ईश्वर के सगुण व निर्गुण होने का सही अर्थ-

ईश्वर के सगुण व निर्गुण होने का सही अर्थ-

       ईश्वर ही क्यों मानव भी सगुण और निर्गुण होते हैं। जो जो अच्छे गुणों से युक्त है वह उनकी सगुणता और बुरे गुणों से रहित है वही उनकी निर्गुणता है …इसी सिद्धांत के अनुसार सगुणता और निर्गुणता का भेद बड़ी सरलता से समझा जा सकता है। उदाहरण स्वरूप आर्यसमाज के दूसरे नियम में ईश्वर के जितने गुण बताए गए हैं उसमें ईश्वर का एक गुण तो सगुण भी है ।

ईश्वर के “सगुणता” प्रकट करने वाले गुण निम्नलिखित है –

जैसे कि, ईश्वर सच्चिदानंद स्वरूप ,सर्वशक्तिमान ,न्यायकारी ,दयालु , सर्व आधार (सब जगत का आधार ईश्वर है) ,सर्वेश्वर, सर्वव्यापक ,सर्व अंतर्यामी ,नित्य ,पवित्र और सृष्टिकर्ता है …ये सारे गुण ईश्वर की सगुणता के लक्षण को प्रकट करते हैं।

ईश्वर के “निर्गुणता” को प्रकट करने वाले गुण निम्नलिखित  है –

जैसे कि, ईश्वर निराकार, अजन्मा(ईश्वर का जन्म और अवतार नहीं होता), निर्विकार (ईश्वर में कोई विकार नहीं ,कोई दोष नहीं ),अनादि ,अनुपम ,अजर ,अमर और अभय(भय रहित है) है।

स्मरण रहे, ईश्वर “सगुण” भी है और “निर्गुण” भी है। किंतु भ्रांतिवश या अज्ञानवश हम मनुष्य लोग निर्गुण के लिए निराकार और सगुण के लिए साकार शब्द का प्रयोग करके ईश्वर को निराकार भी एवं साकार भी मान लेते हैं….. ऐसा कहना बिल्कुल ही दोष युक्त और सत्य के विरुद्ध है ।

यहां हमें समझना है कि ईश्वर निराकार ही है ।ईश्वर कभी साकार नहीं हो सकता ।ईश्वर कभी अवतार नहीं ले सकता क्योंकि ईश्वर जन्म नहीं ले सकता जब ईश्वर जन्म ही नहीं ले सकता तो साकार कैसे हो सकता है।जन्म तो जीवों का होता है।अगर ईश्वर भी मनुष्य की तरह जन्म लेने लगे तो फिर ईश्वर और मनुष्य में कोई अंतर नहीं रह जाएगा। ईश्वर भी फिर जीवात्मा की श्रेणी में आ जाएगा।  ईश्वर निराकार, सर्वव्यापक चेतन सत्ता है।वह कभी जन्म मरण के चक्र में नहीं पड़ता।

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