म्नुस्मृति मे क्या है 

म्नुस्मृति मे क्या है 

मनुस्मृति ने धर्म के निम्न दस लक्षण बताये हैः-

         1. धृति, 2. क्षमा, 3. दम, 4. अस्तेय, 5. शौच, 6. इन्द्रिय-निग्रह, 7. धी, 8. विद्या, 9. सत्य, 10. अत्रोध।[1] इनमें से पाँचवाँ स्थान शौच अर्थात् अन्तः और बाह्य शुद्धि का है। शुद्धि का उपाय बताते हुए मनु कहते हैः-

‘सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्।

योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः।’[2]

          सब प्रकार की शुचियों में अर्थ की शुद्धता सबसे बढ़कर है। जो अर्थ की दृष्टि से शुद्ध है, वही शुद्ध है, लेकिन जिसने अपने को मिट्टी, जल आदि साधनों से शुद्ध किया है, वह शुद्ध नहीं है।

एक अन्य स्थल पर मनु कहते हैं कि वेद का स्वाध्याय और उपदेश, दान, यज्ञ, यम, नियमों का आचरण और तप का अनुष्ठान- ये सभी उत्तम आचरण, जिसकी भावना शुद्ध नहीं है, उसे कोई लाभ नहीं पहुँचा सकतेः-

‘वेदास्त्यागाश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च।
न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित्।’[6]

महाभारत में युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए भीष्म पितामह कहते हैः-

‘अर्थस्य पुरुषो दासः दासस्त्वर्थो न कर्हिचित्।
इति सत्यं महाराज! बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः।’

        हे युधिष्ठिर! मनुष्य अर्थ का दास है, अर्थ किसी का दास नहीं है। इसी अर्थ के कारण मैं कौरवपक्ष से बँधा हुआ हूँ। यहाँ भीष्म नीति और अनीति को जानते हुए भी सत्य का, जो युगधर्म भी है, साथ देने से कतरा रहे हैं। इसका कारण जो मनु ने बताया है, वही है कि राजा का अन्न अन्य किसी धन की अपेक्षा हजार गुना अधिक मन को दूषित कर देता है। आज का मनुष्य पहले की अपेक्षा अधिक शिक्षित होते हुए भी अधिक पथभ्रष्ट होगया है, इसके मूल में अर्थ की पवित्रता को भूल जाना है।

एक नीतिकार का कथन है कि मूर्ख लोगों ने थोड़े से लाभ के लिये वेश्याओं के समान अपने आपको सजाकर दूसरों के अर्पण कर दिया हैः-

‘अबुधैरर्थलाभाय पण्यस्त्रीभिरिव स्वयम्।
आत्मा संस्कृत्य संस्कृत्य परोपकारिणी कृतः।’

        अब प्रश्न उठता है कि क्या हमें धन की उपेक्षा कर देनी चाहिये? कदापि नहीं, क्योंकि वेदशास्त्र हमें समृद्ध और सुखमय जीवन यापन करने का उपदेश देते हैः-‘पतयः स्याम रयीणाम्।’[7] लेकिन जिनके पास धन है, उन्हें धन का उपयोग किस प्रकार करना चाहिये, ऋग्वेद कहता हैः-

‘मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य।
नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी।’[8]

        जो स्वार्थी व्यक्ति अकेले ही सब कुछ खाना चाहता है, मैं सत्य कहता हूँ कि यह उसकी मृत्यु है, क्योंकि इस प्रकार खाने वाला व्यक्ति न अपन भला कर सकता है और न मित्रों का। केवल अपने ही खाने-पीने का ध्यान रखने वाला व्यक्ति पाप का भक्षण करता है।

आजीविका के चलाने का ऐसा कौन-सा मार्ग है, जिस पर चलकर मनुष्य ससम्मान जीवन यापन कर सकता है। इस विषय में नीतिकार का मत हैः-

‘अकृत्वा परसन्तापमगत्वा खलमन्दिरम्।
अनुल्लङ्घय़ सतां मार्गं यत् स्वल्पमपि तद्बहु।’

         दूसरों को सन्ताप दिये विना, दुष्ट के आगे सिर झुकाये विना तथा सन्मार्ग का उल्लङ्घन न करते हुए जो भी प्राप्त हो जाये, वही धन स्वल्प होते हुए भी बहुत है।

यदि व्यक्ति उक्त मार्ग का अनुसरण करता है, तो उसका धन पवित्र धन है। इस प्रकार के अन्न का उपभोग करने वाला व्यक्ति, यदि साधना पथ पर बढ़ता है, तो उसे अवश्य सफलता मिलती है।

निजी अनुभव से – धन सभी कमाते है और धनवान भी हो जाते है। किन्तु धन कितना अर्थ शील है यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। कम कमाए किन्तु अर्थशील धन कमाए। अर्थशील धन सदेव फलित होता है।

 

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