आनन्द की प्राप्ति

अद्यतनीय मन्त्रणा:-
“जिसको संसार चाहिए ,उसको ईश्वर नहीं चाहिए होता और जिसको ईश्वर चाहिए ,उससे संसार स्वयमेव छूटता जाता है ! अतः संसार के भोग को ही जीवन का उद्देश्य मत जानो अपितु ईश्वर के साथ योग का अनुष्ठान करो! यही जीव मात्र का ध्येय है ,यही उद्देश्य है !” इसी सन्दर्भ में महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि- #प्रकाशक्रियास्थितिशीलंभूतेन्द्रियात्मकंभोगापवर्गार्थं_दृश्यम् । यो.द. २/१८
अर्थात् वह सत्तात्मक द्रव्य जो कि #प्रकाश-(सत्त्व गुण),#क्रिया-(रजोगुण)और #स्थिति-(तमोगुण)स्वभाव वाला है ,#भूत-(जल,वायु,आकाश,भूमि,अग्नि) और #इन्द्रिय स्वरूप वाला है तथा #सम्यक्_भोग और #अपवर्ग अर्थात् सर्व दुःखों से सर्वथा निवृत्ति जिसका प्रयोजन(उद्देश्य) है !वह दृश्य अर्थात् स्थूल साकार रूप वाली है !
#विशेष :- मनुष्य के जीवन में छोटे-छोटे लक्ष्य वा उद्देश्य अनेकों होते हैं ! किन्तु, मनुष्य का मुख्य और अत्यावश्यक उद्देश्य एक ही है ,आनन्द की प्राप्ति !

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