बसंत पंचमी

बसंत ऋतु अति सुन्दर रमणीय और मनमोहक है। हर्ष और उल्लास का संदेश लाने वाली यह ऋतु जड़ चेतन सारे जगत् को नवजीवन से भर देती है। जैसे प्रातः सूर्य भगवान के उदय होने पर रात्रि का अंधकार छाई-माई हो जाता है और चोर-उचक्के अपने गुप्त स्थानों को भागने लगते हैं, ठीक इसी प्रकार बसंत ऋतु के आगमन पर शरद ऋतु की कठोरता समाप्त होने लगती है। मानों प्रकृति देवी एक रंग-बिरंगी सुन्दर चुनरी ओढ़कर एक सुन्दर नवविवाहित युवती की तरह उल्लास और उमंगों से भरी नृत्य करती हुई प्रतीत होती हैपतझड शिशिर ने जब अपने प्रकोप से वृक्षोंपेड़ों के पत्तों को सुखाकर धरती पर गिरा दिया था, अब बसंत ने अपनी उदारता से उन सबको नवजीवन देकर पुनः हरा-भरा कर दिया हैइसके फलस्वरूप कोमल, सुन्दर, नन्ही-नन्ही मोहक मुलायम पत्तियों से लदी वृक्षों की टहनियां और लताएं कैसे सुहावनी लगने लगती हैं। प्रकृति में चहुंओर नया वातावरण और उल्लास भरा जीवन दिखाई देता है, जिधर भी दृष्टिगत करो, हरियाली ही हरियाली दिखाई देती है, कहीं-कहीं तो दूर तक दृष्टि दौड़ाने पर प्रतीत होता है, जैसे हरी-हरी मुलायम मखमल का फर्श बिछा हो। सरसों के पीले बसंती रंग के फूलों से भरे खेत अपनी निराली आभा बिखेरते दिखाई देते हैंआम के पेड़ों पर नया बौर आने लगता हैबगीचों और गृह-वाटिकाओं में तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूल खिलने लगते हैं, जो अपनी मीठी-मीठी भीनी-भीनी सुगंध से सारे वातावरण को महका देते हैं। भौरे इनका रस लेने हेतु इन पर मंडराते हुए बड़े अच्छे लगते हैं। मधुमक्खियों के झुंड के झुंड फूलों में शहद एकत्र करना आरम्भ कर देते हैं। बगीचों में कोयल, पक्षी चहकने लगते हे. मानो वह भी अपनी बोली में बसंत देवी का स्वागत गीत गा रहे होंइसलिए तो पाश्चात्य देशों के बडे-बड़े कवियों ने कोयल पक्षी को बसंत का दत कहकर पुकारा है, शीतल समीर मन्द-मन्द बहताहुआ जब शरीर को स्पर्श करता है, तो मानो शरीर में एक नई स्फूर्ति का संचार हो जाता है। इतना ही नहीं, छोटे-छोटे सुन्दर पक्षी जो शीत के कारण बसंत के आगमन से पूर्व कहीं अज्ञात स्थान में मुंह छिपाए बैठे थे, इस जीवनदायिनी, सुहावनी ऋतु के आने पर अपनी मधुरवाणी में इस ऋतुराज का स्वागत करके अपने-अपने पुराने स्थानों को उड़ जाते हैं। इस ऋतुराज के अद्भुत दृश्यों को देखकर मानव भी भला क्यों न प्रभावित हो। अपने इर्द-गिर्द भव्य, मोहक सुन्दर प्राकृतिक दृश्यों को देखकर यह भी मस्ती में भरा झूमने लगता है और अपने भीतर एक नए जीवन और चेतना का संचार अनुभव करने लगता है। महीनों का पड़ा रोगी मनुष्य भी इस मौसम में एक बार तो अपूर्व स्फूर्ति अनुभव करके मस्त हो जाता है और अपनी पीड़ा और रोग को भुला बैठता है। ऐसा सुन्दर प्रेरणादायक वातावरण उपस्थित होने र पर सभी छोटे-बडे उल्लास के साथ इस पर्व को मनाते हैं। कहीं-कहीं लोग इन दिनों में नाच-गाने रासलीलाओं तथा स्वांगों का आयोजन करके अपनी मानसिक प्रसन्नता का प्रदर्शन करते हैं। गुजरात, हरियाणा, मध्यप्रदेश तथा कुछ अन्य प्रदेशों में इस दिन बाल-वृद्ध पतंग उड़ाकर अपनी खुशी का इजहार करते हैं। कुछ विचित्र सी ही बात प्रतीत होती है कि कालांतर में इस देश के निवासियों के ऋतुपरक तथा प्राकृतिक त्यौहारों के साथ किसी न किसी संस्कारी व्यक्ति विशेष के जीवन की घटना का संबंध हो गया होता हैउदाहरण के लिए शिवरात्रि के साथ ऋषि दयानन्द के बोध की घटना, होली के साथ भक्त प्रहलाद की घटना, दीपावली के साथ महर्षि बलिदान, स्वामी रामतीर्थ की जीवित जल-समाधि और महावीर स्वामी के निर्वाण की घटना इत्यादि। ठीक इसी प्रकार इस प्रेरणादायक बसंत पर्व के साथ गत तीन-चार सौ वर्षों से आर्यवीर बालक हकीकत राय के बलिदान की रोमांचकारी घटना भी जुड़ गई है। इस दिन मुगल शासन के समय में धर्माध मौलवियों तथा मुल्लाओं के अन्यायपूर्ण अमानुषिक फतवों (आदेशों) का शिकार हो एक चौदह वर्षीय बालक, अपने माता-पिता की एकमात्रा आशा और जीवन का सहारा, एक यवुती का सुहाग अपने प्यारे धर्म वैदिक धर्म की रक्षा हेतु अपने प्राणों की बलि चढ़ाया गया। इस वीर बालक हकीकत ने हंसते-हंसते जल्लादों की तलवार के आगे अपनी गर्दन यह कहते हए झका दी-कांट सकते हो तो बाहर का हकीकत काटो. काट सकती असल हकीकत राय को यह तलवार नहीं। इस बलिदान की याद में शाह आलम बाग लाहौर में प्रतिवर्ष इस दिन बड़ा भारी मेला लगता रहा, १२ रहा, देश के विभाजन तक। उसके पश्चात् कुछ वषा स नई दिल्ला म हिन्दु महासभा क विशाल प्रांगण में यह मेला लगता है। जहां भाव भरी श्रद्धाजाल उस वार का दा जाता जाता है।

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