पेरियार द्वारा पूछे गए ईश्वर पे प्रश्नों के उत्तर 

पेरियार द्वारा पूछे गए ईश्वर पे प्रश्नों के उत्तर 

1. क्या तुम कायर हो जो हमेशा छिपे रहते हो, कभी किसी के सामने नहीं आते?
2. क्या तुम खुशामद परस्त हो जो लोगों से दिन रात पूजा, अर्चना करवाते हो?
3. क्या तुम हमेशा भूखे रहते हो जो लोगों से मिठाई, दूध, घी आदि लेते रहते हो ?
4. क्या तुम मांसाहारी हो जो लोगों से निर्बल पशुओं की बलि मांगते हो?
5. क्या तुम सोने के व्यापारी हो जो मंदिरों में लाखों टन सोना दबाये बैठे हो?6. क्या तुम व्यभिचारी हो जो मंदिरों में देवदासियां रखते हो ?
7. क्या तुम कमजोर हो जो हर रोज होने वाले बलात्कारों को नही रोक पाते?
8. क्या तुम मूर्ख हो जो विश्व के देशों में गरीबी-भुखमरी होते हुए भी अरबों रुपयों का अन्न, दूध,घी, तेल बिना खाए ही नदी नालों में बहा देते हो?
9. क्या तुम बहरे हो जो बेवजह मरते हुए आदमी, बलात्कार होती हुयी मासूमों की आवाज नहीं सुन पाते?
10. क्या तुम अंधे हो जो रोज अपराध होते हुए नहीं देख पाते?
11. क्या तुम आतंकवादियों से मिले हुए हो जो रोज धर्म के नाम पर लाखों लोगों को मरवाते रहते हो?
12. क्या तुम आतंकवादी हो जो ये चाहते हो कि लोग तुमसे डरकर रहें?
13. क्या तुम गूंगे हो जो एक शब्द नहीं बोल पाते लेकिन करोड़ों लोग तुमसे लाखों सवाल पूछते हैं?
14. क्या तुम भ्रष्टाचारी हो जो गरीबों को कभी कुछ नहीं देते जबकि गरीब पशुवत काम करके कमाये गये पैसे का कतरा-कतरा तुम्हारे ऊपर न्यौछावर कर देते हैं?
15. क्या तुम मुर्ख हो कि हम जैसे नास्तिकों को पैदा किया जो तुम्हे खरी खोटी सुनाते रहते हैं और तुम्हारे अस्तित्व को ही नकारते हैं?

मेरा उत्तर —-
1.ईश्वर कायर नही है , ईश्वर निराकार होने कि वजह से वो सामने नही आ सकता | उसको निराकार होना इसलिए जरुरी है ताकि वो ब्रम्हांड को यथावत चला सके , अगर वो साकार हुवा तो एकदेशीय हो जाएगा , इससे विज्ञानं का नियम टूट जाएगा , और ईश्वर कभी अपने नियमों को नही तोड़ता | विज्ञानं का एक नियम है , जहाँ क्रिया होती है , वहीँ क्रिया को करने वाला कर्ता उपलब्ध होता है , इसलिए ब्रम्हांड में क्रिया हो रही है कण कण में , चुकी ब्रम्हांड अनंत है , इसलिए ईश्वर को सर्वव्यापक होना पड़ेगा , और सर्ववापक होने के लिए निराकार होना पड़ेगा , क्यूंकि केवल निराकार ही सर्वव्यापक हो सकता है | प्रश्न ये भी उठता है कि ईश्वर आये क्यूँ सामने , प्रायः लोग पूछते हैं कि ईश्वर कि क्या आवश्यकता है , तो उत्तर ये भी होगा कि कोई आवस्यकता नही जब तक मनुष्य आलसी बैठा है | ईश्वर को सामने आने कि कोई आवस्यकता नही | ईश्वर ने मनुष्य को पुरुषार्थ करने के लिए उसे वेद ज्ञान समाज द्वारा दिया है , मनुष्य को ईश्वर के भरोसे न बैठकर पुरुषार्थ करना चाहिए |

२.ईश्वर ने कहीं वेदों में यह ज्ञान नही दिया कि , तुम मेरी पूजा अर्चना करो , हाँ लेकिन उपासना करने के लिए जरुर कहा है , उपासना ईश्वर कि ऐसी होती है , जिससे मनुष्य को ही लाभ पहुँचता है , ईश्वर कि लाभ कि कोई इक्षा नही होती | अब उपासना है क्या वो ?? उस उपासना का नाम है “अष्टांग योग “–
अष्टांग योग (आठ अंगों वाला योग), को आठ अलग-अलग चरणों वाला मार्ग नहीं समझना चाहिए; यह आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है। योग के ये आठ अंग हैं:
१) यम, २) नियम, ३) आसन, ४) प्राणायाम, ५) प्रत्याहार, ६) धारणा ७) ध्यान ८) समाधि
यम:-
(क) अहिंसा – शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को अकारण हानि नहीं पहुँचाना
(ख) सत्य – विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना, जैसा विचार मन में है वैसा ही प्रामाणिक बातें वाणी से बोलना
(ग) अस्तेय – चोर-प्रवृति का न होना
(घ) ब्रह्मचर्य – दो अर्थ हैं:
(i) चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना
(ii)सभी इन्द्रिय-जनित सुखों में संयम बरतना
(च) अपरिग्रह – आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना |
नियम:-
(क) शौच – शरीर और मन की शुद्धि
(ख) संतोष – संतुष्ट और प्रसन्न रहना
(ग) तप – स्वयं से अनुशाषित रहना
(घ) स्वाध्याय – आत्मचिंतन करना
(च) ईश्वर-प्रणिधान – इश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए|
आसान :-आसन से तात्पर्य है स्थिर और सुख देनेवाले बैठने के प्रकार (स्थिर सुखमासनम्‌) जो देहस्थिरता की साधना है।
प्राणायाम -:आसन जप होने पर श्वास प्रश्वास की गति के विच्छेद का नाम प्राणायाम है। बाहरी वायु का लेना श्वास और भीतरी वायु का बाहर निकालना प्रश्वास कहलाता है। प्राणायाम प्राणस्थैर्य की साधना है। इसके अभ्यास से प्राण में स्थिरता आती है और साधक अपने मन की स्थिरता के लिए अग्रसर होता है। अंतिम तीनों अंग मन:स्थैर्य का साधना है।
प्रत्याहार :-प्राणस्थैर्य और मन:स्थैर्य की मध्यवर्ती साधना का नाम ‘प्रत्याहार’ है। प्राणायाम द्वारा प्राण के अपेक्षाकृत शांत होने पर मन का बहिर्मुख भाव स्वभावत: कम हो जाता है। फल यह होता है कि इंद्रियाँ अपने बाहरी विषयों से हटकर अंतर्मुखी हो जाती है। इसी का नाम प्रत्याहार है (प्रति=प्रतिकूल, आहार=वृत्ति)।
धारणा:-एकाग्रचित्त होना अपने मन को वश में करना।
ध्यान:- निरंतर ध्यान
समाधि:-आत्मा से जुड़ना: शब्दों से परे परम-चैतन्य की अवस्था हम सभी समाधि का अनुभव करें |
ऐसे ईश्वर कि उपासना होती है , ईश्वर कि कोई मूर्ति नही कि उसकी पूजा कि जाये | और जिसकी मंदिरों में मुजा कि जाती है , वह इश्वर नही , अपितु कई महापुरुष होते हैं |
न तस्य प्रतिमाSअस्ति यस्य नाम महद्दशः |
( यजुर्वेद ३२/३ )
अर्थ – उस ईश्वर कि कोई प्रतिमा नही, जिसका महान यश है |

३.ईश्वर का कोई शरीर नही , इसलिए भूखा रह ही नही सकता वो, उसको कभी भूख नही लगती , हाँ परन्तु अज्ञानता वश लोग मूर्तियों के सामने दूध , घी आदि चढाते हैं , यह मनुष्यों कि गलती है , इस गलतो को उस महापुरुष जिसकी मूर्ति बनी है और ईश्वर पे थोपना नही चाहिए |

४.ईश्वर तो कभी वेदों में बलि या मांस खाने का आदेश नही दिया है , आप एक भी मंत्र दिखाएँ , और मैंने यह भी कह दिया था कि , यह मनुष्यों कि गलती है कि वह ईश्वर के नाम पे बलि आदि करते हैं , लेकिन ईश्वर का इसमें कोई योगदान नही |
यजुर्वेद के 40/7 मन्त्र ‘यस्मिनित्सर्वाणी भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः। तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः।।’ में कहा गया है कि जो व्यक्ति सम्पूर्ण प्राणियों को केवल अपने जैसी आत्माओं के रूप में ही देखता है (स्त्री, पुरुष, बच्चे, गौ, हरिण, मोर, चीते तथा सांप आदि के रूप में नहीं) उसे उनको देखने पर मोह अथवा शोक (ग्लानि वा घृणा) नहीं होता, क्योंकि उन सब प्राणियों के साथ वह एकत्व (समानता तथा साम्यता) का अनुभव करता है। इस मन्त्र में यह सन्देह दिया गया है शोक व मोह से बचने के लिए मनुष्य को सभी प्राणियों को अपनी आत्मा के समान व रूप में ही देखना चाहिये। इससे वह शोक व मोह से बच सकते हैं।
यजुर्वेद मन्त्र 36/18 में कहा गया है कि ‘मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्। मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।’ इस मन्त्र का अभिप्राय है कि मुझे सब प्राणी अपना मित्र समझें तथा मैं भी उनसे अपने मित्रों जैसा व्यवहार करूं। हे परमात्मा ! कुछ ऐसी विधि मिलाओं कि हम सब प्राणी एक दूसरे से सच्चे मित्रों जैसा व्यवहार करें।
प्राणीमात्र के लिये अथाह मैत्री के इस वैदिक सिद्धान्त का पारिणााम यह निकला कि समाज में दोपायों (मनुष्यों) और चैपायों की हिंसा पूर्ण रूपेण निषिद्ध कर दी गई। यजुर्वेद मानव के प्रति अहिंसाभाव का कठोर आदेश देते हुए कहता है कि ‘…… मा हिंसीः पुरुषम् …’ (यजुर्वेद 16/3) अर्थात् पुरुष किसी भी प्राणी की हिंसा न करे। यजुर्वेद पशुओं के मारे जाने पर कठोर प्रतिबन्ध लगाता है। वह कहता है कि ‘मा हिंसीस्तन्वा प्रजाः‘ (यजुर्वेद मन्त्र 12/32) तथा ‘इमं मा हिंसीद्विपाद पशुम् …’ (यजुर्वेद 13/47)। इसी प्रकार यजुर्वेद में गोवध का निषेध किया गया है क्योंकि मानव जाति के लिये गौ शक्तिवर्द्धक घी प्रदान करती है। ‘… गां मा हिंसीरदितिं विराजम्’ (यजुर्वेद 13/43 एवं ‘….. घृतं दुहानार्मादति जनाय …. मा हिंसीः’। (यजुर्वेद 13/49)। इसी प्रकार से अश्व, बकरी व भेड़ आदि पशुओं का वध न करने के प्रति भी वेद में अनेक आज्ञायें उपलब्ध हैं। इससे सिद्ध हो जाता है कि समस्त वैदिक साहित्य के प्रतिनिधि वेद पशुओं की हिंसा के सर्वथा विरोधी हैं, मांसाहार का तो प्रश्न ही नहीं होता।
तो यह बात कहाँ से आगई कि ईश्वर बलि देने को कहते है ? जबकि ईश्वर ने वेदों में प्राणिमात्र को अपना समझने को कहा है | लोग बलि आदि ईश्वर के नाम पे इसलिए देते हैं , क्यूंकि उन्होंने वेद नही पढ़े |

५.अब मंदिर के मूर्ति में कोई प्राण तो होती नही कि , वह मूर्ति किसी से पैसा मंगवाए , और ईश्वर तो सर्वव्यापक है , उसको किस चीज कि कमी है, समस्त ब्रम्हांड उसका है | ये उन ढोंगी मनुष्यों का किया धरा है जो मंदिरों में लाखो तन पैसा रखते हैं , यह उस मूर्ति और ईश्वर का किया धारा नही |

६.ऊपर का ही उत्तर है यहाँ पे भी कि मूर्ति और ईश्वर का कोई योगदान नही मंदिर में देवदशियाँ रखने में , यह सब धूर्तो का किया धरा है |

७.ईश्वर ने मनुष्य को कर्म करने में स्वतंत्र छोड़ा है , ईश्वर कभी किसी मनुष्य के कर्मो में बाधा नही डालता , अगर ऐसा किया तो उसका यह नियम टूट जाएगा कि मनुष्य स्वतंत्र हैं कर्म करने के लिए | उसने मनुष्यों को कर्म करने के लिए इसलिए स्वतंत्र छोड़ा है ताकि वो अपने पूर्व जन्मो के कर्मो का फल भोग सके , अगर मनुष्य स्वतंत्र नही रहेगा ,अर्थात वह ईश्वर के बंधन में रहेगा , अर्थात वह कर्म भी अपने अनुकूल नही कर सकता , तो कर्म का फल कैसा , इस हिसाब से तो फल मिलना ही नही चाहिए , जबकि हर क्रिया कि प्रतिक्रिया होती है , इसलिए कर्म फल सिद्धांत सत्य है , इससे यह भी प्रमाणित होता है मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है | लेकिन ईश्वर सब कर्मो का फल तथावत देता है , जो जैसा करेगा , उसको वैसा फल मिलेगा |

८. इसका उत्तर भी मैंने ऊपर दे दिया है कि यह मनुष्यों का किया धारा है ईश्वर का नही |
९. इसका उत्तर ऊपर उत्तर ७ में दिया गया है |
१०. इसका भी उत्तर ७ ही होगा |
११.इसका भी उत्तर ७ ही होगा |
१२.हम अपने पोता से भी तो डर कर रहते हैं कि हम कोई गलत कार्य न करें जिससे हमारे पिता को गुस्सा आये | उसी तरह ईश्वर से भी गलत कार्य करते समय डरना चाहिए क्यूंकि वह सर्वव्यापक होते हुवे सब देख रहा है |ईश्वर उतना भी डरावना नही कि वह आतंकवादी हो | ईश्वर तो सबका मित्र , हितैषी है |इसके लिए आप वेद पढ़ें , और तर्क से ईश्वर को समझें |
१३. करोडो लोग किसके सामने प्रश्न पूछते हैं ?? मूर्ति के सामने या ईश्वर से ? इस समय तो कुछ को छोड़ कर ईश्वर के वास्तविक स्वरुप को कोई जनता ही नही , ईश्वर से प्रश्न कैसे करना है वह जनता ही नही , इसका उत्तर अष्टांग योग वाले उत्तर में है , कोई मनुष्य कैसे ईश्वर से ज्ञान प्राप्त कर सकता है |
१४. इसका भी उत्तर ७ ही होगा | ईश्वर ने मनुष्य को पुरुषार्थ करने के लिए कहा है |
हमारे दायें हाथ में पुरुषार्थ हो और बायें में विजय हो। (अथर्व० ७। ५८।८)
तुम्हारा सत्य और असत्य का विवेचन पक्षपात रहित हो, किसी एक ही समुदाय के लिए न हो | तुम संगठित होकर स्वास्थ्य, विद्या और समृद्धि को बढ़ाने में सभी क़ी मदद करो | तुम्हारे मन विरोध रहित हों और सभी की प्रसन्नता और उन्नति में तुम अपनी स्वयं की प्रसन्नता और उन्नति समझो | सच्चे सुख़ की बढती के लिए तुम पुरुषार्थ करो | तुम सब मिलकर सत्य की खोज करो और असत्य को मिटाओ | (ऋग्वेद १०.१९१.३ )

१५. ईश्वर ने कभी न आस्तिक को पैदा किया न नास्तिक को | ईश्वर ने केवल मनुष्य कि उतपत्ति कि | एक बालक भी जब जन्म लेता है तो वह न आस्तिक होता है न नास्तिक | नास्तिक उसको कहते हैं जो वेद को न माने , ईश्वर को न माने, बुरे कर्म करे | इससे विपरीत आस्तिक होता है | मैंने पहले ही बता दिया था कि मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है , मनुष्य स्वयं निर्धारित करता जय कि उसे नास्तिक बनना है या आस्तिक |

म्नुस्मृति मे क्या है 

म्नुस्मृति मे क्या है 

मनुस्मृति ने धर्म के निम्न दस लक्षण बताये हैः-

         1. धृति, 2. क्षमा, 3. दम, 4. अस्तेय, 5. शौच, 6. इन्द्रिय-निग्रह, 7. धी, 8. विद्या, 9. सत्य, 10. अत्रोध।[1] इनमें से पाँचवाँ स्थान शौच अर्थात् अन्तः और बाह्य शुद्धि का है। शुद्धि का उपाय बताते हुए मनु कहते हैः-

‘सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्।

योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः।’[2]

          सब प्रकार की शुचियों में अर्थ की शुद्धता सबसे बढ़कर है। जो अर्थ की दृष्टि से शुद्ध है, वही शुद्ध है, लेकिन जिसने अपने को मिट्टी, जल आदि साधनों से शुद्ध किया है, वह शुद्ध नहीं है।

एक अन्य स्थल पर मनु कहते हैं कि वेद का स्वाध्याय और उपदेश, दान, यज्ञ, यम, नियमों का आचरण और तप का अनुष्ठान- ये सभी उत्तम आचरण, जिसकी भावना शुद्ध नहीं है, उसे कोई लाभ नहीं पहुँचा सकतेः-

‘वेदास्त्यागाश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च।
न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित्।’[6]

महाभारत में युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए भीष्म पितामह कहते हैः-

‘अर्थस्य पुरुषो दासः दासस्त्वर्थो न कर्हिचित्।
इति सत्यं महाराज! बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः।’

        हे युधिष्ठिर! मनुष्य अर्थ का दास है, अर्थ किसी का दास नहीं है। इसी अर्थ के कारण मैं कौरवपक्ष से बँधा हुआ हूँ। यहाँ भीष्म नीति और अनीति को जानते हुए भी सत्य का, जो युगधर्म भी है, साथ देने से कतरा रहे हैं। इसका कारण जो मनु ने बताया है, वही है कि राजा का अन्न अन्य किसी धन की अपेक्षा हजार गुना अधिक मन को दूषित कर देता है। आज का मनुष्य पहले की अपेक्षा अधिक शिक्षित होते हुए भी अधिक पथभ्रष्ट होगया है, इसके मूल में अर्थ की पवित्रता को भूल जाना है।

एक नीतिकार का कथन है कि मूर्ख लोगों ने थोड़े से लाभ के लिये वेश्याओं के समान अपने आपको सजाकर दूसरों के अर्पण कर दिया हैः-

‘अबुधैरर्थलाभाय पण्यस्त्रीभिरिव स्वयम्।
आत्मा संस्कृत्य संस्कृत्य परोपकारिणी कृतः।’

        अब प्रश्न उठता है कि क्या हमें धन की उपेक्षा कर देनी चाहिये? कदापि नहीं, क्योंकि वेदशास्त्र हमें समृद्ध और सुखमय जीवन यापन करने का उपदेश देते हैः-‘पतयः स्याम रयीणाम्।’[7] लेकिन जिनके पास धन है, उन्हें धन का उपयोग किस प्रकार करना चाहिये, ऋग्वेद कहता हैः-

‘मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य।
नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी।’[8]

        जो स्वार्थी व्यक्ति अकेले ही सब कुछ खाना चाहता है, मैं सत्य कहता हूँ कि यह उसकी मृत्यु है, क्योंकि इस प्रकार खाने वाला व्यक्ति न अपन भला कर सकता है और न मित्रों का। केवल अपने ही खाने-पीने का ध्यान रखने वाला व्यक्ति पाप का भक्षण करता है।

आजीविका के चलाने का ऐसा कौन-सा मार्ग है, जिस पर चलकर मनुष्य ससम्मान जीवन यापन कर सकता है। इस विषय में नीतिकार का मत हैः-

‘अकृत्वा परसन्तापमगत्वा खलमन्दिरम्।
अनुल्लङ्घय़ सतां मार्गं यत् स्वल्पमपि तद्बहु।’

         दूसरों को सन्ताप दिये विना, दुष्ट के आगे सिर झुकाये विना तथा सन्मार्ग का उल्लङ्घन न करते हुए जो भी प्राप्त हो जाये, वही धन स्वल्प होते हुए भी बहुत है।

यदि व्यक्ति उक्त मार्ग का अनुसरण करता है, तो उसका धन पवित्र धन है। इस प्रकार के अन्न का उपभोग करने वाला व्यक्ति, यदि साधना पथ पर बढ़ता है, तो उसे अवश्य सफलता मिलती है।

निजी अनुभव से – धन सभी कमाते है और धनवान भी हो जाते है। किन्तु धन कितना अर्थ शील है यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। कम कमाए किन्तु अर्थशील धन कमाए। अर्थशील धन सदेव फलित होता है।

 

अवसरवादी राजनीति और सत्य इतिहास

अवसरवादी राजनीति और सत्य इतिहास

        भीमा कोरेगांव की घटना को कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी लोग दलित और आदिवासियों पर हुए अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष के रूप में दर्शाने का प्रयास कर रहे है। सत्य यह है कि हमारे देश की कुछ विभाजनकारी मानसिकता को बढ़ावा देने वाली ताकतें अपना राजनीतिक भविष्य बनाने के चक्कर में देशवासियों को भड़काने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। इसके लिए चाहे उन्हें कोरेगांव की घटना का सहारा लेना पड़े। चाहे मनुस्मृति और ब्राह्मणवाद का जुमला उछालना पड़े। उनके इस दुष्प्रचार से कुछ दलित और आदिवासी (वनवासी) क्षेत्रों में रहने वाले युवा भ्रमित हो जाते हैं। भ्रमित युवाओं को न सत्य का ज्ञान होता है, न ही उन्हें इसे जानने का अवसर प्राप्त होता हैं। कोरेगांव युद्ध में बलिदान हुए महार समाज के कुछ सिपाहियों की वीरता में अंग्रेजों ने स्मृति स्तम्भ बनवा दिया था। इस युद्ध में अगर अंग्रेजों की ओर से अंग्रेज सिपाही, महार सिपाही, राजपूत और ब्राह्मण तक लड़े थे। तो मराठा पेशवा की ओर से मराठा, राजपूत, मुस्लिम, गोसाईं, महार, मतंग और मंग जैसी दलित जातियों के लोग भी लड़े थे। अंग्रेजों की सेना में अगर महार अग्रिम टुकड़ी में थे तो मराठा सेना की अग्रिम पंक्ति में मुस्लिम सिपाही सबसे अधिक थे। तो क्या कोई इसे दलित-मुस्लिम युद्ध कहेगा? नहीं। कभी नहीं। फिर यह दुष्प्रचार क्यों कि कोरेगांव की घटना दलित महारों की ब्राह्मण पेशवाओं पर जीत थी। यह युद्ध तो अंग्रेजों और भारतीयों के मध्य हुआ युद्ध था। ब्रिटिश काल में ऐसे अनेक युद्ध और संघर्ष हुए जिसमें अंग्रेजों ने भारतीयों का बड़े पैमाने पर दमन किया था। हम इस लेख में इतिहास में आदिवासी क्षेत्र में हुए तीन संघर्ष गाथाओं के माध्यम से यह सन्देश देना चाहेंगे कि अंग्रेजों का दमन की घटनाओं को जो लोग भुलाकर भारतीय समाज को सवर्ण और दलित/आदिवासी के रूप में चित्रित करने का प्रयास कर रहे हैं। उनका यह षड़यंत्र असफल हो जाये। क्यूंकि उनकी सोच केवल विघटनकारी है।सत्य इतिहास पर आधारित नहीं है।

1. बिरसा मुंडा का बलिदान

       बिरसा मुंडा 19वीं सदी के एक प्रमुख आदिवासी जननायक थे। उनके नेतृत्‍व में मुंडा आदिवासियों ने 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में मुंडाओं के महान आन्दोलन उलगुलान को अंजाम दिया। बिरसा को मुंडा समाज के लोग भगवान के रूप में पूजते हैं। सुगना मुंडा और करमी हातू के पुत्र बिरसा मुंडा का जन्म १५ नवम्बर १८७५ को झारखंड प्रदेश मेंराँची के उलीहातू गाँव में हुआ था। साल्गा गाँव में प्रारम्भिक पढाई के बाद वे चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल में पढने आये। इनका मन हमेशा अपने समाज की ब्रिटिश शासकों द्वारा की गयी बुरी दशा पर सोचता रहता था। उन्होंने मुंडा लोगों को अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिये अपना नेतृत्व प्रदान किया। १८९४ में मानसून के छोटानागपुर में असफल होने के कारण भयंकर अकाल और महामारी फैली हुई थी। बिरसा ने पूरे मनोयोग से अपने लोगों की सेवा की। 1 अक्टूबर 1894 को नौजवान नेता के रूप में सभी मुंडाओं को एकत्र कर इन्होंने अंग्रेजो से लगान माफी के लिये आन्दोलन किया। 1895 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी। लेकिन बिरसा और उसके शिष्यों ने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी और अपने जीवन काल में ही एक महापुरुष का दर्जा पाया। उन्हें उस इलाके के लोग “धरती बाबा” के नाम से पुकारा और पूजा जाता था। उनके प्रभाव की वृद्धि के बाद पूरे इलाके के मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जागी। 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूँटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियाँ हुईं।जनवरी 1900 डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ था जिसमें बहुत से औरतें और बच्चे मारे गये थे। उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। बाद में बिरसा के कुछ शिष्यों की गिरफ़्तारियाँ भी हुईं। अन्त में स्वयं बिरसा भी 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ़्तार कर लिये गये। बिरसा ने अपनी अन्तिम साँसें 9 जून 1900 को राँची कारागार में लीं।

2. टंटया भील का बलिदान

        टंटया भील का जन्म 1924-27 के आसपास तत्कालीन मध्य प्रांत के पूर्वी निमाड़ ( खंडवा ) की पढ़ाना तहसील के गांव बडाडा में हुआ था। वह एक जननायक बागी था जिसने संकल्प लिया था कि देश से अंग्रेजी हुकूमत को किसी भी तरह उखाड़ फेकना है। टंटया भील केअदम्य साहस और विदेशी शासन को उखाड़ फेकने के जुनून ने उसे आम जनता और आदिवासियों का प्रिय बना दिया। टंटया की वीरता और अदम्य साहस से तात्या टोपे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसेे गुरिल्ला युद्ध में पारंगत बनाया। इसी वजह से वह 12 वर्षों तक पकड़ा नहीं जा सका। टंटया चीते की फूर्ति के साथ अंग्रेजी सैन्य छावनियों में घुसकर उनका खजाना लूट लिया करता था। फूर्ति इतनी कि अंग्रेज मानने लगे कि एक नहीं चार टंटया हैं जो एक ही समय में चार स्थानों पर खजाने लूट लेते हैं। लूटे गये खजाने की अंतिम पाई तक गरीबों और जरूरतमंदों को दे दी जाती थी। इसीलिये टंटया भील की गिरफ्तारी की खबर प्रमुखता से 10 नवंबर , न्यूयॉर्क टाइम्स, 1889 के अंक में प्रकाशित हुयी जिसमें उन्हें भारत के रॉबिन हुड के रूप में वर्णित किया गया था । पुलिस ने मुखबिरी के चलते जालसाजी से उसे गिरफ्तार कर लिया। मुखबिर को तो टंटया ने मार डाला।सख्त पुलिस पहरे और भारी लोहे की जंजीरों से बांधकर जबलपुर की जेल में उसपर अमानवीय अत्याचार किये गये।सत्र न्यायालय , जबलपुर, ने 19 अक्टूबर 1889 के दिन फांसी की सजा सुनाई और 4 दिसंबर को फांसी दे दी गयी। अंग्रेंजों ने भयवश फांसी के बाद वीर बलिदानी टंटया के शव को चुपके से रात के अंधेरे में इंदौर के महू कस्बे के जंगलों में खंडवा रेल मार्ग पर पातालपानी रेलवे स्टेशन के पास फेंक दिया। वहीं उसकी समाधि मंदिर है जहां आज भी सभी रेल चालक रूक कर उसे श्रध्दासुमन अर्पित करते हैं।

       3. गोविन्द गुरु और मानगढ़ के शहीद

       गुजरात से आकर राजपुताना की डूंगरपुर स्टेट के गाँव बड़ेसा (बंसिया ) में बसे बंजारा परिवार में 20 दिसम्बर 1858 को एक बालक पैदा हुवा जिसका नाम गोविंदा रखा गया। अपनी छोटी उम्र में ही गोविंदा इदर ,पालनपुर, सिरोही, प्रतापगढ़, मंदसोर, मालवा और मवाद के दूर तक गाँवो में घूम घूम कर गोविंदा ने आदिवासियों को बेहद निर्धन गरीब हालत को देखा। तो उसके मन में समाज सुधार की भावना जागृत हुई। उसी काल में राजस्थान में प्रवास कर रहे आर्यसमाज के प्रवर्तक एवं वेदों के महाविद्वान स्वामी दयानन्द से उनकी भेंट हुई। स्वामी दयानन्द के आदेशानुसार उन्होंने उनके समीप रहकर उन्होंने यज्ञ-हवन एवं वेदों की शिक्षा प्राप्त की। स्वामी दयानन्द का उद्देश्य उनके माध्यम से बंजारा कुरीतियों, पाखंडों और नशे आदि अन्धविश्वास में फंसा हुआ था। उसे छुड़वाकर उनमें जाग्रति लाना था। बंजारा समाज में उन्हें अपना गुरु बनाया गया। तब से उनका नाम गोविन्द गिरी हुवा। आपने बंजारा समाज में समाज सुधार का कार्य आरम्भ किया जो अंग्रेजों को नहीं सुहाया। अंग्रेज भारतीयों को पिछड़ा और पीड़ित ही रखना चाहते थे। उन्हें अनेक प्रकार से रोकने की कोशिशे की गई। आदिवासी राजस्थान मेँ डूँगरपुर,बाँसवाड़ा और गुजरात सीमा से लगे पँचायतसमिति गाँव भुकिया (वर्तमान आनन्दपुरी) से 7 किलोमीटर दूर ग्राम पँचायत आमदरा के पास मानगढ़ पहाड़ी पर 17 नवम्बर,1913 (मार्ग शीर्ष शुक्ला पूर्णिमा वि.स. 1970) को गोविन्द गुरू का जन्मदिन बनाने के लिए बंजारा वनवासी समाज एकत्र हुआ। अंग्रेजों ने इसे राजद्रोह का बहाना बनाकर मानगढ़ के पहाड़ी को घेर लिया। गोविन्द गुरु वहां यज्ञ,हवन एवं धर्मोपदेश करने के लिए आये थे। अंग्रेज कर्नल शैटर्न की अगुवाई में निहत्थे बंजारों पर गोलीबारी कर जनसंहार को अंजाम दिया गया। मानगढ़ पहाड़ी पर विदेशी हुकूमत के इशारे पर गोविन्द गुरु के नेतृत्व में जमा देशभक्त सपूत गुरुभक्तों पर तोपों और बंदूकों की गोलियों से किए गए हमले के बाद मानगढ़ की पहाड़ी के रक्तस्नान के मंजर का वर्णन रोंगटे खड़़े करता है। सरकारी आंकड़ो के अनुसार 1503 आदिवासी शहीद हुए। कुछ अन्य सूत्रों के अनुसार यह संख्या बहुत अधिक थी। गोविन्द गुरु व उनके शिष्यों को गिरफ्तार कर लिया गया। उनको फांसी की सजा सुनाई गई लेकिन संभावित जनविद्रोह को देखते हुए बीस साल की सजा में बदल दिया गया । उच्च न्यायालय में अपिल पर यह अवधि 10 वर्ष की गई। लेकिन बाद मे 1920 में रिहा कर उन पर सुँथरामपुर (संतरामपुर), बांसवाड़ा, डुँगरपुर एवं कुशलगढ़ रियासतों में प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। मानगढ़ की घटना को राजस्थान का जलियांवाला बाग भी कहा जाता है।

        अंग्रेजों के अत्याचारों के ये केवल तीन प्रचलित ऐतिहासिक घटनाएँ हैं। ऐसे हज़ारों सुनी और अनसुनी घटनाएं इतिहास के गर्भ में सुरक्षित हैं। अंग्रेजों ने सभी पर अत्याचार किया। जिन पर अत्याचार हुआ वो ब्राह्मण या दलित या आदिवासी नहीं थे अपितु भारतीय थे। वो सभी अपने थे और अंग्रेज पराये अत्याचारी शासक थे। आप इस सत्य इतिहास को कभी बदल नहीं सकते। इन तथ्यों की अनदेखी कर अंग्रेजों को श्रेष्ठ और अपने राजाओं को निकृष्ट बताने वाले इन अवसरवादी राजनीतिज्ञों को आप केवल देश-विरोधी नहीं तो क्या कहेंगे।

“क्या इस धरती पर हिन्दू होना पाप है”

“क्या इस धरती पर हिन्दू होना पाप है”

         सुरेश पंडिता रात के दो बजे एकाएक नींद से उठकर बैठ गया। उसको सपने में श्रीनगर के समीप गांव में अपना घर, खलियान, सेब के बाग, डल झील में शिकारे की सवारी, बर्फ से ढके पहाड़ और सोहाना मौसम दिख रहा था। उसने देखा कि तभी एक गोली चली जो उसके पिताजी का सीना चीरते हुए उन्हें सदा के लिए शांत कर गई। उसकी माँ जो घर के आंगन में सफाई कर रही थी एकाएक उसे बचाने घर के अंदर भागी तो एक सीधी गोली उसकी पीठ में  आकर धस गई। बालक सुरेश कुछ समझ पाता इससे पहले उनकी दुकान पर काम करने वाले एक बूढ़े चाचा उसे पिछले दरवाजे से लेकर खेतों में जा छुपे। उनके घर पर आतंकवादी हमला हुआ था। उनके घर में आग लगा दी गई। जैसे ही आग  लपटे आसमान छूने लगी। सुरेश की आँख खुल गई। पूरा बदन पसीने से तरबतर। यह सपना सुरेश पिछले दशक में न जाने कितनी बार देख चूका था। पर रह-रहकर वह फिर याद आ जाता। उसने अपने अतीत को याद किया जब 1989 में आतंकवादियों ने उन्हें कश्मीर से भाग जाने की धमकी दी थी। स्थानीय मस्जिद के लाउडस्पीकर से अजान के बदले धमकी दी गई कि कश्मीरी हिन्दुओं यहाँ से भाग जाओ और अपने स्त्रियों को हमारे लिए छोड़ जाओ। उसके पिता घर के मंदिर में गीता और क़ुरान शरीफ एक साथ रखते थे। वो किसी रोजे या ईद पर मुसलमानों के घर जाकर मेलमिलाप करना कभी नहीं भूलते थे। उनका कहना था कि हम यहाँ सदियों से एक साथ भाई भाई बनकर रहते आये हैं। उन्हें हिन्दू-मुस्लिम एकता पर पूरा विश्वास था। उन्होंने उस धमकी को नजरअंदाज किया था। परिणाम सुरेश का घर, माता-पिता, श्रीनगर सब सदा के लिए बिछुड़ गए। सुरेश का बचपन पहले जम्मू के टेंट फिर दिल्ली की कश्मीरी कॉलोनी में बदतर हालात में निकला। वहां रहने वाले हर कश्मीरी पंडित की जुबान पर लगभग यही कहानी थी। सुरेश जैसे तैसे बड़ा होकर सेना में शामिल हो गया। अपनी ड्यूटी वो बखूबी निभाता था।

          सन 2002 में सुरेश की ड्यूटी बंगलादेश बॉर्डर पर लगी थी। उसे सख्त हिदायत दी गई कि किसी को बॉर्डर के पार न जाने दे। एक दिन रात में उसने झाड़ियों में कुछ हलचल देखी।  हवाई फायर कर उसने सचेत किया। उस दिशा में गोलीयां भी चलाई मगर एक छोटी नहर के साथ की सुखी जमीन का फायदा उठाकर कुछ लोग भारत की सरहद में शामिल हो गए। सुरेश उनके पीछे दौड़ा मगर अँधेरे का फायदा उठाकर वे भाग गए। तलाशी के दौरान सुरेश को चार सोने के कंगन एक पोटली में बंधे मिले। उन्हीं घुसपैठियों के थे जो गिर गए थे। सुरेश ने उठाकर वह अपनी जेब में रख लिए। सोचा कल कोई इसे लेने आएगा तो उसे पकड़ लूंगा। मगर कोई न आया। वह कंगन सुरेश कई बार निकालकर देखता। सोचना की किसके होंगे। उसके मन में अनेक ख्याल आते। मगर यह कोई निर्णय नहीं ले पाया।

         2006 में सुरेश की ड्यूटी बनारस में संकट मोचन मंदिर के समीप लग गई। बनारस के माहौल में सुरेश अपने आपको धार्मिक प्रवृति के अनुकूल बनाने में लगाने लगा। नित्य सुबह शाम मंदिर जाना उसकी दिनचर्या का भाग बन गया। सात मार्च को सुरेश संकट मोचन मंदिर आया था। तभी मंदिर के समीप एक जोर का बम धमाका हुआ। सैकड़ों हताहत हुए। अनेकों की लाशों के इतने टुकड़े हो गए कि पहचान में भी न आये। सुरेश हवा में उछल कर दूर जा गिरा और बेहोश हो गया। एक महीने के बाद उसकी आंख एक हस्पताल में खुली। उसे पता चला कि एक नर्स सीमा द्वारा लगातार उसकी एक महीने तक सेवा हुई जिससे उसके प्राण बच पाए। उसने सीमा को धन्यवाद दिया। मन ही मन आभार प्रकट किया। सहसा उसे लगा कि सीमा के प्रति उसके मन में अलग विचार आ रहे थे। पर वह चुप रहा। अस्पताल से छुट्टी के दिन उससे रहा नहीं गया। वह जीवन में अकेला था। उसे एक जीवन साथी की आवश्यकता थी। सीमा उसे जीवन संगनी बनने के लिए सही लगी। उसने सीमा के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा और उसके सामने सोने के चार कंगन रख दिए। यह वही कंगन थे जो उसे बॉर्डर पर मिले थे। वर्षों से उसके पास सुरक्षित थे। वह कंगन देखते ही सीमा फुट फुट कर रोने लगी। सुरेश ने उससे इतनी जोर से रोने का कारण पूछा।

          सीमा ने पूछा आपको ये कंगन कहाँ मिले। सुरेश ने सब कुछ बता दिया कि उसे कैसे यह बंगलादेश सीमा पर मिले। सीमा ने रोते रोते बताया कि ये कंगन उसकी माँ ने उसके और उसकी बड़ी बहन के लिए बनवाये थे। उनका परिवार बंगलादेश का रहने वाला था। 2002 के गुजरात दंगों की आंच भारत देश की सीमा लाँघ कर उनके यहाँ पहुंच गई। स्थानीय चुनावों में मुस्लिम गुंडों ने हिन्दुओं के घरों पर हमला कर दिया ताकी वो वोट करने न जाये। अनेक हिन्दू लड़कियों की घरों से उठा लिया गया। उसकी बड़ी बहन ललिता भी उनमें एक थी। जिसकी लाश दो दिन बाद खेत में निवस्त्र मिली थी। ललिता के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था। उनका परिवार इतना डर गया कि उन्होंने तुरंत भारत आने का मन बना लिया। पिताजी ने एक दलाल को खोज निकाला जिसने घर की सभी जमापूंजी सीमा पार ले जाने के बदले मांग ली। मरते क्या न करते। जैसे तैसे रात को जीप में बैठकर सीमा से कुछ किलोमीटर पहले पहुंचे। फिर पैदल रात को पार करने लगे। तभी भारतीय सेना को उनकी आहत मिल गई। गोलियों की बौछार से जैसे तैसे बचते हुए भारतीय सीमा उन्होंने पार कर ली। उसी दौरान उसके हाथ से कंगनों की पोटली गिर गई। वहां से कोलकाता और उधर से बनारस अपने दूर के रिश्तेदारों के यहाँ पहुंचे थे। पिछले कुछ समय से सीमा ने गुजारे के लिए उस हस्पताल में नौकरी कर ली थी।

यह आपबीती सुनकर सुरेश को रोना आ गया। उसकी और सीमा की आपबीती में कोई अंतर नहीं था। दोनों अपनी पूर्वजों की धरती से बेदखल हुए थे। दोनों को अपने परिवारों के सदस्यों, अपनी धन-संपत्ति, अपने मान को खोना पड़ा था। दोनों का एक ही शांतिप्रिय सम्प्रदाय ने शोषण किया था। दोनों एक ही बात सोच रहे थे कि

An open letter to Jignesh Mevani on Manu Smriti and Caste System

An open letter to Jignesh Mevani on Manu Smriti and Caste System.

Dr Vivek Arya

        Dalit leader Jignesh mevani asked in delhi rally to choose between Manusmriti and Indian Constitution. I am 100% sure that he and other people like him have never ever read Manusmriti. Boasting with loud mouth is only what they knows. I challenge Jignesh Mevani to read this article and then give his opinion about Manusmriti. Let him come and debate on MANUSMRITI. I challenge him for this noble cause.

     Let the readers decide what they will choose between Indian Constitution and Manusmriti after reading this article.

       Most of readers might be having opinion about Manu Smriti that it supports Caste System. It says that a Brahmin is superior to a Shudra. Many will advocate to burn such text as it supports Caste System. Let us inquire into the common unfavorable perception that does the Manu Smriti supports casteism?
Swami Dayanand, the great Vedic scholar of the 19th Century, writes: “I believe in that part of Manu Smriti which is not interpolated (appended later) and is in accord with the Vedas.” He concludes that the Manu Smriti we read today is not as originally laid down by Swayambhu Manu, the first Chief of Humanity. As it now is, he found the text as self-contradictory and against the values espoused in Vedas, and hence injudicious. He therefore rejects those prejudicial texts which advocate discrimination against populations with alleged inferior status.

        Truth is that Manu proposed Varn Vyastha — which was based on merit and not on account of one’s birth.

      Here are the verses from Manu Smriti which says that Varna is based on qualification not on the basis of Birth.

      2/157. As an elephant made of wood, as an antelope made of leather, such is an unlearned Brahmana; those three have nothing but the names (devoid of virtues respective to their kind).

         2/28. This (human) body is made fit for (union with) Brahman by study of the Vedas, by vows, by burnt oblations, by (recitation of) sacred texts, by (acquisition of the) threefold sacred science, by offering (to gods, sages and manes), by (procreation of) sons, by great sacrifices, and by (the Srauta) rites

      (The above texts lays the qualifications to be acquired, with great dedication and effort at specified works, in order to become a Brahmin, and not merely by being born to a Brahmin father.)

       The varn of a person (caste or status in society) was decided after completion of his education.

        Two births were considered for a person in Vedic period : first, when he was born to his parents, and, next, when he completed his education with due thoroughness. It was after second birth (twice born) that the varn of person was determined.

         The following text from Manu Smriti makes it even more clear.

       2/148. But that birth which a teacher acquainted with Vedas entire, in accordance with the law, procures for him (the student) through the Savitr (Sun), is real and exempt from his birth, age or death.

     2/146. Between him to whom one is physically born and him who gives (the knowledge of) the Vedas, the giver of the Veda is the more venerable father; for birth through arising in the knowledge of the Veda (ensures) eternal (reward) both in this (life) and that (afterlife).

      A person who remained uneducated and devoid of the knowledge of Vedas was considered a Shudra.

        That is, the Shudra varn was not based on birth but on merit.

       10/4. Brahmana, Kshatriya and the Vaisya castes (Varna) are twice-born (educated) but the fourth, the Shudra, has one birth only; there is no fifth (caste).

         2/172. He who has not been initiated with teaching of the Vedas is like a Shudra.

         Manu also advises not to insult a person of lower Varna.

        4/141. Let him not insult those who have redundant limbs or are deficient in limbs, nor those destitute of knowledge, nor very aged men, nor those who have no beauty or wealth, nor those who are of low birth.

           Why Manu started Varn Vyastha?

        1/31. But for the sake of the prosperity of the worlds he caused the Brahmana, the Kshatriya, the Vaisya and the Shudra varn origin in form of the body of the society : as its mouth, its arms, its thighs and its feet, respectively.

           (Only the ignorant consider the Shudra as being originated from the feet of god.)

      1/87. But in order to protect this universe He (God), the most resplendent one, assigned separate (duties and) occupations to
those as done in a body by mouth, arms, thighs, and feet.

       1/88. To Brahmanas He assigned teaching and studying (the Vedas), sacrificing for their own benefit and for the welfare of others, giving and accepting (of alms).

       1/89. The Kshatriya he commanded to protect the people, to bestow gifts, to offer sacrifices, to study (the Vedas), and to abstain from attaching himself to sensual pleasures;

        1/90. The Vaisya to tend cattle, to bestow gifts, to offer sacrifices, to study (the Vedas), to trade, to lend money, and to
cultivate the land.

        1/91. One occupation only the Lord prescribed to the Shudra : to serve these (other) three castes.

        Manu considered anyone who is without knowledge or capacity for skilled deeds as a Sudra; so any uneducated person is fit only for being in the service, under the guidance, of others who have the requisite knowledge and skills.

         Isn’t that how we are organised even today ?

        Manu also advises people to exert in order to acquire a higher varna, and change his or her allotted Varna.

      The advisory leaves varn vyastha changeable, fluid, and not based on birth but on merit alone.

       10/65. (Thus) a Shudra attains the rank of a Brahmana, and (in a similar manner) a Brahmana sinks to the level of a Shudra; and know that it is the same with the offspring  of a Kshatriya or of a Vaisya.

       9/335. (A Shudra who is) pure, accompanies his betters and is gentle in his speech, free from pride, and always seeks a refuge with Brahmanas, attains a higher Varna (Brahmana, Kshatriya or Vaisya) based on his qualities.

         4/245. A Brahmana who always connects himself with the most
excellent (ones), and shuns all inferior ones, (himself) becomes most distinguished; by an opposite conduct he becomes a Shudra.

         Is it not said : the company one keeps makes a man better or worse ?

         2/103. But he who does not worships in morning, nor in the evening, is like a Shudra and he shall be excluded, just like a Shudra, from all the duties and rights of an Arya (one of noble qualities).

         2/168. A twice-born man who, not having studied the Vedas, applies himself to other (and worldly study), soon falls, even while living, to the condition of a Shudra; and so do his descendants (after him).

         2/126. A Brahmana who does not know the form of returning a salutation, they must not be saluted by a learned man; they must be considered as a Shudra.

A Sudra too can teach the other castes.

         2/238. He who possesses faith may receive pure learning even from a man of lower caste (Shudra), the highest law even from the lowest, and an excellent wife even from a base family.

         2/241. It is prescribed that in times of distress (a student) may learn (the Vedas) from one who is not a Brahmana; and that he shall walk behind and serve (such a) teacher, as long as the instruction lasts.

Superior rights given by Manu to shudras.

     2/136. Wealth, kindred, age, (the due performance of) rites, and, fifthly, sacred learning are titles to respect; but each later-named (cause) is more weighty (than the preceding ones).

         2/137. Whatever man of the three (higher) castes possesses most of those five, both in number and degree, that man is worthy of honour among them; and (so is) also a Shudra who has entered the tenth (decade of his life).

           In above text Manu gives respect to any Shudra who is in tenth decade of life.

          That is, anybody who lives long enough transcends the varna vyavastha.

    3/116. After the Brahmanas, the kinsmen, and the servants have dined, the householder and his wife may afterwards eat of what remains.

        Householders are advised by Manu to dine after sudras or the servants !

      8/335. Neither a father, nor a teacher, nor a friend, nor a mother, nor a wife, nor a son, nor a domestic priest must be left unpunished by a king, if they do not keep within their duty.

       8/336. Where another common man would be fined one karshapana, the king shall be fined one thousand; that is the settled rule.

      8/337. In (a case of) theft the guilt of a Shudra shall be eightfold, that of a Vaisya sixteen fold, that of a Kshatriya two-and-thirtyfold …

       8/338. … that of a Brahmana sixty-fourfold, or quite a hundredfold, or (even) twice four-and-sixtyfold; (each of them) knowing the nature of the offence.

        Manu advises strict punishment for a higher varna : punishing the Brahman many times more than a lower varn, say, a Shudra.

          The above text is evidence of Manu’s unbiased social hierarchy and structure.

      He considered a behavioural error as being more unpardonable in case of the learned one than for the ignorant.

          Following are the examples of changing of varn vyastha in past.
Rishi Brahma, son Manu Swayambhu himself, was born to a Brahmana but became a Kshatriya king.

         Manu’s eldest son, Priyavrat, became a king, a Kshatriya.

      Out of Manu’s ten sons seven became kings while three became Brahmanas. Their names were Mahavir, Kavi and Savan. (Ref Bhagwat Puran Chap. 5)

      Kavash Ailush was born to a Shudra and attained the highest varna of a Rishi. He became mantra-drashta to numerous hymns in Rig-Veda : 10th Mandal.

         Jabala’s son, Satyakaam, born from unknown father became Rishi by his qualities.

        Matang became a Rishi after his birth in low varna.

        Maharishi Valmiki was born in inferior varna and became a Rishi.
Mahatma Vidur was born to a Dasi (maid) and became the prime minister to king Dhritarastra.

         Raja Vishvanath, a Kshatriya, became a Brahmana – Rishi Vishwamitra.

        There are many examples of varn vyastha to inferior level.

        Ravan king of Lanka was son of a Brahmana Rishi Pultasya became a rakshasa.

        Shri Ram’s ancestor, Raja Raghu’s son, Pravidh, was declared of inferior varna due to lack of qualities.

       Shri Ram’s ancestor, Raja Samar’s son, Asmanjas, was declared a Shudra due to his bad qualities.

        Thus the real Manu Smriti supports Varn Vyastha based on Merit not on the basis of Birth. The adulterated part is thus reject able.

पाकिस्तान का हिंदू न घर का है न घाट का

पाकिस्तान का हिंदू न घर का है न घाट का

 

         पाकिस्तान का सिंध प्रांत। 

        शामियाना सजा, अतिथियों का जमावड़ा हुआ, फूलों की सजावट और इत्र की बौछारें हुई भी हुई. शामियाने के प्रवेश द्वार पर लिखे गये शब्द दावते-ए-इस्लाम की भावना का सम्मान पता नहीं लोगों के मन में कितना था पर जमीन पर दरियाँ बिछी उसके ऊपर कुर्सियां लगी ठीक सामने मंच के इस छोर से उस छोर तक मुल्ला मौलवियों का जमावड़ा था जो खुशी से फूले नहीं समा रहे थे. दरअसल ये दावत थी इस्लाम को अपनाने की. जिसका आयोजन कर पाकिस्तान के सिंध प्रांत के मातली जिले में माशाअल्लाह शादी हाल नज्द मदरसा में 25 मार्च 2018 को 50 हिन्दू परिवारों के 500 लोगों का सामूहिक रूप से जबरन धर्म परिवर्तन करवा दिया गया.

       मंच पर पीर मुख्तयार जान सरहदी, पीर सज्जाद जान सरहदी और पीर साकिब जान सरहदी ने कलमा पढ़ा जिसे सभी हिंदुओं को दोहराने को कहा गया. इन लोगों ने पर्दे में बैठी महिलाओं व बच्चों के भी नाम लेकर उन्हें इस्लाम कबूल करने को कहा. सभी हिंदू दुखी मन और छलकती आँखों से कलमा दोहराते रहे. फिर वहां मौजूद लोगों ने उन्हें नए मुस्लिम बनने की मुबारकबाद दी.

       जो लोग कलमा पढ़ रहे थे, उनके चेहरों पर खुशी नहीं थी. वे बच्चों और पर्दों में बैठी महिलाओं के साथ मजबूरी में इस्लाम कबूल कर रहे थे. इनमें से अधिकांश वे थे, जो भारत में शरण लेने आए तो थे. परंतु लम्बी अवधि का वीजा नहीं मिलने के कारण उन्हें पाकिस्तान लौटना पड़ा था.

        राजस्थान की सीमा के उस पार धर्म परिवर्तन का यह पूरा सिलसिला ठीक उसी दौरान चल रहा था जब जिनेवा में यूएन मानवाधिकार परिषद के 37 वें सत्र में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सिंध प्रांत में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों और जबरन धर्म परिवर्तन, हिन्दुओ की लड़कियों और महिलाओं के अपहरण पर चिंता जताई जा रही थी. इसका संचालन मुस्लिम कनेडियन कांग्रेस के फाउंडर व लेखक तारिक फतेह कर रहे थे.

       बताया जा रहा है कि राजस्थान में पिछले तीन सालों में 1379 हिंदू विस्थापितों को पाकिस्तान लौटना पड़ा. ऐसे लोगों का पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन हो रहा था. खबर है अभी भी राजस्थान में लम्बी अवधि के वीजा के लिए 15000 विस्थापित दिल्ली और संबंधित जिलों के एसपी ऑफिस के चक्कर लगा रहे हैं. हालाँकि राजस्थान में बड़े स्तर पर 2005 में नागरिकता दी गई थी, उसके बाद से 5000 विस्थापित नागरिकता के इंतजार में है.

        ऐसा नहीं है कि हमारे देश में जगह कम है बल्कि यहाँ बहुत बड़ी संख्या में विस्थापित रहते आये है. इनमें लाखों की तादात में तिब्बती शरणार्थियों के अलावा लगभग 40 हजार रोहिंग्या मुसलमान, जिनके पास न वीजा है न पासपोर्ट और करोड़ो की संख्या में बंगलादेशी मुसलमान, अफगान हो या इराकी शरणार्थियों समेत भारत दुनिया का सबसे बढ़िया ठिकाना बनता जा रहा हैं. अर्थात अपने देश की अनूठी परम्पराओं का लुत्फ आज सम्पूर्ण विश्व उठा रहा है. परम्पराओं, परिपाटियों एवं एतिहासिक उदहारण की आड़ में हमारे राजनेता भी अपनी हर ख्वाहिश को न केवल पूरा कर रहे हैं बल्कि अपनी कुर्सी भी सुरक्षित रख रहे हैं.

        लेकिन जब बात पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थियों की होती है तो कथित धार्मिक जगत से लेकर राजनितिक जगत में एक अजीब सी खामोशी छा जाती है. उउनके पास वैध वीजा और पासपोर्ट होते हुए भी रहने नहीं दिया जाता जबकि अभी पिछले दिनों जब भारत सरकार ने रोहिंग्या मुद्दे को उठाया तो उनके समर्थन में पूरा विपक्ष कूद पड़ा, कई धार्मिक संगठन सामने आये इन्हें मासूम, परिस्थिति का शिकार, मजलूम और न जाने कितने भावनात्मंक शब्दों से इनका शरणार्थी अभिषेक किया जा रहा था. परन्तु जब इसी महीने पाकिस्तान से अपना धर्म बचाकर भागे हिन्दू भारत में शरण मांग रहे थे तो सरकार से लेकर विपक्ष तक ने अपने कान और आँख बंद कर ली नतीजा उनके पाकिस्तान वापिस लौटते ही उनका धर्मांतरण कर दिया गया.

        ये पाकिस्तान में कोई नया काम नहीं हुआ ये तो वहां हर रोज होता हैं पाकिस्तान बनने के बाद जब पहली बार जनगणना की गई थी तो उस समय पाकिस्तान की तीन करोड़ चालीस लाख आबादी में से करीब 20 प्रतिशत गैर-मुसलमान थे. मगर आज पाकिस्तान के 18 करोड़ नागरिकों में गैर-मुसलमानों की सूची में अहमदी समुदाय को शामिल कर लिए जाने के बावजूद वहां गैर-मुसलमानों की आबादी 2 से 3 फीसदी में बची है. 1947 में कराची और पेशावर में लगभग डेढ़ हजार यहूदी बसा करते थे. आज वहां कोई यहूदी दिखाई नहीं देता. विभाजन के समय कराची और लाहौर में दस हजार से अधिक पारसी मौजूद थे जबकि आज लाहौर में 20 से पच्चीस पारसी भी बा मुश्किल से नहीं बचे हैं. गोवा से कराची में आकर रहने वाले ईसाईयों की संख्या वहां कभी 20 हजार से अधिक थी. ईसाई मुश्किल से 10 हजार भी नहीं बचे. कभी लाहौर शहर पूरा सिखों का हुआ करता था आज मुश्किल से बचे 20 हजार पाकिस्तानी सिख भी भय और नफरत के साये में जी रहे है.

         1971 के युद्ध के दौरान और बाद लगभग नब्बे हजार हिंदू राजस्थान के शिविरों में आ गए. ये लोग थरपारकर इलाके में थे जिस पर भारतीय सेना का कब्जा हो गया था. 1978 तक उन्हें शिविरों से बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी. बाद में भुट्टो सरकार के साथ समझोता हुआ पाकिस्तान को इलाका वापस दे दिया लेकिन पाकिस्तान ने लोगों को वापस लेने में कोई रुचि नहीं दिखाई. फिर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद पाकिस्तान में जो प्रतिक्रिया हुई उसके परिणाम में अगले पांच साल के दौरान लगभग सत्रह हजार पाकिस्तानी हिंदू भारत चले आये. इस बार अधिकांश पलायन करने वालों का संबंध पंजाब से था. 1965 और 1971 में पाकिस्तान से आने वाले हिंदूओं को आख़िरकार दो हजार चार में भारतीय नागरिकता मिल गई लेकिन बाबरी मस्जिद की प्रतिक्रिया के बाद आने वाले पाकिस्तानी हिंदूओं को अब तक नागरिकता नहीं मिल सकी है.

        पाकिस्तान के हिंदू सिंह सोढा का कहना है कि पाकिस्तान का हिंदू न घर का है न घाट का. वहां धर्म बदलने की मजबूरी, यहां रोजी-रोटी और न जाने कब खदेड़ दिए जाने का खतरा हर समय मंडराता है. भारत सरकार विस्थापित हिंदुओं के पुनर्वास के नियम बनाती तो है, लेकिन जिला स्तरों पर उनकी पालना नहीं होती. इसलिए जो लौट रहे हैं, उनके पास धर्म बदलने के अलावा दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है. कई संगठन कलमा पढ़ने वालों को रहने के लिए घर, घरेलू सामान, दहेज का सामान, काम करने के लिए सिलाई मशीनें, नहरों से खेती करने के लिए साल भर पानी का प्रलोभन भी दे रहे हैं. थारपारकर व उमरकोट इलाकों में जबरन धर्म परिवर्तन के मामले ज्यादा आ रहे हैं. जब कोई रास्ता नहीं बचता तो लोगों के सामने दो ही रास्ते बचते है या तो धर्म बचा ले या जीवन! अधिकांश लोग जीवन ही बचाना मुनासिफ समझते है.

स्वराज्य का महत्त्व

स्वराज्य का महत्त्व

आ य्द्वामीयचक्षसा मित्र वयं च सूरयः |
व्यचिष्ठे बहुपाय्ये यतेमहि स्वराज्ये ||

( ऋग्वेद ५-६६-६ )

       शब्दार्थ — हे ईयक्षसा = प्राप्तव्य ज्ञानवाले , मित्रा = प्रीतियुक्त स्त्री-पुरुषों ! , वाम् = आप दोनों के , सूरयः = विद्वान् , च = और , वयम् = हम मिलकर , व्यचिष्ठे = अति विशाल , बहुपाय्ये = अनेक मनुष्यों से रक्षणीय , स्वराज्ये = स्वराज्य में , आ+यतेमहि = सब ओर से यत्न करें ।

        व्याख्या — संसार में क्षुद्र से क्षुद्र कोई ऐसा प्राणी न मिलेगा , जो अपनी गतिविधि में प्रतिबन्ध को पसन्द करे । सभी चाहते हैं कि उनकी गति निर्बाध रहे । वेद में मार्ग के सम्बन्ध में प्रार्थना है की वह ‘अनृक्षरः’ काँटों से रहित हो । काँटे मार्ग की बाधा है । बाधा से रहित मार्ग प्रशस्त माना जाता है , और प्रशस्त होता भी है । ऐसी स्थिति में स्वराज्य की कामना अस्वाभाविक नहीं , अतएव अपराध भी नहीं । जो दूसरे की गतिविधि में प्रतिबन्ध लगाता है , जब कभी उसकी गतिविधि पर प्रतिबन्ध लगता है तब उसे ज्ञात होता है कि स्वाधीनत = स्वतन्त्रता = स्वराज्य क्या वस्तु है । वेद स्वराज्य का सबसे अधिक समर्थक है । वेद में एक समूचा का समूचा सूक्त ( ऋग्वेद १-८० ) स्वराज्य – प्रतिपादक है । इस स्वराज्य-सूक्त के प्रत्येक मन्त्र की टेक है – “अर्चनन्नु स्वराज्यम्” – ( स्वराज्य के अनुकूल कार्य करता हुआ )
“स्वराज्य” के सम्बन्ध में दो-एक निर्देश इस मन्त्र में हैं , जो मनन करने योग्य हैं —

     १ ) “स्वराज्य” में तथा स्वराज्यप्राप्ति के लिए विद्वानों का सहयोग अत्यन्त आवश्यक है । विद्वानों के बिना स्वराज्य का सम्भालना दुष्कर हो जाता है ।

      २ ) स्वराज्य “बहुपाय्य” है । अनेक जन मिलकर ही इसकी रक्षा कर सकते हैं । स्वराज्य तभी स्वराज्य हो सकता है , जब सभी को यह प्रतीत हो की यह अपना राज्य है । किसी का एक-छत्र राज्य उसके लिए भले ही राज्य हो , किन्तु उस राज्य में रहनेवाले सभी का राज्य नहीं हो सकता । स्वराज्य में सभी स्वराज्य अनुभव करें ।

     ३ ) स्वराज्य “व्यचिष्ठ” विशाल होना चाहिए । क्षुद्र स्वराज्य के अपहृत और नष्ट होने की सम्भावना का भय बना रहता है । विशाल राज्य में उसके रक्षक बहुत होंगे , अतः उसके विनाश की सम्भावना भी कम होती है ।

      ४ ) स्वराज्य के लिए जब सबको ममता होगी , तो सभी उसके लिए “यतेमहि” पुरुषार्थ करेंगे और सब प्रकार का पुरुषार्थ करेंगे ।

        स्वराज्य का महत्त्व ऋषि में शब्दों में लिखा है —

      “कोई कितना ही करे , परन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है , वह सर्वोपरि उत्तम होता है । अथवा मत-मतान्तर के आग्रहरहित अपने और पराये का पक्षपातशून्य , प्रजा पर पिता-माता के समान कृपा , न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है । “

      — सत्यार्थप्रकाश , अष्टमसमुल्लास

       आद्य और आज के ऋषि का भाव कितना समान है । स्वराज्य की भावना का विरोध अस्वभाविक है ।

       (–साभार :-स्वामी वेदानन्द तीर्थ की पुस्तक “स्वाध्याय – सन्दोह” से )

सदा सुख शांति फैले मेरे भगवान दुनिया में

सदा सुख शांति फैले मेरे भगवान दुनिया में

      सदा सुख शांति फैले मेरे भगवान दुनिया में। बनावे फिर से हम अपने वतन की शान दुनिया में। व्रतधारी, सदाचारी बने नर नार भारत में। वेद विद्या पढ़े सीखे ज्ञान विज्ञान दुनिया में। बहे दुध की नदियां मेरे इस देश भारत में। पशु, पक्षी गऊ माता ना हो कुर्बान दुनिया में। एशिया सर्व यूरोप में फहरावे ओ३म् का झंडा। वेद की शिक्षा के हित भाई करै सब दान दुनिया में। सकल विश्व के नर नारी रहे आजाद होकर के, कहै “भीष्म” घर -२ हो वेद व्याख्यान दुनिया में।।

        “स्वामी भीष्म जी” आपकी गणना आर्य समाज व आधुनिक भारत के निर्माताओं में होती है। स्वामी जी ने भारत के पुर्नउत्थान तथा सामाजिक ,धार्मिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक पुर्नजागरण में अद्वितीय योगदान दिया है। आर्य समाज में ८० से ज्यादा भजन मंडलियां तैयार कर स्वतंत्र रुप से वेद प्रचार के लिए भेजी। जिन्होने हरियाणा समेत उत्तर भारत के अमूमन राज्यों में ख़्याती प्राप्त की है।

🍂🍂#जन्म🍂🍂

         सन् १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के ठीक दो वर्ष बाद इस महान क्रांतिकारी जन्म हुआ। इनका जन्म सम्वत् १९१५ विक्रमी, मास चैत्र, कृष्ण पंचमी, दिन रविवार अर्थात मार्च १८५९ में हरियाणा के कुरूक्षेत्र जिले के तेवड़ा नामक गांव में हूआ। ये एक निर्धन परिवार था। इनके पिता जी श्री बारु राम था जो की कट्टर सनातनी थे। स्वामी भीष्म जी का बचपन का नाम लाल सिंह था। स्वामी जी के पिता जी शिव के उपासक थे। समाज में प्रचलित रीति रिवाजों एवं मूर्ती पूजा में उनका अटूट श्रद्धा थी।

       स्वामी भीष्म जी की माता जी का नाम पार्वती देवी था। जो की एक विनम्र, सुशील, तथा धार्मिक विचारों की आदर्श भारतीय नारी थी। इनकी माता इन्हें स्वामी दयानंद की तरह हष्ट पुष्ट पहलवान आजीवन ब्रह्मचारी और सन्यासी बनाना चाहती थी। साथ ही वह रुढीवादी ब्राह्मत्व के प्रभाव को पूर्णयता समाप्त करने के लिए अपने पुत्र को तर्क विद्या एवं शास्त्रों की विद्या से परिपूर्ण एक प्रकांड पंडित बनाना चाहती थी। माता के अथक प्रयत्न व उनके प्रभाव के कारण ही स्वामी भीष्म यह सब बन पाये थे। बच्चों में प्राय: जो आदते होती है। जैसे कुश्ती लड़ना, कबड्डी खेलना, दौड़ना, व्यायाम करना भजन, गाने संगीत सुनना इत्यादि ये सब स्वामी भीष्म में भी थी। गाने भजन व संगीत सुनने की में इनकी विशेष रुची थी।

🍂🍂#शिक्षा🍂🍂

        स्वामी जी ने प्रारम्भिक शिक्षा अपने गांव के पंडित चन्दनराम से प्राप्त की। कुछ समय इन्होने साधु पाठशाला हरिद्वार में भी शिक्षा ग्रहण की। तदन्तर इन्होने वेदांत की अनेक पुस्तको का स्वाध्याय किया और साथ ही गाने बजाने का अभ्यास भी। ग्यारह वर्ष की आयु से ही भजन गाने लग गए थे। इनकी आवाज शुरू से ही सुरीली थी। धीरे धीरे ये उच्च कोटी के गायक बन गए। स्वामी जी में देश भक्ति की भावना कुट कुट कर भरी हूई थी। सन् १८७८ ई० में ये क्रांतिकारियों से प्रभावित हो कर कानपुर जाकर ६२ न० पलटन में भर्ती हो गए थे। पौने दो वर्ष तक फौज में नौकरी करने के बाद वे बंदुक लेकर फरार हो गए एवं क्रांतिकारियों के साथ मिल गए।

🍂🍂#सन्यास ग्रहण🍂🍂

         स्वामी भीष्म जी सन् १८८१ ई० में सन्यासी योगीराज जी के पास बल्ली गोहाणा पहूंचे। इन्होने योगीराज से प्रार्थना की कि वे इन्हें अपना शिष्य बनाकर इनका जीवन सफल बनाएं। परंतु सन्यासी योगीराज ने इनकी यौवन अवस्था बलिष्ठ शरीर एवं पहलवानी के कारनामों को जानकर यह संदेह हो गया था कि शायद ये सदाचारी ना रह सकें। अत: सन्यासी योगीराज ने इन्हें सन्यास देने से मना कर दिया। स्वामी भीष्म जी ने बार बार उनसे निवेदन किया परंतु वे मना करते रहे। एक दिन स्वामी भीष्म ने योगीराज जी से कहा मैने दृढ़ निश्चय किया है कि मैं सन्यासी ही बनूंगा। आप जो इसके लिए शर्त रखे मुझे मंजूर है। तब स्वामी योगीराज ने कहा आप अपनी इन्द्री में छेदन कर ले तो मैं आपको सन्यास दे सकता हूं। स्वामी भीष्म जी ने यह शर्त सहर्ष स्वीकार कर ली। परिणाम स्वरुप इन्होने इंद्री निग्रह की कड़ी शर्त पूरी करके सन्यास ग्रहण किया और इनका नाम आत्म प्रकाश रखा। लेकिन आगे चलकर ये सन्यासी “”भीष्म ब्रह्मचारी”” के नाम से विख्यात हूए।

🍂🍂#आर्य समाज में प्रवेश🍂🍂

        सन्यास ग्रहण करने के बाद स्वामी जी इकतारा लेकर भजन गाते थे। सन् १८८६ में रोहतक का एक लड़का ज्ञानी राम सत्यार्थ प्रकाश लेकर आया। बोला स्वामी जी इसको पढ़ा दो। स्वामी जी ने उस लड़के को साफ मना कर दिया। क्योंकि स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश को हाथ लगाना भी पाप समझते थे। दूसरे दिन वह दो आदमियों को लेकर आ पहूंचा ओर कहा कि आप कहा करते हैं कि कमल का फुल जल में ही रहता है, लेकिन उसके उपर जल का कोई असर नही होता, इसी प्रकार आपके सत्यार्थ प्रकाश का प्रभाव नही पड़ेगा। उनके काफी आग्रह करने के बाद स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ाना आरम्भ किया
उसको पढ़ाने के चक्कर में स्वामी जी ही पढ़े गए। और खुद स्वामी जी आर्य समाज के रंग में रंगे गए।

🍂🍂#लेखन कार्य🍂🍂

       वस्तुत: स्वामी भीष्म जी ने भजन मंडलियों द्वारा सामाजिक व धार्मिक क्रांति एवं स्वतंत्रता आंदोलन के स्वरों को समाज में गुंजित किया और राष्ट्रिय चेतना जागृत की। स्वामी जी ने क्रांतिकारी एवं राष्ट्रीयता से सम्बधिंत विषयों पर पुस्तकें लिखी है जिनमें हजारो ही कविताएं एवं भजन संकलित हैं। कुछ प्रमुख पुस्तकें निम्नलिखित हैं :- स्वतंत्र भारत, नौजवानो को आह्वान, क्रांति का बिगुल, क्रांति का गोला, भयंकर तूफान, शहीदों के जीवन, भीष्म के तारे, भीष्म की गर्ज, भीष्म की दहाड़, भीष्म की तड़फ, भीष्म की धुम, भीष्म की तोप, विश्व प्रकाश अप्रकाशिक भीष्म भजन भंडार भाग १व २ तथा इनकी एक पुस्तक “”प्रमाण”” जो कि शास्त्रार्थ पर है। ये पुस्तक श्री जगदेव सिंह सिद्धांति जी ने अपनी सम्राट् प्रेस में छापी थी।

🍂🍂#क्रांतिकारियों से मिलनसार🍂🍂

         सन् १९२० से सन् १९३४ तक स्वामी भीष्म जी करैहड़ा गांव से समीप, गाजियाबाद उत्तर प्रदेश जंगल में कुटिया बना कर रहे। यहां इनसे भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद, अश्फाक उल्लां खां लाल बहादुर शास्त्री, तथा चौधरी चरण सिंह आदि क्रांतिकारी यहां आकर सहयोग प्राप्त करते थे। और भविष्मयी योजनाएं बनाते थे। ये कुटिया क्रांतिकारियों का अड्डा बन गई थी। १० सितम्बर १९२२ को स्वामी भीष्म जी ने अमृतसर में सिक्खों के धर्म युद्ध में भाग लिया, इन्होने गुरु का बाग घायल सिक्खों को सहायता एवं सांत्वना दी।

         सन् १९३६ में स्वामी जी ने घरौंडा करनाल में भीष्म भवन बनाया और उसी दिन तिरंगा फहरा दिया। यह झंडा अंग्रेज अधिकारियों, पुलिस आदि के विरोध के बावजूद आजादी आने तक शान से फहराता रहा।

         सन् १९३८ में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में दिल्ली में एक अखिल भारतीय नौजवान सम्मेलन हूआ। उस सम्मेलन में स्वामी जी ने मंच से एक क्रांतिकारी कविता सुनाई। तब नेता जी ने स्वामी जी से कहा कि वे इस कविता की अंतिम पंक्ति “”जवानी सफल हो सेना के तैयार से “” को सार्थक कर दिखाएंगें। नेता जी के इसी दृढ़ संकल्प का परिणाम था द्वितीय महायुद्ध के दौरान आजाद हिंद फौज का गठन तथा भारत को स्वतंत्र करने के लिए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। भारत आजाद हो गया लेकिन जिसका इंतजार पुरे आर्यावर्त यानी भारत को था उस वीर बहादुर बोस की याद में स्वामी जी ने भजन गाकर सुनाया था। जो आज भी बेहद लोकप्रिय है।

देश स्वतंत्र आज है-मां के सर पर ताज है।
भारतीयों का राज है-पर आने वाला आया ना।।टेक।।

पानी की तरह खून बहाया बाग के सच्चे माली ने।
भारत को आजाद किया है उस प्यारे बंगाली ने।
पापों का घट फोड़ गया, मां का बंधन तोड़ गया।
ना जाने किस ओड़ गया जो आकर दर्श दिखाया ना।।1।।

चालीस करोड़ भाईयों के दुख को उसने अपना दुख समझा।
आजादी के लाने को ही महावीर ने सुख समझा।।
तज के घर को बार गया-सात समुन्दर पार गया,
भारत का भार उतार गया-पर आजादी सुख पाया ना।2।

कस्तूरी की शुद्धि सुगन्धि छुपती नहीं छुपाने से।
इसी तरह से चश्मे वाला भी रूकता ना आने से।
शान वतन की बोस था, ब्रह्मचारी निर्दोष था,
होके गया रूपोष था-जो मरने से घबराया ना।।3।।

नर नारी बेचैन वतन के करें वसु को याद सभी।
कहाँ छुपे हो आ जाओ अब हो गये हैं आजाद सभी।।
कोई कहे कि मर गया हमें स्वतंत्र कर गया।
भीष्म सुनकर डर गया-जब किसी ने पता बताया ना।।4।।

           इतने करूणा भरे शब्द सुनकर श्रोताओं के आंसू निकल आते थे।

🍂🍂 #अंधविश्वास मिटाया 🍂🍂

         एक बार स्वामी जी उत्तर प्रदेश के किसी गांव में गए हुए थे। पंडित चन्द्रभानु भी स्वामी जी के साथ थे। गांव में नौगजे सैयद का खौफ था। प्रचार में स्वामी जी ने भुत प्रेत का खंडन किया तो एक आदमी रोने लगा। वह एक मुस्लिम कुंजड़ा था। उसने एक आमों का बाग ले रखा था। वो बोला महात्मा जी हमारे बाग में नोगजे सैयद आते हैं। पेड़ तोड़ जाते हैं। आम तोड़ कर ले जाते हैं। हम वहां रात को सो नहीं सकते। स्वामी जी बोले – हमे दिखाओ। अगली रात को स्वामी जी के साथ पांच व्यक्ति गए। जेली गंडास ले ली। बाग के पास छिपकर बैठ गए। रात के ठीक १२ बजे चांद निकला। ३ नो गजे सैयद आए। उनके पाजामें बहुत लम्बे थे। कुर्ता मनुष्य जैसा। स्वामी जी ने कहा इनके पाजामें व कुर्ते में इतना फर्क क्यों हैं। स्वामी व इनके साथियों ने उन पर हमला बोल दिया। एक एक जेली में तीनो नो गजे गीर गए। हाथ जोड़कर बोले हम निकट गांव के नट हैं। पैरों में लम्बे बांस बांधकर लट्ठे का थान पैरो पर लपेट लेते हैं। हमारे पास पैसे नहीं थे। एक सप्ताह पूर्व इनसे २० सेर आम उधार लेने आए थे। इन्होने मना कर दिया। अगले दिन हमने इनको आकर डराया की हमारे दादा जी कहते हैं की इस बाग में नो गजे सैयद रहते हैं। अगली रोज हम भेष बदलकर आए ओर आम तोड़कर ले गए। हम अचारी आम आस पास के गांव में बेच देते हैं। हमे छोड़ दो। स्वामी जी बोले गांव में चलो। लोगो का भ्रम मिटाना है। इन कुंजड़ो की भरपाई कर देना। उनके हाथ बांधकर गांव में लाया गया। पंचायत ने उन पर जुर्माना लगाया। तब स्वामी जी ने कहा भूत बीते समय काल का वक्त है। भूत प्रेत से बचना चाहते हो तो आर्य बनो। ताकि पाखंड से पीछा छुटे।

🍂🍂#स्वामी जी के शिष्य🍂🍂

       स्वामी भीष्म जी ने ८५ सफल आर्य भजनोपदेशक तैयार किये। स्वामी जी के शिष्यों की सूची बहुत लम्बी है। लेकिन इनमे से प्रमुख हैं :- पंडित हरिदत्त जी, पंडित ज्योतिस्वरुप मानपुरा, स्वामी रामेश्वरानंद जी, पंडित चन्द्रभानु आर्योपदेशक, महाशय परमानंद आर्य, चौधरी नत्था सिंह, स्वामी रुद्रवेश जी, रामस्वरुप आजाद, पंडित ताराचंद वैदिक तोप,रतीराम,स्वामी विद्यानंद, स्वामी ब्रह्मानंद, मनीराम बागड़ी, रामचन्द्र जी विक्कल, ज्ञानी जैल सिंह, इत्यादि स्वामी भीष्म जी के प्रसिद्ध शिष्य रहे हैं।

🍂🍂#सम्मान प्राप्ति,देह त्याग🍂🍂

       स्वामी भीष्म जी की सेवाओं को देखते हूए २१ मई १९८१ को हरियाणा सरकार ने स्वामी जी महाराज का नागरीक अभिनन्दन कुरूक्षेत्र की भूमी पर किया। जिसमे तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री श्री ज्ञानी जैल सिंह ने स्वामी भीष्म जी महाराज को एक कर्मठ देश भक्त उच्च कोटी का समाज सेवक बताते हूए उनकी सेवाओं को याद किया।

         ८ जनवरी सन् १९८४ दिन रविवार को भीष्म भवन घरौंडा में स्वामी जी महाराज का शरीरांत हूआ। इस प्रकार देश का एक महान क्रांतिकारी सन्यासी अपना कार्य कर विदा हूआ। वस्तुतः स्वामी भीष्म जी ने अपने नि: स्वार्थ सेवा, त्याग, भावना से जो परोपकार के लिए जीवन बिताया है। उनका ये समाज सदैव ऋणी रहेगा। मेरा स्वामी जी को शत शत नमन। वैदिक धर्म की जय।

वेदों का क्रम

वेदों का क्रम

        शंका- पश्चिमी लेखों का मानना है कि चार वेदों में कोई क्रम नहीं हैं? चार वेदों विभिन्न विभिन्न काल में प्रकाशित हुए।

       समाधान- यह वेदों पर आक्षेप करने वाले की  बुद्धिहीनता और स्वाध्याय की कमी को दर्शाता हैं। वेद चार हैं। उनके प्रधान विषय और सन्देश को समझने से सरलता से यह समझा जा सकता है कि चरों वेद क्रम के अनुसार हैं।

      ऋग्वेद में विज्ञान की प्रधानता है। ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त पदार्थों का उसमें निरूपण है। ऋग्वेद अग्नि से आरम्भ होकर नाना विज्ञानों का बोध कराते हुए संज्ञानसूक्त पर समाप्त होता है। अर्थात यथार्थ ज्ञान का फल मनुष्यों के विचार, उच्चार तथा व्यवहार की एकता होनी चाहिए। सभी की एक मति एक उक्ति एवं एक गति होनी चाहिए।

       यजुर्वेद कर्मवेद है। ज्ञान के पश्चात कर्म मनुष्य का प्रयोजन है। यजुर्वेद के पहले मंत्र में देवो व: सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे अर्थात ऐसा यत्न करो जिस से भगवान् तुम मनुष्यों को श्रेष्ठतम कर्म में प्रवृत रखे की प्रेरणा है। अंत के अध्याय में कुर्वन्नेवेह कर्माणि मंत्र में सन्देश दिया गया है कि मनुष्य इस संसार में समस्त आयु कर्म करता हुआ ही जीने की आशा करे। इसी अध्याय के 15वे मंत्र में पुन: कहा कि कृतं स्मर। किल्बे स्मर अर्थात हे मनुष्य अपने किये कर्मों को स्मरण कर। इस प्रकार से यजुर्वेद कर्म प्रधान वेद हैं।

      सामवेद में साम का अर्थ है सांत्वना। कर्म से श्रान्त उद्भ्रांत मनुष्य को शांति चाहिए। उसके लिए सामवेद है। सामवेद के प्रथम मंत्र में भगवान् काआह्वान है। उपासना की विभीन भूमिकाओं का वर्णन करते हुए अंत में सामवेद युद्धसक्त पर समाप्त होता है। अंत में युद्धसक्त एक विशेष सन्देश दे रहा है। योगी लोग योग की चरम सीमा तक पहुंचने के लिए संसार में प्रसृत सभी आंतरिक एवं बाहर के पापों से युद्ध करता हैं। धर्म पथ के पथिक को अधर्म से युद्ध करना अनिवार्य है। यही युद्ध सूक्त का सन्देश हैं।

      अथर्ववेद में शांति प्राप्त करने के पश्चात सूक्षम विषयों की ओर प्रवृति होती है। ताकि मनुष्य के संशयों का निवारण हो जाये। अथर्ववेद के प्रथम वर्ग में भगवान् से प्रार्थना है कि हमारा श्रुत हमारे पास बना रहे- मय्येवास्तु मयि श्रुतं। विस्मरण, अपस्मरण के कारण वह नष्ट न होने पावे। अथर्ववेद का अंतिम मंत्र पनाय्यं तदश्विना कृतं वां वृषभो दिवो रजसः पृथिव्याः का सन्देश है कि हे अश्विनों! तुम्हारी यह रचना प्रशंसनीय है किन्तु द्यौ, अंतरिक्ष , पृथ्वी पर सब प्रकार की सुख वृष्टि करने वाला परमेश्वर भी प्रशंसनीय है। असंख्य प्रशंसाए हैं और जो वाग्यज्ञ, ज्ञानयज्ञ में जो ज्ञान है, उन सब का पान करने के लिए तुम सब उन्हें प्राप्त करो। इस प्रकार से संक्षेप में अथर्ववेद का पहला मन्त्र ज्ञान के बने रहने का सन्देश देता है ताकि उसके अनुसार व्यवहार मनुष्य करें। अंतिम मंत्र यह कह रहा है कि यह सृष्टि अश्विनों अर्थात जड़ चेतन की क्रिया हैं। जिसका करता सबका सुखविधाता है। ज्ञान की जिसकी चर्चाएं हैं। उनका पान करो अर्थात अपने जीवन का अंग बनाओ। यही ज्ञान का पान है।

इस प्रकार से यह सिद्ध होता है कि चारों वेदों में वैज्ञानिक रूप से क्रम सम्बन्ध हैं।

-डॉ विवेक आर्य

वीर वैरागी

वीर वैरागी

डर डर कर थे भीरु सरकते, कहीं गुप्तचर-चाल न हो। 
स्वांग भूख का भरा शत्रु ने, कण के मिष मृति-जाल न हो। 
लो ! धर दी तलवार धीर ने, हंसता काल कराल न हो। 
प्यारा लगता प्राण-पखेरू, मुक्त मृत्यु का माल न हो॥

कोई यम को मार ले, भवसागर को फाँद जाय।
कौन मनचला वीर जो, वैरागी को बाँध जाय॥

आईं इन नयनों के आगे लीलाएं अद्भुत नाना। 
एक खेल था चतुर खिलाड़ी का पिंजरे में बँध जाना॥ 
जिन आंखों ने पीठ देख अब तक वैरी को पहिचाना।
बैरि-बदन हंसता सम्मुख हो यह कौतुक अचरज माना॥

दर्शन को वर-वीर के लालायित दिल्ली हुई।
आरति कौतूहल भर निश्चल नयनों की हुई॥

धोखा था भोले भूपति को सुत रखते हैं वैरागी। 
मस्त मोह-माया में रहते हैं मानो सर्वस-त्यागी। 
गोदी में बालक बैठाया दया क्रूर मन से भागी। 
अंग-अंग को काट रहे, नहिं जनक-हृदय ममता जागी॥

विजय क्षेत्र में सिंह सम जो हरते पर प्राण थे।
आज भेड़ बन चुप खड़े, क्या प्रमाण ? थे या न थे॥

कमरें बाँधे खड़े सूरमा देख रहे दलपति की ओर। 
अभी शंख बजता है देखें पड़े शत्रु-पुर के किस छोर। 
भीरु भगौड़े खेत रहेंगे घर घर घोर मचेगा शोर। 
अगुआ आगे शत्रु सामने, थामे कौन जिगर का जोर॥

वन्दे ! आंखें मोड़ लीं, सचमुच वैरागी रहा। 
सुभट सूर संग्राम का, चाप तोड़ त्यागी रहा॥

निज सुत मरने का मानो तुझ को रत्ती भर शोक न था। 
अंग-अंग कटता जाता है तेरा तुझे नहीं परवा। 
चेला बना वीरता-युग में किस निष्क्रिय प्रतिरोधी का। 
इतने वीर मरे जाते हैं, मर कर कौन हुआ जेता॥

उठ उठ दल बल चुस्त कर, आत्मशक्ति तो लो दिखा।
हम हों लाख कृतघ्न तू था पुतला उपराम का॥

सेना ने तुझ को छोड़ा है तू सेना का साथ न छोड़। 
शिष्यों ने तुझ से मुख मोड़ा, तू न शिष्य-दल से मुख-मोड़॥ 
मेल शान्ति से निष्क्रियता का क्या ? क्या दया दैन्य का जोड़ ? 
समझा समाधि-सुख सपनों को, भंग- भक्त के कान मरोड़॥

मूर्त योग ! वैराग्य-घन ! हम को वैरागी बना । 
भक्तराज ! संन्यास-धन ! यह संन्यास हमें सिखा॥