुज्ञातो नो चेदुपवसेत् क्वचित्॥

 

याज्ञवल्क्यस्मृति में भी कहा गया है

“ब्राह्मणक्षत्रियविशां भैक्षचर्या यथाक्रमम्॥”

गुरुकुल में रहकर अनेक स्थानों के विद्यार्थी अध्ययन करते थे तथा अपने वर्णानुसार मर्यादाओं का पालन करते थे। गुरु की सेवा में शिष्य पूर्ण रूप से समर्पित रहकर अध्ययन करता हुआ आशीर्वाद व योग्यता प्राप्त करता था। उज्जयिनी में सान्दीपनी के आश्रम में अध्ययन करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण गुरु की सेवा जंगल से काष्ठादि लाकर करते थे और अन्त में गुरु के लिए दक्षिणा रूप में उनके मृत पुत्र को यमराज के यहां से लाकर सौंपते हुए गुरुदेव से कीर्ति और वेदज्ञान-प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त कियागुरुकुल में रहता हुआ विद्यार्थी अपने माता-पिता की अपेक्षा गुरुदेव से अधिक प्यार, दुलार, हितादि को प्राप्त करता था। गुरु शिष्य को मुक्ति प्राप्त करने तक की विद्या प्रदान करता था। ‘सा विद्या या विमुक्तये’ के अनुसार विद्या से मुक्ति प्राप्त होती थी। गुरु द्वारा पढ़ाई जाने वाली विद्या का अधिकारी कोई शिष्ट शिष्य ही होता था। क्योंकि श्रेष्ठ का आचरण अन्यों के लिए अनुकरणीय होता है। जैसा कि श्रीमद्भागवद गीता में भगवान श्रीकष्ण ने कहा

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।

स यत्प्रमाणं कुरूते लोकस्तदनुवर्तत।

प्राचीन भारत गुरुकुल शिक्षा से ही व्यवस्थित संस्कृति की पहचान वाला देश था और तभी यह सोने की चिडिया कहलाकर अपनी धनाढयता सिद्ध करता था। वर्तमान समय में गुरुजनों के प्रति उपेक्षा के भाव ने संस्कृति का रूप क्षत-विक्षत-सा कर दिया है। –

जागें सूरज से पहले

जागें सूरज से पहले

स्वस्थ रहने के लिए सुबह सूर्योदय से पहले उठने की आदत डालें। यह दिमाग और शरीर को तरोताजा रखने के साथ प्रतिरक्षा तन्त्र को भी मजबूत करता है। साथ ही, आपको दिन भर की योजना बनाने के लिए पर्याप्त समय भी मिल जाता है। इसके अन्य फायदे इस प्रकार है। रक्त संचार दुरूस्त होता है। रात में नींद अच्छी और गहरी आती है। कब्ज और अपच की समस्या नहीं रहती। सुबह के वक्त ओस से भीगी हरी घास पर टहलने से आंखों की रोशनी तेज होती है। यह हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए भी फायदेमन्द है। टहलने के बाद कुछ समय के लिए एकांत में बैठकर ध्यान और योग करें। – सुबह के वक्त याद किया गया अध्याय जल्दी भूलता नहीं। आदत कैसे डालें- जितने बजे उठते है, उससे 15-30 मिनट पहले उठना शुरु करें। 10 अलार्म घड़ी को बिस्तर के पास रखने की बजाय कुछ दूर रखें। रात में देर तक टीवी न देखें। समय से सोना चाहिए। छुट्टी के दिन देर तक नहीं सोना चाहिए। इससे पूरे हफ्ते का चक्र गड़बड़ा जाता है।

परिवार कल्याण के लिए माता-पिता व बुजुर्गों का दायित्व

बच्चे और युवा हमारे देश भारत के भविष्य हैं और वे आपकी आशा हैंउनको अपने परिवार, कल्याण तथा देश भारत के मान-सम्मान और आदर हेतु प्रारंभ से ही संस्कारवान् बनायें। स्वयं उदाहरण बनकर उनमें अच्छी-अच्छी आदतें डालें जो मानव को उचित-अनुचित का ज्ञान कराकर उसे सहज, मानवीय, आदर्श मानव बनकर आधुनिक समयानुकूल आचरण करने की प्रेरणा देंकभी-कभी हम, हम दो और हमारे दो के सिद्धांत के अनुसार उसे ही परिवार मान लेते हैं जिससे देश में एकल परिवार और मां-बाप से अलग रहने की प्रवृति पनप रही है। पर उसके लिए उत्तरदायी हम ही हैं। भारतीय ताय संस्कति में मनुष्य दैवी शक्ति है।

जन्म लेने वाला प्रत्येक बालक अपनी तरह के संस्कार लेकर आता है। पर उन्हें नई दिशा देकर उपयोगी और परिपक्व बनाने का उत्तरदायित्व उस बालक का नहीं, माता-पिता, वरिष्ठजनों, परिवार और समाज का होता है। युवक तभी भटकते हैं, जब उन्हें वरिष्ठों से समुचित दिशा नहीं मिलती। हमें बच्चों को ऐसी शिक्षा देनी चाहिए, जिससे उनका चरित्र बने, मानसिक बल बढ़े, बुद्धि का विकास हो और जिससे मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके व समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी हो। अतः अच्छी प्रकार की शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य निर्माण ही है। सारे संस्कारों व प्रशिक्षणों का अंतिम ध्येय मनुष्य का विकास करना ही है। विज्ञान ने मनष्य को मशीनें देकर उसकी उत्पादन क्षमता को बढ़ा दिया और कार्य को सहज बना दिया है परन्तु दूसरी ओर मनुष्य का हृदय – मशीन की तरह कठोर हो गया है। मन से दया, करूणा, सहृदयता और देशभक्ति की भावना उठ गई है। विज्ञान ने मनुष्य को बुद्धि का विकास तो दिया परन्तु बुद्धि की दिव्यता छीन ली है। उसने मनुष्य को बिजली और अणु शक्ति तो दी है परन्तु उससे आत्मिक शक्ति और देशभक्ति ले ली है।

          – स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘जो ज्ञान और संस्कार साधारण व्यक्ति को जीवन संग्राम में समर्थ नहीं बना सकता, जो मनुष्य में चरित्र-बल, परहित भावना, नैतिकता तथा सिंह के समान साहस नहीं ला सकता, वह भी क्या कोई ज्ञान (शिक्षा) हैज्ञान अन्तर्निहित है, वह बाहर से नहीं प्राप्त होता, संस्कारों से आता है।

          – महात्मा गांधी ने कहा था ‘ज्ञान का अंतिम म लक्ष्य चरित्र निर्माण है और अच्छे चरित्र का आधार संस्कारयुक्त शिक्षा है, जो मनुष्य को देशभक्त बनाती है। संसार में कौन माता-पिता नहीं चाहेंगे कि उनके बच्चे सभ्य समाज की एक कड़ी बने, महान् देशभक्त बनें, उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप बनकर उनका तथा स्वयं का नाम उज्ज्वल करे। परन्तु आज के माता-पिता बच्चों को केवल धन-दौलत से सम्पन्न तो देखना चाहते हैं पर मानव नहीं बनाना चाहते, उनमें मानव मूल्य नहीं भरना चाहते। फिर यह सब कैसे होगा? इसके लिए बच्चों के सामने स्वयं अपने से बड़ों का के सामने स्वयं अपने से बड़ों का आदर और अभिवादन करें। इसके लिए माता-पिता क परिश्रम तथा अथक प्रयास व लगन के साथ बच्चे की नींव मजबूत बनानी होगी। उसमें परोपकार, शालीनता, प्रेम, संस्कार भरने होगें। दादा-दादी माता-पिता परिवार के ऐसे सदस्य होते हैं जिनके सम्पर्क में बच्चा सबसे अधिक रहता है। बचपन से लेकर ठीक से होश संभालने तक वह माता के ही पास रहता है।

                         जब बच्चा शिशु होता है, उसमें उचित संस्कार ठीक ढंग से लालन-पालन करते समय डालें। बच्चों में ऐसी भावना भरनी चाहिए कि वे अपने से बड़ों का सम्मान करें, उनसे शिष्टाचार के साथ बातें कर सकें। सादगी अपने आप में एक बहुत बड़ा गुण है। बच्चों को इसकी शिक्षा दी जानी चाहिए। बच्चों के पहनावे का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर इसकी प्रतिमूर्ति थे। उनका उदाहरण हमें ‘ बच्चों को देना चाहिए। बच्चों में अनुशासन और आज्ञा पालन की प्रवृत्ति के विकास को उत्सुक माता-पिता, दादा-दादी, जब अनुशासन संबंधी आदेश-निर्देश रौब दिखाकर या दबाव डालते हुए देते हैं, उस समय उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि यह व्यवहार बच्चों और युवकों में विरोध-विद्रोह की भावना जगाएगा। यदि प्रारंभिक उपेक्षा के क्रम में बच्चे ने अनसुनी कर दी, तब तो उनमें अनुशासनहीनता के बीज शुरु से अंकुरित हो उठते हैं, जो भविष्य में घातक बनते हैं और अनादर करने की प्रवृत्ति आती है। बच्चों को आवश्यक रूप में बार-बार टोकना भी ठीक नहीं, क्योंकि बच्चे स्वभावतः चंचल होते है हैंबच्चों की सहज अनुकरण बुद्धि को सदा ध्यान में में रखना चाहिए। माता-पिता को भी बच्चों के सामने परस्पर शालीनता का व्यवहार करना चाहिए। कच्चे लोहे को पिघलाकर इस्पात ढालने की अपनी विधा होती है। पेटोलियम से मोबील आयल निकालते हैं। बच्चे के कंसस्कार वे चाहे कितने ही जन्मों से जड पकडे हए हों, उन्हें भी सुधारा और संवारा जाना बिल्कल आसान बात है, यदि हम ता. क्योंकि बच्चे को मनोवैज्ञानिक ढंग से शिक्षा व दिशा और वातावरण दे सकें। उदाहरणत: यदि बच् गाने एवं संगीत की प्रवृत्ति है तो उसे प्रेरणाप्रद राष्ट्रीय गीत गाने की, भजनों, कहानियों, नाटक और अच्छे गीत सिखाने की जिम्मेदारी बच्चों के पता और संबंधियों की हो इससे अभिवादनशीलता आती है। जिन बच्चों में आरंभ से माता-पिता वरिष्ठ जनों द्वारा सेवा की भावना का स्वस्थ विकास कर दिया जाता है, वे आगे चलकर अपने सेवा-भाव से समाज में प्रतिष्ठा के पात्र बन जाते हैं और समाज के आदर्श हो जाते हैं। राष्ट्रभक्ति सेवा-पथ से चलकर हजारों ऐसे व्यक्ति उन्नति के महान् शिखरों पर पहुंचे हैं। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, भारत रत्न, मदन मोहन मालवीय, सुभाष चन्द्र बोस, दीनदयाल उपाध्याय, वीर सावरकर और लाल बहादुर शास्त्री, विनोबा भावे इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जिन्होंने देशभक्ति की भावना सभी में जाग्रत की, अपने परिवार का कल्याण कर विश्व में परिवार का नाम अमर किया है। – महेश चन्द्र शर्मा