NRC से समस्या

NRC से समस्या

” alt=”” aria-hidden=”true” />       NRC से समस्या यह है कि सवा दो करोड़ को अवैध घुसपैठिया घोषित करके नागरिकता के सारे अधिकारों से वञ्चित करना पड़ेगा और शेष करोड़ों अवैध घुसपैठियों के सिर पर खतरा मँडराता रहेगा कि वे न तो अवैध घुसपैठिये घोषित हो पायेंगे और न ही NRC रजिस्टर में स्थान पा सकेंगे;मुस्लिम मुहल्लों में कबतक छुपकर रहेंगे?

      उन अघोषित घुसपैठियों में से आधे तो पुरानी सरकारों के दौरान नागरिकता पा भी चुके हैं किन्तु बहुतों के पास कोई कागजात नहीं है । असली आक्रोश उनके लिये ही है । उनकी संख्या करोड़ों में है,जबकि CAA का लाभ तो मुट्ठी भर गैर−मुस्लिमों को मिलने जा रहा है । अतः आक्रोश इस बात का है कि उन अवैध करोड़ों का क्या होगा जो न भारत के बन सके और न अब बांग्लादेश या पाकिस्तान के ही रहे । वे शरणार्थी भी नहीं हैं और न ही उत्पीड़ित,वे उन लोगों के अंश हैं जिन्होंने भारत के टुकड़े करके पाकिस्तान ले लिये थे । जिनको पिछली केन्द्र सरकारों अथवा दिल्ली वा बंगाल आदि की राज्य सरकारों ने गलत तरीके से भारतीय होने के कागजात धरा दिये हैं,जैसे कि आधारकार्ड,वोटर कार्ड,राशन कार्ड,आदि,उनको भी भय है कि कहीं उनके इतिहास की छानबीन न होने लगे । ऐसे सात करोड़ घुसपैठिये आक्रोशित हैं और उनके करोड़ों मित्र भी ।

      लंबे समय तक लेफ्ट फ्रंट का गढ़ रहे पश्चिम बंगाल में हर चौथा व्यक्ति मुसलमान है, पर वहां भी जेलों में लगभग आधे कैदी मुसलमान हैं. बंगाल में कभी किसी सांप्रदायिक पार्टी का राज  नहीं रहा. यही नहीं, महाराष्ट्र में हर तीसरा तो उत्तर प्रदेश में हर चौथा कैदी मुसलमान है.

     जम्मू-कश्मीर, पुडुचेरी और सिक्किम के अलावा देश के अमूमन हर सूबे में मुसलमानों की जितनी आबादी है, उससे अधिक अनुपात में मुसलमान जेल में हैं. 

        इस्लामिक स्टेट से भागकर यूरोप में आये शरणार्थियो के उत्पात ने यूरोपीय देशो को बता दिया है कि इस्लाम शान्ति का मजहब है और इस्लाम और अपराध का दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है.
     जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल की उदारवादी आप्रवासी नीति के कारण साल 2015 में जर्मनी में अनुमान से ज्यादा मुस्लिम शरणार्थी आ गए। जिनकी अनुमानित संख्या करीब 11 लाख बतायी जा रही है।
      जर्मनी के कोलोन में 31 दिसंबर 2015 की रात ने जर्मनी में सब कुछ बदल दिया।
      जो जर्मन मुस्लिम शरणार्थियों का स्वागत कर रहे थे, उस रात ने उनके अंदर न सिर्फ शरणार्थियों के प्रति बल्कि पूरे इस्लाम के प्रति नफरतों के बीज बो दिए।
      न सिर्फ जर्मनी बल्कि पूरे विश्व में इस घटना क्रम ने सनसनी फैला दी, जिसके प्रभाव पूरे मुस्लिम समुदाय को निशाने पर ले रहे हैं।

      कोलोन में 31 दिसंबर 2015 की रात जर्मन लड़कियों पर यौन हमले हुए। जांच में सामने आया कि ये हमले करने वाले लोग मुस्लिम शरणार्थी थे। उस रात लगभग 1,200 शिकायतें आईं जिनमें से 500 से ज्यादा यौन हमलों की थीं। इस घटना ने पूरे जर्मनी को दहला दिया जगह जगह से शरणार्थियों के विरोध की आवाजें सुनाई देने लगीं हैं.

आर्य क्षत्रिय परंपरा के अमर बलिदानी वीर गोकुला जाट

आर्य क्षत्रिय परंपरा के अमर बलिदानी वीर गोकुला जाट

” alt=”” aria-hidden=”true” />        आर्य धर्म की महान क्षत्रिय परम्परा को कौन नही जानता, एक ऐसी परम्परा जिसमें समय समय पर अनेकों शूरवीर सामने आये और कभी राष्ट्रभक्ति तो कभी धर्म के लिए अपने प्राण तक दांव पर लगा दिए। इस महान क्षत्रिय परम्परा के शौर्य और वीरता के कारण ही भारत के सामने विश्व थर थर काँपता रहा है और आज भी जो भारत हमारे सामने है उसमे क्षत्रिय परम्परा के शूरवीरों का अहम योगदान माना जाता है। इस परम्परा के अतर्गत पृथ्वीराज चौहान, महाराज शिवाजी, महाराणा प्रताप की शूरवीरता से तो आप सब परिचित ही है। परन्तु इनके अलावा और ऐसे असंख्य महावीर शूरवीर है। जिन्होंने अपने शौर्य और पराक्रम से जन जन को प्रेरित किये रखा। जिनके बारे में हमे पढ़ाया नही गया। एक ऐसे ही एक महान शूरवीर गोकुल सिंह थे। जिसे इतिहासकार ‘गोकुला’ महान के नाम से परिचित करवाते है। गोकुल सिंह अथवा गोकुला सिनसिनी गाँव का सरदार था। हिन्दू क्षत्रिय जाट व औरंगजेब की सेना में 10 मई 1666 को तिलपत में लड़ाई हुई। लड़ाई में हिन्दू क्षत्रियों की विजय हुई। इसके बाद मुगल शासन ने इस्लाम धर्म को बढावा दिया और किसानों पर कर बढ़ा दिया। मगर गोकुला ने किसानों को संगठित किया और कर जमा करने से मना कर दिया। गुस्साये औरंगजेब ने बहुत शक्तिशाली सेना भेजी और गोकुला को बंदी बना लिया गया। 1जनवरी 1670 को आगरा के किले पर जनता को आतंकित करने के लिये टुकडे़-टुकड़े कर मारा गया। गोकुला के बलिदान ने मुगल शासन के खातमें की शुरुआत हुई थी। 

      सन 1666 का समय था जब औरंगजेब के अत्याचारोँ से हिँदू जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। हिँदुओं को दबाने के लिए औरंगजेब ने अब्दुन्नवी नामक एक कट्टर मुसलमान को मथुरा का फौजदार नियुक्त किया। मथुरा के सिनसिनी गाँव के सरदार गोकुल सिंह के आह्वान पर किसानों ने लगान देने से इनकार कर दिया। मुग़ल सैनिकों ने लूटमार से लेकर किसानों के ढोर-डंगर तक खोलने शुरू कर दिए और संघर्ष शुरू हो गया। मई 1669 मेँ धर्मपरायण हिन्दू क्षत्रिय योद्धा गोकुला जाट और उसकी किसान सेना और औरंगजेब की अब्दुन्नवी के नेतृत्व में सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अब्दुन्नवी और उसकी सेना सिहोरा के वीर जाटोँ के सामने टिक ना पाई और सारे गाजर-मूली की तरह काट दिए गए। मुगलोँ की सदाबद छावनी जला दी गई। अब्दुन्नवी की चीखेँ दिल्ली की सल्तनत को भी सुनाई दी थी। मुगलोँ की जलती छावनी के धुँए ने औरंगजेब को अंदर तक हिलाकर रख दिया। औरंगजेब इसलिए भी डर गया था क्योँकि गोकुला की सेना मेँ जाटोँ के साथ गुर्जर, अहीर, ठाकुर, मेव इत्यादि भी थे। इस विजय ने मृतप्राय हिँदू समाज मेँ नए प्राण फूँक दिए। औरंगजेब ने सैफ शिकन खाँ को मथुरा का नया फौजदार नियुक्त किया और उसके साथ रदांदाज खान को गोकुल का सामना करने के लिए भेजा। लेकिन असफल रहने पर औरंगजेब ने महावीर गोकुला को संधि प्रस्ताव भेजा। गोकुला ने औरंगजेब का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया क्योँकि औरंगजेब कोई सत्ता या जागीरदारी के लिए नहीँ बल्कि धर्मरक्षा के लिए लङ रहा था और औरंगजेब के साथ संधि करने के बाद ये कार्य असंभव था। गोकुल ने औरंगजेब का उपहास उड़ाया। अब औरंगजेब दिल्ली से चलकर खुद आया गोकुल से लङने के लिए। औरंगजेब ने मथुरा मेँ अपनी छावनी बनाई और अपने सेनापति हसन अली खान को एक मजबूत एवं विशाल सेना के साथ मुरसान भेजा। ग्रामीण रबी की बुवाई मेँ लगे थे तो हसन अली खाँ ने ने गोकुला की सेना की तीन गढियोँ/गाँवोँ रेवाङा, चंद्ररख और सरकरु पर सुबह के वक्त अचानक धावा बोला। औरंगजेब की शाही तोपोँ के सामने किसान योद्धा अपने मामूली हथियारोँ के सहारे ज्यादा देर तक टिक ना पाए और जाटोँ की पराजय हुई। इस जीत से उत्साहित औरंगजेब ने अब सीधा गोकुला से टकराने का फैसला किया। औरंगजेब के साथ उसके कई फौजदार और उसके गुलाम कुछ हिँदू राजा भी थे। औरंगजेब की तोपोँ, धर्नुधरोँ, हाथियोँ से सुसज्जित विशाल सेना और गोकुला की किसानोँ की 20000 हजार की सेना मेँ तिलपत का भयंकर युद्ध छिङ गया। 4 दिन तक भयंकर युद्ध चलता रहा और गोकुल की छोटी सी अवैतनिक सेना अपने बेढंगे व घरेलू हथियारोँ के बल पर ही अत्याधुनिक हथियारोँ से सुसज्जित और प्रशिक्षित मुगल सेना पर भारी पङ रही थी। इस लङाई मेँ सिर्फ पुरुषोँ ने ही नहीँ बल्कि उनकी क्षत्राणियों ने भी पराक्रम दिखाया था। मनूची नामक यूरोपिय इतिहासकार ने जाटोँ और उनकी चौधरानियोँ के पराक्रम का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “अपनी सुरक्षा के लिए ग्रामीण कंटीले झाडियों में छिप जाते या अपनी कमजोर गढ़ियों में शरण लेते, स्त्रियां भाले और तीर लेकर अपने पतियों के पीछे खड़ी हो जातीं।

       जब पति अपने बंदूक को दाग चुका होता, पत्नी उसके हाथ में भाला थमा देती और स्वयं बंदूक को भरने लगती थी। इस प्रकार वे उस समय तक रक्षा करते थे,जब तक कि वे युद्ध जारी रखने में बिल्कुल असमर्थ नहीं हो जाते थे। जब वे बिल्कुल ही लाचार हो जाते, तो अपनी पत्नियों और पुत्रियों को गरदनें काटने के बाद भूखे शेरों की तरह शत्रु की पंक्तियों पर टूट पड़ते थे और अपनी निश्शंक वीरता के बल पर अनेक बार युद्ध जीतने में सफल होते थे” . मुगल सेना इतने अत्याधुनिक हथियारोँ, तोपखाने और विशाल प्रशिक्षित संख्या बल के बावजूद जाटोँ से पार पाने मेँ असफल हो रही थी। 4 दिन के युद्ध के बाद जब गोकुल की सेना युद्ध जीतती हुई प्रतीत हो रही थी तभी हसन अली खान के नेतृत्व मेँ 1 नई विशाल मुगलिया टुकङी आ गई और इस टुकङी के आते ही गोकुला की सेना हारने लगी। तिलपत की गढी की दीवारेँ भी शाही तोपोँ के वारोँ को और अधिक देर तक सह ना पाई और भरभराकर गिरने लगी। युद्ध मेँ अपनी सेना को हारता देख औरतोँ, बहनोँ और बच्चियोँ ने भी अपने प्राण त्यागने शुरु कर दिए। हजारोँ नारियोँ जौहर की पवित्र अग्नि मेँ खाक हो गई। तिलपत के पत्तन के बाद गोकुला और उनके ताऊ उदय सिँह को 7 हजार साथियोँ सहित बंदी बना लिया गया। इन सभी को आगरा लाया गया। लोहे की बेङियोँ मेँ सभी बंदियोँ को औरंगजेब के सामने पेश किया गया तो औरंगजेब ने कहा ” जान की खैर चाहते हो तो इस्लाम कबूल कर लो और रसूल के बताए रास्ते पर चलो। बोलो क्या इरादा है इस्लाम या मौत? ” अधिसंख्य धर्म-परायण जाटों ने एक सुर में कहा – ” बादशाह, अगर तेरे खुदा और रसूल का का रास्ता वही है जिस पर तू चल रहा है तो हमें तेरे रास्ते पर नहीं चलना। ” गोकुल की बलशाली भुजा पर जल्लाद का बरछा चला तो हजारोँ चीत्कारोँ ने एक साथ आसमान को कोलाहल से कंपा दिया। बरछे से कटकर चबूतरे पर गिरकर फङकती हुई गोकुला की भुजा चीख-चीखकर अपने मेँ समाए हुए असीम पुरुषार्थ और बल की गवाही दे रही थी। लोग जहाँ इस अमानवीयता पर काँप उठे थे वहीँ गोकुला का निडर और ओजपूर्ण चेहरा उनको हिँदुत्व की शक्ति का एहसास दिला रहा था . गोकुला ने एक नजर अपने भुजाविहीन रक्तरंजित कंधे पर डाली और फिर बङे ही घमण्ड के साथ जल्लाद की ओर देखा कि दूसरा वार करो।

      दूसरा बरछा चलते ही वहाँ खङी जनता आंर्तनाद कर उठी और फिर गोकुला के शरीर के एक-एक जोङ काटे गए। गोकुला का सिर जब कटकर धरती माता की गोद मेँ गिरा तो धरती माँ भी खून के आंसू रोने लगी। यही हाल उदय सिँह और बाकी बंदियोँ का भी किया गया। गोकुला वीर के पास न तो बड़े-बड़े दुर्ग थे, न अरावली की पहाड़ियाँ और न ही महाराष्ट्र जैसा विविधतापूर्ण भौगोलिक प्रदेश, इन अलाभकारी स्थितियों के बावजूद, उन्होंने जिस धैर्य और रण-चातुर्य के साथ, एक शक्तिशाली साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति का सामना करके, बराबरी के परिणाम प्राप्त किए, वह सब अभूतपूर्व व अतुलनीय है। भारत के इतिहास में ऐसे युद्ध कम हुए हैं जहाँ कई प्रकार से बाधित और कमजोर पक्ष, इतने शांत निश्चय और अडिग धैर्य के साथ लड़ा हो। वीरवर गोकुलसिंह का युद्ध तीसरे दिन चला। 1जनवरी 1670 को आगरा के किले पर जनता को आतंकित करने के लिये टुकडे़-टुकड़े कर मारा गया। गोकुला के बलिदान ने मुगल शासन के खातमें की शुरुआत की। वीर छत्रसाल, गुरु गोविन्द सिंह, वीर शिवाजी, वीर दुर्गादास जैसे महान पराक्रमी आर्य क्षत्रियों की श्रेणी में शामिल वीर गोकुल का नाम सदा सदा के लिए अमर हो गया।

भीमा कोरेगांव की घटना

भीमा कोरेगांव की घटना

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      पुणे के समीप भीमा कोरेगांव में एक स्मारक बना हुआ है। कहते है कि आज से 200 वर्ष पहले इसी स्थान पर बाजीराव पेशवा द्वितीय की फौज को अंग्रेजों की फौज ने हराया था। महाराष्ट्र में दलित कहलाने वाली महार जाति के सैनिकों ने अंग्रेजों की ओर से युद्ध में भाग लिया था। हम इस लेख में यह विश्लेषण करेंगे कि युद्ध का परिणाम क्या था और कौन इसका राजनीतिक लाभ उठा रहा हैं।

     इतिहास में लड़ी गई अनेक लड़ाईयों के समान ही यह युद्ध भी एक सामान्य युद्ध के रूप में दर्ज किया गया था। डॉ अम्बेडकर ने 1927 में कोरेगांव जाकर 200 वर्ष पहले हुए युद्ध को महार दलितों की ब्राह्मण पेशवा पर जीत के समान चर्चित करने का प्रयास किया था। जबकि यह युद्ध था विदेशी अंग्रेजों और भारतीय पेशवा के मध्य। इसे जातिगत युद्ध के रूप में प्रचलित करना किसी भी प्रकार से सही नहीं कहा जा सकता। अंग्रेजों की सेना में सभी वर्गों के सिपाही थे। उसमें महार रेजिमेंट के सिपाही भी शामिल थे। पेशवा की फौज में भी उसी प्रकार से सभी वर्गों के सिपाही थे। जिसमें अनेक मुस्लिम भी शामिल थे। युद्ध केवल व्यक्तियों के मध्य नहीं लड़ा जाता। युद्ध तो एक विचारधारा का दूसरी विचारधारा से होता है। फिर इस युद्ध को अत्याचारी ब्राह्मणों से पीड़ित महारों के संघर्ष गाथा के रूप में चित्रित करना सरासर गलत हैं। क्यूंकि इस आधार पर तो 1857 की क्रांति को भी आप सिख बनाम ब्राह्मण (मंगल पांडेय जैसे बिहार और उत्तर प्रदेश के सिपाही) के रूप में चित्रित करेंगे।  इस आधार पर तो आप दोनों विश्वयुद्धों को भी अंग्रेजों की विजय नहीं अपितु भारतीयों की विजय कहेंगे। क्यूंकि दोनों विश्वयुद्ध में पैदल चलने वाली टुकड़ियों में भारतीय सैनिक बहुत बड़ी संख्या में शामिल थे।

       इससे यही सिद्ध होता हैं कि यह एक प्रकार से पेशवाओं को ब्राह्मण होने के नाते अत्याचारी और महार को दलित होने के नाते पीड़ित दिखाने का एक असफल प्रयास मात्र था।

      अब हम यह विश्लेषण करेंगे कि वास्तव में कोरेगांव के युद्ध में क्या हुआ था। सत्य यह है कि कोरेगांव के युद्ध में अंग्रेजों को विजय नहीं मिली थी। जेम्स ग्रैंड डफ़ नामक अंग्रेज अधिकारी एवं इतिहासकार लिखते है कि “शाम को अँधेरा होने के बाद जितने भी घायल सैनिक थे उनको लेकर कप्तान स्टैंटन गांव से किसी प्रकार निकले और पूना की ओर चल पड़े। रास्ते में राह बदल कर वो सिरोर की ओर मुड़ गए। अगले दिन सुबह 175 मृत और घायल सैनिकों के साथ वो अपने गंतव्य पहुंचे। अंग्रेजी सेना के एक तिहाई घोड़े या तो मारे जा चुकें थे अथवा लापता थे। “

      क्या आप अंग्रेज इतिहासकार की बात भी नहीं मानेगे जो अपनी कौम को सदा विजयी और श्रेष्ठ बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते? चलों हम मान भी ले कि अंग्रेजों को विजय मिली। तो भी इस युद्ध को हम ‘दलित बनाम ब्राह्मण’ किस आधार पर मानेंगे? कोरेगांव युद्ध में एक भी महार सिपाही का नाम किसी सेना के बड़े पद पर लिखा नहीं मिलता। यह यही दर्शाता है कि महार सैनिक केवल पैदल सेना के सदस्य थे। आपको यह जानकर भी अचरज होगा कि कोरेगांव युद्ध को अंग्रेजों ने कभी अपनी विजय तक नहीं माना। महार सैनिकों ने युद्ध में अंग्रेजों की ओर से भाग लिया। इसका ईनाम उन्हें आगे चल कर कैसे मिला। यह आगे जानेगे।

       बहुत कम लोग इतिहास के इस तथ्य को जानते है कि महार सैनिक मराठा सेना के अभिन्न अंग थे। छत्रपति शिवाजी की सेना में महार बड़ी संख्या में ऊँचें पदों पर कार्यरत थे। शिवांक महार को उनकी वीरता से प्रभावित होकर शिवाजी के पुत्र राजाराम ने एक गांव तक भेंट किया था। शिवांक महार के पोते जिसका नाम भी शिवांक महार था ने 1797 में परशुराम भाऊ की निज़ाम के साथ हुए युद्ध में प्राणरक्षा की थी। नागनक महार ने मराठों के मुसलमानों के साथ हुए युद्ध में विराटगढ़ का किला जीता था जिसके ईनाम स्वरुप उसे सतारा का पाटिल बनाया गया था।  बाजीराव पेशवा प्रथम की फौज में भी अनेक महार सैनिक कार्य करते थे। इससे यही सिद्ध हुआ कि अंग्रेजों की सेना के महार सैनिकों ने पेशवा की सेना के दलित/महार सैनिकों के साथ युद्ध किया था। पेशवा माधवराव ने अपने राज्य में बेगार प्रथा पर 1770 में ही प्रतिबन्ध लगा दिया था। आप सभी जानते है कि बहुत काल तक अंग्रेज हमारे देश के दलितों को बेगार बनाकर उन पर अत्याचार करते रहते थे। एक बार पेशवा के राज्य में किसी विवाद को लेकर ब्राह्मणों ने महारों के विवाह करवाने से मना कर दिया था। इस पर महारों ने पेशवा से ब्राह्मणों की शिकायत की थी। पेशवा ने ब्राह्मणों को महार समाज के विवाह आदि संस्कार करवाने का आदेश दिया था। न मानने वाले ब्राह्मण के लिए दंड और जुर्माने का प्रावधान पेशवा ने रखा था। यह ऐतिहासिक तथ्य आपको किसी पुस्तक में नहीं मिलते।

     1857 के विपल्व में भी 100-200 महार सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया था। 1894 तक आते आते अंग्रेजों ने महार सैनिकों को अपनी सेना में लेना बंद कर दिया था। अंग्रेजों ने महारों को अछूत घोषित कर सेना में लेने से मना कर दिया।  बाबा वलंगकर जो स्वयं महार सैनिक थे ने अंग्रेजों को पत्र लिखकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया था कि महार क्षत्रिय है और शिवाजी के समय से ही क्षत्रिय के रूप में सेना में कार्य करते आये हैं। जबकि अंग्रेज महारों को क्षत्रिय न मानकर अछूत मानते थे।  प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों ने कुछ महारों को सेना में स्थान दिया। मगर युद्ध के पश्चात  फिर से बंद कर दिया। बेरोजगार महारों से बेगार कार्य करवाकर बिना सेवा शुल्क दिए अंग्रेजों के अदने से अदने अफसर उन्हें धमकी देकर भगा देते थे। डॉ अम्बेडकर ने महारों को सरकारी सेना में लेने और महार रेजिमेंट बनाने के लिए अंग्रेजों से नियम बनाने का प्रस्ताव भेजा था। बहुत कम लोग जानते है कि डॉ अम्बेडकर को इस कार्य में हिन्दू महासभा के वीर सावरकर और बैरिस्टर जयकर एवं डॉ मुंजे का साथ मिला था। वीर सावरकर ने तो रत्नागिरी में महार सम्मलेन की अध्यक्षता तक की थी। अंग्रेजों का लक्ष्य तो महारों का विकास करना नहीं अपितु उनका शोषण करना था।आगे 1947 के बाद ही डॉ अम्बेडकर द्वारा स्वतंत्र भारत में महार रेजिमेंट की स्थापना हुई। इससे अंग्रेज महारों के विकास के लिए कितने गंभीर थे। यहपता चलता है।

      अभी तक यह सिद्ध हो चूका है कि न तो पेशवा की कोरेगांव में हार हुई थी।  न ही अंग्रेज कोई महारों के हितैषी न्यायप्रिय शासक थे। न ही पेशवा कोई अत्याचारी शासक थे। अब इस षड़यंत्र को कौन और क्यों बढ़ावा दे रहा हैं?  इस विषय पर चर्चा करेंगे। हमारे देश में एक देशविरोधी गिरोह सक्रिय हैं।  जो कभी जाति के नाम पर, कभी आरक्षण के नाम पर, कभी इतिहास के नाम पर, कभी परम्परा के नाम पर देश को तोड़ने की साज़िश रचता रहता हैं।  इसके अनेक चेहरे हैं। नेता, चिंतक, लेखक, मीडिया, बुद्धिजीवी, पत्रकार, शिक्षक, शोधकर्ता, मानवअधिकार कार्यकर्ता, NGO, सेक्युलर, सामाजिक कार्यकर्ता, वकील आदि आदि।  इस जमात का केवल एक ही कार्य होता है। इस देश की एकता ,अखंडता और सम्प्रभुता को कैसे बर्बाद किया जाये। इस विषय में षड़यंत्र करना।  यह जमात हर देशहित और देश को उन्नत करने वाले विचार का पुरजोर विरोध करती हैं। इस जमात की जड़े बहुत गहरी है। आज़ादी से पहले यह अंगेजों द्वारा पोषित थी। आज यह विदेशी ताकतों और राजनीतिक पार्टियों द्वारा पोषित हैं। संघ विचारक वैद्य जी द्वारा इसका नामकरण ब्रेकिंग इंडिया ब्रिगेड यथार्थ रूप में किया गया है। जो अक्षरत: सत्य है। अब आप देखिये कोरेगांव को लेकर हुए दंगों को मीडिया दलित बनाम हिन्दू के रूप में चित्रित कर रहा हैं।  क्या दलित समाज हिन्दुओं से कोई भिन्न समाज है? दलित समाज तो हिन्दू समाज का अभिन्न अंग हैं। दलितों को हिन्दू समाज से अलग करने के लिए ऐसा दर्शाया जाता हैं। यह कोई आज से नहीं हो रहा। बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा 1924 में कांग्रेस के कोकानाडा सेशन में मुहम्मद अली (अली बंधू) ने मंच पर सार्वजानिक रूप से उस समय वास कर रहे 6 करोड़ दलित हिन्दुओं को आधा-आधा हिन्दुओं और मुसलमानों में विभाजित करने की मांग की थी। महात्मा गाँधी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। जबकि उस काल के सबसे प्रभावशाली समाज सुधारक एवं नेता स्वामी श्रद्धानन्द ने मंच से ही दलित हिन्दुओं को विभाजित करने की उनकी सोच का मुंहतोड़ उत्तर दिया था। स्वामी श्रद्धानन्द ने उद्घोषणा की थी कि हिन्दू समाज जातिवाद रूपी समस्या का निराकरण कर रहा हैं और अपने प्रयासों से दलित हिन्दुओं को उनका अधिकार दिलाकर रहेगा। 1947 के पश्चात जातिवाद को मिटाने के स्थान पर उसे और अधिक बढ़ावा दिया गया। यह बढ़ावा इसी जमात ने दिया। जब दो भाइयों का आपस में विवाद होता है  तो तीसरा पंच बनकर लाभ उठाता है। यह प्रसिद्द लोकोक्ति है। आज भी यही हो रहा है। पहले जातिवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है फिर दलितों को हिन्दुओं से अलग करना के लिए प्रेरित किया जा रहा है।  आप स्वयं बताये आज देश में कहीं कोई दलित गले में मटकी लटकाएं और पीछे झाड़ू बांध कर चलता है। नहीं। क्या कोई दलित मुग़लों की देन मैला ढोहता है? नहीं। आज आपको प्राय: सभी हिन्दू बिना जातिगत भेदभाव के एक साथ बैठ कर शिक्षा ग्रहण करते, भोजन करते, व्यवसाय करते दिखेंगे। बड़े शहरों में तो जातिवाद लगभग समाप्त ही हो चूका है। एक आध अपवाद अगर है भी, तो उसका निराकरण समाज में जातिवाद उनर्मुलन का सन्देश देकर किया जा सकता हैं।  मगर दलित और सवर्ण के रूप में विभाजित कर जातिवाद का कभी निराकरण नहीं हो सकता। यह अटल सत्य है। दलित हिन्दू अगर हिन्दू समाज से अलग होगा तो उसको ये विदेशी ताकतें चने के समान चबा जाएगी। एकता में शक्ति है। यह सर्वकालिक और व्यावहारिक सत्य है। दलित हिन्दुओं को यह समझना होगा कि अपने निहित स्वार्थों के लिए भड़काया जा रहा हैं। जिससे हिन्दू समाज की एकता भंग हो और विदेशी ताकतों को देश को अस्थिर करने का मौका मिल जाये।

      आज हर हिन्दू अगर ईमानदारी से जातिवाद के विरुद्ध संघर्ष करने का दृढ़ संकल्प ले, तो यह देशविरोधी जमात कभी अपने षड़यंत्र में सफल नहीं हो पायेगी। यही समय की मांग है और यही एकमात्र विकल्प भी हैं। अन्यथा भीमा कोरेगांव को लेकर हुई घटनाएं अगर अलग रूप में ऐसे ही सामने आती रहेगी।

How Britain stole $45 trillion from India

How Britain stole $45 trillion from India

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       There is a story that is commonly told in Britain that the colonisation of India – as horrible as it may have been – was not of any major economic benefit to Britain itself. If anything, the administration of India was a cost to Britain. So the fact that the empire was sustained for so long – the story goes – was a gesture of Britain’s benevolence.

      New research by the renowned economist Utsa Patnaik – just published by Columbia University Press – deals a crushing blow to this narrative. Drawing on nearly two centuries of detailed data on tax and trade, Patnaik calculated that Britain drained a total of nearly $45 trillion from India during the period 1765 to 1938.

   It’s a staggering sum. For perspective, $45 trillion is 17 times more than the total annual gross domestic product of the United Kingdom today.

How did this come about

     It happened through the trade system. Prior to the colonial period, Britain bought goods like textiles and rice from Indian producers and paid for them in the normal way – mostly with silver – as they did with any other country. But something changed in 1765, shortly after the East India Company took control of the subcontinent and established a monopoly over Indian trade.

      Here’s how it worked. The East India Company began collecting taxes in India, and then cleverly used a portion of those revenues (about a third) to fund the purchase of Indian goods for British use. In other words, instead of paying for Indian goods out of their own pocket, British traders acquired them for free, “buying” from peasants and weavers using money that had just been taken from them.

      It was a scam – theft on a grand scale. Yet most Indians were unaware of what was going on because the agent who collected the taxes was not the same as the one who showed up to buy their goods. Had it been the same person, they surely would have smelled a rat.

      Some of the stolen goods were consumed in Britain, and the rest were re-exported elsewhere. The re-export system allowed Britain to finance a flow of imports from Europe, including strategic materials like iron, tar and timber, which were essential to Britain’s industrialisation. Indeed, the Industrial Revolution depended in large part on this systematic theft from India.

      On top of this, the British were able to sell the stolen goods to other countries for much more than they “bought” them for in the first place, pocketing not only 100 percent of the original value of the goods but also the markup.

     After the British Raj took over in 1858, colonisers added a special new twist to the tax-and-buy system. As the East India Company’s monopoly broke down, Indian producers were allowed to export their goods directly to other countries. But Britain made sure that the payments for those goods nonetheless ended up in London.

      How did this work? Basically, anyone who wanted to buy goods from India would do so using special Council Bills – a unique paper currency issued only by the British Crown. And the only way to get those bills was to buy them from London with gold or silver. So traders would pay London in gold to get the bills, and then use the bills to pay Indian producers. When Indians cashed the bills in at the local colonial office, they were “paid” in rupees out of tax revenues – money that had just been collected from them. So, once again, they were not in fact paid at all; they were defrauded.

     Meanwhile, London ended up with all of the gold and silver that should have gone directly to the Indians in exchange for their exports.

      This corrupt system meant that even while India was running an impressive trade surplus with the rest of the world – a surplus that lasted for three decades in the early 20th century – it showed up as a deficit in the national accounts because the real income from India’s exports was appropriated in its entirety by Britain.

   Some point to this fictional “deficit” as evidence that India was a liability to Britain. But exactly the opposite is true. Britain intercepted enormous quantities of income that rightly belonged to Indian producers. India was the goose that laid the golden egg. Meanwhile, the “deficit” meant that India had no option but to borrow from Britain to finance its imports. So the entire Indian population was forced into completely unnecessary debt to their colonial overlords, further cementing British control.

     Britain used the windfall from this fraudulent system to fuel the engines of imperial violence – funding the invasion of China in the 1840s and the suppression of the Indian Rebellion in 1857. And this was on top of what the Crown took directly from Indian taxpayers to pay for its wars. As Patnaik points out, “the cost of all Britain’s wars of conquest outside Indian borders were charged always wholly or mainly to Indian revenues.”

      And that’s not all. Britain used this flow of tribute from India to finance the expansion of capitalism in Europe and regions of European settlement, like Canada and Australia. So not only the industrialisation of Britain but also the industrialisation of much of the Western world was facilitated by extraction from the colonies.

     Patnaik identifies four distinct economic periods in colonial India from 1765 to 1938, calculates the extraction for each, and then compounds at a modest rate of interest (about 5 percent, which is lower than the market rate) from the middle of each period to the present. Adding it all up, she finds that the total drain amounts to $44.6 trillion. This figure is conservative, she says, and does not include the debts that Britain imposed on India during the Raj.

      These are eye-watering sums. But the true costs of this drain cannot be calculated. If India had been able to invest its own tax revenues and foreign exchange earnings in development – as Japan did – there’s no telling how history might have turned out differently. India could very well have become an economic powerhouse. Centuries of poverty and suffering could have been prevented.

      All of this is a sobering antidote to the rosy narrative promoted by certain powerful voices in Britain. The conservative historian Niall Ferguson has claimed that British rule helped “develop” India. While he was prime minister, David Cameron asserted that British rule was a net help to India.

     This narrative has found considerable traction in the popular imagination: according to a 2014 YouGov poll, 50 percent of people in Britain believe that colonialism was beneficial to the colonies.

      Yet during the entire 200-year history of British rule in India, there was almost no increase in per capita income. In fact, during the last half of the 19th century – the heyday of British intervention – income in India collapsed by half. The average life expectancy of Indians dropped by a fifth from 1870 to 1920. Tens of millions died needlessly of policy-induced famine.

     Britain didn’t develop India. Quite the contrary – as Patnaik’s work makes clear – India developed Britain.

    What does this require of Britain today? An apology? Absolutely. Reparations? Perhaps – although there is not enough money in all of Britain to cover the sums that Patnaik identifies. In the meantime, we can start by setting the story straight. We need to recognise that Britain retained control of India not out of benevolence but for the sake of plunder and that Britain’s industrial rise didn’t emerge sui generis from the steam engine and strong institutions, as our schoolbooks would have it, but depended on violent theft from other lands and other peoples.

नागरिकता संशोधन बिल 2019

नागरिकता संशोधन बिल 2019

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नागरिकता संशोधन बिल 2019 कुछ तथ्य जिनसे हिन्दू अनजान है।

   1—युगांडा —4 अगस्त, 1972, को युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन ने युगांडा में वर्षों से रह रहे 60000 एशियाइयों (गैर मुस्लिम मुख्यतः हिन्दू) को अचानक देश छोड़ देने का आदेश दे दिया है. उन्हें देश छोड़ने के लिए सिर्फ़ 90 दिन का समय दिया जाता है। ईदी अमीन को अचानक एक सपना आया और उन्होंने युगांडा के एक नगर टोरोरो में सैनिक अधिकारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अल्लाह ने उनसे कहा है कि वो सारे एशियाइयों (गैर मुस्लिम मुख्यतः हिन्दू) को अपने देश से तुरंत निकाल बाहर करें. वास्तव मे यह सलाह उसे लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफ़ी ने दी थी।
हर व्यक्ति को अपने साथ सिर्फ़ 55 पाउंड और 250 किलो सामान ले जाने की इजाज़त थी.
        लोगों के सूटकेस खोल कर देखे जा रहे थे. उनकी हर चीज़ बाहर निकाल कर फेंकी जा रही थी, ताकि वो देख सकें कि उसमें सोना या पैसा तो छिपा कर नहीं रखे गए हैं. एक हिन्दू लड़की गीता की उंगली से अंगूठी नहीं निकली तो सैनिकों ने उसकी अंगुली काट दी।
       लोगों को दुकाने और घर ऐसे ही खुले छोड़ कर आना पड़ा. उन्हें अपना घर का सामान बेचने की इजाज़त नहीं थी. युगांडाई सैनिक उनका वो सामान भी लूटने की फ़िराक में थे, जिन्हें वो अपने साथ बाहर ले जाना चाहते थे। युगांडा से बाहर जाने वाले हर एशियाई को बीच में बने पांच रोड ब्लॉक्स से हो कर जाना पड़ता था. हर रोड ब्लॉक पर उनकी तलाशी होती थी और सैनिकों की पूरी कोशिश होती थी कि उनसे कुछ न कुछ सामान ऐंठ लिया जाए.’

         जॉर्ज इवान स्मिथ अपनी किताब ‘घोस्ट ऑफ़ कंपाला’ में लिखते हैं, ”अमीन ने एशियाइयों की ज़्यादातर दुकानें और होटल अपने सैनिकों को दे दिए. इस तरह के वीडियो मौजूद हैं जिसमें अमीन अपने सैनिक अधिकारियों के साथ चल रहे हैं. उनके साथ हाथ में नोट बुक लिए एक असैनिक अधिकारी भी चल रहा है और अमीन उसे आदेश दे रहे हैं कि फ़लाँ दुकान को फ़लाँ ब्रिगेडियर को दे दिया जाए और फ़लाँ होटल फ़लाँ ब्रिगेडियर को सौंप दिया जाए. ‘इन अधिकारियों को अपना घर तक चलाने की भी तमीज़ नहीं थी. वो मुफ़्त में मिली दुकानों को क्या चला पाते. वो एक जनजातीय प्रथा का पालन करते हुए अपने कुनबे के लोगों को आमंत्रित करते और उनसे कहते कि वो जो चाहें, वो चीज़ यहाँ से ले जा सकते हैं. उनको इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था कि कहाँ से नई चीज़ें ख़रीदी जाएं और इन चीज़ों का क्या दाम वसूला जाए. नतीजा ये हुआ कि कुछ ही दिनों में पूरी अर्थव्यवस्था धरातल पर पहुंच गई.”

           निकाले गए 60000 लोगों में से 29000 लोगों को ब्रिटेन ने शरण दी. केवल वे 11000 लोग भारत आ सके जबकि इनमे से अधिकांश भारतीय गैर मुस्लिम थे। 5000 लोग कनाडा गए । कितने ग बेघर मारे गए उसका कोई रिकार्ड नहीं।
भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने उन हिन्दुओ को भारत लाने की कोई सार्थक कोशिश नहीं की।

    2—1947 मे महात्मा (?) गांधी ने अनशन किया। गांधी की मुख्य 2 मांगें थी। पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिए जाएँ और पाकिस्तान से जान बचा कर आए हिन्दू शरणार्थियों को नवंबर दिसंबर की सर्दी मे पाकिस्तान गए मुस्लिमो के खाली पड़े घरों मे ना घुसने दिया जाए।

       1948 मे पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर से हजारों लोग जान बचा कर भारतीय कश्मीर मे आए। उसमे से 99% से अधिक हिन्दू थे। इनमे भी अधिकांश दलित थे। आज उनकी संख्या 8 लाख है। उन्हे 2019 तक नागरिकता नहीं मिली। इन दलितों के लिए भीम मीम वाले भी चुप थे मायवती भी और कांग्रेस भी। क्योंकि ये वोटबैंक नहीं थे।

         1971 – बांग्लादेश बना – बड़ी संख्या मे बंग्लादेशी हिन्दू जान बचा कर आए। सबसे अधिक लूट, ह्त्या और बलात्कार के पीड़ित ये हिन्दू ही थे। सरकारों की मानसिकता देखिए। 93000 कैदी सैनिकों के लिए तो विशेष भोजन और सुविधाएं परंतु उन शरणार्थी हिंदूओ के लिए कुछ भी नहीं।

       1990 वी पी सिंह प्रधानमंत्री थे। खाड़ी युद्ध हुआ। कुवैत से बड़ी संख्या मे (1.5 लाख लगभग) भारतीय लाए गए जिसमे बड़ी संख्या मे मुस्लिम थे। परंतु अपने ही देश कश्मीर से 3 लाख से अधिक हिन्दू भागा दिए गए। तब हिन्दू का विचार न तो प्र्धानमंत्री को आया ना ग्रहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद को।

     3–विश्व में 52 से अधिक मुस्लिम देश हैं. इसमें से 90% इस्लामिक शासन प्रणाली से चलते हैं.
इनमे परमाणु शक्ति सम्पन्न पाकिस्तान के हालात आज इतने खराब हैं कि गैर मुस्लिम का अस्तित्व ही खतरे में हो गया है. पुरे विश्व के मुल्कों में जितने भी शरणार्थी हैं वहअधिकाँश मुसलमान हैं और काफिरों के देश में काफीरों की दया की रोटी पर जिंदा हैं ! इन शरणार्थियों की संख्या में सिर्फ दो प्रतिशत वह हैं जिन्हें बौद्ध मुल्क मिय्ममार से भगाया गया है शेष खुद मुसलमानों के हाथों मुस्लिम राष्ट्रों से ही फिरकापरस्ती के नाम पर काफिर कह पीट पीट कर भागे जाने पर मजबुर हुए हैं !
शरणार्थी बेहद ग़मगीन है क्योंकि उन्हें काफिरों के मुल्कों में जीने का हर अधिकार तो मिल रहा है पर शरिया क़ानून नहीं दिये जा रहे ! इतने सम्पन्न , हर सुविधा से भरे देशों में सिर्फ एक कमी है की यह लोग अल्लाह को मानने वाले नहीं हैं अब शरणार्थी वहां की सरकारों को समझा रहे हैं की हमें इस्लामिक हुकूक दे दें क्योंकि इस्लाम सलामती का दीन है

   4—यदि भारत में मुस्लिम बहुसंख्यक हो जाएंगे तो ?
कुछ साल पहले NDTV के समाचार वाचक रविश ने कहा था – यदि भारत में मुस्लिम बहुसंख्यक हो जाएंगे तो कौनसी बिजली टूट पड़ेगी. रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में बसाने के लिए मीडिया, कम्युनिस्ट, नास्तिक, मोमिन खूब जोर लगा रहे हैं। जैसे हमारा देश कोई धर्मशाला हो। ये लोग न व्यवाहरिक रूप से सोचते हैं, न इतिहास से सबक लेते है। क्यूंकि इतिहास से सबक सिखने वाला समझदार कहलाता है।
        भारत में मुस्लिम भारी भरकम जनसँख्या में से नाममात्र भी टैक्स नहीं देते। इसमें से भी कश्मीर से टैक्स सम्बंधित आकड़ें चौकाने वाले है। कश्मीर देश को केवल 0.1 प्रतिशत टैक्स देता है। उसे केंद्रीय सरकार के कोटे से सबसे अधिक 10% अनुदान मिलता है। कर्नाटक राज्य 9.56% टैक्स देश को देता है। उसे बदले में केवल केंद्र सरकार से केवल 4.5% अनुदान मिलता है। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या कश्मीर से 16 गुणा अधिक है। फिर भी उसे कश्मीर से कम अनुदान मिलता है। कश्मीर की कुल जनसँख्या से एक प्रतिशत भी टैक्स नहीं देते। कश्मीर के मुसलमान केवल हिन्दुओं को भगाने, सेना पर पत्थरबाजी करने, रोहिंग्या मुसलमानों को बसाने, लव जिहाद करने और आर्मी को आतंकवादियों को पकड़ने से रोकने का काम करते हैं। देश में सबसे अधिक टैक्स देने वाले राज्य जैसे आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, कर्नाटक में कोई भी बस सकता है। मगर कश्मीर में धारा 370 के लगने के कारण कोई भी गैर कश्मीरी भारतीय जमीन तक नहीं खरीद सकता। 2015-16 में कश्मीर राज्य को सबसे अधिक 11,838.96 करोड़ रुपये का अनुदान केंद्र द्वारा दिया गया। जबकि कश्मीर के देश को कर आदि के रूप में सहयोग न के बराबर है।

     5—दुनिया में मुसलमानों की कुल आबादी एक अरब 50 करोड़ से अधिक है। जिनकी अमेरिका में संख्या 60 लाख, एशिया और मध्य पूर्व के देशों और राज्यों में लगभग एक अरब, अफ्रीकी देशों में 40 करोड़ और यूरोप में 4 करोड़ 40 लाख है। इस समय दुनिया की 20 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है। दुनिया में इस समय एक हिंदूके मुकाबले दो मुसलमान हैं। बौद्ध धर्म से भी यही अनुपात है 1 यहूदी व्यक्ति की तुलना में 107 मुसलमान हैं,
         किसी भी इस्लामी देश के विश्वविद्यालय का नाम दुनिया की पांच सौ सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल नहीं है।
जबकि केवल इस्राएल के 6 विश्वविद्यालय दुनिया के शीर्ष 500 सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में शामिल हैं।
       अगर पढ़े लिखे लोगों की दर अनुपात को देखा जाए तो पश्चिमी देशों में 65%पढ़े लिखे लोग हैं। जबकि मुस्लिम देशों में यही अनुपात केवल 35 प्रतिशत है। इसराइल में पढ़े लिखे लोगों की दर अनुपात 95 प्रतिशत से अधिक है। पश्चिमी देशों में 15 देश ऐसे हैं जहां पढ़े लिखे लोगों का दर अनुपात 100 प्रतिशत है जबकि मुसलमानों का कोई भी ऐसा देश नहीं है।

कर्नाटक और तमिलनाडु में सोने के मंदिर तबाह

कर्नाटक और तमिलनाडु में सोने के मंदिर तबाह

” alt=”” aria-hidden=”true” />       तेलंगाना को तबाह करने के बाद अलाउद्दीन खिलजी की बुरी नज़र कर्नाटक और तमिलनाडू पर गई। ये वो इलाके थे, जहाँ दिल्ली पर कब्ज़े के बाद पहली बार इन इस्लामी लुटेरों ने धावे बोले। सन् 1311। एक बार फिर मलिक काफूर को इस लंबी  यात्रा में लुटेरी फौज के नेतृत्व की कमान सौंपी जाती है।

       लगातार लूट में हासिल बेहिसाब दौलत ने दिल्ली के इन बेरहम तुर्क लुटेरों में गजब का जोश भर दिया था। खुद को इस्लाम का झंडाबरदार मानने वालों के लिए यह एक अलग तरह का एडवेंचर था। एक बार फिर दिल्ली से चली फौजें देवगिरि आती हैं, जहाँ राजा रामदेव की मृत्यु हो चुकी थी।

       कर्नाटक में राजा बल्लाल देव तृतीय हैं। इनकी राजधानी है द्वार समुद्र (या घोर समुद्र), जो आज मैसूर के पास होलेबिडु के नाम से मशहूर ऐतिहासिक मंदिरों की शानदार विरासत वाली जगह है। देवगिरि के यादवों की तरह यहाँ भी 300 सालों से स्थापित होयसाला राजाओं की पीढ़ियों से संचित दौलत और राज्य इस हमले के शिकार होते हैं। सबसे पहले जियाउद्दीन बरनी की रिपोर्ट–

       “देवगिरि पहुँचने के बाद मलिक नायब कूच करता हुआ घोर समुद्र की सीमा पर जा पहुँचा। पहले ही हमले में बल्लाल राय इस्लामी हमले में हार गया। घोर समुद्र पर फतह हासिल हुई। 36 हाथी और पूरे खजाने पर कब्जा कर लिया गया। जीत की खबरें दिल्ली भेजी गईं।”

      मुहम्मद कासिम हिंदू शाह फिरिश्ता की ज़िंदगी दक्षिण में ही गुज़री थी। वह सबसे पहले अहमदनगर के निज़ामशाह की नौकरी में था और फिर बीजापुर के इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय के यहाँ रहा। दूर दक्षिण भारत में खिलजी की इस महालूट पर उसका ब्यौरा वहीं से सुनिए–

      “मलिक नायब ने बिलाल देव को बंदी बना लिया। उसके राज्य का विध्वंस कर दिया गया। मंदिरों को तुड़वा डाला है। समस्त जड़ाऊ मूर्तियों पर कब्ज़ा हो चुका है। चूने की एक छोटी मस्जिद बनाई गई, जहाँ से अजान दी गई। अलाउद्दीन के नाम का खुत्बा पढ़ा गया।”

      कर्नाटक के द्वार समुद्र और तमिलनाडु में माबर (प्रसिद्ध पुरातत्वविद् केके मोहम्मद के अनुसार द्वार समुद्र वर्तमान मैसूर के पास होयसला राजाओं की राजधानी आज होलेबिडु है और माबर तमिलनाडु में चेन्नई के आसपास का राज्य था)। मलिक काफूर के इस हमले में पहले द्वार समुद्र को लूटा गया। फिर माबर की तरफ ये लुटेरे झपटे। फरिश्ता ने इस लूट से चौंधियाई दिल्ली की आँखों का ब्यौरा इस प्रकार लिखा-

     “मलिक नायब सारी लूट की दौलत को हाथियों पर लदवाकर माबर पहुँचा। वहाँ के मंदिरों को भी मटियामेट कर दिया गया। इस इलाके से लूटमार के बाद वह दिल्ली पहुँचा। 312 हाथी, 20,000 घोड़े, 96 मन सोना, जो करीब 10 करोड़ तनकों के बराबर था, सोने और मोती से भरे अनगिनत संदूक सीरी के हजार सुतून के महल में सुलतान के सामने पेश किए गए।

      लूट की यह दौलत देखकर वह बहुत खुश हुआ। उसने अपने अमीरों को दस-दस और पाँच-पाँच मन सोना दिया। आलिमों और सूफियों को भी उनकी श्रेणी के अनुसार एक-एक और आधा-आधा मन सोना दिया। बचे हुए सोने की मोहरे ढलवाई गईं।”

     गौरतलब बात यह है कि तेलगांना के बाद दक्षिण की इस दूसरी महालूट के सामान में चांदी का जिक्र तक कहीं नहीं है। सिर्फ सोना या कीमती जवाहरात और उनसे भरे संदूकों की ही खटपट दिल्ली में सुनाई दे रही है। चर्चा भी हिंदुस्तान के इस सबसे मालामाल इलाके की है, जिसकी मिल्कियत की एक झलक इन दो लूटों में खिलजी के कारण मिली।

      इससे दिल्ली में दक्षिण की समृद्धि को लेकर छवि यह बनी कि उस इलाके में चांदी की कोई हैसियत ही नहीं है। लोग सोने का ही इस्तेमाल करते हैं। वहाँ के फकीर भी चांदी के आभूषण पहनने में अपनी बेइज्ज़ती समझते हैं। लाेग अधिकतर सोने के ही बर्तनों में भोजन करते हैं। अब हमें बरनी माबर के बारे में बता रहा है और वहाँ भी सोने के चमचमाते मंदिर देखे गए हैं–

     “माबर के सोने के मंदिर तोड़ दिए गए हैं। सोने की मूर्तियाँ, जिन्हें बरसों से वहाँ के हिंदू अपने देवी-देवता मानते थे, तुड़वा डाली गई हैं। मंदिर की सारी धन-संपदा, जड़ाऊ सोने की मूर्तियाें के टुकड़े बहुत बड़ी संख्या में खजाने में दाखिल कराए गए हैं। माबर दो रायों के मातहत है। दोनों रायों के सारे हाथी और खजाने कब्ज़े में आ चुके हैं। माबर पर फतह की खुश-खबर भी दिल्ली भेज दी गई है।“

     जब दक्षिण के दो राज्यों को लूटकर मलिक काफूर की फौजें दिल्ली लौटकर आती हैं तो दिल्ली शहर में चर्चा का विषय यही था कि दक्षिण से कितना माल मिला? बरनी ने आम लोगों की राय भी जुटाई है। वह बता रहा है-

     “देहली के सभी तजुर्बेकार उम्रदराज लोग इस बात से राजी हुए कि इतना और इस प्रकार की लूट का सामान, इतने हाथी और सोना माबर और घोर समुद्र पर हमले के बाद हासिल हुआ है कि इससे पहले किसी कालखंड में इतना माल दिल्ली नहीं आया था। न तो ऐसा किसी की याददाश्त में है और न ही किसी दस्तावेज में ऐसा दर्ज है कि इतना सोना और इतने हाथी दिल्ली आए हों।”

     खिलजी का सितारा किस कदर बुलंद था! जब लूट की दौलत दिल्ली वालों की चर्चा का खास विषय थी तभी एक ही साल पहले लूटकर कब्जाए गए तेलंगाना से राजा रुद्रदेव की ओर से 20 हाथी और तय धन-संपत्ति की पहली खेप दिल्ली पहुँचती है। 13वीं सदी में बरनी के अलावा एसामी की आँखों से भी दक्षिण की यह लूट बची नहीं है। उसने लूट के माल के साथ आई खबरों को दर्ज किया है। वह लिख रहा है-

    “माबर में हिंदुओं का एक प्रसिद्ध मंदिर था, जो विशुद्ध सोने से बना हुआ था। उसमें मोती, लाल और जवाहरात जड़े हुए थे। मलिक नायब को हुक्म था कि वह सबसे पहले मंदिर का सोना प्राप्त कर ले। उसके बाद ही इलाके की धन-संपदा पर कब्ज़ा करे।

     40 दिन के भीतर देवगिरि पार करके बल्लाल की सीमा पर पहुँच गया। बल्लाल को खबर मिली तो वह हाथी, घोड़े और संपत्ति भेजकर समझौते पर राजी हो गया। एक हफ्ते में ही मलिक नायब ने बल्लाल से ही माबर का रास्ता बताने को कहा, जिसे बल्लाल ने स्वीकार कर लिया। छह महीने बाद वे दिल्ली पहुँचे। बल्लाल को भी मलिक नायब अपने साथ ले आया था। उसे इज्ज़त दी गई। 10 लाख तनके देकर उसे उसके राज्य की ओर लौटा दिया गया।”

      पहली, हमने देखा कि अलाउद्दीन खिलजी ने विदिशा पर हमला किया और विदिशा वालों ने उसे देवगिरि का पता बताया। देवगिरि पर हमले और लूट के बाद राजा रामदेव के कंधे पर सवार होकर वह तेलंगाना को लूटता है। तेलंगाना के बाद कर्नाटक में द्वार समुद्र को लूटा जाता है और यहाँ के बल्लाल देव की मदद माबर को लूटने में ली जाती है।

     तेलंगाना में रुद्र देव और कर्नाटक में बल्लाल देव देवगिरि के रामदेव के समकालीन हैं और इनकी सीमाएँ एक-दूसरे से सटी भी थीं। 1296 में जब देवगिरि पहली बार लुटा तब वारंगल और द्वार समुद्र या माबर तक भी खिलजी के खौफनाक हमले की खबरें पहुँची ही होंगी। मुमकिन है अपनी सीमाओं को लेकर आपस में लड़ते रहने वाले दोनों पड़ोसी संपन्न हिंदू राज्यों ने देवगिरि की बरबादी पर राहत की साँस ली होगी। शायद वे नहीं जानते थे कि अगले सिर्फ छह सालों के भीतर उनकी भी वही दशा होने वाली थी! मौत ने घर देख लिया था।

     दूसरी अहम बात, लूट के माल से दिल्ली के सूफियों को भी आधा-आधा और एक-एक मन सोने की खैरात बांटी जा रही है। हम देख चुके हैं कि निजामुद्दीन औलिया उस समय दिल्ली में सबसे इज्जतदार सूफी शख्स थे। उन्हें अच्छी तरह से यह पता था कि सोने की यह खैरात आ कहाँ से रही है।

     लेकिन वे सूफी हिंदू राज्यों की इस लूट के हिस्से को खुशी से हासिल कर रहे थे और सुलतान को अगली फतहों की दुआएँ दे रहे थे कि इस्लामी फौजें इसी तरह कामयाबी हासिल करती रहें। सूफियों का यह सच भी आइने की तरह साफ है कि उनके पास किसी इंसानियत का कोई पैगाम नहीं था।

     वे उसी इस्लाम के पैरोकार थे, जिसे हाथों में तलवार थमाकर दिल्ली से चारों तरफ लूटमार के लिए खुला छोड़ दिया गया था। क्या किसी भी धर्म के भिक्षु, आचार्य, मुनि, महर्षि कभी ऐसा सोच भी सकते हैं-कब्जा, लूटमार, कत्ले-आम, खूनखराबा? ये किस ढंग के रूहानी लोग थे? इनकी रूह किसके लिए धड़क रही थी? ये रूह कैसी थी? विचित्र है!

      खिलजी के खूनी कारनामे इतने हैं कि सुलतान बनने के बाद बीता एक भी साल ऐसा नहीं है, जब किसी न किसी इलाके में लूटमार न हुई हो और हज़ारों की तादाद में कत्ल न हुए हों। द्वार समुद्र और माबर की इस लूट से जुड़ा ऐसा ही एक प्रसंग है।

     मलिक नायब की इस लुटेरी फौज के कुछ महत्वपूर्ण नाम फिरिश्ता की डायरी में मिले हैं। ये हैं-बहराम कबरा, कुतला निहंग, महमूद सरबत्ता और अबाजी मुगल। ये पाँच आदमी इस नाते खास थे कि हर दिन इनमें से एक सरदार लुटेरी फौज के आगे-आगे जाया करता था ताकि आगे के इलाकों की खबर जुटाई जा सके। सूचना संकलन!

      एक दिन अबाजी के दिमाग में आया कि क्यों न वह माबर के राय के पास ही चला जाए और तुर्कों की इस हमलावर सेना की जानकारी उन्हें दे दी जाए। उसने अपने किसी ज्यादा फायदे के लालच में ऐसा सोचा। वह एक दिन निकल गया। लेकिन बदकिस्मती से हिंदुओं की एक सेना से उसका मुकाबला हो गया। उसके साथ का कोई दुभाषिया इस टक्कर में मारा गया। अबाजी के साथ की टुकड़ी हार गई।

      तीसरे दिन वह मलिक नायब के पास लौटा। उस मुगल को बंदी बना लिया गया। अब उसके बंदी हालत में ही मलिक नायब ने द्वार समुद्र की ओर से माबर का रुख किया। जब इस बंदी मुगल और दोनों राज्यों की लूट का माल दिल्ली पहुँचा तो फरिश्ता बता रहा है-

     “अलाउद्दीन खिलजी ने अबाजी को मारने का हुक्म दिया। उस समय देहली में 10,000 से ज्यादा मुगल थे। वे लोग खुद को बहुत ताकतवर बनाने के लिए हर समय साजिश किया करते थे। सुलतान ने हर जगह के मुक्तों को हुक्म जारी किया कि एक दिन निश्चित समय पर इन मुगलों का कत्ल कर डालें।”

      दूर दक्षिण की इस दूसरी लूट का आखिरी अहम ब्यौरा लेने हम एक बार फिर दिल्ली में अमीर खुसरो के पास चलते हैं। हम पहले ही देख चुके हैं कि शेख निज़ामुद्दीन औलिया का यह खास चेला कितनी बारीकी से तारीखवार चीजों को दर्ज करता है। ऐसा हमारे किसी गाइड ने नहीं किया है।

     माबर पर हमले के लिए दिल्ली से फौजों की रवानगी की तारीख उसने 10 नवंबर 1310 लिखी है। 3 फरवरी 1311 को वे देवगिरि पहुँचते हैं। देवगिरि से ढेर सारी मदद और रसद लेकर चार दिन में ही ये फौजें द्वार समुद्र का रुख करती हैं। 25 फरवरी 1311 को द्वार समुद्र घेर लिया गया। 10 मार्च 1311 को इस पूरे इलाके को लूटने के बाद वे माबर की तरफ कूच करते हैं।

     पूरा मार्च और अप्रैल यहाँ चारों तरफ लूटमार और अफरातफरी के हैं। 24 अप्रैल 1311 को लूट में हासिल सारे हाथी और खजाने के संदूक दिल्ली रवाना किए जाते हैं। 18 अक्टूबर 1311 को दिल्ली में सुलतान के सामने दरबार के जश्न भरे माहौल में लूट के माल की नुमाइश होती है।

     पूरा एक साल तक खिलजी की फौजें दिल्ली से देवगिरि, देवगिरि से द्वार समुद्र, द्वार समुद्र से माबर और माबर से फिर दिल्ली कूच करती हैं। इस तरह आज के हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडू होकर फिर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान और हरियाणा होकर दिल्ली लौटती हैं।

     आप कल्पना कीजिए। हज़ारों की संख्या में लुटेरे-हमलावर लगातार एक साल तक इतने बड़े इलाके से गुजरे होंगे। मकसद एक ही था- हर जगह लूटमार, मारकाट। अमीर खुसरो द्वार समुद्र और माबर की इस लूट से बहुत खुश नज़र आ रहा है। वह बड़ी-बड़ी उपमाएँ देते हुए लिखता है–

    “यदि हाथियों की पीठ पर वज़न न होता तो वे सुलतान के दरबार की रौनक देखकर भाग ही जाते। दक्षिण पर हमले में शामिल सरदार अपने मलिकों के साथ पेश हुए। बिस्मिल्लाह की आवाज इतनी ऊँची सुनाई दी कि लगा कि अल्लाह की मेहरबानी आसमान से उतरने ही वाली है। सबसे बाद में लूट का माल नुमाइश के लिए लाया गया। हाथी और जवाहरात पेश किए गए। अलाउद्दीन खिलजी ने अल्लाह का शुक्रिया अदा किया!”

गुरु गोविन्द सिंह और जफरनामा का सच 

गुरु गोविन्द सिंह और जफरनामा का सच 

” alt=”” aria-hidden=”true” />      गुरु गोविन्द सिंह जी एक महान योद्धा होने के साथ साथ महान विद्वान् भी थे. वह ब्रज भाषा, पंजाबी, संस्कृत और फारसी भी जानते थे. और इन सभी भाषाओँ में कविता भी लिख सकते थे. जब औरंगजेब के अत्याचार सीमा से बढ़ गए तो गुरूजी ने मार्च 1705 को एक पत्र भाई दयाल सिंह के हाथों औरंगजेब को भेजा. इसमे उसे सुधरने की नसीहत दी गयी थी. यह पत्र फारसी भाषा के छंद शेरों के रूप में लिखा गया है. इसमे कुल 134 शेर हैं. इस पत्र को “ज़फरनामा “कहा जाता है.

     यद्यपि यह पत्र औरंगजेब के लिए था. लेकिन इसमे जो उपदेश दिए गए है वह आज हमारे लिए अत्यंत उपयोगी हैं . इसमे औरंगजेब के आलावा मु सल मानों के बारे में जो लिखा गया है, वह हमारी आँखें खोलने के लिए काफी हैं. इसीलिए ज़फरनामा को धार्मिक ग्रन्थ के रूप में स्वीकार करते हुए दशम ग्रन्थ में शामिल किया गया है.

जफरनामासे विषयानुसार कुछ अंश प्रस्तुत किये जा रहे हैं. ताकि लोगों को इस्लाम की हकीकत पता चल सके —

       1 – शस्त्रधारी ईश्वर की वंदना —

बनामे खुदावंद तेगो तबर, खुदावंद तीरों सिनानो सिपर.

खुदावंद मर्दाने जंग आजमा, ख़ुदावंदे अस्पाने पा दर हवा. 2 -3.

    उस ईश्वर की वंदना करता हूँ, जो तलवार, छुरा, बाण, बरछा और ढाल का स्वामी है. और जो युद्ध में प्रवीण वीर पुरुषों का स्वामी है. जिनके पास पवन वेग से दौड़ने वाले घोड़े हैं.

      2 – औरंगजेब के कुकर्म —

तो खाके पिदर रा बकिरादारे जिश्त, खूने बिरादर बिदादी सिरिश्त.

वजा खानए खाम करदी बिना, बराए दरे दौलते खेश रा.

      तूने अपने बाप की मिट्टी को अपने भाइयों के खून से गूँधा, और उस खून से सनी मिटटी से अपने राज्य की नींव रखी. और अपना आलीशान महल तैयार किया.

      3 – अल्लाह के नाम पर छल —

न दीगर गिरायम बनामे खुदात, कि दीदम खुदाओ व् कलामे खुदात.

ब सौगंदे तो एतबारे न मांद, मिरा जुज ब शमशीर कारे न मांद.

        तेरे खु-दा के नाम पर मैं धोखा नहीं खाऊंगा, क्योंकि तेरा खु-दा और उसका कलाम झूठे हैं. मुझे उनपर यकीन नहीं है . इसलिए सिवा तलवार के प्रयोग से कोई उपाय नहीं रहा.

      4 – छोटे बच्चों की हत्या —

चि शुद शिगाले ब मकरो रिया, हमीं कुश्त दो बच्चये शेर रा.

चिहा शुद कि चूँ बच्च गां कुश्त चार, कि बाकी बिमादंद पेचीदा मार.

        यदि सियार शेर के बच्चों को अकेला पाकर धोखे से मार डाले तो क्या हुआ. अभी बदला लेने वाला उसका पिता कुंडली मारे विषधर की तरह बाकी है. जो तुझ से पूरा बदला चुका लेगा.

     5 – मु-सलमानों पर विश्वास नहीं —

मरा एतबारे बरीं हल्फ नेस्त, कि एजद गवाहस्तो यजदां यकेस्त.

न कतरा मरा एतबारे बरूस्त, कि बख्शी ओ दीवां हम कज्ब गोस्त.

कसे कोले कुरआं कुनद ऐतबार, हमा रोजे आखिर शवद खारो जार.

अगर सद ब कुरआं बिखुर्दी कसम, मारा एतबारे न यक जर्रे दम.

        मुझे इस बात पर यकीन नहीं कि तेरा खुदा एक है. तेरी किताब (कु-रान) और उसका लाने वाला सभी झूठे हैं. जो भी कु-रान पर विश्वास करेगा, वह आखिर में दुखी और अपमानित होगा. अगर कोई कुरान कि सौ बार भी कसम खाए, तो उस पर यकीन नहीं करना चाहिए.

      6 – दुष्टों का अंजाम —

 कुजा शाह इस्कंदर ओ शेरशाह, कि यक हम न मांदस्त जिन्दा बजाह.

कुजा शाह तैमूर ओ बाबर कुजास्त, हुमायूं कुजस्त शाह अकबर कुजास्त.

         सिकंदर कहाँ है, और शेरशाह कहाँ है, सब जिन्दा नहीं रहे. कोई भी अमर नहीं हैं, तैमूर, बाबर, हुमायूँ और अकबर कहाँ गए. सब का एकसा अंजाम हुआ.

      7 – गुरूजी की प्रतिज्ञा —

कि हरगिज अजां चार दीवार शूम, निशानी न मानद बरीं पाक बूम.

चूं शेरे जियां जिन्दा मानद हमें, जी तो इन्ताकामे सीतानद हमें.

चूँ कार अज हमां हीलते दर गुजश्त, हलालस्त बुर्दन ब शमशीर दस्त.

        हम तेरे शासन की दीवारों की नींव इस पवित्र देश से उखाड़ देंगे. मेरे शेर जब तक जिन्दा रहेंगे, बदला लेते रहेंगे. जब हरेक उपाय निष्फल हो जाएँ तो हाथों में तलवार उठाना ही धर्म है.

        8 – ईश्वर सत्य के साथ है —

इके यार बाशद चि दुश्मन कुनद, अगर दुश्मनी रा बसद तन कुनद.

उदू दुश्मनी गर हजार आवरद, न यक मूए ऊरा न जरा आवरद.

       यदि ईश्वर मित्र हो, तो दुश्मन क्या क़र सकेगा, चाहे वह सौ शरीर धारण क़र ले. यदि हजारों शत्रु हों, तो भी वह बल बांका नहीं क़र सकते है. सदा ही धर्म की विजय होती है.

       गुरु गोविन्द सिंह ने अपनी इसी प्रकार की ओजस्वी वाणियों से लोगों को इतना निर्भय और महान योद्धा बना दिया कि अब भी शांतिप्रिय — सिखों से उलझाने से कतराते हैं. वह जानते हैं कि सिख अपना बदला लिए बिना नहीं रह सकते . इसलिए उनसे दूर ही रहो.

      इस लेख का एकमात्र उद्देश्य है कि आप लोग गुरु गोविन्द साहिब कि वाणी को आदर पूर्वक पढ़ें, और श्री गुरु तेगबहादुर और गुरु गोविन्द सिंह जी के बच्चों के महान बलिदानों को हमेशा स्मरण रखें. और उनको अपना आदर्श मनाकर देश धर्म की रक्षा के लिए कटिबद्ध हो जाएँ. वर्ना यह सेकुलर और जिहा दी एक दिन हिन्दुओं को विलुप्त प्राणी बनाकर मानेंगे.

संसद में वितंडा क्यों 

संसद में वितंडा क्यों 
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       नागरिकता संशोधन बिल-2019 में हिन्दू शरणार्थी की भांति संत्रस्त शियाओं को भी भारतीय नागरिकता देने की माँग आल इंडिया शिया पर्सनल ला बोर्ड ने उठाई है| लखनऊ में कल (रविवार 8 दिसंबर 2019) संपन्न हुए अपने राष्ट्रीय उलेमा सम्मेलन में माँग की कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान आदि इस्लामी गणराज्यों में मजहबी कट्टरता के शिकार हुए अकीदतमंदों को उदारता से भारत में पनाह दी जाये| इनमें हैं सिख, जैन, पारसी, बौद्ध , इसाई आदि| शरणागत की आदर्श परिपाटी भारत में युगों पुरानी है| रणथम्भौर के हमीरदेव तो सभी को याद हैं| खिलजी से भिड़े पर मंगोल शरणार्थी को संरक्षण दिया| चीनी तानाशाही के शिकार  दलाई लामा का भी उदाहरण गत सदी का है|

      गौरतलब है कि आज लोकसभा में शिवसेना ने भाजपा के बिल के पक्ष में वोट दिया| मुंबई में उसके सरकारी साथीजन (कांग्रेस और पवार कांग्रेस) ने बिल का विरोध किया| अचरज तो तब हुआ कि भारत को धर्म के नाम पर विभाजित करनेवाले जवाहरलाल नेहरू की पार्टी वाले अब इस्लामी उग्रता से त्रस्त हिन्दू शरणार्थियों को राहत देने का विरोध कर रहे हैं| वे नजरंदाज करते हैं कि गैरमुस्लिम जन पाकिस्तान छोड़कर अन्यत्र कहाँ त्राणस्थल पायेंगे? सिवाय भारत के?

      दिल्ली विधान सभा की घटना याद कर लें| तब जनता दल के विधायक मोहम्मद शोएब ने विधान सभा में ऐलानिया तौर पर कहा था, “हम मुसलमान तो किसी भी इस्लामी मुल्क (कुल 51 हैं) में बस जायेंगे| तुम हिंदू लोग भारत से निकाले गये तो नेपाल के आलावा कहाँ ठौर पाओगे ?” मगर अब तो परिस्थितियाँ इतनी दुरूह हो गई हैं कि नेपाल भी कम्युनिस्ट प्रभावित भारत-विरोधी राष्ट्र हो गया है| 

      आये दिन खबर आती रहती है कि ईशनिंदा वाले नृशंस कानून के तहत पाकिस्तान में इसाई जन की सरे आम लिंचिंग होती है| नमाज अता करते हुए शियाओं की मस्जिद पर बम फोड़ा जाता है| हिन्दुओं की युवतियों का अपहरण और बलात मतान्तरण कराया जाता है | ऐसी विपत्तियों का इस्लामी गणराज्य में सामना कैसे हो ? उधर पूर्वोत्तर में आशंका बलवती हुई है कि बंगलादेशी हिन्दू आ गये तो आर्थिक तंगी बढ़ सकती है| तो इसका समाधान सरकार खोजे|  यूं 1971 में इंदिरा गाँधी ने जनरल टिक्का खां के सताये सारे पूर्वी पाकिस्तानियों  (बांग्लादेशियों) को भारतीय नागरिकता प्रदान कर दी थी| आबादी का बोझ बढ़ा दिया था|  तो प्रश्न उठता है कि गम्भीर स्थिति उपजने पर शेष सताये गये गैरमुस्लिम लोगों को राहत क्यों न मिले?

       पहलू यहाँ मानवीय है| ये गंगाजमुनी जन गत वर्षों में बर्मा से विस्थापित हजारों रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में बसाने के लिए हिंसक हो उठे थे| लखनऊ में मुसलमानों का हुजूम भाला, बर्छी, बल्लम, छूरी आदि से लैस हजरतगंज तक आ गया था| मगर उन्हें (बांग्लादेश से आये) हिन्दू शरणार्थियों के लिए तनिक भी हमदर्दी कभी थी ही नहीं!

       इतिहास साक्षी है कि मजहब को सियासत में घालमेल कर मोहम्मद अली जिन्नाह ने भारत तोड़ा| अब जिन्ना कि स्टाइल में शेष भारत फिर न टूटे-कटे| यूं ही चंद खुदगर्ज मुसलमानों के कारण देश बंटा| फिर लम्हों की गलती नहीं होने पाये| ताकि सदियों को सजा न मिले| तो इतना वितंडा क्यों ? सामान्य ज्ञान की बात है| क्या कोई मुसलमान दारुल इस्लाम छोड़कर दारुल हर्ब (शत्रु राष्ट्र) में बसना चाहेगा? कानूनन अंतर करना पड़ेगा घुसपैठियों और शरणार्थी में| नागरिकों में और वोट बैंक में|

 ईश्वर की सत्ता

 ईश्वर की सत्ता

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        वेद ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखते हैं और आस्तिकता के प्रचारक हैं। वेद नास्तिकता के विरोधी हैं। परन्तु संसार में कुछ व्यक्ति हैं जो ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करते। वेद ऐसे लोगों की बुद्धि पर आश्चर्य प्रकट करता है और उनकी भर्त्सना करता है।

न तं विदाथ य इमा जजानाऽन्यद्युष्माकमन्तरं बभूव ।
नीहारेण प्रावृता जल्प्या चाऽसुतृप उक्थशासश्चयन्ति ।।.

      भावार्थ― तुम उसको नहीं जानते जो इन सबको उत्पन्न करता है। तुम्हारा अन्तर्यामी तुमसे भिन्न है। किन्तु मनुष्य अज्ञान से ढके हुए होने के कारण वृथा जल्प करते हैं और बकवादी प्राण-मात्र की तृप्ति में लगे रहते हैं।

      अब हम तर्क और सृष्टि-क्रम में आधार पर ईश्वर की सत्ता को सिद्ध करने का प्रयत्न करेंगे।

     संसार और संसार के जितने पदार्थ हैं, वे परमाणुओं के संयोग से बने हैं, इस तथ्य को नास्तिक भी स्वीकार करता है। ये परमाणु संयुक्त कैसे हुए? नास्तिक कहता है कि ये परमाणु अपने-आप संयुक्त हुए। नास्तिक की यह धारणा मिथ्या है। परमाणुओं का संयोग अपने-आप नहीं हो सकता। संयोग करने वाली इस शक्ति का नाम परमात्मा है। जैसे सृष्टि और सृष्टि के पदार्थों के निर्माण के लिए परमाणुओं का संयोग होता है, वैसे ही वियोग भी होता है। परमाणुओं का यह वियोग अपने-आप नहीं होता। इन परमाणुओं के वियोग करने वाला भी परमात्मा ही है। जड़ और बुद्धिशून्य परमाणुओं में अपने-आप संयोग कैसे हो हो सकता है? इन जड़ परमाणुओं में इतना विवेक कैसे उत्पन्न हुआ कि उन्होंने अपने-आप को विभिन्न पदार्थों में परिवर्तित कर लिया?

       यदि यह कहा जाए कि प्रकृति के नियमों एवं सिद्धान्तों से ही संसार की रचना हो जाती है, तो प्रश्न यह है कि जड़ प्रकृति में नियम और सिद्धान्त किसने लागू किए? नियमों के पीछे कोई-न-कोई नियामक होता है। इन नियमों और सिद्धान्तों के स्थापित करने वाली सत्ता का नाम परमेश्वर है।

     संसार की वस्तुएँ एक-दूसरे की पूरक हैं। उदाहरणार्थ―हम दूषित वायु छोड़ते हैं, वह पौधों और वृक्षों के काम आती है; और पौधे एवं वृक्ष जिस वायु को छोड़ते हैं वह मनुष्यों के काम आती है। इस प्रक्रिया के कारण संसार नरक होने से बच जाता है। किसने वस्तुओं का यह पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित किया है? वस्तुओं के पारस्परिक सम्बन्ध को स्थापित करने वाली शक्ति का नाम ईश्वर है।

     विज्ञान और आस्तिकता में कोई विरोध नहीं। विज्ञान जिन नियमों की खोज करता है, उन नियमों को स्थापित करने वाली ज्ञानवान् सत्ता का नाम ही तो ईश्वर है। यदि विकास के कारण ही सृष्टि-रचना को माना जाए तो विकास का कारण कौन है? डार्विन के पितृ-नियम, अर्थात् एक वस्तु से उसी के समान वस्तु का उत्पन्न होना, परिवर्तन का नियम अर्थात् उपयोग तथा अनुपयोग के कारण वस्तुओं में परिवर्तन, अधिक उत्पत्ति का नियम और योग्यतम की विजय―यदि इन चारों नियमों को भी सत्य माना जाए तो प्रश्न यह है कि नियमों को स्थापित करने वाला कौन है?

     वैज्ञानिक, धातुओं का आविष्कार तो करता है, परन्तु उनका निर्माण नहीं करता। उनका निर्माण करने वाली कोई और शक्ति है जिसे परमात्मा कहते हैं। इसी प्रकार वैज्ञानिक, सृष्टि में विद्यमान नियमों की खोज करता है; वह नियमों का निर्माता नहीं है। इन नियमों का निर्माता एवं स्थापितकर्त्ता परमात्मा है।

    संसार में सोना, चाँदी, लोहा, सीसा, कांस्य, पीतल आदि अनेक धातुएँ पाई जाती हैं। हीरे, मोती, जवाहर आदि अनेक बहुमूल्य रत्न पाए जाते हैं। ये सब ईश्वर के द्वारा बनाए गए हैं; किसी मनुष्य के द्वारा नहीं बनाए गए।

    इस ब्रह्माण्ड की असीम वायु, अनन्त जल, पृथिवी, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र―ये सब किसी महान् सत्ता का परिचय दे रहे हैं। आस्तिक इसी महान् सत्ता को ईश्वर के नाम से पुकारता है।

    फल-फूल, वनस्पतियों और ओषधियों के संसार को देखकर भी मनुष्य को बहुत आश्चर्य होता है। गुलाब के पौधे वा नीम की पत्तियाँ देखने में कितनी सुन्दर लगती हैं। उनके किनारे बिना मशीन के एक-जैसे कटे होते हैं। गुलाब के फूल में सुन्दर रंग, मधुर मोहक सुगन्ध और उसके अन्दर इत्र का प्रवेश―ये किसी बुद्धिमान् कारीगर की कारीगरी को दिखा रहे हैं। अनार की अद्भुत रचना देखिए। ऊपर कठोर छिलका, छिलके के अन्दर झिल्ली, झिल्ली के अन्दर दानों का एक निश्चित क्रम में फँसा होना, दानों में सुमधुर रस का भरा होना, उन रसभरे दानों में छोटी-सी गुठली और गुठली में सम्पूर्ण वृक्ष को उत्पन्न करने की शक्ति। वट का विशाल वृक्ष और सरसों के बीज में एक विशाल वृक्ष का समाविष्ट होना, ये सब उस अद्भुत रचयिता को सिद्ध करते हैं।

    चींटी से लेकर हाथी तक जीव-जन्तुओं की शरीर-रचना, वन्य-जन्तुओं के आकार और विभिन्न पक्षियों और कीट-पतंगों की रचना―ये सब किसके कारण है? क्या जड़ प्रकृति में इतनी सूझ-बूझ है कि वह विभिन्न आकृतियों का सृजन कर दे? ये विभिन्न शरीर-रचनाएँ परमपिता परमात्मा की ओर संकेत कर रही हैं।

    इस समय धरती पर पाँच अरब व्यक्ति निवास करते हैं। सृष्टि के रचयिता की अद्भुत कारीगरी देखिए कि एक व्यक्ति की आकृति दूसरे व्यक्ति से नहीं मिलती।

     इस संसार की विशालता भी आश्चर्यकारी है। ऐसा कहते हैं कि पृथिवी की परिधि २५ हजार मील है। पाँच अथवा छ: फुट लम्बे शरीरवाले मनुष्य के लिए यह परिधि आश्चर्यजनक है। पर्वत की विशालता भी कुछ कम आश्चर्यकारी नहीं―पत्थरों की एक विशाल राशि, जिसके आगे मनुष्य तुच्छ प्रतीत होता है। समुद्र की विशालता को लीजिए। कितनी अथाह-जलराशि होती है। सूर्य पृथिवी से १३ लाख गुणा बड़ा है। पृथिवी की परिधि आश्चर्यकारी है, परन्तु पृथिवी से १३ लाख गुणा बड़ा सूर्य विशालता की दृष्टि से क्या कम विस्मयकारी है? और फिर सूर्य के समान ब्रहाण्ड में करोड़ों सूर्य हैं। क्या यह संसार किसी अद्भुत रचयिता की ओर संकेत नहीं कर रहा है?

      जहाँ संसार की विशालता आश्चर्यकारी है, वहाँ सृष्टि की सूक्ष्मता भी कम विस्मयकारी नहीं। बड़े-से-बड़े हाथी को देखकर जहाँ आश्चर्य होता है, वहाँ चींटी-जैसे सूक्ष्म प्राणियों को देखकर भी विस्मय होता है। संसार की यह सूक्ष्मता भी किसी रचयिता की ओर संकेत कर रही है।

     कुछ लोग कहते हैं कि यह संसार अकस्मात् बना है। कोई भी घटना पूर्व-परामर्श अथवा पूर्व-प्रबन्ध के बिना नहीं होती। बाजार में दो व्यक्तियों का अकस्मात् मिलन उनकी इच्छा-शक्ति से प्रेरित होकर किसी उद्देश्य के लिए घर से निकलने का परिणाम है। अकस्मात् वाद का आश्रय लेकर यदि कोई कहे कि देवनागरी के अक्षरों को उछालते रहने से ‘रामचरित मानस’ की रचना हो जाएगी तो उनकी यह कल्पना असम्भव है। ‘रामचरित मानस’ की रचना के पीछे किसी ज्ञानवान् चेतन सत्ता की आवश्यकता है।

      कुछ लोग कहते हैं कि संसार का बनाने वाला कोई नहीं। जो कुछ बनता है वह नेचर अथवा कुदरत से बनता है। प्रश्न यह है कि नेचर अथवा कुदरत किसे कहते हैं? यदि नेचर का अर्थ सृष्टिनियमों से है तो सृष्टियों का कोई नियामक चाहिए। कुदरत अरबी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ है सामर्थ्य। सामर्थ्य, बिना सामर्थ्यवान् के टिक नहीं सकता। सामर्थ्यवान् कोई चेतन सत्ता ही हो सकती है।

      स्वभाववादी, स्वभाव से ही संसार को बना हुआ मानते हैं। किन्तु तथ्य यह है कि यदि परमाणुओं में मिलने का स्वभाव होगा तो वे अलग नहीं होंगे, सदा मिले रहेंगे। यदि अलग रहने का स्वभाव है तो परमाणु मिलेंगे नहीं; सृष्टि-रचना नहीं हो पाएगी। यदि मिलने वाले परमाणुओं की प्रबलता होगी तो वे सृष्टि को कभी बिगड़ने नहीं देंगे। यदि अलग-अलग रहने वाले परमाणुओं की प्रबलता होगी तो सृष्टि कभी नहीं बन पाएगी। यदि बराबर होंगे तो सृष्टि न बन पाएगी, न बिगड़ेगी।

      जैनी ऐसी शंका करते हैं कि ईश्वर तो क्रियाशून्य है, अत: वह जगत् को नहीं बना सकता। वे इस यथार्थ को भूल जाते हैं कि क्रिया की आवश्यकता एकदेशीय कर्त्ता को पड़ती है। जो परमात्मा सर्वदेशी है उसे क्रिया की आवश्यकता ही नहीं होती। वह सर्वव्यापक होने से ही संसार की रचना करने में समर्थ होता है, जैसे शरीर में आत्मा के स्थित होने के कारण शरीर सब प्रकार की चेष्टाएँ करता है।

     जब परमात्मा आनन्दस्वरुप है तो वह आनन्द छोड जगत् के प्रपंच में क्यों फँसता है?―यह बात निर्मूल है क्योंकि, प्रपंच में फँसने की बात एकदेशी पर लागू होती है, सर्वदेशी पर नहीं।

UNKNOWN INDIAN HEROES

UNKNOWN INDIAN HEROES

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NAGABHATTA 

          He was an Indian king who founded the imperial Gurjara Pratihara dynasty. He ruled the Avanti (or Malava) region in present-day Madhya Pradesh, from his capital at Ujjain. He possibly extended his control over the Gurjara country, which includes parts of present-day Gujarat and Rajasthan. He repulsed an Arab invasion from Sindh led by Arab generals probably by Junayd ibn Abd al-Rahman al-Murri or by Al Hakam ibn Awana . But Nagabhata seems to be defeated by the Rashtrakuta king Dantidurga.
      Nagabhata has been named as the founder of the imperial Pratihara dynasty in the Gwalior inscription of his descendant Mihira Bhoja. The exact date of Nagabhata’s accession is not known. His grand-nephew Vatsaraja is known to have been ruling in Avanti in 783-784 CE. Assuming a period of 25 years for each generation, Nagabhata can be presumed to have ascended the throne around 730 CE.

       The Gwalior inscription traces the dynasty’s origin to the legendary hero Lakshmana Nagabhata’s historical antecedents are not fully known, but he ruled from Ujjain in Avanti region. The Jain text Harivamsa (783-784 CE) states that his grand-nephew Vatsaraja was the king and son of Avanti soil (Avanti-bhūbriti). It also describes the other neighbouring kingdoms leaving one in no doubt about its location. The 871 CE Sanjan copper-plate inscription of the Rashtrakuta ruler Amoghavarsha also suggests the association of the Gurjara-Pratiharas with Ujjain. Based on this, a number of historians, including R. C. Majumdar and Baij Nath Puri, hold the view that Ujjain, the capital of Avanti, was the original home of Nagabhata’s dynasty.

      Dasharatha Sharma, on the other hand, theorized that Nagabhata originated from present-day Rajasthan. His theory is based on the identification of Nagabhata with Nāhada, who is mentioned in a medieval Jain prabandha (legendary chronicle) as a “soldier of fortune” and the first ruler of his family. The text states that Nāhada made Jābālipura (identified with Jalor) his capital and came into conflict with a Muslim ruler, whom he defeated. Sharma put forward the view that Jalor was the original home of the Gurjara-Pratiharas, from where they might have emigrated.

Arab invasion

      According to the Gwalior inscription of his descendant Mihira Bhoja, Nagabhata repulsed a mlechchha invasion. These mlechchhas are identified with the Arab Muslim invaders. The 9th century Muslim historian Al-Baladhuri refers to Arab invasions of Uzain (Ujjain); this appears to be a reference to their conflict with Nagabhata. The invasion was led by Junayd ibn Abd al-Rahman al-Murri or by Al Hakam ibn Awana , a general and governor of Sindh under the Umayyad caliph Hisham ibn Abd al-Malik. Al-Baladhuri mentions the conquests of several other places by these invaders, but about Ujjain, he only mentions that the city was invaded. This appears to be a tacit admission that the invasion was unsuccessful.

        The semi-legendary Guhila ruler Bappa Rawal is also said to have repulsed an Arab invasion. Historian R. V. Somani theorizes that he was a part of an anti-Arab confederacy formed by Nagabhata.

Battle with Rashtrakutas

        Nagabhata appears to have been defeated by the Rashtrakuta ruler Dantidurga. According to the Rashtrakuta records, the ruler of Malava was among the kings defeated by Dantidurga. The Sanjan inscription of Dantidurga’s descendant Amoghavarsha states that Dantidurga performed a religious ceremony at Ujjayini (Ujjain, the capital of Nagabhata). During this ceremony, the Lord of Gurjara (Gurjaresha) acted as a pratihara (door-keeper) of Dantidurga. The usage of the word pratihara seems to be a word play, suggesting that the Rashtrakuta king subdued the Gurjara-Pratihara king who was ruling Avanti at that time.

Identification with Nagavaloka

       The 756 CE Hansot inscription of a Chahamana ruler Bhartrvaddha records the grant of a village during the reign of his overlord Nagavaloka. D. R. Bhandarkar and other historians have identified Nagavolka with Nagabhata. If this assumption is true, it is possible that after the Rashtrakutas left, Nagabhata regained his power, and and conquered the area around Bhrigukachchha (Bharuch), where a Chahamana branch ruled under his suzerainty. According to historian B. N. Puri, Nagabhata may have conquered this region from Chalukya feudatory Avanijanashraya Pulakeshin. Thus, besides Malwa, Nagabhata’s kingdom may have comprised parts of present-day Gujarat and Rajasthan.

       The Ragholi copper-plate inscription of the Shaila dynasty ruler Jayavardhana states that his ancestor Prithuvardhana defeated a Gurjara ruler. R. C. Majumdar believed that the defeated ruler might have been Nagabhata. However, B. N. Puri disagrees with this theory, and believes that Prithuvardhana ruled around 694 CE, several years before Nagabhata’s ascension.

         An inscription of Gallaka, a subordinate of Vatsaraja, in the year 795 regards Nagabhata I as the one who had acquired victory over the “invincible Gurjaras” and obtained fame. Thus, even though the dynasty is called Gurjara-Pratiharas, it is not certain if the kings themselves were from Gurjara tribe.

       Nagabhatta had no sons to inherit his vast and strong kingdom. However he was succeeded by Kakustha and Devaraja, who were sons of his elder brother